Posted in Uncategorized

अनजाने कर्म का फल


अनजाने कर्म का फल

एक राजा ब्राह्मणों को लंगर में महल के आँगन में भोजन करा रहा था ।
राजा का रसोईया खुले आँगन में भोजन पका रहा था ।
उसी समय एक चील अपने पंजे में एक जिंदा साँप को लेकर राजा के महल के उपर से गुजरी ।
तब पँजों में दबे साँप ने अपनी आत्म-रक्षा में चील से बचने के लिए अपने फन से ज़हर निकाला ।
तब रसोईया जो लंगर ब्राह्मणो के लिए पका रहा था, उस लंगर में साँप के मुख से निकली जहर की कुछ बूँदें खाने में गिर गई ।
किसी को कुछ पता नहीं चला ।
फल-स्वरूप वह ब्राह्मण जो भोजन करने आये थे उन सब की जहरीला खाना खाते ही मौत हो गयी ।
अब जब राजा को सारे ब्राह्मणों की मृत्यु का पता चला तो ब्रह्म-हत्या होने से उसे बहुत दुख हुआ ।

ऐसे में अब ऊपर बैठे यमराज के लिए भी यह फैसला लेना मुश्किल हो गया कि इस पाप-कर्म का फल किसके खाते में जायेगा …. ???
(1) राजा …. जिसको पता ही नहीं था कि खाना जहरीला हो गया है ….
या
(2 ) रसोईया …. जिसको पता ही नहीं था कि खाना बनाते समय वह जहरीला हो गया है ….
या
(3) वह चील …. जो जहरीला साँप लिए राजा के उपर से गुजरी ….
या
(4) वह साँप …. जिसने अपनी आत्म-रक्षा में ज़हर निकाला ….

बहुत दिनों तक यह मामला यमराज की फाईल में अटका (Pending) रहा ….

फिर कुछ समय बाद कुछ ब्राह्मण राजा से मिलने उस राज्य मे आए और उन्होंने किसी महिला से महल का रास्ता पूछा ।
उस महिला ने महल का रास्ता तो बता दिया पर रास्ता बताने के साथ-साथ ब्राह्मणों से ये भी कह दिया कि “देखो भाई ….जरा ध्यान रखना …. वह राजा आप जैसे ब्राह्मणों को खाने में जहर देकर मार देता है ।”

बस जैसे ही उस महिला ने ये शब्द कहे, उसी समय यमराज ने फैसला (decision) ले लिया कि उन मृत ब्राह्मणों की मृत्यु के पाप का फल इस महिला के खाते में जाएगा और इसे उस पाप का फल भुगतना होगा ।

यमराज के दूतों ने पूछा – प्रभु ऐसा क्यों ??
जब कि उन मृत ब्राह्मणों की हत्या में उस महिला की कोई भूमिका (role) भी नहीं थी ।
तब यमराज ने कहा – कि भाई देखो, जब कोई व्यक्ति पाप करता हैं तब उसे बड़ा आनन्द मिलता हैं । पर उन मृत ब्राह्मणों की हत्या से ना तो राजा को आनंद मिला …. ना ही उस रसोइया को आनंद मिला …. ना ही उस साँप को आनंद मिला …. और ना ही उस चील को आनंद मिला ।
पर उस पाप-कर्म की घटना का बुराई करने के भाव से बखान कर उस महिला को जरूर आनन्द मिला । इसलिये राजा के उस अनजाने पाप-कर्म का फल अब इस महिला के खाते में जायेगा ।

बस इसी घटना के तहत आज तक जब भी कोई व्यक्ति जब किसी दूसरे के पाप-कर्म का बखान बुरे भाव से (बुराई) करता हैं तब उस व्यक्ति के पापों का हिस्सा उस बुराई करने वाले के खाते में भी डाल दिया जाता हैं ।

अक्सर हम जीवन में सोचते हैं कि हमने जीवन में ऐसा कोई पाप नहीं किया, फिर भी हमारे जीवन में इतना कष्ट क्यों आया …. ??

*ये कष्ट और कहीं से नहीं, बल्कि लोगों की बुराई करने के कारण उनके पाप-कर्मो से आया होता हैं जो बुराई करते ही हमारे खाते में ट्रांसफर हो जाता हैं ।

सुबोध महेरा

Posted in Uncategorized

कुतुबमीनार से ऊंचा है यह किला,
राजा की चिता पर बैठकर रानी
ने दी थी जान.. .

जोधपुर का मेहरानगढ़ किला 120 मीटर
ऊंची एक चट्टान पहाड़ी पर निर्मित है।
इस तरह से यह किला दिल्ली के कुतुब
मीनार की ऊंचाई (73मीटर) से भी ऊंचा है।
किले के परिसर में सती माता का मंदिर भी
है। 1843 में महाराजा मान सिंह का निधन
होने के बाद उनकी पत्नी ने चिता पर बैठकर
जान दे दी थी।
यह मंदिर उसी की स्मृति में बनाया गया। .

आसमान से कुछ यूं नज़र आता है
जोधपुर का ये खूबसूरत क़िला .

मेहरानगढ़ किला एक पहाड़ी पर बनाया
गया जिसका नाम ‘भोर चिड़िया’ बताया
जाता है। ये क़िला अपने आप में जोधपुर का
इतिहास देख चुका है,
इसने युद्ध देखे हैं और इस शहर हो
बदलते भी देखा है। .

10 किलोमीटर में फैली है किले की दीवार .

इस किले के दीवारों की परिधि 10
किलोमीटर तक फैली है।
इनकी ऊंचाई 20 फुट से 120 फुट तथा
चौड़ाई 12 फुट से 70 फुट तक है।
इसके परकोटे में दुर्गम रास्तों वाले सात
आरक्षित दुर्ग बने हुए थे।
घुमावदार सड़कों से जुड़े इस किले के चार
द्वार हैं। किले के अंदर कई भव्य महल,
अद्भुत नक्काशीदार दरवाजे,
जालीदार खिड़कियां हैं। .

500 साल से पुराना है यह किला .

जोधपुर शासक राव जोधा ने
12 मई 1459 को इस किले की नींव डाली
और महाराज जसवंत सिंह (1638-78) ने
इसे पूरा किया। इस किले में बने महलों में से
उल्लेखनीय हैं मोती महल, फूल महल, शीश
महल, सिलेह खाना, दौलत खाना आदि।
इन महलों में भारतीय राजवेशों के साज
सामान का विस्मयकारी संग्रह निहित है। .

1965 के युद्ध में देवी ने की थी
इसकी रक्षा… .

राव जोधा को चामुंडा माता में अथाह श्रद्धा
थी। चामुंडा जोधपुर के शासकों की कुलदेवी
रही हैं। राव जोधा ने 1460 मे मेहरानगढ
किले के समीप चामुंडा माता का मंदिर
बनवाया और मूर्ति की स्थापना की।
माना जाता है कि 1965 के भारत-पाक
युद्ध के दौरान सबसे पहले जोधपुर को
टारगेट बनाया गया। माना जाता है कि इस
दौरान माता के कृपा से यहां के लोगों का
बाल भी बांका नहीं हुआ था। .

किले के छत पर रखे तोपों से होती थी
6 किलोमीटर के क्षेत्र की रक्षा .

इस किले के दीवारों पर रखे भीमकाय तोपों
से आस-पास का छह किलोमीटर का
भू-भाग सुरक्षित रखा जाता था।
किले के दूसरे दरवाजे पर आज भी पिछले
युद्धों के दौरान बने तोप के गोलों के
निशान मौजूद हैं। .

आज भी मौजूद हैं रानियों के
आत्मदाह के निशान .

अंतिम संस्कार स्थल पर आज भी सिंदूर के
घोल और चांदी की पतली वरक से बने
हथेलियों के निशान पर्यटकों को उन
राजकुमारियों और रानियों की
याद दिलाते हैं…#jodhpur
#Rajasthanifan

image

Posted in Uncategorized

महान पण्डित जवाहरलाल नेहरू की शादी का कार्ड…..
.
जब हिन्दुओ में शादी होती है तो शादी के कार्ड पर ॐ और श्री गणेश जरूर बना होता है, उसमे मंगल सन्देश भी लिखा होता है, भगवान् विष्णु के सन्देश भी होते है, पर मुसलमानो की शादी के कार्ड में ये सब नहीं होता, वहां उनके हिसाब से चीजें लिखी हुई होती है

आज हम आपको नेहरू की शादी का कार्ड दिखा रहे है जो उनके अब्बू मोतीलाल ने छपवाया था, शादी का पूरा कार्ड ही उर्दू में छापा गया था, और हर चीज उर्दू में यहाँ तक की शादी के समारोह के दिनांक भी उर्दू में ही लिखे गए थे, देखिये नेहरू की शादी का कार्ड
.
(1)…पहले कार्ड में ये लिखा है – इल्तिजा है कि बरोज़ शादीबरखुर्दार जवाहर लाल नेहरूतारीख 7 फरवरी सन् 1916, बवक़्त 4 बजे शामजनाब मआ अज़ीज़ानग़रीब ख़ाना पर चा नोशी फ़रमा कर हमरही नौशादौलत ख़ाना समधियान पर तशरीफ़ अरज़ानी फ़रमाएं बंदा मोती लाल नेहरू नेहरू वेडिंग कैम्पअलीपुर रोड, दिल्ली
.
(2)…दूसरा दावत नामा जो कि मोतीलाल नेहरू की तरफ से मेहमानों को आनंद भवन (इलाहाबाद) में बुलाते हुए छपवाया गया था, उसे भी देखियेःतमन्ना है कि बतक़रीब शादीबरख़ुर्दार जवाहर लाल नेहरू साथ दुख़्तर पंडित जवाहर मल कौलबमुक़ाम देहली बतारीख़ 7 फरवरी, सन् 1916 व तक़ारीबमाबाद बतवारीख़8 और 9 फरवरी, सन् 1916जनाब मआ अज़ीज़ान शिरकत फ़रमा कर मुसर्रत और इफ़्तेख़ार बख़्शें बंदा मोती लाल नेहरू मुंतज़िर जवाब आनंद भवन इलाहाबाद
.
(3)…तीसरा कार्ड बहुरानी यानी कमला कौल के स्वागत कार्यक्रम से संबंधित था जिसमें खाने के इंतेजाम का जिक्र था और अजीज लोगों से दावत में शामिल होने की गुजारिश थी। ये कार्ड दो पन्नों में छपा था। कार्ड के शब्द इस प्रकार से हैः शादीबरख़ुर्दार जवाहर लाल नेहरूसाथदुख़्तर पंडित जवाहर मल कौल साहब, आरज़ू है कि बतक़रीब आमदन बहूरानीतारीख़ 9 फ़रवरी, सन् 1916 बवक़्त 8 बजे शामजनाब मअ अज़ीज़ान ग़रीबख़ाना पर तनावुल मा हज़र फ़रमा करमुसर्रत व इफ़्तेख़ार बख़्शेंबंदा मोती लाल नेहरूनेहरू वेडिंग कैम्प अलीपुर रोड, देहली

नेहरू की शादी के कार्ड से आप समझ सकते है की नेहरू की शादी में माहौल क्या रहा होगा, ऐसा लगता है की ये किसी पंडित की शादी का कार्ड है, जिसमे इस्लामिक इत्र तो खूब महक रहा है, पर हिन्दू मंत्र, ॐ, गणेश सबकुछ ही गायब है

image

image

image

Posted in Uncategorized

श्री सालासर हनुमान जी की पूरी स्थापना कथा

सभी भक्त ये कहानी को पढ़ कर (SHARE) जरुर करे!!!

भारत कि जनता श्री हनुमानजी को गाँवदेवता व् जनदेवता मानती है! राजस्थान में जयपुर – बीकानेर राजमार्ग पर सीकर के पास लछमनगढ़ से 30 किलोमीटर की दूरी पर सालासर गाँव में हनुमानजी की विशेष मान्यता है! वहाँ पर श्री हनुमानजी का एक सिद्ध पीठ मंदिर है, जिसकी सालासर में ‘बालाजी’ के नाम से लोक प्रसिद्ध है!

भक्त प्रवर श्री मोहन दास जी इस मंदिर के संस्थापक थे! भक्त मोहन दास जी की बहन कान्ही का विवाह सालासर के प. सुखराम से हुआ था! इनका एक बेटा उदय पैदा हुआ, लेकिन पांच वर्ष बाद हे प. सुखराम का अचानक निधन हो गया! विधवा बहन और भांजे उदय राम को सहारा देने के लिए मोहन दास जी अपना पैतृक गाँव छोड़ कर सालासर आकार इनके साथ रहने लगे! श्री मोहन दास जी बचपन से श्री हनुमानजी के परम भक्त थे!

एक दिन मोहन दास जी अपने भांजे के साथ खेत में काम कर रहे थे कि हनुमानजी ने प्रकट होकर उन्हें कृषि कार्यों से विरत होने को कहा और मोहन दास जी के हाथ से गंडासी छीन कर दूर फेंक दी, जिसे दूर खड़ा उदय राम भी देख रहा था! शाम को इसी घटना का जिक्र उदय ने अपनी माँ से किया तथा कहा कि मामा का मन आजकल कृषि कार्यों में नहीं लगता! बहन के मन में आया कि मोहन को वैवाहिक बंधन में बाँध देना चाहिए लेकिन बहन कि लाख कोशिशों के बावजूद मोहन दास जी ने शादी नहीं की! एक दिन कान्ही अपने घर में मोहन दास जी और उदय को भोजन करा रही थी कि दरवाजे पर किसी साधु ने आवाज दी! कान्ही जब आटा लेकर दरवाजे पर गई तो वहाँ कोई नहीं था! उसके वापिस आने पर मोहन दास जी ने बताया कि वे स्वयं बालाजी थे! कान्ही ने भाई से प्राथना की कि मुझे भी बालाजी के दर्शन करवाइए! मोहन दास जी ने हामी भर ली! इस बार मोहन दास जी स्वयं गए और बहुत निवेदन करके बालाजी को वापिस लाये, वह भी इस शर्त पर की ‘खीर-खांड युक्त चूरमे का भोजन कराओ और पवित्र आसन पर बिठाओ’! मोहन दास जी ने स्वीकार कर लिया! सेवा से प्रसन्न होकर श्री बालाजी ने वरदान दिया कि “कोई भी मेरी छाया (आवेश) अपने ऊपर धारण करने की चेष्टा नहीं करेगा! श्रद्धापूर्वक जो कोई भी मुझे याद करेगा मैं उसकी सहायता करूँगा और मैं निरंतर सालासर में विराजमान रहूँगा!” ऐसा कहकर श्री बालाजी अंतर्धान हो गए! संवत १८११ श्रावण मास में सूर्योदय के समय एक दिन, जिला नागौर के लाडनू के पास, असोटा ग्राम में एक जाट अपने खेत में हल जोत रहा था कि जमीन से शिलाखंडित मूर्ति निकली, पर प्रमादवश जाट ने कोई ध्यान नहीं दिया! फलस्वरूप वह उदरशूल से पीड़ित हो गया और लेट गया! दोपहर को जब उसकी पत्नी भोजन मेकर आई तो जाट ने सारी कथा कह सुनाई! जाटनी समझदार थी! उसने अपने आँचल से मूर्ति को साफ़ किया तो उसको शिलाखंड में श्री मारुतिनंदन की झांकी दृष्टिगोचर हुई! अब उसने श्रद्धापूर्वक उस मूर्ति को एक वृक्ष के निचे स्थापित कर चूरमे का भोग लगाया और श्री बालाजी का ध्यान किया! चमत्कार यह हुआ कि जाट स्वस्थ होकर उठ बैठा और काम करने लगा! इस घटना को सुन कर जनसमुदाय उमड़ पड़ा! असोटा ग्राम के ठाकुर भी मूर्ति के दर्शनार्थ आये और मूर्ति को महल में ले गए, किन्तु कुछ लोगों का मानना है कि मूर्ति उनके महल में भेज दी गई! रात्रि को श्री हनुमानजी ने स्वपन में प्रकट होकर ठाकुर को उस मूर्ति को शीघ्र सालासर पहुँचाने का आदेश दिया! सवेरा होते ही ठाकुर ने आदेशानुसार बैलगाडी में उस मूर्ति को अपने निजी सेवकों कि निगरानी मिएँ सालासर के लिए रवाना कर दिया और स्वयं भी दूसरे रथ में बैठकर साथ गए! ये दोनों रथ आज भी मंदिर में सुरक्षित रखे हुए है! उसी रात्रि भक्त मोहन दास जी को भी श्री हनुमानजी के दर्शन हुए! उन्होंने अपने भक्त से कहा कि –“तुम्हे दिए गए वचनानुसार में असोटा ग्राम के ठाकुर द्वारा भेजी जा रही मूर्ति के रूप में तुम्हारे पास आ रहा हू!”

सालासर पहुँचकर ‘मूर्ति कि स्थापना’ के स्थान के चयन को लेकर कुछ समस्या आई! तब श्री मोहन दास जी ने कहा कि रथ के बैलों को स्वतंत्र सहोद दिया जाए और जहाँ बैल स्वतः रुकें उसी स्थान पर मूर्ति कि स्थापना कर दी जाए! ऐसा ही हुआ! बैल एक तिकोने टीले पर जाकर रुक गए और उसी दिन श्रावन शुक्ल नौंवी ,संवत १८११ ईसवी सन् १७५४ शनिवार के दिन. परम तपस्वी श्री मोहन दास जी के मार्ग-दर्शन में उसी टीले पर शिलाखंड-मूर्ति को स्थापित कर दिया गया! संवत १८१५ में मिटटी एवं पत्थर से इस मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ! थोड़े हे दिनों में श्री बालाजी एवं मोहन दास कि ख्याति दूर दूर तक फ़ैल गई! समय पाकर जैसे जैसे श्रधालु भक्तों कि मनोकामनाएं पूर्ण होती गई वैसे वैसे मंदिर भी विशाल बनता गया! आज २४४ वर्षों बाद इस मंदिर कि दीवारें चांदी कि भव्य मूर्तियों और चित्रों से सुसज्जित है! आज श्री सालासर में बालाजी का यह मंदिर लोक विख्यात है!

सभी भक्त कथा पढ़ कर सालासर बालाजी का जय कारा Comment कर जरूरू लगाये!!! And सभी भक्त ये कहानी को पढ़ कर (SHARE) कर फेसबुक पर बालाजी के सभी भक्तो तक ये कथा जरुर पंहुचा दे!!!!

जय सालासर बालाजी की !!
विक्रम प्रजेश राइसोनय

image

Posted in Uncategorized

#महान क्रांतिकारी महवीर सिंह राठौर

16 सितंबर 1904 को #उत्तर प्रदेश के एटा जिले के राठौर राजपूतो के ठिकाने राजा का रामपुर के शाहपुर टहला (अब कासगंज जिला) में ठाकुर देवी सिंह जी के यहाँ जन्मे महावीर सिंह ने एटा के राजकीय इंटर कॉलेज से पढाई करने के बाद आगे की पढाई के लिये कानपुर के DAV कॉलेज में दाखिल लिया। महावीर सिंह जी को घर से ही देशभक्ति की शिक्षा मिली थी। कानपुर में इनको क्रान्तिकारियो का सानिध्य मिला और ये पूरी तरह अंग्रेजो के विरुद्ध क्रांतिकारी संघर्ष में कूद पड़े। उनके पिता को भी जब इसका पता चला तो उन्होंने कोई विरोध करने की जगह अपने पुत्र को देश के लिये बलिदान होने के लिये आशीर्वाद दिया। भगत सिंह जैसे अनेक क्रांतिकारी अंग्रेज़ो से छिपने के लिये उनके गाँव के घर में ही रुकते थे। भगत सिंह खुद 3 दिन उनके घर रुके थे।

काकोरी कांड और सांडर्स कांड में शामिल होने के बाद वो अंग्रेज़ो के लिये चुनौती बन गए थे। उन्होंने सांडर्स की हत्या के बाद भगत सिंह को लाहौर से निकालने में सक्रीय भूमिका निभाई थी। अपने खिलाफ अंग्रेज़ो के सक्रिय होने के बाद वो भूमिगत होकर काम करने लगे। अंत में 1929 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें अन्य क्रान्तिकारियो के साथ काला पानी की सजा सुनाई गई।

बलिदान–
जैल में क्रान्तिकारियो के साथ बहुत बुरा बर्ताव होता था। उनको अनेक यातनाऐं दी जाती थीं और बदसलूकी की जाती थी। काफी यातनाए सहने के बाद बन्दियों ने विरोध करने का फैसला लिया और जेल में बदसलूकी और बदइंतेजामी के खिलाफ भूख हड़ताल शुरू की। अंग्रेज़ो ने भूख हड़ताल को तोड़ने की अनेक कोशिशे की लेकिन सब बेकार रहा। बन्दियों को जबरदस्ती खाना खिलाने का प्रयत्न किया, जिसमे अनेको क्रान्तिकारियो की भूख हड़ताल तुड़वाने में सफल रहे। अंग्रेज़ो ने महावीर सिंह जी की भी भूख हड़ताल तुड़वाने की बहुत कोशिश की, अनेको लालच दिए, यातनाए दी लेकिन बलिष्ठ शरीर के स्वामी महावीर सिंह जी की भूख हड़ताल नही तुड़वा पाए। अंग्रेज़ो ने फिर जबरदस्ती करके मुँह में खाना ठूसने की कोशिश की, इसमें भी वो सफल नही हो पाए। इसके बाद अंग्रेजो ने नली को नाक के द्वारा गले में पहुँचाकर उन्हें जबरदस्ती दूध पिलाने की कोशिश की जिसमे उन्हें जमीन पर गिराकर 8 पुलिसवालो ने पकड़ा हुआ था। हठी महावीर सिंह राठौड़ ने पूरी जान लगाकर इसका विरोध किया जिससे दूध उनके फेफड़ो में चला गया जिससे तड़प तड़पकर उनकी 17 मई 1933 को मृत्यु हो गई और उन्होंने शहीदों की श्रेणी में अपना नाम अमर कर दिया। अंग्रेज़ो ने शहीद के घर वालो तक को शव नही ले जाने दिया और शव को पत्थरों से बांधकर समुद्र में फेंक दिया।

दुःख की बात ये है की आज ऐसे बलिदानी महापुरुषो, जिनकी वजह से हमे अंग्रेज़ो से स्वतंत्रता नसीब हुई के बारे में बहुत कम लोग जानते हैँ। महावीर सिंह राठौड़ ऐसे ही एक राजपूत योद्धा थे जिनकी शहादत से बहुत कम लोग परिचित हैँ जबकि ना केवल उन्होंने बल्कि उनके परिवार को भी उनकी राष्ट्रभक्ति की कीमत यातनाओ के साथ चुकानी पड़ी। अंग्रेज़ो की यातनाओ से तंग आकर उनके परिवार को 9 बार घर बदलना पड़ा और आज भी उनके परिवारीजन गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैँ जबकि उस वक्त जेल में मजे से रोटी खाने वाले और अंग्रेज़ो से गलबहियां करने वाले स्वतंत्रता आंदोलन का सारा श्रेय लेकर सांसद, मंत्री और प्रधानमन्त्री तक बन गए और उनके परिवारीजन अब भी मौज कर रहे हैँ। ऐसे लोगो की मुर्तिया चौक, चौराहो पर लगी हैँ, इनके नाम पर हजारो इमारतों का नामकरण किया गया है लेकिन महावीर सिंह राठौड़ जी की उनके गृह जिले एटा में भी कोई मूर्ती नही है….

इस पोस्ट को शेयर करें जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगो को इन गुमनाम शहीदों के बारे में कम से कम जानकारी तो हो.

B p singh

image

Posted in Uncategorized

समाजवाद पर प्रयोग …..

एक स्थानीय कॉलेज में अर्थशास्त्र के एक प्रोफेसर ने अपने एक बयान में कहा –

“उसने पहले कभी किसी छात्र को फेल नहीं किया, पर हाल ही में उसने एक पूरी की पूरी क्लास को फेल कर दिया है l”
क्योंकि उस क्लास ने दृढ़ता पूर्वक यह कहा था कि

“समाजवाद सफल होगा और न कोई गरीब होगा और न कोई धनी होगा” सबको सामान करने वाला एक महान सिद्धांत !

तब प्रोफेसर ने कहा – अच्छा ठीक है ! आओ हम क्लास में समाजवाद के अनुरूप एक प्रयोग करते हैं  “सफलता पाने वाले सभी छात्रों के विभिन्न ग्रेड का औसत निकाला जाएगा और सबको वही एक ग्रेड दी जायेगी ”
पहली परीक्षा के बाद, सभी ग्रेडों का औसत निकाला गया और प्रत्येक छात्र को B ग्रेड प्राप्त हुआl

जिन छात्रों ने कठिन परिश्रम किया था वे परेशान हो गए और जिन्होनें कम ही पढ़ाई की थी वे खुश हुए l

दूसरी परीक्षा के लिए कम पढ़ने वाले छात्रों ने पहले से भी और कम पढ़ाई की और जिहोनें कठिन परिश्रम किया था उन्होंने यह तय किया कि वे भी मुफ्त की ग्रेड प्राप्त करेंगे और उन्होंने भी कम पढ़ाई की l

दूसरी परीक्षा की ग्रेड D थी l
इसलिए कोई खुश नहीं था l
जब तीसरी परीक्षा हुई तो ग्रेड F हो गई l

जैसे-जैसे परीक्षाएँ आगे बढ़ने लगीं स्कोर कभी ऊपर नहीं उठा, बल्कि आपसी कलह, आरोप-प्रत्यारोप, गाली-गलौज और एक-दूसरे से नाराजगी के परिणाम स्वरूप कोई भी नहीं पढ़ता था

क्योंकि कोई भी छात्र अंपने परिश्रम से दूसरे को लाभ नहीं पहुंचाना चाहता था l

अंत में सभी आश्चर्यजनक रूप से फेल हो गए और प्रोफेसर ने उन्हें बताया कि इसी तरह “समाजवाद” भी अंततोगत्वा फेल हो जाएगा क्योंकि ईनाम जब बहुत बड़ा होता है तो सफल होने के लिए किया जाने वाला उद्यम भी बहुत बड़ा होगा l परन्तु जब सरकार सारे अवार्ड छीन लेगी तो कोई भी न तो सफल होना चाहेगा और न ही सफल होने की कोशिश करेगा l

निम्नलिखित पाँच सर्वश्रेष्ठ उक्तियाँ इस प्रयोग पर लागू होती हैं l

  1. आप समृद्ध व्यक्ति को उसकी समृद्धि से बेदखल करके गरीब को समृद्ध बनाने का क़ानून नहीं बना सकते l

  2. जो व्यक्ति बिना कार्य किए कुछ प्राप्त करता है, अवश्य ही परिश्रम करने वाले किसी अन्य व्यक्ति के ईनाम को छीन कर उसे दिया जाता है l

  3. सरकार तब तक किसी को कोई वस्तु नहीं दे सकती जब तक वह उस वस्तु को किसी अन्य से छीन न ले l

  4. आप सम्पदा को बाँट कर उसकी वृद्धि नहीं कर सकते l

  5. जब किसी राष्ट्र की आधी आबादी यह समझ लेती है कि उसे कोई काम नहीं करना है, क्योंकि बाकी आधी आबादी उसकी देख-भाल जो कर रही है और बाकी आधी आबादी यह सोच कर कुछ अच्छा कार्य नहीं कर रही कि उसके कर्म का फल किसी दूसरे को मिल रहा है – तो वहीँ उस राष्ट्र के अंत की शुरुआत हो जाती है।

Posted in Uncategorized

अभी तो हम इसी में खुश हैं कि चलो विदेशियों ने हमारे राम-सेतु को भगवान राम से जोड़ा और इसके प्राकृतिक न होने तथा मानवनिर्मित होने का सर्टिफिकेट तो दे ही दिया , भले ही इसे मात्र पाँच हजार साल ही पुराना माना । अब बेचारा हिन्दु पाँच हजार साल को थोड़ा पीछे ले जाकर दस-बीस हजार साल तक तो मान सकता है , पर वैज्ञानिक सोच को धारण करते हुए वह कैसे माने कि हमारे आराध्य भगवान श्री राम सत्रह लाख साल पहले इस धरा पर अवतरित हुए थे । ऐसा कहते ही उसे घोर पुरातनपंथी और दकियानूसी सोच रखने वाला घोषित कर दिया जायेगा ।

ऐसे भय के माहौल में मेरी हिम्मत नहीं हो पा रही है कि मैं लाखों नहीं बल्कि करोड़ों साल पहले देवों और असुरों के बीच हुए समुद्र-मंथन के सत्यता पर बहस छेड़ूँ । लगभग पाँच करोड़ साल तो हिमालय को उत्पन्न हुए हुआ है । उससे पहले वहाँ टेथिंस सागर का अस्तित्व था । प्लेट टेक्टॉनिक थियरी के आधार पर इस सागर के ऊपर दबाव के परिणामस्वरूप हिमालय की उत्पत्ति हुई ।

जब उस स्थान पर समुद्र हुआ करता था , तभी उसी समुद्र में अमृत की प्राप्ति के लिए देवताओं और दानवों द्वारा समुद्र-मंथन किया गया । ये घटना करोड़ वर्ष पहले की है या अरब वर्ष पहले की है , इसके बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता । इस समुद्र-मंथन से मुख्य रूप से चौदह रत्न निकले थे ।

अभी पिछले महीने मैं बाँका में मंदार पर्वत पर किसी कार्यक्रम में गया था । यह वही मंदार पर्वत है जिसका प्रयोग समुद्र-मंथन के समय मथनी के रूप में किया गया था , इसे सुमेरु पर्वत के नाम से भी जाना जाता है । यहाँ संयोग से एक स्वंयसेवक मित्र राहुल डोकानिया जी से परिचय हुआ । ये बहुत अध्यात्यमिक और गुरू भक्त हैं । इन्होंने मुझे बताया कि इनके गुरू जी ने इनसे बताया है कि समुद्र-मंथन के परिणामस्वरूप मात्र चौदह रत्न ही नहीं निकले थे बल्कि हजार से अधिक वस्तुएं निकली थीं जो आज भी इस पर्वत में छिपी हुई हैं । इसके प्रमाण में उनके गुरू जी ने एक विशाल शंख का पता बताया कि एक निश्चित स्थान पर जल के भीतर एक प्राचीन शंख है । उनके बताए मार्गदर्शन के आधार पर राहुल डोकानिया जी ने उस विशाल शंख को खोज निकाला ।

इसके बाद राहुल डोकानिया जी ने बहुत प्रयास करके पुरातत्व विभाग के सर्वेक्षण दल को वहाँ बुलवाया । सर्वेक्षण दल ने शंख प्राप्ति की सूचना को सूचीबद्ध तो कर लिया है पर वर्षों से मंदार पर्वत पर अन्य किसी भी प्रकार के नये खोज में दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है । इसके साथ ही पुरातत्व विभाग ने मंदार पर्वत पर किसी भी प्रकार के नये खोज करने से राहुल डोकानिया जी पर प्रतिबंध लगा रखा है । वे अब इस दैविय विषय को लेकर केंद्र सरकार से गुहार लगा रहे हैं कि शायद ये हिन्दुवादी सरकार अपने प्राचीन वैभवशाली स्वर्णिम इतिहास को संसार के सामने उजागर होने का अवसर प्रदान करे ।

Rahul Singh Rathore

image

image

image

image

Posted in Uncategorized

एक सुरंग से जुड़े हैं राजस्थान के ये दो किले,
आज भी आते-जाते हैं लोग !!

राजस्थान के दो किले।
एक जंग की पहचान तो दूसरा खूबसूरती की अद्भुत मिसाल।

ये हैं जयपुर की पहचान आमेर और जयगढ़ के किले।
शहर की अलग-अलग पहाड़ियों पर बने इन किलों को आपस में
जोड़ती है एक सुरंग।
इस सुरंग को टूरिस्ट के लिए फिर से शुरू किया गया है।
आखिर क्या है इन दोनों किलों की खासियत?

आमेर के रास्ते जयगढ़ पहुंचती है सुरंग !

  • आमेर महल से जयगढ़ पहुंचने वाली इस सुरंग को गुप्त तरीके से
    किले से बाहर निकलने के लिए बनाया गया था।
  • जयगढ़ फोर्ट तक पहुंचने वाली ये सुरंग आमेर महल के पश्चिमी
    भाग में बनी है।
  • इसका कुछ हिस्सा जमीन के अंदर बना है तो कुछ जमीन के ऊपर।
  • इस एक सुरंग से मान सिंह महल, दिवान-ए-खास और महल के कई
    हिस्सों में पहुंचा जा सकता है।

  • इस सुरंग में रोशनी के लिए मशाल का इस्तेमाल किया जाता था।

  • किले को फिर से संवारते वक्त इस सुरंग को भी टूरिस्ट्स के लिए
    फिर से शुरू किया गया है।

जयगढ़ किले में क्या है खास !!

जयगढ़ किला जयपुर का सबसे ऊंचा दुर्ग है।
शहर में सबसे मजबूत भी।
यहां से जयपुर के चारों ओर नजर रखी जाती थी।
यहां रखी विशाल तोप भी करीब 50 किमी तक वार करने में सक्षम थी।
इसे एशिया की सबसे बड़ी तोप भी माना जाता है।

आमेर किले की खासियत !!

इसका निर्माण 16वीं शताब्दी में राजा मानिंसह ने करवाया था।
यह विश्व धरोहर में भी शामिल है।
इसे बनाते वक्त इसमें सफेद और लास सैंड स्टोन का इस्तेमाल
किया गया।
ये महल हिंदू ओर मुगल आर्किटेक्च का बेजोड़ नमूना है।
इसे किले में बना आमेर पैलेस खास तौर पर राज परिवार के रहने के
लिए बनाया गया था।
कहा जाता है कि आमेर फोर्ट में बना शीश महल माचिस की एक
तिल्ली से रोशन हो जाता था।
============================================
http://www.bhaskar.com/news-hf/RAJ-JAI-HMU-amber-and-

jaigarh-fort-tunnel-5208837-PHO.html?

सदा सुमंगल,,,
वन्देमातरम,,,
जय भवानी,,,
जय श्री राम
विजय कृष्णा पांडेय

image

image

Posted in Uncategorized

हनुमान प्रश्नावली यंत्र से जानिए अपनी समस्या का समाधान
🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸
हर इंसान चाहता है कि उसका आने वाला कल सुख और संपत्ति से पूर्ण हो, लेकिन इसके लिए उसे क्या करना चाहिए, ये बात वह नहीं जानता और किस्मत चमकाने के चक्कर में इधर-उधर भागता रहता है।
हम आपके लिए लाए हैं हनुमान प्रश्नावली चक्र। इसके 49 अंकों में आपके उन सभी प्रश्नों के उत्तर लिखे हैं, जो आप जानना चाहते हैं। इसका उपयोग इस प्रकार करें-

उपयोग विधि
🔸🔸🔹🔹
जिसे भी अपने प्रश्नों का उत्तर चाहिए, वे स्नान आदि कर साफ वस्त्र धारण करें और पांच बार “ऊं रां रामाय नम:” मंत्र का जाप करने के बाद 11 बार “ऊं हनुमते नम:” मंत्र का जाप करें। इसके बाद आंखें बंद कर के हनुमानजी का स्मरण करें व अपना प्रश्न मन में दोहराएं। इसके बाद प्रश्नावली चक्र पर कर्सर (तर्जनी या अनामिका) उंगली घुमाते हुए रोक दें। जिस कोष्ठक (खाने) पर कर्सर रुके, उस कोष्ठक में लिखे अंक को देखकर अपने प्रश्न का उत्तर देखें।

1- आपका कार्य शीघ्र पूरा होगा।

2- आपके कार्य में समय लगेगा। मंगलवार का व्रत करें।

3- प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें, तो कार्य शीघ्र पूरा होगा।

4- कार्य पूर्ण नहीं होगा।

5- कार्य शीघ्र होगा, किंतु अन्य व्यक्ति की सहायता लेनी पड़ेगी।

6- कोई व्यक्ति आपके कार्यों में रोड़े अटका रहा है, बजरंग बाण का पाठ करें।

7- आपके कार्य में किसी स्त्री की सहायता अपेक्षित है।

8- आपका कार्य नहीं होगा, कोई अन्य कार्य करें।

9- कार्यसिद्धि के लिए यात्रा करनी पड़ेगी।

10- मंगलवार का व्रत रखें और हनुमानजी को चोला चढ़ाएं, तो मनोकामना पूर्ण होगी।

11- आपकी मनोकामना शीघ्र पूरी होगी। सुंदरकांड का पाठ करें।

12- आपके शत्रु बहुत हैं। कार्य नहीं होने देंगे।

13- पीपल के वृक्ष की पूजा करें। एक माह बाद कार्य सिद्ध होगा।

14- आपको शीघ्र लाभ होने वाला है। मंगलवार के दिन गाय को गुड़-चना खिलाएं।

15- शरीर स्वस्थ रहेगा, चिंताएं दूर होंगी।

16- परिवार में वृद्धि होगी। माता-पिता की सेवा करें और रामचरितमानस के बाल काण्ड का पाठ करें।

17- कुछ दिन चिंता रहेगी। ऊं हनुमते नम: मंत्र की प्रतिदिन एक माला का जाप करें।

18- हनुमानजी के पूजन एवं दर्शन से मनोकामना पूर्ण होगी।

19- आपको व्यवसाय द्वारा लाभ होगा। दक्षिण दिशा में व्यापारिक संबंध बढ़ाएं।

20- ऋण से छुटकारा, धन की प्राप्ति तथा सुख की उपलब्धि शीघ्र होने वाली है। हनुमान चालीसा का पाठ करें।

21- श्रीरामचंद्रजी की कृपा से धन मिलेगा। श्रीसीताराम के नाम की पांच माला जप रोज करें।

22- अभी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा पर अंत में विजय आपकी होगी।

23- आपके दिन ठीक नहीं है। रोजाना हनुमानजी का पूजन करें। मंगलवार को चोला चढ़ाएं। संकटों से मुक्ति मिलेगी।

24- आपके घर वाले ही विरोध में हैं। उन्हें अनुकूल बनाने के लिए पूर्णिमा का व्रत करें।

25- आपको शीघ्र शुभ समाचार मिलेगा।

26- हर काम सोच-समझकर करें।

27- स्त्री पक्ष से आपको लाभ होगा। दुर्गासप्तशती का पाठ करें।

28- अभी कुछ महीनों तक परेशानी है।

29- अभी आपके कार्य की सिद्धि में विलंब है।

30- आपके मित्र ही आपको धोखा देंगे। सोमवार का व्रत करें।

31- संतान का सुख प्राप्त होगा। भगवान शिव की आराधना करें व शिवमहिम्नस्तोत्र का पाठ करें।

32- आपके दुश्मन आपको परेशान कर रहे हैं। रोज पार्थिव शिवलिंग का पूजन कर शिव ताण्डव स्तोत्र का पाठ करें। सोमवार को ब्राह्मणों को भोजन कराएं।

33- कोई स्त्री आपको धोखा देना चाहती है, सावधान रहें।

34- आपके भाई-बंधु विरोध कर रहे हैं। गुरुवार का व्रत रखें।

35- नौकरी से आपको लाभ होगा। पदोन्नति संभव है, पूर्णिमा का व्रत रख कथा कराएं।

36- आपके लिए यात्रा शुभदायक रहेगी। आपके अच्छे दिन आ गए हैं।

37- पुत्र आपकी चिंता का कारण बनेगा। रोज राम नाम की पांच माला का जप करें।

38- आपको अभी कुछ दिन और परेशानी रहेगी। यथाशक्ति दान-पुण्य और कीर्तन करें।

39- आपको राजकार्य और मुकद्मे में सफलता मिलेगी। श्रीसीताराम का पूजन करने से लाभ मिलेगा।

40- अतिशीघ्र आपको यश प्राप्त होगा। हनुमानजी की उपासना करें और रामनाम का जाप करें।

41- आपकी मनोकामना पूर्ण होगी।

42- समय अभी अच्छा नहीं है।

43- आपको आर्थिक कष्ट का सामना करना पड़ेगा।

44- आपको धन की प्राप्ति होगी।

45- दाम्पत्य सुख मिलेगा।

46- संतान सुख की प्राप्ति होने वाली है।

47- अभी दुर्भाग्य समाप्त नहीं हुआ है। विदेश यात्रा से अवश्य लाभ होगा।

48- आपका अच्छा समय आने वाला है। सामाजिक और व्यवसायिक क्षेत्र में लाभ मिलेगा।

49- आपका समय बहुत अच्छा आ रहा है। आपकी प्रत्येक मनोकामना पूर्ण होगी।

🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

image

Posted in Uncategorized

अगर आपके पास कुछ समय है तो आओ पण्डितजी के चार धामों में से एक द्वारिका धाम की यात्रा दस मिनट में करें।

गुजरात के देवभूमि द्वारका जिले में स्थित एक नगर तथा हिन्दू तीर्थस्थल है। यह हिन्दुओं के साथ सर्वाधिक पवित्र तीर्थों में से एक तथा चार धामों में से एक है। यह सात पुरियों में एक पुरी है।

जिले का नाम द्वारका पुरी से रखा गया है। यह नगरी भारत के पश्चिम में समुन्द्र के किनारे पर बसी है। हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार, भगवान कॄष्ण ने इसे बसाया था। यह श्रीकृष्ण की कर्मभूमि है। आधुनिक द्वारका एक शहर है। कस्बे के एक हिस्से के चारों ओर चहारदीवारी खिंची है इसके भीतर ही सारे बड़े-बड़े मन्दिर है।

काफी समय से जाने-माने शोधकर्ताओं ने पुराणों में वर्णित द्वारिका के रहस्य का पता लगाने का प्रयास किया, लेकिन वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित कोई भी अध्ययन कार्य अभी तक पूरा नहीं किया गया है। 2005 में द्वारिका के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए अभियान शुरू किया गया था। इस अभियान में भारतीय नौसेना ने भी मदद की।

अभियान के दौरान समुद्र की गहराई में कटे-छटे पत्थर मिले और यहां से लगभग 200 अन्य नमूने भी एकत्र किए, लेकिन आज तक यह तय नहीं हो पाया कि यह वही नगरी है अथवा नहीं जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने बसाया था। आज भी यहां वैज्ञानिक स्कूबा डायविंग के जरिए समंदर की गहराइयों में कैद इस रहस्य को सुलझाने में लगे हैं।

कृष्ण मथुरा में उत्पन्न हुए, गोकुल में पले, पर राज उन्होने द्वारका में ही किया। यहीं बैठकर उन्होने सारे देश की बागडोर अपने हाथ में संभाली। पांड़वों को सहारा दिया। धर्म की जीत कराई और, शिशुपाल और दुर्योधन जैसे अधर्मी राजाओं को मिटाया।

द्वारका उस जमाने में राजधानी बन गई थीं। बड़े-बड़े राजा यहां आते थे और बहुत-से मामले में भगवान कृष्ण की सलाह लेते थे। इस जगह का धार्मिक महत्व तो है ही, रहस्य भी कम नहीं है। कहा जाता है कि कृष्ण की मृत्यु के साथ उनकी बसाई हुई यह नगरी समुद्र में डूब गई। आज भी यहां उस नगरी के अवशेष मौजूद हैं।

निकटवर्ती तीर्थ

गोमती द्वारका द्वारका के दक्षिण में एक लम्बा ताल है। इसे ‘गोमती तालाब’ कहते है। इसके नाम पर ही द्वारका को गोमती द्वारका कहते है।

निष्पाप कुण्ड इस गोमती तालाब के ऊपर नौ घाट है। इनमें सरकारी घाट के पास एक कुण्ड है, जिसका नाम निष्पाप कुण्ड है। इसमें गोमती का पानी भरा रहता है। नीचे उतरने के लिए पक्की सीढ़िया बनी है। यात्री सबसे पहले इस निष्पाप कुण्ड में नहाकर अपने को शुद्ध करते है। बहुत-से लोग यहां अपने पुरखों के नाम पर पिंड-दान भी करतें हैं।

रणछोड़ जी मंदिर द्वारकाधीश मंदिर गोमती के दक्षिण में पांच कुंए है। निष्पाप कुण्ड में नहाने के बाद यात्री इन पांच कुंओं के पानी से कुल्ले करते है। तब रणछोड़जी के मन्दिर की ओर जाते है। रास्तें में कितने ही छोटे मन्दिर पड़ते है-कृष्णजी, गोमती माता और महालक्ष्मी के मन्दिर।

रणछोड़जी का मन्दिर द्वारका का सबसे बड़ा और सबसे बढ़िया मन्दिर है। भगवान कृष्ण को उधर रणछोड़जी कहते है। सामने ही कृष्ण भगवान की चार फुट ऊंची मूर्ति है।

यह चांदी के सिंहासन पर विराजमान है। मूर्ति काले पत्थर की बनी है। हीरे-मोती इसमें चमचमाते है। सोने की ग्यारह मालाएं गले में पड़ी है। कीमती पीले वस्त्र पहने है। भगवान के चार हाथ है। एक में शंख है, एक में सुदर्शन चक्र है। एक में गदा और एक में कमल का फूल। सिर पर सोने का मुकुट है। लोग भगवान की परिक्रमा करते है और उन पर फूल और तुलसी दल चढ़ाते है।

चौखटों पर चांदी के पत्तर मढ़े है। मन्दिर की छत में बढ़िया-बढ़िया कीमती झाड़-फानूस लटक रहे है। एक तरफ ऊपर की मंमें जाने के लिए सीढ़िया है। पहली मंजिल में अम्बादेवी की मूर्ति है-ऐसी सात मंजिले है और कुल मिलाकर यह मन्दिर एक सौ चालीस फुट ऊंचा है। इसकी चोटी आसमान से बातें करती है।

परिक्रमा रणछोड़जी के दर्शन के बाद मन्दिर की परिक्रमा की जाती है। मन्दिर की दीवार दोहरी है। दो दावारों के बीच इतनी जगह है कि आदमी समा सके। यही परिक्रमा का रास्ता है। रणछोड़जी के मन्दिर के सामने एक बहुत लम्बा-चौड़ा १०० फुट ऊंचा जगमोहन है। इसकी पांच मंजिलें है और इसमें ६० खम्बे है। रणछोड़जी के बाद इसकी परिक्रमा की जाती है। इसकी दीवारे भी दोहरी है।

दुर्वासा और त्रिविक्रम मंदिर दक्षिण की तरफ बराबर-बराबर दो मंदिर है। एक दुर्वासाजी का और दूसरा मन्दिर त्रिविक्रमजी को टीकमजी कहते है। इनका मन्दिर भी सजा-धजा है। मूर्ति बड़ी लुभावनी है। और कपड़े-गहने कीमती है। त्रिविक्रमजी के मन्दिर के बाद प्रधुम्नजी के दर्शन करते हुए यात्री इन कुशेश्वर भगवान के मन्दिर में जाते है। मन्दिर में एक बहुत बड़ा तहखाना है। इसी में शिव का लिंग है और पार्वती की मूर्ति है।

कुशेश्वर शिव के मन्दिर के बराबर-बराबर दक्षिण की ओर छ: मन्दिर और है। इनमें अम्बाजी और देवकी माता के मन्दिर खास हैं। रणछोड़जी के मन्दिर के पास ही राधा, रूक्मिणी, सत्यभामा और जाम्बवती के छोटे-छोटे मन्दिर है। इनके दक्षिण में भगवान का भण्डारा है और भण्डारे के दक्षिण में शारदा-मठ है।

शारदा-मठ को आदि गुरू शंकराचार्य ने बनबाया था। उन्होने पूरे देश के चार कोनों मे चार मठ बनायें थे। उनमें एक यह शारदा-मठ है। परंपरागत रूप से आज भी शंकराचार्य मठ के अधिपति है। भारत में सनातन धर्म के अनुयायी शंकराचार्य का सम्मान करते है।

रणछोड़जी के मन्दिर से द्वारका शहर की परिक्रमा शुरू होती है। पहले सीधे गोमती के किनारे जाते है। गोमती के नौ घाटों पर बहुत से मन्दिर है- सांवलियाजी का मन्दिर, गोवर्धननाथजी का मन्दिर, महाप्रभुजी की बैठक।

हनुमान मंदिर आगे वासुदेव घाट पर हनुमानजी का मन्दिर है। आखिर में संगम घाट आता है। यहां गोमती समुद्र से मिलती है। इस संगम पर संगम-नारायणजी का बहुत बड़ा मन्दिर है।

चक्र तीर्थ  संगम-घाट के उत्तर में समुद्र के ऊपर एक ओर घाट है। इसे चक्र तीर्थ कहते है। इसी के पास रत्नेश्वर महादेव का मन्दिर है। इसके आगे सिद्धनाथ महादेवजी है, आगे एक बावली है, जिसे ‘ज्ञान-कुण्ड’ कहते है। इससे आगे जूनीराम बाड़ी है, जिससे, राम, लक्ष्मण और सीता की मूर्तिया है।

इसके बाद एक और राम का मन्दिर है, जो नया बना है। इसके बाद एक बावली है, जिसे सौमित्री बावली यानी लक्ष्मणजी की बावजी कहते है। काली माता और आशापुरी माता की मूर्तिया इसके बाद आती है।

कैलाश कुण्ड इनके आगे यात्री कैलासकुण्ड़ पर पहुंचते है। इस कुण्ड का पानी गुलाबी रंग का है। कैलासकुण्ड के आगे सूर्यनारायण का मन्दिर है।

इसके आगे द्वारका शहर का पूरब की तरफ का दरवाजा पड़ता है। इस दरवाजे के बाहर जय और विजय की मूर्तिया है। जय और विजय बैकुण्ठ में भगवान के महल के चौकीदार है। यहां भी ये द्वारका के दरवाजे पर खड़े उसकी देखभाल करते है। यहां से यात्री फिर निष्पाप कुण्ड पहुंचते है और इस रास्ते के मन्दिरों के दर्शन करते हुए रणछोड़जी के मन्दिर में पहुंच जाते है। यहीं परिश्रम खत्म हो जाती है।

यही असली द्वारका है। इससे बीस मील आगे कच्छ की खाड़ी में एक छोटा सा टापू है। इस पर बेट-द्वारका बसी है। गोमती द्वारका का तीर्थ करने के बाद यात्री बेट-द्वारका जाते है। बेट-द्वारका के दर्शन बिना द्वारका का तीर्थ पूरा नही होता। बेट-द्वारका पानी के रास्ते भी जा सकते है और जमीन के रास्ते भी।

गोपी तालाब नागेश्वर मंदिर जमीन के रास्ते जाते हुए तेरह मील आगे गोपी-तालाब पड़ता है। यहां की आस-पास की जमीन पीली है। तालाब के अन्दर से भी रंग की ही मिट्टी निकलती है। इस मिट्टी को वे गोपीचन्दन कहते है। यहां मोर बहुत होते है। गोपी तालाब से तीन-मील आगे नागेश्वर नाम का शिवजी और पार्वती का छोटा सा मन्दिर है।

यात्री लोग इसका दर्शन भी जरूर करते है।कहते है, भगवान कृष्ण इस बेट-द्वारका नाम के टापू पर अपने घरवालों के साथ सैर करने आया करते थे। यह कुल सात मील लम्बा है। यह पथरीला है। यहां कई अच्छे और बड़े मन्दिर है। कितने ही तालाब है। कितने ही भंडारे है। धर्मशालाएं है और सदावर्त्त लगते है। मन्दिरों के सिवा समुद्र के किनारे घूमना बड़ा अच्छा लगता है।

बेट-द्वारका ही वह जगह है, जहां भगवान कृष्ण ने अपने प्यारे भगत नरसी की हुण्डी भरी थी। बेट-द्वारका के टापू का पूरब की तरफ का जो कोना है, उस पर हनुमानजी का बहुत बड़ा मन्दिर है।

इसीलिए इस ऊंचे टीले को हनुमानजी का टीला कहते है। आगे बढ़ने पर गोमती-द्वारका की तरह ही एक बहुत बड़ी चहारदीवारी यहां भी है। इस घेरे के भीतर पांच बड़े-बड़े महल है। ये दुमंजिले और तिमंजले है। पहला और सबसे बड़ा महल श्रीकृष्ण का महल है। इसके दक्षिण में सत्यभामा और जाम्बवती के महल है। उत्तर में रूक्मिणी और राधा के महल है।

इन पांचों महलों की सजावट ऐसी है कि आंखें चकाचौंध हो जाती हैं। इन मन्दिरों के किबाड़ों और चौखटों पर चांदी के पतरे चढ़े हैं। भगवान कृष्ण और उनकी मूर्ति चारों रानियों के सिंहासनों पर भी चांदी मढ़ी है। मूर्तियों का सिंगार बड़ा ही कीमती है। हीरे, मोती और सोने के गहने उनको पहनाये गए हैं। सच्ची जरी के कपड़ों से उनको सजाया गया है।

चौरासी धुना – भेंट द्वारका टापू में भगवान द्वारकाधीश के मंदिर से ७ कि॰मी॰ की दूरी पर चौरासी धुना नामक एक प्राचीन एवं एतिहासिक तीर्थ स्थल है।

उदासीन संप्रदाय के सुप्रसिद्ध संत और प्रख्यात इतिहास लेखक, निर्वाण थडा तीर्थ, श्री पंचयाती अखाडा बड़ा उदासीन के पीठाधीश्वर महंत योगिराज डॉ॰ बिंदुजी महाराज “बिंदु” के अनुसार ब्रह्माजी के चारों मानसिक पुत्रो सनक, सनंदन, सनतकुमार और सनातन ने ब्रह्माजी की श्रृष्टि-संरचना की आज्ञा को न मानकर उदासीन संप्रदाय की स्थापना की और मृत्यु-लोक में विविध स्थानों पर भ्रमण करते हुए भेंट द्वारका में भी आये।

उनके साथ उनके अनुयायियों के रूप में अस्सी (८०) अन्य संत भी साथ थें| इस प्रकार चार सनतकुमार और ८० अनुयायी उदासीन संतो को जोड़कर ८४ की संख्या पूर्ण होती है।

इन्ही ८४ आदि दिव्य उदासीन संतो ने यहाँ पर चौरासी धुने स्थापित कर साधना और तपस्चर्या की और ब्रह्माजी को एक एक धुने की एकलाख महिमा को बताया, तथा चौरासी धुनो के प्रति स्वरुप चौरासी लाख योनिया निर्मित करने का सांकेतिक उपदेश दिया। इस कारन से यह स्थान चौरासी धुना के नाम से जग में ख्यात हुआ।

कालांतर में उदासीन संप्रदाय के अंतिम आचार्य जगतगुरु उदासिनाचार्य श्री चन्द्र भगवान इस स्थान पर आये और पुनः सनकादिक ऋषियों के द्वारा स्थापित चौरासी धुनो को जागृत कर पुनः प्रज्वलित किया और उदासीन संप्रदाय के एक तीर्थ के रूप में इसे महिमामंडित किया। यह स्थान आज भी उदासीन संप्रदाय के अधीन है और वहां पर उदासी संत निवास करते हैं।

आने वाले यात्रियों, भक्तों एवं संतों की निवास, भोजन आदि की व्यवस्था भी निःशुल्क रूप से चौरासी धुना उदासीन आश्रम के द्वारा की जाती है। जो यात्री भेंट द्वारका दर्शन हेतु जाते हैं वे चौरासी धुना तीर्थ के दर्शन हेतु अवश्य जाते हैं। ऐसी अवधारणा है की चौरासी धुनो के दर्शन करने से मनुष्य की लाख चौरासी कट जाती है, अर्थात उसे चौरासी लाख योनियों में भटकना नहीं पड़ता और वह मुक्त हो जाता है।

रणछोड़ जी मंदिर  रणछोड़ जी के मन्दिर की ऊपरी मंजिलें देखने योग्य है। यहां भगवान की सेज है। झूलने के लिए झूला है। खेलने के लिए चौपड़ है। दीवारों में बड़े-बड़े शीशे लगे हैं। इन पांचों मन्दिरों के अपने-अलग भण्डारे है। मन्दिरों के दरवाजे सुबह ही खुलते है। बारह बजे बन्द हो जाते है।

फिर चार बजे खुल जाते है। और रात के नौ बजे तक खुले रहते है। इन पांच विशेष मन्दिरों के सिवा और भी बहुत-से मन्दिर इस चहारदीवारी के अन्दर है। ये प्रद्युम्नजी, टीकमजी, पुरूषोत्तमजी, देवकी माता, माधवजी अम्बाजी और गरूड़ के मन्दिर है। इनके सिवाय साक्षी-गोपाल, लक्ष्मीनारायण और गोवर्धननाथजी के मन्दिर है। ये सब मन्दिर भी खूब सजे-सजाये हैं। इनमें भी सोने-चांदी का काम बहुत है।

बेट-द्वारका में कई तालाब है-रणछोड़ तालाब, रत्न-तालाब, कचौरी-तालाब और शंख-तालाब। इनमें रणछोड तालाब सबसे बड़ा है। इसकी सीढ़िया पत्थर की है। जगह-जगह नहाने के लिए घाट बने है। इन तालाबों के आस-पास बहुत से मन्दिर है। इनमें मुरली मनोहर, नीलकण्ठ महादेव, रामचन्द्रजी और शंख-नारायण के मन्दिर खास है। लोगा इन तालाबों में नहाते है और मन्दिर में फूल चढ़ाते है।

शंख तालाब  रणछोड़ के मन्दिर से डेढ़ मील चलकर शंख-तालाब आता है। इस जगह भगवान कृष्ण ने शंख नामक राक्षस को मारा था। इसके किनारे पर शंख नारायण का मन्दिर है। शंख-तालाब में नहाकर शंख नारायण के दर्शन करने से बड़ा पुण्य होता है।

बेट-द्वारका से समुद्र के रास्ते जाकर बिरावल बन्दरगाह पर उतरना पड़ता है। ढाई-तीन मील दक्षिण-पूरब की तरफ चलने पर एक कस्बा मिलता है इसी का नाम सोमनाथ पट्टल है। यहां एक बड़ी धर्मशाला है और बहुत से मन्दिर है। कस्बे से करीब पौने तीन मील पर हिरण्य, सरस्वती और कपिला इन तीन नदियों का संगम है। इस संगम के पास ही भगवान कृष्ण के शरीर का अंतिम संस्कार किया गया था।

Sanjay Gupta

image