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एक सुरंग से जुड़े हैं राजस्थान के ये दो किले,
आज भी आते-जाते हैं लोग !!

राजस्थान के दो किले।
एक जंग की पहचान तो दूसरा खूबसूरती की अद्भुत मिसाल।

ये हैं जयपुर की पहचान आमेर और जयगढ़ के किले।
शहर की अलग-अलग पहाड़ियों पर बने इन किलों को आपस में
जोड़ती है एक सुरंग।
इस सुरंग को टूरिस्ट के लिए फिर से शुरू किया गया है।
आखिर क्या है इन दोनों किलों की खासियत?

आमेर के रास्ते जयगढ़ पहुंचती है सुरंग !

  • आमेर महल से जयगढ़ पहुंचने वाली इस सुरंग को गुप्त तरीके से
    किले से बाहर निकलने के लिए बनाया गया था।
  • जयगढ़ फोर्ट तक पहुंचने वाली ये सुरंग आमेर महल के पश्चिमी
    भाग में बनी है।
  • इसका कुछ हिस्सा जमीन के अंदर बना है तो कुछ जमीन के ऊपर।
  • इस एक सुरंग से मान सिंह महल, दिवान-ए-खास और महल के कई
    हिस्सों में पहुंचा जा सकता है।

  • इस सुरंग में रोशनी के लिए मशाल का इस्तेमाल किया जाता था।

  • किले को फिर से संवारते वक्त इस सुरंग को भी टूरिस्ट्स के लिए
    फिर से शुरू किया गया है।

जयगढ़ किले में क्या है खास !!

जयगढ़ किला जयपुर का सबसे ऊंचा दुर्ग है।
शहर में सबसे मजबूत भी।
यहां से जयपुर के चारों ओर नजर रखी जाती थी।
यहां रखी विशाल तोप भी करीब 50 किमी तक वार करने में सक्षम थी।
इसे एशिया की सबसे बड़ी तोप भी माना जाता है।

आमेर किले की खासियत !!

इसका निर्माण 16वीं शताब्दी में राजा मानिंसह ने करवाया था।
यह विश्व धरोहर में भी शामिल है।
इसे बनाते वक्त इसमें सफेद और लास सैंड स्टोन का इस्तेमाल
किया गया।
ये महल हिंदू ओर मुगल आर्किटेक्च का बेजोड़ नमूना है।
इसे किले में बना आमेर पैलेस खास तौर पर राज परिवार के रहने के
लिए बनाया गया था।
कहा जाता है कि आमेर फोर्ट में बना शीश महल माचिस की एक
तिल्ली से रोशन हो जाता था।
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http://www.bhaskar.com/news-hf/RAJ-JAI-HMU-amber-and-

jaigarh-fort-tunnel-5208837-PHO.html?

सदा सुमंगल,,,
वन्देमातरम,,,
जय भवानी,,,
जय श्री राम
विजय कृष्णा पांडेय

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अगर आपके पास कुछ समय है तो आओ पण्डितजी के चार धामों में से एक द्वारिका धाम की यात्रा दस मिनट में करें।

गुजरात के देवभूमि द्वारका जिले में स्थित एक नगर तथा हिन्दू तीर्थस्थल है। यह हिन्दुओं के साथ सर्वाधिक पवित्र तीर्थों में से एक तथा चार धामों में से एक है। यह सात पुरियों में एक पुरी है।

जिले का नाम द्वारका पुरी से रखा गया है। यह नगरी भारत के पश्चिम में समुन्द्र के किनारे पर बसी है। हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार, भगवान कॄष्ण ने इसे बसाया था। यह श्रीकृष्ण की कर्मभूमि है। आधुनिक द्वारका एक शहर है। कस्बे के एक हिस्से के चारों ओर चहारदीवारी खिंची है इसके भीतर ही सारे बड़े-बड़े मन्दिर है।

काफी समय से जाने-माने शोधकर्ताओं ने पुराणों में वर्णित द्वारिका के रहस्य का पता लगाने का प्रयास किया, लेकिन वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित कोई भी अध्ययन कार्य अभी तक पूरा नहीं किया गया है। 2005 में द्वारिका के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए अभियान शुरू किया गया था। इस अभियान में भारतीय नौसेना ने भी मदद की।

अभियान के दौरान समुद्र की गहराई में कटे-छटे पत्थर मिले और यहां से लगभग 200 अन्य नमूने भी एकत्र किए, लेकिन आज तक यह तय नहीं हो पाया कि यह वही नगरी है अथवा नहीं जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने बसाया था। आज भी यहां वैज्ञानिक स्कूबा डायविंग के जरिए समंदर की गहराइयों में कैद इस रहस्य को सुलझाने में लगे हैं।

कृष्ण मथुरा में उत्पन्न हुए, गोकुल में पले, पर राज उन्होने द्वारका में ही किया। यहीं बैठकर उन्होने सारे देश की बागडोर अपने हाथ में संभाली। पांड़वों को सहारा दिया। धर्म की जीत कराई और, शिशुपाल और दुर्योधन जैसे अधर्मी राजाओं को मिटाया।

द्वारका उस जमाने में राजधानी बन गई थीं। बड़े-बड़े राजा यहां आते थे और बहुत-से मामले में भगवान कृष्ण की सलाह लेते थे। इस जगह का धार्मिक महत्व तो है ही, रहस्य भी कम नहीं है। कहा जाता है कि कृष्ण की मृत्यु के साथ उनकी बसाई हुई यह नगरी समुद्र में डूब गई। आज भी यहां उस नगरी के अवशेष मौजूद हैं।

निकटवर्ती तीर्थ

गोमती द्वारका द्वारका के दक्षिण में एक लम्बा ताल है। इसे ‘गोमती तालाब’ कहते है। इसके नाम पर ही द्वारका को गोमती द्वारका कहते है।

निष्पाप कुण्ड इस गोमती तालाब के ऊपर नौ घाट है। इनमें सरकारी घाट के पास एक कुण्ड है, जिसका नाम निष्पाप कुण्ड है। इसमें गोमती का पानी भरा रहता है। नीचे उतरने के लिए पक्की सीढ़िया बनी है। यात्री सबसे पहले इस निष्पाप कुण्ड में नहाकर अपने को शुद्ध करते है। बहुत-से लोग यहां अपने पुरखों के नाम पर पिंड-दान भी करतें हैं।

रणछोड़ जी मंदिर द्वारकाधीश मंदिर गोमती के दक्षिण में पांच कुंए है। निष्पाप कुण्ड में नहाने के बाद यात्री इन पांच कुंओं के पानी से कुल्ले करते है। तब रणछोड़जी के मन्दिर की ओर जाते है। रास्तें में कितने ही छोटे मन्दिर पड़ते है-कृष्णजी, गोमती माता और महालक्ष्मी के मन्दिर।

रणछोड़जी का मन्दिर द्वारका का सबसे बड़ा और सबसे बढ़िया मन्दिर है। भगवान कृष्ण को उधर रणछोड़जी कहते है। सामने ही कृष्ण भगवान की चार फुट ऊंची मूर्ति है।

यह चांदी के सिंहासन पर विराजमान है। मूर्ति काले पत्थर की बनी है। हीरे-मोती इसमें चमचमाते है। सोने की ग्यारह मालाएं गले में पड़ी है। कीमती पीले वस्त्र पहने है। भगवान के चार हाथ है। एक में शंख है, एक में सुदर्शन चक्र है। एक में गदा और एक में कमल का फूल। सिर पर सोने का मुकुट है। लोग भगवान की परिक्रमा करते है और उन पर फूल और तुलसी दल चढ़ाते है।

चौखटों पर चांदी के पत्तर मढ़े है। मन्दिर की छत में बढ़िया-बढ़िया कीमती झाड़-फानूस लटक रहे है। एक तरफ ऊपर की मंमें जाने के लिए सीढ़िया है। पहली मंजिल में अम्बादेवी की मूर्ति है-ऐसी सात मंजिले है और कुल मिलाकर यह मन्दिर एक सौ चालीस फुट ऊंचा है। इसकी चोटी आसमान से बातें करती है।

परिक्रमा रणछोड़जी के दर्शन के बाद मन्दिर की परिक्रमा की जाती है। मन्दिर की दीवार दोहरी है। दो दावारों के बीच इतनी जगह है कि आदमी समा सके। यही परिक्रमा का रास्ता है। रणछोड़जी के मन्दिर के सामने एक बहुत लम्बा-चौड़ा १०० फुट ऊंचा जगमोहन है। इसकी पांच मंजिलें है और इसमें ६० खम्बे है। रणछोड़जी के बाद इसकी परिक्रमा की जाती है। इसकी दीवारे भी दोहरी है।

दुर्वासा और त्रिविक्रम मंदिर दक्षिण की तरफ बराबर-बराबर दो मंदिर है। एक दुर्वासाजी का और दूसरा मन्दिर त्रिविक्रमजी को टीकमजी कहते है। इनका मन्दिर भी सजा-धजा है। मूर्ति बड़ी लुभावनी है। और कपड़े-गहने कीमती है। त्रिविक्रमजी के मन्दिर के बाद प्रधुम्नजी के दर्शन करते हुए यात्री इन कुशेश्वर भगवान के मन्दिर में जाते है। मन्दिर में एक बहुत बड़ा तहखाना है। इसी में शिव का लिंग है और पार्वती की मूर्ति है।

कुशेश्वर शिव के मन्दिर के बराबर-बराबर दक्षिण की ओर छ: मन्दिर और है। इनमें अम्बाजी और देवकी माता के मन्दिर खास हैं। रणछोड़जी के मन्दिर के पास ही राधा, रूक्मिणी, सत्यभामा और जाम्बवती के छोटे-छोटे मन्दिर है। इनके दक्षिण में भगवान का भण्डारा है और भण्डारे के दक्षिण में शारदा-मठ है।

शारदा-मठ को आदि गुरू शंकराचार्य ने बनबाया था। उन्होने पूरे देश के चार कोनों मे चार मठ बनायें थे। उनमें एक यह शारदा-मठ है। परंपरागत रूप से आज भी शंकराचार्य मठ के अधिपति है। भारत में सनातन धर्म के अनुयायी शंकराचार्य का सम्मान करते है।

रणछोड़जी के मन्दिर से द्वारका शहर की परिक्रमा शुरू होती है। पहले सीधे गोमती के किनारे जाते है। गोमती के नौ घाटों पर बहुत से मन्दिर है- सांवलियाजी का मन्दिर, गोवर्धननाथजी का मन्दिर, महाप्रभुजी की बैठक।

हनुमान मंदिर आगे वासुदेव घाट पर हनुमानजी का मन्दिर है। आखिर में संगम घाट आता है। यहां गोमती समुद्र से मिलती है। इस संगम पर संगम-नारायणजी का बहुत बड़ा मन्दिर है।

चक्र तीर्थ  संगम-घाट के उत्तर में समुद्र के ऊपर एक ओर घाट है। इसे चक्र तीर्थ कहते है। इसी के पास रत्नेश्वर महादेव का मन्दिर है। इसके आगे सिद्धनाथ महादेवजी है, आगे एक बावली है, जिसे ‘ज्ञान-कुण्ड’ कहते है। इससे आगे जूनीराम बाड़ी है, जिससे, राम, लक्ष्मण और सीता की मूर्तिया है।

इसके बाद एक और राम का मन्दिर है, जो नया बना है। इसके बाद एक बावली है, जिसे सौमित्री बावली यानी लक्ष्मणजी की बावजी कहते है। काली माता और आशापुरी माता की मूर्तिया इसके बाद आती है।

कैलाश कुण्ड इनके आगे यात्री कैलासकुण्ड़ पर पहुंचते है। इस कुण्ड का पानी गुलाबी रंग का है। कैलासकुण्ड के आगे सूर्यनारायण का मन्दिर है।

इसके आगे द्वारका शहर का पूरब की तरफ का दरवाजा पड़ता है। इस दरवाजे के बाहर जय और विजय की मूर्तिया है। जय और विजय बैकुण्ठ में भगवान के महल के चौकीदार है। यहां भी ये द्वारका के दरवाजे पर खड़े उसकी देखभाल करते है। यहां से यात्री फिर निष्पाप कुण्ड पहुंचते है और इस रास्ते के मन्दिरों के दर्शन करते हुए रणछोड़जी के मन्दिर में पहुंच जाते है। यहीं परिश्रम खत्म हो जाती है।

यही असली द्वारका है। इससे बीस मील आगे कच्छ की खाड़ी में एक छोटा सा टापू है। इस पर बेट-द्वारका बसी है। गोमती द्वारका का तीर्थ करने के बाद यात्री बेट-द्वारका जाते है। बेट-द्वारका के दर्शन बिना द्वारका का तीर्थ पूरा नही होता। बेट-द्वारका पानी के रास्ते भी जा सकते है और जमीन के रास्ते भी।

गोपी तालाब नागेश्वर मंदिर जमीन के रास्ते जाते हुए तेरह मील आगे गोपी-तालाब पड़ता है। यहां की आस-पास की जमीन पीली है। तालाब के अन्दर से भी रंग की ही मिट्टी निकलती है। इस मिट्टी को वे गोपीचन्दन कहते है। यहां मोर बहुत होते है। गोपी तालाब से तीन-मील आगे नागेश्वर नाम का शिवजी और पार्वती का छोटा सा मन्दिर है।

यात्री लोग इसका दर्शन भी जरूर करते है।कहते है, भगवान कृष्ण इस बेट-द्वारका नाम के टापू पर अपने घरवालों के साथ सैर करने आया करते थे। यह कुल सात मील लम्बा है। यह पथरीला है। यहां कई अच्छे और बड़े मन्दिर है। कितने ही तालाब है। कितने ही भंडारे है। धर्मशालाएं है और सदावर्त्त लगते है। मन्दिरों के सिवा समुद्र के किनारे घूमना बड़ा अच्छा लगता है।

बेट-द्वारका ही वह जगह है, जहां भगवान कृष्ण ने अपने प्यारे भगत नरसी की हुण्डी भरी थी। बेट-द्वारका के टापू का पूरब की तरफ का जो कोना है, उस पर हनुमानजी का बहुत बड़ा मन्दिर है।

इसीलिए इस ऊंचे टीले को हनुमानजी का टीला कहते है। आगे बढ़ने पर गोमती-द्वारका की तरह ही एक बहुत बड़ी चहारदीवारी यहां भी है। इस घेरे के भीतर पांच बड़े-बड़े महल है। ये दुमंजिले और तिमंजले है। पहला और सबसे बड़ा महल श्रीकृष्ण का महल है। इसके दक्षिण में सत्यभामा और जाम्बवती के महल है। उत्तर में रूक्मिणी और राधा के महल है।

इन पांचों महलों की सजावट ऐसी है कि आंखें चकाचौंध हो जाती हैं। इन मन्दिरों के किबाड़ों और चौखटों पर चांदी के पतरे चढ़े हैं। भगवान कृष्ण और उनकी मूर्ति चारों रानियों के सिंहासनों पर भी चांदी मढ़ी है। मूर्तियों का सिंगार बड़ा ही कीमती है। हीरे, मोती और सोने के गहने उनको पहनाये गए हैं। सच्ची जरी के कपड़ों से उनको सजाया गया है।

चौरासी धुना – भेंट द्वारका टापू में भगवान द्वारकाधीश के मंदिर से ७ कि॰मी॰ की दूरी पर चौरासी धुना नामक एक प्राचीन एवं एतिहासिक तीर्थ स्थल है।

उदासीन संप्रदाय के सुप्रसिद्ध संत और प्रख्यात इतिहास लेखक, निर्वाण थडा तीर्थ, श्री पंचयाती अखाडा बड़ा उदासीन के पीठाधीश्वर महंत योगिराज डॉ॰ बिंदुजी महाराज “बिंदु” के अनुसार ब्रह्माजी के चारों मानसिक पुत्रो सनक, सनंदन, सनतकुमार और सनातन ने ब्रह्माजी की श्रृष्टि-संरचना की आज्ञा को न मानकर उदासीन संप्रदाय की स्थापना की और मृत्यु-लोक में विविध स्थानों पर भ्रमण करते हुए भेंट द्वारका में भी आये।

उनके साथ उनके अनुयायियों के रूप में अस्सी (८०) अन्य संत भी साथ थें| इस प्रकार चार सनतकुमार और ८० अनुयायी उदासीन संतो को जोड़कर ८४ की संख्या पूर्ण होती है।

इन्ही ८४ आदि दिव्य उदासीन संतो ने यहाँ पर चौरासी धुने स्थापित कर साधना और तपस्चर्या की और ब्रह्माजी को एक एक धुने की एकलाख महिमा को बताया, तथा चौरासी धुनो के प्रति स्वरुप चौरासी लाख योनिया निर्मित करने का सांकेतिक उपदेश दिया। इस कारन से यह स्थान चौरासी धुना के नाम से जग में ख्यात हुआ।

कालांतर में उदासीन संप्रदाय के अंतिम आचार्य जगतगुरु उदासिनाचार्य श्री चन्द्र भगवान इस स्थान पर आये और पुनः सनकादिक ऋषियों के द्वारा स्थापित चौरासी धुनो को जागृत कर पुनः प्रज्वलित किया और उदासीन संप्रदाय के एक तीर्थ के रूप में इसे महिमामंडित किया। यह स्थान आज भी उदासीन संप्रदाय के अधीन है और वहां पर उदासी संत निवास करते हैं।

आने वाले यात्रियों, भक्तों एवं संतों की निवास, भोजन आदि की व्यवस्था भी निःशुल्क रूप से चौरासी धुना उदासीन आश्रम के द्वारा की जाती है। जो यात्री भेंट द्वारका दर्शन हेतु जाते हैं वे चौरासी धुना तीर्थ के दर्शन हेतु अवश्य जाते हैं। ऐसी अवधारणा है की चौरासी धुनो के दर्शन करने से मनुष्य की लाख चौरासी कट जाती है, अर्थात उसे चौरासी लाख योनियों में भटकना नहीं पड़ता और वह मुक्त हो जाता है।

रणछोड़ जी मंदिर  रणछोड़ जी के मन्दिर की ऊपरी मंजिलें देखने योग्य है। यहां भगवान की सेज है। झूलने के लिए झूला है। खेलने के लिए चौपड़ है। दीवारों में बड़े-बड़े शीशे लगे हैं। इन पांचों मन्दिरों के अपने-अलग भण्डारे है। मन्दिरों के दरवाजे सुबह ही खुलते है। बारह बजे बन्द हो जाते है।

फिर चार बजे खुल जाते है। और रात के नौ बजे तक खुले रहते है। इन पांच विशेष मन्दिरों के सिवा और भी बहुत-से मन्दिर इस चहारदीवारी के अन्दर है। ये प्रद्युम्नजी, टीकमजी, पुरूषोत्तमजी, देवकी माता, माधवजी अम्बाजी और गरूड़ के मन्दिर है। इनके सिवाय साक्षी-गोपाल, लक्ष्मीनारायण और गोवर्धननाथजी के मन्दिर है। ये सब मन्दिर भी खूब सजे-सजाये हैं। इनमें भी सोने-चांदी का काम बहुत है।

बेट-द्वारका में कई तालाब है-रणछोड़ तालाब, रत्न-तालाब, कचौरी-तालाब और शंख-तालाब। इनमें रणछोड तालाब सबसे बड़ा है। इसकी सीढ़िया पत्थर की है। जगह-जगह नहाने के लिए घाट बने है। इन तालाबों के आस-पास बहुत से मन्दिर है। इनमें मुरली मनोहर, नीलकण्ठ महादेव, रामचन्द्रजी और शंख-नारायण के मन्दिर खास है। लोगा इन तालाबों में नहाते है और मन्दिर में फूल चढ़ाते है।

शंख तालाब  रणछोड़ के मन्दिर से डेढ़ मील चलकर शंख-तालाब आता है। इस जगह भगवान कृष्ण ने शंख नामक राक्षस को मारा था। इसके किनारे पर शंख नारायण का मन्दिर है। शंख-तालाब में नहाकर शंख नारायण के दर्शन करने से बड़ा पुण्य होता है।

बेट-द्वारका से समुद्र के रास्ते जाकर बिरावल बन्दरगाह पर उतरना पड़ता है। ढाई-तीन मील दक्षिण-पूरब की तरफ चलने पर एक कस्बा मिलता है इसी का नाम सोमनाथ पट्टल है। यहां एक बड़ी धर्मशाला है और बहुत से मन्दिर है। कस्बे से करीब पौने तीन मील पर हिरण्य, सरस्वती और कपिला इन तीन नदियों का संगम है। इस संगम के पास ही भगवान कृष्ण के शरीर का अंतिम संस्कार किया गया था।

Sanjay Gupta

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सत्य कड़वा होता है, परन्तु जब उसे लिखा या पढ़ा जाए तो यह भंयकर होता है।
24 घंटे से ज्यादा अगर कुत्ते को बंद रखो या बाहर घुमाने न लेकर जाओ तो वो भी भौंकने लगता है ।

इसके विपरीत कई दिनों तक यदि किसी को अँधेरे कमरे में बंद रखो तो वो प्रकाश में जाने से भी डरता है ।

और इस हिन्दू जनमानस को तो सदियाँ हो गईं… क़ैद कर के रखा हुआ है ।

अज्ञानता की जंजीरों में ……
McCauleyवादी नीतियों ने ।

इस हिन्दू जनमानस को भी सदियों से सनातन वैदिक ग्रन्थों की पवित्र वायु में श्वास-प्रश्वास का अवसर ही कहाँ मिला… मिला भी तो अवसर चूक गये ।

अब यदि इस हिन्दू जनमानस को कोई खुली वायु का आभास करवाने का भी प्रयास करे… तो भयभीत होकर ही भौंकने लगते हैं ।

चीन में कभी भारत की एक अलग ही परिभाषा थी…
भा = प्रकाश
रत = लीन रहने वाला, चलायमान, गतिमान ।

भारत = ज्ञान के प्रकाश में सदा लीन, गतिमान रहने वाला ।

ज्ञान की धारा में अविरल बहने की भारत की इस महान परम्परा के यम, नियम और गुण भी महान ही थे ।

यदि कोई गुरु कोई बात कहे या विचार दे या शिक्षा दे … तो परस्पर कुतर्क नहीं किया जाता था …हाँ …प्रश्न करने का अधिकार सबको था …परन्तु कुतर्क नही ।

उत्तर देने पर फिर प्रश्न पूछा जा सकता है … प्रश्न चलते रहें परन्तु मर्यादा में ।

ऋषि याज्ञवल्क्य से लेकर आदि गुरु शंकराचार्य जी तक हमने शास्त्रों के न जाने कितने ही उदाहरण और सन्दर्भ सुने और पढ़े हैं …आर्य समाज के ऋषि दयानन्द सस्वती जी ने भी अनेकों शास्त्रार्थ किये ।

नाथ सम्प्रदाय के गुरु गेहणीनाथ जी ने तो इस्लाम के पैगम्बर मुहम्मद को शास्त्रार्थ में पराजित किया ।

परन्तु उन सन्दर्भों के भी कुछ यम-नियम आदि निश्चित एवं निर्धारित होते थे ।

दोनों और के शास्त्रार्थ करने वाले अपने अपने संदर्भो हेतु तथ्यों और प्रमाणों हेतु समस्त ग्रन्थ अपने साथ रखते थे …
एक प्रश्न का उत्तर संतोषजनक देने के उपरान्त दूसरा व्यक्ति प्रश्न करता है … फिर उसका उत्तर।

जो परास्त होता था उसे विजयी विद्वान की सभी नियमो तथा शर्तों का पालन करना होता था ।

आदि शन्कराचार्य और मंडन मिश्र जी का साक्षात्कार कई महीनो तक निरंतर चला … अंत में मंडन मिश्र ने आदि गुरु शंकराचार्य जी को अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया ।

बोद्ध सम्प्रदाय के प्रपंचों के कारण हिन्दू जनमानस वेद विरुद्ध होकर बोद्ध सम्प्रदाय में दीक्षित होने लगा था… परिस्थितियाँ लगभग वही थीं जो इस्लाम और इसाइयत के आतंकवाद में दिखाई देती है…
मन्दिरों का विध्वंस भी किया गया…
वैदिक धर्म की स्त्रियों पर अत्याचार…
धर्मग्रंथो में मिलावट और उनको जलाया जाना…
गुरुकुलों पर प्रतिबन्ध लगाये गये…
चन्द्रगुप्त से लेकर अशोक तक तो वैदिक गुरुकुलों को बोद्ध रूप देने के ही कार्य चले …
नालंदा और तक्षशिला भी बोद्द वर्चस्व का शिकार ही चुके थे …

अशोक ने तो यज्ञों पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया था … सभी प्रकार के कर्मकाण्डो पर रोक लग चुकी थी ।

ऐसे कठिन समय में आदि गुरु शन्कराचार्य ने बोद्ध आचार्यों के साथ शास्त्रार्थ में पराजित किया और लाखों की संख्या में वैदिक से बोद्ध तथा जैनियों बने जनमानस को पुन: वैदिक धर्म में दीक्षित किया ।

इस कार्य में कुमारिल भट्ट जी का योगदान भी उल्लेखनीय रहा जिन्होंने बोद्ध मठ में रहकर बोद्ध शास्त्रों का भी अध्ययन किया ताकी उनकी कमजोरियां ढूंढ कर उन्हें पराजित किया जा सके ।

दोनों और के विद्वान अपने अपने वैदिक और वेद विरोधी ग्रन्थ आदि साथ लेकर बैठते थे… उनके बीच कोई नही बोलता था ।

सभी प्रश्नों के उत्तर हेतु उपलब्ध ग्रंथो के प्रमाण उपस्थित किये जाते थे ।

बोद्ध यदि हारे तो वैदिक धर्म स्वीकार करते थे … और वैदिक यदि हारे तो बोद्ध विद्वान से हारने पर उसके सम्प्रदाय को स्वीकार करते थे ।

आदि शंकराचार्य जीवन में कभी किसी भी शास्त्रार्थ में पराजित नही हुए ।

वैदिक ज्ञान से ऋषि भूमि को पुन: प्रकाशित किया …

बोद्ध प्रपंचों के कारण लुप्त होने लगी श्रीमदभगवदगीता को पुन: ऋषि भूमि के कोने कोने तक सुलभ करवाया ।

शंकराचार्य ने हिंदू धर्म को व्यवस्थित करने का भरपूर प्रयास किया, उन्होंने हिंदुओं की सभी जातियों को इकट्ठा किया ।

भविष्य में पुन: वैदिक धर्म पर कोई आघात न हो इस हेतु उन्होंने करके ‘दसनामी संप्रदाय’ बनाया और साधु समाज की अनादिकाल से चली आ रही धारा को पुनर्जीवित कर चार धाम की चार पीठ का गठन किया जिस पर चार शंकराचार्यों की परम्परा की शुरुआत हुई।

ब्रह्मलीन होने से पूर्व मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने भारतभर का भ्रमण कर हिंदू समाज को एक सूत्र में पिरोने के लिए चार मठों ही स्थापना की।

चार मठ के शंकराचार्य ही हिंदुओं के केंद्रिय आचार्य माने जाते हैं, इन्हीं के अधिन अन्य कई मठ हैं।
चार प्रमुख मठ निम्न हैं:-
1. वेदान्त ज्ञानमठ, श्रृंगेरी (दक्षिण भारत)।
2. गोवर्धन मठ, जगन्नाथपुरी (पूर्वी भारत)
3. शारदा (कालिका) मठ, द्वारका (पश्चिम भारत)
4. ज्योतिर्पीठ, बद्रिकाश्रम (उत्तर भारत)

शंकराचार्य के चार शिष्य: 1. पद्मपाद (सनन्दन), 2। हस्तामलक 3. मंडन मिश्र 4. तोटक (तोटकाचार्य)।
उनके ये शिष्य चारों वर्णों से थे।

ग्रंथ: शंकराचार्य ने सुप्रसिद्ध ब्रह्मसूत्र भाष्य के अतिरिक्त ग्यारह उपनिषदों पर तथा गीता पर भाष्यों की रचनाएँ की एवं अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथों स्तोत्र-साहित्य का निर्माण कर वैदिक धर्म एवं दर्शन को पुन: प्रतिष्ठित करने के लिए अनेक श्रमण, बौद्ध तथा हिंदू विद्वानों से शास्त्रार्थ कर उन्हें पराजित किया।

दसनामी सम्प्रदाय:
शंकराचार्य से सन्यासियों के दसनामी सम्प्रदाय का प्रचलन हुआ।

इनके चार प्रमुख शिष्य थे और उन चारों के कुल मिलाकर दस शिष्य हए।
इन दसों के नाम से सन्यासियों की दस पद्धतियाँ विकसित हुई।
शंकराचार्य ने चार मठ स्थापित किए थे।

दसनामी सम्प्रदाय के साधु प्रायः गेरुआ वस्त्र पहनते, एक भुजवाली लाठी रखते और गले में चौवन रुद्राक्षों की माला पहनते। कठिन योग साधना और धर्मप्रचार में ही उनका सारा जीवन बीतता है।

दसनामी संप्रदाय में शैव और वैष्णव दोनों ही तरह के साधु होते हैं।

यह दस संप्रदाय निम्न हैं:
1.गिरि, 2.पर्वत और 3.सागर।
इनके ऋषि हैं भ्रगु।

4.पुरी, 5.भारती और 6.सरस्वती।
इनके ऋषि हैं शांडिल्य।

7.वन और 8.अरण्य
इनके ऋषि हैं कश्यप।

9.तीर्थ और 10. आश्रम
इनके ऋषि अवगत हैं।

इन दशनामी गुरुकुलों में किसी भी जाती या वर्ण का बालक पढने जा सकता है… शिक्षा प्राप्ति के उसका नाम स्वयं बदल दिया जाता है ।

द्सनामी सम्प्रदाय से दीक्षित हिन्दू साधुओं के नाम के आगे स्वामी और अंत में उसने जिस संप्रदाय में दीक्षा ली है उस संप्रदाय का नाम लगाया जाता है, जैसे- स्वामी अवधेशानंद गिरि,
स्वामी जयेंद्र सरस्वती,
स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ ।

इस प्रकार वर्ण व्यवस्था का भी संरक्षण होने लगा ।

शंकराचार्य के दर्शन को अद्वैत वेदांत का दर्शन कहा जाता है।

शंकराचार्य के गुरु दो थे।
गौडपादाचार्य के वे प्रशिष्य और गोविंदपादाचार्य के शिष्य कहलाते थे।

शकराचार्य का स्थान विश्व के महान दार्शनिकों में सर्वोच्च माना जाता है। उन्होंने ही इस ब्रह्म वाक्य को प्रचारित किया था कि ‘ब्रह्म ही सत्य है और जगत माया।’ आत्मा की गति मोक्ष में
है।

अद्वैत वेदांत अर्थात उपनिषदों के ही प्रमुख सूत्रों के आधार पर स्वयं विद्वानों ने उपदेश दिए थे। उन्हीं का विस्तार आगे चलकर माध्यमिका एवं विज्ञानवाद में हुआ।
इस उपनिषद अद्वैत दर्शन को गौडपादाचार्य ने अपने तरीके से व्यवस्थित रूप दिया जिसका विस्तार शंकराचार्य ने किया।

वेद और वेदों के अंतिम भाग अर्थात वेदांत या उपनिषद में वह सभी कुछ है जिससे दुनिया के तमाम तरह का धर्म, विज्ञान और दर्शन निकलता है।

नागा साधुओं की सेना तैयार की गई जिसने आगे चलकर पृथ्वीराज चौहान को भी सहायता की और श्रीराम जन्मभूमि हेतु हुए संघर्ष में औरंगजेब को लगातार 30 युद्धों में पराजित किया जो कि औरंगजेब की खुद की जीवनी में भी उल्लेखित है ।

बहुत से राजा भी वैदिक धर्म को प्रचारित करने हेतु पुन: प्रेरित हुए जिनमे पुष्यमित्र शुङ्ग तथा शशांक शेखर का योगदान अतुलनीय है ।

इतिहासकारों के प्रपंचों के कारण सबके काल समय में अनियमितता पाई जाती है ।

जहाँ एक और पुष्यमित्र शुङ्ग ने अशोक के आखिरी वंशज बृहद्रथ का वध करके मगध पर बोद्ध शासन समाप्त करके पुन: वैदिक धर्म को प्रचारित किया …

वहीं दूसरी और गौड़ प्रदेश बंगाल के राजा शशांक शेखर ने एक दिन यह घोषणा कर दी कि कल का सूर्यास्त वो देखेगा जो … हिन्दू होगा ।

अगले दिन जितने बोद्ध काटे गये… उससे दुगुने बोद्धों ने पुन: वैदिक धर्म स्वीकार किया… इनमे वे भी थे जो भय या मजबूरी के कारण बोद्ध मत में चले गये थे ।

कुछ बोद्ध सिंध, अफगानिस्तान और बलोचिस्तान की और भाग गये ।

तथा कुछ थाईलेंड, चीन आदि की और भाग गये ।

जो चीन, थाईलेंड आदि देशों की और गये उनका प्रतिशोध तो समय के साथ ठंडा पड़ गया …

परन्तु अफगानिस्तान, मंगोलिया, सिंध और बलोचिस्तान के बोद्धों में प्रतिशोध की अग्नि जलती जलती रही… पुन: वैदिक धर्म को क्षीण करके बोद्ध सत्ता का वर्चस्व स्थापित करना ।

ऐसा तब संभव हुआ जब 712 ईस्वी में सीरिया के दमिश्क से मुहम्मद बिन कासिम आया … जो तीन बार ईरान के रास्ते आया पर परास्त हुआ ।

परन्तु चौथी बार जब अरब के समुद्री मार्ग से आया… तो तटीय क्षेत्रों पर उसका स्वागत किया ।

कई दिन की मेहमाननवाजी में शान्ति के सम्प्रदाय कहे जाने वाले बोद्ध अनुयायियों ने 32 लाख गायों की हत्या करवा कर खान पान करवाया मुहम्मद बिन कासिम और उसकी सेना का ।

बोद्धों ने मुहम्मद बिन कासिम को सिंध के राजा दाहिर सेन के विरुद्ध अपने अनुभवी नाविक और जासूस दिए जिन्होंने उफनती नदियों से बचाकर सिंध के राजा तक पहुँचाया और जासूसी करके कमियाँ भी पता करके दीं …

अंतत: बोद्धों की गद्दारी के कारण दाहिर सेन परास्त हुए ।

अगले कुछ वर्षों में इस्लाम की क्रूरता ने गद्दार बोद्धों को भी नही बक्शा और सभी बोद्धों को भी इस्लाम में धर्मान्तरित किया ।

इतना सब कुछ हुआ…
और उसके बाद के 1100 वर्षों का इस्लामिक-ब्रिटिश अत्याचार और नरसंहारों का इतिहास भी आपके समक्ष उपलब्ध है ।

परन्तु हिन्दुओं को अक्कल न आई…

आज जब ऐसे ही एक शंकराचार्य ने वेद-विरुद्ध न जाने की शिक्षा दी …

तो वर्षों से सनातन वैदिक ग्रंथो की ज्ञान की वायु से दूर अन्धकार और अज्ञान में रखे गये हिन्दू आज… ज्ञान की रौशनी। पाने के नाम पर भी भौंकने लगते हैं ।

जबकि वे भूल जाते हैं कि शंकराचार्य सनातन वैदिक धर्म के समस्त शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करने के उपरान्त ही उस पदवी को प्राप्त करने हेतु योग्यता प्राप्त करते हैं ।

शास्र्त्रों का ज्ञान नही और शंकराचार्यों को कहते हैं कि उसे कुछ ज्ञात नही … यह कौन से हिन्दू हैं … ???

आशा हैं कि हिन्दू अज्ञानता के गुलाम बन कर ज्ञान पर भौंकना बंद करेंगे शीघ्र ही ।

कई दिनों तक अन्धकार में रहने के उपरान्त प्रकाश में जाने से भी भयभीत न होकर पुन: सनातन वैदिक ग्रंथो के ज्ञान से प्रकाशित होगा ।

परन्तु यह इतना सरल नही था… न होगा ।

पराजित राष्ट्र तब तक पराजित नही होते जब तक वे अपनी संस्कृति, मूल्यों, धरोहरों एवं परम्पराओं की रक्षा करते हैं ।

समय के साथ अनेक परिवर्तन होते हैं, पोशाकों में बदलाव आयेगा,
घरों की रचना में बदलाव आयेगा,
खानपान के तरीके भी बदलेंगे…..

परन्तु जीवन मूल्य तथा आदर्श जब तक कायम रहेंगे तब तक संस्कृति भी कायम कहेगी l

यही संस्कृति राष्ट्रीयता का आधार होती है ….राष्ट्रीयता का पोषण यानि संस्कृति का पोषण होता है …. इसे ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहा जाता है l

सीमाएं उसी राष्ट्र की विकसित और सुरक्षित रहेंगी …..
…जो सदैव संघर्षरत रहेंगे l

जो लड़ना ही भूल जाएँ वो न स्वयं सुरक्षित रहेंगे न ही अपने राष्ट्र को सुरक्षित बना पाएंगे l

………..✍🏻विकास खुराना ( अध्यक्ष, हिन्दू समूह ) 🚩

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🚩🌞 जानें शंकराचार्यों की महान परम्परा के बारे में👌🏻
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🌷कृते विश्वगुरुर्ब्रह्मा त्रेतायां ऋषिसत्तमः।
द्वापरे वेदव्यासश्च अहमस्मि कलौयुगे। (मठाम्नाय महानुशासन)
माहिष्मती सम्राट महाराज सुधन्वा चौहान को सर्वप्रथम यह बात बताई गयी थी कि सत्ययुग में ब्रह्मा, त्रेता में वशिष्ठ, द्वापर में वेदव्यास और कलियुग में रुद्रांश वीरभद्र के अवतार शंकराचार्य जी विश्व के गुरु होते हैं। ये साक्षात् शरीर धारी भगवान् शिव के अंश होते हैं। नररूप धरो हरः

हिंदू धर्म का संत समाज आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा नियुक्त चार मठों के अधीन है। हिंदू धर्म की एकजुटता और व्यवस्था के लिए चार मठों की परंपरा को जानना आवश्यक है। चार मठों से ही गुरु-शिष्य परम्परा का निर्वाह होता है। चार मठों के संतों को छोड़कर अन्य किसी को गुरु बनाना हिंदू संत धारा के अंतर्गत नहीं आता।

शंकराचार्य जी ने इन मठों की स्थापना के साथ-साथ उनके मठाधीशों की भी नियुक्ति की, जो बाद में स्वयं शंकराचार्य कहे जाते हैं। जो व्यक्ति किसी भी मठ के अंतर्गत संन्यास लेता हैं वह दसनामी संप्रदाय में से किसी एक सम्प्रदाय पद्धति की साधना करता है।

☀ये चार मठ निम्न हैं:-

⚪ श्रृंगेरी मठ
श्रृंगेरी मठ भारत के दक्षिण में रामेश्वरम में स्थित है। श्रृंगेरी मठ के अन्तर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले संन्यासियों के नाम के बाद सरस्वती, भारती तथा पुरी सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उक्त संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। श्रृंगेरी पीठाधीश्वर जगद्गुरु श्री भारती कृष्णतीर्थ जी महाराज। इस मठ का महावाक्य ‘अहं ब्रह्मास्मि’ है तथा मठ के अन्तर्गत ‘यजुर्वेद’ को रखा गया है। इस मठ के प्रथम मठाधीश आचार्य सुरेश्वरजी थे, जिनका पूर्व में नाम मण्डन मिश्र था।वर्तमान में स्वामी भारती कृष्णतीर्थ इसके 36वें मठाधीश हैं।

⚪ गोवर्धन मठ
गोवर्धन मठ भारत के पूर्वी भाग में उड़ीसा राज्य के जगन्नाथ पुरी में स्थित है। गोवर्धन मठ के अंतर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले सन्यासियों के नाम के बाद ‘आरण्य’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उक्त संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। पुरी पीठाधीश्वर जगद्गुरु श्री निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज इस मठ का महावाक्य है ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ तथा इस मठ के अंतर्गत ‘ऋग्वेद’ को रखा गया है। इस मठ के पहले मठाधीश आदि शंकराचार्य के पहले शिष्य पद्मपाद हुए। वर्तमान में निश्चलानंद सरस्वती इस मठ के 145 वें मठाधीश हैं।

⚪ शारदा मठ
शारदा (कालिका) मठ गुजरात में द्वारकाधाम में स्थित है। शारदा मठ के अंतर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले सन्यासियों के नाम के बाद ‘तीर्थ’ और ‘आश्रम’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उक्त संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। द्वारिका एवं ज्योति पीठाधीश्वर जगद्गुरु श्री स्वरूपानन्द जी महाराज  है । इस मठ का महावाक्य है ‘तत्त्वमसि’ तथा इसके अंतर्गत ‘सामवेद’ को रखा गया है। शारदा मठ के प्रथम मठाधीश हस्तामलक (पृथ्वीधर) थे। हस्तामलक आदि शंकराचार्य के प्रमुख चार शिष्यों में से एक थे। वर्तमान में स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती इसके 79 वें मठाधीश हैं।

⚪ ज्योतिर्मठ उत्तरांचल के बद्रीनाथ में स्थित है ज्योतिर्मठ। ज्योतिर्मठ के अंतर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘गिरि’, ‘पर्वत’ एवं ‘सागर’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उक्त संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस मठ का महावाक्य ‘अयमात्मा ब्रह्म’ है। इस मठ के अंतर्गत अथर्ववेद को रखा गया है। ज्योतिर्मठ के प्रथम मठाधीश आचार्य तोटक बनाए गए थे। वर्तमान में कृष्णबोधाश्रम इसके 44 वें मठाधीश थे, जिनके ब्रह्मलीन होने के बाद वर्तमान में श्री स्वरूपानंद जी इस पीठ का अतिरिक्त प्रभार सम्भाल रहे हैं। उक्त मठों तथा इनके अधीन उपमठों के अंतर्गत संन्यस्त संतों को गुरु बनाना या उनसे दीक्षा लेना ही हिंदू धर्म के अंतर्गत माना जाता है। यही हिंदुओं की संत धारा मानी गई है।

इन पीठों के अलावा बाद में कार्यभार बढ़ने के कारण तीन खंडपीठों की भी स्थापना की गयी, जिनमे काशी सुमेरु, भानपुरा और कांची कामकोटि पीठ सम्मिलित है। वर्तमान में चर्चित शंकर रमन हत्याकांड में इन्हीं कांची कामकोटि खण्डपीठ के शंकराचार्य श्री जयेन्द्र सरस्वती जी को जयललिता के षड्यंत्र पर मुख्य अभियुक्त बनाया गया था, जिसमें वे पूर्णतः निर्दोष सिद्ध हुए। ये सभी पीठ हर वर्ष समाजसेवा में बीस हज़ार करोड़ से भी अधिक धन खर्च करते हैं। आईये हम सब पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्यों का दर्शन कर सौभाग्यशाली बने।
▫➖▫➖▫➖▫➖▫➖▫
            🌸🍁🌼🙏🌼🍁🌸

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. ।। 🕉 ।।
🌞 सुप्रभातम् 🌞
««« आज का पंचांग »»»
कलियुगाब्द…………….5120
विक्रम संवत्……………2075
शक संवत्………………1940
मास………………………ज्येष्ठ
पक्ष………………………शुक्ल
तिथी………………….एकादशी
संध्या 05.50 पर्यंत पश्चात द्वादशी
रवि…………………..उत्तरायण
सूर्योदय………..05.46.12 पर
सूर्यास्त…………07.00.18 पर
सूर्य राशि………………….वृषभ
चन्द्र राशि………………..कन्या
नक्षत्र………………………हस्त
संध्या 07.57 पर्यंत पश्चात चित्रा
योग……………………….सिद्धि
संध्या 07.33 पर्यंत पश्चात व्यतिपात
करण…………………….वणिज
प्रातः 06.00 पर्यंत पश्चात विष्टि
ऋतु……………………….ग्रीष्म
दिन……………………..शुक्रवार

🇬🇧 आंग्ल मतानुसार :-
25 मई सन 2018 ईस्वी ।

☸ शुभ अंक………………….7
🔯 शुभ रंग…………………नीला

👁‍🗨 राहुकाल :-
प्रात: 10.44 से 12.23 तक ।

🚦 दिशाशूल :-
पश्चिमदिशा – यदि आवश्यक हो तो जौ का सेवन कर यात्रा प्रारंभ करें।

चौघडिया :-
प्रात: 07.25 से 09.04 तक लाभ
प्रात: 09.04 से 10.43 तक अमृत
दोप. 12.23 से 02.02 तक शुभ
सायं 05.20 से 06.59 तक चंचल
रात्रि 09.41 से 11.02 तक लाभ ।

📿 आज का मंत्र :-
।। ॐ प्रमोदाय नमः ।।

📢 संस्कृत सुभाषितानि
दीर्घा वै जाग्रतो रात्रि: दीर्घं श्रान्तस्य योजनम् ।
दीर्घो बालानां संसार: सद्धर्मम् अविजानताम् ॥
अर्थात :-
रातभर जागनेवाले को रात बहुत लंबी मालूम होती है । जो चलकर थका है, , उसे एक योजन ह्मचार मील ) अंतर भी दूर लगता है । सद्धर्म का जिन्हे ज्ञान नही है उन्हे जिन्दगी दीर्घ लगती है ।

🍃 आरोग्यं सलाह :-
आंखों की देखभाल एवं घरेलु नुस्खे :-

4. एलोवेरा –
एलोवेरा का इस्तेमाल शरीर की बीमारियों को दूर करने के लिए ही नहीं बल्कि त्वचा एंव बालों के लिए भी फायदेमंद है। एलोवेरा कई तरह की बीमारियों में उपचार गुणों के लिए जाना जाता है। इसकी सुखदायक गुणों के कारण यह आपकी आंखों पर बेहद आरामदायक प्रभाव डालता है। इसमें एंटीमाइक्रोबायल कंपाउंड और एंटीऑक्सिडेंट भी होते हैं जो आपकी आंखों में दर्द के कारणों का इलाज कर सकते हैं। इसके लिए आप एक चम्मच एलोवेरा जेल लीजिए और दो बड़े चम्मच ठंड़े पानी में मिला दीजिए। फिर रुई को इसमें भिगोकर 10 मिनट के लिए पलकों पर रखें। आप इसे दिन में दो बार कर सकते हैं।

5. गुलाब जल –
तवचा की समस्या को दूर करने के लिए गुलाब जल का इस्तेमाल करना बहुत ही लाभकारी होता है। यह स्किन को साफ करने के साथ ही अपने एंटी-बैक्टीरियल गुण से संक्रमण भी दूर करता है। जब आंखों में दर्द और थकावट से राहत चाहिए तो गुलाब का पानी एक प्रसिद्ध घरेलू उपाय है। आप बहुत ही जल्द कूलिंग और आराम महसूस करेंगे। इसके लिए आप कॉटन को पानी में डुबोएं और इसे 10 से 15 मिनट के लिए बंद पलकों पर रखें। यदि आपको अच्छे परिणाम चाहिए तो ठंड़ा गुलाब जल प्रयोग में लाएं।

6. सेब का सिरका –
सेब के सिरके में मौजूद कैल्शियम, पोसोडियम, टैशियम, क्लोरीन तथा आयरन आदि तत्व त्वचा के पोषण के लिए अति आवश्यक होते हैं। आंखों की देखभाल एवं घरेलु नुस्खे में सेब का सिरका भी शामिल है। यह उपाय संक्रमण के कारण होने वाली आंखों में दर्द से तत्काल राहत दे सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि एसीवी या सेब का सिरका में मैलिक एसिड होता है, जो आंखों को प्रभावित करने वाले बैक्टीरिया से लड़ने में सहायक होता है। इसके लिए आप दो बड़े चम्मच पानी में एक बड़ा चम्मच सेब का सिरका मिलाएं। फिर इसमें कॉटन बॉल को डुबोएं और 10 से 15 मिनट के लिए इसे अपने पलको पर रखें। इसे दिन में एक या दो बार जरूर करें।

आज का राशिफल :-

🐏 राशि फलादेश मेष :-
संपत्ति के कार्य लाभ देंगे। उन्नति के मार्ग प्रशस्त होंगे। परीक्षा व साक्षात्कार में वृद्धि होगी। प्रमाद न करें।

🐂 राशि फलादेश वृष :-
रचनात्मक कार्य सफल रहेंगे। मनपसंद भोजन का आनंद मिलेगा। जोखिम व जमानत के कार्य टालें।

👫 राशि फलादेश मिथुन :-
दौड़धूप अधिक होगी। स्वास्थ्य का ध्यान रखें। वाणी में हल्के शब्दों का प्रयोग बिलकुल न करें।

🦀 राशि फलादेश कर्क :-
मेहनत‍ का फल मिलेगा। घर-बाहर पूछ-परख रहेगी। आय में वृद्धि होगी। जल्दबाजी न करें।

🦁 राशि फलादेश सिंह :-
बिछड़े साथियों से मुलाकात होगी। उत्साहवर्धक सूचना मिलेगी। प्रसन्नता बनी रहेगी। जोखिम न लें।

👱🏻‍♀ राशि फलादेश कन्या :-
भेंट व उपहार की प्राप्ति होगी। परीक्षा व साक्षात्कार में सफलता मिलेगी। व्यावसायिक यात्रा सफल रहेगी।

राशि फलादेश तुला :-
अपेक्षाकृत कामों में विलंब होगा। पुराना रोग उभर सकता है। फालतू खर्च होगा। चिंता रहेगी।

🦂 राशि फलादेश वृश्चिक :-
यात्रा, निवेश व नौकरी मनोनुकूल रहेंगे। बकाया वसूली होगी। नए कार्य प्रारंभ हो सकते हैं।

🏹 राशि फलादेश धनु :-
योजना फलीभूत होगी। मान-सम्मान मिलेगा। धन प्राप्ति सुगम होगी। बेचैनी रहेगी। प्रमाद न करें।

🐊 राशि फलादेश मकर :-
कानूनी अड़चन दूर होगी। पूजा-पाठ में मन लगेगा। घर-बाहर प्रसन्नता रहेगी। वरिष्ठजनों की बात मानें।

🏺 राशि फलादेश कुंभ :-
वाहन व मशीनरी के प्रयोग में सावधानी रखें। कीमती वस्तुएं संभालकर रखें। जल्दबाजी न करें।

🐋 राशि फलादेश मीन :-
कोर्ट व कचहरी में लाभ होगा। बुद्धि का प्रयोग करें। जीवनसाथी का सहयोग मिलेगा। प्रसन्नता रहेगी।

☯ आज का दिन सभी के लिए मंगलमय हो |

।। 🐚 शुभम भवतु 🐚 ।।

🇮🇳🇮🇳 भारत माता की जय 🚩🚩वीके

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“`
अमेरिका को English में America
ही बोलते.

जापान को भी English में Japan बोलते

भूटान को भी English में Bhutan ही बोलते

श्रीलंका को भी English में
Sri Lanka ही बोलते.

बांग्लादेश को भी English में Bangladesh ही बोलते

नेपाल को भी English में Nepal ही बोलते.

इतना ही नहीं अपने पडोसी मुल्क पाकिस्तान को भी
English में Pakistan ही बोलते.

फिर सिर्फ भारत को ही English में India क्यों बोलते ?

तो

Oxford Dictionary के अनुसार

India यह शब्द कैसे आया यह ९९% लोगो को भी पता तक नहीं होगा…
*
I – Independent

N- Nation

D- Declared

I – In

A- August

इसीलिए इंडिया (India)

दोस्तों

इस पोस्ट को कृपया इतना शेयर करो की, ज्यादा से ज्यादा भारतीयों को यह पता चल सके…“`

👌👍👏👏👏👏👏👏👏

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[09/04, 6:42 p.m.] Rashminbhai: ટીચર: મન્કી નો સ્પેલીંગ બોલ.

સ્ટુડન્ટ: એમ. ઓ. એન. કે. ઈ. વાય.

ટીચર: ચોપડીમાંથી જોઈને બોલ્યો?

સ્ટુડન્ટ: ના, સર, તમારી સામે જ જોઈને બોલ્યો…..

(બંને જવાબો સાવ સાચા હોવા છતાં ટીચરે એને આખો પીરીયડ ઉભો રાખ્યો…!!!).
🤣😜🤣😜🤣
[09/04, 6:43 p.m.] Rashminbhai: 👳🏻‍♂👳🏻‍♀👳🏻‍♂👳🏻‍♀👳🏻‍♂👳🏻‍♀👳🏻‍♂👳🏻‍♀👳🏻‍♂
આજકાલ લગન ગાળામાં સાફા બંધાવાની ફેશન વધી છે.
પુરુષોમાં તો હતું જ..👳🏻‍♂👳🏻‍♂
પણ
આજકાલ મહિલાઓમાં પણ ફૅટો બાંધવાનું ચલણ કેમ વધ્યું? 👳🏻‍♀👳🏻‍♀
તે બાબતે તપાસ કરતાં જાણવા મળ્યું કે,
બ્યુટી પાર્લરમાં હેર સ્ટાઈલના રૂ.3000 આપવા
તેના કરતાં
રૂ.200 કે 250 ના સાફાથી
વટ પણ પડે ને સસ્તુ પણ પડે!!!!!
👳🏻‍♀👳🏻‍♂👳🏻‍♀👳🏻‍♂👳🏻‍♀👳🏻‍♂👳🏻‍♀👳🏻‍♂👳🏻‍♀
[09/04, 6:43 p.m.] Rashminbhai: એક મહિલા તેની ફ્રેન્ડને કહેતી હતી કે –

બધા દોરા ધાગા પેહરી જોયા, પણ સાચી શાંતિ તો પતિ સાથે જગડ્યાં પછી જ મળે છે .
🤣🤣🤣🤣🤣🤣
[09/04, 7:56 p.m.] Varsha Ashodiya: आज की नारी ….

पति:- अजी सुनती हो. 💁🏻‍♀
पत्नी:- नहीं सिर्फ बोलती हूँ…. 💁🏻‍♀

😆😄😂🤣😜😜😅😂😆
[09/04, 7:56 p.m.] Varsha Ashodiya: पहले महिलाओं को अबला इसलिए कहते थे, जब पैसे खत्म हो जाते थे तो बस ज़रूरत भर रकम के लिए पति से कहती थी अब_ला

आज कल की तेज तर्रार सबला है, पति का वेतन मिलते ही बोलती है सब_ला

🤣🤣🤣🤣
[09/04, 10:48 p.m.] Rashminbhai: Q.दुनिया का सबसे बड़ा त्यौहार कौन सा है?

Ans. घरवाली

Q.कैसे?

Ans. हफ्ते में 3-4 बार मनाना ही पड़ता है🤣🤣🤣😅😅🙏🙏😁
[10/04, 8:07 a.m.] Rajubhai Car Mechanic: ગુજરાતીઓ ખાવાના બોવ શોખીન…

નવરા બેઠા બગાસા ખાય, ફરવા જાય તો હવા ખાય
ઊંઘ આવેતો ઝોંકા ખાય, માંદા પડે તો ઉધરસ/છીંક ખાય
બાળકો હીંચકા ખાય, મોટા માન ખાય
છોકરીઓ ભાવ ખાય, છોકરા માર ખાય
ઇમાનદાર ધક્કા ખાય, બેઇમાન પૈસા ખાય
વાંઢા માથુ ખાય અને પરણેલા ખોટ ખાય
અને જે બાકી રહી ગયા એ માવા ખાય. 😩😩😩😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😜
[10/04, 5:31 p.m.] Sachinbhai Maniyar: क्या आप जानते हैं….?

ओलंपिक्स में पदक जीतने वाली सभी महिला खिलाड़ियों के कोच पुरुष हैं।

इससे ये साबित होता है कि,

जो औरतें पुरुषों की बातें सुनती और मानती हैं,
उन्हें जीवन में सफलता प्राप्त होती है !
और उनकी कीर्ति पूरे विश्व में फैलती है।

ये बात अपनी पत्नी को

नाश्ता करनेके बाद ही बताएं ….

औऱ फिर….

…तुरंत दफ्तर निकल जायें ।।
😂😂😜😜🤣🤣

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संजय सिंह, भारतीय खिलाड़ी, दूध के कर्ज का सम्मान करते हुए।
जिस गाय के दूध ने उन्हें 3 गोल्ड मैडल लाने के लिए सक्षम बनाया।
उसी गाय को नमन करते हुए।
ये है,वो भारतीय संस्कृति, जिसे गौ हत्यारे कभी नही समझ सकते। कोई संस्कार इनसे सीखे।….जय माँ भारती।

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शालिग्राम

नेपाल में गंडकी नदी के तल में पाए जाने वाले काले रंग के चिकने, अंडाकार पत्थर को कहते हैं। ये भगवान विष्णु का ही एक स्वरुप कहलाते है। तुलसी के श्राप स्वरुप भगवान विष्णु को शालिग्राम बनना पड़ा था। अधिकतर घरों में पूजा के लिए शालिग्राम रखे जाते है। आइये जानते है शालिग्राम से जुडी कुछ ख़ास बातें-
1. स्वयंभू होने के कारण शालिग्राम की प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती और भक्त जन इन्हें घर या मंदिर में सीधे ही पूज सकते हैं।
2. शालिग्राम अलग-अलग रूपों में पाए जाते हैं, कुछ मात्र अंडाकार होते हैं तो कुछ में एक छिद्र होता है ये पत्थर के अंदर शंख, चक्र, गदा या पद्म खुदे होते हैं।
3. भगवान शालिग्राम का पूजन तुलसी के बिना पूर्ण नहीं होता और तुलसी अर्पित करने पर वे तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं।
4. श्री शालिग्राम और भगवती स्वरूपा तुलसी का विवाह करने से सारे अभाव, कलह, पाप ,दुःख और रोग दूर हो जाते हैं।
5. तुलसी शालिग्राम विवाह करवाने से वही पुण्य फल प्राप्त होता है जो कन्यादान करने से मिलता है।
4. पूजन में श्री शालिग्राम जी को स्नान कराकर चंदन लगाकर तुलसी दल अर्पित करना और चरणामृत ग्रहण करना चाहिए। यह उपाय मन, धन व तन की सारी कमजोरियों व दोषों को दूर करने वाला माना गया है।
5. पुराणों में तो यहां तक कहा गया है कि जिस घर में भगवान शालिग्राम हो, वह घर सारे तीर्थों से भी श्रेष्ठ है। इनके दर्शन व पूजन से समस्त भोगों का सुख मिलता है।
6. भगवान शिव ने भी स्कंदपुराण के कार्तिक माहात्मय में भगवान शालिग्राम की स्तुति की है। ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृतिखंड अध्याय में उल्लेख है कि जहां भगवान शालिग्राम की पूजा होती है वहां भगवान विष्णु के साथ भगवती लक्ष्मी भी निवास करती है।
7. पुराणों में यह भी लिखा है कि शालिग्राम शिला का जल जो अपने ऊपर छिड़कता है, वह समस्त यज्ञों और संपूर्ण तीर्थों में स्नान के समान फल पा लेता है।
8. जो निरंतर शालिग्राम शिला का जल से अभिषेक करता है, वह संपूर्ण दान के पुण्य व पृथ्वी की प्रदक्षिणा के उत्तम फल का अधिकारी बन जाता है।
9. मृत्युकाल में इनके चरणामृत का जलपान करने वाला समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक चला जाता है।
10. जिस घर में शालिग्राम का रोज पूजन होता है उसमें वास्तु दोष और बाधाएं अपने आप समाप्त हो जाती हैं।

           !!!   हरि ओंम   !!!

संजय गुप्ता

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महाराणा प्रताप के बारे में कुछ रोचक जानकारी:-
1… महाराणा प्रताप एक ही झटके में घोड़े समेत दुश्मन सैनिक को काट डालते थे।
2…. जब इब्राहिम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थे । तब उन्होने अपनी माँ से पूछा कि- हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर आए ? तब माँ का जवाब मिला- ”उस महान देश की वीर भूमि हल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल लेकर आना, जहाँ का राजा अपनी प्रजा के प्रति इतना वफ़ादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना ।”
लेकिन बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था |
“बुक ऑफ़ प्रेसिडेंट यु एस ए ‘ किताब में आप यह बात पढ़ सकते हैं |
3…. महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलोग्राम था और कवच का वजन भी 80 किलोग्राम ही था|
कवच, भाला, ढाल, और हाथ में तलवार का वजन मिलाएं तो कुल वजन 207 किलो था।

4…. आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं |
5…. अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है, तो आधा हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे, पर बादशाहत अकबर की ही रहेगी|
लेकिन महाराणा प्रताप ने किसी की भी अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया |

6…. हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और अकबर की ओर से 85000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए |

7…. महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना हुआ है, जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है |

8…. महाराणा प्रताप ने जब महलों का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगों ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा कि फौज के लिए तलवारें बनाईं | इसी समाज को आज गुजरात मध्यप्रदेश और राजस्थान में गाढ़िया लोहार कहा जाता है| मैं नमन करता हूँ ऐसे लोगो को |

9…. हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में तलवारें पाई गई।
आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 में हल्दी घाटी में मिला था |

10….. महाराणा प्रताप को शस्त्रास्त्र की शिक्षा “श्री जैमल मेड़तिया जी” ने दी थी, जो 8000 राजपूत वीरों को लेकर 60000 मुसलमानों से लड़े थे। उस युद्ध में 48000 मारे गए थे । जिनमे 8000 राजपूत और 40000 मुग़ल थे |

11…. महाराणा के देहांत पर अकबर भी रो पड़ा था |

12…. मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में
अकबर की फौज को अपने तीरो से रौंद डाला था । वो महाराणा प्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा बिना भेदभाव के उन के साथ रहते थे ।
आज भी मेवाड़ के राजचिन्ह पर एक तरफ राजपूत हैं, तो दूसरी तरफ भील |

13….. महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक महाराणा को 26 फीट का दरिया पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ | उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वह दरिया पार कर गया। जहाँ वो घायल हुआ वहां आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है, जहाँ पर चेतक की मृत्यु हुई वहाँ चेतक मंदिर है |

14….. राणा का घोड़ा चेतक भी बहुत ताकतवर था उसके
मुँह के आगे दुश्मन के हाथियों को भ्रमित करने के लिए हाथी की सूंड लगाई जाती थी । यह हेतक और चेतक नाम के दो घोड़े थे|

15….. मरने से पहले महाराणा प्रताप ने अपना खोया हुआ 85 % मेवाड फिर से जीत लिया था । सोने चांदी और महलो को छोड़कर वो 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमे ।

16…. महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो और लम्बाई 7’5” थी, दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे हाथ में।

महाराणा प्रताप के हाथी की कहानी:
मित्रो, आप सब ने महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक के बारे में तो सुना ही होगा,
लेकिन उनका एक हाथी भी था। जिसका नाम था रामप्रसाद। उसके बारे में आपको कुछ बाते बताता हुँ।

रामप्रसाद हाथी का उल्लेख अल- बदायुनी, जो मुगलों की ओर से हल्दीघाटी के
युद्ध में लड़ा था ने अपने एक ग्रन्थ में किया है।

वो लिखता है की- जब महाराणा प्रताप पर अकबर ने चढाई की थी, तब उसने दो चीजो को ही बंदी बनाने की मांग की थी । एक तो खुद महाराणा और दूसरा उनका हाथी रामप्रसाद।

आगे अल बदायुनी लिखता है की- वो हाथी इतना समझदार व ताकतवर था की उसने हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही अकबर के 13 हाथियों को मार गिराया था ।

वो आगे लिखता है कि- उस हाथी को पकड़ने के लिए हमने 7 बड़े हाथियों का एक
चक्रव्यूह बनाया और उन पर14 महावतो को बिठाया, तब कहीं जाकर उसे बंदी बना पाये।

अब सुनिए एक भारतीय जानवर की स्वामी भक्ति।

उस हाथी को अकबर के समक्ष पेश किया गया ।
जहा अकबर ने उसका नाम पीरप्रसाद रखा।

रामप्रसाद को मुगलों ने गन्ने और पानी दिया।

पर उस स्वामिभक्त हाथी ने 18 दिन तक मुगलों का न तो दाना खाया और न ही
पानी पिया और वो शहीद हो गया।

तब अकबर ने कहा था कि- जिसके हाथी को मैं अपने सामने नहीं झुका पाया,
उस महाराणा प्रताप को क्या झुका पाउँगा.?

इसलिए मित्रो हमेशा अपने भारतीय होने पे गर्व करो।