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लघुकथा -सफेद फरिश्ता
मीनाक्षी देवी एक छोटे से शहर में रहती थी। उनके दोनों बच्चे बेटा और बेटी कनाडा में बस गए थे और मीनाक्षी देवी के पति जगमोहन 6 महीने पहले बीमारी के कारण चल बसे।
मीनाक्षी देवी अकेली रह गई थी। बच्चे कभी कभार फोन करके बात कर लेते थे। मां कैसी हो, अपना ध्यान रखना वगैरा-वगैरा सिर्फ औपचारिकता
निभाते थे। 1 दिन में मीनाक्षी देवी निकट बाजार में सब्जी लेने गई, वापस आते समय एक छोटा सा सफेद रंग का पपी,उनके पीछे पीछे घर तक आ गया। मीनाक्षी देवी को जानवर पालना पसंद नहीं था, लेकिन उनको उस पपी पर दया आ गई और उन्होंने अपने आंगन में एक गत्ते का डिब्बा, उसे बैठने के लिए दे दिया।
वह दिन और आज का दिन, पूरे 4 महीने हो चुके हैं ये पपी उनका पीछा ही नहीं छोड़ता। अब तो मोहल्ले के बच्चों का भी लाडला बन चुका है। बच्चे इसे वहाइटी कह कर पुकारते हैं। मीनाक्षी देवी को भी इससे अब बहुत लगाव हो गया था। समय-समय पर उसे खाना देती ,कभी नहलाती, साथ में बाजार ले जाती। वहाइटी बहुत समझदार था।
बारिश होने के कारण आंगन में फिसलन हो गई थी। एक दिन मीनाक्षी देवी वहां फिसल कर गिर पड़ी और अचेत हो गई। व्हाइटी भौंक भौंक कर सारे बच्चों को वहां ले आया। बच्चों ने आंटी के गिरने की बात जाकर अपने मां बाप को बताई, तब पड़ोसियों ने मीनाक्षी देवी को तुरंत अस्पताल पहुंचा दिया। सिर में चोट लगने के कारण वह कोमा में चली गई। पड़ोसियों ने उनके बच्चों को फोन किया लेकिन वे नहीं आ पाए।
वहाइटी, रोज मीनाक्षी देवी को मिलने अस्पताल जाता था, उनके कंधों पर अपने पंजे रखता था और थोड़ी देर उनके सिरहाने जमीन पर बैठ जाता था। थोड़ी देर बाद उठकर वापस चला जाता था। अस्पताल वाले भी उसका प्यार देखकर उसे रोकते नहीं थे। वह कभी किसी को परेशान नहीं करता था।
पूरे 15 दिन बाद मीनाक्षी देवी को होश आया। उन्होंने बताया कि ,”जब मैं कोमा में थी तब मुझे रोज ऐसे लगता था कि एक सफेद फरिश्ता मेरे कंधों पर हाथ रख कर कह रहा हो कि तुम बहुत जल्दी ठीक हो जाओगी, बहुत जल्दी, चिंता मत करना।”
तब उन लोगों ने उन्हें बताया कि रोज वहाइटी
किस तरह उनके कंधों पर अपने पंजे रखता था और उनक सिरहाने बैठा रहता था।
जब मीनाक्षी देवी को लगा कि यही वह सफेद फरिश्ता है जो मेरे मन में कोमा से बाहर निकलने की आशा जगाता था। उन्होंने ममता से भर कर वहाइटी को गोद में उठाया और अपने ह्रदय से लगा लिया। उनकी आंखें आंसुओं से भरी हुई थी।
स्वरचित काल्पनिक सर्वाधिकार सुरक्षित
गीता वाधवानी दिल्ली

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दिल से दिल की बात
आज शाम से सविता बड़ी उधेड़बुन में थी। समझ नही आ रहा था कि आज रात को खाने में क्या बनाये। सच्ची में औरतों के लिए खाना बनाने से ज्यादा मुश्किल होता है ये डिसाइड करना कि क्या बनाया जाय। उस पर मुश्किल ये भी के सबकी पसंद का भी होना चाहिए।
बहुत सोच कर सविता ने सोचा चलो आज उरद की सूखी दाल बनाती हूँ ।पतिदेव को बहुत ज्यादा पसंद थी और बेटे को भी।हालांकि सविता को खुद को तो ठीक ठाक ही लगती थी कि चलो बनी है तो खा ही लेती हूं।
पतिदेव आये और नहाने चले गए।सविता ने जल्दी से सलाद काट कर गरम गरम चपाती बना कर खाना लगा दिया।
पतिदेव जैसे ही खाने की टेबल पर आए तो देखते ही बोले ,”ओह हो, ओह…
सविता एक दम से सोच में पड़ गयी और बोली,” क्या हुआ?
“कुछ नही, कुछ नही वो बोले और मुस्कुराते हुए बहुत स्वाद ले ले कर खाना खाने लगे।
अब सविता सोच में पड़ गयी कि पहले तो ऐसे बोले ओर अब मजे से खा रहे है। सच्ची में इन मर्दों की भी बातें समझ से परे हैं।
जब खाना निपट गया और सविता ने किचन सम्भाल दी। तब रूम में आई तो पतिदेव आराम से टी वी देखने मे व्यस्त थे।
“सुनो,अब तो बता दो आपने खाने की प्लेट देखकर ऐसे भाव क्यों व्यक्त किये थे। क्या खाना पसंद नही आया??
वो बोले,”अरे नही ऐसा कुछ नही है। खाना तो तुम वैसे भी हमेशा अच्छा बनाती हो।वो दरअसल में आज तुमसे ये कहने वाला था कि बहुत दिन से तुमने उरद की सूखी दाल नही बनाई।
और जब मैं टेबल पे आया तो तुमने पहले से ही सूखी दाल बना रखी थी।मैं बहुत ज्यादा हैरान हुआ देख कर के तुम मेरे बिना कहे कैसे मेरे दिल की बात जान जाती हो”
अभी चार दिन पहले ही कि तो बात है जब सविता के पति ने कहा ,सविता सुनो सावन चल रहा है किसी दिन खीर ही बना लो।वो कहते हैं सावन में खीर अवश्य खानी चाहिए।”
और सविता आगे से मंद मंद मुस्कुरा रही थी क्योंकि वो उस दिन खाने के बाद मीठे में खीर ही तो सर्व करने वाली थी जो उसने सुबह ही बना कर फ्रिज में ठंडी होने के लिए लगा रखी थी।
मौलिक रचना
रीटा मक्कड़

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【【गलत का खुलकर विरोध करना चाहिए】】
अंतिम सांस गिन रहे #जटायु ने कहा कि “मुझे पता था कि मैं #रावण से नही जीत सकता लेकिन फिर भी मैं लड़ा ..यदि मैं नही लड़ता तो आने वाली #पीढियां मुझे कायर कहतीं”
जब रावण ने जटायु के दोनों पंख काट डाले… तो मृत्यु आई और जैसे ही मृत्यु आयी… तो गिद्धराज जटायु ने मृत्यु को ललकार कर कहा…
“खबरदार ! ऐ मृत्यु ! आगे बढ़ने की कोशिश मत करना..! मैं तुझ को स्वीकार तो करूँगा… लेकिन तू मुझे तब तक नहीं छू सकती… जब तक मैं माता #सीता जी की “सुधि” प्रभु “#श्रीराम” को नहीं सुना देता…!

मौत उन्हें छू नहीं पा रही है… काँप रही है खड़ी हो कर…मौत तब तक खड़ी रही, काँपती रही… यही इच्छा मृत्यु का वरदान जटायु को मिला ।

किन्तु #महाभारत के #भीष्म_पितामह छह महीने तक बाणों की #शय्या पर लेट करके मृत्यु की प्रतीक्षा करते रहे… आँखों में आँसू हैं …वे पश्चाताप से रो रहे हैं… भगवान मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं…!
कितना अलौकिक है यह दृश्य… #रामायण मे जटायु भगवान की गोद रूपी शय्या पर लेटे हैं…
प्रभु “श्रीराम” रो रहे हैं और जटायु हँस रहे हैं…
वहाँ महाभारत में भीष्म पितामह रो रहे हैं और भगवान “#श्रीकृष्ण” हँस रहे हैं… भिन्नता प्रतीत हो रही है कि नहीं… ?

अंत समय में जटायु को प्रभु “श्रीराम” की #गोद की शय्या मिली… लेकिन भीष्म पितामह को मरते समय #बाण की शय्या मिली….!
जटायु अपने #कर्म के बल पर अंत समय में भगवान की #गोद रूपी शय्या में प्राण त्याग रहे हैं.. प्रभु “श्रीराम” की #शरण में….. और बाणों पर लेटे लेटे भीष्म पितामह रो रहे हैं….

ऐसा अंतर क्यों?…

ऐसा अंतर इसलिए है कि भरे दरबार में भीष्म पितामह ने #द्रौपदी चीरहरण देखा था… विरोध नहीं कर पाये और मौन रह गए थे …!
दुःशासन को ललकार देते… दुर्योधन को ललकार देते…
तो उनका साहस न होता, लेकिन द्रौपदी रोती रही… #बिलखती रही… #चीखती रही… #चिल्लाती रही… लेकिन भीष्म पितामह सिर झुकाये बैठे रहे… #नारी की #रक्षा नहीं कर पाये…!

उसका परिणाम यह निकला कि इच्छा मृत्यु का वरदान पाने पर भी बाणों की शय्या मिली और ….
जटायु ने नारी का सम्मान किया…
अपने प्राणों की आहुति दे दी… तो मरते समय भगवान
“श्रीराम” की गोद की शय्या मिली…!

जो दूसरों के साथ गलत होते देखकर भी आंखें मूंद लेते हैं … उनकी गति #भीष्म जैसी होती है …
जो अपना परिणाम जानते हुए भी…औरों के लिए #संघर्ष करते है, उसका माहात्म्य #जटायु जैसा #कीर्तिवान होता है ।

अतः सदैव #गलत का #विरोध जरूर करना चाहिए ।
“#सत्य” #परेशान तो जरूर होता है, पर #पराजित नहीं

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🙏मोहन के गोपाल 🙏
छोटे-से गांव में एक दरिद्र विधवा ब्राह्मणी रहती थी। छह वर्षीय बालक मोहन के अतिरिक्त उसका और कोई नहीं था।
वह दो-चार भले घरों से भिक्षा मांगकर अपना तथा बच्चे का पेट भर लेती और भगवान का भजन करती थी। भीख पूरी न मिलती तो बालक को खिलाकर स्वयं उपवास कर लेती। यह कम चलता रहा।
ब्राह्मणी को लगा कि ब्राह्मण के बालक को दो अक्षर न आए यह ठीक नहीं है। गांव में पड़ाने की व्यवस्था नहीं थी। गाँव से दो कोस पर एक पाठशाला थी।
ब्राह्मणी अपने बेटे को लेकर वहा गई। उसकी दरिद्रता तथा रोने पर दया करके वहा के अध्यापक ने बच्चे को पढ़ाना स्वीकार कर लिया।
वहां पढने वाले छात्र गुरु के घर में रहते थे किंतु ब्राह्मणी का पुत्र मोहन अभी बहुत छोटा था और ब्राह्मणी को भी अपने पुत्र को देखे विना चैन नहीं पड़ता था अत: मोहन नित्य पढ़ने जाता और सायंकाल घर लौट आता।
उसको विद्या प्राप्ति के लिए प्रतिदिन चार कोस चलना पड़ता। मार्ग में कुछ दूर जंगल था। शाम को लौटने में अंधेरा होने लगता था। उस जंगल में मोहन को डर लगता था।
एक दिन गुरुजी के यहा कोई उत्सव था। मोहन को अधिक देर हो गई और जब वह घर लौटने लगा रात्रि हो गई थी। अंधेरी रात जंगली जानवरों की आवाजों से बालक मोहन भय से थर-थर कांपने लगा।
ब्राह्मणी भी देर होने के कारण बच्चे को ढूंढने निकली थी। किसी प्रकार अपने पुत्र को वह घर ले आई।
मोहन ने सरलता से कहा : ”मां ! दूसरे लड़को को साथ ले जाने तो उनके नौकर आते हैं। मुझे जंगल में आज बहुत डर लगा। तू मेरे लिए भी एक नौकर रख दे।” बेचारी ब्राह्मणी रोने लगी। उसके पास इतना पैसा कहा कि नौकर रख सके।
माता को रोते देख मोहन ने कहा : ”मां ! तू रो मत ! क्या हमारा और कोई नहीं है ?” अब ब्राह्मणी क्या उत्तर दे ? उसका हृदय व्यथा से भर गया।
उसने कहा : ”बेटा ! गोपाल को छोड़कर और कोई हमारा नहीं है।” बच्चे की समझ में इतनी ही बात आई कि कोई गोपाल उसका है।
उसने पूछा : ”गोपाल कौन ? वे क्या लगते हैं मेरे और कहा रहते हैं ?”
ब्राह्मणी ने सरल भाव से कह दिया : ”वे तुम्हारे भाई लगते हैं। सभी जगह रहते हैं परंतु आसानी से नहीं दिखते। संसार में ऐसा कौन सा स्थान है जहां वे नहीं रहते। लेकिन उनको तो देखा था ध्रुव ने, प्रहलाद ने ओर गोकुल के गोपों ने।”
बालक को तो अपने गोपाल भाई को जानना था। वह पूछने लगा : गोपाल मुझसे छोटे हैं या बड़े अपने घर आते हैं या नहीं?
माता ने उसे बताया : ”तुमसे वे बड़े हैं और घर भी आते हैं पर हम लोग उन्हें देख नहीं सकते। जो उनको पाने के लिए व्याकुल होता है उसी के पुकारने पर वे उसके पास आते हैं।”
मोहन ने कहा : ”जंगल में आते समय मुझे बड़ा डर लगता है। मैं उस समय खूब व्याकुल हो जाता हूं। वहां पुकारू तो क्या गोपाल भाई आएंगे ?”
माता ने कहा : ”तू विश्वास के साथ पुकारेगा तो अवश्य वे आएंगे।” मोहन की समझ में इतनी बात आई कि जंगल में अब डरने की जरूरत नहीं है। डर लगने पर मैं व्याकुल होकर पुकारूंगा तो मेरा गोपाल भाई वहा आ जाएगा।
दूसरे दिन पाठशाला से लौटते समय जब वह वन में पहुचा उसे डर लगा। उसने पुकारा : ”गोपाल भाई ! तुम कहां हो ? मुझे यहा डर लगता है। मैं व्याकुल हो रहा हूं। गोपाल भाई !”
जो दीनबंधु हैं दीनों के पुकारने पर वह कैसे नहीं बोलेंगे। मोहन को बड़ा ही मधुर स्वर सुनाई पड़ा : ”भैया ! तू डर मत। मैं यह आया।” यह स्वर सुनते ही मोहन का भय भाग गया।
थोड़ी दूर चलते ही उसने देखा कि एक बहुत ही सुंदर ग्वालबाल उसके पास आ गया। वह हाथ पकड़कर बातचीत करने लगा। साथ-साथ चलने लगा। उसके साथ खेलने लगा। वन की सीमा तक वह पहुंचाकर लौट गया। गोपाल भाई को पाकर मोहन का भय जाता रहा।
घर आकर उसने जब माता को सब बातें बताईं तब वह ब्राह्मणी हाथ जोडकर गदगद हो अपने प्रभु को प्रणाम करने लगी।
उसने समझ लिया जो दयामयी द्रोपदी और गजेंद्र की पुकार पर दौड़ पड़े थे मेरे भोले बालक की पुकार पर भी वही आए थे। ऐसा ही नित्य होने लगा..
एक दिन उसके गुरुजी के पिता का श्राद्ध होने लगा। सभी विद्यार्थी कुछ न कुछ भेंट देंगे। गुरुजी सबसे कुछ लाने को कह रहे थे।
मोहन ने भी सरलता से पूछा : “गुरुजी ! मैं क्या ले आऊं ?” गुरु को ब्राह्मणी की अवस्था का पता था। उन्होंने कहा : ‘बेटा ! तुमको कुछ नहीं लाना होगा।’
लेकिन मोहन को यह बात कैसे अच्छी लगती। सब लड़के लाएंगे तो मैं क्यों न लाऊं उसके हठ को देखकर गुरुजी ने कह दिया : ”अच्छा तुम एक लोटा दूध ले आना।”
घर जाकर मोहन ने माता से गुरुजी के पिता के श्राद्ध की बात कही और यह भी कहा” मुझे एक लोटा दूध ले जाने की आज्ञा मिली है।”
ब्राह्मणी के घर में था क्या जो वह दूध ला देती। मांगने पर भी उसे दूध कौन देता लेकिन मोहन ठहरा बालक। वह रोने लगा।
अंत में माता ने उसे समझाया : ”तू गोपाल भाई से दूध मांग लेना। वे अवश्य प्रबंध कर देंगे।”
दूसरे दिन मोहन ने जंगल में गोपाल भाई को जाते ही पुकारा और मिलने पर कहा : ”आज मेरे गुरुजी के पिता का श्राद्ध है। मुझे एक लोटा दूध ले जाना है। मां ने कहा है कि गोपाल भाई से मांग लेना। सौ मुझे तुम एक लोटा दूध लाकर दो।”
गोपाल ने कहा : ”मैं तो पहले से यह लौटा भर दूध लाया हूं । तुम इसे ले जाओ।” मोहन बड़ा प्रसन्न हुआ।
पाठशाला में गुरुजी दूसरे लड़कों के उपहार देखने और रखवाने में लगे थे। मोहन हंसता हुआ पहुंचा। कुछ देर तो वह प्रतीक्षा करता रहा कि उसके दूध को भी गुरुजी देखेंगे।
पर जब किसी का ध्यान उसकी ओर न गया तब वह बोला : ‘गुरुजी ! मैं दूध लाया हूं।’ गुरु जी ढेरों चीजें सम्हालने में व्यस्त थे। मोहन ने जब उन्हें स्मरण दिलाया तब झुंझलाकर बोले : ”जरा-सा दूध लाकर यह लड़का कान खाए जाता है जैसे इसने हमें निहाल कर दिया।
इसका दूध किसी बर्तन से डालकर हटाओ इसे यहां से।”
मोहन अपने इस अपमान से खिन्न हो गया। उसका उत्साह चला गया। उसके नेत्रों से आंसू गिरने लगे।
नौकर ने लोटा लेकर दूध कटोरे मे डाला तो कटोरा भर गया फिर गिलास में डाला तो वह भी भर गया। बाल्टी में टालने लगा तो वह भी भर गई। भगवान के हाथ से दिया वह लोटा भर दूध तो अक्षय था।
नौकर घबराकर गुरुजी के पास गया। उसकी बात सुनकर गुरुजी तथा और सब लोग वहां आए अपने सामने एक बड़े पात्र में दूध डालने को उन्होंने कहा। पात्र भर गया पर लोटा तनिक भी खाली नहीं हुआ। इस प्रकार बड़े-बड़े बर्तन दूध से भर गए।
अब गुरुजी ने पूछा : ”बेटा ! तू दूध कहां से लाया हें ?” सरलता से बालक ने कहा : ”मेरे गोपाल भाईआ ने दिया।” गुरुजी और चकित हुए। उन्होंने पूछा : ”गोपाल भाई कौन ? तुम्हारे तो कोई भाई नहीं।”
मोहन ने दृढ़ता से कहा : ”है क्यों नहीं। गौपाल भाई मेरा बड़ा भाई है। वह मुझे रोज वन में मिल जाते है। मां कहती हैं कि वह सब जगह रहता है पर दिखता नहीं कोई उसे खूब व्याकुल होकर पुकारे तभी वह आ जाता है। उससे जो कुछ मांगा जाए वह तुरंत दे देता है।”
अब गुरुजी को कुछ समझना नहीं था। मोहन को उन्होंने हृदय से लगा लिया। श्राद्ध में उस दूध से खीर बनी और ब्राह्मण उसके स्वाद का वर्णन करते हुए तृप्त नहीं होते थे ।
गोपाल भाई के दूध का स्वाद स्वर्ग के अमृत में भी नहीं तब संसार के किसी पदार्थ में कहां से होगा। उस दूध का बना श्राद्धान्त पाकर गुरुजी के पितर तृप्त ही नहीं हुए, माया से मुक्त भी हो गए।
श्राद्ध समाप्त हुआ। संध्या को सब लोग चले गए। मोहन को गुरुजी ने रोक लिया था। अब उन्होंने कहा : ”बेटा ! मैं तेरे साथ चलता हूं। तू मुझे अपने गोपाल भाई के दर्शन करा देगा न ?”
मोहन ने कहा : ”चलिए मेरा गोपाल भाई तो पुकारते ही आ जाता है।” वन में पहुंच कर उसने पुकारा। उत्तर में उसे सुनाई पड़ा : ”आज तुम अकेले तो हो नहीं तुम्हें डर तो लगता नहीं, फिर मुझे क्यों बुलाते हो ?”
मोहन ने कहा : ”मेरे गुरुजी तुम्हें देखना चाहते हैं तुम जल्दी आओ !”
जब मोहन ने गोपाल भाई को देखा तो गुरुजी से कहा : ”आपने देखा मेरा गोपाल भाई कितना सुदर है ?”
गुरुजी कहने लगे : “मुझे तो दिखता ही नहीं। मैं तो यह प्रकाशमात्र देख रहा हूं।”
अब मोहन ने कहा : “गोपाल भाई ! तुम मेरे गुरुजी को दिखाई क्यों नहीं पड़ते ?”
उत्तर मिला : ”तुम्हारी बात दूसरी है। तुम्हारा अत: करण शुद्ध है तुममें सरल विश्वास है, अत: मैं तुम्हारे पास आता हूं।
तुम्हारे गुरुदेव को जो प्रकाश दिख गया उनके लिए वही बहुत है। उनका इतने से ही कल्याण हो जाएगा।
उस अमृत भरे स्वर को सुनकर गुरुदेव का हृदय गदगद हो गया। उनको अपने हृदय में भगवान के दर्शन हुए। भगवान की उन्होंने स्तुति की।
कुछ देर में जब भगवान अंतर्धान हो गए, तब मोहन को साथ लेकर वे उसके घर आए और वहां पहुंचकर उनके नेत्र भी धन्य हो गए।
गोपाल भाई उस ब्राह्मणी की गोद में बैठे थे और माता के नेत्रों की अश्रुधार उनकी काली धराली अलकों को भिगो रही थी। माता को शरीर की सुध-बुध ही नहीं थी।

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લાખો_વણજારો

લાખો કરીને એક વણજારો હતો.
પૈસેટકે એ સુખી હતો ; પણ એકવાર એને ભીડ પડી.
એ તો ગયો વાણિયાને ત્યાં.

વાણિયો કહે , “જોઈએ એટલા રૂપિયા લઈ જાઓ. તમારા જ છે. ”

જોઈતી રકમ ખાતે મંડાવી લાખો ઊપડ્યો. “લો , રામ રામ શેઠજી ! મહિનો પૂરો થતાં રકમ લઈને આવી પહોંચીશ. ત્યાં સુધી આ ડાઘિયાને (કુતરાને) તમારે ત્યાં મૂકી જાઉં છું. ”

“ એ શું બોલ્યા ? તમારા પૈસા તો દૂધ ધોયેલા છે. ”

“ મોટી મહેરબાની , શેઠ. પણ એમ કાંઈ સાનમાં મૂક્યા વગર મારાથી પાઈ પણ લેવાય નહી.”

લાખાએ ડાઘિયાને ડચકારીને શેઠની પાસે રહેવા હાથ ને આંખથી ઈશારો કર્યો. પછી એણે તરત ડાઘિયા ઉપરથી આંખ વાળી લીધી અને એ રસ્તે પડ્યો.
ડાઘિયો લાખાની પીઠ દેખાઈ ત્યાં સુધી તેના તરફ જોઈ રહ્યો.

પછી તો એવું બન્યું કે શેઠને ઘેર એક રાતે ખાતર પડ્યું. હજારોની ચોરી થઈ. ચારેકોર તપાસ ચાલી. ડાઘિયો બધાની જોડે જ હતો. થોડે આગળ જાય ને પાછો આવે. પણ એના તરફ કોઈનું ધ્યાન જાય તો ને ?
આગળ પગેરું ન મળ્યું એટલે કંટાળીને સૌ પાછા વળતા હતા. ત્યાં ડાઘિયાએ વાણિયાનું ધોતિયું મોઢામાં પકડીને ખેંચવા માંડ્યું. અમરકથાઓ

એક વાડ આગળ આવીને ડાઘિયો ઊભો રહ્યો અને પગથી જમીન ખોતરવા મંડ્યો. ત્યાં ખોદ્યુ તો ચોરાયેલો બધો જ માલ અકબંધ મળી આવ્યો. વાણિયાના હરખનો પાર ન રહ્યો. એને થયું કે આ ડાઘિયાને હવે વહેલો છૂટો કરીને એના ધણી ભેગો કરી દેવો જોઈએ. લાખાને જે પૈસા ધીર્યા છે એથી અનેકગણું ડાઘિયાએ મને બચાવી આપ્યું.

વાણિયાએ આ બધી વાત ચિઠ્ઠીમાં લખી તે કૂતરાની કોટે (ડોકે) બાંધી અને તેને વિદાય કર્યો.

અહીં એવું બન્યું કે લાખા વણજારાને પૈસાની છૂટ થઈ. એને વિચાર થયો કે મહિનો પૂરો થાય ને પૈસા આપવા જાઉં એમાં મેં શું કર્યું ? મહિનામાં દિવસો બાકી હોય ને પૂરા પૈસા દઈ આવું તો હું ખરો. પૈસા લઈને એ નીકળ્યો. અડધે રસ્તે આવ્યો ત્યાં સામેથી એને કંઈ કૂતરા જેવું આવતું દેખાયું. ધારીને જુએ છે તો એનો વહાલો ડાઘિયો !

ડાઘિયાને જોતાં જ લાખાની આંખ ફરી ગઈ. “અરે રામ ! આ કૂતરાએ મારી શાખ ઉપર પાણી ફેરવ્યું ! એ નાસી આવ્યો ! શેઠને હું શું મોં બતાવીશ ?”

ડાઘિયો લાડથી પાસે આવવા જાય છે , ત્યાં લાખાએ આંખ બતાવી એને ફિટકાર આપ્યો અને મોં ફેરવી લીધું.

ઘડીભર ડાઘિયો થંભી ગયો. બીજી જ પળે એ તો ડુંગર તરફ દોડ્યો. ત્યાં એ અબોલ જીવ પથરા પર માથું પછાડી પછાડીને મરી ગયો. લાખો પૈસા આપવા ગયો. ત્યાં એણે શેઠ પાસેથી બધી વાત જાણી. વણજારાના પસ્તાવાનો કંઈ પાર ન રહ્યો. #અમર_કથાઓ

ભારે હૈયે લાખો પાછો વળ્યો. જ્યાં પોતાનો વિશ્વાસુ કૂતરો માથું પછાડીને મરી ગયો હતો ત્યાં એણે એક મોટું સરોવર બંધાવ્યું.

એ સરોવર તે ડાઘાસર. ઉત્તર ગુજરાતમાં રાધનપુર પાસે એ આવેલું છે.
———–અમર કથાઓ ————

નોંધ- હાલમા આ પાઠ ધો.-૪ ગુજરાતી પાઠ્યપુસ્તકમા સમાવેશ થયેલ છે. નિચેના બે ફોટા શૈલેષભાઇ પંચાલની વોલ પરથી લીધેલા છે.

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐गुरु दक्षिणा💐💐

एक बार एक शिष्य ने विनम्रतापूर्वक अपने गुरु जी से पूछा- ‘गुरु जी,कुछ लोग कहते हैं कि जीवन एक संघर्ष है, कुछ अन्य कहते हैं कि जीवन एक खेल है और कुछ जीवन को एक उत्सव की संज्ञा देते हैं | इनमें कौन सही है?’

गुरु जी ने धैर्यपूर्वक उत्तर दिया-पुत्र,जिन्हें गुरु नहीं मिला उनके लिए जीवन एक संघर्ष है; जिन्हें गुरु मिल गया उनका जीवन एक खेल है और जो लोग गुरु द्वारा बताये गए मार्ग पर चलने लगते हैं, मात्र वे ही जीवन को एक उत्सव का नाम देने का साहस जुटा पाते हैं|

यह उत्तर सुनने के बाद भी शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट न था।गुरु जी को इसका आभास हो गया ।वे कहने लगे-‘लो, तुम्हें इसी सन्दर्भ में एक कहानी सुनाता हूँ

एक बार किसी गुरुकुल में तीन शिष्यों नें अपना अध्ययन सम्पूर्ण करने पर अपने गुरु जी से यह बताने के लिए विनती की कि उन्हें गुरुदाक्षिणा में, उनसे क्या चाहिए |गुरु जी पहले तो मंद-मंद मुस्कराये और कहने लगे-‘मुझे तुमसे गुरुदक्षिणा में एक थैला भर के सूखी पत्तियां चाहिए, ला सकोगे?
वे तीनों मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि उन्हें लगा कि वे बड़ी आसानी गुरु जी की इच्छा पूरी कर सकेंगे |सूखी पत्तियाँ तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती हैं| वे उत्साहपूर्वक एक ही स्वर में बोले-‘जी गुरु जी,जैसी आपकी आज्ञा |’

अब वे तीनों शिष्य एक समीपस्थ जंगल में पहुँच चुके थे |लेकिन यह देखकर कि वहाँ पर तो सूखी पत्तियाँ केवल एक मुट्ठी भर ही थीं ,उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा |
वे सोच में पड़ गये कि आखिर जंगल से कौन सूखी पत्तियां उठा कर ले गया होगा?
इतने में ही उन्हें दूर से आता हुआ कोई किसान दिखाई दिया |वे उसके पास पहुँच कर, उससे विनम्रतापूर्वक याचना करने लगे कि वह उन्हें केवल एक थैला भर सूखी पत्तियां दे दे |

अब उस किसान ने उनसे क्षमायाचना करते हुए कहा कि वह उनकी मदद नहीं कर सकता क्योंकि उसने सूखी पत्तियों का ईंधन के रूप में पहले ही उपयोग कर लिया था ।
अब तीनों पास में ही बसे एक गाँव की ओर इस आशा से बढ़ने लगे थे कि हो सकता है वहाँ उस गाँव में उनकी कोई सहायता कर सके |

वहाँ पहुँच कर उन्होंने जब एक व्यापारी को देखा तो बड़ी उम्मीद से उससे एक थैला भर सूखी पत्तियां देने के लिए प्रार्थना करने लगे लेकिन उन्हें फिर से एकबार निराशा ही हाथ आई क्योंकि उस व्यापारी ने तो, पहले ही, कुछ पैसे कमाने के लिए सूखी पत्तियों के दोने बनाकर बेच दिए थे लेकिन उस व्यापारी ने उदारता दिखाते हुए उन्हें एक बूढी माँ का पता बताया जो सूखी पत्तियां एकत्रित किया करती थी|

पर भाग्य ने यहाँ पर भी उनका साथ नहीं दिया क्योंकि वह बूढी माँ तो उन पत्तियों को अलग-अलग करके कई प्रकार की ओषधियाँ बनाया करती थी |अब निराश होकर वे तीनों खाली हाथ ही गुरुकुल लौट गये |गुरु जी ने उन्हें देखते ही स्नेहपूर्वक पूछा- ‘पुत्रो,ले आये गुरुदक्षिणा ?’तीनों ने सर झुका लिया |गुरू जी द्वारा दोबारा पूछे जाने पर उनमें से एक शिष्य कहने लगा- ‘गुरुदेव,हम आपकी इच्छा पूरी नहीं कर पाये |हमने सोचा था कि सूखी पत्तियां तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती होंगी लेकिन बड़े ही आश्चर्य की बात है कि लोग उनका भी कितनी तरह से उपयोग करते हैं

’गुरु जी फिर पहले ही की तरह मुस्कराते हुए प्रेमपूर्वक बोले- ‘निराश क्यों होते हो ?प्रसन्न हो जाओ और यही ज्ञान कि सूखी पत्तियां भी व्यर्थ नहीं हुआ करतीं बल्कि उनके भी अनेक उपयोग हुआ करते हैं; मुझे गुरुदक्षिणा के रूप में दे दो |’तीनों शिष्य गुरु जी को प्रणाम करके खुशी-खुशी अपने-अपने घर की ओर चले गये |

वह शिष्य जो गुरु जी की कहानी एकाग्रचित्त हो कर सुन रहा था,अचानक बड़े उत्साह से बोला-‘गुरु जी,अब मुझे अच्छी तरह से ज्ञात हो गया है कि आप क्या कहना चाहते हैं |आप का संकेत, वस्तुतः इसी ओर है न कि जब सर्वत्र सुलभ सूखी पत्तियां भी निरर्थक या बेकार नहीं होती हैं तो फिर हम कैसे, किसी भी वस्तु या व्यक्ति को छोटा और महत्त्वहीन मान कर उसका तिरस्कार कर सकते हैं? चींटी से लेकर हाथी तक और सुई से लेकर तलवार तक-सभी का अपना-अपना महत्त्व होता है |

गुरु जी भी तुरंत ही बोले-‘हाँ, पुत्र,मेरे कहने का भी यही तात्पर्य है कि हम जब भी किसी से मिलें तो उसे यथायोग्य मान देने का भरसक प्रयास करें ताकि आपस में स्नेह, सद्भावना,सहानुभूति एवं सहिष्णुता का विस्तार होता रहे और हमारा जीवन संघर्ष के बजाय उत्सव बन सके |

दूसरे,यदि जीवन को एक खेल ही माना जाए तो बेहतर यही होगा कि हम निर्विक्षेप,स्वस्थ एवं शांत प्रतियोगिता में ही भाग लें और अपने निष्पादन तथा निर्माण को ऊंचाई के शिखर पर ले जाने का अथक प्रयास करें |’अब शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट था |

💐💐शिक्षा💐💐

यदि हम मन, वचन और कर्म- इन तीनों ही स्तरों पर इस कहानी का मूल्यांकन करें, तो भी यह कहानी खरी ही उतरेगी |सब के प्रति पूर्वाग्रह से मुक्त मन वाला व्यक्ति अपने वचनों से कभी भी किसी को आहत करने का दुःसाहस नहीं करता और उसकी यही ऊर्जा उसके पुरुषार्थ के मार्ग की समस्त बाधाओं को हर लेती है |वस्तुतः,हमारे जीवन का सबसे बड़ा ‘उत्सव’ पुरुषार्थ ही होता है-ऐसा विद्वानों का मत है |

💐💐 प्रेषक अभिजीत चौधरी 💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम💐💐

          एक समय की बात है कि श्री गुरू नानक देव जी महाराज और उनके 2 शिष्य बाला और मरदाना किसी गाँव में जा रहे थे। चलते चलते रास्ते में एक मकई का खेत आया। बाला स्वभाव से बहुत कम बोलता था। मगर जो मरदाना था वो बात की नीँव उधेडता था।

मकई का खेत देख कर मरदाने ने गुरू महाराज से सवाल किया “कि बाबा जी इस मकई के खेत में जितने दाने हैं क्या वे सब पहले से ही निर्धारित कर दिये गए हैं कि कौन इसका हकदार है और ये किस किस के मुँह में जाऐंगे। इस पर गुरू नानक जी महाराज ने कहा बिल्कुल मरदाना जी इस संसार मे कहीं भी कोई भी खाने योग्य वनस्पति है उस पर मोहर पहले से ही लग गई है और जिसके नाम की मोहर होगी वही जीव उसका ग्रास करेगा। गुरू जी की इस बात ने मरदाने के मन के अन्दर कई सवाल खड़े कर दिए। मरदाने ने मकई के खेत से एक मक्का तोड़ लिया और उसका एक दाना निकाल कर हथेली पर रख लिया और गुरू महाराज से यह पूछने लगा बाबा जी कृपा करके मुझे बताएं कि इस दाने पर किसका नाम लिखा है। इस पर गुरू महाराज ने जवाब दिया कि इस दाने पर एक मुर्गी का नाम लिखा है। मरदाने ने गुरू जी के सामने बड़ी चालाकी दिखाते हुए मकई का वो दाना अपने मुँह मे फेंक लिया और गुरू जी से कहने लगा कि कुदरत का यह नियम तो बड़ी आसानी से टूट गया।

मरदाने ने जैसे ही वो दाना निगला वो दाना मरदाने की श्वास नली मे फंस गया। अब मरदाने की हालत तीर लगे कबूतर जैसी हो गई। मरदाने ने गुरू नानक देव जी से कहा कि बाबा जी कुछ कीजिए नहीं तो मैं मर जांऊगा। गुरू नानक देव जी महाराज ने कहा मरदाना जी  मैं क्या करूँ कोई वैद्य या हकीम ही इसको निकाल सकता है। पास के गाँव मे चलते हैं। वहाँ किसी हकीम को दिखाते हैं । मरदाने को लेकर वे पास के एक गाँव में चले गए। वहाँ एक हकीम मिला। उस हकीम ने मरदाने की नाक में नसवार डाल दी। नसवार बहुत तेज थी। नसवार सूंघते ही मरदाने को छींके आनीं शुरू हो गईं। मरदाने के छीँकने से मकई का वो दाना गले से निकल कर बाहर गिर गया। जैसे ही दाना बाहर गिरा पास ही खड़ी मुर्गी ने झट से वो दाना खा लिया। मरदाने ने गुरू नानक देव जी से क्षमा माँगी और कहा बाबा जी मुझे माफ कर दीजिए। मैने आपकी बात पर शक किया ।

इसी लिये कहते है जिसके भाग्य में ईश्वर ने जितना लिख दिया उसको उतना ही मिलता है।

💐💐 प्रेषक अभिजीत चौधरी 💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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फूल

तेरह चौदह साल की वो बच्ची लोगों के घरों में,पूजा के लिए फूल दे जाती है। अपने बाप का हाथ बंटाती और स्कूल जाती है। मुझसे थोड़ा लगाव सा हो गया है
“तू कल फूल क्यूँ नही दे गई? मैं दस बजे तक तेरा इंतजार करती रही”
“बापू बीमार हैं ना,अस्पताल लेकर गई थी कल। और आप बिना फूल के भी पूजा कर लिया करो जब 8 बजे तक मैं ना आऊं, वैसे भी भगवान को तो सिर्फ भक्ति से मतलब होता है ना”
“अच्छा, तो फिर तू फूल क्यूँ दे जाती है?
“क्योंकि इन फूलों को डाली पर ही मुरझाने से अच्छा है कुछ काम आ जाएं, और फिर हमारा घर भी तो इन्हीं फूलों से चलता है ना”
मैं उसकी मीठी बातें सुनने के लिए उसे कुछ ना कुछ टोका करती रहती
“अरे बिन्नी तू आज गुड़हल का फूल नहीं लाई, देवी जी को मैं वही फूल चढ़ाती हूँ”
“इस मौसम में ज्यादा गुड़हल नहीं खिल रहा है आँटी। और फूल तो फूल हैं, सभी तो उसी भगवान की मर्जी से खिलते हैं”
“अच्छा, अच्छा”
वो ऐसे ही प्यारी बातें कभी कह जाती है और मैं मुस्कुरा दिया करती हूँ। एक हफ्ते से वो आ नहीं रही। चिंता इस बात की नहीं है कि मैं भगवान को फूल नहीं चढ़ा पा रही हूँ। पर चिंता हो रही है वो कभी इतने दिन गायब नहीं होती। सच बताऊँ तो पूजा से पहले उसकी मीठी बातों की आदत हो गई है। माँ है नहीं उसकी। अपने बापू और छोटे भाई के साथ रहती है। आज मन बनाकर ख़ास उसे मिलने के लिए पास की ही बस्ती में गई।
उसके घर जा कर देखा तो अपने भाई को अपने हाथों से निवाला खिला रही थी। छोटा भाई रो रहा था। वे उसे चुप करा रही थी। मुझे देखते ही चौक पड़ी और
“आँटी जी आप?’
“हाँ.. ये रो क्यूँ रहा है”
मेरे इस सवाल से उसकी भी आँखें भर आईं
“बापू भी चले गए आँटी जी” वो मुझसे लिपट फूट फूटकर रो पड़ी।उसकी बातें सुन मन धक से बैठ गया। क्या मैं उस भगवान की पूजा करती हूँ जो इन जैसे बच्चों को भी अनाथ और बेसहारा कर देते हैं। उन्हें देख मन व्यथित हो उठा। सामने पालनहार कन्हैया की फ़ोटो टंगी थी। हम तीनों की आँखों में आँसू थे और वे बाँसुरी पकड़े मुस्कुरा रहे थे। अचानक से लगा जैसे कह रहे हो,
“ये अनाथ नहीं हैं, समाज के ये दो फूल अब तुम्हारे दायित्व हैं”

मैं उन बच्चों की उंगली पकड़े बस्ती से अपने घर की ओर चल पड़ी..!

©️विनय कुमार मिश्रा
Vinay Kumar Mishra

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लघुकथा मैं डरपोक 🙏🙏

एक बार की बात है रक्षाबंधन के दिन मैं अपनी मम्मी के साथ उनके भाई यानी मेरे मामा के घर जा रही थी। हम दोनों बस में बैठे थे और हमें कानपुर जाना था जैसे ही बस आगे बढ़ी हमने देखा एक एक्सीडेंट हो गया है जिसमें एक आदमी जमीन पर नीचे गिरा पड़ा है। बस को रोका गया और देखा गया कि यह व्यक्ति कौन है? मेरे मन में भी आया कि मैं भी उतर कर देखूं कि यह कौन है? लेकिन मैं डरपोक बस से उतर ना पाई और मैंने ईश्वर से प्रार्थना की कि हे! भगवान इस इंसान की मदद कर। पूरे रास्ते भर मेरा मन कचोटता रहा कि मैं बस से क्यों नहीं उतरी?
अपने मामा के यहां पूरा दिन बिताने के बाद हम जब घर लौटे तुम मुझे पता चला कि उसी भीड़ में से एक भले इंसान ने एंबुलेंस बुलाकर उस व्यक्ति की मदद की जिसका एक्सीडेंट हो गया था। मेरे मन को बहुत सुकून मिला और मैंने ईश्वर का धन्यवाद दिया।
लेकिन उस दिन के बाद से मैंने मन में यह ठान लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए अगर किसी व्यक्ति को मेरी सहायता की जरूरत होगी तो मैं बिना डरे उस व्यक्ति के पास जाऊंगी और जो भी संभव सहायता हो सकेगी मैं उसकी करूंगी। इसके लिए चाहे मुझे कितने भी कष्ट क्यों ना उठाने पड़े । मैं सोचती हूं यदि भीड़ में से वह इंसान मेरी तरह डरपोक होता तो शायद उस व्यक्ति की जान ना बच पाती जो आज अपने घर में जीवित है और अपने परिवार के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रहा है।
मैं वाकई में बहुत डरपोक बन गई थी न जाने ईश्वर ने मुझे यह शक्ति क्यों नहीं दी कि मैं उस इंसान की सहायता कर पाती।
मुझे अपने पर शर्म आती है कि मैं इतनी डरपोक निकली कि मैं उस इंसान का चेहरा देखने की भी हिम्मत नहीं कर सकी कि वह कौन है?
मैं वाकई में बहुत डरपोक थी।।।
🙏🙏🙏🙏
मेरी हर रचना मेरे साथ घटित एक सत्य घटना है। हम सभी के जीवन में कभी ना कभी कुछ ऐसा घटित हो जाता है जो हमें अंदर तक कचोट देता है।
उसी के बाद हमारा हृदय परिवर्तन होने की संभावना बढ़ जाती है। शायद मेरा भी हृदय परिवर्तन हो गया है और आने वाले समय में मैं भी किसी जरूरतमंद की मदद करने को हिम्मत के साथ आगे बढ़ सकूंगी।
ईश्वर मुझे हिम्मत और सद्बुद्धि दे।।
❤️❤️❤️❤️❤️🙏🙏🙏🙏🙏🙏
रंजीता अवस्थी,
शाहजहांपुर

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Jai shree ram ji
Jai shree hanumantaye namah ji
🔥 जीवन के दो पुण्य 🔥

एक विद्वान साधु थे जो दुनियादारी से दूर रहते थे। वह अपनी ईमानदारी,सेवा तथा ज्ञान के लिए प्रसिद्ध थे। एक बार वह पानी के जहाज से लंबी यात्रा पर निकले।

उन्होंने यात्रा में खर्च के लिए पर्याप्त धन तथा एक हीरा संभाल के रख लिया । ये हीरा किसी राजा ने उन्हें उनकी ईमानदारी से प्रसन्न होकर भेंट किया था सो वे उसे अपने पास न रखकर किसी अन्य राजा को देने जाने के लिए ही ये यात्रा कर रहे थे।

यात्रा के दौरान साधु की पहचान दूसरे यात्रियों से हुई। वे उन्हें ज्ञान की बातें बताते गए। एक फ़क़ीर यात्री ने उन्हें नीचा दिखाने की मंशा से नजदीकियां बढाने लगा।

एक दिन बातों-बातों में साधु ने उसे विश्वासपात्र नेक आदमी समझकर हीरे की झलक भी दिखा दी। उस फ़क़ीर को और लालच आ गया। उसने उस हीरे को हथियाने की योजना बनाई।

रात को जब साधु सो गया तो उसने उसके झोले तथा उसके वस्त्रों में हीरा ढूंढा पर उसे मिला नही ।

अगले दिन उसने दोपहर की भोजन के समय साधु से कहा कि इतना कीमती हीरा है, आपने संभाल के रक्खा है न।
साधु ने अपने झोले से निकलकर दिखाया कि देखो ये इसमे रखा है। हीरा देखकर फ़क़ीर को बड़ी हैरानी हुई कि ये उसे कल रात को क्यों नही मिला। आज रात फिर प्रयास करूंगा ये सोचकर उसने दिन काटा और सांझ होते ही तुंरन्त अपने कपड़े टांगकर, सामान रखकर, स्वास्थ्य ठीक नही है कहकर जल्दी सोने का नाटक किया।

निश्चित समय पर संध्या पूजा अर्चना के पश्चात जब साधु कमरे में आये तो उन्होंने फ़क़ीर को सोता हुआ पाया ।

सोचा आज स्वास्थ्य ठीक नही है इसलिए फ़क़ीर जल्दी सो गया होगा। उन्होंने भी अपने कपड़े तथा झोला उतारकर टांग दिया और सो गए।

आधी रात को फ़क़ीर ने उठकर फिर साधु के कपड़े तथा झोला झाड़कर झाड़कर देखा। उसे हीरा फिर भी नही मिला।

अगले दिन उदास मन से फकीर ने साधु से पूछा -“इतना कीमती हीरा संभाल कर तो रखा है ना साधुबाबा,यहां बहुत से चोर है”।

साधु ने फिर अपनी पोटली खोल कर उसे हीरा दिखा दिया।

अब हैरान परेशान फ़क़ीर के मन में जो प्रश्न था उसने साधु से खुलकर कह दिया उसने साधु से पूछा कि-” मैं पिछली दो रातों से आपके कपड़े तथा झोले में इस हीरे को ढूंढता हूं मगर मुझे नहीं मिलता, ऐसा क्यों , रात को यह हीरा कहां चला जाता है ।

साधु ने बताया- ” मुझे पता है कि तुम कपटी हो, तुम्हारी नीयत इस हीरे पर खराब थी और तुम इसे हर रात अंधेरे में चोरी करने का प्रयास करते थे इसलिए पिछले दो रातों से मैं अपना यह हीरा तुम्हारे ही कपड़ों में छुपा कर सो जाता था और प्रातः उठते ही तुम्हारे उठने से पहले इसे वापस निकाल लेता था”

मेरा ज्ञान यह कहता है कि व्यक्ति अपने भीतर नहीं झांकता, नहीं ढूंढता। दूसरे में ही सब अवगुण तथा दोष देखता है। तुम भी अपने कपड़े नही टटोलते थे।”

फकीर के मन में यह बात सुनकर और ज्यादा ईर्ष्या और द्वेष उत्पन्न हो गया । वह मन ही मन साधु से बदला लेने की सोचने लगा। उसने सारी रात जागकर एक योजना बनाई।

सुबह उसने जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘हाय मैं मर गया। मेरा एक कीमती हीरा चोरी हो गया।’ वह रोने लगा।

जहाज के कर्मचारियों ने कहा, ‘तुम घबराते क्यों हो। जिसने चोरी की होगी, वह यहीं होगा। हम एक-एक की तलाशी लेते हैं। वह पकड़ा जाएगा।’

यात्रियों की तलाशी शुरू हुई। जब साधु बाबा की बारी आई तो जहाज के कर्मचारियों और यात्रियों ने उनसे कहा,

आपकी क्या तलाशी ली जाए। आप पर तो अविश्वास करना ही अधर्म है।’यह सुन कर साधु बोले, ‘नहीं, जिसका हीरा चोरी हुआ है उसके मन में शंका बनी रहेगी इसलिए मेरी भी तलाशी ली जाए।’बाबा की तलाशी ली गई। उनके पास से कुछ नहीं मिला।

दो दिनों के बाद जब यात्रा खत्म हुई तो उसी फ़क़ीर ने उदास मन से साधु से पूछा, ‘बाबा इस बार तो मैंने अपने कपड़े भी टटोले थे, हीरा तो आपके पास था, वो कहां गया?

साधु ने मुस्करा कर कहा, ‘उसे मैंने बाहर पानी में फेंक दिया था।

साधु ने पूछा – तुम जानना चाहते हो क्यों?

क्योंकि मैंने जीवन में दो ही पुण्य कमाए थे – एक ईमानदारी और दूसरा लोगों का विश्वास।

अगर मेरे पास से हीरा मिलता और मैं लोगों से कहता कि ये मेरा ही हैं तो शायद सभी लोग साधु के पास हीरा होगा इस बात पर विश्वास नही करते यदि मेरे भूतकाल के सत्कर्मो के कारण विश्वास कर भी लेते तो भी मेरी ईमानदारी और सत्यता पर कुछ लोगों का संशय बना रहता।

“मैं धन तथा हीरा तो गंवा सकता हूं लेकिन ईमानदारी और सत्यनिष्ठा को खोना नहीं चाहता, यही मेरे पुण्यकर्म है जो मेरे साथ जाएंगे।”

उस फ़क़ीर ने साधु से माफी मांगी और उनके पैर पकड कर गिड़गिड़ाने लगा।

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🙏जय श्री राम 🙏