Posted in हिन्दू पतन

क्या यह आश्चर्य का विषय नहीं है कि अलग देश बनवाने के बाद भी वे भारत में क्यों रहे ?

इन लोगों की भयावह चाल को कभी भी हम भारतीयों को सफल नहीं होने देना चाहिए।

बॉलीवुड के तथाकथित देशभक्तों के पास वास्तव में अपने पिता, दादा या परदादा के पापों का जवाब देने के लिए केवल झूठ ही है।

शुरुआत हम शबाना आजमी के पिता कैफी आजमी से कर सकते हैं।
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उन्होंने पाकिस्तान के निर्माण का जश्न मनाते हुए कविताएँ लिखीं। कैफ़ी आज़मी विभाजन के समर्थक थे और उन्होंने विभाजन से ठीक पहले एक कविता लिखी थी “अगली आय में” (अगली ईद पाकिस्तान में)।
कैफी आज़मी पाकिस्तान गये और कुछ ही दिनों में वापस आ गया। फिर वे यहीं बस गये I अब उनके बच्चे हमें ज्ञान देते हैं कि उनके माता-पिता भारत से कितना प्यार करते थे।

इप्टा (इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन) कम्युनिस्ट पार्टी का सांस्कृतिक मोर्चा था और आज भी है I
शबाना आज़मी इप्टा की सक्रिय प्रस्तावक हैं। यह कम्युनिस्ट विचारधारा के तहत था कि कैफ़ी और यहां तक कि साहिर लुधियानवी जैसे लेखकों ने पाकिस्तान के निर्माण का समर्थन किया।

साहिर लुधियानवी भी वास्तव में लगभग 6-7 महीने पाकिस्तान में रहा फिर उसने भारत सरकार से वापस आने और यहां रहने की अनुमति देने की गुहार लगाई।

फिर भी कैफ़ी और साहिर और नासर के पिता जैसे लोग ‘न्यू मदीना’
(पाकिस्तान) के पक्ष में लगातार कविताएँ लिख रहे थे और भाषण दे रहे थे।

जावेद अख्तर के परदादा मौलाना फजले हक खैराबादी ने 1855 में अयोध्या में प्रसिद्ध हनुमान गढ़ी मंदिर पर कब्जा करने और उसे गिराने के लिए फतवा दिया था।पर अंग्रेजों ने वास्तव में इन मुस्लिम आक्रांताओं से हनुमान गढ़ी के अयोध्या मंदिर को बचाया।

इसी कारण खैराबादी ने अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद का आह्वान किया, जिसके लिए उन्हें पकड़ लिया गया और काला पानी भेज दिया गया।
वह 1857 के बाद भी अंग्रेजों के प्रति वफादारी की याचना करता रहा I तब अंग्रेज़ो ने दया की I

लेकिन खैराबादी तब भी दूसरे मुसलमानो को जिहाद करने और मरने मारने के लिए उकसाता रहा I जान निसार अख्तर के दादाजी ने विनती की और अंग्रेजों ने उनकी वफादारी के बदले में नरमी बरती।फिर उन्होंने खुद एक भव्य और शानदार जीवन व्यतीत किया I

अब नसीरुद्दीन शाह के परिवार पर आते हैं। उनके परदादा जन-फिशन खान ने 1857 में अंग्रेजों का समर्थन किया, सरधना में एक जागीर और एक हज़ार रुपये की पेंशन प्राप्त की।उनके पिता, अली मोहम्मद शाह, एक मुस्लिम लीग सदस्य, बहराइच, यूपी से थे। उन्होंने पाकिस्तान को वोट दिया, इंग्लैंड में रेस्टोरेंट खोलना चाहता था I पर कहीं नहीं जा पाया और यहीं रुके रहे I इसी तरह यूपी/महाराष्ट्र/तमिलनाडु/केरल/बिहार के मुसलमानों ने पाकिस्तान को वोट दिया पर वे भी पाकिस्तान नहीं गए।

अब नसीर खान हमें ज्ञान देते हैं कि उनके परिवार का भारत के प्रति गहरा प्रेम है।

अब मजरूह सुल्तानपुरी का एक और मामला लें। उन्होंने भी पाकिस्तान की महानता पर कविताएँ लिखीं पर कुछ दिनो में भारत लौट आये फिर यहीं रुके रहे I

मुस्लिमों में से बहुत शातिर क़िस्म के लोग भी जिनमें उनका नेतृत्व भी शामिल है, पाकिस्तान के लिए रवाना हुए पर उन्होंने भारत में परिवार का एक हिस्सा आबाद रखा I राजा महमूदाबाद जैसे कुछ लोग यूपी में संपत्ति का दावा करने के लिए बुढ़ापे में वापस आए (मामला चल रहा है)।

उन्होंने जिन्ना (उनके मामा) को वित्त पोषित किया। इस मामले को आखिरकार सुलझा लिया गया और @narendramodi सरकार ने संपत्ति को बचाने के लिए शत्रु संपत्ति अधिनियम में संशोधन किया। कांग्रेस उन्हें संपत्ति देने के लिए पूरी तरह तैयार थी।

“पाकिस्तान की विचारधारा” शब्द का इस्तेमाल पहली बार 1971 में याह्या खान के सूचना मंत्री मेजर जनरल शेर अली खान पटुआदी द्वारा किया गया था। क्या आप जानते हैं कौन है ये पटौदी? जी हां, सैफ अली खान पटुआदी के अंकल। सैफ के दादा यहां क्यों रुके थे? क्योंकि यहां उनकी संपत्ति बहुत ज्यादा थी।

सैफ के बड़े चाचा मज्र. जनरल इसफंदयार अली खान पटौदी आईएसआई के उप निदेशक थे। एक और परदादा मामा एम.जे.आर. जनरल शेर अली पटौदी पाक सेना में जनरल स्टाफ के प्रमुख थे, एक और महान चाचा शहरयार अली पटौदी पीसीबी के अध्यक्ष थे।

यह सब बहुत सोचा समझा प्लान था। इनका विचार भारत की राजनीति में घुसपैठ करना और पाकिस्तान के लिए अनुकूल परिवर्तन करवाते रहना सरकारी शासन तन्त्र पर कब्जा करना था I

जो लोग पाकिस्तान चाहते थे, वे योजना अनुसार नहीं गए और जो पंजाब और एनडब्ल्यूएफपी (पठानों) को नहीं चाहते थे, उन्हें मिल गया।

हैदराबाद के मुसलमानों ने वैसे भी सोचा था कि उनका एक अलग देश होगा I नवाब ने रु 1947 में पाकिस्तान को मदद के लिए 150 करोड़ ओवैसी के पिता (जो रजाकार थे) को दिये पर वह रक़म उन्होंने लंदन के एक बैंक में जमा करवा दिया। ओवैसी अब ज्ञान बाँट रहे हैं कि वे भारत से कितना प्यार करते हैं I

पाकिस्तान से वापस आने वालों की लिस्ट लम्बी है I बिहार से सैय्यद हुसैन इमाम, एम. मो. मद्रास से इस्माइल, आदि, मुस्लिम लीग के कुछ नेता भी भारत में वापस आ गए थे।

इन सभी मुस्लिमों ने पाकिस्तान को भारतीय मुसलमानों की मातृभूमि के रूप में बनाया था I ख़ुद ऐसे नेता वापस रहने की अनुमति लेकर भारत में बस गये I मेरी राय में उन्हें भारत आने देने का कोई औचित्य नहीं था।
महमूदाबाद के राजा, बेगम एजाज रसूल, पीरपुर के राजा, मौलाना हसरत मोहानी आदि पाकिस्तान के बड़े पैरोकार पाकिस्तान नहीं गए I उनके वंशज यहां ज्ञान देते हैं।

विडंबना यह है कि लतीफ़ी, जो पाकिस्तान के वास्तुकारों में से एक थे और पाकिस्तान के निर्माण के एक उत्साही समर्थक थे, नए देश में नहीं गए। लतीफी 1950 के दशक में खुशवंत सिंह के पिता द्वारा दिए गए फ्लैट में रहते थे और फिर उन्हें अपना ठिकाना मिल गया। दिल्ली में मरे, बनवाकर भी पाकिस्तान नहीं गए।

इसके अलावा, आजम खान की प्रसिद्धि के रामपुर ने, रामपुर राज्य को पाकिस्तान में शामिल करने की मांग करते हुए, सरकारी भवनों को आग लगाकर एक आंदोलन शुरू किया।

आप उस सबसे बड़े बदमाश को जानते हैं जिसने मुस्लिम लीग (1945-46 में जिन्ना द्वारा इस्तेमाल किया गया) का घोषणापत्र लिखा था, पाकिस्तान के विचारक, बॉम्बे हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करते रहे और कभी पाकिस्तान नहीं गए। उन्हें इस देश में रहने और अभ्यास करने की इजाजत कैसे दी गई। पाकिस्तान के लिए उनका योगदान इकबाल से भी बड़ा है, फिर भी वे कभी नहीं गए। यदि आप पाकिस्तान में मुसलमानों के लिए एक मातृभूमि बनाने में इतने निवेशित थे और घोषणापत्र, वैचारिक कारणों को लिखा और इसे इकबाल के आध्यात्मिक संदेशों के साथ मिला दिया, तो भी वह नहीं गए, लेकिन उस भूमि पर रहे जिससे वे नफरत करते थे और छुटकारा पाना चाहते थे।

मुझे इस सब में संयोग नहीं दिखता, मुझे एक भयावह मकसद दिखाई देता है।

जैसा कि सरदार पटेल ने कोलकाता 1949 में कहा था, “कल तक आप पाकिस्तान चाहते थे, उसे वोट दिया और अब आप भारत से प्यार करने का दावा करते हैं, मैं आप पर कैसे विश्वास करूं ?
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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

जब टाईटेनिक समुन्द्र में डूब रहा था तो उसके आस पास तीन ऐसे जहाज़ मौजूद थे जो टाईटेनिक के मुसाफिरों को बचा सकते थे।

सबसे करीब जो जहाज़ मौजूद था उसका नाम SAMPSON था और वो हादसे के वक्त टाईटेनिक से सिर्फ सात मील की दूरी पर था।

SAMPSON के कैप्टन ने न सिर्फ टाईटेनिक की ओर से फायर किए गए सफेद शोले (जो कि बेहद खतरे की हालत में हवा में फायर किये जाते हैं।) देखे थे, बल्कि टाईटेनिक के मुसाफिरों के चिल्लाने के आवाज़ को भी सुना भी था। लेकिन सैमसन के लोग गैर कानूनी तौर पर बेशकीमती समुन्द्री जीव का शिकार कर रहे थे और नहीं चाहते थे कि पकड़े जाएं, अपने जहाज़ को दूसरी तरफ़ मोड़ कर चले गए।

यह जहाज़ हम में से उन लोगों की तरह है जो अपनी गुनाहों भरी जिन्दगी में इतने मग़न हो जाते हैं कि उनके अंदर से इनसानियत खत्म हो जाती है।

दूसरा जहाज़ जो करीब मौजूद था उसका नाम CALIFORMIAN था, जो हादसे के वक्त टाईटेनिक से चौदह मील दूर था, उस जहाज़ के कैप्टन ने भी टाईटेनिक की ओर से निकल रहे सफेद शोले अपनी आखों से देखे, क्योंकि टाईटेनिक उस वक्त बर्फ़ की चट्टानों से घिरा हुआ था और उसे उन चट्टानों के चक्कर काट कर जाना पड़ता, इसलिए वो कैप्टन सुबह होने का इन्तजार करने लगा।और जब सुबह वो टाईटेनिक की लोकेशन पर पहुंचा तो टाईटेनिक को समुन्द्र की तह मे पहुचे हुए चार घंटे गुज़र चुके थे और टाईटेनिक के कैप्टन Adword_Smith समेत 1569 मुसाफिर डूब चुके थे।

यह जहाज़ हम लोगों मे से उनकी तरह है जो किसी की मदद करने के लिए अपनी सहूलियत और आसानी देखते हैं और अगर हालात सही न हों तो अपना फ़र्ज़ भूल जाते हैं।

तीसरा जहाज़ CARPATHIA था जो टाईटेनिक से 68 मील दूर था, उस जहाज़ के कैप्टन ने रेडियो पर टाईटेनिक के मुसाफारों की चीख पुकार सुनी, जबकि उसका जहाज़ दूसरी तरफ़ जा रहा था, उसने फौरन अपने जहाज़ का रुख मोड़ा और बर्फ़ की चट्टानों और खतरनाक़ मौसम की परवाह किए बगैर मदद के लिए रवाना हो गया। हालांकि वो दूर होने की वजह से टाईटेनिक के डूबने के दो घंटे बाद लोकेशन पर पहुच सका लेकिन यही वो जहाज़ था, जिसने लाईफ बोट्स की मदद से टाईटेनिक के बाकी 710 मुसाफिरों को जिन्दा बचाया था और उन्हें हिफाज़त के साथ न्यूयार्क पहुचा दिया था।

उस जहाज़ के कैप्टन “आर्थो रोसट्रन ” को ब्रिटेन की तारीख के चंद बहादुर कैप्टनों में शुमार किया जाता है और उनको कई सामाजिक और सरकारी आवार्ड से भी नवाजा गया था।

हमारी जिन्दगी में हमेशा मुश्किलें रहती हैं, चैलेंज रहते हैं लेकिन जो इन मुश्किल और चैलेंज का सामना करते हुए भी इन्सानियत की भलाई के लिए कुछ कर जाए वही सच्चा इन्सान है।

महामुद्रा तिरोहित

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🍁सास बहू संबंध🍁
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पुत्रवधू का व्यवहार ऐसी हो कि सास ससुर गर्व करें!!

मैं पुनि पुत्रवधू प्रिय पाई।
रूप राशि गुन शील सुहाई।।

अपने प्राणपति श्रीराम जी के वनवास सुनकर सीता जी अपनी सासु माँ के शरण लेती हैं और सिर झुका कर नेत्रों से जलधार बहा रही हैं। उनकी व्याकुलता कौशल्या जी से सहन नहीं होता अतः वे पुत्र श्रीराम जी से विनती करती हैं कि- हे राम सुनो! मेरी प्यारी पुत्रवधू सीता बहुत सुकोमल है। इनका स्वभाव ऐसी है कि ये सास ससुर के साथ साथ परिवार के सभी सदस्यों को प्रिय हैं।

तात सुनहु सिय अति सुकुमारी। सास ससुर परिजनहि पिआरी।।

ये मेरी प्यारी पुत्रवधू अपने स्वभाव से परिजनों पर अमिट छाप छोड़ दी है।
हे राम! मैं सीता को पुत्रवधू के रूप में पाकर परम धन्य हो गई हूँ।
क्या विशेषता है जो सीता जी सभी को प्रिय हैं….
पुत्रवधू चयन करने वालों को इस पर विशेष ध्यान देना चाहिए…

१. रूप राशि- जब श्रीराम जी जनकपुर के पुष्प वाटिका में सखी संग सीता जी को देखे…
प्रभु जब जात जानकी जानी। सुख सनेह शोभा गुन खानी।।
१.सुख- प्रसन्नचित्त रहने वाली बहु हो , न तो आजकल बात बात पर मुँह लटकाने वाली बहुओं की भरमार है।

२. सनेह- पति, सास, ससुर, परिजन सभी से स्नेह रखने वाली बहु हो। जो जिस सम्मान के योग्य हैं उसे सम्मान दे।

३. शोभा- केवल बाह्य सुंदरता ही शोभा नहीं है और न तो आजकल की सभी नहीं परंतु बहुतेरे बहुएँ देखने में सुंदर किन्तु शील में कैसी हैं यह सर्व विदित है।

४.गुन खानी- सीता हरण समय भी श्रीराम जी को सीता जी के गुण याद आते हैं…हा गुन खानी जानकी सीता।
हमेशा शीतल स्वभाव रखने वाली बहु रहना चाहिए।
सीता जी वनवास में भी कौशल्या जी को छोड़िए कैकेई को भी अपने सेवा से अपने अधीन कर लीं…सीय सासु प्रति बेष बनाई। सादर करइ सरिस सेवकाई।।
सरिस- माता कौशल्या जी हों या वनवास देने वाली कैकेई सभी से सम भाव
सियँ सासु सेवा बस किन्हीं। तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं।।
सेवा के फलस्वरूप आशीर्वाद मिला, शिक्षा मिली।
और कैकेई आत्मग्लानी में डूब गई…

लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। “कुटिल रानी ” पछितानि अघाई।।
(काश! दहेज लोभी इन सभी पर ध्यान देते!!!!)

सास पुत्रवधू के स्नेह रूपी रस्सी से बँध गई हैं अतः उन्हें पुत्रवधू में सद्गुण क्यों न दिखाई देंगे।
जय रामजी की!!

सिताला दुबे

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

तुर्की का
सैन्य कमांडर बख्तियार खिलजी गंभीर रूप से बीमार पड़ गया।
सारे हकीम हार गए परंतु बीमारी का पता नहीं चल पाया खिलजी दिनों दिन कमजोर पड़ता गया और उसने बिस्तर पकड़ लिया ।उसे लगा कि अब उसके आखिरी दिन आ गए हैं ।
एक दिन उससे मिलने आए एक बुज़ुर्ग ने सलाह दी कि दूर भारत के मगध

साम्राज्य में अवस्थित
नालंदा महावीर के एक ज्ञानी राहुल शीलभद्र को एक बार दिखा लें ,वे आपको ठीक कर देंगे।
खिलजी तैयार नहीं हुआ। उसने कहा कि मैं किसी काफ़िर के हाथ की दवा नहीं ले सकता हूं चाहे मर क्यों न जाऊं!!
मगर बीबी बच्चों की जिद के आगे झुक गया। राहुल शीलभद्र जी तुर्की आए।

खिलजी ने उनसे कहा कि दूर से ही देखो मुझे छूना मत क्योंकि तुम काफिर हो और दवा मैं लूंगा नहीं।राहुल शीलभद्र जी ने उसका चेहरा देखा,शरीर का मुआयना किया,बलगम से भरे बर्तन को देखा,सांसों के उतार चढ़ाव का अध्ययन किया और बाहर चले गए
फिर लौटे और पूछा कि कुरान पढ़ते हैं?
खिलजी ने कहा दिन रात पढ़ते हैं
पन्ने कैसे पलटते हैं?
उंगलियों से जीभ को छूकर सफे पलटते हैं!!
शीलभद्र जी ने खिलजी को एक कुरान भेंट किया और कहा कि आज से आप इसे पढ़ें और राहुल शीलभद्र जी वापस भारत लौट आए
उधर दूसरे दिन से ही खिलजी की तबीयत ठीक होने लगी
और एक हफ्ते में वह भला चंगा हो गया
दरअसल राहुल शीलभद्र जी ने कुरान के पन्नों पर दवा लगा दी थी जिसे उंगलियों से जीभ तक पढ़ने के दौरान पहुंचाने का अनोखा तरीका अपनाया गया था
खिलजी अचंभित था मगर उससे भी ज्यादा ईर्ष्या और जलन से मरा जा रहा था कि आखिर एक काफिर मुस्लिम से ज्यादा काबिल कैसे हो गया?
अगले ही साल 1193 में उसने
सेना तैयार की और जा पहुंचा नालंदा महावीर मगध क्षेत्र।पूरी दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञान और विज्ञान का केंद्र। जहां 10000 छात्र और 1000 शिक्षक एक बड़े परिसर में रहते थे।जहां एक तीन मंजिला इमारत में विशाल लायब्रेरी थी जिसमें एक करोड़ पुस्तकें,पांडुलिपियां एवं ग्रंथ थे
खिलजी जब वहां पहुंचा तो शिक्षक और छात्र उसके स्वागत में बाहर आए क्योंकि उन्हें लगा कि वह कृतज्ञता व्यक्त करने आया है
खिलजी ने उन्हें देखा और मुस्कुराया….और तलवार से भिक्षु श्रेष्ठ की गर्दन काट दी
फिर हजारों छात्र और शिक्षक गाजर मूली की तरह काट डाले गए
खिलजी ने फिर ज्ञान विज्ञान के केंद्र
पुस्तकालय में आग लगा दी
कहा जाता है कि पूरे तीन महीने तक पुस्तकें जलती रहीं
खिलजी चिल्ला चिल्ला कर कह रहा था कि तुम काफिरों की हिम्मत कैसे हुई इतनी पुस्तकें पांडुलिपियां इकट्ठा करने की? बस एक कुरान रहेगा धरती पर बाकी सब को नष्ट कर दूंगा
पूरे नालंदा को तहस नहस कर जब वह लौटा तो
रास्ते में विक्रम शिला विश्वविद्यालय को भी जलाते हुए लौटा
मगध क्षेत्र के बाहर बंगाल में वह रूक गया और वहां खिलजी साम्राज्य की स्थापना की
जब वह लद्दाख क्षेत्र होते हुए तिब्बत पर आक्रमण करने की योजना बना रहा था तभी एक रात उसके एक कमांडर ने उसकी सोए में हत्या कर दी
आज भी बंगाल के
पश्चिमी दिनाजपुर में उसकी कब्र है जहां उसे दफनाया गया था
और सबसे हैरत की बात है कि उसी दुर्दांत हत्यारे के नाम पर बिहार में बख्तियार पुर नामक जगह है जहां रेलवे जंक्शन भी है जहां से नालंदा की ट्रेन जाती है।..साभार

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🙏प्रसाद🙏

अनभिज्ञता में हम कहीं दरिद्रता तो नहीं लेकर जा रहे ??

सभी की आँखें खोलने के लिए ये संदेश है… जो मंदिर/ गुरुद्वारा से लंगर- भंडारा को अपने घर बांध बांध कर ले जाते हैं..!!

एक बार गुरु देव जी एक नगर को गए। वहाँ सारे नगर वासी इकठे हो गए।

वहाँ एक महिला भक्त श्री गुरु देव जी से कहने लगी- महाराज! मैंने तो सुना है, आप सभी के दुःख दूर करते हो। मेरे भी दुःख दूर करो, मैं बहुत दुखी हूँ। मैं तो आप के मंदिर में रोज 50 रोटी अपने घर से बना कर बाँटती हूँ, फिर भी दुखी हूँ।

ऐसा क्यों ? गुरु देव जी ने कहा- कि तू दुसरों का दुःख अपने घर लाती हो, इस लिए दुखी हो। वो कहने लगी – महाराज! मुझे कुछ समझ नहीं आया, मुझ अज्ञानी को ज्ञान दो। गुरु देव जी कहने लगे- तू 50 रोटी मंदिर द्वार में बांटती तो हो… पर बदले में क्या ले जाती हो ? वो कहने लगी- सिर्फ आप के भंडारे में बंट रही प्रसाद के सिवा और कुछ भी नहीं।

गुरु देव जी कहने लगे- लंगर या भंडारा का मतलब है एक रोटी खाना और अपने गुरु या भगवान का कृतज्ञता मानना। पर तू तो रोज बड़ी- बड़ी थैलियों में दाल मखनी , मटर पनीर, रायता, खीर और 15- 20 रोटी भर- भर के ले जाती हो। तीन दिन वो लंगर अर्थात प्रसाद तेरे घर में रहता है।

तू अपने घर में सभी परिवार को वो खिलाती हो। तू नहीं जानती कि भगवान और गुरु के घर की रोटी के एक टुकड़े में भी भगवान जी की वो ही कृपा रहती है, जितना भगवान जी के भंडारे में होती है।

तू कहती है मेरे बच्चे घर पर हैं उनके लिए, मेरे पोतों के लिए, मेरी बहू के लिए, मेरे बेटे के लिए इन सब के लिए भरपूर भंडारा, लंगर ले जाना है। सब को ये कहकर तू भर – भर कर लंगर/ प्रसाद अपने घर ले जाती है। पर तू ये नहीं जानती कि मंदिर में इस लंगर को चखने से कितनों के दुःख दूर होने थे।

पर तूने अपने सुख के लिए दुसरों के दुख दूर नहीं होने दिए। इसी लिए तू उनके सारे दुख अपने घर ले जाती हो और दुखी रहती हो। तेरे दुख तो दिन दुगने रात चौगुने बढ़ रहे हैं। उसमें हम क्या करें बता ? उसकी आँखों से अंधकार हट गया।

वो जोर से रोने लगी और बोली- महाराज मैं अंधकार में डूबी थी। मुझे क्षमा करो, अपने चरणों से लगाओ। अब से मैं एक ही चम्मच का लंगर करूंगी। गुरु देव जी ने समझाया कि इंसान अपने दुःख खुद खरीदता है, पर उसे कभी पता नहीं चलता।

इसलिए लंगर में अपनी भूख जितना ही खाना चाहिए और लंगर प्रसाद को भर भर कर घर कभी नहीं लाना चाहिए। प्रसाद का एक कण भी कृपा से भरपूर होता है। इसलिए ध्यान अवश्य रखें।। भंडारे का प्रसाद घर लाना दरिद्रता को लाना होता है।।
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!!जय श्री कृष्णा राधे राधे!!

हरीश शर्मा

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*ईश्वर अवश्य देगा*
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एक बार एक राजा था, वह जब भी मंदिर जाता, तो 2 भिखारी उसके दाएं और बाएं बैठा करते..
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दाईं तरफ़ वाला कहता: “हे ईश्वर, तूने राजा को बहुत कुछ दिया है, मुझे भी दे दे.!”
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बाईं तरफ़ वाला कहता: “ऐ राजा.! ईश्वर ने तुझे बहुत कुछ दिया है, मुझे भी कुछ दे दे.!”
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दाईं तरफ़ वाला भिखारी बाईं तरफ़ वाले से कहता: ईश्वर से माँग वह सबकी सुनने वाला है..
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बाईं तरफ़ वाला जवाब देता: “चुप कर मुर्ख..”
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एक बार राजा ने अपने मंत्री को बुलाया और कहा कि मंदिर में दाईं तरफ जो भिखारी बैठता है वह हमेशा ईश्वर से मांगता है तो अवश्य ईश्वर उसकी ज़रूर सुनेगा..
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लेकिन जो बाईं तरफ बैठता है वह हमेशा मुझसे फ़रियाद करता रहता है, तो तुम ऐसा करो कि एक बड़े से बर्तन में खीर भर के उसमें स्वर्ण मुद्रा डाल दो और वह उसको दे आओ.!
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मंत्री ने ऐसा ही किया.. अब वह भिखारी मज़े से खीर खाते-खाते दूसरे भिखारी को चिड़ाता हुआ बोला: “हुह… बड़ा आया ईश्वर देगा..’, यह देख राजा से माँगा, मिल गया ना.?”
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खाते खाते जब इसका पेट भर गया तो इसने बची हुई खीर का बर्तन उस दूसरे भिखारी को दे दिया और कहा: “ले पकड़… तू भी खाले, मुर्ख..”
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अगले दिन जब राजा आया तो देखा कि बाईं तरफ वाला भिखारी तो आज भी वैसे ही बैठा है लेकिन दाईं तरफ वाला ग़ायब है..
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राजा नें चौंक कर उससे पूछा: “क्या तुझे खीर से भरा बर्तन नहीं मिला.?”
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भिखारी: “जी मिला था राजा जी, क्या स्वादिस्ट खीर थी, मैंने ख़ूब पेट भर कर खायी.!”
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राजा: “फिर..?!!?”
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भिखारी: “फ़िर जब मेरा पेट भर गया तो वह जो दूसरा भिखारी यहाँ बैठता है मैंने उसको दे दी, मुर्ख हमेशा कहता रहता है: ‘ ईश्वर देगा, ईश्वर देगा.!’ ले खा ले !
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राजा मुस्कुरा कर बोला: “अवश्य ही, ईश्वर ने उसे दे ही दिया.!”
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इसी तरह हमें भी उस भगवान से ही विनती करनी चाहिए। वही हमें देने वाला है, दुनिया के जीव तो एक जरिया है। बाकी उसकी मर्जी से ही मिलता है।
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इसलिए उस कुल मालिक को हमेशा याद रखो। हर रोज भजन बंदगी सिमरन करो, तब जाकर हमारा परमार्थ और स्वार्थ दोनों बन पाएंगे..!!

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—– साबुन —–

“यह संस्कार दे रही हो भाभी… अपनी बच्ची को।” संजना तमतमा कर बोली।
अमीर घर में ब्याही संजना गर्मी की छुट्टियों में अपने गाँव मायके छह बरस के बेटे लवी को लेकर आई है। अपने साथ मँहगी खुशबूदार साबुन लाई है… बेटे को सदा से इसी साबुन की आदत है।वह बेटे को नहलाने के बाद अपने किट में वापस रख लेती है…पर सात बरस की रिया ने बुआ की किट से साबुन निकालकर खूब नहाया।
“क्या हुआ दीदी….!” रजनी किचन से दौड़ी- दौड़ी आई उसने देखा,
रिया बुआ के सामने डरी हुई खड़ी थी।
“यहाँ वह साबुन मिलता नहीं है, दस दिन तक लवी को क्या लगाऊंगी… बिना पूछे किसी की चीज लेना चोरी है… आपने बताया नहीं क्या?” संजना के तेवर कम न हुए।
रजनी बुरी तरह से क्षोभ से भर उठी। पूरे गुस्से से रिया को जोरदार चाँटा मारने को ही थी कि सासू माँ की कड़क आवाज गूंज उठी,” खबरदार बहू … जो रिया पर हाथ उठाया…।”
रजनी ने बेचारगी से खुद को रोक तो लिया पर उसकी आंखों में विवशता की नमी तैर गई।
संजना माँ को कुछ बोलने को थी पर उनकी इस प्रतिक्रिया ने उसे रोक लिया।
“बच्चे चोर नहीं होते…नासमझ मासूम होते हैं…संजना बेटा संस्कार देना तो शायद मैं तुम्हे भूल गई…।”
बेटी ने आश्चर्य से अपनी माँ को देखा।
“बच्चे सब एक से होते हैं… छोटी- छोटी चीजों में हम उन्हें भेद-भाव करना सिखा देते हैं… और एक दिन वे यही व्यवहार हमारे साथ करते हैं।”
दबे पाँव दोनों बच्चे कब खेलने बाहर भाग गए थे किसी को पता न था।

—– रश्मि स्थापक

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बुद्धिमान कौन

बहुत पुरानी बात है, उन दिनों आज की तरह स्कूल नही होते थें. गुरुकुल शिक्षा प्रणाली थी और छात्र गुरुकुल में ही रहकर पढ़ते थे. उन्हीं दिनों की बात है. एक विद्वान पंडित थे, उनका नाम था- राधे गुप्त. उनका गुरुकुल बड़ा ही प्रसिद्ध था, जहाँ दूर दूर से बालक शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे.

राधे गुप्त की पत्नी का देहांत हो चूका था, उनकी उम्रः भी ढलने लगी थी, घर में विवाह योग्य एक कन्या थी, जिनकीं चिंता उन्हें हर समय सताती थी. पंडित राधे गुप्त उसका विवाह ऐसे योग्य व्यक्ति से करना चाहते थे, जिसके पास सम्पति भले न हो पर बुद्धिमान हो.

एक दिन उनकें मन में विचार आया, उनहोंने सोचा कि क्यों न वे अपने शिष्यों में ही योग्य वर की तलाश करें. ऐसा विचार कर उन्होंने बुद्धिमान शिष्य की परीक्षा लेने का निर्णय लिया, उन्होंने सभी शिष्यों को एकत्र किया और उनसें कहा-”मैं एक परीक्षा आयोजित करना चाहता हूँ, इसका उद्देश्य यह जानना है कि कौन सबसें बुद्धिमान है.

मेरी पुत्री विवाह योग्य हो गईं है और मुझें उसके विवाह की चिंता है, लेकिन मेरे पास पर्याप्त धन नही है. इसलिए मैं चाहता हूँ कि सभी शिष्य विवाह में लगने वाली सामग्री एकत्र करे. भले ही इसके लिए चोरी का रास्ता क्यों न चुनना पड़े. लेकिन सभी को एक शर्त का पालन करना होगा, शर्त यह है कि किसी भी शिष्य को चोरी करते हुए कोई देख न सके.

अगले दिन से सभी शिष्य अपने अपने काम में जुट गये. हर दिन कोई न कोई न कोई शिष्य अलग अलग तरह की वस्तुएं चुरा कर ला रहा था और गुरूजी को दे रहा था. राधे गुप्त उन वस्तुओं को सुरक्षित स्थान पर रखते जा रहे थे. क्योंकि परीक्षा के बाद उन्हें सभी वस्तुएं उनकें मालिक को वापिस करनी थी.

परीक्षा से वे यही जानना चाहते थे कि कौन सा शिष्य उनकी बेटी से विवाह करने योग्य है. सभी शिष्य अपने अपने दिमाग से कार्य कर रहे थे. लेकिन उनमें से एक छात्र रामास्वामी, जो गुरुकुल का सबसे होनहार छात्र था, चुपचाप एक वृक्ष के नीचे बैठा कुछ सोच रहा था.

उसे सोच में बैठा देख राधे गुप्त ने कारण पूछा. रामास्वामी ने बताया, “आपने परीक्षा की शर्त के रूप में कहा था कि चोरी करते समय कोई देख न सके. लेकिन जब हम चोरी करते है, तब हमारी अंतरात्मा तो सब देखती है, हम खुद से उसे छिपा नही सकते. इसका अर्थ यही हुआ न कि चोरी करना व्यर्थ है.”

उसकी बात सुनकर राधे गुप्त का चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा. उन्होंने उसी समय सभी शिष्यों को एकत्र किया और उनसें पूछा-”आप सबने चारी की.. क्या किसी ने देखा? सभी ने इनकार में सिर हिलाया. तब राधे गुप्त बोले ”बच्चों ! क्या आप अपने अंतर्मन से भी इस चोरी को छुपा सके?”

इतना सुनते ही सभी बच्चों ने सिर झुका लिया. इस तरह गुरूजी ने अपनी पुत्री के लिए योग्य और बुद्धिमान वर मिल गया. उन्होंने रामास्वामी के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर दिया. साथ ही शिष्यों द्वारा चुराई गई वस्तुएं उनके मालिकों को वापिस कर बड़ी विनम्रता से क्षमा मांग ली.

शिक्षा:-
इस प्रसंग से यह शिक्षा मिलती है कि कोई भी कार्य अंतर्मन से छिपा नहीं रहता और अंतर्मन ही व्यक्ति को सही रास्ता दिखाता है. इसलिए मनुष्य को कोई भी कार्य करते समय अपने मन को जरुर टटोलना चाहिए, क्योंकि मन सत्य का ही साथ देता है ।

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गुप्ता जी अपने परिवार के साथ अपने पैतृक गाँव से निकलकर एक शहर में रहने के लिए आ गए।

अपनी आजीविका कमाने के लिए उन्होंने मिठाई की एक दुकान खोली। ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए उन्होंने एक स्लेट टांग दी, जिस पर उन्होंने लिखा: “यहाँ ताज़ा मिठाई बिकती है।” फिर वह दुकान पर बैठकर ग्राहकों के मिठाई खरीदने का इंतज़ार करने लगे।

एक राहगीर दुकान पर रुका। उसने बोर्ड की ओर देखा और कहा, ” ‘ताज़ा’ क्यों लिखा है? कोई भी बासी मिठाई नहीं बेचता है, क्या कोई बेचता है?” गुप्ता जी ने उसे धन्यवाद दिया और ‘ताज़ा’ शब्द मिटा दिया।

बोर्ड पर अब लिखा था, “यहाँ मिठाई बिकती है।”

उसी दिन, एक और व्यक्ति दुकान पर आया, उसने बोर्ड की ओर देखा और असहमति में अपना सिर हिलाया।

उसने गुप्ता जी से कहा , “यहाँ, क्या ‘यहाँ’ लिखना ज़रूरी है? जिस क्षण कोई भी मिठाई देखेगा, वह समझ जाएगा कि मिठाई यहाँ बिकती है।”

गुप्ता जी ने उसे धन्यवाद दिया और उसकी बात मान ली। उसने ‘यहाँ’ शब्द को मिटा दिया। अब बोर्ड पर लिखा था, “मिठाई बिकती है।”

कुछ समय बाद उस शहर के स्कूल के शिक्षक दुकान पर आए। बोर्ड की ओर देखा और कहा, “बिकती? बेशक, आपने मिठाइयाँ बेचने के लिए रखी हैं, दान में देने के लिए नहीं।”

गुप्ता जी ने उसे धन्यवाद दिया और ‘बिकती’ शब्द को मिटा दिया। बोर्ड पर अब लिखा था, “मिठाई।” अब फिर से वे ग्राहकों का धैर्यपूर्वक इंतज़ार करने लगे।

अब शहर के एक बुद्धिमान व्यक्ति दुकान पर आए और उन्होंने कहा, “दुकान के आधा मील दूर से ही मिठाई की खुशबु आने लगती है। क्या लिख कर के ये बताना जरूरी है कि यह मिठाई की दुकान है?”

गुप्ता जी ने उसे धन्यवाद दिया, और बोर्ड पर जो एकमात्र शब्द लिखा था, ‘*मिठाई*’ उसे भी मिटा दिया।

अब ऊपर एक स्लेट लटक रही थी जिस पर कुछ भी नहीं लिखा था।

गुप्ता जी फिर से ग्राहकों का इंतज़ार करने लगे ।

तभी उसकी पत्नी आई। उसने पूछा, “यहाँ खाली स्लेट क्यों लटका हुआ है। क्या यह ग्राहकों को आकर्षित करने का तरीका है?”

उसने गुप्ता जी से गुस्से में कहा, “आप स्लेट पर लिखते क्यों नहीं हैं: ‘ताज़ा मिठाइयाँ यहाँ बिकती हैं?”

उस दिन गुप्ता जी को एक बात अच्छी तरह समझ में आ गई, कि किसी भी एक वस्तु को देखने और समझने का सब का नज़रिया अलग-अलग होता है।
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हम सभी के पास किसी भी चीज़ को देखने और समझने के लिए एक जैसी इंद्रियाँ होती हैं लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि हर कोई इसे एक ही तरह से समझे और देखे।
*”जब हम ह्रदय की सुनते हैं, तो निष्क्रिय करने वाले संदेह एवं भ्रम के बजाय, हम केवल आत्मविश्वास से भरे निर्णय लेते हैं।”*

रवि kant

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न्यायधीश का अनोखा दंड 🙏🙏

अमेरिका में एक पंद्रह साल का लड़का था, स्टोर से चोरी करता हुआ पकड़ा गया। पकड़े जाने पर गार्ड की गिरफ्त से भागने की कोशिश में स्टोर का एक शेल्फ भी टूट गया।

जज ने जुर्म सुना और लड़के से पूछा, “क्या तुमने सचमुच चुराया था ब्रैड और पनीर का पैकेट”?

लड़के ने नीचे नज़रें कर के जवाब दिया- जी हाँ।

जज :- क्यों ?

लड़का :- मुझे ज़रूरत थी।

जज :- खरीद लेते।

लड़का :- पैसे नहीं थे।

जज:- घर वालों से ले लेते।

लड़का:- घर में सिर्फ मां है। बीमार और बेरोज़गार है, ब्रैड और पनीर भी उसी के लिए चुराई थी।

जज:- तुम कुछ काम नहीं करते ?

लड़का:- करता था एक कार वाश में। मां की देखभाल के लिए एक दिन की छुट्टी की थी, तो मुझे निकाल दिया गया।

जज:- तुम किसी से मदद मांग लेते?

लड़का:- सुबह से घर से निकला था, लगभग पचास लोगों के पास गया, बिल्कुल आख़िर में ये क़दम उठाया।

जिरह ख़त्म हुई, जज ने फैसला सुनाना शुरू किया, चोरी और विशेषतौर से ब्रैड की चोरी बहुत ही शर्मनाक अपराध है और इस अपराध के हम सब ज़िम्मेदार हैं।

“अदालत में मौजूद हर शख़्स.. मुझ सहित सभी अपराधी हैं, इसलिए यहाँ मौजूद प्रत्येक व्यक्ति पर दस-दस डालर का जुर्माना लगाया जाता है। दस डालर दिए बग़ैर कोई भी यहां से बाहर नहीं जा सकेगा।”

ये कह कर जज ने दस डालर अपनी जेब से बाहर निकाल कर रख दिए और फिर पेन उठाया लिखना शुरू किया:- इसके अलावा मैं स्टोर पर एक हज़ार डालर का जुर्माना करता हूं कि उसने एक भूखे बच्चे से इंसानियत न रख कर उसे पुलिस के हवाले किया।

अगर चौबीस घंटे में जुर्माना जमा नहीं किया तो कोर्ट स्टोर सील करने का हुक्म देगी।

जुर्माने की पूर्ण राशि इस लड़के को देकर कोर्ट उस लड़के से माफी चाहती है।

फैसला सुनने के बाद कोर्ट में मौजूद लोगों के आंखों से आंसू तो बरस ही रहे थे, उस लड़के की भी हिचकियां बंध गईं। वह लड़का बार बार जज को देख रहा था जो अपने आंसू छिपाते हुए बाहर निकल गये।

क्या हमारा समाज, सिस्टम और अदालत इस तरह के निर्णय के लिए तैयार हैं?

चाणक्य ने कहा था कि “यदि कोई भूखा व्यक्ति रोटी चोरी करता पकड़ा जाए तो उस देश के लोगों को शर्म आनी चाहिए।”