Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

चार पेड़

एक बार की बात है, एक भूमि में बहुत दूर नहीं, एक छोटी सी पहाड़ी की चोटी पर चार पेड़ उगने लगे।

पेड़ों में से तीन बहुत स्वार्थी, घमंडी और घमंडी पेड़ हैं जो हमेशा शेखी बघारते हैं कि वे कितने बड़े और ऊंचे हो जाएंगे, एक दूसरे को चिढ़ाते हैं कि वे हमेशा कैसे रहेंगे।

चौथा वृक्ष सर्व सुखी और सन्तुष्ट है, केवल एक वृक्ष होने के लिए।

जैसे-जैसे समय बीतता है तीन अभिमानी और स्वार्थी पेड़ अपने सभी दिन उतने ही लंबे और प्रभावशाली बढ़ने में बिताते हैं, जितने वे हर दिन शेखी बघारते हैं कि वे कितने अद्भुत होंगे

चौथा पेड़ सुनता है, लेकिन खुश और संतुष्ट है, सिर्फ एक पेड़ होने के लिए।

कई साल बीत जाते हैं और तीन पेड़ सभी प्रभावशाली दिखते हैं और सीधे और ऊंचे हो गए हैं, लेकिन वे और अधिक अहंकारी, स्वार्थी और गर्वित हो गए हैं, लगातार शेखी बघारते और चिढ़ाते हैं कि वे दूसरे से बेहतर कैसे हैं और अब वे हमेशा के लिए कैसे जीवित रहेंगे।

चौथा पेड़ सबसे अच्छा दिखने वाला या सबसे ऊँचा नहीं है, लेकिन सभी खुश और संतुष्ट हैं, सिर्फ एक पेड़ होने के लिए।

लकड़हारा साथ आता है और तीन अभिमानी, अभिमानी पेड़ों को जमीन पर गिरा देता है। पहला पेड़ सिटी गेट्स में बनाया गया है, दूसरा पेड़ एक महान युद्धपोत और तीसरा पेड़ पूजा के महान स्थान में है।

तीनों पेड़ों में से प्रत्येक समाज में अपनी नई स्थिति पर गर्व और खुश है, यह दावा करते हुए कि वे दूसरे से बेहतर हैं और वे वास्तव में हमेशा के लिए कैसे रहेंगे।

चौथा वृक्ष सर्व सुखी और सन्तुष्ट है, केवल एक वृक्ष होने के लिए।

एक महान सेना हमला करने के लिए आती है, शहर के द्वार नष्ट हो जाते हैं, महान युद्धपोत बंदरगाह में डूब जाता है और पूजा का महान स्थान जमीन पर जल जाता है।

केवल चौथा पेड़ पहाड़ी पर उगता है, सभी खुश और संतुष्ट, सिर्फ एक पेड़ होने के लिए।

चौथा पेड़ जानता है कि वह हमेशा के लिए नहीं रह सकता। कि वह दिन अवश्य आए, जब चौथा वृक्ष भी टल जाएगा,

लेकिन इससे पहले कि वह उस पहाड़ी पर उगने वाले चार छोटे पेड़ों को बीज देता है, सभी खुश और संतुष्ट, बस एक पेड़ बनने के लिए!

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🔥 લઘુકથા 🔥 🌷 *ગુરુ* 🌷

🔅 માણેકલાલ પટેલ 🔅

કોઈએ હરિને કહેલું કે જેને ગુરુ ન હોય એને નુગરો કહેવામાં આવે છે.
આ વખતે તો એણે નક્કી જ કરેલું કે ગુરુ બનાવી જ લેવા છે.
એ સવારથી જ ગુરુની શોધમાં નીકળ્યો.
એના વિસ્તારમાં પાંચ આશ્રમો હતા.
પહેલા અને બીજા આશ્રમમાં જગ્યા જ નહોતી.ખૂબ ભીડ હતી.તપાસ કરી તો જાણવા મળ્યું કે ત્યાં જડીબુટ્ટીઓ અને સાબુ- અગરબત્તી એવું બધું વેચાતું હતું જે ગુરૂ પ્રસાદીરૂપે ખરીદવા માટે પડાપડી થઈ રહી હતી.ત્રીજા આશ્રમમાં માયા છોડવા માટેનું પ્રવચન ચાલતું હતું અને જેને દિક્ષા લેવી હોય તેમનાં નામ એ વખતે નિશ્ચિત રકમ વહીવટી સરળતાના નામે લઈ નોંધવામાં આવતાં હતાં.દિક્ષા રાત્રે આપવાની હતી.એ ચોથા આશ્રમે ગયો તો ત્યાં આગ્રહ કરી કરીને જમાડવામાં આવતા હતા.એણે પણ ડિશ લીધી.બાજુમાં વાતચીત થતી હતી:- “આવી જગ્યાએ મફત તો જમાય નહિ ને ? બસો કે પાંચસો લખાવી દઈશું. ” હરિએ ખાલી ડિશ એમ જ મૂકી દીધી.
એ પાંચમા આશ્રમે પહોંચ્યો ત્યારે ત્યાં લાઈન લાગેલી એણે જોઈ .પૂછપરછ કરતાં ખબર પડી કે
ગુરુ મહારાજના ચરણસ્પર્શ કરવા માટેની એ લાંબી લાઈન હતી.
એ નિરાશ થઈ ઘરે પાછો આવ્યો.
બપોરના બે વાગવા આવ્યા હતા.
એનાં ઘરડાં મા- બાપ, પત્ની અને બે બાળકો એની જ રાહ જોઈ રહ્યાં હતાં.એનાં બાએ પૂછ્યું:-” ભૈ ! ભૂખ નથી લાગી ?”
” તમે તો જમી લીધું ને ?”
” તારા વિના કોળિયો મોંઢે કેમ ઉતરે ?” એના બાપુજીએ કહ્યું ત્યારે એનાં બેય બાળકો એને વીંટળાઈ વળ્યાં.
ખાતાં ખાતાં એણે એના બાપુજીને પૂછ્યું:- ” બાપુજી ! તમે ગુરુ કર્યા છે ?”
એમણે કહ્યું:- ” યોગ્ય વ્યક્તિને ગુરુ બનાવવા જોઈએ.મારી યુવાનીમાં હુંયે બે- ત્રણ જગ્યાએ ગયેલો.પણ, ક્યાંય મારું મન માનેલું નહિ.”
” પણ, ગુરુ વિનાના તો નુગરા ન કહેવાય. “
” તારી વાત સાચી છે.” એમણે કહ્યું:-” પછી તો મારાં મા- બાપને જ ગુરુ માની લીધેલાં એટલે બીજે ગુરુ કરવાની જરૂર જ ન પડી.”

  • માણેકલાલ પટેલ *
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असली ज्ञान
एक युवा संन्यासी एक वृद्ध संन्यासी के आश्रम में
ठहरा हुआ था। लेकिन दो-चार दिन में ही उसे लगा कि वह
वृद्ध अज्ञानी है। वह आश्रम छोड़ने की सोच ही रहा था
कि उसी दिन एक और संन्यासी का उस आश्रम में
आगमन हुआ।
रात को सब आश्रमवासी एकत्र हुए और उनमें बातें
हुईं। नवागंतुक संन्यासी ने ज्ञान की इतनी बातें कीं कि
आश्रम छोड़ने की सोचनेवाला संन्यासी मंत्रमुग्ध हो गया
और उसे लगा कि गुरु हो तो ऐसा हो।
जब चर्चा समाप्त हुई तो उस नवागंतुक संन्यासी ने
वृद्ध संन्यासी से पूछा कि आपको मेरी बातें कैसी लगीं।
तब वृद्ध संन्यासी ने कहा, “तुम्हारी बातें? बातें तो तुम
करते थे लेकिन वे तुम्हारी नहीं थीं। मैं तो बहुत ध्यान से
सुनता था कि तुम कुछ बोलोगे लेकिन तुम कुछ बोलते ही
नहीं थे। जो तुमने इकट्ठा कर लिया था, उसी को बाहर
निकालते रहे। बाहर से जो भीतर ले जाया जाये और फिर
बाहर निकाल दिया जाये, उसमें तो वमन की दुर्गन्ध ही
आती है। तुम्हारे भीतर से किताबें बोलती थीं, शास्त्र
बोलते थे, लेकिन तुम ज़रा भी नहीं बोले।”
युवा संन्यासी, जो आश्रम छोड़ने की सोच रहा था,
वहीं रुक गया। उसे पता चला कि जानने-जानने में बहुत
फर्क है। जानना वह है, जिसका जन्म भीतर से हो। बाहर
से जो इकट्ठा कर लेते हैं, वह हमारा बंधन हो जाता है,
उससे हमारी जिंदगी में कोई परिवर्तन होने वाला नहीं। वह
हमें मुक्त नहीं करता। जो भीतर से आता है, वही हमें मुक्त
करता है।
बो.क.सा. 116

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सुखी जीवन का सूत्र ये है कि संतुष्ट रहें
पुराने समय एक राजा बहुत घमंडी था। जब उसका जन्मदिन आया तो उसने
सोचा कि आज मैं किसी एक व्यक्ति की सारी इच्छाएं पूरी कर दूंगा। दरबार
| में भव्य आयोजन हुआ। प्रजा राजा के जन्मोत्सव में पहुंच गई थी। वहां एक
संत भी पहुंचे थे।संत ने राजा को शुभकामनाएं दीं। राजा ने संत से कहा कि
आज मैं आपकी सारी इच्छाएं पूरी करना चाहता हूं। आप मुझसे कुछ भी मांग
सकते हैं। मैं राजा हूं और मेरे लिए कुछ भी असंभव नहीं है। संत ने राजा से
कहा महाराज मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं ऐसे ही खुश हूं। राजा ने संत से फिर
कहा कि आप इच्छाएं बताएं, मैं उन्हें जरूर पूरी करूंगा। राजा जिद कर रहा
था तो संत ने कहा कि ठीक है राजन्, मेरे इस छोटे से बर्तन को सोने के
सिक्कों से भर दो। राजा ने कहा कि ये तो बहुत छोटा काम है। मैं अभी इसे भर
देता हूं। राजा ने जैसे ही अपने पास रखे हुए सोने के सिक्के उसमें डाले तो
सभी सिक्के गायब हो गए। राजा देखकर हैरान हो गया। राजा ने अपने
कोषाध्यक्ष को बुलाकर खजाने से और सोने के सिक्के मंगवाए। राजा जैसेजैसे उस बर्तन में सिक्के डाल रहा था, वे सब गायब होते जा रहे थे। धीरे-धीरे
राजा का खजाना खाली होने लगा, लेकिन वह बर्तन नहीं भरा।राजा सोचने
लगा कि ये कोई जादुई बर्तन है। इसी वजह से ये भर नहीं पा रहा है। राजा ने
|संत से पूछा कि कृपया इस बर्तन का रहस्य बताइए? ये भर क्यों नहीं रहा है?
संत ने कहा कि महाराज ये बर्तन हमारे मन का प्रतीक है। जिस तरह हमारा
मन धन, पद और ज्ञान से कभी भी नहीं भरता है, ठीक उसी तरह ये पात्र भी
कभी भर नहीं सकता।हमारे पास चाहे जितना धन आ जाए, हम कितना भी
ज्ञान मिल जाए, पूरी दुनिया जीत लें, तब भी मन की कुछ इच्छाएं बाकी रह
जाती हैं। हमारा मन इन चीजों से भरने के लिए बना ही नहीं है। जब तक हम
भक्ति नहीं करते हैं, तब तक ये खाली ही रहता है। हमारी इच्छाएं अनंत हैं, ये
कभी पूरी नहीं हो पाएंगी। इसीलिए जिस स्थिति में हैं, उसी में खुश रहना
चाहिए। सुखी जीवन का सूत्र ये है कि संतुष्ट रहें। घमंड न करें और भगवान
की भक्ति में मन लगाना चाहिए।

Posted in रामायण - Ramayan

ही #लोग भूल गए होंलेकिन #राम#जन्मभूमि का #केस लड़ने के लिए 2005 में उन्हे गोली मार दी गई थी और 1996 में 16 बार चाकू मारा गया था मगर वह बच गए क्योंकि उन्हें राम लल्ला ने #अपना केस लड़ने के लिए #चुना था .#जयश्रीराम🕉️🙏🚩

Posted in रामायण - Ramayan

भाग्य नगर के एक धर्मप्रेमी ने अयोध्या श्रीराम मंदिर के लिए सोने चांदी हीरे से युक्त रामजी को चरणपादुका समर्पित की😍बोलते रहिए जय श्रीराम

Posted in संस्कृत साहित्य

ज़िंदगी में सब से सीख मिली, चाहे वे अध्यापक रहे हों, माता-पिता, या फिर अपने घर के पालतू जानवर! हक़ीक़त में सारी प्रकृति ही गुरु रही है मेरी, तो ये कुछ दोहे उन्हीं के नाम हैं!


यह तन विष की बेल री, गुरु अमृत की खान,
शीश दिए जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान ।।

गीली मिट्टी अनगढ़ी, हमको गुरुवर जान,
ज्ञान प्रकाशित कीजिए, आप समर्थ बलवान।।

गुरु अनंत तक जानिए, गुरु की ओर न छोर,
गुरु प्रकाश का पुंज है, निशा बाद का भोर।।

गुरु अमृत है जगत में, बाकी सब विषबेल,
सतगुरु संत अनंत हैं, प्रभु से कर दें मेल।।

गुरु की कृपा हो शिष्य पर, पूरन हों सब काम,
गुरु की सेवा करत ही, मिले ब्रह्म का धाम।।

गुरु ग्रंथन का सार है, गुरु है प्रभु का नाम,
गुरु अध्यात्म की ज्योति है, गुरु हैं चारों धाम।।

गुरु बिन ज्ञान न होत है, गुरु बिन दिशा अजान,
गुरु बिन इन्द्रिय न सधें, गुरु बिन बढ़े न शान।।

गुरु मन में बैठत सदा, गुरु है भ्रम का काल,
गुरु अवगुण को मेटता, मिटें सभी भ्रमजाल।।

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु अपने गोविन्द दियो बताय।।

गुरु पारस को अन्तरो, जानत हैं सब संत।
वह लोहा कंचन करे, ये करि लेय महंत।।

शिष्य वही जो सीख ले, गुरु का ज्ञान अगाध,
भक्तिभाव मन में रखे, चलता चले अबाध।।

कहै कबीर तजि भरत को, नन्हा है कर पीव।
तजि अहं गुरु चरण गहु, जमसों बाचै जीव॥

कुमति कीच चेला भरा, गुरु ज्ञान जल होय।
जनम – जनम का मोरचा, पल में डारे धोया॥

केते पढी गुनि पचि मुए, योग यज्ञ तप लाय।
बिन सतगुरु पावै नहीं, कोटिन करे उपाय॥

गुरु की आज्ञा आवै, गुरु की आज्ञा जाय।
कहैं कबीर सो संत हैं, आवागमन नशाय॥

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट।
अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥

गुरु को सिर राखिये, चलिये आज्ञा माहिं।
कहैं कबीर ता दास को, तीन लोकों भय नाहिं॥

गुरु पारस को अन्तरो, जानत हैं सब सन्त।
वह लोहा कंचन करे, ये करि लये महन्त॥

गुरु मूरति आगे खड़ी, दुतिया भेद कुछ नाहिं।
उन्हीं कूं परनाम करि, सकल तिमिर मिटि जाहिं॥

गुरु मूरति गति चन्द्रमा, सेवक नैन चकोर।
आठ पहर निरखत रहे, गुरु मूरति की ओर॥

गुरु समान दाता नहीं, याचक शीष समान।
तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान॥

गुरु सो ज्ञान जु लीजिये, सीस दीजये दान।
बहुतक भोंदू बहि गये, सखि जीव अभिमान॥

गुरु सो प्रीतिनिवाहिये, जेहि तत निबहै संत।
प्रेम बिना ढिग दूर है, प्रेम निकट गुरु कंत॥

जग में युक्ति अनूप है, साधु संग गुरु ज्ञान।
तामें निपट अनूप है, सतगुरु लगा कान॥

जाका गुरु है आँधरा, चेला खरा निरंध।
अन्धे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फन्द॥

जेही खोजत ब्रह्मा थके, सुर नर मुनि अरु देव।
कहैं कबीर सुन साधवा, करू सतगुरु की सेवा॥

जो गुरु बसै बनारसी, शीष समुन्दर तीर।
एक पलक बिखरे नहीं, जो गुण होय शारीर॥

ज्ञान समागम प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास।
गुरु सेवा ते पाइए, सद् गुरु चरण निवास॥

तबही गुरु प्रिय बैन कहि, शीष बढ़ी चित प्रीत।
ते कहिये गुरु सनमुखां, कबहूँ न दीजै पीठ॥

पंडित यदि पढि गुनि मुये, गुरु बिना मिलै न ज्ञान।
ज्ञान बिना नहिं मुक्ति है, सत्त शब्द परमान॥

यह सतगुरु उपदेश है, जो माने परतीत।
करम भरम सब त्यागि के, चलै सो भव जलजीत॥

सतगुरु खोजे संत, जीव काज को चाहहु।
मेटो भव के अंक, आवा गवन निवारहु॥

सतगुरु तो सतभाव है, जो अस भेद बताय।
धन्य शिष धन भाग तिहि, जो ऐसी सुधि पाय॥

सतगुरु मिला जु जानिये, ज्ञान उजाला होय।
भ्रम का भाँडा तोड़ी करि, रहै निराला होय॥

सतगुरु सम कोई नहीं, सात दीप नौ खण्ड।
तीन लोक न पाइये, अरु इकइस ब्रह्मणड॥

सब धरती कागज करूँ, लिखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय॥

सोई सोई नाच नचाइये, जेहि निबहे गुरु प्रेम।
कहै कबीर गुरु प्रेम बिन, कितहुं कुशल नहिं क्षेम॥

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મમ્મીનું_પેન્સન

ભૂપતભાઈ જાજું પેન્સન ખાઈ શક્યા નહીં.. આમ તો તંદુરસ્ત હતા , પણ મહામારી ભરખી ગઈ..નિવૃત્તિના ત્રીજા વરસે ગુજરી ગયા..
એના સાંસારીક કામો તો બધા પુરા થઈ ગયા હતા.. બે દિકરા અને એક દિકરી હતી.. ત્રણેયને ધામધુમે પરણાવ્યા હતા.. બેય દિકરાને જુદા જુદા શહેરમાં સારી નોકરી હતી.. ત્રણેયને ઘરે બે બે બાળકો હતા.. નાના મોટા તહેવારમાં બધા એક ઘરે ભેગા થાય.. બે ભાભી અને નણંદ વચ્ચે પણ સારો મેળ હતો..
બાપદાદાની ખેતી ભાગમાં આવી હતી , તેમાંથી પણ બે ભાગ કરી દિકરાઓને નામે કરી દીધી હતા.. બે દિકરા માટે અલાયદા મકાનની ગોઠવણ કરી દીધી હતી..
પણ એના અવસાન પછી વાતાવરણ પલટાવા લાગ્યું.. નાનો દિકરો અને વહુ પાંચમની વિધિ કરવા આવ્યા પછી એક દિવસ વધુ રોકાયા.. રાત્રે બે દિકરા વહુ અને વનીતાબેન બેઠાં હતાં , ત્યારે મિલ્કતના ભાગની વાત નિકળી..
ભૂપતભાઈએ નિવૃત થતી વખતે આવેલ રકમમાંથી છયે બાળકોના નામે બેંકમાં સરખી રકમ મુકી હતી.. અને એક પ્લોટ ખરીદ્યો હતો.. નાનાએ એ પ્લોટમાં ભાગ માંગ્યો.. થોડી ચર્ચા પછી બેયનો અડધો ભાગ એમ નક્કી થયું..
પછી મમ્મીના પેન્સનની વાત થઈ.. વનીતાબેનને કુટુંબ પેન્સન ચાલુ થઈ ગયું હતું , જે માસીક પાંત્રીસેક હજાર જેટલું હતું.. નાની વહુએ દરખાસ્ત મુકી.. ” અમને એમાંથી ત્રીજો ભાગ આપવો.. અથવા હવે હું મમ્મીને લઈ જાઉં અને તમને ત્રીજો ભાગ આપશું..” વનીતાબેને તો એમ જ કહ્યું કે ” તમને બધાને ઠીક લાગે તેમ કરો..” ઘણી ચર્ચા થઈ પણ નિર્ણય આવ્યો નહીં.. બધા સુઈ ગયા..
સવારે વનીતાબેન ગંગામા પાસે ગયા.. ગંગાડોશી કડેધડે શરીર.. ને સાચાબોલો જીવ.. ગમે તેને મોઢે પરખાવી દે.. વનીતાબેને વિગતવાર વાત કરી , સલાહ માંગી..
ગંગામાએ કહ્યું.. ” ના .. એવું ના કરવા દેતી.. પેન્સન તો તારી કમાણી કહેવાય.. અત્યારે તારું શરીર ચાલે છે.. પછી સાવ ઘડપણમાં તારી પાસે પૈસા હશે તો બધા સાંચવશે.. પેન્સન તું તારી પાસે જ રાખ.. એમાંથી મહિને પાંચ હજાર , જેના ભેગી રહે તેને ખાધાખોરાકીના આપતી જા.. વારે તહેવારે વહુ છોકરાં માટે કપડાલતા લઈ દે.. મરજી પડે તેમ દાન પુન કર.. દિકરા વહુ માથે હાથ રાખીને જીવને.. પેન્સનના ભાગ દિકરા સીધા પાડી લેશે તો , તું ઓશીયાળી થઈ જઈશ..”
વનીતાબેનને આ વાત ગળે ઉતરી.. ” પણ માં , મને આ વાત મુકવાનું ફાવશે નહીં.. તમે ચાલોને..”
ડોશી આવ્યા.. ચારેયને ખખડાવી નાખ્યા.. ” એલાવ .. શરમ નથી આવતી..? મોટી નોકરીઓ કરો છો તોય માંના પેન્સનમાં જીવ નાખ્યો.. ? ભૂખે મરે છે તમારા છોકરાં..? આ એની મરજી પડે તેની સાથે રહેશે.. ને મહિને પાંચ હજાર આપશે.. મન પડે ત્યાં દાન ધર્માદા કરશે.. એ મરે, તે પછી જે વધે એ તમારું..”
ડોશીની વાત સામે કોઈ પાસે દલીલ ન હતી.. ડોશી ચાલતા થયા.. મોટી વહુએ કહ્યું.. “ ગંગામા .. ચા પીતા જાવ..”
ડોશી બોલ્યા..” મારી વાત માનવી હોય તો ચા પીઉં.. નહીંતર કોઈદી નહીં પીઉં..”

  • જયંતીલાલ ચૌહાણ ૨૪-૭-૨૧
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पर्देकेपीछेकानग्न_सत्य ***

….. राज कुंद्रा… ये कोई छोटा मोटा नाम नहीं है…. शिल्पा शेट्टी… ये नाम भी किसी पहचान का मोहताज नहीं हैं।

Alt Balaji…. वेब सीरीज़ की दुनिया का जाना माना नाम….एकता कपूर इसकी मालकिन है…. एकता कपूर…. ये नाम अपने आप में एक बॉलीवुड हैं…!!

…… ये सब एक दूसरे से जूड़े हुए हैं… राज कुंद्रा को पोर्नोग्राफी के लिए गिरफ्तार किया गया है… उसके साथ 11 और लोगों को भी गिरफ्तार किया गया है।

वो पोर्न फिल्म बनाते थे और कई चैनलों को बेचते थे…. जिसमें Alt Balaji का नाम मीडिया में आ चुका है… ये एकता कपूर का है……
…… मतलब एकता कपूर जानती थी कि राज कुंद्रा क्या क्या करता है….. शिल्पा शेट्टी कुंद्रा की बीवी हैं…. क्या कोई इस बात पर यकीन कर सकता है कि….. एक बीवी को यह नहीं पता कि उसका पति क्या काम करता है…!!!
और वो भी शिल्पा शेट्टी जैसी बीवी,,,, बॉलीवुड की एक जानी-मानी हिरोइन…!! हो ही नहीं सकता…..

….. कल एक मॉडल DNA में बता रही थी कि….. उसका ऑडिशन फिल्म के लिए हुआ था… जिसमे उसका सिलेक्शन हुआ था…. कुछ दिन शुटिंग करने के बाद उसे न्यूड सीन के लिए कहा गया,,, जब उसने मना किया तो तब तक हुई शुटिंग का पुरा खर्च उससे मांगा गया….. वर्ना केस करने और उसे बर्बाद करने की धमकी दी गई…. ऐसे कई लोग हैं जिसकी जिंदगी इन्होंने बर्बाद कर दी अपने राजनीतिक और पैसे के रसुख का उपयोग करके….ये इतने ताकतवर है कि कोई इनके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं कर सकता….

…… एकता कपूर बहुत सारे सिरियल बनाती
है….. पारिवारिक… सास बहू वाले…. इन सिरियल के लिए पुरे देश में ऑडिशन होते हैं….. शिल्पा शेट्टी टीवी शॉ में जज बनती है…. सिंगिग शॉ…. डांसिंग शॉ…. फूहड़ हास्य वाले शॉ…. जिनमें छोटे बच्चे और युवा आयु के बच्चे भाग लेते हैं…. इन Shows के लिए देशभर में ऑडिशन होते हैं…. उन Audition में कौन जाता है…

….. आपके हमारे घर की महिलाएं…. बच्चे…. किसको पता है कि इन ऑडिशन के पीछे क्या चल रहा होता है…. कौन जानता है कि पर्दे के पीछे कैसे गंदे घिनौने खेल चल रहे होते है….

मोदी ना आते तो इन पर्दे के पीछे की सच्चाई शायद ही कभी बाहर आ पाती….

……बॉलीवुड एक गंदा नाला हैं…. इस नाले में बहने से बचिए…. और दूसरों को भी बचाइए….

यदि आपके अंदर टेलेन्ट है…. आपके बच्चों के अंदर टेलेन्ट है…. वीडियो बनाईये….. YouTube, Facebook, Twitter…. जैसे किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर डालिए….. लोगों को आपका टेलेन्ट पसंद आयेगा तो लोग खुद आपको फॉलो करेंगे….

क्या जरूरत है आपको ऐसे ऑडिशन में जाने की….!! क्या जरूरत है आपको किसी के झांसे में आने की….!!

आपको अपना टेलेन्ट ही दिखाना है ना….Youtube पर अपना चैनल बनाकर विडियो पोस्ट करो…. अपनी खुद की पहचान बनाओ…..

…… मोदीजी जब कहते हैं ना कि ,,,,,, ” आत्मनिर्भर बनो “…….
तो उसका मतलब सिर्फ ” पकौड़े ” बेचना नहीं होता….. इसका मतलब अपना ” हुनर ” बेचना होता है….

उनकी बातों को समझना सीखो…. ध्रुव राठी जैसे लोग तो झूठ बोल बोल के YouTube पर सेलेब्रिटी बन गए हैं….. ये भी एक ” हुनर ” ही है…..

…..जिस दिन हम आत्मनिर्भर हो जायेंगे….. देश सोने की चिड़िया बन जायेगा…..

……..

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक समय एक राज्य में राजा ने घोषणा की कि वह राज्य के मंदिर में पूजा अर्चना करने के लिए अमुक दिन जाएगा।
इतना सुनते ही मंदिर के पुजारी ने मंदिर की रंग रोगन और सजावट करना शुरू कर दिया, क्योंकि राजा आने वाले थे। इस खर्चे के लिए उसने ₹6000/- का कर्ज लिया ।
नियत तिथि पर राजा मंदिर में दर्शन, पूजा, अर्चना के लिए पहुंचे और पूजा अर्चना करने के बाद आरती की थाली में चार आने दक्षिणा स्वरूप रखें और अपने महल में प्रस्थान कर गए !
पूजा की थाली में चार आने देखकर पुजारी बड़ा नाराज हुआ, उसे लगा कि राजा जब मंदिर में आएंगे तो काफी दक्षिणा मिलेगी पर चार आने !!
बहुत ही दुखी हुआ कि कर्ज कैसे चुका पाएगा, इसलिए उसने एक उपाय सोचा !!!

गांव भर में ढिंढोरा पिटवाया की राजा की दी हुई वस्तु को वह नीलाम कर रहा है। नीलामी पर उसने अपनी मुट्ठी में चार आने रखे पर मुट्ठी बंद रखी और किसी को दिखाई नहीं।
लोग समझे की राजा की दी हुई वस्तु बहुत अमूल्य होगी इसलिए बोली रु10,000/- से शुरू हुई।
रु 10,000/- की बोली बढ़ते बढ़ते रु50,000/- तक पहुंची और पुजारी ने वो वस्तु फिर भी देने से इनकार कर दिया। यह बात राजा के कानों तक पहुंची ।
राजा ने अपने सैनिकों से पुजारी को बुलवाया और पुजारी से निवेदन किया कि वह मेरी वस्तु को नीलाम ना करें मैं तुम्हें रु50,000/-की बजाय सवा लाख रुपए देता हूं और इस प्रकार राजा ने सवा लाख रुपए देकर अपनी प्रजा के सामने अपनी इज्जत को बचाया !
तब से यह कहावत बनी बंद मुट्ठी सवा लाख की खुल गई तो खाक की !!
यह मुहावरा आज भी प्रचलन में है।
ईश्वर ने सृष्टि की रचना करते समय तीन विशेष रचना की…

  1. अनाज में कीड़े पैदा कर दिए, वरना लोग इसका सोने और चाँदी की तरह संग्रह करते।

2.मृत्यु के बाद देह (शरीर) में दुर्गन्ध उत्पन्न कर दी, वरना कोई अपने प्यारों को कभी भी जलाता या दफ़न नहीं करता।

  1. जीवन में किसी भी प्रकार के संकट या अनहोनी के साथ रोना और समय के साथ भुलना दिया, वरना जीवन में निराशा और अंधकार ही रह जाता, कभी भी आशा, प्रसन्नता या जीने की इच्छा नहीं ह