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“पांगी घाटी” जहां आज भी लड़की को भगा कर शादी करने का चलन है।
हमारा हिमालय दुर्गम घाटियों और ऊचाईयों का अद्भुत संगम है। आश्चर्य होता है ऐसी-ऐसी जगहों को देख कर कि वहां मनुष्य रह कैसे लेता है। क्या है ऐसा उस जगह में जो आठ-आठ महीने मुख्य धरा से कट कर भी इंसान खुश है अपने उस निवास मे।

एक ऐसी ही घाटी में बसी आबादी का जिक्र है, नाम है जिसका “पांगी”। हिमाचल के खूबसूरत चंबा जिले मे आने वाली यह घाटी सैलानियों के लिए स्वर्ग से कम नहीं है। राजधानी शिमला से इसकी दूरी करीब 560 किमी है। यहां जाने के लिए चंबा से “तरेला” नमक स्थान तक बस की सुविधा है। उसके बाद पैदल यात्रा करना अपने आप मे एक सुखद और रोमांचक अनुभव है। वैसे गाड़ियों द्वारा जाने के लिए एक रास्ता रोहतांग दर्रे को पार कर भी जाता है। पांगी घाटी तकरीबन 1200 किमी क्षेत्र में फैली हुए है। यह अक्तूबर से मई तक बर्फ से ढकी रहती है। उस समय यहां का तापमान -35 से -40 डिग्री तक हो जाता है। सारे काम-काज ठप्प पड़ जाते हैं। फिर भी यहां के रहने वाले अपना सामान्य जीवन बसर करते रहते हैं। इन कठिन परिस्थितियों को झेलने के लिए इनके घर भी खास तरीके से बने होते हैं। यह मिट्ती और लकड़ी के बने घर तीन मंजिला होते हैं। मुख्य द्वार निचली मंजिल में होता है जो चारों ओर से दिवारों से घिरा होता है जिससे ठंड़ी हवाएं सीधे अंदर ना आ सकें। यहीं पर इनके पालतु जानवर रहते हैं। दूसरी मंजिल में रहने तथा खाना बनाने की व्यवस्था होती है। रसोईघर काफी बड़ा बनाया जाता है जिससे सर्दियों में सारा परिवार वहां की गर्माहट में सो सके। यहां धुएं रहित चुल्हों की व्यवस्था होती है। रसोई के सामने ही एक बड़ा सा चुल्हा भी बनाया जाता है जिसमें बर्फ को पिघला कर पीने के पानी की आपूर्ति होती रह सके। कड़ाके की ठंड़ में बाहर ना जाना पड़े इसलिए शौचालय का इंतजाम भी इसी मंजिल पर होता है। यहां हर घर में जौ की शराब बनती है जो इन्हें ठंड़ से तो बचाती ही है साथ ही साथ स्वास्थ्यवर्द्धक पेय का भी काम करती है।

यहां के लोग देवी के भक्त हैं। इनकी आराध्य देवी “मिंगल माता” है, जिस पर इन्हें अटूट विश्वास है। इसी देवी के ड़र से यहां चोरी-चमारी की घटनाएं नहीं होती हैं। यहां शादी ब्याह का भी अजीबोगरीब रिवाज है। यहां लड़की को भगा कर ले जाने का चलन है। लड़का लड़की को भगा कर अपने घर ले जाता है। लड़के के घर जा कर यदि लड़की वहां का भोजन ग्रहण कर लेती है तो शादी को रजामंदी मिल जाती है पर यदि वह ऐसा नहीं करती तो बात नहीं बनती और लड़के वालों को पंचायत की तरफ से दंड़ मिलता है साथ ही साथ हर्जाना भी देना पड़ता है।

जाड़े के चरम में यहां करीब 15 से 20 फुट तक बर्फ गिर जाती है तब बाहरी दुनिया से जुड़ने का एकमात्र साधन हेलिकाप्टर ही रह जाता है। यहां का मुख्यालय “किलाड़” है। जहां सरकार ने हर सुविधा मुहैय्या करवाई हुई है। यहां का वन व लोक निर्माण विश्राम गृह बड़े-बड़े होटलों को मात करता है। जून से सितंबर तक का समय यहां रौनक मेला लगा रहता है। दूर-दूर से सैंकड़ों चरवाहे अपने-अपने रेवड़ों को यहां ला कर ड़ेरा ड़ाल देते हैं । यहां की घास इतनी पौष्टिक है कि हर चरवाहा उसे अपने पशुओं को खिलवाने के लिए लालायित रहता है। एक और आश्चर्य की बात यहां रबी और खरीफ की फसलें एक साथ उगाई जाती है। यहां की आलू की पैदावर भी बहुत मशहूर है। यहां के रहने वालों को सरकारी सुविधा प्राप्य होने का कारण यहां के बहुत सारे युवा सरकारी कार्यालयों में भी कार्य करते हैं।

पांगी घाटी में पहुंचना चाहे कितना भी मुश्किल हो यहाँ पहुंच कर पर्यटक अपनी सारी तकलीफें भूल जाता है। इस हरी-भरी स्वर्ग नुमा घाटी में प्रकृति ने अपना सौंदर्य मुक्त हाथों से लुटाया है।

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पद्मिनी नहीं मिली तो खिलजी चित्तौड़ के गेट को उखाड़कर ले गया था दिल्ली जिसे 462 साल बाद भरतपुर के जाट महाराजा जीतकर वापस लाए

अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान चित्तौड़ की रानी पद्मिनी ने 25 अगस्त 1303 को दासियों के साथ जौहर कर लिया था। इसके बाद गुस्से में आए अलाउद्दीन खिलजी ने मेवाड़ इलाके में बेरहमी से मारकाट और लूटपाट की। इसी दौरान वह चित्तौड़गढ़ किले से बेशकीमती अष्टधातु गेट को उखाड़ कर ले गया था। जिसे पाँचवें मुगल सम्राट शाहजहाँ ने दिल्ली के लाल किले में  लगावा दिया था।

(लालकिले का निर्माण 1638 में आरम्भ होकर 1648 में पूर्ण हुआ। पर कुछ मतों के अनुसार इसे लालकोट का एक पुरातन किला एवं नगरी बताते हैं, जिसे शाहजहाँ ने कब्जा़ करके यह किला बनवाया था।)

462 साल बाद भरतपुर के जाट महाराजा जवाहर सिंह जीतकर वापस लाए
       इतिहासकार रामवीर सिंह वर्मा ने अपनी पुस्तक भरतपुर का इतिहास के पृष्ठ संख्या 59 में इसका जिक्र करते हुए लिखा है कि 1765 में भरतपुर के महाराजा जवाहर सिंह ने अपने पिताश्री महाराजा सूरजमल की मौत का बदला लेने के लिए दिल्ली के शासक नजीबुद्दौला पर आक्रमण कर दिया था । उन्हें चित्तौड़ के अपमान व गेट के बारे में जानकारी हुई तो वे अष्टधातु का दरवाजा भी उखाड़कर भरतपुर ले आए।

      महाराजा जवाहरसिंह ही पहले हिन्दू नरेश थे जिन्होंने आगरे के किले और दिल्ली के लाल किले को जीतकर विजय वैजयन्ती फहराई थी ।
  
       ये दरवाजा आज भी जाट वीरों की बहादुरी और जिंदादिली की दास्तां बयां कर रहा है। ब्रज विश्वविद्यालय के डॉ. सतीश त्रिगुणायत के अनुसार इस प्रसंग का उल्लेख इतिहासकार दीनानाथ दुबे की पुस्तक “भारत के दुर्ग’ तथा डॉ. राघवेन्द्र मनोहर की पुस्तक “राजस्थान के प्रमुख दुर्ग” में भी आता है।

20 टन वजनी है अष्टधातु दरवाजा
अष्टधातु का दरवाजा करीब 20 टन वजन का है। इसमें करीब 6 टन मात्रा में अष्टधातु लगी है। चूंकि अष्टधातु में सोना भी शामिल होता है इसलिए इसकी सुरक्षा के लिए पुरातत्व विभाग ने लोहे की सुरक्षा जाली लगा रखी है। सोना मिलने से धातु का रंग काला नहीं पड़ता और यह हजारों साल तक सुरक्षित रहता है।

चित्तौड़गढ़ की महारानी पद्मिनी को हासिल नहीं कर पाने से खिसियाकर अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़़ किले के अष्टधातु 20 टन वजनी दरवाजे को उखाड़कर दिल्ली ले गया था। भरतपुर के राजा जवाहर सिंह 462 साल बाद इस दरवाजे को जीतकर लाए और अपमान का बदला लिया।

    जब भरतपुर के जाट महाराजा जवाहर सिंह ने मुगल सेना को परास्त कर उस किवाड़ को लाल किले से उतार कर भरतपुर ले आए तो कुछ दिन बाद चित्तौड़ के राजपूत राजा ने भरतपुर संदेशा भेजा कि इस किवाड़ को वापस कर दिया जाए बदले में वो भरतपुर के खजाने को भर देंगे ।
तब प्रत्युत्तर में महाराजा जवाहर सिंह ने कहा–वीरता की कोई कीमत नहीं होती और अगर फिर भी यह किवाड़ चित्तौड़ को चाहिए तो उसी तरह ले जाओ,जिस तरह हम दिल्ली से लाए है ।

युद्ध भुमि में भरतपुर को परास्त कर अष्टधातु दरवाजा ले जाना चित्तौड़ के वस की बात नहीं थी इसलिए आज भी ये किवाड़ भरतपुर के लोहागढ़ दुर्ग में लगे हुए है।

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शेर ए पंजाब महाराजा रणजीत सिंह की गौरवमयी गाथा

महाराजा रणजीत सिंह (Maharaja Ranjit Singh) का नाम भारतीय इतिहास के सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है। पंजाब के इस महावीर ने अपने साहस और वीरता के दम पर कई भीषण युद्ध जीते थे। रणजीत सिंह के पिता सुकरचकिया मिसल के मुखिया थे। बचपन में रणजीत सिंह चेचक की बीमारी से ग्रस्त हो गये थे, उसी कारण उनकी बायीं आँख दृष्टिहीन हो गयी थी।

किशोरावस्था से ही चुनौतीयों का सामना करते आये रणजीत  जब मात्र 12 वर्ष के थे तब उनके पिताजी का देहान्त (वर्ष 1792) हो गया था। खेलने -कूदने की उम्र में ही नन्हें रणजीत  को मिसल का सरदार बना दिया गया था और उस ज़िम्मेदारी को उन्होने बखूबी निभाया।

महाराजा रणजीत सिंह स्वभाव से अत्यंत सरल व्यक्ति थे। महाराजा की उपाधि प्राप्त कर लेने के बाद भी रणजीत सिंह अपने दरबारियों के साथ भूमि पर बिराजमान होते थे। वह अपने उदार स्वभाव, न्यायप्रियता ओर समस्त धर्मों के प्रति समानता रखने की उच्च भावना के लिए प्रसिद्ध थे। अपनी प्रजा के दुखों और तकलीफों को दूर करने के लिए वह हमेशा कार्यरत रहते थे। अपनी प्रजा की आर्थिक समृद्धि और उनकी रक्षा करना ही मानो उनका धर्म था।

महाराजा रणजीत सिंह ने लगभग 40 वर्ष शासन किया। अपने राज्य को उन्होने इस कदर शक्तिशाली और समृद्ध बनाया था कि उनके जीते जी  किसी आक्रमणकारी सेना की उनके साम्राज्य की ओर आँख उठा ने की हिम्मत नहीं होती थी।

महाराजा रणजीत सिंह  के जीवन से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

महा सिंह और राज कौर के पुत्र रणजीत सिंह दस साल की उम्र से ही घुड़सवारी, तलवारबाज़ी, एवं अन्य युद्ध कौशल में पारंगत हो गये। नन्ही उम्र में ही रणजीत सिंह अपने पिता महा सिंह के साथ अलग-अलग सैनिक अभियानों में जाने लगे थे।
महाराजा रणजीत सिंह को कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी, वह अनपढ़ थे।
अपने पराक्रम से विरोधियों को धूल चटा देने वाले रणजीत सिंह पर 13 साल की कोमल आयु में प्राण घातक हमला हुआ था। हमला करने वाले हशमत खां को किशोर रणजीत सिंह नें खुद ही मौत की नींद सुला दिया।
बाल्यकाल में चेचक रोग की पीड़ा, एक आँख गवाना, कम उम्र में पिता की मृत्यु का दुख, अचानक आया कार्यभार का बोझ, खुद पर हत्या का प्रयास इन सब कठिन प्रसंगों नें रणजीत सिंह को किसी मज़बूत फौलाद में तबदील कर दिया।
रणजीत सिंह का विवाह 16 वर्ष की आयु में महतबा कौर से हुआ था। उनकी सास का नाम सदा कौर था। सदा कौर की सलाह और प्रोत्साहन पा कर रणजीत सिंह नें रामगदिया पर आक्रमण किया था, परंतु उस युद्ध में वह सफलता प्राप्त नहीं कर सके थे।
रणजीत सिंह के राज में कभी किसी अपराधी को मृत्यु दंड नहीं दिया गया था। रणजीत सिंह बड़े ही उदारवादी राजा थे, किसी राज्य को जीत कर भी वह अपने शत्रु को बदले में कुछ ना कुछ जागीर दे दिया करते थे ताकि वह अपना जीवन निर्वाह कर सके।
वो महाराजा रणजीत सिंह ही थे जिन्होंने हरमंदिर साहिब यानि गोल्डन टेम्पल का जीर्णोधार करवाया था।
उन्होंने कई शादियाँ की, कुछ लोग मानते हैं कि उनकी 20 शादियाँ हुई थीं।
महाराजा रणजीत सिंह न गौ मांस खाते थे ना ही अपने दरबारियों को इसकी आज्ञा देते थे।

भारत के वीर पुत्र महाराजा रणजीत सिंह का पराक्रम और विजय अभियान

लाहौर पर विजय
1798 ई. – 1799 ई  में अफगानिस्तान के शासक जमानशाह ने लाहौर पर आक्रमण कर दिया और बड़ी आसानी से उस पर अधिकार कर लिया पर अपने सौतेले भाई महमूद के विरोध के कारण जमानशाह को वापस काबुल लौट जाना  पड़ा था| काबूल लौटते समय उसकी कुछ तोपें  झेलम नदी में गिर पड़ी थीं| रणजीत सिंह ने इन तोपों को नदी से निकलवा कर सुरक्षित काबुल भिजवा दिया | इस बात पर जमानशाह बहुत प्रसन्न हो गये और उन्होने रणजीत सिंह को लाहौर पर अधिकार कर लेने की अनुमति दे दी | इस के बाद तुरंत ही रणजीत सिंह ने लाहौर पर आक्रमण कर दिया और 7 जुलाई 1799 के दिन लाहौर पर आधिपत्य जमा लिया |

पंजाब के भिन्न-भिन्न मिसलों पर जीत हासिल की

ई॰ 1803 में अकालगढ़ पर विजय।
ई॰ 1804 में डांग तथा कसूर पर विजय।
ई॰ 1805 में अमृतसर पर विजय।
ई॰ 1809 में गुजरात पर विजय।

महाराजा रणजीत सिंह ने किया सतलज पार के प्रदेशो को अपने आधीन

ई 1806 में दोलाधी गाँव पर किया कब्जा।
ई॰ 1806 में ही लुधियाना पर जीत हासिल की।
ई॰ 1807 में जीरा बदनी और नारायणगढ़ पर जीत हासिल की।
ई॰ 1807 में ही फिरोज़पुर पर विजय प्राप्त की।

अमृतसर की संधि
महाराज रणजीत सिंह के सैनिक अभियानों से डर कर सतलज पार बसी हुई सिख रियासतों ने अंग्रेजो से संरक्षण देने की प्रार्थना की थी ताकि वह सब बचे रह सकें| तभी उन रियासतों की प्रार्थना पर गर्वनर जनरल लार्ड मिन्टो ने सर चार्ल्स मेटकाफ को रणजीत सिंह से संधि करने हेतु उनके वहाँ भेजा था| पहले तो रणजीतसिंह संधि प्रस्ताव पर सहमत नही हुए परंतु जब लार्ड मिन्टो ने मेटकाफ के साथ आक्टरलोनी के नेतृत्व में एक विशाल सैनिक टुकड़ी भेजी और उन्होंने अंग्रेज़ सैनिक शक्ति की धमकी दी तब रणजीतसिंह को समय की मांग के आगे झुकना पड़ा था।

अंत में चातुर्यपूर्वक महाराजा रणजीत सिंह ने तारीख 25 अप्रैल 1809 ईस्वी के दिन अंग्रेजो से संधि कर ली। इतिहास में यह संधि अमृतसर की संधि कही जाती है।

कांगड़ा पर विजय (ई॰ 1809)

अमरसिंह थापा नें ई॰ 1809 में कांगड़ा पर आक्रमण कर दिया था। उस समय वहाँ संसारचंद्र राजगद्दी पर थे। मुसीबत के समय उस वक्त संसारचंद्र नें रणजीतसिंह से मदद मांगी, तब उन्होने फौरन उनकी मदद के लिए एक विशाल सेना की रवाना कर दी, सिख सेना को सामने आता देख कर ही अमरसिंह थापा की हिम्मत जवाब दे गयी और वह सेना सहित उल्टे पाँव वहाँ से भाग निकले। इस प्रकार कांगड़ा राज्य पर भी रणजीत सिंह का आधिपत्य हो गया।

मुल्तान पर विजय (ई॰ 1818)

उस समय मुल्तान के शासक मुजफ्फरखा थे उन्होने सिख सेना का वीरतापूर्ण सामना किया था पर अंत में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। महाराजा रणजीत सिंह की और से वह युद्ध मिश्र दीवानचंद और खड्गसिंह नें लड़ा था और मुल्तान पर विजय प्राप्त की थी। इस तरह महाराजा रणजीत सिंह नें ई॰ 1818 में मुल्तान को अपने आधीन कर लिया।

कटक राज्य पर विजय (ई॰ 1813)

वर्ष 1813 में महाराजा रणजीत सिंह ने कूटनीति द्वारा काम लेते हुए कटक राज्य पर भी अधिकार कर लिया था | ऐसा कहा जाता है की उन्होंने कटक राज्य के गर्वनर जहादांद को एक लाख रूपये की राशि भेंट दे कर ई॰ 1813 में कटक पर अधिकार प्राप्त कर लिया था|

कश्मीर पर विजय (ई॰ 1819)

महाराजा रणजीत सिंह नें 1819 ई. में मिश्र दीवानचंद के नेतृत्व मे विशाल सेना कश्मीर की और आक्रमण करने भेजी थी। उस समय कश्मीर में अफगान शासक जब्बार खां का आधिपत्य था। उन्होनें रणजीत सिंह की भेजी हुई सिख सेना का पुरज़ोर मुकाबला किया परन्तु उन्हे पराजय का स्वाद ही चखना पड़ा। अब कश्मीर पर भी रणजीत सिंह का पूर्ण अधिकार हो गया था।

डेराजात की विजय (ई॰ 1820-21)

आगे बढ़ते हुए ई॰ 1820-21 में महाराजा रणजीत सिंह ने क्रमवार डेरागाजी खा, इस्माइलखा और बन्नू पर विजय हासिल कर के अपना अधिकार सिद्ध कर लिया था।

पेशावर की विजय (ई॰ 1823-24)

पेशावर पर जीत हासिल करने हेतु ई॰ 1823. में महाराजा रणजीत सिंह ने वहाँ एक विशाल सेना भेज दी। उस समय सिक्खों ने वहाँ जहांगीर और नौशहरा की लड़ाइयो में पठानों को करारी हार दी और पेशावर राज्य पर जीत प्राप्त कर ली। महाराजा की अगवाई में ई॰ 1834 में पेशावर को पूर्ण सिक्ख साम्राज्य में सम्मलित कर लिया गया।

लद्दाख की विजय (ई॰ 1836)

ई॰ 1836 में महाराजा रणजीत सिंह के सिक्ख सेनापति जोरावर सिंह ने लद्दाख पर आक्रमण किया और लद्दाखी सेना को हरा कर के लद्दाख पर आधिपत्य हासिल कर लिया|

महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु

भारतीय इतिहास में अपनी जगह बनाने वाले प्रचंड पराक्रमी महाराजा रणजीत सिंह 58 साल की उम्र में सन 1839 में मृत्यु को प्राप्त हुए। उन्होने अपनी अंतिम साँसे लाहौर में ली थी। सदियों बाद भी आज उन्हें अपने साहस और पराक्रम के लिए याद किया जाता है। सब से पहली सिख खालसा सेना संगठित करने का श्रेय भी महाराजा रणजीत सिंह को जाता है। उनकी मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र महराजा खड़क सिंह ने उनकी गद्द्दी संभाली।

कोहिनूर हीरा

महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद ई॰ 1845 में अंग्रेजों नें सिखों पर आक्रमण किया। फिरोज़पुर की लड़ाई में सिख सेना के सेनापति लालसिंह ने अपनी सेना के साथ विश्वासघात किया और अपना मोर्चा छोड़ कर लाहौर चला गया। इसी समय में अंग्रेज़ो ने सिखों से कोहिनूर हीरा लूट लिया और साथ-साथ कश्मीर राज्य और हज़ारा राज्य भी छीन लिया। कोहिनूर हीरा लंदन ले जाया गया और वहाँ ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया के ताज में जड्वा दिया गया। ऐसा कहा जाता है की कोहिनूर हीरे को ब्रिटेन की महारानी के ताज में लगाने से पहले जौहरीयों ने एक माह और आठ दिन तक तराशा था।

विशेष

महाराजा रणजीत सिंह में आदर्श राजा के सभी गुण मौजूद थे- बहादुरी, प्रजा प्रेम, करुणा, सहनशीलता, कुटिलता, चातुर्य और न्यायसंगतता। भारत वर्ष के इस महान तेजवंत शासक को उनकी जयन्ति पर हमारा आदर सहित प्रणाम।

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मौत के बाद बीवियां किसी और से न कर ले शादी इसलिए अफ़ज़ल खान ने 1 ही दिन में 64 बीवियों का किया था क़त्ल…
कर्नाटक के बीजापुर में गोल गुम्बज और इब्राहीम रोज़ा जैसी कई ऐतिहासिक इमारतें और दर्शनीय स्थल हैं, लेकिन एक स्थान ऐसा भी है जहाँ पर्यटकों को ले जाकर इस्लामी आक्रांताओं के कई काले कारनामों में से एक के दर्शन करवाये जा सकते हैं।
बीजापुर-अठानी रोड पर लगभग 5 किलोमीटर दूर एक उजाड़ स्थल पर पाँच एकड़ में फ़ैली यह ऐतिहासिक कत्लगाह है।
“सात कबर” (साठ कब्र का अपभ्रंश) ऐसी ही एक जगह है। इस स्थान पर आदिलशाही सल्तनत के एक सेनापति अफ़ज़ल खान द्वारा अपनी 64 पत्नियों की हत्या के बाद बनाई गई कब्रें हैं। इस खण्डहर में काले पत्थर के चबूतरे पर 64 कब्रें बनाई गई हैं।
इतिहास कुछ इस प्रकार है कि एक तरफ़ औरंगज़ेब और दूसरी तरफ़ से शिवाजी द्वारा लगातार जारी हमलों से परेशान होकर आदिलशाही द्वितीय (जिसने बीजापुर पर कई वर्षों तक शासन किया) ने सेनापति अफ़ज़ल खान को आदेश दिया कि इनसे निपटा जाये और राज्य को बचाने के लिये पहले शिवाजी पर चढ़ाई की जाये।
हालांकि अफ़ज़ल खान के पास एक बड़ी सेना थी, लेकिन फ़िर भी वह ज्योतिष और भविष्यवक्ताओं पर काफ़ी भरोसा करता था।
शिवाजी से युद्ध पर जाने के पहले उसके ज्योतिषियों ने उसके जीवित वापस न लौटने की भविष्यवाणी की।
उसी समय उसने तय कर लिया कि कहीं उसकी मौत के बाद उसकी पत्नियाँ हिन्दुओ से दूसरी शादी न कर लें, सभी 64 पत्नियों को मार डालने की योजना बनाई।

अफ़ज़ल खान अपनी सभी पत्नियों को एक साथ बीजापुर के बाहर एक सुनसान स्थल पर लेकर गया।
जहाँ एक बड़ी बावड़ी स्थित थी, उसने एक-एक करके अपनी पत्नियों को उसमें धकेलना शुरु किया, इस भीषण दुष्कृत्य को देखकर उसकी दो पत्नियों ने भागने की कोशिश की लेकिन उसने सैनिकों को उन्हें मार गिराने का हुक्म दिया।
सभी 64 पत्नियों की हत्या के बाद उसने वहीं पास में सबकी कब्र एक साथ बनवाई।

आज की तारीख में इतना समय गुज़र जाने के बाद भी जीर्ण-शीर्ण खण्डहर अवस्था में यह बावड़ी और कब्रें काफ़ी ठीक-ठाक हालत में हैं। यहाँ पहली दो लाइनों में 7-7 कब्रें, तीसरी लाइन में 5 कब्रें तथा आखिरी की चारों लाइनों में 11 कब्रें बनी हुई दिखाई देती हैं और वहीं एक बड़ी “आर्च” (मेहराब) भी बनाई गई है, ऐसा क्यों और किस गणित के आधार पर किया गया, ये तो अफ़ज़ल खान ही बता सकता है। वह बावड़ी भी इस कब्रगाह से कुछ दूर पर ही स्थित है।

अफ़ज़ल खान ने खुद अपने लिये भी एक कब्र यहीं पहले से बनवाकर रखी थी।
हालांकि उसके शव को यहाँ तक नहीं लाया जा सका और मौत के बाद प्रतापगढ़ के किले में ही उसे दफ़नाया गया था, लेकिन इससे यह भी साबित होता है कि वह अपनी मौत को लेकर बेहद आश्वस्त था, भला ऐसी मानसिकता में वह शिवाजी से युद्ध कैसे लड़ता…?
हिन्दुओ के शान महान योद्धा शिवाजी के हाथों अफ़ज़ल खान का वध प्रतापगढ़ के किले में 1659 में हुआ
http://www.dainik-bharat.org/2017/11/64

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आज १९.११.२०१७ को
कुश्ती के महान योद्धा,
विश्व विजेता भारत केशरी
दारा सिंह जी रंधावा जी की
पावन जयंती है,,,,,,

संभवतः कुश्ती जगत के एवं बॉलीवुड के लोगों को और उन लोगों को,,जिन्होंने इनकी
प्रत्येक उपलब्धि पर तालियाँ बजाई,,आनंदित हुए,,,सभी ने उन्हें बिसरा दिया,,,,

ठीक ही कहा है,,,,दृष्टि से ओझल,,,दिमाग से ओझल,,,,,
Out of Sight,
Out of Mind.

ये सदा अपराजित रहे,,,,,,

पावन जयंती के अवसर पर देश वासियों का नमन,,कोटि कोटि वंदन,,,


दारा सिंह (जन्म:19 नवम्बर, 1928, अमृतसर – मृत्यु: 12 जुलाई, 2012 मुम्बई) अपने जमाने के विश्व प्रसिद्ध फ्रीस्टाइल पहलवान और प्रसिद्ध अभिनेता थे। दारा सिंह 2003-2009 तक राज्यसभा के सदस्य भी रहे। दारा सिंह ने खेल और मनोरंजन की दुनिया में समान रुप से नाम कमाया और अपने काम का लोहा मनवाया। यही वजह है कि उन्हें अभिनेता और पहलवान दोनों तौर पर जाना जाता है।

1966 में दारा सिंह को रुस्तम-ए-पंजाब का खिताब से नवाजा गया।
1978 में दारा सिंह को रुस्तम-ए-हिंद के खिताब से नवाजा गया।

उन्होंने 1959 में पूर्व विश्व चैम्पियन जार्ज गार्डीयांका को पराजित करके कॉमनवेल्थ की विश्व चैम्पियनशिप जीती थी।

बाद में वे अमरीका के विश्व चैम्पियन लाऊ थेज को पराजित कर फ्रीस्टाइल कुश्ती के विश्व चैम्पियन बन गये।

—आरम्भिक जीवन

अखाड़े से फ़िल्मी दुनिया तक का सफर दारा सिंह के लिए काफ़ी चुनौती भरा रहा। बचपन से ही पहलवानी के दीवाने रहे दारा सिंह का पूरा नाम दारा सिंह रंधावा है। हालांकि चाहने वालों के बीच वे दारा सिंह के नाम से ही जाने गए। सूरत सिंह रंधावा और बलवंत कौर के बेटे दारा सिंह का जन्म 19 नवंबर 1928 को पंजाब के अमृतसर के धरमूचक (धर्मूचक्क या धर्मूचाक या धर्मचुक) गांव के जाट-सिख परिवार में हुआ था। उस समय देश में अंग्रेज़ों का शासन था। दारा सिंह के पिताजी बाहर रहते थे। दादाजी चाहते कि बडा होने के कारण दारा स्कूल न जाकर खेतों में काम करे और छोटा भाई पढाई करे। इसी बात को लेकर लंबे समय तक झगड़ा चलता रहा।

—पहलवानी का शौक

दारा सिंह को बचपन से ही पहलवानी का शौक़ था। अपनी किशोर अवस्था में दारा सिंह दूध व मक्खन के साथ 100 बादाम रोज खाकर कई घंटे कसरत व व्यायाम में गुजारा करते थे। कम उम्र में ही दारा सिंह के घरवालों ने उनकी शादी कर दी। नतीजतन महज 17 साल की नाबालिग उम्र में ही एक बच्चे के पिता बन गए लेकिन जब उन्होंने कुश्ती की दुनिया में नाम कमाया तो उन्होंने अपनी पसन्द से दूसरी शादी सुरजीत कौर से की। दारा सिंह के परिवार में तीन पुत्रियाँ और तीन पुत्र हैं।

—कुश्ती में करियर

दारा सिंह अपने जमाने के विश्व प्रसिद्ध फ्रीस्टाइल पहलवान रहे। साठ के दशक में पूरे भारत में उनकी फ्री स्टाइल कुश्तियों का बोलबाला रहा। दारा सिंह को पहलवानी का शौक़ बचपन से ही था। बचपन अपने फार्म पर काम करते-करते गुजर गया, जिसके बाद ऊंचे कद मजबूत काठी को देखते हुए उन्हें कुश्ती लड़ने की प्रेरणा मिलती रही। दारा सिंह ने अपने घर से ही कुश्ती की शुरूआत की। दारा सिंह और उनके छोटे भाई सरदारा सिंह ने मिलकर पहलवानी शुरू कर दी और धीरे-धीरे गांव के दंगलों से लेकर शहरों में कुश्तियां जीतकर अपने गांव का नाम रोशन करना शुरू कर दिया और भारत में अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश में जुट गए। दारा सिंह ने अखाड़े में पहलवानी सीखी। उस दौर में दारा सिंह को राजा महाराजाओं की ओर कुश्ती लड़ने का न्यौता मिला करता था। हाटों और मेलों में भी कुश्ती की और कई पहलवानों को पटखनी दी।

—राष्ट्रीय चैंपियन

भारत की आज़ादी के दौरान 1947 में दारा सिंह सिंगापुर पहुंचे। वहां रहते हुए उन्होंने भारतीय स्टाइल की कुश्ती में मलेशियाई चैंपियन त्रिलोक सिंह को पराजित कर कुआलालंपुर में मलेशियाई कुश्ती चैम्पियनशिप जीती। उसके बाद उनका विजयी रथ अन्य देशों की ओर चल पड़ा और एक पेशेवर पहलवान के रूप में सभी देशों में अपनी कामयाबी का झंडा गाड़कर वे 1952 में भारत लौट आए। क़रीब पांच साल तक फ्री स्टाइल रेसलिंग में दुनियाभर (पूर्वी एशियाई देशों) के पहलवानों को चित्त करने के बाद दारा सिंह भारत आकर सन 1954 में भारतीय कुश्ती चैंपियन (राष्ट्रीय चैंपियन) बने। दारा सिंह ने उन सभी देशों का एक-एक करके दौरा किया जहां फ्रीस्टाइल कुश्तियां लड़ी जाती थीं।

—विश्व चैंपियन

इसके बाद उन्होंने कॉमनवेल्थ देशों का दौरा किया और विश्व चैंपियन किंग कॉन्ग को भी धूल चटा दी। दारा सिंह की लोकप्रियता से भन्नाए कनाडा के विश्व चैंपियन जार्ज गार्डीयांका और न्यूजीलैंड के जॉन डिसिल्वा ने 1959 में कोलकाता में कॉमनवेल्थ कुश्ती चैंपियनशिप में उन्हें खुली चुनौती दे डाली।

नतीजा वही रहा। यहां भी दारा सिंह ने दोनों पहलवानों को हराकर विश्व चैंपियनशिप का खिताब हासिल किया। कॉमनवेल्थ चैपियनशिप के बाद दारा सिंह का मिशन था पूरी दुनिया को अपना दम-खम दिखाना। भारत के इस पहलवान ने दुनिया के लगभग हर देश के पहलवान को चित किया। आखिरकार अमेरिका के विश्व चैंपियन लाऊ थेज को 29 मई 1968 को पराजित कर फ्रीस्टाइल कुश्ती के विश्व चैंपियन बन गए। कुश्ती का शहंशाह बनने के इस सफर में दारा सिंह ने पाकिस्तान के माज़िद अकरा, शाने अली और तारिक अली, जापान के रिकोडोजैन, यूरोपियन चैंपियन बिल रॉबिनसन, इंग्लैंड के चैपियन पैट्रॉक समेत कई पहलवानों का गुरूर मिट्टी में मिला दिया। 1983 में कुश्ती से रिटायरमेंट लेने वाले दारा सिंह ने 500 से ज़्यादा पहलवानों को हराया और ख़ास बात ये कि ज़्यादातर पहलवानों को दारा सिंह ने उन्हीं के घर में जाकर चित किया। उनकी कुश्ती कला को सलाम करने के लिए 1966 में दारा सिंह को रुस्तम-ए-पंजाब और 1978 में रुस्तम-ए-हिंद के खिताब से नवाज़ा गया।

दारा सिंह ने क़रीब 36 साल तक अखाड़े में पसीना बहाया और अब तक लड़ी कुल 500 कुश्तियों में से दारा सिंह एक भी नहीं हारे, जिसकी बदौलत उनका नाम ऑब्जरवर न्यूजलेटर हॉल ऑफ फेम में दर्ज है। दारा सिंह की कुश्ती के दीवानों में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू समेत कई दूसरे प्रधानमंत्री भी शामिल थे। सही मायने में दारा सिंह कुश्ती के दंगल के वो शेर थे, जिनकी दहाड़ सुनकर बड़े-बड़े पहलवानों ने दुम दबाकर अखाड़ा छोड़ दिया।

—फ़िल्मी करियर

लगभग 60 साल तक दारा सिंह ने हिंदुस्तान के दिल पर राज किया है। आज की पीढ़ी को शायद अंदाज़ा भी ना हो कि अखाड़े से अदाकारी के मैदान में उतरे दारा सिंह बॉलीवुड के पहले हीमैन माने जाते हैं। वो टारजन सीरीज़ की फ़िल्मों के हीरो रहे हैं। दारा सिंह अपनी मजबूत कद काठी की वजह से फ़िल्मों में आए। फ़िल्म अभिनेत्री मुमताज़ का करियर संवारने में भी सबसे बड़ा सहारा दारा सिंह का साथ ही साबित हुआ। बॉलीवुड में बॉडी दिखाकर स्टारडम पाने का रास्ता ना खुलता, अगर दारा सिंह ना होते। जी हां, बॉलीवुड में आज हर सुपरस्टार पर शर्ट खोलकर मसल्स दिखाने की जो धुन सवार है, वो चलन शुरू हुआ था दारा सिंह के जरिए। जिस वक्त पूरी दुनिया में दारा सिंह की पहलवानी का सिक्का चल रहा था, तब 6 फीट 2 इंच लंबे इस गबरू जट्ट पर बॉलीवुड इस कदर फिदा हुआ कि पहलवान दारा सिंह बन गए अभिनेता दारा सिंह। दारा सिंह ने अपने समय की मशहूर अदाकारा मुमताज़ के साथ हिंदी की स्टंट फ़िल्मों में प्रवेश किया और कई फ़िल्मों में अभिनेता बने। दारा सिंह ने मुमताज़ के 16 फ़िल्मों में साथ काम किया। यही नहीं कई फ़िल्मों में वह निर्देशक व निर्माता भी बने। दारा सिंह ने कई हिंदी फ़िल्मों का निर्माण किया और उसमें खुद हीरो रहे।

–पहली फ़िल्म

दारा सिंह की पहली फ़िल्म ‘संगदिल’ 1952 में रिलीज़ हुई, जिसमें दिलीप कुमार और मधुबाला मुख्य भूमिकाओं में थे। 1955 में वो फ़िल्म ‘पहली झलक’ में पहलवान बनकर आए, जिसमें मुख्य किरदार किशोर कुमार और वैजयंती माला ने निभाया था। कुश्ती और फ़िल्मों में एक साथ मौजूदगी दर्ज़ कराते रहे दारा सिंह की बतौर हीरो पहली फ़िल्म थी ‘जग्गा डाकू’, जिसके बाद वो बॉलीवुड के पहले एक्शन हीरो के तौर पर छा गए।

–मुख्य फ़िल्में

दारा सिंह की असल पहचान बनी 1962 में आई फ़िल्म ‘किंग कॉन्ग’ से। इस फ़िल्म ने उन्हें शोहरत के आसमान पर पहुंचा दिया।इस फिल्म में दारा सिंह की नायिका थी “कुमकुम” जो कि प्रसिद्द भोजपुरी फिल्म “गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबो”(१९६३) कि नायिका थी,,,, ये फ़िल्म कुश्ती पर ही आधारित थी। किंग कांग के बाद रुस्तम-ए-रोम, रुस्तम-ए-बगदाद, रुस्तम-ए-हिंद,सैमसन,हरक्युलस,फौलाद,आदि फ़िल्में कीं। सभी फ़िल्में सफल रहीं। मशहूर फ़िल्म आनंद में भी उनकी छोटी-सी किंतु यादगार भूमिका थी। उन्होंने कई फ़िल्मों में अलग-अलग किरदार निभाए हैं। वर्ष 2002 में शरारत, 2001 में फर्ज, 2000 में दुल्हन हम ले जाएंगे, कल हो ना हो, 1999 में ज़ुल्मी, 1999 में दिल्लगी और इस तरह से अन्य कई फ़िल्में।

इनकी यादगार फ़िल्में थीं,,,
लुटेरा एवं सिकंदरेआजम,,,
इन दोनों ही फिल्मों में स्वर्गीय
पृथ्वी राज कपूर ने अभिनय किया था,,,,

लुटेरा फिल्म की नायिका थीं निशि(अभिनेता अरमान कोहली की माँ एवं निर्माता राजकुमार कोहली की पत्नी,,,,

इस फिल्म में पृथ्वीराज कपूर इनके बड़े भाई बने थे,,,

सिकंदरे आजम में ये सिकंदर बने थे तथा की नायिका थीं मुमताज,,,
पृथ्वीराज कपूर जी पोरस बने
थे एवं प्रेमनाथ तथा प्रेम चोपड़ा उनके पुत्र बने थे,,,

–मुमताज़ से जुगलबंदी

अपने 60 साल लंबे फ़िल्मी करियर में दारा सिंह ने 100 से ज्यादा फ़िल्मों में काम किया जिनमें सबसे ज्यादा 16 फ़िल्में अभिनेत्री मुमताज़ के साथ की। मुमताज़ के साथ दारा सिंह की जोड़ी बनी 1963 में फ़िल्म ‘फौलाद’ से। शोख-चुलबुली मुमताज़ और हीमैन दारा सिंह की जोड़ी का जादू क़रीब पांच साल तक सिल्वर स्क्रीन पर छाया रहा। दारा सिंह और मुमताज़ ने ‘वीर भीमसेन’, ‘हरक्यूलिस’, ‘आंधी और तूफान’, ‘राका’, ‘रुस्तम-ए-हिंद’, ‘सैमसन’, ‘सिकंदर-ए-आज़म’, ‘टारज़न कम्स टु डेल्ही’, ‘टारज़न एंड किंगकांग’, ‘बॉक्सर’, ‘जवां मर्द’ और ‘डाकू मंगल सिंह’ समेत क़रीब डेढ़ दर्ज़न फ़िल्मों में साथ काम किया।

—फ़िल्म निर्माता-निर्देशक

कुश्ती के बाद दारा सिंह को सबसे ज़्यादा प्यार फ़िल्मों से ही रहा। उन्होंने मोहाली के पास दारा स्टूडियो बनाया और ढे़र सारी फ़िल्में भी। उन्होंने पहली फ़िल्म बनाई अपनी मातृभाषा पंजाबी में ‘नानक दुखिया सब संसार’। भक्ति भावना वाली यह फ़िल्म जबर्दस्त हिट रही। इसके बाद ‘ध्यानी भगत’, ‘सवा लाख से एक लडाऊं’ व ‘भगत धन्ना जट्ट’ आदि फ़िल्मों का निर्माण भी उन्होंने किया। दारा सिंह ने हिंदी और पंजाबी में 8 फ़िल्में निर्मित कीं, 8 फ़िल्मों का निर्देशन किया और 7 फ़िल्मों की कहानी भी खुद ही लिखी। सौ से ज़्यादा फ़िल्मों में अदाकारी कर चुके दारा सिंह की आखिरी यादगार फ़िल्म थी 2007 में इम्तियाज अली की फ़िल्म ‘जब वी मेट’, जिसमें उन्होंने करीना कपूर के दादाजी का किरदार निभाया। वो आखिरी दम तक फ़िल्मों में जुड़ा रहना चाहते थे, लेकिन बढ़ती उम्र और बिगड़ती सेहत साथ नहीं दे रही थी, लिहाज़ा दारा सिंह ने 2011 में लाइट-कैमरा और एक्शन को अलविदा कह दिया।

—धारावाहिक रामायण में हनुमान

कोई एक किरदार कैसे किसी की मुकम्मल पहचान बदल देता है, इसकी मिसाल हैं दारा सिंह। सीरियल रामायण में हनुमान के किरदार ने उन्हें घर-घर में ऐसी पहचान दी कि अब किसी को याद भी नहीं कि दारा सिंह अपने ज़माने के वर्ल्ड चैंपियन पहलवान थे। ये वो किरदार है, जिसने पहलवान से अभिनेता बने दारा सिंह की पूरी पहचान बदल दी। 1986 में रामानंद सागर के सीरियल रामायण में दारा सिंह हनुमान के रोल में ऐसे रच-बस गए कि इसके बाद कभी किसी ने किसी दूसरे कलाकार को हनुमान बनाने के बारे में सोचा ही नहीं। रामायण सीरियल के बाद आए दूसरे पौराणिक धारावाहिक महाभारत में भी हनुमान के रूप में दारा सिंह ही नज़र आए। 1989 में जब ‘लव कुश’ की पौराणिक कथा छोटे परदे पर उतारी गई, तो उसमें भी हनुमान का रोल दारा सिंह ने ही किया। 1997 में आई फ़िल्म ‘लव कुश’ में भी हनुमान बने दारा सिंह।

—विभिन्न धार्मिक चरित्र

1964 में फ़िल्म ‘वीर भीमसेन’ में दारा सिंह ने भीम का रोल निभाया। अगले साल आई फ़िल्म ‘महाभारत’ में भी दारा सिंह ही भीम बने। 1968 में फ़िल्म ‘बलराम श्रीकृष्ण’ में दारा सिंह कृष्ण के बड़े भाई बलराम की भूमिका में नज़र आए। 1971 में फ़िल्म ‘तुलसी विवाह’ में दारा सिंह पहली बार भगवान शिव के रोल में सामने आए। भगवान शिव की भूमिका उन्होंने ‘हरि दर्शन’ और ‘हर-हर महादेव’ में भी निभाई। दारा सिंह को पहली बार हनुमान बनाया निर्माता-निर्देशक चंद्रकांत ने। 1976 में रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘बजरंग बली’ में दारा सिंह हनुमान की भूमिका में थे। इस फ़िल्म में तब तक चॉकलेटी हीरो विश्वजीत राम के रोल में थे, जबकि लक्ष्मण की भूमिका शशि कपूर ने निभाई और रावण बने थे प्रेमनाथ। ‘बजरंग बली’ रिलीज़ होने के बारह साल साल बाद जब रामायण सीरियल शुरू हुआ, तो रामानंद सागर के जेहन में हनुमान के रोल को लेकर कोई दुविधा नहीं थी। वो पूरी तरह इस बात से सहमत थे कि हनुमान की भूमिका के लिए दारा सिंह से बेहतर कोई हो ही नहीं सकता।

—सम्मान और उपाधि

1966 में दारा सिंह को रुस्तम-ए-पंजाब का खिताब से नवाजा गया।
1978 में दारा सिंह को रुस्तम-ए-हिंद के खिताब से नवाजा गया।

उन्होंने 1959 में पूर्व विश्व चैम्पियन जार्ज गार्डीयांका को पराजित करके कॉमनवेल्थ की विश्व चैम्पियनशिप जीती थी।

बाद में वे अमरीका के विश्व चैम्पियन लाऊ थेज को पराजित कर फ्रीस्टाइल कुश्ती के विश्व चैम्पियन बन गये।

—निधन

84 साल का दिल का दौरा पड़ने से 12 जुलाई 2012 को निधन हुआ। इस प्रकार एक सफल पहलवान, एक सफल अभिनेता, निर्देशक और निर्माता के तौर पर दारा सिंह ने अपने जीवन में बहुत कुछ पाया और साथ ही देश का गौरव बढ़ाया।

सदा सर्वदा सुमंगल,,
हर हर महादेव,
जय भवानी,
जय श्री राम,

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विजय जरिशन पांडेय

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एक अमरीकी अभिनेत्री ग्रेटागार्बो का नाम आपने सुना होगा। वह यूरोप के एक छोटे से देश में एक गरीब घर में पैदा हुई। और एक बाल बनाने के सैलून में दाढ़ी पर साबुन लगाने का काम करती रही जब तक उन्नीस वर्ष की थी। दो पैसे में दाढ़ी पर साबुन लगाने का काम नाई की दुकान में करती रही। एक अमरीकी यात्री ने–वह उसकी दाढ़ी पर साबुन लगा रही थी–और आईने में उसका चेहरा देखा और कहा कि बहुत सुंदर है! बहुत सुंदर है!

ग्रेटा ने उससे कहा, क्या कहते हैं आप? मुझे आज छह वर्ष हो गए लोगों की दाढ़ी पर साबुन लगाते, किसी ने मुझसे कभी नहीं कहा कि मैं सुंदर हूं। आप कहते क्या हैं? मैं सुंदर हूं?

उस अमरीकन ने कहा, बहुत सुंदर! मैंने बहुत कम इतनी सुंदर स्त्रियां देखी हैं।

ग्रेटागार्बो ने अपनी आत्मकथा में लिखा है: मैं उसी दिन पहली दफा सुंदर हो गई। एक आदमी ने मुझे सुंदर कहा था। मुझे खुद भी खयाल नहीं था। मैं उस दिन घर लौटी और आईने के सामने खड़ी हुई और मुझे पता लगा कि मैं दूसरी औरत हो गई हूं!

वह लड़की जो उन्नीस साल की उम्र तक केवल साबुन लगाने का काम करती रही थी, वह अमरीका की बाद में श्रेष्ठतम अभिनेत्री साबित हुई। और उसने जो धन्यवाद दिया, उसी अमरीकी को दिया, जिसने उसे पहली दफा सुंदर कहा था। उसने कहा कि अगर उस आदमी ने उस दिन वे दो शब्द न कहे होते तो शायद मैं जीवन भर वही साबुन लगाने का काम करती रहती। मुझे खयाल ही नहीं था कि मैं सुंदर भी हूं। और हो सकता है उस आदमी ने बिलकुल ही सहज कहा हो। हो सकता है उस आदमी ने सिर्फ शिष्टाचार में कहा हो। और हो सकता है उस आदमी ने कुछ खयाल ही न किया हो, सोचा भी न हो कि मैं यह क्या कह रहा हूं, बिलकुल कैजुअल रिमार्क रहा हो। और उसे पता भी न हो कि मेरे एक शब्द ने एक स्त्री के भीतर सौंदर्य की प्रतिमा को जन्म दे दिया है। वह जाग गई, उसके भीतर जो चीज सोई थी।

जिन लोगों से काम लेना हो उनके भीतर जो सोया है उसे जगाना जरूरी है। इसलिए वे जो हैं, इस पर ध्यान देने की कम जरूरत है; वे जो हो सकते हैं, इस पर ध्यान देने की ज्यादा जरूरत है; अगर मित्रों से कोई बड़ा काम लेना हो। नहीं तो काम नहीं लिया जा सकता। अगर मैं कभी मित्रों को कहता हूं कि फलां आदमी से काम लो। मुझे बता दिया जाता है कि वह आदमी बुरा है, वह आदमी बेईमान है, या उस आदमी का भरोसा नहीं किया जा सकता।
यह ठीक है कि आदमी बुरा है, आदमी बेईमान है। कौन आदमी बुरा नहीं? कौन आदमी बेईमान नहीं? लेकिन वह आदमी क्या हो सकता है, सवाल यह है। वह क्या है, यह सवाल ही नहीं है। हमें उसके भीतर उसको पुकार लेना है जो वह हो सकता है, अगर उससे कोई बड़ा काम लेना हो।

गांधी के आश्रम में कृपलानी भोजन बनाते रहे, रसोइये का काम करते रहे। एक अमरीकी पत्रकार आश्रम में ठहरा हुआ था। उसने पूछा कि यह आदमी जे.बी.कृपलानी मालूम होता है जो खाना बनाता है आपका!

कृपलानी बर्तन साफ करते थे, उन्होंने कहा कि यह जो बूढ़ा है, अदभुत है! असल में मैं रसोइये के योग्य ही था। और इस आदमी ने मेरे भीतर वह जगा दिया जिसका कोई हिसाब नहीं!

छोटे-छोटे आदमी के भीतर जादू घटित हो सकता है। एक दफा हम उसे पुकारें और उसकी आत्मा में जो सोया है उसे निकट लाएं, उस पर विश्वास करें। उसके भीतर जो सोया है उसको आवाज दें, उसको चुनौती खड़ी करें। उसके भीतर बहुत कुछ निकल सकता है। और एक बड़े से बड़े आदमी को हम निराश कर सकते हैं। एक श्रेष्ठतम व्यक्ति को हम कह सकते हैं कि तुम कुछ भी नहीं हो। और अगर दस-पांच दफा सब तरफ से उसे यही सुनाई पड़े कि वह कुछ भी नहीं है, तो निश्चित मानना वह कुछ भी नहीं हो जाएगा।

अनंत की पुकार👣ओशो

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Marriage invitation card of Pandit Jawaharlal Nehru. Where is “Om” ? Where is Ganesha and his Stotra ? Where is Swastika ? Where is Kalasha ? Is this the card of a Pandit ?  Urdu mixed Persian is the language not Sanskrit or Hindi is the language without any auspicious symbol or words of Hindus. Whereas during those times, in my area, all bramhin’s marriage invitation cards were in Sanskrit. (Please draw your own conclusions about Giyasuddin Gazi and his successors. 😀)

पहले कार्ड में ये लिखा है – इल्तिजा है कि बरोज़ शादीबरखुर्दार जवाहर लाल नेहरूतारीख 7 फरवरी सन् 1916, बवक़्त 4 बजे शामजनाब मआ अज़ीज़ानग़रीब ख़ाना पर चा नोशी फ़रमा करब हमरही नौशादौलत ख़ाना समधियान पर तशरीफ़ शरीफ़अरज़ानी फ़रमाएंबंदा मोती लाल नेहरूनेहरू वेडिंग कैम्पअलीपुर रोड, दिल्ली

दूसरा दावत नामा जो कि मोतीलाल नेहरू की तरफ से मेहमानों को आनंद भवन (इलाहाबाद) में बुलाते हुए छपवाया गया था, उसे भी देखियेःतमन्ना है कि बतक़रीब शादीबरख़ुर्दार जवाहर लाल नेहरूसाथदुख़्तर पंडित जवाहर मल कौलबमुक़ाम देहलीबतारीख़ 7 फरवरी, सन् 1916 व तक़ारीबमाबाद बतवारीख़8 और 9 फरवरी, सन् 1916जनाब मआ अज़ीज़ान शिरकत फ़रमा करमुसर्रत और इफ़्तेख़ार बख़्शेंबंदा मोती लाल नेहरूमुंतज़िर जवाबआनंद भवन इलाहाबाद

तीसरा कार्ड बहुरानी यानी कमला कौल के स्वागत कार्यक्रम से संबंधित था जिसमें खाने के इंतेजाम का जिक्र था और अजीज लोगों से दावत में शामिल होने की गुजारिश थी। ये कार्ड दो पन्नों में छपा था। कार्ड के शब्द इस प्रकार से हैः शादीबरख़ुर्दार जवाहर लाल नेहरूसाथदुख़्तर पंडित जवाहर मल कौल साहब, आरज़ू है कि बतक़रीब आमदन बहूरानीतारीख़ 9 फ़रवरी, सन् 1916 बवक़्त 8 बजे शामजनाब मअ अज़ीज़ान ग़रीबख़ाना पर तनावुल मा हज़र फ़रमा करमुसर्रत व इफ़्तेख़ार बख़्शेंबंदा मोती लाल नेहरूनेहरू वेडिंग कैम्प अलीपुर रोड, देहली

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