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एक लम्बी लेकिन प्रेरक भावपूर्ण संस्मरण

एक अखवार वाला प्रात:काल लगभग 5 बजे जिस समय वह अख़बार देने आता था उस समय मैं उसको अपने मकान की ‘गैलरी’ में टहलता हुआ मिल जाता था। अत: वह मेरे आवास के मुख्य द्वार के सामने चलती साइकिल से निकलते हुए मेरे आवास में अख़बार फेंकता और मुझको ‘नमस्ते बाबू जी’ वाक्य से अभिवादन करता हुआ फर्राटे से आगे बढ़ जाता था।
क्रमश: समय बीतने के साथ मेरे सोकर उठने का समय बदल कर प्रात: 7:0 बजे हो गया।
जब कई दिनों तक मैं उसको प्रात: टहलते नहीं दिखा तो एक रविवार को प्रात: लगभग 9:0 बजे वह मेरा कुशल-क्षेम लेने मेरे आवास पर आ गया। जब उसको ज्ञात हुआ कि घर में सब कुशल मंगल है मैं बस यूँ ही देर से उठने लगा था तो वह बड़े सविनय भाव से हाथ जोड़ कर बोला, बाबू जी! एक बात कहूँ?”
मैंने कहा…बोलो
वह बोला…आप सुबह तड़के सोकर जगने की अपनी इतनी अच्छी आदत को क्यों बदल रहे हैं? आप के लिए ही मैं सुबह तड़के विधान सभा मार्ग से अख़बार उठा कर और फिर बहुत तेज़ी से साइकिल चला कर आप तक अपना पहला अख़बार देने आता हूँ….. सोचता हूँ कि आप प्रतीक्षा कर रहे होंगे
मेने विस्मय से पूछा… और आप!विधान सभा मार्ग से अखबार लेकर आते हैं?
“हाँ! सबसे पहला वितरण वहीं से प्रारम्भ होता है”, उसने उत्तर दिया।
“तो फिर तुम जगते कितने बजे हो?”
“ढाई बजे…. फिर साढ़े तीन तक वहाँ पहुँच जाता हूँ।”
“फिर?”, मैंने पूछा।
“फिर लगभग सात बजे अख़बार बाँट कर घर वापस आकर सो जाता हूँ….. फिर दस बजे कार्यालय…… अब बच्चों को बड़ा करने के लिए ये सब तो करना ही होता है।”
मैं कुछ पलों तक उसकी ओर देखता रह गया और फिर बोला,“ठीक! तुम्हारे बहुमूल्य सुझाव को ध्यान में रखूँगा।”

घटना को लगभग पन्द्रह वर्ष बीत गये। एक दिन प्रात: नौ बजे के लगभग वह मेरे आवास पर आकर एक निमंत्रण-पत्र देते हुए बोला, “बाबू जी! बिटिया का विवाह है….. आप को सपरिवार आना है।“
निमंत्रण-पत्र के आवरण में अभिलेखित सामग्री को मैंने सरसरी निगाह से जो पढ़ा तो संकेत मिला कि किसी डाक्टर लड़की का किसी डाक्टर लड़के से परिणय का निमंत्रण था। तो जाने कैसे मेरे मुँह से निकल गया, “तुम्हारी लड़की?”
उसने भी जाने मेरे इस प्रश्न का क्या अर्थ निकाल लिया कि विस्मय के साथ बोला, “कैसी बात कर रहे हैं बाबू जी! मेरी ही बेटी।”
मैं अपने को सम्भालते हुए और कुछ अपनी झेंप को मिटाते हुए बोला, “नहीं! मेरा तात्पर्य कि अपनी लड़की को तुम डाक्टर बना सके इसी प्रसन्नता में वैसा कहा।“
“हाँ बाबू जी! लड़की ने केजीएमसी से एमबीबीएस किया है और उसका होने वाला पति भी वहीं से एमडी है ……. और बाबू जी! मेरा लड़का इंजीनियरिंग के अन्तिम वर्ष का छात्र है।”
मैं किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा सोच रहा था कि उससे अन्दर आकर बैठने को कहूँ कि न कहूँ कि वह स्वयम् बोला, “अच्छा बाबू जी! अब चलता हूँ….. अभी और कई कार्ड बाँटने हैं…… आप लोग आइयेगा अवश्य।”
मैंने भी फिर सोचा आज अचानक अन्दर बैठने को कहने का आग्रह मात्र एक छलावा ही होगा। अत: औपचारिक नमस्ते कहकर मैंने उसे विदाई दे दी।

उस घटना के दो वर्षों के बाद जब वह मेरे आवास पर आया तो ज्ञात हुआ कि उसका बेटा जर्मनी में कहीं कार्यरत था। उत्सुक्तावश मैंने उससे प्रश्न कर ही डाला कि आखिर उसने अपनी सीमित आय में रहकर अपने बच्चों को वैसी उच्च शिक्षा कैसे दे डाली?
“बाबू जी! इसकी बड़ी लम्बी कथा है फिर भी कुछ आप को बताये देता हूँ।
अख़बार, नौकरी के अतिरिक्त भी मैं ख़ाली समय में कुछ न कुछ कमा लेता था। साथ ही अपने दैनिक व्यय पर इतना कड़ा अंकुश कि भोजन में सब्जी के नाम पर रात में बाज़ार में बची खुची कद्दू, लौकी, बैंगन जैसी मौसमी सस्ती-मद्दी सब्जी को ही खरीद कर घर पर लाकर बनायी जाती थी
एक दिन मेरा लड़का परोसी गयी थाली की सामग्री देखकर रोने लगा और अपनी माँ से बोला, ‘ये क्या रोज़ बस वही कद्दू, बैंगन, लौकी, तरोई जैसी नीरस सब्ज़ी… रूख़ा-सूख़ा ख़ाना…… ऊब गया हूँ इसे खाते-खाते। अपने मित्रों के घर जाता हूँ तो वहाँ मटर-पनीर, कोफ़्ते, दम आलू आदि….। और यहाँ कि बस क्या कहूँ!!!!’
मैं सब सुन रहा था तो रहा न गया और मैं बड़े उदास मन से उसके पास जाकर बड़े प्यार से उसकी ओर देखा और फिर बोला, ‘पहले आँसू पोंछ फिर मैं आगे कुछ कहूँ।’
मेरे ऐसा कहने पर उसने अपने आँसू स्वयम् पोछ लिये। फिर मैं बोला, ‘बेटा! सिर्फ़ अपनी थाली देख। दूसरे की देखेगा तो तेरी अपनी थाली भी चली जायेगी…… और सिर्फ़ अपनी ही थाली देखेगा तो क्या पता कि तेरी थाली किस स्तर तक अच्छी होती चली जाये। इस रूख़ी-सूख़ी थाली में मैं तेरा भविष्य देख रहा हूँ। इसका अनादर मत कर। इसमें जो कुछ भी परोसा गया है उसे मुस्करा कर खा ले ….।
उसने फिर मुस्कराते हुए मेरी ओर देखा और जो कुछ भी परोसा गया था खा लिया। उसके बाद से मेरे किसी बच्चे ने मुझसे किसी भी प्रकार की कोई भी माँग नहीं रक्खी। बाबू जी! आज का दिन बच्चों के उसी त्याग का परिणाम है।”

उसकी बातों को मैं तन्मयता के साथ चुपचाप सुनता रहा।
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आज जब मैं यह संस्मरण लिख रहा हूँ तो यह भी सोच रहा हूँ कि आज के बच्चों की कैसी विकृत मानसिकता है कि वे अपने अभिभावकों की हैसियत पर दृष्टि डाले बिना उन पर ऊटपटाँग माँगों का दबाव डालते रहते हैं

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🗣️🗣️🗣️ सबसे अनमोल 🗣️🗣️🗣️
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अशोक जी अपनी पत्नी के साथ अपनी रिटायर्ड जिंदगी बहुत हँसी खुशी गुजा़र रहे थे…उनके तीनों बेटे अलग अलग शहरों में अपने अपने परिवारों के साथ थे…उन्होनें नियम बना रखा था….दीपावली पर तीनों बेटे सपरिवार उनके पास आते थे…वो एक सप्ताह कैसे मस्ती में बीत जाता था…कुछ पता ही नही चलता था।

कैसे क्या हुआ…उनकी खुशियों को जैसे नज़र ही लग गई… अचानक शीला जी को दिल का दौरा पड़ा …एक झटके में उनकी सारी खुशियाँ बिखर गईं।

तीनों बेटे दुखद समाचार पाकर दौड़े आए…उनके सब क्रिया कर्म के बाद सब शाम को एकत्रित हो गए…बड़ी बहू ने बात उठाई,”बाबूजी, अब आप यहाँ अकेले कैसे रह पाऐंगे… आप हमारे साथ चलिऐ।”

“नही बहू, अभी यही रहने दो…यहाँ अपनापन लगता है… बच्चों की गृहस्थी में…।”
कहते कहते वो चुप से हो गए… बड़ा पोता कुछ बोलने को हुआ…उन्होंने हाथ के इशारे से उसे चुप कर दिया…

“बच्चों, अब तुम लोगों की माँ हम सबको छोड़ कर जा चुकी हैं… उनकी कुछ चीजें हैं… वो तुम लोग आपस में बांट लो…हमसे अब उनकी साजसम्हाल नही हो पाऐगी।” कहते हुए अल्मारी से कुछ निकाल कर लाए….मखमल के थैले में बहुत सुंदर चाँदी का श्रंगारदान था…एक बहुत सुंदर सोने के पट्टे वाली पुरानी रिस्टवाच थी…सब इतनी खूबसूरत चीजों पर लपक से पड़े।
छोटा बेटा जोश में बोला,”अरे ये घड़ी तो अम्मा सरिता को देना चाहती थी।”

अशोकजी धीरे से बोले,”और सब तो मैं तुम लोगों को बराबर से दे ही चुका हूँ…इन दो चीजों से उन्हें बहुत लगाव था…बेहद चाव से कभी कभी निकाल कर देखती थीं…लेकिन अब कैसे उनकी दो चीजों को तुम तीनों में बांटू?”

सब एक दूसरे का मुँह देखने लगे…तभी मंझला बेटा बड़े संकोच से बोला,”ये श्रंगारदान वो मीरा को देने की बात करती थी।”

पर समस्या तो बनी ही थी…वो मन में सोच रहे थे…बड़ी बहू को क्या दूँ….उनके मन के भाव शायद उसने पढ़ लिए,”बाबू जी, आप शायद मेरे विषय में सोच रहे हैं… आप श्रंगारदान मीरा को …और रिस्टवाच सरिता को दे दीजिए… अम्मा भी तो यही चाहती थी।”

“पर नन्दिनी, तुझे क्या दूँ…समझ में नही आ रहा।”

“आपके पास एक और अनमोल चीज़ है …और वो अम्माजी मुझे ही देना चाहती थीं।”
सबके मुँह हैरानी से खुले रह गए… दोनों बहुऐं तो बहुत हैरान परेशान हो गईं…अब कौन सा पिटारा खुलेगा…

सबकी हैरानी और परेशानी को भाँप कर बड़ी बहू मुस्कुरा कर बोली,”वो सबसे अनमोल तो आप स्वयं हैं बाबूजी…. पिछली बार अम्माजी ने मुझसे कह दिया था…मेरे बाद बाबूजी की देखरेख तेरे जिम्मे…बस अब आप उनकी इच्छा का पालन करें और हमारे साथ चलें।”
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शिक्षा :-रुपया पैसा, धन,दौलत, मकान, दुकान,खेत ,खलिहान ये सबको चाहिए और जो अनमोल है उससे मुँह मोड़ लेते है।
माँ बाप की सेवा नही करना चाहते उनका धन चाहिए ।

🌲दुनिया मे बोया काटा का सिद्धांत है ।

सुभरात्री🙏

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         *हैसियत*

पुरानी साड़ियों के बदले बर्तनों के लिए मोल भाव करती सम्पन्न घर की महिला ने अंत,तः दो साड़ियों के बदले एक टब पसंद किया। “नही दीदी, बदले में तीन साड़ियों से कम तो नही लूँगा।” बर्तन वाले ने टब को वापस अपने हाथ में लेते हुए कहा।”अरे भैया, एक एक बार की पहनी हुई तो हैं..बिल्कुल नये जैसी। एक टब के बदले में तो ये दो भी ज्यादा हैं, मैं तो फिर भी दे रही हूँ।””नही नही, तीन से कम में तो नही हो पायेगा।” वह फिर बोला।

एक दूसरे को अपनी पसंद के सौदे पर मनाने की इस प्रक्रिया के दौरान गृह स्वामिनी को घर के खुले दरवाजे पर देखकर सहसा गली से गुजरती अर्द्धविक्षिप्त महिला ने वहाँ आकर खाना माँगा…।आदतन हिकारत से उठी महिला की नजरें उस महिला के कपड़ो पर गयी….। अलग अलग कतरनों को गाँठ बाँध कर बनायी गयी उसकी साड़ी उसके युवा शरीर को ढँकने का असफल प्रयास कर रही थी…। एकबारगी उसने मुँह बिचकाया पर सुबह सुबह का याचक है सोचकर अंदर से रात की बची रोटियां मंगवायी।
उसे रोटी देकर पलटते हुए उसने बर्तन वाले से कहा “तो भैय्या क्या सोचा ? दो साड़ियों में दे रहे हो या मैं वापस रख लूँ !”बर्तन वाले ने उसे इस बार चुपचाप टब पकड़ाया और अपना गठ्ठर बाँध कर बाहर निकला…। अपनी जीत पर मुस्कुराती हुई महिला दरवाजा बंद करने को उठी तो सामने नजर गयी…। गली के मुहाने पर बर्तन वाला अपना गठ्ठर खोलकर उसकी दी हुई साड़ियों में से एक साड़ी उस अर्धविक्षिप्त महिला को दे रहा था…।हाथ में पकड़ा हुआ टब अब उसे अब चुभता हुआ सा महसूस हो रहा था….।!

कुछ देने के लिए हैसियत नही दिल बड़ा होना चाहिए….!!
आपके पास क्या है और कितना है यह कोई मायने नहीं रखता है आपकी सोच व नियत सर्वोपरि होना आवश्यक है
और ये वही समझता है जो इन परिस्थितियों से गुजरा हो…..
🌹🌼🙏
धमँ संसार गुपँ की तरफ़ से वषॉ परीख ७९७७७४०४६२

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सुबह सुबह की राम राम जी ‌🙏🏽🙏🏽 ‌ , प्रार्थना का मोल

एक वृद्ध महिला एक सब्जी की दुकान पर जाती है, उसके पास सब्जी खरीदने के पैसे नहीं होते है।

वो दुकानदार से प्रार्थना करती है कि उसे सब्जी उधार दे दे पर दुकानदार मना कर देता है।

उसके बार-बार आग्रह करने पर दुकानदार खीज कर कहता है, तुम्हारे पास कुछ ऐसा है , जिसकी कोई कीमत हो , तो उसे इस तराजू पर रख दो, मैं उसके वज़न के बराबर सब्जी तुम्हे दे दूंगा।

वृद्ध महिला कुछ देर सोच में पड़ जाती है।क्योंकि उसके पास ऐसा कुछ भी नहीं था।

कुछ देर सोचने के बाद वह, एक मुड़ा-तुड़ा कागज़ का टुकड़ा निकलती है और उस पर कुछ लिख कर तराजू पर रख देती है।

दुकानदार ये देख कर हंसने लगता है।
फिर भी वह थोड़ी सब्जी उठाकर तराजू पर रखता है।
आश्चर्य…!!!
कागज़ वाला पलड़ा नीचे रहता है और सब्जी वाला ऊपर उठ जाता है।

इस तरह वो और सब्जी रखता जाता है पर कागज़ वाला पलड़ा नीचे नहीं होता।

तंग आकर दुकानदार उस कागज़ को उठा कर पढता है और हैरान रह जाता है

कागज़ पर लिख था की परमात्त्मा आप सर्वज्ञ हो, अब सब कुछ तुम्हारे हाथ में है.

दुकानदार को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था।

वो उतनी सब्जी वृद्ध महिला को दे देता है।

पास खड़ा एक अन्य ग्राहक दुकानदार को समझाता है, कि दोस्त, आश्चर्य मत करो।

केवल परमात्मा ही जानते हैं की प्रार्थना का क्या मोल होता है।

वास्तव में प्रार्थना में बहुत शक्ति होती है।
चाहे वो एक घंटे की हो या एक मिनट की।
यदि सच्चे मन से की जाये, तो ईश्वर अवश्य सहायता करते हैं..!!

अक्सर लोगों के पास ये बहाना होता है, की हमारे पास वक्त नहीं।

मगर सच तो ये है कि परमात्मा को याद करने का कोई समय नहीं होता…!!

प्रार्थना के द्वारा मन के विकार दूर होते हैं, और एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

जीवन की कठिनाइयों का सामना करने का बल मिलता है।

ज़रूरी नहीं की कुछ मांगने के लिए ही प्रार्थना की जाये।

जो आपके पास है उसका धन्यवाद करना चाहिए।

इससे आपके अन्दर का अहम् नष्ट होगा और एक कहीं अधिक समर्थ व्यक्तित्व का निर्माण होगा।
(–) 𝔇𝔢𝔢𝔭𝔞𝔨 𝔧𝔞𝔦𝔰𝔦𝔫𝔤𝔥 (–)
प्रार्थना करते समय मन को ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध घृणा जैसे विकारों से मुक्त रखे।
🙏🏽🙏🏽🙏🏽🙏🏽

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ભગવાન પર ભરોસો

એક જૂની ઇમારતમાં વૈદજીનું મકાન હતું. પાછળના ભાગમાં રહેતા હતા અને આગળના ભાગમાં દવાખાનું ખોલી રાખ્યું હતું. તેમનાં પત્નીની આદત હતી કે દવાખાનુ ખોલવાના પહેલા, તે દિવસના માટે આવશ્યક ચીજ-વસ્તુઑ એક ચિઠ્ઠીમાં લખીને દેતાં હતા. વૈદજી ગાદી પર બેસીને પહેલા ભગવાનનું નામ લેતા પછી તે ચિઠ્ઠી ખોલતા.
પત્નીએ જે વસ્તુઓ લખી હોય તેના ભાવ જોતાં, પછી તેનો હિસાબ કરતા. પછી પરમાત્માને પ્રાર્થના કરતા કે હે ભગવાન ! હું કેવળ તારાં જ આદેશના અનુસાર તારી ભક્તિ છોડીને અહીં દુનિયાદારીના ચક્કરમાં આવી બેઠો છું. તેઓ ક્યારેય પોતાના મુખેથી કોઈ પણ દર્દીથી ફીસ ન્હોતાં માગતા. કોઈ દેતું હતું, કોઈ ન પણ દેતું પરંતુ એક વાત નિશ્ચિત હતી કે જેવોજ તે દિવસનો આવશ્યક સામાન ખરીદવા પુરતા પૈસા આવી જાય, તેનાં પછી કોઈની પાસેથી દવાના પૈસા લેતા ન હતા ભલેને તે દર્દી કેટલો પણ ધનવાન કેમ ન હોય !

એક દિવસ વૈદજીએ દવાખાનુ ખોલ્યું. ગાદી પર બેસીને પરમાત્માનું સ્મરણ કરીને પૈસાનો હિસાબ કરવાં આવશ્યક વસ્તુઓ વાળી ચિઠ્ઠી ખોલીને એકીટસે જોતાં જ રહી ગયા. એક વાર તો તેમનું મન ભટકી ગયું. તેમને પોતાની આંખોના સામે તારા ચમકતા નજર આવ્યા પરંતુ શિઘ્ર જ તેમને પોતાની તંત્રિકાઓ પર નિયંત્રણ કરી લિધું. લોટ, દાલ-ચોખાના પછી પત્નીએ લખ્યું હતુ, દિકરીના લગ્ન ૨૦ તારીખના છે, તેના દહેજનો સામાન. થોડી વાર માટે બાકીની ચીજોની કીંમત લખવાના બાદ દહેજના સામાનની સામે લખ્યું, આ કામ પરમાત્માનું છે, પરમાત્મા જાણે.

એક-બે દર્દી આવ્યા હતા. તેઓને વૈદજી દવા દઈ રહ્યાં હતા. તે દરમ્યાન એક મોટી કાર તેમનાં દવાખાનાના સામે આવીને રોકાઈ. વૈદજીએ કોઈ ખાસ ધ્યાન આપ્યું કેમકે ઘણા કાર વાળા તેમની પાસે આવતા રહેતા હતા. બન્ને દર્દી દવા લઈને ચાલ્યા ગયા. તે સૂટેડ-બૂટેડ સાહેબ કારમાંથી બહાર નિકળ્યા અને નમસ્તે કરીને બેંચ પર બેસી ગયા. વૈદજીએ કહ્યું કે જો આપે દવા લેવાની છે તો અહીં સ્ટૂલ પર આવો જેથી નાડી જોઈ લઉં અને કોઈ બીજા માટે લેઈ જવાની હોય તો બિમારીની સ્થિતિનું વર્ણન કરો.

તે સાહેબ કહેવા લાગ્યા, વૈદજી ! આપે મને ઓળખ્યો નહીં. મારું નામ કૃષ્ણલાલ છે. હાં… આપ મને ઓળખી પણ ક્યાંથી શકો ? કેમકે 15-16 વરસ બાદ આપના દવાખાના પર આવ્યો છું. આપને પાછલી મુલાકાતના હાલ સંભળાવું છું, પછી આપને બધી વાત યાદ આવો જશે. જ્યારે હું પહેલી વાર અહીં આવ્યો હતો તો હું જાતે આવ્યો ન હતો પરંતુ ઈશ્વર આપની પાસે લઈ આવ્યો હતો કેમકે ઈશ્વરે મારા પર કૃપા કરી હતી અને તે મારું ઘર હર્યુ-ભર્યુ કરવે ઇચ્છતો હતો. થયું એમકે હું કારથી જઈ પિતરાઈના ઘરે રહ્યો હતો અને બિલકુલ આપના દવાખાનાની સામે અમારી કાર પંકચર થઈ ગઈ. ડ્રાઈવર વ્હીલ કાઢીને પંકચર કરાવવા લઈ ગયો. આપે જોયું કે ગરમીમાં કારની પાસે ઉભો હતો તો આપ મારી પાસે આવ્યા અને દવાખાનાની તરફ ઇશારો ક્યો કે ત્યાં છાયામાં ખુરશી પર બેસવાનું કિધુ. હું આવીને ખુરશી પર બેસી ગયો. ડ્રાઈવરે કંઈક વધારે વાર લગાવી દિધી હતી.
એક નાની બેબી પણ ત્યાં મેજની પાસે ઉભી હતી અને ઘડીયે ઘડીયે કહી રહી હતી, ચાલો ને બાબા ! મને ભૂખ લાગી છે. આપ તેને કહી રહ્યાં હતા કે બેટા ! થોડી ધીરજ ધરો, આવું છું. હું તે વિચાર કરી રહ્યો હતો કે આટલી વારથી હું આપની પાસે બેઠો હતો અને મારા જ કારણે આપ ખાવા પણ નથી જઈ રહ્યાં ! મારે કંઈક દવા ખરીદી લેવી જોઇએ જેથી આપની પાસે બેસવાનો ભાર ન લાગે. મેં કહ્યું, વૈદજી ! છેલ્લા 5-6 વરસથી ઇંગ્લેંડમાં રહીને કારોબાર કરી રહ્યો છું. ઇંગ્લેંડ જવાના પહેલા લગ્ન થઈ ગયા હતા પરંતુ હજી સુધી સંતાન સુખથી વંચિત છું. અહીંયા પણ ઇલાજ કરાવ્યો અને ત્યાં ઇંગ્લેંડમાં પણ પરંતુ કિસ્મતે નિરાશા સિવાય કાંઈ ન દિધું.
આપે કહ્યું હતુ, મારા ભાઈ ! ભગવાનથી નિરાશ ન થાવ. યાદ રાખો કે તેના કોષમાં કોઈ ચીજની કમી નથી. આશ-ઓલાદ, ધન-ઇજ્જત, સુખ-દુખ બધુ જ એના હાથમાં છે. એ કોઈ વૈદ કે ડોક્ટરના હાથમાં નથી હોતું અને ન તો કોઈ દવામાં હોય છે. જે કાંઈ થવાનું હોય છે તે બધુ ભગવાનના આદેશથી થાય છે. ઓલાદ દેવી છે તો તે જ દેવાના છે. મને યાદ છે આપ વાતો કરતા જઈ રહ્યાં હતા અને સાથે પડીકીઓ બનાવતા પણ જઈ રહ્યાં હતા. બધી દવા આપે બે ભાગોમાં વિભાજિત કરીને બે લિફાફામાં નાખી હતી અને પછી મને પૂછીને એક લિફાફા પર મારુ નામ અને બીજા પર મારી પત્નીનું નામ લખીને દવાનો ઉપયોગ કરવાની રીત કહી હતી.
મેં ત્યારે એમ જ તે દવા લઈ લિધી હતી કેમકે હું ફક્ત થોડા પૈસા આપવા ઇચ્છતો હતો. પરંતુ જ્યારે દવા લઈ લિધા બાદ મેં પૈસા પૂછ્યા તો આપે કહ્યું હતુ, કાંઈ લેવાનું નથી. પરંતુ મારો આગ્રહ કર્યો તો આપે કહ્યું હતું, આજનું ખાતુ બંધ થઈ ગયું છે.
મેં કહ્યું, આપની વાત સમજમાં ન આવી ! તે દરમ્યાન એક માણસ ત્યાં આવ્યો, તેણે અમારી ચર્ચા સાંભળીને મને બતાવ્યું કે ખાતુ બંધ થવાનો મતલબ એ છે કે આજના ઘરેલુ ખર્ચના માટે જેટલી રાશી વૈદજીએ ભગવાન પાસે માંગી હતી તે ઈશ્વરે તેમને દઈ દિધી છે. અધિક પૈસા તેઓ નથી લઈ શકતા.

હું થોડો હેરાન થયો અને થોડો લજ્જિત પણ કે મારા વિચાર કેટલા નિમ્ન હતા અને એ સરલચિત્ત વૈદ કેટલા મહાન છે. મેં ઘર પર જઈ પત્નીને ઔષધિ દેખાડી અને બધી વાત કહી તો તેના મોઢામાંથી શબ્દો નિકળ્યા, તે ઇન્સાન નહીં કોઈ દેવતા છે અને તેમની દિધેલી દવા જ અમારા મનની મુરાદ પૂરી કરવાનું કારણ બનશે. આજ અમારા ઘરમાં બે ફૂલ ખિલેલા છે. અમે પતિ-પત્ની હર સમય આપના માટે પ્રાર્થના કરતા રહીયે છીએ. આટલા વરસો સુધી કારોબારે ફૂરસદ જ ન દિધી કે સ્વયં આવીને આપથી ધન્યવાદના બે શબ્દો કહી જતા. આટલા વરસો બાદ આજ ભારત આવ્યો છું અને કાર કેવળ અહીં જ રોકી છે.

વૈદજી ! અમારો પરિવાર ઇંગ્લૈંડમાં સેટલ થઈ ચુક્યો છે. કેવળ મારી એક વિધવા બહેન પોતાની દિકરીની સાથે ભારતમાં રહે છૈ. અમારી ભાણેજના લગ્ન આ મહિનાની ૨૧ તારીખના થવાના છે. ન જાણે કેમ જ્યારે-જ્યારે અમારી ભાણેજના આણાંના માટે કોઈ સામાન ખરીદ કરતો તો મારી નજરના સામે આપની તે નાનકડી દિકરી પણ આવી જતી હતી અને હર વસ્તુ હું બમણી ખરીદી લેતો. હું આપના વિચારોને જાણતો હતો કે સંભવતઃ તે વસ્તુઓ ન લો પરંતુ મને લાગતું હતુ કે મારી પોતાની સગી ભાણેજના સાથે જે ચહેરો હર વાર દેખાતો રહ્યો છે તે પણ મારી ભાણેજ જ છે. મને લાગતું હતુ કે ઈશ્વરે આ ભાણેજના લગ્નના આણું ભરવાની જવાબદારી દિધી છે.

વૈદજીની આંખો આશ્ચર્યથી ખુલી રહી ગઈ અને બહુ ધીમા અવાજે બોલ્યા, કૃષ્ણલાલજી ! આપ જે કાંઈ કહી રહ્યા છો તે મારી સમજમાં નથી આવી રહ્યું કે ઈશ્વરની આ શું માયા છે. આપ મારી શ્રીમતીના હાથની ચિઠ્ઠી જૂઓ ! અને વૈદજીએ ચિઠ્ઠી ખોલીને કૃષ્ણલાલજીને પકડાવી દિધી. ત્યાં ઉપસ્થિત બધાએ જોઈને હેરાન રહી ગયા કે “દહેજનો સામાન” ના સામે લખ્યું હતું, “આ કામ પરમાત્માનું છે, પરમાત્મા જાણે !” કાંપતી અવાજમાં વૈદજી બોલ્યા, કૃષ્ણલાલજી ! વિશ્વાસ કરજો કે આજ સુધો એવું થયું નથી કે પત્નીએ ચિઠ્ઠી પર આવશ્યક્તા લખી હોય અને પરમાત્માએ તે જ દિવસે તેની વ્યવસ્થા ન કરી દિધી હોય ! આપની વાત સાંભળીને તો એવું લાગે છે કે ક્યા દિવસે મારી શ્રીમતી શું લખવા વાળી છે અન્યથા આપનાથી એટલા દિવસ પહેલા જ સામાન ખરીદવા આરંભ ન કરાવી દિધો હોત પરમાત્માએ !! વાહ પ્રભુ વાહ ! તું મહાન છે, તું દયાવાન છે !!! હું હેરાન છું કે તે પોતાનો રંગ કેવો કેવો દેખાડે છે !!!

વૈદજીએ આગળ કહ્યું, સવારે ઉઠીને ઉંઘમાંથી ઉઠાડવા બદલ પરમાત્માનો આભાર માનો, સાંજે સારો દિવસ પસાર થયાનો આભાર માનો, અને રાત્રે સૂતા સમયે તેનો આભાર માનો.

આગળ મોકલશો તો બીજાઓ પણ વાંચી શકશે. 🙏

જય શ્રી કૃષ્ણ

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🙏🌹
सुप्रभात
एक आदमी ने नारदमुनि से पूछा मेरे भाग्य में कितना धन हे, नारदमुनि ने कहा भगवान विष्णु से पुछ कर कल बताऊंगा।
नारदमुनि ने कहा- 1 रुपया रोज तुम्हारे भाग्य में हे, आदमी बहुत खुश रहने लगा उसकी जरूरते 1 रूपये में पूरी हो जाती थी। एक दिन उसके मित्र ने कहा में तुम्हारे सादगी जीवन और खुश देखकर बहुत प्रभावित हुआ हूं और अपनी बहन की शादी तुमसे करना चाहता हूँ,
आदमी ने कहा मेरी कमाई 1 रुपया रोज की हे, इसको ध्यान में रखना, इसी में से ही गुजर बसर करना पड़ेगा तुम्हारी बहन को, मित्र ने कहा कोई बात नहीं मुझे रिश्ता मंजूर हे ।
अगले दिन से उस आदमी की कमाई 11 रुपया हो गई, उसने नारदमुनि को बुलाया की हे मुनिवर मेरे भाग्य में 1 रूपया लिखा हे फिर 11 रुपये क्योँ मिल रहे हे ?
नारदमुनि ने कहा तुम्हारा किसी से रिश्ता या सगाई हुई है क्या?
हाँ हुई है ।
तो यह तुमको 10 रुपये उसके भाग्य के मिल रहे हे, इसको जोड़ना शुरू करो तुम्हारे विवाह में काम आएंगे ।
एक दिन उसकी पत्नी गर्भवती हुई और उसकी कमाई 31 रूपये होने लगी।
फिर उसने नारदमुनि को बुलाया और कहा है मुनिवर मेरी और मेरी पत्नी के भाग्य के 11 रूपये मिल रहे थे लेकिन अभी 31 रूपये क्यों मिल रहे हे, क्या में कोई अपराध कर रहा हूँ?
मुनिवर ने कहा- यह तेरे बच्चे के भाग्य के 20 रुपये मिल रहे हे । हर मनुष्य को उसका प्रारब्ध (भाग्य) मिलता है !

किसके भाग्य से घर में धन दौलत आती है हमको नहीं पता, लेकिन मनुष्य अहंकार करता है
मेने बनाया, मेने कमाया, मेरा हे,में कमा रहा हूँ, मेरी वजह से हो रहा है।
मुर्ख प्राणी तुझे नहीं पता तू किसके भाग्य का खा कमा रहा है ।

🙏🌹☆ जय श्रीराम ☆🌹🙏

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अपनी कीमत


अपनी कीमत

एक युवक बहुत परेशान रहता था। उसके पास रोजगार का कोई साधन नहीं था। विधवा मां के अलावा छोटे भाई बहनों के भरण पोषण का दायित्व भी उसी के ऊपर था। तकलीफों से टूट कर वह अपने जीवन का अंत करने की सोच रहा था। लेकिन मां और छोटे भाई बहनों का विचार आ जाता और इस विचार को झटक देता। मगर फिर उसी उलझन में डूब जाता। एक दिन उसकी मुलाकात एक साधु से हुई। साधु को उसने मन की बात बताई। साधु ने उससे पूछा कि वह आत्महत्या क्यों करना चाहता है ? युवक ने कहा, ‘महाराज गरीबी से परेशान हूँ। जिंदगी में कुछ आकर्षण नहीं बचा। पास में कुछ भी नहीं है, आत्महत्याना करुं तो क्या करूँ ? साधु ने कहा, ‘तेरे पास बहुत कुछ है। समस्या है कि तुझे उस की परख नहीं है। तू घबरा मत। मेरे साथ चल। यहां का राजा मेरा भक्त है। तेरे पास जो है उसमें से कुछ बिकवा देगा। तेरी समस्या हल हो जाएगी। साधु उसे महल के दरवाजे तक ले आया। उसने युवक से कहा, ‘तू बाहर ठहर मैं अभी आया। महल से बाहर आ साधु युवक से बोला, बोल एक लाख सोने की मोहरें दिलवा दें तो कैसा रहेगा?’ युवक हैरान होकर बोला, पर आप बिकवा क्या रहे हैं? साधु ने कहा, ‘तेरे पास कुछ और तो है नहीं तो क्यों ना तेरी आँखें बिकवा दें। युवक ने कहा, अपना आँखें तो मैं किसी कीमत पर नहीं दूँगा।’ साधु ने मुस्कुरा कर कह, ‘तो हाथ ही दे दो। युवक साधु का आशय समझ गया। अब उसे अपना मूल्य समझ में आ रहा था। युवक बोला-महाराज ! आपने मेरी आँखें खोल दी हैं। मैं आज से ही काम की तलाश में जुट जाऊंगा। साधु ने ने कहा, ‘दरअसल, हमारे पास जो है उसका मूल्य हमें तब तक पता नहीं चलता जब तक वह चीज हमारे पास से चली ना जाए, छीन ना ली जाए। संतोष तो उससे हैजो हमारे पास है।’ संकलन: नवनीत प्रियादास पुस्तक: ‘सोच से परे जीवन’

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जंगल के स्कूल का रिजल्ट


जंगल के स्कूल का रिजल्ट 😗

   हुआ यूँ कि जंगल के राजा शेर ने ऐलान कर दिया कि अब आज के बाद कोई अनपढ़ न रहेगा। हर पशु को अपना बच्चा स्कूल भेजना होगा। राजा साहब का स्कूल पढ़ा-लिखाकर सबको Certificate बँटेगा।

   सब बच्चे चले स्कूल। हाथी का बच्चा भी आया, शेर का भी, बंदर भी आया और मछली भी, खरगोश भी आया तो कछुआ भी, ऊँट भी और जिराफ भी।

FIRST UNIT TEST/EXAM हुआ तो हाथी का बच्चा फेल।

“किस Subject में फेल हो गया जी?”

“पेड़ पर चढ़ने में फेल हो गया, हाथी का बच्चा।”

“अब का करें?”

“ट्यूशन दिलवाओ, कोचिंग में भेजो।”

  अब हाथी की जिन्दगी का एक ही मक़सद था कि हमारे बच्चे को पेड़ पर चढ़ने में Top कराना है।

 किसी तरह साल बीता। Final Result आया तो हाथी, ऊँट, जिराफ सब फेल हो गए। बंदर की औलाद first आयी। Principal ने Stage पर बुलाकर मैडल दिया। बंदर ने उछल-उछल के कलाबाजियाँ दिखाकरगुलाटियाँ मार कर खुशी का इजहार किया। उधर अपमानित महसूस कर रहे हाथी, ऊँट और जिराफ ने अपने-अपने बच्चे कूट दिये। नालायकों, इतने महँगे स्कूल में पढ़ाते हैं तुमको | ट्यूशन-कोचिंग सब लगवाए हैं। फिर भी आज तक तुम पेड़ पर चढ़ना नहीं सीखे। सीखो, बंदर के बच्चे से सीखो कुछ, पढ़ाई पर ध्यान दो।

  फेल हालांकि मछली भी हुई थी। बेशक़ Swimming में First आयी थी पर बाकी subject में तो फेल ही थी। मास्टरनी बोली, "आपकी बेटी  के साथ attendance की problem है।" मछली ने बेटी को आँखें दिखाई। बेटी ने समझाने की कोशिश की कि, "माँ, मेरा दम घुटता है इस स्कूल में। मुझे साँस ही नहीं आती। मुझे नहीं पढ़ना इस स्कूल में। हमारा स्कूल तो तालाब में होना चाहिये न?" नहीं, ये राजा का स्कूल है। तालाब वाले स्कूल में भेजकर मुझे अपनी बेइज्जती नहीं करानी। समाज में कुछ इज्जत Reputation है मेरी। तुमको इसी स्कूल में पढ़ना है। पढ़ाई पर ध्यान दो।"

   हाथी, ऊँट और जिराफ अपने-अपने Failure बच्चों को पीटते हुए ले जा रहे थे। रास्ते में बूढ़े बरगद ने पूछा, "क्यों पीट रहे हो, बच्चों को?" जिराफ बोला, "पेड़ पर चढ़ने में फेल हो गए?"

बूढ़ा बरगद सबसे फ़ते की बात बोला, “पर इन्हें पेड़ पर चढ़ाना ही क्यों है ?” उसने हाथी से कहा, “अपनी सूंड उठाओ और सबसे ऊँचा फल तोड़ लो। जिराफ तुम अपनी लंबी गर्दन उठाओ और सबसे ऊँचे पत्ते तोड़-तोड़ कर खाओ।”ऊँट भी गर्दन लंबी करके फल पत्ते खाने लगा। हाथी के बच्चे को क्यों चढ़ाना चाहते हो पेड़ पर? मछली को तालाब में ही सीखने दो न?

दुर्भाग्य से आज स्कूली शिक्षा का पूरा Curriculum और Syllabus सिर्फ बंदर के बच्चे के लिये ही Designed है। इस स्कूल में 35 बच्चों की क्लास में सिर्फ बंदर ही First आएगा। बाकी सबको फेल होना ही है। हर बच्चे के लिए अलग Syllabus, अलग subject और अलग स्कूल चाहिये।

    हाथी के बच्चे को पेड़ पर चढ़ाकर अपमानित मत करो। जबर्दस्ती उसके ऊपर फेलियर का ठप्पा मत लगाओ। ठीक है, बंदर का उत्साहवर्धन करो पर शेष 34 बच्चों को नालायक, कामचोर, लापरवाह, Duffer, Failure घोषित मत करो।

   मछली बेशक़ पेड़ पर न चढ़ पाये पर एक दिन वो पूरा समंदर नाप देगी।

शिक्षा – अपने बच्चों की क्षमताओं व प्रतिभा की कद्र करें चाहे वह पढ़ाई, खेल, नाच, गाने, कला, अभिनय, BUSINESS, खेती, बागवानी, मकेनिकल, किसी भी क्षेत्र में हो और उन्हें उसी दिशा में अच्छा करने दें | जरूरी नहीं कि सभी बच्चे पढ़ने में ही अव्वल हो बस जरूरत हैं उनमें अच्छे संस्कार व नैतिक मूल्यों की जिससे बच्चे गलत रास्ते नहीं चुने l
सभी अभिभावकों को सादर समर्पित

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विचार संजीवनी


विचार संजीवनी

एक सेठ जी का इकलौता बेटा वेश्यागामी हो गया था। और भी ऐसा कौन सा ऐब था, जो उस लड़के में नहीं था? तो सेठ उसकी चिंता से ही घिरा रहता था।

एक उस सेठ ने अपने बेटे की जन्मकुंडली एक ज्योतिषी को दिखाई। ज्योतिषी ने कहा-

आपका बेटा करोड़पति बनेगा।
सेठ ने कहा- इसमें बताने वाली कौन सी बात है? जब मैं ही करोड़पति हूँ, तो मेरा बेटा तो करोड़पति होगा ही।

ज्योतिषी बोला- नहीं नहीं, एक बार वह सारा धन खो देगा, फिर करोड़पति बनेगा।

सेठ ने सोचा कि यह तो सारा धन खो हो देगा, फिर धन इकट्ठा करके इसे देने से क्या लाभ?

सेठ ने अपना सारा कारोबार आदि बेच कर, सारा धन, हीरे, सोना आदि घर के आँगन में दबा दिया, उसके ऊपर एक खम्बा गड़वा दिया और बेटे के नाम एक चिठ्ठी छोड़ कर, खुद सन्यासी हो गया।

बेटा घर आया तो चिठ्ठी पढ़ी। उसमें लिखा था कि इतना इतना धन आदि श्री खम्बा सिंह से ले लेना।

अब उस बेटे के पास पैसे तो बचे नहीं थे, तो मित्र आदि भी अकेला छोड़ गए। हार कर वह खम्बा सिंह को ढूंढने लगा। ढूंढते ढूंढते आधा देश छान मारा। योंही बहुत समय बीत गया पर कोई खम्बा सिंह होता तब तो मिलता।
आखिर वह थक कर वापिस अपने घर आ गया। इतने में दरवाजे पर किसी संत ने आवाज लगाई।

संत बोले- आज रात मुझे यहाँ सोने दो।

लड़का बोला- भाग यहाँ से! मेरे पास कुछ नहीं है।

संत बोले- मुझे कुछ चाहिए नहीं। मेरे पास भोजन है। बल्कि तुम भी खा लेना।

लड़के ने सोचा- आज तक जो भी आया, खाने वाला ही आया। कोई खिलाने वाला तो पहली बार ही आया है।

लड़के ने संत को भीतर बुला लिया, दोनों ने भोजन किया। संत ने पूछा- तुम लगते तो धनी हो, तब तुम्हारी ऐसी हालत कैसे हो गई?

लड़के ने सारी बात बताई और वह चिठ्ठी दिखाई। संत ने कहा कि मुझे अपना घर दिखाओ। लड़के ने आँगन का दरवाजा खोल दिया। संत ने देखा कि आँगन के बीचों बीच एक खम्बा गड़ा है।
संत ने पूछा- यह खम्बा यहाँ कब से गड़ा है?

लड़का बोला- यह तो मुझे भी नहीं मालूम। मैं कभी भीतर आया ही नहीं। मैंने भी आज ही देखा है।

संत ने कहा आओ यह खम्बा उखाड़ते हैं। खम्बा उखाड़ा तो धन मिल गया। इतने समय के संघर्ष से लड़का भी सुधर चुका था।

ⅅℰℰℙᗅK ℐᗅⅈՏⅈℕℊℍ
तुम्हारा धन भी तुम्हारे आँगन में गड़ा है, भीतर गड़ा है, मन में गड़ा है। वह खम्बा सिंह है तुम्हारे भीतर, तुम खोज रहे हो बाहर।

हो अरबपति, बने हो भिखारी। जिनको मित्र समझा, सब मतलब के साथी निकले।

तुम संत को भीतर आने तो दो। उसके लिए अपने मन का दरवाजा तो खोलो। वह तुम्हें तुम्हारा गड़ा हुआ धन दिला देगा। तुम्हें ईश्वर से मिला देगा।

देर मत करो। अभी निर्णय करो।
यह तय करने में ‘समय’ न लगाओ कि ‘आपको क्या करना है?’

वरना ‘समय’ तय कर लेगा कि ‘आपका क्या करना है.. ?’

राम राम जी मित्रों 🙏🏽🙏🏽

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

ये है देश के दो बड़े गद्दारों की कहानी….


ये है देश के दो बड़े गद्दारों की कहानी….
जनता को नहीं पता है कि भगत सिंह के खिलाफ विरुद्ध गवाही देने वाले दो व्यक्ति कौन थे । जब दिल्ली में भगत सिंह पर अंग्रेजों की अदालत में असेंबली में बम फेंकने का मुकद्दमा चला तो…
भगत सिंह और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त के खिलाफ शोभा सिंह ने गवाही दी और दूसरा गवाह था शादी लाल !
दोनों को वतन से की गई इस गद्दारी का इनाम भी मिला। दोनों को न सिर्फ सर की उपाधि दी गई बल्कि और भी कई दूसरे फायदे मिले।
शोभा सिंह को दिल्ली में बेशुमार दौलत और करोड़ों के सरकारी निर्माण कार्यों के ठेके मिले आज कनौट प्लेस में सर शोभा सिंह स्कूल में कतार लगती है बच्चो को प्रवेश नहीं मिलता है जबकि
शादी लाल को बागपत के नजदीक अपार संपत्ति मिली। आज भी श्यामली में शादी लाल के वंशजों के पास चीनी मिल और शराब कारखाना है।
सर शादीलाल और सर शोभा सिंह, भारतीय जनता कि नजरों मे सदा घृणा के पात्र थे और अब तक हैं
लेकिन शादी लाल को गांव वालों का ऐसा तिरस्कार झेलना पड़ा कि उसके मरने पर किसी भी दुकानदार ने अपनी दुकान से कफन का कपड़ा तक नहीं दिया।
शादी लाल के लड़के उसका कफ़न दिल्ली से खरीद कर लाए तब जाकर उसका अंतिम संस्कार हो पाया था।
शोभा सिंह खुशनसीब रहा। उसे और उसके पिता सुजान सिंह (जिसके नाम पर पंजाब में कोट सुजान सिंह गांव और दिल्ली में सुजान सिंह पार्क है) को राजधानी दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में हजारों एकड़ जमीन मिली और खूब पैसा भी।
शोभा सिंह के बेटे खुशवंत सिंह ने शौकिया तौर पर पत्रकारिता शुरु कर दी और बड़ी-बड़ी हस्तियों से संबंध बनाना शुरु कर दिया।
सर शोभा सिंह के नाम से एक चैरिटबल ट्रस्ट भी बन गया जो अस्पतालों और दूसरी जगहों पर धर्मशालाएं आदि बनवाता तथा मैनेज करता है।
आज दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास बाराखंबा रोड पर जिस स्कूल को मॉडर्न स्कूल कहते हैं वह शोभा सिंह की जमीन पर ही है और उसे सर शोभा सिंह स्कूल के नाम से जाना जाता था।
खुशवंत सिंह ने अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर अपने पिता को एक देशभक्त
दूरद्रष्टा और निर्माता साबित करने की भरसक कोशिश की।
खुशवंत सिंह ने खुद को इतिहासकार भी साबित करने की भी कोशिश की और कई घटनाओं की अपने ढंग से व्याख्या भी की।
खुशवंत सिंह ने भी माना है कि उसका पिता शोभा सिंह 8 अप्रैल 1929 को उस वक्त सेंट्रल असेंबली मे मौजूद था जहां भगत सिंह और उनके साथियों ने धुएं वाला बम फेंका था।
बकौल खुशवंत सिह, बाद में शोभा सिंह ने यह गवाही दी, शोभा सिंह 1978 तक जिंदा रहा और दिल्ली की हर छोटे बड़े आयोजन में वह बाकायदा आमंत्रित अतिथि की हैसियत से जाता था।
हालांकि उसे कई जगह अपमानित भी होना पड़ा लेकिन उसने या उसके परिवार ने कभी इसकी फिक्र नहीं की।
खुशवंत सिंह का ट्रस्ट हर साल सर शोभा सिंह मेमोरियल लेक्चर भी आयोजित करवाता है जिसमे बड़े-बड़े नेता और लेखक अपने विचार रखने आते हैं,
और…
बिना शोभा सिंह की असलियत जाने (य़ा फिर जानबूझ कर अनजान बने) उसकी तस्वीर पर फूल माला चढ़ा आते हैं
आज़ादी के दीवानों क विरुद्ध और भी गवाह थे ।

  1. शोभा सिंह
  2. शादी राम
  3. दिवान चन्द फ़ोर्गाट
  4. जीवन लाल
  5. नवीन जिंदल की
    बहन के पति का दादा
  6. भूपेंद्र सिंह हुड्डा का दादा
    Sir Chotu Ram !
    दीवान चन्द फोर्गाट DLF कम्पनी का Founder था इसने अपनी पहली कालोनी रोहतक में काटी थी
    इसकी इकलौती बेटी थी जो कि K.P.Singh को ब्याही और वो मालिक बन गया DLF का ।
    अब K.P.Singh की
    भी इकलौती बेटी है जो कि कांग्रेस के नेता और गुज्जर से मुस्लिम Converted गुलाम नबी आज़ाद के बेटे सज्जाद नबी आज़ाद के साथ ब्याही गई है । अब वह DLF का मालिक बनेगा ।
    जीवन लाल मशहूर एटलस साईकल कम्पनी का मालिक था।
    बाकि मशहूर हस्तियों को तो आप जानते ही होंगे ।
    ये सन्देश देश को लूटने वाले सभी लोगों तक भी पहुँचना चाहिए, फिर चाहे वो “आप” के हों या पराए…??