Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

💪💪💪💪 💪💪–हड़ताल–💪💪💪💪💪💪

एक सच्ची घटना।

उन दिनों मेरी पोस्टिंग एक छोटे से पर समृद्ध गाँव में थी। इंदौर के करीब, रेल और सड़क मार्ग की सुबिधा से सम्पन्न।

गाँव में एक प्लास्टिक शीट का कारखाना था। जो कई लोगों के रोज़गार का साधन था। कारखाने का मालिक चूँकि उसी गाँव का निवासी था– इसलिये इंदौर में खुद की हवेली होने के बावजूद –अपने पिता की इच्छा से रात्रि विश्राम गाँव में ही करना पसंद करता था। दिन में इंदौर चला जाता और अपने दूसरे कारोबार की देख-रेख करता।

प्लास्टिक फैक्टरी दक्ष मैनेजर और कर्मचारियों के सहारे चल रहा था।

कारखानेदार ने देखा कि गाँव के कई युवा बेरोज़गार बैठे है। दिन भर शतरंज और ताश खेलने में सर्फ कर रहे है। इनमें से कई उसके बाल मित्र थे। उन्हें रोज़गार देने की नीयत से कारखानेदार ने टॉर्च असेम्बलिंग का एक यूनिट अपने प्लास्टिक कारखाने के पास डाल दिया।

पार्ट्स इंदौर से आते।टॉर्च की शक्ल अख्तियार कर –पैक हो कर वापस इंदौर।
पचासों छोकरो को नोकरी मिल गयी।
सेठ भी सन्तुष्ट था कि बिना विशेष हानि के अपने गाँव के प्रति कर्तब्य का निर्वाहन कर रहा है।
कच्चा माल लाने एवम तैयार माल इंदौर पहुँचाने में जो ट्रक का किराया लगता था वह सस्ती मज़दूरी में समायोजित हो जाता था।

फिर एक दिन अज़ाब आ गया।
सेठ ने किसी कर्मचारी को डाँटा।
कर्मचारियों का स्वाभिमान जाग उठा।
सेठ लिखित में माफी माँगो से लेकर– इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते हुवे –कारखाने से सेठ के आवास तक रैली निकाली गयी।
सयाने-होशियारचंदो ने मांगों की लंबी फेहरिस्त बनायी। कुछ अनोखे असम्भव जैसे मांग भी जोड़े गए।
सरकारी नोकरी में मिलने वाले लाभ एवम सुबिधा से मिलता-जुलता ड्राफ्ट तैयार किया गया।

कल तक जो बेरोज़गार थे। जिन पर अहसान करने की नीयत से ये असेम्बलिंग यूनिट खोला गया था।अब सबको कम से कम तीन गुना वेतन वृद्धि, मेडिकल सुबिधा, गाँव के गाँव मे आने-जाने के लिये यात्रा भत्ता–यहाँ तक कि 20 साल नोकरी करने के बाद निश्चित और नियमित पेंशन की लिखित गैरन्टी भी चाहियें थी।

सेठ माँगो की लिस्ट पढ़ कर दंग रह गया।
लिस्ट सोंपने वाले से दो टूक पूछा “काम करना है या नहीं?”
जोश में अगले ने कहा –“नहीं। जब तक हमारी मांगे पूरी नहीं होती – आप लिखित में माफी नहीं मांगते तब तक नहीं।”
सेठ ने गहरी साँस ली। प्लास्टिक फैक्टरी के मैनेजर को तलब किया और टॉर्च यूनिट को स्थायी तौर से बन्द कर दिया।

पन्द्रह दिन बाद जोशीले जवानों को अहसास हुआ कि वे फिर से बेरोज़गार हो भी चुके है।
सात दिन बाद ही दो ट्रकों में भर कर टार्च यूनिट इंदौर पहुँच भी गयी और वहाँ खुद असेम्बल हो कर असेम्बलिंग का काम चालू कर दी।

जोशीले जवान जो अब तक नियमित कमाई होने के कारण कई तरह के शौक पाल चुके थे। सिगरेट से बीड़ी पर आ गए। पाउच और गुटका छोड़ कर तंबाकू मसलने लगे।

कुछ लोग गाँव के बड़े-बूढ़े लोगो को साथ ले जा कर– अनुनय-विनय करने पहुँचे कि गाँव में फिर से टार्च यूनिट चालू हो सके।
अपनी गरीबी मज़बूरी और बेरोजगारी का हवाला देकर गिड़गिड़ाने लगे।
सेठ द्रवित हो कर उन्हें इंदौर के प्लांट में गाँव वाली तनख्वाह पर नोकरी देने को तैयार हुआ।
गाँव के गाँव में जिन्हें यात्रा भत्ता चाहियें था–अब वे रोज़ 30 km प्रति दिन अप-डाउन अपने खर्चे पर कर रहे थे।

इंक़लाब ज़िंदाबाद । हमारी मांगे पूरी करो। हड़ताल । जब तक सूरज चाँद रहेगा नेताजी तेरा नाम रहेगा।

उपरोक्त नारों से कर्मचारियों का नहीं नेताओं का ही भला हुआ है।

बामियों के कदम जहाँ भी पड़े लोगो का भविष्य लुभावने नारों , सुनहरे सपने , नयी उम्मीद की भेंट चढ़ गया।

कानपुर जो भारत का मैनचेस्टर कहलाता था। आज खुद गुजरात महाराष्ट्र से कपड़े मंगवाता है।

बामियों जहाँ-जहाँ तुम्हारें कदम पड़े। तुम्हारें मनभावन नारों से मन में दबी छुपी इच्छाओं को भड़काने की कला से, मेरा हक़ मारा जा रहा है कि उकसाऊ सोच के कारण लोगो का भला कम नुकसान ज़्यादा हुआ है।
उधोग धंधे निपट गए।
तुम्हारी नज़रें इनायत कृषि पर पड़ चुकी है।
20 साल बाद अन्य वस्तुओं की तरह कृषि उत्पाद भी चाइना से ही आयात होगा

टाटा बिड़ला अम्बानी अडानी बियानी रामदेव की चाहें लाख बुराई कर लो पर इन्हें कोसने की जगह तुम खुद भी तो इनके जैसा बिज़नेस एम्पायर खड़ा कर सकते हो। तुम्हें बड़ा सेठ बनने से किसने रोका है ?

धीरूभाई अंबानी ने गाड़ियों में ईंधन भरा है।
बाबा रामदेव ने साइकिलों से जड़ी बूटियां ढोयी है।
बहुत से लोगों ने धक्के खा- खा कर ज़िन्दगी में कोई मुकाम हासिल की है।

तभी तो कहते है कि ठोकर खा-खा कर ठाकुर होना।

नोट:-मुझें अहसास है कि आलेख पढ़ने के बाद बहुत से लोग रुष्ट होंगे। मुझें कोसेंगे। गालियां भी देंगे। पर क्या करूँ! लगभग 25 साल तक नोकरी करने –ट्रेड यूनियनों को चंदा देने –उनका झंडा उठाने के बाद –यही अनुभव हुआ कि हमनें अजगर पाले है।

तभी तो दास मलूका कह गये है कि :-

अजगर करे न चाकरी पंक्षी करें ना काम
दास मलूका कह गये सबके दाता राम आपका अरुण कुमार अविनाश

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