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♥️ Story-9 ♥️

कहानी पढ़ने से पहले, एक गहरी सांस लें और इस पल को महसूस करें।

सेवा की कहानी

मैं चेन्नई में कार्यरत था और मेरा पैतृक घर भोपाल में था। अचानक घर से पिताजी का फ़ोन आया कि तुरन्त घर चले आओ, कोई अत्यंत आवश्यक कार्य है। मैं आनन फानन में रेलवे स्टेशन पहुँचा और तत्काल रेलवे आरक्षण की कोशिश की परन्तु गर्मी की छुट्टियाँ होने के कारणवश एक भी सीट उपलब्ध नहीं थी।

सामने प्लेटफार्म पर ग्रैंड ट्रंक एक्सप्रेस गाड़ी खड़ी थी और उसमें भी बैठने की जगह नहीं थी, परन्तु मरता क्या नहीं करता,घर तो कैसे भी जाना था। बिना कुछ सोचे-समझे सामने खड़े साधारण श्रेणी के स्लीपर क्लास के डिब्बे में घुस गया। मैंने सोचा इतनी भीड़ में रेलवे टी.टी. कुछ नहीं कहेगा। डिब्बे के अन्दर भी बुरा हाल था। जैसे-तैसे जगह बनाने हेतु एक बर्थ पर एक सज्जन को लेटे देखा तो उनसे याचना करते हुए बैठने के लिए जगह मांग ली। सज्जन मुस्कुराये और उठकर बैठ गए और बोले– “कोई बात नहीं,आप यहाँ बैठ सकते हैं।”

मैं उन्हें धन्यवाद दे,वही कोने में बैठ गया। थोड़ी देर बाद ट्रेन ने स्टेशन छोड़ दिया और रफ़्तार पकड़ ली। कुछ मिनटों में जैसे सभी लोग व्यवस्थित हो गए और सभी को बैठने का स्थान मिल गया और लोग अपने साथ लाया हुआ खाना खोल कर खाने लगे। पूरे डिब्बे में भोजन की महक भर गयी। मैंने अपने सहयात्री को देखा और सोचा, बातचीत का सिलसिला शुरू किया जाये। मैंने कहा– “मेरा नाम आलोक है और मैं इसरो में वैज्ञानिक हूँ। आज़ जरुरी काम से अचानक मुझे घर जाना था इसलिए साधारण स्लीपर क्लास में चढ़ गया, वरना मैं ए.सी. वातानुकूलित श्रेणी से कम में यात्रा नहीं करता।”

वो मुस्कुराये और बोले– “वाह ! तो मेरे साथ एक वैज्ञानिक यात्रा कर रहे हैं। मेरा नाम जगमोहन राव है। मैं वारंगल जा रहा हूँ। उसी के पास एक गाँव में मेरा घर है। मैं अक्सर शनिवार को घर जाता हूँ।”

इतना कह उन्होंने अपना बैग खोला और उसमें से एक डिब्बा निकाला। वो बोले– “ये मेरे घर का खाना है,आप लेना पसंद करेंगे ?”

मैंने संकोचवश मना कर दिया और अपने बैग से सैंडविच निकाल कर खाने लगा। जगमोहन राव ! ये नाम कुछ सुना-सुना और जाना-पहचाना सा लग रहा था, परन्तु इस समय याद नहीं आ रहा था।

कुछ देर बाद सभी लोगों ने खाना खा लिया और जैसे तैसे सोने की कोशिश करने लगे। हमारी बर्थ के सामने एक परिवार बैठा था। जिसमें एक पिता, माता और दो बड़े बच्चे थे । उन लोगों ने भी खाना खा कर बिस्तर लगा लिए और सोने लगे। मैं बर्थ के पैताने में उकडू बैठ कर अपने मोबाइल में गेम खेलने लगा।

रेलगाड़ी तेज़ रफ़्तार से चल रही थी। अचानक मैंने देखा कि सामने वाली बर्थ पर 55-57 साल के जो सज्जन लेटे थे, वो अपनी बर्थ पर तड़पने लगे और उनके मुंह से झाग निकलने लगा। उनका परिवार भी घबरा कर उठ गया और उन्हें पानी पिलाने लगा, परन्तु वो कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थे। मैंने चिल्ला कर पूछा- अरे ! कोई डॉक्टर को बुलाओ, इमरजेंसी है।”

रात में स्लीपर क्लास के डिब्बे में डॉक्टर कहाँ से मिलता? उनके परिवार के लोग उन्हें असहाय अवस्था में देख रोने लगे। तभी मेरे साथ वाले जगमोहन राव नींद से जाग गए। उन्होंने मुझसे पूछा — “क्या हुआ ?”

मैंने उन्हें सब बताया। मेरी बात सुनते ही वो लपक के अपने बर्थ के नीचे से अपना सूटकेस को निकाले और खोलने लगे। सूटकेस खुलते ही मैंने देखा उन्होंने स्टेथेस्कोप निकाला और सामने वाले सज्जन के सीने पर रख कर धड़कने सुनने लगे। एक मिनट बाद उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें दिखने लगीं। उन्होंने कुछ नहीं कहा और सूटकेस में से एक इंजेक्शन निकाला और सज्जन के सीने में लगा दिया और उनका सीना दबा-दबा कर, मुंह पर अपना रूमाल लगा कर अपने मुंह से सांस देने लगे। कुछ मिनट तक सी.पी.आर. तकनीक से कृत्रिम रूप से स्वांस देने के बाद मैंने देखा कि रोगी सहयात्री का तड़फना कम हो गया।

जगमोहन राव जी ने अपने सूटकेस में से कुछ और गोलियां निकाली और परिवार के बेटे से बोले– “बेटा !, ये बात सुनकर घबराना नहीं। आपके पापा को गंभीर हृदयाघात आया था, पहले उनकी जान को ख़तरा था परन्तु मैंने इंजेक्शन दे दिया है और ये दवाइयां उन्हें दे देना।”

उनका बेटा आश्चर्य से बोला– “पर आप कौन हो ?”

वो बोले– “मैं एक डॉक्टर हूँ। मैं इनकी तबीयत के बारे में पूरा विवरण और दवाइयां पर्ची पर लिख देता हूँ,अगले स्टेशन पर उतर कर आप लोग इन्हें अच्छे अस्पताल ले जाइएगा।”

उन्होंने अपने बैग से एक लेटरपेड से एक पर्ची निकाली और जैसे ही मैंने उस लेटरपेड पर उनका व्यक्तिगत विवरण पढ़ा, मेरी याददाश्त वापस आ गयी।

उस पर छपा था – डॉक्टर जगमोहन राव हृदय रोग विशेषज्ञ, अपोलो अस्पताल चेन्नई।

अब तक मुझे भी याद आ गया कि कुछ दिन पूर्व मैं जब अपने पिता को इलाज के लिए अपोलो हस्पताल ले गया था, वहाँ मैंने डॉक्टर जगमोहन राव के बारे में सुना था। वो अस्पताल के सबसे वरिष्ठ, विशेष प्रतिभाशाली हृदय रोग विशेषज्ञ थे। उनसे मिलने का समय लेने के लिए महीनों लगते थे। मैं आश्चर्य से उन्हें देख रहा था। एक इतना बड़ा डॉक्टर रेल की साधारण श्रेणी में यात्रा कर रहा था और मैं एक छोटा सा तृतीय श्रेणी वैज्ञानिक घमंड से वातानुकूलित श्रेणी में यात्रा की बात कर रहा था और ये इतने बड़े आदमी इतने सामान्य ढंग से पेश आ रहे थे। इतने में अगला स्टेशन आ गया और वो हृदयाघात से पीड़ित बुजुर्ग एवं उनका परिवार, टी.टी. एवं स्टेशन पर बुलवाई गई चिकित्सा मदद से उतर गया।

रेल वापस चलने लगी। मैंने उत्सुकतावश उनसे पूछा– “डॉक्टर साहब !आप तो आराम से, वातानुकूलित श्रेणी, में यात्रा कर सकते थे फिर सामान्य श्रेणी में यात्रा क्यूँ ?”

वो मुस्कुराये और बोले– “मैं जब छोटा था और गाँव में रहता था, तब मैंने देखा था कि रेल में कोई डॉक्टर उपलब्ध नहीं होता, खासकर दूसरे दर्जे में। इसलिए मैं जब भी घर या कहीं जाता हूँ तो साधारण क्लास में ही सफ़र करता हूँ। न जाने कब किसे मेरी जरुरत पड़ जाए! मैंने डॉक्टरी लोगों की सेवा के लिए ही की थी। हमारी पढ़ाई का क्या फ़ायदा यदि हम किसी के काम न आ पाए ?”

इसके बाद सफ़र उनसे यूं ही बात करते बीतने लगा। सुबह के चार बज गए थे। वारंगल आने वाला था। वो यूं ही मुस्कुरा कर लोगों का दर्द बाँट कर, गुमनाम तरीके से मानव सेवा कर,अपने गाँव की ओर निकल लिए और मैं उनके बैठे हुए स्थान से आती हुई खुशबू का आनंद लेते हुए अपनी बाकी यात्रा पूरी करने लगा।

अब मेरी समझ में आया था कि इतनी भीड़ के बावजूद डिब्बे में खुशबू कैसे फैली? ये खुशबू उन महान व्यक्तित्व और पुण्य आत्मा की खुशबू थी जिसने मेरा जीवन और मेरी सोच दोनों को महका दिया।

हम बदलेंगे,युग बदलेगा। _____♥️_____

Heartfulness Meditation 💌

HFN Story Team Jodhpur

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गद्दार_यार

कैसे होते हैं?
लेख पढिए +++
एक सहेली ने दूसरी सहेली से पूछा:- बच्चा पैदा होने की खुशी में तुम्हारे पति ने तुम्हें क्या तोहफा दिया ?

सहेली ने कहा – कुछ भी नहीं!

उसने सवाल करते हुए पूछा कि क्या ये अच्छी बात है ?
क्या उस की नज़र में तुम्हारी कोई कीमत नहीं ?

लफ्ज़ों का ये ज़हरीला बम गिरा कर वह सहेली दूसरी सहेली को अपनी फिक्र में छोड़कर चलती बनी।।

थोड़ी देर बाद शाम के वक्त उसका पति घर आया और पत्नी का मुंह लटका हुआ पाया।।
फिर दोनों में झगड़ा हुआ।।
एक दूसरे को लानतें भेजी।।
मारपीट हुई, और आखिर पति पत्नी में तलाक हो गया।।

जानते हैं प्रॉब्लम की शुरुआत कहां से हुई ? उस फिजूल जुमले से जो उसका हालचाल जानने आई सहेली ने कहा था।।

रवि ने अपने जिगरी दोस्त पवन से पूछा:- तुम कहां काम करते हो?

पवन- फला दुकान में।।

रवि- कितनी तनख्वाह देता है मालिक?

पवन-18 हजार।।

रवि-18000 रुपये बस, तुम्हारी जिंदगी कैसे कटती है इतने पैसों में ?

पवन- (गहरी सांस खींचते हुए)- बस यार क्या बताऊं।।

मीटिंग खत्म हुई, कुछ दिनों के बाद पवन अब अपने काम से बेरूखा हो गया।। और तनख्वाह बढ़ाने की डिमांड कर दी।। जिसे मालिक ने रद्द कर दिया।। पवन ने जॉब छोड़ दी और बेरोजगार हो गया।। पहले उसके पास काम था अब काम नहीं रहा।।

एक साहब ने एक शख्स से कहा जो अपने बेटे से अलग रहता था।। तुम्हारा बेटा तुमसे बहुत कम मिलने आता है।। क्या उसे तुमसे मोहब्बत नहीं रही?

बाप ने कहा बेटा ज्यादा व्यस्त रहता है, उसका काम का शेड्यूल बहुत सख्त है।। उसके बीवी बच्चे हैं, उसे बहुत कम वक्त मिलता है।।

पहला आदमी बोला- वाह!! यह क्या बात हुई, तुमने उसे पाला-पोसा उसकी हर ख्वाहिश पूरी की, अब उसको बुढ़ापे में व्यस्तता की वजह से मिलने का वक्त नहीं मिलता है।। तो यह ना मिलने का बहाना है।।

इस बातचीत के बाद बाप के दिल में बेटे के प्रति शंका पैदा हो गई।। बेटा जब भी मिलने आता वो ये ही सोचता रहता कि उसके पास सबके लिए वक्त है सिवाय मेरे।।

याद रखिए जुबान से निकले शब्द दूसरे पर बड़ा गहरा असर डाल देते हैं।। बेशक कुछ लोगों की जुबानों से शैतानी बोल निकलते हैं।। हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बहुत से सवाल हमें बहुत मासूम लगते हैं।।*

जैसे-
तुमने यह क्यों नहीं खरीदा।।
तुम्हारे पास यह क्यों नहीं है।।
तुम इस शख्स के साथ पूरी जिंदगी कैसे चल सकती हो।।
तुम उसे कैसे मान सकते हो।।
वगैरा वगैरा।।

इस तरह के बेमतलबी फिजूल के सवाल नादानी में या बिना मकसद के हम पूछ बैठते हैं।।

जबकि हम यह भूल जाते हैं कि हमारे ये सवाल सुनने वाले के दिल में
नफरत या मोहब्बत का कौन सा बीज बो रहे हैं।।

आज के दौर में हमारे इर्द-गिर्द, समाज या घरों में जो टेंशन टाइट होती जा रही है, उनकी जड़ तक जाया जाए तो अक्सर उसके पीछे किसी और का हाथ होता है।।
वो ये नहीं जानते कि नादानी में या जानबूझकर बोले जाने वाले जुमले किसी की ज़िंदगी को तबाह कर सकते हैं।।

ऐसी हवा फैलाने वाले हम ना बनें।

(आंख बंद करके एक बार विचार जरूर करें)

रवि कांत

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एक प्रदेश के राजा के पास बहुत सुन्दर औऱ निहायत ही वफादार घोड़ी थी।राजा अपने घोड़ी पर जान छिड़कता था और घोड़ी राजा पर ।दोनों एक दूसरे को जी जान से प्रेम करते थे ।

कई बार बड़े औऱ भीषण युद्ध में घोड़ी ने अपनी जान पर खेलकर राजा के प्राण बचाये थे ।

समय बीतता गया । कुछ दिनों के बाद राजा की घोड़ी ने एक बच्चे को जन्म दिया लेकिन बच्चा काना पैदा हुआ, पर शरीर हृष्ट पुष्ट सुडौल औऱ बेहद खूबसूरत ।

घोड़ी का बच्चा जब बड़ा हुआ, उसने अपनी मां से पूछा: मां मैं बहुत बलवान हूँ, पर काना हूँ.. यह कैसे हो गया।

इस पर घोड़ी बोली: बेटा, एक बार जब मैं गर्भवती थी, तू मेरे पेट में था तब राजा ने मेरे ऊपर सवारी करते समय मुझे एक कोड़ा मार दिया था क्योंकि मेरे पैर फिसलने के कारण राजा ज़मीन पर गिर पड़ा था जिसके कारण तू काना हो गया क्योंकि उस वक़्त मुझें चोट लग गई थी ।

अपनी माँ की यह बात सुनकर बच्चे को राजा पर बहुत गुस्सा आया और उसने अपनी मां से कहा : मां मैं राजा से इसका बदला जरूर लूंगा ।

मां ने कहा…नहीं बेटा, ऐसा क़भी मत सोचना क्योंकि राजा ने हमारा पालन-पोषण किया है, तू जो स्वस्थ है.. सुन्दर है, उसी के पोषण औऱ कृपा से तो है । यदि राजा को एक बार गुस्सा आ गया तो इसका अर्थ यह नहीं है कि हम उसे क्षति पहुचायें।

पर उस बच्चे के समझ में कुछ नहीं आया, उसने मन ही मन राजा से बदला लेने की सोच ली औऱ इसके लिए अवसर तलाश करने लगा ।

आखिरकार एक दिन घोड़े को यह मिल गया.. राजा उसे एक युद्ध पर ले गया। युद्ध के दौरान लड़ते-लड़ते राजा बुरी तरह घायल हो गया । शत्रुओं ने उसे चारों तरफ़ से घेर लिया लेकिन घोड़ा अपनी जान पर खेलकर उसे तुरन्त उठाकर वापस महल ले आया औऱ राजा की जान बच गई ।

जब घोड़े की माँ को इस घटना की जानकारी हुई तो उसे अपने बेटे पर बहुत ताज्जुब हुआ लेकिन वह अपने बेटे के रवैये से मन ही मन बहुत खुश हुई ।

घोड़े ने अपनी मां से पूछा: मां,आज राजा से बदला लेने का बहुत अच्छा मौका था, पर युद्ध के मैदान में बदला लेने का ख्याल ही नहीं आया और न ही मैं ले पाया, मन ने गवाही नहीं दी….बल्कि राजा को विपत्ति में घिरा देख उल्टे मेरा खून खौल उठा औऱ मैंने हर हाल में उसकी हिफाज़त करने की ठान ली ,भले ही मेरी जान चली जाती ।इतना कह घोड़ा रोने लगा ।

इस पर घोडी ने मुस्कुरा कर गंभीरता से कहा : बेटा तेरे खून में और तेरे संस्कार में धोखा है ही नहीं, तू जानबूझकर तो धोखा दे ही नहीं सकता है,साथ हु तुझसे नमक हरामी हो नहीं सकती, क्योंकि तेरी नस्ल में तेरी मां का ही तो अंश है।वास्तव में आज जो तूने किया,यही तेरा फ़र्ज़ था औऱ अगर तू अपने फ़र्ज़ के लिए आज कुर्बान भी हो जाता तो मुझें तुझपर फक्र होता ।

वाकई.. यह सत्य है कि जैसे हमारे संस्कार होते हैं, वैसा ही हमारे मन का व्यवहार होता है ।

रवि कांत

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एक चाट वाला था।
जब भी उसके पास चाट खाने जाओ तो ऐसा लगता कि वह हमारा ही रास्ता देख रहा हो। हर विषय पर बात करने में उसे बड़ा मज़ा आता था। कई बार उसे कहा कि भाई देर हो जाती है, जल्दी चाट लगा दिया करो पर उसकी बात ख़त्म ही नहीं होती।

एक दिन अचानक उसके साथ मेरी कर्म और भाग्य पर बात शुरू हो गई।

तक़दीर और तदबीर की बात सुन मैंने सोचा कि चलो आज उसकी फ़िलासफ़ी भी देख ही लेते हैं। मैंने उससे एक सवाल पूछ लिया।

मेरा सवाल उस चाट वाले से था कि, आदमी मेहनत से आगे बढ़ता है या भाग्य से ?

और उसने जो जवाब दिया उसके जवाब को सुन कर मेरे दिमाग़ के सारे जाले ही साफ़ हो गए।

वो चाट वाला मेरे से कहने लगा आपका किसी बैंक में लॉकर तो होगा?

मैंने कहा हाँ, तो उस चाट वाले ने मेरे से कहा कि उस लाकर की चाबियां ही इस सवाल का जवाब है। हर लॉकर की दो चाबियां होती हैं। एक आपके पास होती है और एक मैनेजर के पास।

आपके पास जो चाबी है वह है परिश्रम और मैनेजर के पास वाली चाबी भाग्य है।

जब तक दोनों चाबियां नहीं लगती लाॅकर का ताला नहीं खुल सकता।

आप कर्मयोगी पुरुष हैं और मैनेजर भगवान।

आपको अपनी चाबी भी लगाते रहना चाहिये। पता नहीं ऊपर वाला कब अपनी चाबी लगा दे । कहीं ऐसा न हो कि भगवान अपनी भाग्यवाली चाबी लगा रहा हो और हम अपनी परिश्रम वाली चाबी न लगा पायें और ताला खुलने से रह जाये।

रवि कांत

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🌷जय माता लक्ष्मी 🌷

एक बूढ़ा ब्राह्मण था वह रोज पीपल को जल से सींचता था । पीपल में से रोज एक लड़की निकलती और कहती पिताजी मैं आपके साथ जाऊँगी। यह सुनते-सुनते बूढ़ा दिन ब दिन कमजोर होने लगा तो बुढ़िया ने पूछा की क्या बात है? बूढ़ा बोला कि पीपल से एक लड़की निकलती है और कहती है कि वह भी मेरे साथ चलेगी। बुढ़िया बोली कि कल ले आना उस लड़की को जहाँ छ: लड़कियाँ पहले से ही हमारे घर में है वहाँ सातवीं लड़की और सही।
अगले दिन बूढ़ा उस लड़की को घर ले आया। घर लाने के बाद बूढ़ा आटा माँगने गया तो उसे पहले दिनों की अपेक्षा आज ज्यादा आटा मिला था। जब बुढ़िया वह आटा छानने लगी तो लड़की ने कहा कि लाओ माँ, मैं छान देती हूँ। जब वह आटा छानने बैठी तो परात भर गई। उसके बाद माँ खाना बनाने जाने लगी तो लड़की बोली कि आज रसोई में मैं जाऊँगी तो बुढ़िया बोली कि ना, तेरे हाथ जल जाएँगे लेकिन लड़की नहीं मानी और वह रसोई में खाना बनाने गई तो उसने तरह-तरह के छत्तीसों व्यंजन बना डाले और आज सभी ने भरपेट खाना खाया। इससे पहले वह आधा पेट भूखा ही रहते थे।
रात हुई तो बुढ़िया का भाई आया और कहने लगा कि दीदी मैं तो खाना खाऊँगा। बुढ़िया परेशान हो गई कि अब खाना कहाँ से लाएगी। लड़की ने पूछा की माँ क्या बात है? उसने कहा कि तेरा मामा आया है और रोटी खाएगा लेकिन रोटी तो सबने खा ली है अब उसके लिए कहाँ से लाऊँगी। लड़की बोली कि मैं बना दूँगी और वह रसोई में गई और मामा के लिए छत्तीसों व्यंजन बना दिए। मामा ने भरपेट खाया और कहा भी कि ऎसा खाना इससे पहले उसने कभी नहीं खाया है। बुढ़िया ने कहा कि भाई तेरी पावनी भाँजी है उसी ने बनाया है।
शाम हुई तो लड़की बोली कि माँ चौका लगा के चौके का दीया जला देना, कोठे में मैं सोऊँगी। बुढ़िया बोली कि ना बेटी तू डर जाएगी लेकिन वह बोली कि ना मैं ना डरुँगी, मैं अंदर कोठे में ही सोऊँगी। वह कोठे में ही जाकर सो गई। आधी रात को लड़की उठी और चारों ओर आँख मारी तो धन ही धन हो गया। वह बाहर जाने लगी तो एक बूढ़ा ब्राह्मण सो रहा था। उसने देखा तो कहा कि बेटी तू कहाँ चली? लड़की बोली कि मैं तो दरिद्रता दूर करने आई थी। अगर तुम्हें दूर करवानी है तो करवा लो। उसने बूढे के घर में भी आँख से देखा तो चारों ओर धन ही धन हो गया।
सुबह सवेरे सब उठे तो लड़की को ना पाकर उसे ढूंढने लगे कि पावनी बेटी कहां चली गई। बूढ़ा ब्राह्मण बोला कि वह तो लक्ष्मी माता थी जो तुम्हारे साथ मेरी दरिद्रता भी दूर कर गई। हे लक्ष्मी माता !
बोलो 👉🌹जय माँ लक्ष्मी🌹

आशुतोष सुक्ला

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एक महिला की आदत थी कि वह हर रोज रात में सोने से पहले अपनी दिन भर की खुशियों को एक काग़ज़ पर लिख लिया करती थीं।

एक रात उसने लिखा…
मैं खुश हूं कि मेरा पति पूरी रात ज़ोरदार खर्राटे लेता है क्योंकि वह ज़िंदा है और मेरे पास है ना…भले ही उसकी खर्राटो की आवाज़ मुझें सोने नहीं देते…ये भगवान का शुक्र है…

मैं खुश हूं कि मेरा बेटा सुबह सवेरे इस बात पर झगड़ता है कि रात भर मच्छर-खटमल सोने नहीं देते यानी वह रात घर पर गुज़रता है आवारागर्दी नहीं करता…इस पर भी भगवान का शुक्र है…

मैं खुश हूं कि हर महीना बिजली,गैस, पेट्रोल, पानी वगैरह का अच्छा खासा टैक्स देना पड़ता है ,यानी ये सब चीजें मेरे पास,मेरे इस्तेमाल में हैं ना… अगर यह ना होती तो ज़िन्दगी कितनी मुश्किल होती…?इस पर भी भगवान का शुक्र है…..

मैं खुश हूं कि दिन ख़त्म होने तक मेरा थकान से बुरा हाल हो जाता है….यानी मेरे अंदर दिनभर सख़्त काम करने की ताक़त और हिम्मत सिर्फ ऊपरवाले के आशीर्वाद से है…

मैं खुश हूं कि हर रोज अपने घर का झाड़ू पोछा करना पड़ता है और दरवाज़े -खिड़कियों को साफ करना पड़ता है शुक्र है मेरे पास घर तो है ना… जिनके पास छत नहीं उनका क्या हाल होता होगा…?इस पर भी भगवान का शुक्र है…

मैं खुश हूं कि कभी कभार थोड़ी बीमार हो जाती हूँ यानी कि मैं ज़्यादातर सेहतमंद ही रहती हूं।इसके लिए भी भगवान का शुक्र है..

मैं खुश हूं कि हर साल दिवाली पर उपहार देने में पर्स ख़ाली हो जाता है यानी मेरे पास चाहने वाले मेरे अज़ीज़ रिश्तेदार ,दोस्त हैं जिन्हें उपहार दे सकूं…अगर ये ना हों तो ज़िन्दगी कितनी बे रौनक हो…?इस पर भी भगवान का शुक्र है…..

मैं खुश हूं कि हर रोज अलार्म की आवाज़ पर उठ जाती हूँ यानी मुझे हर रोज़ एक नई सुबह देखना नसीब होती है…ज़ाहिर है ये भी भगवान का ही करम है…

जीने के इस फॉर्मूले पर अमल करते हुए अपनी भी और अपने से जुड़े सभी लोगों की ज़िंदगी संतोषपूर्ण बनानी चाहिए…..छोटी-छोटी परेशानियों में खुशियों की तलाश..
खुश रहने का अजीब अंदाज़…औऱ हर हाल में खुश रहने की कला ही जीवन है

आशुतोष शुक्ल

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🌷जय माता लक्ष्मी 🌷

एक बूढ़ा ब्राह्मण था वह रोज पीपल को जल से सींचता था । पीपल में से रोज एक लड़की निकलती और कहती पिताजी मैं आपके साथ जाऊँगी। यह सुनते-सुनते बूढ़ा दिन ब दिन कमजोर होने लगा तो बुढ़िया ने पूछा की क्या बात है? बूढ़ा बोला कि पीपल से एक लड़की निकलती है और कहती है कि वह भी मेरे साथ चलेगी। बुढ़िया बोली कि कल ले आना उस लड़की को जहाँ छ: लड़कियाँ पहले से ही हमारे घर में है वहाँ सातवीं लड़की और सही।
अगले दिन बूढ़ा उस लड़की को घर ले आया। घर लाने के बाद बूढ़ा आटा माँगने गया तो उसे पहले दिनों की अपेक्षा आज ज्यादा आटा मिला था। जब बुढ़िया वह आटा छानने लगी तो लड़की ने कहा कि लाओ माँ, मैं छान देती हूँ। जब वह आटा छानने बैठी तो परात भर गई। उसके बाद माँ खाना बनाने जाने लगी तो लड़की बोली कि आज रसोई में मैं जाऊँगी तो बुढ़िया बोली कि ना, तेरे हाथ जल जाएँगे लेकिन लड़की नहीं मानी और वह रसोई में खाना बनाने गई तो उसने तरह-तरह के छत्तीसों व्यंजन बना डाले और आज सभी ने भरपेट खाना खाया। इससे पहले वह आधा पेट भूखा ही रहते थे।
रात हुई तो बुढ़िया का भाई आया और कहने लगा कि दीदी मैं तो खाना खाऊँगा। बुढ़िया परेशान हो गई कि अब खाना कहाँ से लाएगी। लड़की ने पूछा की माँ क्या बात है? उसने कहा कि तेरा मामा आया है और रोटी खाएगा लेकिन रोटी तो सबने खा ली है अब उसके लिए कहाँ से लाऊँगी। लड़की बोली कि मैं बना दूँगी और वह रसोई में गई और मामा के लिए छत्तीसों व्यंजन बना दिए। मामा ने भरपेट खाया और कहा भी कि ऎसा खाना इससे पहले उसने कभी नहीं खाया है। बुढ़िया ने कहा कि भाई तेरी पावनी भाँजी है उसी ने बनाया है।
शाम हुई तो लड़की बोली कि माँ चौका लगा के चौके का दीया जला देना, कोठे में मैं सोऊँगी। बुढ़िया बोली कि ना बेटी तू डर जाएगी लेकिन वह बोली कि ना मैं ना डरुँगी, मैं अंदर कोठे में ही सोऊँगी। वह कोठे में ही जाकर सो गई। आधी रात को लड़की उठी और चारों ओर आँख मारी तो धन ही धन हो गया। वह बाहर जाने लगी तो एक बूढ़ा ब्राह्मण सो रहा था। उसने देखा तो कहा कि बेटी तू कहाँ चली? लड़की बोली कि मैं तो दरिद्रता दूर करने आई थी। अगर तुम्हें दूर करवानी है तो करवा लो। उसने बूढे के घर में भी आँख से देखा तो चारों ओर धन ही धन हो गया।
सुबह सवेरे सब उठे तो लड़की को ना पाकर उसे ढूंढने लगे कि पावनी बेटी कहां चली गई। बूढ़ा ब्राह्मण बोला कि वह तो लक्ष्मी माता थी जो तुम्हारे साथ मेरी दरिद्रता भी दूर कर गई। हे लक्ष्मी माता !
बोलो 👉🌹जय माँ लक्ष्मी🌹

आशुतोष सुक्ला

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(((( हरि मैं जैसो तैसो तेरौ ))))
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दक्षिण भारत में गोदावरी के पवित्र किनारे पर कनकावती नगरी थी। वहाँ रामदास नाम के एक भगवद्भक्त रहते थे। वे जाति के चमार थे।
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घर में मूली नाम की पतिव्रता पत्‍नी थी और एक सुशील बालक था।
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स्‍त्री-पुरुष मिलकर जूते बनाते थे। रामदास उन्‍हें बाजार में बेच आते। इस प्रकार अपनी मजदूरी के पवित्र धन से वे जीवन-निर्वाह करते थे।
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तीन प्राणियों का पेट भरने पर जो पैसे बचते, वे अतिथि-अभ्‍यागतों की सेवा में लग जाते या दीन-दु:खियों को बाँट दिये जाते।
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संग्रह करना इन भक्त दम्‍पत्ति ने सीखा ही नहीं था। कीर्तन-भजन रामदास घर में कीर्तन किया करते थे।
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जूता बनाते-बनाते भी वे भगवन्नाम लिया करते थे। कहीं कथा-कीर्तन का पास-पड़ौस में समाचार मिलता तो वहाँ गये बिना नहीं रहते थे।
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उन्‍होंने कीर्तन में सुना था- “हरि मैं जैसो तैसो तेरौ।” यह ध्‍वनि उनके हृदय में बस गयी थी। इसे बार-बार गाते हुए वे प्रेम-विह्वल हो जाया करते थे।
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अपने को भगवान का दास समझकर वे सदा आनन्‍दमग्‍न रहते थे।
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एक बार एक चोर को चोरी के माल के साथ शालग्राम जी की एक सुन्‍दर मूर्ति मिली।
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उसे उस मूर्ति से कोई काम तो था नहीं। उसने सोचा- “मेरे जूते टूट गये हैं, इस पत्‍थर के बदले एक जोड़ी जूते मिल जायँ तो ठीक रहे।”
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वह रामदास के घर आया। पत्‍थर रामदास को देकर कहने लगा- “देखो, तुम्‍हारे औजार घिसने-योग्‍य कितना सुन्‍दर पत्‍थर लाया हूँ। मुझे इसके बदले एक जोड़ी जूते दे दो।”
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रामदास उस समय अपनी धुन में थे। उन्‍हें ब्रह्मज्ञान पूरा नहीं था। ग्राहक आया देख अभ्‍यासवश एक जोड़ी जूता उठाकर उसके सामने रख दिया।
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चोर जूता पहनकर चला गया। मूल्‍य माँगने की याद ही रामदास को नहीं आयी। इस प्रकार शालग्राम जी अपने भक्त के घर पहुँच गये।
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रामदास अब उन पर औजार घिसने लगे।
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एक दिन उधर से एक ब्राह्मण देवता निकले। उन्‍होंने देखा कि यह चमार दोनों पैरों के बीच शालग्राम जी की सुन्‍दर मूर्ति को दबाकर उस पर औजार घिर रहा है।
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ब्राह्मण को दु:ख हुआ यह देखकर। वे आकर कहने लगे- “भाई ! मैं तुमसे एक वस्‍तु माँगने आया हूँ। ब्राह्मण की इच्‍छा पूरी करने से तुम्‍हें पुण्‍य होगा।
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तुम्‍हारा यह पत्‍थर मुझे बहुत सुन्‍दर लगता है। तुम इसको मुझे दे दो। इसे न पाने से मुझे बड़ा दु:ख होगा।
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चाहो तो इसके बदले दस-पाँच रुपये मैं तुम्‍हें दे सकता हूँ।
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रामदास ने कहा- “पण्डित जी ! यह पत्‍थर है तो मेरे बड़े काम का है। ऐसा चिकना पत्‍थर मुझे आज तक नहीं मिला है; पर आप इसको न पाने से दु:खी होंगे, अत: आप ही ले जाइये।
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मुझे इसका मूल्‍य नहीं चाहिये। आपकी कृपा से परिश्रम करके मेरा और मेरे स्‍त्री-पुत्र का पेट भरे, इतने पैसे मैं कमा लेता हूँ। प्रभु ने मुझे जो दिया है, मेरे लिये उतना पर्याप्‍त है।”
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पण्डित जी मूर्ति पाकर बड़े प्रसन्‍न हुए। घर आकर उन्‍होंने स्‍नान किया। पंचामृत से शालग्राम जी को स्‍नान कराया।
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वेदमंत्रों का पाठ करते हुए षोडशोपचार से पूजन किया भगवान का। इसी प्रकार वे नित्‍य पूजा करने लगे।
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वे विद्वान थे, विधिपूर्वक पूजा भी करते थे; किंतु उनके हृदय में लोभ, ईर्ष्‍या, अभिमान, भोगवासना आदि दुर्गुण भरे थे।
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वे भगवान से नाना प्रकार की याचना किया करते थे।
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रामदास अशिक्षित था, पर उसका हृदय पवित्र था। उसमें न भोगवासना थी, न लोभ था। वह रूखी-सूखी खाकर संतुष्‍ट था।
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शुद्ध हो या अशुद्ध, पर सात्त्विक श्रद्धा से विश्‍वासपूर्वक वह भगवान का नाम लेता था। भगवान शालग्राम अपनी इच्‍छा से ही उसके घर गये थे।
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जब वह भजन गाता हुआ भगवान की मूर्ति पर औजार घिसने के लिये जल छोड़ता, तब प्रभु को लगता कि कोई भक्त पुरुष-सूक्‍त से मुझे स्‍नान करा रहा है।
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जब वह दोनों पैरों में दबाकर उस मूर्ति पर रखकर चमड़ा काटता, तब भावमय सर्वेश्‍वर को लगता कि उनके अंगों पर चन्‍दन-कस्‍तूरी का लेप किया जा रहा है।
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रामदास नहीं जानता था कि जिसे वह साधारण पत्‍थर मानता है, वे शालग्राम जी हैं, किंतु वह अपने को सब प्रकार से भगवान का दास मानता था।
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इसी से उसकी सब क्रियाओं को सर्वात्‍मा भगवान अपनी पूजा मानकर स्‍वीकार करते थे।
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ब्राह्मण का स्‍वप्‍न इधर ये पण्डित जी बड़ी विधि से पूजा करते थे, पर वे भगवान के सेवक नहीं थे।
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वे धन-सम्‍पत्ति के दास थे। वे धन-सम्‍पत्ति की प्राप्ति के लिये भगवान को साधन बनाना चाहते थे।
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भगवान को यह कैसे रुचता। वे तो नि:स्‍वार्थ भक्ति के वश हैं।
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भगवान ने ब्राह्मण को स्‍वप्‍न दिया- “पण्डित जी ! तुम्‍हारी यह आडम्‍बरपूर्ण पूजा मुझे तनिक भी नहीं रुचती। मैं तो रामदास चमार के निष्‍कपट प्रेम से ही प्रसन्‍न हूँ।
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तुमने मेरी पूजा की है। मेरी पूजा कभी व्‍यर्थ नहीं जाती। अत: तुम्‍हें धन और यश मिलेगा। पर मुझे तुम उस चमार के घर प्रात: काल ही पहुँचा दो।
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भगवान की आज्ञा पाकर ब्राह्मण डर गया। दूसरे दिन सबेरे ही स्‍नानादि करके शालग्राम जी को लेकर वह रामदास के घर पहुँचा।
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उसने कहा- “रामदास ! तुम धन्‍य हो। तुम्‍हारे माता-पिता धन्‍य हैं। तुम बड़े पुण्‍यात्‍मा हो। भगवान को तुमने वश में कर लिया है।
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ये भगवान शालग्राम हैं। अब तुम इनकी पूजा करना। मैं तो पापी हूँ, इसलिये मेरी पूजा भगवान को पसंद नहीं आयी।
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भाई ! तुम्‍हारा जीवन पवित्र हो गया। तुम तो भवसागर से पार हो चुके।
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नित्य पूजा-पाठ रामदास ने ब्राह्मण के चरणों में प्रणाम किया। उनका हृदय भगवान की कृपा का अनुभव करके आनन्‍द में भर गया।
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वे सोचने लगे- “मैं दीन, अज्ञानी, नीच जाति का पापी प्राणी हूँ। न मुझमें शौच है, न सदाचार।
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रात-दिन चमड़ा छीलना मेरा काम है। मुझ-जैसे अधम पर भी प्रभु ने इतनी कृपा की।
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प्रभो ! तुम सचमुच ही पतितपावन हो।” भगवान को एक छोटे सिंहासन पर विराजमान कर दिया उन्‍होंने।
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अब वे नित्‍य पूजा करने लगे। धंधा-रोजगार प्रेम की बाढ़ में बह गया। वे दिनभर, रातभर कीर्तन करते।
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कभी हँसते, कभी रोते, कभी गान करते, कभी नाचने लगते, कभी गुमसुम बैठे रहते।
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भगवान के दर्शन की इच्‍छा से कातर कण्‍ठ से पुकार करते- “दयाधाम ! जब एक ब्राह्मण के घर को छोड़कर आप इस नीच के यहाँ आये…
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तब मेरे नेत्रों को अपनी अदभुत रूपमाधुरी दिखाकर कृतार्थ करो, नाथ ! मेरे प्राण तुम्‍हारे बिना तड़प रहे हैं।”
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रामदास की व्‍यथित पुकार सुनकर भगवान एक ब्राह्मण का रूप धारणकर उनके यहाँ पधारे।
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रामदास उनके चरणों पर गिर गये और गिड़-गिड़ाकर प्रार्थना करने लगे कि- “भगवान का दर्शन हो, ऐसा उपाय बताइये।”
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भगवान ने कहा- “तुम इस दुराशा को छोड़ दो। बड़े-बड़े योगी, मुनि जन्‍म-जन्‍म तप, ध्‍यान आदि करके भी कदाचित ही भगवान का दर्शन पाते हैं।”
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रामदास का विश्‍वास डिगने वाला नहीं था। वे बोले- “प्रभो ! आप ठीक कहते हैं। मैं नीच हूँ, पापी हूँ। मेरे पाप एवं नीचता की ओर देखकर तो भगवान मुझे दर्शन कदापि नहीं दे सकते…
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परंतु मेरे वे स्‍वामी दीनबन्‍धु हैं, दया के सागर हैं। अवश्‍य वे मुझे दर्शन देंगे। अवश्‍य वे इस अधम को अपनायेंगे।”
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अब भगवान से नहीं रहा गया। भक्त की आतुरता एवं विश्‍वास देखकर वे अपने चतुर्भुज स्‍वरूप से प्रकट हो गये।
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प्रभु ने कहा- “रामदास ! यह ठीक है कि जाति नहीं बदल सकती; किंतु मेरी भक्ति से भक्त का पद अवश्‍य बदल जाता है।
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मेरा भक्त ब्राह्मणों का, देवताओं का भी आदरणीय हो जाता है। तुम मेरे दिव्‍य रूप के दर्शन करो।” रामदास भगवान का दर्शन करके कृतार्थ हो गया।

गौरव गुप्ता

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हनुमान जी से धोखा!

करीब 95 साल पहले की बात है। राजस्थान के अलवर इलाके में एक गडरिया भेड़ चराते हुए जंगल में चला गया। अचानक किसी ने उसे कहा कि यहाँ बकरियां चराना मना है। बातों बातों में पता चला कि वो इलाके का तहसीलदार था। दोनों में बात होने लगी। पता चला कि बहुत कोशिश के बाद भी तहसीलदार को बच्चे नहीं होते। गड़रिये ने उनसे कहा कि आप दौसा के बालाजी हनुमानजी के मंदिर जाकर बेटा मांग लो, मिल जायेगा।

न जाने क्यों तहसीलदार ने उस गड़रिए की बात मान ली। उन्होंने हनुमान जी से कहा कि अगर मेरा बेटा हो जायेगा तो मैं उसे यहीं इसी मंदिर में सेवा के लिए छोड़ जाऊंगा। इस बात का ज़िक्र उन्होंने अपनी पत्नी से भी नहीं किया । मन्नत मांगने के एक साल के अंदर उन्हें बेटा नसीब हो गया लेकिन बाप का प्यार अब आड़े आ गया। उन्होंने हनुमानजी से कहा कि मैं अपना वचन पूरा नहीं कर सकता। आपका ये ऋण मुझ पर रहेगा।

वो बेटा बड़ा होने लगा। शिक्षा की उम्र तक आया तो पिताजी ने उसे हरिद्वार के एक बड़े विद्वान प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी के यहाँ पढ़ने भेज दिया। लड़के में अद्धभुत क्षमता थी उसे रामायण कंठस्थ थी। बिना पढ़े वो रामायण का पाठ करने लगा। उसकी ख्याति दूर दूर तक फ़ैल गयी और वो साधु सन्यासियों और बड़े बड़े उद्योगपतियों के घर रामायण पाठ करने लगा। जवान होने पर उसकी शादी भी हो गयी। एक दिन देश के बड़े उद्योगपति जुगल किशोर बिरला ने अखबार में विज्ञापन दिया कि दिल्ली के लक्ष्मी नारायण मंदिर यानी बिरला मंदिर में हनुमान जी को रामायण पढ़कर सुनानी है। उसके लिए उस व्यक्ति का टेस्ट खुद बिरला जी लेंगे। तय तारीख पर नारायण स्वामी अपनी पत्नी के साथ बिरला निवास पहुंच गए! बहुत से और लोग भी बिरला जी को रामायण पढ़कर सुना रहे थे। जब नारायण बाबा का नंबर आया तो उन्होंने बिना रामायण हाथ में लिए पाठ शुरू दिया। बिरला जी के अनुग्रह पर नारायण ने हारमोनियम पर गाकर भी रामायण सुना दी।

बिरला जी भाव विभोर हो गए। नौकरी पक्की हो गयी। सस्ते ज़माने में 350 रुपए की पगार, रहने के लिए बिरला मंदिर में एक कमरा और इस्तेमाल के लिए एक कार भी नारायण बाबा को दे दी गयी। जीवन बेहद सुकून और आराम का हो गया। रूपया पैसा, शौहरत और देश के सबसे बड़े उद्योगपति से नज़दीकियां।

बिरला जी के गुरु चमत्कारी संत नीम करोली बाबा जैसे ही वृन्दावन से दिल्ली आये तो बिरला जी ने उन्हें प्रसन्न करने के लिए नारायण बाबा का एक रामायण पाठ रख दिया। बिरला जी ने नीम करोली बाबा से कहा कि एक लड़का है जो रामायण गाकर सुनाता है। नीम करोली बाबा ने कहा कि मुझे भी उस लड़के से मिलना है! जैसे ही नारायण बाबा कमरे में गये तो नीम करोली बाबा ने कहा “तेरे बाप ने हनुमान जी से धोखा किया है।” नारायण बाबा अपने पिता की खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे लेकिन तय हुआ कि अगर नीम करोली बाबा की बात सच्ची है तो वो उन्हें गुरु रूप में स्वीकार कर लेंगे। तभी के तभी नारायण बाबा अलवर रवाना हो गए और अपने पिता से कहा कि एक संत आपको हनुमान जी का ऋणी बता रहा है और आपको धोखेबाज भी। नारायण बाबा के पिता ने कहा की वो संत हनुमान जी ही हो सकते हैं क्योंकि ये बात सिर्फ उन्हें ही पता है ।पिता की बात सुनकर नारायण बाबा वापस चले आये और नीम करोली बाबा को अपना गुरु स्वीकार कर लिया।

नीम करोली बाबा ने आदेश दिया कि नारायण तेरा जनम हनुमान जी की सेवा के लिए हुआ है इसीलिए छोड़ लाला की नौकरी। गुरु आदेश मिलते ही नारायण बाबा ने नौकरी छोड़ दी और दिल्ली के मेहरौली इलाके में एक जंगल में एक गुप्त मंदिर में आश्रय लिया। बिरला मंदिर से निकल कर सांप, भूतों और एक अनजाने जंगल में हनुमान जी की सेवा शुरू कर दी। नीम करोली बाबा ने आदेश दिया कि किसी से एक रूपया भी नहीं लेना है और हर साल नवरात्रे में लोगों का भंडारा करना है।

बड़ी अजीबोगरीब बात है कि एक पैसा भी किसी से नहीं लेना और हर साल हज़ारों लोगों को खाना भी खिलाना है लेकिन गुरु ने जो कह दिया वो पत्थर पर लकीर है। बिना सोच के उन्होंने अपना काम शुरू कर दिया! नीम करोली बाबा ने बिरला से कहकर नारायण बाबा की पत्नी को घर चलाने के पैसे हर महीने दिलवा दिए लेकिन नारायण बाबा को पैसे से दूर रखा।

1969 से आज तक इस मंदिर से हर साल दो बार नवरात्रे में हज़ारों लोग भंडारा खाकर जाते हैं। किसी को आज तक इस मंदिर में पैसे चढ़ाते नहीं देखा गया लेकिन हाँ प्रसाद पाते सबको देखा है। नारायण बाबा आज 94 साल के हो गए हैं लेकिन गुरु सेवा में आज भी लगे हैं और चाहते हैं कि कम ही लोग उनसे मिलने आये।

नेहा रावत

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🌹कर्म और भाग्य🌹
बहुत ही सुंदर कथा जिसे पढ़कर भावुक हो जाएंगे

एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों की सभा बुलाकर प्रश्न किया:- “मेरी जन्म पत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था मैं राजा बना, किन्तु उसी घड़ी मुहूर्त में अनेक जातकों ने जन्म लिया होगा जो राजा नहीं बन सके क्यों ..? इसका क्या कारण है ? राजा के इस प्रश्न से सब निरुत्तर हो गये!!!”

अचानक एक वृद्ध खड़े हुये बोले:- “महाराज आपको यहाँ से कुछ दूर घने जंगल में एक महात्मा मिलेंगे उनसे आपको उत्तर मिल सकता है।”

राजा ने घोर जंगल में जाकर देखा कि एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठ कर अंगारे ( गरमा गरम कोयला ) खाने में व्यस्त हैं। राजा ने महात्मा से जैसे ही प्रश्न पूछा महात्मा ने क्रोधित होकर कहा:- “तेरे प्रश्न का उत्तर आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं ,वे दे सकते हैं ।”

राजा की जिज्ञासा और बढ़ गयी, पहाड़ी मार्ग पार कर बड़ी कठिनाइयों से राजा दूसरे महात्मा के पास पहुंचा।

राजा हक्का बक्का रह गया देख कर। दृश्य ही कुछ ऐसा था, वे महात्मा अपना ही माँस चिमटे से नोच नोच कर खा रहे थे। राजा को महात्मा ने भी डांटते हुए कहा:- ”मैं भूख से बेचैन हूँ मेरे पास समय नहीं है…

आगे आदिवासी गाँव में एक बालक जन्म लेने वाला है ,जो कुछ ही देर तक जिन्दा रहेगा..वह बालक तेरे प्रश्न का उत्तर दे सकता है.. राजा बड़ा बेचैन हुआ, बड़ी अजब पहेली बन गया मेरा प्रश्न.. उत्सुकता प्रबल थी..

राजा पुनः कठिन मार्ग पार कर उस गाँव में पहुंचा.. गाँव में उस दंपति के घर पहुंचकर सारी बात कही..जैसे ही बच्चा पैदा हुआ दम्पत्ति ने नाल सहित बालक राजा के सम्मुख उपस्थित किया..

राजा को देखते ही बालक हँसते हुए बोलने लगा .. राजन् ! मेरे पास भी समय नहीं है। किन्तु अपना उत्तर सुन लो:- “तुम,मैं और दोनों महात्मा सात जन्म पहले चारों भाई राजकुमार थे। एक बार शिकार खेलते खेलते हम जंगल में तीन दिन तक भूखे प्यासे भटकते रहे। अचानक हम चारों भाइयों को आटे की एक पोटली मिली। हमने उसकी चार बाटी सेंकी.. अपनी अपनी बाटी लेकर खाने बैठे ही थे कि भूख प्यास से तड़पते हुए एक महात्मा वहां आ गये.. अंगारे खाने वाले भइया से उन्होंने कहा:- “बेटा ,मैं दस दिन से भूखा हूँ ,अपनी बाटी में से मुझे भी कुछ दे दो , मुझ पर दया करो जिससे मेरा भी जीवन बच जाय। इतना सुनते ही भइया गुस्से से भड़क उठे और बोले.. तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या खाऊंगा ? आग ..

चलो भागो यहां से। वे महात्मा फिर मांस खाने वाले भइया के निकट आये उनसे भी अपनी बात कही..

किन्तु उन भईया ने भी महात्मा से गुस्से में आकर कहा कि :- “बड़ी मुश्किल से प्राप्त ये बाटी तुम्हें दे दूंगा तो क्या मैं अपना मांस नोचकर खाऊंगा ?

भूख से लाचार वे महात्मा मेरे पास भी आये..मुझसे भी बाटी मांगी… किन्तु मैंने भी भूख में धैर्य खोकर कह दिया कि चलो आगे बढ़ो मैं क्या भूखा मरुँ …?

अंतिम आशा लिये वो महात्मा , हे राजन !.. आपके पास भी आये,दया की याचना की.. दया करते हुये ख़ुशी से आपने अपनी बाटी में से आधी बाटी आदर सहित उन महात्मा को दे दी।बाटी पाकर महात्मा बड़े खुश हुए और बोले:- “तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा

बालक ने कहा:- “इस प्रकार उस घटना के आधार पर हम अपना अपना भोग, भोग रहे हैं…
और वो बालक मर गया

धरती पर एक समय में अनेकों फल-फूल खिलते हैं,किन्तु सबके रूप, गुण,आकार-प्रकार,स्वाद भिन्न होते हैं ..।
राजा ने माना कि शास्त्र भी तीन प्रकार के है। ज्योतिष शास्त्र, कर्तव्य शास्त्र और व्यवहार शास्त्र।

जातक सब अपना किया, दिया, लिया ही पाते हैं। यही है जीवन!!!
“गलत पासवर्ड से एक छोटा सा मोबाइल नही खुलता..
तो सोचिये गलत कर्मो से सच खंड के दरवाजे कैसे खुलेंगे!!!
अभी भी वक्त है अपने सतगुरु के दिए पासवर्ड ( पांच नामों का सुमिरन) का प्रयोग करें और सच खंड के दरवाजे खोलने के काबिल बने।

सुनील कुमार