Posted in Astrology

नाम बदलो भाग्य बदलेगा

नाम बदलो भाग्य बदलेगा

आम तौर पर हर व्यक्ति कर्म तो करता है लेकिन उसका भाग्य नहीं बदल पाता क्योंकि उसे नामांक की शक्ति पता नहीं होता। मूलांक और भाग्यांक तो अपरिवर्तनशील हैं लेकिन योजनाबद्ध ढंग से यदि नामांक, मूलांक और भाग्यांक का मेल हो जाये तो व्यक्ति का भाग्य बदलने में देर नहीं लगती। आजमाकर देखें तो सहीं। वेदशास्त्र एवं धर्म ग्रंथ कहते हैं, मनुष्य का भाग्य नहीं बदला जा सकता। मनुष्य जीवन की तीन मुखय घटनाएं यथा जन्म, विवाह एवं मृत्यु तो बिल्कुल भी नहीं बदली जा सकती क्योंकि विवाह के जोड़े आदि सब पहले से निश्चित होते हैं तथा जन्म और मृत्यु की तारीख भी नहीं बदली जा सकती। जन्म समय के ग्रह-नक्षत्र मनुष्य का भाग्य दर्शाते हैं जो उसके पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार बनता है। परंतु जन्म राशि, जन्म लग्न एवं अंक ज्योतिष का मूल आधार मूलांक व भाग्यांक तो जन्म की तारीख से बनते हैं जिसको बदला नहीं जा सकता। लेकिन नाम में परिवर्तन करके आप अपने जीवन की रूपरेखा में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन अवश्य ला सकते हैं।

अपना मूलांक और भाग्यांक जानने की सरल विधि यह है कि जन्म तारीख का योग करें वह आपका मूलांक और जन्म तारीख, माह और सन् के अंक का योग भाग्यांक कहलाता है। जैसे 3, 12, 21, 30 जन्म तारीख वाले का मूलांक 3 होगा और 18-01-1926 जन्म तारीख वाले का भाग्यांक 1 होगा। इसमे जन्म तारीख माह और सन् का योग करने से 28 अंक आया। इस का योग 2+8 = 10, यानि मूलांक 1 । अधिकतर जीवन के मूलांक और भाग्यांक वाले माह, तारीख तथा सन लाभकारी रहते हैं। यदि राशि के हिसाब से भी योगकारी ग्रह का अंक, मूलांक या भाग्यांक से मेल खाता है तो वह अंक बहुत लाभकारी रहेगा। इसी के साथ यदि व्यक्ति के नाम का अंक भी भाग्यांक या मूलांक से मेल खावे तो वह व्यक्ति जीवन में बहुत उन्नति करता है। नाम भी भाग्यांक के अनुसार रखें तो वह लाभकारी सिद्ध होगा। जो लोग जीवन में झंझावातों से जूझते देखे गये, उनमें प्रायः यह पाया गया कि उनके इन तीनों अंकों में तालमेल नहीं था।

यदि मूलांक, भाग्यांक और नामांक में तालमेल न हो तो हम नामांक बदल सकते हैं, क्योंकि जन्मांक और भाग्यांक तो जन्म लेते ही निश्चित हो जाते हैं। ये भगवान के दिये होते हैं। केवल नाम ही है, जिसे मनुष्य देता है- उसे बदला जा सकता है- यदि आवश्यक हो तो अपना नाम बदलें और उसका लाभ उठायें। कुछ व्यक्ति इतने भाग्यशाली होते हैं कि उनके मूलांक तथा भाग्यांक और नामांक में समन्वय रहता है और वे सुखी जीवन व्यतीत करते हैं। अंक ज्योतिष अंकों का गणित नहीं, बल्कि अंकों का विज्ञान है। यह ज्योतिष व हस्तरेखा जैसी ही विद्या है। अंक ज्योतिष का आधार वास्तव में नौ ग्रह ही हैं। अंग्रेजी के प्रत्येक अक्षर का तथा प्रत्येक ग्रह का भी एक अंक निर्धारित किया गया है।

जो इस प्रकार है :- हिंदी के अक्षरों को भी अंक शास्त्र में नंबर दियें गये हैं। अ से अं, अः तक 1 से 24 अंक सीरियल में तथा क, ख से ह तक 1 से 36 अंक सीरियल में दिये गये हैं। इन्हें भी आजमा कर देखें। यदि मूलांक या भाग्यांक के अनुसार नामांक भी हो तो जीवन में उन्नति की संभावना अधिक रहती है। इसके अतिरिक्त यदि जन्म/राशि लग्न के योगकारी ग्रह का अंक मूलांक या भाग्यांक से मिलता है तो उस अंक के अनुसार नामांक बना लें तो बहुत उन्नति होगी। कुछ वर्तमान प्रसिद्ध लोगों के इन अंकों के परीक्षण से सिद्ध होता है कि अंक शास्त्र उपयोगी है। 1. श्रीमती सोनिया गांधी जी की जन्म तारीख 9.12.1946 है। इनका मूलांक नौ (9) है और भाग्यांक पांच (5) है।

इन की राशि मिथुन और जन्म लग्न कर्क है। इनके जन्म लग्न के हिसाब से मंगल योगकारी है। मंगल का अंक 9 है। इनके नामांक का अंक भी 9 है। इसी कारण इन्हें इतनी प्रसिद्धि मिली। इनकी राशि का स्वामी बुध है और बुध का अंक 5 है जो इनका भाग्यांक है। इन्हीं कारणों से इन्होंने प्रसिद्धि अर्जित की। 2. फिल्म स्टार शाहरूख खान की जन्म तारीख 2.11.65 है। उसका मूलांक 2 है और भाग्यांक 7 है तथा नामांक 6 है। इनकी राशि मकर के लिए शुक्र योगकारी ग्रह है और शुक्र का अंक 6 है। नामांक 6 इसी कारण लाभकारी है और उसको बहुत प्रसिद्धि मिली तथा धन-दौलत मिली।

यह जन्म राशि के योगकारी ग्रह के अनुसार नामांक होने से उन्नति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। (इनकी जन्म पत्रिका में शश व रूचक नामक दो पंच महापुरुष राजयोग भी हैं॥ 3. प्रसिद्ध फिल्म स्टार हेमा मालिनी की जन्म तारीख 16.10.48 होने से भाग्यांक 3 है और उनका नामांक भी 3 है। यह अंक 3 गुरु का अंक है। उनका लग्न कर्क एवं राशि मीन होने से गुरु योगकारी है। उनका स्वभाव रहन-सहन गुरु प्रधान होने से उनका जीवन सुखी है। उनकी प्रवृत्ति भी सात्विक बनी। गुरु ने जन्मपत्री में हंस नामक पंच महापुरूष राजयोग भी बनाया। यह भी जन्म तारीख और जन्मपत्रिका के अनुसार नामांक से उन्नति + प्रसिद्धि का उत्तम उदाहरण है।

4. रितिक रोशन ने फिल्म जगत में एक ही फिल्म से धूम मचा दी। इसका कारण हम अंक शास्त्र के नजरिये से देखें तो उसकी जन्म तारीख 10.01.1974 है- उसका मूलांक एक सूर्य का अंक है और उसका भाग्यांक पांच बुध का नंबर है- उसकी जन्म राशि कर्क है उसके लिए योगकारी ग्रह मंगल का अंक नौ है- उसका नामांक दो है। उसका मूलांक सूर्य का अंक एक और नामांक चंद्र का अंक दो होने से वह सूर्य +चंद्र की भांति जगत में वर्षों तक जगमगाता रहेगा।

उसके मूलांक और नामांक के स्वामी एक एवं दो अंक परम मित्र – रायल ग्रह होने से उसका नाम तीव्र गति से रोशन हुआ। जैसे सूर्य और चंद्र के उदय होने पर अंधेरा दूर हो जाता है और प्रकाश चारों और फैल जाता है। उसके नामांक दो का स्वामी चंद्र होने से जीवन में सामन्जस्य बना रहेगा- मेष राशि के स्वग्रही मंगल ने केंद्र में रूचक नामक पंच महापुरुष राजयोग बनाया है और चंद्र-मंगल राजयोग, गजकेसरी जैसे राजयोगों के कारण उसकी बहुत उन्नति होगी।

परंतु हम अंक शास्त्र के अनुसार देखें तब भी उसकी उन्नति बहुत होगी क्योंकि मूलांक एक और नामांक दो के स्वामी सूर्य और चंद्र ज्योतिष में राजा रानी कहलाते हैं। इस अंक वाले को शिखर पर पहुंचा देते हैं- भगवान श्रीराम की कर्क राशि थी। श्री रितिक की राशि भी कर्क होने से वह अपना नाम रोशन करेगा। व्यापार के लिये, व्यापार संस्थान का नाम यदि हम इस शास्त्र के अनुसार रखें तो व्यापार में अच्छी उन्नति की संभावना बनती है। कई व्यापार संस्थाओं के नाम बदलने से उन्हें लाभ हुआ है।

Posted in रामायण - Ramayan

*अयोध्या में राम- मंदिर के प्रमाण*

*अयोध्या में राम- मंदिर के प्रमाण*

बाबरी मस्जिद के नीचे खुदाई हाई कोर्ट के ऑर्डर से सरकार की निगरानी में तथा मुस्लिम पर्सनल बोर्ड व अखाड़ा के नुमाईंदों की मौजूदगी में दो बार की गई । पहली 1977 में दूसरी 2003 में । इन खुदाईयों से जो भी तथ्य सामने आए उनसे यह सिद्ध होता है कि वहाँ (उस मस्जिद के नीचे) पहले एक मंदिर था–
1; खुदाई से मिले 14 स्तंभों (pillrs ) का आधार शिला (base) मन्दिरो के स्थापत्य को दर्शाता है और उस पर मन्दिरों की कलाकृतियां अंकित थी।
2, मंदिर के शिखर पर ‘अगलखा’ बना हुआ था जो मंदिर का सबूत दे रहा था।
3, खुदाई में ‘जलाभिषेक’ मिला जो सिर्फ मन्दिर में ही होता है , मस्जिद में नही।
4, खुदाई में टूटी मूर्तियां, पत्थर के हाथी, बैल, कमल फूल आदि मन्दिर की गवाही देते हैं।
5, 5×2 फुट के लाल पत्थरोँ पर नागरी व संस्कृत भाषा मे खुदे अनेक शिलालेख मिले है, जिस पर यह लिखा है कि यह मंदिर दस सर वाले रावण को मारने वाले प्रतापी राजा श्री राम जी का है और इस मंदिर का जीर्णोद्धार साकेत मण्डल के राजा ने किया है।
6, कवि तुलसीदास ने अपने महाकाव्य रामचरितमानस में लिखा है कि 1528 में मीर बाकी ने बड़ी बर्बरता पूर्वक राम मंदिर को ध्वस्त कर बाबरी मस्जिद का निर्माण किया ।
ऐसे अनेक प्रमाण यह सिद्ध करते हैं कि अयोध्या में राम मंदिर को तोड़फोड़ कर उसी स्थान पर एक मस्जिद का निर्माण किया गया जिसका नाम बाबरी मस्जिद रखा । अतः वहाँ पुनः राम मंदिर ही बनना चाहिए, मस्जिद नहीं।
सन्दीप आर्य
मंत्री आर्य समाज सांताक्रुज

Posted in छोटी कहानिया - Chooti Kahaniya

*चार शब्दों की उच्चतम प्रार्थना*

*चार शब्दों की उच्चतम प्रार्थना*

http://whatsupmessagess.blogspot.com/2017/05/Four-word-pray-whatsup-story.html

एक जादूगर जो मृत्यु के करीब था, मृत्यु से पहले अपने बेटे को चाँदी के सिक्कों से भरा थैला देता है और बताता है की “जब भी इस थैले से चाँदी के सिक्के खत्म हो जाएँ तो मैं तुम्हें एक प्रार्थना बताता हूँ, उसे दोहराने से चाँदी के सिक्के फिर से भरने लग जाएँगे । उसने बेटे के कान में चार शब्दों की प्रार्थना कही और वह मर गया । अब बेटा चाँदी के सिक्कों से भरा थैला पाकर आनंदित हो उठा और उसे खर्च करने में लग गया । वह थैला इतना बड़ा था की उसे खर्च करने में कई साल बीत गए, इस बीच वह प्रार्थना भूल गया । जब थैला खत्म होने को आया तब उसे याद आया कि “अरे! वह चार शब्दों की प्रार्थना क्या थी ।” उसने बहुत याद किया, उसे याद ही नहीं आया ।

अब वह लोगों से पूँछने लगा । पहले पड़ोसी से पूछता है की “ऐसी कोई प्रार्थना तुम जानते हो क्या, जिसमें चार शब्द हैं । पड़ोसी ने कहा, “हाँ, एक चार शब्दों की प्रार्थना मुझे मालूम है, “ईश्वर मेरी मदद करो ।” उसने सुना और उसे लगा की ये वे शब्द नहीं थे, कुछ अलग थे । कुछ सुना होता है तो हमें जाना-पहचाना सा लगता है । फिर भी उसने वह शब्द बहुत बार दोहराए, लेकिन चाँदी के सिक्के नहीं बढ़े तो वह बहुत दुःखी हुआ । फिर एक फादर से मिला, उन्होंने बताया की “ईश्वर तुम महान हो” ये चार शब्दों की प्रार्थना हो सकती है, मगर इसके दोहराने से भी थैला नहीं भरा । वह एक नेता से मिला, उसने कहा “ईश्वर को वोट दो” यह प्रार्थना भी कारगर साबित नहीं हुई । वह बहुत उदास हुआ ।

उसने सभी से मिलकर देखा मगर उसे वह प्रार्थना नहीं मिली, जो पिताजी ने बताई थी । वह उदास होकर घर में बैठा हुआ था तब एक भिखारी उसके दरवाजे पर आया । उसने कहा, “सुबह से कुछ नहीं खाया, खाने के लिए कुछ हो तो दो ।” उस लड़के ने बचा हुआ खाना भिखारी को दे दिया । उस भिखारी ने खाना खाकर बर्तन वापस लौटाया और ईश्वर से प्रार्थना की, *”हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद ।”* अचानक वह चोंक पड़ा और चिल्लाया की “अरे! यही तो वह चार शब्द थे ।” उसने वे शब्द दोहराने शुरू किए-“हे ईश्वर तुम्हारा धन्यवाद”……..और उसके सिक्के बढ़ते गए… बढ़ते गए… इस तरह उसका पूरा थैला भर गया ।

इससे समझें की जब उसने किसी की मदद की तब उसे वह मंत्र फिर से मिल गया । “हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद ।” यही उच्च प्रार्थना है क्योंकि जिस चीज के प्रति हम धन्यवाद देते हैं, वह चीज बढ़ती है । अगर पैसे के लिए धन्यवाद देते हैं तो पैसा बढ़ता है, प्रेम के लिए धन्यवाद देते हैं तो प्रेम बढ़ता है । ईश्वर या गुरूजी के प्रति धन्यवाद के भाव निकलते हैं की ऐसा ज्ञान सुनने तथा पढ़ने का मौका हमें प्राप्त हुआ है । बिना किसी प्रयास से यह ज्ञान हमारे जीवन में उतर रहा है वर्ना ऐसे अनेक लोग हैं, जो झूठी मान्यताओं में जीते हैं और उन्हीं मान्यताओं में ही मरते हैं । मरते वक्त भी उन्हें सत्य का पता नहीं चलता । उसी अंधेरे में जीते हैं, मरते हैं ।

*ऊपर दी गई कहानी से समझें की “हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद” ये चार शब्द, शब्द नहीं प्रार्थना की शक्ति हैं । अगर यह चार शब्द दोहराना किसी के लिए कठिन है तो इसे तीन शब्दों में कह सकते हैं, “ईश्वर तुम्हार धन्यवाद ।” ये तीन शब्द भी ज्यादा लग रहे हों तो दो शब्द कहें, “ईश्वर धन्यवाद !” और दो शब्द भी ज्यादा लग रहे हों तो सिर्फ एक ही शब्द कह सकते हैं, “धन्यवाद ।” आइए, हम सब मिलकर एक साथ धन्यवाद दें उस ईश्वर को, जिसने हमें मनुष्य जन्म दिया और उसमें दी दो बातें – पहली “साँस का चलना” दूसरी “सत्य की प्यास ।” यही प्यास हमें खोजी से भक्त बनाएगी । भक्ति और प्रार्थना से होगा आनंद, परम आनंद, तेज आनंद ।

Posted in छोटी कहानिया - Chooti Kahaniya

एक साधु महाराज श्री रामायण कथा सुना रहे थे

http://whatsupmessagess.blogspot.com/2017/05/Four-word-pray-whatsup-story.html

एक साधु महाराज श्री रामायण कथा सुना रहे थे। लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते। साधु महाराज का नियम था रोज कथा शुरू करने से पहले “आइए हनुमंत जी बिराजिए” कहकर हनुमान जी का आह्वान करते थे, फिर एक घण्टा प्रवचन करते थे।
एक वकील साहब हर रोज कथा सुनने आते। वकील साहब के भक्तिभाव पर एक दिन तर्कशीलता हावी हो गई । उन्हें लगा कि महाराज रोज “आइए हनुमंत जी बिराजिए” कहते हैं तो क्या हनुमान जी सचमुच आते होंगे !
अत: वकील साहब ने महात्मा जी से पूछ ही डाला- महाराज जी आप रामायण की कथा बहुत अच्छी कहते हैं हमें बड़ा रस आता है परंतु आप जो गद्दी प्रतिदिन हनुमान जी को देते हैं उसपर क्या हनुमान जी सचमुच बिराजते हैं ?
साधु महाराज ने कहा… हाँ यह मेरा व्यक्तिगत विश्वास है कि रामकथा हो रही हो तो हनुमान जी अवश्य पधारते हैं । वकील ने कहा… महाराज ऐसे बात नहीं बनेगी, हनुमान जी यहां आते हैं इसका कोई सबूत दीजिए । आपको साबित करके दिखाना चाहिए कि हनुमान जी आपकी कथा सुनने आते हैं ।
महाराज जी ने बहुत समझाया कि भैया आस्था को किसी सबूत की कसौटी पर नहीं कसना चाहिए यह तो भक्त और भगवान के बीच का प्रेमरस है, व्यक्तिगत श्रद्घा का विषय है । आप कहो तो मैं प्रवचन करना बंद कर दूँ या आप कथा में आना छोड़ दो।
लेकिन वकील नहीं माना । कहता ही रहा कि आप कई दिनों से दावा करते आ रहे हैं । यह बात और स्थानों पर भी कहते होंगे, इसलिए महाराज आपको तो साबित करना होगा कि हनुमान जी कथा सुनने आते हैं।
इस तरह दोनों के बीच वाद-विवाद होता रहा । मौखिक संघर्ष बढ़ता चला गया । हारकर साधु महाराज ने कहा…  हनुमान जी हैं या नहीं उसका सबूत कल दिलाऊंगा । कल कथा शुरू हो तब प्रयोग करूंगा।
जिस गद्दी पर मैं हनुमानजी को विराजित होने को कहता हूं आप उस गद्दी को आज अपने घर ले जाना, कल अपने साथ उस गद्दी को लेकर आना और फिर मैं कल गद्दी यहाँ रखूंगा ।
मैं कथा से पहले हनुमानजी को बुलाएंगे फिर आप गद्दी ऊँची उठाना । यदि आपने गद्दी ऊँची कर दी तो समझना कि हनुमान जी नहीं हैं । वकील इस कसौटी के लिए तैयार हो गया ।
महाराज ने कहा… हम दोनों में से जो पराजित होगा वह क्या करेगा, इसका निर्णय भी कर लें ? यह तो सत्य की परीक्षा है । वकील ने कहा- मैं गद्दी ऊँची न कर सका तो वकालत छोड़कर आपसे दीक्षा ले लूंगा । आप पराजित हो गए तो क्या करोगे ? साधु ने कहा… मैं कथावाचन छोड़कर आपके ऑफिस का चपरासी बन जाऊंगा।
अगले दिन कथा पंडाल में भारी भीड़ हुई जो लोग रोजाना कथा सुनने नहीं आते थे, वे भी भक्ति, प्रेम और विश्वास की परीक्षा देखने आए। काफी भीड़ हो गई। पंडाल भर गया । श्रद्घा और विश्वास का प्रश्न जो था।
साधु महाराज और वकील साहब कथा पंडाल में पधारे । गद्दी रखी गई ।
महात्मा जी ने सजल नेत्रों से मंगलाचरण किया और फिर बोले… “आइए हनुमंत जी बिराजिए” ऐसा बोलते ही साधु महाराज के नेत्र सजल हो उठे । मन ही मन साधु बोले… प्रभु ! आज मेरा प्रश्न नहीं बल्कि रघुकुल रीति की पंरपरा का सवाल है । मैं तो एक साधारण जन हूँ । मेरी भक्ति और आस्था की लाज रखना ।
फिर वकील साहब को निमंत्रण दिया गया आइए गद्दी ऊँची कीजिए । लोगों की आँखे जम गईं । वकील साहब खड़ेे हुए ।
उन्होंने गद्दी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया पर गद्दी को स्पर्श भी न कर सके ! जो भी कारण रहा, उन्होंने तीन बार हाथ बढ़ाया, किन्तु तीनों बार असफल रहे।
महात्मा जी देख रहे थे, गद्दी को पकड़ना तो दूर वकील साहब गद्दी को छू भी न सके । तीनों बार वकील साहब पसीने से तर-बतर हो गए। वकील साहब साधु महाराज के चरणों में गिर पड़े और बोले महाराज गद्दी उठाना तो दूर, मुझे नहीं मालूम कि क्यों मेरा हाथ भी गद्दी तक नहीं पहुंच पा रहा है ।
अत: मैं अपनी हार स्वीकार करता हूं। कहते है कि श्रद्घा और भक्ति के साथ की गई आराधना में बहुत शक्ति होती है । मानो तो देव नहीं तो पत्थर ।
प्रभु की मूर्ति तो पाषाण की ही होती है लेकिन भक्त के भाव से उसमें प्राण प्रतिष्ठा होती है तो प्रभु बिराजते है ।
जय श्री बजरंग बली….

Posted in Gau maata

गोमांस आदि के प्रचार के लिए लोगों ने जानबूझकर पुस्तकों के गलत अर्थ किये हैं। गोमांस का भोजन दिखाने के लिये पुणे के भण्डारकर शोध संस्थान द्वारा प्रकाशित उत्तर रामचरित की टीका में गलत अर्थ किया गया है। दशरथ जी के पास वसिष्ठ जी किसी चर्चा के लिए आये। अतिथि के लिए वत्सतरी दी गई। उसे वसिष्ठ ने ग्रहण किया तो मड़मड़ का शब्द हुआ-वत्सतरी  मडमडायते। वत्सतरी का अर्थ किया है 2 वर्ष का गाय का वत्स। उसे देखते ही वसिष्ठ ने बछड़े को चबाना शुरू किया। उसकी हड़डियों के टूटने से मडमड का शब्द हुआ। व्याकरण में  कुछ भी व्याख्या करें, मगरमच्छ भी गाय का 2 वर्ष का बछड़ा या तुरंत पैदा हुआ बछड़ा भी अपने मुंह में नहीं ले सकता। 2 वर्ष के बछड़े का प्रायः वयस्क जैसा आकार हो जाता है। मगरमच्छ बकरे को भी बहुत कठिनाई से मुंह में ले पाता है।

वत्सतरी लेने के बाद दशरथ ने कहा कि आपने मधुपर्क ले लिया, अब प्रसंग पर चर्चा करें। इससे स्पष्ट है कि वत्सतरी का अर्थ मधुपर्क है।

कोई भी अतिथि आता है तो थका होता है तथा उसके शरीर में पानी की कमी होती है। अतः उसे पानी तथा ग्लूकोज  (मीठा) किसी रूप में दिया जाता है-यह मधुपर्क हुआ। पेट की सूखी आंत में पानी पहुंचने पर आंत की गति से मडमड शब्द होता है। कुछ लोग मुंह से भी जोर से शब्द निकालते हैं। पानी में चीनी या थोड़ा नमक (गुजराती में इसे भी मीठू कहते हैं) मिलाने पर उससे 1 दिन का बच्चा भी तृप्त हो जाता है। वस्तुतः उनका पेट खराब होने पर यही दवा देते हैं जिसे  ORH कहा जाता है। इसलिए मधुपर्क को ही वत्सतरी कहा है।

इसी प्रकार राहुल सांकृत्यायन ने भी श्वेताश्वतर उपनिषद् के नाम से निष्कर्ष निकाला कि ऋषि केवल घोड़े की हड्डी का सूप पीते थे। अश्व = घोड़ा, उसका श्वेत भाग हड्डी, तर = सूप। कई लोगों को मैंने कहा कि इस उपनिषद् में घोड़ा का कोई शब्द दिखा दें। पर घोड़ा या गाय के मांस का किसी प्रकार अर्थ निकालते ही उनके जीवन का उद्देश्य पूरा हो जाता है, उसके बाद कुछ सुनते या समझते नहीं हैं। 

आकाश में सूर्य अश्व या ऊर्जा का स्रोत है। उसका प्रकाशित क्षेत्र श्वेत अश्व है। उसके परे ब्रह्माण्ड आदि श्वेताश्वतर हैं जिनकी चर्चा इसमें है।

अरुण उपाध्याय

Posted in Subhasit

विद्या महिमा के संस्कृत श्लोक

विद्या महिमा के संस्कृत श्लोक | Sanskrit Slokas on Education with Meaning

http://www.shiveshpratap.com/sanskrit-slokas-on-education-vidya-mahima-with-meaning/

आदि काल से ही हमारी भारतीय संस्कृति में शिक्षा का बड़ा महत्व रहा है| शिक्षा को अमरत्व का साधन माना गया है| “सा विद्या या विमुक्तये” का मंत्र संसार की एकमात्र हिंदू संस्कृति में मिलता है और इस तरह से हमारी संस्कृति ने सनातन काल से ही गुरु शिष्य परंपरा के माध्यम से शिक्षा को जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग माना है | यही कारण है कि समय समय पर हमारे ऋषि मुनियों के साथ-साथ समाज ने शिक्षा के महत्व पर आधारित संस्कृत श्लोकों की तमाम रचनाएं की जिसे आज मैं यहां संकलित कर रहा हूं मुझे विश्वास है कि यह आपको अच्छा लगेगा

विद्या महिमा के संस्कृत श्लोक | Sanskrit Slokas on Education with Meaning:

संयोजयति विद्यैव नीचगापि नरं सरित् ।
समुद्रमिव दुर्धर्षं नृपं भाग्यमतः परम् ॥
जैसे नीचे प्रवाह में बहेनेवाली नदी, नाव में बैठे हुए इन्सान को न पहुँच पानेवाले समंदर तक पहुँचाती है, वैसे हि निम्न जाति में गयी हुई विद्या भी, उस इन्सान को राजा का समागम करा देती है; और राजा का समागम होने के बाद उसका भाग्य खील उठता है ।
विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम् ।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् ॥
विद्या विनय देती है; विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म, और धर्म से सुख प्राप्त होता है ।
कुत्र विधेयो यत्नः विद्याभ्यासे सदौषधे दाने ।
अवधीरणा क्व कार्या खलपरयोषित्परधनेषु ॥
यत्न कहाँ करना ? विद्याभ्यास, सदौषध और परोपकार में । अनादर कहाँ करना ? दुर्जन, परायी स्त्री और परधन में ।
विद्याविनयोपेतो हरति न चेतांसि कस्य मनुजस्य ।
कांचनमणिसंयोगो नो जनयति कस्य लोचनानन्दम् ॥
विद्यावान और विनयी पुरुष किस मनुष्य का चित्त हरण नहि करता ? सुवर्ण और मणि का संयोग किसकी आँखों को सुख नहि देता ?
विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम् ।
कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम् ॥
कुरुप का रुप विद्या है, तपस्वी का रुप क्षमा, कोकिला का रुप स्वर, तथा स्त्री का रुप पतिव्रत्य है ।
रूपयौवनसंपन्ना विशाल कुलसम्भवाः ।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥
रुप संपन्न, यौवनसंपन्न, और चाहे विशाल कुल में पैदा क्यों न हुए हों, पर जो विद्याहीन हों, तो वे सुगंधरहित केसुडे के फूल की भाँति शोभा नहि देते ।
माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः ।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ॥
जो अपने बालक को पढाते नहि, ऐसी माता शत्रु समान और पित वैरी है; क्यों कि हंसो के बीच बगुले की भाँति, ऐसा मनुष्य विद्वानों की सभा में शोभा नहि देता !
क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्  ॥
एक एक क्षण गवाये बिना विद्या पानी चाहिए; और एक एक कण बचा करके धन ईकट्ठा करना चाहिए । क्षण गवानेवाले को विद्या कहाँ, और कण को क्षुद्र समजनेवाले को धन कहाँ ?
अजरामरवत् प्राज्ञः विद्यामर्थं च साधयेत् ।
गृहीत एव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् ॥
बुढापा और मृत्यु आनेवाले नहि, ऐसा समजकर मनुष्य ने विद्या और धन प्राप्त करना; पर मृत्यु ने हमारे बाल पकडे हैं, यह समज़कर धर्माचरण करना ।
विद्या नाम नरस्य कीर्तिरतुला भाग्यक्षये चाश्रयो
धेनुः कामदुधा रतिश्च विरहे नेत्रं तृतीयं च सा ।
सत्कारायतनं कुलस्य महिमा रत्नैर्विना भूषणम्
तस्मादन्यमुपेक्ष्य सर्वविषयं विद्याधिकारं कुरु ॥
विद्या अनुपम कीर्ति है; भाग्य का नाश होने पर वह आश्रय देती है, कामधेनु है, विरह में रति समान है, तीसरा नेत्र है, सत्कार का मंदिर है, कुल-महिमा है, बगैर रत्न का आभूषण है; इस लिए अन्य सब विषयों को छोडकर विद्या का अधिकारी बन ।
श्रियः प्रदुग्धे विपदो रुणद्धि यशांसि सूते मलिनं प्रमार्ष्टि ।
संस्कारशौचेन परं पुनीते शुद्धा हि वुद्धिः किल कामधेनुः ॥
शुद्ध बुद्धि सचमुच कामधेनु है, क्यों कि वह संपत्ति को दोहती है, विपत्ति को रुकाती है, यश दिलाती है, मलिनता धो देती है, और संस्काररुप पावित्र्य द्वारा अन्य को पावन करती है ।
हर्तृ र्न गोचरं याति दत्ता भवति विस्तृता ।
कल्पान्तेऽपि न या नश्येत् किमन्यद्विद्यया विना ॥
जो चोरों के नजर पडती नहि, देने से जिसका विस्तार होता है, प्रलय काल में भी जिसका विनाश नहि होता, वह विद्या के अलावा अन्य कौन सा द्रव्य हो सकता है ?
ज्ञातिभि र्वण्टयते नैव चोरेणापि न नीयते ।
दाने नैव क्षयं याति विद्यारत्नं महाधनम् ॥
यह विद्यारुपी रत्न महान धन है, जिसका वितरण ज्ञातिजनों द्वारा हो नहि सकता, जिसे चोर ले जा नहि सकते, और जिसका दान करने से क्षय नहि होता ।
विद्या शस्त्रं च शास्त्रं च द्वे विद्ये प्रतिपत्तये ।
आद्या हास्याय वृद्धत्वे द्वितीयाद्रियते सदा ॥
शस्त्रविद्या और शास्त्रविद्या – ये दो प्राप्त करने योग्य विद्या हैं । इन में से पहली वृद्धावस्था में हास्यास्पद बनाती है, और दूसरी सदा आदर दिलाती है ।
सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुरनुत्तमम् ।
अहार्यत्वादनर्ध्यत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा ॥
सब द्रव्यों में विद्यारुपी द्रव्य सर्वोत्तम है, क्यों कि वह किसी से हरा नहि जा सकता; उसका मूल्य नहि हो सकता, और उसका कभी नाश नहि होता ।
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः ।
विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परं दैवतम्
विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः ॥
विद्या इन्सान का विशिष्ट रुप है, गुप्त धन है । वह भोग देनेवाली, यशदात्री, और सुखकारक है । विद्या गुरुओं का गुरु है, विदेश में वह इन्सान की बंधु है । विद्या बडी देवता है; राजाओं में विद्या की पूजा होती है, धन की नहि । इसलिए विद्याविहीन पशु हि है ।
मातेव रक्षति पितेव हिते नियुंक्ते
कान्तेव चापि रमयत्यपनीय खेदम् ।
लक्ष्मीं तनोति वितनोति च दिक्षु कीर्तिम्
किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या ॥
विद्या माता की तरह रक्षण करती है, पिता की तरह हित करती है, पत्नी की तरह थकान दूर करके मन को रीझाती है, शोभा प्राप्त कराती है, और चारों दिशाओं में कीर्ति फैलाती है । सचमुच, कल्पवृक्ष की तरह यह विद्या क्या क्या सिद्ध नहि करती ?
सद्विद्या यदि का चिन्ता वराकोदर पूरणे ।
शुकोऽप्यशनमाप्नोति रामरामेति च ब्रुवन् ॥
सद्विद्या हो तो क्षुद्र पेट भरने की चिंता करने का कारण नहि । तोता भी “राम राम” बोलने से खुराक पा हि लेता है ।
न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी ।
व्यये कृते वर्धते एव नित्यं विद्याधनं सर्वधन प्रधानम् ॥
विद्यारुपी धन को कोई चुरा नहि सकता, राजा ले नहि सकता, भाईयों में उसका भाग नहि होता, उसका भार नहि लगता, (और) खर्च करने से बढता है । सचमुच, विद्यारुप धन सर्वश्रेष्ठ है ।
अपूर्वः कोऽपि कोशोड्यं विद्यते तव भारति ।
व्ययतो वृद्धि मायाति क्षयमायाति सञ्चयात् ॥
हे सरस्वती ! तेरा खज़ाना सचमुच अवर्णनीय है; खर्च करने से वह बढता है, और संभालने से कम होता है।
नास्ति विद्यासमो बन्धुर्नास्ति विद्यासमः सुहृत् ।
नास्ति विद्यासमं वित्तं नास्ति विद्यासमं सुखम् ॥
विद्या जैसा बंधु नहि, विद्या जैसा मित्र नहि, (और) विद्या जैसा अन्य कोई धन या सुख नहि ।
अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम् ।
सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः ॥
अनेक संशयों को दूर करनेवाला, परोक्ष वस्तु को दिखानेवाला, और सबका नेत्ररुप शास्त्र जिस ने पढा नहि, वह इन्सान (आँख होने के बावजुद) अंधा है ।
सुखार्थिनः कुतोविद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम् ।
सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम् ॥
जिसे सुख की अभिलाषा हो (कष्ट उठाना न हो) उसे विद्या कहाँ से ? और विद्यार्थी को सुख कहाँ से ? सुख की ईच्छा रखनेवाले ने विद्या की आशा छोडनी चाहिए, और विद्यार्थी ने सुख की ।
ज्ञानवानेन सुखवान् ज्ञानवानेव जीवति ।
ज्ञानवानेव बलवान् तस्मात् ज्ञानमयो भव ॥
ज्ञानी इन्सान हि सुखी है, और ज्ञानी हि सही अर्थ में जीता है । जो ज्ञानी है वही बलवान है, इस लिए तूं ज्ञानी बन । (वसिष्ठ की राम को उक्ति)
कुलं छलं धनं चैव रुपं यौवनमेव च ।
विद्या राज्यं तपश्च एते चाष्टमदाः स्मृताः ॥
कुल, छल, धन, रुप, यौवन, विद्या, अधिकार, और तपस्या – ये आठ मद हैं ।
सालस्यो गर्वितो निद्रः परहस्तेन लेखकः ।
अल्पविद्यो विवादी च षडेते आत्मघातकाः ॥
आलसी, गर्विष्ठ, अति सोना, पराये के पास लिखाना, अल्प विद्या, और वाद-विवाद ये छे आत्मघाती हैं ।
स्वच्छन्दत्वं धनार्थित्वं प्रेमभावोऽथ भोगिता ।
अविनीतत्वमालस्यं विद्याविघ्नकराणि षट् ॥
स्वंच्छंदता, पैसे का मोह, प्रेमवश होना, भोगाधीन होना, उद्धत होना – ये छे भी विद्याप्राप्ति में विघ्नरुप हैं ।
गीती शीघ्री शिरः कम्पी तथा लिखित पाठकः ।
अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः ॥
गाकर पढना, शीघ्रता से पढना, पढते हुए सिर हिलाना, लिखा हुआ पढ जाना, अर्थ न जानकर पढना, और धीमा आवाज होना ये छे पाठक के दोष हैं ।
माधुर्यं अक्षरव्यक्तिः पदच्छेदस्तु सुस्वरः ।
धैर्यं लयसमर्थं च षडेते पाठके गुणाः ॥
माधुर्य, स्पष्ट उच्चार, पदच्छेद, मधुर स्वर, धैर्य, और तन्मयता – ये पाठक के छे गुण हैं ।
विद्या वितर्को विज्ञानं स्मृतिः तत्परता क्रिया ।
यस्यैते षड्गुणास्तस्य नासाध्यमतिवर्तते ॥
विद्या, तर्कशक्ति, विज्ञान, स्मृतिशक्ति, तत्परता, और कार्यशीलता, ये छे जिसके पास हैं, उसके लिए कुछ भी असाध्य नहि ।
द्यूतं पुस्तकवाद्ये च नाटकेषु च सक्तिता ।
स्त्रियस्तन्द्रा च निन्द्रा च विद्याविघ्नकराणि षट् ॥
जुआ, वाद्य, नाट्य (कथा/फिल्म) में आसक्ति, स्त्री (या पुरुष), तंद्रा, और निंद्रा – ये छे विद्या में विघ्नरुप होते हैं ।
आयुः कर्म च विद्या च वित्तं निधनमेव च ।
पञ्चैतानि विलिख्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ॥
आयुष्य, (नियत) कर्म, विद्या (की शाखा), वित्त (की मर्यादा), और मृत्यु, ये पाँच देही के गर्भ में हि निश्चित हो जाते हैं ।
आरोग्य बुद्धि विनयोद्यम शास्त्ररागाः ।
आभ्यन्तराः पठन सिद्धिकराः भवन्ति ॥
आरोग्य, बुद्धि, विनय, उद्यम, और शास्त्र के प्रति राग (आत्यंतिक प्रेम) – ये पाँच पठन के लिए आवश्यक आंतरिक गुण हैं ।
आचार्य पुस्तक निवास सहाय वासो ।
बाह्या इमे पठन पञ्चगुणा नराणाम् ॥
आचार्य, पुस्तक, निवास, मित्र, और वस्त्र – ये पाँच पठन के लिए आवश्यक बाह्य गुण हैं ।
दानानां च समस्तानां चत्वार्येतानि भूतले ।
श्रेष्ठानि कन्यागोभूमिविद्या दानानि सर्वदा ॥
सब दानों में कन्यादान, गोदान, भूमिदान, और विद्यादान सर्वश्रेष्ठ है ।
तैलाद्रक्षेत् जलाद्रक्षेत् रक्षेत् शिथिल बंधनात् ।
मूर्खहस्ते न दातव्यमेवं वदति पुस्तकम् ॥
पुस्तक कहता है कि, तैल से मेरी रक्षा करो, जल से रक्षा करो, मेरा बंधन शिथिल न होने दो, और मूर्ख के हाथ में मुझे न दो ।
दानं प्रियवाक्सहितं ज्ञानमगर्वं क्षमान्वितं शौर्यम् ।
वित्तं दानसमेतं दुर्लभमेतत् चतुष्टयम् ॥
प्रिय वचन से दिया हुआ दान, गर्वरहित ज्ञान, क्षमायुक्त शौर्य, और दान की इच्छावाला धन – ये चार दुर्लभ है ।
अव्याकरणमधीतं भिन्नद्रोण्या तरंगिणी तरणम् ।
भेषजमपथ्यसहितं त्रयमिदमकृतं वरं न कृतम् ॥
व्याकरण छोडकर किया हुआ अध्ययन, तूटी हुई नौका से नदी पार करना, और अयोग्य आहार के साथ लिया हुआ औषध – ये ऐसे करने के बजाय तो न करने हि बेहतर है ।
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः ।
तथा वेदं विना विप्रः त्रयस्ते नामधारकाः ॥
लकडे का हाथी, और चमडे से आवृत्त मृग की तरह वेदाध्ययन न किया हुआ ब्राह्मण भी केवल नामधारी हि है ।
गुरुशुश्रूषया विद्या पुष्कलेन धनेन वा ।
अथवा विद्यया विद्या चतुर्थी नोपलभ्यते ॥
गुरु की सेवा करके, अत्याधिक धन देकर, या विद्या के बदले में हि विद्या पायी जा सकती है; विद्या पानेका कोई चौथा उपाय नहि ।
विद्याभ्यास स्तपो ज्ञानमिन्द्रियाणां च संयमः ।
अहिंसा गुरुसेवा च निःश्रेयसकरं परम् ॥
विद्याभ्यास, तप, ज्ञान, इंद्रिय-संयम, अहिंसा और गुरुसेवा – ये परम् कल्याणकारक हैं ।
पठतो नास्ति मूर्खत्वं अपनो नास्ति पातकम् ।
मौनिनः कलहो नास्ति न भयं चास्ति जाग्रतः ॥
पढनेवाले को मूर्खत्व नहि आता; जपनेवाले को पातक नहि लगता; मौन रहनेवाले का झघडा नहि होता; और जागृत रहनेवाले को भय नहि होता ।
अर्थातुराणां न सुखं न निद्रा कामातुराणां न भयं न लज्जा ।
विद्यातुराणां न सुखं न निद्रा क्षुधातुराणां न रुचि न बेला ॥
अर्थातुर को सुख और निद्रा नहि होते; कामातुर को भय और लज्जा नहि होते । विद्यातुर को सुख व निद्रा, और भूख से पीडित को रुचि या समय का भान नहि रहेता ।
अनालस्यं ब्रह्मचर्यं शीलं गुरुजनादरः ।
स्वावलम्बः दृढाभ्यासः षडेते छात्र सद्गुणाः ॥
अनालस्य, ब्रह्मचर्य, शील, गुरुजनों के लिए आदर, स्वावलंबन, और दृढ अभ्यास – ये छे छात्र के सद्गुण हैं ।
अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम् ।
अधनस्य कुतो मित्रममित्रस्य कुतः सुखम् ॥
आलसी इन्सान को विद्या कहाँ ? विद्याविहीन को धन कहाँ ? धनविहीन को मित्र कहाँ ? और मित्रविहीन को सुख कहाँ ?
पुस्तकस्या तु या विद्या परहस्तगतं धनं ।
कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम् ॥
पुस्तकी विद्या और अन्य को दिया हुआ धन ! योग्य समय आने पर ऐसी विद्या विद्या नहीं और धन धन नहीं, अर्थात् वे काम नहीं आते ।