Posted in Uncategorized

अनजाने कर्म का फल


अनजाने कर्म का फल

एक राजा ब्राह्मणों को लंगर में महल के आँगन में भोजन करा रहा था ।
राजा का रसोईया खुले आँगन में भोजन पका रहा था ।
उसी समय एक चील अपने पंजे में एक जिंदा साँप को लेकर राजा के महल के उपर से गुजरी ।
तब पँजों में दबे साँप ने अपनी आत्म-रक्षा में चील से बचने के लिए अपने फन से ज़हर निकाला ।
तब रसोईया जो लंगर ब्राह्मणो के लिए पका रहा था, उस लंगर में साँप के मुख से निकली जहर की कुछ बूँदें खाने में गिर गई ।
किसी को कुछ पता नहीं चला ।
फल-स्वरूप वह ब्राह्मण जो भोजन करने आये थे उन सब की जहरीला खाना खाते ही मौत हो गयी ।
अब जब राजा को सारे ब्राह्मणों की मृत्यु का पता चला तो ब्रह्म-हत्या होने से उसे बहुत दुख हुआ ।

ऐसे में अब ऊपर बैठे यमराज के लिए भी यह फैसला लेना मुश्किल हो गया कि इस पाप-कर्म का फल किसके खाते में जायेगा …. ???
(1) राजा …. जिसको पता ही नहीं था कि खाना जहरीला हो गया है ….
या
(2 ) रसोईया …. जिसको पता ही नहीं था कि खाना बनाते समय वह जहरीला हो गया है ….
या
(3) वह चील …. जो जहरीला साँप लिए राजा के उपर से गुजरी ….
या
(4) वह साँप …. जिसने अपनी आत्म-रक्षा में ज़हर निकाला ….

बहुत दिनों तक यह मामला यमराज की फाईल में अटका (Pending) रहा ….

फिर कुछ समय बाद कुछ ब्राह्मण राजा से मिलने उस राज्य मे आए और उन्होंने किसी महिला से महल का रास्ता पूछा ।
उस महिला ने महल का रास्ता तो बता दिया पर रास्ता बताने के साथ-साथ ब्राह्मणों से ये भी कह दिया कि “देखो भाई ….जरा ध्यान रखना …. वह राजा आप जैसे ब्राह्मणों को खाने में जहर देकर मार देता है ।”

बस जैसे ही उस महिला ने ये शब्द कहे, उसी समय यमराज ने फैसला (decision) ले लिया कि उन मृत ब्राह्मणों की मृत्यु के पाप का फल इस महिला के खाते में जाएगा और इसे उस पाप का फल भुगतना होगा ।

यमराज के दूतों ने पूछा – प्रभु ऐसा क्यों ??
जब कि उन मृत ब्राह्मणों की हत्या में उस महिला की कोई भूमिका (role) भी नहीं थी ।
तब यमराज ने कहा – कि भाई देखो, जब कोई व्यक्ति पाप करता हैं तब उसे बड़ा आनन्द मिलता हैं । पर उन मृत ब्राह्मणों की हत्या से ना तो राजा को आनंद मिला …. ना ही उस रसोइया को आनंद मिला …. ना ही उस साँप को आनंद मिला …. और ना ही उस चील को आनंद मिला ।
पर उस पाप-कर्म की घटना का बुराई करने के भाव से बखान कर उस महिला को जरूर आनन्द मिला । इसलिये राजा के उस अनजाने पाप-कर्म का फल अब इस महिला के खाते में जायेगा ।

बस इसी घटना के तहत आज तक जब भी कोई व्यक्ति जब किसी दूसरे के पाप-कर्म का बखान बुरे भाव से (बुराई) करता हैं तब उस व्यक्ति के पापों का हिस्सा उस बुराई करने वाले के खाते में भी डाल दिया जाता हैं ।

अक्सर हम जीवन में सोचते हैं कि हमने जीवन में ऐसा कोई पाप नहीं किया, फिर भी हमारे जीवन में इतना कष्ट क्यों आया …. ??

*ये कष्ट और कहीं से नहीं, बल्कि लोगों की बुराई करने के कारण उनके पाप-कर्मो से आया होता हैं जो बुराई करते ही हमारे खाते में ट्रांसफर हो जाता हैं ।

सुबोध महेरा

Posted in Uncategorized

कुतुबमीनार से ऊंचा है यह किला,
राजा की चिता पर बैठकर रानी
ने दी थी जान.. .

जोधपुर का मेहरानगढ़ किला 120 मीटर
ऊंची एक चट्टान पहाड़ी पर निर्मित है।
इस तरह से यह किला दिल्ली के कुतुब
मीनार की ऊंचाई (73मीटर) से भी ऊंचा है।
किले के परिसर में सती माता का मंदिर भी
है। 1843 में महाराजा मान सिंह का निधन
होने के बाद उनकी पत्नी ने चिता पर बैठकर
जान दे दी थी।
यह मंदिर उसी की स्मृति में बनाया गया। .

आसमान से कुछ यूं नज़र आता है
जोधपुर का ये खूबसूरत क़िला .

मेहरानगढ़ किला एक पहाड़ी पर बनाया
गया जिसका नाम ‘भोर चिड़िया’ बताया
जाता है। ये क़िला अपने आप में जोधपुर का
इतिहास देख चुका है,
इसने युद्ध देखे हैं और इस शहर हो
बदलते भी देखा है। .

10 किलोमीटर में फैली है किले की दीवार .

इस किले के दीवारों की परिधि 10
किलोमीटर तक फैली है।
इनकी ऊंचाई 20 फुट से 120 फुट तथा
चौड़ाई 12 फुट से 70 फुट तक है।
इसके परकोटे में दुर्गम रास्तों वाले सात
आरक्षित दुर्ग बने हुए थे।
घुमावदार सड़कों से जुड़े इस किले के चार
द्वार हैं। किले के अंदर कई भव्य महल,
अद्भुत नक्काशीदार दरवाजे,
जालीदार खिड़कियां हैं। .

500 साल से पुराना है यह किला .

जोधपुर शासक राव जोधा ने
12 मई 1459 को इस किले की नींव डाली
और महाराज जसवंत सिंह (1638-78) ने
इसे पूरा किया। इस किले में बने महलों में से
उल्लेखनीय हैं मोती महल, फूल महल, शीश
महल, सिलेह खाना, दौलत खाना आदि।
इन महलों में भारतीय राजवेशों के साज
सामान का विस्मयकारी संग्रह निहित है। .

1965 के युद्ध में देवी ने की थी
इसकी रक्षा… .

राव जोधा को चामुंडा माता में अथाह श्रद्धा
थी। चामुंडा जोधपुर के शासकों की कुलदेवी
रही हैं। राव जोधा ने 1460 मे मेहरानगढ
किले के समीप चामुंडा माता का मंदिर
बनवाया और मूर्ति की स्थापना की।
माना जाता है कि 1965 के भारत-पाक
युद्ध के दौरान सबसे पहले जोधपुर को
टारगेट बनाया गया। माना जाता है कि इस
दौरान माता के कृपा से यहां के लोगों का
बाल भी बांका नहीं हुआ था। .

किले के छत पर रखे तोपों से होती थी
6 किलोमीटर के क्षेत्र की रक्षा .

इस किले के दीवारों पर रखे भीमकाय तोपों
से आस-पास का छह किलोमीटर का
भू-भाग सुरक्षित रखा जाता था।
किले के दूसरे दरवाजे पर आज भी पिछले
युद्धों के दौरान बने तोप के गोलों के
निशान मौजूद हैं। .

आज भी मौजूद हैं रानियों के
आत्मदाह के निशान .

अंतिम संस्कार स्थल पर आज भी सिंदूर के
घोल और चांदी की पतली वरक से बने
हथेलियों के निशान पर्यटकों को उन
राजकुमारियों और रानियों की
याद दिलाते हैं…#jodhpur
#Rajasthanifan

image

Posted in Uncategorized

महान पण्डित जवाहरलाल नेहरू की शादी का कार्ड…..
.
जब हिन्दुओ में शादी होती है तो शादी के कार्ड पर ॐ और श्री गणेश जरूर बना होता है, उसमे मंगल सन्देश भी लिखा होता है, भगवान् विष्णु के सन्देश भी होते है, पर मुसलमानो की शादी के कार्ड में ये सब नहीं होता, वहां उनके हिसाब से चीजें लिखी हुई होती है

आज हम आपको नेहरू की शादी का कार्ड दिखा रहे है जो उनके अब्बू मोतीलाल ने छपवाया था, शादी का पूरा कार्ड ही उर्दू में छापा गया था, और हर चीज उर्दू में यहाँ तक की शादी के समारोह के दिनांक भी उर्दू में ही लिखे गए थे, देखिये नेहरू की शादी का कार्ड
.
(1)…पहले कार्ड में ये लिखा है – इल्तिजा है कि बरोज़ शादीबरखुर्दार जवाहर लाल नेहरूतारीख 7 फरवरी सन् 1916, बवक़्त 4 बजे शामजनाब मआ अज़ीज़ानग़रीब ख़ाना पर चा नोशी फ़रमा कर हमरही नौशादौलत ख़ाना समधियान पर तशरीफ़ अरज़ानी फ़रमाएं बंदा मोती लाल नेहरू नेहरू वेडिंग कैम्पअलीपुर रोड, दिल्ली
.
(2)…दूसरा दावत नामा जो कि मोतीलाल नेहरू की तरफ से मेहमानों को आनंद भवन (इलाहाबाद) में बुलाते हुए छपवाया गया था, उसे भी देखियेःतमन्ना है कि बतक़रीब शादीबरख़ुर्दार जवाहर लाल नेहरू साथ दुख़्तर पंडित जवाहर मल कौलबमुक़ाम देहली बतारीख़ 7 फरवरी, सन् 1916 व तक़ारीबमाबाद बतवारीख़8 और 9 फरवरी, सन् 1916जनाब मआ अज़ीज़ान शिरकत फ़रमा कर मुसर्रत और इफ़्तेख़ार बख़्शें बंदा मोती लाल नेहरू मुंतज़िर जवाब आनंद भवन इलाहाबाद
.
(3)…तीसरा कार्ड बहुरानी यानी कमला कौल के स्वागत कार्यक्रम से संबंधित था जिसमें खाने के इंतेजाम का जिक्र था और अजीज लोगों से दावत में शामिल होने की गुजारिश थी। ये कार्ड दो पन्नों में छपा था। कार्ड के शब्द इस प्रकार से हैः शादीबरख़ुर्दार जवाहर लाल नेहरूसाथदुख़्तर पंडित जवाहर मल कौल साहब, आरज़ू है कि बतक़रीब आमदन बहूरानीतारीख़ 9 फ़रवरी, सन् 1916 बवक़्त 8 बजे शामजनाब मअ अज़ीज़ान ग़रीबख़ाना पर तनावुल मा हज़र फ़रमा करमुसर्रत व इफ़्तेख़ार बख़्शेंबंदा मोती लाल नेहरूनेहरू वेडिंग कैम्प अलीपुर रोड, देहली

नेहरू की शादी के कार्ड से आप समझ सकते है की नेहरू की शादी में माहौल क्या रहा होगा, ऐसा लगता है की ये किसी पंडित की शादी का कार्ड है, जिसमे इस्लामिक इत्र तो खूब महक रहा है, पर हिन्दू मंत्र, ॐ, गणेश सबकुछ ही गायब है

image

image

image

Posted in Uncategorized

श्री सालासर हनुमान जी की पूरी स्थापना कथा

सभी भक्त ये कहानी को पढ़ कर (SHARE) जरुर करे!!!

भारत कि जनता श्री हनुमानजी को गाँवदेवता व् जनदेवता मानती है! राजस्थान में जयपुर – बीकानेर राजमार्ग पर सीकर के पास लछमनगढ़ से 30 किलोमीटर की दूरी पर सालासर गाँव में हनुमानजी की विशेष मान्यता है! वहाँ पर श्री हनुमानजी का एक सिद्ध पीठ मंदिर है, जिसकी सालासर में ‘बालाजी’ के नाम से लोक प्रसिद्ध है!

भक्त प्रवर श्री मोहन दास जी इस मंदिर के संस्थापक थे! भक्त मोहन दास जी की बहन कान्ही का विवाह सालासर के प. सुखराम से हुआ था! इनका एक बेटा उदय पैदा हुआ, लेकिन पांच वर्ष बाद हे प. सुखराम का अचानक निधन हो गया! विधवा बहन और भांजे उदय राम को सहारा देने के लिए मोहन दास जी अपना पैतृक गाँव छोड़ कर सालासर आकार इनके साथ रहने लगे! श्री मोहन दास जी बचपन से श्री हनुमानजी के परम भक्त थे!

एक दिन मोहन दास जी अपने भांजे के साथ खेत में काम कर रहे थे कि हनुमानजी ने प्रकट होकर उन्हें कृषि कार्यों से विरत होने को कहा और मोहन दास जी के हाथ से गंडासी छीन कर दूर फेंक दी, जिसे दूर खड़ा उदय राम भी देख रहा था! शाम को इसी घटना का जिक्र उदय ने अपनी माँ से किया तथा कहा कि मामा का मन आजकल कृषि कार्यों में नहीं लगता! बहन के मन में आया कि मोहन को वैवाहिक बंधन में बाँध देना चाहिए लेकिन बहन कि लाख कोशिशों के बावजूद मोहन दास जी ने शादी नहीं की! एक दिन कान्ही अपने घर में मोहन दास जी और उदय को भोजन करा रही थी कि दरवाजे पर किसी साधु ने आवाज दी! कान्ही जब आटा लेकर दरवाजे पर गई तो वहाँ कोई नहीं था! उसके वापिस आने पर मोहन दास जी ने बताया कि वे स्वयं बालाजी थे! कान्ही ने भाई से प्राथना की कि मुझे भी बालाजी के दर्शन करवाइए! मोहन दास जी ने हामी भर ली! इस बार मोहन दास जी स्वयं गए और बहुत निवेदन करके बालाजी को वापिस लाये, वह भी इस शर्त पर की ‘खीर-खांड युक्त चूरमे का भोजन कराओ और पवित्र आसन पर बिठाओ’! मोहन दास जी ने स्वीकार कर लिया! सेवा से प्रसन्न होकर श्री बालाजी ने वरदान दिया कि “कोई भी मेरी छाया (आवेश) अपने ऊपर धारण करने की चेष्टा नहीं करेगा! श्रद्धापूर्वक जो कोई भी मुझे याद करेगा मैं उसकी सहायता करूँगा और मैं निरंतर सालासर में विराजमान रहूँगा!” ऐसा कहकर श्री बालाजी अंतर्धान हो गए! संवत १८११ श्रावण मास में सूर्योदय के समय एक दिन, जिला नागौर के लाडनू के पास, असोटा ग्राम में एक जाट अपने खेत में हल जोत रहा था कि जमीन से शिलाखंडित मूर्ति निकली, पर प्रमादवश जाट ने कोई ध्यान नहीं दिया! फलस्वरूप वह उदरशूल से पीड़ित हो गया और लेट गया! दोपहर को जब उसकी पत्नी भोजन मेकर आई तो जाट ने सारी कथा कह सुनाई! जाटनी समझदार थी! उसने अपने आँचल से मूर्ति को साफ़ किया तो उसको शिलाखंड में श्री मारुतिनंदन की झांकी दृष्टिगोचर हुई! अब उसने श्रद्धापूर्वक उस मूर्ति को एक वृक्ष के निचे स्थापित कर चूरमे का भोग लगाया और श्री बालाजी का ध्यान किया! चमत्कार यह हुआ कि जाट स्वस्थ होकर उठ बैठा और काम करने लगा! इस घटना को सुन कर जनसमुदाय उमड़ पड़ा! असोटा ग्राम के ठाकुर भी मूर्ति के दर्शनार्थ आये और मूर्ति को महल में ले गए, किन्तु कुछ लोगों का मानना है कि मूर्ति उनके महल में भेज दी गई! रात्रि को श्री हनुमानजी ने स्वपन में प्रकट होकर ठाकुर को उस मूर्ति को शीघ्र सालासर पहुँचाने का आदेश दिया! सवेरा होते ही ठाकुर ने आदेशानुसार बैलगाडी में उस मूर्ति को अपने निजी सेवकों कि निगरानी मिएँ सालासर के लिए रवाना कर दिया और स्वयं भी दूसरे रथ में बैठकर साथ गए! ये दोनों रथ आज भी मंदिर में सुरक्षित रखे हुए है! उसी रात्रि भक्त मोहन दास जी को भी श्री हनुमानजी के दर्शन हुए! उन्होंने अपने भक्त से कहा कि –“तुम्हे दिए गए वचनानुसार में असोटा ग्राम के ठाकुर द्वारा भेजी जा रही मूर्ति के रूप में तुम्हारे पास आ रहा हू!”

सालासर पहुँचकर ‘मूर्ति कि स्थापना’ के स्थान के चयन को लेकर कुछ समस्या आई! तब श्री मोहन दास जी ने कहा कि रथ के बैलों को स्वतंत्र सहोद दिया जाए और जहाँ बैल स्वतः रुकें उसी स्थान पर मूर्ति कि स्थापना कर दी जाए! ऐसा ही हुआ! बैल एक तिकोने टीले पर जाकर रुक गए और उसी दिन श्रावन शुक्ल नौंवी ,संवत १८११ ईसवी सन् १७५४ शनिवार के दिन. परम तपस्वी श्री मोहन दास जी के मार्ग-दर्शन में उसी टीले पर शिलाखंड-मूर्ति को स्थापित कर दिया गया! संवत १८१५ में मिटटी एवं पत्थर से इस मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ! थोड़े हे दिनों में श्री बालाजी एवं मोहन दास कि ख्याति दूर दूर तक फ़ैल गई! समय पाकर जैसे जैसे श्रधालु भक्तों कि मनोकामनाएं पूर्ण होती गई वैसे वैसे मंदिर भी विशाल बनता गया! आज २४४ वर्षों बाद इस मंदिर कि दीवारें चांदी कि भव्य मूर्तियों और चित्रों से सुसज्जित है! आज श्री सालासर में बालाजी का यह मंदिर लोक विख्यात है!

सभी भक्त कथा पढ़ कर सालासर बालाजी का जय कारा Comment कर जरूरू लगाये!!! And सभी भक्त ये कहानी को पढ़ कर (SHARE) कर फेसबुक पर बालाजी के सभी भक्तो तक ये कथा जरुर पंहुचा दे!!!!

जय सालासर बालाजी की !!
विक्रम प्रजेश राइसोनय

image

Posted in Uncategorized

#महान क्रांतिकारी महवीर सिंह राठौर

16 सितंबर 1904 को #उत्तर प्रदेश के एटा जिले के राठौर राजपूतो के ठिकाने राजा का रामपुर के शाहपुर टहला (अब कासगंज जिला) में ठाकुर देवी सिंह जी के यहाँ जन्मे महावीर सिंह ने एटा के राजकीय इंटर कॉलेज से पढाई करने के बाद आगे की पढाई के लिये कानपुर के DAV कॉलेज में दाखिल लिया। महावीर सिंह जी को घर से ही देशभक्ति की शिक्षा मिली थी। कानपुर में इनको क्रान्तिकारियो का सानिध्य मिला और ये पूरी तरह अंग्रेजो के विरुद्ध क्रांतिकारी संघर्ष में कूद पड़े। उनके पिता को भी जब इसका पता चला तो उन्होंने कोई विरोध करने की जगह अपने पुत्र को देश के लिये बलिदान होने के लिये आशीर्वाद दिया। भगत सिंह जैसे अनेक क्रांतिकारी अंग्रेज़ो से छिपने के लिये उनके गाँव के घर में ही रुकते थे। भगत सिंह खुद 3 दिन उनके घर रुके थे।

काकोरी कांड और सांडर्स कांड में शामिल होने के बाद वो अंग्रेज़ो के लिये चुनौती बन गए थे। उन्होंने सांडर्स की हत्या के बाद भगत सिंह को लाहौर से निकालने में सक्रीय भूमिका निभाई थी। अपने खिलाफ अंग्रेज़ो के सक्रिय होने के बाद वो भूमिगत होकर काम करने लगे। अंत में 1929 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें अन्य क्रान्तिकारियो के साथ काला पानी की सजा सुनाई गई।

बलिदान–
जैल में क्रान्तिकारियो के साथ बहुत बुरा बर्ताव होता था। उनको अनेक यातनाऐं दी जाती थीं और बदसलूकी की जाती थी। काफी यातनाए सहने के बाद बन्दियों ने विरोध करने का फैसला लिया और जेल में बदसलूकी और बदइंतेजामी के खिलाफ भूख हड़ताल शुरू की। अंग्रेज़ो ने भूख हड़ताल को तोड़ने की अनेक कोशिशे की लेकिन सब बेकार रहा। बन्दियों को जबरदस्ती खाना खिलाने का प्रयत्न किया, जिसमे अनेको क्रान्तिकारियो की भूख हड़ताल तुड़वाने में सफल रहे। अंग्रेज़ो ने महावीर सिंह जी की भी भूख हड़ताल तुड़वाने की बहुत कोशिश की, अनेको लालच दिए, यातनाए दी लेकिन बलिष्ठ शरीर के स्वामी महावीर सिंह जी की भूख हड़ताल नही तुड़वा पाए। अंग्रेज़ो ने फिर जबरदस्ती करके मुँह में खाना ठूसने की कोशिश की, इसमें भी वो सफल नही हो पाए। इसके बाद अंग्रेजो ने नली को नाक के द्वारा गले में पहुँचाकर उन्हें जबरदस्ती दूध पिलाने की कोशिश की जिसमे उन्हें जमीन पर गिराकर 8 पुलिसवालो ने पकड़ा हुआ था। हठी महावीर सिंह राठौड़ ने पूरी जान लगाकर इसका विरोध किया जिससे दूध उनके फेफड़ो में चला गया जिससे तड़प तड़पकर उनकी 17 मई 1933 को मृत्यु हो गई और उन्होंने शहीदों की श्रेणी में अपना नाम अमर कर दिया। अंग्रेज़ो ने शहीद के घर वालो तक को शव नही ले जाने दिया और शव को पत्थरों से बांधकर समुद्र में फेंक दिया।

दुःख की बात ये है की आज ऐसे बलिदानी महापुरुषो, जिनकी वजह से हमे अंग्रेज़ो से स्वतंत्रता नसीब हुई के बारे में बहुत कम लोग जानते हैँ। महावीर सिंह राठौड़ ऐसे ही एक राजपूत योद्धा थे जिनकी शहादत से बहुत कम लोग परिचित हैँ जबकि ना केवल उन्होंने बल्कि उनके परिवार को भी उनकी राष्ट्रभक्ति की कीमत यातनाओ के साथ चुकानी पड़ी। अंग्रेज़ो की यातनाओ से तंग आकर उनके परिवार को 9 बार घर बदलना पड़ा और आज भी उनके परिवारीजन गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैँ जबकि उस वक्त जेल में मजे से रोटी खाने वाले और अंग्रेज़ो से गलबहियां करने वाले स्वतंत्रता आंदोलन का सारा श्रेय लेकर सांसद, मंत्री और प्रधानमन्त्री तक बन गए और उनके परिवारीजन अब भी मौज कर रहे हैँ। ऐसे लोगो की मुर्तिया चौक, चौराहो पर लगी हैँ, इनके नाम पर हजारो इमारतों का नामकरण किया गया है लेकिन महावीर सिंह राठौड़ जी की उनके गृह जिले एटा में भी कोई मूर्ती नही है….

इस पोस्ट को शेयर करें जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगो को इन गुमनाम शहीदों के बारे में कम से कम जानकारी तो हो.

B p singh

image

Posted in Uncategorized

समाजवाद पर प्रयोग …..

एक स्थानीय कॉलेज में अर्थशास्त्र के एक प्रोफेसर ने अपने एक बयान में कहा –

“उसने पहले कभी किसी छात्र को फेल नहीं किया, पर हाल ही में उसने एक पूरी की पूरी क्लास को फेल कर दिया है l”
क्योंकि उस क्लास ने दृढ़ता पूर्वक यह कहा था कि

“समाजवाद सफल होगा और न कोई गरीब होगा और न कोई धनी होगा” सबको सामान करने वाला एक महान सिद्धांत !

तब प्रोफेसर ने कहा – अच्छा ठीक है ! आओ हम क्लास में समाजवाद के अनुरूप एक प्रयोग करते हैं  “सफलता पाने वाले सभी छात्रों के विभिन्न ग्रेड का औसत निकाला जाएगा और सबको वही एक ग्रेड दी जायेगी ”
पहली परीक्षा के बाद, सभी ग्रेडों का औसत निकाला गया और प्रत्येक छात्र को B ग्रेड प्राप्त हुआl

जिन छात्रों ने कठिन परिश्रम किया था वे परेशान हो गए और जिन्होनें कम ही पढ़ाई की थी वे खुश हुए l

दूसरी परीक्षा के लिए कम पढ़ने वाले छात्रों ने पहले से भी और कम पढ़ाई की और जिहोनें कठिन परिश्रम किया था उन्होंने यह तय किया कि वे भी मुफ्त की ग्रेड प्राप्त करेंगे और उन्होंने भी कम पढ़ाई की l

दूसरी परीक्षा की ग्रेड D थी l
इसलिए कोई खुश नहीं था l
जब तीसरी परीक्षा हुई तो ग्रेड F हो गई l

जैसे-जैसे परीक्षाएँ आगे बढ़ने लगीं स्कोर कभी ऊपर नहीं उठा, बल्कि आपसी कलह, आरोप-प्रत्यारोप, गाली-गलौज और एक-दूसरे से नाराजगी के परिणाम स्वरूप कोई भी नहीं पढ़ता था

क्योंकि कोई भी छात्र अंपने परिश्रम से दूसरे को लाभ नहीं पहुंचाना चाहता था l

अंत में सभी आश्चर्यजनक रूप से फेल हो गए और प्रोफेसर ने उन्हें बताया कि इसी तरह “समाजवाद” भी अंततोगत्वा फेल हो जाएगा क्योंकि ईनाम जब बहुत बड़ा होता है तो सफल होने के लिए किया जाने वाला उद्यम भी बहुत बड़ा होगा l परन्तु जब सरकार सारे अवार्ड छीन लेगी तो कोई भी न तो सफल होना चाहेगा और न ही सफल होने की कोशिश करेगा l

निम्नलिखित पाँच सर्वश्रेष्ठ उक्तियाँ इस प्रयोग पर लागू होती हैं l

  1. आप समृद्ध व्यक्ति को उसकी समृद्धि से बेदखल करके गरीब को समृद्ध बनाने का क़ानून नहीं बना सकते l

  2. जो व्यक्ति बिना कार्य किए कुछ प्राप्त करता है, अवश्य ही परिश्रम करने वाले किसी अन्य व्यक्ति के ईनाम को छीन कर उसे दिया जाता है l

  3. सरकार तब तक किसी को कोई वस्तु नहीं दे सकती जब तक वह उस वस्तु को किसी अन्य से छीन न ले l

  4. आप सम्पदा को बाँट कर उसकी वृद्धि नहीं कर सकते l

  5. जब किसी राष्ट्र की आधी आबादी यह समझ लेती है कि उसे कोई काम नहीं करना है, क्योंकि बाकी आधी आबादी उसकी देख-भाल जो कर रही है और बाकी आधी आबादी यह सोच कर कुछ अच्छा कार्य नहीं कर रही कि उसके कर्म का फल किसी दूसरे को मिल रहा है – तो वहीँ उस राष्ट्र के अंत की शुरुआत हो जाती है।

Posted in Uncategorized

अभी तो हम इसी में खुश हैं कि चलो विदेशियों ने हमारे राम-सेतु को भगवान राम से जोड़ा और इसके प्राकृतिक न होने तथा मानवनिर्मित होने का सर्टिफिकेट तो दे ही दिया , भले ही इसे मात्र पाँच हजार साल ही पुराना माना । अब बेचारा हिन्दु पाँच हजार साल को थोड़ा पीछे ले जाकर दस-बीस हजार साल तक तो मान सकता है , पर वैज्ञानिक सोच को धारण करते हुए वह कैसे माने कि हमारे आराध्य भगवान श्री राम सत्रह लाख साल पहले इस धरा पर अवतरित हुए थे । ऐसा कहते ही उसे घोर पुरातनपंथी और दकियानूसी सोच रखने वाला घोषित कर दिया जायेगा ।

ऐसे भय के माहौल में मेरी हिम्मत नहीं हो पा रही है कि मैं लाखों नहीं बल्कि करोड़ों साल पहले देवों और असुरों के बीच हुए समुद्र-मंथन के सत्यता पर बहस छेड़ूँ । लगभग पाँच करोड़ साल तो हिमालय को उत्पन्न हुए हुआ है । उससे पहले वहाँ टेथिंस सागर का अस्तित्व था । प्लेट टेक्टॉनिक थियरी के आधार पर इस सागर के ऊपर दबाव के परिणामस्वरूप हिमालय की उत्पत्ति हुई ।

जब उस स्थान पर समुद्र हुआ करता था , तभी उसी समुद्र में अमृत की प्राप्ति के लिए देवताओं और दानवों द्वारा समुद्र-मंथन किया गया । ये घटना करोड़ वर्ष पहले की है या अरब वर्ष पहले की है , इसके बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता । इस समुद्र-मंथन से मुख्य रूप से चौदह रत्न निकले थे ।

अभी पिछले महीने मैं बाँका में मंदार पर्वत पर किसी कार्यक्रम में गया था । यह वही मंदार पर्वत है जिसका प्रयोग समुद्र-मंथन के समय मथनी के रूप में किया गया था , इसे सुमेरु पर्वत के नाम से भी जाना जाता है । यहाँ संयोग से एक स्वंयसेवक मित्र राहुल डोकानिया जी से परिचय हुआ । ये बहुत अध्यात्यमिक और गुरू भक्त हैं । इन्होंने मुझे बताया कि इनके गुरू जी ने इनसे बताया है कि समुद्र-मंथन के परिणामस्वरूप मात्र चौदह रत्न ही नहीं निकले थे बल्कि हजार से अधिक वस्तुएं निकली थीं जो आज भी इस पर्वत में छिपी हुई हैं । इसके प्रमाण में उनके गुरू जी ने एक विशाल शंख का पता बताया कि एक निश्चित स्थान पर जल के भीतर एक प्राचीन शंख है । उनके बताए मार्गदर्शन के आधार पर राहुल डोकानिया जी ने उस विशाल शंख को खोज निकाला ।

इसके बाद राहुल डोकानिया जी ने बहुत प्रयास करके पुरातत्व विभाग के सर्वेक्षण दल को वहाँ बुलवाया । सर्वेक्षण दल ने शंख प्राप्ति की सूचना को सूचीबद्ध तो कर लिया है पर वर्षों से मंदार पर्वत पर अन्य किसी भी प्रकार के नये खोज में दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है । इसके साथ ही पुरातत्व विभाग ने मंदार पर्वत पर किसी भी प्रकार के नये खोज करने से राहुल डोकानिया जी पर प्रतिबंध लगा रखा है । वे अब इस दैविय विषय को लेकर केंद्र सरकार से गुहार लगा रहे हैं कि शायद ये हिन्दुवादी सरकार अपने प्राचीन वैभवशाली स्वर्णिम इतिहास को संसार के सामने उजागर होने का अवसर प्रदान करे ।

Rahul Singh Rathore

image

image

image

image