Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

बालू के गोपाल ब्रज के पास एक गांव में मंदिर के बाहर एक महाराज कृष्ण भगवान की कथा सुनाते हुए कृष्ण भगवान के सुंदर बाल रूप का वर्णन कर रहे थे। उसी समय एक ठग बालू वहां से गुजर रहा था। वह भी थोड़ी देर कथा सुनने के लिए रुक गया। उस समय महाराज कृष्ण भगवान के आभूषणों का वर्णन करते हुए कह रहे थे "उस बालक के सिर पर हीरे मोती जड़े मोर मुकुट,गले में मोतियों की माला,कानों में रत्नजड़ित कुंडल,बाहों में बाजूबंद,उंगलियों में अंगूठियां,कमर में छोटी छोटी घंटियों वाला कमरबंद,पैरों में नूपुर वाले सुंदर पायल थे।यशोदा माता प्रतिदिन उनका श्रृंगार करती थीं।बालक अपने साथियों के साथ गाय चराने जाते थे ।' बालू ने यह सुनकर सोचा कि अगर यह बालक मुझे मिल जाए तो मुझे किसी को ठगने की जरूरत नहीं पड़ेगी ।परंतु यह बालक मिलेगा कहाँ। जरूर महाराज यह जानते होंगे।

वह कथा समाप्त होने की प्रतीक्षा करने लगा ।जब कथा समाप्त हुई और सारे भक्त चले गए तब बालू महाराज के पास पहुंचा और कहने लगा ‘ अभी आप जिस बालक का वर्णन कर रहे थे वह मुझे कहां मिलेगा।’
महाराज उसकी बात सुनकर मुस्कुराने लगे और यूँ ही कह दिया यहीं पास में वृंदावन के जंगल में यह बालक गाय चराते तुम्हें मिलेगा।’ बालू उसी दिन अपने मन में संकल्प करके निकला कि इस बालक से तो मुझे मिलना ही है और इसके सारे आभूषण में ठग कर ले लूंगा ।वह महाराज द्वारा बताए गए स्थान में पहुंचकर बालक की प्रतीक्षा करने लगा।
कुछ समय बाद उसने देखा कि गाय के झुंड आ रहे हैं और पीछे पीछे एक बालक बांसुरी बजाता हुआ आ रहा है ।बालू ने देखकर सोचा ‘यह बालक तो छोटा सा है, इसे तो पकड़ना और ठगना आसान है।’
जैसे ही बालक पास आया बालू ने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा ‘अपने सारे आभूषण निकाल कर मुझे दे दो ।’
बालक बालू से नहीं डरा ।उसने मुस्कुराते हुए सारे आभूषण बालू को उतारने दिए। बालू ने सारे आभूषण अपने गमछे में बांध लिये।हीरे मोती जड़े हुए स्वर्ण आभूषण थे। बालू तो इन आभूषणों को देखकर बहुत ही खुश हो गया।
उसने बालक से कहा ‘तुमने इतनी आसानी से सारे आभूषण दे दिये।तुम्हारे माता पिता तुमसे कुछ नहीं कहेंगे।’
बालक ने भोलेपन से कहा’ मेरे पास ऐसे ही और आभूषण हैं ।मैं दूसरे पहन लूंगा।’
बालू ने मन ही मन सोचा वाह ऐसे ही और आभूषण मिल जाएं तो क्या कहना।उसने बालक से कहा ‘ठीक है कल फिर आना ‘और अपनी राह ली।
रास्ते में वह सोचने लगा कि उस महाराज के कारण ही मुझे इतने कीमती आभूषण मिले हैं। कथा सुनने के बाद भक्तजन महाराज को दक्षिणा दे रहे थे ।मुझे भी कुछ दक्षिणा देनी चाहिए । मुझे भी महाराज को कुछ आभूषण दे देना चाहिए । वह महाराज के पास गया और गमछा खोल कर कहने लगा ‘महाराज आप इसमें से कुछ आभूषण ले लीजिए।”
महाराज आभूषणों कोई देखकर आश्चर्यचकित रह गए ।उन्होंने बालू से पूछा ‘तुम यह सब कहां से लेकर आ रहे हो?’
बालू ने बताया ‘ आपने सुबह मुझे उस बालक के मिलने का जो स्थान बताया था, मैं उसी स्थान पर गया और उस बालक से मिला । उसने अपने पहने हुए आभूषण मुझे आसानी से दे दिए।’
महाराज पहले तो विश्वास नहीं कर पाए ।फिर उन्होंने आभूषणों को उलट पलट के देखा तो उन्हें मोर मुकुट दिखाई दिया ।उन्होंने बालू से कहा ‘मुझे भी उस बालक के दर्शन करने थे ।’
बालू ने कहा ‘वह कल फिर आएगा। आप कल मेरे साथ चलिएगा और उसे देख लीजिएगा।’
दूसरे दिन महाराज बालू के साथ उसी स्थान पर जाकर एक पेड़ के पीछे छिपकर बालक की प्रतीक्षा करने लगे ।थोड़ी देर की प्रतीक्षा के बाद काल के जैसे ही गायों के झुंड के पीछे पीछे बांसुरी बजाता हुआ सुंदर बालक दिखाई दिया। बालू ने महाराज से कहा ‘आप यहीं छिपे रहिए। पहले मुझे बालक के आभूषण लेने दीजिये।’
महाराज तो उस सुंदर बालक के रूप को देखकर ही मोहित हो गए थे। उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बह रही थी।
बालू बालक से बात करते करते एक एक आभूषण निकालते जा रहा था। बालक भी मुस्कुराते हुए आभूषणों को देते जा रहा था।
सारे आभूषण निकालने के बाद बालू ने बालक से कहा ‘ एक महाराज भी मेरे साथ में आए हैं । तुमसे मिलना चाहते हैं। ‘
बालक ने कहा ‘ठीक है,उन्हें बुला लो।’
बालू ने महाराज को आवाज दी । महाराज जी तो मूर्ति के समान खड़े थे।बालू ने उनके पास आकर उनको हिलाया और कहा चलिए।
महाराज बालक के सामने आए और उसके चरणों में गिरकर अपने आंसुओं से उनके चरण धोने लगे ।बालू यह देख कर आश्चर्यचकित हो गया कि महाराज जी तो स्वयं इतने विद्वान हैं ,सब लोग तो इनके चरण छूते हैं । यह छोटे से बालक के चरण क्यों छू रहे हैं ।बालक ने बड़े प्रेम से महाराज जी को उठाया उनके आंसू पोंछे। बालू ने महाराज से पूछा
‘ आप इसके चरण क्यों छू रहे हैं? यह तो छोटा सा बालक है।’
तब महाराज ने उसे बताया कि ‘यह तो परमानंद भगवान
जगत के स्वामी गोपाल हैं, जिनकी मैं जीवन भर आराधना करता रहा और कथा सुनाता रहा। इन्होंने कभी मुझे दर्शन नहीं दिए। आज तुम्हारे कारण मुझे अपने आराध्य गोपाल जी के दर्शन हो गए । तुम्हारे विश्वास के कारण ही आज गोपाल जी ने तुम्हें दर्शन दिए हैं ।’
गोपाल जी ने दोनों को ही आशीर्वाद दिया और अपने लोक चले गए। बालू को यह सब सुनकर पश्चाताप होने लगा कि मैंने भगवान को ही ठग लिया । महाराज ने उसे समझाया कि तुम्हारे कारण आज मुझे भी उनके दर्शन हुए हैं ।
बालू की आंखें खुल गई। वह महाराज जी के साथ ही रहने लगा और गोपालजी की भक्ति में अपना शेष जीवन बिताने लगा।

संकलित
नीरजा नामदेव

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