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” फील्ड मार्शल जनरल करियप्पा भारत रत्न के लायक नहीं है” ( – कांग्रेस)

क्योंकि स्वतन्त्रता के बाद भी अंग्रेज सेनाध्यक्ष के अधीन रहने वाली भारतीय सेना के मुख्यालय द्वारा 6 जुलाई 1948 को “जम्मू-कश्मीर में कोई बड़ा अभियान नहीं छेड़ने ” के स्पष्ट आदेश का उल्लंघन करके उन्होंने कारगिल और लदाख पर भारत का अधिकार कराया था और उसके बाद केन्द्र सरकार की राय के विरुद्ध पाकिस्तानी सेना को श्रीनगर की सीमा से खदेड़कर जब बहुत दूर भेज दिया तो नेहरु ने UNO में मामले को लटकाकर युद्ध-विराम करा दिया, हालाँकि जनरल करियप्पा की राय थी कि पहले पूरे जम्मू-कश्मीर को स्वतन्त्र करा लें उसके बाद जहाँ जो पंचैती करानी हो कराते रहें ।

गिलगित में पाकिस्तान का झंडा फहराने का विचार वहां के लोगों का नहीं था, 2 नवम्बर 1947 को ऐसा करने का आदेश अंग्रेज अफसर मेजर ब्राउन ने दिया था क्योंकि वे जानते थे कि यदि भारत के अधीन गिलगित रहा तो वहां इंग्लैंड या अमरीका अपना फौजी अड्डा नहीं खोल पायेंगे । संसार में अमरीका का सबसे बड़ा फौजी अड्डा आज भी गिलगित में ही है, लेकिन नेहरु की बदनामी न हो इस कारण उसपर अमरीकियों ने पाकिस्तान का साइनबोर्ड लगवा दिया । अब तो उस क्षेत्र में चीनियों के भी कई सैन्य अड्डे हैं ।

1947-8 के कश्मीर युद्ध में मीरपुर में 400 हिन्दू स्त्रियों ने बलात्कार से बचने के लिए आत्महत्या कर ली, गुलाम कश्मीर में जो हिन्दू स्त्रियाँ पकड़ी गयीं उनको रावलपिंडी जैसे नगरों के वेश्यालयों में बेच दिया गया । इसी कारण जनरल करियप्पा गुलाम कश्मीर को पूरी तरह आज़ाद कराना चाहते थे, किन्तु अंग्रेजों के बहकावे में आकर नेहरु ने रोक दिया । रानी पद्मावती जौहर करे या मीरपुर की हिन्दू नारियां कूँए में डूब मरें, सेक्युलरों को क्यों दिखेगा ?
भारतीय स्रोतों को तो ये सेक्युलर लोग असत्य मानते हैं, पाश्चात्य स्रोत दिखाता हूँ : Tom Cooper ने “Indo-Pakistani War, 1947–1949” , (“Air Combat Information Group वेबसाइट, 29 October 2003) में लिखा है कि मुज़फ्फराबाद पर कबाइलियों के वेश में जब पाकिस्तानियों ने कब्जा कर लिया, जिनमें बहुत से सैनिक भी थे, तब महाराजा की सेना को पुनः तैयार होने से पहले श्रीनगर की ओर बढ़ने की बजाय वे लोग “लूटपाट और अन्य अपराध” (बलात्कार, हत्या, आदि) करने में समय गँवाते रहे !

अंग्रेजों और नहरू जैसे उनके भूरे पिट्ठूओं की योजना तो बड़ी कुशल थी, उनको पता नहीं था कि युद्ध के दौरान भी शान्तिप्रिय कौम के लोग युद्ध छोड़कर बलात्कार जैसे “शान्तिप्रिय” कार्यों में लग जायेंगे, जिस कारण पूरे कश्मीर पर पाकिस्तान का कब्जा नहीं हो सका !

गुलाम कश्मीर में कितने लाख हिन्दू मारे गए और कितनी लाख हिन्दू नारियों को नष्ट किया गया इसका कोई हिसाब नहीं है । वे हिन्दू थे, अतः शेख अब्दुला भी इस विषय पर कभी मुँह नहीं खोलते थे ।

भारतीय सेना ने जब श्रीनगर में पंहुचकर पाकिस्तानियों को खदेड़ना आरम्भ कर दिया उसके सात दिन बाद गिलगित स्काउट को पाकिस्तान के पक्ष में अंग्रेज अफसरों ने कराकर वहां पाकिस्तानी झंडा लहराया, जिस कारण जनरल करियप्पा को कारगिल और लदाख की चिन्ता हो गयी थी । उनको रोकने का प्रयास अंग्रेजों के अधीनस्थ सेना मुख्यालय और केन्द्र सरकार ने किया । गिलगित स्काउट ने कारगिल पर कब्जा भी कर लिया था और लेह के मार्ग पर की उनका कब्जा हो गया था । अतः जनरल करियप्पा यदि सेना मुख्यालय के आदेश का पालन करते तो पूरे जम्मू कश्मीर का बहुत छोटा हिस्सा भारत के पास बचता और तब पाकिस्तान का दावा और भी मजबूत हो जाता, वे कहते के अधिकाँश हमारे पास है अतः बचा-खुचा भी दे दो ।

देश के विभाजन के समय भी जनरल करियप्पा ने कहा था कि सेना का विभाजन नहीं होना चाहिए ! इसका अर्थ यह था कि पाकिस्तान को नए सिरे से अपनी सेना बनानी पड़ती ! लेकिन हुक्मरानों ने उनकी नहीं सुनी ।

सुभाष चन्द्र बसु की आज़ाद हिन्द सेना के साथ बेहतर व्यवहार करने की वकालत भी उन्होंने की थी । बाद में सेनाध्यक्ष बनने पर आज़ाद हिन्द फ़ौज के नारे “जय हिन्द” को उन्होंने भारतीय सेना का नारा बना दिया ।

यही कारण था कि नेहरु सरकार ने करियप्पा महोदय को सेनाध्यक्ष बनने से रोकने का पूरा प्रयास किया । जनवरी 1949 में नेहरु के रक्षा मन्त्री बलदेव सिंह ने अन्य दो अफसरों श्रीनागेश और नाथूसिंह को बारी-बारी से सेनाध्यक्ष बनने के लिए कहा, परन्तु उन दोनों ने सेनाध्यक्ष बनने से इनकार कर दिया क्योंकि वे जानते थे कि जनरल करियप्पा सेवा में वरिष्ठतम और सर्वाधिक कुशल हैं । वे यह भी जानते थे कि जनरल करियप्पा के कारण ही पूरे कश्मीर पर पाकिस्तान का कब्जा नहीं हो सका, और वे यह भी जानते थे कि रणनीति एवं सैन्य-संचालन में जनरल करियप्पा से कोई भी अफसर मुकाबला नहीं कर सकता । कश्मीर मोर्चे में जनरल करियप्पा ने क्या-क्या किया और उनसे पहले भारतीय सेना के ब्रिटिश सेनाध्यक्ष किस प्रकार कश्मीर पर पाकिस्तान का कब्जा कराने का षड्यन्त्र रच रहे थे यह बड़ी लम्बी कहानी है । मीडिया जानती है लेकिन बतायेगी नहीं ।

नाथूसिंह ने सरकार को स्पष्ट कहा था कि सेनाध्यक्ष बनने लायक केवल करियप्पा जी हैं । तब नेहरु किसी अंग्रेज को सेनाध्यक्ष बनाने की बात करने लगे, जिसपर नाथूसिंह ने ऐसा जवाब दिया जो नेहरु को पूरे जीवन में किसी ने नहीं दिया होगा !! नेहरु ने कहा था कि भारतीयों को सेनाध्यक्ष बनने का अनुभव नहीं है, अतः किसी अंग्रेज को ही यह भार मिलना चाहिए । इसपर नाथूसिंह ने जवाब दिया — “जी सर, भारतीयों को प्रधानमन्त्री बनने का भी अनुभव नहीं है, इंग्लैंड से किसी अनुभवी को बुलाया जाय !!” तब जाकर जनरल करियप्पा कमांडर-इन-चीफ बन सके !!

इन सब “अपराधों” के कारण आज भी कांग्रेस मानती है कि जनरल करियप्पा भारत-रत्न के अधिकारी नहीं है, केवल नेहरु वंश के लोग ही इस लायक हैं ! कांग्रेस की चले तो सोनिया गांधी को भारत रत्न और राष्ट्रमाता बना दें !

(इस आलेख में  फील्ड मार्शल जनरल करियप्पा के सभी महत्वपूर्ण कार्यों का उल्लेख नहीं है, केवल उन कार्यों का उल्लेख है जिनके कारण आज भी कांग्रेस उनसे चिढ़ी हुई है)
संजय द्विवेदी

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भीम हनुमानजी प्रसंग – जानिए क्यों विराजित हुए हनुमानजी अर्जुन के रथ के छत्र पर?

धर्म ग्रंथो के अनुसार हनुमानजी और भीम भाई है क्योंकि दोनों ही पवन देवता के पुत्र है। महाभारत में एक प्रसंग आता है जब भीम और हनुमान की मुलाक़ात होती है। आज हम आपको वोही प्रसंग विस्तारपूर्वक बता रहे है। साथ ही इस प्रसंग का सम्बन्ध उस मान्यता से भी है जिसके अनुसार महाभारत युद्ध में श्रीकृष्ण, अर्जुन के जिस रथ के सारथी बने थे उस रथ के छत्र पर स्वयं हनुमानजी विराजित थे। इसलिए आज भी अर्जुन के रथ की पताका में हनुमानजी को दर्शाया जाता है। तो आइए जानते है क्या है ये प्रसंग ?

भीम-हनुमानजी प्रसंग

वनवास के दौरान पांडव जब बदरिकाश्रम में रह रहे थे तभी एक दिन वहां उड़ते हुए एक सहस्त्रदल कमल आ गया। उसकी गंध बहुत ही मनमोहक थी। उस कमल को द्रौपदी ने देख लिया। द्रौपदी ने उसे उठा लिया और भीम से कहा- यह कमल बहुत ही सुंदर है। मैं यह कमल धर्मराज युधिष्ठिर को भेंट करूंगी। अगर आप मुझसे प्रेम करते हैं तो ऐसे बहुत से कमल मेरे लिए लेकर आइये।

द्रौपदी के ऐसा कहने पर भीम उस दिशा की ओर चल दिए, जिधर से वह कमल उड़ कर आया था। भीम के चलने से बादलों के समान भीषण आवाज आती थी, जिससे घबराकर उस स्थान पर रहने वाले पशु-पक्षी अपना आश्रय छोड़कर भागने लगे।

कमल पुष्प की खोज में चलते-चलते भीम एक केले के बगीचे में पहुंच गए। यह बगीचा गंधमादन पर्वत की चोटी पर कई योजन लंबा-चौड़ा था। भीम नि:संकोच उस बगीचे में घुस गए। इस बगीचे में भगवान श्रीहनुमान रहते थे। उन्हें अपने भाई भीमसेन के वहां आने का पता लग गया।

हनुमानजी ने सोचा कि यह मार्ग भीम के लिए उचित नहीं है। यह सोचकर उनकी रक्षा करने के विचार से वे केले के बगीचे में से होकर जाने वाले सकड़े मार्ग को रोककर लेट गए।

चलते-चलते भीम को बगीचे के सकड़े मार्ग पर लेटे हुए वानरराज हनुमान दिखाई दिए। उनके ओठ पतले थे, जीभ और मुंह लाल थे, कानों का रंग भी लाल-लाल था, भौंहें चंचल थीं तथा खुले हुए मुख में सफेद, नुकीले और तीखे दांत और दाढ़ें दिखती थीं। बगीचे में इस प्रकार एक वानर को लेटे हुए देखकर भीम उनके पास पहुंचे और जोर से गर्जना की।

हनुमानजी ने अपने नेत्र खोलकर उपेक्षापूर्वक भीम की ओर देखा और कहा – तुम कौन हो और यहां क्या कर रहे हो। मैं रोगी हूं, यहां आनंद से सो रहा था, तुमने मुझे क्यों जगा दिया। यहां से आगे यह पर्वत अगम्य है, इस पर कोई नहीं चढ़ सकता। अत: तुम यहां से चले जाओ।

हनुमानजी की बात सुनकर भीम बोले- वानरराज। आप कौन हैं और यहां क्या कर रहे हैं? मैं तो चंद्रवंश के अंतर्गत कुुरुवंश में उत्पन्न हुआ हूं। मैंने माता कुंती के गर्भ से जन्म लिया है और मैं महाराज पाण्डु का पुत्र हूं। लोग मुझे वायुपुत्र भी कहते हैं। मेरा नाम भीम है।

भीम की बात सुनकर हनुमानजी बोले- मैं तो बंदर हूं, तुम जो इस मार्ग से जाना चाहते हो तो मैं तुम्हें इधर से नहीं जाने दूंगा। अच्छा तो यही हो कि तुम यहां से लौट जाओ, नहीं तो मारे जाओगे।

यह सुनकर भीम ने कहा – मैं मरुं या बचूं, तुमसे तो इस विषय में नहीं पूछ रहा हूं। तुम उठकर मुझे रास्ता दो।

हनुमान बोले- मैं रोग से पीडि़त हूं, यदि तुम्हें जाना ही है तो मुझे लांघकर चले जाओ।

भीम बोले- संसार के सभी प्राणियों में ईश्वर का वास है, इसलिए मैं तुम्हारा लंघन कर परमात्मा का अपमान नहीं करुंगा। यदि मुझे परमात्मा के स्वरूप का ज्ञान न होता तो मैं तुम्ही को क्या, इस पर्वत को भी उसी प्रकार लांघ जाता जैसे हनुमानजी समुद्र को लांघ गए थे।

हनुमानजी ने कहा- यह हनुमान कौन था, जो समुद्र को लांघ गया था? उसके विषय में तुम कुछ कह सकते हो तो कहो।

भीम बोले- वे वानरप्रवर मेरे भाई हैं। वे बुद्धि, बल और उत्साह से संपन्न तथा बड़े गुणवान हैं और रामायण में बहुत ही विख्यात हैं। वे श्रीरामचंद्रजी की पत्नी सीताजी की खोज करने के लिए एक ही छलांग में सौ योजन बड़ा समुद्र लांघ गए थे। मैं भी बल और पराक्रम में उन्हीं के समान हूं। इसलिए तुम खड़े हो जाओ मुझे रास्ता दो। यदि मेरी आज्ञा नहीं मानोगे तो मैं तुम्हें यमपुरी पहुंचा दूंगा।

भीम की बात सुनकर हनुमानजी बोले- हे वीर। तुम क्रोध न करो, बुढ़ापे के कारण मुझमें उठने की शक्ति नहीं है इसलिए कृपा करके मेरी पूंछ हटाकर निकल जाओ।

यह सुनकर भीम हंसकर अपने बाएं हाथ से हनुमानजी पूंछ उठाने लगे, किंतु वे उसे टस से मस न कर सके। फिर उन्होंने दोनों हाथों से पूंछ उठाने का  प्रयास किया लेकिन इस बार भी वे असफल रहे। तब भीम लज्जा से मुख नीचे करके वानरराज के पास पहुंचे और कहा- आप कौन हैं? अपना परिचय दीजिए और मेरे कटु वचनों के लिए मुझे क्षमा कर दीजिए।

तब हनुमानजी ने अपना परिचय देते हुए कहा कि इस मार्ग में देवता रहते हैं, मनुष्यों के लिए यह मार्ग सुरक्षित नहीं है, इसीलिए मैंने तुम्हें रोका था। तुम जहां जाने के लिए आए हो, वह सरोवर तो यहीं है।

हनुमानजी की बात सुनकर भीम बहुत प्रसन्न हुए और बोले- आज मेरे समान कोई भाग्यवान नहीं है। आज मुझे अपने बड़े भाई के दर्शन हुए हैं। किंतु मेरी एक इच्छा है, वह आपको अवश्य पूरी करनी होगी। समुद्र को लांघते समय आपने जो विशाल रूप धारण किया था, उसे मैं देखना चाहता हूं।

भीम के ऐसा कहने पर हनुमानजी ने कहा- तुम उस रूप को नहीं देख सकते और न कोई अन्य पुरुष उसे देख सकता है। सतयुग का समय दूसरा था और त्रेता और द्वापर का भी दूसरा है। काल तो निरंतर क्षय करने वाला है, अब मेरा वह रूप है ही नहीं।

तब भीमसेन ने कहा- आप मुझे युगों की संख्या और प्रत्येक युग के आचार, धर्म, अर्थ और काम के रहस्य, कर्मफल का स्वरूप तथा उत्पत्ति और विनाश के बारे में बताइए।

भीम के आग्रह पर हनुमानजी ने उन्हें कृतयुग, त्रेतायुग फिर द्वापरयुग व अंत में कलयुग के बारे में बताया।
हनुमानजी ने कहा कि- अब शीघ्र ही कलयुग आने वाला है। इसलिए तुम्हें जो मेरा पूर्व रूप देखना है, वह संभव नहीं है।

हनुमानजी की बात सुनकर भीम बोले- आपके उस विशाल रूप को देखे बिना मैं यहां से नहीं जाऊंगा। यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा है तो मुझे उस रूप में दर्शन दीजिए।

भीम के इस प्रकार कहने पर हनुमानजी ने अपना विशाल रूप दिखाया, जो उन्होंने समुद्र लांघते समय धारण किया था। हनुमानजी के उस रूप के सामने वह केलों का बगीचा भी ढंक गया। भीमसेन अपने भाई का यह रूप देखकर आश्चर्यचकित हो गए।

फिर भीम ने कहा- हनुमानजी। मैंने आपके इस विशाल रूप को देख लिया है। अब आप अपने इस स्वरूप को समेट लीजिए। आप तो उगते हुए सूर्य के समान हैं, मैं आपकी ओर देख नहीं सकता।

भीम के ऐसा कहने पर हनुमानजी अपने मूल स्वरूप में आ गए और उन्होंने भीम को अपने गले से लगा लिया। इससे तुरंत ही भीम की सारी थकावट दूर हो गई और सब प्रकार की अनुकूलता का अनुभव होने लगा।

गले लगाने के बाद हनुमानजी भीमसेन से कहा कि- भैया भीम। अब तुम जाओ, मैं इस स्थान पर रहता हूं- यह बात किसी से मत कहना। भाई होने के नाते तुम मुझसे कोई वर मांगो। तुम्हारी इच्छा हो तो मैं हस्तिनापुर में जाकर धृतराष्ट्र पुत्रों को मार डालूं या पत्थरों से उस नगर को नष्ट कर दूं अथवा दुर्योधन को बांधकर तुम्हारे पास ले आऊं। तुम्हारी जैसी इच्छा हो, उसे मैं पूर्ण कर सकता हूं।
हनुमानजी बात सुनकर भीम बड़े प्रसन्न हुए और बोले- हे वानरराज। आपका मंगल हो। आपने जो कहे हैं वह काम तो होकर ही रहेंगे। बस, आपकी दयादृष्टि बनी रहे- यही मैं चाहता हूं।

भीम के ऐसा कहने पर हनुमानजी ने कहा- भाई होने के नाते मैं तुम्हारा प्रिय करूंगा। जिस समय तुम शत्रु सेना में घुसकर सिंहनाद करोगे, उस समय मैं अपने शब्दों से तुम्हारी गर्जना को बढ़ा दूंगा तथा अर्जुन के रथ की ध्वजा पर बैठा हुआ ऐसी भीषण गर्जना करुंगा, जिससे शत्रुओं के प्राण सूख जाएंगे और तुम उन्हें आसानी से मार सकोगे। ऐसा कहकर हनुमानजी ने भीमसेन को मार्ग दिखाया और अंतर्धान हो गए।
संजय गुप्ता

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🐚मानसी सेवा🐚
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<p>★ भगवान का स्मरण यानि स्मरण भक्ति की बहूत महिमा है– स्मरण भक्ति मे प्रभु का ध्यान करने से एक दिन एसी स्थिति आ जाती है की अगर भाव मे प्रभु के साथ लीला करते हूए या मानसिक रुप से भोग लगाते हूए कोई वस्तु प्रभु को दी जाए तो प्रभु उस वस्तु को स्वीकार कर लेते है।★</p>
<p> बहुत सुंदर भाव,,,,,बड़े प्यार से पढ़े,,,,,<br>
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एक बार एक बनिया गोसाई जी के पास जाकर बोला-महाराज! मैं प्रभु सेवा तो करना चाहता हुँ किंतु एक भी पैसा के खर्च के बिना सेवा हो सके ऐसा मार्ग बताइए।

तो गोसाई जी ने मानसी सेवा का मार्ग बताते हुए, उस बनिये से कहा- तू मानसी सेवा बिना ख़र्च के कर सकेगा।
केवल मन से संकल्प करते रहना की मै भगवान को स्नान करा रहा हुँ वस्त्र पहनना रहा हूं ,पूजा कर रहा हूँ, भोग लगा रहा हूँ, भगवान भोजन कर रहे हैं,आदि।

फिर गोसाई जी ने उससे पूछा-
तुझे भगवान जी का कौन- सा स्वरूप अधिक प्रिय हैं !
बनिये ने उत्तर दिया मुझे भगवानजी का बालकृष्ण स्वरूप अधिक प्रिय हैं।

गोसाई जी ने कहा–प्रातः काल मे ऐसी भावना कर की ठाकुरजी के लिए यमुना जल ले आया हूँ। यशोदा जी जैसी भावना रखकर बाल स्वरूप की सेवा करना।

बाल स्वरूप में वात्सल्यभाव मुख्य है। सेवा में दूध और माखन लाना। ठाकुर जी को मंगलगीत गाकर जगाना।

।। जागो बंसीवारे ललना मोरे प्यारे।।
।। रजनी बीती भोर भयो हैं।।
।। घर घर खुले किवारे।।

यशोदा जी लाला को मनाती थी कि इतना माखन खा लेगा तेरी चोटी दाऊजी से भी जल्दी बढ़ेगी फिर ठाकुरजी का श्रृंगार करना। कान्हा से पूछना की आज वो कौन सा पीताम्बर पहनेगा।

कान्हा जो कहें,वह पीताम्बर पहनाना। श्रृंगार में तन्मयता होने पर बह्मनन्द-सा आनंद प्राप्त होता हैं।

गोसाईजी द्वारा बताई गई रीति के अनुसार बनिया श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की मानसी सेवा करने लगा। प्रतिदिन प्रेम से मानसी सेवा करने लगा।

वह इतना तन्मय होने लगा कि सभी वस्तुएं प्रत्यक्ष दिखने लगीं।

इस सेवा में मन की धारा टूटनी नही चाहिए कोई लौकिक विचार आये तो समझलो सेवा खण्डित हो गई। बाहर वर्षो तक उसने मानसी सेवा की।

अब एक दिन वह दूध लाया और उसमें चीनी डाली किन्तु उसे लगा कि लाला के दूध में असज चीनी अधिक पड़ गई हैं।बनिया यह कैसे सह सकता था…?
स्वभाव सहज कृपणता कैसे मिट सकती हैं….?

प्राण और प्रकृति साथ-साथ ही तो जाते है उसने सोचा जरूरत से अधिक चीनी पड़ गई है उसे निकाल लूँ ,कभी दूसरे काम मे उपयोगी होगीं।

अब यहाँ ना दूध हैं ना बर्तन और न ही चीनी।

क्योंकि वह तो मानसी सेवा ही करता था,ना। फिर भी तन्मयता के कारण उसे ये सारी चीजें वस्तुएं प्रत्यक्ष दिखाई देती थीं।अतः मन ही मन कल्पना में चीनी को निकालने लगा।

ठाकुर जी ने सोचा कि जैसा भी हो किन्तु इस बनिये ने मेरा बाहर वर्षों तक मानसी सेवा की है अतः उन्हें प्रकट होने की इच्छा हुई।

बालकृष्ण प्रसन्न हुये थे। उन्होंने ने प्रकट होकर बनिये का हाथ पकड़ा औऱ कहा कि चीनी अधिक है तो क्या हुआ?तूने एक पैसे का खर्च तो नही किया हैं।

भगवत-स्पर्श होने से बनिया सच्चा वैष्णव बन गया। वह भगवान का अनन्य सेवक बन गया। बाहर वर्षों तक जो भी सत्कर्मों नियमपूर्वक किया जाए उस का फल अवश्य मिलता हैं।

शंकराचार्य भी मानसी सेवा करते थे। भरतजी मानसी सेवा किया करते हुए तन्मय हुए है।

🌻जय हो बाल गोपाला🌻
🌻जय जय श्री राधे श्याम 🌻
🌻जय श्री राधे राधे 🌻

संजय गुप्ता

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ऋषि दुर्वासा एवं  विष्णु भक्त राजा अंबरीष की कथा,,,,,

  • जो अपराधु भगत कर करई। राम रोष पावक सो जरई॥
    लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा। यह महिमा जानहिं दुरबासा॥

भावार्थ:- जो कोई उनके भक्त का अपराध करता है, वह श्री राम की क्रोधाग्नि में जल जाता है। लोक और वेद दोनों में इतिहास (कथा) प्रसिद्ध है। इस महिमा को दुर्वासाजी जानते हैं॥

प्राचीन समय की बात है। राजा नाभाग के अंबरीष नामक एक प्रतापी पुत्र थे। वे बड़े बीर, बुद्धिमान व तपस्वी राजा थे। वे जानते थे कि जिस धन-वैभव के लोभ में पड़कर प्राणी घोर नरक में जाते हैं वह कुछ ही दिनों का सुख है, इसलिए उनका मन सदैव भगवत भक्ति व दीनों की सेवा में लगा रहता था। राज्याभिषेक के बाद राजा अंबरीष ने अनेक यज्ञ करके भगवान विष्णु की पूजा-उपासना की जिन्होंने प्रसन्न होकर उनकी रक्षा के लिए अपने ‘सुदर्शन चक्र’ को नियुक्त कर दिया।

एक बार अंबरीष ने अपनी पत्नी के साथ द्वादशी प्रधान एकादशी व्रत करने का निश्चय किया। उन्होंने भगवान विष्णु का पूजन किया और ब्राह्मणों को अन्न-धन का भरपूर दान दिया। तभी वहाँ दुर्वासा ऋषि का आगमन हो गया। वे परम तपस्वी व अलौकिक शक्तियों से युक्त थे किंतु क्रोधी स्वभाव के कारण उनकी सेवा-सुश्रुसा में विशेष सावधानी अपेक्षित थी।

अंबरीष ने उनका स्वागत किया और उन्हें श्रेष्ठ आसन पर बिठाया। तत्पश्चात् दुर्वासा ऋषि की पूजा करके उसने प्रेमपूर्वक भोजन ग्रहण करने का आग्रह किया। दुर्वासा ऋषि ने उनका आग्रह स्वीकार कर लिया। किंतु भोजन से पूर्व नित्य कर्मों से निवृत्त होने के लिये वे यमुना नदी के तट पर चले गये। वे परब्रह्म का ध्यान कर यमुना के जल में स्नान करने लगे।

इधर द्वादशी केवल कुछ ही क्षण शेष रह गयी थी। स्वयं को धर्मसंकट में देख राजा अम्बरीष ब्राह्मणों से परामर्श करते हुए बोले – “मान्यवरों ! ब्राह्मण को बिना भोजन करवाए स्वयं खा लेना और द्वादशी रहते भोजन न करना – दोनो ही मनुष्य को पाप का भागी बनाते हैं। इसलिये इस समय आप मुझे ऐसा उपाय बताएँ, जिससे कि मैं पाप का भागी न बन सकूँ।”

ब्राह्मण बोले – “राजन ! शास्त्रों मे कहा गया है कि पानी भोजन करने के समान है भी और समान नहीं भी है। इसलिये इस समय आप जल पी कर द्वादशी का नियम पूर्ण कीजिये।” यह सुनकर अंबरीष ने जल पी लिया और दुर्वासा ऋषि की प्रतीक्षा करने लगे।

जब दुर्वासा ऋषि लौटे तो उन्होंने तपोबल से जान लिया कि अंबरीष भोजन कर चुके हैं। अत: वे क्रोधित हो उठे और कटु स्वर में बोले – “ दुष्ट अंबरीष ! तू धन के मद में चूर होकर स्वयं को बहुत बड़ा मानता है। तूने मेरा तिरस्कार किया है। मुझे भोजन का निमंत्रण दिया लेकिन मुझसे पहले स्वयं भोजन कर लिया। अब देख मैं तुझे तेरी दुष्टता का दंड देता हूँ।”

क्रोधित दुर्वासा ने अपनी एक जटा उखाड़ी और अंबरीष को मारने के लिए एक भयंकर और विकराल कृत्या उत्पन्न की। कृत्या तलवार लेकर अंबरीष की ओर बढ़ी किंतु वे बिना विचलित हुए मन ही मन भगवान विष्णु का स्मरण करते रहे। जैसे ही कृत्या ने उनके ऊपर आक्रमण करना चाहा; अंबरीष का रक्षक सुदर्शन चक्र सक्रिय हो गया और पल भर में उसने कृत्या को जलाकर भस्म कर दिया।

जब दुर्वासा ऋषि ने देखा कि कि चक्र तेजी से उन्हीं की ओर बढ़ रहा है तो वे भयभीत हो गये। अपने प्राणों की रक्षा के लिए वे आकाश, पाताल,पृथ्वी,समुद्र, पर्वत, वन आदि अनेक स्थानों पर शरण लेने गये किंतु सुदर्शन चक्र ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। घबराकर उन्होंने ब्रह्मा जी से रक्षा की गुहार लगायी।

ब्रह्मा जी प्रकट हुए किंतु असमर्थ होकर बोले, “वत्स, भगवान विष्णु द्वारा बनाये गये नियमों से मैं बँधा हुआ हूँ। प्रजापति, इंद्र, सूर्य आदि सभी देवगण भी इन नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकते। हम नारायण की आज्ञा के अनुसार ही सृष्टि के प्राणियों का कल्याण करते हैं। इस प्रकार भगवान विष्णु के भक्त के शत्रु की रक्षा करना हमारे वश में नहीं है।”

ब्रह्माजी की बातों से निराश होकर दुर्वासा ऋषि भगवान शंकर की शरण में गये। पूरा वृत्तांत सुनने के बाद महादेव जी ने उन्हें समझाया, “ऋषिवर ! यह सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का शस्त्र है जो उनके भक्तजन की रक्षा करता है। इसका तेज सभी के लिए असहनीय है। अतः उचित होगा कि आप स्वयं भगवान विष्णु की शरण में जाएँ। केवल वे ही इस दिव्य शस्त्र से आपकी रक्षा कर सकते हैं और आपका मंगल हो सकता है।”

वहाँ से भी निराश होकर दुर्वासा ऋषि भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे और उनके चरणों में सिर नवाकर दया की गुहार लगायी। आर्त स्वर में दुर्वासा बोले, “भगवन मैं आपका अपराधी हूँ। आपके प्रभाव से अनभिज्ञ होकर मैंने आपके परम भक्त राजा अंबरीष को मारने का प्रयास किया। हे दयानिधि, कृपा करके मेरी इस धृष्टता को क्षमा कर मेरे प्राणों की रक्षा कीजिए।”

भगवान नारायण ने दुर्वासा ऋषि को उठाया और समझाया, “मुनिवर ! मैं सर्वदा भक्तों के अधीन हूँ। मेरे सीधे-सादे भक्तों ने अपने प्रेमपाश में मुझे बाँध रखा है। भक्तों का एकमात्र आश्रय मैं ही हूँ। अतः मैं स्वयं अपने व देवी लक्ष्मी से भी बढ़कर अपने भक्तों को चाहता हूँ। जो भक्त अपने बंधु-बांधव और समस्त भोग-विलास त्यागकर मेरी शरण में आ गये हैं उन्हें किसी प्रकार छोड़ने का विचार मैं कदापि नहीं कर सकता। यदि आप इस विपत्ति से बचना चाहते हैं तो मेरे परम भक्त अंबरीष के पास ही जाइए। उसके प्रसन्न होने पर आपकी कठिनाई अवश्य दूर हो जाएगी।”

नारायण की सलाह पाकर दुर्वासा अंबरीष के पास पहुँचे और अपने अपराध के लिए क्षमा माँगने लगे। परम तपस्वी महर्षि दुर्वासा की यह दुर्दशा देखकर अंबरीष को अत्यंत दुख हुआ। उन्होंने सुदर्शन चक्र की स्तुति की और प्रार्थना पूर्वक आग्रह किया कि वह अब लौट जाय। उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर सुदर्शन चक्र ने अपनी दिशा बदल ली और दुर्वासा ऋषि को भयमुक्त कर दिया।

जबसे दुर्वासा ऋषि वहाँ से गये थे तबसे राजा अम्बरीष ने भोजन ग्रहण नहीं किया था। वे ऋषि को भोजन कराने की प्रतीक्षा करते रहे। उनके लौटकर आ जाने व भयमुक्त हो जाने के बाद अम्बरीष ने सबसे पहले उन्हें आदर पूर्वक बैठाकर उनकी विधि सहित पूजा की और प्रेम पूर्वक भोजन कराया। राजा के इस व्यवहार से ऋषि दुर्वासा अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें अनेकशः आशीर्वाद देकर वहाँ से विदा हुए।
संजय गुप्ता

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मै अपनी झाँसी नहीं दूँगी:
विनायक दामोदर सावरकर लिखते है -” संसार के सामने दृढ़तापूर्वक कहा गया ‘नहीं’ शब्द बहुत कम आया है | भारत के उदारमना लोगो के मुह से अब तक यही एक शब्द सुनाई देता आया है ‘मै दूँगा’ किन्तु लक्ष्मीबाई ने यह विलक्षण जयघोष किया – ‘ मै अपनी झाँसी नहीं दूँगी ‘ | काश यह आवाज भारत के हर मुँह से गूँजी होती ”
इतिहास के पन्नो मे अमिट एवं हिंदुस्तान की स्वतन्त्रता संग्राम की वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई का जन्म 19 नवम्बर 1835 को काशी मे हुआ था। इनके बचपन का नाम मनुबाई था मनुबाई के पिता का नाम मोरोपंत तांबे एवं माता का नाम भगीरथी बाई था। इनके पिता महाराष्ट्र मे बाजीराव पेशवा के यहाँ कार्यरत थे सान 1818 मे जब अंग्रेज़ो ने पेशवा पदवी खत्म की तो मोरोपंत तांबे पेशवा के भाई के साथ बनारस आ गए जबकि पेशवा बिठूर चले गए। पेशवा के भाई की मृत्यु के बाद मोरोपंत भी बिठुर आ गए। चार वर्ष की ही अल्पायु मे मनुबाई की माता का देहांत हो गया॥ बाजीराव पेशवा की कोई संतान नहीं थी अतः उन्होने नाना घोडूपंत नाम के बालक को गोंद ले लिया यही बालक नाना के नाम से प्रसिद्ध हुआ॥ मनुबाई के बचपन के मित्र नाना थे और इनके पसंद के खेल तलवारबाजी बंदूक चलाना घुड़सवारी कुश्ती। मनुबई बेहद हठी और चंचल बालिका थी एवं इनके शौक बालको एवं योद्धाओं जैसे थे । इनके सुंदर चेहरे के कारण इन्हे लोग प्यार से छबीली बुलाते थे मगर स्वयं मनुबाई को ये नाम पसंद नहीं था।
झाँसी के प्रकांड विद्वान तात्या दीक्षित एक बार बीठूर बाजीराव पेशवा से मिलने आए ।मनुबाई को देख झाँसी नरेश एवं मनुबाई के रिश्ते के लिए दीक्षित ने मध्यस्थता की । जब रिश्ता तय हो रहा था उस समय मनुबाई अन्य बालिकाओं से इतर अक्सर इस बात की चर्चा करती रहती की झाँसी की सेना कितनी बड़ी है क्या हम इस सेना की सहायता से अंग्रेज़ो से अपना राजी वापस ले सकते हैं॥ उनकी इस बात को बाजीराव और उनके पिता मोरोपांत बाल विनोद समझकर भुला देते थे । विवाह की शर्तों पर चर्चा के लिए झासी के राजा एवं बिठूर के पुरोहितो की वार्ता मे निर्णय ये हुआ की विवाह का पूरा खर्च झासी नरेश उठाएंगे और मोरोपांत स्थायी रूप से झसी मे बस जाएंगे तथा उनकी गिनती झाँसी के सरदारो मे होगी।
विवाह के बाद मनुबाई झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई के रूप मे प्रसिद्ध हुई । गंगाधर एक निर्दयी शासक के रूप मे आलोकप्रिय होते जा रहे थे उसी समय अङ्ग्रेज़ी कंपनी ने झांसी राज्य को एक संधि करने के लिए विवश किया जिसके अनुसार अङ्ग्रेज़ी सेना झाँसी के खर्चे पर झाँसी मे रहेगी तथा एक क्षेत्र कंपनी के अधिकार मे दे दिया जाएगा । इस समझौते से झाँसी का नुकसान हुआ मगर गंगाधर को अब शासन के अधिकार को अंग्रेज़ो ने मान्यता दे दी ।
लक्ष्मी बाई को ये पसंद नहीं आया मगर राज्य का अधिकार गंगाधर के पास था । साल बाद रानी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई मगर काल के क्रूर पंजो के कारण पुत्र की जल्द मृत्यु हो गयी । राजा का स्वास्थ्य भी गिर रहा था,सन1853 मे रानी ने एक दत्तक पुत्र दामोदर को गोद लेने का प्रयास किया जिससे राजा का स्वास्थ्य सुधरे और झाँसी को वारिस मिले ॥राजा ने कंपनी के पुलिस कप्तान मार्टिन को इस नए परिवर्तन और राजी के उत्तराधिकारी के बारे मे सूचित किया । ठीक उसी समय राजा की तबीयत बिगड़ी और उनका स्वर्गवास हो गया । राजा के स्वर्गवास के समय अंग्रेज़ो ने झाँसी के अतिरिक्त लगभग सारे हिस्सो पर अधिकार कर लिया था अब उनकी कुटिल नजर झाँसी पर थी ॥ नाना ,तात्या टोपे और लक्ष्मीबाई ने आते हुए खतरो को भाप कर मृतप्राय हो चुके राजाओं को संगठित करना शुरू किया ।
इसी समय अंग्रेज़ो से नबाब अली बहादुर और खुदाबक्स नाम के दो सरदारो को अंग्रेज़ो ने अपनी ओर मिला लिया एवं रानी के दत्तक पुत्र दामोदर राव को मान्यता न देते हुये झाँसी पर अधिकार का दावा कर दिया॥ इसी समय भारत मे स्वतन्त्रता संग्राम मंगल पांडे के विद्रोह से शुरू हो गया ।14 मार्च, 1857 से आठ दिन तक तोपें किले से आग उगलती रहीं। अंग्रेज सेनापति ह्यूरोज लक्ष्मीबाई की किलेबंदी देखकर दंग रह गया। रानी रणचंडी का साक्षात रूप रखे पीठ पर दत्तक पुत्र दामोदर राव को बांधे भयंकर युद्ध करती रहीं. झांसी की मुट्ठी भर सेना ने रानी को सलाह दी कि वह कालपी की ओर चली जाएं। झलकारी बाई और मुंदर सखियों ने भी रणभूमि में अपना खूब कौशल दिखाया. अपने विश्वसनीय चार-पांच घुड़सवारों को लेकर रानी कालपी की ओर बढ़ीं. अंग्रेज सैनिक रानी का पीछा करते रहे। कैप्टन वाकर ने उनका पीछा किया और उन्हें घायल कर दिया।
22 मई, 1857 को क्रांतिकारियों को कालपी छोड़कर ग्वालियर जाना पड़ा। 17 जून को फिर युद्ध हुआ. रानी के भयंकर प्रहारों से अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा। महारानी की विजय हुई, लेकिन 18 जून को ह्यूरोज स्वयं युद्धभूमि में आ डटा। लक्ष्मीबाई ने दामोदर राव को रामचंद्र देशमुख को सौंप दिया। सोनरेखा नाले को रानी का घोड़ा पार नहीं कर सका। वहीं एक सैनिक ने पीछे से रानी पर तलवार से ऐसा जोरदार प्रहार किया कि उनके सिर का दाहिना भाग कट गया और आंख बाहर निकल आई। घायल होते हुए भी उन्होंने उस अंग्रेज सैनिक का काम तमाम कर दिया। रानी के विश्वस्त गुलमुहम्मद और रघुनाथ सिंह रानी को उस हालत मे बाबा गंगादास की कुटी पर ले गए । वहाँ रामचन्द्र ने रानी को अपनी वर्दी पर लिटाया एवं साफे से उनके सिर का घाव बांध दिया॥ बाबा गंगादास उन्हे देखते ही पहचान गए और बोले “सीता और सावित्री के देश की कन्याएँ हैं ये॥”
बाबा ने रानी के मुह पर गंगाजल डाला तब रानी होश मे आई ॥ एक बार “हर हर महादेव” का उच्चारण किया और बेहोश हो गयी। दूसरी बार गंगाजल डालने पर रानी ने “ॐ वसुदेवाय नमः” का उच्चारण किया और चिरनिद्रा मे विलीन हो गयी। ये समय सूर्यास्त का था और “झाँसी का सूर्य भी अस्त हो चुका था ” लकड़िया इतनी नहीं थी रानी और उनकी सहेली मुंदर का दाह संस्कार हो सके अतः बाबा ने अपनी कुटिया उधेड़ लाने को कहा और दोनों शवों का दाह संस्कार किया गया ॥
रानी के सहयोगी रामचन्द्र देशमुख जी उनके पुत्र दामोदर राव को लेकर दक्षिण की ओर चले गए । जब उन्होने पुनः लौटकर युद्ध किया तो वो भी मारे गए । महारानी की अस्थियाँ पर्णकुटी के प्रांगड़ मे भूमि में समर्पित कर दी गयी .
हिंदुस्थान की इस महान हिन्दू वीरांगना को जन्मदिवस पर शत शत नमन
आशुतोष की कलम से
संदर्भ पुस्तक: रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी तुलसी पब्लिकेशन

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महारानी पद्मिनी की चित्तौड़ गौरव गाथा
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          ठाकुर हिम्मत सिंह हाडा
                    इतिहासकार
   यह मेरी कल्पना के बाहर  की बात थी!
कि मैं रानी पद्मिनी जैसी वीरांगना एवं सती स्त्री के व्यक्तित्व पर कुछ लिख सकूं?? परंतु कहावत है जब प्रेरणा सोत्र बलवान हो तो फिर कौन सा कार्य है जो पूर्ण नहीं हो सकता
भारतीय दुर्गों में चित्तौड़ दुर्ग का नाम विशेष सम्मान के साथ केवल इसलिए ही नहीं लिया जाता की पर्वतीय दुर्ग संस्कृति के सभी निवशो को अपने में समाहित किए हुए अन्य दुर्गा से वृहदाकार है| बल्कि इसलिए भी याद किया जाता है कि यह दुर्ग देश के शौर्य और अस्मिता की अनेक कहानियों का साक्षी रहा है और इस से जुड़ा है लंबा इतिहास| इस दुर्ग ने अपनी आन बान और शान के खिलाफ कोई सौदा नहीं किया वरन सम्मान के लिए खून की होली और प्रचंड अग्नि की ज्वालाएं को अंगीकार करना श्रेष्ठ समझा| आज भी दुर्ग के कण-कण से वीरों की शहादत की ध्वनि गूंजती है| रानी पद्मिनी और कर्मावती के अभूतपूर्व त्याग की महक अनायास ही पर्यटक को रोमांचित कर देती है| मैं हिम्मत हाडा गरव के साथ यह कहता हूं कि धन्य हैं यह चित्तौड़गढ़ का दुर्ग जिसने स्वाभिमान और हिंदुत्व के प्रतीक इस दुर्ग की माटी को सभी ने सोने चांदी से भी मूल्यवान माना है|
आवै न सौनो ओल मे,हूये न चान्दी  होड़ |
रगत थाप नंदी रही, माटी गढ़ चितौड़ ||
शाका——-
स्वाभिमान की रक्षार्थ केसरिया  पहन मरने मारने के उद्देश्य से निकलकर युद्ध करते हुए प्राणोत्सर्ग करने को  शाका अथार्थ जोहर कहा जाता है|
भारतवर्ष में सबसे प्राचीन और प्रथम जौहर सन 327 ईसवी पूर्व में सिकंदर के आक्रमण के समय पंजाब के अगल सोई गणराज्य में हुआ| दूसरा सिंध के राजा दाहर सोडा की रानी लाडो बाई ने सन 792 मैं किया इस क्रम में गढ़ तनोट मैं भी  सन 841  और सन 1294 में भयंकर  जोहर हुए|–
राजस्थान में प्रमुख जोहर की घटनाएं–
सन 1295 ईस्वी जैसलमेर रावल मूलराज भाटी का
सन 1295 ईस्वी गढ़ पावा फंता जी चौहान
सन 1295 इस वि गढ आबू अडसी पंवार
सन 1301 रणथंबोर हम्मीर चौहान राजकुमारी देवल
सन 1303 ईसवी चित्तौड़गढ़ रावल रतन सिंह रानी पद्मिनी
सन 1308 ईसवी सिवाना सातल देव का सोम चौहान
सन 1314 ईस्वी जालौर कानड़दैव वीरमदैव सौनगरा
सन 1315 ईस्वी जैसलमेर रावल दूदा जसोड़ भाटी
सन 1423 ईसवी गागरोन अचलदास खींची
सन 1535 चित्तौड़गढ़ महारानी कर्णावती का
चित्तौड़ का तीसरा जोहर अंतिम जोहर 23 फरवरी 1568 को हुआ था|
पिंगल पुत्री पदमिणी,मारवाणी तिणी नाम|
जौडी जोई विचारयँउ,घना विधाता काम||
नल राजा नरवर तपै,सूत तिण सालहकुमार|
पिगंल पति पद्ममणी सुता, भरवण गीत संचार||
रानी पद्मिनी का चरित्र हिमगिरी से ज्यादा पवित्र और समुद्र से ज्यादा गराई लिए हुए था| वह दिव्य सौंदर्य की अपार निधि होने के उपरांत भी एक शील व्रत सती नारी का अनुकरण करते हुए अग्नि के धधकते अंगारों पर प्राणोत्सर्ग करने में भी जरा नहीं हिचकी| ऐसी देवी स्वरूपा रानी के कृत्य से देवताओं के नेत्रों में अंजन टपकने लगा| मां सरस्वती के सपूतों की लेखनीयो मै भूचाल आ गया जो शीघ्रता से करबद्ध हो नमन करने को तैयार हो गई|
रानी पद्मिनी के सौंदर्य ने जहां श्रृंगार काव्य को उत्साहित किया वही उम्र की साधना के बलिदान ने नारी जाति को सतीत्व का पाठ पढ़ाया| आज इस दुर्ग का नाम किसी नगर शहर अथवा दुर्ग विशेष से नहीं जुड़ा है बल्कि राष्ट्र की संस्कृति समृद्धि और गरिमा का प्रतीक बन समूचे देश में फैला हुआ है|
पगी पगी पांगी पंत सिर,ऊपरी अम्बर छाहं|
पावस परकट्ऊ पदमनि,कह उत पुगंल जाहँ||
महारानी पद्मिनी का यह विश्व प्रसिद्ध जोहर 23 मार्च सन 1303 को हुआ था| जिसमें रानी पद्मिनी ने अपने साथ 16000 रानियों के साथ अग्नि स्नान किया था ठीक उसके कुछ समय बाद आताताई अल्लाउद्दीन खिलजी के अपवित्र कदम चित्तौड़ दुर्ग पर पड़े और चित्तौड़ दुर्ग का नाम बदलकर अपने पुत्र खिज्र खां के नाम से खिजराबाद रख दिया———–
धन्य है वह समस्त क्षत्राणी या जो नारी धर्म की रक्षा करती संसार को सतीत्व का पाठ पढ़ा गई सभी वंदनीय वीरांगनाएं अपने अपने पतियों से स्वर्ग में ऐसी विभूषित हुई जैसे शचि इंद्रदेव के साथ शोभा पाती है 23 मार्च 1303 के इस महा जोहर का मार्मिक चित्रण निम्न कविता के माध्यम से प्रस्तुत करते हुए हर्ष होता है|
रण में झुझार बणया सगला,महला मै अगनी धधक उठी|
सतिया री लाज बचावण नै,
                 जौहर री ज्वाला भभक उठी||
सत री अगनी तन माही,
                      धरती की अगनी साख भरै|
हर हर करती पदमा कुदी,
                    सतिया अब कुण गिणणै ||
पुष्पांजलि———
रावल युद्ध में खेत रहे, पाई मुक्ति महान |
रानियों  ने उत्सर्ग किए, गढ़ चित्तौड़ में प्राण
अमर यह दोनों हो गए ,दे के अपनी जान|
गढ़ चित्तोड़ को मिल गया, स्वाभिमान का दान||
लाज रखी कुल वंश की ,और क्षत्राणी को मान|
धन्य रानी तू पद्मिनी ,तुझे शत शत बार प्रणाम||
चित्तौड़ दुर्ग की वेदना
चित्तौड़ का नाम किसने नहीं सुना अथवा ऐसा कौन अभागा होगा जो इस के दर्शन को उत्साहित ना रहा हो यह वही दुर्ग है जो कभी बप्पा रावल के शौर्य से आकाश को नाप रहा था यह वही दुर्ग है जो रानी पद्मिनी के साथ हजारों रमणियों की दर्दभरी दास्तान को अपने हृदय में समेटे हुए हैं आज श्रीहीन होने के बाद भी सादर आमंत्रित कर रहा है आओ मेरे प्यारे पथिक यदि तुम पत्थरो की कारीगिरी के पारखी हो तो भीतर आकर परीक्षा करो कि पत्थर बड़े हैं अथवा  इन पर उकेरी गई कला,? यदि तुम मानव हृदय की पीड़ा को समझते हो तो मेरे हृदय में व्याप्त  तड़पन को देखो! आओ—
डरो मत….. भीतर आओ टटोलो शायद मिले तुम्हारा कोई निशान……. अभी अभी वह आग बुझी हुई राख के ढेर को देखो ढूंढो तुम्हारी किसी  मां बहन की गली हुई चूड़ियां इधर-उधर बिखरी न पडी हो|___
अभी तक यह दीवारें बोलती थी देखो उन पर तुम्हारा कोई शब्द तो अंकित नहीं है बेबसी दुर्ग की मुख्य वेदना तो अंकित नहीं है बेबसी दुर्ग की मुक वैदना कहती है टटोलो देखो यहां का एक एक पत्थर  में अदमय साहसी वीर है यह जयमल कल्ला के स्मारक है कर्तव्य जैसे दुर्भाग्य से पछाड़ खाकर जमीन पर कराह रहा हो| वैसे ही इन विरांतक योद्धाओं कि यह यादगार है जयमल जिसने घायल होने पर भी अपने कर्तव्य को नहीं छोड़ा जब वह घोड़े पर चढ़ने में असमर्थ रहा तो कल्ला के कंधों पर चढ़कर युद्ध करने लगा उस केसरिया बाने की यादगार जिस पर  बहता खून ऐसा चमक रहा था मानो शोर्य  के घोड़े पर क्रोध सवार हो यह वही स्थल है जहां जयमल ने महाकाल की पूजा में अपने जीवन पुष्प को सदा के वास्ते अर्पण कर दिया था यह वह दुर्ग का वह द्वार हैं जहां प्राणों की बाजी लग जाया करती थी जवानी मृत्यु को धाराशाई कर दिया करती थी कर्तव्य यहां योवन की कलाइयों को पकड़ मरोड़ दिया करता था  |  उमंगे यहां तलवार की धार पर नाचने लग जाया करती थी तथा उत्साह यहां खून से स्नान कर अठखेलियां किया करता था एवं विलास वैभव और सुख यहां उदासीन हो कर धक्के खाया करते थे ?
यह वह अंतिम द्वार है जहां मस्ती भी एक बार मस्त हो जाया करती थी |अब सिर्फ यादगार बड़ी हो कर सिसक रही है चूकि
समय नहीं हे इसका मुकुट सुहाग छीन लिया है यह देखो वीर वर फत्ता का स्मारक है  जो काल की कलुषित छाया में समा गया है .यह मासूम परवाना टहनी पर खिलने से  पहले ही मुरझाया हुआ फूल हैं शत्रु का जिसने खुली छाती से मुकाबला किया हो आज उसी की वेदना यहां सो रही है मत जगाओ  पथिक कहीं फिर आंसू Aag Ke Sholay न बन जाए
आगे बढ़ो पथिक यह कुंभा के महलों का भग्नावशेष और यह पास ही खड़ा उस वीर का कीर्तिस्तंभ एक चेहरे की  यह दो आंखें जिनमें एक में पीड़ा के आंसू तो दूसरी में मुस्कुराहट वास कर रही है देखो  पथिक एक ही भाग्य विधाता की यह दो कृतियां जिनमें एक आकाश को छूते हुऐ इठला रही है| तो दूसरी धरती पर वीरान पड़ी है यानी एक ही जीवन के दो पहलू एक स्मृति की अट्टालिका तो दूसरी विस्मृति की उपमा बन बीते हुए वैभव पर आंसू बहा रही है|
है इस्लामी बॉलीवुड का भांड मां के दूध को कलंकित करने वाला लीला भंसाली भांड यहां  त्याग की तपोभूमि चित्तौड़ आकर देख यह वह  सती का जोहर स्थल है ?जहां वीरांगनाओं ने अपने लाडलों को बलि चढ़ा कर अपने पतिव्रता नारी धर्म का पालन किया था…..?
यहां वीर  माताओं ने मौत का जहर पीकर जिंदगी के लिए अमृत का उपहार दिया था! अब भी जमीन में ज्वाला  धधक रही है लपटों में अग्नि स्नान हो रहा है? मिट्टी से बने शरीर को सतीत्व की रक्षार्थ पुन: मिट्टी में मिला दिया था |यह वीरांगनाएं योम की अज्ञात गहराइयों से प्रकट होकर अनंत गहराई में समा गई है शत्रु इन के रूप सौंदर्य के पिपासु बन कर आते परंतु उन्हें मिलती अनंत सौंदर्य से युक्त गर्म राख की ढेरी….
इस जीवट भरी कहानी पर शत्रु भी उसी राख को मस्तक पर लगा कर दो आंसू बहा दिया करते हैं|…………
पर है ? विधर्मी नीच लीला भंसाली भांड तेरा मन मेरी इस कलम की वेदना से भी नहीं पसीजा क्या?………..
हे रखेल पुत्र भांड भंसाली यह चित्तौड़ का विहंगम स्थल है जिस को कलंकित करने की तुझ में औकात कहां से आई? यह   महान स्थल  तो महान स्त्रियों का  पावन स्थान है,जिसके कण कण की महिमा का मंडन विदेशी इतिहासकारों , साहित्यकारों ने भी अपनी पुस्तकों में किया है|
हे राही ! यह गोरा बादल की छतरिया है,
जहां मस्तानों की होली रंग लाया करती थी| दीवानों की जिंदगी दीवाना बन जाया करती थी | यहां सौभाग्य और दुर्भाग्य की आंख मिचौनी में साम्राजयो के  भविष्य बनते और बिगड़ते थे| यह सुख विधाता की भूल और भोग उस भूल का  कोड माना जाता था |
यहां पराजयो की छाती रौन्दकर  विज्योतस्व  मनाऐ जाते थै| यहां देश धर्म और कर्तव्य की बलिवेदी पर शहीदों के मेले लगा करते थे|  आज भी उन शहीदों के उत्तेजनापूर्ण भाव  इन टूटती जा रही गुमटियों से टकराकर कहते हैं’ ” ठहरो पथिक लो,  हमारे शोर्य से प्रेरणा,  अमर कर दो अपना नाम! सच्चाई है हमारी आंखों में अब आंसू भी नहीं बचे जो इन की याद में बहाए जा सके ?
मैं मेरे अंतर्मन से यह कहना चाहता हूं जो अधर्मी राष्ट्रद्रोही जो अपना इतिहास नहीं जानते उनसे मैं यह कहता हूं——–
जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं|
वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं||
है इस्लामी बॉलीवुड का भांड संजय लीला भंसाली क्या तुझनै?मेरे चित्तौड़ की गौरव  गाथा का गुणगान नहीं सुना हो तो मैं कवि प्रदीप की वह ऐतिहासिक कविता के कुछ अंश तुझे और तेरे जैसे मां पद्मावती के सतीत्व का अपमान करने वालों को इस लेख के माध्यम से सुनाना चाहता हूं ? सुनिए भांड लीला भंसाली………..
यह है अपना राजपूताना,
                          नाज इसे तलवारों पर|
इसने अपना जीवन सिंचा ,
                        बरछी तीर कटारों पै||
यह प्रताप का वतन पनाह है,
                     आजादी के नारों पै |
कूद पड़ी थी यहां हजारों ,ललनाएं अंगारों पै||
बोल रही है कण कण में ,कुर्बानी राजस्थान की|
इस माटी से तिलक करो ,यह माटी है, बलिदान की ?
वन्दे मातरंम  वन्दे मातरंम ——–
मां शक्ति स्वरूपा पद्मनी पर मूवी बनाने वाले विधर्मी पथभ्रष्ट लीला भंसाली भांड मेरे चित्तौड़ की धधकती ज्वाला की तपोभूमि पर आ कर तो देख मैं हिम्मत हाडा तुझे सती स्वरूपा माता पद्मिनी का सत्य इतिहास बताता हूं
हां यही रानी पद्मिनी के महल है जो चारों ओर से जल से गिरे हुए है ,ऐसे प्रतीत हो रहे हैं मानो पत्थरों ने रो-रो कर आंसुओं के सरोवर मैं गाथाओ को घेर लिया हो|
दुख दर्द और वेदना पिघल पिघल कर पानी हो गई जो अब रूक रूक कर फिर पर हो रही हो| जल के मध्य खड़े यह मन ऐसा लग रहा हैं  जैसे  वियोगी मुमुक्ष बनकर जलसमाधि के लिए तैयार हो रहे हो अथवा सृष्टि के दर्पण में अपने सौंदर्य के पानी को मिलाकर योगाभ्यास कर रहे हो | यह वह महल है जिनके सौंदर्य के समक्ष देवलोक की सात्विकता बेहोश हो जाया करती थी|
जिसकी खुशबू चुराकर फूल आज भी संसार में प्रसन्नता की सौरभ बरसाते हैं| यहां भी कर्तव्य पालन की कितनी कीमत चुकानी पड़ी है?  सब राख की ढेर हो गई |
बस अब उसकी महक ही भटक रही है!
क्षत्राणी होने का दंड कोई क्या चुका पाएगी जो रानी पद्मिनी ने भोग-विलास सुख सौंदर्य को एक झटके में लात मारकर जोहर व्रत का अनुष्ठान किया ! यह वही महल है जहां रानी ने राज परिवार की समस्त नारियों को सतीत्व का पाठ पढ़ाया और मदहोश रावल को क्षत्रिय धर्म की प्रेरणा देखकर युद्ध को विदा किया——…….
राष्ट्र की अस्मिता रखने वाले मेरे करणी सेना के साहसी युवाओं ? मां पदमनी की तरह तुम भी अपने हृदय को वज्र के तुल्य कठोर कर लो ? चित्तौड़ दुर्ग आगे अपनी आप बीती कहता है देखो ? मेरी अस्मिता को बचाने वालों भारत वासियों…………
देख लो  आज भी मैं खड़ा हूं ?
देखो मै पिघला  और जला भी नहीं फिर भी इन वेदनाओं को सहन करने के वास्ते अडिग  खड़ा हूं| है मेरे दर्शनों के अभिलाषी पथिक इधर जरा मुड़ कर देख यह  खीचण रानी पन्ना दाय  का महल है जिसने राजवंश की रक्षार्थ अपने पुत्र की बलि देकर चित्तौड़ का मान बढ़ाया था यह  मेवाड़ वंश का रक्षक  बिखरता अतीत के बादलों मै झांक रहा है|
तुम्हें क्या शिक्षा दी जाए पथिक|  तुम्हारे पूर्वजों के खून ने तुम्हें कोई शिक्षा नहीं दी|
तुम्हारी माता बहिनों के बलिदान ने तुम्हें कुछ नहीं सिखाया ?
तुम्हारे जाज्वल्यमान इतिहास से भी तुम कुछ नहीं सीख सके तो अब मैं तुम्हें(लीला  भंशाली  भांड ) जैसे विधर्मियों को क्या शिक्षा दे सकता हूं?  जो मै उस जीवित इतिहास का  मूक स्मारक हूं | पर हां,
मेरी भी मर्यादा है | जिसका मस्तक    झुक गया है तुम उन्हें जा कर कहना,  मेरे सामने आकर अपना मस्तक ना झुकाऐ है |  जिन्होंने एक जीवित जाति और जीवित इतिहास का स्मारक बना दिया है उन्हें  कह देना कि मैं उन्हें देखना भी नहीं चाहता ,
वे  कदम कभी इधर ना आए जो हार कर शत्रुओं के टुकड़ों पर जीवित रहने के लिए चल  पढ़े हो ?……..,……….

मैंने तलवार उठाना सिखाया,
दुश्मन के लौहू से रंगने को  |
वीरों को मैंने उत्साहित किना ,
दुश्मन की नाक रगड़ने को ||
शहीदों को मैंने सम्मान दिया,
रमणीयो  का बना में तीर्थ स्थल |
आओ मेरे वीर सपूतों
पद्मिनी की आत्मा करती कल कल ||
नमन करो तुम उस भूमि को
जिसने राष्ट्र का मान बढाया |
मैं वही चित्तौड़ निराला हूं
जिसने स्वाभिमान को नहीं गिराया ||
            ……. जय जय चित्तौड़गढ़
……. ….. जय जय राजपूताना

   **** ठा•   हिम्मत सिंह हाडा
         [ इतिहासकार]
            झालावाड

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✍🏻 मालूम हैं तुम्हें ???
रामायण नामक धार्मिक धारावाहिक में भगवान श्रीराम का किरदार मात्र निभाने वाले कलाकार अरुण गोविल जब भी कहीं जाते थे तो लोग उनको श्री राम समझ कर पैरों पर गिर जाते थे।
वो खुद समझ नहीं पाते थे की ऐसी स्थितीयों में क्या किया जाएँ ….

उसी तरह महाभारत धारावाहिक में भीष्म पितामह का रोल निभाने वाले श्री मुकेश खन्ना आजीवन ब्रह्मचारी रहे…..

रामायण के निर्देशक श्री
रामानंद सागर ने पंद्रह से अधिक भाषाओं की रामायण पढ़ी थी और रामचरित मानस पूरी कंठस्थ थी उनको ।

और हाँ अरविंद त्रिवेदी हाँ हाँ वही अरविंद त्रिवेदी जिन्होनें ने रामायण में रावण का रोल निभाया था उन्हे अयोध्या में दर्शन करने से इसलिए रोक दिया था कि उन्होंने अपना किरदार निभाते समय हनुमान जी को बार बार मरकट कहा था……

माता सीता का अभिनय करने वाली दीपिका जी ने आगे मिलने वाली कई फिल्में ठुकरा दी थीं।

और आप कहते हैं फिल्मे धारावाहिक बस मनोरंजन का माध्यम हैं ????

ये भारत है साहब यहां रोड पर बैठा मोची भी पहली बोहनी को माथे से लगाता है और सिंधी या बनिया सेठ भी पहली बोहनी माथे से लगाता है।

दुकान खोलते और बंद करते समय भी सात बार प्रणाम करते हैं ।

ये आस्थाओं का देश है यकीन मानों आप उस पर चोट करोगे तो व्यवस्था हिल जाएगी……

यहां तो जुमे की नमाज पर हर दुकानदार तक अपने मुस्लिम इंप्लोयी को भी एक घंटे की छुट्टी देती है ….जब हम सबकी आस्था का सम्मान करते हैं,

तुम भी सीख लो…..

अच्छा रहेगा ….

By सूरज उपाध्याय 😊