Posted in रामायण - Ramayan

!! शबरी के पैरों की धूल !!

शबरी एक आदिवासी भील की पुत्री थी। देखने में बहुत साधारण, पर दिल से बहुत कोमल थी।

इनके पिता ने इनका विवाह निश्चित किया, लेकिन आदिवासियों की एक प्रथा थी की किसी भी अच्छे कार्य से पहले निर्दोष जानवरों की बलि दी जाती थी।

इसी प्रथा को पूरा करने के लिये इनके पिता शबरी के विवाह के एक दिन पूर्व सौ भेड़ बकरियाँ लेकर आये।

तब शबरी ने पिता से पूछा – पिताजी इतनी सारी भेड़ बकरियां क्यूँ लाये..?

पिता ने कहा – शबरी यह एक प्रथा है जिसके अनुसार कल प्रातः तुम्हारी विवाह की विधि शुरू करने से पूर्व इन सभी भेड़ बकरियों की बलि दी जायेगी। यह कहकर उसके पिता वहाँ से चले जाते हैं।

प्रथा के बारे में सुन शबरी को बहुत दुःख होता है और वो पूरी रात उन भेड़ बकरियों के पास बैठी रही और उनसे बातें करती रही। उसके मन में एक ही विचार था कि कैसे वो इन निर्दोष जानवरों को बचा पाये।

तब ही एकाएक शबरी के मन में ख्याल आता है और वो सुबह होने से पूर्व ही अपने घर से भाग कर जंगल चली गई जिससे वो उन निर्दोष जानवरों को बचा सके।

शबरी भली भांति जानती थी, अगर एक बार वो इस तरह से घर से जायेगी तो कभी उसे घर वापस आने का मौका नहीं मिलेगा फिर भी शबरी ने खुद से पहले उन निर्दोषों की सोची।

घर से निकल कर शबरी एक घने जंगल में जा पहुँची। अकेली शबरी जंगल में भटक रही थी तब उसने शिक्षा प्राप्ति के उद्देश्य से कई गुरुवरों के आश्रम में दस्तक दी, लेकिन शबरी तुच्छ जाति की थी इसलिये उसे सभी ने धुत्कार के निकाल दिया।

शबरी भटकती हुई मतंग ऋषि के आश्रम पहुंची और उसने अपनी शिक्षा प्राप्ति की इच्छा व्यक्त की। मतंग ऋषि ने शबरी को सहर्ष अपने गुरुकुल में स्थान दे दिया।

अन्य सभी ऋषियों ने मतंग ऋषि का तिरस्कार किया लेकिन मतंग ऋषि ने शबरी को अपने आश्रम में स्थान दिया।

शबरी ने गुरुकुल के सभी आचरणों को आसानी से अपना लिया और दिन रात अपने गुरु की सेवा में लग गई।

शबरी जतन से शिक्षा ग्रहण करने के साथ- साथ आश्रम की सफाई, गौ शाला की देख रेख, दूध दोहने के कार्य के साथ सभी गुरुकूल के वासियों के लिये भोजन बनाने के कार्य में लग गई। कई वर्ष बीत गये, मतंग ऋषि शबरी की गुरु भक्ति से बहुत प्रसन्न थे।

मतंग ऋषि का शरीर दुर्बल हो चूका था इसलिये उन्होंने एक दिन शबरी को अपने पास बुलाया और कहा- पुत्री मेरा शरीर अब दुर्बल हो चूका है, इसलिये मैं अपनी देह यहीं छोड़ना चाहता हूँ, लेकिन उससे पहले मैं तुम्हें आशीर्वाद देना चाहता हूँ बोलो पुत्री तुम्हें क्या चाहिये..?

आँखों में आसूं भरकर शबरी मतंग ऋषि से कहती है – हे गुरुवर आप ही मेरे पिता है, मैं आपके कारण ही जीवित हूँ, आप मुझे अपने साथ ही ले जाये।

तब मतंग ऋषि ने कहा- नहीं पुत्री तुम्हें मेरे बाद मेरे इस आश्रम का ध्यान रखना है। तुम जैसी गुरु परायण शिष्या को उसके कर्मो का उचित फल मिलेगा।

एक दिन भगवान राम तुम से मिलने यहाँ आयेंगे और उस दिन तुम्हारा उद्धार होगा और तुम्हे मोक्ष की प्राप्ति होगी। इतना कहकर मतंग ऋषि अपनी देह त्याग कर समाधि ले लेते हैं।

उसी दिन से शबरी हर रोज प्रातः उठकर बाघ जाती, ढेर सारे फल इकठ्ठा करती, सुंदर- सुंदर फूलों से अपना आश्रम सजाती क्यूंकि उसे भगवान राम के आने का कोई निश्चित दिन नहीं पता था। उसे केवल अपने गुरुवर की बात पर यकीन था, इसलिये वो रोज श्री राम के इंतजार में समय बिता रही थी। वो रोजाना यही कार्य करती थी।

एक दिन शबरी आश्रम के पास के तालाब में जल लेने गई, वहीं पास में एक ऋषि तपस्या में लीन थे। जब उन्होंने शबरी को जल लेते देखा तो उसे अछूत कहकर उस पर एक पत्थर फेंक कर मारा और उसकी चोट से बहते रक्त की एक बूंद से तालाब का सारा पानी रक्त में बदल गया…!!

यह देखकर संत शबरी को बुरा भला और पापी कहकर चिल्लाने लगा। शबरी रोती हुई अपने आश्रम में चली गई।

उसके जाने के बाद ऋषि फिर से तप करने लगा उसने बहुत से जतन किये लेकिन वो तालाब में भरे रक्त को जल नहीं बना पाएं। उसमे गंगा, यमुना सभी पवित्र नदियों का जल डाला गया लेकिन रक्त जल में नहीं बदला।

कई वर्षों बाद, जब भगवान राम सीता की खोज में वहां आये तब वहाँ के लोगो ने भगवान राम को बुलाया और आग्रह किया कि वे अपने चरणों के स्पर्श से इस तालाब के रक्त को पुनः जल में बदल दें।

राम उनकी बात सुनकर तालाब के रक्त को चरणों से स्पर्श करते हैं लेकिन कुछ नहीं होता। ऋषि उन्हें जो – जो करने बोलते हैं, वे सभी करते हैं लेकिन रक्त जल में नहीं बदला।

तब राम ऋषि से पूछते हैं – हे ऋषिवर मुझे इस तालाब का इतिहास बताये। तब ऋषि उन्हें शबरी और तालाब की पूरी कथा बतातें हैं और कहते हैं – हे भगवान यह जल उसी शुद्र शबरी के कारण अपवित्र हुआ है।

तब भगवान श्रीराम ने दुखी होकर कहा – हे गुरुवर, यह रक्त उस देवी शबरी का नहीं मेरे ह्रदय का है जिसे तुमने अपने अप शब्दों से घायल किया है…!!

भगवान राम ऋषि से आग्रह करते हैं कि मुझे देवी शबरी से मिलना है। तब शबरी को बुलावा भेजा जाता है। राम का नाम सुनते ही शबरी दौड़ी चली आती है।

‘राम मेरे प्रभु’ कहती हुई जब वो तालाब के समीप पहुँचती है तब उसके पैर की धूल तालाब में चली जाती है और तालाब का सारा रक्त जल में बदल जाता है।

तब भगवान राम कहते हैं – देखिये गुरुवर आपके कहने पर मैंने सब किया लेकिन यह रक्त भक्त शबरी के पैरों की धूल से जल में बदल गया।

शबरी जैसे ही भगवान राम को देखतीं हैं उनके चरणों को पकड़ लेती हैं और अपने साथ आश्रम लाती हैं। उस दिन भी शबरी रोज की तरह सुबह से अपना आश्रम फूलों से सजाती हैं और बाग से चख- चख कर सबसे मीठे बेर अपने प्रभु राम के लिये चुनतीं हैं।

वो पुरे उत्साह के साथ अपने प्रभु राम का स्वागत करती हैं और बड़े प्रेम से उन्हें अपने जूठे बेर परौसती हैं। भगवान राम भी बहुत प्रेम से उसे खाने उठाते हैं,

तब उनके साथ गये लक्ष्मण उन्हें रोककर कहते हैं – भ्राता ये बेर जूठे हैं। तब राम कहते हैं – लक्ष्मण यह बेर जूठे नहीं सबसे मीठे हैं, क्यूंकि इनमे प्रेम हैं और वे बहुत प्रेम से उन बेरों को खाते हैं।

मतंग ऋषि का कथन सत्य होता है और देवी शबरी को मोक्ष की प्राप्ति होती है। और इस तरह भगवान राम, शबरी के राम कहलाये। 👏 !! जय जय सियाराम !! 👏

Posted in खान्ग्रेस

विषैला_वामपंथी 📣

अगर किसी पुस्तक का लेखक
रोमिला थापर और रामचन्द्र गुहा है तो
समझ लीजिए उसमें लिखीं बातें 100% झूठी है।

क्या आपको मालूम है कि
रोमिला थापर नेहरू खानदान की ही एक कड़ी है..?? अरे कांग्रेस की वही अद्भुत विद्वान इतिहासकार
जिन्होंने अपने एक लेख में लिखा है की

“सम्राट अशोक से प्रेरित होकर
सिंहासन त्यागना चाहते थे युधिष्ठिर !”

रोमिला थापर का चचेरा भाई है करण थापर,
वही मशहूर पत्रकार
जिसके बयान को आधार बना कर
पाकिस्तान ने
कुलभूषण जाधव को रॉ का एजेंट बताया था।

कांग्रेस ने अपने खानदान के
कैसे- कैसे लोगों को हमारे ऊपर थोपा हैं!

ये दोनों भाई बहन
खुशवन्त सिंह के खानदान (शोभा सिंह) से जुड़ा है,
जो भगत सिंह की फांसी के मुख्य गवाह था
और इसके दादा ने
पजांब के गवर्नर सर मैकल ओ-ड्वायर के फंड में
1.75 लाख रुपये चंदा दिया था।
ड्वायर वही व्यक्ति था
जिसने जलियांवाला बाग नरसंहार के दौरान
ब्रिगेडियर जनरल रेनॉल्ट डायर पर
कार्रवाई का बचाव किया

ब्रिटिश सरकार के प्रति अपनी वफादारी के लिए
कुंज बिहारी थापर
1920 में ब्रिटिश साम्राज्य से पुरस्कृत भी हुआ था…!!

करण थापर के पिता
जनरल प्राण नाथ थापर
भारत के एक मात्र ऐसा सेना प्रमुख था
जिसने युद्ध हारा था।
1962 में चीन से लड़ाई हारने के कारण ही
उसे 19 नवंबर 1962 को अपमानित होकर
जबरन इस्तीफा देना पड़ा था।

1936 में प्राण नाथ थापर ने
गौतम सहगल की बहन
बिमला बशिराम सहगल से शादी की थी।
1944 में गौतम सहगल की नयनतारा सहगल से
शादी हुई,
नयनतारा सहगल अंग्रेजी लेखिका है।
नयनतारा सहगल जवाहरलाल नेहरू की बहन
विजया लक्ष्मी की तीन बेटियों में से दूसरी बेटी थी…!!

अब समझ मे आया कि
भारत का वामपंथी इतिहास किसके इशारों पर रचित हुआ ??
R.D. Amrute

ध्यान से कडी जोडते जाइए
समझ में आएगा कि नेहरू का खानदान
जो पहले अंग्रेजों के साथ था।
अमरिंदर सिंह से लेकर दिग्विजय सिंह के खानदान तक।
से लेकर

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भाग्य और भक्ति …..!!
एक समय महात्मा जगन्नाथ दास जी ने पुरी की यात्रा की।
उन दिनों आजकल की सी सवारियों का प्रबंध नहीं था, वह वृद्ध थे, किसी तरह गिरते-पड़ते, चलते-फिरते किसी तरह वह पुरी पहुंचे।
जलवायु बदला, भोजन का भी ठीक प्रबंध नहीं हो सका, अजीर्ण रोग ने आ घेरा।
जहाँ तक हो सका सावधानी करते रहे पर साधू का कौन ठौर ठिकाना, जो मिला उससे उदर पूर्ति कर ली।
जिसने आदर सहित बुलाया उसी की भिक्षा ग्रहण कर ली, कभी मंदिर से प्रसाद पा लिया।
कुछ दिन पीछे ही उनको दस्त लगने लगे, जब तक साधारण स्थिति रही सहन करते रहे, बाद में रोग बढ़ जाने पर समुद्र के किनारे चले गए और वहीँ एकांत में पड़े रहे।
दस्त में कमजोरी आती ही है, बूढ़े थे बेहोश हो गए, कपड़ों में ही मल-मूत्र करने लगे, मखियाँ भिनकने लगीं, जो आता दूर से ही देखकर लौट जाता।
कोई पूछने वाला नहीं था कि यह मरने वाला कौन है, कहाँ से आया है, इसको औषधि की भी आवश्यकता है या नहीं।
महात्मा जगन्नाथ दास जी की ऐसी दीन दशा देखकर प्रभु जगन्नाथ को दया आई।
भगवान जगन्नाथ दस वर्ष के बालक का रूप धारण कर अपने भक्त के समीप पहुंचे, उसके कपड़े बदले, उनको अपने कर-कमलों से शौच कराया।
मल मूत्र के वस्त्रों को ले जाकर समुद्र में धोया, धूप में सुखाया।
जब तक वह कपड़े भी खराब हो गए, अब इन्हें फिर बदला और धोया सुखाया।
कई दिन व्यतीत हो गए, जगन्नाथ दास को कुछ खबर नहीं कि मेरी सेवा कौन कर रहा है।
जगन्नाथ जी को कुछ होश आया, आँख खोली तो देखा, एक बालक सब तरह की सेवा कर रहा है।
उठने बोलने की सामर्थ्य नहीं थी, चुप रह गए और मन ही मन में उसकी प्रशंसा करने लगे और उसे धन्यवाद देने लगे।
दो तीन दिन और ऐसे ही कटे, अब शरीर में कुछ बल आया।
महात्मा जगन्नाथ दास जी उठे, सहारे से घिसटते जल तक पहुंचे स्नान किया।
शुद्ध धुले हुए वस्त्र, जो लड़के ने पहले से ही तैयार कर रखे थे, बदले।
भजन और नित्य कर्म की सामर्थ्य नहीं रही, एक शुद्ध स्थान पर सघन वृक्ष तले आकर लेट गए।
बच्चा कहीं से जलपान ले आया, वह खाया और आराम करने लगे, ऐसे ही कई और दिन बीते।
अब जगन्नाथ जी का स्वास्थ्य ठीक हो चला है, वह चलने फिरने लगे हैं।
दस्त बंद है, भूख भी लगने लगी है, कुछ खा भी लेते हैं, पर अभी पूरे निरोग नहीं हुए। निर्बलता बाकी है, लेकिन संध्या नियम उनका शुरू हो गया है।
प्रातः काल का समय था, भक्त जी स्नान कर पूजा करने बैठे थे, ध्यान में डूब गए, मस्ती छा गई, तन-बदन भूल गए, सुध-बुध जाती रही।
उस दशा में बालक के शरीर में उनको भगवान के रूप के दर्शन हुए।
महात्मा जगन्नाथ दास जी घबरा गए, आँख खोल दी, रोने लगे और जल्दी से उठकर अपने सेवक बालक के चरणों में लोट गए।
जगन्नाथ दास जी क्षमा याचना करने लगे, तरह-तरह की विनती करने लगे:-
प्रभु इस अधम के लिए आप ने इतना कष्ट उठाया, माता की तरह मल मूत्र साफ किये।
इस पापी को मर जाने देते, इस अपराधी को दुःख झेलने देते, यह दुष्ट इसी योग्य था कि इसे दंड मिलता।
आपने क्यों इतनी दया की, क्यों इसकी खबर ली, अब इसका प्रायश्चित मैं कैसे करूँ, इसका बदला मैं कैसे चुकाऊँ, किन शब्दों में आपकी विनती करूँ?
मैं कर्त्तव्यविमूढ़ हो रहा हूँ, क्या करूँ कुछ समझ में नहीं आ रहा, हे जगतपति, क्षमा करो, क्षमा करो…!!!
का मुख ले विनती करूँ, लाज आवत है मोहि।
तुम देखत अवगुण किये, कैसे भाऊँ तोही॥
हे हरी, आप सर्वशक्तिमान हैं, सर्व सामर्थ्यवान हैं, सर्वोपरि हैं, आप चाहते तो दूर रहते हुए ही इस व्यथा को दूर कर सकते थे।
आप वैकुण्ठ में बैठे हुए ही एक दृष्टि से इस विपदा को काट सकते थे, यहाँ क्यों पधारे, क्यों इस दास के लिए इतनी चिंता की?
प्रभु बोले:- हम भक्तन के भक्त हमारे, प्यारे जगन्नाथ, मुझसे भक्तों के दुःख नहीं देखे जाते, मुझसे उनकी विपत्तियां नहीं सही जाती।
मैं भक्तों को सुख देने के लिए सर्वदा तैयार रहता हूँ, मैं उनके लिए सब कुछ कर सकता हूँ, इसमें मुझको आनंद आता है, ऐसा करते हुए मुझे खुशी होती है।
मैं भक्तों से दूर किसी और स्थान पर नहीं रहता, मैं सदा उनके समीप ही रहता हूँ, उनके स्थान में ही चक्कर लगाया करता हूँ।
तेरा कष्ट मुझसे सहन नहीं हो सका, मैंने प्रगट हो तुझे आराम पहुँचाने की कोशिश की, इसमें कोई बड़ा काम मैंने नहीं किया केवल अपने कर्त्तव्य का पालन किया है।
भगवान ने आगे कहा:- प्रेम सब कुछ करा लेता है, तू मुझे प्यारा है, इसलिए मैंने ऐसा किया है।
इसके लिए तू किसी प्रकार की चिंता मत कर, हृदय में क्षोभित मत हो।
हाँ, एक बात जो तूने कही कि वहाँ बैठे हुए ही इस रोग को दूर कर सकते थे, सो हे भ्राता, यह मेरे अधिकार से बाहर की बात है।
प्रारब्ध का भोग अवश्य भोगना पड़ता है, कर्म बिना भोगे नहीं कटता, यह प्रकृति का नियम है, मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता।
प्राणी जो कुछ सुख-दुःख उठाता है, कर्मानुसार ही उसे मिलता है, जगत में कर्म ही प्रधान है।
हाँ, जो भजन करने वाले हैं, जो निरंतर सच्चे हृदय से मेरी भक्ति में रत रहने वाले हैं, उनके कष्टों को मैं कुछ हल्का और सुलभ कर देता हूँ।
कठिन विपत्ति के समय अपने सेवकों की मैं सहायता कर देता हूँ, यही मेरी दया है।
कर्मों को बिना भोगे आत्मा शुद्ध नहीं होती, संस्कार आत्मा के ऊपर लिपटे रहते हैं और पर्दा बन के प्राणी को मुझसे दूर किये रहते हैं।
कर्मों को भोगने से यह आवरण हट जाते हैं और मैं उन्हें समीप ही दिखाई देने लगता हूँ।
फिर ऐसा निर्मल चित्त वाले भक्त में और मुझमें भेद नहीं रहता, वह मेरे हो जाते हैं और मैं उनका हो जाता हूँ।
ऐसा उपदेश देकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए।
इसके बाद महात्मा जगन्नाथ जी का आगे का जीवन कैसे कटा, कहाँ रहे, इससे ना कोई संबंध है और ना हमको मालूम है, पर यह कथा तीन बातों का सबक हमें दे रही है।
पहली बात:-
कर्म के भोग को परमात्मा भी नहीं टाल सकता, वह भोगकर ही कट सकता है, उसका भोगना अपने लिए ही लाभदायक होता है।
बिना भोगे न तो आवरण हटते हैं, न संस्कार क्षय होते हैं, और न हृदय शुद्ध व निर्मल बनता है।
कठोर हृदय भजन के योग्य नहीं होता, नरम हृदय आदमी ही इस दौलत का हक़दार होता है।
अब दूसरी बात सुनो:-
मूर्ख और दुष्ट प्रकृति के मनुष्य विपत्ति के समय ईश्वर को कोसते हैं, उसे गलियां देते हैं, पर यह नहीं सोचते कि यह उन्हीं के किए हुए कर्मों का फल उन्हें मिल रहा है।
इसमें ईश्वर का क्या अपराध हुआ कि उसके सिर दोष मढते हो?
ईश्वर तो तुम्हें सुख में रखना चाहता था, परन्तु तुमने अपने आप अपने लिये कुआँ खोदा और उसमें गिर पड़े, इसमें दूसरे को दोष क्यों देते हो?
अपनी मूर्खता पर पछताओ, आगे उसे दूर करने का प्रयत्न करो, सदाचारी जीवन बनाओ, सत्कर्मी बनो, निषेध कर्मों को त्याग दो, राग-द्वेष को दूर हटाकर सबके साथ प्रेम का बर्ताव करो, फिर देखो, तुम सुखी रहते हो या नहीं।
अब तीसरी बात:-
ऐसी बातें कई तार्किक कहने लगते हैं कि जब कर्म का फल हमें भोगना ही है तो भजन से क्या लाभ?
क्यों भजन और पूजा में समय नष्ट करें, वृथा क्यों परिश्रम उठाएं? ईश्वर हमें क्या दे देगा, हम जैसा करेंगे वैसा भोगेंगे।
इसका समाधान भी इस कथा में हुआ है, वह यह है कि भोग तो आयेगा और वह भोगने से ही कटेगा, पर जो भजन करने वाले हैं, भगवान के सच्चे भक्तों में हैं, और साथ ही शुद्ध चरित्र और कोमल स्वभाव हैं, उन्हें कठिन विपत्ति के समय एक गुप्त सहायता ऐसी मिलती है जिससे वह कष्ट तीव्र और भारी न रहके सूक्ष्म और हल्का हो जाता है।
उस मनुष्य के अंदर एक ऐसी शक्ति का संचालन रहता है कि जो उसे शांत और प्रसन्न रखती है।
इस आनंद में कठिनाई आती है और चली जाती है, उसे कोई विशेष अनुभव भी नहीं होने पाता बस, इतना ही भजन का प्रताप है, और भजन करने वालों और साधारण लोगों में यही भेद है।

अनिल पढियार

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80 साल की उम्र के राजपूत राजा छत्रसाल जब मुगलों से घिर गए, और बाकी राजपूत राजाओं से कोई उम्मीद ना थी तो उम्मीद का एक मात्र सूर्य था “ब्राह्मण बाजीराव पेशवा” एक राजपुत ने एक ब्राह्मण को खत लिखा:-

जो गति ग्राह गजेंद्र की सो गति भई है आज!

बाजी जात बुन्देल की बाजी राखो लाज!

(जिस प्रकार गजेंद्र हाथी मगरमच्छ के जबड़ो में फंस गया था ठीक वही स्थिति मेरी है, आज बुन्देल हार रहा है, बाजी हमारी लाज रखो)।

ये खत पढ़ते ही बाजीराव खाना छोड़कर उठ गए। उनकी पत्नी ने कहा खाना तो खा लीजिए। तब बाजीराव ने कहा ‘अगर मुझे पहुँचने में देर हो गई तो इतिहास लिखेगा कि एक क्षत्रिय राजपूत ने मदद मांगी और ब्राह्मण भोजन करता रहा।” ऐसा कहते हुए भोजन की थाली छोड़कर बाजीराव अपनी सेना के साथ राजा छत्रसाल की मदद को बिजली की गति से दौड़ पड़े।

दस दिन की दूरी बाजीराव ने केवल 500 घोड़ों के साथ 48 घंटे में पूरी की, बिना रुके, बिना थके। ब्राह्मण योद्धा बाजीराव बुंदेलखंड आया और बंगस खान की गर्दन काट कर जब राजपूत राजा छत्रसाल के सामने गए तो छत्रसाल से बाजीराब बलाड़ को गले लगाते हुए कहा:-

जग उपजे दो ब्राह्मण: परशु ओर बाजीराव।

एक डाहि राजपुतिया, एक डाहि तुरकाव।।

(धरती पर 2 ही ब्राह्मण आये है एक परशुराम जिसने अहंकारी क्षत्रियों का मर्दन किया और दूसरा बाजीराव जिसने मलेछ जिहादी मुगलो का सर्वनाश किया है

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रात्रि के अंतिम प्रहर में एक बुझी हुई चिता की भस्म पर अघोरी ने जैसे ही आसन लगाया, एक प्रेत ने उसकी गर्दन जकड़ ली और बोला- मैं जीवन भर विज्ञान का छात्र रहा और जीवन के उत्तरार्ध में तुम्हारे पुराणों की विचित्र कथाएं पढ़कर भ्रमित होता रहा। यदि तुम मुझे पौराणिक कथाओं की सार्थकता नहीं समझा सके तो मैं तुम्हे भी इसी भस्म में मिला दूंगा।

अघोरी बोला- एक कथा सुनो, रैवतक राजा की पुत्री का नाम रेवती था। वह सामान्य कद के पुरुषों से बहुत लंबी थी, राजा उसके विवाह योग्य वर खोजकर थक गये और चिंतित रहने लगे। थक-हारकर वो योगबल के द्वारा पुत्री को लेकर ब्रह्मलोक गए। राजा जब वहां पहुंचे तब गन्धर्वों का गायन समारोह चल रहा था, राजा ने गायन समाप्त होने की प्रतीक्षा की।

गायन समाप्ति के उपरांत ब्रह्मदेव ने राजा को देखा और पूछा- कहो, कैसे आना हुआ?

राजा ने कहा- मेरी पुत्री के लिए किसी वर को आपने बनाया अथवा नहीं?

ब्रह्मा जोर से हंसे और बोले- जब तुम आये तबतक तो नहीं, पर जिस कालावधि में तुमने यहाँ गन्धर्वगान सुना उतनी ही अवधि में पृथ्वी पर २७ चतुर्युग बीत चुके हैं और २८ वां द्वापर समाप्त होने वाला है, अब तुम वहां जाओ और कृष्ण के बड़े भाई बलराम से इसका विवाह कर दो, अच्छा हुआ की तुम रेवती को अपने साथ लाए जिससे इसकी आयु नहीं बढ़ी।

इस कथा का वैज्ञानिक संदर्भ समझो- आर्थर सी क्लार्क ने आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी की व्याख्या में एक पुस्तक लिखी है- मैन एंड स्पेस, उसमे गणना है की यदि 10 वर्ष का बालक यदि प्रकाश की गति वाले यान में बैठकर एंड्रोमेडा गैलेक्सी का एक चक्कर लगाये तो वापस आनेपर उसकी आयु ६६ वर्ष की होगी पर धरती पर 40 लाख वर्ष बीत चुके होंगे। यह आइंस्टीन की time dilation theory ही तो है जिसके लिए जॉर्ज गैमो ने एक मजाकिया कविता लिखी थी-

There was a young girl named Miss Bright,

Who could travel much faster than light

She departed one day in an Einstein way

And came back previous night

प्रेत यह सुनकर चकित था, बोला- यह कथा नहीं है, यह तो पौराणिक विज्ञान है, हमारी सभ्यता इतनी अद्भुत रही है, अविश्वसनीय है। तभी तो आइंस्टीन पुराणों को अपनी प्रेरणा कहते थे।

अघोरी मुस्कुराता रहा और प्रेत वायु में विलीन हो गया।

हम विश्व की सबसे उन्नत संस्कृति हैं यह विश्वास मत खोना।

दिनेश सिंह हिसामपुर डोभी केराकत जौनपुर उत्तर प्रदेश

रात्रि के अंतिम प्रहर में एक बुझी हुई चिता की भस्म पर अघोरी ने जैसे ही आसन लगाया, एक प्रेत ने उसकी गर्दन जकड़ ली और बोला- मैं जीवन भर विज्ञान का छात्र रहा और जीवन के उत्तरार्ध में तुम्हारे पुराणों की विचित्र कथाएं पढ़कर भ्रमित होता रहा। यदि तुम मुझे पौराणिक कथाओं की सार्थकता नहीं समझा सके तो मैं तुम्हे भी इसी भस्म में मिला दूंगा।

अघोरी बोला- एक कथा सुनो, रैवतक राजा की पुत्री का नाम रेवती था। वह सामान्य कद के पुरुषों से बहुत लंबी थी, राजा उसके विवाह योग्य वर खोजकर थक गये और चिंतित रहने लगे। थक-हारकर वो योगबल के द्वारा पुत्री को लेकर ब्रह्मलोक गए। राजा जब वहां पहुंचे तब गन्धर्वों का गायन समारोह चल रहा था, राजा ने गायन समाप्त होने की प्रतीक्षा की।

गायन समाप्ति के उपरांत ब्रह्मदेव ने राजा को देखा और पूछा- कहो, कैसे आना हुआ?

राजा ने कहा- मेरी पुत्री के लिए किसी वर को आपने बनाया अथवा नहीं?

ब्रह्मा जोर से हंसे और बोले- जब तुम आये तबतक तो नहीं, पर जिस कालावधि में तुमने यहाँ गन्धर्वगान सुना उतनी ही अवधि में पृथ्वी पर २७ चतुर्युग बीत चुके हैं और २८ वां द्वापर समाप्त होने वाला है, अब तुम वहां जाओ और कृष्ण के बड़े भाई बलराम से इसका विवाह कर दो, अच्छा हुआ की तुम रेवती को अपने साथ लाए जिससे इसकी आयु नहीं बढ़ी।

इस कथा का वैज्ञानिक संदर्भ समझो- आर्थर सी क्लार्क ने आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी की व्याख्या में एक पुस्तक लिखी है- मैन एंड स्पेस, उसमे गणना है की यदि 10 वर्ष का बालक यदि प्रकाश की गति वाले यान में बैठकर एंड्रोमेडा गैलेक्सी का एक चक्कर लगाये तो वापस आनेपर उसकी आयु ६६ वर्ष की होगी पर धरती पर 40 लाख वर्ष बीत चुके होंगे। यह आइंस्टीन की time dilation theory ही तो है जिसके लिए जॉर्ज गैमो ने एक मजाकिया कविता लिखी थी-

There was a young girl named Miss Bright,

Who could travel much faster than light

She departed one day in an Einstein way

And came back previous night

प्रेत यह सुनकर चकित था, बोला- यह कथा नहीं है, यह तो पौराणिक विज्ञान है, हमारी सभ्यता इतनी अद्भुत रही है, अविश्वसनीय है। तभी तो आइंस्टीन पुराणों को अपनी प्रेरणा कहते थे।

अघोरी मुस्कुराता रहा और प्रेत वायु में विलीन हो गया।

हम विश्व की सबसे उन्नत संस्कृति हैं यह विश्वास मत खोना।

दिनेश सिंह हिसामपुर डोभी केराकत जौनपुर उत्तर प्रदेश

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रावी नदी के ऊपर बना हुआ पुल पंजाब और जम्मू कश्मीर राज्य को जोड़ता है। हजारों सवारी गाड़ियाँ , हजारों लोग रोजाना गुजरते हैं उस पुल के उपर से होकर… बिना किसी परमिट के , बिना किसी अनुमति पत्र के।

परंतु बात उन दिनों की है जब जम्मू कश्मीर राज्य में प्रवेश करने के लिए परमिट लेना अनिवार्य था।
ऐसे में माँ भारती का एक सपूत डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने परमिट व्यवस्था को समाप्त कराने का प्रण लिया था।

उन्होंने नेहरू जी से एक सवाल किया था — “जब आप कहते हो कि जम्मू कश्मीर का भारत में 100% विलय हो चुका है तो फिर ये परमिट क्यों ? “

नेहरू निरूत्तर हो गये थे…….

इसके पहले मुखर्जी ने एक सभा में सिंह गर्जना करते हुए कहा था — ” जम्मू काश्मीर में एक निशान , एक विधान और एक प्रधान होना चाहिए , और इसे लागू करवाने के लिए यदि मेरे प्राण भी चले जाएँ तो मैं सहर्ष तैयार हूँ। “

मई 1953 में परमिट व्यवस्था के खिलाफ राज्य में बिना परमिट लिए प्रवेश करने का उन्होंने निर्णय किया।

8 मई को वे दिल्ली से एक पैसेंजर ट्रेन से माधोपुर (पंजाब) के लिए निकले , रास्ते में ट्रेन जहाँ भी रूकती, हजारों की संख्या में लोग उस योद्धा के दर्शन के लिए आते ।

… माधोपुर में बीस हजार लोग उनके स्वागत के लिए खड़े थे । उन्हें संबोधित करने के बाद वे कुछ साथियों के साथ आगे बढ़े।

जैसे ही रावी के पुल के आधे हिस्से को पार किया, पुलिस ने उनसे कहा — ” मि. मुखर्जी , यू आर अंडर अरेस्ट ,,, आप कश्मीर में बिना परमिट के नहीं जा सकते हैं।”
मुखर्जी साहब ने मुस्कराते हुए अटल जी की तरफ देखा और कहा – ” गो एंड टेल द पिपल आॅफ इंडिया, आई हैव एंटर्ड जम्मू एंड कश्मीर”

अटल जी की आँखें नम थीं।

मुखर्जी साहब ने हाथ में लिए तिरंगे को जेब में डाला और दूसरा हाथ अटल जी के कंधे पर रखते हुए कहा – ” मेरे साथ यह तिरंगा भी बिना परमिट के कश्मीर जा रहा है … जाओ यह खुशखबरी लोगों को दे देना।”
मुखर्जी साहब को गिरफ्तार करके कश्मीर ले जाया गया , एक छोटे से कमरे में कैद करके रखा गया …जहाँ बुनियादी सुविधाओं का नितांत अभाव था।
चालीस दिनों के बाद जून 1953 में देश के इस महान सपूत ने संदेहास्पद परिस्थितियों में अपने नश्वर शरीर का त्याग कर दिया।

मुखर्जी साहब का यूँ चले जाना किसी को समझ में नहीं आया था… सारा राष्ट्र शोक संतप्त हो गया था।
उस समय अखबारों में एक आलेख छपा था जिसका शीर्षक था — ” वह सफेद पुड़िया क्या थी ” ??

डॉ* मुखर्जी की बेटी सबिता मुखर्जी अपने पति के साथ उस स्थान पर गई जहाँ एक जेलनुमा कमरे में मुखर्जी साहब को रखा गया था।

वहाँ सबिता की मुलाकात एक पंजाबी हिन्दू नर्स से हुई जो उस समय ड्यूटी पर थी।

उसने बताया था कि एक डॉक्टर ने उससे कहा था कि यदि इनका दर्द , इंजेक्शन से ठीक ना हो तो यह पुड़िया दे देना।
इतना कहते ही वो नर्स रोने लगी और आगे कहा कि — ” मैंने दी ..और फिर मुखर्जी साहब हमेशा के लिए सो गये “।
डॉ मुखर्जी ने देश की खातिर अपना बलिदान दे दिया था …परमिट व्यवस्था खत्म हो चुकी थी …तिरंगा कश्मीर पहुँच चुका था।

आज 6 जुलाई है , डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्मदिन है।

जनसंघ के संस्थापक डॉ मुखर्जी 1901 में पैदा हुए थे…. और 1953 में उन्होंने अपना बलिदान दिया था।

भारत के इस सपूत के जन्मदिन के अवसर पर बारम्बार नमन।
🙏🙏

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हरदिनपावन

मुड़बद्री पर राज करने वाली रानी अबक्का चोटा जिस पर हमे गर्व होना चाहिए जो जैन धर्म का पालन करने वाली वीरांगना थी..🙏🏻🥁

साल था 1555 जब पुर्तगाली सेना कालीकट, बीजापुर, दमन, मुंबई जीतते हुए गोवा को अपना हेडक्वार्टर बना चुकी थी। टक्कर में कोई ना पाकर उन्होंने पुराने कपिलेश्वर मंदिर को ध्वस्त कर उस पर चर्च स्थापित कर डाली।

मंगलौर का व्यवसायिक बंदरगाह अब उनका अगला निशाना था। उनकी बदकिस्मती थी कि वहाँ से सिर्फ 14 किलोमीटर पर ‘उल्लाल’ राज्य था जहां की शासक थी 30 साल की रानी ‘अबक्का चौटा’ (Abbakka Chowta).।

पुर्तगालियों ने रानी को हल्के में लेते हुए केवल कुछ सैनिक उसे पकडने भेजा। लेकिन उनमेंसे कोई वापस नहीं लौटा। क्रोधित पुर्तगालियों ने अब एडमिरल ‘डॉम अल्वेरो ड-सिलवीरा’ (Dom Álvaro da Silveira) के नेतृत्व में एक बड़ी सेना भेजी। शीघ्र ही जख्मी एडमिरल खाली हाथ वापस आ गया। इसके बाद पुर्तगालियों की तीसरी कोशिश भी बेकार साबित हुई।

चौथी बार में पुर्तगाल सेना ने मंगलौर बंदरगाह जीत लिया। सोच थी कि यहाँ से रानी का किला जीतना आसान होगा, और फिर उन्होंने यही किया। जनरल ‘जाओ पिक्सीटो’ (João Peixoto) बड़ी सेना के साथ उल्लाल जीतकर रानी को पकड़ने निकला।

लेकिन यह क्या..?? किला खाली था और रानी का कहीं अता-पता भी ना था। पुर्तगाली सेना हर्षोल्लास से बिना लड़े किला फतह समझ बैठी। वे जश्न में डूबे थे कि रानी अबक्का अपने चुनिंदा 200 जवान के साथ उनपर भूखे शेरो की भांति टूट पड़ी।

बिना लड़े जनरल व अधिकतर पुर्तगाली मारे गए। बाकी ने आत्मसमर्पण कर दिया। उसी रात रानी अबक्का ने मंगलौर पोर्ट पर हमला कर दिया जिसमें उसने पुर्तगाली चीफ को मारकर पोर्ट को मुक्त करा लिया।

अब आप अन्त जानने में उत्सुक होंगे..??

रानी अबक्का के देशद्रोही पति ने पुर्तगालियों से धन लेकर उसे पकड़वा दिया और जेल में रानी विद्रोह के दौरान मारी गई।

क्या आपने इस वीर रानी अबक्का चौटा के बारे में पहले कभी सुना या पढ़ा है..?? जैन कुल की इस रानी के बारे में जो चार दशकों तक विदेशी आततायियों से वीरता के साथ लड़ती रही, हमारी पाठ्यपुस्तकें चुप हैं। अगर यही रानी अबक्का योरोप या अमेरिका में पैदा हुई होती तो उस पर पूरी की पूरी किताबें लिखी गई होती।

इस कहानी से दो बातें साफ हैं..

हमें हमारे गौरवपूर्ण इतिहास से जानबूझ कर वन्चित रखा गया है। मैं भी रानी अबक्का चौटा के बारे में उस समय ही जान पाया जब मैं कर्नाटक की कहानी पढ़ रहा था, व हमारी 1000 साल की दासता अपने ही देशवासियों (भितरघातियों) के विश्वासघात का नतीजा है। दुर्भाग्य से यह आज भी यथावत है..🙏😢

साभार :- विद्रोहिणी आर्या जी की वॉल से..🙏🙏🚩
Valam Meghwal जी
सलोनी यादव की टाइम लाइन से साभार

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👉બે વર્ષની નાનકડી દીકરીએ સમજદારી દાખવી મા નો જીવ બચાવ્યો. રેલ્વે સ્ટેશન ઉપર મા બેભાન થઈ ગઈ. સાથે છ માસનો દીકરો માની જોડે હતો.દીકરી ઈશારાથી પોલીસને બોલાવી લાવી. … હવે વાંચો આગળ…
(દીવ્યભાસ્કરમાંથી સાભાર) સં. હસમુખ ગોહીલ સામાન્ય રીતે માતા-પિતા બાળકોનું ધ્યાન રાખતાં હોય છે, પરંતુ મધ્યપ્રદેશના રાયબરેલીમાં એક એવી ઘટના સામે આવી છે, જેમાં બાળકીએ તેની માતાનો જીવ બચાવ્યો છે. અહીં મોરાદાબાદ રેલવે સ્ટેશન પર એક માતા બેભાન થઈ જતાં તેની 2 વર્ષની બાળકીએ તેનો બચાવ્યો છે. અહીં મોરાદાબાદ રેલવે સ્ટેશન પર 2 વર્ષની બાળકી જે માંડ ચાલતા શીખી છે, તેણે પોતાની માને રેલવે પ્લેટફોર્મ પર બેભાન અવસ્થામાં પડેલી જોઇ હતી. બેભાન અવસ્થામાં માતા સાથે બાળકીનો 6 મહિનાનો ભાઇ પણ હતો. માને આવી અવસ્થામાં જોઇ તેણે મદદ માટે ઘણા લોકોને બોલાવવાનો પ્રયત્નો કર્યો, પરંતુ કોઇનું ધ્યાન આ તરફ ગયું નહિ. અંતે, બાળકી ગમે તેમ કરી બીજા રેલવે પ્લેટફોર્મ પર પહોંચી, ત્યાં RPFના પોલીસની તેના પર નજર પડી. બાળકીએ પોલીસને તેની મા વિશે જણાવવાની કોશિશ કરી. બાળકીને પોલીસને તેની વાત સમજવામાં ઘણી મુશ્કેલી થઇ. પરિણામે, પોલીસે બાળકી સાથે બીજા પ્લેટફોર્મ પર જઇને જોયું ત્યારે તેમને સમગ્ર ઘટનાની જાણ થઈ હતી. પોલીસે જોયું કે બાળકીની માતા બેભાન અવસ્થામાં પ્લેટફોર્મ પર પડી છે અને બાજુમાં તેનો 6 મહિનાનો દીકરો પણ હતો. પોલીસે તરતજ એમ્બ્યુલન્સને જાણ કરી અને મહિલાને નજીકની હોસ્પિટલમાં લઇ જવામાં આવી. મહિલા હાલ પણ બેભાન અવસ્થામાં છે અને તેની અને તેનાં બાળકોની ઓળખ હજુ સુધી થઇ શકી નથી. RPFના પોલીસ કે જેમણે બાળકીને પ્રથમવાર જોઇ હતી તેમણે કહ્યું, બાળકી ખૂબ જ ચિંતામાં દેખાતી હતી અને કશું કહેવા માગતી હોય એવું લાગતું હતું. ઘણા પ્રયત્નો પછી તેણે બીજા પ્લેટફોર્મ તરફ આંગળી બતાવી ઇશારો કર્યો અને જવાનનો હાથ પકડી તેને ત્યાં લઇ જવા પ્રયત્ન કરવા લાગી. ત્યાર બાદ ત્યાં જતાં એક સ્ત્રી બેભાન અવસ્થામાં અને તેની બાજુમાં એક 6 મહિનાનું બાળક મળી આવ્યું. આ ઘટના પ્લેટફોર્મ નંબર 5 પર બની હતી. પોલીસે જણાવ્યું હતું કે રેલવે પોલીસને આ ઘટનાની જાણ કરવામાં આવી હતી અને સ્ત્રીને તાત્કાલિક નજીકની હોસ્પિટલમાં સારવાર અર્થે મોકલવામાં આવી હતી. ઇમર્જન્સી મેડિકલ ઓફિસર ડો.શોભિતે જણાવ્યું હતું કે ' રેલવે પોલીસ 2 બાળક સાથે એક સ્ત્રીને બેભાન અવસ્થામાં લઇને આવ્યા હતા, તે સ્ત્રી 30 વર્ષની હોય એવું અનુમાન લગાવી શકાય છે. હાલ તેને નિરીક્ષણ હેઠળ રાખવામાં આવી છે. સ્ત્રી હજુ પણ બેભાન અવસ્થામા હોવાથી તેની અને તેનાં બાળકોની ઓળખાણ થઇ શકી નથી, સ્ત્રી હોશમાં આવ્યા પછી આગળની કાર્યવાહી કરવામાં આવશે.'

(દિવ્યભાસ્કર માંથી સાભાર)
સં. હસમુખ ગોહીલ

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नसीहत
समीर अपनी बी टेक की पढ़ाई पूरी कर के आज घर लौटने वाला था। उसके माता पिता दोनों बहुत खुश थे ।
शहर में बहुत बडी कोठी बनवा रखी थी अपने गाँव की जमीन को बेचकर ।थोड़ी सी जमीन बची थी उसके सहारे माता पिता का गुजर बसर हो जाता था जो गाँव में रहते थे।
समीर उनकी इकलौती संतान थी । जितने अधिक लाड़-प्यार से पला उतना ही योग्य और समझदार । जैसे सारे गुण उसमे एक साथ समाहित हो गये हों ।हर कक्षा में प्रथम रहा। बहुत अधिक संवेदनशील , दया , करुणा , सेवा, ममता की प्रतिमूर्ति
आज सुबह उसे पहुँचना था , माता पिता बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे।
तभी उसका फोन आया ।
‘माँ, आप मेरा इन्तजार कर रहे होगे ।पर मैं घर नहीं आ रहा हूँ ।”
‘नहीं आ रहा? पर क्यों तुझे तो आज पहुँचना था? चला नही क्या ?’
‘ मै यहाँ दादा, दादी के पास आया हूँ । सोचा था बहुत समय से
उनसे मिला नहीं हूँ सबसे पहले उनसे मिलता चलूँ, उनका आशीर्वाद लेता चलूँ ।पर यहाँ उनकी दशा देखकर मैने अपना फैसला बदल लिया है ।मै अब यही रहूँगा इनके पास ।”
माँ स्तब्ध रह गई । कोई जवाब सुने बिना उसने फोन रख दिया था।
दो घंटे बाद ही माता पिता दोनों गाँव पहुँच गए ।
समीर से बोले पिता ‘यह क्या बचपना है समीर? यहाँ
कैसे रहोगे तुम?किसी तरह की कोई सुविधा नहीं है यहाँ ।माता पिता हैं तुम्हारे । सोचा है तुमने हम तुम्हारे बिना कैसे रहेंगे?

जैसे आपके माता पिता आपके बिना रहते है।वही रिश्ता तो सैलाब न उनका भी आपके साथ ।’ समीर की आवाज में एक दृढता थी।
दादा जी बोले ‘ जाओ समीर, हमें आदत है ऐसे रहने की।तुम परेशान मत हो।’
‘ मै भी आदत डाल लूँगा ।पर
आप दोनों को इस हालत में छोड़ कर नही जाऊँगा।अपना सब कुछ देकर किस हाल में गुजर कर रहे हैं आप ।मुझे भी उस ऐशो-आराम की जिंदगी नही जीनी। मै यही रहूँगा जिस हाल में आप रहेंगे उसी हाल में ।’
और अगले दिन समीर माता पिता के साथ दादा दादी को लेकर शहर जा रहा था ।बहुत बढी नसीहत दे दी थी उसने।
मौलिक स्वरचित
सुधा शर्मा

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भाग्य और भक्ति …..!!
एक समय महात्मा जगन्नाथ दास जी ने पुरी की यात्रा की।
उन दिनों आजकल की सी सवारियों का प्रबंध नहीं था, वह वृद्ध थे, किसी तरह गिरते-पड़ते, चलते-फिरते किसी तरह वह पुरी पहुंचे।
जलवायु बदला, भोजन का भी ठीक प्रबंध नहीं हो सका, अजीर्ण रोग ने आ घेरा।
जहाँ तक हो सका सावधानी करते रहे पर साधू का कौन ठौर ठिकाना, जो मिला उससे उदर पूर्ति कर ली।
जिसने आदर सहित बुलाया उसी की भिक्षा ग्रहण कर ली, कभी मंदिर से प्रसाद पा लिया।
कुछ दिन पीछे ही उनको दस्त लगने लगे, जब तक साधारण स्थिति रही सहन करते रहे, बाद में रोग बढ़ जाने पर समुद्र के किनारे चले गए और वहीँ एकांत में पड़े रहे।
दस्त में कमजोरी आती ही है, बूढ़े थे बेहोश हो गए, कपड़ों में ही मल-मूत्र करने लगे, मखियाँ भिनकने लगीं, जो आता दूर से ही देखकर लौट जाता।
कोई पूछने वाला नहीं था कि यह मरने वाला कौन है, कहाँ से आया है, इसको औषधि की भी आवश्यकता है या नहीं।
महात्मा जगन्नाथ दास जी की ऐसी दीन दशा देखकर प्रभु जगन्नाथ को दया आई।
भगवान जगन्नाथ दस वर्ष के बालक का रूप धारण कर अपने भक्त के समीप पहुंचे, उसके कपड़े बदले, उनको अपने कर-कमलों से शौच कराया।
मल मूत्र के वस्त्रों को ले जाकर समुद्र में धोया, धूप में सुखाया।
जब तक वह कपड़े भी खराब हो गए, अब इन्हें फिर बदला और धोया सुखाया।
कई दिन व्यतीत हो गए, जगन्नाथ दास को कुछ खबर नहीं कि मेरी सेवा कौन कर रहा है।
जगन्नाथ जी को कुछ होश आया, आँख खोली तो देखा, एक बालक सब तरह की सेवा कर रहा है।
उठने बोलने की सामर्थ्य नहीं थी, चुप रह गए और मन ही मन में उसकी प्रशंसा करने लगे और उसे धन्यवाद देने लगे।
दो तीन दिन और ऐसे ही कटे, अब शरीर में कुछ बल आया।
महात्मा जगन्नाथ दास जी उठे, सहारे से घिसटते जल तक पहुंचे स्नान किया।
शुद्ध धुले हुए वस्त्र, जो लड़के ने पहले से ही तैयार कर रखे थे, बदले।
भजन और नित्य कर्म की सामर्थ्य नहीं रही, एक शुद्ध स्थान पर सघन वृक्ष तले आकर लेट गए।
बच्चा कहीं से जलपान ले आया, वह खाया और आराम करने लगे, ऐसे ही कई और दिन बीते।
अब जगन्नाथ जी का स्वास्थ्य ठीक हो चला है, वह चलने फिरने लगे हैं।
दस्त बंद है, भूख भी लगने लगी है, कुछ खा भी लेते हैं, पर अभी पूरे निरोग नहीं हुए। निर्बलता बाकी है, लेकिन संध्या नियम उनका शुरू हो गया है।
प्रातः काल का समय था, भक्त जी स्नान कर पूजा करने बैठे थे, ध्यान में डूब गए, मस्ती छा गई, तन-बदन भूल गए, सुध-बुध जाती रही।
उस दशा में बालक के शरीर में उनको भगवान के रूप के दर्शन हुए।
महात्मा जगन्नाथ दास जी घबरा गए, आँख खोल दी, रोने लगे और जल्दी से उठकर अपने सेवक बालक के चरणों में लोट गए।
जगन्नाथ दास जी क्षमा याचना करने लगे, तरह-तरह की विनती करने लगे:-
प्रभु इस अधम के लिए आप ने इतना कष्ट उठाया, माता की तरह मल मूत्र साफ किये।
इस पापी को मर जाने देते, इस अपराधी को दुःख झेलने देते, यह दुष्ट इसी योग्य था कि इसे दंड मिलता।
आपने क्यों इतनी दया की, क्यों इसकी खबर ली, अब इसका प्रायश्चित मैं कैसे करूँ, इसका बदला मैं कैसे चुकाऊँ, किन शब्दों में आपकी विनती करूँ?
मैं कर्त्तव्यविमूढ़ हो रहा हूँ, क्या करूँ कुछ समझ में नहीं आ रहा, हे जगतपति, क्षमा करो, क्षमा करो…!!!
का मुख ले विनती करूँ, लाज आवत है मोहि।
तुम देखत अवगुण किये, कैसे भाऊँ तोही॥
हे हरी, आप सर्वशक्तिमान हैं, सर्व सामर्थ्यवान हैं, सर्वोपरि हैं, आप चाहते तो दूर रहते हुए ही इस व्यथा को दूर कर सकते थे।
आप वैकुण्ठ में बैठे हुए ही एक दृष्टि से इस विपदा को काट सकते थे, यहाँ क्यों पधारे, क्यों इस दास के लिए इतनी चिंता की?
प्रभु बोले:- हम भक्तन के भक्त हमारे, प्यारे जगन्नाथ, मुझसे भक्तों के दुःख नहीं देखे जाते, मुझसे उनकी विपत्तियां नहीं सही जाती।
मैं भक्तों को सुख देने के लिए सर्वदा तैयार रहता हूँ, मैं उनके लिए सब कुछ कर सकता हूँ, इसमें मुझको आनंद आता है, ऐसा करते हुए मुझे खुशी होती है।
मैं भक्तों से दूर किसी और स्थान पर नहीं रहता, मैं सदा उनके समीप ही रहता हूँ, उनके स्थान में ही चक्कर लगाया करता हूँ।
तेरा कष्ट मुझसे सहन नहीं हो सका, मैंने प्रगट हो तुझे आराम पहुँचाने की कोशिश की, इसमें कोई बड़ा काम मैंने नहीं किया केवल अपने कर्त्तव्य का पालन किया है।
भगवान ने आगे कहा:- प्रेम सब कुछ करा लेता है, तू मुझे प्यारा है, इसलिए मैंने ऐसा किया है।
इसके लिए तू किसी प्रकार की चिंता मत कर, हृदय में क्षोभित मत हो।
हाँ, एक बात जो तूने कही कि वहाँ बैठे हुए ही इस रोग को दूर कर सकते थे, सो हे भ्राता, यह मेरे अधिकार से बाहर की बात है।
प्रारब्ध का भोग अवश्य भोगना पड़ता है, कर्म बिना भोगे नहीं कटता, यह प्रकृति का नियम है, मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता।
प्राणी जो कुछ सुख-दुःख उठाता है, कर्मानुसार ही उसे मिलता है, जगत में कर्म ही प्रधान है।
हाँ, जो भजन करने वाले हैं, जो निरंतर सच्चे हृदय से मेरी भक्ति में रत रहने वाले हैं, उनके कष्टों को मैं कुछ हल्का और सुलभ कर देता हूँ।
कठिन विपत्ति के समय अपने सेवकों की मैं सहायता कर देता हूँ, यही मेरी दया है।
कर्मों को बिना भोगे आत्मा शुद्ध नहीं होती, संस्कार आत्मा के ऊपर लिपटे रहते हैं और पर्दा बन के प्राणी को मुझसे दूर किये रहते हैं।
कर्मों को भोगने से यह आवरण हट जाते हैं और मैं उन्हें समीप ही दिखाई देने लगता हूँ।
फिर ऐसा निर्मल चित्त वाले भक्त में और मुझमें भेद नहीं रहता, वह मेरे हो जाते हैं और मैं उनका हो जाता हूँ।
ऐसा उपदेश देकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए।
इसके बाद महात्मा जगन्नाथ जी का आगे का जीवन कैसे कटा, कहाँ रहे, इससे ना कोई संबंध है और ना हमको मालूम है, पर यह कथा तीन बातों का सबक हमें दे रही है।
पहली बात:-
कर्म के भोग को परमात्मा भी नहीं टाल सकता, वह भोगकर ही कट सकता है, उसका भोगना अपने लिए ही लाभदायक होता है।
बिना भोगे न तो आवरण हटते हैं, न संस्कार क्षय होते हैं, और न हृदय शुद्ध व निर्मल बनता है।
कठोर हृदय भजन के योग्य नहीं होता, नरम हृदय आदमी ही इस दौलत का हक़दार होता है।
अब दूसरी बात सुनो:-
मूर्ख और दुष्ट प्रकृति के मनुष्य विपत्ति के समय ईश्वर को कोसते हैं, उसे गलियां देते हैं, पर यह नहीं सोचते कि यह उन्हीं के किए हुए कर्मों का फल उन्हें मिल रहा है।
इसमें ईश्वर का क्या अपराध हुआ कि उसके सिर दोष मढते हो?
ईश्वर तो तुम्हें सुख में रखना चाहता था, परन्तु तुमने अपने आप अपने लिये कुआँ खोदा और उसमें गिर पड़े, इसमें दूसरे को दोष क्यों देते हो?
अपनी मूर्खता पर पछताओ, आगे उसे दूर करने का प्रयत्न करो, सदाचारी जीवन बनाओ, सत्कर्मी बनो, निषेध कर्मों को त्याग दो, राग-द्वेष को दूर हटाकर सबके साथ प्रेम का बर्ताव करो, फिर देखो, तुम सुखी रहते हो या नहीं।
अब तीसरी बात:-
ऐसी बातें कई तार्किक कहने लगते हैं कि जब कर्म का फल हमें भोगना ही है तो भजन से क्या लाभ?
क्यों भजन और पूजा में समय नष्ट करें, वृथा क्यों परिश्रम उठाएं? ईश्वर हमें क्या दे देगा, हम जैसा करेंगे वैसा भोगेंगे।
इसका समाधान भी इस कथा में हुआ है, वह यह है कि भोग तो आयेगा और वह भोगने से ही कटेगा, पर जो भजन करने वाले हैं, भगवान के सच्चे भक्तों में हैं, और साथ ही शुद्ध चरित्र और कोमल स्वभाव हैं, उन्हें कठिन विपत्ति के समय एक गुप्त सहायता ऐसी मिलती है जिससे वह कष्ट तीव्र और भारी न रहके सूक्ष्म और हल्का हो जाता है।
उस मनुष्य के अंदर एक ऐसी शक्ति का संचालन रहता है कि जो उसे शांत और प्रसन्न रखती है।
इस आनंद में कठिनाई आती है और चली जाती है, उसे कोई विशेष अनुभव भी नहीं होने पाता बस, इतना ही भजन का प्रताप है, और भजन करने वालों और साधारण लोगों में यही भेद है।

अनिल पढियार