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“एक बोध कथा”

पुराने जमाने में एक नगर में दो ब्राह्मण पुत्र रहते थे। एक गरीब था तो दूसरा अमीर! दोनों पड़ोसी थे। गरीब ब्राह्मण की पत्नी उसे रोज़ ताने देती, झगड़ती।एक दिन एकादशी के दिन गरीब ब्राह्मण पुत्र झगड़ों से तंग आ जंगल की ओर चल पड़ता है। ये सोचकर कि जंगल में शेर या कोई हिंसक जीव उसे मार कर खा जायेगा। उस जीव का पेट भर जायेगा और मरने से वह इस कष्ट में भी मुक्त हो जायेगा।

जंगल में पहुंचने पर उसे एक गुफ़ा दिखाई दी। वह गुफ़ा की ओर गया। गुफ़ा में एक शेर सोया था और शेर की नींद में ख़लल न पड़े इसके लिये हंस का पहरा था। हंस ने ज़ब दूर से ब्राह्मण पुत्र को आता देखता है तो चिंता में पड़ सोचता है - ये ब्राह्मण आयेगा, शेर जागेगा और इसे मार कर खा जायेगा। आज एकादशी होने से इस दिन मुझे पाप लगेगा। इसे बचाऊं कैसे? उसे उपाय सूझा है और वो शेर के भाग्य की तारीफ़ करते कहता है - ओ जंगल के राजा! उठो, जागो आज आपके भाग्य खुले हैं। एकादशी के दिन स्वय विप्रदेव आपके घर पधारे हैं। आप उठें इनका स्वागत करे और इन्हे दक्षिणा दें रवाना करें। ऐसा करने से आपका मोक्ष हो जायेगा। यह दिन दुबारा आपके जीवन में मिलना दुभर हो। ईश्वर कृपा से आपको पशु योनी से मुक्ति मिल जाये। शेर दहाड़ कर उठता है, हंस की बात उसे सही लगती है।अपनी मांद में पूर्व के शिकार हुए मनुष्यों के गहने वो ब्राह्मण के पैरों में रख, शीश नवाता है, जीभ से उनके पैर चाटता है। हंस ब्राह्मण को इशारा करता है - विप्रदेव! ये सब गहने उठाओ और जितना जल्द हो सके वापस अपने घर जाओ। ये सिंह है, कब मन बदल जाय! ब्राह्मण बात समझता है घर लौट जाता है। इस घटना की पडौसी अमीर ब्राह्मण की पत्नी को जब पता चलता है तो अगली एकादश। को अपने पति को जंगल में उसी शेर की गुफा की ओर भेजती है। आज शेर का पहेरादार बदल जाता है। नया पहरेदार होता है *"कौवा"* । जैसी कौवे की प्रवृति होती है वह वैसा ही सोचता है - बढिया है! ब्राह्मण आया, शेर को जगाऊं! शेर की नींद में ख़लल पड़ेगा, गुस्साएगा, ब्राह्मण को मारेगा तो कुछ मेरे भी हाथ लगेगा, मेरा पेट भर जायेगा। यह सोच वह कांव-कांव कर चिल्लाता है। आवाज से शेर गुस्सा हो जागता है। दूसरे ब्राह्मण पर उसकी नज़र पड़ती है। उसे हंस की बात याद आ जाती है। वो समझ जाता है, आज शेर स्वयं ही समझ जाता हैं कि *कौवा क्यूं कांव-कांव कर रहा है?* पूर्व में हंस के कहने पर एकादशी को किये गये धर्म को नष्ट नहीं करना चाहता।

फिर भी नहीं शेर, शेर होता है जंगल का राजा होता हैं वह दहाड़ कर ब्राह्मण को कहता है –
“हंस उड़ सरवर गये
अब काग भये प्रधान
थे विप्र थांरे घरे जाओ,
में किनाइ नी जिजमान!

अर्थात हंस जो अच्छी सोच वाले, अच्छी मनोवृत्ति वाले थे उड़ के सरोवर यानि तालाब को चले गये हैं और अब कौवा प्रधान पहरेदार है जो मुझे तुम्हें मारने के लिये उकसा रहा है। मेरी बुद्धि घूमे उससे पहले ही हे ब्राह्मण! यहां से चले जाओ। शेर किसी का जजमान नहीं हुआ है! वो तो हंस था जिसने मुझ शेर से भी पुण्य करवा दिया।

दूसरा ब्राह्मण सारी बात समझ जाता है और डर के मारे तुरंत प्राण बचाकर अपने घर की ओर भाग जाता है।

हंस और कौवा कोई और नहीं हमारे ही चरित्र हैं!

कोई किसी का दु:ख देख दु:खी होता है और उसका भला सोचता है – वो हंस है और जो किसी को दु:खी देखना चाहता है, किसी का सुख जिसे सहन नहीं होता – वो कौवा है।

जो आपस में मिलजुल, भाईचारे से रहना चाहते हैं वे हंस प्रवृत्ति के हैं।

जो झगड़े कर एक दूजे को मारने लूटने की प्रवृत्ति रखते हैं वे कौवे की प्रवृति के हैं।

जय श्री कृष्ण 🙏🌹

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••-•{{जीवन का जहाज़ }}•-••
••-•{{ ओशो }}•-••

जीवन बहुत उलझा हुआ है लेकिन अक्सर जो उसे सुलझाने में लगते हैं वे उसे और भी उलझा लेते हैं।

जीवन निश्चय ही बड़ी समस्या है लेकिन उसके लिए प्रस्तावित समाधान उसे और भी बड़ी समस्या बना देते हैं।
क्यों? लेकिन एसा क्यों होता है?

•••••••••••• || ओशो ||.°

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एक विश्वविद्यालय में विधीशास्त्र के एक अध्यापक अपने जीवनभर वर्ष के पहले दिन की पढ़ाई तखते पर ‘चार’ और ‘दो’ के अंक लिखकर प्रारंभ करते थे।

वे दोनों अंकों को लिखकर विद्यार्थियों से पूछते थे : ‘क्या हल है?’

निश्चय ही कोई विद्यार्थी शीघ्रता से कहता : ‘छः!’

और फिर कोई दूसरा कहता : ‘दो!’

लेकिन अध्यापक को चुप सिर हिलाते देखकर अंततः अंतिम संभावना को सोचकर अधिकतम विद्यार्थी चिल्लाते ‘आठ’।

लेकिन अध्यापक तब भी अपना अस्वीकार सूचक सिर हिलाते ही जाते थे!

और तब सन्नाटा छा जाता था क्योंकि और कोई उत्तर तो हो ही नहीं सकता था!

फिर वे अध्यापक हंसते थे और कहते थे : ‘मित्रो, आप सभी ने अत्यंत आधारभूत प्रश्न ही नहीं पूछा तो हल कैसे संभव हो सकता है? आपने यही नहीं जानना चाहा कि वस्तुतः समस्या क्या है?

और जो समस्या को सम्यक रूप से जाने बिना ही समाधान जानने मैं लग जाता है, निश्चय ही वह समाधान तो पाता ही नहीं है और उल्टे समस्या को और उलझा लेता है।’

क्या यह बात सत्य नहीं है कि समस्या को जाने बिना ही समाधान खोज और पकड़ लिए जाते हैं; जबकि समाधान नहीं, महत्वपूर्ण सदा समस्या ही है।

क्योंकि अंततः तो समस्या को उसकी समग्रता में जान लेना ही समाधान बनता है।

और गणित में एसी भूल हो तो हो लेकिन क्या जीवन में भी ऐसा ही नहीं होता है?

क्या वास्तविक समस्या को जाने बिना ही जब हम समाधान के लिए श्रम करने लगते हैं तो सारा श्रम व्यर्थ ही नहीं, आत्मघाती भी सिद्ध नहीं होता है?

मित्र, समस्या को ही जो सही रूप में नहीं जानता है, वह यदि किसी अन्य ही प्रश्न को प्रश्न जानकर हल करता हो तो भी आश्चर्य नहीं है।

क्या आपको उस जहाज़ के बाबत कुछ भी पता नहीं है, जो कि डूब रहा था; और कुछ लोग उसे डूबने से बचाने के लिए उस पर पालिश कर रहे थे।

मैं तो सोचता हूँ कि आपको उस जहाज़ के संबंध में ज़रूर ही पता होगा, क्योंकि मैं तो आपको भी उस पर ही सवार देखता हूँ;

और न केवल सवार ही देखता हूँ बल्कि यह भी देखता हूँ कि जहाज़ डूब रहा है और आप उसे बचाने के लिए उस पर पालिश करने में लगे हैं!

मित्र, वह जहाज़ जीवन का ही जहाज़ तो है।

•••-=-•{{ ओशो }}•-=-•••
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ओशो.
” फूल ओर कांटे ”-
(कथा–02)
(जीवन का जहाज़)

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स्वभाव की आजादी

भयंकर ठंड की एक शाम वृक्ष पर बैठे हंस ने नीचे देखा चुहो का परिवार ठंड में बुरी तरह ठिठुर रहा है। उनके बिलों में पानी भर गया है। हंस को दया आ गई।
उसने जाकर उन प अपने धवल, नर्म, गरम पंख फैला दिए और ठंड से उनकी रक्षा की। चुहों का परिवार बच गया।

सुबह हंस जब उड़ने लगा तो देखा कि……….. यह क्या..? उसके तो पंख ही कुतरे जा चुके थे। अब वह उड़े भी तो कैसे..? हंस कातर भाव से रोने लगा… चिल्लाने लगा…!

आस पास के सारे पशु पक्षी इकट्ठे हुए और वास्तविकता जानकर चुहों के परिवार को धिक्कारने और कोसने लगे।

यह सुन कर चुहों ने कहा –

“कुतरना हमारा स्वभाव है, हमारी पहचान है। हमने क्या गलत किया…? हमारी आइडेंटिटी के साथ जीना हमारा हक है। हमारी आइडेंटिटी की रक्षा होनी चाहिए। हम तो वर्षों से यही करते आए हैं। अब यदि हमारी प्रकृति आप लोगों की समझ में नहीं आ रही हो, तो इसमें हम चुहे क्या करें। हमारी आदत, हमारे स्वभाव को गलत कहना अमानवीय है, अलोकतांत्रिक है। गलती हंस की है।”

सेक्युलरिज्म को सादर समर्पित

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एक भील बालक का त्याग

एक बार महाराणा प्रताप पुंगा की पहाड़ी बस्ती में रुके हुए थे । बस्ती के भील बारी-बारी से प्रतिदिन राणा प्रताप के लिए भोजन पहुँचाया करते थे, इस कड़ी में आज दुद्धा की बारी थी, लेकिन उसके घर में अन्न का दाना भी नहीं था, दुद्धा की मां पड़ोस से आटा मांगकर ले आई और रोटियाँ बनाकर दुद्धा को देते हुए बोली, ले! यह पोटली महाराणा को दे आ । दुद्धा ने खुशी-खुशी पोटली उठाई और पहाड़ी पर दौड़ते-भागते रास्ता नापने लगा ।
घेराबंदी किए बैठे अकबर के सैनिकों को दुद्धा को देखकर शंका हुई, एक ने आवाज लगाकर पूछा, क्यों रे ! इतनी जल्दी-जल्दी कहाँ भागा जा रहा है ? दुद्धा ने बिना कोई जवाब दिए, अपनी चाल बढ़ा दी। मुगल सैनिक उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे भागने लगा, लेकिन उस चपल-चंचल बालक का पीछा वह जिरह-बख्तर में कसा सैनिक नहीं कर पा रहा था । दौड़ते-दौड़ते वह एक चट्टान से टकराया और गिर पड़ा, इस क्रोध में उसने अपनी तलवार चला दी ।
तलवार के वार से बालक की नन्हीं कलाई कटकर गिर गई । खून फूट कर बह निकला, लेकिन उस बालक का जिगर देखिए, नीचे गिर पड़ी रोटी की पोटली उसने दूसरे हाथ से उठाई और फिर सरपट दौड़ने लगा. बस, उसे तो एक ही धुन थी – कैसे भी करके राणा तक रोटियाँ पहुँचानी हैं।
रक्त बहुत बह चुका था , अब दुद्धा की आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा, उसने चाल और तेज कर दी, जंगल की झाड़ियों में गायब हो गया । सैनिक हक्के-बक्के रह गए कि कौन था यह बालक?
जिस गुफा में राणा परिवार समेत थे, वहां पहुंचकर दुद्धा चकराकर गिर पड़ा। उसने एक बार और शक्ति बटोरी और आवाज लगा दी — राणाजी ! आवाज सुनकर महाराणा बाहर आए, एक कटी कलाई और एक हाथ में रोटी की पोटली लिए खून से लथपथ 12 साल का बालक युद्धभूमि के किसी भैरव से कम नहीं लग रहा था ।
राणा ने उसका सिर गोद में ले लिया और पानी के छींटे मारकर होश में ले आए , टूटे शब्दों में दुद्धा ने इतना ही कहा-राणाजी ! …ये… रोटियाँ… मां ने.. भेजी हैं । फौलादी प्रण और तन वाले राणा की आंखों से शोक का झरना फूट पड़ा, वह बस इतना ही कह सके, बेटा तुम्हे इतने बडें संकट में पड़ने की कहा जरूरत थी ?
वीर दुद्धा ने कहा – अन्नदाता…. आप तो पूरे परिवार के साथ… संकट में है …. माँ कहती है आप चाहते तो अकबर से समझौता कर आराम से रह सकते थे….. पर आपने धर्म और संस्कृति रक्षा के लिए… कितना बड़ा…. त्याग किया उसके आगे मेरा त्याग तो कुछ नही है….. ।
इतना कह कर वीरगति को प्राप्त हो गया दुद्धा ।

राणा जी की आखों में आंसू थे । मन में कहने लगे ….
धन्य है तेरी देशभक्ति, तू अमर रहेगा, मेरे बालक। तू अमर रहेगा। अरावली की चट्टानों पर वीरता की यह कहानी आज भी देशभक्ति का उदाहरण बनकर बिखरी हुई है। भील दुद्धा जैसे बालक हमारे इतिहास के गौरव और संस्कृति के आधार हैं । धर्म व देश की रक्षा में सब का समान योगदान रहा है ।

जात-पात , ऊँच- नीच , छोटा- बड़ा का भ्रम तोड़ कर केवल हिंदुस्तानी होने का गर्व होना चाहिए ।
छोटी- छोटी बातों को तो हम बाद मे भी निपटा सकते है, पर हम निजी स्वार्थ व लोभ – लालच के चलते जब एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाएंगे , अपनी ऊर्जा आपस मे नष्ट करेंगे , सुपंथ छोड़ देंगे तो दुश्मन हमारे अस्तित्व को समाप्त कर देगा। इतिहास का दोहरान न करें, हम कई बार आपसी राग -द्वेष व ईर्ष्या से अपना नुकसान कर चुके है । हर बार आँखे तब खुली , जब चिड़िया चुग गई खेत । उस समय कुछ होगा नही ।

आओ हम सब एक बार वापस दुद्धा व प्रताप बन कर एक दूसरे के लिए जिए , धर्म व संस्कृति को बचावें ।
🙏💐🚩महाराणा प्रताप जयंती की शुभकामनाएं🚩💐🙏

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Jai shree ram hanumantaye namah ji
(((((श्रीराम लीला सत्य है ।)))

एक दिन श्री रघुनाथ जी ने हनुमान जी से कहाँ – हनुमान ! तुम निरंतर हमारी सेवा मे रहते हो और नाम जप भी करते हो परंतु सत्संग और कथा श्रवण करने नही जाते – यह तुम्हारे अंदर थोडी सी कमी है । हनुमान जी बोले – प्रभु ! आपकी आज्ञा शिरोधार्य है परंतु जिन भगवान की कथा है वे तो निरंतर मिले हुए है और आपकी सेवा भी मिली हुई है । आपकी जो प्रत्यक्ष अवतार लीलाएं है – जो चरित्र है वे प्रायःसभी हमने देखे है अतः मै सोचता हूं की कथा श्रवण से क्या लाभ ? श्री रघुनाथ जी बोले – यह सब तप ठीक है परंतु कथा तो श्रवण करनी ही चाहिए । श्री हनुमान जी ने पूछा कि आप ही कृपापूर्वक बताएं की किसके पास जाकर कथा श्रवण करें ?

रघुनाथ जी बोले – नीलगिरीपर्वत पर श्री काग भुशुण्डि जी नित्य कथा कहते है , वे बड़े उच्च कोटी के महात्मा है । शंकर जी, देवी देवता, तीर्थ आदि सभी उनके पास जाकर सतसंग करते है , आप उन्ही के पास जाकर कथा श्रवण करो । हनुमाम जी ने बटुक रूप धारण किया और नीलगिरी पर्वतपर कथा मे पहुँच गए । वहां श्री कागभुशुण्डि जी हनुमान जी की ही कथा कह रहे थे । उन्होंने कहां की जब जाम्बवान जी ने हनुमान जी को अपनी शक्ति का स्मरण कराया तब हनुमान जी ने विराट शरीर धारण किया , एक पैर तो था महेंद्रगिरि पर्वत पर भारत के दक्षिणी समुद्र तटपर और दूसरा रखा सीधे लंका के सुबेल पर्वत पर । एक ही बार मे समुद्र लांघ गए ।

वहां विभीषण से मिले, अशोके वाटिका मे जाकर सीधे ,बिना चोरी छिपे श्री सीता जी से मीले और वहां जब उनपर राक्षसों ने प्रहार किया तब उन्होंने सब राक्षसों को मार गिराया । रावण के दरबार मे भी पहुंचे , वहां रावण ने श्री राम जी के बारे मे अपशब्द प्रयोग किये और राक्षसों से कहां कि इस वानर की पूंछ मे आग लगा दो । हनुमान जी ने यह सुनकर जोर से हूंकार किया और उनके मुख से भयंकर अग्नि प्रकट हुए । उस अग्नि ने लंका को जला दिया और हनुमान जी पुनः एक पग रखा तो इस पर रामजी के पास पहुँच गए। यह सुनते ही हनुमान जी ने सोचा की कागभुशुण्डि जी यह कैसी कथा सुना रहे है । मैन तो इस प्रकार न समुद्र लांघा और न इस प्रकर से लंका जली । लगता है कथा व्यास आजकल असत्य कथा कहने लगे है ।

श्री हनुमान जी के वापस आनेपर रघुनाथजी ने पूछा कि आज कथा मे कौनसा प्रसंग सुनाया गया ? हनुमान जी ने उदास मुख से बताया की प्रसंग तो समुद्र लंघन और लंका दहन लीला का था परंतु उन्होंने तो कथा को बहुत प्रकार से बढ़ा चढाकर कहा । इस तरह की कोई लीला मैने नही की । रघुनाथ जी हंसते हए बोले की आपको संदेह नही करना चाहिए , व्यास आसान पर बैठे संत के प्रति मनुष्य बुद्धी नही होनी चाहिए – कागभुशुण्डि जी कोई सामान्य महात्मा नही है । हनुमान जी ने बात तो मान ली और प्रभु के चरण दबाने लगे पर मन मे संदेह था , वे बार बार वही बात सोच रहे थे की आखिर विश्वास करें तो कैसे करे ? श्री राम जी ने उस समय अपनी अनामिका से अंगूठी निकाल कर गिरायी और कहां कि हनुमान जी मेरी अंगूठी उठाकर दो ।

हनुमान जी अंगूठी उठाने झुके तो वह अंगूठी और आगे सरक गयी, उसको पुनः पकड़ने गए तो और आगे जाने लगी । पूरे ब्रह्मांड का चक्कर लगाकर अंत मे सुमेरु पर्वत की एक कंदरा मे प्रविष्ट हो गयी । वहां पर एक विशाल गुफा के भीतर वह चली गयी, हनुमान जी अंदर जाने लगे तो एक विशाल वानर ने उन्हें रोक लिया और उसने हनुमान जी से कहां की मैं यहां का द्वारपाल हूं , तुम्हे भीतर जाने से पहले मुझसे अनुमति लेनी चाहिए । हनुमान जी ने द्वारपाल से कहा की तुम मुझे जानते नही हो इसिलए मुझसे ऐसा कहते हो : मै श्री राम जी का दास, पवनपुत्र हनुमान हूँ । यह बार सुनकर वह द्वारपाल वानर हंसकर बोला की हनुमान कब से इतने निर्बल, तेजहीन हो गए ? झूठ कहते हुए तुम्हे लज्जा नही आती ? तुम हनुमान जी कैसे हो सकते हो, हनुमान जी तो गुफा के भीतर ध्यान मे बैठे है ।

हनुमन जी समझ गए की अवश्य ही इसमें प्रभु की कोई लीला है । हनुमान जी ने द्वारपाल से आदरपूर्वक कहां की आप भीतर जाकर हनुमान जी से विनती करो के बाहर एक वानर खड़ा है और आपके दर्शन करना चाहता है । द्वारपाल ने भीतर जाकर हनुमान जी से कहां की एक वानर बाहर खड़ा है और अपने को श्रीराम दास हनुमान कहता है । भीतर बैठे हनुमान जी ने द्वारपाल से कहां की वे हनुमान जी ही है, तुम उनको प्रणाम करके बहुत आदरपूर्वक यहां लाओ । बाहरखड़े हनुमान जी को द्वारपाल ने भीतर लाया तब उन्होंने देखा की दिव्य प्रकाश से वह गुफा चमक रही है और स्वर्ण सिंहासन पर करोड़ो सूर्य के समान तेजस्वी हनुमान जी बैठे है ।

उन्होंने हनुमान से कहां की श्री कागभुशुण्डिजी ने जो कथा सुनाई थी वह किसी अन्य कल्प की है । हर कल्प मे भगवान के अवतार होते रहते है , अलग अलग कल्पो मे अलग अलग पद्धति से लीला होती रहती है। युग के अनुसार और लीला के अनुसार भगवान श्रीराम अपने लीला पात्रों मे जैसी शक्ति स्थापित करना चाहते है वैसी करते है । एक पैर से लंका पर जाने वाले और फूंक मारकर लंका जलाने वाला हनुमान मैही हूं , तुम संदेह रहित हो जाओ। आपके द्वारा पूँछ बांधने के कारण लंका दहन करवाया और मेरे द्वारा फूंक मारकर ।

यह शक्ति आपकी और मेरी नही, यह शक्ति तो श्रीराम जी की है । यह जो मेरे पास जो कुंड है, उसमे जाकर देखो – उसमे तुम्हे भगवान की अंगूठी मिल जाएगी जिसका पीछा करते हुए तुम यहां आये । हनुमान जी ने कुंड मे देखा तो पूरे कुंड मे एक जैसी सैकड़ो अंगूठियां दिखाई पड़ी । सिंहासन मेबैठे हनुमान जी ने कहां की जब जब अवतार काल मे श्रीराम जी हनुमान जी को कथा श्रवण करने भेजते है और उन्हें संदेह होता है तबवे ऐसी लीला करते है । अब तक सैकडो बार अवतार हुआ और सैकड़ो हनुमान यहां आये है । सार यही है की कितने भी बड़े महात्मा हो, सिद्ध हो , योगी हो – सत्संग और कथा का त्याग कभी नही करना चाहिए ।
Jai shree ram hanumantaye namah ji

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. “युक्तिवाद से दोषों को उचित न मानें” महाभारत में एक घटना आती है कि एक बार किसी ब्राह्मण की गाय को डाकू लोग चुरा ले गये। रात को समय था। ब्राह्मण ने आकर पुकार की कि मेरी गाय डाकू ले गये। अर्जुन ने पुकार सुनी। अर्जुन के धनुष-बाण अन्त:पुर में रखे थे और अन्त:पुर में उस दिन युधिष्ठिर महाराज थे। द्रौपदी के पाँच पति थे। भगवान् व्यास ने यह नियम बना दिया था कि जो भाई अन्त:पुर में रहे उसके अतिरिक्त दूसरा भाई उन दिनों अन्त:पुर में न जाय, अगर चला जाय तो उसको बारह वर्ष का देश-निकाला हो। धनुषबाण थे अन्त:पुर में तो अर्जुन ने सोचा कि अब सामने दो बातें हैं। एक ओर बारह वर्ष का देश-निकाला है और दूसरी ओर है राजधर्म का पालन-ब्राह्मण की गायों को बचाकर लाना। उन्होंने देश निकाला स्वीकार किया। नीची नजर किये अन्त:पुर में गये। वहाँ से धनुष-बाण लिया और गायों को छुड़ाकर ले आये। ब्राह्मण के गायों की रक्षा हो गयी। युधिष्ठिर को यह घटना मालूम नहीं थी, क्योंकि वे सो रहे थे। दूसरे दिन अर्जुन ने सभा में आकर बड़े भाई युधिष्ठिरजी से कहा-महाराज ! मुझे बारह वर्ष का देश निकाला मिलना चाहिये। युधिष्ठिर ने कहा-कैसे ? तुमने क्या कसूर किया ? अपराध क्या हुआ ? अर्जुन बोले-अपराध यह हुआ कि मैं रात को नियम-भंग करके अन्त:पुर में गया था; क्योंकि वहाँ से धनुष-बाण निकालने थे और ब्राह्मण के गौओं की रक्षा करनी थी। इस पर धर्मराज ने कहा-इसमें तो कोई ऐसी बात हुई नहीं। प्रथम तो मैं बड़ा भाई और बड़े भाई के घर में जाना कोई दोष नहीं तथा दूसरी बात तुम मेरी धर्मरक्षा के लिये गये थे। गायों की रक्षा करनी थी, तुमने अच्छा काम किया। तुम्हारा कोई दोष नहीं। धर्मराज की इस बात को सुनकर अर्जुन ने कहा कि महाराज ! मैंने आपसे यही सीखा है कि किसी बहाने से धर्म का लोप न करो। किसी युक्तिवाद से कोई युक्ति लगाकर बहाना बनाकर अपने दोष का समर्थन न करो। मैं युक्तिवाद से दोष का समर्थन करना नहीं चाहता। इस घटना का तात्पर्य यही है कि जो धर्मसंगत बात हो वह जीवन में उतर जाय। जब तक जीवन में साधना नहीं उतरती, जब तक जीवन में उपदेश की बातें नहीं उतरतीं, तब तक उपदेशक का उपदेश व्यर्थ होता है। ----------:::×:::---------- - श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार (श्रीभाईजी) 'सरस प्रसंग' "जय जय श्री राधे"


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जेम्स थरबर की एक बहुत प्रसिद्ध कथा है कि सांपों के देश में एक बार एक शांतिप्रिय नेवला पैदा हो गया। नेवलों ने तत्क्षण उसे शिक्षा देनी शुरू की कि सांप हमारे दुश्मन हैं। पर उस नेवले ने कहा, ‘क्यों? मेरा उन्होंने अब तक कुछ भी नहीं बिगाड़ा।’ पुराने नेवलों ने कहा, ‘नासमझ, तेरा न बिगाड़ा हो, लेकिन वे सदा से हमारे दुश्मन हैं। उनसे हमारा विरोध जातिगत है।’ पर उस शांतिप्रिय नेवले ने कहा, ‘जब मेरा उन्होंने कुछ नहीं बिगाड़ा तो मैं क्यों उनसे शत्रुता पालूं।’

खबर फैल गई नेवलों में कि एक गलत नेवला पैदा हो गया है, जो सांपों का मित्र और नेवलों का दुश्मन है। नेवले के बाप ने कहा, ‘यह लड़का पागल है।’ नेवले की मां ने कहा, ‘यह लड़का बीमार है।’ नेवले के भाइयों ने कहा, ‘यह लड़का, यह हमारा भाई बुजदिल है।’ समझाया बहुत उसे कि यह हमारा फर्ज है, राष्ट्रीय कर्तव्य है, कि हम सांपों को मारें। हम इसीलिए हैं। इस पृथ्वी को सांपों से खाली कर देना है, क्योंकि उन के कारण ही सारी बुराई है। सांप ही शैतान हैं। उस शांतिप्रिय नेवले ने कहा, ‘मैं तो इसमें कोई फर्क नहीं देखता। सांपों को भी मैं देखता हूं, मुझे उन में कोई शैतान नहीं दिखाई पड़ता। उनमें भी संत हैं और शैतान हैं, जैसे हम में भी संत और शैतान हैं।’

खबर फैल गई कि वह नेवला वस्तुतः सांप ही है। सांपों की तरह रेंगता है। और उससे सावधान रहना। क्योंकि शक्ल उसकी नेवले की है और आत्मा सांप की है। बड़े-बूढ़े इकट्ठे हुए, पंचायत की और उन्होंने आखिरी बार कोशिश की नेवले को समझाने की कि ‘तू पागलपन मत कर।’ उस नेवले ने कहा, ‘लेकिन सोचना-समझना तो जरूरी है।’ एक नेवला भीड़ में से बोला, ‘सोचना-समझना गद्दारी है।’ दूसरे नेवले ने कहा, ‘सोचना-समझना दुश्मनों का काम है।’

फिर जब वे उसे न समझा पाये तो उस नेवले को उन्होंने फांसी दे दी। जेम्स थरबर ने अंतिम वचन इस कहानी में लिखा है, कि यह शिक्षा मिलती है कि अगर तुम अपने दुश्मनों के हाथ न मारे गये, तो अपने मित्रों के हाथ मारे जाओगे। मारे तुम जरूर जाओगे।

समाज भीड़ के मनोविज्ञान से जीता है। समाज में सत्य की चिंता किसे भी नहीं। दूसरों से सहमति बनी रहे इसकी ही चिंता है। समाज के साथ व्यक्ति कैसे समायोजित रहे, एडजस्टेड रहे, इसकी ही चिंता है। समाज झूठ हो तो व्यक्ति को भी झूठ हो जाना पड़ता है। व्यक्ति बहुत अकेला है। समाज बड़ा है। और जब तक समाज से बड़े का सहारा न मिले, तब तक इसके अतिरिक्त कोई उपाय भी नहीं कि समाज के साथ सहमत रहा जाये।

केवल वे ही लोग समाज के पार उठ पाते हैं जिन्हें परमात्मा का सहारा मिल जाता है; क्योंकि तब उन्होंने विराट और अनंत के साथ अपना संबंध जोड़ लिया। तब उन्होंने सागर से संबंध जोड़ लिया। नदी से संबंध टूट भी जाये, डबरे से संबंध टूट भी जाये, तो कोई अंतर नहीं पड़ता।

परमात्मा में प्रविष्ट होते ही व्यक्ति समाज से मुक्त हो पाता है। अन्यथा समाज बहुत बड़ी घटना है। चारों तरफ वे ही लोग हैं। उनसे जरा भी तुम भिन्न हुए कि तुम पागल हो। उनसे जरा भी तुम अन्य हुए कि तुम नासमझ हो।

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. “चावल का दाना” एक भिखारी एक दिन सुबह अपने घर के बाहर निकला। त्यौहार का दिन है। आज गाँव में बहुत भिक्षा मिलने की संभावना है। वो अपनी झोली में थोड़े से चावल दाने डाल कर, बाहर आया। चावल के दाने उसने डाल लिये हैं अपनी झोली में, क्योंकि झोली अगर भरी दिखाई पड़े तो देने वाले को आसानी होती है, उसे लगता है कि किसी और ने भी दिया है। सूरज निकलने के क़रीब है। रास्ता सोया है। अभी लोग जाग ही रहे हैं। मार्ग पर आते ही सामने से राजा का रथ आता हुआ नजर आता है।सोचता है आज राजा से अच्छी भीख मिल जायेगी, राजा का रथ उसके पास आकर रूक जाता है। उसने सोचा, “धन्य हैं मेरा भाग्य ! आज तक कभी राजा से भिक्षा नहीं माँग पाया, क्योंकि द्वारपाल बाहर से ही लौटा देते हैं। आज राजा स्वयं ही मेरे सामने आकर रूक गया है। भिखारी ये सोच ही रहा होता है अचानक राजा उसके सामने एक याचक की भाँति खड़ा होकर उससे भिक्षा देने की मांग करने लगता है। राजा कहता है कि आज देश पर बहुत बड़ा संकट आया हुआ है, ज्योतिषियों ने कहा है इस संकट से उबरने के लिए यदि मैं अपना सब कुछ त्याग कर एक याचक की भाँति भिक्षा ग्रहण करके लाऊँगा तभी इसका उपाय संभव है। तुम आज मुझे पहले आदमी मिले हो इसलिए मैं तुमसे भिक्षा मांग रहा हूँ। यदि तुमने मना कर दिया तो देश का संकट टल नहीं पायेगा इसलिए तुम मुझे भिक्षा में कुछ भी दे दो। भिखारी तो सारा जीवन माँगता ही आया था कभी देने के लिए उसका हाथ उठा ही नहीं था। सोच में पड़ गया की ये आज कैसा समय आ गया है, एक भिखारी से भिक्षा माँगी जा रही है, और मना भी नहीं कर सकता। बड़ी मुशकिल से एक चावल का दाना निकाल कर उसने राजा को दिया। राजा वही एक चावल का दाना ले खुश होकर आगे भिक्षा लेने चला गया। सबने उस राजा को बढ़-बढ़कर भिक्षा दी। परन्तु भिखारी को चावल के दाने के जाने का भी गम सताने लगा। जैसे-तैसे शाम को वह घर आया। भिखारी की पत्नी ने भिखारी की झोली पलटी तो उसमें उसे भीख के अन्दर एक सोने का चावल का दाना भी नजर आया। भिखारी की पत्नी ने उसे जब उस सोने के दाने के बारे में बताया तो वो भिखारी छाती पीटके रोने लगा। जब उसकी पत्नी ने रोने का कारण पूछा तो उसने सारी बात उसे बताई। उसकी पत्नी ने कहा, “तुम्हें पता नहीं, कि जो दान हम देते हैं, वही हमारे लिए स्वर्ण है। जो हम इकट्ठा कर लेते हैं, वो सदा के लिए मिट्टी का हो जाता है।" उस दिन से उस भिखारी ने भिक्षा माँगनी छोड़ दी, और मेहनत करके अपना तथा परिवार का भरण-पोषण करने लगा। जिसने सदा दुसरों के आगे हाथ फैलाकर भीख माँगी थी अब खुले हाथ से दान-पुण्य करने लगा। धीरे-धीरे उसके दिन भी बदलने लगे। जो लोग सदा उससे दूरी बनाया करते थे अब उसके समीप आने लगे। वो एक भिखारी की जगह दानी के नाम से जाना जाने लगा। इस कथा का सार यही है- जिस इन्सान की प्रवृति देने की होती है उसे कभी किसी चीज की कमी नहीं होती और जो हमेशा लेने की नियत रखता है उसका कभी पूरा नहीं पड़ता। ----------:::×:::--------- "जय जय श्री राधे"


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एक साधु सन्यासी का न्यूयार्क में बडे पत्रकार इंटरव्यू ले रहे थे..


एक साधु सन्यासी का न्यूयार्क में बडे पत्रकार इंटरव्यू ले रहे थे…. पत्रकार- सर, आपने अपने लास्ट लेक्चर में संपर्क *(Contact*) और संजोग *(Connection)* पर स्पीच दिया लेकिन यह बहुत कन्फ्यूज करने वाला था। क्या आप इसे समझा सकते हैं ?साधु मुस्कराये और उन्होंने पत्रकार से ही पूछना शुरू कर दिया।*आप न्यूयॉर्क से हैं?*पत्रकार: Yes*सन्यासी: आपके घर मे कौन कौन हैं?*पत्रकार को लगा कि साधु उनका सवाल टालने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि उनका सवाल बहुत व्यक्तिगत और उसके सवाल के जवाब से अलग था।फिर भी पत्रकार बोला : मेरी माँ अब नही है, पिता हैं तथा 3 भाई और एक बहिन हैं। सब शादीशुदा हैं।साधू ने चेहरे पे एक मुस्कान के साथ पूछा: आप अपने पिता से बात करते हैं?*पत्रकार चेहरे से गुस्से में लगने लगा…*साधू ने पूछा, आपने अपने फादर से last कब बात की?*पत्रकार ने अपना गुस्सा दबाते हुए जवाब दिया : शायद एक महीने पहले…*साधू ने पूछा: क्या आप भाई-बहिन अक़्सर मिलते हैं? आप सब आखिर में कब मिले एक परिवार की तरह ?*इस सवाल पर पत्रकार के माथे पर पसीना आ गया कि इंटरव्यू, मैं ले रहा हूँ या ये साधु ? ऐसा लगा साधु, पत्रकार का इंटरव्यू ले रहा है।*एक आह के साथ पत्रकार बोला : क्रिसमस पर 2 साल पहले।*साधू ने पूछा: कितने दिन आप सब साथ में रहे ?*पत्रकार अपनी आँखों से निकले आँसुओं को पोंछते हुये बोला : 3 दिन*साधु: कितना वक्त आप भाई- बहनों ने अपने पिता के बिल्कुल करीब बैठ कर गुजारा ?*पत्रकार हैरान और शर्मिंदा दिखा और एक कागज़ पर कुछ लिखने लगा… *साधु ने पूछा: क्या आपने पिता के साथ नाश्ता , लंच या डिनर लिया ? क्या आपने अपने पिता से पूछा कि वो कैसे हैँ ? माता की मृत्यु के बाद उनका वक्त कैसे गुज़र रहा है ?*पत्रकार की आंखों से आंसू छलकने लगे।*साधु ने पत्रकार का हाथ पकड़ा और कहा: शर्मिंदा, परेशान या दुखी मत होना।* मुझे खेद है अगर मैंने आपको अनजाने में चोट पहुंचाई हो लेकिन ये ही आपके सवाल का जवाब है। “संपर्क और संजोग” *Contact & Connection*आप अपने पिता के सिर्फ संपर्क *(Contact)* में हैं पर आपका उनसे कोई *’Connection’* (जुड़ाव ) नही है। *You are not connected to him.आप अपने father से संपर्क में हैं पर उनसे जुड़े नहीं हैं।* *Connection* हमेशा आत्मा से आत्मा का होता है। heart से heart होता है। एक साथ बैठना, भोजन साझा करना और एक दूसरे की देखभाल करना, स्पर्श करना, हाथ मिलाना, आँखों का संपर्क होना, कुछ समय एक साथ बिताना।आप अपने पिता, भाई और बहनों के संपर्क *’Contact’* में हैं लेकिन आपका आपस मे कोई’ जुड़ाव *Connection* नहीं है!”*पत्रकार ने आंखें पोंछी और बोला: मुझे एक अच्छा और अविस्मरणीय सबक सिखाने के लिए धन्यवाद।*वो तब का न्यूयार्क था पर आज ये भारत की भी सच्चाई हो चली है…. *At home and society में सबके हज़ारो संपर्क contacts हैं पर कोई connection नहीं। कोई विचार-विमर्श नहीं। हर आदमी अपनी नकली दुनिया में खोया हुआ है।*हमें केवल “संपर्क” नहीं बनाए रखना चाहिए अपितु “कनेक्टेड” भी रहना चाहिये। हमें हमारे सभी प्रियजनों की देखभाल करना, उनके सुख-दुख को साझा करना और साथ में समय व्यतीत करना चाहिए।वो साधु और कोई नहीं *स्वामी विवेकानंद जी* थे।

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दुर्वासा बह्म साधक थे ( मतलब बह्मा विष्णु शिव को परमेश्वर ना मानकर ॐ को ही परमेश्वर मानना ) वे एक बार स्वर्ग गये रास्ते में‌ अप्सरा सज धज कर जा रही थी उसके गले में सुंदर मोतियों की माला थी । दुर्वासा ने अप्सरा को कहा यह माला मुझे दे दो अप्सरा ने सोचा ऋषि है कोई श्राप दे देगा माला दो पीछा छुडाओ । अप्सरा ने कहा लिजिये ऋषिवर और माला दे दी । दुर्वासा ऋषि ने वो माला अपने लम्बे लम्बे बालो में लपेट कर लगा दी उसी रास्ते में आगे इन्द्र की सवारी साज बाज के साथ जा रही थी ऋषि ने वो निकाल माला हाथी पर बैठे इन्द्र को दे दी इन्द्र ने सम्मान के साथ लेकर अपने ऐरावत हाथी पर रख दी ऐरावत ऐसे ऐसे रखे भेंट पुष्प हटाता रहता था तो उसने माला को पुष्प के साथ फेंक दी माला रास्ते में पडी देख दुर्वासा बडा कुपित हुआ बोला इन्द्र तुझे राज का बडा अभिमान हो गया है तुने मेरी दी माला का अपमान किया है तुने मेरी भेंट का अपमान किया तेरा राज नष्ट हो जायेगा इन्द्र हाथी से उतरा और क्षमा याचना करने लगा कि ऋषि इस हाथी ने भूल वश हटा दी थी पर दुर्वासा बोला जो बोलना था वो बोल दिया अब मेरे बस का कुछ नही और कुछ ही समय में इन्द्र का राज नष्ट हो गया ।अब आपको क्या लगता है गलती किसकी थी …..?*अप्सरा की जिसनें माला दी ।*ऋषि की जिसने माला ली १० मिनिट बाद किसी और को बिन मांगे दी ।‌*इन्द्र की जिसने माला हाथी की ऊपर रखी ।* हाथी की जिसने माला को पुष्प समझ‌ कर फेंक दिया ।संत रामपाल जी कहते है यह बह्म तक के साधक साधना करते बह्म तक उस से मोक्ष तो होता नही और श्राप और वरदान दे कर अपनी भक्ति पुंजी नष्ट करते औरो को भी हताहत करते है कबीर , ७२ अक्षोणी खा गया , वो चुनक ऋषिवर एक । देह धारे यह मौत फिरे , यह सभी काल के भेख (भेष) ।। ‌‌ दुर्वासा कोपे तहां , समझ ना आई नीच । 56 कोटी यादव कटे , मची रूधिर की कीच ।। *( भक्ति से भगवान तक ) पुस्तक से साभार