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काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के साथ करीब 250 साल बाद बदली काशी की सूरत, जानें कुछ रोचक बातें
1/8 काशी विश्वनाथ मंदिर के बारे में जानिए सबकुछ🙏🌹
🙏🌹काशी विश्वनाथ मंदिर से गंगा को एकाकार करने वाला काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बनकर तैयार हो गया है और अब करीब 250 साल बाद काशी नगरी को एक नई काशी से रुबरू होने का मौका मिला है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद मोदी इसे राष्ट्र को भेंट कर चुके हैं। इस ऐतिहासिक अवसर पर देश के जाने माने संत और साधुजन, शंकराचार्य, महामंडलेश्वर, श्री महंत सहित सनातन धर्म के सभी संप्रदायों के प्रमुख और गणमान्य लोग काशी में मौजूद रहे। वहीं, विश्‍वनाथ धाम के साथ सजकर तैयार पूरी काशी मंत्रोच्चार और शंखनाद से गूंजेगी।

2/8 एकबार फिर विश्वनाथ धाम में आया ज्ञानवापी कूप

करीब ढाई सौ साल पहले महारानी अहिल्याबाई के बाद अब विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार विश्‍वनाथ धाम के रूप में सामने आया है। वास्तविक रूप से धर्म नगरी में आने और आनंद कानन का अहसास कराने वाला चुनार के गुलाबी पत्थरों की आभा से दमकता विश्‍वनाथ धाम रिकॉर्ड समय यानी 21 महीने में बनकर तैयार हुआ है। मंदिर के लिए सात तरह के पत्थरों से विश्‍वनाथ धाम को सजाया गया है। यहां आने वाले श्रद्धालु रुद्र वन यानी रुद्राक्ष के पेड़ों के बीच से होकर बाबा विश्‍वनाथ का दर्शन करने पहुंचेंगे। 352 साल पहले अलग हुआ ज्ञानवापी कूप एक बार फिर से बाबा विश्वनाथ धाम परिसर में आ गया है।

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3/8 चारों प्रतिमाएं लगा दी गईं

विश्‍वनाथ धाम में आदि शंकराचार्य, महारानी अहिल्याबाई, भारत माता और कार्तिकेय की प्रतिमाओं को स्थापित करने का काम शनिवार रात से शुरू होकर रविवार सुबह तक पूरा हो गया। इसके लिए विशेषज्ञों की टीम लगी रही। घाट से धाम जाते समय सबसे पहले कार्तिकेय, इसके बाद भारत माता और फिर अहिल्‍याबाई की प्रतिमा लगी है। अंत में आदि शंकराचार्य की प्रतिमा है। प्रधानमंत्री के बाबा के दरबार मे जाने के लिए मंदिर चौक की सीढ़ियां नहीं उतरनी होगी। उनके लिए रैंप बना उसपर शेड भी लगाया गया है।

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4/8 मंदिर के इतिहास को संरक्षित करेगा काशी विद्वत परिषद

काशी विद्वत परिषद काशी विश्वनाथ मंदिर के इतिहास से संबंधित दस्तावेजों को संरक्षित करेगा। मुगल शासक औरंगजेब के फरमान से 1669 में आदि विश्‍वेश्‍वर के मंदिर को ध्वस्त किए जाने के बाद 1777 में मराठा साम्राज्य की महारानी अहिल्याबाई ने विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। इसके बाद वर्ष 1835 में राजा रणजीत सिंह ने मंदिर के शिखर को स्वर्ण मंडित कराया तो राजा औसानगंज त्रिविक्रम सिंह ने मंदिर के गर्भगृह के लिए चांदी के दरवाजे चढ़ाए थे।

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5/8 436 में तीसरी बार हुआ मंदिर का जीर्णाद्धार

काशी विश्‍वनाथ से संबंधित महत्वपूर्ण कालखंड पर नजर डालें तो औरंगजेब से पहले 1194 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने काशी विश्वनाथ मंदिर पर हमला किया था। 13वीं सदी में एक गुजराती व्यापारी ने मंदिर का नवीनीकरण कराया तो 14वीं सदी में शर्की वंश के शासकों ने मंदिर को नुकसान पहुंचाया। 1585 में एक बार फिर टोडरमल द्वारा काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया था। अब 436 साल में तीसरी बार मंदिर का जीर्णोद्धार विश्‍वनाथ धाम के रूप में हुआ है।

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6/8 दर्शन मात्र से होती है मोक्ष की प्राप्ति

मान्यताओं के अनुसार, काशी के बाबा विश्वनाथ के दर्शन मात्र से ही पापों से मुक्ति मिल जाती है और मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। शास्त्रों और पुराणों के अनुसार, जब संसार में प्रलय आएगी और पूरी सृष्टि का विनाश हो जाएगा तब काशी ही एकमात्र जगह होगी, जो सुरक्षित रहेगी। क्योंकि काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी है। इसलिए देश-विदेश से भक्तजन मंदिर के दर्शन करने आते हैं। काशी में देवी मां का एक शक्तिपीठ भी स्थित है, जिससे इस जगह की पवित्रता और बढ़ जाती है।

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7/8 भगवान शिव और माता पार्वती का है प्रिय स्थान

ऐसी मान्यता है कि सृष्टि के निर्माण के समय काशी में ही भगवान शिव ने अपने शरीर से नारी शक्ति रूप में देवी आदिशक्ति को प्रकट किया था। यहीं पर भगवान विष्णु का प्राकट्य हुआ था। काशी के विषय में कहा जाता है कि इस स्थान को भगवान शिव स्वयं अपने त्रिशूल पर धारण करते हैं। 5 कोश में फैली काशी की भूमि को अविमुक्तेश्वर स्थान कहा जाता है, जो भगवान शिव की राजधानी है। कहते हैं रुद्र ने भगवान शिव से इस स्थान को अपनी राजधानी बनाने का अनुरोध किया था। दूसरी ओर देवी पार्वती को हिमालय पर रहते हुए मायके में रहने का अनुभव होता था और वह किसी अन्य स्थान पर अपना निवास बनाने के लिए भगवान शिव से अनुरोध करती थीं। ऐसे में भगवान शिव ने लंका में सोने की नगरी का निर्माण करवाया लेकिन यह नगरी रावण ने भगवान शिव से दक्षिणा में मांग ली। बद्रीनाथ में भगवान शिव ने अपना ठिकाना बनाया तो भगवान विष्णु ने यह स्थान शिवजी से ले लिया। तब भगवान शिव ने काशी को अपना निवास बनाया। कहते हैं भगवान शिव से पहले यह स्थान भगवान विष्णु का स्थान हुआ करता था। काशी विश्वनाश रूप में भगवान शिव ने स्वयं अपने तेज से विश्वेश्वर शिवलिंग को स्थापित किया था। यह स्वयंभू लिंग साक्षात शिव रूप माना जाता है। बताया जाता है कि जब भगवान शिव काशी में आ गए थे तब उनके पीछे-पीछे उत्तम देव स्थान, नदियां, वन, पर्वत आदि काशी में पहुंच गए थे।

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8/8 भगवान विष्णु ने की थी यहां तपस्या

शिव और काल भैरव की इस नगरी को सप्तपुरियों में शामिल किया गया है। काल भैरव को इस शहर का कोतवाल कहा जाता है और भैरव बाबा पूरे शहर की व्यवस्था देखते हैं। बाबा विश्वनाथ के दर्शन से पहले काल भैरव के दर्शन करने होते हैं तभी दर्शन का महत्व माना जाता है। काशी दो नदियां वरुणा और असी के मध्य बसा होने की वजह से इसका नाम वारणसी पड़ा। बताया जाता है कि भगवान विष्णु ने अपने चिंतन से यहां एक पुष्कर्णी का निर्माण कराकर लगभग पचास हजार साल तक तपस्या की थी। भैरव को भगवान शिव का गण और माता पार्वती का अनुचर माना जाता है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, काशी को दुनिया का प्राचीनतम प्राचीन शहर माना जाता है

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“बहुत लाजवाब पोस्ट”

एक दिन कॉलेज में प्रोफेसर ने विद्यर्थियों से पूछा कि इस संसार में जो कुछ भी है उसे प्रकृति ने ही बनाया है न?

सभी ने कहा, “हां प्रकृति ने ही बनाया है!“

प्रोफेसर ने कहा कि इसका मतलब ये हुआ कि बुराई भी प्रकृति की बनाई चीज़ ही है!

प्रोफेसर ने इतना कहा तो एक विद्यार्थी उठ खड़ा हुआ और उसने कहा कि इतनी जल्दी इस निष्कर्ष पर मत पहुंचिए सर!

प्रोफेसर ने कहा, क्यों? अभी तो सबने कहा है कि सबकुछ प्रकृति का ही बनाया हुआ है फिर तुम ऐसा क्यों कह रहे हो?

विद्यार्थी ने कहा कि सर, मैं आपसे छोटे-छोटे दो सवाल पूछूंगा फिर उसके बाद आपकी बात भी मान लूंगा!

प्रोफेसर ने कहा, “तुम कपिल शर्मा की तरह सवाल पर सवाल करते हो खैर पूछो!”

विद्यार्थी ने पूछा , “सर क्या दुनिया में ठंड का कोई वजूद है?”

प्रोफेसर ने कहा, बिल्कुल है! सौ फीसदी है! हम ठंड को महसूस करते हैं!

विद्यार्थी ने कहा, “नहीं सर, ठंड कुछ है ही नहीं ये असल में गर्मी की अनुपस्थिति का अहसास भर है! जहां गर्मी नहीं होती, वहां हम ठंड को महसूस करते हैं!”

प्रोफेसर चुप रहे!

विद्यार्थी ने फिर पूछा, “सर क्या अंधेरे का कोई अस्तित्व है?”

प्रोफेसर ने कहा, “बिल्कुल है रात को अंधेरा होता है!”

विद्यार्थी ने कहा, “नहीं सर अंधेरा कुछ होता ही नहीं! ये तो जहां रोशनी नहीं होती वहां अंधेरा होता है!

प्रोफेसर ने कहा, “तुम अपनी बात आगे बढ़ाओ!”

विद्यार्थी ने फिर कहा, “सर आप हमें सिर्फ लाइट एंड हीट (प्रकाश और ताप) ही पढ़ाते हैं! आप हमें कभी डार्क एंड कोल्ड (अंधेरा और ठंड) नहीं पढ़ाते! फिजिक्स में ऐसा कोई विषय ही नहीं सर, ठीक इसी तरह प्रकृति ने सिर्फ अच्छा-अच्छा बनाया है! अब जहां अच्छा नहीं होता, वहां हमें बुराई नज़र आती है पर बुराई को प्रकृति ने नहीं बनाया ये सिर्फ अच्छाई की अनुपस्थिति भर है!”

दरअसल दुनिया में कहीं बुराई है ही नहीं ये सिर्फ प्यार, विश्वास और प्रकृति में हमारी आस्था की कमी का नाम है!

ज़िंदगी में जब और जहां मौका मिले अच्छाई बांटिए!

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. क्या पापा गंदे हो सकते है ….
🟣….गंदे पापा….🟣

मिडिल क्लास फॅमिली में पली बढ़ी खुशबू अपने जिंदगी में सबसे ज्यादा गुस्सा अपने पापा से थी। पापा के लिए उसके मन में नफरत के अलावा कुछ न था।
22 साल की हो चुकी खुशबू ने आज तक एक भी वेलेंटाइन नहीं बनाया था…जबकि उसकी क्लास मेट्स…. हर साल अलग अलग बॉयज के साथ वेलेंटाइन डे मनाती थी …
खैर, आज खुशबू आग्नेय से शादी के वक़्त सबसे ज्यादा खुश थी… कि आखिर इस बेहद स्ट्रिक्ट, कड़क और डिसिप्लिनड पापा से छुटकारा तो मिला।”ये न करो” “वो न करो” ऐसे कपड़े न पहनों”,लेट नाईट पार्टियाँ नहीं,”लड़कों से दोस्ती नहीं।”
आज तक एक स्मार्टफोन खरीद तक नहीं दिया…!… सारे सपनों और अरमानों को अपने नैरो माइंडेड सोच के कारण कुचलकर रख दिया ।अब मैं आग्नेय के साथ सारी दबी इच्छाएँ पूरी करूँगी।….आग्नेय और खुशबू पिछले तीन सालों से एक ही कॉलेज में साथ साथ पढ़ते थे और एक दूसरे को अच्छी तरह जानते थे एक दूसरे की पसंद नापसंद का अच्छे से ख्याल रखते थे। खुशबू ने बहुत डरते डरते पापा से आग्नेय के साथ शादी की इच्छा जताई थी।और पापा ने आग्नेय और उसके परिवार वालों से मिलकर शादी के लिए हामी भर दी।
*
खुशबू ने विदाई समय पहली बार पापा को उससे लिपटकर बच्चों की तरह फूट फूट कर रोते देखा पर खुशबू को पापा के इमोशन से कोई मतलब न था वह बस पत्थर की बुत बन खड़ी थी,जाते जाते पापा ने ढ़ेर सारे गिफ्ट के साथ एक बंद लिफाफा भी खुशबू को दिया।
ससुराल पहुँचते ही सबसे पहले खुशबू ने लिफाफा खोल पापा की चिट्ठी को पढ़ना शुरु किया ” खुशबू बेटा मैं जानता हूँ कि पिछले दस सालों से मैं तुम्हारे साथ बैड डैड की तरह पेश आता रहा।मैं तुम्हारे सामने स्ट्रिक्ट इसलिए बनता था क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तुम्हारा भी हाल रागिनी जैसा हो ।रागिनी मेरे साथ कॉलेज में पढ़ने वाली एक बहुत अच्छे घर की पढ़ने में तेज शरीफ लड़की थी परंतु फैशन और नकली ग्लैमर के चक्कर में उसने अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर ली थी।
“उसने वो सब किया जिससे मैं तुम्हें हमेशा रोकता रहा।फैशनेबल कपड़े ,लड़को से दोस्ती,लेट नाईट पार्टियाँ सब करती थी ,सोचती चरित्र अच्छा है तो इन सब में कोई हर्ज नहीं।फिर एक दिन उसके ड्रिंक्स में नशा डालकर उसके कुछ दोस्तों ने ………।इस घटना से वो अपना दिमागी संतुलन खो बैठी और समाज के तानों और लोगों से बचने के लिए उसके पापा ने उसकी माँ और छोटी बहन के साथ सल्फास खाकर सुसाइड कर लिया।”
खुशबू बेटा, आज से तुम अब दो परिवारों की इज़्ज़त हो और मैं तुमसे यही उम्मीद करूँगा कि तुम ऐसा कोई काम नही करोगी जिससे दोनों परिवारों की इज़्ज़त पे कोई दाग लगे और हो सके तो अपने बैड डैड को माफ कर देना।
चिट्ठी पढ़कर खुशबू फूट फूट कर रोते हुए तुरंत फ़ोन लगाकर भर्राए आवाज़ में पापा से कहा” मुझे माफ़ कर दीजिए पापा ! मैं आपके गुस्से के पीछे के प्यार को नही देख पाई!!! आपके चिल्लाहट के पीछे की केअर नहीं देख पाई!आपकी झुंझलाहट के पीछे का समर्पण नही देख पाई !”
” मैं हर जन्म में आपकी ही बेटी बनना चाहूँगी पापा …….”
*
वक़्त बीतता गया ….
खुशबू को ससुराल आए लगभग एक साल होने को आया…मगर ऐसा कोई दिन ना था जिस दिन उसने अपने पापा को याद ना किया हो।आज उसके पापा का जन्मदिन था।सुबह मंदिर गई ।पूजा की …पापा की खुशी और सलामती के लिए दुआएँ माँगी।फिर शाम में केक लाकर अपने ससुरालवालों के साथ उनका जन्मदिन मनाने का प्रोग्राम बनाया।
फिर केक काटने से पहले पापा को वीडियो कॉल लगाया उधर पापा मम्मी के साथ उदास बैठे थे।खुशबू उन्हें देखते ही चहक के बोली ” हैप्पी बर्थडे टू यू माई स्वीट पापा !!!! पता है पापा …… यहाँ मैं आपकी डाँट… आपके गुस्से… को हर दिन मिस करती हूँ ।यहाँ सारे लोग मुझे बहुत प्यार करते हैं स्पेशली सासू माँ!पता है पापा …..एक दिन घर में मुहल्ले की औरतों सासु माँ को जब ये बोल रहीँ थीं कि कितनी अच्छी बहु मिली है तुम्हे ।….कपड़ो ,बोली और स्वभाव में शालीनता जरूर इसके मम्मी पापा से विरासत में मिले है।….आज कल की लड़कियों में इतने संस्कार अब कहाँ मिलते हैं।आपके लिए ये शब्द सुनकर पापा मेरा सर फक्र से ऊँचा हो गया।”
*
” आज मुझे आपपे प्राउड है पापा । आप मम्मा को हमेशा बोलते थे कि” सारी दुनिया को तो सुधार नही सकते बस अपना दामन बचा के रखना होगा।”
जानती हूँ पापा और महसूस भी किया है मैंने कि…आजकल लड़कियों के लिए बॉयफ्रेंड बनाना ,ड्रिंक्स करना, लिव इन रिलेशन रहना और ट्रांसपेरेंट ड्रेस पहनना फैशन सा है पर आपने एक सुरक्षा कवच बनकर मुझे इन बुराइयों से बचाये रखा।
आपको पता है पापा जब मैं यहाँ बी.एड. का एग्जाम पास कर टीचर बनूँगी ना….तो बच्चो को यही सिखाऊंगी कि “डैड के तेज गुस्से के पीछे का प्यार महसूस कर सको तो कर लो, ऐसा न हो कि बाद में सिर्फ पछताने के सिवा कुछ न रहे!!!”
*
दूसरी तरफ पापा के होंठ काँप रहे थे .. वो बोल रहे थे आँखों से लगातार आँसू लिए मुँह से अपनी खुशबू बेटी के लिए ” खुश रहो भगवान करे तुम्हें मेरी उम्र और खुशियाँ लग जाए
🌹🙏🏻जय श्री जिनेन्द्र🙏🏻🌹
🌹पवन जैन🌹

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वेदों में सूर्य किरण चिकित्सा पद्धति


वेदों में सूर्य किरण चिकित्सा पद्धति
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सूर्य किरण से नाना प्रकार के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। वाष्प स्नान से जो लाभ होता है वही लाभ धूप स्नान से होता है। धूप स्नान से रोम कूप खुल जाते हैं और शरीर से पर्याप्त मात्रा में पसीना निकलता है और शरीर के अन्दर का दूषित पदार्थ गल कर बाहर निकल जाता है। जिससे स्वास्थ्य सुधर जाता है।

जिन गायों को बाहर धूप में घूमने नहीं दिया जाता है और सारे दिन घर में ही रख कर खिलाया-पिलाया जाता है, उनके दुग्ध में विटामिन डी विशेष मात्रा में नहीं पाया जाता है।

उदय काल का सूर्य निखिल विश्व का प्राण है। प्राणःप्रजानामुदयत्येष सूर्यः प्राणोपनिषद् 1/8 सूर्य प्रजाओं का प्राण बन कर उदय होता है।

अथर्ववेद में सूर्य किरणों से रोग दूर करने की चर्चा है। अथर्ववेद काँड 1 सूक्त 22 में-

अनुसूर्यमुदयताँ हृदयोतो हरिमा चते। गौ रोहितस्य वर्णन तेन त्वा परिद्धयसि॥ 1॥

अर्थ- हे रोगाक्राँत व्यक्ति। तेरा हृदय धड़कन, हृदयदाह आदि रोग और पाँडुरोग सूर्य के उदय होने के साथ ही नष्ट हो जायं। सूर्य के लाल रंग वाले उदयकाल के सूर्य के उस उदय कालिक रंग से भरपूर करते हैं।

इस मंत्र में सूर्य की रक्त वर्ण की किरणों को हृदय रोग के नाश करने के लिए प्रयोग करने का उपदेश है। सूर्य किरण चिकित्सा के अनुसार कामला और हृदयरोग के रोगी को सूर्य की किरणों में रखे लाल काँच के पात्र में रखे जल को पिलाने का उपदेश है।

“परित्वा रोहितेर्वर्णेदीर्घायुत्वाय दम्पत्ति। यथायमरपा असदथो अहरितो भुवत्॥ 2॥

अर्थ- हे पाँडुरोग से पीड़ित व्यक्ति। दीर्घायु प्राप्त कराने के लिए तेरे चारों ओर सूर्य की किरणों से लाल प्रकाश युक्त आवरणों में तुझे रखते हैं जिससे यह तू रोगी पाप के फलस्वरूप रोग रहित हो जाय और जिससे तू पाँडुरोग से भी मुक्त हो जाय।

ऐसे रोगियों को नारंगी, सन्तरे, सेब, अंगूर आदि फलों को खिलाने तथा गुलाबी रंग के पुष्पों से विनोद कराना भी अच्छा है।

या रोहिणी दैवत्या गावो या उत रोहिणीः। रुपं रुपं वयोवयस्तामिष्ट्रवा परिदध्यसि॥ 3॥

अर्थ- जो देव, प्रकाश सूर्य की प्रातःकालीन रक्त वर्ण की किरणें हैं और जो लाल वर्ण की कपिला गायें हैं या उगने वाली औषधियाँ हैं उनके भीतर विद्यमान कान्तिजनक चमक को और दीर्घायु जनक उन द्वारा तुझको सब प्रकार से परिपुष्ट करते हैं।

हृदयरोग के सम्बन्ध में वाव्यटूट अष्ठग संग्रह हृदय रोग निदान अ. 5 में लिखते हैं, पाँच प्रकार का हृदय रोग होता है वातज, पितज, कफज, त्रिदोषज और कृमियों से। इनके भिन्न-2 लक्षण प्रकट होते हैं। इसी प्रकार पाँडुरोग का एक विकृत रूप हलीमक है। उसमें शरीर हरा, नीला, पीला हो जाता है। उसके सिर में चक्कर, प्यास, निद्रानाश, अजीर्ण और ज्वर आदि दोष अधिक हो जाते हैं। इनकी चिकित्सा में रोहिणी और हारिद्रव और गौक्षीर का प्रयोग दर्शाया गया है। रोहित रोहिणी, रोपणाका, यह एक ही वर्ग प्रतीत होता है। हारिद्रव हल्दी और इसके समान अन्य गाँठ वाली औषधियों का ग्रहण है। शुक भी एक वृक्ष वर्ग का वाचक है।

अथर्ववेद काण्ड 6, सूक्त 83 में गंडमाला रोग को सूर्य से चिकित्सा करने का वर्णन है।

अपचितः प्रपतत सुपर्णों वसतेरिव। सूर्यः कृणोतु भेषजं चन्द्रमा वो पोच्छतु॥

(अथर्व. 6। 83।1)

अर्थ- हे गंडमाला ग्रन्थियों। घोंसले से उड़ जाने वाले पक्षी के समान शीघ्र दूर हो जाओ। सूर्य चिकित्सा करे अथवा चन्द्रमा इनको दूर करे।

यहाँ सूर्य की किरणों से गंडमाला की चिकित्सा करने का उपदेश है। नीले रंग की बोतल से रक्त विकार के विस्फोटक दूर होते हैं। यही प्रभाव चंद्रालोक का भी है। रात में चन्द्रातप में पड़े जल से प्रातः विस्फोटकों को धोने से उनकी जलन शान्ति होती है और विष नाश होता है।

एन्येका एयेन्येका कृष्णे का रोहिणी वेद। सर्वासामग्रभं नामावीरपूनीरपेतन॥

(अथर्व. 6। 83। 2)

अर्थ- गंडमालाओं में से एक हल्की लाल श्वेत रंग की स्फोटमाला होती है, दूसरी श्वेत फुँसी होती है। तीसरी एक काली फुँसियों वाली होती है। और दो प्रकार की लाल रंग की होती है उनको क्रम से ऐनी, श्येनी, कृष्णा और रोहिणी नाम से कहा जाता है। इन सबका शल्य क्रिया के द्वारा जल द्रव पदार्थ निकालता हूँ। पुरुष का जीवन नाश किये बिना ही दूर हो जाओ।

असूतिका रामायणयऽपचित प्रपतिष्यति। ग्लोरितः प्र प्रतिष्यति स गलुन्तो नशिष्यति ॥

(अथर्व. 6।83।3)

अर्थ- पीव उत्पन्न न करने वाली गंडमाला, रक्तनाड़ियों के मर्म स्थान में होने वाली, ऐसी गंडमाला भी पूर्वोक्त उपचार से विनाश हो जायेगी। इस स्थान से व्रण की पीड़ा भी विनाश हो जायेगी।

वीहि स्वामाहुतिं जुषाणो मनसा स्वाहा यदिदं जुहोमि। (अथर्व. 6।83।4)

अर्थ- अपने खाने-पीने योग्य भाग को मन से पसन्द करता हुआ सहर्ष खा, जो यह सूर्य किरणों से प्रभावित जल, दूध, अन्नादि पदार्थ मैं देता हूँ।

सं ते शीष्णः कपालानि हृदयस्य च यो विधुः। उद्यन्नादित्य रश्मिमिः शीर्ष्णो रोगमनीनशोंग भेदमशीशमः।

(अथर्व. 9।8।22)

अर्थ- हे रोगी तेरे सिर के कपाल सम्बन्धी रोग और हृदय की जो विशेष प्रकार की पीड़ा थी वह अब शाँत हो गई है। हे सूर्य! तू उदय होता हुआ ही अपनी किरणों से सिर के रोग को नाश करता है और शरीर के अंगों को तोड़ने वाली तीव्र वेदना को भी शाँत कर देता है।

इस प्रकार समस्त रोगों को सूर्य उदय होता हुआ अपनी किरणों से दूर करता है।

धूप स्नान करते समय रोगी का शरीर नग्न होना चाहिए। जब सूर्य की किरणें त्वचा पर पड़ती है तो उससे विशेष लाभ होता है। सिर को सदैव धूप लगने से बचाना चाहिए। छाजन(एक्जिमा) रोग में धूप स्नान से बहुत लाभ होता है। यदि शरीर का कोई प्रधान अंग निर्बल हो गया हो, तो धूप स्नान से उन्हें लाभ होता है। कुछ रोगों में धूप स्नान मना भी है यथा सभी प्रकार के ज्वर में।

इस तरह से वेदों में नैसर्गिक सूर्य क्रिया चिकित्सा का स्पष्ट वर्णन है।

सूर्य किरण चिकित्सा पद्धति दिलाती है हर बीमारी से मुक्ति
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सूर्य किरण चिकित्सा पद्धति इस प्रकार की चिकित्सा है जिसका उपयोग प्रत्येक व्यक्ति आसानी से अपने घर पर कर सकता है। इससे व्यक्ति अपने शरीर को बीमार होने से बचा सकता है या अपनी बीमारी से मुक्ति पा सकता है। सूर्य चिकित्सा के अपने सिद्धांत हैं जो कि पूर्णत: प्राकृतिक हैं।

क्या कहते हैं सूर्य किरण चिकित्सा पद्धति के सिद्धान्त
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सूर्य विज्ञान के अनुसार रोगोत्पत्ति का कारण शरीर में रंगों का घटना-बढ़ना है। सूर्य किरण चिकित्सा के अनुसार अलग‍-अलग रंगों के अलग-अलग गुण होते हैं|।लाल रंग उत्तेजना और नीला रंग शक्ति पैदा करता है। इन रंगों का लाभ लेने के लिए रंगीन बोतलों में आठ-नौ घण्टे तक पानी रखकर उसका सेवन किया जाता है।
मानव शरीर रासायनिक तत्वों का बना है। रंग एक रासायनिक मिश्रण है। जिस अंग में जिस प्रकार के रंग की अधिकता होती है शरीर का रंग उसी तरह का होता है। जैसे त्वचा का रंग गेहुंआ, केश का रंग काला और नेत्रों के गोलक का रंग सफेद होता है। शरीर में रंग विशेष के घटने-बढ़ने से रोग के लक्षण प्रकट होते हैं, जैसे खून की कमी होना शरीर में लाल रंग की कमी का लक्षण है। सूर्य स्वास्थ्य और जीवन शक्ति का भण्डार है।

सूर्य किरणों के फ़ायदे
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मनुष्य सूर्य के जितने अधिक सम्पर्क में रहेगा उतना ही अधिक स्वस्थ रहेगा। जो लोग अपने घर को चारों तरफ से खिड़कियों से बन्द करके रखते हैं और सूर्य के प्रकाश को घर में घुसने नहीं देते वे लोग सदा रोगी बने रहते हैं जहां सूर्य की किरणें पहुंचती हैं, वहां रोग के कीटाणु स्वत: मर जाते हैं और रोगों का जन्म ही नहीं हो पाता। सूर्य अपनी किरणों द्वारा अनेक प्रकार के आवश्यक तत्वों की वर्षा करता है और उन तत्वों को शरीर में ग्रहण करने से असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं।
शरीर को कुछ ही क्षणों में झुलसा देने वाली गर्मियों की प्रचंड धूप से भले ही व्यक्ति स्वस्थ होने की बजाय बीमार पड़ जाए, लेकिन प्राचीन ग्रंथ अथर्ववेद में सुबह धूप स्नान हृदय को स्वस्थ रखने का कारगर तरीका बताया गया है। इसमें कहा गया है कि जो व्यक्ति सूर्योदय के समय सूर्य की लाल रश्मियों का सेवन करता है उसे हृदय रोग कभी नहीं होता।
जैसा कि आप सब जानते ही होंगे कि सूर्य के प्रकाश में सात रंग होते हैं। उन सात रंगों में से प्रत्येक की अलग-अलग प्रकृति होती है। यह एक अलग तरह का फ़ायदा पहुंचाती है। इस बात को ध्यान में रख कर हम आपको उन सात रंगों के बारे में विशेष जानकारी दे रहे हैं ताकि आप उनसे लाभ ले सकें।

अब हम सूर्य के सातों रंगों की चिकित्सा के बारे में जानेंगे-
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  1. लाल किरण👉 सूर्य रश्मि पूंज में 80% केवल लाल किरण होती है| ये गर्मी की किरण होती है, जिनको हमारा चर्म भाग 80% सोख लेता है| स्नायु मंडल को उत्तेजित करना इनका विशेष काम है| लाल रंग गर्मी बढ़ता है व शरीर के निर्जीव भाग को चैतन्यता प्रदान करता है। शरीर के किसी भाग में यदि गति ना हो तो उस भाग पर लाल रंग डालने से उसमें चैतन्यता आ जाती है। लाल रंग से जोड़ों का दर्द, सर्दी का दर्द, सूजन, मोच, गठिया आदि रोगों मे लाभ मिलता है| जिसकी पगतली ठंडी हो तो उसे लाल रंग के मोजे पहनने चाहिए। शरीर में लाल रंग की कमी से सुस्ती अधिक होती है। नींद ज़्यादा आती है पर भूख कम हो जाती है। सूर्य तप्त लाल रंग के जल व तेल से मालिश करने से गठिया व किसी प्रकार के बाल रोग नहीं होते हैं। सूर्य तप्त लाल रंग के जल से फोड़े फुंसी धोएं तो लाभ मिलता है।

विशेष सावधानी
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1) जिस कमरे में लाल रंग का पेंट किया हो वहां भोजन ना करें। लाल रंग का टेबल कवर बिछा कर भोजन ना करें, इससे पाचन बिगड़ जाता है।
2) केवल लाल रंग का सूर्य तप्त जल थोड़ा सा ही पिएं, ज़्यादा पीने से उल्टी व दस्त होने का डर रहता है।

  1. नारंगी किरण👉 यह रंग भी गर्मी बढ़ाता है। यह रंग दमा रोग के लिए रामबाण है। दमा, टीबी, प्लीहा का बढ़ना, आंतों की शिथिलता आदि रोगों में नारंगी किरण तप्त जल 50 सी. सी. दिन में दो बार देने से लाभ मिलता है। लकवे में नारंगी किरण तप्त तेल से मालिश करने से लाभ मिलता है।
  2. पीली किरण:👉 पीला रंग बुद्धि, विवेक व ज्ञान की वृद्धि करने वाला है। ऋषि मुनि इसी कारण पीले कपड़े पहनते थे। पेट में गड़बड़, विकार, क्रमी रोग, पेट फूलना, कब्ज, अपच आदि रोगों में पीली किरण द्वारा सूर्य तप्त जल देने से लाभ मिलता है। पानी की मात्रा 50 सी. सी. दिन में 2 बार दें।
  3. हरी किरण👉 इसका स्वभाव मध्यम है। यह रंग आंख व त्वचा के रोगों में विशेष लाभकारी है। यह रंग भूख बढ़ाता है, हरा रंग दिमाग़ की गर्मी शांत करने व आंखों की ज्योति बढ़ाने में रामबाण है। समय से पहले सफेद हो रहे बालों में अगर हरी किरण द्वारा सूर्य तप्त तेल से मालिश करें तो आराम होगा। सिर व पांव मे मालिश करने से नेत्र रोग नहीं होते हैं व नींद अच्छी आती है। कान के रोगों में हरे तेल की 4-5 बूंदें डालने से लाभ होता है। जिन्हें खुजली हो, फोड़े फुंसी हो उन्हें हरे रंग के कपड़े पहनने चाहिए।
  4. आसमानी किरण👉 इनमें चुंबकीय व विद्युत शक्ति होती है। यह सब रंगों में बेस्ट रंग है, यह रंग शांति प्रदान करता है। भगवान राम व कृष्ण भी यही रंग लिए हुए थे। आसमानी रंग जितना हल्का होता है उतना ही अच्छा होता है। टॉन्सिल या गले के रोग में आसमानी रंग का सूर्य तप्त जल दिन में 50 सी. सी. दो बार देने से लाभ मिलता है। अस्थि रोग या गठिया में इस जल से भीगी पट्टियां बांधें तो लाभ होगा। इस रंग के तेल की मालिश से शरीर मजबूत व सुंदर बनता है। स्वस्थ मानव भी अगर यह जल पिए तो टॉनिक का काम करता है। मधुमक्खी, बिच्छू के काटने पर उस स्थान को आसमानी रंग से धोएं तो लाभ होगा। शरीर में सूजन हो तो आसमानी रंग के कपड़े पहनें।
  5. नीली किरण👉 इस रंग की कमी से पेट में मरोड़, आन्त्रसोध व बुखार होता है। इसमें नीली किरण का सूर्य तप्त जल 50 सी. सी. दिन में दो बार दें, लाभ होगा। फोड़े फुंसी को इस जल से धोने पर उनमें पस नहीं पड़ता है। इस जल से कुल्ले करने पर टॉन्सिल व छालों में लाभ मिलता है। इस रंग के तेल से सिर में मालिश करने पर बाल काले व मुलायम बनते हैं। सिर दर्द नहीं होता है और दिमाग़ को ताक़त मिलती है। स्मरण शक्ति तेज होती है।
  6. बैंगनी किरण👉 यह किरण शीतल होती है। इस रंग की कमी से शरीर में गर्मी बढ़ जाती है। हैजा, हल्का ज्वर व परेशानी रहती है। बैंगनी किरण से बना सूर्य तप्त जल रैबीज के रोगी को 50 सी. सी. दिन में 2 बार देने से लाभ मिलता है। टी. बी. के रोगी को भी इस जल से लाभ मिलता है। नीली किरण वाले जल से बुद्धि बढ़ती है, दिमाग़ शांत रहता है। शरीर में इस रंग से बने तेल की मालिश से नींद अच्छी आती है व थकान दूर होती है।

सूर्य की किरण से सम्बंधित कुछ अन्य महत्वपूर्ण जानकारी
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सूर्य किरण चिकित्सा प्रायः चार माध्यमों से की जाती है-

1.👉 पानी द्वारा भीतरी प्रयोग
2.👉 तेल द्वारा बाहरी प्रयोग
3.👉 सांस द्वारा
4.👉 सीधे ही किरण द्वारा

सूर्य की किरण में सात रंग होते हैं किंतु मूल रंग तीन ही होते है।

1.👉 लाल
2.👉 पीला
3.👉 नीला

सूर्य चिकित्सा इन रंगों की सहायता से की जाती है।
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1.👉 नारंगी (लाल, पीला, नारंगी में से एक)
2.👉 हरा रंग
3.👉 नीला (नीला, आसमानी, बैंगनी में से एक)

सूर्य तप्त (सूर्यतापी) जल तैयार करने की विधि
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साफ कांच की बोतल में साफ ताज़ा जल भरकर लकड़ी के कार्क से बंद कर दें। बोतल का मुंह बंद करने के बाद उसे लकड़ी के पट्टे पर रख कर धूप में रखें। 6-7 घंटे बाद सूर्य की किरण के प्रभाव से सूर्य तप्त होकर पानी दवा बन जाता है और रोग निरोधक तत्वों से युक्त हो जाता है। चाहें तो अलग-अलग बोतल में पानी बनाएं पर ध्यान रहे कि एक रंग की बोतल की छाया दूसरे रंग की बोतल पर ना पड़े।

धूप में रखी बोतल गरम हो जाने से उसमें खाली भाग पर भाप के बिंदु या बुलबुले दिखने लगें तो समझ जाएं कि पानी दवा के रूप में उपयोग के लिए तैयार है। धूप जाने से पहले लकड़ी के पट्टे सहित उसे घर में सही जगह पर रख दें व सूर्य तप्त जल को अपने आप ठंडा होने दें। यह पानी तीन दिन तक काम में लिया जा सकता है। पुराने रोगों में पानी की खुराक 25 सी. सी. दिन में तीन बार लें।

तेज रोगों में 25 सी. सी. दो-दो घंटे के बाद, बुखार, हैजा में 25 सी. सी. 1/2 घंटे के अंतराल से देना चाहिए। नारंगी रंग की बोतल का पानी नाश्ते या भोजन के 15 मिनट बाद लेना चाहिए। नीले व हरे रंग का पानी खाली पेट लेना चाहिए, क्योंकि इसका काम शरीर में जमा गंदगी बाहर निकलना व खून साफ करना है।

यदि आप टॉनिक के रूप में सूर्य तप्त जल पीना चाहते हैं तो उसे सफेद कांच की बोतल में भरकर बनाएं। इस पानी से बाल धोने से चमक आती है व बाल टूटते नहीं हैं।

सामान्य रूप से देखने पर सूर्य का प्रकाश सफेद ही दिखाई देता है पर वास्तव में वह सात रंगों का मिश्रण होता है। कांच के त्रिपार्श्व से सूर्य की किरणों को गुजारने पर दूसरी ओर इन सात रंगों को स्पष्ट देखा जा सकता है। किसी विशेष रंग की कांच की बोतल में साधारण पानी, चीनी, मिश्री, घी, ग्लिसरीन आदि तीन-चौथाई भरकर सूर्य की किरणें दिखाने से या धूप में रखने से उस कांच द्वारा सूर्य के प्रकाश से उसी रंग की किरणों को ग्रहण किया जाता है। उसी रंग का तत्व और गुण पानी आदि वस्तु में उत्पन्न हो जाता है। वह सूर्यतप्त (सूर्य किरणों द्वारा चार्ज की गई वस्तु) रोग-निवारण गुणों और स्वास्थ्यवर्धक तत्वों से युक्त हो जाती है। इन सूर्यतापित वस्तुओं के उचित भीतरी और बाहरी प्रयोग से मनुष्य के शरीर में रंगों का संतुलन कायम रखा जा सकता है और अनेक प्रकार के रोगों को सहज ही दूर किया जा सकता है। यही सूर्य किरण चिकित्सा है।

प्रकृति की अमूल्य देन सूर्य-किरणें
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धूप और पाचन की क्रियाओं में बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है। यदि मनुष्य या अन्य किसी प्राणी पर प्रतिदिन सूर्य किरणें नहीं पड़तीं, तो उसकी पाचन और समीकरण शक्ति क्षीण हो जाती है। स्फुरण (Solar Radiation) तथा मानव जीवन इन दोनों का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। जीवन का सम्बन्ध प्रकाश-शक्ति तथा उसके वर्ण-वैभव से है, न कि प्रोटीन, श्वेत सार, हाइड्रोजन, कार्बन अथवा उष्णाँक से।

आकाश और वायु- तत्व की भाँति प्रकाश-तत्व भी अत्यन्त सूक्ष्म है। प्रकृति के हरे भरे प्रशस्त अंचल में हम जो नाना रंगों की चित्रपटी देखते हैं-यह सब सूर्य की सतरंगी किरणों की ही माया है। प्रकाश में अन्तर्निहित रंगीनी केवल नेत्रों को ही सुन्दर प्रतीत नहीं होती प्रत्युत जीवन रंजक भी है। सूर्य की किरणों का प्राणी जगत पर स्थायी प्रभाव पड़ा करता है। सूर्य किरण चिकित्सा का यही मूलाधार है। रंगीन बोतलों में पानी रखने से प्रकाश का प्रभाव भी बदलता रहता है और उसमें भाँति-2 के गुण उत्पन्न हो जाते हैं।

सूर्य की किरणों के रंग
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चर्म चक्षुओं से सूर्य की किरणें श्वेत प्रतीत होती हैं किन्तु वास्तव में ये सात रंगों की बनी हुई हैं। इन सातों रंगों का रासायनिक प्रभाव पृथक-2 होता है। विभिन्न फलों तथा तरकारियों को प्रकाश तथा रंग नाना प्रकार के गुण प्रदान करता है। इन रासायनिक गुणों के अनुसार हम पृथक भाजियों का प्रयोग करते हैं। प्रकृति की तीन रचना में सबका कुछ न कुछ गुप्त प्रयोजन है। वनस्पति जगत में प्रकाश तत्व के कारण ही नाना प्रकार के गुण, रंग, एवं रासायनिक तत्व सामने आते हैं।

रंगीन फल तथा तरकारियों का प्रभाव
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रंगों के आधार पर हम फल तथा तरकारियों को निम्न वर्गों में विभाजित कर सकते हैं-

  1. पीला रंग👉 इस रंग वाले फलों का प्रभाव पाचन क्रिया पर बड़ा अच्छा पड़ता है, आमाशय और कोष्ठ के स्नायुओं को उत्तेजित करने में इसका विशेष महत्व है। ये फल रेचक व पाचक होते हैं। पेट की खराबियों में ये खासतौर पर काम में लाये जाते हैं। इनमें कागजी नींबू, चकोतरा, मकोय, अनानास, खरबूजा, पपीता, बथुआ, अमरूद। इनमें कार्बन, नाइट्रोजन या खनिज लवण प्रचुर मात्रा में होता है।
  2. लाल रंग👉 इस रंग वाले फलों में लोहा और पोटेशियम की मात्रा अधिक होती है। नाइट्रोजन और ऑक्सीजन की भी पर्याप्त मात्रा होती है। इस वर्ग में चुकन्दर, लालबेर, टमाटर, पालक, लालशाक, मूली इत्यादि रखें गये हैं।
  3. नारंगी रंग👉 इन फल तथा तरकारियों में चूना और लोहा विशेष रूप से पाया जाता है। इस श्रेणी में नारंगी, आम, गाजर इत्यादि हैं।
  4. नीला रंग👉 इस रंग की श्रेणी में हम गहरा नीला और बैंगनी भी रखते हैं। इन तरकारियों में ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, मैग्नीशियम तथा फास्फोरस अधिक होता है। इस श्रेणी में जामुन फालसा, आलू बुखारा, बेल, सेब विशेष रूप से आते हैं।
  5. हरे रंग👉 की तरकारियाँ शीतल प्रकृति की होती हैं, गुर्दों को हितकारी, पेट को साफ करने वाली और नेत्र तथा चर्म रोगों में लाभदायक सिद्ध होती है।

मनुष्य के शारीरिक अथवा मानसिक विकास में सूर्य किरणों द्वारा उत्पन्न उपरोक्त सभी रंगों के फल, शाक, भाजियों का संतुलन आवश्यक है। यदि एक ही प्रकार के रंग का भोजन अधिक दिन तक लेते रहे तो वह रंग शरीर में अधिक हो जायेगा और रोग उत्पन्न हो सकता है। अतः यथासंभव सभी रंगों का भोजन काम में लेना चाहिए। व्यक्तिगत रंग-संतुलन स्थापित कर हम सामंजस्य स्थापित कर सकते हैं।

दैनिक जीवन में सूर्य किरणों का उपयोग
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मनुष्य के लिए सूर्य का प्रकाश सर्वश्रेष्ठ एवं अकथनीय गुणकारी है। हमारी आत्मा पर इसका प्रभाव इतना विकासपूर्ण होता है कि प्रायः हम अनुभव किया करते हैं कि अंधेरे में जैसे दम घुट रहा हो। उजाले में रहने से आँतरिक द्वेष दूर होते और हृदय की खिन्नता मिटकर चित्त प्रसन्न होता है। प्रकाश उत्साह, साहस और उत्सुकता का द्योतक है।

सूर्य स्नान👉 सूर्य में कीटाणुनाशक शक्तियाँ हैं अतः अधिक से अधिक धूप में रहने का अभ्यास करना चाहिए। सूर्य की प्राण पोषक शक्तियों को ग्रहण करने के लिए अमेरिका और इंग्लैण्ड में सूर्य स्नान का रिवाज है। समुद्र तट पर जब लोग सूर्य स्नान के लिए जाते हैं तो केवल जाँघिया के, अन्य पोशाक बिल्कुल उतार देते हैं, सूर्य की तेज किरणों में रेत पर लेट जाते हैं।

अनिद्रा में उपयोग
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अनिद्रा में एनीमिया अर्थात् रक्त की कमी में सूर्य का प्रकाश अमृत-तुल्य है। अनिद्रा क्षय तक उत्पन्न कर सकती है। सूर्य-प्रकाश लेने से रुधिर की प्राणपोषक वायु बढ़ जाती है, गति में भी तीव्रता आ जाती है। प्रकाश में श्वास क्रिया गहरी और धीमी हो जाती है। इसके फलस्वरूप रात्रि में अच्छी नींद आती है।

रक्त की कमी
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(एनीमिया) में रोगी सरदर्द से बड़ा परेशान रहता है। ऐसी दशा में सूर्य किरणें देने से लाभ होता है।

रक्तचाप
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सूर्य किरणों का बढ़े हुए रक्त चाप में उपयोग करने से रक्तचाप में कमी आ जाती है। सर्व साधारण के लिए भी यह उपयुक्त है कि वह 10-15 मिनट के लिए अवश्य धूप में बैठे। सूर्य किरण के सेवन से वजन बढ़ जाता है। रक्तचाप की सभी अवस्थाओं में किसी योग्य चिकित्सक के आदेशानुसार ही सूर्य-प्रकाश का सेवन करना चाहिए।

घाव-घावों को ठीक करने में
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सूर्य का प्रकाश बड़ा आश्चर्यजनक सिद्ध हुआ है क्योंकि रक्त में गति आ जाती है। सूर्य की किरणों से दूषित कीटाणु नष्ट होते हैं। सूर्य किरण शरीर को पार कर जाती हैं और रुधिर में जीवाणुओं की अभिवृद्धि करती हैं। इससे सब प्रकार की कमियाँ नष्ट होकर घाव अच्छा हो जाता है। रोगी को थोड़ी देर तक रोज सर्वांग सूर्य-स्नान लेना चाहिए।

क्षय में सूर्य का चमत्कार
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क्षय रोग में सूर्य किरणों से अत्यधिक लाभ होता है। रुधिर में प्राण शक्ति का आविर्भाव होता है। क्षय के रोगी को धूप में 10 से 20 मिनट तक बैठना चाहिये। शरीर पर जितने कम कपड़े रहें उतना अच्छा है। शरीर नंगा रहे तो सर्वोत्तम है। आधुनिक चिकित्सक सूर्य किरण को क्षय के लिये महौषधि मानते हैं। क्षय में सूर्य किरण का उपयोग करते हुए किसी योग्य चिकित्सक का आदेश लेना चाहिये।

साधारण जीवन में
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सूर्य-स्नान महान उपयोगी है, प्रकृति की अमूल्य तथा अनुपम देन है। छोटे-छोटे बच्चों का नित्य प्रति कुछ देर के लिए धूप में ही सेवन कराना चाहिये। शीतकाल में उन्हें धूप में ही खेलने देना चाहिये। गोद के शिशुओं को सूर्य किरणों में कुछ देर के लिए लिटाना चाहिए। रोगियों के लिये सूर्य प्रकाश महौषधि है।

सूर्य स्नान से शरीर के रक्त में लोहे की मात्रा 2 प्रतिशत बढ़ जायेगी। इसके लिए आप को लोह-प्रधान पदार्थ या लोह-तत्व बढ़ाने वाले भोजनों की आवश्यकता न पड़ेगी। धूप-स्नान से शरीर में इतना प्रभावोत्पादक गुण उत्पन्न होता है, जो कि औषधि-प्रणाली के लिए सर्वदा अज्ञात ही है, उसकी किसी भी दवा में इतना प्रभावोत्पादक गुण कभी नहीं पाया जाता। त्वचा के नीचे जो तत्व पहले से ही विद्यमान हैं, उसे सूर्य की किरणें तत्काल ही विटामिन डी. में परिणत कर देती हैं। शरीर में चूने की कमी के कारण होने वाले रोगों का इलाज बड़ा सहज हैं। वह है सूर्य-रश्मियों का उपयोग।
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ये कथा घर में सबको सुनायें

एक महिला को सब्जी मण्डी जाना था..

उसने जूट का बैग लिया और सड़क के किनारे सब्जी मण्डी की ओर चल पड़ी…

तभी पीछे से एक ऑटो वाले ने आवाज़ दी : —’कहाँ जायेंगी माता जी…?”

महिला ने ”नहीं भैय्या” कहा तो ऑटो वाला आगे निकल गया.

अगले दिन महिला अपनी बिटिया मानवी को स्कूल बस में बैठाकर घर लौट रही थी…

तभी पीछे से एक ऑटो वाले ने आवाज़ दी :—बहनजी चन्द्रनगर जाना है क्या…?”

महिला ने मना कर दिया…

पास से गुजरते उस ऑटोवाले को देखकर महिला पहचान गयी कि ये कल वाला ही ऑटो वाला था. *आज महिला को अपनी सहेली के घर जाना था.*

वह सड़क किनारे खड़ी होकर ऑटो की प्रतीक्षा करने लगी.

तभी एक ऑटो आकर रुका :—”कहाँ जाएंगी मैडम…?”

महिला ने देखा ये वो ही ऑटोवाला है जो कई बार इधर से गुज़रते हुए उससे पूंछता रहता है चलने के लिए..

महिला बोली :— ”मधुबन कॉलोनी है ना सिविल लाइन्स में, वहीँ जाना है.. चलोगे…?”

ऑटोवाला मुस्कुराते हुए बोला :— ”चलेंगें क्यों नहीं मैडम..आ जाइये…!”

ऑटो वाले के ये कहते ही महिला ऑटो में बैठ गयी.*ऑटो स्टार्ट होते ही महिला ने जिज्ञासावश उस ऑटोवाले से पूंछ ही लिया :—''भैय्या एक बात बताइये..?-* *दो-तीन दिन पहले आप मुझे माताजी कहकर चलने के लिए पूंछ रहे थे,*

कल बहनजी और आज मैडम, ऐसा क्यूँ…?”

ऑटोवाला थोड़ा झिझककर शरमाते हुए बोला :—”जी सच बताऊँ… आप चाहे जो भी समझेँ पर किसी का भी पहनावा हमारी सोच पर असर डालता है.

आप दो-तीन दिन पहले साड़ी में थीं तो एकाएक मन में आदर के भाव जागे,

क्योंकि,

मेरी माँ हमेशा साड़ी ही पहनती है. *इसीलिए मुँह से स्वयं ही "माताजी'" निकल गया.* *कल आप सलवार-कुर्ती में थीँ, जो मेरी बहन भी पहनती है* *इसीलिए आपके प्रति स्नेह का भाव मन में जागा और मैंने ''बहनजी'' कहकर आपको आवाज़ दे दी.*

आज आप जीन्स-टॉप में हैं, और इस लिबास में माँ या बहन के भाव तो नहीँ जागते.

इसीलिए मैंने आपको “मैडम” कहकर पुकारा.

कथासार
हमारे परिधान का न केवल हमारे विचारों पर वरन दूसरे के भावों को भी बहुत प्रभावित करता है.

टीवी, फिल्मों या औरों को देखकर पहनावा ना बदलें, बल्कि विवेक और संस्कृति की ओर भी ध्यान दें.

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐मेरा ग़म कितना कम है💐💐

तत्काल सर्जरी के लिए बुलाए जाने के बाद एक डॉक्टर साहब आनन-फानन में अस्पताल में दाखिल हुए। उन्होंने जल्द से जल्द कॉल का जवाब दिया, अपने कपड़े बदले और सीधे सर्जरी ब्लॉक में चले गए। उन्होंने पाया कि लड़के के पिता हॉल में डॉक्टर का इंतजार कर रहे हैं।

उन्हें देखकर पिताजी चिल्लाए: “तुमने इतना समय आने में क्यों लिया? क्या तुम नहीं जानते कि मेरे बेटे की जान खतरे में है? क्या तुम्हें डॉक्टर की जिम्मेदारी का कोई एहसास नहीं है?”

डॉक्टर मुस्कुराया और कहा: “मुझे खेद है, मैं अस्पताल में नहीं था और मैं कॉल प्राप्त करने के बाद जितनी जल्दी हो सका उतनी तेजी से आया हूँ… और अब, मैं चाहता हूं कि आप भी शांत हो जाएं ताकि मैं भी अपना काम शांति से कर सकूं”

“शांत हो जाओ ?~~
क्या होता यदि आपका अपना बेटा अभी इस कमरे में जिंदगी और मौत में झूल रहा होता, तो क्या आप शांत हो जाते? यदि आपका अपना बेटा, अब मर रहा हो तो आप क्या करेंगे?” पिता ने गुस्से में कहा

डॉक्टर ने फिर शालीनता से उत्तर दिया: “मैं वही कहूंगा जो ईश्वर ने गीता में संदेश दिया है कि कण कण में भगवान है। हम सभी मिट्टी से जन्मे है मिट्टी में मिल जाना है। ईश्वर सभी का भला करे”
“हम डॉक्टर उपचार कर सकते है, जीवन को लम्बा नहीं कर सकते। आप अपने बेटे के लिए प्रार्थना कीजिये और विश्वास रखिये की हम भी ईश्वर की कृपा से अपना सर्वश्रेष्ठ करेंगे”

“दूसरे का बेटा है न, जब हम टेंशन में न हों तो ज्ञान देना कितना आसान होता है” पिता बुदबुदाया।

सर्जरी में कुछ घंटे लगे जिसके बाद डॉक्टर खुश होकर बाहर निकला, “भगवान का शुक्र है!, आपका बेटा बच गया है!”

और पिता के उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही वह डॉक्टर बोलते बोलते बाहर की ओर दौड़ता सा चला गया की “यदि आपके कोई प्रश्न हैं, तो नर्स से पूछ लेना !!”

डॉक्टर के जाने के कुछ मिनट बाद नर्स को देखकर पिता ने टिप्पणी की- “ये डॉक्टर इतना अहंकारी क्यों है? कुछ मिनट इंतजार नहीं कर सका कि मैं अपने बेटे की स्थिति के बारे में उससे कुछ पूछूं”

नर्स ने रुआंसे होकर जवाब दिया,कहते कहते ही नर्स के चेहरे पर आंसू ढुलकने लगे: “उनका जवान बेटा, जो डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहा था , कल एक सड़क दुर्घटना में मर गया। जब हमने उन्हें आपके बेटे की सर्जरी के लिए तुंरन्त बुलाया तो वो उंस समय उसे जलाने के लिये ले जा रहे थे। और अब जब उन्होंने आपके बेटे की जान बचा ली है, तो वह अपने बेटे की अंतिम किर्याक्रम के लिए श्मशान के लिए भाग कर गए हैं”
वहां उनकी पत्नी तथा रिश्तेदार उनकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे।

“दुनिया मे कितना गम है, मेरा गम कितना कम है”
एक चिकित्सक के लिए मरीजों की सेवा ही फर्ज और धर्म है। इस सेवा में किसी तरह की कोई कमी नहीं रहने दी जाती है। विश्वास मानिए उनकी भरसक कोशिश होती है कि अपनी चिकित्सकीय सेवा के जरिये मरीजों को संतुष्ट करें। आप भी कभी किसी के दुख का आंकलन कम अथवा ज्यादा में मत कीजिये क्योंकि आप कभी नहीं जानते कि उनका जीवन कैसा है और वे अपने जीवन मे किस दौर से गुजर रहे हैं।

💐💐 प्रेषक अभिजीत चौधरी 💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

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मम्मी फटक लूं खिचड़ी को लाली निकल गई’, ‘नहीं अभी नहीं निकली और चोट मार।’ इन दिनों की यादों में शामिल है भाभी का बार-बार फटकने पर ज़ोर देना और मम्मी का चोट मारने के लिए कहना। मेरी मां बाजरे की खिचड़ी को कुटवा-कुटवा कर सफ़ेद करवा देती, कहती – ‘खिचड़ी धौली पड़क कुटनी चाहिए, जितनी मेहनत लगेगी उतनी ही स्वादिष्ट बनेगी।’ बचपन से मैं सर्दियों में मम्मी का ये खिचड़ी बनाओ का लंबा कार्यक्रम देखती आई हूं। अब सभी गांव में एक साथ नहीं रहते, तो जो जहां भी जा बसा, मां वहीं खिचड़ी कुटवाकर भिजवाने की कोशिश करती हैं।
मधुरिमा
बाजरे की खिचड़ी का शौक़ मेरे घर में सभी को है। हमारे गांव में शाम के वक़्त खिचड़ी बनती है जिसे रात को गर्मा-गर्म घी, गुड़, शक्कर के बूरे आदि के साथ खाई जाती है और सुबह बची हुई खिचड़ी दही के साथ खाई जाती है।

शाम को तीन-चार बजे मां खिचड़ी कूटना शुरू करती। पहले बाजरे में थोड़ा पानी का छिड़का देती, फिर कूटना शुरू करती। ऊखल (ओखली) में मूसल से चोट मारते जाओ, एक व्यक्ति तो कूटेगा ही।

कई बार मम्मी भाभी या बड़ी बहन के साथ कूटतीं, शानदार नज़ारा होता, दो जन मूसल से बारी-बारी चोट मारते। बच्चों को पीछे की तरफ़ जाने की मनाही थी क्योंकि मूसल से चोट लग सकती थी। मैं हमेशा सोचा करती कि इनके मूसल आपस में टकराते क्यों नहीं हैं। और तो और मम्मी दो मूसलों की चोट के बीच खिचड़ी को ऊपर नीचे भी करती जाती, बाजरे का छिलका बाहर आता जाता, उसे मां लाली कहतीं। शुरुआत में एकदम काले रंग की लाली निकलती, मां छाजले (छाज) से फटककर सारी लाली बाहर करतीं। खिचड़ी दोबारा ऊखल में जाती, फिर से कूटी जाती, दूसरी बार की लाली का रंग थोड़ा भूरा होता।

मां बाजरे को मसलकर देखतीं छिलका पूरी तरह उतर गया या नहीं। साथ कूटने वाली चोट मारती थक चुकी होती सो कह देती निकल गया सारा छिलका फटक लो अब। पर मां थोड़ा और कूटने का आदेश दे देती। कूटते-कूटते मां को भी समझ आ जाता कि थोड़ी छूट दे दी जाए, तो कहतीं, ‘चल जा चूल्हा जलाकर पानी चढ़ा आ खिचड़ी के लिए, इतने में मैं कूटती हूं।’ दो बार छिलके को फटककर निकाल देने के बाद बाजरे को महीन कूटा जाता। आख़िर में मां जब संतुष्ट हो जाती तो कहतीं, ‘जा थाली ले आ कुट गई खिचड़ी।’

खिचड़ी कूटने के बाद हम सारे बच्चे मां के साथ चूल्हे के पास पहुंच जाते, बड़े से बर्तन में उबलते पानी में मां धीरे-धीरे खिचड़ी डालतीं। उस वक़्त ध्यान से काम करना होता नहीं तो खिचड़ी में गुठली पड़ने का डर रहता। खिचड़ी डालने के बाद मां चने की दाल और चावल मंगवाती, दोनों की एक-एक मुट्ठी डाल देतीं और नमक डालकर चाटू (लकड़ी का चम्मच) से चलाती रहतीं। खिचड़ी जैसे ही खदकने लगती मां कहती, ‘बच्चों दूर हट जाओ खिचड़ी लात मारेगी।’ उबलती हुई खिचड़ी में से गरमा-गरम खिचड़ी उछलकर किसी के हाथ या पांव पर गिर जाना किसी लात से कम न होता था। हम बार-बार पूछते कितनी देर में बनेगी, मां कहती ‘अभी कसर है।’ थाली में थोड़ी-सी खिचड़ी डालकर चने की दाल को दबाकर देखती थीं मां कि बनी या‌ नहीं। हम कई बार थोड़ी-थोड़ी खिचड़ी डलवाकर चाटते पर मां थोड़ी-सी ही डालतीं। कहतीं, ‘कच्ची है पेट दर्द हो जाएगा।’ खिचड़ी बनते ही हम बच्चे घी या मक्खन के साथ खाते।

मेरे बड़े पापा का खिचड़ी खाने का अंदाज़ सबसे अलग था। वे अपनी थाली में खिचड़ी के बीच जगह बनाते उसमें तिल का तेल डलवाते। मां लोहे की फूंकनी या चिमटे को चूल्हे में डाल देती थी, जब वो एकदम गर्म हो जाता तो खिचड़ी में डले तेल को उससे छुआया जाता, चड़ाचड़ की आवाज़ आती और हल्का धुंआ भी उठता। इसे तेल को पकाना कहा जाता है, खिचड़ी में तेल को मिलाकर बड़े पापा खाते। कई बार मैंने भी ये अनोखा स्वाद चखा था। गुड़, लाल वाली शक्कर, बूरा के साथ भी ये खिचड़ी मज़ेदार लगती। पापा तो थाली में थोड़ी-सी खिचड़ी बचती तब कहते- ‘जा थोड़ा दूध डलवा ला इसमें।’ सच कहूं तो रात के समय खिचड़ी तो एक थी लेकिन उसके स्वाद अनेक थे। हम बच्चों का छोटा-सा पेट किस-किस स्वाद को समेटे इसलिए कुछ स्वाद अगली बारी के लिए छोड़ दिए जाते। सुबह खिचड़ी ठंडी होती तो दही के साथ ही खाई जाती। अब जब मैं ख़ुद खिचड़ी बनाती हूं तो मां के जितनी स्वादिष्ट नहीं बन पाती।

फोन पर कूटने संबंधी बारीकियां मां से पूछती हूं तो कहती हैं- ‘इमामदस्ते में बाजरे का दाना फूट जाता है इसलिए छिलका पूरा नहीं निकल पाता और थोड़ी कड़वी बनती है।’ मेरी समस्या के समाधान के लिए मां ने मेरे लिए ऊखल ख़रीद लिया है और कह रही थी, ‘तेरे लिए एक हल्का मूसल बनवाऊंगी।’ मैंने कहा, ‘ज़रूर बनवा देना।’ मैं कल्पना करने लगी ऊखल में खिचड़ी कूटती मैं, आस-पास मंडराते बच्चे। हम फिर से जिएंंगे बचपन को। विरासत में मिला यह ‘खिचड़ी दर्शन’ तो रहेगा भले ही वो मिट्टी के चूल्हे पर न बनकर गैस के चूल्हे पर बनेगी पर बनेगी ज़रूर, वादा रहा।

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कहानी
अनोखा बन्धन (पिया का लॉक डॉउन)

जैसे ही विदा हुई वह बस में बैठी थी और बस चल पड़ी थी उसने पीछे मुड़ कर खिड़की से देखा, उसको विदा करके माँ पाप भाई भाभी सभी रो रहे थे ।छोटा सा बिट्टू भी रो रहा था।।उनको रोता देख उसकी रुलाई भी बढ़ती जा रही थी।जैसे जैसे बस आगे बढ़ी सब पीछे रह गए थे।उसका अपना घर अपने लोग
सब कुछ मानों पीछे छूटता जा रहा था।
जैसे जैसे बस चलती जा रही थी।
उसका बेबस मन मानों आगे ना बढ़ान चाह रहा हो ।घूंघट की ओट में से रीना के बहते आँसू उसको यादों के दायरे से बहार ही नही निकलने दे रहे थे।
माता पिता की देहरी भाई बहनों का प्यार सखियाँ सब कुछ उसको मानो आवाज दे रही थी।
माँ आज मुझकों तो छोले ही खाना है मैं नही खाऊँगी दाल रोज रोज वह पैर पटक कर बोली ।अच्छा ठीक है शाम को छोले पूरी बना दूँगी ,अभी तो खा लो बेटा मां की प्यारी मनुहार ।भैया मुझको घड़ी चाहिए मेरी सभी सहेलियों के पास है।
अच्छा बाबा अबकी बार ला दूँगा जैसे ही तनख्वाह मिलेंगी।
घर में छोटी होने के कारण अपनी हर फरमाइश वह रो कर और जिद्द करके मनवा लेती ।पापा की भी बहुत लाडली थी वह।उसको याद आ रहा था वो दिन जब वह पहली बार कॉलेज से एजुकेशन ट्रिप पर जाना चाहती थी ,और पापा उसको अपने से दूर इतनी दूर नही भेज रहे थे ।नही गुड़ियां तुम नही जाओगी कैसे रहोगीं तुम वहां कौन ध्यान रखेगा तुम्हारा।पर बहुत जिद्द करके औऱ भैया के समझाने के बाद ही पापा ने उसकों भेजा था।और आज उसको एक नए घर में आसानी से भेज दिया अनजान लोगों के भरोसे। वह रोती ही जा रही थी।
वही पापा की प्यारी गुड़ियां आज सब को छोड़ कर एक नए परिवार नयें माहौल नए लोगों के साथ जा रही है।
जिन लोगों के बिना वह एक पल नही रह सकती थी, आज उन्हीं से दूर जा रही है।
कैसे रहेगी वह सबके बिना, वह रोती ही जा रही थी।तभी उसके पास बैठे अमित ने धीरे से उसका हाथ अपने हाथों में लेकर धीरे से सहलाया ।जैसे वह कहना चाह रहा हो कि मैं हर पल तुम्हारें साथ हूँ। उसके प्यार भरे स्पर्श से उसको एक पल को अच्छा लगा ,अब वह रोते हुए ही नींद के आगोश में जा चुकी थी।
चलो भाभी उतरो घर आ गया अचानक किसी ने हिलाया तो वह चौक कर उठ गई। उसकी ननद उसको उठा रही थी
देख तो उसका नया आशियाना आ चुका था।
शुरू के दो तीन दिन तो उसको अपने घर की बहुत ही याद आयी ।पर सब लोगो का व खास तौर पर पति अमित का व्यवहार उसका प्यार व हर पल उसका ध्यान रखना सब कुछ उसको अच्छा लगने लगा।उसको अमित से मिलकर ऐसा लगने लगा था कि जैसे उसकी जन्मों की पहचान हो। दो दिनों बाद ही वह लोग हनीमून पर शिमला कुल्लुमनाली निकल गए थे। वहाँ की हरी भरी वादियाँ बर्फ से ढके पहाड़ो पर नीचे आते बादल और अमित का साथ वो दस दिन कैसे निकल गए उसको पता नही चला।अमित मानों उसकी जिंदगी ही हो चुका था ।वह सभी को भूल गयी थी उसमें इतना खो चुकी थी।और अमित का भी यही हाल था। दस दिन बाद जब वह लौट कर आएं
तब आते ही सास बोली बेटा रीना के पापा पगफेरा के लिए रीना के भाई राजा को भेज रहे है पहला पगफेरा है मुहूर्त से होता है।
अमित बोले ठीक है मम्मी ।
रात को अमित और रीना दोनो ही उदास एकदूसरे की बाहों में खो गए थे।कल तुम चली जाओगी मैं कैसे रह पाऊँगा जानू अमित बोला। रीना ने प्यार से उसके बालो को सहलाने लगी और बोली मैं भी अब आपके बिना रहने का सोच नही सकती अब। कभी नही सोचा था चंद दिनों में जिंदगी इतनी खूबसूरत व हसीन लगने लगेगी ।आपका साथ पाकर हर एक पल इतना सुंदर लम्हा बन जाएगां।
मैं भी आपके बिना रह पाऊँगी क्या वह उसकी छाती में सिर छुपाते हुए बोली।अमित ने उसको बाहों में इस तरह कस लिया मानो अब दूर नही जाने देगा।
दूसरे दिन ही राजा आ गया था ।भैया को देख वो एकदम गले लगा गयी थी।सब कैसे है भैया। माँ पाप सब याद करते है ना भाभी बिट्टू।अरे भाई तुम चल तो रही हो सबसे मिल लेना । तुम्हारें बिन घर भर उदास है गुड़िया ।
उसकी तैयारी हो चुकी थी जाने की।
वह कपड़े बदलने जब कमरे आयी तो अमित ने पीछे से आकर उसको बाहों में भर लिया था।जल्दी आ जाओगी ना ।रीना रो पड़ी थी तुमको छोड़ कर जाने को मन नही कर रहा पर तुम जल्दी से लेने आ जाना मैं इंतजार करुँगी औऱ अमित को चूम लिया था।
बेटा जल्दी करो बस का समय हो रहा है।
जी पापा बस आ रहे है।
रीना ने बाहर आकर सबके पैर छुए।
सास उसको गले लगाकर बोली बेटा जल्दी आ जाना घर में सूना लगेगा तुम्हारें बिना।
वह सास के गले लग रो पड़ी उसको आज एक और माँ मिल गयी थी। हाँ मां
अमित छोड़ने के लिए बस स्टैंड पर आया था।
वह जैसे ही बस में बैठी अमित उससे बोला अपना ध्यान रखना।
और उतर गया था खिड़की पर आकर उसको हाथों में डेरीमिल्क चॉकलेट रख दी थी जो कि उसको बहुत पसंद थी।
और एक फ्लाइंग किस दिया।बस अब चल रही थी और वह आज एक बार फिर खिड़कीं से बाहर अमित को देख कर रो रही थी।उस दिन उसको अपने माँ पापा भैया भाभी सबको छोड़ कर रोना आ रहा था।और आज वह रो रही थीअपने प्रियतम की जुदाई में जिसके साथ वह चंद दिनों पहले ही एक प्यारें बन्धन में बंधी थी। सोच रही थी चंद दिनों में ये कैसा अनोखा प्यार बन्धन बन गया है, की आज का ये रिश्ता
मायके के पच्चीस साल के सबके रिश्तों पर भारी पड़ रहा है।

मंगला श्रीवास्तव
इंदौर स्वरचित मौलिक कहानी 🙏✍️✍️🙏

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દર્દ

સવારના સમયે મનહરભાઈ જાહેર ઉદ્યાનમાં એક ઝાડ નીચે ગોઠવેલ બાંકડા પર એમની ડાયરીમાં કંઈક લખી રહ્યા હતા.ખાસ્સા સમયની મહેનત પછી લખેલું એ પાનું એમણે ફાડીને ડૂચો વાળીને ફેંકી દીધું અને ત્યાંથી ધીમે ધીમે ચાલતા થયા.બાગના દરવાજે પહોંચીને વળી પાછા વળ્યા.જે બાંકડે બેઠા હતા ત્યાં આવીને જોયું તો ડૂચો દેખાયો નહીં. વળી એમણે વિચાર્યું, જરૂર કોઈ સારા માણસે કાગળનો ડૂચો કચરાપેટીમાં નાખી દીધો હશે.જાહેરમાં ડૂચો ફેંકવા પર મનહરભાઈને આફસોસ થયો….મનહરભાઈ ચાલતા થયા.
એ કાગળનો ડૂચો કોઈએ કચરાપેટીમાં તો નહોતો નાખ્યો પરંતુ મનહરભાઈની સોસાયટીમાં જ રહેતા અને એમના મકાનથી ચાર મકાન દૂર રહેતા એમના પાડોશી સંજયે ઉપાડી લીધો હતો.
ડુચો ખોલીને સંજય એમાં લખેલ લખાણને વાંચવા લાગ્યો.જેમ જેમ વાંચતો ગયો તેમ તેમ એની આંખો ભીની થતી ગઈ.શું હતું એવું લખાણ એમાં? બાધા પૂજાઓ બહું કરી: આખર રીઝ્યા કિરતાર, આશા પુરી કરી વ્હાલે: દીધો ખોળાનો ખુંદનાર. લડાવી લાડ કર્યો મોટો: સિંચ્યાં શિક્ષણ સંસ્કાર, ઈચ્છા એક જ હતી હૈયે: થશે ઘડપણનો આધાર. ઉજાળશે નામ અમ તણાં: કરીને પરમારથ કાજ,

સેવ્યા હતા ઉંચા મનોરથ:
સમાજે થશે સરતાજ.
ના થયું કંઈ ધારેલું ઉરે:
કાં કપાતર પાક્યો તું તન?
છતા ધન દોલતે આજે:
વેરાન લાગે છે જીવન.
માત જીવે મુરઝાઈને તારી:
બાપને વેદના ના જીરવાય,
પેટને જણ્યેય વાંઝીયા જેવાં:
ના કહેવાય કે સહેવાય. મનહરભાઈ અને દમયંતીબેનનો સુખી સંપન્ન પરિવાર.મનહરભાઈ ઉંચા હોદ્દાના સરકારી નોકરીયાત.દમયંતીબેન પણ સરકારી નોકરીયાત.ગામડે પોતાના ભાગની પચાસ વિઘા જમીનેય ખરી.નોકરીને કારણે શરૂઆતથી જ શહેરમાં રહેવાનું થયું.લગ્નના સાત વરસ પછી દિકરાનો જન્મ થયો.આખા પરિવારમાં આનંદ આનંદ થઈ ગયો. મનહરભાઈ અને દમયંતીબેન-બન્ને વિશાળ હ્રદયનાં માનવી.સેવાધર્મને પાળનાર દંપતિ સેવાકાર્યોમાં કાયમ મોખરે.ગામડાની જમીનની ઉપજ તો કાયમ ભાઈઓને જ હવાલે. બાળપણથી જ પુત્ર મનોરથને લાડકોડની સાથે ઉતમ શિક્ષણની વ્યવસ્થા કરવામાં આવી.ઈંગ્લીશ મીડીયમમાં ઉંચા ટકે ગ્રેજ્યુએટ થઈને ઉંચી પદવી માટે મનોરથ અમેરિકા ગયો.બસ,વિદેશની માયા લાગી ગઈ.લગ્ન પણ ગુજરાતી છોકરી સાથે ત્યાં જ કરી ને અમેરિકા જ સ્થાયી થઈ ગયો. લગ્ન કરીને તરત જ માતાપિતાને મળવા એકલો વતનમાં જરૂર આવ્યો પરંતુ મનહરભાઈ અને દમયંતીબેનને આવીને કહ્યું, 'ડેડી!મમ્મી! સોરી.... લગ્નના ખોટા ખર્ચામાંથી બચી જવાય એટલે મેં એકલે એકલે લગ્ન કરી લીધાં.મારી વાઈફને લઈને એકવાર જરૂર આવીશ. અત્યારે તો મારે મકાન માટે રૂપિયા જોઈએ છે,એટલે ઈન્ડિયા આવ્યો છું. દમયંતીબેન બોલ્યાં,'રૂપિયા તો તને આપીશું જ બેટા! પરંતુ વહુને એકવાર કુળદેવીનાં દર્શન કરાવવા ગામડે લઈ જવી પડે એ નિયમ આપણાથી ના ભુલાય બેટા.' 'સોરી મોમ! પરંતુ મારી વાઈફ એ ગામડાનાં આંટી અંકલનાં ફેમીલી જુએ તો એને બધાં પુઅર લાગે.એનો જન્મ જ અમેરિકામાં થયો છે.જો આ એનો ફોટો.કેટલી લેટેસ્ટ છે માય વાઈફ! (મોબાઈલમાં ફોટો બતાવે છે).હાં મોમ! તારી ઈચ્છા જ છે તો હું અમેરિકા જઈને વીડીયો કોલ કરીશ.તું ગામડે જજે.વીડીયો કોલથી માય વાઈફને માતાજીનાં દર્શન કરાવી દઈશ બસ!' આ બધું સાંભળીને મનહરભાઈના પગ નીચેથી જમીન સરકી રહી હતી.શરીરે પરસેવો વળી રહ્યો હતો.એક મોટા અધિકારી એવા બાપને દિકરાની ચર્ચા સાંભળીને જમીન આસમાન એક થઈ રહ્યાં હતાં.અમેરિકામાંય ગીતા, રામાયણના પાઠ થાય છે.ભારતની સંસ્કૃતિને ત્યાં રહેતો આપણો સમાજ હજી ભુલ્યો નથી અને આ દિકરો શું બકે છે?આ બધું ક્યાંથી શીખ્યો આ કૂળદીપક? મગજની કમાન છટકે એ પહેલાં મનહરભાઈ વચ્ચે બોલી ઉઠ્યા, 'કેટલા રૂપિયા જોઈએ છે મનોરથ?' 'જુઓને ડેડી !આમ તો તમે બન્ને જણ નોકરીયાત છો એટલે જે કંઈ બચત છે એ આપી દો.પગાર તો મન્થલી આવવાનો જ છે ને! અને હા! જો મેડીક્લેમ ના હોય તો જરૂર લઈ લેજો.આજની ફાસ્ટ લાઇફમાં ક્યારે શું થાય એ કહેવાય નહી એટલે આકસ્મિક ખર્ચ માટે એ જરૂરી છે.,' મનહરભાઈની આંખો લાલાશ પકડી રહી હતી એ દમયંતીબેનને ધ્યાને આવતાં જ એમના બે હાથ જોડાઈ ગયા.મનહરભાઈ સમસમીને બેસી રહ્યા. પચાસેક લાખની બચત અમેરિકન કરન્સીમાં ટ્રાન્સફર કરીને મનહરભાઈ અને દમયંતીબેનને "બાય"કહીને ઉપડી ગયો મનોરથ અમેરિકા...... મનહરભાઈ અને દમયંતીબેને ઘણું મનોમંથન કર્યું પરંતુ દિકરો આવો કેમ પાક્યો એનો તાળો ના મળ્યો.ગામડે કુટુંબ પરિવારને પણ બધી જાણ થઈ ચુકી હતી તો સોસાયટીમાંય ઘણાંને આછી પાતળી ખબર હતી જ પરંતુ આ સેવાભાવી દંપતિને સૌ સ્વમાનની નજરે જ જોતું હતું. મનહરભાઈનો કાયમનું મોર્નિંગ વોક અને બગીચામાં જઈને થોડી હળવી કસરત કરવાનો નિર્ણય જળવાઈ રહ્યો હતો પરંતુ મનથી ભાંગી પડ્યા હતા.બાળપણથી જ લેખનનો શોખ ધરાવતા મનહરભાઈ કાયમ ડાયરી સાથે જ રાખતા. પુત્ર વિષે લખતાં તો લખી દીધું પરંતુ છેવટે તો બાપનો જીવ ને! એટલે જ લખેલું એ પાનું ફાડીને ડૂચો વાળીને ફેંકી દીધું હતું........... સંજય બાળપણથી અનાથાશ્રમમાં ઉછરેલો પછી એનાં માબાપ કોણ એ તો એને ક્યાંથી ખબર હોય? અનાથાશ્રમમાં રહીને જ ભણ્યો અને કુદરતે એની જીંદગીને આબાદ બનાવી દીધી.નોકરીએ મળી અને અનાથાશ્રમમાં જ ઉછરેલી એક પગે સામાન્ય ખોડંગાતી પત્નિ પણ મળી.બન્ને પતિ પત્ની અત્યારે મનહરભાઈની સોસાયટીમાં જ એમના પોતાના મકાનમાં રહેતાં હતાં.સંજય પણ સવારે વોક અને બગીચે કસરત કરવા નિયમિત જતો.ઘણીવાર મનહરભાઈ સાથે એની વાતચીત થતી.મનહરભાઈ સંજયની જીવનકથની જાણી ચુક્યા ત્યારથી તેમને સંજય પ્રત્યે વિશેષ લાગણી હતી.અઠવાડિયે એકાદવાર બન્ને સાથે કોફી જરૂર પીવે. ધીમે ધીમે બન્ને વચ્ચે આત્મીયતા વધતી ગઈ.એમાંય જ્યારે મનહરભાઈના એકના એક દિકરા મનોરથ વિષે બધું જાણવા મળ્યું ત્યારે આ અનાથ સંજયને મનહરભાઈ માટે કંઈક કરી છુટવાની જિજીવિષા થઈ ઉઠી. એટલે જ છેલ્લા સમયથી સંજય મનહરભાઈને થોડા ખુશ કરવાના પ્રયત્નો જરૂર કરતો. રવિવારના દિવસે સંજય અને એની પત્ની મમતા મનહરભાઈના ઘેર આવી ચડ્યાં.મનહરભાઈ અને દમયંતીબેન આજનું છાપું વાંચી રહ્યાં હતાં.બન્ને જણ મનહરભાઈ અને દમયંતીબેનને વંદન કરીને ઉભાં રહ્યાં.દમયંતીબેને બન્નેને આવકાર આપીને બેસવાનું કહ્યું.મનહરભાઈએ કહ્યું, 'અરે સંજય! આમ અચાનક!બોલ ભાઈ, કંઈ કામકાજ હોય તો કહે.' સંજયે બગીચામાંથી મળેલ કાગળ મનહરભાઈના હાથમાં મુક્યો અને કહ્યું, 'માફ કરજો સાહેબ! અમને થોડી ઘણી તો મનોરથભાઈ વિષે જાણ હતી.આપની સતત ઉદાસી અમને કોરી ખાતી હતી પરંતુ અમે તમારી આગળ કંઈ બોલી શકતાં નહોતાં.આજે આ લખાણ અમને અહીં ખેંચી લાવ્યું છે. માબાપનો પ્રેમ કેવો હોય એ અમે બન્ને અભાગીયાંએ તો જોયો નથી પરંતુ બાળકો માટે માબાપની વેદના કેવી હોય એ હું છેલ્લા સમયથી અનુભવી રહ્યો છું.અમે બન્ને આપને એક વિનંતી કરવા આવ્યાં છીએ.અમે તમારાં દિકરો દિકરી બનીને તમારી સેવા કરવા માંગીએ છીએ.અમને નિરાશ ના કરતાં.અમનેય માબાપનો પ્રેમ કેવો હોય એ અનુભવવું છે.' મનહરભાઈએ કાગળ પર નજર ફેરવીને દમયંતીબેનને આપ્યો.દમયંતીબેને લખાણ ધ્યાનથી વાંચ્યું.મનહરભાઈની લખાયેલ વેદના હતી એ જાણતાં દમયંતીબેનને વાર ના લાગી. મનહરભાઈએ દમયંતીબેનને કહ્યું, 'લખતાં તો લખાઈ ગયું પરંતુ છેવટે તો એક બાપ છું ને! માવતર કમાવતર થોડાં થાય! -બસ, એટલે જ તો લખીનેય થોડો પસ્તાવો થતાં ફાડીને ફેંકી દીધું.પરંતુ એના લીધે જ તો આજે એકસાથે દિકરો અને દિકરી -બે મળી ગયાં.' મમતાએ બધું જ ઘરકામ ઉપાડી લીધું.મનહરભાઈ અને દમયંતીબેન નિવૃત થઈ ગયાં.વતનમાં જઈને ઠરીઠામ થવાનો વિચાર કરી જોયો પરંતુ પુત્રનું વર્તન સમાજમાં નીચાજોણા સમાન હોઈ અહીં જ રહેવાનું યોગ્ય લાગ્યું. લગ્નના ત્રણ વર્ષ પછી મનોરથને ત્યાં પુત્રનો જન્મ થયો.એ વખતે દમયંતીબેને સમાચાર મળતાં જ આખી સોસાયટીમાં મીઠાઈ વહેંચી હતી.પુત્ર મનોરથને પૌત્રને એકવાર અહીં લઇને આવવાની ફોન પર વિનંતી પણ કરી હતી પરંતુ મનોરથે મમ્મીને સંભળાવી દીધું કે, 'મોમ! પ્રિન્સ થોડો મોટો થશે ત્યારે જરૂર ઈન્ડિયા લઈને આવીશ. અત્યારે તો ખોટું હેરાન થઈ જવાય. 'આજ સુધી મનોરથ બે વખત ભારત આવી ગયો.મનહરભાઈ અને દમયંતીબેનની નિવૃત્તિ વખતે માત્ર મળેલ ગ્રેજ્યુએટીનાં નાણાંનો ભાગ પડાવવા પરંતુ પત્નિ અને દિકરા સાથે તો નહીં જ. ફોન પર ઔપચારિક સમાચાર તો જરૂર લેવાય. વીડીયો કોલથી વહુને કુળદેવીનાં દર્શન પણ કરાવેલ દમયંતીબેને.એ વખતે દિયર જેઠનાં દિકરા દિકરીઓએ ઘણી હોંશથી "કેમ છો ભાભી?"કહેલું પરંતુ "હાય! એવરી બડી "કહીને ફોન મુકાઈ ગયેલો.દમયંતીબેનની હાલત તો એ વખતે જોયા જેવી થયેલી. હા, આજ સુધી મનહરભાઈએ ફોન પર દિકરા સાથે વાત નથી જ કરી પરંતુ "કેમ છે દિકરો,પુત્રવધૂ અને પૌત્ર? "-એટલું દરેક ફોન વખતે જરૂર પુછ્યું છે દમયંતીબેનને........ પ્રિન્સ બાર વર્ષનો થઈ ગયો.મનોરથ અને એની પત્નિ હવાઈ સફર કરી રહ્યાં.એ વિમાન સમુદ્રમાં તૂટી પડ્યું. પ્રિન્સ સાથે નહોતો એ એનાં નસીબ.ઘણા। બધા મુસાફરોની ડેડ બૉડી હાથ ના લાગી એમાં મનોરથ અને એની પત્નિ પણ સામેલ હતાં. દુર્ઘટનાના ત્રીજા દિવસે મનહરભાઈને સમાચાર મળ્યા.દમયંતીબેન અને મનહરભાઈ સાવ પડી ભાગ્યાં."એક દિવસ તો સૌ સારૂ થશે જ"-એ આશા પણ ઠગારી નિવડી.ભગ્ન હ્રદયે સરકારી વિધિ પતાવીને મનહરભાઈ અમેરિકા પહોંચ્યા પૌત્ર પ્રિન્સને લેવા માટે. પુત્ર મનોરથના ભાડાના મકાનમાં દિવાલ પર મનોહર અને એની પત્નીની તસવીર લટકતી હતી.એની ઉપર ચિતરામણ કરીને લખેલું હતું "એન્જોય લાઈફ." જોઈને ઝળઝળિયાં આવી ગયાં મનહરભાઈની આંખોમાં.ત્યાં જ ગુજરાતી આડોશી પાડોશીઓ વચ્ચે રાહ જોઈને બેઠેલો અદ્લ મનહરભાઈ જેવો જ બારેક વર્ષનો છોકરો દેખાયો.મનહરભાઈએ સૌને પોતાની ઓળખાણ આપીને કહ્યું, 'આ મારો પૌત્ર પ્રિન્સ છે ને? ' ઉભેલાં પરિવારોમાં અરેકારો થઈ ગયો.શુ,સગા દાદા એમના પૌત્રને નહીં ઓળખતા હોય? મનહરભાઈ પાસે એનો જવાબેય ક્યાં હતો!તેઓ તો સૌનો આભાર માની, સૌ વિધિ વિધાન સંપન્ન કરી પૌત્રને લઈને ભારત આવવા નિકળી ગયા. ઘેર આવીને દમયંતીબેન,સંજય, મમતા અને પૌત્ર પ્રિન્સને સાથે લઈને મનહરભાઈ ઉપાડયા વતનના ગામડે. કુળદેવીના મંદિરે જઈને મનહરભાઈ બે હાથ જોડીને કરગરી પડ્યા,'હે મા! ધન, દોલત કંઈ ના આપે તો વાંધો નથી પરંતુ આ મારા પૌત્રને સંસ્કાર જરૂર આપજે મા!

બાર વર્ષની ઉંમરમાં પ્રથમવાર પથ્થરની પ્રતિમા સામે રડતા એક માનવીને પ્રિન્સ સજળ નયને જોઈ રહ્યો હતો.એના મનમાં કુતૂહલ સર્જાયું હતું પરંતુ માત્ર છ મહિનાના ટુંકા ગાળામાં એ સમગ્ર પરિવારનો લાડકો બનીને ઘરના મંદિરીયે સમૂહ પ્રાર્થના ગવડાવતો થઈ ગયો હતો.

લેખન-નટવરભાઈ રાવળદેવ થરા.

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माँसाहारी या शाकाहारी
कैसे पहचानेंगे??

असम में एक शिशु मन्दिर में जाना हुआ तो बच्चों में बड़ा उत्साह था जैसे किसी जादूगर के आने पर होता है,,

बात शुरू हुई तो मैंने बच्चों से पूछा – आप लोग कहीं जा रहे हैं, सामने से कोई कीड़ा मकोड़ा या कोई साँप छिपकली या कोई गाय भैंस या अन्य कोई ऐसा विचित्र जीव दिख गया जो आपने जीवन में पहले कभी नहीं देखा, तो प्रश्न यह है कि आप कैसे पहचानेंगे कि वह जीव अंडे देता है या बच्चे? क्या पहचान है उसकी?

बच्चे मौन रहे बस आंतरिक खुसर फुसर चलती रही…..

मिनट दो मिनट बाद मैंने ही बताया कि बहुत आसान है,, जिनके भी कान बाहर दिखाई देते हैं वे सब बच्चे देते हैं और जिन जीवों के कान बाहर नहीं दिखाई देते वे अंडे देते हैं….

फिर दूसरा प्रश्न पूछा – ये बताइए आप लोगों के सामने एकदम कोई प्राणी आ गया,, आप कैसे पहचानेंगे की यह शाकाहारी है या मांसाहारी? क्योंकि आपने तो उसे भोजन करते देखा नहीं है, बच्चों में फिर वही कौतूहल और खुसर फ़ुसर की आवाजें…..

मैंने कहा – देखो भाई बहुत आसान है,, जिन जीवों की आँखों की बाहर की यानी ऊपरी संरचना गोल है वे सब माँसाहारी हैं जैसे कुत्ता, बिल्ली, बाज, चिड़िया, शेर, भेड़िया, चील,, या अन्य कोई भी आपके आस पास का जीव जंतु जिसकी आँखे गोल हैं वह माँसाहारी है,, ठीक उसी तरह जिसकी आँखों की बाहरी संरचना लंबाई लिए हुए है, वे सब शाकाहारी हैं जैसे हिरन,, गाय, हाथी, बैल, भैंस, बकरी,, इनकी आँखे बाहर की बनावट में लंबाई लिए होती है ….

अब ये बताओ कि मनुष्य की आँखें गोल हैं या लंबाई वाली,,, सब बच्चों ने कहा कि लंबाई वाली,, मैंने फिर पूछा कि यह बताओ इस हिसाब से मनुष्य शाकाहारी जीव हुआ या माँसाहारी??सबका उत्तर था #शाकाहारी,,

फिर दूसरी बात यह बताई कि जिन भी जीवों के नाखून तीखे नुकीले होते हैं वे सब माँसाहारी होते हैं जैसे शेर बिल्ली, कुत्ता बाज गिद्ध या अन्य कोई तीखे नुकीले नाखूनों वाला जीव….

जिनके नाखून चौड़े चपटे होते हैं वे सब शाकाहारी होते हैं जैसे गाय, घोड़ा, गधा, बैल, हाथी, ऊँट, बकरी…..

अब ये बताओ बालकों कि मनुष्य के नाखून तीखे नुकीले हैं या चौड़े चपटे??

बालकों ने कहा कि चौड़े चपटे,, अब ये बताओ इस हिसाब से मनुष्य कौनसे जीवों की श्रेणी में हुआ??सब बालकों ने कहा कि शाकाहारी,,,

फिर तीसरी बात बताई,, जिन भी जीवों पशु प्राणियों को पसीना आता है वे सब शाकाहारी होते हैं जैसे घोड़ा बैल गाय भैंस खच्चर आदि अनेकों प्राणी…

माँसाहारी जीवों को पसीना नहीं आता है, इसलिए कुदरती तौर पर वे जीव अपनी #जीभ निकालकर लार टपकाते हुए हाँफते रहते हैं इस प्रकार वे अपनी शरीर की गर्मी को नियंत्रित करते हैं….

तो प्रश्न यह है कि मनुष्य को पसीना आता है या जीभ से एडजस्ट करता है??

बालकों ने कहा कि पसीना आता है,अच्छा यह बताओ कि इस बात से मनुष्य कौनसा जीव सिद्ध हुआ, सबने एकसाथ कहा – शाकाहारी…

ऐसे ही अनेकों विषयों पर बच्चों से बात की, आनंद आ गया….

#सभी लोग विशेषकर अध्यापन से जुड़े भाई बहन चाहें तो बच्चों को सीखने पढ़ाने के लिए इस तरह बातचीत की शैली विकसित कर सकते हैं, इससे जो वे समझेंगे सीखेंगे वह उन्हें जीवनभर काम आएगा याद रहेगा, पढ़ते वक्त बोर भी नहीं होंगे….