Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

એક ખેતરના ખૂણા પર મકાન બનાવીને


એક ખેતરના ખૂણા પર મકાન બનાવીને એક કુટુંબ રહેતું હતું. માં-બાપ, દાદાજી, તેમનો પૌત્ર. માં-બાપ રોજે મજુરી ઉપર નીકળી જતા, અને ઘરે દાદાજી અને દસ વરસનો પૌત્ર જ રહેતા. દાદાજી રોજે સવારે વહેલા ઉઠીને બારી પાસે મુકેલી ખુરશી પર બેસીને પુસ્તકો વાંચતા રહેતા.

એક દિવસ પૌત્રએ પૂછ્યું: “દાદા…હું તમારી જેમ જ બુક્સ વાંચવાનો પ્રયત્ન કરું છું, પણ હું તેમાં કઈ સમજતો નથી. અને હું જે કઈ પણ સમજુ છું એ એક-બે દિવસમાં ભૂલી જાઉં છું. ઘણીવાર તો બુક બંધ કરું ને પાછળ બધું ભુલાઈ જાય છે. તમે પણ બધું ભૂલી જાઓ છો. તો પછી પુસ્તકો અને કહાનીઓ વાંચવાનો મતલબ શું?”

દાદાજી હસ્યા, અને ઉભા થઈને રસોડામાં ગયા અને લોટ ચાળવાનો ગંદો હવાલો લઈને આવ્યા. પોતાના પૌત્રને કહ્યું: “આ હવાલો લે, અને બહાર ખેતરમાં જતા પાણીના ધોરીયા માંથી હવાલો ભરીને લેતો આવ. મારે આ હવાલામાં સમાય એટલું પાણી જોઈએ છે.”

દીકરાને જેમ કહેલું તેમ કર્યું, પરંતુ હવાલો ભરીને દોડતો દાદાજી પાસે આવ્યો એ પહેલા જ હવાલાના કાણાઓ માંથી બધું પાણી લીક થઇ ગયું. દાદાજી હસ્યા અને કહ્યું: “બીજી વાર ભરતો આવ, પરંતુ આ વખતે ઝડપથી દોડીને આવજે.” દીકરો બીજી વાર ગયો, પણ ફરીથી તે દાદાજી પાસે પહોંચે એ પહેલા હવાલો ખાલી હતો! હાંફતા-હાંફતા તેણે દાદાજીને કહ્યું કે આ હવાલામાં તો પાણી ભરીને લાવવું અશક્ય લાગે છે. હું એક ગ્લાસમાં કે લોટામાં ભરતો આવું.
પરંતુ દાદાજી કહે: “ના. મારે આ હવાલામાં સમાય એટલું પાણી જ પીવું છે! મને લાગે છે તું સરખી કોશિશ નથી કરી રહ્યો.” છોકરો ફરી બહાર ગયો, અને પૂરી ઝડપથી દોડતો આવ્યો, પણ હવાલો ફરી ખાલી જ હતો! થાકીને જમીન પર બેસીને દાદાજીને તેણે કહ્યું: “દાદા…કહું છું ને…આ નકામું છે. ના ચાલે.”

“ઓહ… તો તને લાગે છે કે આ નકામું કામ છે?” દાદાજીએ કહ્યું, “-તું એકવાર હવાલા સામે તો જો.”

છોકરાએ હવાલાને જોયો અને પહેલીવાર તેણે જોયું કે હવાલો બદલાઈ ગયો હતો. તે જુના ગંદા હવાલા માંથી ધોવાયેલો, ચોખ્ખો, ચળકતો હવાલો બની ગયો હતો. તેના દરેક મેલ ધોવાઇ ગયા હતા.

દાદાજીએ હસીને કહ્યું: “બેટા…જયારે તમે પુસ્તકો વાંચો ત્યારે આવું થાય છે. તું કદાચ બધું સમજે નહી, કે બધું યાદ ન રહે, પરંતુ જયારે તમે વાંચો, ત્યારે તમે બદલાતા હો છો. અંદર અને બહાર પણ. કોઈ પણ કહાની કે કોઈ સારી વાત તમને અંદરથી થોડા ધોઈ નાખે છે, અને તમારો મેલ દુર કરે છે.

આહીર પ્રવીણ સોનારા

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

कुमार सतीश

एक बहुत पुरानी कहानी है कि….

एक बार एक पंडित जी ने कहीं पूजा करवाया और उस पूजा में दान स्वरूप पंडित जी एक बहुत ही प्यारी सी बछिया (छोटी गाय) मिली…!

लेकिन, जब पंडित जी जब उस बछिया को लेकर घर आने लगे तो कुछ उचक्कों ने पंडित जी से उस बछिया को छीनने का सोचा…!

लेकिन, सीधे छीन लेने में खतरा था और छीनने के कारण उन्हें दंड पाने का भी भय था…

इसीलिए, उन उचक्कों ने एक प्लान बनाया और और वे पूरे रास्ते में बिखर गए.

जब पंडित जी उस रास्ते से गुजरे से पहले उचक्के ने कहा :
अरे पंडित जी, ये बकरी कहाँ से ले आये ?
आप इस बकरी का क्या करेंगे ??

इस पर पंडित जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि… जजमान, शायद तुम्हें दिख नहीं रहा है कि.. ये बकरी नहीं बल्कि, बछिया है.

इस पर उस उचक्के ने बछिया को ध्यान से देखने का नाटक किया .. और, फिर बोला कि….
नहीं, पंडित जी, मैंने बहुत ध्यान से देखा… ये बकरी ही है.. किसी ने आपको बेवकूफ बनाकर बछिया के बदले बकरी दे दी है.

इस पर पंडित जी… हँसते हुए आगे बढ़ गए.

लेकिन, साजिश के अनुसार…. थोड़ी दूर पर दूसरे उचक्के ने उन्हें फिर टोक दिया… और, वही सब बातें दुहराने लगा.

इस बार पंडित जी को खुद पर ही थोड़ा शक हुआ कि… कहीं उनसे ही कोई भूल तो नहीं हो रही है.

लेकिन, फिर भी पंडित जी… बछिया को लेकर आगे बढ़ गए.

आगे फिर उन्हें तीसरा उचक्का मिला और वो भी पंडित जी का ब्रेन वाश करने लगा.

इस तरह … पांचवे, छठे और सातवें उचक्के तक पहुंचते-पहुंचते पंडित जी को भी ये विश्वास हो गया कि…
जजमान ने उन्हें बछिया नहीं बल्कि बकरी ही दी है.

और, पंडित जी ने…. अपनी बछिया को बकरी समझ कर उसे छोड़ दिया और आगे बढ़ गए…!

👉 इस कहानी में समझने लायक बात यह कि… पंडित जी इसीलिए धोखा खा गए क्योंकि…

  • पंडित जी को बछिया और बकरी के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी.
  • और, पंडित जी ने… खुद से ज्यादा उन उचक्कों पर विश्वास कर लिया… और, पंडित जी उनके षड्यंत्र को भांप नहीं पाए.

👉 👉 ऐसा ही कुछ हमारे हिनू समाज के साथ किया गया है.. जहाँ कुछ मुगल उचक्कों और उसके आगे के रास्ते पर में वामपंथी और खान्ग्रेसी उचक्कों ने….
पिस्लामी आक्रांता का बर्बरता और पाप छुपाने के लिए …. हमारे समाज में महिलाओं की बुरी स्थिति बताई….
और, उसे हिन्दू सनातन धर्म की कुरीति घोषित कर दिया.

बाल विवाह, सतीप्रथा आदि को जोरशोर से हिनू सनातन धर्म की कुरीति बताया गया…
और, इस माध्यम से हिनुओं को मानसिक रूप से डिप्रेस किया गया.

लेकिन… उन्होंने कभी ये कभी ये नहीं बताया कि…

सतीप्रथा … मुसरिम आक्रांताओं के कुत्सित दृष्टि से बचने का एक सुरक्षा माध्यम था… क्योंकि, मुगलों ने ये नियम बना दिया था कि जिस भी सुंदर स्त्री का पति नहीं होगा वो बादशाह की मानी जायेगी.

साथ ही… बालविवाह भी मुसरिम आक्रांता से बचने के लिए ही अपनाया गया गया एक सुरक्षा माध्यम था….
ताकि, कुंवारी लड़की देखकर मुसरिम उसे उठा ना ले जाएं….!

लेकिन… बालविवाह और सतीप्रथा को हिनू सनातन धर्म की कुरीति बताने वाले ये भूल गए कि…

हमारे वेद… नारी को अत्यंत महत्वपूर्ण, गरिमामय और उच्च स्थान प्रदान करते है..!

स्त्रियों की शिक्षा दीक्षा, गुण, कर्तव्य, अधिकार और सामाजिक भूमिका का वर्णन वेदों में पाया जाता है..!

और, वेदों में जो अधिकार नारी के लिए बताए गए है.. ये सब संसार के किसी भी दूसरे धर्मग्रंथों में नही मिलता. (वेद की ऋचाएं संलग्न है)

हमारे वेद तो स्त्री को… घर की साम्राज्ञी से लेकर देश की शासक और पृथ्वी की साम्राज्ञी तक बनने का अधिकार देते है.

सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि…. वेदों में स्त्री को यज्ञ समान पूजनीय बताया गया है और वैदिक काल में नारी अध्ययन अध्यापन से लेकर रणक्षेत्र तक में जाया करती थी.

माँ दुर्गा, काली से लेकर माँ सरस्वती और माँ लक्ष्मी स्त्री ही तो हैं.

इसके अलावा… हमारे यहाँ स्वयंवर का भी प्रचलन था…जिसमें लड़कियां खुद अपना वर चुनती थी.

स्वयंवर अपनेआप में बालविवाह के कहानी की धज्जियाँ उड़ाने के लिए काफी है…
क्योंकि, जाहिर सी बात है कि… स्वयंवर में लड़कियाँ जब अपना वर चुनती होंगी तो वे इतनी परिपक्व तो होती ही होगी कि… जो सही और गलत में भेद कर सके.

लेकिन…. इसके उलट… आपके किसी भी मुगल , वामपंथी, खान्ग्रेसी अथवा कोर्स के किताब ने कभी भी…. तीन तलाक, हलाला और पॉलीगेमी (बहुपत्नी) को कुरीति के तौर पर नहीं बताया.

किसी कोर्स के किताब ने भी नहीं बताया कि… पिस्लाम में विवाह नहीं बल्कि कॉन्ट्रैक्ट होते हैं… जिसे कभी भी तोड़ा जा सकता है.

बहुत से मित्र तो आजतक ये नहीं जानते हैं कि…. पिस्लामी शरीयत कानून के हिसाब से किसी भी घटना की गवाही के तौर पर पिस्लामी ख़्वातूनों की गवाही.. पुरुषों से आधी ही मानी जाती है.

लेकिन…. इन सबको कभी भी कुरीति नहीं बताया गया…

बल्कि, कुरीति बताया गया… मुसरिम आक्रांताओं से बच सकने वाले सुरक्षात्मक उपायों को.

और… हममें से अधिकांश लोगों ने वामपंथियों और खांग्रेसियों की इस बात को स्वीकार भी कर लिया… क्योंकि… जिस तरह कहानी में पंडित जी बछिया और बकरी के बारे में जानकारी नहीं थी…

उसी तरह … हमारे पास हमारे धर्मग्रंथों और संदर्भों की जानकारी नहीं है.

यही कारण है कि… कभी स्त्रियों के मामले में डिफेंसिव किया जाता है तो कभी… हमारे त्योहारों और पूजा पाठ को पाखंड बताया जाता है.

और… दूसरों को जाने ही दें…
हमारे अपने ही लोग… श्री राम कथा और भागवत कथा के नाम … फिल्मी गीत और हली-मौला गाते फिरते हैं.

जय महाकाल…!!!

नोट : आप इस पूरे लेख से आसानी से समझ सकते हैं कि उनलोगों ने हमारे दलित भाइयों को किस तरह भरमाया होगा.

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मोहनलाल जैन

जब औरंगजेब ने मथुरा का श्रीनाथ मंदिर तोड़ा तो मेवाड़ के नरेश राज सिंह 100 मस्जिद तुड़वा दिये थे।
अपने पुत्र भीम सिंह को गुजरात भेजा, कहा ‘सब मस्जिद तोड़ दो तो भीम सिंह ने 300 मस्जिद तोड़ दी थी’।

वीर दुर्गादास राठौड़ ने औरंगजेब की नाक में दम कर दिया था और महाराज अजीत सिंह को राजा बनाकर ही दम लिया।

कहा जाता है कि दुर्गादास राठौड़ का भोजन, जल और शयन सब अश्व के पार्श्व पर ही होता था। वहाँ के लोकगीतों में ये गाया जाता है कि यदि दुर्गादास न होते तो राजस्थान में सुन्नत हो जाती।

वीर दुर्गादास राठौड़ भी शिवाजी के जैसे ही छापामार युद्ध की कला में विशेषज्ञ थे।

मध्यकाल का दुर्भाग्य बस इतना है कि हिन्दू संगठित होकर एक संघ के अंतर्गत नहीं लड़े, अपितु भिन्न भिन्न स्थानों पर स्थानीय रूप से प्रतिरोध करते रहे।

औरंगजेब के समय दक्षिण में शिवाजी, राजस्थान में दुर्गादास, पश्चिम में सिख गुरु गोविंद सिंह और पूर्व में लचित बुरफुकन, बुंदेलखंड में राजा छत्रसाल आदि ने भरपूर प्रतिरोध किया और इनके प्रतिरोध का ही परिणाम था कि औरंगजेब के मरते ही मुगलवंश का पतन हो गया।

इतिहास साक्षी रहा है कि जब जब आततायी अत्यधिक बर्बर हुए हैं, हिन्दू अधिक संगठित होकर प्रतिरोध किया है। हिन्दू स्वतंत्र चेतना के लिए ही बना है। हिंदुओं का धर्मांतरण सूफियों ने अधिक किया है। तलवार का प्रतिरोध तो उसने सदैव किया है, बस सूफियों और मिशनरियों से हार जाता है।
बाबर ने मुश्किल से कोई 4 वर्ष राज किया। हुमायूं को ठोक पीटकर भगा दिया। मुग़ल साम्राज्य की नींव अकबर ने डाली और जहाँगीर, शाहजहाँ से होते हुए औरंगजेब आते आते उखड़ गया।
कुल 100 वर्ष (अकबर 1556ई. से औरंगजेब 1658ई. तक) के समय के स्थिर शासन को मुग़ल काल नाम से इतिहास में एक पूरे पार्ट की तरह पढ़ाया जाता है….
मानो सृष्टि आरम्भ से आजतक के कालखण्ड में तीन भाग कर बीच के मध्यकाल तक इन्हीं का राज रहा….!

अब इस स्थिर (?) शासन की तीन चार पीढ़ी के लिए कई किताबें, पाठ्यक्रम, सामान्य ज्ञान, प्रतियोगिता परीक्षाओं में प्रश्न, विज्ञापनों में गीत, ….इतना हल्ला मचा रखा है, मानो पूरा मध्ययुग इन्हीं 100 वर्षों के इर्द गिर्द ही है।

जबकि उक्त समय में मेवाड़ इनके पास नहीं था। दक्षिण और पूर्व भी एक सपना ही था।
अब जरा विचार करें….. क्या भारत में अन्य तीन चार पीढ़ी और शताधिक वर्षों तक राज्य करने वाले वंशों को इतना महत्त्व या स्थान मिला है ?
अकेला विजयनगर साम्राज्य ही 300 वर्षों तक टिका रहा। हम्पी नगर में हीरे माणिक्य की मण्डियां लगती थीं। महाभारत युद्ध के बाद 1006 वर्ष तक जरासन्ध वंश के 22 राजाओं ने, 5 प्रद्योत वंश के राजाओं ने 138 वर्ष , 10 शैशुनागों ने 360 वर्षों तक , 9 नन्दों ने 100 वर्षों तक , 12 मौर्यों ने 316 वर्षों तक , 10 शुंगों ने 300 वर्षों तक , 4 कण्वों ने 85 वर्षों तक , 33 आंध्रों ने 506 वर्षों तक , 7 गुप्तों ने 245 वर्षों तक राज्य किया । और पाकिस्तान के सिंध, पंजाब से लेके अफ़ग़ानिस्तान के पर समरकन्द तक राज करने वाले रघुवंशी लोहाणा(लोहर-राणा) जिन्होने देश के सारे उत्तर-पश्चिम भारत वर्ष पर राज किया और सब से ज्यादा खून देकर इस देश को आक्रांताओ से बचाया, सिकंदर से युद्ध करने से लेकर मुहम्मद गजनी के बाप सुबुकटिगिन को इनके खुद के दरबार मे मारकर इनका सर लेके मूलतान मे लाके टाँगने वाले जसराज को भुला दिया। कश्मीर मे करकोटक वंश के ललितादित्य मुक्तपीड ने आरबों को वो धूल चटाई की सदियो तक कश्मीर की तरफ आँख नहीं उठा सके। और कश्मीर की सबसे ताकतवर रानी दिद्दा लोहराणा(लोहर क्षत्रिय) ने सब से मजबूत तरीके से राज किया। और सारे दुश्मनों को मार दिया। तारीखे हिंदवा सिंध और चचनामा पहला आरब मुस्लिम आक्रमण जिन मे कराची के पास देब्बल मे 700 बौद्ध साध्विओ का बलात्कार नहीं पढ़ाया जाता। और इन आरबों को मारते हुए इराक तक भेजने वाले बाप्पा रावल, नागभट प्रथम, पुलकेसीन जैसे वीर योद्धाओ के बारेमे नहीं पढ़ाया जाता।
फिर विक्रमादित्य ने 100 वर्षों तक राज्य किया था । इतने महान सम्राट होने पर भी भारत के इतिहास में गुमनाम कर दिए गए ।

उनका वर्णन करते समय इतिहासकारों को मुँह का कैंसर हो जाता है। सामान्य ज्ञान की किताबों में पन्ने कम पड़ जाते है। पाठ्यक्रम के पृष्ठ सिकुड़ जाते है। प्रतियोगी परीक्षकों के हृदय पर हल चल जाते हैं।
वामपंथी इतिहासकारों ने नेहरूवाद का …….. भक्षण कर, जो उल्टियाँ की उसे ज्ञान समझ चाटने वाले चाटुकारों…!
तुम्हे धिक्कार है !!!

यह सब कैसे और किस उद्देश्य से किया गया ये अभी तक हम ठीक से समझ नहीं पाए हैं और ना हम समझने का प्रयास कर रहे हैं।

एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत हिन्दू योद्धाओं को इतिहास से बाहर कर सिर्फ मुगलों को महान बतलाने वाला नकली इतिहास पढ़ाया जाता है। महाराणा प्रताप के स्थान पर अत्याचारी व अय्याश अकबर को महान होना लिख दिया है।
ये इतिहास को ऐसा प्रस्तुत करने का जिम्मेवार सिर्फ एक व्यक्ति है वो है
मौलाना आजाद, भारत का पहला केंद्रीय शिक्षा मंत्री ।
अब यदि इतिहास में उस समय के वास्तविक हिन्दू योद्धाओं को सम्मिलित करने का प्रयास किया जाता है तो विपक्ष शिक्षा के भगवा करण करने का आरोप लगाता है !

नोट : सब लोग इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर और आगे भी Forward करें…. ताकी इस आलेख का अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार हो सके !

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🔔धर्म और संस्कृति🔔
ग्रुप की सादर सप्रेम भेंट
🦋🦋🦋🦋🦋🦋

हँस जैन रामनगर खँडवा
98272 14427

दुर्गुणों को बाहर करो
👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻

एक बार एक गाँव में पंचायत लगी थी | वहीं थोड़ी दूरी पर एक संत ने अपना बसेरा किया हुआ था| जब पंचायत किसी निर्णय पर नहीं पहुच सकी, तो किसी ने कहा कि क्यों न हम महात्मा जी के पास अपनी समस्या को लेकर चलें ,अतः सभी संत के पास पहुंचे |जब संत ने गांव के लोगों को देखा तो पूछा कि कैसे आना हुआ ?
तो लोगों ने कहा ‘महात्मा जी गाँव भर में एक ही कुआँ हैं और कुँए का पानी हम नहीं पी सकते, बदबू आ रही है । मन भी नहीं होता पानी पीने को।
संत ने पूछा –हुआ क्या ?पानी क्यों नहीं पी रहे हो ?
लोग बोले–तीन कुत्ते लड़ते लड़ते उसमें गिर गये थे । बाहर नहीं निकले, मर गये उसी में । अब जिसमें कुत्ते मर गए हों, उसका पानी कौन पिये महात्मा जी ?संत ने कहा — ‘एक काम करो ,उसमें गंगाजल डलवाओ,तो कुएं में गंगाजल भी आठ दस बाल्टी छोड़ दिया गया,फिर भी समस्या जस की तस
लोग फिर से संत के पास पहुंचे,अब संत ने कहा”भगवान की पूजा कराओ”।
लोगों ने कहा ••••ठीक है
भगवान की पूजा कराई ,फिर भी समस्या जस की तस ।लोग फिर संत के पास पहुंचे !
अब संत ने कहा उसमें सुगंधित द्रव्य डलवाओ।
लोगों ने फिर कहा ••••• हाँ, अवश्य
सुगंधित द्रव्य डाला गया । नतीजा फिर वही…ढाक के तीन पात।लोग फिर संत के पास गए …अब संत खुद चलकर आये
लोगों ने कहा– महाराज ! वही हालत है, हमने सब करके देख लिया । गंगाजल भी डलवाया, पूजा भी करवायी, प्रसाद भी बाँटा और उसमें सुगन्धित पुष्प और बहुत चीजें डालीं; लेकिन महाराज !हालत वहीं की वहीं
अब संत आश्चर्यचकित हुए कि अभी भी इनका कार्य ठीक क्यों नहीं हुआ ?
तो संत ने पूछा– कि तुमने और सब तो किया, वे तीन कुत्ते मरे पड़े थे, उन्हें निकाला कि नहीं ?
लोग बोले — उनके लिए न आपने कहा था, न हमने निकाला, बाकी सब किया । वे तो वहीं के वहीं पड़े हैं ।
संत बोले — जब तक उन्हें नहीं निकालोगे, इन उपायों का कोई प्रभाव नहीं होगा ।
सही बात यह है कि हमारे आपके जीवन की भी यही कहानी है ,
इस शरीर नामक गाँव के अंतःकरण के कुएँ में ये काम, क्रोध और लोभ के तीन कुत्ते लड़ते झगड़ते गिर गये हैं । इन्हीं की सारी बदबू है ।
हम उपाय पूछते हैं तो लोग बताते हैं– तीर्थ यात्रा कर लो, थोड़ा यह कर लो, थोड़ा पूजा करो, थोड़ा पाठ ।
सब करते हैं, पर बदबू उन्हीं दुर्गुणों की आती रहती है
कथा सार :
पहले हम सभी अपने भीतर के दुर्गुणों को निकाल कर बाहर करें तभी हमारा जीवन उपयोगी होगा ।

हँस जैन रामनगर खँडवा
98272 14427 🙏🏽🙏🏾🙏🙏🏿

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

जब भी कोई राजपूत किसी मुग़ल की गद्दारी की बात करता है तो कुछ मुग़ल प्रेमियों द्वारा उसे जोधाबाई का नाम लेकर चुप कराने की कोशिश की जाती है!

बताया जाता है की कैसे जोधा ने अकबर की आधीनता स्वीकार की या उससे विवाह किया! परन्तु अकबर कालीन किसी भी इतिहासकार ने जोधा और अकबर की प्रेम कहानी का कोई वर्णन नही किया!

सभी इतिहासकारों ने अकबर की सिर्फ 5 बेगम बताई है!
1.सलीमा सुल्तान
2.मरियम उद ज़मानी
3.रज़िया बेगम
4.कासिम बानू बेगम
5.बीबी दौलत शाद

अकबर ने खुद अपनी आत्मकथा अकबरनामा में भी, किसी रानी से विवाह का कोई जिक्र नहीं किया।परन्तु राजपूतों को नीचा दिखने के लिए कुछ इतिहासकारों ने अकबर की मृत्यु के करीब 300 साल बाद 18 वीं सदी में “मरियम उद ज़मानी”, को जोधा बाई बता कर एक झूठी अफवाह फैलाई!

और इसी अफवाह के आधार पर अकबर और जोधा की प्रेम कहानी के झूठे किस्से शुरू किये गए! जबकि खुद अकबरनामा और जहांगीर नामा के अनुसार ऐसा कुछ नही था!

18वीं सदी में मरियम को हरखा बाई का नाम देकर राजपूत बता कर उसके मान सिंह की बेटी होने का झूठ पहचान शुरू किया गया। फिर 18वीं सदी के अंत में एक ब्रिटिश लेखक जेम्स टॉड ने अपनी किताब “एनालिसिस एंड एंटटीक्स ऑफ़ राजस्थान” में मरीयम से हरखा बाई बनी इसी रानी को जोधा बाई बताना शुरू कर दिया!

और इस तरह ये झूठ आगे जाकर इतना प्रबल हो गया की आज यही झूठ भारत के स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बन गया है और जन जन की जुबान पर ये झूठ सत्य की तरह आ चूका है!

और इसी झूठ का सहारा लेकर राजपूतों को निचा दिखाने की कोशिश जाती है! जब भी मैं जोधाबाई और अकबर के विवाह प्रसंग को सुनता या देखता हूं तो मन में कुछ अनुत्तरित सवाल कौंधने लगते हैं!

आन,बान और शान के लिए मर मिटने वाले शूरवीरता के लिए पूरे विश्व मे प्रसिद्ध भारतीय क्षत्रिय अपनी अस्मिता से क्या कभी इस तरह का समझौता कर सकते हैं??

हजारों की संख्या में एक साथ अग्नि कुंड में जौहर करने वाली क्षत्राणियों में से कोई स्वेच्छा से किसी मुगल से विवाह कर सकती हैं????जोधा और अकबर की प्रेम कहानी पर केंद्रित अनेक फिल्में और टीवी धारावाहिक मेरे मन की टीस को और ज्यादा बढ़ा देते हैं!

अब जब यह पीड़ा असहनीय हो गई तो एक दिन इस प्रसंग में इतिहास जानने की जिज्ञासा हुई तो पास के पुस्तकालय से अकबर के दरबारी ‘अबुल फजल’ द्वारा लिखित ‘अकबरनामा’ निकाल कर पढ़ने के लिए ले आई, उत्सुकतावश उसे एक ही बैठक में पूरा पढ़ डाली पूरी किताब पढ़ने के बाद घोर आश्चर्य तब हुआ जब पूरी पुस्तक में जोधाबाई का कहीं कोई उल्लेख ही नही मिला!

मेरी आश्चर्य मिश्रित जिज्ञासा को भांपते हुए मेरे मित्र ने एक अन्य ऐतिहासिक ग्रंथ ‘तुजुक-ए-जहांगिरी’ जो जहांगीर की आत्मकथा है उसे दिया! इसमें भी आश्चर्यजनक रूप से जहांगीर ने अपनी मां जोधाबाई का एक भी बार जिक्र नही किया!

हां कुछ स्थानों पर हीर कुँवर और हरका बाई का जिक्र जरूर था। अब जोधाबाई के बारे में सभी एतिहासिक दावे झूठे समझ आ रहे थे कुछ और पुस्तकों और इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के पश्चात हकीकत सामने आयी कि “जोधा बाई” का पूरे इतिहास में कहीं कोई जिक्र या नाम नहीं है!

इस खोजबीन में एक नई बात सामने आई जो बहुत चौकानें वाली है! ईतिहास में दर्ज कुछ तथ्यों के आधार पर पता चला कि आमेर के राजा भारमल को दहेज में ‘रुकमा’ नाम की एक पर्सियन दासी भेंट की गई थी जिसकी एक छोटी पुत्री भी थी!

रुकमा की बेटी होने के कारण उस लड़की को ‘रुकमा-बिट्टी’ नाम से बुलाते थे आमेर की महारानी ने रुकमा बिट्टी को ‘हीर कुँवर’ नाम दिया चूँकि हीर कुँवर का लालन पालन राजपूताना में हुआ इसलिए वह राजपूतों के रीति-रिवाजों से भली भांति परिचित थी!

राजा भारमल उसे कभी हीर कुँवरनी तो कभी हरका कह कर बुलाते थे। राजा भारमल ने अकबर को बेवकूफ बनाकर अपनी परसियन दासी रुकमा की पुत्री हीर कुँवर का विवाह अकबर से करा दिया जिसे बाद में अकबर ने मरियम-उज-जमानी नाम दिया!

चूँकि राजा भारमल ने उसका कन्यादान किया था इसलिये ऐतिहासिक ग्रंथो में हीर कुँवरनी को राजा भारमल की पुत्री बता दिया! जबकि वास्तव में वह कच्छवाह राजकुमारी नही बल्कि दासी-पुत्री थी!

राजा भारमल ने यह विवाह एक समझौते की तरह या राजपूती भाषा में कहें तो हल्दी-चन्दन किया था। इस विवाह के विषय मे अरब में बहुत सी किताबों में लिखा है!

(“ونحن في شك حول أكبر أو جعل الزواج راجبوت الأميرة في هندوستان آرياس كذبة لمجلس”) हम यकीन नहीं करते इस निकाह पर हमें संदेह
इसी तरह ईरान के मल्लिक नेशनल संग्रहालय एन्ड लाइब्रेरी में रखी किताबों में एक भारतीय मुगल शासक का विवाह एक परसियन दासी की पुत्री से करवाए जाने की बात लिखी है!

‘अकबर-ए-महुरियत’ में यह साफ-साफ लिखा है कि (ہم راجپوت شہزادی یا اکبر کے بارے میں شک میں ہیں) हमें इस हिन्दू निकाह पर संदेह है क्योंकि निकाह के वक्त राजभवन में किसी की आखों में आँसू नही थे और ना ही हिन्दू गोद भरई की रस्म हुई थी!

सिक्ख धर्म गुरू अर्जुन और गुरू गोविन्द सिंह ने इस विवाह के विषय मे कहा था कि क्षत्रियों ने अब तलवारों और बुद्धि दोनो का इस्तेमाल करना सीख लिया है, मतलब राजपुताना अब तलवारों के साथ-साथ बुद्धि का भी काम लेने लगा है!

17वी सदी में जब ‘परसी’ भारत भ्रमण के लिये आये तब उन्होंने अपनी रचना ”परसी तित्ता” में लिखा “यह भारतीय राजा एक परसियन वैश्या को सही हरम में भेज रहा है अत: हमारे देव(अहुरा मझदा) इस राजा को स्वर्ग दें”!

भारतीय राजाओं के दरबारों में राव और भाटों का विशेष स्थान होता था वे राजा के इतिहास को लिखते थे और विरदावली गाते थे उन्होंने साफ साफ लिखा है-

”गढ़ आमेर आयी तुरकान फौज ले ग्याली पसवान कुमारी ,राण राज्या राजपूता ले ली इतिहासा पहली बार ले बिन लड़िया जीत! (1563 AD)

मतलब आमेर किले में मुगल फौज आती है और एक दासी की पुत्री को ब्याह कर ले जाती है! हे रण के लिये पैदा हुए राजपूतों तुमने इतिहास में ले ली बिना लड़े पहली जीत 1563 AD!

ये ऐसे कुछ तथ्य हैं जिनसे एक बात समझ आती है कि किसी ने जानबूझकर गौरवशाली क्षत्रिय समाज को नीचा दिखाने के उद्देश्य से ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ की और यह कुप्रयास अभी भी जारी है!

लेकिन अब यह षडयंत्र अधिक दिन नही चलेगा।

साभार हरिसिंह राठौड़ नान्दला जी

Posted in संस्कृत साहित्य

प्राचीन भारतीय सृष्टि विज्ञान एवं दर्शन को रुपायित करती यह घड़ी बहुत अच्छी लगी।
हम सभी को यह स्मरण दिलाती है कि

जब 1 बजे तो स्मरण हो कि ब्रम्ह एक है…!

2 बजने पर सृष्टि विकास में युगल देवों अर्थात अश्विनी और कुमार (रात दिन,पृथ्वी स्वर्ग,विद्युत चुम्बक,इडा पिंगला,दोनों नासापुट,सूर्य चंद्र, दान पुण्य,वैद्य यौवन प्रदाता,आदि) का स्मरण।

3 अर्थात तीन गुण – सत्व, रज और तम।

4 अर्थात चारों वेद – ऋ क, यजु:,साम,और अथर्व।

5 अर्थात पांच प्राण – प्राण,अपान, उदान, व्यान और समान।

6 अर्थात छ रस – अम्ल,नमकीन,कटु, तिक्त,कषाय और मधुर।

7 अर्थात सात ऋषि प्राण – अत्रि,कश्यप,वशिष्ठ,विश्वामित्र,भारद्वाज,गौतम और जमदग्नि।

8 अर्थात आठ सिद्धियां – अनिमा,लघिमा,गरिमा,महिमा,प्राप्ति,प्राकाम्य,इशित्व और वशीकरण।

9 अर्थात नौ द्रव्य – पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु,आकाश,दिक – काल, मन और आत्मा।

10 अर्थात दस दिशाएं – पूर्व,आग्नेय,दक्षिण, नैरित्य,पश्चिम,वायव्य,उत्तर,ईशान,ऊपर और नीचे।

11 अर्थात ग्यारह रुद्र – कपाली,पिंगल,भीम,विरूपाक्ष,विलोहित,शास्ता,अजपाद, अहिर्बुधन्य,शंभू,चंड,और भव।

12 बजने पर स्मरण हो कि बारह आदित्य (जो कि 12 मास के रूप में सृष्टि चक्र को संचालित करते हैं ) – अंशुमान, भग, पूषा,धाता,मित्र,अर्यमा,वरुण, विवस्वान,सविता,शुक्र,त्वष्टा और विष्णु।

सभी भारतीय इस अद्भुत सृष्टि विज्ञान का चिंतन स्मरण इस घड़ी के माध्यम से करने का आनंद लें।

साभार
-डॉ रामेश्वर आमेटा

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

श्रीक्षेन्दू घोसाल

पुरन्दर किला दो चोटियों पर बना था। मुख्य किला 2,500 फुट ऊँची चोटी पर था, जबकि 2,100 फुट वाली चोटी पर वज्रगढ़ बना था। जब कई दिन के बाद भी मुगलों को किले को हथियाने में सफलता नहीं मिली, तो उन्होंने वज्रगढ़ की ओर से तोपें चढ़ानी प्रारम्भ कर दीं। मराठा वीरों ने कई बार उन्हें पीछे धकेला; पर अन्ततः मुगल वहाँ तोप चढ़ाने में सफल हो गये। इस युद्ध में हजारों मराठा सैनिक मारे गये.

पुरन्दर किले में मराठा सेना का नेतृत्व मुरारबाजी देशपाण्डे कर रहे थे। उनके पास 6,000 सैनिक थे, जबकि मुगल सेना 10,000 की संख्या में थी और फिर उनके पास तोपें भी थीं। किले पर सामने से दिलेर खाँ ने, तो पीछे से राजा जयसिंह के बेटे कीरत सिंह ने हमला बोल दिया। इससे मुरारबाजी दो पाटों के बीच संकट में फँस गये. उनके अधिकांश सैनिक मारे जा चुके थे। शिवाजी ने समाचार पाते ही नेताजी पालकर को किले में गोला-बारूद पहुँचाने को कहा। उन्होंने पिछले भाग में हल्ला बोलकर इस काम में सफलता पाई; पर वे स्वयं किले में नहीं पहुँच सके। इससे किले पर दबाव तो कुछ कम हुआ; पर किला अब भी पूरी तरह असुरक्षित था.

किले के मराठा सैनिकों को अब आशा की कोई किरण नजर नहीं आ रही थी। मुरारबाजी को भी कुछ सूझ नहीं रहा था। अन्ततः उन्होंने आत्माहुति का मार्ग अपनाते हुए निर्णायक युद्ध लड़ने का निर्णय लिया। किले का मुख्य द्वार खोल दिया गया। बचे हुए 700 सैनिक हाथ में तलवार लेकर मुगलों पर टूट पड़े। इस आत्मबलिदानी दल का नेतृत्व स्वयं मुरारबाजी कर रहे थे। उनके पीछे 200 घुड़सवार सैनिक भी थे। भयानक मारकाट प्रारम्भ हो गयी.

मुरारबाजी मुगलों को काटते हुए सेना के बीच तक पहुँच गये। उनकी आँखें दिलेर खाँ को तलाश रही थीं। वे उसे जहन्नुम में पहुँचाना चाहते थे; पर वह सेना के पिछले भाग में हाथी पर एक हौदे में बैठा था। मुरारबाजी ने एक मुगल घुड़सवार को काटकर उसका घोड़ा छीना और उस पर सवार होकर दिलेर खाँ की ओर बढ़ गये। दिलेर खाँ ने यह देखकर एक तीर चलाया, जो मुरारबाजी के सीने में लगा। इसके बाद भी उन्होंने आगे बढ़कर दिलेर खाँ की ओर अपना भाला फेंककर मारा। तब तक एक और तीर ने उनकी गर्दन को बींध दिया। वे घोड़े से निर्जीव होकर गिर पड़े.

यह ऐतिहासिक युद्ध 22 मई, 1665 को हुआ था। मुरारबाजी ने जीवित रहते मुगलों को किले में घुसने नहीं दिया। ऐसे वीरों के बल पर ही छत्रपति शिवाजी क्रूर विदेशी और विधर्मी मुगल शासन की जड़ें हिलाकर ‘हिन्दू पद पादशाही’ की स्थापना कर सके। आज वीरता के उस चरम बिंदु मुराबाजी देशपाण्डे को उनके बलिदान दिवस पर सुदर्शन परिवार बारम्बार नमन और वन्दन करते हुए उनकी गौरवगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प दोहराता है ..मुरारबाजी देशपाण्डे अमर रहें …
Remembering the great Maratha warrior MurarBaji Deshpande on his martyrdom day🙏🕯💐