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॥ ब्रह्मबिन्दु-उपनिषत् ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्योऽरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
मनो हि द्विविधं प्रोक्तं शुद्धं चाशुद्धमेव च ।
अशुद्धं कामसङ्कल्पं शुद्धं कामविवर्जितम् ॥ १ ॥
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।
बन्धाय पिष्यासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम् ॥ २ ॥
यतो निर्विषयस्यास्य मनसो मुक्तिरिष्यते ।
अतो निर्विषयं नित्यं मनः कार्यं मुमुक्षुणा ॥ ३ ॥
निरस्तनिषयासङ्गं सन्निरुद्धं मनो हृदि ।
यदाऽऽयात्यात्मनो भावं तदा तत्परमं पदम् ॥ ४ ॥
तावदेव निरोद्धव्यं यावद्धृति गतं क्षयम् ।
एतज्ज्ञानं च ध्यानं च शेषो न्यायश्च विस्तरः ॥ ५ ॥
नैव चिन्त्यं न चाचिन्त्यं न चिन्त्यं चिन्त्यमेव च ।
पक्षपातविनिर्मुक्तं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥ ६ ॥
स्वरेण सन्धयेद्योगमस्वरं भावयेत्परम् ।
अस्वरेणानुभावेन नाभावो भाव इष्यते ॥ ७ ॥
तदेव निष्कलं ब्रह्म निर्विकल्पं निरञ्जनम् ।
तदब्रह्माहमिति ज्ञात्वा ब्रह्म सम्पद्यते ध्रुवम् ॥ ८ ॥
निर्विकल्पमनन्तं च हेतुद्याष्टान्तवर्जितम् ।
अप्रमेयमनादिं च यज्ञात्वा मुच्यते बुधः ॥ ९ ॥
न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः ।
न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥ १० ॥
एक एवाऽऽत्मा मन्तव्यो जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु ।
स्थानत्रयव्यतीतस्य पुनर्जन्म न विद्यते ॥ ११ ॥
एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः ।
एकधा बहुधा चैव दृष्यते जलचन्द्रवत् ॥ १२ ॥
घटसंवृतमाकाशं नीयमानो घटे यथा ।
घटो नीयेत नाऽकाशः तद्धाज्जीवो नभोपमः ॥ १३ ॥
घटवद्विविधाकारं भिद्यमानं पुनः पुनः ।
तद्भेदे न च जानाति स जानाति च नित्यशः ॥ १५ ॥
शब्दमायावृतो नैव तमसा याति पुष्करे ।
भिन्नो तमसि चैकत्वमेक एवानुपश्यति ॥ १५ ॥
शब्दाक्षरं परं ब्रह्म तस्मिन्क्षीणे यदक्षरम् ।
तद्विद्वानक्षरं ध्यायेच्द्यदीच्छेछान्तिमात्मनः ॥ १६ ॥
द्वे विद्ये वेदितव्ये तु शब्दब्रह्म परं च यत् ।
शब्दब्रह्माणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ १७ ॥
ग्रन्थमभ्यस्य मेधावी ज्ञानवीज्ञानतत्परः ।
पलालमिव धान्यार्यी त्यजेद्ग्रन्थमशेषतः ॥ १८ ॥
गवामनेकवर्णानां क्षीरस्याप्येकवर्णता ।
क्षीरवत्पष्यते ज्ञानं लिङ्गिनस्तु गवां यथा ॥ १९ ॥
धृतमिव पयसि निगूढं भूते भूते च वसति विज्ञानम् ।
सततं मनसि मन्थयितव्यं मनु मन्थानभूतेन ॥ २० ॥
ज्ञाननेत्रं समाधाय चोद्धरेद्वह्निवत्परम् ।
निष्कलं निश्चलं शान्तं तद्ब्रह्माहमिति स्मृतम् ॥ २१ ॥
सर्वभूताधिवासं यद्भूतेषु च वसत्यपि ।
सर्वानुग्राहकत्वेन तदस्म्यहं वासुदेवः तदस्म्यहं वासुदेव इति ॥ २२ ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्योऽरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
॥ इति ब्रह्मबिन्दूपनिषत्समाप्ता ॥
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👉👉 एक बहुत अमीर आदमी ने रोड के किनारे एक भिखारी से पूछा.. “तुम भीख क्यूँ मांग रहे हो जबकि तुम तन्दुरुस्त हो…??”

भिखारी ने जवाब दिया… “मेरे पास महीनों से कोई काम नहीं है…
अगर आप मुझे कोई नौकरी दें तो मैं अभी से भीख मांगना छोड़ दूँ”

अमीर मुस्कुराया और कहा.. “मैं तुम्हें कोई नौकरी तो नहीं दे सकता ..
लेकिन मेरे पास इससे भी अच्छा कुछ है…
क्यूँ नहीं तुम मेरे बिज़नस पार्टनर बन जाओ…”

भिखारी को उसके कहे पर यकीन नहीं हुआ…
“ये आप क्या कह रहे हैं क्या ऐसा मुमकिन है…?”

“हाँ मेरे पास एक चावल का प्लांट है.. तुम चावल बाज़ार में सप्लाई करो और जो भी मुनाफ़ा होगा उसे हम महीने के अंत में आपस में बाँट लेंगे..”

भिखारी के आँखों से ख़ुशी के आंसू निकल पड़े…
” आप मेरे लिए जन्नत के फ़रिश्ते बन कर आये हैं मैं किस कदर आपका शुक्रिया अदा करूँ..”

फिर अचानक वो चुप हुआ और कहा.. “हम मुनाफे को कैसे बांटेंगे..?
क्या मैं 20% और आप 80% लेंगे ..या मैं 10% और आप 90% लेंगे..
जो भी हो …मैं तैयार हूँ और बहुत खुश हूँ…”

अमीर आदमी ने बड़े प्यार से उसके सर पर हाथ रखा ..
“मुझे मुनाफे का केवल 10% चाहिए बाकी 90% तुम्हारा ..ताकि तुम तरक्की कर सको..”

भिखारी अपने घुटने के बल गिर पड़ा.. और रोते हुए बोला…
“आप जैसा कहेंगे मैं वैसा ही करूंगा… मैं आपका बहुत शुक्रगुजार हूँ …।

और अगले दिन से भिखारी ने काम शुरू कर दिया ..उम्दा चावल और
बाज़ार से सस्ते… और दिन रात की मेहनत से..बहुत जल्द ही उसकी बिक्री
काफी बढ़ गई… रोज ब रोज तरक्की होने लगी….

और फिर वो दिन भी आया जब मुनाफा बांटना था.

और वो 10% भी अब उसे बहुत ज्यादा लग रहा था… उतना उस भिखारी ने कभी सोचा भी नहीं था… अचानक एक शैतानी ख्याल उसके दिमाग में आया…

“दिन रात मेहनत मैंने की है…और उस अमीर आदमी ने कोई भी काम नहीं किया.. सिवाय मुझे अवसर देने की..मैं उसे ये 10% क्यूँ दूँ …वो इसका
हकदार बिलकुल भी नहीं है..।

और फिर वो अमीर आदमी अपने नियत समय पर मुनाफे में
अपना हिस्सा 10% वसूलने आया और भिखारी ने जवाब दिया
” अभी कुछ हिसाब बाक़ी है, मुझे यहाँ नुकसान हुआ है, लोगों से कर्ज की अदायगी बाक़ी है, ऐसे शक्लें बनाकर उस अमीर आदमी को हिस्सा देने को टालने लगा.”

अमीर आदमी ने कहा के “मुझे पता है तुम्हे कितना मुनाफा हुआ है फिर कयुं तुम मेरा हिस्सा देनेसे टाल रहे हो ?”

उस भिखारी ने तुरंत जवाब दिया “तुम इस मुनाफे के हकदार नहीं हो ..क्योंकि सारी मेहनत मैंने की है…”

अब सोचिये…
अगर वो अमीर हम होते और भिखारी से ऐसा जवाब सुनते ..
तो …हम क्या करते ?

ठीक इसी तरह………
भगवान ने हमें जिंदगी दी..हाथ- पैर..आँख-कान.. दिमाग दिया..
समझबूझ दी…बोलने को जुबान दी…जज्बात दिए…”

हमें याद रखना चाहिए कि दिन के 24 घंटों में 10% भगवान का हक है….
हमें इसे राज़ी ख़ुशी भगवान के नाम सिमरन में अदा करना चाहिए.
अपनी Income से 10% निकाल कर अछे कामो मे लगाना चाहिए और…भगवान का शुक्रिया अदा करना चाहिए जिसने हमें जिंदगी दी सुख दिए ….
कृपया ज्यादा से ज्यादा शेयर करें जिससे समस्त सज्जनों को संसार की सत्यता का बोध होता रहे धन्यवाद
Radhe radhe

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एक वैश्या मरी और उसी दिन उसके सामने रहने वाला बूढ़ा सन्यासी भी मर गया,संयोग की बात है।देवता लेने आए सन्यासी को नरक में और वैश्या को स्वर्ग में ले जाने लगे।संन्यासी एक दम अपना डंडा पटक कर खड़ा हो गया,तुम ये कैसा अन्याय कर रहे हो?मुझे नरक में और वैश्या को स्वर्ग में ले जा रहे हो,जरूर कोई भूल हो गई है तुमसे,कोई दफ्तर की गलती रही होगी, पूछताछ करो..मेरे नाम आया होगा स्वर्ग का संदेश और इसके नाम नर्क का।मुझे परमात्मा का सामना कर लेने दो, दो दो बातें हो जाए,सारा जीवन बीत गया शास्त्र पढ़ने में–और ये परिणाम।मुझे नाहक परमात्मा ने धोखे में डाला।उसे परमात्मा के पास ले जाया गया,परमात्मा ने कहा इसके पीछे एक गहन कारण है,वैश्या शराब पीती थी,भोग में रहती थी,पर जब तुम मंदिर में बैठकर भजन गाते थे,धूप दीप जलाते थे,घंटियां बजाते थे,,,तब वह सोचती थी कब मेरे जीवन में यह सौभाग्य होगा,मैं मंदिर में बैठकर भजन कर पाऊंगी कि नहीं,वह ज़ार जार रोती थी,और तुम्हारे धूप दीप की सुगंध जब उसके घर मेम पहुंचती थी तो वह अपना अहोभाग्य समझती थी,घंटियों की आवाज सुनकर मस्त हो जाती थी।लेकिन तुम्हारा मन पूजापाठ करते हुए भी यही सोचता कि वैश्या है तो सुंदर पर वहां तक कैसे पंहुचा जाए?तुम हिम्मत नही जुटा पाए,,तुम्हारी प्रतिष्ठा आड़े आई–गांव भर के लोग तुम्हें संयासी मानते थे।जब वैश्या नाचती थी,शराब बंटती थी,तुम्हारे मन में वासना जगती थी तुम्हें रस था खुद को अभागा समझते रहे..इसलिए वैश्या को स्वर्ग लाया गया और तुम्हें नरक में।वेश्या को विवेक पुकारता था तुम्हें वासना,वह प्रार्थना करती थी तुम इच्छा रखते थे वासना की।वह कीचड़ में थी पर कमल की भांति ऊपर उठती गईऔर तुम कमल बनकर आए थे कीचड़ में धंसे रहे।असली सवाल यह नहीं कि तुम बाहर से क्या हो,,,असली सवाल तो यह है कि तुम भीतर से क्या हो?
भीतर ही निर्णायक है।

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महारानी पद्मावती की ऐतिहासिकता के प्रमाण :-
जौनपुर सुल्तान के राज्य में सूफी सन्त मालिक मुहम्मद जायसी ने 1540 ईसवी में अवधी भाषा में “पद्मावत” काव्य की रचना की जिसने महारानी पद्मावती के आख्यान को लोकप्रिय बना दिया | उसी शती में चित्तौर के महाराणा रत्नसिंह के प्रमुख सामन्त गोरा और बादल पर भी (हेमरतन द्वारा ‘गोरा बादल पद्मिनी चौपाल’) लोकगाथाएं लिखी गयीं | और भी अनेक कथाएं और गीत प्रचलित हुए, मोटे तौर पर उन सबकी मूल कथाओं में साम्य है, जिस कारण आधुनिक युग के छद्म-सेक्युलर इतिहासकारों का कथन है कि महारानी पद्मावती केवल साहित्यिक कल्पना हैं जिनका आधार जायसी की कल्पना है |
“पद्मावत” काव्य के अनुसार चित्तौर शरीर की प्रतीक है, महाराणा रत्नसिंह (पद्मावत में रतनसेन) उस शरीर के मन हैं, सिंहल हृदय है जहां की राजकुमारी पद्मावती थीं, पद्मावती ज्ञान की प्रतीक थीं, और अलाउद्दीन वासना का |
“पद्मावत” काव्य के अनुसार नारियां चार प्रकार की होती हैं जिनमें सर्वोत्तम नारियों को “पद्मिनी” कहा जाता है, वे केवल सिंहल में ही होती हैं और उनमें सर्वोत्तम का नाम पद्मावती था | जिन लोगों ने “पद्मावत” काव्य नहीं पढ़ा वे पद्मावती को ही पद्मिनी भी कह देते हैं, यद्यपि पद्मावती व्यक्तिवाचक नाम है और पद्मिनी नारियों के एक प्रकार का |
“पद्मावत” काव्य में अनेक काल्पनिक बातों का समावेश है, जैसा कि साहित्यिक कृतियों में प्रायः होता है, और एक ब्राह्मण ‘राघव चेतन’ को विश्वासघाती बताया गया है जिसने दिल्ली जाकर अलाउद्दीन को पद्मिनी किस्म की सिंहल नारियों के बारे में जानकारी दी | सूफी सन्तों में ब्राह्मणों के प्रति द्वेष आम बात रही है, क्योंकि हिन्दू समाज में ब्राह्मणों को अपदस्थ करके ये सूफी हिन्दुओं का आध्यात्मिक गुरु बनना चाहते थे | इन साहित्यिक रचनाओं के विवेचन में न जाकर यहाँ केवल ऐतिहासिक तथ्यों पर बात करें — “पद्मावत” काव्य के अनुसार महारानी पद्मावती के साथ वहाँ की सभी नारियों ने अलाउद्दीन से इज्जत बचाने के लिए जौहर किया था |
यह बात सच है कि जायसी से पहले रानी पद्मावती के नाम का कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिलता, जिसको आधार बनाकर इरफ़ान हबीब और सतीश चन्द्र जैसे कुछ आधुनिक सेक्युलर (हिन्दू-विरोधी) इतिहासकारों का कहना है कि रानी पद्मावती केवल कवि की कल्पना है | इस आधुनिक ‘खोज’ के पीछे मंशा है अलाउद्दीन के दामन पर लगे दाग को धोना |
अब अलाउद्दीन के काल के प्रत्यक्षदर्शी प्रमाण की बात करें | अलाउद्दीन ने 28 जनवरी 1303 ईस्वी (जूलियन कैलेन्डर) को चित्तौर पर आक्रमण किया, किन्तु आठ महीनों की घेराबन्दी के बाद ही चित्तौर पर कब्जा कर सका | उसके दरबारी लेखक अमीर खुसरो ने  “खजा’इन उल फुतूह” (“जीत के खजाने”) पुस्तक में इस युद्ध का वर्णन किया, जिसमें वह अलाउद्दीन के साथ गया था और अलाउद्दीन ने जब चित्तौरगढ़ के भीतर प्रवेश किया तब अमीर खुसरो भी सुलतान के साथ था | अमीर खुसरो के अनुसार उन आठ महीनों में दो बार गढ़ पर सीधा आक्रमण किया गया जिसमें सुलतान की पराजय हुई | अन्त में अलाउद्दीन की विजय युद्ध के कारण नहीं हुई इसपर सारे इतिहासकार एकमत हैं, उनका मानना है कि गढ़ के भीतर रसद समाप्त होने पर था | जायसी के अनुसार इसी कारण राजपूतों ने सन्धि का प्रस्ताव स्वीकारा, किन्तु बाद में सुलतान ने धोखा दिया |
26 अगस्त 1303 को अलाउद्धीन ने चुने हुए दरबारियों के साथ चित्तौरगढ़ में प्रवेश किया, उन चहेतों में अमीर खुसरो भी था | हिन्दू-विरोधी इतिहासकारों का तर्क है कि अमीर खुसरो ने जौहर का उल्लेख नहीं किया | किन्तु चित्तौरगढ़ में अलाउद्दीन के साथ प्रवेशकाल का अमीर खुसरो ने निम्नोक्त वर्णन किया था :-
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“अल हिजरी 703 के मुहर्रम मास की 11 तारीख को सोमवार के दिन हमारे युग के सुलेमान (अलाउद्दीन) अपने हवाई आसन (पालकी) पर सवार होकर गढ़ में घुसे जिसमें परिन्दे भी नहीं घुस सकते थे | उस (सुलतान) के नौकर (अमीर खुसरो) , जो सुलेमान की चिड़िया थे, भी साथ थे (गाने वाली पालतू चिड़िया, अमीर खुसरो सबसे प्रसिद्ध दरबारी गायक थे)| वे बारम्बार चिल्लाए – “हुदहुद, हुदहुद” (यह सुलेमान की चिड़िया का नाम था)| लेकिन मैं जवाब नहीं दे सका, क्योंकि मुझे सुल्तान के गुस्से का डर था कि सुलतान पूछते — “हुदहुद को मैं क्यों नहीं देखता, या फिर हुदहुद भी लापता (लोगों/नारियों) में से है?” और तब मैं अपनी गैरहाजिरी का कौन सा बहाना बनाता जब सुलतान पूछते – “साफ़ साफ़ कारण बताओ !” यदि सुलतान गुस्से में कहते – “मैं उसे (हुदहुद को)  दण्ड दूंगा”, तो बेचारी कमजोर चिड़िया उस दण्ड को सहने की ताक़त कहाँ से लाती?”

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कुरान के सूर-27 की 22 से 28 वीं आयतों में सुलेमान (सोलोमन) राजा की कथा है जिसमें उल्लेख है कि सुलेमान की सेना जब विदेश में हमला करने गयी तो उसमें एक पालतू चिड़िया हुदहुद भी थी जो सुलेमान के शिविर में एक बार  अनुपस्थित पायी गयी | सुलेमान के बारम्बार बुलाने पर हुदहुद आयी और कहा कि वह “शेबा” राज्य (बाइबिल में बारम्बार इसका उल्लेख है) की रानी बिलकिस के यहाँ गयी थी जो सूर्य को पूजने वाली शक्तिशाली और बुद्धिमती रानी थी | सुलेमान ने रानी बिलकिस को सूर्यपूजा त्यागकर इस्लाम अपनाने का सन्देश भेजा तो बिलकिस ने इनकार किया, किन्तु पुनः सन्देश आने पर डरकर इस्लाम कबूल कर लिया |
उसी प्राचीन कथा का अमीर खुसरो ने चित्तौर में प्रवेश के काल में उल्लेख किया, किन्तु उस प्राचीन कथा से एक अन्तर था – अमीर खुसरो के युग के सुलेमान (अलाउद्दीन) ने शेबा राज्य (चित्तौर) पर तो कब्जा कर लिया लेकिन उसे कोई रानी बिलकिस (पद्मिनी) नहीं मिली जिस कारण अलाउद्दीन आगबबूला था !!
अमीर खुसरो ने अलाउद्दीन के भय से रानी पद्मिनी के जौहर का स्पष्ट वर्णन नहीं किया क्योंकि उस युग में अशुभ सूचना देने वालों पर सुलतान कुपित हो जाते थे ऐसी अनेक घटनाओं का उल्लेख इतिहास में मिलता है | किन्तु अमीर खुसरो ने स्पष्ट उल्लेख कर दिया कि चित्तौर में घुसने का मुख्य उद्देश्य वहां की रानी पर अधिकार ज़माना था जिसमें असफल होने के कारण सुलतान अत्यधिक क्रोध में था | अमीर खुसरो ने अलाउद्दीन के क्रोध का आगे भी वर्णन किया – खुसरो के अनुसार उसी दिन अलाउद्दीन ने हिन्दू सैनिकों को मारने के बाद सभी हिन्दुओं के सामूहिक कत्लेआम का हुक्म दिया, जिस कारण खुसरों के शब्दों में “तीस हज़ार (सैनिकों के अलावा) अन्य हिन्दू सूखे घास की तरह काट डाले गए” – जिस कारण “लगता था कि खिज्राबाद के मैदान में घास की बजाय पुरुष उगते थे” (केवल हिन्दू पुरुष मारे गए, क्योंकि उन सबकी नारियों ने जौहर कर लिया था जो सुलतान के क्रोध का असली कारण था)| अलाउद्दीन ने चित्तौर पर कब्जा करने के बाद अपने नाबालिग बेटे खिज्र खां के नाम पर गढ़ का नाम खिज्राबाद रख दिया था |
अलाउद्दीन को हिन्दू नारियों की कितनी भूख थी इसका उल्लेख अमीर खुसरो ने भी उल्लेख किया — खुसरो के अनुसार अलाउद्दीन के कारण रणथम्भौर की नारियों ने सामूहिक जौहर किया, गुजरात की रानी कमलादेवी को अलाउद्दीन अपने हरम मे ले आया, उसकी बेटी देवलदेवी  पर कब्जा करके अपने बेटे खिज्र खां से शादी कराने के लिए उसने यादव राज्य को नष्ट कर डाला | अलाउद्दीन की कामवासना कितनी भयंकर थी इसका सबसे बड़ा प्रमाण तो यह है कि जब अगस्त महीने में दिल्ली पर मंगोलों का हमला हो रहा था तब भी अलाउद्दीन चित्तौर में घुसने का प्रयास कर रहा था | दिल्ली को बचाने के लिए ही अलाउद्दीन ने सन्धि का झूठा प्रस्ताव रखकर चित्तौर में प्रवेश किया और एक सप्ताह तक कत्लेआम मचाने के बाद जब उसे लगा कि दिल्ली अब हाथ से निकल जायेगी तब जाकर वह दिल्ली लौटा, किन्तु उसे लौटने में देर हो गयी थी | दिल्ली पर कब्जा करके मंगोलों ने भयंकर लूट-मार मचा दी थी | अलाउद्दीन दिल्ली में घुसने में नाकाम रहा तो अधूरे किले सीरी में पनाह ली | लम्बे अरसे तक मंगोलों से लड़ाई चली, किसी की जीत नहीं हुई, लेकिन मंगोलों को अपने राज्य की चिन्ता थी अतः वे लौट गए | कामवासना से अलाउद्दीन पीड़ित नहीं होता तो राजधानी और पूरे राज्य को खतरे में डालकर चित्तौर को जीतने के एक सप्ताह बाद तक भी वहां गुस्से में आम नागरिकों का कत्लेआम क्यों मचाता रहता ? अतः मलिक मुहम्मद जायसी का कथन सत्य है कि अलाउद्दीन कामवासना का जीता-जागता नमूना था |
आज के वामपन्थी और अन्य हिन्दू-विरोधी इतिहासकारों का कहना है कि अमीर खुसरो ने रणथम्भौर के जौहर का उल्लेख किया किन्तु चित्तौर के जौहर का उल्लेख नहीं किया, अतः चित्तौर में न तो कोई जौहर हुआ और न ही पद्मावती का कोई अस्तित्व था ! चित्तौर में घुसते समय सुलेमान अलाउद्दीन को जिस रानी बिलकिस की तलाश थी वह यदि पद्मावती नहीं थी तो क्या सेक्युलरों की अम्मा थी ? चित्तौर में पद्मावती के नाम और जौहर का वर्णन खोलकर अमीर खुसरो ने किस डर से नहीं किया उसका कारण भी खुसरो ने बता दिया | रणथम्भौर से अलाउद्दीन का वैसा व्यक्तिगत मसला नहीं था जैसा कि चित्तौर की रानी के प्रति था, अतः रणथम्भौर के जौहर का वर्णन करने में खुसरो को भय नहीं हुआ |
आज के “गंगा-जमुनी तहजीब” वाले भ्रष्ट हिन्दू भी अमीर खुसरो का गुणगान करते है, जबकि आम हिन्दुओं के कत्लेआम का खुसरो ने गुणगान किया और लिखा कि इस तरह अलाउद्दीन ने इस्लाम को चित्तौर में जीत दिलाई !!
1568 ईस्वी में अकबर “महान” ने भी चित्तौर पर कब्जा करने के बाद वैसा ही आम कत्लेआम कराया था क्योंकि उसके सैनिकों को हिन्दू नारियां नहीं मिलती थीं — आसपास के सभी किसान भी अपने परिवारों को लेकर चित्तौरगढ़ में पनाह ले चुके थे जिस कारण लम्बे काल तक घेराबन्दी के बाद बलात्कार करने के लिए नारियां नहीं मिलने पर अकबर की सेना में भगदड़ मचने लगी थी | तब अकबर ने भी सन्धि का झूठा प्रस्ताव भेजकर रात में राजपूतों को धोखे से क़त्ल कराया और बाद में आम किसानों का भी क़त्ल कराया | इतिहासकारों का कहना है कि चित्तौर के दूसरे कत्लेआम में भी लगभग तीस हज़ार निहत्थे आम हिन्दू मारे गए थे |
चित्तौर के गौरवशाली इतिहास को कलंकित करने वालों का अपना इतिहास कलंकित है | भुज के राजपूत राजा को बॉलीवुड की एक साइड डान्सर “लीला” पसन्द आ गयी (नर्तकी के पीछे झुण्ड में नाचने वाली को साइड डान्सर कहते हैं)| उससे संजय पैदा हुआ | बाद में राजा ने उसे भगा दिया, जिस कारण संजय को राजपूतों से घृणा हो गयी | मुम्बई में उसकी माँ सिलाई करके गुजरा करती थी, साइड डान्सर का रोल हमेशा तो मिलता नहीं था | एक बेटी भी थी जो वैसा ही काम करती थी | एक ही कमरे में माँ, बेटी और बेटा सोते थे, एक ही बिस्तर पर भाई-बहन और माँ, और उसी कमरे में किचन आदि सबकुछ था | बाद में बॉलीवुड में ऊँची पँहुच वालों से परिचय हुआ तो फ़िल्में बनाने लगे ! ऊँची पँहुच वालों से परिचय कैसे होता है यह खोलकर बताना पडेगा ? (मैं किसी का नाम खोलना नहीं चाहता क्योंकि वे लोग मुकदमा कर देंगे और सारे गवाह मुकर जायेंगे, दावूद जैसे लोग इनके पीछे हैं | आपलोग भी “लीला” की लीला को गोपनीय ही रहने दें, नाम न खोलें )
रिपब्लिक-टीवी इन लोगों का सबसे बड़ा प्रचारक है क्योंकि इस मामले को कवर करने वाले प्रेस्टिटयूट का नाम है वरुण भंसाली |
जायसी के ही काल के दरबारी इतिहासकार फ़रिश्ता ने रानी पद्मावती के जौहर को सच्ची घटना बताया | बीसवीं शताब्दी तक किसी को यह नहीं सूझा था कि रानी पद्मावती को काल्पनिक सर्जना कहे ! पूरे देश के सारे हिन्दू और सारे मुस्लिम उस घटना को सच्चा इतिहास मानते आये थे |
अलाउद्दीन भारतीय नहीं था | वह तुर्क मूल का था लेकिन उसके पुरखे दो सौ वर्षों से अफगानिस्तान में बसे हुए थे जिस कारण दिल्ली का तुर्क समुदाय उसके खानदान को अफगान मानता था | एक विदेशी खूँखार दरिन्दे का गुणगान स्वतन्त्र भारत के हिन्दू इतिहासकार और फिल्मकार करें, और वह भी इतिहास को विकृत करके,  तो इसका एकमात्र कारण है हिन्दू समाज की हद से अधिक सहिष्णुता |
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अगले पोस्ट में मैं रानी पद्मावती के अस्तित्व और जौहर का ज्योतिषीय प्रमाण दूंगा | किन्तु वह प्रमाण राज-ज्योतिष की गोपनीय विधि पर आधारित है जिसका अब प्रयोग लोग भूल चुके हैं |

देवेंद्र शर्मा

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#महारानी पद्मावती को काल्पनिक कहने वाले विकृत मानसिकता के लोग
चित्र में जो दिख रहा है यही वो असंख्य नमन करने वाला स्थल है जिसमें महारानी पद्मावती ने म्लेच्छ आक्रान्ताओं से अपनी रक्षा करने के लिए धधकती ज्वाला के कुंड में छलांग लगाई थी।  चित्तौड़गढ़ के किले में आज उस कुंड की ओर जाने वाला रास्ता बेहद अंधेरे वाला है जिसपर कोई जाने का साहस नहीं करता । उस रास्ते की दीवारों तथा कई गज दूर भवनों में आज भी कुंड की अग्नि के चिन्ह और उष्णता अनुभव किया जा सकता है । विशाल अग्निकुंड की ताप से दीवारों पर चढ़े हुए चूने के प्लास्टर जल चुके हैं। चित्र में  कुंड के समीप जो दरवाज़ा दिख रहा है कहा जाता है की माँ पद्मावती वहीँ से कुंड में कूद गयी थी। स्थानीय लोग आज भी विश्वास के साथ कहते हैं कि इस कुंड से चीखें यदा-कदा सुनायी पड़ती रहती है और सैंकड़ों वीरांगनाओं की आत्माएं आज भी इस कुंड में मौजूद हैं।

  वो चीखें आज के युग में एक सबक है, “उन हिन्दू बहनों और बेटियों के लिए जिन पर वर्तमान मलेच्छों की बुरी नज़र है। “
  ये चीखें नहीं एक दहाड़ है , जो यह कहता है की ,”हे हिन्दू पुत्रियाँ हर युगों में इन मलेच्छों से सतर्क रहना। “
  ये चीखें नहीं एक आत्मबल है जो यह कहता है कि,” हे हिन्दू पुत्रियाँ तुम अबला नहीं सबला हो ।”
  ये चीखें नहीं एक वेदना है जो यह कहती हैं की, ” हे हिन्दू वीरों और वीरंगनाओं हमें भूल न जाना। “
महारानी पद्मावती जी हम सहस्त्र जन्म लेकर भी आपका उपकार नहीं चुका पाएँगे।
असंख्य नमन….चित्र में जो दिख रहा है यही वो असंख्य नमन करने वाला स्थल है जिसमें महारानी पद्मावती ने म्लेच्छ आक्रान्ताओं से अपनी रक्षा करने के लिए धधकती ज्वाला के कुंड में छलांग लगाई थी।  चित्तौड़गढ़ के किले में आज उस कुंड की ओर जाने वाला रास्ता बेहद अंधेरे वाला है जिसपर कोई जाने का साहस नहीं करता । उस रास्ते की दीवारों तथा कई गज दूर भवनों में आज भी कुंड की अग्नि के चिन्ह और उष्णता अनुभव किया जा सकता है । विशाल अग्निकुंड की ताप से दीवारों पर चढ़े हुए चूने के प्लास्टर जल चुके हैं। चित्र में  कुंड के समीप जो दरवाज़ा दिख रहा है कहा जाता है की माँ पद्मावती वहीँ से कुंड में कूद गयी थी। स्थानीय लोग आज भी विश्वास के साथ कहते हैं कि इस कुंड से चीखें यदा-कदा सुनायी पड़ती रहती है और सैंकड़ों वीरांगनाओं की आत्माएं आज भी इस कुंड में मौजूद हैं।

  वो चीखें आज के युग में एक सबक है, “उन हिन्दू बहनों और बेटियों के लिए जिन पर वर्तमान मलेच्छों की बुरी नज़र है। “
  ये चीखें नहीं एक दहाड़ है , जो यह कहता है की ,”हे हिन्दू पुत्रियाँ हर युगों में इन मलेच्छों से सतर्क रहना। “
  ये चीखें नहीं एक आत्मबल है जो यह कहता है कि,” हे हिन्दू पुत्रियाँ तुम अबला नहीं सबला हो ।”
  ये चीखें नहीं एक वेदना है जो यह कहती हैं की, ” हे हिन्दू वीरों और वीरंगनाओं हमें भूल न जाना। “
महारानी पद्मावती जी हम सहस्त्र जन्म लेकर भी आपका उपकार नहीं चुका पाएँगे।
असंख्य नमन….
Praveen Gulati की मूल पोस्ट से  कॉपी

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“Hindu Belief Is Fascinating And Inspired By It” Says James Cameron “Avatar” Movie Director

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🔴जिला कलक्टर तो ऐसा हो।….

DM ने ड्राइवर से कहा-आज तुम रिटायर हो रहे हो तो मेरी सीट पर बैठो मैं पूरे दिन गाड़ी चलाऊंगा
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🔵*कलेक्टर की गाड़ी चलाने वाले दिगंबर ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनके रिटायरमेंट पर कोई डीएम उन्हें एक दिन का साहब बनाकर खुद ड्राइवर बनकर सम्मान देगा।
🔵अकोला(महाराष्ट्र) आज तुम मेरी गाड़ी की स्टेयरिंग नहीं संभालोगे। आज तुम मेरी सीट पर बैठो। मैं स्टेयरिंग संभालूंगा। तुम्हारे रिटायरमेंट पर मेरा गाड़ी चलाने का मन कर रहा है। जब महाराष्ट्र के अकोला जिले के डीएम श्रीकांथ ने अपने ड्राइवर दिगंबर ठाक से यह बात कही तो दिगंबर की आंखें खुशी के आंसुओं से छलछला उठीं। और वे नहीं साहब… नहीं साहब कहने लगे फिर भी कलेक्टर साहब नहीं माने और अपने ड्राइवर को पीछे बैठाकर घर से ऑफिस तक लेकर आए। ऐसी विदाई की उम्मीद किसी सरकारी ड्राइवर ने सपने में भी नहीं सोची होगी, जैसी विदाई दिगंबर को मिली।

डीएम खुद पहुंच गए घर ड्राइवर को लेने

खास बात है कि डीएम श्रीकांथ ने अपनी बत्ती लगी कार को पहले सरकारी आवास पर फूलों से सजवाया। फिर खुद कार ड्राइव करते हुए ड्राइवर दिगंबर के घर पहुंचे। अपने घर कलेक्टर को आया देख दिगंबर का परिवार खुशी से झूम उठा तो आंखों में अचरज भी रहा। डीएम ने कहा कि तुमने इतने वर्षों तक तमाम कलेक्टर की सेवा की है, आज तुम्हारी सरकारी सेवा के आखिरी दिन मैं ड्राइवर बनना चाहता हूं। ड्राइवर दिगंबर ने डीएम से हाथ जोड़ लिए-साहब यह मेरी औकात नहीं। मुझे इतना सम्मान मत दीजिए। मगर डीएम मानने को तैयार ही नहीं हुए। डीएम की जिद पर ड्राइवर दिगंबर को झुकना पड़ा।

जब डीएम की सीट से ड्राइवर को उतरता देख ऑफिस वाले रह गए दंग

सुबह दस बजे अकोला कलेक्ट्रेट में डीएम ऑफिस के सामने कलेक्टर की कार आई। कार को सजा देख लोगों को अचरज हुआ। जब कार की पीछे स्थित डीएम की सीट पर ड्राइवर को और आगे ड्राइवर की सीट पर डीएम को स्टाफ ने बैठा देखा तो उनका अचरज और बढ़ गया। गाड़ी से उतरते ही डीएम ने सबका अभिवादन स्वीकारने के बाद कहा कि आज हमारे चालक दिगंबर की सरकारी सेवा का आखिरी दिन है। आज रिटायर हो रहे हैं। तो मैने सोचा क्यों ने आज मैं इन्हें कुछ सरप्राइज दूं। तो मैं ड्राइवर बन गया और ये हमारे साहब।

18 कलेक्टर की गाडी चलाई मगर श्रीकांथ सर ने जो सम्मान दिया जिंदगी भर नहीं भूलेगा

कलेक्टर श्रीकांथ की ओर से इतना बड़ा मान-सम्मान मिलने पर ड्राइवर दिगंबर ठाक ने कहा कि उन्होंने 35 साल सरकारी ड्राइवर की नौकरी की। कुल 18 जिला कलेक्टर की गाड़ी चलाई। मगर जो सम्मान श्रीकांथ सर ने दिया वह सपने भी नहीं सोचा था। वहीं डीएम श्रीकांत ने कहा कि दिगंबर ने हमेशा अफसरों को सुरक्षित मंजिल तक पहुंचाने की सेवा का बखूबी निर्वहन किया। ऐसे में उन्हें यादगार तोहफा पाने का हक था।😳😳😳😳😳😳👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻

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