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Kerala

Presstitutes

Kerala, over the past few years has seen the murder of several RSS activists. Today, we present a small list to you about who has been murdered and by whom.
1. On December 1, 2006, Krishna Kumar (Biju), an RSS activist killed in Thiruvananthapuram by CPI(M) members.
2.On 17th December 2006 BJP activist P.S. Sujith murdered in Engandiyur town of Thrissur district by CPI(M) members.
3.On January 20th 2007 – RSS activist Ravi killed in Tirur by NDF members.
4. ON 12th February 2007, BJP/ BMS activist Shaju (30) killed in Kallettumkara near Thrissur district by CPI(M) members.
5. On 5th March 2007 PP Valsaraj Kurup (37) was murdered by the CPI(M) members.
6. On 16th March 2007, RSS activist Lakshman murdered in Thanur in Malappuram district by NDF workers.
7. On 24th April 2007 an RSS Taluk Karivayak G. Chandran murdered in Vettiyar near Mavelikkara by CPI(M) workers.
8. On August 16th 2007 at 7.30 am, K. Pramod (33), RSS/BJP activist killed by CPI(M) members in Thallassery, Kannur district.
9. On 22nd October 2007, BJP activist Sunil Kumar killed in Kodungallur by DYFI members.
10. On 2nd November 2007 an RSS activist Vinod Kumar (35) killed near Manalayam junction at Chadayamangalam in Thiruvananthapuram by NDF workers.
11. On 23rd December 2007, RSS Mandal Sareerik Sikshan Pramukh Vinod (25) killed by NDF goons near his house.
12. On 5th March 2008, RSS activist Nekhil killed in Thallessary (Kannur) by CPI(M) workers.
13. On 5th March 2008, RSS activist Sathyan killed in Thallessary (Kannur) by CPI(M) members.
14. On 6th March 2008, RSS activist Mahesh killed in Kannur by CPI(M) workers.
15. On 7th March 2008, RSS activist Suresh Babu killed in Kodiyeri(Kannur) by CPI(M) members.
16. On 7th March 2008, RSS activist Surendran killed in Kannur by CPI (M) members.
(List credits to www.indiafacts.co)
This is only a short list of 16 murders. There have been several more like that of Shri Manoj ji, but we have not covered them as the case has not yet been closed. But nevertheless, CPI(M), and NDF members are accused in these cases too.
Communism does not advocate murder. But the followers of the parties with these principles are engaging in such acts.
Whatever may be the differences, murder is not the answer. You can hate someone, but murdering them is not justified.
We sincerely hope that some shut eye are opened through this post. We hope people learn, for RSS will not indulge in a war of tit for tat.
Vande Mataram! Om Shanti Shanti Shantihi Credits- Say “No” to Sold Media.

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मैं इससे पूर्ण सहमत हु और आप?

Youth BJP's photo.
Youth BJP with Vikas Sharma and 28 others

13 hrs ·

मैं इससे पूर्ण सहमत हु और आप?
इतना शेयर करो कि सेक्युलरो की नींद उड़ जाए!

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राष्ट्र का संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

राष्ट्र का संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ जिसे आर.एस.एस (R.S.S.) जाना जाता है मुझे नही लगता कि किसी को संघ की पहचान बताने की जरूरत है। आज यह कहना ही उचित होगा कि इसके आलोचक ही इसकी मुख्य पहचान है। जब आलोचक संघ की कटु आलोचना करते नज़र आते है तब तब संघ और मजबूत होता हुआ दिखाई पड़ता है। छद्म धर्मनिरपेक्षवादी लोगो को यही लगता है कि भारत उन्ही के भरोसे चल रहा होता है किन्‍तु जानकर भी पागलो की भांति हरकत करते है जैसे उन्‍हे पता ही न हो कि संघ की वास्‍तविक गतिविधि क्‍या है ?

संघ के बारे थोड़ा बताना चाहूँगा उन धर्मनिरपेक्ष बंदरो को जो अपने आकाओ के इसारे पर नाचने की हमेशा नाटक करते रहते है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्‍थापना सन् 27 सितंबर 1925 को विजय दशमी के दिन मोहिते के बाड़े नामक स्‍थान पर डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार उपाख्य डॉक्टर जी ने की थी। संघ के 5 स्‍वयंसेवको के साथ शुरू हुई विश्व की पहली शाखा आज 50 हजार से अधिक शाखाओ में बदल गई और ये 5 स्‍वयंसेवक आज करोड़ो स्‍वयंसेवको के रूप में हमारे समाने है। संघ की विचार धारा में राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र, राम जन्मभूमि, अखंड भारत, समान नागरिक संहिता जैसे विजय है जो देश की समरसता की ओर ले जाता है। कुछ लोग संघ की सोच को राष्ट्र विरोधी मानते है क्‍योकि उनका काम ही है यह मानना, नही मानेगे तो उनकी राजनीतिक गतिविधि खत्‍म हो जाती है।

राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ की हमेशा अवधारणा रही है कि ‘एक देश में दो प्रधान, दो विधान, दो निशान नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे’ बात सही भी है। जब समूचे राष्ट्र और राष्ट्र के नागरिको को एक सूत्र मे बाधा गया है तो धर्म के नाम पर कानून की बात समझ से परे हो जाती है, संघ द्वारा समान नागरिक संहिता की बात आते ही संघ को सामप्रदायिक होने की संज्ञा दी जाती है। अगर देश के समस्‍त नागरिको के लिये एक नियम की बात करना सामप्रदायिकता है तो मेरी नज़र में इस सामप्रदायिकता से बड़ी देशभक्ति और नही हो सकती है।

संघ ने हमेशा कई मोर्चो पर अपने आपको स्‍थापित किया है। राष्ट्रीय आपदा के समय संघ कभी यह नही देखता‍ कि किसकी आपदा मे फसा हुआ व्‍यक्ति किस धर्म का है। आपदा के समय संघ केवल और केवल राष्ट्र धर्म का पालन करता है कि आपदा मे फसा हुआ अमुख भारत माता का बेटा है। गुजरात में आये भूकम्प और सुनामी जैसी घटनाओ के समय सबसे आगे अगर किसी ने राहत कार्य किया तो वह संघ का स्‍वयंसेवक था। संघ के प्रकल्पो ने देश को नई गति दी है, जहाँ दीन दयाल शोध संस्थान ने गांवों को स्वावलंबी बनाने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई है। संघ के इस संस्‍थान ने अपनी योजना के अंतगत करीब 80 गांवों में यह लक्ष्य हासिल कर लिया और करीब 500 गांवों तक बिस्‍तार किए जाने हैं। दीन दयाल शोध संस्थान के इस प्रकल्प में संघ के हजारों स्‍वयंसेवक बिना कोई वेतन लिए मिशन मानकर अपने अभियान मे लगे है। सम्‍पूर्ण राष्‍ट्र में संघ के विभिन्‍न अनुसांगिक संगठनो राष्ट्रीय सेविका समिति, विश्व हिंदू परिषद, भारतीय जनता पार्टी, बजरंग दल, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, राष्ट्रीय सिख संगत, भारतीय मजदूर संघ, हिंदू स्वयंसेवक संघ, हिन्दू विद्यार्थी परिषद, स्वदेशी जागरण मंच, दुर्गा वाहिनी, सेवा भारती, भारतीय किसान संघ, बालगोकुलम, विद्या भारती, भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम सहित ऐसे संगठन कार्यरत है जो करीब 1 लाख प्रकल्‍पो को चला रहे है।

संघ की प्रार्थना भी भारत माता की शान को चार चाँद लगता है, संघ की प्रार्थना की एक एक लाईन राष्‍ट्र के प्रति अपनी सच्‍ची श्रद्धा प्रस्‍तुत करती है मेरी पोस्‍ट मुस्लिम भाई मै आप से अभिभूत हूँ पर संघ की प्रार्थना और उसके अर्थ को पढ़ा जा सकता है। संघ का गाली देने से संघ का कुछ बिगड़ने वाला नही है अप‍ितु गंदे लोगो की जुब़ान की गन्‍दगी ही परिलक्षित होती है।

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वर्ष 1923 हिन्दू-मुस्लमान का दंगा हुआ था जिसमे काफी हिन्दू मारे गये थे

वर्ष 1923 हिन्दू-मुस्लमान का दंगा हुआ था जिसमे काफी हिन्दू मारे गये थे…. कांग्रेस के मुस्लिम तुस्टीकरण के कारण ! केवल पूरी कॉंग्रेस में से एक व्यक्ति ने मुस्लिम तुष्टिकरण की आलोचना करी थी, नाम था विधर्व के बड़े नेता डॉ.‪#‎केशव_बलिराम_हेडगे‬­वार। मुस्लिम आलोचना करने के कारण कांग्रेस ने डॉ.हेडगेवार को अपमानित करके कांग्रेस से निकाल दिया था।
भरी सभा में कांग्रेस के घमंडी नेताओ को चुनोती देते हुए डा. हेगडेवार ने कहा था- “में हिंदुस्तान में हिन्दुओ का इतना बड़ा संघठन खड़ा करूंगा कि किसी पार्टी में हिम्मत नहीं होगी दुबारा हिन्दुओ को अपमानित या तिरस्कित कर सके…… आज वो संघठन आर.एस.एस. हे ”
डॉ.हेडगेवार ने 27 सितम्बर 1925 नागपुर में केवल 10 युवा लडको के साथ संगठन सुरु हुआ किया था। घमंडी कांग्रेस्सियो ने उनका मजाक उड़ाया था। आज RSS और उसकी साथी संघठनो में कम से कम 13 करोड़ लोग जुड़ चुके हे।
.
दुनिया का सबसे बड़ा संघठन आर.एस.एस. है !
.
दुनिया की सबसे बड़ी फोज हैं !
.
देश हित के लिए आप भी जुड़े….!
केवल खुखार or कट्टर हिन्दू ही Ye Group Join करें…….
https://m.facebook.com/groups/344461295727928?refid=18&__tn__=C

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नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे,

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे,
(हे परम वत्सला मातृभूमि! मै तुझे निरंतर प्रणाम
करता हु,)
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् ।
(तूने सब सुख दे कर मुझको बड़ा किया|)
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे,
(हे महा मंगला पुण्यभूमि!)
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ।।१।।
(तेरे ही कारण
मेरी यह काया, तुझको अर्पित, तुझे
मै अनन्त बार प्रणाम करता हु।।)
प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता,
(हे सर्व शक्तिमय परमेश्वर! हम हिंदुराष्ट्र
के अंगभूत घटक,)
इमे सादरं त्वां नमामो वयम् |
(तुझे आदर पूर्वक प्रणाम करते है।)
त्वदीयाय कार्याय
बध्दा कटीयं,
(तेरे ही कार्य के लिए हमने कमर
कासी है,)
शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये ||
(उसकी पूर्ति के लिए हमें शुभ
आशीर्वाद दे||)
अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं,
(विश्व के लिए अजेय ऐसी शक्ति,)
सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत् |
(सारा जगत विनम्र हो ऐसा विशुद्ध (उत्तम)
शील|)
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं,
(तथा बुद्धि पूर्वक स्वीकृत, हमारे
कंटकमय मार्ग को सुगम करे,)
स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत् ।।१।।
(ऐसा ज्ञान भी हमें दे।।)
समुत्कर्षनिःश्रेयसस्यैकमुग्रं
(अभ्युदय सहित निःश्रेयस
की प्राप्ति का,)
परं साधनं नाम वीरव्रतम्
(वीर व्रत नामक जो एकमेव श्रेष्ठ,
उग्र साधन है,)
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा
(उसका हम लोगों के अंत:करण में स्फुरहण
हो,)
हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम् ।
(हमारे र्हुद्य मे, अक्षय
तथा तीव्र ध्येयनिष्ठा सदैव जागृत
रहे।)
विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
(तेरे आशीर्वाद से
हमारी विजय शालीन
संघटित कार्य शक्ति,)
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम् ।
(स्वधर्म का रक्षण कर ।)
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं
(अपने इस राष्ट्र को परम वैभव
की स्थिति,)
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ।।३।।
(पर ले जाने में अतीव समर्थ
हो ।।)
भारत माता की जय ।।
Jay Ram Ji Ki…

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे,
(हे परम वत्सला मातृभूमि! मै तुझे निरंतर प्रणाम
करता हु,)
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् ।
(तूने सब सुख दे कर मुझको बड़ा किया|)
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे,
(हे महा मंगला पुण्यभूमि!)
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ।।१।।
(तेरे ही कारण
मेरी यह काया, तुझको अर्पित, तुझे
मै अनन्त बार प्रणाम करता हु।।)
प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता,
(हे सर्व शक्तिमय परमेश्वर! हम हिंदुराष्ट्र
के अंगभूत घटक,)
इमे सादरं त्वां नमामो वयम् |
(तुझे आदर पूर्वक प्रणाम करते है।)
त्वदीयाय कार्याय
बध्दा कटीयं,
(तेरे ही कार्य के लिए हमने कमर
कासी है,)
शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये ||
(उसकी पूर्ति के लिए हमें शुभ
आशीर्वाद दे||)
अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं,
(विश्व के लिए अजेय ऐसी शक्ति,)
सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत् |
(सारा जगत विनम्र हो ऐसा विशुद्ध (उत्तम)
शील|)
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं,
(तथा बुद्धि पूर्वक स्वीकृत, हमारे
कंटकमय मार्ग को सुगम करे,)
स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत् ।।१।।
(ऐसा ज्ञान भी हमें दे।।)
समुत्कर्षनिःश्रेयसस्यैकमुग्रं
(अभ्युदय सहित निःश्रेयस
की प्राप्ति का,)
परं साधनं नाम वीरव्रतम्
(वीर व्रत नामक जो एकमेव श्रेष्ठ,
उग्र साधन है,)
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा
(उसका हम लोगों के अंत:करण में स्फुरहण
हो,)
हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम् ।
(हमारे र्हुद्य मे, अक्षय
तथा तीव्र ध्येयनिष्ठा सदैव जागृत
रहे।)
विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
(तेरे आशीर्वाद से
हमारी विजय शालीन
संघटित कार्य शक्ति,)
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम् ।
(स्वधर्म का रक्षण कर ।)
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं
(अपने इस राष्ट्र को परम वैभव
की स्थिति,)
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ।।३।।
(पर ले जाने में अतीव समर्थ
हो ।।)
भारत माता की जय ।।
Jay Ram Ji Ki...
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The name of this country is India that is Bharat.
भारतीय संविधान में लिखित उपर्युक्त पंक्ति इस देश का आधिकारिक नाम (Official name) “इण्डिया” घोषित करती है और संस्कृति का रुदन करने वालों पर दया करते हुए “भारत” शब्द के वैकल्पिक प्रयोग की अनुमति प्रदान करती है। संविधान के इस वैकल्पिक शब्द के औचित्यनिर्धारण हेतु महाभारत ही प्रथम ग्राह्य है यतो हि – “यन्न भारते तन्न भारते” अर्थात् जो महाभारत में नहीं है, वह भारतवर्ष में नहीं है।
महाभारत आदि ग्रन्थों के अनुसार हमारे सांस्कृतिक विस्तार के 3 रूप हैं – लघु, मध्यम व वृहत् जो क्रमशः ब्रह्मावर्त, भारतवर्ष व जम्बूद्वीप कहलाते हैं। मध्यम रूप को भारतीय सम्राटों ने अपना न्यूनतम राजनैतिक आदर्श माना – “इमां सागरपर्यन्तां हिमवत्-विन्ध्यकुण्डलाम्। महीमेकातपत्राङ्कां राजसिंहः प्रशास्तु नः।।” महाभारत के जम्बूखण्डविनिर्माण नामक अवान्तर पर्व में भारतवर्ष की पश्चिमी सीमा पारसीक (वर्तमान ईरान) देश कही गई है तथा सिन्धु व गान्धार को भारतवर्ष के पश्चिमी राज्य कहा गया है जिसमें वर्तमान पाकिस्तान व अफगानिस्तान अन्तर्निहित हैं। हरिवंश पुराण के अनुसार भारतवर्ष की पूर्वी सीमा चिन् पर्वत है जिसका स्थानीय नाम अराकानयोमा है। आज भी इसका उत्तरी भाग चिन् ही कहलाता है। भारतवर्ष की दक्षिणी सीमा समुद्रपर्यन्त है, यह तो सुविज्ञात ही है। महाभारत वर्तमान श्रीलंका को भी भारतान्तार्गत कहता है। महाभारत एवं अन्य पुराणों के अनुसार हिमालय के भी उत्तर में स्थित कैलाश पर्वत एवं उसके निकट से उद्भूत सिन्धु व ब्रह्मपुत्र नद भारतवर्ष की उत्तरी सीमा बनाते हैं। यदि इन सीमाओं का विचार किया जाए तो वर्तमान राजनैतिक भारत अपने मौलिक भूभाग का प्रायः आधा गँवा चुका है।
अब, India शब्द पर विचार करें। इसका प्रयोग सर्वप्रथम Greek लेखकों द्वारा किया गया और उन्होंने इसे पारसीकों से जाना था। किन्तु मूल पारसीक शब्द था – “हिन्दु” जो संस्कृत के “सिन्धु” शब्द का तद्भव है जो एक अतिप्रमुख भारतीय नदी है। वस्तुतः सिन्धु शब्द 4 पदार्थों का वाचक है – 1.एक नदी 2.एक पर्वत 3.एक समुद्र तथा 4.एक भूभाग और ये चारों अर्थ परस्पर सम्बन्धित भी हैं। प्रथम अर्थ प्रसिद्ध सिन्धु नदी का द्योतक है। द्वितीय अर्थ हिन्दुकुश पर्वत का द्योतक है। तृतीय अर्थ अरब सागर का द्योतक है तथा चतुर्थ अर्थ, जो भूभागवाचक है, के 3 रूप हैं – 1.”सप्तसिन्धु” 2.”सिन्धु राज्य” तथा 3.”वृहत्सिन्धु”।
अस्तु, सप्तसिन्धु का तात्पर्य है – हिन्दुकुश पर्वत, कुभा (काबुल) नदी व सिन्धु नदी के मध्य स्थित त्रिभुजाकार पर्वतीय भूभाग। वेदोक्त “त्रि-सप्त” संज्ञा के अनेक अर्थ हैं जिनमें से एक अर्थ “सप्तसिन्धु” भी है। पारसीक इसे “हप्तहिन्दु” अथवा “हिन्दु” अथवा “हिन्दुश” कहते थे। प्रथमतया इसी भूभाग को Greek जनों ने “India” कहा। इस पर Alexander के आक्रमण के उपरान्त वे सम्पूर्ण वृहत्सिन्धु को “India” कहने लगे। यह त्रिभुजाकार पर्वतीय भूभाग परवर्ती संस्कृत साहित्य में “कपिशा” भी कहा गया है। कपिशा के निवासी सरलतापूर्वक कश्मीर आया-जाया करते थे।
सिन्धु राज्य का तात्पर्य है – वर्तमान सिन्ध प्रान्त जो पाकिस्तान के अधिकार में है। अरब सागर इसकी दक्षिणी सीमा था। सिन्धु नदी का मूल दक्षिणी प्रवाह इसकी पूर्वी सीमा था किन्तु जयद्रथ प्रभृति सिन्धुराज इस सीमा का अतिक्रमण कर सिन्धु नदी के पूर्वी तट पर स्थित सौवीर आदि राज्यों पर अधिकार का प्रयास करते रहे।
वृहत्सिन्धु का तात्पर्य है – सिन्धु राज्य, गान्धार राज्य, कपिशा तथा बाह्लीक (बाहीक, वाहीक आदि) इन चार राज्यों का समुच्चय। भारतवर्ष का यह पश्चिमोत्तर भाग यदा-कदा आंशिकरूपेण अथवा पूर्णरूपेण संप्रभु अथवा पारसीक आदि वैदेशिकों के अधीन भी हो जाता था। वर्तमान हेलमंद (प्राचीन नाम सम्भवतः ऐलवान् अथवा ऐलवती) नदी व उसकी सहायक नदियों से सिञ्चित भूभाग गान्धार कहलाता था। पारसीक इसे “गदर” कहते थे। हिन्दुकुश पर्वत के पश्चिमोत्तर का संलग्न राज्य बाह्लीक कहलाता था।
इस प्रकार दृष्टव्य है कि सिन्धु शब्द के चारों अर्थ परस्पर सम्बन्धित हैं तथा भूभागवाचक चतुर्थ अर्थ के तीनों रूप ऐसे भूभागों के द्योतक हैं जो सिन्धु नदी के दक्षिणी प्रवाह के पश्चिम में स्थित हैं। अतः Alexander के India पर आक्रमण तथा विजय सम्बन्धी Greek लेखकों के विवरण सावधान होकर पढ़ने योग्य हैं। इनमें उल्लिखित India, सिन्धु नदी के दक्षिणी प्रवाह के पूर्व में स्थित कोई भूभाग नहीं था। Greek विवरणों का India वस्तुतः वृहत्सिन्धु साम्राज्य का द्योतक है। Alexander ने इसी भूभाग पर आक्रमण किया था जो सिन्धु नदी के दक्षिणी प्रवाह के पश्चिम में है। उसने सिन्धु नदी के दक्षिणी प्रवाह को पारकर उसके पूर्व में पदार्पण किया था, यह सन्दिग्ध ही है।
Alexander ने हिन्दुकुश पार करके बाह्लीक से कपिशा में प्रवेश किया। उसने जिन दो बड़ी नदियों को पार करके राजा पुरु (पोरस) पर आक्रमण किया वे सिन्धु व झेलम न होकर कपिशा की चित्राल व काबुल नदियाँ थीं तथा पुरु की राजधानी झेलम नदी के पूर्व में स्थित कोई नगरी न होकर पुरुषपुर (वर्तमान पेशावर) थी। पुरुषपुर के पूर्व में कुभा-सिन्धु संगम-स्थल पर ही Alexander अटक गया था क्योंकि सिन्धु नदी के पूर्वी तट के राजा आम्भी ने Alexander को कर देकर वहीं अटका दिया था, अतः यह स्थल “अटक” कहलाया। कुभा-सिन्धु संगम-स्थल सिन्धु नदी के पश्चिम में है जबकि इस संगम-स्थल के ठीक पूर्व में सिन्धु नदी का पूर्वी तट सम्प्रति अटक कहलाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि Alexander का जो प्रतिनिधि आम्भी से कर-ग्रहण करने हेतु सिन्धु नदी के पूर्वी तट पर आया था, उसे आम्भी ने यहीं पर अटका दिया था। कालान्तर में पश्चिमी अटक को विस्मृत कर दिया गया। इस प्रकार पश्चिमी व पूर्वी अटक को क्रमशः “Alexander-अटक” व “Alexander-दूत-अटक” कह सकते हैं। हमारे विचार से सहमत होकर विक्रमजी ने कहा है कि आम्भी की राजधानी Taxila (तक्षशिला) कहलाई क्योंकि उसने Alexander को Tax दिया था। इसके उपरान्त Alexander ने दक्षिण की ओर बढ़कर सिन्धु नदी के पश्चिमी तट के अन्य राज्यों पर आक्रमण किया। अन्त में सिन्धु नदी व अरब सागर के मिलन-स्थल पर पहुँच कर उसने अपनी सेना को दो भागों में विभक्त कर दिया। उसने एक भाग को अरब सागर के तट से होकर थल-मार्ग से तथा दूसरे भाग को पहले भाग के निकट रहते हुए नौकाओं द्वारा समुद्री मार्ग से स्वदेश लौटने का आदेश दिया। इस प्रकार यह Greek आँधी भारतवर्ष के सीमान्त राज्यों को उजाड़ती हुई सिन्धु नदी तक आ पहुँची किन्तु वह भारतवर्ष के आन्तरिक भाग (भरतखण्ड) में प्रविष्ट नहीं हुई और सिन्धु नदी की धारा को आन्दोलित कर लौट गई। साथ ही वह आगामी आक्रमणों की चेतावनी भी दे गई जिसे सुन पाने वाले भारतीयों की संख्या अतिन्यून ही थी।
इस घटना के पर्याप्त पश्चात् अरबों ने सिन्धु राज्य पर आक्रमण किया। उन्होंने सिन्धु राज्य को सिन्ध अथवा सिन्द कहा। उन्होंने कपिशा पर भी आक्रमण किया। गौतम बुद्ध की विशाल मूर्तियों के कारण उन्होंने कपिशा का नाम “काफिरिस्तान” ही रख दिया था। जिस कपिशा को पारसीक जन हिन्दु कहते थे उसी कपिशा को अरबों ने काफिरिस्तान कहा जिससे काफिर व हिन्दू शब्द पर्यायवाचक माने जाने लगे। अरबों ने कपिशा के लिए प्रयुक्त पारसीक शब्द हिन्दु के अर्थ को विस्तृत कर वृहत्सिन्धु साम्राज्य का वाचक बना दिया। बाद में अरबों ने वृहत्सिन्धु को हिन्द अथवा हिन्दुस्तान कहा। उन्होंने सचमुच सिन्धु नदी के दक्षिणी प्रवाह को पार कर लिया और उसके पूर्व के भूभाग में पहुँच गए। उन्होंने इस भूभाग का नाम जानने का प्रयास नहीं किया जिसका उत्तरी भाग पञ्जाब (पारसीक शब्द) व दक्षिणी भाग मरुप्रदेश कहलाता था तथा दोनों का संयुक्त नाम सारस्वत प्रदेश था। उनके लिए यह हिन्द का ही पूर्वी विस्तार था जहाँ “बुतपरस्ती” (बुद्ध=बुत आदि की मूर्तियों की पूजा) होती थी। कतिपय विद्वानों के अनुसार मूर्तिमात्र को बुत कहने की परम्परा गौतम बुद्ध की मूर्तियों के निर्माण से भी प्राचीन है। इन्हीं अरबों के कारण सिन्धु नदी के दक्षिणी प्रवाह के दोनों ओर का भूभाग हिन्द अथवा हिन्दुस्तान कहलाया। मुगलों ने भी अरबों के इस शब्द-व्यवहार को यथावत् चलाया। जब British सत्ता आई तो उसने भी भारत के लिए मुगलों द्वारा व्यवहृत हिन्दुस्तान शब्द अंगीकार कर लिया। इतना तो Britishers जानते ही थे कि हिन्दुस्तान व इण्डिया पर्यायवाचक हैं, अतः उन्होंने भारत के लिए India शब्द का प्रचलन किया। इस प्रकार सप्तसिन्धु = वृहत्सिन्धु = हिन्द = हिन्दुस्तान = India जो भारतवर्ष के पश्चिमोत्तर भाग का वाचक था, भारतवर्ष का ही वाचक बन गया जिससे Alexander की India-विजय अथवा वृहत्सिन्धु-विजय का अर्थ भारत-विजय किया जाने लगा जबकि वह भारत के आन्तरिक भाग (भरतखण्ड) में प्रविष्ट भी नहीं हुआ था। यह उसी प्रकार है जैसे तुर्की का अधिकार Istanbul (Constantinople) पर है जो Europe में है और यदि कोई Istanbul और Europe को पर्यायवाचक समझ ले तो वह यही समझेगा कि तुर्की का शासन सम्पूर्ण Europe पर है।
स्वातन्त्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर ने परम्परागत “भारतीय” शब्द के स्थान पर हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्थान शब्दों के प्रयोग की वकालत करते हुए लिखा है – “आसिन्धुसिन्धुपर्यन्ता यस्य भारतभूमिका। पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरिति स्मृतः।।” अर्थात् “सिन्धु-ब्रह्मपुत्र नदियों से लेकर सिन्धु (समुद्र) पर्यन्त विस्तृत भारतभूमि जिसके लिए पूर्वजों की भूमि तथा पवित्र भूमि है, वह हिन्दु कहलाता है।” इसमें वे महाभारत आदि में वर्णित भारतवर्ष के स्थान पर एक लघुभारत (भरतखण्ड) को ही पर्याप्त मान रहे हैं, साथ ही इस लघुभारत (भरतखण्ड) के निवासी के लिए एक ऐसी संज्ञा के औचित्य को सिद्ध कर रहे हैं जो भारतवर्ष के एक भागविशेष के निवासी की संज्ञा थी और आक्रान्ताओं द्वारा उसके अर्थ को विस्तृत कर समस्त भारतीयों पर थोप दिया गया था। सर्वाधिक आश्चर्यजनक बात यह है कि भारत के स्वकीय मानचित्र में सावरकर ने इसी भागविशेष को सम्मिलित करना आवश्यक भी नहीं माना है ! वस्तुतः वे British विद्वानों के उस कथन से सम्मोहित हो गए प्रतीत होते हैं जिसमें वे कहते हैं कि “सिन्धु अथवा हिन्दु अथवा Indus नदी के पूर्व का देश हिन्दुस्तान अथवा India है जिसका निवासी हिन्दू अथवा Indian है”। स्पष्टतया यह कथन वस्तुस्थिति के शीर्षासन के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। “भारती यत्र सन्ततिः” , “यत्रेयं भारती प्रजा” आदि वचनों द्वारा अनेकशः इस देश के निवासी को भारतीय कहकर सम्बोधित किया गया है। ऐसा नहीं कि भारत-भारतीय के अर्थ में हिन्द-हिन्दू अथवा India-Indian संज्ञा को वर्जित करना ही अभीष्ट है किन्तु भ्रान्ति से मुक्ति सदा ही अभीष्ट है।