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विधर्मियों का वर्तमान दुष्प्रभाव –

एक बार एक शिकारी जंगल से एक तीतर पकड़ कर लाता है। उसे अपने घर पर अलग पिंजड़े में रखता है और खूब काजू- किशमिश- बादाम खिलाता है।

जब तीतर बड़ा हो जाता है तो उसे पिंजड़े के साथ ही लेकर जंगल जाता है वहाँ जाल बिछाता है और तीतर को वहीं पिंजड़े में रखकर खुद झाड़ी के पीछे छिप जाता है और तीतर से बोलता है : “बोल बेटा!”

तीतर अपने मालिक की आवाज़ सुनकर जोर जोर से चिल्लाता है, उसकी आवाज़ को सुनकर जंगल के सारे तीतर ये सोचकर की ये अपनी प्रजाति का है, जरूर किसी परेशानी में है। सहायता करने के लिए खिंचे चले आते हैं और शिकारी के बिछाये हुए जाल में फंस जाते हैं।

फिर शिकारी मुस्कुराते हुए आता है, पालतू तीतर को अलग कर वो सारे तीतरों को दूसरे झोले में रखकर घर लाता है। इसके बाद अपने पालतू तीतर के सामने ही पकडे गए सारे तीतरों को एक- एक कर काटता है, किन्तु पालतू (तथाकथित सेकुलर) तीतर आह तक नही करता। कैसे करता ? उसे अपने हिस्से का खुराक काजू- किशमिश -बादाम जो मिल रहा था !

लगभग यही दशा आज हिन्दुओं की हो गयी है । शिकारी ( सेकुलर नेताओं और उनके चमचों ..) ने ऐसे ना जाने कितने हिंदू रूपी तीतर पाल रखें हैं, जो अपने समाज को काटता तो देखतें हैं, किन्तु आह तक नहीं करते ।

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एक खानदानी अमीर सेठ ने रात को सपना देखा पूरे श्रृंगार किए एक देवी उनके घर से बाहर जाने का प्रयत्न कर रही है सेठ ने उन देवी से कहा हे देवी आप कौन हे ओर मेरे घर मे कैसे आई और आधी रात को बाहर कहा जा रही हे ,देवी बोली मै वैभव लक्ष्मी हूं तुम्हारे घर मे वर्षों से रह रही हूं कयोकि तुम्हारे घरमे वर्षों से हरिकथा एवं धार्मिक अनुष्ठान होते रहते है बडे छोटे को प्यार और छोटे बडो का सम्मान करते है मेहमानों को पूर्ण सम्मान देकर तृप्त करते थे किंतु अब मुझे यहां से जाना हे पर चूंकि तुमने मुझे पूर्ण सम्मान से रखा इसीलिए एक वर देकर जाना चाहती हूं मांगो ,सेठ सोच मे पड गया ओर बोला -देवी मेरे4बहू बेटे है आज्ञा हो तो कल पूछकर बताऊं ,लक्ष्मी जी बोली ठीक कलतक यही हूं कहकर अदृश्य हो गई सेठ घबराकर उठा सुबह उसने सभी बेटों बहूओ को सारा किस्सा सुनाया किसी ने अनाज के गोदाम तो कोई हीरे जेवरात तो कोई सोना चांदी मांग लो ऐसा बोला अंत मे सबसे छोटी बहू बोली जोकि एक धार्मिक परिवार से आई थी -पिताजी अगर देवी लक्ष्मी जाती हे तो जाने दीजिए बस उनसे कहिए हमें साथ मै प्यार से रहने मे चाहे गरीबी मे रहे एकदूसरे का सम्मान करे हमारे घरमे सदैव हरिकथा होती रहे तथा हर आता मेहमान पहले की तरह तृप्त होकर जाए बस इतना वर दे सभी को ये बात बढिया लगी अगली रात फिर से लक्ष्मी जी सपने आई तो सेठ ने छोटी बहू वाली सभी बातें दोहरा दी ,बातें सुनकर लक्ष्मी जी मुसकुराते हुए बोली-ये वर मांगकर तुमने मुझे सदा के लिए रोक लिया मै सदैव श्रीहरि के चरणों मे विराजती हूं उनकी कथा सदैव होगी तो मै यही रहूंगी मे सदैव उनही घरों मे वास करती हूं जहां बडे छोटो को प्रेम तथा छोटे बडो का आदर करते है आते और जाते मेहमान तृप्त होकर प्रभु गुणगान करते है इसीलिए हे मानव मे यही रहूंगी कहकर फिर से अदृश्य हो गई , मित्रों यदि आप भी सदैव अपने घरों मे लक्ष्मी का वास चाहते हो तो कृपया ऐसा ही कीजिए फिर दीपावली कया सदैव लक्ष्मी जी आपके घर मे विराजेगी ,जय लक्ष्मी माता आप सभी को ओर आपके परिवार एंव दोस्तों को आपके दोस्त की ओर से दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं ..

विमल गोयल

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एक आदमी का पूरा परिवार गुरुद्वारे जाकर गुरु की महान सेवा किया करता था। उस परिवार में एक लड़का जो कि दोनों पैरों से अपाहिज था, वह भी वहाँ बैठे-बैठे बहुत सेवा किया करता था। सेवा करते करते बरसों बीत गए उसका परिवार यह सोचता था कि हम सब गुरुद्वारे जा कर इतनी महान सेवा रोज किया करते हैं, फिर हमारे परिवार में यह बच्चा ऐसे क्यों हुआ, इसका क्या दोष था। एक दिन गुरु पूर्णिमा के दिन सत्संग चल रहा था। हजारों लाखों श्रद्धालुओं के बीच उस अपाहिज पुत्र के पिता ने गद्दी पर बैठे हुए गुरु से एक सवाल किया जय गुरु देव हम सब इतनी गुरुद्वारे में सेवा करते हैं कभी किसी के बारे में बुरा नहीं सोचते हैं ना ही किसी का बुरा करते हैं फिर ऐसा क्या गुनाह हुआ जो हमारा बच्चा अपाहिज पैदा हुआ?? फिर गुरु ने जवाब दिया वैसे तो यह बात बता नहीं सकते थे, पर इस समय तूने हजारों लाखों संगत के बीच में यह सवाल पूछा है,अब अगर मैंने तेरे बात का उत्तर नहीं दिया तो हजारो लाखो संगत का विश्वास डामाडोल हो जाएगा।

इसलिए पूछता है तो सुन। यह जो बच्चा हैं जो दोनों टांगों से बेकार है, पिछले जन्म यह एक किसान का बेटा था। रोज खेत में अपने पिता को दोपहर में भोजन का टिफिन खेत में देने जाया करता था। एक दिन इसकी मां ने इसे दोपहर में 11:00 बजे खाना लगा कर दिया कि बेटा खाना खाकर पापा को टिफिन दे कर आ। इसकी मां ने खाना परोस कर थाली में रखा कि इतने में इसके किसी दोस्त ने आवाज लगाई तो यह खाना वही छोड़ कर अपने दोस्त से बात करने बाहर चला गया। इतने में एक कुत्ता घर में घुस आया और उसने थाली में मुंह डाला और रोटी खाने लगा। लडका जैसे ही घर में वापिस आया और कुत्ते को थाली में मुंह डालता हुआ देखकर पास ही में एक लोहे का बड़ा सा डंडा पड़ा हुआ था इसने यह भी नहीं सोचा कि खाना तो झूठा हो चुका है बिना सोचे समझे उस कुत्ते की दोनों टांगों पर इतनी जोर से लोहे का डंडा मारा कि वह कुत्ता अपनी जिंदगी जब तक जिंदा रहा दोनों पैरों से बेकार हो कर घसीटते घसीटते जिंदगी जिया और तड़प तड़प कर मर गया। यह उसी कुत्ते की बद्दुआ का फल है जो इस जन्म में यह दोनों टांगों से अपाहिज पैदा हुआ है। पुत्र इस संसार में इंसान को अपने अपने कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है इस जन्म में अगर किसी की टांग तोड़ी है तो स्वाभाविक है कि अगले जन्म में अपनी टांग टूटना है। इसलिए जो भी कर्म करो सोच समझ कर करो और अच्छे कर्म करो कभी किसी का दिल न दुखाओ हमेशा सत्कर्म करो।

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मित्रो आज सोमवार को द्वादस ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख केदारनाथ ज्योर्तिलिंग। केदारनाथ महादेव के विषय में कई कथाएं हैं।

स्कन्द पुराण में लिखा है कि एक बार केदार क्षेत्र के विषय में जब पार्वती जी ने शिव से पूछा तब भगवान शिव ने उन्हें बताया कि केदार क्षेत्र उन्हें अत्यंत प्रिय है. वे यहां सदा अपने गणों के साथ निवास करते हैं. इस क्षेत्र में वे तब से रहते हैं जब उन्होंने सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा का रूप धारण किया था।

स्कन्द पुराण में इस स्थान की महिमा का एक वर्णन यह भी मिलता है कि एक बहेलिया था जिस हिरण का मांस खाना अत्यंत प्रिय था. एक बार यह शिकार की तलाश में केदार क्षेत्र में आया. पूरे दिन भटकने के बाद भी उसे शिकार नहीं मिला. संध्या के समय नारद मुनि इस क्षेत्र में आये तो दूर से बहेलिया उन्हें हिरण समझकर उन पर वाण चलाने के लिए तैयार हुआ।

जब तक वह वाण चलाता सूर्य पूरी तरह डूब गया. अंधेरा होने पर उसने देखा कि एक सर्प मेंढ़क का निगल रहा है. मृत होने के बाद मेढ़क शिव रूप में परिवर्तित हो गया. इसी प्रकार बहेलिया ने देखा कि एक हिरण को सिंह मार रहा है. मृत हिरण शिव गणों के साथ शिवलोक जा रहा है. इस अद्भुत दृश्य को देखकर बहेलिया हैरान था. इसी समय नारद मुनि ब्राह्मण वेष में बहेलिया के समक्ष उपस्थित हुए।

बहेलिया ने नारद मुनि से इन अद्भुत दृश्यों के विषय में पूछा. नारद मुनि ने उसे समझाया कि यह अत्यंत पवित्र क्षेत्र है. इस स्थान पर मृत होने पर पशु-पक्षियों को भी मुक्ति मिल जाती है।

इसके बाद बहेलिया को अपने पाप कर्मों का स्मरण हो आया कि किस प्रकार उसने पशु-पक्षियों की हत्या की है. बहेलिया ने नारद मुनि से अपनी मुक्ति का उपाय पूछा. नारद मुनि से शिव का ज्ञान प्राप्त करके बहेलिया केदार क्षेत्र में रहकर शिव उपासना में लीन हो गया. मृत्यु पश्चात उसे शिव लोक में स्थान प्राप्त हुआ।

केदारनाथ ज्योर्तिलिंग की कथा

केदारनाथ ज्योर्तिलिंग की कथा के विषय में शिव पुराण में वर्णित है कि नर और नारयण नाम के दो भाईयों ने भगवान शिव की पार्थिव मूर्ति बनाकर उनकी पूजा एवं ध्यान में लगे रहते. इन दोनों भाईयों की भक्तिपूर्ण तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव इनके समक्ष प्रकट हुए. भगवान शिव ने इनसे वरदान मांगने के लिए कहा तो जन कल्याण कि भावना से इन्होंने शिव से वरदान मांगा कि वह इस क्षेत्र में जनकल्याण हेतु सदा वर्तमान रहें. इनकी प्रार्थना पर भगवान शंकर ज्योर्तिलिंग के रूप में केदार क्षेत्र में प्रकट हुए।

केदारनाथ से जुड़ी पाण्डवों की कथा।

शिव पुराण में लिखा है कि महाभारत के युद्ध के पश्चात पाण्डवों को इस बात का प्रायश्चित हो रहा था कि उनके हाथों उनके अपने भाई-बंधुओं की हत्या हुई है. वे इस पाप से मुक्ति पाना चाहते थे. इसका समाधान जब इन्होंने वेद व्यास जी से पूछा तो उन्होंने कहा कि बंधुओं की हत्या का पाप तभी मिट सकता है जब शिव इस पाप से मुक्ति प्रदान करेंगे. शिव पाण्डवों से अप्रसन्न थे अत: पाण्डव जब विश्वानाथ के दर्शन के लिए काशी पहुंचे तब वे वहां शंकर प्रत्यक्ष प्रकट नहीं हुए. शिव को ढ़ूढते हुए तब पांचों पाण्डव केदारनाथ पहुंच गये।

पाण्डवों को आया देखकर शिव ने भैंस का रूप धारण कर लिया और भैस के झुण्ड में शामिल हो गये . शिव की पहचान करने के लिए भीम एक गुफा के मुख के पास पैर फैलाकर खड़ा हो गया. सभी भैस उनके पैर के बीच से होकर निकलने लगे लेकिन भैस बने शिव ने पैर के बीच से जाना स्वीकार नहीं किया इससे पाण्डवों ने शिव को पहचान लिया।

इसके बाद शिव वहां भूमि में विलीन होने लगे तब भैंस बने भगवान शंकर को भीम ने पीठ की तरह से पकड़ लिया. भगवान शंकर पाण्डवों की भक्ति एवं दृढ़ निश्चय को देखकर प्रकट हुए तथा उन्हें पापों से मुक्त कर दिया. इस स्थान पर आज भी द्रौपदी के साथ पांचों पाण्डवों की पूजा होती है. यहां शिव की पूजा भैस के पृष्ठ भाग के रूप में तभी से चली आ रही है।

बहुत ही मजबूत है केदारनाथ का मंदिर। 400 साल तक बर्फ में दबा रहा केदारनाथ का मंदिर।

अगर वैज्ञानिकों की मानें तो केदारनाथ का मंदिर 400 साल तक बर्फ में दबा रहा था, लेकिन फिर भी वह सुरक्षित बचा रहा। 13वीं से 17वीं शताब्दी तक यानी 400 साल तक एक छोटा हिमयुग (Little Ice Age) आया था जिसमें हिमालय का एक बड़ा क्षेत्र बर्फ के अंदर दब गया था।

वैज्ञानिकों के मुताबिक केदारनाथ मंदिर 400 साल तक बर्फ में दबा रहा फिर भी इस मंदिर को कुछ नहीं हुआ, इसलिए वैज्ञानिक इस बात से हैरान नहीं है कि ताजा जल प्रलय में यह मंदिर बच गया।

देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट के हिमालयन जियोलॉजिकल वैज्ञानिक विजय जोशी ने कहा कि 400 साल तक केदारनाथ के मंदिर के बर्फ के अंदर दबे रहने के बावजूद यह मंदिर सुरक्षित रहा, लेकिन वह बर्फ जब पीछे हटी तो उसके हटने के निशान मंदिर में मौजूद हैं जिसकी वैज्ञानिकों ने स्टडी की है उसके आधार पर ही यह निष्कर्ष निकाला गया है।

जोशी कहते हैं कि 13वीं से 17वीं शताब्दी तक यानी 400 साल तक एक छोटा हिमयुग आया था जिसमें हिमालय का एक बड़ा क्षेत्र बर्फ के अंदर दब गया था। मंदिर ग्लैशियर के अंदर नहीं था बल्कि बर्फ में ही दबा था।

वैज्ञानिकों के अनुसार मंदिर की दीवार और पत्थरों पर आज भी इसके निशान हैं। ये निशान ग्लैशियर की रगड़ से बने हैं। ग्लैशियर हर वक्त खिसकते रहते हैं। वे न सिर्फ खिसकते हैं बल्कि उनके साथ उनका वजन भी होता है और उनके साथ कई चट्टानें भी, जिसके कारण उनके मार्ग में आई हर वस्तुएं रगड़ खाती हुई चलती हैं। जब 400 साल तक मंदिर बर्फ में दबा रहा होगा तो सोचिए मंदिर ने इन ग्लैशियर के बर्फ और पत्थरों की रगड़ कितनी झेली होगी।

वैज्ञानिकों के मुताबिक मंदिर के अंदर भी इसके निशान दिखाई देते हैं। बाहर की ओर दीवारों के पत्थरों की रगड़ दिखती है तो अंदर की ओर पत्थर समतल हैं, जैसे उनकी पॉलिश की गई हो।

मंदिर का निर्माण : विक्रम संवत् 1076 से 1099 तक राज करने वाले मालवा के राजा भोज ने इस मंदिर को बनवाया था, लेकिन कुछ लोगों के अनुसार यह मंदिर 8वीं शताब्दी में आदिशंकराचार्य ने बनवाया था। बताया जाता है कि मौजूदा केदारनाथ मंदिर के ठीक पीछे पांडवों ने एक मंदिर बनवाया था, लेकिन वह मंदिर वक्त के थपेड़ों की मार नहीं झेल सका।

वैसे गढ़वाल ‍विकास निगम अनुसार मौजूदा मंदिर 8वीं शताब्दी में आदिशंकराचार्य ने बनवाया था। यानी छोटा हिमयुग का दौर जो 13वीं शताब्दी में शुरू हुआ था उसके पहले ही यह मंदिर बन चुका था।

लाइकोनोमेट्री डेटिंग : वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने केदारनाथ इलाके की लाइकोनोमेट्री डेटिंग भी की। इस तकनीक से शैवाल और उनके कवक को मिलाकर उनके समय का अनुमान लगाया जाता है। इस तकनीक के अनुसार केदारनाथ के इलाके में ग्लैशियर का निर्माण 14वीं सदी के मध्य में शुरू हुआ और इस घाटी में ग्लैशियर का बनना 1748 ईसवीं तक जारी रहा यानी तकरीबन 400 साल।

जोशी ने कहा कि सबसे बड़ी बात यह है कि लाखों साल पहले केदारनाथ घाटी बनी है चोराबरी ग्लैशियर के पीछे हटने से। जब ग्लैशियर पीछे हटते हैं तो वे रोड रोलर की तरह अपने नीचे की सारी चट्टानों को पीस देते हैं और साथ में बड़ी-बड़ी चट्टानों के टुकड़े छोड़ जाते हैं।

जोशी कहते हैं कि ऐसी जगह में मंदिर बनाने वालों की एक कला थी। उन्होंने एक ऐसी जगह और एक ऐसा सेफ मंदिर बनाया कि आज तक उसे कुछ नुकसान नहीं हुआ। लेकिन उस दौर के लोगों ने ऐसी संवेदनशील जगह पर आबादी भी बसने दी तो स्वाभाविक रूप से वहां नुकसान तो होना ही था।

मजबूत है केदारनाथ का मंदिर : वैज्ञानिक डॉ. आरके डोभाल भी इस बात को दोहराते हैं। डोभाल कहते हैं कि मंदिर बहुत ही मजबूत बनाया गया है। मोटी-मोटी चट्टानों से पटी है इसकी दीवारें और उसकी जो छत है वह एक ही पत्थर से बनी है।

85 फीट ऊंचा, 187 फीट लंबा और 80 फीट चौड़ा है केदारनाथ मंदिर। इसकी दीवारें 12 फीट मोटी है और बेहद मजबूत पत्थरों से बनाई गई है। मंदिर को 6 फीट ऊंचे चबूतरे पर खड़ा किया गया है।

यह हैरतअंगेज है कि इतने भारी पत्थरों को इतनी ऊंचाई पर लाकर तराशकर कैसे मंदिर की शक्ल ‍दी गई होगी। जानकारों का मानना है कि पत्थरों को एक-दूसरे में जोड़ने के लिए इंटरलॉकिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया होगा। यह मजबूती और तकनीक ही मंदिर को नदी के बीचोबीच खड़े रखने में कामयाब हुई है।

केदार घाटी : केदानाथ धाम और मंदिर तीन तरफ पहाड़ों से घिरा है। एक तरफ है करीब 22 हजार फुट ऊंचा केदारनाथ तो दूसरी तरफ है 21 हजार 600 फुट ऊंचा खर्चकुंड और तीसरी तरफ है 22 हजार 700 फुट ऊंचा भरतकुंड। न सिर्फ तीन पहाड़ बल्कि पांच ‍नदियों का संगम भी है यहां। मं‍दाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी। इन नदियों में से कुछ को काल्पनिक माना जाता है। इस इलाके में मंदाकिनी ही स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है। यहां सर्दियों में भारी बर्फ और बारिश में जबरदस्त पानी।

भविष्य की आशंका : दरअसल केदारनाथ का यह इलाका चोराबरी ग्लैशियर का एक हिस्सा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लैशियरों के लगातार ‍पिघलते रहने और चट्टानों के खिसकते रहने से आगे भी इस तरह का जलप्रलय या अन्य प्राकृतिक आपदाएं जारी रहेंगी।

पुराणों की भविष्यवाणी : पुराणों की भविष्यवाणी अनुसार इस समूचे इलाके के तीर्थ लुप्त हो जाएंगे। माना जाता है कि जिस दिन नर और नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे, बद्रीनाथ का मार्ग पूरी तरह बंद हो जाएगा।

भक्त बद्रीनाथ के दर्शन नहीं कर पाएंगे। उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा इस बात की ओर इशारा करती है। पुराणों अनुसार आने वाले कुछ वर्षों में वर्तमान बद्रीनाथ धाम और केदारेश्वर धाम लुप्त हो जाएंगे और वर्षों बाद भविष्य में भविष्यबद्री नामक नए तीर्थ बनेंगे।

पटेल रसिक

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गृह क्लेश दूर करने के लिए
ॐ ग्लोम गौरीपुत्र, वक्रतुंड, गणपति,
गुरु,गणेश ! ग्लोम गणपति, रिद्धिपति, सिद्धिपति! मेरे कर दूर क्लेश

बुधवार के दिन से आठ दिन तक लगातार १०८ दुर्वाकुर, एक
लड्डू, और सिंदूर लेकर गणेशजी के मन्दिर में जाए।
गणपतिजी को सिंदूर का तिलक लगाये, लड्डू चढाये।
फिर १०८ बार उपरोक्त मन्त्र को पढ़े। प्रत्येक मंत्र पर एक
दुर्वाकुर गणपतिजी को चढाते जाए। यह विधि सुबह
बिना कुछ खाए करें

विक्रम प्रकाश

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महाभारत युद्ध चल रहा था। अर्जुन के
सारथी श्रीकृष्ण थे। जैसे
ही अर्जुन का बाण छूटता, कर्ण का रथ कोसों दूर
चला जाता। जब कर्ण का बाण छूटता तो अर्जुन कारथ सात कदम
पीछे चला जाता। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के
शौर्य की प्रशंसा के स्थानपर कर्ण के लिए हर बार
कहा कि कितना वीर है यह कर्ण? जो उस रथ
को सात कदम पीछे धकेल देता है। अर्जुन बड़े परेशान
हुए। असमंजस की स्थिति में पूछ बैठे कि हे वासुदेव!
यह पक्षपात क्यों? मेरे पराक्रम की आप
प्रशंसा करते नहीं एवं मात्र सात कदम
पीछे धकेल देने वाले कर्ण को बारम्बार
वाहवाही देते है।श्रीकृष्ण बोले-अर्जुन
तुम जानते नहीं। तुम्हारे रथ में महावीर
हनुमान एवं स्वयं मैं वासुदेव कृष्ण विराजमान् हूँ। यदि हम दोनों न
होते तो तुम्हारे रथ का अभी अस्तित्व
भी नहीं होता। इस रथ को सात कदम
भी पीछे हटा देना कर्ण के
महाबली होने का परिचायक हैं। अर्जुन को यह
सुनकर अपनी क्षुद्रता पर ग्लानि भीहुई।
इस तथ्य को अर्जुन और भी अच्छी तरह
सब समझ पाए जब युद्ध समाप्त हुआ। प्रत्येकदिन अर्जुन जब
युद्ध से लौटते श्रीकृष्ण पहले उतरते, फिर
सारथी धर्म के नाते अर्जुन को उतारते। अंतिम दिन वे
बोले-अर्जुन! तुम पहले उतरो रथ से व
थोड़ी दूरी तक जाओ। भगवान के उतरते
ही घोड़ा सहित रथ भस्म हो गया। अर्जुन
आश्चर्यचकित थे। भगवान बोले-पार्थ! तुम्हारा रथ
तो कभी का भस्म हो चुका था। भीष्म,
कृपाचार्य, द्रोणाचार्य व कर्ण के दिव्यास्त्रों से यह
कभी का नष्ट हो चुका था। मेरे-स्रष्टा के संकल्प ने
इसे युद्ध समापन तक जीवित रखा था।
अपनी विजय पर गर्वोन्नत अर्जुन के लिए
गीता श्रवण के बाद इससे बढ़कर और
क्या उपदेशहो सकता था कि सब कुछ भगवान का किया हुआ है।
वह तो निमित्त मात्र था। काश हमारे अंदर का अर्जुन इसे समझ
पायें।

विक्रम प्रकाश

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सीता राम सीता राम सीताराम कहिये,
जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये |

मुख में हो राम नाम राम सेवा हाथ में,
तू अकेला नाहिं प्यारे राम तेरे साथ में |
विधि का विधान जान हानि लाभ सहिये,
जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये ||

किया अभिमान तो फिर मान नहीं पायेगा,
होगा प्यारे वही जो श्री रामजी को भायेगा |
फल आशा त्याग शुभ कर्म करते रहिये,
जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये ||

ज़िन्दगी की डोर सौंप हाथ दीनानाथ के,
महलों मे राखे चाहे झोंपड़ी मे वास दे |
धन्यवाद निर्विवाद राम राम कहिये,
जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये ||

आशा एक रामजी से दूजी आशा छोड़ दे,
नाता एक रामजी से दूजे नाते तोड़ दे |
साधु संग राम रंग अंग अंग रंगिये,
काम रस त्याग प्यारे राम रस पगिये ||