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गौ हत्या


गौ हत्या बंद करवाने के लिए पूज्य करपात्री जी महाराज जब संतों और गौभक्तों को लेकर संसद का घेराव करने लगें तब इंदिरा गांधी ने हजारों संतों और गौभक्तों पर गोलियाँ चलवा दी थी. कहते हैं करपात्री जी ने इस अपराध के लिए कुपित होकर इंदिरा गांधी के वंश के विनाश का शाप दे दिया था. लेकिन यह चिंता करनेवाली बात है कि जिस पर करपात्री जी महाराज जैसे संत कुपित होकर शाप दे रहे थें, उसी इंदिरा गांधी पर सनातन धर्म के महान संत देवहरा बाबा का वरदहस्त था. 1977 में इंदिरा गांधी के चुनाव हारने के बाद देवरहा बाबा ने ही अपने आशीर्वाद के वरद मुद्रा को कांग्रेस का चुनाव चिन्ह बनाने का संकेत दिया और 1978 से आजतक कांग्रेस का चुनाव चिन्ह देवरहा बाबा के आशीर्वाद का प्रतिनिधि वही पंजा है, जिस खूनी कांग्रेसी पंजे ने माँ भारती सहित भारत की धर्म, संस्कृति, विरासत आदि को लहूलुहान कर दिया है.

यही नहीं आनंदमयी माँ ने इंदिरा गांधी को एक दिव्य रुद्राक्ष माला प्रदान किया था, जो माला जबतक उनके गले में था वो सुरक्षित रहीं. जिस दिन उन्होंने उसे किसी कारण से नहीं पहन रखा था, उसी दिन उनकी हत्या हो गई थी. अर्थात जिन इंदिरा गांधी ने अली-कुली का नारा देकर असम में बंगलादेशियों को बसा कर वहाँ के लोकल जनसंख्या का संतुलन सिर्फ अपने वोट बैंक के लिए बिगाड़ दिया, जिसकी बहुत बड़ी कीमत आज देश चुका रहा है और इससे भी बड़ी कीमत आगे देश को चुकाना है, उसी इंदिरा गांधी को देश के दिव्य विभूतियों का आशीर्वाद प्राप्त था.

इंदिरा गांधी ने जब वामपंथियों से सत्ता में समर्थन लिया तब वामपंथियों ने बदले में शिक्षण संस्थान पर न सिर्फ कब्जा किया बल्कि रसियन पब्लिकेशन की देश में बाढ़ आ गई. लाखों वामपंथी पुस्तकों से हमारे पूरी पीढ़ी का ब्रेनवॉश करके उन्हें सनातन धर्म का विरोधी बना दिया गया. जब सनातन धर्म ही नहीं बचेगा तो सनातन की सेक्युलर चेतना के साथ पैदा होनेवाले देवहरा बाबा और आनंदमयी माँ के आगे धरा पर आने की परिस्थितियाँ कभी नहीं बन पायेंगी. आज बामियान और पेशावर में कोई आनंदमयी माँ पैदा नहीं हो रही हैं, जो कभी भारत ही था. धीरे-धीरे भारत के भीतर कई अघोषित बामियान और पेशावर बनते जा रहे हैं और भारत सिकुड़ता जा रहा है.

वामपंथियों ने जो हमारी नस्ल को खोखला किया है उसकी जड़ में इंदिरा गांधी हैं और उससे भी बड़े गुनाहगार इंदिरा गांधी को अपनी दिव्य चमत्कारी शक्तियों से बचाने वाले स्प्रिच्युअल गॉड मैन लोग हैं. देवहरा बाबा जिस राजीव गांधी को अपना प्यारा बच्चा बताते थें, उसी बाबा के प्यारे ने इस देश को उपहार में एक ऐसी विषकन्या दिया है जिसके जहर से सनातन धर्म की आत्मा नीली पड़ गयी है और वो मरणासन्न पड़ी है. ये दिव्य संत अपनी व्यक्तिगत साधना के लिए भले महान हों, पर लोकोपकार की दृष्टि से इन्होंने सृजन से अधिक सनातन धर्म का विनाश कर दिया है.

जिस पवित्र गांधी परिवार को देवहरा बाबा और आनंदमयी माँ जैसी दिव्य विभूतियाँ प्रोटेक्ट कर रही थीं, आज अगर साधारण स्वार्थ में डूबे नेता या नौकरशाह उस पवित्र परिवार के लिए अपनी वफादारी दिखाते हैं तो उन्हें हम माँ भारती का अपराधी क्यों मानते हैं? अगर दोषी हैं तो सभी दोषी हैं. हम एक का तो जयचंद कहकर तिरस्कार कर रहे हैं और दूसरे की महानता का यशोगान सुनाते नहीं थक रहे हैं. ऐसे हजारों महात्माओं से श्रेष्ठ राजर्षि नरेन्द्र मोदी जी हैं जो सही मायने में मरणासन्न सनातन धर्म को बचाने की एक आखिरी कोशिश कर रहे हैं. इस एक दूरदर्शी मोदी पर ऐसे हजारों सेक्युलर गॉड मैन कुर्बान हैं जिनमें चमत्कार करने की तो शक्ति थी पर दूरदर्शिता का घोर अभाव था.

Rahul Sing Rathore

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अहिल्याबाई होल्कर


आज 31 मई को तपस्वी राजमाता अहिल्याबाई होल्कर (Devi Ahilyabai Holkar) की जन्मजयंती है।

भारत में जिन महिलाओं का जीवन आदर्श, वीरता, त्याग तथा देशभक्ति के लिए सदा याद किया जाता है, उनमें #रानी_अहिल्याबाई_होल्कर का नाम प्रमुख है। उनका जन्म 31 मई, 1725 को ग्राम छौंदी (अहमदनगर, महाराष्ट्र) में एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। इनके पिता श्री मनकोजी राव शिन्दे परम शिवभक्त थे। अतः यही #संस्कार बालिका अहल्या पर भी पड़े।

एक बार #इन्दौर के राजा मल्हारराव होल्कर ने वहां से जाते हुए मन्दिर में हो रही आरती का मधुर स्वर सुना। वहां पुजारी के साथ एक बालिका भी पूर्ण मनोयोग से आरती कर रही थी। उन्होंने उसके पिता को बुलवाकर उस बालिका को अपनी पुत्रवधू बनाने का प्रस्ताव रखा। मनकोजी राव भला क्या कहते; उन्होंने सिर झुका दिया। इस प्रकार वह आठ वर्षीय बालिका इन्दौर के राजकुंवर खांडेराव की पत्नी बनकर राजमहलों में आ गयी।

इन्दौर में आकर भी अहिल्या पूजा एवं आराधना में रत रहती। कालान्तर में उन्हें दो पुत्री तथा एक पुत्र की प्राप्ति हुई। 1754 में उनके पति खांडेराव एक युद्ध में मारे गये। 1766 में उनके ससुर मल्हार राव का भी देहांत हो गया। इस संकटकाल में रानी ने तपस्वी की भांति श्वेत वस्त्र धारण कर राजकाज चलाया; पर कुछ समय बाद उनके पुत्र, पुत्री तथा पुत्रवधू भी चल बसे। इस वज्राघात के बाद भी रानी अविचलित रहते हुए अपने कर्तव्यमार्ग पर डटी रहीं।

ऐसे में पड़ोसी राजा पेशवा राघोबा ने इन्दौर के दीवान गंगाधर यशवन्त चन्द्रचूड़ से मिलकर अचानक हमला बोल दिया। रानी ने धैर्य न खोते हुए पेशवा को एक मार्मिक पत्र लिखा। रानी ने लिखा कि “यदि युद्ध में आप जीतते हैं, तो एक विधवा को जीतकर आपकी कीर्ति नहीं बढ़ेगी। और यदि हार गये, तो आपके मुख पर सदा को कालिख पुत जाएगी। मैं मृत्यु या युद्ध से नहीं डरती। मुझे राज्य का लोभ नहीं है, फिर भी मैं अन्तिम क्षण तक युद्ध करूंगी।”

इस पत्र को पाकर पेशवा राघोबा चकित रह गया। इसमें जहां एक ओर रानी अहिल्याबाई ने उस पर कूटनीतिक चोट की थी, वहीं दूसरी ओर अपनी कठोर संकल्पशक्ति का परिचय भी दिया था। रानी ने देशभक्ति का परिचय देते हुए उन्हें अंग्रेजों के षड्यन्त्र से भी सावधान किया था। अतः उसका मस्तक रानी के प्रति श्रद्धा से झुक गया और वह बिना युद्ध किये ही पीछे हट गया।

रानी के जीवन का लक्ष्य राज्यभोग नहीं था। वे प्रजा को अपनी सन्तान समझती थीं। वे घोड़े पर सवार होकर स्वयं जनता से मिलती थीं। उन्होंने जीवन का प्रत्येक क्षण राज्य और धर्म के उत्थान में लगाया। एक बार गलती करने पर उन्होंने अपने एकमात्र पुत्र को भी हाथी के पैरों से कुचलने का आदेश दे दिया था; पर फिर जनता के अनुरोध पर उसे कोड़े मार कर ही छोड़ दिया।

धर्मप्रेमी होने के कारण रानी ने अपने राज्य के साथ-साथ देश के अन्य तीर्थों में भी मंदिर, कुएं, बावड़ी, धर्मशालाएं आदि बनवाईं। काशी का वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर 1780 में उन्होंने ही बनवाया था। उनके राज्य में कला, संस्कृति, शिक्षा, व्यापार, कृषि आदि सभी क्षेत्रों का विकास हुआ।

13 अगस्त, 1795 ई0 को 70 वर्ष की आयु में उनका देहान्त हुआ। उनका जीवन धैर्य, साहस, सेवा, त्याग और कर्तव्यपालन का पे्ररक उदाहरण है। इसीलिए एकात्मता स्तोत्र के 11वें श्लोक में उन्हें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, चन्नम्मा, रुद्रमाम्बा जैसी वीर नारियों के साथ याद किया जाता है।

(संदर्भ : राष्ट्रधर्म मासिक, मई 2011)

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मध्यप्रदेश में आगर मालवा नाम का जिला हैं।


मध्यप्रदेश में आगर मालवा नाम का जिला हैं। वहाँ के न्यायालय में सन 1932 ई. में जयनारायण शर्मा नाम के वकील थे। उन्हें लोग आदर से बापजी कहते थे। वकील साहब बड़े ही धार्मिक स्वभाव के थे और रोज प्रातःकाल उठकर स्नान करने के बाद स्थानीय बैजनाथ मन्दिर में जाकर बड़ी देर तक पूजा व ध्यान करते थे। इसके बाद वे वहीं से सीधे कचहरी जाते थे।

घटना के दिन बापजी का मन ध्यान में इतना लीन हो गया कि उन्हें समय का कोई ध्यान ही नहीं रहा। जब उनका ध्यान टूटा तब वे यह देखकर सन्न रह गये कि दिन के तीन बज गये थे। वे परेशान हो गये क्योंकि उस दिन उनका एक जरूरी केस बहस में लगा था और सम्बन्धित जज बहुत ही कठोर स्वभाव का था। इस बात की पूरी सम्भावना थी कि उनके मुवक्किल का नुकसान हो गया हो। ये बातें सोचते हुए बापजी न्यायालय पहुँचे और जज साहब से मिलकर निवेदन किया कि यदि उस केस में निर्णय न हुआ हो तो बहस के लिए अगली तारीख दे दें।

जज साहब ने आश्चर्य से कहा ”यह क्या कह रहे हैं। सुबह आपने इतनी अच्छी बहस की। मैंने आपके पक्ष में निर्णय भी दे दिया और अब आप बहस के लिए समय ले रहे हैं।“

जब बापजी ने कहा कि मैं तो था ही नहीं तब जजसाहब ने फाइल मँगवाकर उन्हें दिखायी। वे देखकर सन्न रह गये कि उनके हस्ताक्षर भी उस फाइल पर बने थे। न्यायालय के कर्मचारियों, साथी वकीलों और स्वयं मुवक्किल ने भी बताया कि आप सुबह सुबह ही न्यायालय आ गये थे और अभी थोड़ी देर पहले ही आप यहाँ से निकले हैं।

बापजी की समझ में आ गया कि उनके रूप में कौन आया था। उन्होंने उसी दिन संन्यास ले लिया और फिर कभी न्यायालय या अपने घर नहीं आये।

इस घटना की चर्चा अभी भी आगर मालवा के निवासियों और विशेष रूप से वकीलों तथा न्यायालय से सम्बन्ध रखनेवाले लोगों में होती है। न्यायालय परिसर में बापजी की मूर्ति स्थापित की गयी है। न्यायालय के उस कक्ष में बापजी का चित्र अभी भी लगा हुआ है जिसमें कभी भगवान बापजी का वेश धरकर आये थे। यही नहीं लोग उस फाइल की प्रतिलिपि कराकर ले जाते हैं जिसमें बापजी के रूप मे आये भगवान ने हस्ताक्षर किये थे और उसकी पूजा करते हैं।

मूल लेखक : Ajay Rachnekar

Naman Jain की पोस्ट से साभार

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एकलव्य और बर्बरीक


महाभारत को काल्पनिक कहने वाले कभी एकलव्य को काल्पनिक नहीं कहते हैं। वैसे सनातनी आस्था वाले लोग तो महाभारत को भी वास्तविक ही मानते हैं और महाभारत की घटनाओं को भी, जो कि सर्वथा उचित भी है। महर्षि वेदव्यास प्रणीत सर्वलोकोपकारी, इस विशाल महाग्रंथ में सभी कर्तव्य, धर्म और तत्वों का सार निहित है। हम आज इस बात पर चर्चा करेंगे कि क्या एकलव्य और बर्बरीक पर कोई अत्याचार हुआ था ? क्या एकलव्य का अंगूठा कटवाना अथवा महाभारत युद्ध से पूर्व ही बर्बरीक का मस्तक काटना, अत्याचार या शोषण नहीं था ? महाभारत स्वयं तो एकलव्य एवं बर्बरीक का कोई विस्तृत वर्णन नहीं करता, अपितु सांकेतिक वर्णन करता है, किन्तु उसके खिलभाग हरिवंशम् में अथवा वेदव्यास कृत अन्य ग्रंथों में इनका व्यापक वर्णन मिलता है।

सर्वप्रथम हम बर्बरीक पर चर्चा करेंगे। बर्बरीक अत्यंत पराक्रमी राक्षस थे। ये भीम और हिडिम्बा के संयोग से उत्पन्न राक्षसराज घटोत्कच, जो कामाख्या के निकट में मायांग (मायोंग) के राजा थे, के पुत्र थे। इनके भाई का नाम अञ्जनपर्वा एवं माता का नाम कामकटंकटा था। मतांतर से कामकटंकटा का नाम मौर्वी भी था क्योंकि यह मुर दैत्य की पुत्री थी। मुर दैत्य प्राग्ज्योतिषपुर (लगभग आज का पूरा असम) के राजा नरकासुर का दुर्गप्रहरी था। घटोत्कच का नाम उनसे केशहीन होने के कारण पड़ा तो बर्बरीक का नाम उनके विशाल एवं कठोर केशों के ही कारण था, जैसा कि स्कन्दपुराण के कौमारिकाखण्ड का वचन है

बर्बराकारकेशत्वाद्बर्बरीकाभिधो भवान्॥

बर्बरीक राक्षसकुल में जन्म लेने के बाद भी अत्यंत संस्कारी एवं धर्मपरायण थे। ये कभी अपने सामर्थ्य का प्रयोग संसार को पीड़ा देने के लिये नहीं करते थे। भगवान् श्रीकृष्ण ने इन्हें धर्मशास्त्रों के तत्व की विशेष शिक्षा दी थी एवं चारों वर्णों के कर्तव्य का बोध कराकर देवी की तपस्या करने के लिए गुह्यतीर्थ (कामाख्या) में भेज दिया। वैसे भी बर्बरीक के पिता का राज्य वहां से दो योजन (लगभग 25 किमी) की दूरी पर ही था।

उस गुह्यतीर्थ में विजय नाम के एक तपस्वी ब्राह्मण अपनी साधना कर रहे थे। उनकी तपस्या में विघ्न उत्पन्न करने के लिए अनेकों हिंस्र जंतु, पिशाच एवं राक्षसों के झुंड आते थे। बर्बरीक ने उन सबका संहार करके विजय मुनि की रक्षा की। अपनी तपस्या पूर्ण होने पर विजय ने हवन का भस्म एवं देवी का सिन्दूर दिया। उसमें त्रिलोक का संहार करने की क्षमता थी। बाद में बर्बरीक ने भी देवी की आराधना करके उनसे दिव्य बाण आदि की प्राप्ति की।

एक बार वनवास के मध्य भीमसेन ने किसी जलस्रोत को प्रदूषित कर दिया था तो बर्बरीक ने उन्हें ऐसा करने से रोका। उस समय तक बर्बरीक ने पांडवों को देखा नहीं था। अपने बल के अभिमान में भीमसेन ने बर्बरीक का अपमान किया तो बर्बरीक उन्हें उठाकर समुद्र में फेंकने के लिए चल पड़े। बाद में आकाशवाणी हुई कि ये तुम्हारे पितामह भीमसेन हैं, तब बर्बरीक ने उन्हें छोड़ा। भीमसेन ने भी प्रकृति को प्रमादवश प्रदूषित करने के लिए क्षमा मांगी थी। यह सब कथाएं स्कन्दपुराण आदि में विस्तार से वर्णित हैं। अब हम उस प्रसङ्ग पर आते हैं जहां महाभारत के युद्ध से पूर्व सभी योद्धागण अपने अपने दिव्यास्त्रों की सीमा और क्षमता का आंकलन कर रहे थे। पाण्डवों के पक्ष से युद्ध में सम्मिलित हुए बर्बरीक ने कहा कि मैं क्षणमात्र में ही उपस्थित दोनों सेनाओं के संहार कर सकता हूँ। इस बात को अविश्वसनीय मानकर सभी वीरों ने उपहास किया। भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा कि जिस सेना को जीतना देवतागण के लिए भी दुष्कर है उसे तुम अकेले ही क्षणमात्र में कैसे संहार कर सकते हो, इसका प्रमाण दो। भगवान् की बात को सुनकर बर्बरीक ने कहा कि यदि मर्म का बोध हो तो एक ही प्रहार से शत्रु को मारा जा सकता है (इसी विचारधारा का प्रयोग मार्शल आर्ट्स वाले करते हैं)

बर्बरीक ने अपने दिव्य तीन बाणों इन से एक बाण को विप्रदत्त सिन्दूर से अभिमंत्रित किया और मर्मनिरीक्षण किया। उनके द्वारा चलाए गए बाण से जो सिन्दूर निकला वह विस्तृत होकर दोनों सेनाओं में गिरा। द्रोण, द्रुपद एवं विराट के कंठ पर सिन्दूर गिरा। दुर्योधन की जंघा, भगदत्त की नासिका भाग एवं शल्य की छाती पर सिन्दूर लगा। भीष्म पितामह के सभी रोमकूपों में सिन्दूर व्याप्त हो गया और भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में भी लगा। कृपाचार्य और अश्वत्थामा को चिरंजीवी होने से सिन्दूर नहीं लगा एवं पाण्डवों को भी नहीं लगा। आप ध्यान देंगे तो उन वीरों का जिस जिस अंग में सिन्दूर लगा था, महाभारत के युद्ध में उसी अंग पर प्रहार होने से उनकी मृत्यु हुई थी। कालांतर में जब श्रीकृष्ण भी धराधाम को त्याग रहे थे तो जरा नामक व्याध के द्वारा पैरों में ही बाण लगने का निमित्त बनाया था।

इस प्रकार सबों के मर्म का निरीक्षण करके बर्बरीक ने उन सबों को मारने की इच्छा से दूसरे बाण का सन्धान किया। इसी मध्य भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने चक्र से बर्बरीक का मस्तक काट दिया। इस अप्रत्याशित घटना से सभी लोग हतप्रभ रह गए। घटोत्कच तो अपने पुत्र की मृत्यु पर मूर्छित सा हो गया एवं पाण्डव भी शोकाकुल हो गए, सभी लोग श्रीकृष्ण को दोषी कहने लगे। उसी समय चण्डिका, वाराही आदि चौदह देवियां प्रकट हुईं एवं एक रहस्य बताया।

देवियों ने कहा – पूर्वकाल में यह बर्बरीक सूर्यवर्चा नामक यक्ष था जो चौरासी करोड़ यक्षों (अथवा मुद्राओं) का स्वामी था। जब स्वर्गलोक में देवताओं की सभा हो रही थी कि पृथ्वी के भारहरण के लिए भगवान् विष्णु का अवतार होना चाहिए एवं उनके साथ ही अन्य देवताओं को भी जाना चाहिए, उस समय एक घटना घटी।

एतस्मिन्नन्तरे बाहुमुद्धृत्योच्चैरभाषत।
सूर्यवर्चेति यक्षेन्द्रश्चतुराशीतिकोटिपः।
किमर्थं मानुषे लोके भवद्भिर्जन्म कार्यते॥
मयि तिष्ठति दोषाणामनेकानां महास्पदे।
सर्वे भवन्तो मोदन्तु स्वर्गेषु सह विष्णुना॥
(स्कन्दपुराण, माहेश्वरखण्ड-कौमारिकाखण्ड, अध्याय – ६६, श्लोक – ५८-६०)

इसी बीच चौरासी करोड़ के स्वामी सूर्यवर्चा नामक यक्ष ने अपनी भुजाएं उठाकर उच्चस्वर से यह उद्घोष-लोग व्यर्थ में ही मनुष्य योनि में जन्म लेना चाहते हैं। पृथ्वी के भार हरण के लिए तो मैं ही पर्याप्त हूँ, मेरे रहते हुए आपलोग क्यों कष्ट करेंगे। युद्ध में बहुत अधिक दोष होते हैं (अतएव बिना सामूहिक युद्ध के अकेले ही सबको मार दूंगा) आप सभी देवगण स्वर्गादि दिव्यलोकों में विष्णु के साथ आनन्दित रहें।

सूर्यवर्चा यक्ष के ऐसा कहने से सभी देवताओं को अपमान का अनुभव हुआ। भगवान् के अवतार का उद्देश्य मात्र संसार के अधर्मियों के नाश करना नहीं होता है, वे लोकमर्यादा की शिक्षा एवं धर्म की स्थापना के लिए भी आते हैं। नानाविध प्रकार से उनके लीलाभाव में सम्मिलित होने की इच्छा वाले भक्तों की कामनापूर्ति भी करते हैं, यद्यपि भगवान् भृकुटिविलासमात्र से सृष्टि संहार में समर्थ हैं फिर भी अवतार लेते हैं। अवतारभेद के उद्देश्य का ज्ञान न रखने वाले उस बलाभिमानी यक्ष को उस सभा में ब्रह्मदेव ने श्राप दिया – तुम पृथ्वी पर राक्षसकुल में जाओगे, अत्यन्त पराक्रमी भी बनोगे किन्तु जब मुख्य युद्ध का अवसर आएगा तब तुम्हारा मस्तक श्रीकृष्ण के द्वारा काट लिया जाएगा।

देवी के द्वारा इस रहस्य का उद्घाटन होने से वहां उपस्थित सभी लोगों ने इस घटना को पूर्वनिर्धारित जानकर भगवान् श्रीकृष्ण को निर्दोष माना। इसके बाद देवी ने बर्बरीक के मस्तक भाग को पुनर्जीवित कर दिया।

इत्युक्ते चण्डिका देवी तदा भक्तशिरस्त्विदम्।
अभ्युक्ष्य सुधया शीघ्रमजरं चामरं व्यधात्॥
यथा राहुशिरस्तद्वत्तच्छिरः प्रणनाम तान्।
उवाच च दिदृक्षामि युद्धं तदनुमन्यताम्॥
ततः कृष्णो वचः प्राह मेघगंभीरवाक्प्रभुः।
यावन्मही सनक्षत्रा यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥
तावत्त्वं सर्वलोकानां वत्स पूज्यो भविष्यसि।
देवीलोकेषु सर्वेषु देवीवद्विचरिष्यसि॥
(स्कन्दपुराण, माहेश्वरखण्ड-कौमारिकाखण्ड, अध्याय ६६, श्लोक – ७३-७६)

चण्डिका देवी ने अपने भक्त के मस्तक को अमृत के द्वारा पुनर्जीवित करके उसे अजर अमर बना दिया। जैसे राहु का शिरमात्र ही है वैसे ही बर्बरीक भी हो गया और उसने सबको प्रणाम दिया और कहा कि आपसबों की सम्मति से मैं अब इस युद्ध का मात्र दर्शन करूँगा। उस समय मेघ के समान गंभीर वाणी में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा – जबतक यह पृथ्वी सभी नक्षत्रों के साथ विद्यमान है, जब तक सूर्य एवं चन्द्र हैं, तब तक हे वत्स ! तुम पूरे संसार के लिए पूजनीय रहोगे। जैसे इस संसार में, तथा अपने लोकों में देवी (इच्छानुसार) विहार करती हैं, वैसे ही तुम भी करोगे। इस प्रकार भगवान् ने बर्बरीक को देवतुल्य बनाकर लोकपूज्य स्थान में वास दे दिया तभी से बर्बरीक ने श्रीकृष्णतुल्यता के साथ संसार में भक्तों का, विशेषकर रोगनाश, बालारिष्ट शमन आदि के माध्यम से कल्याण करना प्रारम्भ किया।

अब हम एकलव्य की चर्चा करते हैं। लोक में प्रसिद्ध है कि एकलव्य हिरण्यधनु नामक निषादराज का पुत्र था किन्तु ग्रंथों के विशेषज्ञ जानते हैं कि वह हिरण्यधनु का औरस नहीं, पालित पुत्र था। वास्तव में एकलव्य का नाम शत्रुघ्न था एवं वह यदुवंशी देवश्रवा (श्रुतदेव) का पुत्र था। उसे लोकसंहारक गतिविधियों के कारण राज्य से निकाल दिया गया था, क्योंकि वह कंस का पक्षधर था। बाद में उसे निषादराज हिरण्यधनु ने पाला और एकलव्य कंस के श्वसुर जरासन्ध आदि के दल में सम्मिलित हो गया।

निवृत्तशत्रुं शत्रुघ्नं श्रुतदेव त्वजायत।
श्रुतदेवात्मजास्ते तु नैषादिर्यः परिश्रुतः॥
एकलव्यो मुनिश्रेष्ठा निषादैः परिवर्द्धितः।
ब्रह्मपुराण, अध्याय – १४, श्लोक – २७)

निवृत्तशत्रुं शत्रुघ्नं देवश्रवा व्यजायत।
देवश्रवाः प्रजातस्तु नैषादिर्यः प्रतिश्रुतः।
एकलव्यो महाराज निषादैः परिवर्धितः॥

(हरिवंशपुराण, हरिवंशपर्व, अध्याय – ३४, श्लोक – ३३)

इसी का समर्थन वायुपुराण आदि भी करते हैं। इधर द्रोणाचार्य कौन थे ? वे हस्तिनापुर के राजगुरु थे। हस्तिनापुर के राजकुमारों को शिक्षित करने के लिए ही उन्हें विशेष नियुक्ति मिली थी, जबकि एकलव्य जरासन्ध के पक्ष का था। हस्तिनापुर उस समय ऐसा राज्य था जो भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य आदि से सुरक्षित होने के कारण किसी की अधीनता स्वीकार नहीं करता था। इसके अतिरिक्त पूरा संसार दो ही राजाओं के सामने झुका हुआ था, एक तो मगधनरेश जरासन्ध एवं दूसरे प्राग्ज्योतिषपुर के राजा नरकासुर। नरकासुर ने हजारों राजाओं की पुत्रियों को विवाह हेतु बन्दी बना रखा था तो उन हज़ारों राजाओं को तामसी यज्ञ में नरबलि देने हेतु जरासन्ध ने बन्दी बना रखा था। नरकासुर की बाणासुर एवं कंस से मित्रता थी और जरासन्ध का दामाद कंस था। साथ ही कंस बाणासुर का मित्र भी था। तो इस प्रकार जरासन्ध एवं नरकासुर में भी मित्रता थी। जरासन्ध के साथ पांचालनरेश द्रुपद एवं मत्स्यनरेश विराट भी थे। अब एकलव्य जरासन्ध का सहयोगी था तो हस्तिनापुर का शत्रु हुआ। साथ ही जरासन्ध के मित्र द्रुपद की द्रोणाचार्य से शत्रुता भी थी तो इस प्रकार एकलव्य, हस्तिनापुर राज्य का परम शत्रु हुआ।

एकलव्य अपनी प्रतिभा का प्रयोग संसार को कष्ट देने के लिए करता था, साथ ही आसुरी शक्तियों के साथ उसकी मित्रता थी, अतएव द्रोणाचार्य ने उसे शस्त्र की अतिरिक्त शिक्षा नहीं दी थी। द्रोणाचार्य के मन में एकलव्य के प्रति कोई निजी दुर्भावना नहीं थी। द्रोणाचार्य अत्यन्त उदार थे, उन्होंने इस घटना के बाद, स्वयं को मारने के लिए उत्पन्न द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न को स्वयं ही शस्त्र की शिक्षा दी थी, क्योंकि उससे शेष संसार को कोई कष्ट नहीं था। तो यदि एकलव्य निजी शत्रु होता, साथ ही संसार को उससे कोई कष्ट नहीं होता तो भी द्रोणाचार्य उसे सिखा देते किन्तु वह राज्यशत्रु भी था और लोकसंहार की प्रवृत्ति से युक्त भी था। यदि चीन या पाकिस्तान का कोई ऐसा व्यक्ति, जिसका अतीत संसार के प्रति आतंकवाद का हो, यहां आए तो भारत का कोई सैन्य प्रशिक्षक उसे प्रशिक्षण दे सकता है क्या ?

एकलव्यं हि साङ्गुष्ठमशक्ता देवदानवाः।
सराक्षसोरगाः पार्थ विजेतुं युधि कर्हिचित्॥

(महाभारत, द्रोणपर्व, अध्याय – १८२, श्लोक – १९)

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन ! यदि एकलव्य अंगूठे से युक्त होता तो देवता, दानव, राक्षस, नाग आदि भी उसे शायद ही युद्ध में जीत पाते।

अतः द्रोणाचार्य ने लोक को उसके प्रकोप से बचाने के लिए उसके अंगूठे को मांग लिया और उसकी प्रतिभा पूर्णतया समाप्त न हो जाए, इसके लिए उसे बिना अंगूठे के ही तर्जनी एवं मध्यमा के सहयोग से तीर चलाने की विधि बता दी थी, जिसका प्रयोग आजतक ओलम्पिक आदि में भी होता है। यहां महाभारत का प्रसङ्ग देखें –

ततो निषादराजस्य हिरण्यधनुषः सुतः।
एकलव्यो महाराज द्रोणमभ्याजगाम ह॥
न स तं प्रतिजग्राह नैषादिरिति चिन्तयन्।
शिष्यं धनुषि धर्मज्ञस्तेषामेवान्ववेक्षया॥
(महाभारत, आदिपर्व, अध्याय – १४२, श्लोक – ४०-४१)

निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र एकलव्य द्रोण के पास गया किन्तु धर्मज्ञ द्रोणाचार्य ने उसे निषादपुत्र समझकर धनुर्विद्या नहीं दी।

यहां द्रोणाचार्य के लिए धर्मज्ञ शब्द आया है, और साथ ही समझकर, ऐसा संकेत है। क्या समझकर ? निषादपुत्र समझकर। द्रोणाचार्य जानते थे कि यह निषादपुत्र तो है नहीं, यह तो मथुरा के राजवंश का क्षत्रिय है, जिसे असामाजिक गतिविधियों के कारण निकाल दिया गया तब निषादों ने इसे अपना लिया, ऐसा समझकर, ऐसा उसके पूर्व चरित्र को जानकर, धर्म का विचार करके द्रोणाचार्य ने उसे मना कर दिया।

द्रोणाचार्य जैसे त्रिलोकविजेता ज्ञानी इतने सरल थे कि उनके यहां उनके शिवावतार चिरंजीवी पुत्र को पीने के लिए दूध तक नहीं होता था। क्या उनकी इस दरिद्रता पर सामाजिक न्याय वाले कभी चर्चा करेंगे ? जब द्रोणाचार्य अपने पूर्व सहपाठी राजा द्रुपद के पास गए तो द्रुपद ने उनका अपमान करते हुए कहा –

न दरिद्रो वसुमतो नाविद्वान्विदुषः सखा।
न शूरस्य सखा क्लीबः सखिपूर्वं किमिष्यते॥
ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं श्रुतम्।
तयोर्विवाहः सख्यं च न तु पुष्टविपुष्टयोः॥
नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा।
नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्वं किमिष्यते॥
(महाभारत, आदिपर्व, अध्याय – १४१, श्लोक – ०९-११)

द्रुपद ने कहा – जो निर्धन है, वह भूमिपति का मित्र नहीं होता। मूर्ख व्यक्ति विद्वान् का, नपुंसक व्यक्ति वीर का सखा नहीं होता, फिर हम दोनों में पूर्वकाल में कैसे मित्रता सम्भव हो सकती है ? जिनका आर्थिक स्तर एवं प्रसिद्धि समान होती है, उनके मध्य ही वैवाहिक सम्बन्ध अथवा मित्रता होती है, असमानों में नहीं। जो वेदज्ञ नहीं है, उसका वेदज्ञ से, जो रथी नहीं है, उसका रथी से, जो राजा नहीं है, उसका राजा से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध नहीं होता है। फिर हम दोनों में कैसी मित्रता ?

राजा द्रुपद के इस प्रकार कहने पर द्रोणाचार्य अपमान का घूंट पीकर रह गए और समर्थ होने पर भी द्रुपद को उस समय दण्डित नहीं किया। बाद में भीष्म पितामह ने उन्हें ससम्मान अपने राज्य में गुरुपद प्रदान किया।

एकलव्य वाली इस घटना के कुछ वर्षों के बाद कंस मारा गया और भगवान् मथुरा में वास करने लगे। अपने जामाता के मरने पर जरासन्ध ने सत्रह बार तेईस अक्षौहिणी सेना के साथ मथुरा पर आक्रमण किया किन्तु प्रत्येक बार उसे पराजित होना पड़ा। अठारहवीं बार कालयवन के एक करोड़ सैनिकों के साथ तथा अपनी भी विशाल सेना को सम्मिलित करने के बाद जरासन्ध ने विशाल आक्रमण किया जिससे प्रजा को बचाने के लिए भगवान् ने रातोंरात विश्वकर्मा के सहयोग से द्वारिका का निर्माण करवाकर वहां प्रजा को स्थानांतरित कराया था।

अब चूंकि जरासन्ध इतना पराक्रमी सम्राट था कि कोई भी उसके विरुद्ध खड़ा नहीं होता था इसीलिए जब उसने अठारहवीं बार मथुरा पर आक्रमण किया तो उसके साथ अनेकों प्रसिद्ध राजा भी आये, किन्तु मथुरा के पक्ष से कोई नहीं आया। जब भगवान् श्रीकृष्ण ने नीति का पालन करते हुए समय को टालने की इच्छा से एवं प्रजा को कालयवन तथा जरासन्ध के दोतरफा आक्रमण से बचाने के लिये, शत्रुओं को भ्रमित करते हुए युद्धभूमि से भागने की लीला की और बाद में बलरामजी के साथ प्रवर्षण पर्वत पर छिप गए तो जरासन्ध ने चिढ़ कर उस पूरे पर्वत को आग लगाने की आज्ञा दे दी थी। उस समय जरासन्ध की सेना में निम्न वीर सम्मिलित थे –

मद्रः कलिङ्गाधिपतिश्चेकितानश्च बाह्लिकः।
काश्मीरराजो गोनर्दः करूषाधिपतिस्तथा॥
द्रुमः किंपुरुषश्चैव पर्वतीयाश्च मानवाः।
पर्वतस्यापरं पार्श्वं क्षिप्रमारोहयन्त्वमी॥
पौरवो वेणुदारिश्च वैदर्भः सोमकस्तथा।
रुक्मी च भोजाधिपतिः सूर्याक्षश्चैव मालवः॥
पाञ्चालाधिपतिश्चैव द्रुपदश्च नराधिपः।
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ दन्तवक्त्रश्च वीर्यवान्॥
छागलिः पुरमित्रश्च विराटश्च महीपतिः।
कौशाम्ब्यो मालवश्चैव शतधन्वा विदूरथः॥
भूरिश्रवास्त्रिगर्तश्च बाणः पञ्चनदस्तथा।
उत्तरं पर्वतोद्देशमेते दुर्गसहा नृपाः॥
आरोहन्तु विमर्दन्तो वज्रप्रतिमगौरवाः।
उलूकः कैतवेयश्च वीरश्चांशुमतः सुतः॥
एकलव्यो दृढाश्वश्च क्षत्रधर्मा जयद्रथः॥
उत्तमौजास्तथा शाल्वः कैरलेयश्च कैशिकः।
वैदिशो वामदेवश्च सुकेतुश्चापि वीर्यवान्॥
पूर्वपर्वतनिर्व्युहमेतेष्वायतमस्तु नः ।
विदारयन्तो धावन्तो वाता इत बलाहकान्॥
हरिवंशपुराण, विष्णुपर्व, अध्याय – ४२, श्लोक – २८-३६)

जरासन्ध ने आदेश दिया – मद्र के राजा (शल्य), कलिंग के राजा, चेकितान, बाह्लीक (भीष्म पितामह के चाचा), काश्मीर के राजा गोनर्द (इन्हीं के नामपर कश्मीर का उत्तरी भाग, जो चीन से लगता है, बसाया गया था), करूष देश के राजा (पौंड्रक) महाराज द्रुम, किम्पुरुष (सुग्रीव के मन्त्री द्विविद आदि) पर्वतों पर रहने वाले मनुष्य, ये सब इस पर्वत के दूसरी ओर से शीघ्र चढ़ें। पुरुवंश का वेणुदारि, विदर्भ के राजा सोमक, भोजकट के स्वामी रुक्मी, मालवा के स्वामी सूर्याक्ष, पाञ्चाल के राजा द्रुपद, अवन्ती के राजा विन्द एवं उनके भाई अनुविन्द, प्रतापी दन्तवक्त्र, पुरमित्र, मत्स्यदेश के राजा विराट, कौशाम्बी के शतधन्वा और मालव के विदूरथ, भूरिश्रवा, त्रिगर्तनरेश (सुशर्मा), पञ्चनद के स्वामी बाण, ये सब इस पर्वत के उत्तरी भाग से शत्रु को रौंदते हुए चढ़ाई करें। छल करने में कुशल शकुनि का पुत्र उलूक, अंशुमान् का वीर पुत्र, दृढ़ाश्व, एकलव्य, क्षत्रधर्मा, जयद्रथ, उत्तमौजा, शाल्व, केरल के राजा कैशिक, विदिशा के स्वामी वामदेव, प्रतापी सुकेतु, ये सब पूर्वदिशा से पर्वत को वैसे ही विदीर्ण करते हुए आक्रमण करें जैसे वायु के प्रहार से बादलों के समूह बिखर जाते हैं।

इस समूह में जरासन्ध की ओर से जो राजा मित्रभाव से प्रसन्न होकर लड़ने आये थे उनमें उलूक, एकलव्य, शाल्व, रुक्मी, पौंड्रक, सुशर्मा, बाण, शतधन्वा, आदि सम्मिलित हैं। जो राजा एवं वीर जरासन्ध के भय से उसके साथ आ गए थे उनमें शल्य, विराट, द्रुपद, चेकितान, आदि थे।

बाद में चेकितान ने भगवान् श्रीकृष्ण की नारायणी सेना में नियुक्ति पा ली थी। जब महाभारत के युद्ध में नारायणी सेना दुर्योधन के पक्ष में चली गयी तो चेकितान ने सात्यकि के साथ पांडवों का पक्ष लिया था। ऐसे भी जरासन्ध के मरने के बाद उत्तमौजा, द्रुपद, विराट, आदि ने श्रीकृष्ण एवं पाण्डवों का पक्ष ही लिया था। जब युधिष्ठिर इस भूमण्डल का सम्राट बनने की इच्छा से राजसूय यज्ञ करना चाहते थे तो भगवान् श्रीकृष्ण ने निम्न बात कही –

क्षत्रे सम्राजमात्मानं कर्तुमर्हसि भारत।
दुर्योधनं शान्तनवं द्रोणं द्रौणायनिं कृपम्॥
कर्णं च शिशुपालं च रुक्मिणं च धनुर्धरम्।
एकलव्यं द्रुमं श्वेतं शैब्यं शकुनिमेव च॥
एतानजित्वा सङ्ग्रामे कथं शक्नोषि तं क्रतुम्।
तथैते गौरवेणैव न योत्स्यन्ति नराधिपाः॥
एकस्तत्र बलोन्मत्तः कर्णो वैकर्तनो वृषा।
योत्स्यते स परामर्षी दिव्यास्त्रबलगर्वितः॥
न तु शक्यं जरासन्धे जीवमाने महाबल।
राजसूयस्त्वयाऽवाप्तुमेषा राजन्मतिर्मम॥
(महाभारत, सभापर्व, अध्याय – १४ श्लोक – ६८-७२)

श्रीकृष्ण ने कहा – हे भरतवंशी युधिष्ठिर ! यदि आप पृथ्वी पर सम्राट बनना चाहते हैं तो दुर्योधन, शान्तनुपुत्र भीष्म, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कर्ण, शिशुपाल, धनुर्धर रुक्मी, एकलव्य, द्रुम, विराटपुत्र श्वेत, शैब्य, शकुनि आदि को बिना जीते ही राजसूय यज्ञ कैसे कर सकते हैं ? हम मानते हैं कि (भीष्म, द्रोण, कृप आदि) आपके प्रति स्नेह और सम्मान का भाव रखने से आपसे युद्ध नहीं करेंगे किन्तु आपसे ईर्ष्या करने वाला कर्ण तो अपने दिव्यास्त्र के बल पर अभिमान करने के कारण आपसे युद्ध करेगा ही। यदि वह भी युद्ध न करे तो भी जरासन्ध के जीवित रहते आप यह राजसूय यज्ञ नहीं कर सकते, ऐसा मैं समझता हूँ।

इस प्रकार हम देखते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण ने एकलव्य को वीरों की श्रेणी में अति सम्माननीय बताया है। इतना ही नहीं, जब राजसूय यज्ञ के समय किसकी अग्रपूजा हो, इस संशय में माद्रीतनय सहदेव ने कहा कि निश्चय ही, अग्रपूजा के अधिकारी भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं, तो शिशुपाल ने वहां सभा में उपस्थित अन्य गणमान्य लोगों के नाम भी गिनाए थे।

भीष्मकं च महावीर्यं दन्तवक्त्रं च भूमिपम्।
भगदत्तं यूपकेतुं जयत्सेनं च मागधम्॥
विराटद्रुपदौ चोभौ शकुनिं च बहद्बलम्।
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पाण्ड्यं श्वेतमथोत्तमम्॥
शङ्खं च सुमहाभागं वृषसेनं च मानिनम्।
एकलव्यं च विक्रान्तं कालिङ्गं च महारथम्॥
अतिक्रम्य महावीर्यं किं प्रशंसति केशवम्।
(महाभारत, सभापर्व, अध्याय – ६७, श्लोक – १९-२२)

शिशुपाल ने कहा – (रुक्मिणी के पिता) अत्यंत पराक्रमी भीष्मक, राजा दन्तवक्त्र, कामरूप के स्वामी भगदत्त, यूपकेतु, मगध के वीर जयत्सेन, विराट एवं द्रुपद ये दोनों, गान्धारनरेश शकुनि, बृहद्बल/ बहद्वल, अवन्ती के विन्द एवं अनुविन्द, पाण्ड्य के राजा, उत्तम आचरण वाले श्वेत, महाभाग शङ्ख, स्वाभिमानी वृषसेन, पराक्रमी एकलव्य, महारथी कलिंगनरेश, इन सभी महाबलशालियों को छोड़कर तुम केशव की प्रशंसा क्यों करते हो ?

भले ही यह बात शिशुपाल ने श्रीकृष्ण के प्रति द्वेषभाव से कही थी किन्तु उपर्युक्त वीरों का समाज में अत्यंत श्रेष्ठ स्थान था, इसमें सन्देह नहीं है। एकलव्य ने बाद में भी कोई समाजसेवा का कार्य नहीं किया। अपने दल के अधर्मियों के साथ उसने द्वारिका पर आक्रमण कर दिया था। उस आक्रमण में दन्तवक्त्र का पुत्र सुवक्त्र भी था जो इन्द्र के समान पराक्रमी एवं सैकड़ों प्रकार के मायायुद्ध में निपुण था। उसमें स्वयं को भगवान् वासुदेव कहने वाले पौंड्रक का पुत्र सुदेव, पाण्ड्य एवं कलिंग के राजकुमार, तथा एकलव्य के पुत्र आदि निम्न वीर सम्मिलित थे –

दन्तवक्त्रस्य तनयं सुवक्त्रममितौजसम्।
सहस्राक्षसमं युद्धे मायाशतविशारदम्॥
पौण्ड्रस्य वासुदेवस्य तथा पुत्रं महाबलम्।
सुदेवं वीर्यसम्पन्नं पृथगक्षौहिणीपतिम्॥
एकलव्यस्य पुत्रं च वीर्यवन्तं महाबलम्।
पुत्रं च पाण्ड्यराजस्य कलिङ्गाधिपतिं तथा॥
(हरिवंशपुराण, विष्णुपर्व, अध्याय, ५९, श्लोक – ०३-०५)

आप सबों को करूष देश के मूर्ख राजा पौंड्रक का स्मरण तो होगा ही, जिसने स्वयं को ही विष्णु का अवतार वासुदेव घोषित कर दिया था एवं भगवान् श्रीकृष्ण को निम्न सन्देश भिजवाया था –

वासुदेवोऽवतीर्णोहमेक एव न चापरः।
भूतानामनुकम्पार्थं त्वं तु मिथ्याभिधां त्यज॥

(श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध – १०, अध्याय – ६६, श्लोक – ०५)

हे कृष्ण ! मैं ही वास्तविक वासुदेव हूँ, मेरे अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं है। मैंने ही प्राणियों पर कृपा करने के लिए अवतार लिया है इसीलिए तुम अपना यह झूठ का आवरण छोड़ दो।

यह पौंड्रक बाद में सात्यकि के हाथों पराजित होता हुआ, अन्त में श्रीकृष्ण के हाथों मारा गया था, किन्तु यहां ध्यातव्य है कि इसके पक्ष से लड़ने के लिए एकलव्य भी आया हुआ था एवं बलराम जी मे उस युद्ध में एकलव्य को मानो रौंद ही डाला था। उस विशाल युद्ध की एक झलक देखें –

ततः शक्तिं समादाय घण्टामालाकुलां नृपः।
निषादो बलदेवाय प्रेषयित्वा महाबलः॥
सिंहनादं महाघोरमकरोत् स निषादपः।
सा शक्तिः सर्वकल्याणी बलदेवमुपागमत्॥
उत्पतन्तीं महाघोरां बलभद्रः प्रतापवान्।
आदायाथ निषादेशं सर्वान् विस्मापयन्निव॥
तयैव तं जघानाशु वक्षोदेशे च माधवः।
स तया ताडितो वीरः स्वशक्त्याथ निषादपः॥
विह्वलः सर्वगात्रेषु निपपात महीतले।
प्राणसंशयमापन्नो निषादो रामताडितः॥

(हरिवंशपुराण, भविष्यपर्व, अध्याय -९८, श्लोक – ११-१५)

तब महाबली निषादराज एकलव्य ने घण्टियों से सुशोभित, एक शक्ति (विशेष प्रक्षेपास्त्र) बलराम जी की ओर चलाकर घोर अट्टहास किया। वह शक्ति ज बलरामजी के पास आयी तो अपने ऊपर गिरती हुई उस महाघोर शक्ति को प्रतापी बलभद्र जी ने पकड़ लिया और उसे वापस निषादराज की ओर ही चला दिया, इस बात से सभी आश्चर्यचकित हो गए। उस शक्ति से माधव बलराम जी ने एकलव्य की छाती पर प्रहार किया। अपनी ही चलाई हुई उस शक्ति के प्रहार से निषादराज के सभी अंग व्याकुल हो गए और बलराम जी के द्वारा मारे जाने पर वह मरणासन्न होकर भूमि पर गिर पड़ा।

युद्धकला को सीखने के लिए मात्र प्रतिभाशाली ही होना आवश्यक नहीं है अपितु पवित्र उद्देश्य, धैर्य, लोकोपकार की भावना, आदि भी आवश्यक है। यह सभी गुण अर्जुन में थे, इसीलिए उन्हें स्वर्ग से भी निमंत्रण मिला। साथ ही शिवजी की कृपा से अनेकों दुर्लभ दिव्यास्त्र मिले। एकलव्य में प्रतिभा तो थी किन्तु सद्भावना नहीं थी। आज भी बहुत से कुशाग्र बुद्धि वाले डॉक्टर, इंजीनियर, वकील एवं वैज्ञानिक अपनी दुर्भावना के कारण आतंकवादी बन जा रहे हैं तो क्या उनकी प्रतिभा के कारण उनका सम्मान किया जाएगा ? द्रोणाचार्य तो इतने अधिक संवेदनशील गुरु थे कि धैर्य आदि गुणों से रहित होने के कारण उन्होंने अपने सगे पुत्र अश्वत्थामा को भी बारम्बार मांगने पर भी ब्रह्मशिर जैसा दिव्य अस्त्र नहीं दिया, ब्रह्मास्त्र को केवल चलाने की विधि बताई, उसे लौटाने की नहीं, किन्तु अर्जुन को उन्होंने ब्रह्मशिर भी दिया और ब्रह्मास्त्र लौटाने की विधि भी बताई, क्योंकि अर्जुन उचित पात्र थे। इस प्रकार हम देखते हैं कि द्रोणाचार्य ने जब अपने पुत्र के साथ भी योग्यता की इतनी गम्भीर विवेचना करते हुए निर्णय लिया तो जिसका पूर्व का आचरण ही संदिग्ध रहा हो उस एकलव्य को कैसे अपनी विद्या दे देते, अतएव हम समझते हैं कि एकलव्य पर कोई अत्याचार नहीं हुआ था।

श्रीमन्महामहिम विद्यामार्तण्ड श्रीभागवतानंद गुरु
His Holiness Shri Bhagavatananda Guru

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ગીત (શતતંતી જંતર આ જીવતર)

જાતાં પૂજ્યાં ડુંગર – કોતર
વળતાં ઝાંખર- ઝાડ જી
તારે આંગણ આવીને મેં
માણ્યો મનનો ઉઘાડ જી

શતતંતી જંતર આ જીવતર
મેળ મળે ના સ્હેજે
તું ચીંધાડે કળ કોઈ તો
તરીએ એના તેજે
લુખ્ખા સુક્કા જીવને બીજું
કોણ લડાવે લાડ જી
તારે આંગણ આવીને મેં
માણ્યો મનનો ઉઘાડ જી

વિના કારણે મારા પર હું
રીંસ કરું ને લડું
કોઈ ના જાણે એવા ખૂણે
જઇ જઇને હું રડું
મારામાં આ શું ઊગ્યું જે
ભીતર પાડે ધાડ જી
તારે આંગણ આવીને મેં
માણ્યો મનનો ઉઘાડ જી

-સંજુ વાળા Sanju Vala

કોરોના

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॥ श्री कृष्णाश्रय स्तुति ॥


॥ श्री कृष्णाश्रय स्तुति ॥

सर्वमार्गेषु नष्टेषु कलौ च खलधर्मिणि।
पाषण्डप्रचुरे लोके कृष्ण एव गतिर्मम॥ (१)

भावार्थ : हे प्रभु! कलियुग में धर्म के सभी रास्ते बन्द हो गए हैं, और दुष्ट लोग धर्माधिकारी बन गये हैं, संसार में पाखंड व्याप्त है, इसलिए केवल आप भगवान श्रीकृष्ण ही मेरे आश्रय हों। (१)

म्लेच्छाक्रान्तेषु देशेषु पापैकनिलयेषु च।
सत्पीडाव्यग्रलोकेषु कृष्ण एव गतिर्मम॥ (२)

भावार्थ : हे प्रभु! देश में दुष्ट लोगों का भय व्याप्त है और सभी लोग पाप कर्मों में लिप्त हैं, संसार में संत लोग अत्यन्त पीड़ित हैं, इसलिए केवल आप भगवान श्रीकृष्ण ही मेरे आश्रय हों। (२)

गंगादितीर्थवर्येषु दुष्टैरेवावृतेष्विह।
तिरोहिताधिदेवेषु कृष्ण एव गतिर्मम॥ (३)

भावार्थ : हे प्रभु! गंगा आदि प्रमुख नदियों पर स्थित तीर्थों का भी दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों ने अतिक्रमण कर लिया हैं और सभी देवस्थान लुप्त होते जा रहें हैं, इसलिए केवल आप भगवान श्रीकृष्ण ही मेरे आश्रय हों। (३)

अहंकारविमूढेषु सत्सु पापानुवर्तिषु।
लोभपूजार्थयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम॥ (४)

भावार्थ : हे प्रभु! अहंकार से ग्रसित होकर संतजन भी पाप-कर्म का अनुसरण कर रहे हैं और लोभ के वश में होकर ही ईश्वर की पूजा करते हैं, इसलिए केवल आप भगवान श्रीकृष्ण ही मेरे आश्रय हों। (४)

अपरिज्ञाननष्टेषु मन्त्रेष्वव्रतयोगिषु।
तिरोहितार्थवेदेषु कृष्ण एव गतिर्मम॥ (५)

भावार्थ : हे प्रभु! वास्तविक ज्ञान लुप्त हो गया है, योग में स्थित व्यक्ति भी वैदिक मन्त्रों का ठीक प्रकार से उच्चारण नहीं करते हैं और व्रत नियमों का उचित प्रकार से पालन भी नहीं करते हैं, वेदों का सही अर्थ लुप्त होता जा रहा है, इसलिए केवल आप भगवान श्रीकृष्ण ही मेरे आश्रय हों। (५)

नानावादविनष्टेषु सर्वकर्मव्रतादिषु।
पाषण्डैकप्रयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम॥ (६)

भावार्थ : हे प्रभु! अनेकों प्रकार की विधियों के कारण सभी प्रकार के व्रत आदि उचित कर्म नष्ट हो रहें है, पाखंडता पूर्वक कर्मों का ही आचरण किया जा रहा है, इसलिए केवल आप भगवान श्रीकृष्ण ही मेरे आश्रय हों। (६)

अजामिलादिदोषाणां नाशकोऽनुभवे स्थितः।
ज्ञापिताखिलमाहात्म्यः कृष्ण एव गतिर्मम॥ (७)

भावार्थ : हे प्रभु! आपका नाम अजामिल आदि जैसे दुष्ट व्यक्तियों के दोषों का नाश करने वाला है, ऐसा अनुभवी संतो द्वारा गाया गया है, अब मैं आपके संपूर्ण माहात्म्य को जान गया हूँ, इसलिए केवल आप भगवान श्रीकृष्ण ही मेरे आश्रय हों। (७)

प्राकृताः सकल देवा गणितानन्दकं बृहत्।
पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात्कृष्ण एव गतिर्मम॥ (८)

भावार्थ : हे प्रभु! समस्त देवतागण भी प्रकृति के अधीन हैं, इस विराट जगत का सुख भी सीमित ही है, केवल आप ही समस्त कष्टों को हरने वाले हैं और पूर्ण आनंद प्रदान करने वाले हैं, इसलिए केवल आप भगवान श्रीकृष्ण ही मेरे आश्रय हों। (८)

विवेकधैर्यभक्त्यादिरहितस्य विशेषतः।
पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिर्मम॥ (९)

भावार्थ : हे प्रभु! मुझमें सत्य को जानने की सामर्थ्य नहीं है, धैर्य धारण करने की शक्ति नहीं है, आप की भक्ति आदि से रहित हूँ और विशेष रूप से पाप में आसक्त मन वाले मुझ दीनहीन के लिए केवल आप भगवान श्रीकृष्ण ही मेरे आश्रय हों। (९)

सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवाखिलार्थकृत्।
शरणस्थमुद्धारं कृष्णं विज्ञापयाम्यहम्॥ (१०)

भावार्थ : हे प्रभु! आप ही सभी प्रकार से सामर्थ्यवान हैं, आप ही सभी प्रकार की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं और आप ही शरण में आये हुए जीवों का उद्धार करने वाले हैं इसलिए मैं भगवान श्रीकृष्ण की वंदना करता हूँ। (१०)

कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत्कृष्णसन्निधौ।
तस्याश्रयो भवेत्कृष्ण इति श्रीवल्लभोऽब्रवीत्॥ (११)

भावार्थ : भगवान श्रीकृष्ण के आश्रय में रहकर और उनकी मूर्ति के सामने जो इस स्तोत्र का पाठ करता है उसके आश्रय श्रीकृष्ण हो जाते हैं, ऐसा श्रीवल्लभाचार्य जी के द्वारा कहा गया है। (११)

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आज का प्रेरक प्रसङ्ग

!! सेहत का रहस्य !!

बहुत समय पहले की बात है , किसी गाँव में शंकर नाम का एक वृद्ध व्यक्ति रहता था। उसकी उम्र अस्सी साल से भी ऊपर थी पर वो चालीस साल के व्यक्ति से भी स्वस्थ लगता था। लोग बार बार उससे उसकी सेहत का रहस्य जानना चाहते पर वो कभी कुछ नहीं बोलता था । एक दिन राजा को भी उसके बारे में पता चला और वो भी उसकी सेहत का रहस्य जाने के लिए उत्सुक हो गए। राजा ने अपने गुप्तचरों से शंकर पर नज़र रखने को कहा। गुप्तचर भेष बदल कर उस पर नज़र रखने लगे।

अगले दिन उन्होंने देखा की शंकर भोर में उठ कर कहीं जा रहा है , वे भी उसके पीछे लग गए। शंकर तेजी से चलता चला जा रहा था , मीलों चलने के बाद वो एक पहाड़ी पर चढ़ने लगा और अचानक ही गुप्तचरों की नज़रों से गायब हो गया। गुप्तचर वहीँ रुक उसका इंतज़ार करने लगे। कुछ देर बाद वो लौटा , उसने मुट्ठी में कुछ छोटे-छोटे फल पकड़ रखे थे और उन्हें खाता हुआ चला जा रहा था। गुप्तचरों ने अंदाज़ा लगाया कि हो न हो , शंकर इन्ही रहस्यमयी फलों को खाकर इतना स्वस्थ है।

अगले दिन दरबार में उन्होंने राजा को सारा किस्सा कह सुनाया। राजा ने उस पहाड़ी पर जाकर उन फलों का पता लगाने का आदेश दिया , पर बहुत खोज-बीन करने के बाद भी कोई ऐसा असाधारण फल वहां नहीं दिखा। अंततः थक-हार कर राजा शंकर को दरबार में हाज़िर करने का हुक्म दिया। राजा – शंकर , इस उम्र में भी तुम्हारी इतनी अच्छी सेहत देख कर हम प्रसन्न हैं , बताओ , तुम्हारी सेहत का रहस्य क्या है ?

शंकर कुछ देर सोचता रहा और फिर बोला , ” महाराज , मैं रोज पहाड़ी पर जाकर एक रहस्यमयी फल खाता हूँ , वही मेरी सेहत का रहस्य है। “ठीक है चलो हमें भी वहां ले चलो और दिखाओ वो कौन सा फल है। सभी लोग पहाड़ी की और चल दिए , वहां पहुँच कर शंकर उन्हें एक बेर के पेड़ के पास ले गया और उसके फलों को दिखाते हुए बोला, ” हुजूर , यही वो फल है जिसे मैं रोज खाता हूँ। “

राजा क्रोधित होते हुए बोले , ” तुम हमें मूर्ख समझते हो , यह फल हर रोज हज़ारों लोग खाते हैं , पर सभी तुम्हारी तरह सेहतमंद क्यों नहीं हैं ?” शंकर विनम्रता से बोला , ” महाराज , हर रोज़ हजारों लोग जो फल खाते हैं वो बेर का फल होता है , पर मैं जो फल खाता हूँ वो सिर्फ बेर का फल नहीं होता …वो मेरी मेहनत का फल होता है। इसे खाने के लिए मैं रोज सुबह 10 मील पैदल चलता हूँ जिससे मेरे शरीर की अच्छी वर्जिश हो जाती है और सुबह की स्वच्छ हवा मेरे लिए जड़ी-बूटियों का काम करती है। बस यही मेरी सेहत का रहस्य है। “

राजा शंकर की बात समझ चुके थे , उन्होंने शंकर को स्वर्ण मुद्राएं देते हुए सम्मानित किया। और अपनी प्रजा को भी शारीरिक श्रम करने की नसीहत दी।

शिक्षा:-
मित्रों, आज टेक्नोलॉजी ने हमारी ज़िन्दगी बिलकुल आसान बना दी है , पहले हमें छोटे -बड़े सभी कामों के लिए घर से निकलना ही पड़ता था , पर आज हम Internet के माध्यम से घर बैठे-बैठे ही सारे काम कर लेते हैं। ऐसे में जो थोड़ा बहुत Physical Activity के मौके होते थे वो भी खत्म होते जा रहे हैं , और इसका असर हमारी सेहत पर भी साफ़ देखा जा सकता है। WHO के मुताबिक , आज दुनिया में 20 साल से ऊपर के ३35% लोग Overweight हैं और 11 % Obese हैं। ऐसे में ज़रूरी हो जाता है कि हम अपनी सेहत का ध्यान रखें और रोज़-मर्रा के जीवन में शारीरक श्रम को महत्त्व दें।

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📔🏆 शिक्षा विभाग समाचार 🏆📔

Posted in हिन्दू पतन

एका ख्रिश्चन धर्म प्रसारकाला आसाम मध्ये पाठवलं होतं.! नाव फादर क्रूज.! त्याला आसाम मधल्या एका प्रभावशाली कुटुंबाच्या मुलाला इंग्रजी शिकवायची संधी मिळाली.!

पाद्री साहेब हळू हळू चौफेर नजर फिरवू लागले. ते म्हणतात ना, ‘हातभर गजरा आणि गावभर नजरा..’ तस..!

त्यांच्या लक्षात आलं की त्या मुलाची आजी ही घरातली सगळ्यात प्रभावशाली व्यक्ती आहे.! तिला जर आपण आकाशातल्या बापाच्या शिकवणुकीत पकडलं तर हे कुटुंब आणि नंतर सगळं गाव आपण ख्रिश्चन बनवू शकतो..!

आनंद कुलकर्णी

मग पाद्री साहेब हळू हळू आजीला सांगायला लागले की कस प्रभू येशू हा कुष्ठरोग बरा करतो, आंधळ्याना कशी दृष्टी देतो.! वगैरे, वगैरे…! ह्यावर त्या आजी त्याला म्हणाल्या, पोरा, आमच्या श्रीराम आणि श्रीकृष्ण ह्यांच्या चमत्कारासमोर हे तर काहीच नाही.! आमच्या प्रभू श्रीरामांनी एका दगडाला नुसता स्पर्श केला तर तो दगड एका जिवंत स्त्री मध्ये बदलला..! आणि त्यांचं नाव नुसतं जर दगडावर लिहिलं तर दगड पाण्यावर तरंगतो..!

पाद्री बाबा गप…! 😷

पण त्याचा प्रयत्न सुरूच होता..!
एक दिवस पाद्री बाबांनी चर्च मधून केक आणला आणि त्या आजींना दिला.! त्याला वाटलं की आजी काहो खाणार नाही, पण आजींनी तो केक खाल्ला..! आता पाद्री बाबांच्या डोळ्यात विजयाच हसू होत.! मोठ्या गर्वान त्यानं आजीला म्हटलं की आजी तुम्ही चर्च चा प्रसाद खाल्लात.! तुम्ही आता ख्रिश्चन झालात.!

आजी त्याला मूर्खांत काढणारं हसू हसल्या आणि म्हटल्या.., अरे बावळटा, मला एक दिवस केक दिलास आणि मी तो एकदाच खाल्ला, तर मी ख्रिश्चन झाले का ? आणि मी जे रोज तुला माझ्या घरचं जेवायला घालते आहे तर तू ते खाऊन हिंदू झालास ना आधी..!

पाद्री बाबांनी तोंड काळं केलं आणि ते परत दिसलेच नाहीत.!

आपल्या धर्माबद्दल एव्हढी निष्ठा असणाऱ्या त्या आजी होत्या, आसामच्या सुप्रसिद्ध क्रांतीकारी #कमलादेवीहजारीका..!

आपल्याला कोणालाच माहीत नाहीत त्या..! आसाम पुरत्याच मर्यादित राहिल्या त्या.!
त्यांच्या सारखा विचार जर प्रत्येक हिंदूनी केला असता तर बळजबरीने बाटवलेले आपले बरेच हिंदू परत घरी येऊ शकले असते.! पण आपण तसा विचार नाही केला.!

माझ्या माहितीप्रमाणे, असा विचार करणारे फक्त दोनच हिंदू होते.! नुसता विचार नाही तर प्रत्यक्ष आपल्या आचरणाने ते त्यांनी दाखवून दिलं..! अत्यन्त तेजस्वी हिंदू धर्माभिमानी आणि प्रखर राष्ट्र निष्ठा असणारे.!

एक म्हणजे श्रीमंत छत्रपती श्री शिवाजी महाराज आणि दुसरे आदरणीय स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर….!

©️ आनंद कुलकर्णी

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आलोचक विशेष 😊

बहुत सुंदर भाव अवश्य पढे….📖

एक साधु वर्षा के जल में प्रेम और मस्ती से भरा चला जा रहा था, कि उसने एक मिठाई की दुकान को देखा जहां एक कढ़ाई में गरम दूध उबाला जा रहा था तो मौसम के हिसाब से दूसरी कढ़ाई में गरमा गरम जलेबियां तैयार हो रही थीं।
साधु कुछ क्षणों के लिए वहाँ रुक गया, शायद भूख का एहसास हो रहा था या मौसम का असर था। साधु हलवाई की भट्ठी को बड़े गौर से देखने लगा साधु कुछ खाना चाहता था लेकिन साधु की जेब ही नहीं थी तो पैसे भला कहां से होते,
साधु कुछ पल भट्ठी से हाथ सेंकनें के बाद चला ही जाना चाहता था कि नेक दिल हलवाई से रहा न गया और एक प्याला गरम दूध और कुछ जलेबियां साधु को दे दीं। मलंग ने गरम जलेबियां गरम दूध के साथ खाई और फिर हाथों को ऊपर की ओर उठाकर हलवाई के लिए प्रार्थना की, फिर आगे चल दिया। साधु बाबा का पेट भर चुका था दुनिया के दु:खों से बेपरवाह, वो फिर एक नए जोश से बारिश के गंदले पानी के छींटे उड़ाता चला जा रहा था।
वह इस बात से बेखबर था कि एक युवा नव विवाहिता जोड़ा भी वर्षा के जल से बचता बचाता उसके पीछे चला आ रहा है। एक बार इस मस्त साधु ने बारिश के गंदले पानी में जोर से लात मारी।
बारिश का पानी उड़ता हुआ सीधा पीछे आने वाली युवती के कपड़ों को भिगो गया उस औरत के कीमती कपड़े कीचड़ से लथपथ हो गये। उसके युवा पति से यह बात बर्दाश्त नहीं हुई।

इसलिए वह आस्तीन चढ़ाकर आगे बढ़ा और साधु के कपड़ो को पकड़ कर खींच कर कहने लगा -“अंधा है?तुमको नज़र नहीं आता तेरी हरकत की वजह से मेरी पत्नी के कपड़े गीले हो गऐ हैं और कीचड़ से भर गऐ हैं?”
साधु हक्का-बक्का सा खड़ा था जबकि इस युवा को साधु का चुप रहना नाखुशगवार गुज़र रहा था।
महिला ने आगे बढ़कर युवा के हाथों से साधु को छुड़ाना भी चाहा, लेकिन युवा की आंखों से निकलती नफरत की चिंगारी देख वह भी फिर पीछे खिसकने पर मजबूर हो गई।

राह चलते राहगीर भी उदासीनता से यह सब दृश्य देख रहे थे लेकिन युवा के गुस्से को देखकर किसी में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उसे रोक पाते और आख़िर जवानी के नशे मे चूर इस युवक ने, एक जोरदार थप्पड़ साधु के चेहरे पर जड़ दिया। बूढ़ा मलंग थप्पड़ की ताब ना झेलता हुआ लड़खड़ाता हुआ कीचड़ में जा गिरा।
युवक ने जब साधु को नीचे गिरता देखा तो मुस्कुराते हुए वहां से चल दिया।
बूढ़े साधु ने आकाश की ओर देखा और उसके होठों से निकला वाह मेरे भगवान कभी गरम दूध जलेबियां और कभी गरम थप्पड़!!!
लेकिन जो तू चाहे मुझे भी वही पसंद है।
यह कहता हुआ वह एक बार फिर अपने रास्ते पर चल दिया।
दूसरी ओर वह युवा जोड़ा अपनी मस्ती को समर्पित अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हो गया। थोड़ी ही दूर चलने के बाद वे एक मकान के सामने पहुंचकर रुका। वह अपने घर पहुंच गए थे।
वो युवा अपनी जेब से चाबी निकाल कर अपनी पत्नी से हंसी मजाक करते हुए ऊपर घर की सीढ़ियों तय कर रहा था। बारिश के कारण सीढ़ियों पर फिसलन हो गई थी। अचानक युवा का पैर फिसल गया और वह सीढ़ियों से नीचे गिरने लगा।
महिला ने बहुत जोर से शोर मचा कर लोगों का ध्यान अपने पति की ओर आकर्षित करने लगी जिसकी वजह से काफी लोग तुरंत सहायता के लिये युवा की ओर लपक, लेकिन देर हो चुकी थी।
युवक का सिर फट गया था और कुछ ही देर में ज्यादा खून बह जाने के कारण इस नौजवान युवक की मौत हो चुकी थी। कुछ लोगों ने दूर से आते साधु बाबा को देखा तो आपस में कानाफूसी होने लगी कि निश्चित रूप से इस साधु बाबा ने थप्पड़ खाकर युवा को श्राप दिया है अन्यथा ऐसे नौजवान युवक का केवल सीढ़ियों से गिर कर मर जाना बड़े अचम्भे की बात लगती है। कुछ मनचले युवकों ने यह बात सुनकर साधु बाबा को घेर लिया।
एक युवा कहने लगा कि

  • “आप कैसे भगवान के भक्त हैं जो केवल एक थप्पड़ के कारण युवा को श्राप दे बैठे। भगवान के भक्त में रोष व गुस्सा हरगिज़ नहीं होता। आप तो जरा सी असुविधा पर भी धैर्य न कर सकें।” साधु बाबा कहने लगा -“भगवान की क़सम! मैंने इस युवा को श्राप नहीं दिया।” -“अगर आप ने श्राप नहीं दिया तो ऐसा नौजवान युवा सीढ़ियों से गिरकर कैसे मर गया?”
    तब साधु बाबा ने दर्शकों से एक अनोखा सवाल किया कि
    -“आप में से कोई इस सब घटना का चश्मदीद गवाह मौजूद है?”
    एक युवक ने आगे बढ़कर कहा -“हाँ! मैं इस सब घटना का चश्मदीद गवाह हूँ।”
    साधु ने अगला सवाल किया-“मेरे क़दमों से जो कीचड़ उछला था क्या उसने युवा के कपड़ों को दागी किया था?”
    युवा बोला- “नहीं। लेकिन महिला के कपड़े जरूर खराब हुए थे।”
    मलंग ने युवक की बाँहों को थामते हुए पूछा- “फिर युवक ने मुझे क्यों मारा?” युवा कहने लगा
  • “क्योंकि वह युवा इस महिला का प्रेमी था और यह बर्दाश्त नहीं कर सका कि कोई उसके प्रेमी के कपड़ों को गंदा करे। इसलिए उस युवक ने आपको मारा।”
    युवा की बात सुनकर साधु बाबा ने एक जोरदार ठहाका बुलंद किया और यह कहता हुआ वहाँ से विदा हो गया…..
    तो! भगवान की क़सम! मैंने श्राप कभी किसी को नहीं दिया लेकिन कोई है जो मुझसे प्रेम रखता है।अगर उसका यार सहन नहीं कर सका तो मेरे यार को कैसे बर्दाश्त होगा कि कोई मुझे मारे? और वो मेरा यार इतना शक्तिशाली है कि दुनिया का बड़े से बड़ा राजा भी उसकी लाठी से डरता है।
    सच है। उस परमात्मा की लाठी दीख़ती नहीं और आवाज भी नहीं करती लेकिन पड़ती है तो बहुत दर्द देती है। हमारे कर्म ही हमें उसकी लाठी से बचाते हैं, बस कर्म अच्छे होने चाहियें।

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आज, कोपरगाँव (महाराष्ट्र) से अपने रास्ते पर


आज, कोपरगाँव (महाराष्ट्र) से अपने रास्ते पर, मैंने एक बुजुर्ग दंपति को सड़क के किनारे चलते देखा। जैसा कि मेरी सामान्य आदत है, मैंने बस भिखारी दिखने वाले जोड़े से दोपहर होने के कारण ऐसे ही भोजन के लिए कहा । परंतु उन्होने मना कर दिया फिर मैंने उन्हें 100/- देना चाहा, पर वे उसे भी लेने से इंकार कर दिया, फिर मेरा अगला सवाल आप लोग ऐसे क्यों घुम रहे हैं, फिर उन्होंनें उनकी जीवनी शुरू हुई – उन्होंने 2200 किमी की यात्रा की और अब द्वारका में अपने घर जा रहे थे। उन्होंने कहा कि मेरी दोनों आंखें 1 साल पहले चली गई थीं और डॉक्टर ने कहा कि ऑपरेशन करना बेकार है, तब मेरी मां ने डॉक्टर से मिलकर ऑपरेशन करने को तैयार किया, तब डॉ. तैयार हुए और ऑपरेशन करना पड़ा। वह श्री कृष्ण मंदिर गई और भगवान को वचन/मन्नत माँगी कि यदि उनकी (बेटे की ) आँखें वापस आती हैं, तो मेरा बेटा पैदल बालाजी और पंढरपुर जाकर फिर वापस द्वारका आएगा, इसलिये मैं माँ के वचनों के लिये पदयात्रा कर रहा हूं । फिर मैंने उनकी धर्मपत्नी के बारे में पुछा तो बोले कि वो मुझे अकेले छोड़ने को तैयार नही थी, आपके लिए रास्ते में भोजन बनाने के लिए साथ रहुंगी और साथ निकल पड़ी, मैंने शिक्षा के बारे में पुछा क्योंकि वे 25% हिंदी और 75% अंग्रेजी बोल रहे थे । मेरी बुद्धि सुनकर सुन्न हो गई और मैं दंग रह गई । उन्होने लंदन स्थित ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से एस्ट्रोनॉमी में उन्होंने 7 साल की पीएचडी की है और उनकी पत्नी ने लंदन में साइकोलॉजी में पीएचडी की है ( इतना सीखने के बाद भी उनके चेहरे पर गर्व नहीं है, नही तो अपने यहाँ 10’वीं फैल भी छाती फुलाकर चलता है ।), इतना ही नही वी. रंगराजन ( गवर्नर ) इनके साथ, वैसे ही कल्पना चावला के साथ एक कामकाजी और दोस्ती का रिश्ता था और वे अपनी मासिक पेंशन एक अंधे ट्रस्ट को देते हैं। वर्तमान में, वे सोशल मीडिया से बहुत दूर रहते हैं। सड़क पर जाने वाले हर जोड़े भिखारी होते हैं, *ऐसा नही है* ।
एकाध जोड़ी, माँ के वचन के लिए, भगवान राम बनने को तैयार होते हैं और कोई अपने पति के साथ सीता बनने को भी तैयार थी। इसीलिए कलियुग में आज मैं जिन लोगों से मिली, मैं उन्हें राम सीता ही समझती हूँ।
हमने सड़क पर खड़े रहते हुए लगभग 1 घंटे तक उनसे बातचीत की। ऐसे गहन विचारों ने पूरे मन को सुन्न कर दिया। अहंकार दूर हो गया । और मुझे लगा कि हम झूठे ढोंग में जी रहे हैं। उस व्यक्ति के बोलने की सादगी देखकर, ऐसा लगा कि हम इस दुनिया में शून्य हैं। मैं इस पैदल यात्रा को देखकर चकित था। यात्रा के तीन महीने हो चुके हैं और घर पहुंचने में एक और महीना लगेगा।
उनका नाम
डॉ. देव उपाध्याय और डॉ. सरोज उपाध्याय

लेख-प्रमोद आसन
रवींद्र
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