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नया मन्दिर बन रहा था, उस गाँव में वैसे ही बहुत मन्दिर थे! आदमियों को रहने की जगह नहीं है, भगवान के लिए मन्दिर बनते चले जाते हैं! और भगवान का कोई पता नहीं है कि वो रहने को कब आएँगे कि नहीं आएँगे, आएँगे भी कि नहीं आएँगे, उनका कुछ पता नहीं है.

नया मन्दिर बनने लगा तो मैंने उस मन्दिर को बनाने वाले कारीगरों से पूछा कि, “बात क्या है? बहुत मन्दिर हैं गाँव में, भगवान का कहीं पता नहीं चलता, और एक किसलिए बना रहे हो?”

बूढ़ा था कारीगर, अस्सी साल उसकी उम्र रही होगी, बामुश्किल मूर्ति खोद रहा था. उसने कहा कि, “आपको शायद पता नहीं कि मन्दिर भगवान के लिए नहीं बनाए जाते.”

मैंने कहा, “बड़े नास्तिक मालूम होते हो. मन्दिर भगवान के लिए नहीं बनाए जाते तो और किसके लिए बनाए जाते हैं?”

उस बूढ़े ने कहा, “पहले मैं भी यही सोचता था. लेकिन ज़िन्दगी भर मन्दिर बनाने के बाद इस नतीजे पे पहुँचा हूँ कि भगवान के लिए इस ज़मीन पर एक भी मन्दिर कभी नहीं बनाया गया.”

मैंने कहा, “मतलब क्या है तुम्हारा?”

उस बूढ़े ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा कि, “भीतर आओ.”

और बहुत कारीगर काम करते थे. लाख़ों रुपए का काम था. क्योंकि कोई साधारण आदमी मन्दिर नहीं बना रहा था. सबसे पीछे, जहाँ पत्थरों को खोदते कारीगर थे, उस बूढ़े ने ले जाके मुझे खड़ा कर दिया एक पत्थर के सामने और कहा कि, “इसलिए मन्दिर बन रहा है!”

उस पत्थर पर मन्दिर को बनाने वाले का नाम स्वर्ण-अक्षरों में खोदा जा रहा है.

उस बूढ़े ने कहा, ‘सब मन्दिर इस पत्थर के लिए बनते हैं. असली चीज़ ये पत्थर है, जिसपे नाम लिखा रहता है कि किसने बनवाया. मन्दिर तो बहाना है इस पत्थर को लगाने का. ये पत्थर असली चीज़ है, इसकी वजह से मन्दिर भी बनाना पड़ता है. मन्दिर तो बहुत महँगा पड़ता है, लेकिन इस पत्थर को लगाना है तो क्या करें, मन्दिर बनाना पड़ता है.”

मन्दिर पत्थर लगाने के लिए बनते हैं जिनपे खुदा है कि किसने बनाया! लेकिन मन्दिर बनाने वाले को शायद होश नहीं होगा कि ये मन्दिर भीड़ के चरणों में बनाया जा रहा है, भगवान के चरणों में नहीं. इसीलिए तो मन्दिर हिन्दू का होता है, मुसलमान का होता है, जैन का होता है. मन्दिर भगवान का कहाँ होता है?’

ओशो

(संभोग से समाधि की ओर)♣️

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દીકરી મારી લાડકવાઇ♥️*

*👩‍💼દીકરી👩‍💼*

એક નગરમાં રાજા એ
ફરમાન કરેલું કે
આ નગર ના કોઈ પુરુષે
કદી ખોંખારો ખાવો નહીં,
ખોંખારો ખાવો એ
મર્દનું કામ છે અને
આપણા નગર માં
મર્દ એકમાત્ર રાજા છે ?
બીજો કોઈ પણ
ખોંખારો ખાશે તો
તેણે એક સોના ની
ગીનિ નો દંડ ભરવો પડશે.
નગર માં સૌએ ખોંખારો
ખાવાનું બંધ કરી દીધું,
પણ એક મર્દ બોલ્યો
“ખોંખારો ખાવો એ તો
મર્દનો જન્મસિદ્ધ હક છે,
હું ખોંખારો ખાઈશ.”
તે મર્દ દરરોજ
રાજમહેલ પાસે થી
પસાર થાય, ખોંખારો ખાય
અને એક ગીનિનો દંડ
ચૂકવીને આગળ ચાલે,
બે-ત્રણ વરસ વીત્યાં,,
એક વખત તે મર્દ ત્યાંથી
ખોંખારો ખાધા વગર જ
ચૂપચાપ ચાલવા માંડ્યો,,
કોઈએ પૂછ્યું,
‘ભાઈ, શું થયું?
રૂપિયા ખૂટી પડ્યા કે
મર્દાનગી ઊતરી ગઈ?
આજે તમારો ખોંખારો
કેમ શાંત થઈ ગયો?’
પેલો મર્દ બોલ્યો,
‘આજે મારે ઘેર
દીકરી નો જન્મ થયો છે,
આપણા સમાજ માં
દીકરીના બાપને
*મર્દાનગી*
બતાવવાનું નથી શોભતું,
*દુનિયાના વહેવારો માં “*
*દીકરીના બાપે ખોંખારા નહીં,”*
*ખામોશી ખાવાની હોય છે,,*
મારી પાસે રૂપિયાય નથી ખૂટયા કે
મારી મર્દાનગી પણ
નથી ઊતરી ગઈ, પણ
*દીકરી ના બાપ ને “*
*ખોંખારા ન શોભે,”*
*ખાનદાની શોભે,*
મારે ઘેર દીકરી એ જન્મ લઈ ને
મારી ખુમારી ના માથે
ખાનદાનીનો મુગટ મૂક્યો છે !!
દીકરી ના બાપ થવા નું
સદભાગ્ય
*ભગવાન શંકર, “*
*રામ અને કૃષ્ણનેય નથી મળ્યું”*
કદાચ એટલે જ એમણે
*ત્રિશૂલ, ધનુષ્ય અને સુદર્શન ચક્ર “*
જેવાં હથિયારો
હાથમાં લેવાં પડ્યાં હશે,
શસ્ત્ર પણ શક્તિ છે,,
*શક્તિ સ્ત્રીલિંગ છે,*
દીકરી ની શક્તિ ન મળી હોય
તેણે શસ્ત્રથી ચલાવી લેવું પડે છે,
ભગવાન *મહાવીર* “ને
દીકરી હતી,,
એનું નામ *પ્રિયદર્શના “*
મહાવીરે શસ્ત્ર હાથ માં ન લીધું,
તેમણે જગતને
*કરુણા* નું
શાસ્ત્ર આપ્યું,,
સંસારને કાં તો
*શસ્ત્ર* જોઈએ કાં તો
*શાસ્ત્ર* જોઈએ.
*દીકરી હોય ત્યાં “*
*શસ્ત્ર ની ગરજ ટળી જાય,,,,,!!*
*🙋‍♂🌹👌🏼દીકરી મારી લાડકવાઇ♥️* આપણા પરીવારની દરેક દીકરીઓને સમર્પિત 👆🏼👑💐👏🏼

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संजय गुप्ता

(((( श्री श्वपच वाल्मीकि जी ))))
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श्वपच वाल्मीकि नामक एक भगवान् के बड़े भारी भक्त थे, वे अपनी भक्ति को गुप्त ही रखते थे।
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एक बार की बात है, धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर ने बड़ा भारी यज्ञ किया। उसमें इतने ऋषि-महर्षि पधारे कि सम्पूर्ण यज्ञ स्थल भर गया
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भगवान् श्रीकृष्ण ने वहां एक शंख स्थापित किया और कहा कि यज्ञ के सांगोपांग पूर्ण हो जाने पर यह शंख बिना बजाये ही बजेगा।
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यदि नहीं बजे तो समझिये कि यज्ञ में अभी कुछ त्रुटि है, यज्ञ पूरा नही हुआ। वही बात हुई।
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पूर्णाहुति, तर्पण, ब्राह्मण भोजन, दान-दक्षिणादि सभी कर्म विधिसमेत सम्पन्न हो गये, परंतु वह शंख नहीं बजा।
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तब सबको बड़ी चिन्ता हुई कि इतने श्रम के बाद भी यज्ञ पूर्ण नहीं हुआ। सभी लोगों ने भगवान् श्रीकृष्ण के पास आकर कहा कि
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प्रभो ! आप कृपा करके बताइये कि यज्ञ में कौन-सी कमी रह गयी है। भगवान् श्री कृष्ण बोले-शंख न बजने का रहस्य सुनिये
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यद्यपि ऋषियों के समूह से चारों दिशाएँ, सम्पूर्ण भूमि भर गयी है और सभी ने भोजन किया है, परंतु किसी रसिक वैष्णव सन्त ने भोजन नहीं किया है,
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यदि आप लोग यह कहें कि इन ऋषियों में क्या कोई भक्त नहीं है तो मैं ‘नही ’ कैसे कहूँ, अवश्य इन ऋषियों में बहुत उत्तम-उत्तम भक्त हैं,
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फिर भी मेरे हृदय की एक गुप्त बात यह है कि मैं सर्वश्रेष्ठ रसिक वैष्णव भक्त उसे मानता हूँ, जिसे अपनी जाति, विद्या, ज्ञान आदि का अहंकार बिल्कुल न हो और अपने जो दासों का दास मानता हो,
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यदि यज्ञ पूर्ण करने की इच्छा है तो ऐसे भक्त को लाकर जिमाइये।
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भगवान् की यह बात सुनकर युधिष्ठिर ने कहा – प्रभो ! सत्य है, पर ऐसा भगवद्भक्त हमारे नगर के आस-पास कहीं भी दिखायी नहीं देता है।
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जिसमें अहंकार की गन्ध न हो-ऐसा भक्त तो किसी दूसरे लोक में भले ही मिले।
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भगवान् ने कहा – नहीं, तुम्हारे नगर में ही रहता है। दिन-रात, प्रातः-सायं तुम्हारे यहाँ आता-जाता भी है, पर उस कोई जानता नहीं है और वह स्वयं अपने को प्रकट भी नहीं करता है।
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यह सुनकर सभी आश्चर्य से चौंक उठे और बोले-प्रभो ! कृपया शीघ्र ही बताइये, उनका क्या नाम है और कहाँ स्थान है ? जहाँ जाकर हम उनका दर्शन करके अपने को सौभाग्यशाली बनाये।
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भगवान् ने कहा – श्वपच भक्त वाल्मीकि के घर को चले जाओ, वे सर्वविकार रहित सच्चे साधु हैं।
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अर्जुन और भीमसेन दोनों ही भक्त वाल्मीकि जी को निमन्त्रण देने के लिये उनके घर जाने को तैयार हुए।
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जब भगवान् ने उन्हें सतर्क करते हुए हृदय की बात खोलकर कही- जाते तो हो पर सावधान रहना, भक्तों की भक्ति का भाव अत्यन्त दुर्लभ और गम्भीर है,
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उनको देखकर मन में किसी प्रकार का विकार न लाना, अन्यथा तुम्हारी भक्ति में दोष आ जायगा।
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दोनों ने भक्त वाल्मीकि के घर पहुँचकर उसके चारों ओर घूमकर उसकी प्रदक्षिणा की। आनन्द से झूमते हुए पृथ्वी पर पड़कर साष्टांग दण्डवत् प्रणाम किया ।
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भीतर जाकर देखा तो उनका उपासना गृह बड़ा सुन्दर था। वाल्मीकिजी ने जब दोनों राज-राजाओं को आया देख तो उन्होंने सब काम छोड़ दिये।
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लज्जा एवं संकोच वश काँपने लगे, उनका मन विह्नल हो गया।
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अर्जुन और भीमसेन ने सविनय निवेदन किया – भक्तवर ! कल आप हमारे घर पर पधारिये और वहाँ अपनी जूठन गिराकर हमारे पापग्रहों को दूर कीजिये। हम सबको परम भाग्यशाली बनाइये।
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दोनों को निमन्त्रण देते तथा अपनी बड़ाई करते हुए सुनकर वाल्मीकि जी कहने लगे
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अजी ! हम तो सदा से आपकी जूठन उठाते हैं और आपके द्वार पर झाडू लगाते हैं। मेरा निमन्त्रण कैसा ?
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पहले आप भोग भोजन कीजियेगा, फिर पीछे से हमें अपनी जूठन दीजियेगा।
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अर्जुन-भीमसेन ने कहा – आप यह क्या कह रहे हैं ? पहले आप भोजन कीजियेगा, फिर पीछे से हमें कराइयेगा।
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बिना आपको खिलाये हम लोग नहीं खायेंगे। दूसरी बात भूलकर भी मन में न सोचिये। वाल्मीकि जी ने कहा-बहुत अच्छी बात, यदि आपके मन में ऐसा है तो ऐसा ही होगा।
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अर्जुन और भीमसेन ने लौटकर राजा युधिष्ठिर से वाल्मीकि की सब बात कही, सुनकर युधिष्ठिर को श्वपच भक्त के प्रति बड़ा प्रेम हुआ।
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भगवान् श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को अच्छी प्रकार से सिखाया कि तुम सभी प्रकार के षट्रस व्यंजनों को अच्छी प्रकार से बनाओ।
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तुम्हारे हाथों की सफलता आज इसी में है कि भक्त के लिये सुन्दर रसोई तैयार करो।
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रसोई तैयार हो चुकने पर राजा युधिष्ठिर जाकर वाल्मीकि को लिवा लाये। उन्होंने कहा कि हमें बाहर ही बैठाकर भोजन करा दो।
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श्रीकृष्ण भगवान् ने कहा – हे युधिष्ठिर ! ये तो तुम्हारे भाई हैं, इन्हें सादर गोद में उठाकर स्वयं ले आओ।
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इस प्रकार उन्हें पाकशाला में लाकर बैठाया गया और उनके सामने सभी प्रकार के व्यंजन परोसे गये।
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रसमय प्रसाद का कौर लेते ही शंख बज उठा, परंतु थोड़ी देर बजकर फिर बन्द हो गया, तब भगवान् ने शंख को एक छड़ी लगायी।
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भगवान् ने शंख से पूछा – तुम भक्त के भोजन करने पर ठीक से क्यों नहीं बज रहे हो ?
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घबड़ाकर शंख बोला – आप द्रौपदी के पास जाकर उनसे पूछिये, आप मन से यह मान लीजिये कि मेरा कुछ भी दोष नहीं है।
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जब द्रौपदी से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि शंख का कथन सत्य है। भक्त जी खट्टे-मीठे आदि रसों के सभी व्यंजनों को एक में मिलाकर खा रहे हैं, इससे मेरी रसोई करने की चतुरता धूल में मिल गयी।
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अपनी पाकविद्या का निरादर देखकर मेरे मन में यह भाव आया कि आखिर हैं तो ये श्वपच जाति के ही, ये भला व्यंजनों का स्वाद लेना क्या जाने ?
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तब भगवान् ने सब पदार्थों को एक में मिलाकर खाने का कारण पूछा।
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भक्त श्वपच वाल्मीकि ने कहा कि इनका भोग तो आप पहले ही लगा चुके है, अतः पदार्थ बुद्धि से अलग-अलग स्वाद कैसे लूँ ?
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पदार्थ तो एक के बाद दूसरे रुचिकर और अरुचिकर लगेंगे। फिर इसमें प्रसाद बुद्धि कहां रहेगी ?
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मै तो प्रसाद का सेवन कर रहा हूँ, व्यंजनों को नहीं खा रहा हूँ। यह सुनकर भक्त वाल्मीकि में द्रौपदी का अपार सद्भाव हुआ।
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शंख जोरों से बजने लगा। लोग भक्त की जय-जयकार करने लगे।
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इस प्रकार यज्ञ पूर्ण हुआ और भक्त वाल्मीकि जी की महिमा का सबको पता चल गया।

Posted in संस्कृत साहित्य

नवदुर्गा*- एक स्त्री के पूरे जीवनचक्र का बिम्ब है नवदुर्गा के नौ स्वरूप !

  1. जन्म ग्रहण करती हुई कन्या “शैलपुत्री” स्वरूप है !
  2. कौमार्य अवस्था तक “ब्रह्मचारिणी” का रूप है !

  3. विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल होने से वह “चंद्रघंटा” समान है !

  4. नए जीव को जन्म देने के लिए गर्भ धारण करने पर वह “कूष्मांडा” स्वरूप है !

  5. संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री “स्कन्दमाता” हो जाती है !

  6. संयम व साधना को धारण करने वाली स्त्री “कात्यायनी” रूप है !

  7. अपने संकल्प से पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से वह “कालरात्रि” जैसी है !

  8. संसार (कुटुंब ही उसके लिए संसार है) का उपकार करने से “महागौरी” हो जाती है !

9 धरती को छोड़कर स्वर्ग प्रयाण करने से पहले संसार मे अपनी संतान को सिद्धि (समस्त सुख-संपदा) का आशीर्वाद देने वाली “सिद्धिदात्री” हो जाती है !
🙏🍁🙏🍁🙏🍁🙏

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ज्योति अग्रवाल

एक बार पिता और पुत्र जलमार्ग से यात्रा कर रहे थे, और दोनों रास्ता भटक गये. वे दोनों एक जगह पहुँचे, जहाँ दो टापू आस-पास थे. पिता ने पुत्र से कहा, अब लगता है हम दोनों का अंतिम समय आ गया है. दूर-दूर तक कोई सहारा नहीं दिख रहा है. अचानक उन्हें एक उपाय सूझा, अपने पुत्र से कहा कि वैसे भी हमारा अंतिम समय नज़दीक है तो क्यों न हम ईश्वर की प्रार्थना करें. उन्होने दोनों टापू आपस में बाँट लिए. एक पर पिता और एक पर पुत्र, और दोनों अलग-अलग ईश्वर की प्रार्थना करने लगे l

पुत्र ने ईश्वर से कहा, हे भगवन, इस टापू पर पेड़-पौधे उग जाए जिसके फल-फूल से हम अपनी भूख मिटा सकें. प्रार्थना सुनी गयी, तत्काल पेड़-पौधे उग गये और उसमें फल-फूल भी आ गये. उसने कहा ये तो चमत्कार हो गया. फिर उसने प्रार्थना की, एक सुंदर स्त्री आ जाए जिससे हम यहाँ उसके साथ रहकर अपना परिवार बसाएँ. तत्काल एक सुंदर स्त्री प्रकट हो गयी. अब उसने सोचा की मेरी हर प्रार्थना सुनी जा रही है, तो क्यों न हम ईश्वर से यहाँ से बाहर निकलने का रास्ता माँगे? उसने ऐसा ही किया उसने प्रार्थना की एक नाव आ जाए जिसमें सवार होकर हम यहाँ से बाहर निकल सकें तत्काल नाव प्रकट हुई, और पुत्र उसमें सवार होकर बाहर निकलने लगा l

तभी एक आकाशवाणी हुई, बेटा तुम अकेले जा रहे हो? अपने पिता को साथ नहीं लोगे? तो पुत्र ने कहा, उनको छोड़ो वो इसी लायक हैं, प्रार्थना तो उनने भी की, लेकिन आपने उनकी एक भी नहीं सुनी. शायद उनका मन पवित्र नहीं है, तो उन्हें इसका फल भोगने दो ना? आकाशवाणी कहती है – बेटा, क्या तुम्हें पता है, की तुम्हारे पिता ने क्या प्रार्थना की? पुत्र बोला नहीं. —– तो सुनो, तुम्हारे पिता ने एक ही प्रार्थना की, हे भगवन, मेरा बेटा आपसे जो माँगे, उसे दे देना…

🙏❣️ ओम शांति ❣️🙏

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ज्योति अग्रवाल

—– टूटी चप्पल —

“पता नहीं ये सामने वाला सेठ हफ्ते में 3-4 बार अपनी चप्पल कैसे तोड़ आता है?” मोची बुदबुदाया, नजर सामने की बड़ी किराना दूकान पर बैठे मोटे सेठ पर थी।
हर बार जब उस मोची के पास कोई काम ना होता तो उस सेठ का नौकर सेठ की टूटी चप्पल बनाने को दे जाता। मोची अपनी पूरी लगन से वो चप्पल सी देता की अब तो 2-3 महीने नहीं टूटने वाली। सेठ का नौकर आता और बिना मोलभाव किये पैसे देकर उस मोची से चप्पल ले जाता। पर 2-3 दिन बाद फिर वही चप्पल टूटी हुई उस मोची के पास पहुंच जाती।
आज फिर सुबह हुई, फिर सूरज निकला। सेठ का नौकर दूकान की झाड़ू लगा रहा था।
और सेठ……..
अपनी चप्पल तोड़ने में लगा था ,पूरी मश्शकत के बाद जब चप्पल न टूटी तो उसने नौकर को आवाज लगाई।
“अरे रामधन इसका कुछ कर, ये मंगू भी पता नहीं कौनसे धागे से चप्पल सिता है, टूटती ही नहीं।”
रामधन आज सारी गांठे खोल लेना चाहता था “सेठ जी मुझे तो आपका ये हर बार का नाटक समझ में नहीं आता। खुद ही चप्पल तोड़ते हो फिर खुद ही जुडवाने के लिए उस मंगू के पास भेज देते हो।”
सेठ को चप्पल तोड़ने में सफलता मिल चुकी थी। उसने टूटी चप्पल रामधन को थमाई और रहस्य की परते खोली… “देख रामधन जिस दिन मंगू के पास कोई ग्राहक नहीं आता उसदिन ही मैं अपनी चप्पल तोड़ता हूं… क्यों की मुझे पता है… मंगू गरीब है… पर स्वाभिमानी है, मेरे इस नाटक से अगर उसका स्वाभिमान और मेरी मदद दोनों शर्मिंदा होने से बच जाते है तो क्या बुरा है।”
आसमान साफ था पर रामधन की आँखों के बादल बरसने को बेक़रार थे।

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संजय गुप्ता

नाम-जपकी विधि………

‘कल्याण’ में एक लेख आया था‒एक गाँवमें रहनेवाले स्त्री-पुरुष थे । गँवार थे बिलकुल । पढ़े-लिखे नहीं थे ।

वे मालासे जप करते तो एक पावभर उड़दके दाने अपने पास रख लेते । एक माला पूरी होनेपर एक दाना अलग रख देते । ऐसे दाने पूरे होनेपर कहते कि मैंने पावभर भजन किया है

स्त्री कहती कि मैंने आधा सेर भजन किया, आधा सेर माला भजन किया । उनके यही संख्या थी । तो किसी तरह भगवान्का नाम जपे ।

अधिक-से-अधिक सेर, दो सेर भजन करो । यह भी भजन करनेका तरीका है । जब आप लग जाओगे तो तरीका समझमें आ जायगा ।

जैसे सरकार इतना कानून बनाती है फिर भी सोच करके कुछ-न-कुछ रास्ता निकाल ही लेते हो । भजनकी लगन होगी तो क्या रास्ता नहीं निकलेगा ।

लगन होगी तो निकाल लोगे । सरकार तो कानूनोंमें जकड़नेकी कमी नहीं रखती; फिर भी आप उससे निकलनेकी कमी नहीं रखते ।
कैसे-न-कैसे निकल ही जाते हैं ।
तो संसारसे निकलो भाई । यह तो फँसनेकी रीति है ।
भगवान के ध्यानमें घबराहट नहीं होती, ध्यानमें तो आनन्द आता है, प्रसन्नता होती है; पर जबरदस्ती मन लगानेसे थोड़ी घबराहट होती है
तो कोई हर्ज नहीं । भगवान से कहो‒ मन नहीं लगता ।’ कहते ही रहो,कहते ही रहो ।

एक सज्जनने कहा था‒कहते ही रहो ‘व्यापारीको ग्राहकके अगाड़ी और भक्तको भगवान्के अगाड़ी रोते ही रहना चाहिये कि क्या करें बिक्री नहीं होती, क्या करें पैदा नहीं होती ।’

ऐसे भक्तको भगवान के अगाड़ी ‘क्या करें, महाराज ! भजन नहीं होता है, हे नाथ ! मन नहीं लगता है ।’ ऐसे रोते ही रहना चाहिये ।

ग्राहकके अगाड़ी रोनेसे बिक्री होगी या नहीं होगी, इसका पता नहीं, पर भगवान्के अगाड़ी रोनेसे काम जरूर होगा । यह रोना एकदम सार्थक है ।

सच्ची लगन आपको बतायेगी कि हमारे भगवान् हैं और हम भगवान के हैं । यह सच्चा सम्बन्ध जोड लें । उसीकी प्राप्ति करना हमारा खास ध्येय है, खास लक्ष्य है ।

यह एक बन जायगा तो दूजी बातें आ जायँगी । बिना सीखे ही याद आ जायँगी, भगवान की कृपासे याद आ जायेंगी ।

जय जय श्रीराधे