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एक बार एक भक्त धनी व्यक्ति मंदिर जाता है।
   पैरों में महँगे और नये जूते होने पर सोचता है कि क्या करूँ?
यदि बाहर उतार कर जाता हूँ तो कोई उठा न ले जाये और अंदर पूजा में मन भी नहीं लगेगा; सारा ध्यान् जूतों पर ही रहेगा।

उसे मंदिर के बाहर एक भिखारी बैठा दिखाई देता है। वह धनी व्यक्ति भिखारी से कहता है ” भाई मेरे जूतों का ध्यान रखोगे? जब तक मैं पूजा करके वापस न आ जाऊँ” भिखारी हाँ कर देता है।

अंदर पूजा करते समय धनी व्यक्ति सोचता है कि ” हे प्रभु आपने यह कैसा असंतुलित संसार बनाया है?
किसी को इतना धन दिया है कि वह पैरों तक में महँगे जूते पहनता है तो किसी को अपना पेट भरने के लिये भीख तक माँगनी पड़ती है!
कितना अच्छा हो कि सभी एक समान हो जायें!!
“वह धनिक निश्चय करता है कि वह बाहर आकर उस भिखारी को 100 का एक नोट देगा।

बाहर आकर वह धनी व्यक्ति देखता है कि वहाँ न तो वह भिखारी है और न ही उसके जूते।
धनी व्यक्ति ठगा सा रह जाता है। वह कुछ देर भिखारी का इंतजार करता है कि शायद भिखारी किसी काम से कहीं चला गया हो, पर वह नहीं आया। धनी व्यक्ति दुखी मन से नंगे पैर घर के लिये चल देता है।

रास्ते में थोड़ी दूर फुटपाथ पर देखता है कि एक आदमी जूते चप्पल बेच रहा है।
धनी व्यक्ति चप्पल खरीदने के उद्देश्य से वहाँ पहुँचता है, पर क्या देखता है कि उसके जूते भी वहाँ बेचने के लिए रखे हैं।
तो वह अचरज में पड़ जाता है फिर वह उस फुटपाथ वाले पर दबाव डालकर उससे जूतों के बारे में पूछता हो वह आदमी बताता है कि एक भिखारी उन जूतों को 100 रु. में बेच गया है।

धनी व्यक्ति वहीं खड़े होकर कुछ सोचता है और मुस्कराते हुये नंगे पैर ही घर के लिये चल देता है। उस दिन धनी व्यक्ति को उसके सवालों के जवाब मिल गये थे—-

समाज में कभी एकरूपता नहीं आ सकती,
क्योंकि हमारे कर्म कभी भी एक समान नहीं हो सकते।
और जिस दिन ऐसा हो गया उस दिन समाज-संसार की सारी विषमतायें समाप्त हो जायेंगी।
ईश्वर ने हर एक मनुष्य के भाग्य में लिख दिया है कि किसको कब और कितना मिलेगा, पर यह नहीं लिखा कि वह कैसे मिलेगा।
यह हमारे कर्म तय करते हैं।
जैसे कि भिखारी के लिये उस दिन तय था कि उसे 100 रु. मिलेंगे, पर कैसे मिलेंगे यह उस भिखारी ने तय किया।
हमारे कर्म ही हमारा भाग्य, यश, अपयश, लाभ, हानि, जय, पराजय, दुःख, शोक, लोक, परलोक तय करते हैं।
हम इसके लिये ईश्वर को दोषी नहीं ठहरा सकते हैं।

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#चित्तौड़गढ़दुर्गविवाह

#पदमावती_जौहर

जब किले में रसद सामग्री समाप्त हो गई,
और चित्तौड़गढ़ (मेवाड़) के रावल रतनसिंह सभी मनसबदारों, और सेनापति सरदारों से मन्त्रणा कर के इस नतीजे पर पहूँचे कि, धोखा तो हमारे साथ हो चुका है! हमने वही भूल की जो हमारे पूर्वज करते रहे परंतु धर्म यही कहता है कि अतिथि  देवो भव ओर शत्रु ने हमारी पीठ मे छूरा घोंपा है,हम ने धर्म की रक्षा की धर्म हमारी रक्षा करेगा…                                                 सबसे बड़ी बात कि हमारी सारी योजनाए निष्फल होती  जा रही है,  क्योंकि कोई भी सेना बिना भोजन के युद्ध लड़ना तो दूर ज़िन्दा भी नही रह सकती!
और  हमने बहुत प्रयास कर लिए की युद्ध ना हो एक राजपूत  स्त्री को विधर्मी देखे यह असहनीय  कृत्य भी हम सहन  कर चुके है परंतु विधि का कुछ और ही विधान है जो हमारा मूल धर्म भी, ह़ैे शायद  भवानी रक्त पान करना चाहती है,
और चित्तोड़ दुर्ग का कोमार्य भंग होने का समय आ गया है!
रतन सिंह के मुख को निहार रही थी समस्त सेना ओर कुछ अद्भूत सुनने की अभिलाषा हो रही थी!

रावल ने कहा- हम परम सौभाग्यशाली  है;जो दुर्ग के विवाह का अवसर महादेव ने हमें दिया है, इसे रक्त के लाल रंग  ओर जौहर की गुलाल से सुसज्जित करने की तैयारी हो  और महाकाल के स्वागत मे नरमुंड की माला अर्पित करने का अवसर ना चुके कोई सेनानी…
हमें अब अपनी रजपूती को लाज्जित नहीं करना!
प्रात: किले के द्वार खोल दिये जाये, और अपने आराध्य का स्वागत केशरिया बाना पहन कर करे जौहर कुंड को सजाया जाये महाकाल के प्रसाधन
में रूपवातियों के देह की दिव्य भस्म  गुलाल तेैयार की जाये..

और   इतना सुनते ही मर्दाना सरदारो के आभा मंड़ल पर दिव्य तेज बिखर गया, और जनाना सरदार अपने दिव्य जौहर की कल्पना में आत्म विभोर  हो उठे,, बात रनिवास तक पहुँची पूरे दुर्ग मे एक दिव्य वातावारण बन गया हर एक वीर ओर वीरांगना हर्ष  और उल्लास से भरपूर हर हर महादेव के नारे लगाने  लगे, मानो इसी दिन का इंतजार कर रहे हो!
हर कोई महादेव का वरण करने को वंदन करने को आतुर था!

और बादल  बोल उठा मैंने तो पहले ही कहा था ,ये तुर्क विश्वास के लायक नहीं परंतु मेरी किसी ने नहीं मानी राजपूत वीरों की भुजायें फड़कने  लगी ओर नेत्रों मे शत्रु के चित्र उतर  आये!

मानो विवाह की तैयारियों में डूब गया किला,किले को सजाने में लग गए समस्त किलेवासी कहीं आने वाले के दीदार में कोई कमी ना रह जाये, मेरे महाकाल आने वाले है!
इतना व्यस्त तो दुर्ग राजतिलक के समय भी नही रहा होगा और इतनी ख़ुशी तो राजकुमार के जन्म पर भी नहीं थी!
वाह! कितना सुन्दर दिख रहा है दुर्ग,इसका विवाह जो है लो  मुहूर्त भी निकल  आया ब्रह्म मुहूर्त..

, राजपूत अपनी ता
तलवारों बरछो, भालों को चमकाने में और केशरिया बाना  बांधने में..
तो क्षत्राणियां अपने अपने संदुको से विवाह के लाल, हरे जोड़े निकाल कर एक दूसरे को दिखाती हुई पूछ रही थी मुझ पर ये कैसारहेगा? ननदें अपनी भाभीयों को सजाने में तो भाभीयाँ अपनी ननदों को संवारने में व्यस्त हो गई, रखडी़, गोरबंद, झूमका, बिन्दी, नथनी, टीका, पायजेब, चुडी़ ,कंगन, बिछुडी़, बाजूबंद, हार, और मंगलसूत्र सजने लगे…

हर  स्त्री को इतना सजने की ललक को फेरों के समय भी नहीं थी उस दिन भी किसी के लिये सजना था ओर आज भी
लेकिन उस दिन पीहर से बिछड़ने का गम था आज तो बस मिलन ही मिलन है!
, पूरे किले मे एक अभूतपूर्व महोत्सव की तैयारियां हो रही थी मानो ये अवसर बड़ी मुश्किल से मिला हो ओर चेहरो की रौनक ऐसी कि कल बारात में जाने की उत्सुकता हो!

कुंड पर चन्दन की लकड़ियाँ नारियल, देशी घी, और पूजन की सामग्री इकट्ठी की गई गंगा जल के कलश, और तुलसी पत्र की  व्यवस्था सुनिश्चित की गई, राज पुरोहित ने रनिवास में ख़बर भेजी  की जौहर सूर्य की पहली किरण के दर्शन करने उपरांत  शुरू हो जायेगा और अग्रिम और अंतिम पंक्ति महारानी सुनिश्चित करे!

जैसे युद्ध में हरावल में रहने की होड़ रहती है जोहर में भी प्रथम पंक्ति में रहने की और महारानी के साथ रहने की होड़ मच गई!

ढ़ोल, नंगाड़े,शाहनाइयाँ और मृदंग बजने लगे, हाथी , घोडे़ और सवार  सजने लगे, परंतु सबसे ज्यादा उत्साह तो औरतों में था!

सुबह होने वाली थी ब्रह्म  मुहूर्त ना चुक  जाये सभी सती स्त्रियों ने अंतिम बार अपने सुहाग के दर्शन किए महारानी पदमावती ने रावल के चरणों का वन्दन किया और  फिर मुड़ कर नही देखा रतन सिंह कुछ कहना चाहते थे परंतु भवानी के मुख का तेज देख उनका मुँह ना खुल पाया, आज पद्मिनी उनको अपनी पत्नी नही महाकाली सी प्रतीत हो रही थी, हो भी क्यों ना? महाकाल की भस्म बनने जो जा रही हैे उनमें विलीन होने जा रही है!
जौहर स्थल पर स्वस्थी वाचन  शुरू हुआ पुरोहितों की टोली ने  वैदिक मंत्रो से पूजन शुरू करवाया और मुख मे़ तुलसी पत्र, गंगा जल, हाथ में नारियल पकड़कर सूर्य की ओर मुख करके प्रथम  पंक्ति महारानी” पदमावती “के साथ तैयार थी! मोक्ष के मार्ग पर बढ़ने को तैयार थी !
सनातन धर्म की हिन्दू धर्म की अस्मिता और रघु कुल की आन  शान की रक्षा करने को, सनातन धर्म के लिये स्वयं की अाहुती देने को अग्नि मंत्रोचार के साथ प्रज्वलित कर  दी गई और उसमें नारियल, घी डाल दिया गया! अग्नि की  लपटे भगवा  रंग की मानो सूर्य का अरूणोदय स्वरूप अस्ताचल में जाने को आतुर हो और अंधकार मेवाड़ को अपनी आगोश  में लेने  का अन्देशा देता हो, वैदिक मंत्र सुन प्रथम  पंक्ति की क्षत्राणियाँ कूद पडी अग्नि में क्षण भर मे स्वाहा…हो गई अग्नि सी पावन अग्नि में मिल गई!

अग्नि और घृत का मिलन देह को क्षण भर में ही भस्म बना रही था देखते ही देखते एक कुंड मे 16000 क्षत्राणियाँ भस्म बन गई और पूरे दुर्ग पर एक दिव्य सुगन्ध फैल गई जो पूर्व में कभी किसी ने महसूस नहीं की थी!

उनके मुख पर इतना तेज था की अग्नि भी मंद पड़ जाये,पुरोहित के स्वाहा के साथ ही सभी  देवियों ने  अपने तन की अाहुतियाँ दे दी!
अभी विवाह की एक रस्म बाकी थी दुर्ग पर फैली दिव्य सुगंध  ने  सभी रजपूतों को कसुमापान करने पर मजबुर कर दिया,,,, भस्म तैयार थी अब महाकाल के स्वागत की बारी थी ….

अपनी 80 साल की माँ ओर 19 साल की पत्नी के जौहर की तैयारी कर रहे “बादल” के नेत्रों में मानो जल सुख गया उसने अपनी माँ से पुछा  आप कब पधारेंगे  माँ  जो अपने बुड्ढे हाथों से अपनी चोटी  बना रही थी अपने पुत्र को देखकर बोली तु एक बार अपनी पत्नी से बात तो कर ले,अभी कोई 4 साल ही हुए थे बादल के विवाह को और बादल के नाक पर हर दम गुस्सा रहता था कभी हिम्मत नही हुई पंवारनी जी की बादल से बात करने की ओर ना कभी बादल को फुर्सत मिली जबकी दो बच्चों के बाप बन गए थे, बादल, पंवार जी के पास पहुँच  बादल कुछ बोलना चाहता था उससे पहले पंवारनी जी बोल उठी, आप को मैंने बहुत दु:ख दिया है, इतना कहते ही बादल, ने मुट्ठी दीवार पर दे मारी और बोल पडा़ पहली बार की मैंने आप को एक औरत समझा आप को बोलने नहीं दिया कभी ओर 3 बर्ष से आपको पीहर भी नहीं जाने दिया, मैंने सीधे मुँह कभी आपसे बात नहीं की, बादल का हाथ पकड़कर, पंवारनी जी बोली आप मन भारी ना करे मैं मोक्ष के मार्ग पर जा रही हूँ , मुझे कमजोर ना करे, आप ऊपर से सख्त बनकर रहे परंतु मुझे पता है आप अंदर से कितने नर्म है?एक स्त्री अपने पति को सबसे बेहतर समझ ले यही उसके जीवन का सार है! आप मिनाल ओर किरानं को संभाले मैं उनको देख कमजोर ना पड जाऊ!
जब तक बादल की माँ तैयार हो जौहर कुंड पर आ गई, बादल के सामने पतराय आंखो से देखकर सोचने  लगी कभी सुख नहीं मिला मेरे बेटे को 3साल की उम्र मे पिता चल  बसे अब 3-4 साल के अपने ही बच्चों  को अपने हाथों कैसे मारेगा?इतने में माँ और पत्नी अग्नि में प्रवेश कर गई! उसके सामने उसका स्वाहा हो गया!
पत्नी से अपने बच्चों को छुड़ा कर  बादल ने सोचा मैं सोचता था आदमी शक्तिशाली होता है; लेकिन आज पता चला कि औरत को शक्ति क्यों कहते है?असल में शक्ति का अवतार होती है! क्षत्राणियों आदमी अंदर से बहुत कमजोर होता है, मैं अपने बच्चों को धार स्नान नहीं करवा सकता ये सोच अपने दोनों बच्चों को अग्नि- कुंड के पास ले गया और मिनाल को अंदर फेंकने लगा उसने अपने बाबोसा के कुर्ते को पकड़ लिया और कहने लगी मैं अब लड़ाई नहीं करूँगी, आप कहोगे वहीं करूँगी मैं किरानं को कभी नही मारूँगी बाबोसा मुझे मत मारो और बादल ने एक झटके से अपना हाथ छुडा़ लिया और एक चीख के साथ…… फिर मासुम 3 साल का किरानं जो सब समझ चुका था मासुम निगाहों से अपने बाप को देख कर बोला बाबोसा मे बडा़ हो कर आप के साथ इन तुर्को को मारूँगा मैं तो आदमी हूँ, बादल ने उसे भी  धक्का दे दिया!
तब तक  सारा जौहर सम्पूर्ण हो चुका था और रजपूतों के लिये खो ने को कुछ नहीं बचा था!

राजपूती वीरों ने तलवारों से अपने हाथों को ओर घोड़े से पीठ को बांध  लिया था हर हर महादेव के जयकारों के साथ
केशरिया बाना पहन कर कसुमापान  कर   वीर कूद पडे़ समरांगण मे एक एक ने 100-100 को मारा परंतु संख्या मे तुर्क ज्यादा थे!
फिर चढ़ाने लगे नरमुंडो के हार और लाल रक्त से महाकाल के स्वागत मे पूरे द्वार को रंग दिया 30000 नर मुंडो से स्वागत किया अपने आराध्य का और दुर्ग का विवाह सम्पन्न हुआ,महाकाल के स्वागत में यही तो होता है ;भस्म रक्त, नरमुंड और बाजों में कुत्तों का  सियारों का विलाप मूर्त लाशों को काल भैरव के कुत्ते खूब आनन्द से खा  रहे थे..
दुर्ग अब कुँवारा नहीं रहा आज उसका विवाह हो गया ऐसे ही होता है ;दुर्ग का विवाह अब ये कौन कह रहा है कि द्वार खिलजी के स्वागत मे खोले गए?
हा हा हा हा हा उसे कौन समझाये ? नादान जो ठहरा …..
खिलजी को यह महसूस हो गया की चित्तौड़ ने उसके लिये नहीं किसी और के स्वागत में द्वार खोला है वो ठगा सा दुर्ग के दृश्य को निहारने लगा और सोचने लगा ये इंसान नहीं हो सकते, 
ये तो दिव्य लोक के देवता हैं!
उसे मन में ग्लानि हो उससे पहले एक विचार आया की ये मेरी वजह से नहीं किसी और के लिए था!
मैं गुरूर करने लायक भी नहीं,लौट गया नमन कर चित्तौड़ को..

खिलजी ने चित्तौड़ में प्रवेश किया परंतु उसके स्वागत मे कुत्ते भी नहीं आये क्योंकि वो महाभोज  का आनन्द ले रहे थे फिर दुर्ग के विवाह में मेहमान बनकर आया खिलजी ऐसा अद्भूत नजारा देख दुर्ग में एक रात भी नहीं गुजार पाया।

जो दृढ़ राखे धर्म को तिही राखे करतार
जय भवानी🚩🚩

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तुम कौन हो? 22/11/17
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एक बार राजा भोज और माघ पंडित सैर करने निकले, लेकिन रास्ता भूल गए।

उन्हें एक बुढिय़ा दिखाई दी। दोनों ने उसे प्रणाम करके पूछा, ‘यह रास्ता कहां जाएगा?’ 
 
बुढिय़ा ने उत्तर दिया, ‘यह रास्ता तो यहीं रहेगा, इसके ऊपर चलने वाले जाएंगे। पर तुम कौन हो?’ 

दोनों बोले, ‘हम तो पथिक हैं।’
 
बुढिय़ा ने चट से उत्तर दिया, ‘पथिक तो दो ही हैं एक सूरज और दूसरा चंद्रमा। तुम कौन से पथिक हो?’ 

हम तो पाहुने हैं। माघ बोले। ‘पाहुने दो ही हैं एक धन, दूसरा यौवन। तुम कौन हो? बुढिय़ा ने पूछा।’ 

भोज बोले, ‘हम तो राजा हैं।’ 
 
बुढिय़ा बोली, ‘राजा तो बस दो हैं एक इंद्र, दूसरा यमराज।

तुम कौन हो?’ दोनों बोले, ‘हम तो क्षमतावान हैं।’

‘भाई क्षमतावान तो दो ही हैं, पृथ्वी और स्त्री। तुम तो इनमें से नहीं दिखते, फिर तुम कौन हो?’ भोज बोले, ‘हम साधु हैं।’ 

बुढिय़ा बोली, ‘साधु तो बस दो ही हैं, एक शील और दूसरा संतोष।’
 
सच-सच कहो तुम कौन हो? माघ बोले, ‘हम परदेसी हैं।’ 

‘जीव और पेड़ का पत्ता, परदेसी ये दो ही हैं। तुम कौन हो?’

चकित माघ पंडित बोले, ‘अब क्या कहें, हम तो हारे हुए हैं।’ 

बुढिय़ा बोली, ‘देखो भाई, हारा हुआ तो बस एक ही है ऋण लेने वाला, तुम कौन हो?’ 

अंत में वे हारकर उस बुद्धिमान बुढिय़ा से बोले, ‘अब क्या बताएं, हम तो कुछ नहीं जानते। सच यह है कि सब कुछ जानने वाली तू ही है।’ 

तब कुछ गंभीर होकर वह बुढिय़ा बोली, ‘तुम दोनों को अपनी विद्वता और ऐश्वर्य का बड़ा घमंड हो गया था। मुझे पता था कि तू तो है राजा भोज और यह माघ पंडित। रास्ता इस तरफ है, पर भविष्य में कभी अहंकार मत करना।’r@njeet

अहंकार टूटते ही दोनों ने बुढिय़ा से क्षमा मांग कर अपनी गलती स्वीकार की और आगे से खुद को सामान्य मनुष्य ही मानने का प्रण किया।

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#Copied

जगत की रीत :-

एक बार एक गाँव में पंचायत लगी थी | वहीं थोड़ी दुरी पर एक संत ने अपना बसेरा किया हुआ था|जब पंचायत किसी निर्णय पर नहीं पहुच सकी तो किसी ने कहा कि क्यों न हम महात्मा जी के पास अपनी समस्या को लेकर चलें अतः सभी संत के पास पहुंचे | जब संत ने गांव के लोगों को देखा तो पुछा कि कैसे आना हुआ? तो लोगों ने कहा ‘महात्मा जी गाँव भर में एक ही कुआँ हैं और कुँए का पानी हम नहीं पी सकते, बदबू आ रही है । मन भी नहीं होता पानी पीने को।

संत ने पुछा–हुआ क्या?पानी क्यों नहीं पी सक रहे हो?

लोग बोले–तीन कुत्ते लड़ते लड़ते उसमें गिर गये थे । बाहर नहीं निकले, मर गये उसी में । अब जिसमें कुत्ते मर गए हों, उसका पानी कौन पिये महात्मा जी ?
संत  ने कहा — ‘एक काम करो ,उसमें गंगाजल डलवाओ,
तो कुएं में गंगाजल भी आठ दस बाल्टी छोड़ दिया गया ।
फिर भी समस्या जस की तस !
लोग फिर से संत के पास पहुंचे,अब संत ने कहा”
भगवान की कथा कराओ”।

लोगों ने कहा ••••ठीक है ।

कथा हुई , फिर भी समस्या जस की तस
लोग फिर संत के पास पहुंचे !
अब संत ने कहा
उसमें सुगंधित द्रव्य डलवाओ।

लोगों ने फिर कहा ••••• हाँ, अवश्य ।
सुगंधित द्रव्य डाला गया|
नतीजा फिर वही…ढाक के तीन पात
लोग फिर संत के पास
अब संत खुद चलकर आये ।
लोगों ने कहा– महाराज ! वही हालत है, हमने सब करके देख लिया । गंगाजल भी डलवाया, कथा भी करवायी, प्रसाद भी बाँटा और उसमें सुगन्धित पुष्प और बहुत चीजें डालीं; लेकिन महाराज ! हालत वहीं की वहीं ।अब संत आश्चर्यचकित हुए कि अभी भी इनका मन कैसे नहीं बदला।
तो संत ने पुछा– कि तुमने और सब तो किया, वे तीन कुत्ते मरे पड़े थे, उन्हें निकाला कि नहीं?
लोग बोले — उनके लिए न आपने कहा था न हमने निकाला, बाकी सब किया । वे तो वहीं के वहीं पड़े हैं ।
संत बोले — जब तक उन्हें नहीं निकालोगे, इन उपायों का कोई प्रभाव नहीं होगा।

👉सही बात यह है कि हमारे आपके जीवन की यह कहानी है । इस शरीर नामक गाँव के अंतःकरण के कुएँ में ये काम, क्रोध और लोभ के तीन कुत्ते लड़ते झगड़ते गिर गये हैं । इन्हीं की सारी बदबू है ।
हम उपाय पूछते हैं तो लोग बताते हैं– तिर्थयात्रा कर लो, थोड़ा यह कर लो, थोड़ा पूजा करो, थोड़ा पाठ। सब करते हैं, पर बदबू उन्हीं दुर्गुणों की आती रहती है ।
तो पहले इन्हें निकाल कर बाहर करें तभी जीवन उपयोगी होगा ।
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⚜प्रेरणादायक कहानी जो दिल को छु जाए……💞दिल से पढ़ना ….👏🏼

एक गरीब आदमी राह पर चलते भिखारियों को देखकर हमेंशा दु:खी होता और भगवान से प्रार्थना करता कि:- “हे भगवान! मुझे इस लायक तो बनाता कि मैं इन बेचारे भिखारियों को कम से कम 1 रूपया दे सकता।
.
“भगवान ने उसकी सुन ली और उसे एक अच्छी Multi-National Company में कम्पनी में Job मिल गई।
अब उसे जब भी कोई भिखारी दिखाई देता, वह उन्हें 1 रूपया अवश्य देता, लेकिन वह 1 रूपया देकर सन्तुष्ट नहीं था।
.
इसलिए वह जब भी भिखारियोंको 1 रूपए का दान देता, ईश्वर से प्रार्थना करता कि:- “हे भगवान! 1 रूपए में इन बेचारों का क्या होगा?
कम से कम मुझे ऐसा तो बनाता कि मैं इन बेचारे भिखारियों को 10 रूपया दे सकता। एक रूपए में आखिरहोता भी क्या है।“
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संयोग से कुछ समय बाद उसी MNC (Multi-National Company) में उसकी तरक्की हो गई और वह उसी कम्पनी में Manager बन गया,
जिससे उसका Standard High होगा। उसने अच्छी सी महंगी Car खरीद ली, बडा घर बनवा लिया।
फिर भी उसे जब भी कोई भिखारी दिखाई देता, वह अपनी अपनी कार रोककर उन्हें 100 रूपया दे देता, मगर फिर भी उसे खुशी नहीं थी।
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वह अब भी भगवान से प्रार्थना करता कि:“100 रूपए में इन बेचारों का क्या भला होता होगा?
काश मैं ऐसा बन पाता कि जो भी भिखारी मेरे सामने से गुजरता, वो भिखारी ही न रह जाता।“संयोग से नियति ने फिर उसका साथ दिया और वो Corporate जगत का Chairman चुन लिया गया।
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अब उसके पास धन की कोई कमी नहीं थी। मंहगी Car, बंगला, First Class AC Rail Ticket आदि उसके लिए अब पुरानी बातें हो चुकी थीं। अब वह हमेंशा अपने स्वयं के Private हवाई जहाज में ही सफर करता था और एक शहर से दूसरे शहर नहीं बल्कि एक देश से दूसरे देश में घूमता था,
लेकिन उसकी प्रार्थनाऐं अभी भी वैसी ही थी, जैसी तब थीं, जब वह एक गरीब व्यक्ति था।
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👉🏼इस Short Moral Story का Moral ये है कि आपकी नियति या आपका भाग्य आपकी भावनाओं पर ही निर्भर करता है।
👉🏼आप जैसी भावनाऐं रखते हैं, वैसे ही बनते जाते हैं। इसलिए आप जैसा बनना चाहते हैं, वैसी ही भावनाऐं रखिये।


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एक दिन पंडित को प्यास लगी, संयोगवश घर में पानी नहीं था। इसलिए उसकी पत्नी पड़ोस से पानी ले आई। पानी पीकर पंडित ने पूछा….

पंडित – कहाँ से लायी हो? बहुत ठंडा पानी है।

पत्नी – पड़ोस के कुम्हार के घर से।

(पंडित ने यह सुनकर लोटा फेंक दिया और उसके तेवर चढ़ गए। वह जोर-जोर से चीखने लगा )

पंडित – अरी तूने तो मेरा धर्म भ्रष्ट कर दिया। कुम्हार ( शूद्र ) के घर का पानी पिला दिया।

(पत्नी भय से थर-थर कांपने लगी)

उसने पण्डित से माफ़ी मांग ली।

पत्नी – अब ऐसी भूल नहीं होगी।

शाम को पण्डित जब खाना खाने बैठा तो घर में खाने के लिए कुछ नहीं था।

पंडित – रोटी नहीं बनाई। भाजी नहीं बनाई। क्यों????

पत्नी – बनायी तो थी। लेकिन अनाज पैदा करने वाला कुणबी(शूद्र) था और जिस कड़ाई में बनाया था, वो कड़ाई लोहार (शूद्र) के घर से आई थी। सब फेंक दिया।

पण्डित – तू पगली है क्या?? कहीं अनाज और कढ़ाई में भी छूत होती है?

यह कह कर पण्डित बोला- कि पानी तो ले आओ।

पत्नी – पानी तो नहीं है जी।

पण्डित – घड़े कहाँ गए???

पत्नी – वो तो मैंने फेंक दिए। क्योंकि कुम्हार के हाथ से बने थे।

पंडित बोला- दूध ही ले आओ। वही पीलूँगा।

पत्नी – दूध भी फेंक दिया जी। क्योंकि गाय को जिस नौकर ने दुहा था, वो तो नीची (शूद्र) जाति से था।

पंडित- हद कर दी तूने तो यह भी नहीं जानती की दूध में छूत नहीं लगती है।

पत्नी-यह कैसी छूत है जी, जो पानी में तो लगती है, परन्तु दूध में नहीं लगती।

(पंडित के मन में आया कि दीवार से सर फोड़ लूं)

वह गुर्रा कर बोला – तूने मुझे चौपट कर दिया है जा अब आंगन में खाट डाल दे मुझे अब नींद आ रही है।

पत्नी- खाट!!!! उसे तो मैनें तोड़ कर फेंक दिया है जी। क्योंकि उसे शूद्र (सुथार ) जात वाले ने बनाया था।

पंडित चीखा – वो फ़ूलों का हार तो लाओ। भगवान को चढ़ाऊंगा, ताकि तेरी अक्ल ठिकाने आये।

पत्नी – हार तो मैंने फेंक दिया। उसे माली (शूद्र) जाति के आदमी ने बनाया था।

पंडित चीखा- सब में आग लगा दो, घर में कुछ बचा भी हैं या नहीं।

पत्नी – हाँ यह घर बचा है, इसे अभी तोड़ना बाकी है। क्योंकि इसे भी तो पिछड़ी जाति के मजदूरों ने बनाया है।

पंडित के पास कोई जबाब नहीं था।
उसकी अक्ल तो ठिकाने आयी।
बाकी लोगों कि भी आ जायेगी।

सिर्फ इस कहानी को आगे फॉरवर्ड करो।
हो सकता है देश से जातिय भेदभाव खत्म हो जाये।
एक कदम बढ़ाकर तो देखो…!!

Soch badlo desh badlega
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09/12/17. ——————————————————————–

———————-बेटी नाराज हो गयी——————

पापा जाने लगे जब ऑफिस,

बेटी जिद पर अड़ी रही, activa के लिए, वो भी आज

papa ने मजबूरी दिखाई, पर बेटी माने तब न.

बेटी ने जिद में आकर papa से बात करना बंद कर दी.

पापा बेचारे क्या करे ?

बहुत कोशिश की, papa ने, ऑफिस से बेटी को मनाने

की,पर बेटी phone उठाये तब न.

mood ख़राब हुआ पापा का

छाती में दर्द होने लगा

immediate गया boss के पास, urgent loan पास

करवाया, showroom गया, बेटी की ख़ुशी के लिए,

activa खरीद ली.

बेटी को फिर फ़ोन किया ये बताने के लिए कि उसकी

activa शाम को आ रही है

पर बेटी अब भी नाराज

मुंह फूलाये बैठी थी, जिदी थी

papa से अब भी नाराज थी

पापा शांत हो गए, chest pain बढ़ने लगा,

बहुत प्यार करता था बेटी से

बेटी ने phone नहीं उठाया, और दर्द बढ़ने लगा.

activa तो पहुंच चुकी घर

पर papa को attack आ गया, ऑफिस में ही.

घर पर activa देखकर बहुत खुश हुई बेटी, हद से ज्यादा

पर पापा नहीं दिखे

पीछे पीछे कोई ambulance आ गयी,

सब परेशान, कौन था उसमें

Body बाहर निकाली गयी

बेटी ने देखा, वो papa थे.

ऑफिस staff ने बताया

सुबह से बहुत परेशान थे

activa के लिए, बेटी के लिए

urgent loan पास करवाके activa तक book की

घर पे बेटी को फ़ोन किया पर शायद बेटी नाराज थी

इसलिए फ़ोन नहीं उठाया

ये upset हो गए, बेटी से

बहुत प्यार करते थे

phone न उठाने के कारण उसे chest pain होने लगा,

कुछ ही sec में वही लेट गए

वही पर ढेर हो गए।

सोचिये, उस वक़्त बेटी की क्या हालत हुई होगी
जार जार रो रही थी

माफ़ कर दो पापा, बहुत बड़ी गलती हो गयी मुझसे

मुझे नहीं पता, पापा, आप इस बेटी को बहुत प्यार करते

हो, माफ़ कर दो पापा.

पर अब क्या हो सकता था ?

ACtiva बाहर खड़ी थी

PApa की dead body भी वहीं थी

बेटी सिर्फ पछता सकती थी, अपनी ज़िद पर, पापा से

नाराज होकर.

काश, वो फ़ोन उठाती

तो papa आज जिन्दा होते

    

हर बच्चे चाहे वो बेटा हो या बेटी से request है कि

dad की salary देखिये, घर की income देखिये, घर की ज़रूरतों को देखिये।

आप जो डिमांड  करते हो

क्या आपके पापा कैपेबल हैं, नहीं तो थोड़ा सब्र कीजिये

पापा कभी भी बच्चों की बातें ignore नहीं करते !!!!

अगर आपको ये पोस्ट सही लगी हो तो एक पल निकाल कर औरो तक जरूर पहुंचाइये . ..
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धन्यवाद मुझे पता है आप एक अच्छा काम करेगे