Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

युगांडा के हिंदूओं पर जुल्म कांग्रेस में कांग्रेस का हाथ , जानिए क्या थी साजिश?????

कल गृहमंत्री अमित शाह जी ने सदन में युगांडा के हिन्दुओं पर हुए जुल्मों का उल्लेख किया , आइए उनके दर्द से सबको रू-बरू करवाता हुं….

…युगांडा 85 प्रतिशत ईसाई तो 14 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या वाला देश है। पूर्व में यह देश भी ब्रिटेन का गुलाम था।

इसी के कारण यहां से बहुत सारे भारतवासी युगांडा गयें थे जिसमें आधे गुजरात से तो आधेसम्पुर्ण भारत से थें।

भारतवासी ने वहाँ जाकर अपने पुरूषार्थ का पसीना बहाया जिसके फलस्वरूप वें वहाँ जाकर समृद्ध बन गयें। उद्योग -धंधे से लेकर राजनीति तक में भारतीयों का सिक्का चल पड़ा।

ईदी अमीन नामक एक मुस्लिम सैन्य अधिकारी ने 1971 में तख्ता पलटकर मिल्टन ओबेटो को हटा दिया और स्वयं युगांडा का प्रमुख बन गया।

अपने शासन के एक साल बाद 1972 इसने गैर मुस्लिम भारतीयों को बाहर निकल जाने का फरमान सुनाया।इस फरमान के बाद भी जब भारतवंशी हिंदूओं ने युगांडा नही छोड़ा तो उसने अपने इस्लामिक सैनिकों को लुट-मार करने की खुली छुट दे दी।

…युगांडा के सेंट्रल और उत्तरी जोन में मुसलमान ज्यादा रहते हैं और इसी जोन में भारतवंशी भी ज्यादा रहते थे। ईदी अमीन की खुली छुट के कारण सेना के साथ-साथ मुसलमानों ने भी हिंदूओ को मारना-पिटना शुरु कर दिया।जिसके कारण अपने कठिन परिश्रम से अर्जित पीढ़ियों की समुची कमाई छोड़कर हिंदूओं को वहां से भागना पड़ा।

सेना और मुस्लिम जनता ने मिलकर हिंदूओं के संपत्ति पर कब्जा कर लिया।

….सैकड़ो हिंदूओं को मार भी दिया गया फिर भी 60000 लोग वहां से भागने में सफल रहें।

इनको वहां से सुरक्षित निकालने में RSS ने बहुत ही महत्वपुर्ण भूमिका निभाई थी।

इंदिरा गांधी तब देश की प्रधानमंत्री थी ၊ युगांडा के हिंदूओं पर अत्याचार को देखकर RSS के सर संघचालक मा० बालासाहेब देवरस जी ने इंदिरा गांधी से संयुक्त राष्ट्र में शिकायत करने की अपील की ,किंतु हिन्दुओं के लिए इन्दिरा गांधी ने कोई कदम नहीं उठाया ।

तब संघ के संघचालक जी ने केन्या के हिंदू संगठनों को तार भेजकर भारत वंशीयों को सहायता करने की अपील की।

दरअसल केन्या युगांडा का पड़ोसी देश है और केन्या में 1947 के मकर संक्रांति के दिन संघ के स्वयसेवकों ने ” भारतीय स्वयंसेवक संघ ” नामक संगठन का निर्माण किया था और यह बहुत जल्दी ही एक बड़ा संगठन बन गया।

….खैर संकट की उस घड़ी में RSS के केन्या की अपनी शाखा ( भारतीय स्वयंसेवक संघ ) के स्वयंसेवकों ने युगांडा के हिंदुओं के पुनर्वास में तन-मन धन से सहायता की।

यहाँ तक की उन भारतवंशीयों को ब्रिटेन और फिजी भेजने में भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।..

तब उनके के इस कार्य पर अमेरिका, ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया के दुतावासों ने “भारतीय स्वयंसेवक संघ ” की प्रशंसा की थी।

…उन 60000 हिंदूओं में 29000 हिंदूओं ने ब्रिटेन में शरण ली तो 4500 फीजी गयें ,5000 ने कनाडा में,1200 लोगों ने केन्या में शरण ली तो 11000 लोग लौटकर भारत आएं।

…शुरू में इंदिरा गांधी युगांडा से आए 11000 हिंदूओं पर मौन साधी रही लेकिन जब अटल बिहारी वाजपेयी व लालकृष्ण आडवाणी और समुचा संघ परिवार इस पर शोर मचाने लगा तब जाकर इंदिरा गांधी को इन्हे नागरिकता देनी पडी।

…यह बात जानना भी महत्वपूर्ण है 29000 हिंदूओं ने जो ब्रिटेन में शरण ली थी इसके कारण वहाँ के समाचारपत्रों ने इसके लिए सरकार की कड़ी आलोचना करना शुरु कर दिया।

ब्रिटेन के अखबारों की आलोचना इतनी कड़वी थी कि मजबुरन वहां के विदेश मंत्री को यह कहना पड़ा कि हम इनको ब्रिटेन में नही रखने जा रहे हैं हम इन सभी को भारत भेजेगें।

…तब इस मुद्दे पर ब्रिटेन के अधिकारियों और भारत के अधिकारियों में बातचीत शुरू हुई।भारत टस से मस नही हुआ उसके बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने इंदिरा गांधी से खुद बात की किंतु इंदिरा गांधी ने 29000 भारतीयों को लेने से इंकार कर दिया।

बाद में युनओ ने हस्तक्षेप किया कि यह अभी प्रताडऩा से पीड़ित हैं इसलिए इनको तत्काल ब्रिटेन में ही रहने दिया जाए।बाद में उनके अच्छे ब्यवहार के कारण सभी 29000 को ब्रिटेन की नागरिकता दे दी गई, किन्तु तब की कांग्रेस और इन्दिरा गांधी की उपेक्षा की वजह से युगांडा ने हिन्दुओं का उत्पीडन हुआ और उन्हें भारत में शरण नहीं दी गई और वो शरणार्थी बनकर दर दर की ठोकरे खाने पर मजबूर हुए ၊
सन् 1971 में वहीं दूसरी ओर कांग्रेस सरकार ने बंगलादेश से आए मुस्लिम घुसपैठियों के लिए नागरिकता बिल में संशोधन किया और सभी बंगलादेशी मुस्लिमों को भारत की नागरिकता देकर उन्हें सारी सुविधाएं दी ၊
कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता केवल हिन्दुओं को सुविधाए देनें से खराब होती है , मुस्लिमों से नहीं, तभी तो आज जब मोदी सरकार दुनियां में सताए जा रहें हिन्दुओं को भारतीय नागरिकता देकर सहारा देना चाहती है , तब ने कैसे कांग्रेस नागरिक संशोधन बिल का विरोध किया , हम सबने देखा ၊

समय है कि दुनियां के हिन्दू समझे कि उनकी चिन्ता करने वाला पूरी दुनियां में यदि कोई है तो वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वं भाजपा ही है , बाकी केवल वोट के भूखे हैं और देश को खोखल करने की मानसिकता रखते हैं ၊

डा० पवन त्यागी
स्वतंत्र लेखक एवं विचारक
फोन : 9968304899

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आप कौन है? अपने को पहचानें–

आइए इसे सरल भाषा मे समझें👇

एक किसान अपने पके हुए फसल मजदूरों से कटवा रहा था। शाम होने को था,उसने मजदूरों से कहा – “जल्दी जल्दी काम करो,यैसा न हो कि रात्रि आ जायँ”। वही खेत मे एक बैठा 🦁शेर यह बात सुन लेता है। उसने सोचा ! 🤔की शायद रात्रि मुझसे भी अधिक शक्तिशाली,कोई जानवर है। सो वह एक झाड़ी में छुप कर बैठ गया। अंधेरा होने पर सारे मजदूर और किसान चले गए।

तब एक धोबी जिसका गधा भूल गया था,खोजते खोजते वहां आया,झाड़ी में उसे कोई जानवर दिखाई दिया,उसने सोचा मेरा गधा ही है,जो यहां आकर बैठ गया है। सो दबे पांव गया और पीछे से दो लाठी जमा दिया। शेर ने समझा कि रात्रि नामक शक्तिशाली जानवर आ गया,सो बेचारा शेर भय से लाठी खा कर भी चुपचाप बैठा रहा। अंधेरा के कारण धोबी भी ठीक से नही देख पाया,सो उस धोबी ने कान पकड़ कर खिंचते हुए,घर लाकर बांध दिया और आराम से सो गया।

सुबह होते ही उसने शेर पर कपड़ा लादा और चल दिया। चुकी वह कभी शेर को देखा नही था,उसने सोचा🤔मेरा गधा तो नही है,पर लगता है किसी दूसरे नश्ल का कोई गधा है,पर हमे क्या,हमे तो काम से मतलब है। रास्ते में एक दूसरा शेर मिला🦁🦁गठरी लादे शेर को देख बड़ा आश्चर्य हुआ की,हमारी जाती का शेर गधे की तरह ब्यवहार कर रहा है। सो उसने सोचा कि,धोबी को तो बाद में खाऊंगा,पहले थोड़ा शेर को समझाऊं। वह चुपचाप शेर के पास गया और बोला – “तू शेर है,शेर होकर गधे का काम कर रहा है?” गधे बना शेर बोला – “चुप रहो,यह रात्रि ( धोबी ) है,बड़ा बलवान जानवर है,यह मुझे औऱ तुम्हे भी मार डालेगा”। शेर ने कहा – “तू जरा दहाडो तो” गधा बना शेर दहाडा🦁 तो धोबी भाग खड़ा हुआ। तब उसे ज्ञान हुआ,मैं तो शेर हूं, उससे अधिक शक्तिशाली हूं। मैं तो भ्रम में था ! ज्ञान होते ही,भय का भूत भाग गया,और वह स्वतंत्र होकर जंगल मे विचरण करने लगा।

भावार्थ – यह जीव,जो वास्तव में परमात्मा रूपी शेर ही है। पर अज्ञान के कारण अपने को जीव ( धोबी का गधा ) मान बैठा है,और कर्मरूपी भार ढो रहा है। जिस दिन जीव अपने को पहचान गया,उस दिन उसका कल्याण निश्चित है।

जय श्री कृष्ण 🙏🌹🙏

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एक नसीहत

👉🏿माता पिता की इज्जत

ट्रेन में एक 18 – 19 वर्षीय खूबसूरत लड़की चढ़ी जिसका सामने वाली बर्थ पर रिजर्वेशन था… उसके पापा उसे छोड़ने आये थे । अपनी सीट पर बैठ जाने के बाद उसने अपने पिता से कहा ” डैडी आप जाइये अब , ट्रेन तो दस मिनट खड़ी रहेगी यहाँ दस मिनट का स्टॉपेज है । ” उसके पिता ने उदासी भरे शब्दों के साथ कहा ” कोई बात नहीं बेटा , 10 मिनट और तेरे साथ बिता लूँगा , अब तो तुम्हारे क्लासेज शुरू हो रहे हैं काफी दिन बाद आओगी तुम । ” लड़की शायद अध्ययन कर रही होगी , क्योंकि उम्र और वेशभूषा से विवाहित नहीं लग रही थी । ट्रेन चलने लगी तो उसने खिड़की से बाहर प्लेटफार्म पर खड़े पिता को हाथ हिलाकर बाय कहा : बाय डैडी . . . . अरे ये क्या हुआ आपको ! अरे नहीं प्लीज ” पिता की आँखों में आंसू थे । ट्रेन अपनी रफ्तार पकड़ती जा रही थी और पिता रुमाल से आंसू पोंछते हुए स्टेशन से बाहर जा रहे थे । लड़की ने फोन लगाया . . . ” हेलो मम्मी . . ये क्या है यार ! जैसे ही ट्रेन स्टार्ट हुई , डैडी तो रोने लग गये . . अब मैं नेक्स्ट टाइम कभी भी उनको सी ऑफ के लिए नहीं कहूँगी . भले अकेली आ जाउंगी ऑटो से . . अच्छा बाय . . पहुंचते ही कॉल करूँगी . डैडी का ख्याल रखना ओके । ” मैं कुछ देर तक लड़की को सिर्फ इस आशा से देखता रहा कि पारदर्शी चश्मे से झांकती उन आँखों से मुझे अश्रुधारा दिख जाए पर मुझे निराशा ही हाथ लगी . उन आँखों में नमी भी नहीं थी । कुछ देर बाद लड़की ने फिर किसी को फोन लगाया – ” हेलो जानू कैसे हो . . . . मैं ट्रेन में बैठ गई हूँ . . हाँ अभी चली है यहाँ से , कल अर्ली – मोर्निंग पहुँच जाउंगी . . लेने आ जाना . लव यू टू यार , मैंने भी बहुत मिस किया तुम्हे . . बस कुछ घंटे और सब्र कर लो कल तो पहुँच ही जाऊँगी । ” मैं मानता हूँ दोस्तों . . . कि आज के युग में बच्चों को उच्च शिक्षा हेतु बाहर भेजना आवश्यक है पर इस बात में भी कोई दो राय नहीं कि इसके कई दुष्परिणाम भी हैं । मैं यह नहीं कह रहा कि बाहर पढने वाले सारे लड़के लड़कियां ऐसे होते हैं । मैं सिर्फ उनकी बात कर रहा हूँ जो पाश्चात्य संस्कृति की इस हवा में अपने कदम बहकने से नहीं रोक पाते। और उनको माता – पिता , भाई – बहन किसी का प्यार याद नहीं रह जाता सिर्फ एक प्यार ही याद रहता है ! वो ये भी भूल जाते हैं कि उनके माता – पिता ने कैसे – कैसे साधनों को जुटा कर और किन सपनों को संजो कर अपने दिल के टुकड़े को अपने से दूर पढने भेजा है। लेकिन बच्चे के कदम बहकने से उसका परिणाम क्या होता है ? वो ये नहीं जानते हैं , इसलिये सभी से रिक्वेस्ट है वो अपने माता पिता के जज्बातों के साथ खिलवाड़ नहीं करें . खासकर लड़कियां क्योंकि लड़की की अपनी इज्जत के साथ सारे परिवार की इज्जत जुडी होती है🙏

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आप कौन है? अपने को पहचानें–

आइए इसे सरल भाषा मे समझें👇

एक किसान अपने पके हुए फसल मजदूरों से कटवा रहा था। शाम होने को था,उसने मजदूरों से कहा – “जल्दी जल्दी काम करो,यैसा न हो कि रात्रि आ जायँ”। वही खेत मे एक बैठा 🦁शेर यह बात सुन लेता है। उसने सोचा ! 🤔की शायद रात्रि मुझसे भी अधिक शक्तिशाली,कोई जानवर है। सो वह एक झाड़ी में छुप कर बैठ गया। अंधेरा होने पर सारे मजदूर और किसान चले गए।

तब एक धोबी जिसका गधा भूल गया था,खोजते खोजते वहां आया,झाड़ी में उसे कोई जानवर दिखाई दिया,उसने सोचा मेरा गधा ही है,जो यहां आकर बैठ गया है। सो दबे पांव गया और पीछे से दो लाठी जमा दिया। शेर ने समझा कि रात्रि नामक शक्तिशाली जानवर आ गया,सो बेचारा शेर भय से लाठी खा कर भी चुपचाप बैठा रहा। अंधेरा के कारण धोबी भी ठीक से नही देख पाया,सो उस धोबी ने कान पकड़ कर खिंचते हुए,घर लाकर बांध दिया और आराम से सो गया।

सुबह होते ही उसने शेर पर कपड़ा लादा और चल दिया। चुकी वह कभी शेर को देखा नही था,उसने सोचा🤔मेरा गधा तो नही है,पर लगता है किसी दूसरे नश्ल का कोई गधा है,पर हमे क्या,हमे तो काम से मतलब है। रास्ते में एक दूसरा शेर मिला🦁🦁गठरी लादे शेर को देख बड़ा आश्चर्य हुआ की,हमारी जाती का शेर गधे की तरह ब्यवहार कर रहा है। सो उसने सोचा कि,धोबी को तो बाद में खाऊंगा,पहले थोड़ा शेर को समझाऊं। वह चुपचाप शेर के पास गया और बोला – “तू शेर है,शेर होकर गधे का काम कर रहा है?” गधे बना शेर बोला – “चुप रहो,यह रात्रि ( धोबी ) है,बड़ा बलवान जानवर है,यह मुझे औऱ तुम्हे भी मार डालेगा”। शेर ने कहा – “तू जरा दहाडो तो” गधा बना शेर दहाडा🦁 तो धोबी भाग खड़ा हुआ। तब उसे ज्ञान हुआ,मैं तो शेर हूं, उससे अधिक शक्तिशाली हूं। मैं तो भ्रम में था ! ज्ञान होते ही,भय का भूत भाग गया,और वह स्वतंत्र होकर जंगल मे विचरण करने लगा।

भावार्थ – यह जीव,जो वास्तव में परमात्मा रूपी शेर ही है। पर अज्ञान के कारण अपने को जीव ( धोबी का गधा ) मान बैठा है,और कर्मरूपी भार ढो रहा है। जिस दिन जीव अपने को पहचान गया,उस दिन उसका कल्याण निश्चित है।

जय श्री कृष्ण 🙏🌹🙏

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🙏🏻🌸 सहजोबाई 🌸🙏🏻

आज सहजो अपनी कुटिया के द्वार पर बैठी है, उसकी गुरुभक्ति से प्रसन्न होकर परमात्मा उसके सामने प्रकट हुए हैं । लेकिन सहजो के अन्दर कोई उत्साह नहीं है।

परमात्मा ने कहा – सहजो हम स्वयं चलकर आऐ हैं क्या तुम्हे हर्ष नही हो रहा ?

सहजो ने कहा — प्रभु ! ये तो आपने अहेतुक कृपा की है, पर मुझे तोआपके दर्शन की भी कामना नही थी।

परमात्मा को झटका लगा।
सहजो तेरे पास ऐसा क्या है ?,
जो तू मेरा आतिथ्य भी नही करती है !

सहजो ने कहा- मेरे पास मेरा सद्गुरु पूर्ण समर्थ है। भगवन ! मैने आपको अपने सद्गुरु मे पा लिया है, मैं परमात्मा तत्व का दर्शन भी करना चाहती हूँ तो केवल अपने सद्गुरु के ही रूप मे। मुझे आपके दर्शनो की कोई अभिलाषा नही है।

यदि मै गुरुदेव को कहती तो वह कभी का आपको उठाकर मेरी झोली मे डाल देते।

ये भाव देखकर आज परमात्मा पिघल गया। कहते है – सहजो मुझे अदंर आने के लिए नही कहोगी ?

सहजो कहती है- प्रभु मेरी कुटिया के भीतर एक ही आसन है और उस पर भी मेरे सद्गुरु विराजते हैं, क्या आप भूमि पर बैठकर मेरा आतिथ्य स्वीकार करेंगें ?

भगवान् कहे तुम जहाँ कहोगी हम वहाँ बैठेंगें, भीतर तो आने दो।

भगवान् देखते हैं सचमुच एक ही आसन है, वे भूमि पर ही बैठ गए।

कहा — सहजो ! मैं जहाँ जाता हूँ कुछ न कुछ देता हूँ ऐसा मेरा नियम है । कुछ माँग ही लो। सहजो कहती है — प्रभु! मेरे जीवन मे कोई कामना नही है। प्रभु ने कहा फिर भी कुछ तो माँग लो । सहजो ने कहा प्रभु ! आप मुझे क्या दोगे ?

आप तो स्वयं एक दान हो, जिसे मेरा दाता सद्गुरु अपने अनन्य भक्त को जब चाहे दान कर देता है। अब बताओ प्रभु ! दान बड़ा या दाता ?

आपने तो प्राणी को जन्म मरण, रोग भोग, सुख दुख मे उलझाया, ये तो मेरे सदगुरु दीनदयाल ने कृपा कर हर प्राणी को विधि बताकर, राह पकड़ा कर, शरण में आये हुए को सहारा देकर उसे निर्भय बनाकर उस द्वन्द से छुड़ाया।

प्रभु मुस्कराते हुए कहते हैं, सहजो ! आज मेरी मर्यादा रख ले, कुछ सेवा ही दे दे।
सहजो ने कहा – प्रभु एक सेवा है, मेरे सद्गुरु आने वाले हैं, जब मैं उन्हे भोजन कराऊँ तो क्या आप उनके पीछे खड़े होकर चवर झुला सकते हो ?

कथा कहती है कि प्रभु ने सहजो के गुरु चरणदास पर चवर झुलाया। यही है सद्गुरु के प्रति सच्ची समर्पण! , साधक के अंदर अगर स्वर्ग तक की कामना जागृत हो जाए।

उसे दृढ़ विश्वास होना चाहिए कि मुझे कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है, यह तो मेरे सच्चे बादशाह यूं ही दे देंगे, लेकिन कब ? जब उसमे मेरा कल्याण होगा।👏🏻🙏🏻_*

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Excellent_article

स्थानीय कॉलेज में अर्थशास्त्र के एक प्रोफेसर ने अपने एक बयान में कहा – “उसने पहले कभी किसी छात्र को फेल नहीं किया था, पर हाल ही में उसने एक पूरी की पूरी क्लास को फेल कर दिया है l”

…….. क्योंकि उस क्लास ने दृढ़तापूर्वक यह कहा था कि “समाजवाद सफल होगा और न कोई गरीब होगा और न कोई धनी होगा”, क्योंकि उन सब का दृढ़ विश्वास है कि यह सबको समान करने वाला एक महान सिद्धांत है…..

तब प्रोफेसर ने कहा– “अच्छा ठीक है ! आओ हम क्लास में समाजवाद के अनुरूप एक प्रयोग करते हैं- सफलता पाने वाले सभी छात्रों के विभिन्न ग्रेड (अंकों) का औसत निकाला जाएगा और सबको वही एक काॅमन ग्रेड दिया जायेगा। ”

पहली परीक्षा के बाद…..
सभी ग्रेडों का औसत निकाला गया और प्रत्येक छात्र को B ग्रेड प्राप्त हुआl

जिन छात्रों ने कठिन परिश्रम किया था वे परेशान हो गए और जिन्होंने कम पढ़ाई की थी वे खुश हुए l

दूसरी परीक्षा के लिए कम पढ़ने वाले छात्रों ने पहले से भी और कम पढ़ाई की और जिहोंने कठिन परिश्रम किया था, उन्होंने यह तय किया कि वे भी मुफ़्त का ग्रेड प्राप्त करेंगे और उन्होंने भी कम पढ़ाई की l

दूसरी परीक्षा में ……
सभी का काॅमन ग्रेड D आया l
इससे कोई खुश नहीं था और सब एक-दूसरे को कोसने लगे।

जब तीसरी परीक्षा हुई…….
तो काॅमन ग्रेड F हो गया l

जैसे-जैसे परीक्षाएँ आगे बढ़ने लगीं, स्कोरकभी ऊपर नहीं उठा, बल्कि और भी नीचे गिरता रहा। आपसी कलह, आरोप-प्रत्यारोप, गाली-गलौज और एक-दूसरे से नाराजगी के परिणाम स्वरूप कोई भी नहीं पढ़ता था, क्योंकि कोई भी छात्र अपने परिश्रम से दूसरे को लाभ नहीं पहुंचाना चाहता था l

अंत में सभी आश्चर्यजनक रूप से फेल हो गए और प्रोफेसर ने उन्हें बताया कि –
“इसी तरह ‘समाजवाद’ की नियति भी अंततोगत्वा फेल होने की ही है, क्योंकि इनाम जब बहुत बड़ा होता है तो सफल होने के लिए किया जाने वाला उद्यम भी बहुत बड़ा करना होता है l
परन्तु जब सरकारें मेहनत के सारे लाभ मेहनत करने वालों से छीन कर वंचितों और निकम्मों में बाँट देगी, तो कोई भी न तो मेहनत करना चाहेगा और न ही सफल होने की कोशिश करेगा l”

उन्होंने यह भी समझाया कि –
” इससे निम्नलिखित पाँच सिद्धांत भी निष्कर्षित व प्रतिपादित होते हैं –

  1. यदि आप राष्ट्र को समृद्ध और समाज को को सक्षम बनाना चाहते हैं, तो किसी भी व्यक्ति को उसकी समृद्धि से बेदखल करके गरीब को समृद्ध बनाने का क़ानून नहीं बना सकते।
  2. जो व्यक्ति बिना कार्य किए कुछ प्राप्त करता है, तो वह अवश्य ही अधिक परिश्रम करने वाले किसी अन्य व्यक्ति के इनाम को छीन कर उसे दिया जाता है।
  3. सरकार तब तक किसी को कोई वस्तु नहीं दे सकती जब तक वह उस वस्तु को किसी अन्य से छीन न ले।
  4. आप सम्पदा को बाँट कर उसकी वृद्धि नहीं कर सकते।
  5. जब किसी राष्ट्र की आधी आबादी यह समझ लेती है कि उसे कोई काम नहीं करना है, क्योंकि बाकी आधी आबादी उसकी देख-भाल जो कर रही है और बाकी आधी आबादी यह सोच कर ज्यादा अच्छा कार्य नहीं कर रही कि उसके कर्म का फल किसी दूसरे को मिलना है, तो वहीं से उस राष्ट्र के पतन और अंततोगत्वा अंत की शुरुआत हो जाती है।

जरूर पढ़ें और यदि समझ में आये तो देश हित में शेयर करें…

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कश्मीर के हिन्दू नरसंहार की 20 नृशंस कहानियाँ जो हर हिन्दू को याद होनी चाहिए
सर्वानंद कौल का तिलक वाला ललाट छीला गया, वीरेंदर की आँखें निकाल ली गईं, गिरिजा के सामूहिक बलात्कार के बाद ज़िंदा आरी से चीर दिया गया, भूषण के सर में छड़ घोंप कर, पेड़ में कीलों से ठोका गया, चुन्नी लाल के चेहरे की चमड़ी उतार ली गई, पी एन कौल की चमड़ी जीवित अवस्था में शरीर से उतार दी गई…

आप- इन्डिया- संपादक ✍अजीत भारती की कलम से ✍

कश्मीर का मतलब है वह जमीन जहाँ से पानी को निकाल दिया गया हो। ब्रह्मा के पौत्र और मरीचि के पुत्र कश्यप ऋषि ने इस भूमि से वराहमुला (बारामुल्ला) की पहाड़ियों को काट कर जल को रास्ता दे कर ब्राह्मणों को बसाया था। कश्मीर के मुख्य शहर को कश्यपपुर भी कहा जाता था जिसका रिकॉर्ड हेकेटेइयस और हेरोडोटस के लेखन में क्रमशः कसपेपीरोस और कसपातायरोस, एवम् टोल्मी के समय में ‘कस्पेरिया’ के नाम से मिल जाता है।

यूँ तो कश्मीर में मानवीय सभ्यता आज से लगभग 5,000 वर्ष पूर्व से शुरु हो जाती है, जिसके पौराणिक, वैदिक और प्रागौतिहैसिक प्रमाण उपलब्ध हैं जहाँ वैदिक काल में उत्तर कुरुओं को कश्मीर में बसने का जिक्र आता है। अगर ऐतिहासिक तथ्यों की बात करें तो कल्हण की ‘राजतरंगिनी’ में पौराणिक काल से ले कर बारहवीं शताब्दी तक के शासकों की चर्चा है।

सिकंदर के समकालीन, 326 ईसा पूर्व में अभिसार कश्मीर का राजा था। उसके बाद यह मौर्य साम्राज्य का हिस्सा बना और बौद्ध स्तूप और शिव मंदिरों ने कश्मीर में जगह बनाई। फिर कनिष्क का शासनकाल आया, जब बौद्ध और हिन्दू धर्म की शिक्षा का केन्द्र बन कर कश्मीर की ख्याति चीन तक पहुँच चुकी थी। उसके बाद हूणों ने कश्मीर को जीत लिया, फिर कारकोटा साम्राज्य आया, तत्पश्चात उत्पलों का शासन चला। नवीं से 11वीं शताब्दी तक शैव दर्शन पर यहाँ खूब कार्य हुआ।

उसके बाद लोहार वंश के जनविरोधी शासन के कारण वहाँ पहली बार मुसलमानों के आगमन का रास्ता खुला। चौदहवीं शताब्दी आते-आते इस्लाम कश्मीर घाटी का बहुसंख्यक मजहब बन चुका था। संस्कृत साहित्य गायब कर दिया गया और सुल्तान सिकंदर ने ‘बुतशिकन’ की उपाधि ले कर इस्लामी आतंक की नींव रख दी थी। फारसी ने आधिकारिक भाषा की जगह ले ली। 16वीं शताब्दी में हुमायूँ के सेनापति ने हमला बोल कर कश्मीर को कब्जे में लिया, लेकिन अकबर के काल तक इसे सीधे तौर पर मुगलों ने शासन में नहीं लिया था। शिया, शाफी और सूफियों की प्रताड़ना का सिलसिला हुमायूँ के दौर में खूब चला। बाद में औरंगजेब ने मुसलमान आतंकी शासकों की परंपरा कायम रखी और मजहबी भेदभाव के साथ-साथ हिन्दुओं और बौद्धों से मुगलिया उगाही जारी रखी।

लगभग चार सौ सालों के मुसलमानी शासन के बाद 19वीं शताब्दी में कुछ समय तक कश्मीर सिखों के शासन में रहा जब पंजाब के रंजीत सिंह ने इसे अपने साम्राज्य का हिस्सा बनाया। 1846-1947 तक डोगरा राजाओं ने कश्मीर पर राज किया। 1901 में कश्मीर घाटी में मुसलमानों का प्रतिशत 93.6 था, हिन्दू 5.4% थे। कहने को तो मुसलमानों का यह प्रतिशत सौ सालों में बहुत बदला नहीं है, जो कि अब 95% से ज्यादा है, लेकिन कश्यप ऋषि के द्वारा वराहमुला की पहाड़ी को काट कर ब्राह्मणों को बसाने वाले कश्मीर में तीस साल पहले जो हुआ, वो धार्मिक नरसंहार हिन्दुओं को भूलना नहीं चाहिए।

तीस साल पहले के कुछ किस्से
25 जून 1990 गिरिजा टिकू नाम की कश्मीरी पंडित की हत्या के बारे में आप जानेंगे तो सिहर जाएँगे। सरकारी स्कूल में लैब असिस्टेंट का काम करती थी। मुसलमान आतंकियों के डर से वो कश्मीर छोड़ कर जम्मू में रहने लगी। एक दिन किसी ने उसे बताया कि स्थिति शांत हो गई है, वो बांदीपुरा आ कर अपनी तनख्वाह ले जाए। वो अपने किसी मुस्लिम सहकर्मी के घर रुकी थी। मुसलमान आतंकी आए, उसे घसीट कर ले गए। वहाँ के स्थानीय मुसलमान चुप रहे क्योंकि किसी काफ़िर की परिस्थितियों से उन्हें क्या लेना-देना। गिरिजा का सामूहिक बलात्कार किया गया, बढ़ई की आरी से उसे दो भागों में चीर दिया गया, वो भी तब जब वो जिंदा थी। ये खबर कभी अखबारों में नहीं दिखी।

4 नवंबर 1989 को जस्टिस नीलकंठ गंजू को दिनदहाड़े हायकोर्ट के सामने मार दिया गया। उन्होंने मुसलमान आतंकी मकबूल भट्ट को इंस्पेक्टर अमरचंद की हत्या के मामले में फाँसी की सजा सुनाई थी। 1984 में जस्टिज नीलकंठ के घर पर बम से भी हमला किया गया था। उनकी हत्या कश्मीरी हिन्दुओं की हत्या की शुरुआत थी।

7 मई 1990 को प्रोफेसर के एल गंजू और उनकी पत्नी को मुसलमान आंतंकियों ने मार डाला। पत्नी के साथ सामूहिक बलात्कार भी किया। 22 मार्च 1990 को अनंतनाग जिले के दुकानदार पी एन कौल की चमड़ी जीवित अवस्था में शरीर से उतार दी गई और मरने को छोड़ दिया गया। तीन दिन बाद उनकी लाश मिली।

उसी दिन श्रीनगर के छोटा बाजार इलाके में बी के गंजू के साथ जो हुआ वो बताता है कि सिर्फ मुसलमान आतंकी ही इस लम्बे चले धार्मिक नरसंहार की चाहत नहीं रखते थे, बल्कि स्थानीय मुसलमानों का पूरा सहयोग उन्हें मिलता रहा। कर्फ्यू हटा था तो बी के गंजू, टेलिकॉम इंजीनियर, अपने घर लौट रहे थे। उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि उनका पीछा किया जा रहा है, हालाँकि घर के पास आने पर उनकी पत्नी ने यह देख लिया। उनके घर में घुसते ही पत्नी ने दरवाजा बंद कर दिया। दोनों ही घर के तीसरे फ्लोर पर चावल के बड़े डब्बों में छुप गए।

आतंकियों ने छान मारा, वो नहीं मिले। जब वो लौटने लगे तो मुसलमान पड़ोसियों ने उन मुसलमान आतंकियों को वापस बुलाया और बताया कि वो कहाँ छुपे थे। आतंकियों ने उन्हें बाहर निकाला, गोलियाँ मारी, और जब खून चावल में बह कर मिलने लगा, तो जाते हुए मुसलमान आतंकियों ने कहा, “इस चावल में खून को मिल जाने दो, और अपने बच्चों को खाने देना। कितना स्वादिष्ट भोजन होगा वो उनके लिए।”

12 फरवरी 1990 को तेज कृष्ण राजदान को उनके एक पुराने सहकर्मी ने पंजाब से छुट्टियों में उनके श्रीनगर आने पर भेंट की इच्छा जताई। दोनों लाल चौक की एक मिनि बस पर बैठे। रास्ते में मुसलमान मित्र ने जेब से पिस्तौल निकाली और छाती में गोली मारी। इतने पर भी वो नहीं रुका, उसने राजदान जी को घसीट कर बाहर किया और लोगों से बोला कि उन्हें लातों से मारें। फिर उनके पार्थिव शरीर को पूरी गली में घसीटा गया और नजदीकी मस्जिद के सामने रख दिया गया ताकि लोग देखें कि हिन्दुओं का क्या हश्र होगा।

24 फरवरी 1990 को अशोक कुमार काज़ी के घुटनों में गोली मारी गई, बाल उखाड़े गए, थूका गया और फिर पेशाब किया गया उनके ऊपर। किसी भी मुसलमान दुकानदार ने, जो उन्हें अच्छे से जानते थे, उनके लिए एक शब्द तक नहीं कहा। जब पुलिस का सायरन गूंजा तो भागते हुए उन्होंने बर्फीली सड़क पर उनकी पीड़ा का अंत कर दिया। पाँच दिन बाद नवीन सप्रू को भी इसी तरह बिना किसी मुख्य अंग में गोली मारे, तड़पते हुए छोड़ा गया, मुसलमानों ने उनके शरीर के जलने तक जश्न मनाया, नाचते और गाते रहे।

30 अप्रैल 1990 को कश्मीरी कवि और स्कॉलर सर्वानंद कौल प्रेमी और उनके पुत्र वीरेंदर कौल की हत्या बहुत भयावह तरीके से की गई। उन्होंने सोचा था कि ‘सेकुलर’ कश्मीरी उन्हें नहीं भगाएँगे, इसलिए परिवार वालों को लाख समझाने पर भी वो ‘कश्मीरी सेकुलर भाइयों’ के नाम पर रुके रहे। एक दिन तीन ‘सेकुलर’ आतंकी आए, परिवार को एक जगह बिठाया, और कहा कि सारे गहने-जेवर एक खाली सूटकेस में रख दें।

उन्होंने प्रेमी जी को कहा कि वो सूटकेस ले लें, और उनके साथ आएँ। घरवाले जब रोने लगे तो उन्होंने कहा, “अरे! हम प्रेमी जी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाएँगे। हम उन्हें वापस भेज देंगे।” 27 साल के बेटे वीरेन्द्र ने कहा कि पिता को अँधेरे में वापसी में समस्या होगी, तो वो साथ जाना चाहता है। “आ जाओ, अगर तुम्हारी भी यही इच्छा है तो!” दो दिन बाद दोनों की लाशें मिलीं। तिलक करने की जगह को छील कर चमड़ी हटा दी गई थी। पूरे शरीर पर सिगरेट से जलाने के निशान थे, हड्डियाँ तोड़ दी गईं थीं। पिता-पुत्र की आँखें निकाल ली गईं थीं। फिर दोनों को रस्सी से लटकाया गया था, और उनकी मृत्यु सुनिश्चित हो, इसके लिए गोली भी मारी गई थी।

मुजू और दो अन्य लोगों को मुसलमान आतंकियों ने किडनैप किया और कहा कि कुछ लोगों को खून की जरूरत है, तो उन्हें चलना होगा। आतंकियों ने उनके शरीर का सारा खून बहा दिया और उनकी मृत्यु हो गई। 9 जुलाई 1990 को हृदय नाथ और राधा कृष्ण के सर कटे हुए मिले। 26 जून 1990 को बी एल रैना जब अपने परिवार को जम्मू लाने के लिए कश्मीर जा रहे थे, तो मुसलमान आतंकियों ने घेर कर मार दिया। 3 जून को, आतंकियों ने उनके पिता दामोदर सरूप रैना की हत्या घर में घुस कर की थी। उन्होंने पड़ोसियों से मदद माँगी, मुसलमान ही थे, नहीं आए।

अशोक सूरी के भाई को गलती से मुसलमान आतंकियों ने उठा लिया। उसे खूब पीटा, टॉर्चर किया और पूरे शरीर को सिगरेट से जलाने के बाद, अधमरे हो जाने पर, बताया कि वो तो उसके भाई के मारना चाहते थे। उसे छोड़ दिया गया। वो किसी तरह घर पहुँच कर भाई को भाग जाने की सलाह देने लगे। भाई ने सलाह नहीं मानी। आधी रात को वो आतंकी घर में आए, लम्बे चाकू से गर्दन काटी और मरने छोड़ कर चले गए।

सोपोर के चुन्नी लाल शल्ला इंस्पेक्टर थे। कुपवाड़ा में पोस्टिंग होने पर उन्होंने दाढ़ी बढ़ा रखी थी कि उन्हें आतंकी पहचान न सकें। एक दिन आतंकी खोजते हुए आए और उन्हें पहचान नहीं पाए, और वापस जाने लगे। उनके साथ ही एक मुसलमान सिपाही भी काम करता था। उसने आतंकियों को वापस बुलाया और बताया कि दाढ़ी वाला ही शल्ला हैं। आतंकी कुछ करते उस से पहले उनके मुसलमान सहकर्मी ने छुरा निकाला और पूरा दाहिना गाल चमड़ी सहित छील दिया। चुन्नी लाल अवाक् रह गए। तब मुसलमान सिपाही ने कहा, “अबे सूअर! तेरे दूसरे गाल पर भी जमात-ए-इस्लामी वाली दाढ़ी नहीं रखने दूँगा।” फिर छुरे से दूसरी तरफ भी काट दिया गया। उसके बाद आतंकियों के साथ मिल कर चुन्नी लाल के चेहरे पर हॉकी स्टिक से ताबड़तोड़ प्रहार किया गया और फिर आतंकियों ने कहा, “दोगले, तेरे ऊपर गोली बर्बाद नहीं करेंगे हम।” रक्त बहते रहने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।

28 अप्रैल 1990 को भूषण लाल रैना के साथ जो हुआ वो मुसलमान आतंकियों की क्रूरता सटीक तरीके से बयान करता है। अगले दिन अपनी माँ के साथ घाटी छोड़ने की योजना थी, सामान बाँध रहे थे। मुसलमान आतंकियों की एक टोली आई और रैना के सर में नुकीला छड़ घोंप कर हमला किया। उसके बाद उन्हें खींच कर बाहर निकाला गया, कपड़े उतार कर एक पेड़ पर कीलें ठोंक कर लटकाने के बाद वो उन्हें तड़पाते रहे। भूषण बार-बार कहते रहे कि वो उन्हें गोली मार दें, आतंकियों ने इंतजार किया, गोली नहीं मारी।

25 जनवरी 1998 की रात को वन्धामा गाँव के 23 कश्मीरी हिन्दुओं की हत्या पूर्वनिर्धारित तरीके से की गई। एक बच्चा जो बच गया, उसने बताया कि मुसलमान आतंकी आर्मी की वर्दी में आए, चाय पिया, और अपने वायरलेस सेट पर संदेश का इंतजार करने लगे। जब खबर आ गई कि सारे कश्मीरी पंडितों के परिवार को एक साथ फँसा लिया गया है, तब एक साथ क्लासनिकोव रायफलों से उनकी नृशंस हत्या कर दी गई। उसके बाद हिन्दुओं के मंदिर तोड़ दिए गए और घरों में आग लगा दी गई।

अगर सिक्खों की बात करें तो कई सिक्खों को उनके परिवार के साथ 1990 से 1992 के बीच इसी क्रूरता से मारा गया। इनमें कई जम्मू कश्मीर पुलिस के सिपाही या अफसर भी शामिल थे। ऐसे ही 1989 से 1992 के बीच छः बार ईसाई मिशनरी स्कूलों पर मुसलमान आतंकियों ने बम धमाके किए।

ये कहानियाँ आज क्यों?
इन कहानियों को अभी कहने का मतलब क्या है? इन कहानियों को अभी कहने का मतलब मात्र यह है कि इसमें से 99% कहानियों के पात्रों का नाम आपको याद भी नहीं होगा। इसलिए, इन्हें इनके शीशे की तरह साफ दृष्टिकोण में मैं आपको बताना चाहता हूँ कि शाब्दिक भयावहता जब इतनी क्रूर है तो उनकी सोचिए जिनके साथ ऐसा हुआ होगा। ये किसी फिल्म के दृश्य नहीं हैं जहाँ नाटकीयता के लिए आरी से किसी को काटा जाता है, किसी की खोपड़ी में लोहे का रॉड ठोक दिया जाता है, किसी की आँखें निकाल ली जाती हैं, किसी के दोनों गाल चाकू से चमड़ी सहित छील दिए जाते हैं, किसी के तिलक लगाने वाले ललाट को चाकू से उखाड़ दिया जाता है…

ये सब हुआ है, और लम्बे समय तक हुआ है। इसमें वहाँ के वो मुसलमान भी शामिल थे, जो आतंकी नहीं थे, बल्कि किसी के सहकर्मी थे, किसी के पड़ोसी थे, किसी के जानकार थे। सर्वानंद कौल सोचते रहे कि उन्होंने तो हमेशा उदारवादी विचार रखे हैं, उन्हें कैसे कोई हानि पहुँचाएगा, लेकिन पुत्र समेत ऐसी हालत में मरे जिसे सोच कर रीढ़ की हड्डियों में सिहरन दौड़ जाती है।

ये आतंकी बनाम हिन्दू नहीं था, बल्कि ये मुसलमान बनाम गैर-मुसलमान था। आतंकी ही होते तो बाजार में घसीटे जा रहे लाश पर कोई मुसलमान कुछ बोलता, आतंकियों को घेरता, पत्थर ही फेंक देता। ऐसा नहीं हुआ। चार सौ सालों के इस्लामी शासन के बाद कश्मीर के गैर-मुसलमान सिमट कर 6% रह गए थे। 1990 की जनवरी से जो धार्मिक नरसंहारों का दौर चला और विभिन्न स्रोतों के मुताबिक तीन से आठ लाख कश्मीरी हिन्दू पलायन को मजबूर हुए।

आज शाहीन बाग के कुछ मुसलमान तख्तियाँ लिए उनके प्रति सहानुभूति जता रहे हैं। यह सहानुभूति नहीं है, यह अपने मतलब के लिए तिरंगे से ले कर राष्ट्रगान और संविधान पर थूकने वाले लोगों द्वारा चली गई एक बारीक चाल है। इनकी धूर्तता देखिए कि इनके पोस्टरों में कश्मीरी हिन्दुओं के लिए कथित सहानुभूति तो है, लेकिन जिन्होंने ऐसी नृशंस हत्याएँ की, उन मुसलमानों के लिए एक भी शब्द नहीं?

क्या कश्मीरी हिन्दू किसी उल्कापिंड के गिरने से कश्मीर छोड़ आए थे? क्या उनके मंदिरों पर उत्तरी कोरिया के इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइलों के नाभिकीय हथियारों से हमला हुआ था! क्या उनके घर दीवाली की पटाखेबाजी में जल गए थे? क्या उनके सिर में घुसा लोहे का रॉड किसी कश्मीरी भालाफेंक एथलीट का जैवलिन था? क्या भूषण रैना को पेड़ में कीलों से टाँगने की कोशिश रोम के लोगों ने की थी कि यह देखा जाए कि तीन दिन बाद पुनर्जीवित होता है कि नहीं?

तो वो लोग, जो स्वार्थ के कारण, आज कश्मीरी हिन्दुओं की पीड़ा बाँटने की कोशिश कर रहे हैं, कम से कम अपने गिरेबान में तो झाँके कि ये सब वो बस इसलिए कर रहे हैं क्योंकि शाहीन बाग से पहले एक खास विचारधारा के लोगों ने देश के कई हिस्सों में तो आगजनी और पत्थरबाजी की है, पेट्रोल बम फेंके हैं और कट्टे चला कर 19 लोगों की जानें ली हैं, उनसे देश का ध्यान हट जाए।

वो जानते हैं कि शाहीन बाग की नौटंकी करते रहने से जामिया नगर के बसों में लगाई गई आग को लोग भूल जाएँगे। लोग यह भी भूल जाएँगे कि वहाँ इस्लामी कट्टरपंथी संगठन PFI के 150 मुसलमान घुस आए थे। लोग यह भी भूल जाएँगे कि वहाँ ‘हिन्दुओं से आज़ादी’ के नारे लगे थे। लेकिन उन्हें भूलना नहीं चाहिए। वो तुम्हें ‘शाहीन बाग में आज ये हुआ’ दिखाते रहेंगे, लेकिन तुम जामिया नगर की आग, उत्तर प्रदेश में 19 मौतें, बंगाल में 250 करोड़ की प्रॉपर्टी के नुकसान, लखनऊ के परिवर्तन चौक की आगजनी, मस्जिदों से बाहर निकल कर पत्थरबाजी और पेट्रोल बम पर सवाल पूछते रहना। नहीं पूछोगे, तो ये वामपंथी मीडिया तुम्हें ही आतंकी बना कर भुना लेगी।

आपको इनकी दोगलई की दाद देनी चाहिए कि कश्मीर के दो-तीन नारे, जो विशुद्ध रूप से हिन्दुओं को भगाने के लिए ही बने थे, वो जामिया में लगते रहे, शाहीन बाग में लगते रहे, और इनकी हिम्मत इतनी बढ़ गई कि उन्होंने कश्मीरी हिन्दुओं की पीड़ा बाँटने के पोस्टर हाथ में ले लिए! ‘ला इलाहा इल्लिल्लाह’ और ‘आज़ादी‘ तो हिन्दुओं से घृणा दर्शाने के कश्मीरी नारे हैं। तुम वो नारे भी लगा रहे हो, और कश्मीरी हिन्दुओं का दुख बाँटने का भी दावा करते हो?

हम वापस आएँगे
आज हजारों कश्मीरी हिन्दुओं ने ये कहा है कि ‘हम वापस आएँगे’। लेकिन उनके ऐसा कहने भर से उनकी वापसी संभव नहीं हो जाती। वो अगर यह सोच रहे हैं कि शाहीन बाग के धूर्त प्रपंचियों की तरह उनके स्वागत में घाटी के मुसलमान तख्तियाँ ले कर खड़े मिलेंगे, तो यह उनकी मूर्खता है। सरकार ने कैम्प तो लगाए थे न इन हिन्दुओं के लिए, उस पर पत्थरबाजी किसने की?

ये वही मुसलमान हैं जिन्होंने अपने पड़ोसी बी के गंजू के चावल के कंटेनर में छिपे होने की बात घर छोड़ कर वापस जाते आतंकियों को बताई थी। और ऐसे पड़ोसियों ने एक बार नहीं, कई बार अपने पड़ोसी होने के इस धर्म को निभाया जब हिन्दुओं की हत्या करने आए मुसलमान आतंकियों को इन्होंने प्रत्यक्ष सहयोग से ले कर, मौन सहमति तक दी। इसलिए आप यह तो भूल ही जाएँ कि इस्लामी शासन के शुरुआत से ही गायब हुए संस्कृत को फारसी से बदल देने वाले लोगों की संतानें ‘स्वागतम्-स्वागतम्’ करती लाल चौक पर आएँगीं।

इनकी वापसी का रास्ता इतना आसान नहीं है। मुसलमानों का इतिहास और वर्तमान बड़ा ही स्पष्ट रहा है, जिस भी इलाके में ये बहुसंख्यक हैं, वहाँ अल्पसंख्यकों के लिए इनके पास घृणा के अलावा और कुछ नहीं। अगर सिर्फ मुसलमान ही रहे, तो भी इसी कश्मीर ने 16वीं शताब्दी में इन्हीं मुसलमानों को आपस ही में शिया, शाफी, और सूफी को प्रताड़ित करते देखा है। म्याँमार में बौद्धों को वहाँ के मुसलमानों ने हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया! उदाहरण असंख्य हैं, इसलिए 95% से ज़्यादा मुस्लिम जनसंख्या वाले इस इलाके में हिन्दुओं को पुनर्स्थापित करना लगभग असंभव कार्य है।

अगर ये हिन्दू वापस जा कर, सर्वानंद कौल की तरह ‘सेकुलर’ राग गा कर, ये सोचने लगेंगे कि तीस साल में वहाँ के मुसलमानों में बदलाव आ गया होगा, और वो उनकी कविताएँ सुन कर भावुक हो जाएँगे, तो वो भूल जाएँ। भूल इसलिए जाएँ कि हिन्दुओं की सहिष्णुता और उदारवाद को इस्लामी आतंकियों ने सदियों से रौंदा है, उसका फायदा उठाया है। जैसा कि के के मुहम्मद कहते हैं कि भारत अगर एक धर्मनिरपेक्ष और शांत समाज है, जिसमें बीस करोड़ मुसलमान भी हैं, तो ये सिर्फ हिन्दुओं की वजह से है।

हिन्दुओं को वहाँ बसने के लिए पुराने तरीके त्यागने होंगे। उन्हें यह याद रखना होगा कि उनके मंदिरों पर जब लाउडस्पीकर लगे थे, और वहाँ से न सिर्फ इस्लामी शब्द कहे गए थे, बल्कि यह भी गूँज रहा था कि इनके मर्दों को जाने दो, हमें सिर्फ हिन्दू औरतें चाहिए। इन्होंने उन लड़कियों और स्त्रियों के साथ हर बार एक ही दुष्कृत्य किया है, और उसका पाप वहाँ के हर उस मुसलमान को ढोना ही पड़ेगा जो इस त्रासदी पर चुप रहता है।

शाहीन बाग की नौटंकीबाज़ मुसलमान औरतों को हर उस हिन्दू का नाम, उनकी हत्या की तारीख, उनकी हत्या का पूर्ण विवरण, हत्या का कारण और उनकी बहू-बेटियों की स्थिति के पोस्टर हाथ में ले कर पूरी दिल्ली में फैल जाना चाहिए और कहना चाहिए कि मुसलमानों के इन कुकर्मों के लिए उनका पूरा समुदाय शर्मिंदा है। अगर इससे एक डिग्री कम भी कुछ कर रहे हैं ये लोग, तो ये बस स्टंट है अपने पिछले पापों को छुपाने का।

मैं नहीं जानता कश्मीरी हिन्दू वापस कब जाएँगे, कैसे जाएँगे। लेकिन मैं यह बात अवश्य जानता हूँ कि कश्यप ऋषि की धरती पर, शारदा और शिव की भूमि पर, जबरन बसे हुए मुसलमान इन हिन्दुओं के लिए पलक-पाँवड़े तो नहीं बिछाएँगे। अगर ये सत्ता के संरक्षण में उस धरती पर कदम रख कर, अपने काष्ठगृहों को दोबारा उठाने की कोशिश करेंगे, तो हाथ में पेट्रोल बम और माचिस ले कर घूमते मुसलमान आतंकियों का कोई जत्था, उसे जलाने से बिलकुल नहीं हिचकेगा।

उन्हें यह याद रखना चाहिए कि जब उनकी बेटी को कोई खींच कर ले जाएगा, सामूहिक बलात्कार करने को बाद, बढ़ई की आरी से दो हिस्सों में काट देगा, और लाश दो जगह मिलेगी, तब सेना या पुलिस ये सब होने के बाद मदद को आएगी। क्योंकि सरकारी और न्यायिक प्रक्रिया तो इसी तरह से चलती है। लेकिन ऐसा होने ही न पाए, उसके लिए कश्मीरी हिन्दू क्या करेगा?

तब सवाल यह उठता है कि अगर वो इस बार भी पेट्रोल बम, माचिस, सरिया, क्लासनिकोव, चाकू और बमों से तुम्हारा स्वागत करते हैं, तो हिन्दू इस बार क्या करेगा? मेरे ख्याल से वापस जाने वाले हिन्दुओं को इज़रायल के यहूदियों की कहानी
पढ़नी चाहिए। खास कर, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वाली।

हिंदू भाई को विचार अवश्य करना चाहिए
आपके धर्म ग्रंथ के बारे में स्कूलों में पढ़ाया नहीं जाता क्यों?

आप अपना वोट देते हैं।
मगर उनसे इस बात की जानकारी क्यों नहीं लेते?

भारत का एक सच्चा नागरिक 🙏कट्टर हिंदू सौरभ सिंह🙏