Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

આ મેસ આયનાક સુંદર શહેરનું પુરાતત્વીય પુનર્નિર્માણ છે



આ મેસ આયનાક સુંદર શહેરનું પુરાતત્વીય પુનર્નિર્માણ છે, જે પ્રાચીન વિશ્વ માટે “ભારતના પ્રવેશદ્વાર” તરીકે ઓળખાય છે.

તે આવા તરીકે જાણીતું હતું કારણ કે તે પ્રાચીન ભારતની ઉત્તર પશ્ચિમ સીમા પર હતું. આ પુનર્નિર્માણ વૈજ્ .ાનિકોની ટીમ દ્વારા બનાવવામાં આવ્યું છે.

દિવાલવાળી શહેર 2000 વર્ષ પહેલાં જેવી દેખાતી હતી. ચીનના પ્રવાસી ઝુઆનઝંગે આ શહેરની મુલાકાત લીધી હતી અને તેને ‘ગેટવે Indiaફ ઈન્ડિયા’ કહે છે. સંસ્કૃત સ્ત્રોતોમાં જોવા મળ્યા મુજબ આ શહેરનું મૂળ નામ લેમ્પકા હતું (મેસ આઈનાક તેનું આધુનિક નામ છે). ઝુઆનઝંગ મુજબ, તે વિસ્તાર મુજબ 30 લિ. તે જાણીતું છે કે મેસ આયનાકના નાગરિકો બૌદ્ધ અને શૈવ ધર્મને અનુસરતા હતા કારણ કે ખોદકામ દરમિયાન બૌદ્ધ સ્તૂપ અને શિવ સિક્કા મળી આવ્યા છે.

10 મી સદી દરમિયાન, આ શહેર પર કાબુલના રાજા, જયપાલદેવના બ્રાહ્મણ શાહીનું શાસન હતું. પરંતુ ગઝનાવિડના આક્રમણથી તે જમીન પર સળગી ગઈ. એકવાર આ દિવાલો તૂટી ગઈ અને કાબુલ શાહીઓ પડી ગયા, ગઝનવીએ હિન્દુ કુશને પાર કરીને અને મેઇનલેન્ડ ભારત પર આક્રમણ કર્યું તે ખૂબ જ સરળતાથી હતું. આજે તે સ્થાન અફઘાનિસ્તાન (કાબુલની નજીક) નું છે અને તે સ્થળ પર મળેલા એકમાત્ર અવશેષો ખંડેર અને અસ્થિર બુદ્ધો છે

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श्राद्ध


श्राद्ध क्या है संपूर्ण जानकारी ।
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श्राद्ध दो प्रकार के होते है ,
1)पिंड क्रिया
2) ब्राह्मणभोज

1)पिण्डक्रिया*
यह प्रश्न स्वाभाविक है कि श्राद्ध में दी गई अन्न सामग्री पितरों को कैसे मिलती है…?

नाम गौत्रं च मन्त्रश्च दत्तमन्नम नयन्ति तम।
अपि योनिशतम प्राप्तान्सतृप्तिस्ताननुगच्छन्ति ।।
(वायुपुराण)

श्राद्ध में दिये गये अन्न को नाम , गौत्र , ह्रदय की श्रद्धा , संकल्पपूर्वक दिये हुय पदार्थ भक्तिपूर्वक उच्चारित मन्त्र उनके पास भोजन रूप में उपलब्ध
होते है ,

2)ब्राह्मणभोजन
निमन्त्रितान हि पितर उपतिष्ठन्ति तान द्विजान ।
वायुवच्चानुगच्छन्ति तथासिनानुपासते ।।
(मनुस्मृति 3,189)

अर्थात श्राद्ध में निमंत्रित ब्राह्मण में पितर गुप्तरूप से प्राणवायु की भांति उनके साथ भोजन करते है , म्रत्यु के पश्चात पितर सूक्ष्म शरीरधारी होते है , इसिलिय वह दिखाई नही देते ,
तिर इव वै 1पितरो मनुष्येभ्यः
( शतपथ ब्राह्मण )
अर्थात सूक्ष्म शरीरधारी पितर मनुष्यों से छिपे होते है ।

धनाभाव में श्राद्ध

धनाभाव एवम समयाभाव में श्राद्ध तिथि पर पितर का स्मरण कर गाय को घांस खिलाने से भी पूर्ति होती है , यह व्यवस्था पद्मपुराण ने दी है ,
यह भी सम्भव न हो तो इसके अलावा भी , श्राद्ध कर्ता एकांत में जाकर पितरों का स्मरण कर दोनों हाथ जोड़कर पितरों से प्रार्थना करे

न मेस्ति वित्तं न धनम च नान्यच्छ्श्राद्धोपयोग्यम स्वपितृन्नतोस्मि ।
तृप्यन्तु भक्त्या पितरो मयोतौ कृतौ भुजौ वर्तमनि मारुतस्य ।।
(विष्णुपुराण)

अर्थात ‘ है पितृगण मेरे पास श्राद्ध हेतु न उपयुक्त धन है न धान्य है मेरे पास आपके लिये ह्रदय में श्रद्धाभक्ति है मै इन्ही के द्वारा आपको तृप्त करना चाहता हूं आप तृप्त होइये

श्राद्ध सामान्यतः 3 प्रकार के होते है

नित्य नैमितकम काम्यम त्रिविधम श्राद्धम उच्यते
यम स्मृति में 5 प्रकार तथा , विश्वामित्र स्मृति में 12 प्रकार के श्राद्ध का वर्णन है ,किंतु 5 श्राद्ध में ही सबका अंतर्भाव हो जाता है ,

1)नित्य श्राद्ध*
प्रतिदिन किया जाने बाला श्राद्ध , जलप्रदान क्रिया से भी इसकी पूर्ति हो जाती है

2)नैमितकम श्राद्ध*
वार्षिक तिथि पर किया जाने बाला श्राद्ध ,

3)काम्यश्राद्ध*
किसी कामना की पूर्ति हेतु किया जाने वाला श्राद्घ

4)वृद्धिश्राद्ध (नान्दीश्राद्ध)*
मांगलिक कार्यों , विवाहादि में किया जाने बाला श्राद्ध

5)पावर्ण श्राद्ध*
पितृपक्ष ,अमावस्या आदि पर्व पर किया जाने बाला श्राद्ध

श्राद्ध कर्म से मनुष्य को पितृदोष-ऋण से मुक्त के साथ जीवन मे सुखशांति तो प्राप्त होती है , अपितु परलोक भी सुधरता है

पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिताहि परमम् तपः।
पितरी प्रितिमापन्ने प्रियन्ते सर्व देवता।।

सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमय: पिता।मातरं पितरं तस्मात सर्वयत्नेन पूजयेत

इस सृष्टि में हर चीज का अथवा प्राणी का जोड़ा है, जैसे: रात और दिन, अँधेरा और उजाला, सफ़ेद और काला, अमीर और गरीब अथवा नर और नारी इत्यादि बहुत गिनवाये जा सकते हैं।

सभी चीजें अपने जोड़े से सार्थक है अथवा एक-दूसरे के पूरक है, दोनों एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं, इसी तरह दृश्य और अदृश्य जगत का भी जोड़ा है, दृश्य जगत वो है जो हमें दिखता है और अदृश्य जगत वो है जो हमें नहीं दिखता, ये भी एक-दूसरे पर निर्भर है और एक-दूसरे के पूरक हैं।
मित्रों, पितृ-लोक भी अदृश्य-जगत का हिस्सा है और अपनी सक्रियता के लिये दृश्य जगत के श्राद्ध पर निर्भर है।

सनातन धर्मग्रंथों के अनुसार श्राद्ध के सोलह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं, ऐसी मान्यता है कि पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है, वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है।

पूर्णिमा पर देहांत होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करने का विधान है, इसी दिन से महालय (श्राद्ध) का प्रारंभ भी माना जाता है, श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए।

पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्ष भर तक प्रसन्न रहते हैं, धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि पितरों का पिण्ड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है।

श्राद्ध में पितरों को आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्ड दान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे, इसी आशा के साथ वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं, यही कारण है कि हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रत्येक हिंदू गृहस्थ को पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य रूप से करने के लिए कहा गया है।

श्राद्ध से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं, मगर ये बातें श्राद्ध करने से पूर्व जान लेना बहुत जरूरी है क्योंकि कई बार विधिपूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे देते हैं,

आज हम आपको श्राद्ध से जुड़ी कुछ विशेष बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं:

1- श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही काम में लेना चाहिए, यह ध्यान रखें कि गाय को बच्चा हुए दस दिन से अधिक हो चुके हैं, दस दिन के अंदर बछड़े को जन्म देने वाली गाय के दूध का उपयोग श्राद्ध कर्म में नहीं करना चाहिए।
2- श्राद्ध में चांदी के बर्तनों का उपयोग व दान पुण्यदायक तो है ही राक्षसों का नाश करने वाला भी माना गया है, पितरों के लिए चांदी के बर्तन में सिर्फ पानी ही दिए जाए तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है, पितरों के लिए अर्घ्य, पिण्ड और भोजन के बर्तन भी चांदी के हों तो और भी श्रेष्ठ माना जाता है।
3- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाते समय परोसने के बर्तन दोनों हाथों से पकड़ कर लाने चाहिए, एक हाथ से लाए अन्न पात्र से परोसा हुआ भोजन राक्षस छीन लेते हैं।
4- ब्राह्मण को भोजन मौन रहकर एवं व्यंजनों की प्रशंसा किए बगैर करना चाहिए क्योंकि पितर तब तक ही भोजन ग्रहण करते हैं जब तक ब्राह्मण मौन रह कर भोजन करें।
5- जो पितृ शस्त्र आदि से मारे गए हों उनका श्राद्ध मुख्य तिथि के अतिरिक्त चतुर्दशी को भी करना चाहिए, इससे वे प्रसन्न होते हैं, श्राद्ध गुप्त रूप से करना चाहिए, पिंड दान पर साधारण या नीच मनुष्यों की दृष्टि पडने से वह पितरों को नहीं पहुंचता।
6- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाना आवश्यक है, जो व्यक्ति बिना ब्राह्मण के श्राद्ध कर्म करता है, उसके घर में पितर भोजन नहीं करते, श्राप देकर लौट जाते हैं, ब्राह्मण हीन श्राद्ध से मनुष्य महापापी होता है।
7- श्राद्ध में जौ, कांगनी, मटरसरसों का उपयोग श्रेष्ठ रहता है, तिल की मात्रा अधिक होने पर श्राद्ध अक्षय हो जाता है, वास्तव में तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं, कुशा (एक प्रकार की घास) राक्षसों से बचाते हैं।
8- दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए, वन, पर्वत, पुण्यतीर्थ एवं मंदिर दूसरे की भूमि नहीं माने जाते क्योंकि इन पर किसी का स्वामित्व नहीं माना गया है, अत: इन स्थानों पर श्राद्ध किया जा सकता है।
9- चाहे मनुष्य देवकार्य में ब्राह्मण का चयन करते समय न सोचे, लेकिन पितृ कार्य में योग्य ब्राह्मण का ही चयन करना चाहिए क्योंकि श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों द्वारा ही होती है।
10- जो व्यक्ति किसी कारणवश एक ही नगर में रहने वाली अपनी बहिन, जमाई और भानजे को श्राद्ध में भोजन नहीं कराता, उसके यहां पितर के साथ ही देवता भी अन्न ग्रहण नहीं करते।
11- श्राद्ध करते समय यदि कोई भिखारी आ जाए तो उसे आदर-पूर्वक भोजन करवाना चाहिए, जो व्यक्ति ऐसे समय में घर आए याचक को भगा देता है उसका श्राद्ध कर्म पूर्ण नहीं माना जाता और उसका फल भी नष्ट हो जाता है।
12- शुक्लपक्ष में, रात्रि में, युग्म दिनों (एक ही दिन दो तिथियों का योग) में तथा अपने जन्मदिन पर कभी श्राद्ध नहीं करना चाहिए, धर्म ग्रंथों के अनुसार सायंकाल का समय राक्षसों के लिए होता है, यह समय सभी कार्यों के लिए निंदित है, अत: शाम के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए।
13- श्राद्ध में प्रसन्न पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष और स्वर्ग प्रदान करते हैं, श्राद्ध के लिए शुक्लपक्ष की अपेक्षा कृष्णपक्ष श्रेष्ठ माना गया है।
14- रात्रि को राक्षसी समय माना गया है, अत: रात में श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए, दोनों संध्याओं के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए, दिन के आठवें मुहूर्त (कुतपकाल) में पितरों के लिए दिया गया दान अक्षय होता है।
15- श्राद्ध में ये चीजें होना महत्वपूर्ण हैं: गंगाजल, दूध, शहद, दौहित्र, कुश और तिल, केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन निषेध है।
सोने, चांदी, कांसे, तांबे के पात्र उत्तम हैं, इनके अभाव में पत्तल उपयोग की जा सकती है।
16- तुलसी से पितृगण प्रसन्न होते हैं, ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को चले जाते हैं, तुलसी से पिंड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं।
17- रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन श्रेष्ठ हैं, आसन में लोहा किसी भी रूप में प्रयुक्त नहीं होना चाहिए।
18- चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी, अपवित्र फल या अन्न श्राद्ध में निषेध हैं।
19- सनातन धर्म के भविष्य पुराण के अनुसार श्राद्ध 12 प्रकार के होते हैं, जो इस प्रकार हैं-
1- नित्य, 2- नैमित्तिक, 3- काम्य, 4- वृद्धि, 5- सपिण्डन, 6- पार्वण, 7- गोष्ठी, 8- शुद्धर्थ, 9- कर्मांग, 10- दैविक, 11- यात्रार्थ, 12- पुष्टयर्थ
20- श्राद्ध के प्रमुख अंग इस प्रकार :
तर्पण- इसमें दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल पितरों को तृप्त करने हेतु दिया जाता है, श्राद्ध पक्ष में इसे नित्य करने का विधान है।
भोजन व पिण्ड दान– पितरों

के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन दिया जाता है, श्राद्ध करते समय चावल या जौ के पिण्ड दान भी किए जाते हैं।
वस्त्रदान– वस्त्र दान देना श्राद्ध का मुख्य लक्ष्य भी है।
दक्षिणा दान– यज्ञ की पत्नी दक्षिणा है जब तक भोजन कराकर वस्त्र और दक्षिणा नहीं दी जाती उसका फल नहीं मिलता।
21 – श्राद्ध तिथि के पूर्व ही यथाशक्ति विद्वान ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलावा दें, श्राद्ध के दिन भोजन के लिए आए ब्राह्मणों को दक्षिण दिशा में बैठाएं।
22- पितरों की पसंद का भोजन दूध, दही, घी और शहद के साथ अन्न से बनाए गए पकवान जैसे खीर आदि है, इसलिए ब्राह्मणों को ऐसे भोजन कराने का विशेष ध्यान रखें।
23- तैयार भोजन में से गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटी के लिए थोड़ा सा भाग निकालें, इसके बाद हाथ जल, अक्षत यानी चावल, चन्दन, फूल और तिल लेकर ब्राह्मणों से संकल्प लें।
24- कुत्ते और कौए के निमित्त निकाला भोजन कुत्ते और कौए को ही कराएं किंतु देवता और चींटी का भोजन गाय को खिला सकते हैं।
इसके बाद ही ब्राह्मणों को भोजन कराएं, पूरी तृप्ति से भोजन कराने के बाद ब्राह्मणों के मस्तक पर तिलक लगाकर यथाशक्ति कपड़े, अन्न और दक्षिणा दान कर आशीर्वाद पाएं।
25- ब्राह्मणों को भोजन के बाद घर के द्वार तक पूरे सम्मान के साथ विदा करके आएं, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों के साथ-साथ पितर लोग भी चलते हैं, ब्राह्मणों के भोजन के बाद ही अपने परिजनों, दोस्तों और रिश्तेदारों को भोजन कराएं।
26- पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए, पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है, पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में सपिंडो (परिवार के) को श्राद्ध करना चाहिए, एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राध्दकर्म करें या सबसे छोटा ।

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पारिजात नाम के वृक्ष को छूने से मिटती है थकान



यन्त्र तंत्र मंत्र ग्रुप की भेंट
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हंस जैन। रामनगर खंडवा
9827214427
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पारिजात नाम के वृक्ष को छूने से मिटती है थकान

क्या कोई ऐसा भी वृक्ष है,जिसं छूने मात्र से मनुष्य की थकान मिट जाती है। हरिवंश पुराण में ऐसे ही एक वृक्ष का उल्लेख मिलता है,जिसको छूने से देव नर्तकी उर्वषी की थकान मिट जाती थी। पारिजात नाम के इस वृक्ष के फूलो को देव मुनि नारद ने श्री कृश्ण की पत्नी सत्यभामा को दिया था। इन अदभूत फूलों को पाकर सत्यभामा भगवान श्री कृष्ण से जिद कर बैठी कि परिजात वृक्ष को स्वर्ग से लाकर उनकी वाटिका में रोपित किया जाए। पारिजात वृक्ष के बारे में श्रीमदभगवत गीता में भी उल्लेख मिलता है। श्रीमदभगवत गीता जिसमें 12 स्कन्ध,350 अध्याय व18000 ष्लोक है ,के दशम स्कन्ध के 59वें अध्याय के 39 वें श्लोक , चोदितो भर्गयोत्पाटय पारिजातं गरूत्मति। आरोप्य सेन्द्रान विबुधान निर्जत्योपानयत पुरम॥ में पारिजात वृक्ष का उल्लेख पारिजातहरण नरकवधों नामक अध्याय में की गई है।

सत्यभामा की जिद पूरी करने के लिए जब श्री कृष्ण ने परिजात वृक्ष लाने के लिए नारद मुनि को स्वर्ग लोक भेजा तो इन्द्र ने श्री कृष्ण के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और पारिजात देने से मना कर दिया। जिस पर भगवान श्री कृष्ण ने गरूड पर सवार होकर स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया और परिजात प्राप्त कर लिया। श्री कृष्ण ने यह पारिजात लाकर सत्यभामा की वाटिका में रोपित कर दिया। जैसा कि श्रीमदभगवत गीता के श्लोक, स्थापित सत्यभामाया गृह उधान उपषोभन । अन्वगु•र्ा्रमरा स्वर्गात तद गन्धासलम्पटा, से भी स्पष्ट है। भगवान श्री कृष्ण ने पारिजात को लगाया तो था सत्यभामा की वाटिका में परन्तु उसके फूल उनकी दूसरी पत्नी रूकमणी की वाटिका में गिरते थे। लेकिन श्री कृष्ण के हमले व पारिजात छीन लेने से रूष्ट हुए इन्द्र ने श्री कृश्ण व पारिजात दोनों को शाप दे दिया था । उन्होन् श्री क्रष्ण को शाप दिया कि इस कृत्य के कारण श्री कृष्ण को पुर्नजन्म यानि भगवान विष्णु के अवतार के रूप में जाना जाएगा। जबकि पारिजात को कभी न फल आने का शाप दिया गया। तभी से कहा जाता है कि पारिजात हमेशा के लिए अपने फल से वंचित हो गया। एक मान्यता यह भी है कि पारिजात नाम की एक राजकुमारी हुआ करती थी ,जिसे भगवान सूर्य से प्यार हो गया था, लेकिन अथक प्रयास करने पर भी भगवान सूर्य ने पारिजात के प्यार कों स्वीकार नहीं किया, जिससे खिन्न होकर राजकुमारी पारिजात ने आत्म हत्या कर ली थी। जिस स्थान पर पारिजात की कब्र बनी वहीं से पारिजात नामक वृक्ष ने जन्म लिया। इसी कारण पारिजात वृक्ष को रात में देखने से ऐसा लगता है जैसे वह रो रहा हो, लेकिन सूर्य उदय के साथ ही पारिजात की टहनियां और पत्ते सूर्य को आगोष में लेने को आतुर दिखाई पडते है। ज्योतिश विज्ञान में भी पारिजात का विशेष महत्व बताया गया है।

पूर्व वैज्ञानिक एवं ज्योतिष के जानकार गोपाल राजू की माने तो धन की देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने में पारिजात वृक्ष का उपयोग किया जाता है। उन्होने बताया कि यदि ,ओम नमो मणि़•ाद्राय आयुध धराय मम लक्ष्मी़वसंच्छितं पूरय पूरय ऐं हीं क्ली हयौं मणि भद्राय नम, मन्त्र का जाप 108 बार करते हुए नारियल पर पारिजात पुष्प अर्पित किये जाए और पूजा के इस नारियल व फूलो को लाल कपडे में लपेटकर घर के पूजा धर में स्थापित किया जाए तो लक्ष्मी सहज ही प्रसन्न होकर साधक के घर में वास करती है। यह पूजा साल के पांच मुहर्त होली,दीवाली,ग्रहण,रवि पुष्प तथा गुरू पुष्प नक्षत्र में की जाए तो उत्तम है। यहां यह भी बता दे कि पारिजात वृक्ष के वे ही फूल उपयोग में लाए जाते है,जो वृक्ष से टूटकर गिर जाते है। यानि वृक्ष से फूल तोड़ने की पूरी तरह मनाही है।

इसी पारिजात वृक्ष को लेकर गहन अध्ययन कर चुके रूड़की के कुंवर हरि सिंह यादव ने बताया कि यंू तो परिजात वृक्ष की प्रजाति भारत में नहीं पाई जाती, लेकिन भारत में एक मात्र पारिजात वृक्ष आज भी उ.प्र. के बाराबंकी जनपद अंतर्गत रामनगर क्ष्ोत्र के गांव बोरोलिया में मौजूद है। लगभग 50 फीट तने व 45 फीट उंचाई के इस वृक्ष की ज्यादातर शाखाएं भूमि की ओर मुड़ जाती है और धरती को छुते ही सूख जाती है।

एक साल में सिर्फ एक बार जून माह में सफेद व पीले रंग के फूलो से सुसज्जित होने वाला यह वृक्ष न सिर्फ खुशबू बिखेरता है, बल्कि देखने में भी सुन्दर लगता है। आयु की दृष्टि से एक हजार से पांच हजार वर्ष तक जीवित रहने वाले इस वृक्ष को वनस्पति शास्त्री एडोसोनिया वर्ग का मानते हैं। जिसकी दुनियाभर में सिर्फ 5 प्रजातियां पाई जाती है। जिनमें से एक डिजाहाट है। पारिजात वृक्ष इसी डिजाहाट प्रजाति का है। कुंवर हरि सिंह यादव अपने षोध आधार पर बताते है कि एक मान्यता के अनुसार परिजात वृक्ष की उत्पत्ति समुन्द्र मंथन से हुई थी । जिसे इन्द्र ने अपनी वाटिका में रोप दिया था। कहा जाता है जब पांडव पुत्र माता कुन्ती के साथ अज्ञातवास पर थे तब उन्होने ही सत्यभामा की वाटिका में से परिजात को लेकर बोरोलिया गांव में रोपित कर दिया होगा। तभी से परिजात गांव बोरोलिया की शोभा बना हुआ है। देशभर से श्रद्धालु अपनी थकान मिटाने के लिए और मनौती मांगने के लिए परिजात वृक्ष की पूजा अर्चना करते है। पारिजात में औषधीय गुणों का भी भण्डार है। पारिजात बावासीर रोग निदान के लिए रामबाण औषधी है। पारिजात के एक बीज का सेवन प्रतिदिन किया जाये तो बावासीर रोग ठीक हो जाता है। पारिजात के बीज का पेस्ट बनाकर गुदा पर लगाने से बावासीर के रोगी को बडी राहत मिलती है। पारिजात के फूल हदय के लिए भी उत्तम औषधी माने जाते हैं। वर्ष में एक माह पारिजात पर फूल आने पर यदि इन फूलों का या फिर फूलो के रस का सेवन किया जाए तो हदय रोग से बचा जा सकता है। इतना ही नहीं पारिजात की पत्तियों को पीस कर शहद में मिलाकर सेवन करने से सुखी खासी ठीक हो जाती है। इसी तरह पारिजात की पत्तियों को पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा संबंधि रोग ठीक हो जाते है। पारिजात की पत्तियों से बने हर्बल तेल का भी त्वचा रोगों में भरपूर इस्तेमाल किया जाता है। पारिजात की कोंपल को अगर 5 काली मिर्च के साथ महिलाएं सेवन करे तो महिलाओं को स्त्री रोग में लाभ मिलता है। वहीं पारिजात के बीज जंहा हेयर टानिक का काम करते है तो इसकी पत्तियों का जूस क्रोनिक बुखार को ठीक कर देता है। इस दृश्टि से पारिजात अपनेआपमें एक संपूर्ण औषधी भी है।

इस वृक्ष के ऐतिहासिक महत्व व दुर्लभता को देखते हुए जंहा परिजात वृक्ष को सरकार ने संरक्षित वृक्ष घोषित किया हुआ है। वहीं देहरादून के राष्ट्रीय वन अनुसंधान संस्थान की पहल पर पारिजात वृक्ष के आस पास छायादार वृक्षों को हटवाकर पारिजात वृक्ष की सुरक्षा की गई। वन अनुसंधान संस्थान के निदेशक डा. एसएस नेगी का कहना है कि पारिजात वृक्ष से चंूकि जन आस्था जुडी है। इस कारण इस वृक्ष को संरक्षण दिये जाने की निरंतर आवश्यकता है। इस वृक्ष की एक विषेशता यह भी है कि इस वृक्ष की कलम नहीं लगती ,इसी कारण यह वृक्ष दुर्लभ वृक्ष की श्रेणी में आता है। भारत सरकार ने पारिजात वृक्ष पर डाक टिकट भी जारी किया। ताकि अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर पारिजात वृक्ष की पहचान बन सके।

सायटिका में लाभदायक पारिजात

हरसिंगार जिसे पारिजात भी कहते हैं, एक सुन्दर वृक्ष होता है, जिस पर सुन्दर व सुगन्धित फूल लगते हैं। इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। यह सारे भारत में पैदा होता है।

परिचय : यह 10 से 15 फीट ऊँचा और कहीं 25-30 फीट ऊँचा एक वृक्ष होता है और देशभर में खास तौर पर बाग-बगीचों में लगा हुआ मिलता है। विशेषकर मध्यभारत और हिमालय की नीची तराइयों में ज्यादातर पैदा होता है। इसके फूल बहुत सुगंधित और सुन्दर होते हैं जो रात को खिलते हैं और सुबह मुरझा जाते हैं।

विभिन्न भाषाओं में नाम : संस्कृत- पारिजात, शेफालिका। हिन्दी- हरसिंगार, परजा, पारिजात। मराठी- पारिजातक। गुजराती- हरशणगार। बंगाली- शेफालिका, शिउली। तेलुगू- पारिजातमु, पगडमल्लै। तमिल- पवलमल्लिकै, मज्जपु। मलयालम – पारिजातकोय, पविझमल्लि। कन्नड़- पारिजात। उर्दू- गुलजाफरी। इंग्लिश- नाइट जेस्मिन। लैटिन- निक्टेन्थिस आर्बोर्ट्रिस्टिस।

गुण : यह हलका, रूखा, तिक्त, कटु, गर्म, वात-कफनाशक, ज्वार नाशक, मृदु विरेचक, शामक, उष्णीय और रक्तशोधक होता है। सायटिका रोग को दूर करने का इसमें विशेष गुण है।

रासायनिक संघटन : इसके फूलों में सुगंधित तेल होता है। रंगीन पुष्प नलिका में निक्टैन्थीन नामक रंग द्रव्य ग्लूकोसाइड के रूप में 0.1% होता है जो केसर में स्थित ए-क्रोसेटिन के सदृश्य होता है। बीज मज्जा से 12-16% पीले भूरे रंग का स्थिर तेल निकलता है। पत्तों में टैनिक एसिड, मेथिलसेलिसिलेट, एक ग्लाइकोसाइड (1%), मैनिटाल (1.3%), एक राल (1.2%), कुछ उड़नशील तेल, विटामिन सी और ए पाया जाता है। छाल में एक ग्लाइकोसाइड और दो क्षाराभ होते हैं।

उपयोग : इस वृक्ष के पत्ते और छाल विशेष रूप से उपयोगी होते हैं। इसके पत्तों का सबसे अच्छा उपयोग गृध्रसी (सायटिका) रोग को दूर करने में किया जाता है।

गृध्रसी (सायटिका) : हरसिंगार के ढाई सौ ग्राम पत्ते साफ करके एक लीटर पानी में उबालें। जब पानी लगभग 700 मिली बचे तब उतारकर ठण्डा करके छान लें, पत्ते फेंक दें और 1-2 रत्ती केसर घोंटकर इस पानी में घोल दें। इस पानी को दो बड़ी बोतलों में भरकर रोज सुबह-शाम एक कप मात्रा में इसे पिएँ।

ऐसी चार बोतलें पीने तक सायटिका रोग जड़ से चला जाता है। किसी-किसी को जल्दी फायदा होता है फिर भी पूरी तरह चार बोतल पी लेना अच्छा होता है। इस प्रयोग में एक बात का खयाल रखें कि वसन्त ऋतु में ये पत्ते गुणहीन रहते हैं अतः यह प्रयोग वसन्त ऋतु में लाभ नहीं करता।

हंस जैन रामनगर खंडवा
9827214427

यन्त्र तंत्र मंत्र ग्रुप की भेंट

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इस्लाम राजपूत युद्ध का इतिहास


प्रशांत मणि त्रिपाठी

इस्लामराजपूतयुद्धकाइतिहास

मुश्किल से मिलती हैं यह चीजें अगर याद नहीं कर पाओ तो कॉपी पेस्ट या शेयर कर देना

लेख का विषय :- पूरे विश्व पर इस्लामी अत्याचार के समय भारत का राजपुत शासन ।

622 ई से लेकर 634 ई तक मात्र 12 साल में अरब के सभी मूर्तिपूजकों को मूहम्मद साहब ने इस्लाम की तलवार से पानी पिलाकर मुसलमान बना दिया ।।

634 ईस्वी से लेकर 651 तक , यानी मात्र 16 साल में सभी पारसियों को तलवार की नोक पर इस्लाम की दीक्षा दी गयी ।।

640 में मिस्र में पहली बार इस्लाम ने पांव रखे, ओर देखते ही देखते मात्र 15 सालों में , 655 तक इजिप्ट के लगभग सभी लोग मुसलमान बना दिये गए ।।

नार्थ अफ्रीकन देश जैसे – अल्जीरिया, ट्यूनीशिया, मोरक्को आदि देशों को 640 से 711 ई तक पूर्ण रूप से इस्लाम धर्म मे बदल दिया गया, 3 देशों का सम्पूर्ण सुख चैन लेने में मुसलमानो ने मात्र 71 साल लगाए ।

711 ईस्वी में स्पेन पर आक्रमण हुआ, 730 ईस्वी तक स्पेन की 70% आबादी मुसलमान थी । मात्र 19 सालों में ।

तुर्क थोड़े से वीर निकले, तुर्को के विरुद्ध जिहाद 651 ईस्वी में शुरू हुआ, ओर 751 ईस्वी तक सारे तुर्क मुसलमान बना दिये गए ।।

मंगौलो यानी इंडोनेशिया के विरुद्ध जिहाद मात्र 40 साल में पूरा हुआ । 1260 में मुसलमानो ने इंडोनेशिया में मार काट मचाई, ओर 1300 ईस्वी तक सारे इंडोनेशिया के मंगोल मुसलमान बन चुके थे । नाममात्र के लोगो को छोड़कर ।

फिलिस्तीन, सीरिया, लेबनान, जॉर्डन आदि देशों को 634 से 650 के बीच मुसलमान बना दिया गया ।।

उसके बाद 700 ईस्वी में भारत के विरुद्ध जिहाद शुरू हुआ वह अब तक चल रहा है ।।

इस्लामिक आक्रमणकारियों की क्रूरता का अंदाजा इस बात से लगाएं की मुसलमानो का ईरान पर आक्रमण हुआ, मुसलमानी सेना ईरानी राजा के महल तक पहुंच गई । महल में लगभग 2 या 3 साल की पारसी राजकुमारी थी । ईरान पर आक्रमण अली ने किया था, जिसे शिया मुसलमान मानते है ।

आपको लगता होगा कि अली कोई बहुत बड़ा महात्मा था, इसलिए शिया मुसलमान थोड़े ठंडे होते है, जबकि ऐसा कुछ नही है, कासिम, अकबर, औरंगजेब ओर इस अली नाम के राक्षस में सुत मात्र का भी फर्क नही था ।।

पारसी राजकुमारी को बंदी बना लिया गया, अब वह कन्या थी, तो लूट के माल पर पहला हक़ खलीफा मुगीरा इब्न सूबा का था । खलीफा को वह मासूम बच्ची भोग के लिए भेंट की गई ।लेकिन खलीफा ईरान में अली की लूट से इतना खुश हुआ कि अली को कह दिया, इसका भोग तुम करो । मुसलमानी क्रूरता , पशु संस्कृति का एक सबसे गलीच नमूना देखिये, की तीन साल की बच्ची में भी उन्हें औरत दिख रही थी । वह उनके लिए बेटी नही, भोग की वस्तु थी ।

बेटी के प्रेम में पिता को भी बंदी बनना पड़ा, इस्लाम या मौत में से एक चुनने का बिकल्प पारसी राजा को दिया गया । पारसी राजा ने मृत्यु चुनी । अली ने उस तीन साल की मासूम राजकुमारी को अपनी पत्नी बना लिया ।। अली की पत्नी Al Sahba’ bint Rabi’ah मात्र 3 साल की थी, ओर उस समय अली 30 साल ले भी ऊपर था । यह है इस्लाम, ओर यह है इस्लाम की संस्कृति ।

मेने मात्र ईरान का उदाहरण दिया है, इजिप्ट हो या अफ्रीकन देश सब जगह यही हाल है । जिस समय सीरिया आदि को जीता गया था, उसकी कहानी तो ओर दर्दनाक है । मुसलमानो ने ईसाई सैनिकों के आगे अपनी औरतों को कर दिया । मुसलमान औरते गयी ईसाइयों के पास की मुसलमानो से हमारी रक्षा करो, बेचारे मूर्ख ईसाइयों ने इन धूर्तो की बातों में आकर उन्हें शरण दे दी, फिर क्या था, सारी सुपर्णखाओ ने मिलकर रातों रात सभी सैनिकों को हलाल करवा दिया ।।

अब आप भारत की स्थिति देखिये । जिस समय आक्रमणकारी ईरान तक पहुंचकर अपना बड़ा साम्राज्य स्थापित कर चुके थे , उस समय उनकी हिम्मत नही थी की भारत के राजपूत साम्राज्य की ओर आंख उठाकर भी देख सकें ।।

जब ईरान , सऊदी आदि को जबरन मुसलमान बना लिया गया था, तो आक्रमणकारियों का मन हुआ कि अब हिंदुस्थान के क्षत्रियों को जीता जाएं, लेकिन यह स्वपन उनके लिए काल बनकर खड़ा हो गया । 636 ईस्वी में खलीफा ने भारत पर पहला हमला बोला । एक भी आक्रांता जिंदा वापस नही जा पाया ।।

कुछ वर्ष तक तो मुस्लिम अक्रान्ताओ की हिम्मत तक नही हुई की भारत की ओर मुंह करके सोया भी जाएं, लेकिन कुछ ही वर्षो में गिद्धों ने अपनी जात दिखा ही दी ।। दुबारा आक्रमण हुआ, इस समय खलीफा की गद्दी पर उस्मान आ चुका था । उसने हाकिम नाम के सेनापति के साथ विशाल इस्लामी टिड्डिडल भारत भेजा ।। सेना का पूर्णतः सफाया हो गया, ओर सेनापति हाकिम बंदी बना लिया गया । हाकिम को भारतीय राजपूतो ने बहुत मारा, ओर बड़े बुरे हाल करके वापस अरब भेजा, जिससे उनकी सेना की दुर्गति का हाल, उस्मान तक पहुंच जाएं ।।

यह सिलसिला लगभग 700 ईस्वी तक चलता रहा ।। जितने भी मुसलमानो ने भारत की तरफ मुँह किया, राजपूतो ने उनका सिर कंधे से नीचे उतार दिया ।।

उसके बाद भी भारत के वीर जवानों ने हार नही मानी ।। जब 7 वी सदी इस्लाम की शुरू हुई , जिस समय अरब से लेकर अफ्रीका, ईरान यूरोप, सीरिया , मोरक्को, ट्यूनीशिया, तुर्की यह बड़े बड़े देश जब मुसलमान बन गए, स्पेन तक कि 70% आबादी मुसलमान थी, तब आपको ज्ञात है भारत मे ” बप्पा रावल ” महाराणा प्रताप के पितामह का जन्म हो चुका था, वे पूर्णतः योद्धा बन चुके थे, इस्लाम के पंजे में जकड़ गए अफगानिस्तान तक से मुसलमानो को उस वीर ने मार भगाया, केवल यही नही, वह लड़ते लड़ते खलीफा की गद्दी तक जा पहुंचा, जहां खुद खलीफा को अपनी जान की भीख मांगनी पड़ी ।

उसके बाद भी यह सिलसिला रुका नही । नागभट्ट प्रतिहार द्वितीय जैसे योद्धा भारत को मिले । जिन्होंने अपने पूरे जीवन राजपूती धर्म का पालन करते हुए पूरे भारत की न केवल रक्षा की, बल्कि हमारी शक्ति का डंका विश्व मे बजाए रखा ।।

पहले बप्पा रावल में साबित किया था कि अरब अपराजित नही है, लेकिन 836 ई के समय भारत मे वह हुआ, की जिससे विश्वविजेता मुसलमान थर्रा गए । मुसलमानो ने अपने इतिहास में उन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन कहा है, वह सरदार भी राजपूत ही थे । सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार ।। मिहिरभोज के बारे में कहा जाता है, की उनका प्रताप ऋषि अगस्त्य से भी ज़्यादा चमका । ऋषि अगस्त्य वहीं है, जिन्होंने श्रीराम को वह अस्त्र दिया था, जिससे रावण का वध सम्भव था ।। राम के विजय अभियान के हिडन योद्धाओं में एक । उन्होंने मुसलमानो को केवल 5 गुफाओं तक सीमित कर दिया ।। यह वही समय था, जिस समय मुसलमान किसी युद्ध मे केवल जीत हासिल करते थे, ओर वहां की प्रजा को मुसलमान बना देते, भारत वीर राजपूत मिहिरभोज ने इन अक्रान्ताओ को अरब तक थर्रा दिया ।।

प्रथ्वीराज चौहान तक इस्लाम के उत्कर्ष के 400 सालों बाद तक
भारत के राजपूतो ने इस्लाम नाम की बीमारी भारत को नही लगने दी, उस युद्ध काल मे भी भारत की अर्थव्यवस्था को गिरने नही दिया ।। उसके बाद मुसलमान विजयी भी हुए, लेकिन राजपूतो ने सत्ता गंवाकर भी हार नही मानी , एक दिन वह चैन से नही बैठे, अंतिम वीर दुर्गादास जी राठौड़ ने दिल्ली को झुकाकर, जोधपुर का किला मुगलो के हलक ने निकाल कर हिन्दू धर्म की गरिमा, वीरता शौर्य को चार चांद लगा दिए ।।

किसी भी देश को मुसलमान बनाने में मुसलमानो में 20 साल नही लिए, ओर भारत मे 500 साल राज करने के बाद भी मेवाड़ के शेर महाराणा राजसिंहः ने अपने घोड़े पर भी इस्लाम की मुहर नही लगवाई ।।

महाराणा प्रताप, दुर्गादास राठौड़, मिहिरभोज, दुर्गावती, चौहान, परमार लगभग सारे राजपूत अपनी मातृभूमि के लिए जान पर खेल गए ।। एक समय ऐसा आ गया था, लड़ते लड़ते राजपूत केवल 2% पर आकर ठहर गए ।।

एक बार पूरी दुनिया देखे, ओर आज अपना वर्तमान देखे । जिन मुसलमानो ने 20 साल में आधी विश्व आबादी को मुसलमान बना दिया, वह भारत मे केवल पाकिस्तान बांग्लादेश तक सिमट कर ही क्यो रह गए ?

मान लिया कि उस समय लड़ना राजपूत राजाओं का धर्म था, लेकिन जब राजाओं ने अपना धर्म निभा दिया, तो आज उनकी बेटियों, पोतियों पर काल्पनिक कहानियां गढ़कर उन योद्धाओं के वंशजो का हिंदुओ द्वारा ही अपमान , कुछ हिन्दू द्वारा ही उनका इतिहास चोरी करना, क्या यह बलिदानियों को भेंट करता है हिन्दू समाज ?

राजा भोज, विक्रमादित्य, नागभट्ट प्रथम और नागभट्ट द्वितीय, चंद्रगुप्त मौर्य, बिंदुसार, समुद्रगुप्त, स्कंद गुप्त, छत्रसाल बुंदेला, आल्हा उदल, राजा भाटी, भूपत भाटी, चाचादेव भाटी, सिद्ध श्री देवराज भाटी, कानड़ देव चौहान वीरमदेव चौहान, हठी हम्मीर देव चौहान, विग्रहराज चौहान, मालदेव सिंह राठौड़, विजय राव लांझा भाटी, भोजदेव भाटी, चूहड़ विजयराव भाटी, बलराज भाटी, घड़सी, रतनसिं, राणा हमीर सिंह और अमर सिंह, अमर सिंह राठौड़ दुर्गादास राठौड़ जसवंत सिंह राठौड़ मिर्जा राजा जयसिंह राजा जयचंद, भीमदेव सोलंकी, सिद्ध श्री राजा जय सिंह सोलंकी, पुलकेशिन द्वितीय सोलंकी, रानी दुर्गावती, रानी कर्णावती, राजकुमारी रत्नाबाई, रानी रुद्रा देवी, हाड़ी रानी, पद्मावती, तोगा जी वीरवर कल्लाजी जयमल जी जेता कुपा, गोरा बादल राणा रतन सिंह, पजबन राय जी कच्छावा, मोहन सिंह मंढाड़ , राजा पोरस, हर्षवर्धन बेस, सुहेलदेव बेस , राव शेखाजी, राव चंद्रसेन जी दोड़ , राव चंद्र सिंह जी राठौड़, कृष्ण कुमार सोलंकी, ललितादित्य मुक्तापीड़, जनरल जोरावर सिंह कालुवारिया, धीर सिंह पुंडीर ,बल्लू जी चंपावत, भीष्म रावत चुण्डा जी, रामसाह सिंहतोमर और उनका वंश, झाला राजा मान, महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर,
स्वतंत्रता सेनानी राव बख्तावर सिंह अमझेरा वजीर सिंह पठानिया, राव राजा राम बक्स सिंह, व्हाट ठाकुर कुशाल सिंह, ठाकुर रोशन सिंह,ठाकुर महावीर सिंह, राव बेनी माधव सिंह, डूंगजी, भुरजी , बलजी, जवाहर जी, छत्रपति शिवाजी और हमारे न जाने अनगिनत लोक देवता, और गुजरात में एक से बढ़कर एक योद्धा लोक देवताओं, संत, सती जुझार, भांजी जडेजा, अजय पाल देव जी
यह तो सिर्फ कुछ ही नाम है जिन्हें हमने गलती से किसी इतिहास सोशल मीडिया या फिर किसी पुस्तक में पढ़ लिया वरना न जाने कितने अनगिनत युद्ध हुए हैं हमारा इतिहास औरों की तरह कोई सौ 200 साल का लिए बल्कि हजारों लाखों साल से हमारे अनगिनत योद्धाओं ने इस भारत देश को भारत देश रैली में अपना बलिदान दिया है चाहे युधिष्ठिर संवत हो चाहे विक्रम संवत हो या चाहे ईसा पूर्व हो और संवत में एक से बढ़कर एक योद्धा पैदा हुए हैं जिन्होंने 18 साल की उम्र से पहले ही अपना योगदान दे दिया घर के घर गांव के गांव ढाणी की ढाणी खाली हो गई जब कोई भी पुरुष नहीं बचा किसी गांव या ढाणी में पूरा का पूरा परिवार पूरे पूरे गांव कुर्बान हो गया रणभेरी पर चल गया क्षात्र धर्म के लिए
और वह भी राजपूत है जिन्होंने सिख धर्म उत्थान के लिए अपना योगदान दिया और फिर बाद में सिख धर्म अपना लिया जैसे बाबा बंदा बहादुर सिंह, बाज सिंह पवार, बज्जर सिंह राठौड़, आलम सिंह चौहान ,महासिंह पवार, बचित्तर सिंह पवार, गुलाब सिंह राठौड़, मनीष सिंह पवार ,फूलों सिंह.

आज राजपूत इतिहास चोरी पर समझदार लोग भी या तो चुप रह जाते है, या चोरों का साथ देते है, वे अपने मन के अंदर झांककर देखे, जिन्होंने तुम्हारी सबसे कीमती चीज़ , तुम्हारा धर्म तुम्हे सुरक्षित रखकर दिया, भले ही अपनी औलादों की ही बलि देनी पड़ी हो, उस जाति के साथ ऐसा व्यवहार ?

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गधों की नियुक्ति का चलन – अनुवाद इक इंगलिश कहावत से


गधों की नियुक्ति का चलन – अनुवाद इक इंगलिश कहावत से
इक शासक ने मछलियां पकड़ने को जाना था उस राजा ने अपने ज्योतिष विशेषज्ञ से पूछा अगले कुछ घंटे का मौसम का हाल। ज्योतिषि ने बताया कोई बारिश की संभावना नहीं आज। राजा अपनी रानी को लेकर मछली पकड़ने चल पड़ा। राह में राजा को इक आदमी मिला जो मछली पकड़ने वाले बांस को पकड़े गधे पर सवार था उसने कहा राजन आप वापस चले जाओ आज बारिश होने वाली है। राजा ने कहा मैंने अपने ज्योतिष अधिकारी से पूछ लिया है जिसको बहुत पैसा देता हूं भरोसा है उसने बताया आज बारिश नहीं होने वाली है। मुझे उसकी बात का विश्वास है और राजा आगे बढ़ गया।

मगर कुछ देर में तेज़ बरसात हुई और राजा रानी भीग गए और वापस आते ही राजा ने अपने ज्योतिष अधिकारी को मौत की सज़ा सुना दी। राजा ने मछली पकड़ने वाले को दरबार में बुलाया और उसको अपना भाग्य बांचने वाला अधिकारी नियुक्त करने की बात की। मछली पकड़ने वाले ने बताया उसको ज्योतिष या मौसम की कोई समझ नहीं है वो तो अपने गधे को देख का समझता है जब उसके कान नीचे की तरफ झुके होते हैं तब बारिश होती है जब खड़े होते हैं नहीं होती बरसात। राजा ने तब इक गधे को नियुक्त कर लिया। तभी से ये चलन चलता रहा है।

( आधुनिक संदर्भ में राजिस्थान में गधे की चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया गया होगा। गधे की बात सही साबित हुई खूब बारिश हो रही है थमती ही नहीं अभी तक भी। पायलट अधर में फंसा है। )

A king wanted to go fishing, and he asked the royal weather forecaster the forecast for the next few hours.
The palace meteorologivst assured him that there was no chance of rain.
So the King and the Queen went fishing.
On the way, he met a man with a fishing pole riding on a donkey, and he asked the man if the fish were biting.
The fisherman said, “Your Majesty, you should return to the palace! In just a short time I expect a huge rain storm.”
The King replied: “I hold the palace meteorologist in high regard.
He is an educated and experienced professional.
Besides, I pay him very high wages.
He gave me a very different forecast.
I trust him.”
So the King continued on his way.
However, in a short time a torrential rain fell from the sky.
The King and Queen were totally soaked.
Furious, the King returned to the palace and gave the order to fire the meteorologist.
Then he summoned the fisherman and offered him the prestigious position of royal forecaster.
The fisherman said, “Your Majesty, I do not know anything about forecasting.
I obtain my information from my donkey.
If I see my donkey’s ears drooping, it means with certainty that…it will rain.”
So the King hired the donkey.
And thus began the practice of hiring dumb asses to work in influential positions of government.
The practice is unbroken to this date… 😊

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गृहस्थ गीता के अनमोल वचन


💖💫 ।। गृहस्थ गीता के अनमोल वचन ।। 💫💖👏🏻

जीवन में चार का महत्व :-

१. चार बातों को याद रखे :- बड़े बूढ़ो का आदर करना, छोटों की रक्षा करना एवं उनपर स्नेह करना, बुद्धिमानो से सलाह लेना और मूर्खो के साथ कभी न उलझना !

२. चार चीजें पहले दुर्बल दिखती है परन्तु परवाह न करने पर बढ़कर दुःख का कारण बनती है :- अग्नि, रोग, ऋण और पाप !

३. चार चीजो का सदा सेवन करना चाहिए :- सत्संग, संतोष, दान और दया !

४. चार अवस्थाओ में आदमी बिगड़ता है :- जवानी, धन, अधिकार और अविवेक !

५. चार चीजे मनुष्य को बड़े भाग्य से मिलते है :- भगवान को याद रखने की लगन, संतो की संगती, चरित्र की निर्मलता और उदारता !

६. चार गुण बहुत दुर्लभ है :- धन में पवित्रता, दान में विनय, वीरता में दया और अधिकार में निराभिमानता !

७. चार चीजो पर भरोसा मत करो :- बिना जीता हुआ मन, शत्रु की प्रीति, स्वार्थी की खुशामद और बाजारू ज्योतिषियों की भविष्यवाणी !

८. चार चीजो पर भरोसा रखो :- सत्य, पुरुषार्थ, स्वार्थहीन और मित्र !

९. चार चीजे जाकर फिर नहीं लौटती :- मुह से निकली बात, कमान से निकला तीर, बीती हुई उम्र और मिटा हुआ ज्ञान !

१०. चार बातों को हमेशा याद रखे :- दूसरे के द्वारा अपने ऊपर किया गया उपकार, अपने द्वारा दूसरे पर किया गया अपकार, मृत्यु और भगवान !

११. चार के संग से बचने की चेस्टा करे :- नास्तिक, अन्याय का धन, पर(परायी) नारी और परनिन्दा !

१२. चार चीजो पर मनुष्य का बस नहीं चलता :- जीवन, मरण, यश और अपयश !

१३. चार पर परिचय चार अवस्थाओं में मिलता है :- दरिद्रता में मित्र का, निर्धनता में स्त्री का, रण में शूरवीर का और मदनामी में बंधू-बान्धवो का !

१४. चार बातों में मनुष्य का कल्याण है :- वाणी के सयं में, अल्प निद्रा में, अल्प आहार में और एकांत के भवत्स्मरण में !

१५. शुद्ध साधना के लिए चार बातो का पालन आवश्यक है :- भूख से काम खाना, लोक प्रतिष्ठा का त्याग, निर्धनता का स्वीकार और ईश्वर की इच्छा में संतोष !

१६. चार प्रकार के मनुष्य होते है : (क) मक्खीचूस – न आप खाय और न दुसरो को दे ! (ख) कंजूस – आप तो खाय पर दुसरो को न दे ! (ग) उदार – आप भी खाय और दूसरे को भी दे ! (घ) दाता – आप न खाय और दूसरे को दे ! यदि सब लोग दाता नहीं बन सकते तो कम से कम उदार तो बनना ही चाहिए !

१७. मन के चार प्रकार है :- धर्म से विमुख जीव का मन मुर्दा है, पापी का मन रोगी है, लोभी तथा स्वार्थी का मन आलसी है और भजन साधना में तत्पर का मन स्वस्थ है

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संत_कथा


संत_कथा

एक बार दो संत भटकते – भटकते जिला बांदा उत्तरप्रदेश तुलसीदास जी के गांव पहुंच गए…संध्या की बेला थी एक सुंदर भवन देखकर अलख जगाई….एक महिला घर से बाहर निकली संतो को प्रणाम किया चौकी की तरफ इशारा करके बोली आप लोग बैठिए मैं कुछ मीठा पानी लेकर आती हूं… वो अंदर गई मीठा पानी लाई संतो का सत्कार करने लग गई…कुछ समय में चाय भी तैयार होकर आ गई संतो ने पीया… इतने में घर के मुखिया जी आ गए प्रणाम किया… और विनंती करने लगे संत जी रात होने को चली है आप लोग आज हमारे दरवाजे पर ही भोजन ग्रहण करें… संतो की खुशी का ठिकाना न रहा वो बोले ठीक है महाशय हम संत है अपने हाथ से ही बनाकर खाएंगे… आप हमें सारा समान उपलब्ध करवा दें हम यहीं बाहर ही अहरा लगाकर बाटी चोखा लगाकर प्रसाद ग्रहण कर लेंगे…मुखिया जी अंदर गए और सारा सामान आटा, दाल, चावल, देशी घी, आलू , बर्तन वगैरह लेकर आए और संत जी को दे दिया बोले लीजिए बनाइए… उसी में से एक संत जी उठे जो चेला जैसे लग रहे थे उन्होंने खाना बनाना चालू कर दिया… इधर गांव में कुछ लोगों को पता चल गया कि फलाने के यहां संतो का आगमन हुआ है तो गांव के युवा, वृद्ध इकट्ठा होने लगे… इधर – उधर की बाते होने लगी गांव वालो को भी बैठने के लिए मुखिया जी ने खटिया का इंतजाम किया…इतने में गांव के ही अलगू परधान भी पधारे संत जी को दंडवत प्रणाम किया…और आग्रह करने लगे कि महात्मा जी जब तक खाना बन रहा है तब तक आपके मुखारविंद से कुछ राम – नाम की चर्चा हो जाए… सब लोग प्रसन्न हो गए बोले हां प्रधान जी आप ने तो हमारे मन की बात कह दी इसीलिए हम लोग भी यहां पर इकट्ठा हुए है…. संत जी भी मन मसोसकर किसी तरह तैयार हुए… और कथा प्रारंभ किये बोले आज आप लोगों को सुग्रीव और बाली का वह प्रसंग सुनाने जा रहा हूं जिसमें राम जी जब बाली को बाण मारते है तब बाली रामजी से प्रश्न करता है कि… मै बैरी सुग्रीव पियारा… मैं बैरी सुग्रीव पियारा…. मैं बैरी सुग्रीव पियारा…. कई बार प्रयास किए किंतु सफलता नहीं मिली…शायद आगे की लाइन संत जी को याद ही नहीं आ रही थी… यह सब उनका चेला जो खाना बना रहा था सुनकर व्यथित हुआ और वह बोला गुरुजी आइये आप भोजन बनाइये कथा मैं कहता हूं… गुरुजी गए खाना बनाने लगे…. अब चेला आ गया व्यास गद्दी पर और गुरुजी ने जहां से कथा रोकी थी चेले ने वहीं से चालू किया… मैं बैरी सुग्रीव पियारा…. मैं बैरी सुग्रीव पियारा…. मैं बैरी सुग्रीव पियारा…चेला भी यहीं अटक गया कई बार कोशिश की अगली लाइन याद ही नहीं रही… इधर गांव वाले आपस में घुसुर – फुसुर करने लगे… तब मुखिया जी से नहीं रहा गया हाथ जोड़कर संत जी से बोले… “संत जी ना तैं बैरी ना वा बैरी बैरी आही मोंही जो तुमका दरवाजे पर संत समझ के रोक लीन्हा अब दादू जाव भोजन लेव कथा बंद करौ”……संत जी के जान में जान आई उठे चल दिए भोजन पर….?? सोचिए जब मन और व्यासपीठ पर शुद्धता नहीं होगी तो मन एकाग्र कैसे होगा?? कथा कैसे होगी???
कहानी का आशय – आज- कल जो मोरारी बापू जैसे संत व्यासपीठ पर बैठकर मौला मौला गा रहे है… देवी चित्रलेखा जो अजान को सपोर्ट करते हुए कह रही हैं कि अजान हो रही हो तो भागवद कथा बंद कर देनी चाहिए… और भी कई संत है जिन्होंने धर्म को धंधा बना लिया है…यह सब उनकी नहीं हमारी और आपकी कमी है जो हम आप इनको सर आंखों पर बिठाकर रखते हैं…. ऐसे लोगों का बहिष्कार होने चाहिए नहीं तो ऐसे लोगों के कारण ही हमारा सनातन धर्म और हम हंसी के पात्र बन जाएंगे और हमारा आस्तित्व खतरे में आ जाएगा!
जय रामजी की//
Shitala Dubey

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अच्छे अच्छे महलों मे भी एक दिन कबूतर अपना घोंसला बना लेते है


सिताला दुबे

प्रेरक कहानी !!
“””””””””””””””””अच्छे अच्छे महलों मे भी एक दिन कबूतर अपना घोंसला बना लेते है … सेठ घनश्याम के दो पुत्रों में जायदाद और ज़मीन का बँटवारा चल रहा था और एक चार पट्टी के कमरे को लेकर विवाद गहराता जा रहा था , एकदिन दोनो भाई मरने मारने पर उतारू हो चले , तो पिता जी बहुत जोर से हँसे। पिताजी को हँसता देखकर दोनो भाई लड़ाई को भूल गये, और पिताजी से हँसी का कारण पुछा। तो पिताजी ने कहा-- इस छोटे से ज़मीन के टुकडे के लिये इतना लड़ रहे हो छोड़ो इसे आओ मेरे साथ एक अनमोल खजाना बताता हूँ मैं तुम्हे ! पिता घनश्याम जी और दोनो पुत्र पवन और मदन उनके साथ रवाना हुये पिताजी ने कहा देखो यदि तुम आपस मे लड़े तो फिर मैं तुम्हे उस खजाने तक नही लेकर जाऊँगा और बीच रास्ते से ही लौटकर आ जाऊँगा ! अब दोनो पुत्रों ने खजाने के चक्कर मे एक समझौता किया की चाहे कुछ भी हो जाये पर हम लड़ेंगे नही प्रेम से यात्रा पे चलेंगे ! गाँव जाने के लिये एक बस मिली पर सीट दो की मिली, और वो तीन थे, अब पिताजी के साथ थोड़ी देर पवन बैठे तो थोड़ी देर मदन ऐसे चलते-चलते लगभग दस घण्टे का सफर तय किया फिर गाँव आया। घनश्याम दोनो पुत्रों को लेकर एक बहुत बड़ी हवेली पर गये हवेली चारों तरफ से सुनसान थी। घनश्याम ने जब देखा की हवेली मे जगह जगह कबूतरों ने अपना घोसला बना रखा है, तो घनश्याम वहीं पर बैठकर रोने लगे। दोनो पुत्रों ने पुछा क्या हुआ पिताजी आप रो क्यों रहे है ? तो रोते हुये उस वृद्ध पिता ने कहा जरा ध्यान से देखो इस घर को, जरा याद करो वो बचपन जो तुमने यहाँ बिताया था , तुम्हे याद है पुत्र इस हवेली के लिये मैं ने अपने भाई से बहुत लड़ाई की थी, सो ये हवेली तो मुझे मिल गई पर मैंने उस भाई को हमेशा के लिये खो दिया , क्योंकि वो दूर देश में जाकर बस गया और फिर वक्त्त बदला और एक दिन हमें भी ये हवेली छोड़कर जाना पड़ा ! अच्छा तुम ये बताओ बेटा की जिस सीट पर हम बैठकर आये थे, क्या वो बस की सीट हमें मिल जायेगी ? और यदि मिल भी जाये तो क्या वो सीट हमेशा-हमेशा के लिये हमारी हो सकती है ? मतलब की उस सीट पर हमारे सिवा कोई न बैठे। तो दोनो पुत्रों ने एक साथ कहा की ऐसे कैसे हो सकता है , बस की यात्रा तो चलती रहती है और उस सीट पर सवारियाँ बदलती रहती है। पहले कोई और बैठा था , आज कोई और बैठा होगा और पता नही कल कोई और बैठेगा। और वैसे भी उस सीट में क्या धरा है जो थोड़ी सी देर के लिये हमारी है ! पिताजी फिर हँसे फिर रोये और फिर वो बोले देखो यही तो मैं तुम्हे समझा रहा हूँ ,कि जो थोड़ी देर के लिये तुम्हारा है , तुमसे पहले उसका मालिक कोई और था बस थोड़ी सी देर के लिये तुम हो और थोड़ी देर बाद कोई और हो जायेगा। बस बेटा एक बात ध्यान रखना की इस थोड़ी सी देर के लिये कही अनमोल रिश्तों की आहुति न दे देना, यदि कोई प्रलोभन आये तो इस घर की इस स्थिति को देख लेना की अच्छे अच्छे महलों में भी एक दिन कबूतर अपना घोसला बना लेते है। बस बेटा मुझे यही कहना था --कि बस की उस सीट को याद कर लेना जिसकी रोज उसकी सवारियां बदलती रहती है उस सीट के खातिर अनमोल रिश्तों की आहुति न दे देना जिस तरह से बस की यात्रा में तालमेल बिठाया था बस वैसे ही जीवन की यात्रा मे भी तालमेल बिठा लेना ! दोनो पुत्र पिताजी का अभिप्राय समझ गये, और पिता के चरणों में गिरकर रोने लगे !

शिक्षा :-जो कुछ भी ऐश्वर्य – सम्पदा हमारे पास है वो सबकुछ बस थोड़ी देर के लिये ही है , थोड़ी-थोड़ी देर मे यात्री भी बदल जाते है और मालिक भी। रिश्तें बड़े अनमोल होते है छोटे से ऐश्वर्य या सम्पदा के चक्कर मे कहीं किसी अनमोल रिश्तें को न खो देना ! !

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ઉછેર


ઉછેર
એક બહેન પોતાના પુત્રને અમારા આશ્રમ બોચાસણ ( આણંદ) ખાતે ભણવા માટે મૂકી ગયેલા. છોકરો ખૂબ સરસ. એ છોકરાના સંસ્કાર જોઈને હું ઘણીવાર વિચાર કરતો કે આની માએ આ છોકરાનો ઉછેર કેવી રીતે કર્યો હશે?
એકવખત મારે એ છોકરાના ગામમાં જવાનું થયું. મારો મુકામ નિશાળમાં હતો . અચાનક આઠેક વર્ષની એક બાળકી છોકરાની નાની બહેનએ આવીને મને કહ્યું મારા ભાઈને લાવ્યા છો? મે કહ્યુ ચાલવાનું વધુ હતું તેથી નથી લાવ્યો પરંતુ તારી માતા ને મારે મળવું છે. પેલી નાની છોકરી ખુશ થતી થતી મને તેના ઘરે લઈ ગઈ. બાળકી ની માં એ મારો ખૂબ આદર સત્કાર કર્યો. ફાટેલી તૂટેલી ગોદડી માં બેસી ને હું તેમના પુત્ર વિશે વાતચીત કરતો હતો ત્યાં અચાનક પાંચેક વરસનો છોકરો દોડતો દોડતો આવીને પેલી બહેનના ખોળામાં બેસી ગયો. તે બહેન તેને આઘો ખસેડવાનો પ્રયત્ન કરે છે પરંતુ, પેલો છોકરો નીચે ઉતરે જ નહિ. મે પૂછ્યું કોનો છોકરો છે ? જવાબ મળ્યો ગામના શેઠનો. મને આશ્ચર્ય થયું પારકા છોકરા સાથે આટલા હેત – પ્રીત!…
આ બાઇ પ્રસૂતિ કરવાનું, દાયણ નું કામ જાણે છે . તેને કહ્યું આ છોકરા નો જન્મ થયો ને તેની માં મરી ગઈ. મે થોડો મોટો કર્યો ને પછી એના પિતા એને લઈ ગયા. અમે રહ્યા “રબારી” એટલે આનો બાપ આને ઘણું રોકે છે પરંતુ, આ અહીજ પડ્યો પાથર્યો રહે છે. આના બાપુને તે ગમતું નથી પણ આ માને શાનો ? એને માટે તો મે મટકુંય જુદું રાખ્યું છે પણ આતો મારા જ પાણિયારે પાણી પીવે છે, જમવાનું પણ મારી પાસે બેસીને જ !
મે પૂછ્યું આ છોકરો માંદો- સાજો થાય તો શું કરો ? પેલા બહેને જવાબ વાળ્યો છોકરો એવો શું ઉછેરિયે કે માંદો પડે? માંદો પડે તો આ કાંડું કાપી ન નાખવું પડે!
એ બહેનની વાત આજે પણ યાદ કરું તો મન આજે પણ પ્રસન્ન થયા કરે છે. બહેનો ઈચ્છે તો દુનિયા પલટી શકે છે…
=} પ્રસ્તુત વાર્તા આજથી મે ત્રણ વર્ષ પહેલાં ખરીદેલી અને અર્ધ વંચાયેલી એક મેગેઝીન માંથી મળી. અને આ વાતના લેખક મુકસેવક, મુઠ્ઠી ઊંચેરા માનવી એવા ગુજરાત રાજ્યના ઉદઘાટક શ્રી રવિશંકર મહારાજ. પ્રકરણમાં સ્ત્રીઓ વિશે પણ સુંદર વિચારો વાંચવા મળ્યા.
=} દોસ્તો આ આખી વાતના પ્રાણ પેલી સ્ત્રી એ મહારાજને ઉછેર ની બાબતે આપેલ જવાબ છે. મારે આ હાર્દ ને માધ્યમ બનાવી ઘણું કહેવું છે ને હું ખુદ ને રોકી નથી શકતો.
=} આપડે નોંધવા જેવું એ છે કે અભણ સ્ત્રી ની પણ કેવી કેળવણી છે! ભણવું એટલે ચોપડી વાંચતા શીખવું એટલું જ નહિ, પણ જીવનમાં બધી રીતે ઘડાઈએ ત્યારે કેળવણી લીધી કહેવાય. અને ઉછેરના આ ઉદાહરણ પરથી તો વર્તમાન અને ભવિષ્યના સંદર્ભે બાળક ઉછેર પ્રત્યે તો ગ્લાનિ યુક્ત ચિંતન જ થાય છે. આજે જોઈ શકાય છે માં પોતાનો સમય સાચવવા અથવા બાળ ઉછેરના ઓતરા- ચીતરા સમયથી બચવા બાળકના હાથમાં મોબાઈલ સોંપી દે. અરે, અમુક બાળકોને તો રાત્રે જો મોબાઈલની સ્ક્રીન પર પોતાની આંગળીઓ ને આંખો ન ફેરવે ત્યાં સુધી તેઓ સુવે નહિ એવી કુટેવ હોય. આગળ શું વાત કરવી રહી જ્યાં બાળકના માતા – પિતા ખુદ આ કુટેવથી અસરગ્રસ્ત હોય! અપવાદ રૂપ સિવાય જેવી માં તેવું બાળક અને તેવો જ સમાજ .બાળઉછેર ના ક્ષેત્રમાં પુરુષ વર્ગ તો પોતે પોતાના વેપાર/ધંધા/ વ્યવસાય ની જવાબદારી ની મિથ્યા ઢાલ ઓઢીને પોતાના હાથ ઊંચા કરી લે છે. અને ઉછેર ની તમામ જવાબદારીનું વહન કેવળ સ્ત્રીઓ જ કરે.
જ્યારે બાળક ને સેવા સગવડ આપવાની થાય ત્યારે બંને એકરૂપ થઈને બાળક માટે એટલા સેફ ઝોન ઊભા કરી દે છે કે બાળક મોટું થતા કોઈપણ ભોગે આ સેવા- સુવિધા મેળવવા માટે જ મહત્વાકાંક્ષી થાય છે. તથા બાળકને એનકેન પ્રકારે જો તેના જીવનના કંફર્ટઝોનની બહારની બાબતને ટેકલ કરવાનું થાય ત્યારે ગભરાય છે અથવા પોતાના ઘૂંટણિયા ટેકવી દે . તરૂણ અવસ્થામાં આવા બાળકોને તડકામાં એકાદ- બે કિલોમીટર ચાલીને ક્યાંય જવાનું કહેવામાં આવે તો તે એવું અનુભવશે , જાણે હિમાલય ઓળંગવાનો હોય. આમાં કારણભૂત છે ઉછેર ની સાથે મળેલી સગવડતારૂપી આળસ.
ઉછેર માટે અન્ય ઘણા બધા કારણો જવાબદાર હોવા છતાં પણ જો માં/ સ્ત્રી વર્ગ ધારે તો સમાજમાં ઘણો મોટો ફેરફાર થઈ શકે છે. બાળમાનસ પર નાની નાની બાબતોની પણ ખૂબ મોટી અસર થાય છે. સ્ત્રી ત્યાગનું બીજું સ્વરૂપ છે અને કોઈપણ ક્ષેત્રમાં પરિવર્તન મેળવવું હોય તો ત્યાગ પ્રાથમિક બાબત થઈ બેસે છે. આપડા ક્રાંતિકારીઓ, મહાપુરુષો , અને યુગપુરુષોના જીવન જુવો તો મોટાભાગે તેમની જનેતાઓનો અથાગ ત્યાગ જોઈ શકાય છે. માતા જીજાબાઇ વિના શિવાજી ન પાકી શકે, રાધાબાઈ વિના તાનાજી ન થાય, જયવંતાબાઇ વિના મહારાણા પ્રતાપ જન્મી જ ન શકે. ભગવાન શ્રી રામ અને મહાબલી હનુમાન જનમવા માતા કૌશલ્યા અને અંજના જેવી માતૃ શકતી જોઈએ જ.
મેધાવીપણું, ખંતિલાપણું, શૌર્ય, વીરતા , નિર્ભયતા , કૂલિનતા, દિવ્યતા, દ્રઢતા, ચપળતા, વ્યવહારિતા, આદર્શતા અને સંસ્કારીતા ક્યાંયથી ખરીદી નથી શકાતા. તેને કેળવવા પડે છે અને કેળવણીનું કેન્દ્રબિંદુ માતૃશક્તિ છે.
એક દુહો યાદ આવે છે. ” મનહર મુખે માનુંણી,( એવી) ગુણિયલ હોય ગંભીર ઇ નારી એ નર નીપજે, ઓલા વંકળ મૂછા વીર
અને પ્રખ્યાત મનોવૈજ્ઞાનિક “જેમ્સ વોટસનનું” એક વાક્ય યાદ આવે છે કે,” તમે મને એક બાળક આપો અને તમે કહો તે હું તેને બનાવી આપું
પ્રત્યેક સ્ત્રી પોતાના બાળકને યોદ્ધો બનાવે ( યોદ્ધા નું મગજ વિકસાવે) તો પ્રત્યેક વ્યક્તિ રાષ્ટ્રને વીરતા, રક્ષા, જાગૃતિ , સમૃદ્ધિ અને સ્થાયી મક્કમતા આપે તો રાષ્ટ્ર કેવળ બે દાયકામાં શ્રેષ્ઠતા ના શિખરો સર કરી નાખે.
પરંતુ આજ ( એકવીસમી સદી ) ના સ્ત્રી વર્ગને પારિવારિક પ્રશ્નો, અંગત પ્રશ્નો, દાંપત્યજીવનના પ્રશ્નો અને સ્વલક્ષી બાબત સિવાય સમય જ નથી. જેને આ બધા થી નવરાશ છે તેને શોશિયલ સાઈટમાંથી છુટકારો નથી. એવો તે દોર બંધાયો છે કે કોઈની બર્થ ડે, એનીવર્શરી, અન્ય શુભેચ્છાઓ, શુભકામનાઓ અને નાઇસ ડિકુ 🤣 કહેવાનું જો રહી જાય તો જાણે અપરાધ થઈ ગયો હોય એવો ભાસ અનુભવે.
=} મારું અંગતમતે દ્રઢતાપૂર્વક એમ માનવું છે કે જો સમાજ અને રાષ્ટ્રને મૂળભૂત રીતે સુયોગ્ય અને જરૂરી પરિવર્તન મેળવવું હોય તો મુખ્ય ત્રણ પરિબળોએ પોતાનું શ્રેષ્ઠ કાર્ય કરવું પડશે. 1. સ્ત્રી વર્ગ , 2. શિક્ષણ અને 3. સાહિત્ય.
જો શ્રેષ્ઠ અને સુયોગ્ય રીતે શિક્ષણ પ્રાપ્ત થાય , સ્ત્રી વર્ગ પોતાના મગજમાંથી અન્ય પરિબળો હટાવી રાષ્ટ્રવાદ ને જ ધ્યાનમાં રાખી બાળકોનો ઉછેર કરે ( રાષ્ટ્રવાદ નો અર્થ કોઈ દિવસ સીમિત વ્યાખ્યા માં ન કરવો, અહીંના સંદર્ભમાં એટલું સમજવું કે રાષ્ટ્રને “કોઈપણ પ્રકારે નુકશાની ન વેઠવી પડે ” અને જરૂરિયાતવાળા લક્ષણો ધરાવતા માણસોની ઉણપ ન વેઠવી પડે અથવા ઉણપ ન વર્તાય તે) એવા બાળકો ઉછેરે કે તે કેવળ તેના પારિવારિક દુઃખો જ નહિ કિન્તુ સમાજ અને રાષ્ટ્રની પીડાઓનો પણ નાશ કરે અને સાહિત્યકારો દ્વારા ઉચ્ચ સાહિત્ય રચવામાં આવે ( જો કે રચાયું જ છે અભાવ કેવળ શિષ્ટ વાંચન નો છે) અને પ્રજા ઉચ્ચત્તમ પ્રકારનું સાહિત્ય ફરજિયાત પણે વાંચે તો સુખકારી અને હિતકારી પરિવર્તનના પ્રવાહ ને કોઈ રોકી શકનાર નથી
~} છેલ્લે ફરી એક સોરઠી દુહો યાદ આવે છે
” જનની જણ તો ભગત જણ
કા , દાતા કા, શુર….
નહિતર માડી રે ‘જે વાંઝણી
તારા મત રે ગુમાવીશ નુર….

~ વિજય

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ॐ दिशाशूल क्या होता है ?


🚩🙏 ॐ दिशाशूल क्या होता है ?
क्यों बड़े बुजुर्ग तिथि देख कर आने जाने की रोक टोक करते हैं ? आज की युवा पीढ़ी भले हि उन्हें आउटडेटेड कहे ..लेकिन बड़े सदा बड़े हि रहते हैं ..इसलिए आदर करे उनकी बातों का ;
दिशाशूल समझने से पहले हमें दस दिशाओं के विषय में ज्ञान होना आवश्यक है

| हम सबने पढ़ा है कि दिशाएं ४ होती हैं |
१) पूर्व
२) पश्चिम
३) उत्तर
४) दक्षिण

परन्तु जब हम उच्च शिक्षा ग्रहण करते हैं तो ज्ञात होता है कि वास्तव में
दिशाएँ दस होती हैं |

१) पूर्व
२) पश्चिम
३) उत्तर
४) दक्षिण
५) उत्तर – पूर्व
६) उत्तर – पश्चिम
७) दक्षिण – पूर्व
८) दक्षिण – पश्चिम
९) आकाश
१०) पाताल

हमारे सनातन धर्म के ग्रंथो में सदैव १० दिशाओं का ही वर्णन किया गया है,
जैसे हनुमान जी ने युद्ध में इतनी आवाजे की उनकी आवाज दसों दिशाओं में सुनाई
दी
हम यह भी जानते हैं कि प्रत्येक दिशा के देवता होते हैं |

दसों दिशाओं को समझने के पश्चात अब हम बात करते हैं वैदिक ज्योतिष की |
ज्योतिष शब्द “ज्योति” से बना है जिसका भावार्थ होता है “प्रकाश”
वैदिक ज्योतिष में अत्यंत विस्तृत रूप में मनुष्य के जीवन की हर
परिस्तिथियों से सम्बन्धित विश्लेषण किया गया है कि मनुष्य यदि इसको तनिक भी समझले तो वह अपने जीवन में उत्पन्न होने वाली बहुत सी समस्याओं से बच
सकता है और अपना जीवन सुखी बना सकता है |

दिशाशूल क्या होता है ? दिशाशूल वह दिशा है जिस तरफ यात्रा नहीं करना
चाहिए हर दिन किसी एक दिशा की ओर दिशाशूल होता है |

१) सोमवार और शुक्रवार को पूर्व
२) रविवार और शुक्रवार को पश्चिम
३) मंगलवार और बुधवार को उत्तर
४) गुरूवार को दक्षिण
५) सोमवार और गुरूवार को दक्षिण-पूर्व
६) रविवार और शुक्रवार को दक्षिण-पश्चिम
७) मंगलवार को उत्तर-पश्चिम
८) बुधवार और शनिवार को उत्तर-पूर्व

परन्तु यदि एक ही दिन यात्रा करके उसी दिन वापिस आ जाना हो तो ऐसी दशा
में दिशाशूल का विचार नहीं किया जाता है

परन्तु यदि कोई आवश्यक कार्य
हो ओर उसी दिशा की तरफ यात्रा करनी पड़े, जिस दिन वहाँ दिशाशूल हो तो यह
उपाय करके यात्रा कर लेनी चाहिए –

रविवार – दलिया और घी खाकर
सोमवार – दर्पण देख कर
मंगलवार – गुड़ खा कर
बुधवार – तिल, धनिया खा कर
गुरूवार – दही खा कर
शुक्रवार – जौ खा कर
शनिवार – अदरक अथवा उड़द की दाल खा कर

साधारणतया दिशाशूल का इतना विचार नहीं किया जाता परन्तु यदि व्यक्ति के
जीवन का अति महत्वपूर्ण कार्य है तो दिशाशूल का ज्ञान होने से व्यक्ति
मार्ग में आने वाली बाधाओं से बच सकता है आशा करते हैं कि आपके जीवन
में भी यह गायन उपयोगी सिद्ध होगा तथा आप इसका लाभ उठाकर अपने दैनिक जीवन
में सफलता प्राप्त करे।

हँस जैन रामनगर खँडवा
98272 14427