Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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🙋🏻‍♂️”पडोसी……🙋🏻‍♀️

खट खट…..खट खट….
कौन है ….पता नहीं कौन है इतनी रात गए ….बडबडाते हुए सावित्रीदेवी ने दरवाजे के बीच बने झरोखे से झांककर देखा …..अरे रमा तुम ….इतनी रात गए जानती भी हो दो बज रहे है कया है….
आंटीजी वो……वो बाबूजी की तबीयत खराब हो रही है उन्हें बडे अस्पताल लेकर जाना होगा ….आंटीजी अंकलजी से कहिए ना वो अपनी गाडी से उन्हें…
बात बीच मे काटते हुए सावित्रीदेवी बोली ….बेटा वो इनकी भी तबीयत खराब है बडी मुश्किल से दवाई देकर सुलाया है ऊपर से गाडी भी ठीक नहीं है तो तुम चौक पर चली जाओ वहां कोई आटो टैक्सी मिल जाएगी…..
कया चौक पर….. रमा की आँखें भीगी हुई थी
रात दो बजे चौक पर …..मां बाबूजी ने कभी आठ बजे के बाद घरसे नही निकलने दिया कारण अक्सर मां बाबूजी उसे समझाते रहते थे बेटा ये वक्त आसामाजिक तत्वों के बाहर घूमते हुए शिकार करने का ज्यादा होता है …. लेकिन आज….आज तो मुझे जाना ही होगा …
मां को ढाढस बंधाकर आई हूं …..मुझे बेटी नही बेटा मानते है मेरे मां बाबूजी तो मे कैसे पीछे हट सकती हूं…..
लेकिन मन मे अक्सर अकेली लडकियों के साथ होती वारदातों की खबरें रमा के मन की आशंकाओं को और बढा रही थी ….लेकिन वो हिम्मत करते हुए अपनी गली से बाहर सडक की ओर जाने लगी….
अरे रुको….कौन हो तुम….पीछे से आवाज सुनाई दी….
रमा ने घबराकर पीछे की ओर देखा तो गली के नुक्कड़ पर महीने भर पहले रहने आए नये पडोसी जोकि रिक्शा चलाते है को खडा पाया ….
अरे तुम तो हमारी गली के दीनानाथ भैया की बिटिया हो ना ….कहा जा रही हो इतनी रात गए…
काका वो….बाबूजी की तबीयत खराब है अस्पताल लेकर जाना है कोई सवारी ढूंढने …..
कया ….दीनानाथ भैया की तबीयत खराब है बिटिया तुम घर चलो वापसी…. कहकर वह जंजीर से बंधे अपने रिक्शा को खोलने लगे….
रमा तुरंत घर पहुंची बाबूजी को सहारा देकर उठाने की कोशिश कर ही रही थी कि रिक्शेवाले काका अंदर आ गए ….आओ दीनानाथ भैया ….
सहारा देते हुए दीनानाथ जी को पकडते हुए रिक्शेवाले ने कहा……
अरे बिटिया ….भाभीजी…. कुछ नहीं है सब ठीक है …अभी डाक्टर के पास पहुंच जाएंगे……
पिछली सीट पर तीनों को बिठाकर रिक्शा पर तेजी से पैडल मारकर खींचने लगा……
अस्पताल पहुंचकर रमा के साथ साथ डाक्टरों के आगे पीछे भागते हुए दीनानाथ जी को भर्ती कराया ….
देखिए थोडा बीपी बढा हुआ था …..डाक्टर ने उन्हें दवाओं सहित थोड़ा आराम करने के लिए कहा…..
बेड के पास बैठी रमा को शाम की वो तस्वीरे आँखों के आगे नजर आ रही थी जब बगलवाली सावित्री आंटी अंकलजी के साथ खिलखिलाकर गाडी से उतरी थी ….तब ना तो गाडी खराब थी और ना अंकलजी की तबीयत ….बस …..
देखिए ये इंजेक्शन मंगवा लीजिए डाक्टर ने एक पर्ची रमा की ओर बढाते हुए कहा….
यहां लाइए डाक्टर साहब ….कहकर रिक्शा वाले ने पर्ची पकड ली ….
तुम मम्मी पापा के साथ रहो हम अभी लेकर आए बिटिया…..और वह बाहर की ओर तेजी से निकल गया…
रमा एकटक उसकी और देखती रही…..
एक छोटा सा चद्दर वाले मकान में रहनेवाला रिक्शा वाला ….गली मे सभी के घर दो तीन मंजिला थे सभी के घरो मे मार्बल पत्थरों की सजावट थी तो किसी के यहां टाइल्स की ….बस वही एक घर अजीब सा लगता था झोपड़ी नुमा सीमेंट की चद्दरों से ढका हुआ ….
कुछ ही देर मे….लो डाक्टर साहब…. अचानक रिक्शेवाले की आवाज ने उसकी तंद्रा भंग की …..
डाक्टर ने इंजेक्शन लगाया ….और आराम करने के लिए कहकर चला गया ….सुबह छ बजे तक डाक्टर ने चारबार बीपी चेक किया तकरीबन सभी समय सुधार था सो डाक्टरों ने दीनानाथ जी को घर जाने की अनुमति दे दी ….वापसी भी रिक्शे पर लेकर रिक्शावाला बडी सावधानी से घरतक छोडकर जैसे ही चलने को हुआ रमा ने बटुआ निकालकर पांच सौ का नोट उसकी और बढाया…. लीजिए काका….
ये कया कर रही हो बिटिया…..हम इनसब कामों के पैसे के लिए नही लेते …..
मतलब….. ये तो आपका काम है ना काका ….लीजिए …
बिटिया …..हमारे परिवार के जीवन यापन के लिए हम सुबह से शामतक उस ऊपरवाले की दया से मेहनत करके कमा लेते है ज्यादा का लालच नही वो इंतजाम किए देता है हमारे पेट का और वैसे भी हम एक गली मे रहते है ऐसे हम और आप पडोसी हुए और वो पडोसी किस काम का जो ऐसी स्थिति में भी साथ ना हो…..कहकर रमा के सिरपर हाथ रखकर वो चलने लगा …..रमा भीगी हुई आँखें पोछते हुए ऊपरवाले की ओर देखकर बोली …. आप जैसे भगवान रुपी पडोसी ईश्वर हर घर के पास रहे…. 🙏
🙏🏻🌹जय श्री जिनेन्द्र🌹🙏🏻
❤️पवन जैन❤️

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अफ्रीका का रामायण ओर राम से सम्बन्ध
अफ्रीका का एक देश इजिप्ट नाम से जाना जाता है, यह नाम अजपति राम के नाम पर पड़ा हुआ है । प्रभु श्री के कई नामो में एक अन्य नाम अजपति भी था । उसी अजपति का अपभ्रंश इजिप्ट होकर रह गया ।
अफ्रीका के सारे लोग Cushiets ( कुशाइत ) कहे जाते है । इसका अर्थ यही है वे प्रभु श्री राम के पुत्र कुश के प्रजाजन ही है । अफ्रीका में राम की ख्याति इसलिए फैली, क्यो की अफ्रीका खण्ड रावण के कब्जे में था । रावण के भाईबंद माली – सुमाली के नाम से अफ्रीका में दो देश आज भी है ही ।
रामायण में जिक्र है लोहित सागर का , आपने कभी गौर किया कि वो लोहित सागर था, तो अब कहाँ है ? लंका की शोध में जब वानर उड़ान भरते थे, तब लोहित सागर का उल्लेख आता है । वह लोहित सागर अफ्रीका खण्ड के करीब ही है । जिसे आज RED SEA के नाम से जाना जाता है । हो सकता है कि वह पिरामिड रामायण कालीन दैत्यों के मरुस्थल स्तिथ किले या महल रहे हो , वे जीते जाने के बाद उनके आगे राम विजय के चिन्ह के रूप में रामसिंह के The sphinx नाम की प्रतिमा बना दी गयी हो ।
अफ्रीका में केन्या नाम का देश है, हो सकता है वहां ” कन्या ” नाम की कोई देवी रही हो , ओर उसकी पूजा की जाती हो । कन्या से ही केन्या बना है । और कन्या तो संस्कृत शब्द ही है ।
अफ्रीका के हिन्दू नगर
दारेसलाम नाम का जो सागर तट पर प्रमुख नगर अफ्रीका में है, वह स्पष्ठतया द्वारेशाल्यम ( द्वार-इशालायं ) संस्कृत नाम है । उसका अभिप्राय यह है कि उस नगर में कोई विशाल शिव मंदिर , विष्णु मंदिर या गणेश मंदिर रहा हो ।
अफ्रीका के एक प्रदेश का नाम रोडेशिया है । एक RHODES नाम का प्रदेश भी है । Sir Cecil Rhodes नाम के एक अंग्रेज के कारण रोडेशिया आदि नाम प्रचलित हुआ, यह सामान्य धारणा है । किन्तु होड्स होडेशिया आदि हम “हत ” यानि ह्रदय यानी heartland अर्थात ह्रदय प्रदेश या हार्दिक प्रदेश इसका मूल संस्कृत नाम है ।
Sir Cecil का मूलतः श्री शुशील नाम है । ताँगानिका नाम का एक अफ्रीकी प्रदेश है , जो तुंगनायक यानि श्रेष्ठ नेता इसका अपभ्रंस है ।द्वारेशलम उसी प्रदेश में आता है ।
मॉरीशस –
अफ्रीका के पूर्ववर्ती किनारे के पास मारिशश द्वीप है । राम के बाण उर्फ रॉकेट ने मारीच को वहां ही गिराया था । अतः उस द्वीप का नाम मासिशश पड़ा । या यह हो सकता है, की मारीच ने राम के भय से वहां शरण ली हो, इस कारण उस द्वीप का नाम मॉरीशस पड़ा हो । कुश के पिता हाम ( Ham ) थे , ऐसा इथोयोपिया की पुस्तकों में लिखा है । हां … हीं आदि संस्कृत में भगवान के रूप बीजाक्षर है । इसी कारण राम का नाम वहां हाम पड़ गया ।
अफ्रीका की नील गंगा/ सरस्वती
अफ्रीका के इजिप्ट में जो नील ( इसका उच्चार नाइल किया जाता है ) नदी है, उसे दुनिया की सबसे प्रमुख नदी में गिना जाता है । प्राचीन वैदिक परंपरा के अनुसार वह बड़ी पवित्र भी मानी गयी है । नील विश्लेषण दैवीय गुणों का धोतक है । नील नदी का उद्गम कहा से है, इसका पता ही यूरोपीय लोग नही लगा सके । लेकिन अंत मे प्राचीन संस्कृत पुराणों से यह समश्या हल हुई । भारत मे ईस्ट इंडिया कम्पनी ने जब यहां पुराणों का अध्यनन करवाया तो पुराणों में नील सरिता नदी का उल्लेख था, जिसका चंद्रगिरि की पहाड़ियों से उद्गम था । पुराणों में दिए भौगोलिक नक्शे के अनुसार यह सच साबित हुआ, ओर नील नदी का उद्गम मिल भी गया । किंतने आश्चर्य की बात है, की जहां देखो वहां भारतीयों का इतिहास मिलता है ।
अफ्रीका मूल रूप से हिन्दू राष्ट्र ही था । आज भी Kenya ( कन्या ) दारेसलाम ( द्वारेशलम ) Rhodesia ( रुद्रदेश) Nile ( नील) , इजिप्ट ( अजपति ) Cairo ( कौरव ) अल-अक्षर ( यानि अल-ईश्वर ) विश्वविद्यालय आदि हिन्दू संस्कृत नाम अफ्रीका खण्ड से जुड़े हुए है ।

साभार : वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास

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हनुमान जी की कथा

श्रीराम हाथ जोड़कर अगस्त्य मुनि से बोले, “ऋषिवर! निःसन्देह वालि और रावण दोनों ही भारी बलवान थे, परन्तु मेरा विचार है कि हनुमान उन दोनों से अधिक बलवान हैं। इनमें शूरवीरता, बल, धैर्य, नीति, सद्गुण सभी उनसे अधिक हैं। यदि मुझे ये न मिलते तो भला क्या जानकी का पता लग सकता था? मेरे समझ में यह नहीं आया कि जब वालि और सुग्रीव में झगड़ा हुआ तो इन्होंने अपने मित्र सुग्रीव की सहायता करके वालि को क्यों नहीं मार डाला। आप कृपा करके हनुमानजी के बारे में मुझे सब कुछ बताइये।”

रघुनाथजी के वचन सुनकर महर्षि अगस्त्य बोले, “हे रघुनन्दन! आप ठीक कहते हैं। हनुमान अद्भुत बलवान, पराक्रमी और सद्गुण सम्पन्न हैं, परन्तु ऋषियों के शाप के कारण इन्हें अपने बल का पता नहीं था। मैं आपको इनके विषय में सब कुछ बताता हूँ। इनके पिता केसरी सुमेरु पर्वत पर राज्य करते थे। उनकी पत्नी का नाम अंजना था। इनके जन्म के पश्चात् एक दिन इनकी माता फल लाने के लिये इन्हें आश्रम में छोड़कर चली गईं। जब शिशु हनुमान को भूख लगी तो वे उगते हुये सूर्य को फल समझकर उसे पकड़ने के लिये आकाश में उड़ने लगे। उनकी सहायता के लिये पवन भी बहुत तेजी से चला। उधर भगवान सूर्य ने उन्हें अबोध शिशु समझकर अपने तेज से नहीं जलने दिया। जिस समय हनुमान सूर्य को पकड़ने के लिये लपके, उसी समय राहु सूर्य पर ग्रहण लगाना चाहता था। हनुमानजी ने सूर्य के ऊपरी भाग में जब राहु का स्पर्श किया तो वह भयभीत होकर वहाँ से भाग गया। उसने इन्द्र के पास जाकर शिकायत की कि देवराज! आपने मुझे अपनी क्षुधा शान्त करने के साधन के रूप में सूर्य और चन्द्र दिये थे। आज जब अमावस्या के दिन मैं सूर्य को ग्रस्त करने के लिये गया तो मैंने देखा कि एक दूसरा राहु सूर्य को पकड़ने जा रहा है।

“राहु की बात सुनकर इन्द्र घबरा गये और राहु को साथ लेकर सूर्य की ओर चल पड़े। राहु को देखकर हनुमान जी सूर्य को छोड़कर राहु पर झपटे। राहु ने इन्द्र को रक्षा के लिये पुकारा तो उन्होंने हनुमान जी के ऊपर वज्र का प्रहार किया जिससे वे एक पर्वत पर जा गिरे और उनकी बायीं ठुड्डी टूट गई। हनुमान की यह दशा देखकर वायुदेव को क्रोध आया। उन्होंने उसी क्षण अपनी गति रोक ली। इससे कोई भी प्राणी साँस न ले सका और सब पीड़ा से तड़पने लगे। तब सारे सुर, असुर, यक्ष, किन्नर आदि ब्रह्मा जी की शरण में गये। ब्रह्मा उन सबको लेकर वायुदेव के पास गये। वे मृत हनुमान को गोद में लिये उदास बैठे थे। जब ब्रह्मा जी ने उन्हें जीवित कर दिया तो वायुदेव ने अपनी गति का संचार करके सब प्राणियों की पीड़ा दूर की। चूँकि इन्द्र के वज्र से हनुमान जी की हनु (ठुड्डी) टूट गई थी, इसलिये तब से उनका नाम हनुमान हो गया। फिर प्रसन्न होकर सूर्य ने हनुमान को अपने तेज का सौंवा भाग दिया। वरुण, यम, कुबेर, विश्वकर्मा आदि ने उन्हें अजेय पराक्रमी, अवध्य होने, नाना रूप धारण करने की क्षमता आदि के वर दिया। इस प्रकार नाना शक्तियों से सम्पन्न हो जाने पर निर्भय होकर वे ऋषि-मुनियों के साथ शरारत करने लगे। किसी के वल्कल फाड़ देते, किसी की कोई वस्तु नष्ट कर देते। इससे क्रुद्ध होकर ऋषियों ने इन्हें शाप दिया कि तुम अपने बल और शक्ति को भूल जाओगे। किसी के याद दिलाने पर ही तुम्हें उनका ज्ञान होगा। तब से उन्हें अपने बल और शक्ति का स्मरण नहीं रहा। वालि और सुग्रीव के पिता ऋक्षराज थे। चिरकाल तक राज्य करने के पश्चात् जब ऋक्षराज का देहान्त हुआ तो वालि राजा बना। वालि और सुग्रीव में बचपन से ही प्रेम था। जब उन दोनों में बैर हुआ तो सुग्रीव के सहायक होते हुये भी शाप के कारण हनुमान अपने बल से अनजान बने रहे।”

हनुमान के जीवन की यह कथा सुनकर सबको बड़ा आश्चर्य हुआ।

जब अगस्त्य तथा अन्य मुनि अयोध्या से विदा होकर जाने लगे तो श्रीराम ने उनसे कहा, “मेरी इच्छा है कि पुरवासी और देशवासियों को अपने-अपने कार्यों में लगाकर मैं यज्ञों का अनुष्ठान करूँ। आपसे प्रार्थना है कि आप सब उन यज्ञों में अवश्य पधारकर भाग लेने की कृपा करें।”

सब ऋषियों ने उसमें भाग लेने की अपनी स्वीकृति प्रदान की। फिर वे वहाँ से विदा होकर अपने-अपने आश्रम को चले गये।

!! जय श्री राम !!
स्वर्ग में देवता भी उनका अभिनंदन करते हैं
जो हर पल हनुमान जी का वंदन करते है !
जय श्री राम प्रातः वंदन आदर-सत्कार अभिनंदन प्यारे भैया

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डॉक्टर सहदेव ने व्यापार में बहुत उन्नति की और उसमें से कुछ पैसा लगा कर लंदन में एक ज़मीन ख़रीदी और उस पर एक 3 मंज़िला आलीशान घर बनाया. उस भूमि पर पहले से ही एक खूबसूरत स्विमिंग पूल और पीछे की और एक 100 साल पुराना लीची का पेड़ था. इसे यूँ भी समझ सकते हैं की उन्होंने वो भूमि उस लीची के पेड़ के कारण ही ख़रीदी थी, क्यूँकि उनकी पत्नी को लीचियाँ बहुत पसंद थी.

लेकिन कुछ अरसे बाद renovation के समय उनके कुछ मित्रों ने उन्हें आग्रह किया कि उन्हें किसी Feng Shui मास्टर की सलाह भी लेनी चाहिए. यद्यपि डॉक्टर सहदेव को ऐसी बातों पर कुछ ख़ास विश्वास नहीं था, फिर भी मित्रों का मन रखने के लिए उन्होंने ये बात मान ली और Hongkong से 30 साल से Feng Shui के बेहद प्रसिद्ध Master Cao को बुलवा लिया.

उन्हें Airport से लिया, दोनों ने शहर में खाना खाया और उसके बाद डॉक्टर सहदेव उन्हें अपनी कार में ले कर अपने घर की ओर चल दिए. रास्ते में जब भी कोई कार उन्हें overtake करने की कोशिश करती, डॉक्टर सहदेव उसे रास्ता दे देते. Master Cao ने हंसते हुए कहा – डॉक्टर सहदेव आप बहुत safe driving करते हैं. डॉक्टर सहदेव ने भी हंसते हुए प्रत्युत्तर में कहा – लोग अक्सर overtake तभी करते हैं जब उन्हें कुछ आवश्यक कार्य हो, इसलिए हमें उन्हें रास्ता देना ही चाहिए.

घर के पास पहुँचते-पहुँचते सड़क थोड़ी संकरी हो गयी और डॉक्टर सहदेव ने कार थोड़ी और धीरे कर ली. तभी अचानक एक हंसता हुआ बच्चा गली से निकला और तेज़ी से भागते हुए उनकी कार के आगे से सड़क पार कर गया, तब भी डॉक्टर सहदेव ने कार तुरंत भगाई नहीं और वो उसी गति से चलते हुए उस गली की ओर देखते रहे, जैसे किसी का इंतज़ार कर रहे हों, तभी अचानक उसी गली से एक और बच्चा भागते हुए उनकी कार के आगे से निकल गया, शायद पहले बच्चे का पीछा करते हुए. Master Cao ने हैरान होते हुए पूछा – आपको कैसे पता कि कोई दूसरा बच्चा भी भागते हुए निकलेगा? डॉक्टर सहदेव ने बड़े सहज भाव से कहा ~ बच्चे अक्सर एक-दूसरे के पीछे भाग रहे होते हैं और इस बात पर विश्वास करना संभव ही नहीं कि कोई बच्चा बिना किसी साथी के ऐसी चुहल और भाग दौड़ कर रहा हो..
Master Cao इस बात पर बहुत ज़ोर से हंसे और बोले की आप निस्संदेह बहुत सुलझे हुए व्यक्ति हैं.

घर के बाहर पहुँच कर दोनों कार से उतरे. तभी अचानक घर के पीछे की ओर से 7-8 पक्षी बहुत तेज़ी से उड़ते नज़र आए. यह देख कर डॉक्टर सहदेव ने Master Cao से कहा कि यदि उन्हें बुरा न लगे तो क्या हम कुछ देर यहाँ रुक सकते हैं ? Master Cao ने कारण जानना चाहा.. डॉक्टर सहदेव ने कहा कि शायद कुछ बच्चे पेड़ से लीचियाँ चुरा रहे होंगे और हमारे अचानक पहुँचने से डर के मारे बच्चों में भगदड़ न मच जाए, इससे पेड़ से गिर कर किसी बच्चे को चोट भी लग सकती है.

Master Cao कुछ देर चुप रहे, फिर संयत आवाज़ में बोले “डॉक्टर सहदेव, इस घर को किसी Feng Shui जाँच और उपायों की आवश्यकता नहीं है..
डॉक्टर सहदेव ने बड़ी हैरानी से पूछा ऐसा क्यूँ !
Master Cao – जहां आप जैसे विवेकपूर्ण व आसपास के लोगों की भलाई सोचने वाले व्यक्ति उपस्थित/विद्यमान होंगे – वो स्थान/संपत्ति Feng Shui नियमों के अनुसार बहुत पवित्र-सुखदायी-फलदायी होगी .

जब हमारा मन व मस्तिष्क दूसरों की ख़ुशी व शांति को प्राथमिकता देने लगे, तो इससे दूसरों को ही नहीं, स्वयं हमें भी मानसिक लाभ-शांति-प्रसन्नता मिलती है..

जब कोई व्यक्ति सदा स्वयं से पहले दूसरों का भला सोचने लगे तो अनजाने में ही उसे संतत्व प्राप्त हो जाता है

सही अर्थ में संत वो व्यक्ति है जिसके कारण दूसरों का भला हो रहा होता है व उसे ज्ञानबोध मिल जाता है.

भले ही प्रण न करें परंतु क़ोशिश अवश्य करें कि आप में भी ऐसे कुछ सदगुण विकसित हो जाएं कि आपके घर को Feng Shui की आवश्यकता न रहे.. 👏

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मीराबाई चानू की कहानी

उस समय उसकी उम्र 10 साल थी। इम्फाल से 200 किमी दूर नोंगपोक काकचिंग गांव में गरीब परिवार में जन्मी और छह भाई बहनों में सबसे छोटी मीराबाई चानू अपने से चार साल बड़े भाई सैखोम सांतोम्बा मीतेई के साथ पास की पहाड़ी पर लकड़ी बीनने जाती थीं।

एक दिन उसका भाई लकड़ी का गठ्ठर नहीं उठा पाया, लेकिन मीरा ने उसे आसानी से उठा लिया और वह उसे लगभग 2 किमी दूर अपने घर तक ले आई।

शाम को पड़ोस के घर मीराबाई चानू टीवी देखने गई, तो वहां जंगल से उसके गठ्ठर लाने की चर्चा चल पड़ी। उसकी मां बोली, ”बेटी आज यदि हमारे पास बैल गाड़ी होती तो तूझे गठ्ठर उठाकर न लाना पड़ता।”

”बैलगाड़ी कितने रूपए की आती है माँं ?” मीराबाई ने पूछा

”इतने पैसों की जितने हम कभी जिंदगीभर देख न पाएंगे।”

”मगर क्यों नहीं देख पाएंगे, क्या पैसा कमाया नहीं जा सकता ? कोई तो तरीका होगा बैलगाड़ी खरीदने के लिए पैसा कमाने का ?” चानू ने पूछा तो तब गांव के एक व्यक्ति ने कहा, ”तू तो लड़कों से भी अधिक वजन उठा लेती है, यदि वजन उठाने वाली खिलाड़ी बन जाए तो एक दिन जरूर भारी—भारी वजन उठाकर खेल में सोना जीतकर उस मैडल को बेचकर बैलग़ाड़ी खरीद सकती है।”

”अच्छी बात है मैं सोना जीतकर उसे बेचकर बैलगाड़ी खरीदूंगी।” उसमें आत्मविश्वास था।

उसने वजन उठाने वाले खेल के बारे में जानकारी हासिल की, लेकिन उसके गांव में वेटलिफ्टिंग सेंटर नहीं था, इसलिए उसने रोज़ ट्रेन से 60 किलोमीटर का सफर तय करने की सोची।

शुरुआत उन्होंने इंफाल के खुमन लंपक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स से की।

एक दिन उसकी रेल लेट हो गयी.. रात का समय हो गया। शहर में उसका कोई ठिकाना न था, कोई उसे जानता भी न था। उसने सोचा कि किसी मन्दिर में शरण ले लेगी और कल अभ्यास करके फिर अगले दिन शाम को गांव चली जाएगी।

एक अधूरा निर्माण हुआ भवन उसने देखा जिस पर आर्य समाज मन्दिर लिखा हुआ था। वह उसमें चली गई। वहां उसे एक पुरोहित मिला, जिसे उसने बाबा कहकर पुकारा और रात को शरण मांगी।

”बेटी मैं आपको शरण नहीं दे सकता, यह मन्दिर है और यहां एक ही कमरे पर छत है, जिसमें मैं सोता हूँ । दूसरे कमरे पर छत अभी डली नहीं, एंगल पड़ गई हैं, पत्थर की सिल्लियां आई पड़ी हैं लेकिन पैसे खत्म हो गए। तुम कहीं और शरण ले लो।”

”मैं रात में कहाँ जाउँगी बाबा,” मीराबाई आगे बोली, ”मुझे बिन छत के कमरे में ही रहने की इजाजत दे दो।”

”अच्छी बात है, जैसी तेरी मर्जी।” बाबा ने कहा।

वह उस कमरे में माटी एकसार करके उसके उपर ही सो गई, अभी कमरे में फर्श तो डला नहीं था। जब छत नहीं थी तो फर्श कहां से होता भला। लेकिन रात के समय बूंदाबांदी शुरू हो गई और उसकी आंख खुल गई।

मीराबाई ने छत की ओर देखा। दीवारों पर उपर लोहे की एंगल लगी हुई थी, लेकिन सिल्लियां तो नीचे थी। आधा अधूरा जीना भी बना हुआ था। उसने नीचे से पत्थर की सिल्लिया उठाई और उपर एंगल पर जाकर रख ​दी और फिर थोड़ी ही देर में दर्जनों सिल्लियां कक्ष की दीवारों के उपर लगी एंगल पर रखते हुए कमरे को छाप दिया।

उसके बाद वहां एक बरसाती पन्नी पड़ी थी वह सिल्लियों पर डालकर नीचे से फावड़ा और तसला उठाकर मिट्टी भर—भरकर उपर छत पर सिल्लियो पर डाल दी। इस प्रकार मीराबाई ने छत तैयार कर दी।

बारिश तेज हो गई,और वह अपने कमरे में आ गई। अब उसे भीगने का डर न था, क्योंकि उसने उस कमरे की छत खुद ही बना डाली थी।

अगले दिन बाबा को जब सुबह पता चला कि मीराबाई ने कमरे की छत डाल दी तो उसे आश्चर्य हुआ और उसने उसे मन्दिर में हमेशा के लिए शरण दे दी, ताकि वह खेल की तैयारी वहीं रहकर कर सके, क्योंकि वहाँं से खुमन लंपक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स निकट था।

बाबा उसके लिए खुद चावल तैयार करके खिलाते और मीराबाई ने कक्षों को गाय के गोबर और पीली माटी से लिपकर सुन्दर बना दिया था।

समय मिलने पर बाबा उसे एक किताब थमा देते,जिसे वह पढ़कर सुनाया करती और उस किताब से उसके अन्दर धर्म के प्रति आस्था तो जागी ही साथ ही देशभक्ति भी जाग उठी।

इसके बाद मीराबाई चानू 11 साल की उम्र में अंडर-15 चैंपियन बन गई और 17 साल की उम्र में जूनियर चैंपियन का खिताब अपने नाम किया।

लोहे की बार खरीदना परिवार के लिए भारी था। मानसिक रूप से परेशान हो उठी मीराबाई ने यह समस्या बाबा से बताई, तो बाबा बोले, ”बेटी चिंता न करो, शाम तक आओगी तो बार तैयार मिलेगा।”

वह शाम तक आई तो बाबा ने बांस की बार बनाकर तैयार कर दी, ताकि वह अभ्यास कर सके।

बाबा ने उनकी भेंट कुंजुरानी से करवाई। उन दिनों मणिपुर की महिला वेटलिफ़्टर कुंजुरानी देवी स्टार थीं और एथेंस ओलंपिक में खेलने गई थीं।

इसके बाद तो मीराबाई ने कुंजुरानी को अपना आदर्श मान लिया और कुंजुरानी ने बाबा के आग्रह पर इसकी हर संभव सहायता करने का बीड़ा उठाया।

जिस कुंजुरानी को देखकर मीरा के मन में विश्व चैंपियन बनने का सपना जागा था, अपनी उसी आइडल के 12 साल पुराने राष्ट्रीय रिकॉर्ड को मीरा ने 2016 में तोड़ा, वह भी 192 किलोग्राम वज़न उठाकर।

2017 में विश्व भारोत्तोलन चैम्पियनशिप, अनाहाइम, कैलीफोर्निया, संयुक्त राज्य अमेरिका में उसे भाग लेने का अवसर मिला।

मुकाबले से पहले एक सहभोज में उसे भाग लेना पड़ा। सहभोज में अमेरिकी राष्ट्रपति मुख्य अतिथि थे।

राष्ट्रपति ने देखा कि मीराबाई को उसके सामने ही पुराने बर्तनों में चावल परोसा गया, जबकि सब होटल के शानदार बर्तनों में शाही भोजन का लुत्फ ले रहे थे।

राष्ट्रपति ने प्रश्न किया, ”इस खिलाड़ी को पुराने बर्तनों में चावल क्यों परोसा गया, क्या हमारा देश इतना गरीब है कि एक लड़की के लिए बर्तन कम पड़ गए, या फिर इससे भेदभाव किया जा रहा है, यह अछूत है क्या ?”

”नहीं महामहिम ऐसी बात नहीं है,” उसे खाना परोस रहे लोगों से जवाब मिला, ” इसका नाम मीराबाई है। यह जिस भी देश में जाती है, वहाँं अपने देश भारत के चावल ले जाती है। यह विदेश में जहाँ भी होती है, भारत के ही चावल उबालकर खाती है।. Copied

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गृह क्लेश क्यों होता है ।
बहुत प्रेरक कहानी

संत कबीर रोज सत्संग किया करते थे। दूर-दूर से लोग उनकी बात सुनने आते थे। एक दिन सत्संग खत्म होने पर भी एक आदमी बैठा ही रहा। कबीर ने इसका कारण पूछा तो वह बोला, ‘मुझे आपसे कुछ पूछना है।

मैं गृहस्थ हूं, घर में सभी लोगों से मेरा झगड़ा होता रहता है । मैं जानना चाहता हूं कि मेरे यहां गृह क्लेश क्यों होता है और वह कैसे दूर हो सकता है ?

कबीर थोड़ी देर चुप रहे, फिर उन्होंने अपनी पत्नी से कहा,‘ लालटेन जलाकर लाओ’ । कबीर की पत्नी लालटेन जलाकर ले आई। वह आदमी भौंचक देखता रहा। सोचने लगा इतनी दोपहर में कबीर ने लालटेन क्यों मंगाई ।

थोड़ी देर बाद कबीर बोले, ‘ कुछ मीठा दे जाना। ’इस बार उनकी पत्नी मीठे के बजाय नमकीन देकर चली गई। उस आदमी ने सोचा कि यह तो शायद पागलों का घर है। मीठा के बदले नमकीन, दिन में लालटेन। वह बोला, ‘कबीर जी मैं चलता हूं।’

कबीर ने पूछा, आपको अपनी समस्या का समाधान मिला या अभी कुछ संशय बाकी है ? वह व्यक्ति बोला, मेरी समझ में कुछ नहीं आया।

कबीर ने कहा, जैसे मैंने लालटेन मंगवाई तो मेरी घरवाली कह सकती थी कि तुम क्या सठिया गए हो। इतनी दोपहर में लालटेन की क्या जरूरत। लेकिन नहीं, उसने सोचा कि जरूर किसी काम के लिए लालटेन मंगवाई होगी।

मीठा मंगवाया तो नमकीन देकर चली गई। हो सकता है घर में कोई मीठी वस्तु न हो। यह सोचकर मैं चुप रहा। इसमें तकरार क्या ? आपसी विश्वास बढ़ाने और तकरार में न फंसने से विषम परिस्थिति अपने आप दूर हो गई।’ उस आदमी को हैरानी हुई । वह समझ गया कि कबीर ने यह सब उसे बताने के लिए किया था।

कबीर ने फिर कहा, गृहस्थी में आपसी विश्वास से ही तालमेल बनता है। आदमी से गलती हो तो औरत संभाल ले और औरत से कोई त्रुटि हो जाए तो पति उसे नजर अंदाज कर दे। यही गृहस्थी का मूल मंत्र है।

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एक व्यक्ति की बीवी के साथ कोई जबरदस्ती कर रहा था

तो वो भागकर अंदर गया और चरखा उठा लाया

और चलाने लगा

बीवी को गुस्सा आया और वो चिल्लाई :

तुम पागल हो क्या ये गुंडा मेरे साथ गलत कर रहा है

और तुम चरखा चला रहे हो ?? व्यक्ति : चरखे से तो अंग्रेज भाग गए फिर ये किस खेत की मूली है

ये भी भाग जाएगा!

ये कहकर व्यक्ति चरखा और जोर से चलाने लगा

जब तक वो गुंडा उस नारी के साथ और ज्यादा बदतमीजी करता रहा!

बीवी रोती हुई गुस्से में पति से बोली

छोडो ये चरखा और pls मुझे बचाओ!

ये सुनकर व्यक्ति ने चरखा side में पटका

और उठकर बलात्कारी के निकट गया

और पूरी विनम्रता से बोला मेरी पत्नी को छोड़ दीजिये!

इतना सुनते ही उस गुंडे ने व्यक्ति के एक खेंचके झाँपट मार दिया!

तो पति ने दूसरा गाल आगे कर दिया

और फिर बोला pls मेरी बीवी को छोड़

दीजिये उस गुंडे ने दूसरे गाल पे भी एक कसके झाँपट मार दिया

व्यक्ति बेहोश हो गया!

इतने में एक भगत सिंह नाम का वीर वहाँ से गुजरा,

उसने जब चीख पुकार सुनी तो वो अंदर गया

और उस महिला को बचाने के लिए गुंडे से भिड़ गया

और आखिर में उस गुंडे को भगा दिया!

उस औरत ने भगत सिंह को धन्यवाद दिया,

तभी पुलिस वहाँ पहुंच गयी

तो पत्नी ने सारा क्रेडिट अपने पति को दे दिया

और दोनों लाल गाल दिखा कर पति ने बहादुरी के सबूत दिखा दिए,

पुलिस ने उस पति को
“वीरता चक्र दिया और भगत सिंह को पकड़ के
गुंडा गर्दी करने के आरोप में जेल में डाल दिया !”

व्यंग्य :- “इस घटना का इतिहास से कोई
लेना देना नही है”..

कितने झूले थे फाँसी पर ,

और कितनों ने गोली खाई थी,

क्यों झूठ बोलते हो साहब ,

कि चरखा चलाने से आजादी पाई थी..!👊🏻🔥😡

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. “गुरु की कृपा” गुरु-कृपा अथवा सन्त-कृपा का बहुत विशेष माहात्म्य है। भगवान् की कृपा से जीव को मानव शरीर मिलता है और गुरु-कृपा से भगवान् मिलते हैं। लोग समझते हैं कि हम गुरु बनायेंगे, तब वे कृपा करेंगे। परन्तु यह कोई महत्त्व की बात नहीं है। अपने-अपने बालकों का सब पालन करते हैं। कुतिया भी अपने बच्चों का पालन करती है। परन्तु सन्त-कृपा बहुत विलक्षण होती है। दूसरा शिष्य बने या न बने, उनसे प्रेम करे या वैर करे-इसको सन्त नहीं देखते। दीन-दु:खी को देखकर सन्त का हृदय द्रवित हो जाता हैं। तो इससे उसका काम हो जाता है। जगाई-मधाई प्रसिद्ध पापी थे और साधुओं से वैर रखते थे, पर चैतन्य महाप्रभु ने उन पर भी दया करके उनका उद्धार कर दिया। सन्त सब पर कृपा करते हैं, पर परमात्मतत्त्व का जिज्ञासु ही उस कृपा को ग्रहण करता है; जैसे-प्यासा आदमी ही जल को ग्रहण करता है। वास्तव में अपने उद्धार की लगन जितनी तेज होती हैं, सत्य तत्त्व की जिज्ञासा जितनी अधिक होती है, उतना ही वह उस कृपा को अधिक ग्रहण करता है। सच्चे जिज्ञासु पर सन्त-कृपा अथवा गुरु-कृपा अपने-आप होती है। गुरु कृपा होने पर फिर कुछ बाकी नहीं रहता। परन्तु ऐसे गुरु बहुत दुर्लभ होते हैं। पारस से लोहा सोना बन जाता है, पर उस सोने में यह ताकत नहीं होती कि दूसरे लोहे को भी सोना बना दे। परन्तु असली गुरु मिल जाय तो उसकी कृपा से चेला भी गुरु बन जाता है, महात्मा बन जाता है- पारस में अरु संत में, बहुत अंतरौ जान। वह लोहा कंचन करे, वह करै आपु समान॥ यह गुरुकृपा की ही विलक्षणता है! यह गुरुकृपा चार प्रकार से होती है-स्मरण से, दृष्टि से, शब्द से और स्पर्श से। जैसे कछवी रेत के भीतर अण्डा देती है, पर खुद पानी के भीतर रहती हुई उस अण्डे को याद करती रहती है तो उसके स्मरण से अण्डा पक जाता है, ऐसे ही गुरु के याद करने मात्र से शिष्य को ज्ञान हो जाता है-यह ‘स्मरण-दीक्षा' है। जैसे मछली जल में अपने अण्डे को थोड़ी-थोड़ी देर में देखती रहती है तो देखने मात्र से अण्डा पक जाता है, ऐसे ही गुरु की कृपा-दृष्टि से शिष्य को ज्ञान हो जाता है-यह 'दृष्टि-दीक्षा' है। जैसे कुररी पृथ्वी पर अण्डा देती है और आकाश में शब्द करती हुई घूमती रहती है तो उसके शब्द से अण्डा पक जाता है, ऐसे ही गुरु अपने शब्दों से शिष्य को ज्ञान करा देता है-यह 'शब्द-दीक्षा' है। जैसे मयूरी अपने अण्डे पर बैठी रहती है तो उसके स्पर्श से अण्डा पक जाता है, ऐसे ही गुरु के हाथ के स्पर्श से शिष्य को ज्ञान हो जाता है—यह 'स्पर्श-दीक्षा' है। ईश्वर की कृपा से मानव-शरीर मिलता है, जिसको पाकर जीव स्वर्ग अथवा नरक में भी जा सकता है तथा मुक्त भी हो सकता हैं। परन्तु गुरुकृपा या सन्तकृपा से मनुष्य को स्वर्ग अथवा नरक नहीं मिलते, केवल मुक्ति ही मिलती है। गुरु बनाने से ही गुरुकृपा होती है-ऐसा नहीं है। बनावटी गुरु से कल्याण नहीं होता। जो अच्छे सन्त-महात्मा होते हैं, वे चेला बनाने से ही कृपा करते हों-ऐसी बात नहीं है। वे स्वत: और स्वाभाविक कृपा करते हैं। सूर्य को कोई इष्ट मानेगा, तभी वह प्रकाश करेगा यह बात नहीं है। सूर्य तो स्वत: और स्वाभाविक प्रकाश करता है, उस प्रकाश को चाहे कोई काम में ले ले। ऐसे ही गुरु की, सन्त-महात्मा की कृपा स्वतः स्वाभाविक होती है। जो उनके सम्मुख हो जाता है, वह लाभ ले लेता है। जो सम्मुख नहीं होता, वह लाभ नहीं लेता। जैसे, वर्षा बरसती है तो उसके सामने पात्र रखने से वह जल से भर जाता है। परन्तु पात्र उलटा रख दें तो वह जल से नहीं भरता और सूखा रह जाता है। सन्तकृपा को ग्रहण करने वाला पात्र जैसा होता है, वैसा ही उसको लाभ होता है। सतगुरु भूठा इन्द्र सम, कमी न राखी कोय। वैसा ही फल नीपजै, जैसी भूमिका होय॥ वर्षा सब पर समान रूप से होती है, पर बीज जैसा होता है, वैसा ही फल पैदा होता है। इसी तरह भगवान् की और सन्त-महात्माओं की कृपा सब पर सदा समान रूप से रहती है। जो जैसा चाहे, लाभ उठा सकता है।

गौरव गुप्ता

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बालू के गोपाल ब्रज के पास एक गांव में मंदिर के बाहर एक महाराज कृष्ण भगवान की कथा सुनाते हुए कृष्ण भगवान के सुंदर बाल रूप का वर्णन कर रहे थे। उसी समय एक ठग बालू वहां से गुजर रहा था। वह भी थोड़ी देर कथा सुनने के लिए रुक गया। उस समय महाराज कृष्ण भगवान के आभूषणों का वर्णन करते हुए कह रहे थे "उस बालक के सिर पर हीरे मोती जड़े मोर मुकुट,गले में मोतियों की माला,कानों में रत्नजड़ित कुंडल,बाहों में बाजूबंद,उंगलियों में अंगूठियां,कमर में छोटी छोटी घंटियों वाला कमरबंद,पैरों में नूपुर वाले सुंदर पायल थे।यशोदा माता प्रतिदिन उनका श्रृंगार करती थीं।बालक अपने साथियों के साथ गाय चराने जाते थे ।' बालू ने यह सुनकर सोचा कि अगर यह बालक मुझे मिल जाए तो मुझे किसी को ठगने की जरूरत नहीं पड़ेगी ।परंतु यह बालक मिलेगा कहाँ। जरूर महाराज यह जानते होंगे।

वह कथा समाप्त होने की प्रतीक्षा करने लगा ।जब कथा समाप्त हुई और सारे भक्त चले गए तब बालू महाराज के पास पहुंचा और कहने लगा ‘ अभी आप जिस बालक का वर्णन कर रहे थे वह मुझे कहां मिलेगा।’
महाराज उसकी बात सुनकर मुस्कुराने लगे और यूँ ही कह दिया यहीं पास में वृंदावन के जंगल में यह बालक गाय चराते तुम्हें मिलेगा।’ बालू उसी दिन अपने मन में संकल्प करके निकला कि इस बालक से तो मुझे मिलना ही है और इसके सारे आभूषण में ठग कर ले लूंगा ।वह महाराज द्वारा बताए गए स्थान में पहुंचकर बालक की प्रतीक्षा करने लगा।
कुछ समय बाद उसने देखा कि गाय के झुंड आ रहे हैं और पीछे पीछे एक बालक बांसुरी बजाता हुआ आ रहा है ।बालू ने देखकर सोचा ‘यह बालक तो छोटा सा है, इसे तो पकड़ना और ठगना आसान है।’
जैसे ही बालक पास आया बालू ने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा ‘अपने सारे आभूषण निकाल कर मुझे दे दो ।’
बालक बालू से नहीं डरा ।उसने मुस्कुराते हुए सारे आभूषण बालू को उतारने दिए। बालू ने सारे आभूषण अपने गमछे में बांध लिये।हीरे मोती जड़े हुए स्वर्ण आभूषण थे। बालू तो इन आभूषणों को देखकर बहुत ही खुश हो गया।
उसने बालक से कहा ‘तुमने इतनी आसानी से सारे आभूषण दे दिये।तुम्हारे माता पिता तुमसे कुछ नहीं कहेंगे।’
बालक ने भोलेपन से कहा’ मेरे पास ऐसे ही और आभूषण हैं ।मैं दूसरे पहन लूंगा।’
बालू ने मन ही मन सोचा वाह ऐसे ही और आभूषण मिल जाएं तो क्या कहना।उसने बालक से कहा ‘ठीक है कल फिर आना ‘और अपनी राह ली।
रास्ते में वह सोचने लगा कि उस महाराज के कारण ही मुझे इतने कीमती आभूषण मिले हैं। कथा सुनने के बाद भक्तजन महाराज को दक्षिणा दे रहे थे ।मुझे भी कुछ दक्षिणा देनी चाहिए । मुझे भी महाराज को कुछ आभूषण दे देना चाहिए । वह महाराज के पास गया और गमछा खोल कर कहने लगा ‘महाराज आप इसमें से कुछ आभूषण ले लीजिए।”
महाराज आभूषणों कोई देखकर आश्चर्यचकित रह गए ।उन्होंने बालू से पूछा ‘तुम यह सब कहां से लेकर आ रहे हो?’
बालू ने बताया ‘ आपने सुबह मुझे उस बालक के मिलने का जो स्थान बताया था, मैं उसी स्थान पर गया और उस बालक से मिला । उसने अपने पहने हुए आभूषण मुझे आसानी से दे दिए।’
महाराज पहले तो विश्वास नहीं कर पाए ।फिर उन्होंने आभूषणों को उलट पलट के देखा तो उन्हें मोर मुकुट दिखाई दिया ।उन्होंने बालू से कहा ‘मुझे भी उस बालक के दर्शन करने थे ।’
बालू ने कहा ‘वह कल फिर आएगा। आप कल मेरे साथ चलिएगा और उसे देख लीजिएगा।’
दूसरे दिन महाराज बालू के साथ उसी स्थान पर जाकर एक पेड़ के पीछे छिपकर बालक की प्रतीक्षा करने लगे ।थोड़ी देर की प्रतीक्षा के बाद काल के जैसे ही गायों के झुंड के पीछे पीछे बांसुरी बजाता हुआ सुंदर बालक दिखाई दिया। बालू ने महाराज से कहा ‘आप यहीं छिपे रहिए। पहले मुझे बालक के आभूषण लेने दीजिये।’
महाराज तो उस सुंदर बालक के रूप को देखकर ही मोहित हो गए थे। उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बह रही थी।
बालू बालक से बात करते करते एक एक आभूषण निकालते जा रहा था। बालक भी मुस्कुराते हुए आभूषणों को देते जा रहा था।
सारे आभूषण निकालने के बाद बालू ने बालक से कहा ‘ एक महाराज भी मेरे साथ में आए हैं । तुमसे मिलना चाहते हैं। ‘
बालक ने कहा ‘ठीक है,उन्हें बुला लो।’
बालू ने महाराज को आवाज दी । महाराज जी तो मूर्ति के समान खड़े थे।बालू ने उनके पास आकर उनको हिलाया और कहा चलिए।
महाराज बालक के सामने आए और उसके चरणों में गिरकर अपने आंसुओं से उनके चरण धोने लगे ।बालू यह देख कर आश्चर्यचकित हो गया कि महाराज जी तो स्वयं इतने विद्वान हैं ,सब लोग तो इनके चरण छूते हैं । यह छोटे से बालक के चरण क्यों छू रहे हैं ।बालक ने बड़े प्रेम से महाराज जी को उठाया उनके आंसू पोंछे। बालू ने महाराज से पूछा
‘ आप इसके चरण क्यों छू रहे हैं? यह तो छोटा सा बालक है।’
तब महाराज ने उसे बताया कि ‘यह तो परमानंद भगवान
जगत के स्वामी गोपाल हैं, जिनकी मैं जीवन भर आराधना करता रहा और कथा सुनाता रहा। इन्होंने कभी मुझे दर्शन नहीं दिए। आज तुम्हारे कारण मुझे अपने आराध्य गोपाल जी के दर्शन हो गए । तुम्हारे विश्वास के कारण ही आज गोपाल जी ने तुम्हें दर्शन दिए हैं ।’
गोपाल जी ने दोनों को ही आशीर्वाद दिया और अपने लोक चले गए। बालू को यह सब सुनकर पश्चाताप होने लगा कि मैंने भगवान को ही ठग लिया । महाराज ने उसे समझाया कि तुम्हारे कारण आज मुझे भी उनके दर्शन हुए हैं ।
बालू की आंखें खुल गई। वह महाराज जी के साथ ही रहने लगा और गोपालजी की भक्ति में अपना शेष जीवन बिताने लगा।

संकलित
नीरजा नामदेव

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💪💪💪💪 💪💪–हड़ताल–💪💪💪💪💪💪

एक सच्ची घटना।

उन दिनों मेरी पोस्टिंग एक छोटे से पर समृद्ध गाँव में थी। इंदौर के करीब, रेल और सड़क मार्ग की सुबिधा से सम्पन्न।

गाँव में एक प्लास्टिक शीट का कारखाना था। जो कई लोगों के रोज़गार का साधन था। कारखाने का मालिक चूँकि उसी गाँव का निवासी था– इसलिये इंदौर में खुद की हवेली होने के बावजूद –अपने पिता की इच्छा से रात्रि विश्राम गाँव में ही करना पसंद करता था। दिन में इंदौर चला जाता और अपने दूसरे कारोबार की देख-रेख करता।

प्लास्टिक फैक्टरी दक्ष मैनेजर और कर्मचारियों के सहारे चल रहा था।

कारखानेदार ने देखा कि गाँव के कई युवा बेरोज़गार बैठे है। दिन भर शतरंज और ताश खेलने में सर्फ कर रहे है। इनमें से कई उसके बाल मित्र थे। उन्हें रोज़गार देने की नीयत से कारखानेदार ने टॉर्च असेम्बलिंग का एक यूनिट अपने प्लास्टिक कारखाने के पास डाल दिया।

पार्ट्स इंदौर से आते।टॉर्च की शक्ल अख्तियार कर –पैक हो कर वापस इंदौर।
पचासों छोकरो को नोकरी मिल गयी।
सेठ भी सन्तुष्ट था कि बिना विशेष हानि के अपने गाँव के प्रति कर्तब्य का निर्वाहन कर रहा है।
कच्चा माल लाने एवम तैयार माल इंदौर पहुँचाने में जो ट्रक का किराया लगता था वह सस्ती मज़दूरी में समायोजित हो जाता था।

फिर एक दिन अज़ाब आ गया।
सेठ ने किसी कर्मचारी को डाँटा।
कर्मचारियों का स्वाभिमान जाग उठा।
सेठ लिखित में माफी माँगो से लेकर– इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते हुवे –कारखाने से सेठ के आवास तक रैली निकाली गयी।
सयाने-होशियारचंदो ने मांगों की लंबी फेहरिस्त बनायी। कुछ अनोखे असम्भव जैसे मांग भी जोड़े गए।
सरकारी नोकरी में मिलने वाले लाभ एवम सुबिधा से मिलता-जुलता ड्राफ्ट तैयार किया गया।

कल तक जो बेरोज़गार थे। जिन पर अहसान करने की नीयत से ये असेम्बलिंग यूनिट खोला गया था।अब सबको कम से कम तीन गुना वेतन वृद्धि, मेडिकल सुबिधा, गाँव के गाँव मे आने-जाने के लिये यात्रा भत्ता–यहाँ तक कि 20 साल नोकरी करने के बाद निश्चित और नियमित पेंशन की लिखित गैरन्टी भी चाहियें थी।

सेठ माँगो की लिस्ट पढ़ कर दंग रह गया।
लिस्ट सोंपने वाले से दो टूक पूछा “काम करना है या नहीं?”
जोश में अगले ने कहा –“नहीं। जब तक हमारी मांगे पूरी नहीं होती – आप लिखित में माफी नहीं मांगते तब तक नहीं।”
सेठ ने गहरी साँस ली। प्लास्टिक फैक्टरी के मैनेजर को तलब किया और टॉर्च यूनिट को स्थायी तौर से बन्द कर दिया।

पन्द्रह दिन बाद जोशीले जवानों को अहसास हुआ कि वे फिर से बेरोज़गार हो भी चुके है।
सात दिन बाद ही दो ट्रकों में भर कर टार्च यूनिट इंदौर पहुँच भी गयी और वहाँ खुद असेम्बल हो कर असेम्बलिंग का काम चालू कर दी।

जोशीले जवान जो अब तक नियमित कमाई होने के कारण कई तरह के शौक पाल चुके थे। सिगरेट से बीड़ी पर आ गए। पाउच और गुटका छोड़ कर तंबाकू मसलने लगे।

कुछ लोग गाँव के बड़े-बूढ़े लोगो को साथ ले जा कर– अनुनय-विनय करने पहुँचे कि गाँव में फिर से टार्च यूनिट चालू हो सके।
अपनी गरीबी मज़बूरी और बेरोजगारी का हवाला देकर गिड़गिड़ाने लगे।
सेठ द्रवित हो कर उन्हें इंदौर के प्लांट में गाँव वाली तनख्वाह पर नोकरी देने को तैयार हुआ।
गाँव के गाँव में जिन्हें यात्रा भत्ता चाहियें था–अब वे रोज़ 30 km प्रति दिन अप-डाउन अपने खर्चे पर कर रहे थे।

इंक़लाब ज़िंदाबाद । हमारी मांगे पूरी करो। हड़ताल । जब तक सूरज चाँद रहेगा नेताजी तेरा नाम रहेगा।

उपरोक्त नारों से कर्मचारियों का नहीं नेताओं का ही भला हुआ है।

बामियों के कदम जहाँ भी पड़े लोगो का भविष्य लुभावने नारों , सुनहरे सपने , नयी उम्मीद की भेंट चढ़ गया।

कानपुर जो भारत का मैनचेस्टर कहलाता था। आज खुद गुजरात महाराष्ट्र से कपड़े मंगवाता है।

बामियों जहाँ-जहाँ तुम्हारें कदम पड़े। तुम्हारें मनभावन नारों से मन में दबी छुपी इच्छाओं को भड़काने की कला से, मेरा हक़ मारा जा रहा है कि उकसाऊ सोच के कारण लोगो का भला कम नुकसान ज़्यादा हुआ है।
उधोग धंधे निपट गए।
तुम्हारी नज़रें इनायत कृषि पर पड़ चुकी है।
20 साल बाद अन्य वस्तुओं की तरह कृषि उत्पाद भी चाइना से ही आयात होगा

टाटा बिड़ला अम्बानी अडानी बियानी रामदेव की चाहें लाख बुराई कर लो पर इन्हें कोसने की जगह तुम खुद भी तो इनके जैसा बिज़नेस एम्पायर खड़ा कर सकते हो। तुम्हें बड़ा सेठ बनने से किसने रोका है ?

धीरूभाई अंबानी ने गाड़ियों में ईंधन भरा है।
बाबा रामदेव ने साइकिलों से जड़ी बूटियां ढोयी है।
बहुत से लोगों ने धक्के खा- खा कर ज़िन्दगी में कोई मुकाम हासिल की है।

तभी तो कहते है कि ठोकर खा-खा कर ठाकुर होना।

नोट:-मुझें अहसास है कि आलेख पढ़ने के बाद बहुत से लोग रुष्ट होंगे। मुझें कोसेंगे। गालियां भी देंगे। पर क्या करूँ! लगभग 25 साल तक नोकरी करने –ट्रेड यूनियनों को चंदा देने –उनका झंडा उठाने के बाद –यही अनुभव हुआ कि हमनें अजगर पाले है।

तभी तो दास मलूका कह गये है कि :-

अजगर करे न चाकरी पंक्षी करें ना काम
दास मलूका कह गये सबके दाता राम आपका अरुण कुमार अविनाश