Posted in रामायण - Ramayan

रामायण कथा का एक अंश
जिससे हमे सीख मिलती है “एहसास” की…
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श्री राम, लक्ष्मण एवम् सीता’ मैया चित्रकूट पर्वत की ओर जा रहे थे,
राह बहुत पथरीली और कंटीली थी !
की यकायक श्री राम के चरणों मे कांटा चुभ गया !

श्रीराम रूष्ट या क्रोधित नहीं हुए, बल्कि हाथ जोड़कर धरती माता से अनुरोध करने लगे !
बोले- “माँ, मेरी एक विनम्र प्रार्थना है आपसे, क्या आप स्वीकार करेंगी ?”

धरती बोली- “प्रभु प्रार्थना नहीं, आज्ञा दीजिए !”

प्रभु बोले, “माँ, मेरी बस यही विनती है कि जब भरत मेरी खोज मे इस पथ से गुज़रे, तो आप नरम हो जाना !
कुछ पल के लिए अपने आँचल के ये पत्थर और कांटे छुपा लेना !
मुझे कांटा चुभा सो चुभा, पर मेरे भरत के पाँव मे आघात मत करना”

श्री राम को यूँ व्यग्र देखकर धरा दंग रह गई !
पूछा- “भगवन, धृष्टता क्षमा हो ! पर क्या भरत आपसे अधिक सुकुमार है ?
जब आप इतनी सहजता से सब सहन कर गए, तो क्या कुमार भरत सहन नही कर पाँएगें ?
फिर उनको लेकर आपके चित मे ऐसी व्याकुलता क्यों ?”

श्री राम बोले- “नही…नही माते, आप मेरे कहने का अभिप्राय नही समझीं ! भरत को यदि कांटा चुभा, तो वह उसके पाँव को नही, उसके हृदय को विदीर्ण कर देगा !”

“हृदय विदीर्ण !! ऐसा क्यों प्रभु ?”,
धरती माँ जिज्ञासा भरे स्वर में बोलीं !

“अपनी पीड़ा से नहीं माँ, बल्कि यह सोचकर कि…इसी कंटीली राह से मेरे भैया राम गुज़रे होंगे और ये शूल उनके पगों मे भी चुभे होंगे !
मैया, मेरा भरत कल्पना मे भी मेरी पीड़ा सहन नहीं कर सकता, इसलिए उसकी उपस्थिति मे आप कमल पंखुड़ियों सी कोमल बन जाना..!!”

अर्थात
रिश्ते अंदरूनी एहसास, आत्मीय अनुभूति के दम पर ही टिकते हैं ।
जहाँ गहरी आत्मीयता नही, वो रिश्ता शायद नही परंतु दिखावा हो सकता है ।
🔰🔰
इसीलिए कहा गया है कि…
रिश्तेखून से नहीं, परिवार से नही,
मित्रता से नही, व्यवहार से नही,
बल्कि…
सिर्फ और सिर्फ आत्मीय “एहसास” से ही बनते और निर्वहन किए जाते हैं।
जहाँ एहसास ही नहीं,
आत्मीयता ही नहीं ..
वहाँ अपनापन कहाँ से आएगा l
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हम सबके लिए प्रेरणास्पद लघुकथा ✍✍
इन शब्दो ने यदि आपकी आत्मा को छुआ हो कृपया इन शब्दो को आगे बढाए ।
🕉🙏 🙏🌹🌹🕉

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विचारणीय लेख

संजय द्विवेदी

अखण्ड सनातन समिति🚩🇮🇳

1951 में कांग्रेस सरकार ने हिंदू धर्म दान एक्ट पास किया था, इस एक्ट के जरिए कांग्रेस ने राज्यों को अधिकार दे दिया कि वो किसी भी मंदिर को सरकार के अधीन कर सकते हैं।

इस एक्ट के बनने के बाद से आंध्र प्रदेश सरकार नें लगभग 34,000 मंदिर को अपने अधीन ले लिया था, कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा, तमिलनाडु ने भी मंदिरों को अपने अधीन कर दिया था, इसके बाद शुरू हुआ मंदिरों के चढ़ावे में भ्रष्टाचार का खेल।

उदाहरण के लिए तिरुपति बालाजी मंदिर की सालाना कमाई लगभग 3500 करोड़ रूपए है, मंदिर में रोज बैंक से दो गाड़ियां आती हैं और मंदिर को मिले चढ़ावे की रकम को ले जाती हैं।

इतना फंड मिलने के बाद भी तिरुपति मंदिर को सिर्फ 7% फंड वापस मिलता है, रखरखाव के लिए।

आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री YSR रेड्डी ने तिरुपति की 7 पहाड़ियों में से 5 को सरकार को देने का आदेश दिया था, इन पहाड़ियों पर चर्च का निर्माण किया जाना था।

मंदिर को मिलने वाली चढ़ावे की रकम में से 80% गैर हिंदू कामों के लिए किया जाता है।

तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक हर राज्य़ में यही हो रहा है, मंदिर से मिलने वाली रकम का इस्तेमाल मस्जिदों और चर्चों के निर्माण में किया जा रहा है।

मंदिरों के फंड में भ्रष्टाचार का आलम ये है कि कर्नाटक के 2 लाख मंदिरों में लगभग 50,000 मंदिर रख-रखाव के अभाव के कारण बंद हो गए हैं।

दुनिया के किसी भी लोकतंत्रिक देश में धार्मिक संस्थानों को सरकारों द्वारा कंट्रोल नहीं किया जाता है, ताकि लोगों की धार्मिक आजादी का हनन न होने पाए, लेकिन भारत में ऐसा हो रहा है, सरकारों ने मंदिरों को अपने कब्जे में इसलिए किया क्योंकि उन्हें पता है कि मंदिरों के चढ़ावे से सरकार को काफी फायदा हो सकता है।

लेकिन, सिर्फ मंदिरों को ही कब्जे में लिया जा रहा है, मस्जिदों और चर्च पर सरकार का कंट्रोल नहीं है।

इतना ही नहीं, मंदिरों से मिलने वाले फंड का इस्तेमाल मस्जिद और चर्च के लिए किया जा रहा है।

इन सबका कारण अगर खोजे तो 1951 में पास किया हुआ कॉंग्रेस का वो बिल है, हिन्दू मंदिर एक्ट की पुरजोर मांग करनी चाहिए जिससे हिन्दुओं के मंदिरों का प्रबंध हिन्दू करें।

गुरुद्वारा एक्ट की तर्ज पर हिन्दू मंदिर एक्ट बनाया जाए ....

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एक नास्तिक की भक्ति
हरिराम एक मेडिकल स्टोर का मालिक था। सारी दवाइयों की उसे अच्छी जानकारी थी, दस साल का अनुभव होने के कारण उसे अच्छी तरह पता था कि कौन सी दवाई 💊कहाँ रखी है।
वह इस व्यवसाय को बड़ी सावधानी और बहुत ही निष्ठा से करता था।

दिन भर उसकी दुकान में भीड़ लगी रहती थी, वह ग्राहकों को वांछित दवाइयों💊 को सावधानी और समझदारी से देता था।

परन्तु उसे भगवान पर कोई भरोसा नहीं था । वह एक नास्तिक था,उसका मानना था की प्राणी मात्र की सेवा करना ही सबसे बड़ी पूजा है। और वह जरूरतमंद लोगों को दवा निशुल्क भी दे दिया करता था।
और समय मिलने पर वह मनोरंजन हेतु अपने दोस्तों के संग दुकान में लूडो खेलता था।

एक दिन अचानक बारिश🌧 होने लगी,बारिश की वजह से दुकान में भी कोई नहीं था। बस फिर क्या, दोस्तों को बुला लिया और सब दोस्त मिलकर लूडो खेलने लगे।

तभी एक छोटा लड़का उसके दूकान में दवाई लेने पर्चा लेकर आया। उसका पूरा शरीर भींगा था।

हरिराम लूडो खेलने में इतना मशगूल था कि बारिश में आए हुए उस लड़के पर उसकी नजर नहीं पड़ी।

ठंड़ से ठिठुरते हुए उस बच्चे ने दवाई का पर्चा बढ़ाते हुए कहा- “साहब जी मुझे ये दवाइयाँ चाहिए, मेरी माँ बहुत बीमार है, उनको बचा लीजिए। बाहर और सब दुकानें बारिश की वजह से बंद है। आपके दुकान को देखकर मुझे विश्वास हो गया कि अब मेरी मां बच जाएगी।

उस लड़के की पुकार सुनकर लूडो खेलते-खेलते ही हरिराम ने दवाई के उस पर्चे को हाथ में लिया और दवाई देने को उठा, लूडो के खेल में व्यवधान के कारण अनमने से दवाई देने के लिए उठा ही था की बिजली चली गयी। अपने अनुभव से अंधेरे में ही दवाई की शीशी को झट से निकाल कर उसने लड़के को दे दिया।

दवा के पैसे दे कर लड़का👨 खुशी-खुशी दवाई की शीशी लेकर चला गया।
अंधेरा होने के कारण खेल बन्द हो गया और दोस्त भी चले गऐ।

अब वह दूकान को जल्दी बंद करने की सोच रहा था। तभी लाइट आ गई और वह यह देखकर दंग रह गया कि उसने दवाई समझकर उस लड़के को दिया था, वह चूहे मारने वाली जहरीली दवा की शीशी थी। जिसे उसके किसी ग्राहक ने थोड़ी ही देर पहले लौटाया था और लूडो खेलने की धुन में उसने अन्य दवाइयों के बीच यह सोच कर रख दिया था कि खेल समाप्त करने के बाद फिर उसे अपनी जगह वापस रख देगा !!

उसका दिल 💓जोर-जोर से धड़कने लगा। उसकी दस साल की विश्वसनीयता पर मानो जैसे ग्रहण लग गया। उस लड़के बारे में वह सोच कर तड़पने लगा।

यदि यह दवाई उसने अपनी बीमार माँ को पिला दी, तो वह अवश्य मर जाएगी। लड़का भी छोटा होने के कारण उस दवाई को तो पढ़ना भी नहीं जानता होगा।
एक पल वह अपने लूडो खेलने के शौक को कोसने लगा और दूकान में खेलने के अपने शौक को छोड़ने का निश्चय कर लिया
पर यह बात तो बाद के बाद देखी जाएगी। अब उस गलत दी दवा का क्या किया जाए ?

उस लड़के का पता ठिकाना भी तो वह नहीं जानता। कैसे उस बीमार माँ 👵🏻 को बचाया जाए?

सच कितना विश्वास था उस लड़के की आंखों में। हरिराम👨 को कुछ सूझ नहीं रहा था। घर जाने की उसकी इच्छा अब ठंडी पड़ गई। दुविधा और बेचैनी उसे घेरे हुए था। घबराहट में वह इधर-उधर देखने लगा।

पहली बार श्रद्धा से उसकी दृष्टि दीवार के उस कोने में पड़ी, जहाँ उसके पिता ने जिद्द करके श्री बांके बिहारी का छोटा सा चित्र दुकान के उदघाटन के वक्त लगा दिया था , पिता से हुई बहस में एक दिन उन्होंने हरिराम से श्री बांके बिहारी को कम से कम एक शक्ति के रूप मानने और पूजने की मिन्नत की थी।

उन्होंने कहा था कि भगवान 🙏की भक्ति में बड़ी शक्ति होती है, वह हर जगह व्याप्त है और श्री बांके बिहारी जी में हर बिगडे काम को ठीक करने की शक्ति है । हरिराम को यह सारी बात याद आने लगी। उसने कई बार अपने पिता को भगवान की तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर, आंखें👀 बंद करके कुछ बोलते हुऐ देखा था।

उसने भी आज पहली बार दूकान के कोने में रखी उस धूल भरी श्री बांके बिहारी श्री कृष्ण की तस्वीर को देखा और आंखें बंद कर दोनों हाथों को जोड़कर🙏 वहीं खड़ा हो गया।
थोड़ी देर बाद वह छोटा लड़का फिर दुकान में आया। हरिराम बहुत अधीर हो उठा। क्या बच्चे ने माँ को दवा समझ के जहर पिला दिया ? इसकी माँ मर तो नही गयी !!

हरिराम का रोम रोम कांप उठा ।पसीना पोंछते हुए उसने संयत हो कर धीरे से कहा- क्या बात है बेटा अब तुम्हें क्या चाहिए?

लड़के की आंखों से पानी छलकने लगा। उसने रुकते-रुकते कहा- बाबूजी…बाबूजी माँ को बचाने के लिए मैं दवाई की शीशी लिए भागे जा रहा था, घर के निकट पहुँच भी गया था, बारिश की वजह से ऑंगन में पानी भरा था और मैं फिसल गया। दवाई की शीशी गिर कर टूट गई। क्या आप मुझे दवाई की दूसरी शीशी दे सकते हैं बाबूजी?
हरिराम हक्का बक्का रह गया। क्या ये सचमुच श्री बांके बिहारी जी का चमत्कार है !

हाँ! हाँ ! क्यों नहीं? हरिराम👨 ने चैन की साँस लेते हुए कहा। लो, यह दवाई!
पर मेरे पास पैसे नहीं है।”उस लड़के ने हिचकिचाते हुए बड़े भोलेपन से कहा।

कोई बात नहीं- तुम यह दवाई ले जाओ और अपनी माँ को बचाओ। जाओ जल्दी करो, और हाँ अब की बार ज़रा संभल के जाना। 🧒लड़का, अच्छा बाबूजी कहता हुआ खुशी से चल पड़ा।

हरिराम की आंखों से अविरल आंसुओं की धार बह निकली। श्री बांके बिहारी को धन्यवाद 🙏देता हुआ अपने हाथों से उस धूल भरे तस्वीर को लेकर अपनी छाती से पोंछने लगा और अपने माथे से लगा लिया
आज के चमत्कार को वह पहले अपने परिवार को सुनाना चाहता था।

जल्दी से दुकान बंद करके वह घर को रवाना हुआ। उसकी नास्तिकता की घोर अंधेरी रात भी अब बीत गई थी और अगले दिन की नई सुबह एक नए हरिराम की प्रतीक्षा कर रही

!!!! जय श्री राधे राधे जी !!!!

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A beautiful story, do read…it makes a difference

One day Maths teacher asked her students to list the names of the other students in the room on two sheets of paper, leaving a space between each name.

Then she told them to think of the nicest thing they could say about each of their classmates and write it down.

It took the remainder of the class period to finish their assignment, and as the students left the room, each one handed in the papers.

That Saturday, the teacher wrote down the name of each student on a separate sheet of paper, and listed what everyone else had said about that individual.

On Monday she gave each student his or her list. Before long, the entire class was smiling. ‘Really?’ she heard whispered. ‘I never knew that I meant anything to anyone!’ and, ‘I didn’t know others liked me so much,’ were most of the comments.

No one ever mentioned those papers in class again. She never knew if they discussed them after class or with their parents, but it didn’t matter. The exercise had accomplished its purpose. The students were happy with themselves and one another. That group of students moved on.

Several years later, one of the students was killed in ‘Kargil’ war and his teacher attended the funeral of that special student. She had never attended Funeral of a serviceman before. He looked so handsome, so mature.
I
The place was packed with his friends. One by one those who loved him took a last walk. The teacher was the last one to bless .

As she stood there, one of the soldiers who acted as pallbearer came up to her. ‘Were you Sanjay’s math teacher?’ he asked. She nodded: ‘yes.’ Then he said: ‘Sanjay talked about you a lot.’

After the funeral, most of Sanjay’s former classmates were there. Sanjay’s mother and father were there, obviously waiting to speak with his teacher.

‘We want to show you something,’ his father said, taking a wallet out of his pocket ‘They found this on Sanjay when he was killed. We thought you might recognize it.’

Opening the billfold, he carefully removed two worn pieces of notebook paper that had obviously been taped, folded and refolded many times. The teacher knew without looking that the papers were the ones on which she had listed all the good things each of Sanjay’s classmates had said about him.

‘Thank you so much for doing that,’ Sanjay’s mother said. ‘As you can see, Sanjay treasured it.’

All of Sanjay’s former classmates started to gather around. Arjun smiled rather sheepishly and said, ‘I still have my list. It’s in the top drawer of my desk at home.’

Prithwiraj’s wife said, ‘ Prithwiraj asked me to put his in our wedding album.’

‘I have mine too,’ Rashmi said. ‘It’s in my diary’

Then Deepali, another classmate, reached into her pocketbook, took out her wallet and showed her worn and frazzled list to the group. ‘I carry this with me at all times,’ Deepali said and without batting an eyelash, she continued: ‘I think we all saved our lists’

That’s when the teacher finally sat down and cried. She cried for Sanjay and for all his friends who would never see him again.

The density of people in society is so thick that we forget that life will end one day. And we don’t know when that one day will be.

So please, tell the people you love and care for, that they are special and important. Tell them, before it is too late.

And One Way To Accomplish This Is: Forward this message on. If you do not send it, you will have, once again passed up the wonderful opportunity to do something nice and beautiful. But its upto U to fwd this one.

If you’ve received this, it is because someone cares for you and it means there is probably at least someone for whom you care.

If you’re ‘too busy’ to take those few minutes right now to forward this message on, would this be the VERY first time you didn’t do that little thing that would make a difference in your relationships?

The more people that you send this to, the better you’ll be at reaching out to those you care about.

We reap what we sow. Let’s put good into the lives of others . 🌻

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( एक बोध कथा )
किसने दिया

राजा अकबर ने बीरबल से पूछा कि तुम हिंदू लोग दिन में कभी मंदिर जाते हो, कभी पूजा-पाठ करते हो, आखिर भगवान तुम्हें देता क्या है

बीरबल ने कहा कि महाराज मुझे कुछ दिन का समय दीजिए बीरबल एक बूढी भिखारन के पास जाकर कहा कि मैं तुम्हें पैसे भी दूँगा और रोज खाना भी खिलाऊंगा, पर तुम्हें मेरा एक काम करना होगा बुढ़िया ने कहा ठीक है जनाब बीरबल ने कहा कि आज के बाद अगर कोई तुमसे पूछे कि क्या चाहिए तो कहना अकबर, अगर कोई पूछे किसने दिया तो कहना अकबर शहनशाह ने
वह भिखारिन अकबर को बिल्कुल नहीं जानती थी, पर वह रोज-रोज हर बात में अकबर का नाम लेने लगी कोई पूछता क्या चाहिए तो वह कहती अकबर, कोई पूछता किसने दिया, तो कहती अकबर मेरे मालिक ने दिया है धीरे धीरे यह सारी बातें अकबर के कानों तक भी पहुँच गई वह खुद भी उस भिखारन के पास गया और पूछा यह सब तुझे किसने दिया है तो उसने जवाब दिया, मेरे शहनशाह अकबर ने मुझे सब कुछ दिया है, फिर पूछा और क्या चाहिए तो बड़े अदब से भिखारन ने कहा, अकबर का दीदार, मैं उसकी हर रहमत का शुक्राना अदा करना चाहती हूँ, बस और मुझे कुछ नहीं चाहिए

अकबर उसका प्रेम और श्रद्धा देख कर निहाल हो गया और उसे अपने महल में ले आया, भिखारन तो हक्की बक्की रह गई और अकबर के पैरों में लेट गई, धन्य है मेरा शहनशाह

अकबर ने उसे बहुत सारा सोना दिया, रहने को घर, सेवा करने वाले नौकर भी दे कर उसे विदा किया तब बीरबल ने कहा महाराज यह आपके उस सवाल का जवाब है
जब इस भिखारिन ने सिर्फ केवल कुछ दिन सारा दिन आप का ही नाम लिया तो आपने उसे निहाल कर दिया इसी तरह जब हम सारा दिन सिर्फ भगवन को ही याद करेंगे तो वह हमें अपनी कृपा से निहाल और ￰धन्य कर देगा ll

हे नाथ ! हे मेरे नाथ !! मैं आप को भूलूँ नहीं !!! राम राम जी !जय जय श्री सीता राम जी
महाराज जी के चरणो में सादर प्रणाम !

Posted in संस्कृत साहित्य

व्रत का सही अर्थ

व्रत का अर्थ यजुर्वेद में बहुत स्पष्ट रुप में बताया गया है। देखिए―

अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम्।
इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि।।
―(यजु० 1/5)
भावार्थ―हे ज्ञानस्वरुप प्रभो! आप व्रतों के पालक और रक्षक हैं। मैं भी व्रत का अनुष्ठान करुँगा। मुझे ऐसी शक्ति और सामर्थ्य प्रदान कीजिए कि मैं अपने व्रत का पालन कर सकूँ। मेरा व्रत यह है कि मैं असत्य-भाषण को छोड़कर सत्य को जीवन में धारण करता हूँ।

इस मन्त्र के अनुसार व्रत का अर्थ हुआ किसी एक दुर्गुण, बुराई को छोड़कर किसी उत्तम गुण को जीवन में धारण करना।

उपवास का भी ऐसा ही अर्थ है―
उप समीपे यो वासो जीवात्मपरमात्मयोः।
उपवासः स विज्ञेयो न तु कायस्य शोषणम्।।
―(वराहोपनिषद् 2/39)
भावार्थ―जीवात्मा का परमात्मा के समीप होना, परमात्मा की उपासना करना, परमात्मा के गुणों को जीवन में धारण करना, इसी का नाम उपवास है। शरीर को सुखाने का नाम उपवास नहीं है।

प्राचीन साहित्य में विद्वानों, सन्तों और ऋषि-महर्षियों ने भूखे–मरनेरुपी व्रत का खण्डन किया है। प्राचीन ग्रन्थों में न तो ‘सन्तोषी’ के व्रत का वर्णन है और न एकादशी आदि व्रतों का विधान है।

महर्षि मनु ने लिखा है―
पत्यौ जीवति या तु स्त्री उपवासव्रतं चरेत्।
आयुष्यं हरते भर्तुर्नरकं चैव गच्छति।।
भावार्थ―जो स्त्री पति के जीवित रहते हुए भूखे-मरनारुप व्रत या उपवास करती है, वह पति की आयु को कम करती है और मरने पर स्वयं नरक को जाती है।
[मनुस्मृति में से अनेक श्लोकों को निकाला गया है। अनेक श्लोक पीछे से मिलाये गये हैं। यह श्लोक पाँचवें अध्याय में १५५ श्लोक के पश्चात् था। अब भी अनेक संस्करणों में यह श्लोक है। कुछ संस्करणों में से निकाल दिया गया है।]

इस प्रकार भूखा-मरनेवाले व्रत का भी सन्तों, ऋषि-मुनियों ने खण्डन किया है, आयुर्वेद की दृष्टि से भी आज जिस रुप में इन व्रतों को किया जाता है, उस रुप में ये व्रत शरीर को हानि पहुँचाते हैं। क्योंकि आजकल के व्रत ऐसे हैं कि दिन भर अन्न को छोड़कर कुछ न कुछ खाते रहो। इस प्रकार आयुर्वेद की दृष्टि से जो उपवास का लाभ पूरे दिन निराहार रहकर या अल्पाहार करके मिलना चाहिये था, वह नहीं मिल पाता (साप्ताहिक या पाक्षिक उपवास)।
व्रत के बहाने हर समय मुँह में कुछ-न-कुछ ठूँसते जाने का नाम व्रत नहीं है।

मैं व्रतों का खण्डन नहीं करता, आर्यसमाज भी व्रतों का खण्डन नहीं करता। आप एकादशी का व्रत लीजिए और खूब कीजिए, परन्तु एकादशी क्या है, इसे समझ लीजिए। पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय तथा एक मन―ये ग्यारह हैं। इन सबको अपने वश में रखना, आँखों से शुभ देखना, कानों से शुभ सुनना, नासिका से ओ३म् का जप करना, वाणी से मधुर बोलना, जिह्वा से शरीर को बल और शक्ति देने वाले पदार्थों का ही सेवन करना, हाथों से उत्तम कर्म करना, पाँवों से उत्तम सत्सङ्ग में जाना, जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन करना―यह है सच्चा एकादशी-व्रत। इस व्रत के करने से आपके जीवन का कल्याण हो जाएगा। शरीर को गलाने और सुखाने से तो यह लोक भी बर्बाद हो जाएगा, मुक्ति मिलना तो दूर की बात है।

सत्यनारायणव्रत का अर्थ है कि मनुष्य अपने हृदय में विद्यमान सत्यस्वरुप परमात्मा के गुणों को अपने जीवन में धारण करे। जीवन में सत्यवादी बने। मन, वचन और कर्म से सत्य का पालन करें ।

Posted in हास्यमेव जयते

Very Very Funny Jokes
3 hrs ·
इंटेलिजेंस ब्यूरो में एक उच्च पद हेतु भर्ती की प्रक्रिया चल रही थी।
अंतिम तौर पर केवल तीन उम्मीदवार बचे थे जिनमें से किसी एक का चयन किया जाना था।
इनमें दो पुरुष थे और एक महिला।
फ़ाइनल परीक्षा के रूप में कर्तव्य के प्रति उनकी निष्ठा की जांच की जानी थी।
पहले आदमी को एक कमरे में ले जाकर परीक्षक ने कहा –”हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि तुम हर हाल में हमारे निर्देशों का पालन करोगे चाहे कोई भी परिस्थिति क्यों न हो।”
फ़िर उसने, उसके हाथ में एक बंदूक पकड़ाई और दूसरे कमरे की ओर इशारा करते हुये कहा –
”उस कमरे में तुम्हारी पत्नी बैठी है। जाओ और उसे गोली मार दो।”
”मैं अपनी पत्नी को किसी भी हालत में गोली नहीं मार सकता”-
आदमी ने कहा।”
तो फ़िर तुम हमारे किसी काम के नहीं हो।
तुम जा सकते हो।” – परीक्षक ने कहा।
अब दूसरे आदमी को बुलाया गया। ”
हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि तुम हर हाल में हमारे निर्देशों का पालन करोगे चाहे कोई भी परिस्थिति क्यों न हो।”
कहकर परीक्षक ने उसके हाथ में एक बंदूक पकड़ाई और दूसरे कमरे की ओर इशारा करते हुये कहा – ”उस कमरे में तुम्हारी पत्नी बैठी है। जाओ और उसे गोली मार दो।”
आदमी उस कमरे में गया और पांच मिनट बाद आंखों में आंसू लिये वापस आ गया। ”मैं अपनी प्यारी पत्नी को गोली नहीं मार सका। मुझे माफ़ कर दीजिये। मैं इस पद के योग्य नहीं हूं।”
अब अंतिम उम्मीदवार के रूप में केवल महिला बची थी। उन्होंने उसे भी बंदूक पकड़ाई और उसी कमरे की तरफ इशारा करते हुये कहा – ”
हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि तुम हर हाल में हमारे निर्देशों का पालन करोगी चाहे कोई भी परिस्थिति क्यों न हो।
उस कमरे में तुम्हारा पति बैठा है। जाओ और जाकर उसे गोली से उड़ा दो।”
महिला ने बंदूक ली और कमरे के अंदर चली गई।
कमरे के अंदर घुसते ही फ़ायरिंग की आवाज़ें आने लगीं । लगभग 11 राउंड फायर के बाद कमरे से चीख-पुकार, उठा-पटक की आवाज़ें आनी शुरू हो गईं।
यह क्रम लगभग पन्द्रह मिनटों तक चला 🕞उसके बाद खामोशी छा गई।
लगभग पांच मिनट बाद कमरे का दरवाजा खुला और माथे से पसीना पोंछते हुये महिला बाहर आई।
बोली – ”तुम लोगों ने मुझे बताया नहीं था कि बंदूक में कारतूस नकली हैं। मजबूरन, मुझे उसको पीट-पीट 💭💭💭💭💭💭💭 कर मारना पड़ा।”