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25 जून/इतिहास-स्मृति

*लोकतन्त्र पर काला धब्बा*

संविधान के निर्माताओं की इच्छा थी कि भारत एक लोकतान्त्रिक देश रहे; पर 25 जून, 1975 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, उनके पुत्र संजय गांधी और उनकी धूर्त मंडली ने लोकतन्त्र के मुख पर कीचड़ पोत दी।

1971 में लोकसभा चुनाव और फिर पाकिस्तान से युद्ध में सफलता से इंदिरा गांधी का दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ा था। वे उ.प्र. में रायबरेली से सांसद बनीं थी; पर उनके निर्वाचन क्षेत्र में हुई धांधली के विरुद्ध उनके प्रतिद्वन्द्वी राजनारायण ने प्रयाग उच्च न्यायालय में मुकदमा दायर कर दिया था। न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने साहसी निर्णय देते हुए इंदिरा गांधी के निर्वाचन को निरस्त कर उन पर छह साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

इंदिरा गांधी सर्वोच्च न्यायालय में चली गयीं। वहां से उन्हें इस शर्त पर स्थगन मिला कि वे संसद में तो जा सकती हैं; पर बहस और मतदान में भाग नहीं ले सकतीं। माता-पिता की अकेली संतान होने के कारण वे बचपन से ही जिद्दी थीं। उन्होंने त्यागपत्र देने की बजाय आंतरिक उपद्रव से निबटने के नाम पर आपातकाल लगा दिया। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद तो उनके चमचे थे ही। उन्होंने 25 जून, 1975 की रात में कागजों पर हस्ताक्षर कर दिये।

वस्तुतः इसके लिए मंत्रिमंडल की सहमति आवश्यक थी; पर इंदिरा, संजय और उनके चमचों ने कुछ नहीं देखा। अगले दिन प्रातः मंत्रियों से हस्ताक्षर की औपचारिकता भी पूरी करा ली गयी। आपातकाल लगते ही नागरिकों के मूल अधिकार स्थगित हो गये। विपक्षी नेताओं को जेल में ठूंस दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। समाचार पत्रों पर सेंसरशिप लागू कर दी गयी। सारे देश में आतंक छा गया।

इसके बाद इंदिरा गांधी ने संविधान में ऐसे अनेक संशोधन कराये, जिससे प्रधानमंत्री पर कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता था। 39 वां संशोधन सात अगस्त, 1975 को संसद में केवल दो घंटे में ही पारित कर दिया गया। विपक्षी नेता जेल में थे और सत्ता पक्ष वाले आतंकित। ऐसे में विरोध कौन करता ? आठ अगस्त को यह राज्यसभा में भी पारित हो गया। नौ अगस्त, (शनिवार) को अवकाश के बावजूद सभी राज्यों की विधानसभाओं के विशेष सत्र बुलाकर वहां भी इसे पारित करा दिया गया। दस अगस्त ( रविवार) को राष्ट्रपति ने भी सहमति दे दी और इस प्रकार यह कानून बन गया।

इस तेजी का कारण यह था कि 11 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई होनी थी। नये कानून से इंदिरा गांधी न्यायालय से भी ऊंची हो गयीं और सुनवाई नहीं हो सकी। पूरा देश कांग्रेसी गुंडो की तानाशाही की गिरफ्त में आ गया; पर समय सदा एक सा नहीं रहता। धीरे-धीरे लोग आतंक से उबरने लगे। संघ द्वारा भूमिगत रूप से किये जा रहे प्रयास रंग लाने लगे। लोगों का आक्रोश फूटने लगा। आपातकाल और प्रतिबन्ध के विरुद्ध हुए सत्याग्रह में एक लाख से अधिक स्वयंसेवकों ने गिरफ्तारी दी। लोकतन्त्र की इस हत्या के विरुद्ध विदेशों में भी लोग इंदिरा गांधी से प्रश्न पूछने लगे।

इससे इंदिरा गांधी पर दबाव पड़ा। उसके गुप्तचरों ने सूचना दी कि देश में सर्वत्र शांति हैं और चुनाव में आपकी जीत सुनिश्चित है। इस भ्रम में इंदिरा गांधी ने चुनाव घोषित कर दिये; पर यह दांव उल्टा पड़ा। चुनाव में उसकी पराजय हुई और दिल्ली में जनता पार्टी की सरकार बन गयी। मां और पुत्र दोनों चुनाव हार गये। इस शासन ने वे सब असंवैधानिक संशोधन निरस्त कर दिये, जिन्होंने प्रधानमंत्री को न्यायालय से भी बड़ा बना दिया था। इस प्रकार इंदिरा गांधी की तानाशाही समाप्त होकर देश में लोकतन्त्र की पुनर्स्थापना हुई…✍🚩

Posted in Kashmir

बहुत से लोग कहते है, कश्मीर में हिन्दू को पुनः बसायेंगे।

पर क्या ये घटना के बाद आपको लगता है हिन्दू फिर से बसाने के बाद बचेंगे।

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अभी न्यूज़ देख रहा था ध्यान से सुनने पर एक गहराई वाली बात सुनाई दी कल कश्मीर में एक DSP मोहम्मद अयूब “पंडित” की मस्जिद के बाहर मुस्लिमो ने पीट पीटकर हत्या कर दी

न्यूज़ चैनल वाले DSP के परिवार वालो के मुह में माइक डालकर सवाल पूछ रहे थे रोते हुए एक महिला के मुहँ से सच निकल गया

उस महिला ने बुर्खे के अन्दर से बोला ” भीड़ ने मेरे अयूब को “#पंडित” समझकर पिट डाला वो उसको मुखबिर समझ रहे थे पहले अयूब से पूछ लेते वो तो वहां #नमाज पढने गया था

अगर भीड़ सिर्फ नाम में “#पंडित” होने पर ही आपको पीटकर मार डालती है तो इसका मतलब आप समझ सकते हो कश्मीर में “कश्मीरी पंडितो ” की क्या #हालात हुई होगी

माइक मुहँ में डालकर सच उगलवाने के लिए “अज्ञात” पत्रकार को धन्यवाद्

ये प्रोग्राम ABP न्यूज़ पर था

Posted in Rajniti Bharat ki

सत्तर अस्सी के दशक में राजनीति के गलियारे में दबी जुबान से ”जग्गू-जगुआर” की चर्चा हुआ करती थी ! तब मुझे राजनीति की कोई समझ नहीं थी और न ही कोई ख़ास लगाव हुआ करता था ! 
दरअसल ”जग्गू-जगुआर” का मतलब जग्गू यानी जगजीवन राम (तत्कालीन रक्षामंत्री) और जगुआर लड़ाकू विमान ! इस विमान की खरीद में कथित रूप से बब्बू जी को घूस मिलने की बात राजनैतिक गलियारे में चर्चा का विषय हुआ करती थी ! एक बार तो जगजीवन राम ने सेना अध्यक्ष ”मानिक शा” पर भी अभद्र भाषा का प्रयोग किया था ! 
मेरे पिता जी को राजनीति में बहुत लगाव था उस समय पर ”दिनमान और रविवार” नाम की पाक्षिक पत्रिकाएं आती थी जिन्हे पिता जी बहुत पढ़ते थे ! (आपको बता दूँ की पूर्व उपराष्ट्रपति स्वर्गीय श्री भैरोंसिंह शेखावत जी भी ये पत्रिकाएं पढ़ते थे) कभी कभी मैं भी चित्र देखने के बहाने कुछ पढ़ लिया करता था ! सायद 1975 की बात है तब मैं 10 साल का था, गर्मियों की छुट्टी में पिता जी शहडोल (MP) से गाँव आये हुए थे ! उनकी चारपाई में तकिये के नीचे दिनमान या रविवार या कोई अन्य पत्रिका रखी थी, मैंने उसे उठाकर पन्ने पलटने लगा इतने में पिता जी आ गए और पत्रिका हाथ से छुड़ा लिया ! जबकि इसके पहले कभी भी ऐसा नहीं किया ! उलटा बोलते थे ”चित्र देख लिए हो तो लाओ मुझे दे दो” ! 
मेरे बालमन में बार बार उस पत्रिका के चित्र देखने की लालच नहीं गया और एक दिन चुपचाप मैंने देख लिए ! उसमे कई फोटो छपे थे पर अब कुछ याद नहीं ! पर आज एक मित्र की पोस्ट में मीराकुमार (राष्ट्रपति की उम्मीदवार) के भाई सुरेश कुमार के किसी महिला के साथ आपत्तिजनक स्थित में एक फोटो देखा तो मुझे 42 साल पुरानी ओ धुंधली याद आ गई जिसमे पत्रिका के एक पेज को पिता जी ने मोड़ कर छिपा दिया था !
इस फोटो की आधी अधूरी सच्चाई जो ज्ञात है (गुगलियाये नहीं कुछ नहीं मिलेगा) ओ ये है की ! बाबू जगजीवन राम जी का बेटा ”सुरेश कुमार” एक बिगड़ी हुई अय्याश किस्म की औलाद था जिसने  देश की रक्षा संबधी महत्वपूर्ण जानकारियों को चीन तथा पाकिस्तान को बेच दिया था ! तब 1970 से 1974 तक जगजीवन राम देश के रक्षामंत्री के रूप में काम किया करते थे विदेशी गुप्त चार एजेंसिया गुप्त सूचनाएं हासिल करने के लिए सुरेश कुमार को शराब तथा अय्याशी का पूरा इंतजाम किया करते थे ! इसी सिलसिले में उसने सुषमा नाम की विदेशी एजेंट से शारीरिक संबंध भी बनाए विदेशी गुप्तचर एजेंसियों ने ब्लैकमेल करने के लिए उसकी अश्लील फोटो भी खीच रखी थी जिसके वजह से वह हर महत्वपूर्ण सूचना भारत विरोधी गुप्तचर संस्थाओं को दे देता था ! इन अश्लील चित्रों के लीक होने से जगजीवन राम को काफी अपमानित होना पडा था , तथा राजनैतिक कैरियर में नुकसान भी उठाना पडा था ! 
सनद रहे जिस दिन पेपर में यह चित्र छपा था उस पेपर की सारी प्रतिया रातो रात खरीद ली गई थी और कुछ माह बाद वह पेपर बंद हो गया था (अखबार का नाम याद नहीं आ रहा) ! इसी तरह से ओ पत्रिका भी कुछ साल बाद बंद हो गई !
अब ये कहेंगे की गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या मिलेगा ? तो भैया जी मामला देश के सर्वोच्च पद का है ! कांगियों की नीति और नियत तो बताना हम राष्ट्रवदियों का पुनीत धर्म है !
नोट—: सभी अश्लील फोटो पोस्ट नहीं कर रहा हूँ !

Posted in Hindu conspiracy

ॐ..

क्या आपको पता है .. 

हर साल मुल्लो की ईद और विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा एक ही दिन होती है 

बहुत लोगो को नही पता होगा .. 

जो खुद को तथाकथित कट्टर हिन्दू बोलते हैं उनको भी पता नही होगा कि कल पुरी में रथ यात्रा है
अजीब है ना 80% हिन्दुओ वाले इस देश में एक खून कत्ल ऐ आम वाला वहशी त्यौहार (ईद) हमारे सैकड़ो पुरानी पवित्र परम्पराओ पर हावी हो जाता है
2 ,3 दिनों से चारो तरफ ईद के msg घूमने लगे हैं 

Wtsp , fb पर ईद मुबारक वाले msg वायरल होने लगे
जिन हिन्दुओ को ईद का मतलब भी नही पता वो उछल उछल कर post करेंगे 

ईद की शुभकांमनाये देने वाला भी हिन्दू और ईद की शुभ कामनाएं लेने वाले भी चूतिये हिन्दू ….
जगनाथ रथ यात्रा को भुला कर दुसरो की देखा देखी करेंगे
वही इस पवित्र यात्रा के लिए सबसे ज्यादा विदेशी उत्साह दिखाते हैं 

हिन्दुओ को तो याद भी नही रहता कि भगवान जगन्नाथ भी आज के दिन अपने गर्भ गृह को छोड़ दर्शन देने आये हैं
देखा देखी से बचें 

अपने आप को अपनी परम्पराओ अपनी रीतियों को तरफ मोड़े… 

ईद मुबारक नही .. जय जगन्नाथ बोलिये…..
PHOTO FROM LONDON TRAFALGAR SQUARE 18 JUNE 2017 WHEN I WENT TO CELEBRATE JAGANNATH RATH YATRA

Posted in छोटी कहानिया - Chooti Kahaniya

http://abhishekgarwara.blogspot.in/2017/06/blog-post.html?m=1
कहानी बड़ी है लेकिन पूरा पढियेगा जरूर मुझे पूरा विश्वास है कि आपको यह पसन्द जरूर आयेगी ।

एक घर के करीब से गुज़र रहा था अचानक मुझे घर के अंदर से एक दस साल के बच्चे की रोने की आवाज़ आई – आवाज़ में इतना दर्द था कि अंदर जा कर बच्चा क्यों रो रहा है यह मालूम करने से मैं खुद को रोक ना सका – अंदर जा कर मैने देखा कि माँ अपने बेटे को धीरे से मारती और बच्चे के साथ खुद भी रोने लगती – मै ने आगे हो कर पूछा ऑन्टी क्यों बच्चे को मार रही हो जबकि खुद भी रोती हो….. उसने जवाब दिया की आप तो जानते ही होंगे कि इसके पिताजी का देहांत हो गया है। हम बहुत गरीब हैं। उनके जाने के बाद मैं फैक्ट्री में मजदूरी करके घर और इसके पढ़ाई का खर्च बहुत कठिनाई के साथ उठाती हूँ यह  देर से स्कूल जाता है और देर से घर आता है – जाते हुए रास्ते मे कहीं खेल कूद में लग जाता है और पढ़ाई की तरफ ज़रा भी ध्यान नहीं देता है जिसकी वजह से रोज़ाना अपनी स्कूल की यूनिफार्म गन्दी कर लेता है – मै ने बच्चे और उसकी माँ को थोड़ा समझाया और चल दिया…..
कुछ दिन ही बीते थे…एक दिन सुबह सुबह कुछ काम से सब्जी मंडी गया – तो अचानक मेरी नज़र उसी दस साल के बच्चे पर पड़ी जो रोज़ाना घर से मार खाता था – क्या देखता हूँ कि वह बच्चा मंडी में घूम रहा है और जो दुकानदार अपनी दुकानों के लिए सब्ज़ी खरीद कर अपनी बोरियों में डालते तो उनसे कोई सब्ज़ी ज़मीन पर गिर जाती वह बच्चा उसे फौरन उठा कर अपनी झोली में डाल लेता – मै यह माजरा देख कर परेशान हो रहा था कि चक्कर क्या है – मै उस बच्चे को चोरी चोरी फॉलो करने लगा – जब उसकी झोली सब्ज़ी से भर गई तो वह सड़क के किनारे बैठ कर उसे ऊंची ऊंची आवाज़ें लगा कर बेचने लगा – मुंह पर मिट्टी गन्दी वर्दी और आंखों में नमी , ऐसा महसूस हो रहा था कि ऐसा दुकानदार ज़िन्दगी में पहली बार देख रहा हूँ कि अचानक एक आदमी अपनी दुकान से उठा जिसकी दुकान के सामने उस बच्चे ने अपनी नन्ही सी दुकान लगाई थी , उसने आते ही एक जोरदार धक्का मार कर उस नन्ही दुकान को एक ही झटके में रोड पर बिखेर दिया और बाज़ुओं से पकड़ कर उस बच्चे को भी उठा कर धक्का दे दिया – वह बच्चा आंखों में आंसू लिए चुप चाप दोबारा अपनी सब्ज़ी को इकठ्ठा करने लगा और थोड़ी देर बाद अपनी सब्ज़ी एक दूसरे दुकान के सामने डरते डरते लगा ली – भला हो उस दुकानदार का जिसकी दुकान के सामने इस बार उसने अपनी नन्ही दुकान लगाई उस ने बच्चे को कुछ नहीं कहा – थोड़ी सी सब्ज़ी थी ऊपर से दूसरी दुकानों से कम कीमत की थी इसलिए जल्द ही बिक गयी और वह बच्चा उठा और बाज़ार में एक कपड़े वाले की दुकान में घुस गया और दुकानदार को वह पैसे देकर दुकान में पड़ा अपना स्कूल बैग उठाया और बिना कुछ कहे वापस स्कूल की ओर चल पड़ा । कौतूहल वश मैं भी उसके पीछे पीछे चल रहा था – बच्चे ने रास्ते में अपना मुंह धोया और स्कूल चल दिया – मै भी उसके पीछे स्कूल चला गया – जब वह बच्चा स्कूल गया तो एक घंटा लेट हो चुका था – जिस पर अध्यापक जी ने डंडे से उसे खूब मारा – मैने जल्दी से जाकर अध्यापक जी को मना किया कि छोटा बच्चा है इसे मत मारो – अध्यापक कहने लगे कि यह रोज़ाना एक डेढ़ घण्टे लेट से ही आता है मै रोज़ाना इसे सज़ा देता हूँ कि डर से स्कूल समय पर आए और कई बार मै इसके घर पर भी सुचना दे चुका हूं – खैर बच्चा मार खाने के बाद क्लास में बैठ कर पढ़ने लगा – मैने उसके शिक्षक का मोबाइल नम्बर लिया और घर की ओर चल दिया घर पहुंच कर ज्ञात हुआ कि जिस कार्य के लिए मैं सब्ज़ी मंडी गया था उसको तो भूल ही गया। दूसरी ओर बच्चे ने घर आ कर माँ से एक बार फिर मार खाई – सारी रात मेरा सर चकराता रहा  – सुबह उठकर जल्दी से तैयार हुआ और ईश्वर की आराधना के उपरांत शिक्षक महोदय को मोबाइल पर फोन कर कहा कि हर हालत में तुरंत सब्जीमंडी पहुंचें। शिक्षक महोदय ने मेरे अनुरोध को स्वीकार किया। बच्चे का स्कूल जाने का समय हुआ और बच्चा घर से सीधा सब्जीमंडी अपनी नन्ही सी दुकान की व्यवस्था करने चल पड़ा। मै ने उसके घर जाकर उसकी माँ को कहा कि ऑन्टी आप मेरे साथ चलो मै तुम्हे बताता हूँ आप का बेटा स्कूल क्यों देर से जाता है – वह फौरन मेरे साथ क्रोध मे यह बड़बड़ाते हुए चल पड़ीं कि आज उस लड़के को छोडूंगी नहीं उसे आज बहुत मार मारूंगी। मंडी में बच्चे के शिक्षक भी आ चुके थे। हम तीनों सब्जीमंडी के एक स्थान पर आड़ लेकर खड़े हो गए जहाँ से उस बच्चे को देखा जा सकता था लेकिन वो हमें नहीं और उस लड़के को छुप कर देखने लगे। प्रतिदिन की भाँति उसको आज भी उसे काफी लोगों से डांट फटकार और धक्के खाने पड़े और आखिरकार वह लड़का अपनी सब्ज़ी बेच कर कपड़े वाली दुकान पर चल दिया। मेरी नज़र उसकी माँ पर पड़ी तो देखता हूँ कि वो बहुत ही दर्द भरी सिसकियां लेकर रो रही थी। मै ने स्कूल के अध्यापक जी की ओर देखा तो बहुत करुणा के साथ उनके नेत्रों से अश्रु बह रहे थे। दोनो के रोने में मुझे ऐसा लग रहा था जैसे उन्हों ने बहुत बड़ा  अपराध किया हो और आज उन को अपनी गलती का पछतावा हो रहा हो। मैंने दोनों को सांत्वना देते हुए वहां से विदा किया। उसकी माँ रोते रोते घर चली गयी और अध्यापक जी भी सजल नेत्रों के साथ स्कूल चले गए। पूर्व की भाँति बच्चे ने दुकानदार को पैसे दिए और आज उसको दुकानदार ने कपडे देते हुए कहा कि बेटा आज कपड़ों के सारे पैसे पूरे हो गए हैं। बच्चे ने उन कपड़ों को पकड़ कर स्कूल बैग में रखा और स्कूल चला गया – आज भी एक घंटा लेट था वह सीधा आचार्य जी के पास गया और बैग डेस्क पर रखकर मार खाने के लिए अपने हाथ आगे कर दिए कि शिक्षक डंडे से उसे मार ले। आचार्य अपनी कुर्सी से उठे और बच्चे को गले लगाकर सुबक पड़े कि मैं भी देख कर अपने आंसुओं पर नियंत्रण ना रख सका। मै ने अपने आप को संभाला और आगे बढ़कर बच्चे से पूछा कि यह जो बैग में कपडे हैं वो है वह किसके लिए है – बच्चे ने रोते हुए जवाब दिया कि मेरी माँ फैक्ट्री में मजदूरी करने जाती है और उसके कपड़े फटे हुए होते हैं। कोई कपडा सही ढंग से तन ढांपने वाला नहीं और और हमारे माँ के पास पैसे नही हैं इसलिये इस दिवाली पर अपने माँ के लिए यह सलवार कमीज का कपडा खरीदा है। मैंने बच्चे से पूछा तो यह कपडा अब घर ले जाकर माँ को दोगे ? परंतु उसके उत्तर ने मेरे और उस बच्चे के शिक्षक के पैरों के नीचे से ज़मीन ही निकाल दी…. बच्चे ने जवाब दिया नहीं अंकल छुट्टी के बाद मैं इसे दर्जी को सिलाई के लिए दे दूँगा। रोज़ाना स्कूल से जाने के बाद काम करके थोड़े थोड़े पैसे सिलाई के लिए दर्जी के पास जमा किये हैं ।

…. आचार्य जी और मैं यह सोच कर रोते जा रहे थे कि आखिर कब तक हमारे समाज में गरीबों और विधवाओं के साथ ऐसा होता रहेगा उन के बच्चे होली-दिवाली जैसी खुशियों को मानाने के लिए कठोर परीक्षाओं का परिश्रम के साथ सामना करते रहेंगे आखिर कब तक!

क्या ईश्वर ने इन जैसे गरीब अनाथ बच्चों और विधवाओं को त्योहारों को प्रसनन्ता के साथ मनाने का कोई हक नहीं दिया? क्या हम चन्द रुपयों का मन्दिर में चढ़ावा या दान दे कर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से हट सकते हैं?
क्या हम अपनी खुशियों के अवसरों पर अपनी व्यर्थ की इच्छाओं को कम कर थोड़े पैसे, थोड़ी खुशियां उनके साथ नहीं बाँट सकते?!!!
सोचना ज़रूर ।

अगर आपको अच्छा लगा हो तो शेयर जरूर करे ।

अभिषेक अग्रवाल

Posted in Srimad Bhagvat Geeta

*जय श्री कृष्ण*

*”उद्धव-गीता”*
उद्धव बचपन से ही सारथी के रूप में श्रीकृष्ण की सेवा में रहे, किन्तु उन्होंने श्री कृष्ण से कभी न तो कोई इच्छा जताई और न ही कोई वरदान माँगा।

जब कृष्ण अपने अवतार काल को पूर्ण कर गौलोक जाने को तत्पर हुए, तब उन्होंने उद्धव को अपने पास बुलाया और कहा-

*”प्रिय उद्धव मेरे इस ‘अवतार काल’ में अनेक लोगों ने मुझसे वरदान प्राप्त किए, किन्तु तुमने कभी कुछ नहीं माँगा! अब कुछ माँगो, मैं तुम्हें देना चाहता हूँ।*

तुम्हारा भला करके, मुझे भी संतुष्टि होगी।

*उद्धव ने इसके बाद भी स्वयं के लिए कुछ नहीं माँगा। वे तो केवल उन शंकाओं का समाधान चाहते थे जो उनके मन में कृष्ण की शिक्षाओं, और उनके कृतित्व को, देखकर उठ रही थीं।*

उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा-

“भगवन महाभारत के घटनाक्रम में अनेक बातें मैं नहीं समझ पाया!

आपके ‘उपदेश’ अलग रहे, जबकि ‘व्यक्तिगत जीवन’ कुछ अलग तरह का दिखता रहा!

क्या आप मुझे इसका कारण समझाकर मेरी ज्ञान पिपासा को शांत करेंगे?”
*श्री कृष्ण बोले-*

*“उद्धव मैंने कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अर्जुन से जो कुछ कहा, वह “भगवद्गीता” थी।*

*आज जो कुछ तुम जानना चाहते हो और उसका मैं जो तुम्हें उत्तर दूँगा, वह “उद्धव-गीता” के रूप में जानी जाएगी।*

इसी कारण मैंने तुम्हें यह अवसर दिया है।

तुम बेझिझक पूछो।

उद्धव ने पूछना शुरू किया- 
*”हे कृष्ण, सबसे पहले मुझे यह बताओ कि सच्चा मित्र कौन होता है?”*

कृष्ण ने कहा- “सच्चा मित्र वह है जो जरूरत पड़ने पर मित्र की बिना माँगे, मदद करे।”

*उद्धव-* 

*”कृष्ण, आप पांडवों के आत्मीय प्रिय मित्र थे। आजाद बांधव के रूप में उन्होंने सदा आप पर पूरा भरोसा किया।*

*कृष्ण, आप महान ज्ञानी हैं। आप भूत, वर्तमान व भविष्य के ज्ञाता हैं।*

*किन्तु आपने सच्चे मित्र की जो परिभाषा दी है, क्या आपको नहीं लगता कि आपने उस परिभाषा के अनुसार कार्य नहीं किया?*

*आपने धर्मराज युधिष्ठिर को द्यूत (जुआ) खेलने से रोका क्यों नहीं?*

चलो ठीक है कि आपने उन्हें नहीं रोका, लेकिन आपने भाग्य को भी धर्मराज के पक्ष में भी नहीं मोड़ा!

आप चाहते तो युधिष्ठिर जीत सकते थे!

आप कम से कम उन्हें धन, राज्य और यहाँ तक कि खुद को हारने के बाद तो रोक सकते थे!

उसके बाद जब उन्होंने अपने भाईयों को दाँव पर लगाना शुरू किया, तब तो आप सभाकक्ष में पहुँच सकते थे! आपने वह भी नहीं किया? उसके बाद जब दुर्योधन ने पांडवों को सदैव अच्छी किस्मत वाला बताते हुए द्रौपदी को दाँव पर लगाने को प्रेरित किया, और जीतने पर हारा हुआ सब कुछ वापस कर देने का लालच दिया, कम से कम तब तो आप हस्तक्षेप कर ही सकते थे!

   अपनी दिव्य शक्ति के द्वारा आप पांसे धर्मराज के अनुकूल कर सकते थे!

*इसके स्थान पर आपने तब हस्तक्षेप किया, जब द्रौपदी लगभग अपना शील खो रही थी, तब आपने उसे वस्त्र देकर द्रौपदी के शील को बचाने का दावा किया!*

   *लेकिन आप यह यह दावा भी कैसे कर सकते हैं?*

उसे एक आदमी घसीटकर हॉल में लाता है, और इतने सारे लोगों के सामने निर्वस्त्र करने के लिए छोड़ देता है!

एक महिला का शील क्या बचा? आपने क्या बचाया?

*अगर आपने संकट के समय में अपनों की मदद नहीं की तो आपको आपाद-बांधव कैसे कहा जा सकता है?*

बताईए, आपने संकट के समय में मदद नहीं की तो क्या फायदा?

क्या यही धर्म है?”

इन प्रश्नों को पूछते-पूछते उद्धव का गला रुँध गया और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

*ये अकेले उद्धव के प्रश्न नहीं हैं।* *महाभारत पढ़ते समय हर एक के मनोमस्तिष्क में ये सवाल उठते हैं!*

*उद्धव ने हम लोगों की ओर से ही श्रीकृष्ण से उक्त प्रश्न किए।*

  भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए बोले-

*”प्रिय उद्धव, यह सृष्टि का नियम है कि विवेकवान ही जीतता है।*

*उस समय दुर्योधन के पास विवेक था, धर्मराज के पास नहीं।*

*यही कारण रहा कि धर्मराज पराजित हुए।”*
उद्धव को हैरान परेशान देखकर *कृष्ण आगे बोले- “दुर्योधन के पास जुआ खेलने के लिए पैसाऔर धन तो बहुत था, लेकिन उसे पासों का खेल खेलना नहीं आता था, इसलिए उसने अपने मामा शकुनि का द्यूतक्रीड़ा के लिए उपयोग किया। यही विवेक है। धर्मराज भी इसी प्रकार सोच सकते थे और अपने चचेरे भाई से पेशकश कर सकते थे कि उनकी तरफ से मैं खेलूँगा।*

*जरा विचार करो कि अगर शकुनी और मैं खेलते तो कौन जीतता?*

*पाँसे के अंक उसके अनुसार आते या मेरे अनुसार?*

चलो इस बात को जाने दो। *उन्होंने मुझे खेल में शामिल नहीं किया, इस बात के लिए उन्हें माफ़ किया जा सकता है।* *लेकिन उन्होंने विवेक-शून्यता से एक और बड़ी गलती की!*

*और वह यह-*

*उन्होंने मुझसे प्रार्थना की कि मैं तब तक सभा-कक्ष में न आऊँ, जब तक कि मुझे बुलाया न जाए!*

*क्योंकि वे अपने दुर्भाग्य से खेल मुझसे छुपकर खेलना चाहते थे।*

*वे नहीं चाहते थे, मुझे मालूम पड़े कि वे जुआ खेल रहे हैं!*

इस प्रकार उन्होंने मुझे अपनी प्रार्थना से बाँध दिया! मुझे सभा-कक्ष में आने की अनुमति नहीं थी!

*इसके बाद भी मैं कक्ष के बाहर इंतज़ार कर रहा था कि कब कोई मुझे बुलाता है! भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव सब मुझे भूल गए! बस अपने भाग्य और दुर्योधन को कोसते रहे!* 

*अपने भाई के आदेश पर जब दुस्साशन द्रौपदी को बाल पकड़कर घसीटता हुआ सभा-कक्ष में लाया, द्रौपदी अपनी सामर्थ्य के अनुसार जूझती रही!*

*तब भी उसने मुझे नहीं पुकारा!*
*उसकी बुद्धि तब जागृत हुई, जब दुस्साशन ने उसे निर्वस्त्र करना प्रारंभ किया!*

*जब उसने स्वयं पर निर्भरता छोड़कर-*

 *’हरि, हरि, अभयम कृष्णा, अभयम’-*

*की गुहार लगाई, तब मुझे उसके शील की रक्षा का अवसर मिला।*

*जैसे ही मुझे पुकारा गया, मैं अविलम्ब पहुँच गया।*

*अब इस स्थिति में मेरी गलती बताओ?”*

उद्धव बोले-

*”कान्हा आपका स्पष्टीकरण प्रभावशाली अवश्य है, किन्तु मुझे पूर्ण संतुष्टि नहीं हुई!* 

क्या मैं एक और प्रश्न पूछ सकता हूँ?”

कृष्ण की अनुमति से उद्धव ने पूछा-

*”इसका अर्थ यह हुआ कि आप तभी आओगे, जब आपको बुलाया जाएगा? क्या संकट से घिरे अपने भक्त की मदद करने आप स्वतः नहीं आओगे?”*

कृष्ण मुस्कुराए-

*”उद्धव इस सृष्टि में हरेक का जीवन उसके स्वयं के कर्मफल के आधार पर संचालित होता है।*

*न तो मैं इसे चलाता हूँ, और न ही इसमें कोई हस्तक्षेप करता हूँ।*

*मैं केवल एक ‘साक्षी’ हूँ।*

*मैं सदैव तुम्हारे नजदीक रहकर जो हो रहा है उसे देखता हूँ।*

*यही ईश्वर का धर्म है।”*
“वाह-वाह, बहुत अच्छा कृष्ण!

*तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप हमारे नजदीक खड़े रहकर हमारे सभी दुष्कर्मों का निरीक्षण करते रहेंगे?* 

*हम पाप पर पाप करते रहेंगे, और आप हमें साक्षी बनकर देखते रहेंगे?*

*आप क्या चाहते हैं कि हम भूल करते रहें? पाप की गठरी बाँधते रहें और उसका फल भुगतते रहें?”*

उलाहना देते हुए उद्धव ने पूछा!
तब कृष्ण बोले-

*”उद्धव, तुम शब्दों के गहरे अर्थ को समझो।*

*जब तुम समझकर अनुभव कर लोगे कि मैं तुम्हारे नजदीक साक्षी के रूप में हर पल हूँ, तो क्या तुम कुछ भी गलत या बुरा कर सकोगे?*

*तुम निश्चित रूप से कुछ भी बुरा नहीं कर सकोगे।*

*जब तुम यह भूल जाते हो और यह समझने लगते हो कि मुझसे छुपकर कुछ भी कर सकते हो, तब ही तुम मुसीबत में फँसते हो! धर्मराज का अज्ञान यह था कि उसने माना कि वह मेरी जानकारी के बिना जुआ खेल सकता है!*
*अगर उसने यह समझ लिया होता कि मैं प्रत्येक के साथ हर समय साक्षी रूप में उपस्थित हूँ तो क्या खेल का रूप कुछ और नहीं होता?”*
 भक्ति से अभिभूत उद्धव मंत्रमुग्ध हो गये और बोले- 

*प्रभु कितना गहरा दर्शन है। कितना महान सत्य। ‘प्रार्थना’ और ‘पूजा-पाठ’ से, ईश्वर को अपनी मदद के लिए बुलाना तो महज हमारी ‘पर-भावना’ है।  मग़र जैसे ही हम यह विश्वास करना शुरू करते हैं कि ‘ईश्वर’ के बिना पत्ता भी नहीं हिलता! तब हमें साक्षी के रूप में उनकी उपस्थिति महसूस होने लगती है।* 

*गड़बड़ तब होती है, जब हम इसे भूलकर दुनियादारी में डूब जाते हैं।*

*सम्पूर्ण श्रीमद् भागवद् गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इसी जीवन-दर्शन का ज्ञान दिया है।*

*सारथी का अर्थ है- मार्गदर्शक।*

अर्जुन के लिए सारथी बने श्रीकृष्ण वस्तुतः उसके मार्गदर्शक थे।

*वह स्वयं की सामर्थ्य से युद्ध नहीं कर पा रहा था, लेकिन जैसे ही अर्जुन को परम साक्षी के रूप में भगवान कृष्ण का एहसास हुआ, वह ईश्वर की चेतना में विलय हो गया!*

*यह अनुभूति थी, शुद्ध, पवित्र, प्रेममय, आनंदित सुप्रीम चेतना की!*

*तत-त्वम-असि!*

अर्थात…

*वह तुम ही हो।।*

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भारत में मुसलमानो के 800 वर्ष के शासन का झूठ : श्री राजिव दीक्षित द्वारा-
_क्या भारत में मुसलमानों ने 800 वर्षों तक शासन किया है-_

_सुनने में यही आता है पर न कभी कोई आत्ममंथन करता है और न इतिहास का सही अवलोकन। आईये देखते हैं, इतिहास के वास्तविक नायक कौन थे? और उन्होंने किस प्रकार मुगलिया ताकतों को रोके रखा और भारतीय संस्कृति की रक्षा में सफल रहे।_
_राजा दाहिर : प्रारम्भ करते है मुहम्मद बिन कासिम के समय से-_

_भारत पर पहला आक्रमण मुहम्मद बिन ने 711 ई में सिंध पर किया। राजा दाहिर पूरी शक्ति से लड़े और मुसलमानों के धोखे के शिकार होकर वीरगति को प्राप्त हुए।_
_बप्पा रावल:_ _दूसरा हमला 735 में राजपुताना पर हुआ जब हज्जात ने सेना भेजकर बप्पा रावल के राज्य पर आक्रमण किया। वीर बप्पा रावल ने मुसलमानों को न केवल खदेड़ा बल्कि अफगानिस्तान तक मुस्लिम राज्यों को रौंदते हुए अरब की सीमा तक पहुँच गए। ईरान अफगानिस्तान के मुस्लिम सुल्तानों ने उन्हें अपनी पुत्रियां भेंट की और उन्होंने 35 मुस्लिम लड़कियों से विवाह करके सनातन धर्म का डंका पुन: बजाया। बप्पा रावल का इतिहास कही नहीं पढ़ाया जाता। यहाँ तक की अधिकतर इतिहासकर उनका नाम भी छुपाते है। गिनती भर हिन्दू होंगे जो उनका नाम जानते हैं!_
_दूसरे ही युद्ध में भारत से इस्लाम समाप्त हो चुका था। ये था भारत में पहली बार इस्लाम का नाश।_
_सोमनाथ के रक्षक राजा जयपाल और आनंदपाल:_ _अब आगे बढ़ते है गजनवी पर। बप्पा रावल के आक्रमणों से मुसलमान इतने भयक्रांत हुए की अगले 300 सालों तक वे भारत से दूर रहे।_
_इसके बाद महमूद गजनवी ने 1002 से 1017 तक भारत पर कई आक्रमण किये पर हर बार उसे भारत के हिन्दू राजाओ से कड़ा उत्तर मिला। पहले राजा जयपाल और फिर उनका पुत्र आनंदपाल, दोनों ने उसे मार भगाया था।_
_महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर भी कई आक्रमण किये पर 17 वे युद्ध में उसे सफलता मिली थी। सोमनाथ के शिवलिंग को उसने तोडा नहीं था बल्कि उसे लूट कर वह काबा ले गया था। जिसका रहस्य आपके समक्ष जल्द ही रखता हु। यहाँ से उसे शिवलिंग तो मिल गया जो चुम्बक का बना हुआ था। पर खजाना नहीं मिला। भारतीय राजाओ के निरंतर आक्रमण से वह वापिस गजनी लौट गया और अगले 100 सालो तक कोई भी मुस्लिम आक्रमणकारी भारत पर आक्रमण न कर सका।_
_सम्राट पृथ्वीराज चौहान:_ _1098 में मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज राज चौहान को 16 युद्द के बाद परास्त किया और अजमेर व दिल्ली पर उसके गुलाम वंश के शासक जैसे कुतुबुद्दीन, इल्तुमिश व बलवन दिल्ली से आगे न बढ़ सके। उन्हें हिन्दू राजाओ के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। पश्चिमी द्वार खुला रहा जहाँ से बाद में ख़िलजी लोधी तुगलक आदि आये। ख़िलजी भारत के उत्तरी भाग से होते हुए बिहार बंगाल पहुँच गए। कूच बिहार व बंगाल में मुसलमानो का राज्य हो गया पर बिहार व अवध प्रदेश मुसलमानो से अब भी दूर थे। शेष भारत में केवल गुजरात ही मुसलमानो के अधिकार में था। अन्य भाग स्वतन्त्र थे।_
_राणा सांगा:-_ _1526 में राणा सांगा ने इब्राहिम लोधी के विरुद्ध बाबर को बुलाया। बाबर ने लोधियों की सत्ता तो उखाड़ दी पर वो भारत की सम्पन्नता देख यही रुक गया और राणा सांगा को उसने युद्ध में हरा दिया। चित्तोड़ तब भी स्वतंत्र रहा पर अब दिल्ली मुगलो के अधिकार में थी। हुमायूँ दिल्ली पर अधिकार नहीं कर पाया पर उसका बेटा अवश्य दिल्ली से आगरा के भाग पर शासन करने में सफल रहा। तब तक कश्मीर भी मुसलमानो के अधिकार में आ चूका था।_
_महाराणा प्रताप:-_

  _अकबर पुरे जीवन महाराणा प्रताप से युद्ध में व्यस्त रहा। जो बाप्पा रावल के ही वंशज थे और उदय सिंह के पुत्र थे जिनके पूर्वजो ने 700 सालो तक मुस्लिम आक्रमणकारियों का सफलतापूर्वक सामना किया। जहाँगीर व शाहजहाँ भी राजपूतों से युद्धों में व्यस्त रहे व भारत के बाकी भाग पर राज्य न कर पाये।_
_दक्षिण में बीजापुर में तब तक इस्लाम शासन स्थापित हो चुका था।_
_छत्रपति शिवाजी महाराज:_औरंगजेब के समय में मराठा शक्ति का उदय हुआ और शिवाजी महाराज से लेकर पेशवाओ ने मुगलो की जड़े खोद डाली। शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित हिंदवी स्वराज्य का विस्तार उनके बाद आने वाले मराठा वीरों ने किया। बाजीराव पेशवा इन्होने मराठा सम्राज्य को भारत में हिमाचल बंगाल और पुरे दक्षिण में फैलाया। दिल्ली में उन्होंने आक्रमण से पहले गौरी शंकर भगवान से मन्नत मांगी थी कि यदि वे सफल रहे तो चांदनी चौक में वे भव्य मंदिर बनाएंगे। जहाँ कभी पीपल के पेड़ के नीचे 5 शिवलिंग रखे थे। बाजीराव ने दिल्ली पर अधिकार किया और गौरी शंकर मंदिर का निर्माण किया। जिसका प्रमाण मंदिर के बाहर उनके नाम का लगा हुआ शिलालेख है। बाजीराव पेशवा ने एक शक्तिशाली हिन्दुराष्ट्र की स्थापना की जो 1830 तक अंग्रेजो के आने तक स्थापित रहा।_
_अंग्रेजों और मुगलों की मिलीभगत:_

  _मुगल सुल्तान मराठाओ को चौथ व कर देते रहे थे और केवल लालकिले तक सिमित रह गए थे। और वे तब तक शक्तिहीन रहे। जब तक अंग्रेज भारत में नहीं आ गए। 1760 के बाद भारत में मुस्लिम जनसँख्या में जबरदस्त गिरावट हुई जो 1800 तक मात्र 7 प्रतिशत तक पहुँच गयी थी। अंग्रेजो के आने के बाद मुसल्मानो को संजीवनी मिली और पुन इस्लाम को खड़ा किया गया, ताकि भारत में सनातन धर्म को नष्ट किया जा सके। इसलिए अंग्रेजो ने 50 साल से अधिक समय से पहले ही मुसलमानो के सहारे भारत विभाजन का षड्यंत्र रच लिया था। मुसलमानो के हिन्दु विरोधी रवैये व उनके धार्मिक जूनून को अंग्रेजो ने सही से प्रयोग किया तो यह झूठा इतिहास क्यों पढ़ाया गया?:-_

 _असल में हिन्दुओ पर 1200 सालो के निरंतर आक्रमण के बाद भी जब भारत पर इस्लामिक शासन स्थापित नहीं हुआ और न ही अंग्रेज इस देश को पूरा समाप्त कर सके। तो उन्होंने शिक्षा को अपना अस्त्र बनाया और इतिहास में फेरबदल किये। अब हिन्दुओ की मानसिकता को बदलना है तो उन्हें ये बताना होगा की तुम गुलाम हो। लगातार जब यही भाव हिन्दुओ में होगा तो वे स्वयं को कमजोर और अत्याचारी को शक्तिशाली समझेंगे। इसी चाल के अंतर्गत ही हमारा जातीय नाम आर्य के स्थान पर हिन्दू रख दिया गया, जिसका अर्थ होता है काफ़िर, काला, चोर, नीच आदि ताकि हम आत्महीनता के शिकार हो अपने गौरव, धर्म, इतिहास और राष्ट्रीयता से विमुख हो दासत्व मनोवृति से पीड़ित हो सकें। वास्तव में हमारे सनातन धर्म के किसी भी शास्त्र और ग्रन्थ में हिन्दू शब्द कहीं भी नहीं मिलता बल्कि शास्त्रो में हमे आर्य, आर्यपुत्र और आर्यवर्त राष्ट्र के वासी बताया गया है। आज भी पंडित लोग संकल्प पाठ कराते हुए  “आर्यवर्त अन्तर्गते…”का उच्चारण कराते हैं । अत: भारत के हिन्दुओ को मानसिक गुलाम बनाया गया जिसके लिए झूठे इतिहास का सहारा लिया गया और परिणाम सामने है।_
 _लुटेरे और चोरो को आज हम बादशाह सुलतान नामो से पुकारते है उनके नाम पर सड़के बनाते है।* शहरो के नाम रखते है और उसका कोई हिन्दू विरोध भी नहीं करता जो बिना गुलाम मानसिकता के संभव नहीं सकता था। इसलिए उन्होंने नई रण नीति अपनाई। इतिहास बदलो, मन बदलो और गुलाम बनाओ। यही आज तक होता आया है। जिसे हमने मित्र माना वही अंत में हमारी पीठ पर वार करता है। इसलिए झूठे इतिहास और झूठे मित्र दोनों से सावधान रहने की आवश्यकता है।_
_इस लेख को अधिक से अधिक जनता तक पहुंचाएं। हमें अपना वास्तविक इतिहास जानने का न केवल अधिकार है अपितु तीव्र आवश्यकता भी, ताकि हम उस दास मानसिकता से मुक्त हो सकें जो हम सब के अंदर घर कर गयी है, ताकि हम जान सकें की हम कायर और विभाजित पूर्वजों की सन्तान नहीं, हम कर्मठ और संगठित वीरों की सन्तान हैं।