Posted in Uncategorized

एक बार की बात है किसी गाँव में एक पंडित जी रहते थे।


एक बार की बात है किसी गाँव में एक पंडित जी रहते
थे।
वैसे तो पंडित जी को वेदों और शास्त्रों का बहुत
ज्ञान था, लेकिन वह बहुत ग़रीब थे।
ना ही रहने के लिए अच्छा घर था और ना ही अच्छे
भोजन के लिए पैसे।
एक छोटी सी झोपड़ी थी, उसी में रहते थे और
भिक्षा माँगकर जो मिल जाता उसी से अपना
जीवन यापन करते थे।
एक बार वह पास के किसी गाँव में भिक्षा माँगने गये,
उस समय उनके कपड़े बहुत गंदे थे और काफ़ी जगह से फट
भी गये थे।
जब उन्होने एक घर का दरवाजा खटखटाया तो सामने
से एक व्यक्ति बाहर आया, उसने जब पंडित को फटे
चिथड़े कपड़ों में देखा तो उसका मन घ्रृणा से भर गया
और उसने पंडित को धक्के मारकर घर से निकाल
दिया।
बोलाः- “पता नहीं कहाँ से गंदा पागल चला आया
है।”
पंडित जी दुखी मन से वापस चले आये, जब अपने घर
वापस लौट रहे थे तो किसी अमीर आदमी की नज़र
पंडित के फटे कपड़ों पर पड़ी तो उसने दया दिखाई और
पंडित जी को भोजन और पहनने के लिए नये कपड़े दे
दिए।
अगले दिन पंडित जी फिर से उसी गाँव में उसी
व्यक्ति के पास भिक्षा माँगने गये।
व्यक्ति ने नये कपड़ों में पंडित जी को देखा और हाथ
जोड़कर पंडित जी को अंदर बुलाया और बड़े आदर के
साथ थाली में बहुत सारे व्यंजन खाने को दिए।
पंडित जी ने एक भी टुकड़ा अपने मुँह में नहीं डाला
और सारा खाना धीरे धीरे अपने कपड़ों पर डालने लगे
और बोलेः-“ले खा और खा।”
व्यक्ति ये सब बड़े आश्चर्य से देख रहा था, आख़िर उसने
पूछ ही लिया किः- “पंडित जी आप यह क्या कर रहे
हैं.?
सारा खाना अपने कपड़ों पर क्यूँ डाल रहे हैं.?”
पंडित जी ने बहुत शानदार उत्तर दियाः- “क्यूंकी
तुमने ये खाना मुझे नहीं बल्कि इन कपड़ों को दिया है।
इसीलिए मैं ये खाना इन कपड़ों को ही खिला रहा
हूँ, कल जब में गंदे कपड़ों में तुम्हारे घर आया तो तुमने
धक्के मारकर घर से निकाल दिया और आज तुमने मुझे
साफ और नये कपड़ों में देखकर अच्छा खाना पेश
किया।
असल में तुमने ये खाना मुझे नहीं, इन कपड़ों को ही
दिया है।”
वह व्यक्ति यह सुनकर बहुत दुखी हुआ।
मित्रों…..
किसी व्यक्ति की महानता उसके चरित्र और ज्ञान
पर निर्भर करती हैं, पहनावे पर नहीं।
अच्छे कपड़े और गहने पहनने से इंसान महान नहीं बनता
उसके लिए अच्छे कर्मों की ज़रूरत होती है……..।

Posted in Uncategorized

पत्नी शब्द की बहुत अच्छी व्याख्या :- हर स्त्री पत्नी नही होसकती। पत्नी पवित्र शब्द है। इसे पति का स्त्रीलिंग ( पति+ङीप्, नुक्=पत्नी) कहना अनुचित है। पाति रक्षति पा+इति=पति अर्थात स्वामी, किन्तु पत्नी का अर्थ स्वामिनी नहीं है। पति+नी (नी+क्विप्)=पतिनि शब्द का अपभ्रंश है, पत्नी। नी का अर्थ है, पथ प्रदर्शक अग्रणी आगे- आगे चलने वाला।इसी प्रकार पतिनी का अर्थ है- पति को साथ लेकर धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति में उसके आगे आगे चलने वाली स्त्री। पतिनी = पत्नी। पत्नी के चार रूप है- धर्म पत्नी, अर्थ पत्नी, काम पत्नी, मोक्ष पत्नी। जिस स्त्री में ये चारों विशेषतायें हैं, वह पूर्ण पत्नी है। महाराज दशरथ की पत्नी कैकयी पूर्ण पत्नी थी। उसने देव दानव युद्ध में देवताओं का पक्ष लेकर लड़ रहे अपने पति दशरथ के साथ रह कर रथ संचालन करती हुई धर्म पत्नी का रूप प्रस्तुत किया। रथ के नष्ट हो जाने पर उस रथ को पुनः जोड़ कर उन्हें विजय दिलाकर उनका अर्थ सिद्ध किया।इसलिये अर्थ पत्नी हुई। उनके काम भाव को तुष्ट करते हुए उसने भरत जैसा महान पुत्र दिया।इसलिए काम पत्नी हुई। अंत में उसने अपने प्रति अनुरक्त दशरथ को फटकार कर उनका मोह भंग किया। जिससे वे राम का नाम लेते हुए मोक्ष पद प्राप्त किया।इस प्रकार वह मोक्ष पत्नी हुई। ॐ हरि ॐ। श्री राधे।

विक्रम प्रकाश रईसों ई

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, Uncategorized

धर्मराज_युधिष्ठिर


#धर्मराज_युधिष्ठिर; महाराज युधिष्ठिर ने जब सुना कि श्रीकृष्ण ने अपनी लीला का संवरण कर लिया है और यादव परस्पर कलह से ही नष्ट हो चुके हैं, तब उन्होंने अर्जुन के पौत्र परीक्षित का राज तिलक कर दिया। स्वयं सब वस्त्र एवं आभूषण उतार दिए। मौन व्रत लेकर,केश खोले, संन्यास लेकर वे राजभवन से निकले और उत्तर दिशा की ओर चल पड़े। उनके शेष भाइयों तथा द्रौपदी ने भी उनका अनुगमन किया। धर्मराज युधिष्ठिर ने सब माया-मोह त्याग दिया था। उन्होंने न भोजन किया,न जल पिया और न विश्राम ही किया। बिना किसी ओर देखे या रुके वे बराबर चलते ही गए और हिमालय में बद्रीनाथ के आगे बढ़ गए। उनके भाई तथा रानी द्रौपदी भी बराबर उनके पीछे चलती रहीं। सत्पथ पार हुआ और स्वर्गारोहण की दिव्य भूमि आई। द्रौपदी,नकुल,सहदेव,अर्जुन-ये क्रम-क्रम से गिरने लगे। जो गिरता था,वह वहीं रह जाता था। उस हिम प्रदेश में गिरकर फिर उठने की चर्चा ही व्यर्थ है। शरीर तो तत्काल हिम-समाधि पा जाता है। उस पावन प्रदेश में प्राण त्यागने वाले को स्वर्ग की प्राप्ति से भला कौन रोक सकता है। युधिष्ठिर न रुकते थे और न गिरते हुए भाइयों की ओर देख ही रहे थे। वे राग-द्वेष से परे हो चुके थे। अंत में भीमसेन भी गिर गए। युधिष्ठिर जब स्वर्गारोहण के उच्चतम शिखर पर पहुंचे,तब भी अकेले नहीं थे। उनके भाई और रानी द्रौपदी मार्ग में गिर चुकी थीं,किंतु एक कुत्ता उनके साथ था। यह कुत्ता हस्तिनापुर से ही उनके पीछे-पीछे आ रहा था। उस शिखर पर पहुंचते ही स्वयं देवराज इंद्र विमान में बैठकर आकाश से उतरे। उन्होंने युधिष्ठिर का स्वागत करते हुए कहा- “आपके धर्माचरण से स्वर्ग अब आपका है। विमान में बैठिए।” युधिष्ठिर ने अब अपने भाइयों तथा द्रौपदी को भी स्वर्ग ले जाने की प्रार्थना की। देवराज ने बताया- वे पहले ही वहां पहुंच गए हैं। युधिष्ठिर ने दूसरी प्रार्थना की- “कृपा करके इस कुत्ते को भी विमान में बैठा ले।” इंद्र बोले, “आप धर्मज्ञ होकर ऐसी बात क्यों करते हैं ? स्वर्ग में कुत्ते का प्रवेश कैसे हो सकता है ? यह अपवित्र प्राणी मुझे देख सका, यही बहुत है।” युधिष्ठिर बोले, “यह मेरे आश्रित है। मेरी भक्ति के कारण ही नगर से इतनी दूर मेरे साथ आया है। आश्रित का त्याग अधर्म है। इसके बिना मैं अकेले स्वर्ग नहीं जाना चाहता।” इंद्र बोले, “राजन! स्वर्ग की प्राप्ति पुण्यों के फल से होती है। यह पुण्यात्मा ही होता तो अधम योनि में क्यों जन्म लेता ?” युधिष्ठिर बोले, “मैं अपना आधा पुण्य इसे अर्पित करता हूँ।” “धन्य हो,धन्य हो,युधिष्ठिर तुम ! मैं तुम पर अत्यंत प्रसन्न हूँ।” युधिष्ठिर ने देखा कि कुत्ते का रूप त्यागकर साक्षात धर्म देवता उनके सम्मुख खड़े होकर उन्हें आशीर्वाद दे रहे हैं। #कथा_महाभारत_से_साभार; ============= धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, जयति पुण्य सनातन संस्कृति, जयति पुण्य भूमि भारत, सदा सर्वदा सुमंगल, हर हर महादेव, जय भवानी, जय श्री कृष्ण, जय श्री राम,,

विजय कृष्णा पांडेय

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, Uncategorized

बूढ़ा पिता अपने IAS बेटे के चेंबर में जाकर


*बूढ़ा पिता अपने IAS बेटे के चेंबर में जाकर उसके कंधे पर हाथ रख कर खड़ा हो गया !* *और प्यार से अपने पुत्र से पूछा…* *”इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान कौन है”?* *पुत्र ने पिता को बड़े प्यार से हंसते हुए कहा “मेरे अलावा कौन हो सकता है पिताजी “!* *पिता को इस जवाब की आशा नहीं थी, उसे विश्वास था कि उसका बेटा गर्व से कहेगा पिताजी इस दुनिया के सब से शक्तिशाली इंसान आप हैैं, जिन्होंने मुझे इतना योग्य बनाया !* *उनकी आँखे छलछला आई !* *वो चेंबर के गेट को खोल कर बाहर निकलने लगे !* *उन्होंने एक बार पीछे मुड़ कर पुनः बेटे से पूछा एक बार फिर बताओ इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान कौन है ???* *पुत्र ने इस बार कहा…* *”पिताजी आप हैैं,* *इस दुनिया के सब से* *शक्तिशाली इंसान “!* *पिता सुनकर आश्चर्यचकित हो गए उन्होंने कहा “अभी तो तुम अपने आप को इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान बता रहे थे अब तुम मुझे बता रहे हो ” ???* *पुत्र ने हंसते हुए उन्हें अपने सामने बिठाते हुए कहा ..* *”पिताजी उस समय आप का हाथ मेरे कंधे पर था, जिस पुत्र के कंधे पर या सिर पर पिता का हाथ हो वो पुत्र तो दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान ही होगा ना,,,,,* *बोलिए पिताजी” !* *पिता की आँखे भर आई उन्होंने अपने पुत्र को कस कर के अपने गले लगा लिया !* *”तब में चन्द पंक्तिया लिखता हुं”* *जो पिता के पैरों को छूता है *वो कभी गरीब नहीं होता।* *जो मां के पैरों को छूता है वो कभी बदनसीब नही होता।* *जो भाई के पैराें को छुता हें वो कभी गमगीन नही होता।* *जो बहन के पैरों को छूता है वो कभी चरित्रहीन नहीं होता।* *जो गुरू के पैरों को छूता है* *उस जेसा कोई खुशनसीब नहीं होता…….* *💞अच्छा दिखने के लिये मत जिओ* *बल्कि अच्छा बनने के लिए जिओ💞* *💞जो झुक सकता है वह सारी* *☄दुनिया को झुका सकता है 💞* *💞 अगर बुरी आदत समय पर न बदली जाये* *तो बुरी आदत समय बदल देती है💞* *💞चलते रहने से ही सफलता है,* *रुका हुआ तो पानी भी बेकार हो जाता है 💞* *💞 झूठे दिलासे से स्पष्ट इंकार बेहतर है* *अच्छी सोच, अच्छी भावना,* *अच्छा विचार मन को हल्का करता है💞* *💞मुसीबत सब प आती है* *कोई बिखर जाता हे* *और कोई निखर जाता हें* *💞 “तेरा मेरा”करते एक दिन चले जाना है…* *जो भी कमाया यही रहे जाना हे* 🙏🏼 *सदैव बुजुर्गों का सम्मान करें* 🙏🏼 *💐जय श्री कृष्णा राधे राधे💐*

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, Uncategorized

स्वर्ग का देवता


((((((( स्वर्ग का देवता ))))))) . लक्ष्मी नारायण बहुत भोला लड़का था। वह प्रतिदिन रात में सोने से पहले अपनी दादी से कहानी सुनाने को कहता था। . दादी उसे नागलोक, पाताल, गन्धर्व लोक, चन्द्रलोक, सूर्यलोक आदि की कहानियाँ सुनाया करती थी। . एक दिन दादी ने उसे स्वर्ग का वर्णन सुनाया। स्वर्ग का वर्णन इतना सुन्दर था कि उसे सुनकर लक्ष्मी नारायण स्वर्ग देखने के लिये हठ करने लगा। . दादी ने उसे बहुत समझाया कि मनुष्य स्वर्ग नहीं देख सकता, किन्तु लक्ष्मीनारायण रोने लगा। रोते- रोते ही वह सो गया। . उसे स्वप्न में दिखायी पड़ा कि एक चम- चम चमकते देवता उसके पास खड़े होकर कह रहे हैं- बच्चे ! स्वर्ग देखने के लिये मूल्य देना पड़ता है। . तुम सरकस देखने जाते हो तो टिकट देते हो न ? स्वर्ग देखने के लिये भी तुम्हें उसी प्रकार रुपये देने पड़ेंगे। . स्वप्न में लक्ष्मीनारायण सोचने लगा कि मैं दादी से रुपये माँगूँगा। लेकिन देवता ने कहा- स्वर्ग में तुम्हारे रुपये नहीं चलते। यहाँ तो भलाई और पुण्य कर्मों का रुपया चलता है। . अच्छा, काम करोगे तो एक रुपया इसमें आ जायगा और जब कोई बुरा काम करोगे तो एक रुपया इसमें से उड़ जायगा। जब यह डिबिया भर जायगी, तब तुम स्वर्ग देख सकोगे। . जब लक्ष्मीनारायण की नींद टूटी तो उसने अपने सिरहाने सचमुच एक डिबिया देखी। . डिबिया लेकर वह बड़ा प्रसन्न हुआ। उस दिन उसकी दादी ने उसे एक पैसा दिया। पैसा लेकर वह घर से निकला। . एक रोगी भिखारी उससे पैसा माँगने लगा। लक्ष्मीनारायण भिखारी को बिना पैसा दिये भाग जाना चाहता था, इतने में उसने अपने अध्यापक को सामने से आते देखा। . उसके अध्यापक उदार लड़कों की बहुत प्रशंसा किया करते थे। उन्हें देखकर लक्ष्मीनारायण ने भिखारी को पैसा दे दिया। अध्यापक ने उसकी पीठ ठोंकी और प्रशंसा की। . घर लौटकर लक्ष्मीनारायण ने वह डिबिया खोली, किन्तु वह खाली पड़ी थी। इस बात से लक्ष्मी नारायण को बहुत दुःख हुआ। . वह रोते- रोते सो गया। सपने में उसे वही देवता फिर दिखायी पड़े और बोले- तुमने अध्यापक से प्रशंसा पाने के लिये पैसा दिया था, सो प्रशंसा मिल गयी। . अब रोते क्यों हो ? किसी लाभ की आशा से जो अच्छा काम किया जाता है, वह तो व्यापार है, वह पुण्य थोड़े ही है। . दूसरे दिन लक्ष्मीनारायण को उसकी दादी ने दो आने पैसे दिये। पैसे लेकर उसने बाजार जाकर दो संतरे खरीदे। . उसका साथी मोतीलाल बीमार था। बाजार से लौटते समय वह अपने मित्र को देखने उसके घर चला गया। . मोतीलाल को देखने उसके घर वैद्य आये थे। वैद्य जी ने दवा देकर मोती लाल की माता से कहा- इसे आज संतरे का रस देना। . मोतीलाल की माता बहुत गरीब थी। वह रोने लगी और बोली- ‘मैं मजदूरी करके पेट भरती हूँ। इस समय बेटे की बीमारी में कई दिन से काम करने नहीं जा सकी। मेरे पास संतरे खरीदने के लिये एक भी पैसा नहीं है।’ . लक्ष्मीनारायण ने अपने दोनों संतरे मोतीलाल की माँ को दिये। वह लक्ष्मीनारायण को आशीर्वाद देने लगी। . घर आकर जब लक्ष्मीनारायण ने अपनी डिबिया खोली तो उसमें दो रुपये चमक रहे थे। . एक दिन लक्ष्मीनारायण खेल में लगा था। उसकी छोटी बहिन वहाँ आयी और उसके खिलौनों को उठाने लगी। लक्ष्मीनारायण ने उसे रोका। जब वह न मानी तो उसने उसे पीट दिया। . बेचारी लड़की रोने लगी। इस बार जब उसने डिबिया खोली तो देखा कि उसके पहले के इकट्ठे कई रुपये उड़ गये हैं। अब उसे बड़ा पश्चाताप हुआ। उसने आगे कोई बुरा काम न करने का पक्का निश्चय कर लिया। . मनुष्य जैसे काम करता है, वैसा उसका स्वभाव हो जाता है। जो बुरे काम करता है, उसका स्वभाव बुरा हो जाता है। उसे फिर बुरा काम करने में ही आनन्द आता है। . जो अच्छा काम करता है, उसका स्वभाव अच्छा हो जाता है। उसे बुरा काम करने की बात भी बुरी लगती है। . लक्ष्मीनारायण पहले रुपये के लोभ से अच्छा काम करता था। धीरे- धीरे उसका स्वभाव ही अच्छा काम करने का हो गया। . अच्छा काम करते- करते उसकी डिबिया रुपयों से भर गयी। स्वर्ग देखने की आशा से प्रसन्न होता, उस डिबिया को लेकर वह अपने बगीचे में पहुँचा। . लक्ष्मीनारायण ने देखा कि बगीचे में पेड़ के नीचे बैठा हुआ एक बूढ़ा साधु रो रहा है। वह दौड़ता हुआ साधु के पास गया और बोला- बाबा ! आप क्यों रो रहे है ? . साधु बोला- बेटा जैसी डिबिया तुम्हारे हाथ में है, वैसी ही एक डिबिया मेरे पास थी। बहुत दिन परिश्रम करके मैंने उसे रुपयों से भरा था। . बड़ी आशा थी कि उसके रुपयों से स्वर्ग देखूँगा, किन्तु आज गंगा जी में स्नान करते समय वह डिबिया पानी में गिर गयी। . लक्ष्मी नारायण ने कहा- बाबा ! आप रोओ मत। मेरी डिबिया भी भरी हुई है। आप इसे ले लो। . साधु बोला- तुमने इसे बड़े परिश्रम से भरा है, इसे देने से तुम्हें दुःख होगा। . लक्ष्मी नारायण ने कहा- मुझे दुःख नहीं होगा बाबा ! मैं तो लड़का हूँ। मुझे तो अभी बहुत दिन जीना है। मैं तो ऐसी कई डिबिया रुपये इकट्ठे कर सकता हुँ। आप बूढ़े हो गये हैं। आप मेरी डिबिया ले लीजिये। . साधु ने डिबिया लेकर लक्ष्मीनारायण के नेत्रों पर हाथ फेर दिया। लक्ष्मीनारायण के नेत्र बंद हो गये। उसे स्वर्ग दिखायी पड़ने लगा। . ऐसा सुन्दर स्वर्ग कि दादी ने जो स्वर्ग का वर्णन किया था, वह वर्णन तो स्वर्ग के एक कोने का भी ठीक वर्णन नहीं था। . जब लक्ष्मीनारायण ने नेत्र खोले तो साधु के बदले स्वप्न में दिखायी पड़ने वाला वही देवता उसके सामने प्रत्यक्ष खड़ा था। . देवता ने कहा- बेटा ! जो लोग अच्छे काम करते हैं, उनका घर स्वर्ग बन जाता है। तुम इसी प्रकार जीवन में भलाई करते रहोगे तो अन्त में स्वर्ग में पहुँच जाओगे।’ देवता इतना कहकर वहीं अदृश्य हो गये। ~~~~~~~~~~~~~~~~~ ((((((( जय जय श्री राधे ))))))) ~~~~~~~~~~~~~~~~~

R K Nakeera

Posted in Laxmi prapti, Uncategorized

महालक्ष्मीस्तुति: — astroprabha


अगस्तिरुवाच – Agastiruvach मातर्नमामि कमले कमलायताक्षि श्रीविष्णुहृत्कमलवासिनि विश्वमात:। क्षीरोदजे कमलकोमलगर्भगौरि लक्ष्मि प्रसीद सततं नमतां शरण्ये।।1।। त्वं श्रीरुपेन्द्रसदने मदनैकमात – र्ज्योत्स्नासि चन्द्रमसि चन्द्रमनोहरास्ये। सूर्ये प्रभासि च जगत्त्रितये प्रभासि लक्ष्मि प्रसीद सततं नमतां शरण्ये।।2।। त्वं जातवेदसि सदा दहनात्मशक्ति – र्वेधास्त्वया जगदिदं विविधं विदध्यात्। विश्वम्भरोSपि बिभृयादखिलं भवत्या लक्ष्मि प्रसीद सततं नमतां शरण्ये।।3।। त्वत्त्यक्तमेतदमले हरते हरोSपि त्वं पासि हंसि […]

via महालक्ष्मीस्तुति: — astroprabha

Posted in Uncategorized

बेटी की फिक्र


बेटी की फिक्र…. पापा मैंने आपके लिए हलवा बनाया है 11 साल की चेतना अपने पिता मोहन से बोली जो ऑफिस से घर मे घुसा ही था। मोहन – अच्छा क्या बात है ? अच्छा खिला फिर अपने पापा को, चेतना दौड़ती रसोई मे गई और बडा कटोरा भरकर हलवा लेकर आई। मोहन ने खाना शुरू किया और चेतना को देखा ! मोहन की आँखों मे आँसू थे। चेतना – क्या हुआ पापा हलवा अच्छा नही लगा ? मोहन – नही मेरी बेटी हलवा तो बहुत अच्छा बना है, और देखते देखते पूरा कटोरा खाली कर दिया इतने मे मोहन की पत्नी राधा बाथरूम से नहाकर बाहर आई। और बोली – ला मुझे भी खिला तेरा हलवा मोहन ने चेतना को 50 ₹ इनाम मे दिए। चेतना खुशी से मम्मी के लिए रसोई से हलवा लेकर आई मगर ये कया जैसे ही उसने हलवा की पहली चम्मच मुंह मे डाली तो तुरंत थूक दिया। और बोली – ये क्या बनाया है ? ये कोई हलवा है ? इसमें तो चीनी नही नमक भरा है और आप इसे कैसे खा गये ये तो जहर हे। मेरे बनाये खाने मे तो कभी नमक मिर्च कम है तेज है कहते रहते हो ओर बेटी को कुछ कहने के बजाय ईनाम देते हो ! मोहन हंसते हुए – अरे पगली तेरा मेरा तो जीवन भर का साथ है, रिश्ता है पति पत्नी का। जिसमें नौक-झौक, रूठना-मनाना ये सब तो चलता है मगर ये तो एक बेटी है कल चली जाएगी| मगर आज इसे वो एहसास वो अपनापन महसूस हुआ जो मुझे इसके जन्म के समय हुआ था। आज इसने बडे प्यार से पहली बार मेरे लिए कुछ बनाया है फिर वो जैसा भी हो मेरे लिए सबसे बेहतर और सबसे स्वादिष्ट है| ये बेटियां भो अपने पापा की परियां और राजकुमारी होती है जैसे तुम अपने पापा की हो। चेतना रोते हुए मोहन के सीने से लग गई और सोच रही थी इसीलिए हर लडकी अपने पति मे अपने पापा की छवि ढूंढती है। दोस्तों यही सच है हर बेटी अपने पिता के बडे करीब होती है या यूं कहे कलेजे का टुकड़ा इसीलिए शादी मे विदाई के समय सबसे ज्यादा पिता ही रोता है। इसीलिए हर पिता हर समय अपनी बेटी की फिक्र करता रहता है। फिर भी दिल हैं हिन्दुस्तानी

Laxmikant varshnay