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टेढ़ी खीर मुहावरे की कथा

एक नवयुवक था. छोटे से क़स्बे का. अच्छे खाते-पीते घर का लेकिन सीधा-सादा और सरल सा. बहुत ही मिलनसार.

एक दिन उसकी मुलाक़ात अपनी ही उम्र के एक नवयुवक से हुई. बात-बात में दोनों दोस्त हो गए. दोनों एक ही तरह के थे. सिर्फ़ दो अंतर थे, दोनों में. एक तो यह था कि दूसरा नवयुवक बहुत ही ग़रीब परिवार से था और अक्सर दोनों वक़्त की रोटी का इंतज़ाम भी मुश्किल से हो पाता था. दूसरा अंतर यह कि दूसरा जन्म से ही नेत्रहीन था. उसने कभी रोशनी देखी ही नहीं थी. वह दुनिया को अपनी तरह से टटोलता-पहचानता था.

लेकिन दोस्ती धीरे-धीरे गाढ़ी होती गई. अक्सर मेल मुलाक़ात होने लगी.

एक दिन नवयुवक ने अपने नेत्रहीन मित्र को अपने घर खाने का न्यौता दिया. दूसरे ने उसे ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार किया.

दोस्त पहली बार खाना खाने आ रहा था. अच्छे मेज़बान की तरह उसने कोई कसर नहीं छोड़ी. तरह-तरह के व्यंजन और पकवान बनाए.

दोनों ने मिलकर खाना खाया. नेत्रहीन दोस्त को बहुत आनंद आ रहा था. एक तो वह अपने जीवन में पहली बार इतने स्वादिष्ट भोजन का स्वाद ले रहा था. दूसरा कई ऐसी चीज़ें थीं जो उसने अपने जीवन में इससे पहले कभी नहीं खाईं थीं.

इसमें खीर भी शामिल थी. खीर खाते-खाते उसने पूछा, “मित्र, यह कौन सा व्यंजन है, बड़ा स्वादिष्ट लगता है.”

मित्र ख़ुश हुआ. उसने उत्साह से बताया कि यह खीर है.

सवाल हुआ, “तो यह खीर कैसा दिखता है?”

“बिलकुल दूध की तरह ही. सफ़ेद.”

जिसने कभी रोशनी न देखी हो वह सफ़ेद क्या जाने और काला क्या जाने. सो उसने पूछा, “सफ़ेद? वह कैसा होता है.”

मित्र दुविधा में फँस गया. कैसे समझाया जाए कि सफ़ेद कैसा होता है. उसने तरह-तरह से समझाने का प्रयास किया लेकिन बात बनी नहीं.

आख़िर उसने कहा, “मित्र सफ़ेद बिलकुल वैसा ही होता है जैसा कि बगुला.”

“और बगुला कैसा होता है.”

यह एक और मुसीबत थी कि अब बगुला कैसा होता है यह किस तरह समझाया जाए. कई तरह की कोशिशों के बाद उसे तरक़ीब सूझी. उसने अपना हाथ आगे किया, उँगलियाँ को जोड़कर चोंच जैसा आकार बनाया और कलाई से हाथ को मोड़ लिया. फिर कोहनी से मोड़कर कहा, “लो छूकर देखो कैसा दिखता है बगुला.”

दृष्टिहीन मित्र ने उत्सुकता में दोनों हाथ आगे बढ़ाए और अपने मित्र का हाथ छू-छूकर देखने लगा. हालांकि वह इस समय समझने की कोशिश कर रहा था कि बगुला कैसा होता है लेकिन मन में उत्सुकता यह थी कि खीर कैसी होती है.

जब हाथ अच्छी तरह टटोल लिया तो उसने थोड़ा चकित होते हुए कहा, “अरे बाबा, ये खीर तो बड़ी टेढ़ी चीज़ होती है.”

वह फिर खीर का आनंद लेने लगा. लेकिन तब तक खीर ढेढ़ी हो चुकी थी. यानी किसी भी जटिल काम के लिए मुहावरा बन चुका था “टेढ़ी खीर.”

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महाकाल

एक जाने-माने स्पीकर ने हाथ में पांच सौ का नोट लहराते हुए अपनी सेमीनार शुरू की. हाल में बैठे सैकड़ों लोगों से उसने पूछा ,” ये पांच सौ का नोट कौन लेना चाहता है?” हाथ उठना शुरू हो गए.फिर उसने कहा ,” मैं इस नोट को आपमें से किसी एक को दूंगा पर उससे पहले मुझे ये कर लेने दीजिये .” और उसने नोट को अपनी मुट्ठी में चिमोड़ना शुरू कर दिया. और फिर उसने पूछा,” कौन है जो अब भी यह नोट लेना चाहता है?” अभी भी लोगों के हाथ उठने शुरू हो गए.“अच्छा” उसने कहा,” अगर मैं ये कर दूं ? ” और उसने नोट को नीचे गिराकर पैरों से कुचलना शुरू कर दिया. उसने नोट उठाई , वह बिल्कुल चिमुड़ी और गन्दी हो गयी थी.” क्या अभी भी कोई है जो इसे लेना चाहता है?”. और एक बार फिर हाथ उठने शुरू हो गए.” दोस्तों , आप लोगों ने आज एक बहुत महत्त्वपूर्ण पाठ सीखा है. मैंने इस नोट के साथ इतना कुछ किया पर फिर भी आप इसे लेना चाहते थे क्योंकि ये सब होने के बावजूद नोट की कीमत घटी नहीं,उसका मूल्य अभी भी 500 था.जीवन में कई बार हम गिरते हैं, हारते हैं, हमारे लिए हुए निर्णय हमें मिटटी में मिला देते हैं. हमें ऐसा लगने लगता है कि हमारी कोई कीमत नहीं है. लेकिन आपके साथ चाहे जो हुआ हो या भविष्य में जो हो जाए , आपका मूल्य कम नहीं होता. आप स्पेशल हैं, इस बात को कभी मत भूलिए.कभी भी बीते हुए कल की निराशा को आने वाले कल के सपनो को बर्बाद मत करने दीजिये. याद रखिये आपके पास जो सबसे कीमती चीज है, वो है आपका जीवन.”
🚩🚩🚩🚩🚩जय श्री महाकाल

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महाकाल

शहर के नज़दीक बने एक farm house में दो घोड़े रहते थे. दूर से देखने पर वो दोनों बिलकुल एक जैसे दीखते थे , पर पास जाने पर पता चलता था कि उनमे से एक घोड़ा अँधा है. पर अंधे होने के बावजूद farm के मालिक ने उसे वहां से निकाला नहीं था बल्कि उसे और भी अधिक सुरक्षा और आराम के साथ रखा था. अगर कोई थोडा और ध्यान देता तो उसे ये भी पता चलता कि मालिक ने दूसरे घोड़े के गले में एक घंटी बाँध रखी थी, जिसकी आवाज़ सुनकर अँधा घोड़ा उसके पास पहुंच जाता और उसके पीछे-पीछे बाड़े में घूमता. घंटी वाला घोड़ा भी अपने अंधे मित्र की परेशानी समझता, वह बीच-बीच में पीछे मुड़कर देखता और इस बात को सुनिश्चित करता कि कहीं वो रास्ते से भटक ना जाए. वह ये भी सुनिश्चित करता कि उसका मित्र सुरक्षित; वापस अपने स्थान पर पहुच जाए, और उसके बाद ही वो अपनी जगह की ओर बढ़ता.

दोस्तों, बाड़े के मालिक की तरह ही भगवान हमें बस इसलिए नहीं छोड़ देते कि हमारे अन्दर कोई दोष या कमियां हैं. वो हमारा ख्याल रखते हैं और हमें जब भी ज़रुरत होती है तो किसी ना किसी को हमारी मदद के लिए भेज देते हैं. कभी-कभी हम वो अंधे घोड़े होते हैं, जो भगवान द्वारा बांधी गयी घंटी की मदद से अपनी परेशानियों से पार पाते हैं तो कभी हम अपने गले में बंधी घंटी द्वारा दूसरों को रास्ता दिखाने के काम आते हैं.
🚩🚩🚩🚩🚩

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अजय वर्मा

तेलगु फिल्मों के महानायक हुआ करते थे स्व नन्दमूरी तारक रामाराव जिन्हें उनके प्रशंसक एन टी आर भी कहा करते थे। साठ के दशक में उनकी कृष्ण अर्जुन की कहानी पर फिल्म आई थी। आलम यह था कि टिकट पाने के लिए लोग घण्टों तक लाईन में लगा करते थे। वे दक्षिण भारत में भगवान की तरह पूजे जाते हैं। बहुचर्चित फिल्म बाहुबली के निर्देशक राजामौली इसी फिल्म का रिमेक बना रहे हैं। फिल्म के रिमेक में उनके पोते जूनियर एनटीआर भी काम कर रहे हैं। जूनियर एनटीआर को टीवी पर फिल्म देखने वाले कृष और जनता गैराज के हीरो के रूप में पहचानते हैं। जूनियर एनटीआर की शक्ल अपने दादा से मिलती है। प्रशंसको की मांग पर वह मात्र 16 साल की उम्र में ही फिल्में करने लगे। उनकी लगातार सात फिल्में सुपरहिट हुई थी। एनटीआर जूनियर लगभग हर फिल्म में अपने जंघे को थाप देते हैं। यह उनके दादा के स्टाइल की कापी है। फिल्म कृष के आखरी सीन में एनटीआर सीनियर भी दिखते हैं, जो कि उनकी पुरानी फिल्म की क्लिपिंग है।
अस्सी के दशक में किसी बात को लेकर वे देश की प्रधानमंत्री स्व इंदिरा गांधी से मिलने के लिए दिल्ली पहुंचे थे। तीन दिनों तक समय मिलने का इंतजार करते रहे। किन्तु श्रीमती गांधी ने उन्हें मिलने का समय ही नहीं दिया। इससे वे खूब खफा हुए। इसे उन्होंने तेलगु विडा मतलब तेलगु जनता का अपमान निरूपित किया। वापस आंध्र लौटे और तेलगु अस्मिता के नाम पर उन्होंने तेलगु देशम पार्टी बनाई। कुछ समय बाद हुए विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी प्रचंड बहुमत से जीती और वे राज्य के मुख्यमंत्री बने। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व वीपी सिंह जब जनमोर्चा पार्टी बनाकर कांग्रेस की खिलाफत कर रहे थे, तब स्व एनटीआर ने कांग्रेस विरोधी सभी पार्टियों को एकजुट कर राष्ट्रीय मोर्चा का गठन किया। राष्ट्रीय मोर्चा के वे संयोजक बनाए गए थे।
उनकी उम्र ढल रही थी और वे बीमार भी रहने लगे थे। इसी दौरान उनके दामाद चन्द्र बाबू नायडू ने उनकी पार्टी का हाईजैक कर लिया था। चंद्रबाबू नायडू आंध्र के मुख्यमंत्री भी बने। अटल सरकार के समय उन्होंने बाहर से समर्थन किया। तब उन्ही की पार्टी के स्व जीएमसी बालयोगी लोकसभा के अध्यक्ष बनाए गए थे। नरेंद्र मोदी की जब साल 2014 में सरकार आई तब भी शुरुआती दौर में सरकार का वे बाहर से समर्थन कर रहे थे। बाद में सरकार का विरोध करने लगे। अभी हुए लोकसभा चुनाव के समय भाजपा विरोधी हर पार्टी प्रमुख से मिलकर उन्होंने ना जाने क्या चर्चा की। आंध्र में लोकसभा के साथ ही विधानसभा चुनाव भी हुए। जिसमें उनकी पार्टी बुरी तरह से हार गई। इस तरह से वे ना तो घर के रहे ना तो घाट के। तेलगु अस्मिता के नाम पर उनके ससुर एनटीआर की पार्टी तेलगु देशम की साख भी वे ले डूबे।

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विजय अल्बानी

🙏 फिजूल की चिंताएँ..!! 🙏
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🙏एक फकीर को उसके सेवक जो भी सेवा में देते थे, सब कुछ शाम को बाँट देते , और रात को फिर से मालिक के भिखारी हो कर सो जाते थे।🙏

🙏यह उनकी ज़िन्दगी का शानदार और सुनहरा नियम था, एक रोज़ वो फकीर सख़्त बीमार हो गये, लेकिन फिर भी ख़ुदा की इबादत, रोज़ का भजन सिमरन नहीं छोड़ा।🙏

🙏 उनकी ये हालत देखकर उनकी बीवी ज़ोर ज़ोर से रोने लगी, फकीर ये देखकर ज़ोर से हँसने लगा , और ख़ुदा का शुक्र करने लगा ,कि ऐ मेरे शहनशाह, तुम मुझे, मेरी उम्मीद से बहुत ज़्यादा प्यार करते हो।🙏

🙏उनकी हालत देखकर हकीम ने कहा, कि अब तो मुझे इनके बचने की कोई सूरत नज़र नहीं आती है, सेवा करो और खुदा को याद करो।🙏

🙏उनकी बीवी ने सोचा कि अगर ऐसे मुश्किल वक्त में दवादारू की जरूरत पड़ी या रात को वैद्य जी को बुलाना पड़ा तो मैं क्या करूँगी , उसने ये सोच कर सेवा में आये हुए रूपयों में से पाँच दीनार बचा कर रख लिए !🙏

🙏आधी रात को फकीर तेज़ दर्द से तड़पने और छटपटाने लगे उन्होंने दर्द से कराहते हुए अपनी बीवी को बुलाया और पूछा की देखो मुझे लगता है कि मेरे जीवन भर का जो नियम था, मुझे दान का एक पैसा भी अपने पास नहीं रखना, मेरी वो प्रतिज्ञा शायद आज टूट जायेगी, वो भी मेरे आखिरी वक्त में, ऐ खुदा मुझे माफ कर देना !🙏

🙏मैंने आने वाले कल के लिए रात को कभी भी कोई इन्तज़ाम नहीं किया, बल्कि अपने ख़ुदा पे पक्का भरोसा रखा और मेरे मौला ने हमेशा मेरी लाज रखी..🙏

🙏लेकिन आज मुझे बहुत डर लग रहा है कि जैसे आज हमारे घर में दान में आये हुए, सेवा से बचे हुए कुछ रुपये रखे हैं भलीमानस अगर तूने रखे हों, तो जल्दी से तूँ उन्हें ज़रूरतमन्दों को बाँट दो।🙏

🙏नहीं तो मुझे ख़ुदा के सामने शर्मिंदा होना पड़ेगा, जब मेरा मालिक मुझसे ये पूछेगा कि, आखिरी दिन, तूने अपना भरोसा क्यूँ तोड़ दिया और कल के लिये कुछ दीनार या रूपये क्यूँ बचा लिए?🙏

🙏फकीर की बीवी घबरा कर रोने लगी और हैरान हो गई कि इन्हें कैसे पता चला!?🙏

🙏उसने जल्दी से वो पाँच दीनार जो बचाए थे, निकाल कर फकीर के आगे रख दिए और रोते हुए कहा कि मुझसे भूल हो गई!, मुझे माफ कर दीजिए, फकीर भी रोने लगा और रोते हुए बोला, खुदा के घर मे सच्चे दिल से पछतावा करते हुए माफी माँगने वालों को माफ कर दिया जाता है, जाओ मेरे खुदा ने तुझे माफ किया।🙏

🙏बीवी दोनों हाथ जोड़ कर रोते हुए बोली, जी मैने तो ये सोचकर पाँच दीनार रखे थे कि रात को अगर चार पैसों की ज़रूरत पड़ी, तो मैं ग़रीब कहाँ से लाऊँगी जी ?🙏

🙏फकीर ने दर्द में भी हँसते हुए उसे समझाया।, अरी पगली जिस खुदा ने हमें हर बार दिया है, हर रोज़ दिया है, आज तक भरपूर दिया है।🙏

🙏क्या कभी हम भूखे रहे ,क्या आज तक हमारी हर जरूरत पूरी नहीं हुई ? ज़रा सोचो, हमारा एक भी दिन उसकी रहमत के बिना या उसके प्यार के बिना गुज़रा है ?🙏

🙏जो सारी दुनिया को उनकी ज़रूरत की हर शै अगर सुबह देता है, तो साँझ को भी देता है, तो क्या वो खुदा आधी रात को नहीं दे सकेगा?🙏

🙏तू ज़रा बाहर दरवाजे पर तो जा के देख, शायद कोई ज़रूरतमन्द खड़ा हो। बीवी बोली, जी आधी रात को भला कौन मिलेगा ?🙏

🙏फकीर बोला, तुम फौरन बाहर जा कर देखो, मेरा खुदा बहुत दयालु है, वही कोई ज़रिया बनायेगा, बीवी आधे अधूरे मन से वो पाँच दीनार ले कर दरवाज़े पर गई।🙏

🙏जैसे ही उसने किवाड़ खोले, तो देखा एक याचक खड़ा था। वो बोला, बहन मुझे पाँच दीनार की सख्त जरूरत है, फकीर की बीवी ने बहुत हैरानी से अपनी आँखों को मला, कि कहीं मैं कोई सपना तो नहीं देख रही हूँ।🙏

🙏जब उसने वही पाँच चाँदी के रूपये उसे दिये तो उसने कहा, कि खुदा बहुत दयालु है, वो तुम्हारे पूरे परिवार पर अपनी दया मेहर बरसायेगा बहन। हैरान और परेशान, जब वो अपने पति को बतलाने गई, कि उसने पाँच दीनार एक ज़रूरतमन्द को दे दिये, और वो दुआऐं देता हुआ गया है।🙏

🙏फकीर ने कहा. देखो भाग्यवान देने वाला भी वही है, और लेने वाला बन कर भी वो ख़ुद ही आता है, हम तो फिज़ूल की चिन्तायें खड़ी कर लेते हैं, फिर चिंता में बुरी तरह से बँध जाते हैं।🙏

🙏फिर मोह ममता के झूठे बँधनों के टूटने से बहुत दुखी होते हैं रोते हैं,चिल्लाते हैं।🙏

🙏 अब मैं खुदा के सामने सिर उठा कर शान से कहूँगा कि मेरे प्रीतम जी, मुझे केवल एक तेरा ही सहारा था, मैंनें आखिरी साँस तक अपना प्रण निभाया है, मैने अपने सतगुरू से ये वायदा किया था, कि सारी उम्र, किसी के आगे हाथ नहीं फैलाऊँगा दाता।🙏

🙏 जिसका परमात्मा में और अपने मुर्शिद में पक्का भरोसा है उसका फिर कोई बंधन नहीं कोई दुख नहीं रहता।🙏

🙏लेकिन दुनिया वालों को परमात्मा में या अपने गुरू पर पूरा और पक्का भरोसा नहीं है , हम ज़रा विचार करें कि हमारा भरोसा किन चीजों में है। बीमा कंपनी में है, बैंकों में जमा, अपने रूपयों पर है, अपनी पत्नी में है, पति में है, परिवार में है, माता पिता में है, बेटे बेटी पर है हमारे तो कितने भरोसे हैं।🙏

🙏फकीर ने अपने मुँह पर चादर डाल ली और कहने लगे कि ऐ मेरे मौला, मुझे अपने कदमों में जगह बख्शो और इतना कह कर शाँति से सो गये। उस फकीर ने खुदा के नाम का सिमरन करते हुए चोला छोड़ दिया और मुकामे हक चला गया।🙏

🙏जैसे केवल पाँच दीनार उसके दुखों का कारण थे। उनके कारण ही वो बेचैन थे, मन पर बोझ था, बंधन था! बाँट दिये बँधन मुक्त हो गये।🙏

🙏हम जुबान से तो सारे ही कहते हैं कि हम सारे दुखों से आज़ाद होना चाहते हैं लेकिन आज़ाद होने के लिए हम जो भी कर्म करते हैं वही हमें बांध लेते हैं।🙏

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🙏 रब राखा……….🙏
🙏 सतनाम वाहेगुरु जी………..🙏

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दिनेश गोयल

विश्व का सबसे अनोखा मुकदमा ,,,,
और में ऐसे मुकदमे हर घर मे देखना भी चाहता हूं

न्यायालय में एक मुकद्दमा आया ,जिसने सभी को झकझोर दिया |अदालतों में प्रॉपर्टी विवाद व अन्य पारिवारिक विवाद के केस आते ही रहते हैं| मगर ये मामला बहुत ही अलग किस्म का था|
एक 70 साल के बूढ़े व्यक्ति ने ,अपने 80 साल के बूढ़े भाई पर मुकद्दमा किया था|
मुकद्दमे का कुछ यूं था कि “मेरा 80 साल का बड़ा भाई ,अब बूढ़ा हो चला है ,इसलिए वह खुद अपना ख्याल भी ठीक से नहीं रख सकता |मगर मेरे मना करने पर भी वह हमारी 110 साल की मां की देखभाल कर रहा है |
मैं अभी ठीक हूं, इसलिए अब मुझे मां की सेवा करने का मौका दिया जाय और मां को मुझे सौंप दिया जाय”।
न्यायाधीश महोदय का दिमाग घूम गया और मुक़दमा भी चर्चा में आ गया| न्यायाधीश महोदय ने दोनों भाइयों को समझाने की कोशिश की कि आप लोग 15-15 दिन रख लो|
मगर कोई टस से मस नहीं हुआ,बड़े भाई का कहना था कि मैं अपने स्वर्ग को खुद से दूर क्यों होने दूँ |अगर मां कह दे कि उसको मेरे पास कोई परेशानी है या मैं उसकी देखभाल ठीक से नहीं करता, तो अवश्य छोटे भाई को दे दो।
छोटा भाई कहता कि पिछले 40 साल से अकेले ये सेवा किये जा रहा है, आखिर मैं अपना कर्तव्य कब पूरा करूँगा।
परेशान न्यायाधीश महोदय ने सभी प्रयास कर लिये ,मगर कोई हल नहीं निकला|
आखिर उन्होंने मां की राय जानने के लिए उसको बुलवाया और पूंछा कि वह किसके साथ रहना चाहती है|
मां कुल 30 किलो की बेहद कमजोर सी औरत थी और बड़ी मुश्किल से व्हील चेयर पर आई थी|उसने दुखी दिल से कहा कि मेरे लिए दोनों संतान बराबर हैं| मैं किसी एक के पक्ष में फैसला सुनाकर ,दूसरे का दिल नहीं दुखा सकती|
आप न्यायाधीश हैं , निर्णय करना आपका काम है |जो आपका निर्णय होगा मैं उसको ही मान लूंगी।
आखिर न्यायाधीश महोदय ने भारी मन से निर्णय दिया कि न्यायालय छोटे भाई की भावनाओं से सहमत है कि बड़ा भाई वाकई बूढ़ा और कमजोर है| ऐसे में मां की सेवा की जिम्मेदारी छोटे भाई को दी जाती है।
फैसला सुनकर बड़ा भाई जोर जोर से रोने लगा कि इस बुढापे ने मेरे स्वर्ग को मुझसे छीन लिया |अदालत में मौजूद न्यायाधीश समेत सभी रोने लगे।
कहने का तात्पर्य यह है कि अगर भाई बहनों में वाद विवाद हो ,तो इस स्तर का हो|
ये क्या बात है कि ‘माँ तेरी है’ की लड़ाई हो,और पता चले कि माता पिता ओल्ड एज होम में रह रहे हैं |यह पाप है।
हमें इस मुकदमे से ये सबक लेना ही चाहिए कि माता -पिता का दिल दुखाना नही चाहिए।।

निवेदन है इस पोस्ट को माँ को हर जगह सम्मान मिले इसलिए #share जरूर कीजिये ….👍💐

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प्रकेशचंद्र पांडे

((((काँच की दीवार)))))

एक बार एक विज्ञान की प्रयोगशाला में एक प्रयोग किया गया। एक बड़े शीशे के टैंक में बहुत सारी छोटी छोटी मछलियाँ छोड़ी गयीं और फिर ढक्कन बंद कर दिया, अब थोड़ी देर बाद एक बड़ी शार्क मछली को भी टैंक में छोड़ा गया लेकिन शार्क और छोटी मछलियों के बीच में एक काँच की दीवार बनायीं गयी ताकि वो एक दूसरे से दूर रहें।
शार्क मछली की एक खासियत होती है कि वो छोटी छोटी मछलियों को खा जाती है। अब जैसे ही शार्क को छोटी मछलियाँ दिखाई दीं वो झपट कर उनकी ओर बढ़ी, जैसे ही शार्क मछलियों की ओर गयी वो कांच की दीवार से टकरा गयी और मछलियों तक नहीं पहुँच पायी, शार्क को कुछ समझ नहीं आया वो फिर से छोटी मछलियों की ओर दौड़ी लेकिन इस बार भी वो विफल रही, शार्क को बहुत गुस्सा आया अबकी बार वो पूरी ताकत से छोटी मछलियों पे झपटी लेकिन फिर से कांच की दीवार बाधा बन गयी।
कुछ घंटों तक यही क्रम चलता रहा, शार्क बार बार मछलियों पर हमला करती और हर बार विफल हो जाती। कुछ देर बाद शार्क को लगा कि वह मछलियों को नहीं खा सकती, यही सोचकर शार्क ने हमला करना बंद कर दिया वो थक कर आराम से पानी में तैरने लगी।
अब कुछ देर बाद वैज्ञानिक ने उस कांच की दीवार को शार्क और मछलियों के बीच से हटा दिया उन्हें उम्मीद थी कि शार्क अब सारी मछलियों को खा जाएगी, लेकिन ये क्या, शार्क ने हमला नहीं किया ऐसा लगा जैसे उसने मान लिया हो कि अब वो छोटी मछलियों को नहीं खा पायेगी, काफी देर गुजरने के बाद भी शार्क खुले टैंक में भी मछलियों पर हमला नहीं कर रही थी।
इसे कहते हैं सोच। कहीं आप भी शार्क तो नहीं? हाँ! हममें से काफी लोग उस शार्क की तरह ही हैं जो किसी कांच जैसी दीवार की वजह से ये मान बैठे हैं कि हम कुछ नहीं कर सकते, और हममें से काफी लोग तो ऐसे जरूर होंगे जो शार्क की तरह कोशिश करना भी छोड़ चुके होंगे, लेकिन सोचिये जब टैंक से दिवार हटा दी गयी फिर भी शार्क ने हमला नहीं किया क्यूंकि वो हार मान चुकी थी, कहीं आपने भी तो हार नहीं मान ली? कोई परेशानी या अवरोध हमेशा नहीं रहता , क्या पता आपकी काँच की दीवार भी हट चुकी हो लेकिन आप अपनी सोच की वजह से प्रयास ही नहीं कर रहे।
आप भी कहीं ना कहीं ये मान बैठे हैं कि मैं नहीं कर सकता। पर मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि एक दिन आपकी दीवार भी जरूर हटेगी या हट चुकी होगी। जरुरत है तो सिर्फ आपके पुनः प्रयास की। तो सोचिये मत, प्रयास करते रहिये आप जरूर कामयाब होंगे…..