Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🌹राम नाम का मोल,,,,,,,,🙏

एक पहुंचे हुए महात्माजी थे। उनके पास एक शिष्य भी रहता था।एक बार महात्माजी कहीं गए हुए थे उस दौरान एक व्यक्ति आश्रम में आया। आगंतुक ने कहा- मेरा बेटा बहुत बीमार है। इसे ठीक करने का उपाय पूछने आया हूं।

शिष्य ने बताया कि महात्माजी तो नहीं हैं, आप कल आइए। आगंतुक बहुत दूर से और बड़ी आस लेकर आया था। उसने शिष्य से ही कहा- आप भी तो महात्माजी के शिष्य हैं। आप ही कोई उपाय बता दें बड़ी कृपा होगी। मुझे निराश न करें, दूर से आया हूं।

उसकी परेशानी देखकर शिष्य ने कहा- सरल उपाय है, किसी पवित्र चीज पर राम नाम तीन बार लिख लो, फिर उसे धोकर अपने पुत्र को पिला दो,ठीक हो जाएगा।

दूसरे दिन वह व्यक्ति फिर आया, उसके शिष्य के बताए अनुसार कार्य किया था तो उसके पुत्र को आऱाम हो गया था। वह आभार व्यक्त करने आया था।

महात्माजी कुटिया पर मौजूद थे। आगंतुक ने महात्माजी के दर्शन किए और सारी बात कही- बड़े आश्चर्य की बात है, मेरे बेटा ऐसे उठ बैठा जैसे कोई रोग ही न रहा हो।

यह सब जानकर महात्माजी शिष्य से नाराज हुए,वह बोले- साधारण सी पीड़ा के लिए तूने राम नाम का तीन बार प्रयोग कराया,तुम्हें राम नाम की महिमा ही नहीं पता, इसके एक उच्चारण से ही अनंत पाप कट जाते हैं, तुम इस आश्रम में रहने योग्य नहीं हो,जहां इच्छा है वहां चले जाओ। शिष्य ने उनके पैर पकड़ लिए और क्षमा मांगने लगा।

महात्माजी ने क्षमा भी कर दिया पर उन्होंने सोचा कि शिष्य को यह समझाना भी जरूरी है आखिर उसने गलती क्या की।

महात्माजी ने एक चमकता पत्थर शिष्य को दिया और बोले- शहर जाकर इसकी कीमत करा लाओ,ध्यान रहे बेचना नहीं है,बस लिखते जाना कि किसने कितनी कीमत लगाई।

शिष्य पत्थर लेकर चला, उसे सबसे पहले सब्जी बेचने वाली मिली,पत्थर की चमक देखकर उसने सोचा यह सुंदर पत्थर बच्चों के खेलने के काम आ सकता है, उसके बदले वह ढेर सारी मूली और साग देने को तैयार हो गई।

शिष्य आगे बढ़ा तो उसकी भेंट एक बनिए से हुई. उसने पूछा कि इसका क्या मोल लगाओगे, उसने कहा- पत्थर तो सुंदर और चमकीला है, इससे तोलने का काम लिया जा सकता है।

इसलिए मैं तुम्हें एक रूपया दे सकता हूं।

शिष्य आगे चला और सुनार के यहां पहुंचा, सुनार ने कहा- यह तो काम का है,इसे तोड़कर बहुत से पुखराज बन जाएंगे, मैं इसके एक हजार रुपए तक दे सकता हूं।

फिर शिष्य रत्नों का मोल लगाने वाले जौहरी के पास पहुंचा,अभी तक पत्थर की कीमत साग-मूली और एक रुपए लगी थी इसलिए उसकी हिम्मत बड़े दुकान में जाने की नहीं पड़ी थी।

पर हजार की बात से हौसला बढ़ा,जौहरी ठीक से पत्थर को परख नहीं पाया लेकिन उसने अंदाजा लगाया कि यह कोई उच्च कोटि का हीरा है। वह लाख रूपए तक पर राजी हुआ।

शिष्य एक के बाद एक बड़ी दुकानों में पहुंचा। कीमत बढ़ती-बढ़ती करोड़ तक हो गई। वह घबराया कि कहीं उसे अब भी सही कीमत न पता चली हो।हारकर वह राजा के पास चला गया।

राजा ने जौहरियों को बुलाया, सबने कहा ऐसा पत्थर तो कभी देखा ही नहीं,इसकी कीमत आंकना हमारी बुद्धि से परे हैं। इसके लिए तो सारे राज्य की संपत्ति कम पड़ जाए।

महात्माजी की प्रसिद्धि से सब परिचित थे। राजा ने कहा- गुरूजी से कहना कि यदि वह इसे बेचना चाहें तो मैं उन्हें सारा राज्य देने को तैयार हूं। शिष्य ने कहा कि नहीं सिर्फ कीमत पता करनी है।

वह वापस आश्रम पर चला आया और सारी कहानी सुना दी, फिर बोला कि जब राजा पत्थर के बदले अपनी सारी संपत्ति देने को राजी है तो इसे बेच ही देना चाहिए।

गुरुजी ने कहा- अभी तक इसकी कीमत नहीं आंकी जा सकी है।शिष्य ने पूछा- गुरुजी राजा अपना पूरा राज्य देने को राजी है।इससे अधिक इसकी क्या कीमत हो सकती है?

गुरु ने उसे एक लोहा लेकर आने को कहा। वह लोहे के दो चिमटे लेकर आया।गुरु ने चिमटों से पत्थर का स्पर्श कराया तो वे सोने के हो गए। शिष्य की तो जैसे आंखें फटी ही रह गईं।

गुरूजी ने पूछा- तुमने इस पत्थर का चमत्कार देखा,अब बोलो इसकी क्या कीमत होनी चाहिए।शिष्य बोला- संसार में हर चीज की कीमत सोने से लगती है, पर जो स्वयं सोना बनाता हो उसका मोल कैसे लगे!

महात्माजी बोले- यह पारस है,इससे स्पर्श करते ही लोहे जैसी कुरुप और कठोर चीज सोने जैसी लचीली और चमकदार हो जाती है। भगवान के नाम का महिमा भी कुछ ऐसी ही है।

इस पारस के प्रयोग से तो केवल जड़ पदार्थ प्राप्त हो सकते हैं जो नश्वर हैं, परमात्मा तक तो यभी नहीं पहुंचा सकता। लेकिन राम नाम तो सच्चित आनंद का मार्ग है। इसका मोल पहचानो।

जिस नाम के प्रभाव से इंसान भव सागर पार करता है उस प्रभु को मामूली सी परेशानी में बुला लेना उचित नहीं।राम नाम का प्रयोग सोच-समझ कर करना चाहिए।

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🔶’लोगो की नहीं अपने दिल की सुने’🔶


एक नगर में एक मशहूर चित्रकार रहता था । चित्रकार ने एक बहुत सुन्दर तस्वीर बनाई और उसे नगर के चौराहे मे लगा दिया और नीचे लिख दिया कि जिस किसी को, जहाँ भी इस में कमी नजर आये वह वहाँ निशान लगा दे। जब उसने शाम को तस्वीर देखी उसकी पूरी तस्वीर पर निशानों से ख़राब हो चुकी थी। यह देख वह बहुत दुखी हुआ।

उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करे वह दुःखी बैठा हुआ था। तभी उसका एक मित्र वहाँ से गुजरा उसने उस के दुःखी होने का कारण पूछा तो उसने उसे पूरी घटना बताई । उसने कहा एक काम करो कल दूसरी तस्वीर बनाना और उस मे लिखना कि जिस किसी को इस तस्वीर मे जहाँ कहीं भी कोई कमी नजर आये उसे सही कर दे।
उसने अगले दिन यही किया।

शाम को जब उसने अपनी तस्वीर देखी तो उसने देखा की तस्वीर पर किसी ने कुछ नहीं किया। उस ने हर तरफ अच्छे से बार बार देखा एक भी निशान कही पर भी नहीं मिलावह संसार की रीति समझ गया । “कमी निकालना , निंदा करना , बुराई करना आसान लेकिन उन कमियों को दूर करना अत्यंत कठिन होता है

शिक्षा – यही जिंदगी है दोस्तों कमी निकालने वालो की इस दुनिया में कोई कमी नहीं है, लोग तो आप के अच्छे कार्यो में भी कमी निकाल लेते है। इसलिए दुनिया की ना सोचे की लोग क्या कहेंगे वो करे जो आप को अच्छा लगे जो आप को सत्य लगे

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आर्डर आर्डर
न्यायधीश का दंड🌳

👉🏽अमेरिका में एक पंद्रह साल का लड़का था, स्टोर से चोरी करता हुआ पकड़ा गया। पकड़े जाने पर गार्ड की गिरफ्त से भागने की कोशिश में स्टोर का एक शेल्फ भी टूट गया।
जज ने जुर्म सुना और लड़के से पूछा, “तुमने क्या सचमुच कुछ चुराया था ब्रैड और पनीर का पैकेट”?
लड़के ने नीचे नज़रें कर के जवाब दिया। ;- हाँ’
जज,:- ‘क्यों ?’
लड़का,:- मुझे ज़रूरत थी।
जज:- ‘खरीद लेते।
लड़का:- ‘पैसे नहीं थे।’
जज:- घर वालों से ले लेते।’ लड़का:- ‘घर में सिर्फ मां है। बीमार और बेरोज़गार है, ब्रैड और पनीर भी उसी के लिए चुराई थी
जज:- तुम कुछ काम नहीं करते ?
लड़का:- करता था एक कार वाश में। मां की देखभाल के लिए एक दिन की छुट्टी की थी, तो मुझे निकाल दिया गया।’
जज:- तुम किसी से मदद मांग लेते?
लड़का:- सुबह से घर से निकला था, तकरीबन पचास लोगों के पास गया, बिल्कुल आख़िर में ये क़दम उठाया।

जिरह ख़त्म हुई, जज ने फैसला सुनाना शुरू किया, चोरी और ख़ुसूसन ब्रैड की चोरी बहुत शर्मनाक जुर्म है और इस जुर्म के हम सब ज़िम्मेदार हैं। ‘अदालत में मौजूद हर शख़्स मुझ सहित सब मुजरिम हैं, इसलिए यहाँ मौजूद हर शख़्स पर दस-दस डालर का जुर्माना लगाया जाता है। दस डालर दिए बग़ैर कोई भी यहां से बाहर नहीं निकल सकेगा।’

ये कह कर जज ने दस डालर अपनी जेब से बाहर निकाल कर रख दिए और फिर पेन उठाया लिखना शुरू किया:- इसके अलावा मैं स्टोर पर एक हज़ार डालर का जुर्माना करता हूं कि उसने एक भूखे बच्चे से ग़ैर इंसानी सुलूक करते हुए पुलिस के हवाले किया।
अगर चौबीस घंटे में जुर्माना जमा नहीं किया तो कोर्ट स्टोर सील करने का हुक्म दे देगी।’
जुर्माने की पूर्ण राशि इस लड़के को देकर कोर्ट उस लड़के से माफी तलब करती है।

फैसला सुनने के बाद कोर्ट में मौजूद लोगों के आंखों से आंसू तो बरस ही रहे थे, उस लड़के के भी हिचकियां बंध गईं। वह लड़का बार बार जज को देख रहा था जो अपने आंसू छिपाते हुए बाहर निकल गये।

क्या हमारा समाज, सिस्टम और अदालत इस तरह के निर्णय के लिए तैयार हैं?

चाणक्य ने कहा है कि यदि कोई भूखा व्यक्ति रोटी चोरी करता पकड़ा जाए तो उस देश के लोगों को शर्म आनी चाहिए

😍😍😍 धन्य हैं ऐसा जज…💐💐💐🙏🙏🙏
धन्य हैं ले लोग जो जजसाहब के निर्णय का स्वागत कर रहे थे…
😢😢😢😢😢😢😢😢
*यह रचना बहुत ही प्यारी है दिल को छू गयी, आप भी पढ़ें।

कुमुद शर्मा

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

अलवर महाराजा जयसिंह जी नरुका, जिन्हें अपने महल में कुत्ते रखना कतई पसंद नहीं था। एक बार लेडी वायसराय अपने कुत्ते के साथ महाराजा के शिविर में भोजन के लिए आई, तो महाराजा ने उनसे कहलवाया कि कुत्ते को बाहर छोड़कर फिर भोजन के लिए आवें, पर लेडी वायसराय अपनी ज़िद पर अड़ी रही। आख़िरकार लेडी वायसराय को बिना भोजन किए ही जाना पड़ा।

इन महाराजा के इसी तरह बर्ताव के कारण अंग्रेज इनसे काफी तंग आ गए थे। अंग्रेजों ने इनको गद्दी से खारिज करके विदेश भेज दिया था और इनका देहांत भी पेरिस में हुआ।

अंग्रेजों ने इनके चरित्र पर कीचड़ उछालने के लिए कई भ्रामक खबरें फैलाई जिनमें से एक ये भी थी कि इन महाराजा ने एक बार अपने घोड़े पर पेट्रोल छिड़कर उसे मार डाला।

बहरहाल, ये वही महाराजा हैं जिन्होंने प्रसिद्ध रॉल्स रॉयस कंपनी की कारों का प्रयोग कचरा उठाने में करवाया, क्योंकि वहां साधारण कपड़ों में जाने पर कर्मचारियों ने इनको बाहर निकाल दिया था।

alwar #naruka #Rajwade

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दंड

अमेरिका में एक पंद्रह साल का लड़का था, स्टोर से चोरी करता हुआ पकड़ा गया। पकड़े जाने पर गार्ड की गिरफ्त से भागने की कोशिश में स्टोर का एक शेल्फ भी टूट गया। जज ने जुर्म सुना और लड़के से पूछा, *”तुमने क्या सचमुच कुछ चुराया था ब्रैड और पनीर का पैकेट”।लड़के ने नीचे नज़रें कर के जवाब दिया। लड़का, ‘हाँ’।
जज, ‘क्यों ?’ लड़का, ‘मुझे ज़रूरत थी।’
जज, ‘खरीद लेते।’ लड़का, ‘पैसे नहीं थे।’
जज, ‘घर वालों से ले लेते।’ लड़का, ‘घर में सिर्फ मां है, बीमार और बेरोज़गार है, ब्रैड और पनीर भी उसी के लिए चुराई थी। जज, ‘तुम कुछ काम नहीं करते ?’ लड़का, ‘करता था एक कार वाश में। मां की देखभाल के लिए एक दिन की छुट्टी की थी, तो मुझे निकाल दिया गया।’ जज, ‘तुम किसी से मदद मांग लेते?’ लड़का, ‘सुबह से घर से निकला था, तकरीबन पचास लोगों के पास गया, बिल्कुल आख़िर में ये क़दम उठाया।’

जिरह ख़त्म हुई, जज ने फैसला सुनाना शुरू किया, ‘चोरी और ख़ुसूसन ब्रैड की चोरी बहुत शर्मनाक जुर्म है और इस जुर्म के हम सब ज़िम्मेदार हैं। ‘अदालत में मौजूद हर शख़्स मुझ सहित सब मुजरिम हैं, इसलिए यहाँ मौजूद हर शख़्स पर दस-दस डालर का जुर्माना लगाया जाता है। दस डालर दिए बग़ैर कोई भी यहां से बाहर नहीं निकल सकेगा।’

ये कह कर जज ने दस डालर अपनी जेब से बाहर निकाल कर रख दिए और फिर पेन उठाया लिखना शुरू किया:- ‘इसके अलावा मैं स्टोर पर एक हज़ार डालर का जुर्माना करता हूं कि उसने एक भूखे बच्चे से ग़ैर इंसानी सुलूक करते हुए पुलिस के हवाले किया। अगर चौबीस घंटे में जुर्माना जमा नहीं किया तो कोर्ट स्टोर सील करने का हुक्म दे देगी।’ जुर्माने की पूर्ण राशि इस लड़के को देकर कोर्ट उस लड़के से माफी तलब करती है।

फैसला सुनने के बाद कोर्ट में मौजूद लोगों के आंखों से आंसू तो बरस ही रहे थे, उस लड़के के भी हिचकियां बंध गईं। वह लड़का बार बार जज को देख रहा था जो अपने आंसू छिपाते हुए बाहर निकल गये।

क्या हमारा समाज, सिस्टम और अदालत इस तरह के निर्णय के लिए तैयार हैं? चाणक्य ने कहा है कि यदि कोई भूखा व्यक्ति रोटी चोरी करता पकड़ा जाए तो उस देश के लोगों को शर्म आनी चाहिए।

रामचंद्र आर्य

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एक सहेली का सवाल :-

आयो न दीखे पारधी, लाग्या न दीखे बाण ,
मुं थने पूंछूं हे सखी, ये किण विध तजिया प्राण !

दूसरी सहेली का जवाब :-
जल थोड़ो और नेह घणो, लाग्या प्रीत रा बाण ,
तूं पी -तूं पी केवता, इण दोन्यू तजिया प्राण !

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👌🏻बहुत सुंदर 👌🏻

मैं एक गृह प्रवेश की पूजा में गया था,
पंडितजी पूजा करा रहे थे ।

पंडितजी ने सबको हवन में शामिल होने के लिए बुलाया । सबके सामने हवन सामग्री रख दी गई । पंडितजी मंत्र पढ़ते और कहते, “स्वाहा।”

लोग चुटकियों से हवन सामग्री लेकर अग्नि में डाल देते, गृह मालिक को स्वाहा कहते ही अग्नि में घी डालने की ज़िम्मेदीरी सौंपी गई ।

हर व्यक्ति थोड़ी सामग्री डालता, इस आशंका में कि कहीं हवन खत्म होने से पहले ही सामग्री खत्म न हो जाए, गृह मालिक भी बूंद-बूंद घी डाल रहे थे । उनके मन में भी डर था कि घी खत्म न हो जाए।

मंत्रोच्चार चलता रहा, स्वाहा होता रहा और पूजा पूरी हो गई, सबके पास बहुत सी हवन सामग्री बची रह गई ।

“घी तो आधा से भी कम इस्तेमाल हुआ था।”

हवन पूरा होने के बाद पंडितजी ने कहा कि आप लोगों के पास जितनी सामग्री बची है, उसे अग्नि में डाल दें । गृह स्वामी से भी उन्होंने कहा कि आप इस घी को भी कुंड में डाल दें ।

एक साथ बहुत सी हवन सामग्री अग्नि में डाल दी गई । सारा घी भी अग्नि के हवाले कर दिया गया । पूरा घर धुंए से भर गया । वहां बैठना मुश्किल हो गया, एक-एक कर सभी कमरे से बाहर निकल गए ।

अब जब तक सब कुछ जल नहीं जाता, कमरे में जाना संभव नहीं था । काफी देर तक इंतज़ार करना पड़ा, सब कुछ स्वाहा होने के इंतज़ार में ।
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……मेरी कहानी यहीं रुक जाती है ।
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उस पूजा में मौजूद हर व्यक्ति जानता था कि जितनी हवन सामग्री उसके पास है, उसे हवन कुंड में ही डालना है । पर सभी ने उसे बचाए रखा कि आख़िर में सामग्री काम आएगी या खत्म न हो जाए ?

ऐसा ही हम करते हैं । यही हमारी फितरत है । हम अंत के लिए बहुत कुछ बचाए रखते हैं । जो अंत मे जमीन जायदाद और बैंक बैलेंस के रूप में यहीं पड़ा रह जाता है।😞

ज़िंदगी की पूजा खत्म हो जाती है और हवन सामग्री बची रह जाती है । हम बचाने में इतने खो जाते हैं कि यह भी भूल जाते है कि सब कुछ होना हवन कुंड के हवाले ही है, उसे बचा कर क्या करना । बाद में तो वो सिर्फ धुंआ ही होना है !!

“संसार” हवन कुंड है और “जीवन” पूजा।

एक दिन सब कुछ हवन कुंड में समाहित होना है ।

अच्छी पूजा वही है, जिसमें…
“हवन सामग्री का सही अनुपात में इस्तेमाल हो” न सामग्री खत्म हो ! न बची रह जाए !! यही मेनेजमेन्ट करना है !!!

भारतीय संस्कृति संस्थान

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बंदरों की ज़िद्द

एक बार कुछ वैज्ञानिकों ने एक बड़ा ही मजेदार प्रयोग किया..

उन्होंने 5 बंदरों को एक बड़े से पिंजरे में बंद कर दिया और बीचों -बीच एक सीढ़ी लगा दी जिसके ऊपर केले लटक रहे थे..

जैसा की अनुमान था, एक बन्दर की नज़र केलों पर पड़ी वो उन्हें खाने के लिए दौड़ा..

पर जैसे ही उसने कुछ सीढ़ियां चढ़ीं उस पर ठण्डे पानी की तेज धार डाल दी गयी और उसे उतर कर भागना पड़ा..

पर वैज्ञानिक यहीं नहीं रुके,उन्होंने एक बन्दर के किये गए की सजा बाकी बंदरों को भी दे डाली और सभी को ठन्डे पानी से भिगो दिया..

बेचारे बन्दर हक्के-बक्के एक कोने में दुबक कर बैठ गए..

पर वे कब तक बैठे रहते,कुछ समय बाद एक दूसरे बन्दर को केले खाने का मन किया..
और वो उछलता कूदता सीढ़ी की तरफ दौड़ा..

अभी उसने चढ़ना शुरू ही किया था कि पानी की तेज धार से उसे नीचे गिरा दिया गया..

और इस बार भी इस बन्दर के गुस्ताखी की सज़ा बाकी बंदरों को भी दी गयी..

एक बार फिर बेचारे बन्दर सहमे हुए एक जगह बैठ गए…

थोड़ी देर बाद जब तीसरा बन्दर केलों के लिए लपका तो एक अजीब वाक्य हुआ..

बाकी के बन्दर उस पर टूट पड़े और उसे केले खाने से रोक दिया,
ताकि एक बार फिर उन्हें ठन्डे पानी की सज़ा ना भुगतनी पड़े..

अब प्रयोगकारों ने एक और मजेदार चीज़ की..

अंदर बंद बंदरों में से एक को बाहर निकाल दिया और एक नया बन्दर अंदर डाल दिया..

नया बन्दर वहां के नियम क्या जाने..

वो तुरंत ही केलों की तरफ लपका..

पर बाकी बंदरों ने झट से उसकी पिटाई कर दी..

उसे समझ नहीं आया कि आख़िर क्यों ये बन्दर ख़ुद भी केले नहीं खा रहे और उसे भी नहीं खाने दे रहे..

ख़ैर उसे भी समझ आ गया कि केले सिर्फ देखने के लिए हैं खाने के लिए नहीं..

इसके बाद प्रयोगकारों ने एक और पुराने बन्दर को निकाला और नया अंदर कर दिया..

इस बार भी वही हुआ नया बन्दर केलों की तरफ लपका पर बाकी के बंदरों ने उसकी धुनाई कर दी और मज़ेदार बात ये है कि पिछली बार आया नया बन्दर भी धुनाई करने में शामिल था..
जबकि उसके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था!

प्रयोग के अंत में सभी पुराने बन्दर बाहर जा चुके थे और नए बन्दर अंदर थे जिनके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था..

पर उनका स्वभाव भी पुराने बंदरों की तरह ही था..

वे भी किसी नए बन्दर को केलों को नहीं छूने देते..

हमारे समाज में भी ये स्वभाव देखा जा सकता है..

जब भी कोई नया काम शुरू करने की कोशिश करता है,
चाहे वो पढ़ाई , खेल , एंटरटेनमेंट, व्यापार, राजनीति, समाजसेवा या किसी और क्षेत्र से सम्बंधित हो, उसके आस पास के लोग उसे ऐसा करने से रोकते हैं..

उसे असफलता का डर दिखाया जाता है..

और मजेदार बात ये है कि उसे रोकने वाले अधिकतर वो होते हैं जिन्होंने ख़ुद उस क्षेत्र में कभी हाथ भी नहीं आज़माया होता..

इसलिए यदि आप भी कुछ नया करने की सोच रहे हैं और आपको भी समाज या आस पास के लोगों के नकारात्मक विचारों को झेलना पड़ रहा है तो कान बंद कर लीजिये ..

और अपनी अंतरात्मा ,अपनी सामर्थ्य और अपने विश्वास को सुनिए..

Jayesh Kumar

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दूध का फर्ज

देर रात गये दरवाजे की बेल बजी तो भय भी लगता है ।सरोज जी बस सोने ही जा रही थी अपने सतरह सौ स्कावयर फुट के फ्लैट में अकेली ही रहती हैं ।
बडा बेटा अनिल बहू के साथ बंगलोर में रहता है।
छोटा एम डी कर रहा सो होस्टल में ।
वे खाना खाकर कुछ देर टी वी देखने के बाद सोने ही जा रही थी ।
की होल से देखा अनिलऔर बहू खडे थे ।
दरवाजा खोला “.अरे तुम लोग बिना बताये “
” मम्मी आज आपका जन्म दिन है सो सप्राइज देने आ गये “बेटा बोला ।
“बाप रे ,ऐसे खतरनाक सप्राइज न दिया करो “
खैर बताओ क्या खाओगे
बहू बोली हम खाकर आये हैं आप परेशान न हों फिर भी उन्होंने तुरंत गर्म पूड़ियाँ तली ।
सब्जी खीर फ्रिज में था ।
सुबह जल्दी उठकर रोज की तरह टहलने निकल गयीं ।
ये दोनों सो रहे थे ।
आते समय दूध सब्जी सब लेते आईं
बच्चे उठे तब तक नहा धोकर पूजा पाठ भी कर लिया । उडद की कचौड़ी बेटे को प्रिय थी सो आलू की तरी सब्जी और कचौड़ी तैयार कर दी ।
बेटे ने ऊंगलियां चाट चाट कर खायी लगता है बहू को भली नहीं लगी ये बात ।
फ्लैटवालों ने एक मीटिंग रखी थी सो नीचे गयीं ,
दरवाजा खुला ही था ।
लौटी तो सुना बहू कह रही थी कि इनके अकेले के लिये इतने बडे फ्लैट की क्या जरुरत बेच दो ।
इन्हें साथ ले चलें कितनी स्मार्ट बैंड दूध सब्जी सब ले आई खाना भी कितना अच्छा और जल्दी बनाती हैं ।कामवालियों से तो छुट्टी मिल जायेगी और कोई रिस्क भी नहीं ।
अनिल जोर से चीखा -” रश्मि तुम्हें शर्म नहीं आती ये मेरी मां है मां ।
तुम्हारी तरह छत्तीस को दिनभर उठाती बैठाती थी । क्लासवन सरकारी अधिकारी थी ।
गाडी, पियून , बंगला सब था ।
ये फ्लैट भी खुद की कमाई से खरीदा तीन बेड रुम का कि हम सब साथ रह सकें ।
पापा के मरने के बाद हमको कितनी जतन से योग्य बनाया और तुम कह रही कि इनको अपनी नौकरानी का दर्जा दोगी ।
आइंदा ऐसी बात जुबान पर भी लाई तो जुबान काटकर फेंक दूंगा समझी । “
सरोज जी का कलेजा गर्व से फूल उठा कि वाह मेरे बेटे ।मेरे दूध का मान रख दिया ।
उनको देखते ही दोनों सकपका गये ।
उन्होंने ऐसा प्रदर्शित किया जैसे कुछ सुना ही नहीं।

सोकि ढींगरा

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⭕️’समस्या का समाधान…✍️


यह कहानी एक गुरु जी और उनके शिष्य की जोड़ी की है। यह साधु महात्मा एक शहर से दूसरे शहर घुमा करते थे।

और गुरु जी जो थे वह बहुत सारे लोगों के कष्टों का निवारण करते थे। अब शिष्य जो था उनके साथ उनकी सेवा करता और गुरु जी के साथ हमेशा उनकी सहायता और मदद करता था।

अब यह साधु और शिष्य की जोड़ी यह दोनों एक शहर पहुंचे वहां पर यह साधु जी का 2 दिन का सत्संग कार्यक्रम था और उन्हें वह शहर पर वहां रुकना था जब वहां पर 2 दिन का सत्संग खत्म हो गया तो अगली सुबह दुसरे शहर के लिए रवाना होना था।

परंतु ना ही उस शहर में वे किसी को जानते थे ना ही किसी को पहचानते थे। तो उस शहर पर उन्हें वहां पर खाने और रुकने की एक समस्या थी। तभी शिष्य ने अपने गुरु जी से कहा, “गुरु जी आज की रात या तो मंदिर की सीढ़ियों पर बितानी होगी” या किसी बगीचे या रास्ते में पर ही आज की रात बितानी होगी।

इस बात पर साधु ने शिष्य से कहा, ऐसा बिल्कुल नहीं होगा अच्छे काम के लिए निकले हैं तो ऊपरवाला ध्यान जरूर रखेगा। उन्होंने अपने शिष्य सेे कहा की आज आराम से खाना खाने को भी मिलेगा और आराम से रहने के लिए एक अच्छी जगह भी मिलेगा।

फिर साधु जिस रास्ते पर से पैदल जा रहे थे उसी रास्ते के किनारे एक बगीचा था वहां पर जाकर वो ध्यान मुद्रा में बैठ गए और कुछ देर बाद उठे और चलने लगे। और शिष्य भी उनके पीछे हो लिया।

कुछ देर बाद साधु महात्मा एक होटल के पास जाकर रुके और देखा तो वहां पर सूट में एकदम तैयार होटल का मैनेजर खड़ा हुआ था। मानो जैसे कि होटल का मैनेजर दोनों का स्वागत करने के लिए होटल के सामने खड़े हुए हैं

तब मैनेजर ने साधु महात्मा जी से कहा, ऐसा लगता है कि आप सफर करके आए हैं और इस शहर में किसी को जानते तक नहीं आप जैसे महापुरुषों के लिए आपके सत्कार के लिए एक विशेष व्यवस्था हमारे होटल में रहती है।

कृपया करके यदि आपकी इच्छा हो तो आप हमारे होटल में रुक सकते हैं, तो वह साधु और शिष्य उस होटल में रुक गए। और वहां के मैनेजर ने साधु महात्मा जी से कहा कि आप सबसे पहले भोजन कर लें। तो यह सब कुछ देखकर और सुनकर शिष्य चौंक जाता है।

उसे विश्वास नहीं हो रहा था उसे लगा कि मेरे गुरु जी को यह सब कैसे पता। अगली सुबह जब वे जिस स्थान पर पहुंचने वाले थे वह वहां पर पहुंच गए। और वहा पर पांच दिवसीय सत्संग था जिसके लिए बहुत सारे लोग भी आए थे। और वह सत्संग शुरू हो गया।

साधु महात्मा जी को प्रवचन सुनते और लोगों के कष्टों को दूर करते हुए 2 दिन समाप्त हो गए। तीसरे दिन सुबह एक महिला यह गुरुजी के पास आ पहुंची उसने कहा कि गुरु जी आप के प्रवचन सुनने से मुझे बहुत बल मिलता है लेकिन मैं यह शिविर छोड़ रही हूं।

मैं यहां शिविर में कल से नहीं आऊंगी। साधु ने ध्यान से उसकी बातों को सुना और फिर कहा, उसका कारण क्या है कि तुम आगे का प्रवचन सुनना नहीं चाहती हो?

तब महिला ने बताया कि आपके प्रवचन के बाद जो समय होता है उसमें ध्यान में बैठना होता है और मैं ध्यान में नहीं बैठ पाती, उस जगह में या तो कोई पैर पसार के बैठा होता है या फिर कोई अपने मोबाइल फोन में बतिया रहा होता है।

ऐसे में ध्यान में कैसे बैठा जाए? गुरुजी ने ध्यान से बातें सुनी और फिर उस महिला से गुरूजी ने कहा कोई बात नहीं कल से शिविर नहीं आना तुम। लेकिन तुम्हें एक क्रिया खत्म करके जाना होगा। और गुरुजी ने कहा उस महिला से कहा कि तुम्हें एक लोटे में बिल्कुल ऊपर तक भरा हुआ पानी लेना होगा और यह जो मंदिर है उसकी चारों ओर 5 चक्कर लगानी होगी।

लेकिन ध्यान इतना रहे कि लोटे में से एक बूंद भी पानी बाहर ना गिरे। जैसा गुरु जी ने कहा था बिल्कुल वैसा खत्म करके महिला गुरुजी के पास पहुंची। गुरुजी ने देखा कि लोटे में पानी हिला तक नहीं था तो गुरु जी ने महिला से पूछा, जब तुम मंदिर के चक्कर लगा रही थी।

तो क्या तुम्हें कोई शोरगुल सुनाई दिया या फिर कोई मोबाइल फोन पर बतियाता रहा, या कोई पैर पसार कर बैठा हो, वह दिखाई पड़ा। तब महिला ने सर झुकाते हुए कहा, नहीं गुरु जी मुझे कुछ भी ऐसा ना दिखाई दिया ना ही सुनाई दिया।

तब गुरुजी ने कहा कि बेटी तुम्हारा सारा का सारा ध्यान इस एक लोटे के पानी पर केंद्रित था। वैसे ही तुम उस सत्संग के खत्म होने के बाद जब ध्यान के लिए बोला जाता है तो तुम बिल्कुल ऐसे ही लोटे के पानी की तरह ध्यान को केंद्रित किया करो।

अर्थात जैसा कि कहा जाता है आज की दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण जरूरी बात है जो यह है कि अगर सफल होना है तो समस्या पर नहीं समाधान पर ध्यान केंद्रित करिए।

लेकिन आज कल की दुनिया में होता यह है कि ना ही किसी को सच्चाई की सलाह सुननी है और ना ही किसी को धोखे की तारीफ, परंतु हर कोई एक दूसरे को बस यही दोनों चीजें सुनाते रहते हैं और तारीफ के झूठे धोखे में लिपट कर अपने आप पर घमंड करके चारों ओर घूमते रहते हैं।