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आखिर कहा गया जयगढ़ किले का खजाना_____________________

अक्सर सुनने को मिलता है कि आपातकाल में भारत सरकार ने जयपुर के पूर्व राजघराने पर छापे मारकर उनका खजाना जब्त किया था, राजस्थान में यह खबर आम है कि – चूँकि जयपुर की महारानी गायत्री देवी कांग्रेस व इंदिरा गांधी की विरोधी थी अत: आपातकाल में देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जयपुर राजपरिवार के सभी परिसरों पर छापे की कार्यवाही करवाई, जिनमें जयगढ़ का किला प्रमुख था, कहते कि राजा मानसिंह की अकबर के साथ संधि थी (जो की मन घंडन्त और सच्चाई से परे बाते हे, जिसका कोई भी प्रमाण मूल ऐतिहासिक बुक में नहीं हे पर अबुल फजल और कर्नल टॉड ने ऐसा ही लिखा हे., अंदेशा हे की ये सब राजपूतो को आपस में लड़वाने के लिए भ्रान्ति मात्र हे.)… राजा मानसिंह अकबर के सेनापति के रूप में जहाँ कहीं आक्रमण कर जीत हासिल करेंगे उस राज्य पर राज अकबर होगा और उस राज्य के खजाने में मिला धन राजा मानसिंह का होगा| इसी कहानी के अनुसार राजा मानसिंह ने अफगानिस्तान सहित कई राज्यों पर जीत हासिल कर वहां से ढेर सारा धन प्राप्त किया और उसे लाकर जयगढ़ के किले में रखा, कालांतर में इस अकूत खजाने को किले में गाड़ दिया गया जिसे इंदिरा गाँधी ने आपातकाल में सेना की मदद लेकर खुदाई कर गड़ा खजाना निकलवा लिया|
यही आज से कुछ वर्ष पहले डिस्कवरी चैनल पर जयपुर की पूर्व महारानी गायत्री देवी पर एक टेलीफिल्म देखी थी उसमें में गायत्री देवी द्वारा इस सरकारी छापेमारी का जिक्र था साथ ही फिल्म में तत्कालीन जयगढ़ किले के किलेदार को भी फिल्म में उस छापेमारी की चर्चा करते हुए दिखाया गया| जिससे यह तो साफ़ है कि जयगढ़ के किले के साथ राजपरिवार के आवासीय परिसरों पर छापेमारी की गयी थी|
जश्रुतियों के अनुसार उस वक्त जयपुर दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग सील कर सेना के ट्रकों में भरकर खजाने से निकाला धन दिल्ली ले जाया गया, लेकिन अधिकारिक तौर पर किसी को नहीं पता कि इस कार्यवाही में सरकार के कौन कौन से विभाग शामिल थे और किले से खुदाई कर जब्त किया गया धन कहाँ ले जाया गया|
चूँकि राजा मानसिंह के इन सैनिक अभियानों व इस धन को संग्रह करने में हमारे भी कई पूर्वजों का खून बहा था, साथ ही तत्कालीन राज्य की आम जनता का भी खून पसीना बहा था| इस धन को भारत सरकार ने जब्त कर राजपरिवार से छीन लिया इसका हमें कोई दुःख नहीं, कोई दर्द नहीं, बल्कि व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि यह जनता के खून पसीने का धन था जो सरकारी खजाने में चला गया और आगे देश की जनता के विकास में काम आयेगा| पर चूँकि अधिकारिक तौर पर यह किसी को पता नहीं कि यह धन कितना था और अब कहाँ है ?
गृह मंत्रालय से उपरोक्त खजाने से संबंधित निम्न सवाल पूछ सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के अंतर्गत जबाब मांगे
1- क्या आपातकाल के दौरान केन्द्रीय सरकार द्वारा जयपुर रियासत के किलों, महलों पर छापामार कर सेना द्वारा खुदाई कर रियासत कालीन खजाना निकाला गया था ? यही हाँ तो यह खजाना इस समय कहाँ पर रखा गया है ?
2- क्या उपरोक्त जब्त किये गए खजाने का कोई हिसाब भी रखा गया है ? और क्या इसका मूल्यांकन किया गया था ? यदि मूल्यांकन किया गया था तो उपरोक्त खजाने में कितना क्या क्या था और है ?
3- उपरोक्त जब्त खजाने की जब्त सम्पत्ति की यह जानकारी सरकार के किस किस विभाग को है?
4- इस समय उस खजाने से जब्त की गयी सम्पत्ति पर किस संवैधानिक संस्था का या सरकारी विभाग का अधिकार है?
5- वर्तमान में जब्त की गयी उपरोक्त संपत्ति को संभालकर रखने की जिम्मेदारी किस संवैधानिक संस्था के पास है?
6- उस संवैधानिक संस्था या विभाग का का शीर्ष अधिकारी कौन है?
7- खजाने की खुदाई कर इसे इकठ्ठा करने के लिए किन किन संवैधानिक संस्थाओ को शामिल किया गया और ये सब कार्य किसके आदेश पर हुआ ?
8- इस संबंध में भारत सरकार के किन किन जिम्मेदार तत्कालीन जन सेवकों से राय ली गयी थी?
किसी अनुसंधान की जरुरत हो, लेकिन जिस तरह सरकार द्वारा सूचना मुहैया कराने के मामले में हाथ खड़े किये गये है उससे यह शक गहरा गया कि उस वक्त जयपुर राजघराने से जब्त खजाना देश के खजाने में जमा ही नहीं हुआ, यदि थोड़ा बहुत भी जमा होता तो कहीं तो कोई प्रविष्ठी मिलती या इस कार्यवाही का कोई रिकोर्ड होता| पर किसी तरह का कोई दस्तावेजी रिकॉर्ड नहीं होना दर्शाता है कि आपातकाल में उपरोक्त खजाना तत्कालीन शासकों के निजी खजानों में गया है| और सीधा शक जाहिर कर रहा कि उपरोक्त खोदा गया अकूत खजाना आपातकाल की आड़ में इंदिरा गाँधी ने खुर्द बुर्द कर स्विस बैंकों में भेज दिया जिसे सीधे सीधे जनता के धन पर डाका है..!,

श्री विकास खुराना

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एक कहानी जो दिल को छू गयी,

एक बार जरूर पढे…….
वह शख्स गाड़ी से उतरा.. और बड़ी तेज़ी से एयरपोर्ट मे घुसा , जहाज़ उड़ने के लिए तैयार था , उसे किसी कांफ्रेंस मे पहुंचना था जो खास उसी के लिए आयोजित की जा रही थी…..
वह अपनी सीट पर बैठा और जहाज़ उड़ गया…अभी कुछ दूर ही जहाज़ उड़ा था कि….कैप्टन ने ऐलान किया , तूफानी बारिश और बिजली की वजह से जहाज़ का रेडियो सिस्टम ठीक से काम नही कर रहा….इसलिए हम क़रीबी एयरपोर्ट पर उतरने के लिए मजबूर हैं.।
जहाज़ उतरा वह बाहर निकल कर कैप्टन से शिकायत करने लगा कि…..उसका एक-एक मिनट क़ीमती है और होने वाली कांफ्रेस मे उसका पहुचना बहुत ज़रूरी है….पास खड़े दूसरे मुसाफिर ने उसे पहचान लिया….और बोला डॉक्टर पटनायक आप जहां पहुंचना चाहते हैं…..टैक्सी द्वारा यहां से केवल तीन घंटे मे पहुंच सकते हैं…..उसने शुक्रिया अदा किया और टैक्सी लेकर निकल पड़ा…

लेकिन ये क्या आंधी , तूफान , बिजली , बारिश ने गाड़ी का चलना मुश्किल कर दिया , फिर भी ड्राइवर चलता रहा…
अचानक ड्राइवर को एह़सास हुआ कि वह रास्ता भटक चुका है…
ना उम्मीदी के उतार चढ़ाव के बीच उसे एक छोटा सा घर दिखा….इस तूफान मे वही ग़नीमत समझ कर गाड़ी से नीचे उतरा और दरवाज़ा खटखटाया….
आवाज़ आई….जो कोई भी है अंदर आ जाए..दरवाज़ा खुला है…

अंदर एक बुढ़िया आसन बिछाए भगवद् गीता पढ़ रही थी…उसने कहा ! मांजी अगर इजाज़त हो तो आपका फोन इस्तेमाल कर लूं…

बुढ़िया मुस्कुराई और बोली…..बेटा कौन सा फोन ?? यहां ना बिजली है ना फोन..
लेकिन तुम बैठो..सामने जल है , पी लो….थकान दूर हो जायेगी..और खाने के लिए भी कुछ ना कुछ फल मिल जायेगा…..खा लो ! ताकि आगे सफर के लिए कुछ शक्ति आ जाये…

डाक्टर ने शुक्रिया अदा किया और जल पीने लगा….बुढ़िया अपने पाठ मे खोई थी कि उसकेे पास उसकी नज़र पड़ी….एक बच्चा कंबल मे लपेटा पड़ा था जिसे बुढ़िया थोड़ी थोड़ी देर मे हिला देती थी…
बुढ़िया फारिग़ हुई तो उसने कहा….मांजी ! आपके स्वभाव और एह़सान ने मुझ पर जादू कर दिया है….आप मेरे लिए भी दुआ
कर दीजिए….यह मौसम साफ हो जाये मुझे उम्मीद है आपकी दुआऐं ज़रूर क़बूल होती होंगी…

बुढ़िया बोली….नही बेटा ऐसी कोई बात नही…तुम मेरे अतिथी हो और अतिथी की सेवा ईश्वर का आदेश है….मैने तुम्हारे लिए भी दुआ की है…. परमात्मा का शुक्र है….उसने मेरी हर दुआ सुनी है..
बस एक दुआ और मै उससे माँग रही हूँ शायद जब वह चाहेगा उसे भी क़बूल कर लेगा…

कौन सी दुआ..?? डाक्टर बोला…

बुढ़िया बोली…ये जो 2 साल का बच्चा तुम्हारे सामने अधमरा
पड़ा है , मेरा पोता है , ना इसकी मां ज़िंदा है ना ही बाप , इस बुढ़ापे मे इसकी ज़िम्मेदारी मुझ पर है , डाक्टर कहते हैं…इसे कोई खतरनाक रोग है जिसका वो इलाज नही कर सकते , कहते हैं एक ही नामवर डाक्टर है , क्या नाम बताया था उसका !
हां “डॉ पटनायक ” ….वह इसका ऑप्रेशन कर सकता है , लेकिन मैं बुढ़िया कहां उस डॉ तक पहुंच सकती हूं ? लेकर जाऊं भी तो पता नही वह देखने पर राज़ी भी हो या नही ? बस अब बंसीवाले से ये ही माँग रही थी कि वह मेरी मुश्किल आसान कर दे..!!

डाक्टर की आंखों से आंसुओं का सैलाब बह रहा है….वह भर्राई हुई आवाज़ मे बोला !
माई…आपकी दुआ ने हवाई जहाज़ को नीचे उतार लिया , आसमान पर बिजलियां कौदवां दीं , मुझे रस्ता भुलवा दिया , ताकि मैं यहां तक खींचा चला आऊं ,हे भगवान! मुझे यकीन ही नही हो रहा….कि भगवान एक दुआ क़बूल करके अपने भक्तौं के लिए इस तरह भी मदद कर सकता है…..!!!!

दोस्तों वह सर्वशक्तीमान है….परमात्मा के बंदो उससे लौ लगाकर तो देखो…जहां जाकर इंसान बेबस हो जाता है , वहा ं से उसकी परमकृपा शुरू होती है…।यह आप सबसे अधिक लोगो को भेजे ताकि मुझ जैसे लाखो लोगो की आँखे खुले।

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एक प्राचीन कथा है जंगल की राह से एक जौहरी गुजरता था। देखा उसने राह में, एक कुम्हार अपने गधे के गले में एक बड़ा हीरा बांधकर चल रहा है। चकित हुआ! पूछा कुम्हार से, कितने पैसे लेगा इस पत्थर के? कुम्हार ने कहा, आठ आने मिल जाएं तो बहुत। लेकिन जौहरी को लोभ पकड़ा। उसने कहा, चार आने में दे—दे, पत्थर है, करेगा भी क्या?

पर कुम्हार भी जिद बांधकर बैठ गया, छह आने से कम न हुआ तो जौहरी ने सोचा कि ठीक है, थोड़ी देर में अपने आप आकर बेच जाएगा। वह थोड़ा आगे बढ़ गया। लेकिन कुम्हार वापस न लौटा तो जौहरी लौटकर आया; लेकिन तब तक बाजी चूक गई थी, किसी और ने खरीद लिया था। तो पूछा उसने कि कितने में बेचा? उस कुम्हार ने कहा कि हुजूर, एक रुपया मिला पूरा। आठ आने में बेच देता, छह आने में बेच देता, बड़ा नुकसान हो जाता।

उस जौहरी की छाती पर कैसा सदमा लगा होगा! उसने कहा, मूर्ख! तू बिलकुल गधा है। लाखों का हीरा एक रुपए में बेच दिया?

उस कुम्हार ने कहा, हुजूर मैं अगर गधा न होता तो लाखों के हीरे को गधे के गले में ही क्यों बांधता? लेकिन आपके लिए क्या कहें? आपको पता था कि लाखों का हीरा है और पत्थर की कीमत में भी लेने को राजी न हुए!

धर्म का जिसे पता है, उसका जीवन अगर रूपांतरित न हो तो उस जौहरी की भांति गधा है। जिन्हें पता नहीं है, वे क्षमा के योग्य हैं; लेकिन जिन्हें पता है, उनको क्या कहें?

दो ही संभावनाएं हैं : या तो उन्हें पता ही नहीं है; सोचते हैं, पता है। और यही संभावना ज्यादा सत्यतर मालूम होती है। या दूसरी संभावना है कि उन्हें पता है और फिर भी गलत चले जाते हैं।

वह दूसरी संभावना संभव नहीं मालूम होती। जौहरी ने तो शायद चार आने में खरीद लेने की कोशिश की हो लाखों के हीरे को, लेकिन धर्म के जगत में यह असंभव है कि तुम्हें पता हो और तुम उससे विपरीत चले जाओ।

सुकरात का बड़ा बहुमूल्य वचन है: ज्ञान ही चरित्र है। जिसने जान लिया, वह बदल गया। और अगर जानकर भी न बदले हो, तो समझना कि जानने में कहीं खोट है।

अक्सर मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैं, जानते तो हम हैं, लेकिन जीवन बदलता नहीं। यह तो उन्होंने मान ही लिया है कि जानते हैं; अब जीवन बदलने की राह देख रहे हैं।

मैं उनसे कहता हूं पहली बात ही बेबुनियाद है, दूसरे की प्रतीक्षा ही न करो। तुमने अभी बुनियाद ही नहीं रखी और भवन उठाने की कोशिश में लग गए हो। पहले फिर से सोचो, तुम जानते हो? क्योंकि ऐसा कभी होता नहीं कि जो जानता हो और बदल न जाए। बदलाहट जानने के पीछे अपने आप चली आती है। वह सहज परिणाम है, उसके लिए कुछ करना भी नहीं पड़ता।

अगर बदलने के लिए जानने के अतिरिक्त भी कुछ करना पड़े तो समझना कि जानने में कोई कमी रह गई थी। जितनी कमी हो, उतना ही करना पड़ता है। वह जो कमी है, उसकी पूर्ति ही कृत्य से करनी पड़ती है। बोध की कमी कृत्य से पूरी करनी पड़ती है; अन्यथा बोध पर्याप्त है।

एस धम्‍मो सनंतनो–(प्रवचन-31)

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बुढापे की लाठी-“बहु”

लोगों से अक्सर सुनते आये हैं कि बेटा बुढ़ापे की लाठी होता है।इसलिये लोग अपने जीवन मे एक “बेटा” की कामना ज़रूर रखते हैं ताकि बुढ़ापे अच्छे से कट जाए।ये बात सच भी है क्योंकि बेटा ही घर में बहु लाता है।बहु के आ जाने के बाद एक बेटा अपनी लगभग सारी जिम्मेदारी अपनी पत्नी के कंधे में डाल देता है।और फिर बहु बन जाती है अपने बूढ़े सास-ससुर की बुढ़ापे की लाठी।जी हाँ मेरा तो यही मनाना है वो बहु ही होती है जिसके सहारे बूढ़े सास-ससुर अपनी जीवन व्यतीत करते हैं।एक बहु को अपने सास-ससुर की पूरी दिनचर्या मालूम होती।कौन कब और कैसी चाय पीते है, क्या खाना बनाना है, शाम में नाश्ता में क्या देना,रात को हर हालत में 9 बजे से पहले खाना बनाना है।अगर सास-ससुर बीमार पड़ जाए तो पूरे मन या बेमन से बहु ही देखभाल करती है।अगर एक दिन के लिये बहु बीमार पड़ जाए या फिर कही चले जाएं,बेचारे सास-ससुर को ऐसा लगता है जैसा उनकी लाठी ही किसी ने छीन ली हो।वे चाय नाश्ता से लेकर खाना के लिये छटपटा जाएंगे।कोई पूछेगा नही उन्हें,उनका अपना बेटा भी नही क्योंकि बेटा को फुर्सत नही है,और अगर बेटे को फुरसत मिल जाये भी तो वो कुछ नही कर पायेगा क्योंकि उसे ये मालूम ही नही है कि माँ-बाबूजी को सुबह से रात तक क्या क्या देना है।क्योंकि बेटा के चंद सवाल है और उसकी ज़िम्मेदारी खत्म जैसे माँ-बाबूजी को खाना खाएं,चाय पियें, नाश्ता किये, लेकिन कभी भी ये जानने की कोशिश नही करते कि वे क्या खाते हैं कैसी चाय पीते हैं।ये लगभग सारे घर की कहानी है।मैंने तो ऐसी बहुएं देखी है जिसने अपनी सास की बीमारी में तन मन से सेवा करती थी,बिल्कुल एक बच्चे की तरह,जैसे बच्चे सारे काम बिस्तर पर करते हैं ठीक उसी तरह उसकी सास भी करती थी और बेचारी बहु उसको साफ करती थी।और बेटा ये बचकर निकल जाता था कि मैं अपनी माँ को ऐसी हालत में नही देख सकता इसलिये उनके पास नही जाता था।ऐसे की कई बहु के उदाहरण हैं।मैंने अपनी माँ और चाची को दादा-दादी की ऐसे ही सेवा करते देखा है।ऐसे ही कई उदाहरण आपलोगो ने भी देखा होगा,आपलोग में से ही कई बहुयें ने अपनी सास-ससुर की ऐसी सेवा की होगी या कर रही होगी।कभी -कभी ऐसा होता है कि बेटा संसार छोड़ चला जाता है,तब बहु ही होती है जो उसके माँ-बाप की सेवा करती है, ज़रूरत पड़ने पर नौकरी करती है।लेकिन अगर बहु दुनिया से चले जाएं तो बेटा फिर एक बहु ले आता है, क्योंकि वो नही कर पाता अपने माँ-बाप की सेवा,उसे खुद उस बहु नाम की लाठी की ज़रूरत पड़ती है।इसलिये मेरा मानना है कि बहु ही होती ही बुढ़ापे की असली लाठी लेकिन अफसोस “बहु” की त्याग और सेवा उन्हें भी नही दिखती जिसके लिये सारा दिन वो दौड़-भाग करती रहती है।***जय श्री राधे कृष्णा ***

लष्मीकांत

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(((( स्वास रूपी चन्दन ))))
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सुनसान जंगल में एक लकड़हारे से पानी का लोटा पीकर प्रसन्न हुआ राजा कहने लगा―
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हे पानी पिलाने वाले ! किसी दिन मेरी राजधानी में अवश्य आना, मैं तुम्हें पुरस्कार दूँगा,
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लकड़हारे ने कहा―बहुत अच्छा।
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इस घटना को घटे पर्याप्त समय व्यतीत हो गया, अन्ततः लकड़हारा एक दिन चलता-फिरता राजधानी में जा पहुँचा और राजा के पास जाकर कहने लगा―
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मैं वही लकड़हारा हूँ, जिसने आपको पानी पिलाया था,
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राजा ने उसे देखा और अत्यन्त प्रसन्नता से अपने पास बिठाकर सोचने लगा कि- इस निर्धन का दुःख कैसे दूर करुँ ?
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अन्ततः उसने सोच-विचार के पश्चात् चन्दन का एक विशाल उद्यान (बाग) उसको सौंप दिया।
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लकड़हारा भी मन में प्रसन्न हो गया। चलो अच्छा हुआ। इस बाग के वृक्षों के कोयले खूब होंगे, जीवन कट जाएगा।
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यह सोचकर लकड़हारा प्रतिदिन चन्दन काट-काटकर कोयले बनाने लगा और उन्हें बेचकर अपना पेट पालने लगा।
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थोड़े समय में ही चन्दन का सुन्दर बगीचा एक वीरान बन गया, जिसमें स्थान-स्थान पर कोयले के ढेर लगे थे। इसमें अब केवल कुछ ही वृक्ष रह गये थे, जो लकड़हारे के लिए छाया का काम देते थे।
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राजा को एक दिन यूँ ही विचार आया। चलो, तनिक लकड़हारे का हाल देख आएँ। चन्दन के उद्यान का भ्रमण भी हो जाएगा। यह सोचकर राजा चन्दन के उद्यान की और जा निकला।
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उसने दूर से उद्यान से धुआँ उठते देखा। निकट आने पर ज्ञात हुआ कि चन्दन जल रहा है और लकड़हारा पास खड़ा है।
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दूर से राजा को आते देखकर लकड़हारा उसके स्वागत के लिए आगे बढ़ा।
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राजा ने आते ही कहा― भाई ! यह तूने क्या किया ?
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लकड़हारा बोला― आपकी कृपा से इतना समय आराम से कट गया। आपने यह उद्यान देकर मेरा बड़ा कल्याण किया।
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कोयला बना-बनाकर बेचता रहा हूँ। अब तो कुछ ही वृक्ष रह गये हैं। यदि कोई और उद्यान मिल जाए तो शेष जीवन भी व्यतीत हो जाए।
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राजा मुस्कुराया और कहा― अच्छा, मैं यहाँ खड़ा होता हूँ। तुम कोयला नहीं, प्रत्युत इस लकड़ी को ले-जाकर बाजार में बेच आओ।
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लकड़हारे ने दो गज [ लगभग पौने दो मीटर ] की लकड़ी उठाई और बाजार में ले गया।
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लोग चन्दन देखकर दौड़े और अन्ततः उसे तीन सौ रुपये मिल गये, जो कोयले से कई गुना ज्यादा थे।
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लकड़हारा मूल्य लेकर रोता हुआ राजा के पास आय और जोर-जोर से रोता हुआ अपनी भाग्यहीनता स्वीकार करने लगा।


इस कथा में चन्दन का बाग मनुष्य का शरीर और हमारा एक-एक श्वास चन्दन के वृक्ष हैं पर अज्ञानता वश हम इन चन्दन को कोयले में तब्दील कर रहे हैं।
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लोगों के साथ बैर, द्वेष, क्रोध, लालच, ईर्ष्या, मनमुटाव, को लेकर खिंच-तान आदि की अग्नि में हम इस जीवन रूपी चन्दन को जला रहे हैं।
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जब अंत में स्वास रूपी चन्दन के पेड़ कम रह जायेंगे तब अहसास होगा कि व्यर्थ ही अनमोल चन्दन को इन तुच्छ कारणों से हम दो कौड़ी के कोयले में बदल रहे थे,
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पर अभी भी देर नहीं हुई है हमारे पास जो भी चन्दन के पेड़ बचे है उन्ही से नए पेड़ बन सकते हैं।
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आपसी प्रेम, सहायता, सौहार्द, शांति, भाईचारा, और विश्वास, के द्वारा अभी भी जीवन सँवारा जा सकता है।

((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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बेटी नाराज हो गयी

पापा जाने लगे जब ऑफिस,

बेटी जिद पर अड़ी रही, activa के लिए, वो भी आज

papa ने मजबूरी दिखाई, पर बेटी माने तब न.

बेटी ने जिद में आकर papa से बात करना बंद कर दी.

पापा बेचारे क्या करे ?

बहुत कोशिश की, papa ने, ऑफिस से बेटी को मनाने

की,पर बेटी phone उठाये तब न.

mood ख़राब हुआ पापा का

छाती में दर्द होने लगा

immediate गया boss के पास, urgent loan पास

करवाया, showroom गया, बेटी की ख़ुशी के लिए,

activa खरीद ली.

बेटी को फिर फ़ोन किया ये बताने के लिए कि उसकी

activa शाम को आ रही है

पर बेटी अब भी नाराज

मुंह फूलाये बैठी थी, जिदी थी

papa से अब भी नाराज थी

पापा शांत हो गए, chest pain बढ़ने लगा,

बहुत प्यार करता था बेटी से

बेटी ने phone नहीं उठाया, और दर्द बढ़ने लगा.

activa तो पहुंच चुकी घर

पर papa को attack आ गया, ऑफिस में ही.

घर पर activa देखकर बहुत खुश हुई बेटी, हद से ज्यादा

पर पापा नहीं दिखे

पीछे पीछे कोई ambulance आ गयी,

सब परेशान, कौन था उसमें

Body बाहर निकाली गयी

बेटी ने देखा, वो papa थे.

ऑफिस staff ने बताया

सुबह से बहुत परेशान थे

activa के लिए, बेटी के लिए

urgent loan पास करवाके activa तक book की

घर पे बेटी को फ़ोन किया पर शायद बेटी नाराज थी

इसलिए फ़ोन नहीं उठाया

ये upset हो गए, बेटी से

बहुत प्यार करते थे

phone न उठाने के कारण उसे chest pain होने लगा,

कुछ ही sec में वही लेट गए

वही पर ढेर हो गए।

सोचिये, उस वक़्त बेटी की क्या हालत हुई होगी
जार जार रो रही थी

माफ़ कर दो पापा, बहुत बड़ी गलती हो गयी मुझसे

मुझे नहीं पता, पापा, आप इस बेटी को बहुत प्यार करते

हो, माफ़ कर दो पापा.

पर अब क्या हो सकता था ?

ACtiva बाहर खड़ी थी

PApa की dead body भी वहीं थी

बेटी सिर्फ पछता सकती थी, अपनी ज़िद पर, पापा से

नाराज होकर.

काश, वो फ़ोन उठाती

तो papa आज जिन्दा होते

हर बच्चे चाहे वो बेटा हो या बेटी से request है कि

dad की salary देखिये, घर की income देखिये, घर की ज़रूरतों को देखिये।

आप जो डिमांड करते हो

क्या आपके पापा कैपेबल हैं, नहीं तो थोड़ा सब्र कीजिये

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कानपुर में पुष्पा की बारात इलाहाबाद से आयी …

पुष्पा के बाबजीू सब बारातियों के भव्य स्वागत की गजब तैयारी किये थे …
..
कुल सत्तर बारातियों के लिये सत्तर किसम के व्यंजन तो केवल जनवासे मे परोसे गये

साथ मे खालिस दूध की काफी और मेवे अलग से बारह तरह की शुद्ध देसी घी की मिठाइयाँ

और स्पेशल मूँग का हलवा भी ..

बारातियों के ठहरने के लिये बड़े बड़े हॉल नुमा कमरो मे सत्तर मुलायम बिस्तर लगवाये गये

हर बिस्तर के सिरहाने एक एक टेबल फैन और हर दो बिस्तर के बीच एक फर्राटेदार पाँच फुटा कूलर ..

.नहाने के लिये खुशबूदार साबुन
..
.साथ मे झक सफेद रूई जैसी कोमल एक एक तौलिया सबको ..

.सफाई इतनी की जो लोग सबके सामने आईना देखने मे संकोच कर रहे थे

वो आयें बायें करके चोरी चोरी फर्श पर ही खुद को निहार रहे थे …
.
.रात भर खाने पीने का फुल इंतजाम
और
सुबह कलेवा मे हर बाराती को एक एक चाँदी का सिक्का और पाँच सौ एक रुपया नगद भी दिया गया !!!!!!

इस इंतजाम पे बारातियो की प्रतिक्रिया देखिये🙄🙄🙄🙄🙄🙄🙄

1-समधी जी इत्ती घोर बेइज्जती करीन है हम लोगन का बुलाय के की पूछौ मत ..l
2-जइसे हम लोग कबहु देसी घी और मेवा न खाय होये l
3- खिलाय खिलाय पेट खराब कर दिहिन l
4-का हम लोग कबहूं खुशबू वाला साबुन नाहि लगाये हैं l
5-इत्ते मुलायम बिस्तरा पर लेटाय दिहिन की सार पिठे झुराय लागि l
6-जब पंखा लगाय दिये रहें तौ कूलरवा लगाय की का जुरुरत रही …रतिया भर खटर पटर से कनवा पक गवा l
7-खनवा उबलत उबलत परोस दिहिन हमार तो मुहे जल गवा
8-इत्ती मुलायम तौलिया से तो छोट लड़कन का बदन पुछावा जात है हम लोगन की खातिर तो तनी गरु तौलिया होये चाही l
9-अरे आपन पैसवा दिखाय रहेन हैं हम लोगन का l
10-अब चाँदी वांदी का को पूछत है देय का रहा है तो एक्को सफारी सूट दय देते l

💕मोरलऑफद_स्टोरी 💕

आप अथवा सरकार कितना भी अच्छा करने की कोशिश कीजिये कुछ लोगो को कमी निकालने की आदत होती ही है इसलिये टेंशन लेने का नई !