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देवीसिंह तोमर

मनु स्मृति के अनुसार,इन पंद्रह लोगों के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए!!!!!!

ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः।
बालवृद्धातुरैर्वैधैर्ज्ञातिसम्बन्धिबांन्धवैः।।
मातापितृभ्यां यामीभिर्भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया।
दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत्।।

अर्थात् : – यज्ञकरने,वाले,पुरोहित,आचार्य,अतिथियों,माता,पिता,मामा आदि।संबंधियों,भाई,बहन,पुत्र,पुत्री,पत्नी,पुत्रवधू,दामाद तथा,गृह सेवकों यानी नौकरों से वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

यज्ञ करने वाला : – यज्ञ करने वाला ब्राह्मण सदैव सम्मान करने योग्य होता है। यदि उससे किसी प्रकार की कोई चूक हो जाए तो भी उसके साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। यदि आप ऐसा करेंगे तो इससे आपकी प्रतिष्ठा ही धूमिल होगी। अतः यज्ञ करने वाले वाले ब्राह्मण से वाद-विवाद न करने में ही भलाई है।_

पुरोहित : – यज्ञ, पूजन आदि धार्मिक कार्यों को संपन्न करने के लिए एक योग्य व विद्वान ब्राह्मण को नियुक्त किया जाता है, जिसे पुरोहित कहा जाता है। भूल कर भी कभी पुरोहित से विवाद नहीं करना चाहिए। पुरोहित के माध्यम से ही पूजन आदि शुभ कार्य संपन्न होते हैं, जिसका पुण्य यजमान (यज्ञ करवाने वाला) को प्राप्त होता है। पुरोहित से वाद-विवाद करने पर वह आपका काम बिगाड़ सकता है, जिसका दुष्परिणाम यजमान को भुगतना पड़ सकता है। इसलिए पुरोहित से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

आचार्य : – प्राचीनकाल में उपनयन संस्कार के बाद बच्चों को शिक्षा के लिए गुरुकुल भेजा जाता था, जहां आचार्य उन्हें पढ़ाते थे। वर्तमान में उन आचार्यों का स्थान स्कूल टीचर्स ने ले लिया है। मनु स्मृति के अनुसार आचार्य यानी स्कूल टीचर्स से भी कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। वह यदि दंड भी दें तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। आचार्य (टीचर्स) हमेशा अपने छात्रों का भला ही सोचते हैं। इनसे वाद-विवाद करने पर विद्यार्थी का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है।

अतिथि : – हिंदू धर्म में अतिथि यानी मेहमान को भगवान की संज्ञा दी गई है इसलिए कहा जाता है मेहमान भगवान के समान होता है। उसका आवभगत ठीक तरीके से करनी चाहिए। भूल से भी कभी अतिथि के साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। अगर कोई अनजान व्यक्ति भी भूले-भटके हमारे घर आ जाए तो उसे भी मेहमान ही समझना चाहिए और यथासंभव उसका सत्कार करना चाहिए। अतिथि से वाद-विवाद करने पर आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस लग सकती है।

माता : – माता ही शिशु की सबसे प्रथम शिक्षक होती है। माता 9 महीने शिशु को अपने गर्भ में धारण करती है और जीवन का प्रथम पाठ पढ़ाती है। यदि वृद्धावस्था या इसके अतिरिक्त भी कभी माता से कोई भूल-चूक हो जाए तो उसे प्यार से समझा देना चाहिए न कि उसके साथ वाद-विवाद करना चाहिए। माता का स्थान गुरु व भगवान से ही ऊपर माना गया है। इसलिए माता सदैव पूजनीय होती हैं। अतः माता के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

*पिता : – पिता ही जन्म से लेकर युवावस्था तक हमारा पालन-पोषण करते हैं। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पिता के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। पिता भी माता के ही समान पूज्यनीय होते हैं। हम जब भी किसी मुसीबत में फंसते हैं, तो सबसे पहले पिता को ही याद करते हैं और पिता हमें उस समस्या का समाधान भी सूझाते हैं। वृद्धावस्था में भी पिता अपने अनुभव के आधार पर हमारा मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए पिता के साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

मामा आदि संबंधी : – मामा आदि संबंधी जैसे- काका-काकी, ताऊ-ताईजी, बुआ-फूफाजी, ये सभी वो लोग होते हैं, जो बचपन से ही हम पर स्नेह रखते हैं। बचपन में कभी न कभी ये भी हमारी जरूरतें पूरी करते हैं। इसलिए ये सभी सम्मान करने योग्य हैं। इनसे वाद-विवाद करने पर समाज में हमें सभ्य नहीं समझा जाएगा और हमारी प्रतिष्ठा को भी ठेस लग सकती है। इसलिए भूल कर भी कभी मामा आदि सगे-संबंधियों से वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। यदि ऐसी स्थिति बने तो भी समझा-बूझाकर इस मामले को सुलझा लेना चाहिए।_

भाई : – हिंदू धर्म के अनुसार बड़ा भाई पिता के समान तथा छोटा भाई पुत्र के समान होता है। बड़ा भाई सदैव मार्गदर्शक बन कर हमें सही रास्ते पर चलने के प्रेरित करता है और यदि भाई छोटा है तो उसकी गलतियां माफ कर देने में ही बड़प्पन है। विपत्ति आने पर भाई ही भाई की मदद करता है। बड़ा भाई अगर परिवार रूपी वटवृक्ष का तना है तो छोटा भाई उस वृक्ष की शाखाएं। इसलिए भाई छोटा हो या बड़ा उससे किसी भी प्रकार का वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।_

बहन : – भारतीय सभ्यता में बड़ी बहन को माता तथा छोटी बह न को पुत्री माना गया है। बड़ी बहन अपने छोटे भाई-बहनों को माता के समान ही स्नेह करती है। संकट के समय सही रास्ता बताती है। छोटे भाई-बहनों पर जब भी विपत्ति आती है, बड़ी बहन हर कदम पर उनका साथ देती है।

छोटी बहन पुत्री के समान होती है। परिवार में जब भी कोई शुभ प्रसंग आता है, छोटी बहन ही उसे खास बनाती है। छोटी बहन जब घर में होती है तो घर का वातावरण सुखमय हो जाता है। इसलिए मनु स्मृति में कहा गया है कि बहन के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

पुत्र : – हिंदू धर्म ग्रंथों में पुत्र को पिता का स्वरूप माना गया है यानी पुत्र ही पिता के रूप में पुनः जन्म लेता है। शास्त्रों के अनुसार पुत्र ही पिता को पुं नामक नरक से मुक्ति दिलाता है। इसलिए उसे पुत्र कहते हैं।

पुं नाम नरक त्रायेताति इति पुत्र : – पुत्र द्वारा पिंडदान, तर्पण आदि करने पर ही पिता की आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है। पुत्र यदि धर्म के मार्ग पर चलने वाला हो तो वृद्धावस्था में माता-पिता का सहारा बनता है और पूरे परिवार का मार्गदर्शन करता है। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पुत्र से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

पुत्री : – भारतीय संस्कृति में पुत्री को लक्ष्मी का रूप माना जाता है। कहते हैं कि भगवान जिस पर प्रसन्न होता है, उसे ही पुत्री प्रदान करता है। संभव है कि पुत्र वृद्धावस्था में माता-पिता का पालन-पोषण न करे, लेकिन पुत्री सदैव अपने माता-पिता का साथ निभाती है। परिवार में होने वाले हर मांगलिक कार्यक्रम की रौनक पुत्रियों से ही होती है। विवाह के बाद भी पुत्री अपने माता-पिता के करीब ही होती है। इसलिए पुत्री से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।_

पत्नी : – हिंदू धर्म में पत्नी को अर्धांगिनी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पति के शरीर का आधा अंग। किसी भी शुभ कार्य व पूजन आदि में पत्नी का साथ में होना अनिवार्य माना गया है, उसके बिना पूजा अधूरी ही मानी जाती है। पत्नी ही हर सुख-दुख में पति का साथ निभाती है। वृद्धावस्था में यदि पुत्र आदि रिश्तेदार साथ न हो तो भी पत्नी कदम-कदम पर साथ चलती है। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पत्नी से भी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

पुत्रवधू* : – पुत्र की पत्नी को पुत्रवधू कहते हैं। भारतीय संस्कृति के अनुसार पुत्रवधू को भी पुत्री के समान ही समझना चाहिए। पुत्रियों के अभाव में पुत्रवधू से ही घर में रौनक रहती है। कुल की मान-मर्यादा भी पुत्रवधू के ही हाथों में होती है। परिवार के सदस्यों व अतिथियों की सेवा भी पुत्रवधू ही करती है। पुत्रवधू से ही वंश आगे बढ़ता है। इसलिए यदि पुत्रवधू से कभी कोई चूक भी हो जाए तो भी उसके साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।_

गृह सेवक यानी नौकर : – मनु स्मृति के अनुसार गृह सेवक यानी नौकर से भी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि पुराने सेवक आपकी व आपके परिवार की कई गुप्त बातें जानता है। वाद-विवाद करने पर वह गुप्त बातें सार्वजनिक कर सकता है। जिससे आपके परिवार की प्रतिष्ठा खराब हो सकती है। इसलिए नौकर से भी कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।_

दामाद : – पुत्री के पति को दामाद यानी जमाई कहते हैं। धर्म ग्रंथों में पुत्री के पुत्र (धेवते) को पोत्र समान माना गया है। पुत्र पोत्र के न होने पर धेवता ही उससे संबंधित सभी जिम्मेदारी निभाता है तथा नाना के उत्तर कार्य (पिंडदान, तर्पण, श्राद्ध आदि) करने का अधिकारी भी होता है। दामाद से इसलिए भी विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका असर आपकी पुत्री के दांपत्य जीवन पर भी पढ़ सकता है।

Posted in संस्कृत साहित्य

मिलनाडु के प्राचीन पंचवर्णस्वामी मंदिर की दीवाल पर साईकिल पर बैठे एक वयक्ति की मूर्ति उकीर्ण है ।।
जिसमे साफ़ तौर पर युवक सायकल पैडल मारता हुआ दिखाई दे रहा है इस तस्वीर ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है।
ये मूर्ति 2000 साल पुरानी है । लेकिन साईकिल का आविष्कार तो 200 साल पहले यूरोप में हुआ था ।।
एक बात हमेशा दिमाग में घूमती है सारे बड़े बड़े आविष्कार सिर्फ 250 सालो के अंदर ही हुए जब अंग्रेज और फ्रांसीसी पुर्तगाली भारत आये इससे पहले क्यों कोई आविष्कार नही हुआ भारत आने के बाद हजारो आविष्कार कैसे होने लगे ???

विदेशी आक्रमण कारियों ने हमारे धन सम्पति के साथ साथ विज्ञान और तकनीक को भी चुराया है ।और अपने नाम से छापा है।

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

सर! मुझे पहचाना?”

“कौन?”

“सर, मैं आपका स्टूडेंट। 40 साल पहले का

“ओह! अच्छा। आजकल ठीक से दिखता नही बेटा और याददाश्त भी कमज़ोर हो गयी है। इसलिए नही पहचान पाया। खैर। आओ, बैठो। क्या करते हो आजकल?” उन्होंने उसे प्यार से बैठाया और पीठ पर हाथ फेरते हुए पूछा।

“सर, मैं भी आपकी ही तरह टीचर बन गया हूँ।”

“वाह! यह तो अच्छी बात है लेकिन टीचर की तनख़ाह तो बहुत कम होती है फिर तुम कैसे…?”

“सर। जब मैं सातवीं क्लास में था तब हमारी कलास में एक वाक़िआ हुआ था। उस से आपने मुझे बचाया था। मैंने तभी टीचर बनने का इरादा कर लिया था। वो वाक़िआ मैं आपको याद दिलाता हूँ। आपको मैं भी याद आ जाऊँगा।”

“अच्छा! क्या हुआ था तब?”

“सर, सातवीं में हमारी क्लास में एक बहुत अमीर लड़का पढ़ता था। जबकि हम बाक़ी सब बहुत ग़रीब थे। एक दिन वोह बहुत महंगी घड़ी पहनकर आया था और उसकी घड़ी चोरी हो गयी थी। कुछ याद आया सर?”

“सातवीं कक्षा?”

“हाँ सर। उस दिन मेरा दिल उस घड़ी पर आ गया था और खेल के पीरियड में जब उसने वह घड़ी अपने पेंसिल बॉक्स में रखी तो मैंने मौक़ा देखकर वह घड़ी चुरा ली थी।
उसके बाद आपका पीरियड था। उस लड़के ने आपके पास घड़ी चोरी होने की शिकायत की। आपने कहा कि जिसने भी वह घड़ी चुराई है उसे वापस कर दो। मैं उसे सज़ा नहीं दूँगा। लेकिन डर के मारे मेरी हिम्मत ही न हुई घड़ी वापस करने की।”

“फिर आपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और हम सबको एक लाइन से आँखें बंद कर खड़े होने को कहा और यह भी कहा कि आप सबकी जेब देखेंगे लेकिन जब तक घड़ी मिल नहीं जाती तब तक कोई भी अपनी आँखें नहीं खोलेगा वरना उसे स्कूल से निकाल दिया जाएगा।”

“हम सब आँखें बन्द कर खड़े हो गए। आप एक-एक कर सबकी जेब देख रहे थे। जब आप मेरे पास आये तो मेरी धड़कन तेज होने लगी। मेरी चोरी पकड़ी जानी थी। अब जिंदगी भर के लिए मेरे ऊपर चोर का ठप्पा लगने वाला था। मैं पछतावे से भर उठा था। उसी वक्त जान देने का इरादा कर लिया था लेकिन….लेकिन मेरी जेब में घड़ी मिलने के बाद भी आप लाइन के आख़िर तक सबकी जेब देखते रहे। और घड़ी उस लड़के को वापस देते हुए कहा, “अब ऐसी घड़ी पहनकर स्कूल नहीं आना और जिसने भी यह चोरी की थी वह दोबारा ऐसा काम न करे। इतना कहकर आप फिर हमेशा की तरह पढाने लगे थे।”कहते कहते उसकी आँख भर आई।

वह रुंधे गले से बोला, “आपने मुझे सबके सामने शर्मिंदा होने से बचा लिया। आगे भी कभी किसी पर भी आपने मेरा चोर होना जाहिर न होने दिया। आपने कभी मेरे साथ फ़र्क़ नहीं किया। उसी दिन मैंने तय कर लिया था कि मैं आपके जैसा टीचर ही बनूँगा।”

“हाँ हाँ…मुझे याद आया।” उनकी आँखों मे चमक आ गयी। फिर चकित हो बोले, “लेकिन बेटा… मैं आजतक नहीं जानता था कि वह चोरी किसने की थी क्योंकि…जब मैं तुम सबकी जेब देख कर रहा था तब मैंने भी अपनी आँखें बंद कर ली थीं।”

शिक्षक संस्कारों का
निर्माता होता है।

Posted in महाभारत - Mahabharat

शीतला दुबे

भगवान् श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ी अनसुनी बातें…
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1. भगवान् श्री कृष्ण के खड्ग का नाम ‘नंदक’, गदा का नाम ‘कौमौदकी’ और शंख का नाम ‘पांचजन्य’ था जो गुलाबी रंग का था।

  1. भगवान् श्री कॄष्ण के परमधामगमन के समय ना तो उनका एक भी केश श्वेत था और ना ही उनके शरीर पर कोई झुर्री थीं।

3.भगवान् श्री कॄष्ण के धनुष का नाम शारंग व मुख्य आयुध चक्र का नाम ‘ सुदर्शन’ था। वह लौकिक, दिव्यास्त्र व देवास्त्र तीनों रूपों में कार्य कर सकता था उसकी बराबरी के विध्वंसक केवल दो अस्त्र और थे पाशुपतास्त्र ( शिव , कॄष्ण और अर्जुन के पास थे) और प्रस्वपास्त्र ( शिव , वसुगण , भीष्म और कृष्ण के पास थे) ।

  1. भगवान् श्री कॄष्ण की परदादी ‘मारिषा’ व सौतेली मां रोहिणी( बलराम की मां) ‘नाग’ जनजाति की थीं.

  2. भगवान श्री कॄष्ण से जेल में बदली गई यशोदापुत्री का नाम एकानंशा था, जो आज विंध्यवासिनी देवी के नाम से पूजी जातीं हैं।

  3. भगवान् श्री कॄष्ण की प्रेमिका ‘राधा’ का वर्णन महाभारत, हरिवंशपुराण, विष्णुपुराण व भागवतपुराण में नहीं है। उनका उल्लेख बॄम्हवैवर्त पुराण, गीत गोविंद व प्रचलित जनश्रुतियों में रहा है।

  4. जैन परंपरा के मुताबिक, भगवान श्री कॄष्ण के चचेरे भाई तीर्थंकर नेमिनाथ थे जो हिंदू परंपरा में ‘घोर अंगिरस’ के नाम से प्रसिद्ध हैं.

  5. भगवान् श्री कॄष्ण अंतिम वर्षों को छोड़कर कभी भी द्वारिका में 6 महीने से अधिक नहीं रहे।

  6. भगवान श्री कृष्ण ने अपनी औपचारिक शिक्षा उज्जैन के संदीपनी आश्रम में मात्र कुछ महीनों में पूरी कर ली थी।

  7. ऐसा माना जाता है कि घोर अंगिरस अर्थात नेमिनाथ के यहाँ रहकर भी उन्होंने साधना की थी.

  8. प्रचलित अनुश्रुतियों के अनुसार, भगवान श्री कॄष्ण ने मार्शल आर्ट का विकास ब्रज क्षेत्र के वनों में किया था और डांडिया रास उसी का नॄत्य रूप है।

  9. कलारीपट्टु’ का प्रथम आचार्य कॄष्ण को माना जाता है। इसी कारण ‘नारायणी सेना’ भारत की सबसे भयंकर प्रहारक सेना बन गई थी।

  10. भगवान श्रीकृष्ण के रथ का नाम ‘जैत्र’ था और उनके सारथी का नाम दारुक/ बाहुक था। उनके घोड़ों (अश्वों) के नाम थे शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक।

  11. भगवान श्री कृष्ण की त्वचा का रंग मेघश्यामल था और उनके शरीर से एक मादक गंध स्रावित होती थी.

  12. भगवान श्री कॄष्ण की मांसपेशियां मृदु परंतु युद्ध के समय विस्तॄत हो जातीं थीं, इसलिए सामन्यतः लड़कियों के समान दिखने वाला उनका लावण्यमय शरीर युद्ध के समय अत्यंत कठोर दिखाई देने लगता था ठीक ऐसे ही लक्ष्ण कर्ण, द्रौपदी व कॄष्ण के शरीर में देखने को मिलते थे।

  13. जनसामान्य में यह भ्रांति स्थापित है कि अर्जुन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे, परंतु वास्तव में कॄष्ण इस विधा में भी सर्वश्रेष्ठ थे और ऐसा सिद्ध हुआ मद्र राजकुमारी लक्ष्मणा के स्वयंवर में जिसकी प्रतियोगिता द्रौपदी स्वयंवर के ही समान परंतु और कठिन थी।

  14. यहां कर्ण व अर्जुन दोंनों असफल हो गये और तब श्री कॄष्ण ने लक्ष्यवेध कर लक्ष्मणा की इच्छा पूरी की, जो पहले से ही उन्हें अपना पति मान चुकीं थीं।

  15. भगवान् श्री युद्ध कृष्ण ने कई अभियान और युद्धों का संचालन किया था, परंतु इनमे तीन सर्वाधिक भयंकर थे। 1- महाभारत, 2- जरासंध और कालयवन के विरुद्ध 3- नरकासुर के विरुद्ध

  16. भगवान् श्री कृष्ण ने केवल 16 वर्ष की आयु में विश्वप्रसिद्ध चाणूर और मुष्टिक जैसे मल्लों का वध किया. मथुरा में दुष्ट रजक के सिर को हथेली के प्रहार से काट दिया.

  17. भगवान् श्री कॄष्ण ने असम में बाणासुर से युद्ध के समय भगवान शिव से युद्ध के समय माहेश्वर ज्वर के विरुद्ध वैष्णव ज्वर का प्रयोग कर विश्व का प्रथम ‘जीवाणु युद्ध’ किया था।

  18. भगवान् श्री कॄष्ण के जीवन का सबसे भयानक द्वंद युद्ध सुभुद्रा की प्रतिज्ञा के कारण अर्जुन के साथ हुआ था, जिसमें दोनों ने अपने अपने सबसे विनाशक शस्त्र क्रमशः सुदर्शन चक्र और पाशुपतास्त्र निकाल लिए थे। बाद में देवताओं के हस्तक्षेप से दोंनों शांत हुए।

  19. भगवान् श्री कृष्ण ने 2 नगरों की स्थापना की थी द्वारिका (पूर्व मे कुशावती) और पांडव पुत्रों के द्वारा इंद्रप्रस्थ ( पूर्व में खांडवप्रस्थ)।

  20. भगवान् श्री कृष्ण ने कलारिपट्टू की नींव रखी जो बाद में बोधिधर्मन से होते हुए आधुनिक मार्शल आर्ट में विकसित हुई।

  21. भगवान् श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवतगीता के रूप में आध्यात्मिकता की वैज्ञानिक व्याख्या दी, जो मानवता के लिए आशा का सबसे बडा संदेश थी, है और सदैव रहेगी।
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Posted in रामायण - Ramayan

રામ મંદિર નિર્માણનો નિર્ણય સુપ્રીમ કોર્ટે આપ્યો તો રામ મંદિર મુદ્દે ક્રેડિટ ભાજપને શા માટે મળવી જોઈએ?

ભવ્ય-દિવ્ય રામ મંદિર નિર્માણમાં ભાજપનું બલિદાન – યોગદાન

રામ જન્મભૂમિમાં રામનો વાસ કરાવવામાં અને મંદિર નિર્માણમાં ભાજપની ભૂમિકા સૌથી મહત્વપૂર્ણ રહી

રામ મંદિર નિર્માણ મામલે ભાજપનો એક વર્ગ, ખાસ કરીને ભાજપ સમર્થકો જ ભાજપથી નારાજ હતા. કેન્દ્રમાં ભાજપની સરકાર બન્યા બાદ મોટાભાગ લોકોની મહત્વકાંક્ષા હતી કે, ભાજપ સરકારે કાયદો બનાવી રામ મંદિરનું નિર્માણ કરવું જોઈએ. એ લોકોને કોર્ટ-કચેરીથી કોઈ મતલબ ન હતો. એમને તો બસ ભાજપ સરકાર રામ મંદિરનું નિર્માણ કરે એટલું જ જોઈતું હતું. પ્રધાનમંત્રી નરેન્દ્રભાઈ મોદી – ભાજપે જ્યારે રામ મંદિર મુદ્દો ન્યાયમંદિરમાં જ ઉકેલાશે એવું કહ્યું ત્યારે અલગ-અલગ પ્રકારની વાતો થઈ ભાજપ પર આંગળી ઉઠવા લાગી હતી. એક આખા રાષ્ટ્રવાદી વર્ગને પણ આંચકો લાગી ભાજપે રામ મંદિર મુદ્દે પાછીપાની કરી તેવી ધારણા બાંધી લીધી હતી. રામ મંદિર નિર્માણ મુદ્દે કરોડો હિંદુઓને એકમાત્ર ભાજપ પાસેથી આશા-અપેક્ષા-ઈચ્છા હતી કે ભાજપ સરકાર રામ મંદિર નિર્માણ કરશે. કોર્ટમાં નહીં પરંતુ કાયદો ઘડી. આ એવા બધા લોકો હતા જેમેને અદાલતની કાર્યવાહી અને ચૂકાદાઓ અંગે પૂર્વગ્રહ હતા. પણ તેઓ એ વિચારી શકતા ન હતા કે જે વિવાદ ૫૦૦ વર્ષોથી ચાલ્યો છે તેનું નિરાકરણ લાવવામાં સમય તો લાગે જ.

રામ મંદિર મુદ્દે મોદી-શાહ અને ભાજપના ઉદ્દેશો પર શંકા થવા લાગી હતી. ઘણા નોટાવીર બની ગયા તો બીજા કેટલાંક લોકો પણ અન્ય પક્ષો સાથે જોડાઈ ગયા હતા. અહીં અભાવ તેમની પોતાની શ્રદ્ધામાં હતો પરંતુ તેઓ સેનાપતિને દોષી ગણાવવા લાગ્યા હતા. મંદિરનું નિર્માણ હોય કે હિંદુઓનાં હક્કની વાત.. ભાજપ હંમેશા ભારતીયોનો અવાજ બન્યું છે. જો માત્ર રામ મંદિર નિર્માણમાં ભાજપના પ્રયત્નો અને તેના પરિણામો વિશે વાત કરવામાં આવે તો..

🏹 સૌ પ્રથમ, લાલકૃષ્ણ અડવાણીએ રથયાત્રા કાઢીને રામ મંદિર નિર્માણનું વાતાવરણ બનાવ્યું હતું. જ્યારે યાત્રા દરમિયાન તેમની ધરપકડ કરવામાં આવી હતી ત્યારે તેમણે વી.પી.સિંઘ પાસેથી ટેકો પાછો ખેંચી કેન્દ્ર સરકારને પાડી દીધી હતી. રામ મંદિર મુદ્દે સરકારો બને છે પરંતુ આ મુદ્દે કેન્દ્ર સરકાર પડી ભાંગી હોય તેની વાત કોઈપણ કરતું નથી. બાદમાં કારસેવકો પર ગોળીબાર કર્યા બાદ ભાજપ સહિત અન્ય હિન્દુવાદી સંગઠનોનાં દબાણને કારણે મુલાયમ સરકારને પણ સરકારમાંથી વિદાય લેવી પડી હતી.

🏹 ૬ ડિસેમ્બરનાં રોજ બાબરી વિધ્વંસ મામલે કલ્યાણ સરકારે કારસેવકોને ટેકો આપ્યો અને પોલીસને ગોળીબાર કરતા અટકાવ્યા. જ્યારે ત્રણેય ઢાંચા પડી ભાંગ્યા ત્યારે એ કલ્યાણસિંહ જ હતા જેમણે એ જ સાંજે છાતી ઠોકીને કહ્યું હતું કે, અમારી સરકારમાં આ ઢાંચો તૂટ્યો છે અને હું તેની જવાબદારી જાતે લઈને કોઈપણ પ્રકારની ન્યાયિક તપાસનો સામનો કરવા તૈયાર છું. અને તેમણે જય શ્રી રામનો જયઘોષ પણ કર્યો હતો.

🏹 ભાજપનાં ઘણા નેતાઓની સાથે મુખ્યત્વે લાલકૃષ્ણ અડવાણી, મુરલી મનોહર જોશી, ઉમાભારતી, વિનય કટિયાર, વેદાંતીજી મહારાજ જેવા લોકો હજી પણ બાબરી મસ્જિદ વિધ્વંસ કેસનો સામનો કરી રહ્યાં છે.

🏹 જે એએસઆઈનાં ખોદકામનાં પુરાવા પર સુપ્રીમ કોર્ટમાં રામ મંદિર તરફેણમાં નિર્ણય આવ્યો છે એ ખોદકામ શરૂ કરવામાં તત્કાલીન અટલ બિહારી સરકાર અને મુરલી મનોહર જોશીજીનો ફાળો છે.

🏹 બાબરી વિધ્વંસ પહેલાં, કલ્યાણ સરકારે લગભગ ૭૦ એકર જમીન હસ્તગત કરીને મંદિર બનાવવાનું કામ શરૂ કર્યું હતું પરંતુ મુસ્લિમ પક્ષે હાઈકોર્ટનાં દરવાજા ખખડાવ્યા હતા અને અદાલતે સ્થાયી બાંધકામ પર રોક લગાવી દીધી હતી. પાછળથી આ જમીન કેન્દ્ર સરકારની હસ્તક આવી, જે જમીન મોદી સરકારે આ વર્ષે સુપ્રીમ કોર્ટમાં હિન્દુ પક્ષોને આપવાની વાત કહી હતી.

🏹 બીજી તરફ કોંગ્રેસ સરકારે શ્રી રામ કાલ્પનિક વ્યક્તિ છે તેવું એફિડેવિટ પણ સુપ્રીમ કોર્ટમાં જમા કરાવેલું તો ગયા વર્ષે કપિલ સિબ્બલે ચૂંટણી પહેલા રામ મંદિર મામલે નિર્ણય ન આવે તે માટે સુપ્રીમ કોર્ટમાં અરજી કરી હતી. જો અન્ય રાજકીય પક્ષોની વાત કરવામાં આવે તો.. સપાએ ગોળીઓ ચલાવી હતી અને યુપીમાં તેમની સરકાર રહી ત્યાં સુધી ક્યારેય મંદિરની તરફેણમાં નિવેદન આપ્યું ન હતું. પંચ કોસી અને ચૌરાસી કોસી યાત્રા દરમિયાન પણ મોટા અવરોધ ઉભા કર્યા હતા. આ સાથે જ ફૈઝાબાદ કોર્ટનાં ન્યાયધીશ જેમણે સૌ પ્રથમ તાળુ ખોલવાની મંજૂરી આપી હતી, મુલાયમ સરકારે તેમનું હાઈકોર્ટમાં પ્રમોશન અટકાવવા સુધી ષડયંત્ર રચેલા.

🏹 લાલુ યાદવ હોય કે વામપંથીઓ કે કોંગ્રેસીઓ.. રામ મંદિર મુદ્દે દરેકનાં ચહેરાઓ ઉઘાડા પડતા રહ્યાં છે. ત્યારે એક માત્ર ભાજપ જ હતું જેણે તેને ચૂંટણીનો મુદ્દો બનાવ્યો અને સ્પષ્ટપણે કહ્યું હતું કે, મંદિરનું નિર્માણ કાયદાકીય રીતે શાંતિ-સૌહાર્દપૂર્ણ રીતે થશે.

🏹 મોદી-યોગીજીનાં આગમન પછી અયોધ્યાને તેની દિવ્યતા-ભવ્યતા મળી. મેડિકલ કોલેજ, એરપોર્ટ સહિતની કરોડો રૂપિયાની યોજનાઓ પણ શરૂ કરવામાં આવી હતી. અહીં જ્યારે અખિલેશ કે માયાવતીની સરકાર હતી ત્યારે તેમણે એ જાણવું પણ મહત્વપૂર્ણ સમજ્યું ન હતું કે, ગોરખનાથપીઠનાં પ્રમુખ મહારાજજી છે, જેની ત્રણ પેઢીઓ મંદિર માટે લડત લડી રહી છે. તે જ સમયે યોગી સરકારે અયોધ્યામાં ૨૫૧ મીટર ઉંચી શ્રી રામ પ્રતિમાની સ્થાપના કરીને શ્રી રામનાં સ્વરૂપમાં દિવ્ય-ભવ્ય રીતે ન્યાય આપવાનું કામ શરૂ કર્યું.

🏹 રામ મંદિર મુદ્દે આ નિર્ણય મોદી સરકાર પહેલાની સરકારનાં કાર્યકાળમાં આવી શક્યો હોત પરંતુ ભાજપ સિવાય કોંગ્રેસ સહિતનાં તમામ પક્ષો રામ મંદિર મુદ્દે એટલા બધા આડા ચાલ્યા કે દેશનાં ન્યાયિક ઈતિહાસમાં પહેલીવાર સીજેઆઈને મહાભિયોગનો સામનો કરવો પડ્યો.

🏹 જ્યારે હાલનાં સીજેઆઈ જસ્ટિસ ગોગોઈએ આ કેસની દૈનિક સુનવણીની વાત કરી ત્યારે તેમના પર જાતીય શોષણનો આરોપ મૂકાયો હતો. તે સમયે અરુણ જેટલીએ એક બ્લોગ લખીને સીજેઆઈને ટેકો આપ્યો હતો. ત્યારબાદ કાયદાપ્રધાન અને મોદીજીએ પણ ન્યાયતંત્રનું ગૌરવ જાળવવાની વાત કરીને પરોક્ષ રીતે સીજેઆઇને ટેકો આપ્યો હતો.

🏹 ભાજપનાં તમામ વિરોધી પક્ષો દ્વારા કેટકેટલા દાવપેચ રમવામાં આવ્યા હતા પરંતુ આ વખતે આખરે નિર્ણય આવી ગયો છે. આ બધી બાબતો તેવા લોકોએ સમજી લેવી જોઈએ કે જેઓ હજી પણ કહે છે કે જો રામ મંદિર મુદ્દે નિર્ણય સુપ્રીમ કોર્ટ આપે તો તેની ક્રેડિટ ભાજપને કેમ મળે?

🏹 તેથી જ ભાજપે સુપ્રીમ કોર્ટથી આ નિર્ણયની આશા રાખી હતી જેથી પોતાના કે અન્ય લોકો ભલે ભાજપની ટિકા કરે પરંતુ કોર્ટનાં નિર્ણય કે રામ મંદિર મુદ્દે ભવિષ્યમાં ક્યારેય આંગળી ન ચીંધી શકે. તેથી કેન્દ્રમાં સરકાર હોવા છતાં ભાજપે રામ મંદિર મુદ્દે કાયદો બનાવવાનો વિકલ્પ પ્લાન-બી તરીકે રાખ્યો હતો.

🏹 અંતે અયોધ્યા કેસ અંગે ઐતિહાસિક નિર્ણય આપ્યા બાદ સુપ્રીમ કોર્ટે ભવ્ય-દિવ્ય રામ મંદિર બનાવવાની જવાબદારી કેન્દ્ર અને રાજ્યની ભાજપ સરકારને જ સોંપી છે પણ આ બધી બાબતો કટ્ટરવાદી લોકો સમજી નહીં શકે. આ લેખ ભવ્ય-દિવ્ય રામ મંદિર નિર્માણમાં ભાજપનું બલિદાન – યોગદાન અંગે હતો પણ હા, રામ મંદિર નિર્માણમાં અન્ય કેટલાય લોકો અને સંસ્થાઓએ પણ બલિદાન આપ્યું છે જેની વાત હવે પછીનાં લેખમાં..

– ભવ્ય રાવલ લેખક-પત્રકાર

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इस पूरी दुनिया मे “राम” शब्द का उच्चारण सबसे ज्यादा जिस भूभाग पर होता है वो भूभाग हरियाणा है ।
हरियाणा वो भूमि है जहाँ पर न सिर्फ स्वागत और अभिवादन के लिए राम राम बोलते हैं अपितु सारी दुनिया जहाँ जहाँ भगवान , ईश्वर इत्यादि शब्द प्रयोग होते हैं वहाँ हरियाणा मे राम शब्द प्रयोग किया जाता है ।
जैसे दुनिया कहेगी – भगवान देख रहा है , ईश्वर न्याय करेगा , धर्मराज के द्वार जाना है इत्यादि
लेकिन हरियाणा मे कहेंगे – राम देखै है , राम न्याय करेगा ,राम घर जाना है , राम से डर ।
हरियाणा की कहावतें भी केवल राम से संबंधित है जैसे –
हिम्मत का राम हिमायती , अंधों की मक्खी राम हटावै , राम को राम नहीं कहता , अपने को राम से बड़ा समझना ,
हरियाणा में आकाश को भी राम कहते है ।
हरियाणा मे आराम को भी राम कहते है । जैसे दुनिया कहेगी आराम से चल , आराम कर ले लेकिन हरियाणा में कहेंगे कि राम से चल , राम कर ले ।
जब कही जाना हो तो गाड़ी मे बैठने के बाद दुनिया वाले कहते हैं कि “चलो” लेकिन हरियाणा मे कहते है कि “ले राम का नाम , चाल”
हरियाणा में बारिश को भी राम कहते है । जब बूंदें होती है तो दुनिया वाले कहते हैं कि बूंदे आई थी , बहुत बारिश हूई इत्यादि । लेकिन हरियाणा में कहते हैं कि राम आया था , बहोत राम बरसा ।
जब कोई किसी का हाल चाल पूछता है तो बाकी दुनिया मे कहते है कि सब बढिय़ा है इत्यादि । लेकिन हरियाणा मे कहते हैं कि “राम रैजी स” या दया है राम की ।
हरियाणा मे गाँव को गाम कहते हैं और हरियाणवी कहावत है कि गाम राम होता है
हरियाणा के कण कण और शब्द शब्द मे राम बसता है और मुझे गर्व है स्वयं के हरियाणवी होना 🙏🏻🙏🏻 राम मंदिर के लिए बधाई आप सभी को🙏🏻🙏🏻

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अरुन सुक्ला

श्रीराम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आ जाने के बावजूद भी इस पूरे विवाद में उन नीच वामपंथी इतिहासकारों, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों के गलीज, घिनौने, बदबूदार और बेईमानी भरे षड्यंत्रों को मत भूलियेगा जो इन्होंने पिछले तीस सालों से पूरी दुष्टता, कमीनगी और निर्लज्जता के साथ सेकुलर मीडिया की मदद से रचे और अंजाम दिए और जिनका भंडाफोड़ इलाहाबाद हाईकोर्ट की न्यायिक सुनवाई में ही हो गया था। पुनः ध्यान दीजिए एक बार –

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले ने विवादित स्थल पर मंदिर होने के शोधपूर्ण वैज्ञानिक निष्कर्षों की पुष्टि तो की ही थी, साथ ही साथ मस्जिद-कमिटी की ओर से गवाह के तौर पर वामपंथी इतिहासकार इरफ़ान हबीब की अगुवाई में पेश हुए देश के तमाम वामपंथी इतिहासकारों के फरेब को भी न्यायालय ने उजागर किया था l न्यायालय को ये टिप्पणी करनी पडी थी कि इन इतिहासकारों ने अपने रवैये से उलझाव, विवाद, और सम्प्रदायों में तनाव पैदा करने की कोशिश की और इनका विषय-ज्ञान भी छिछला है l
केस की सुनवाई के दौरान हुए ‘क्रॉस एग्जामिनेशन’ में पकड़े गए इनके फरेबों के दृष्टांत आपको हैरत में डाल देंगे :-

(1) वामपंथी इतिहासकार प्रोफ़ेसर मंडल ने ये स्वीकारा कि खुदाई का वर्णन करती उनकी पुस्तक दरअसल उन्होंने बिना अयोध्या गए ही लिख दी थी l

(2) वामपंथी इतिहासकार सुशील श्रीवास्तव ने ये स्वीकार किया कि प्रमाण के तौर पर पेश की गयी उनकी पुस्तक में संदर्भ के तौर पर दिए पुस्तकों का उल्लेख उन्होंने बिना पढ़े ही कर दिया है l

(3) जेएनयू की इतिहास-प्रोफ़ेसर सुप्रिया वर्मा ने ये स्वीकार किया कि उन्होंने खुदाई से संदर्भित ‘राडार सर्वे’ की रिपोर्ट को पढ़े बगैर ही रिपोर्ट के विरोध में गवाही दे दी थी l

(4) अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर जया मेनन ने ये स्वीकारा कि वे तो खुदाई स्थल पर गयी ही नहीं थी लेकिन ये गवाही दे दी थी कि मंदिर के खंभे बाद में वहां रखे गए थे l

(5) ‘एक्सपर्ट’ के तौर पर उपस्थित वामपंथी सुविरा जायसवाल जब ‘क्रोस एग्जामिनेशन’ में पकड़ी गयीं तब उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें मुद्दे पर कोई ‘एक्सपर्ट’ ज्ञान नहीं है; जो भी है वो सिर्फ ‘अखबारी खबरों’ के आधार पर ही है l

(6) पुरात्व्वेत्ता वामपंथी शीरीन रत्नाकर ने सवाल-जवाब में ये स्वीकारा कि दरअसल उन्हें कोई ‘फील्ड-नॉलेज’ है ही नहीं l

(7) ‘एक्सपर्ट’ प्रोफ़ेसर मंडल ने ये भी स्वीकारा था, “मुझे बाबर के विषय में इसके अलावा – कि वो सोलहवीं सदी का एक शासक था – और कुछ ज्ञान नहीं है l न्यायधीश ने ये सुन कर कहा था कि इनके ये बयान विषय सम्बंधित इनके छिछले ज्ञान को प्रदर्शित करते है l

(8) वामपंथी सूरजभान मध्यकालीन इतिहासकार के तौर पर गवाही दे रहे थे पर ‘क्रॉस एग्जामिनेशन’ में ये तथ्य सामने आया कि वे तो इतिहासकार थे ही नहीं, मात्र पुरातत्ववेत्ता थे l

(9) सूरजभान ने ये भी स्वीकारा कि डी एन झा और आर एस शर्मा के साथ लिखी उनकी पुस्तिका “हिस्टोरियंस रिपोर्ट टू द नेशन” दरअसलद खुदाई की रपट पढ़े बगैर ही दबाव में केवल छै हफ्ते में ही लिख दी गयी थी l

(10) वामपंथी शिरीन मौसवी ने क्रॉस एग्जामिनेशन में ये स्वीकार किया कि उनका पहले का ये कहना सही नहीं है कि राम-जन्मस्थली का ज़िक्र मध्यकालीन इतिहास में नहीं है l

दृष्टान्तों की सूची और लम्बी है l पर विडंबना तो ये है कि लाज हया को ताक पर रख कर वामपंथी इतिहासकार रोमिला थापर ने इन्हीं फरेबी वामपंथी इतिहासकारों व अन्य वामपंथियों का नेतृत्व करते हुए न्यायालय के इसी फैसले के खिलाफ लम्बे लम्बे पर्चे भी लिख डाले थे l पर शर्म इन्हें आती भी है क्या ?

(सन्दर्भ : Allahabad High court verdict dated 30 Sep 2010)