Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🧟‍♀ कामवाली बाई🧟‍♀
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सच्ची घटना पर आधारित यह बात कुछ दिनों पुरानी है, जब स्कूल बस की हड़ताल चल रही थी।

मेरे मिस्टर अपने व्यवसाय की एक आवश्यक मीटिंग में बिजी थे इसलिए मेरे 5 साल के बेटे को स्कूल से लाने के लिए मुझे टू-व्हीलर पर जाना पड़ा।

जब मैं टू व्हीलर से घर की ओर वापस आ रही थी, तब अचानक रास्ते में मेरा बैलेंस बिगड़ा और मैं एवं मेरा बेटा हम दोनों गाड़ी सहित नीचे गिर गए।

मेरे शरीर पर कई खरोंच आए लेकिन प्रभु की कृपा से मेरे बेटे को कहीं खरोंच तक नहीं आई ।

हमें नीचे गिरा देखकर आसपास के कुछ लोग इकट्ठे हो गए और उन्होंने हमारी मदद करना चाही।

तभी मेरी कामवाली बाई राधा ने मुझे दूर से ही देख लिया और वह दौड़ी चली आई।

उसने मुझे सहारा देकर खड़ा किया, और अपने एक परिचित से मेरी गाड़ी एक दुकान पर खड़ी करवा दी।

वह मुझे कंधे का सहारा देकर अपने घर ले गई जो पास में ही था।

जैसे ही हम घर पहुंचे वैसे ही राधा के दोनों बच्चे हमारे पास आ गए।

राधा ने अपने पल्लू से बंधा हुआ 50 का नोट निकाला और अपने बेटे राजू को दूध ,बैंडेज एवं एंटीसेप्टिक क्रीम लेने के लिए भेजा तथा अपनी बेटी रानी को पानी गर्म करने का बोला। उसने मुझे कुर्सी पर बिठाया तथा मटके का ठंडा जल पिलाया। इतने में पानी गर्म हो गया था।

वह मुझे लेकर बाथरूम में गई और वहां पर उसने मेरे सारे जख्मों को गर्म पानी से अच्छी तरह से धोकर साफ किए और बाद में वह उठकर बाहर गई ।

वहां से वह एक नया टावेल और एक नया गाउन मेरे लिए लेकर आई।

उसने टावेल से मेरा पूरा बदन पोंछ तथा जहां आवश्यक था वहां बैंडेज लगाई। साथ ही जहां मामूली चोट पर एंटीसेप्टिक क्रीम लगाया।

अब मुझे कुछ राहत महसूस हो रही थी।

उसने मुझे पहनने के लिए नया गाउन दिया वह बोली “यह गाउन मैंने कुछ दिन पहले ही खरीदा था लेकिन आज तक नहीं पहना मैडम आप यही पहन लीजिए तथा थोड़ी देर आप रेस्ट कर लीजिए। ”

“आपके कपड़े बहुत गंदे हो रहे हैं हम इन्हें धो कर सुखा देंगे फिर आप अपने कपड़े बदल लेना।”

मेरे पास कोई चॉइस नहीं थी । मैं गाउन पहनकर बाथरुम से बाहर आई।

उसने झटपट अलमारी में से एक नया चद्दर निकाल और पलंग पर बिछाकर बोली आप थोड़ी देर यहीं आराम कीजिए।

इतने मैं बिटिया ने दूध भी गर्म कर दिया था।

राधा ने दूध में दो चम्मच हल्दी मिलाई और मुझे पीने को दिया और बड़े विश्वास से कहा मैडम आप यह दूध पी लीजिए आपके सारे जख्म भर जाएंगे।

लेकिन अब मेरा ध्यान तन पर था ही नहीं बल्कि मेरे अपने मन पर था

मेरे मन के सारे जख्म एक एक कर के हरे हो रहे थे।।मैं सोच रही थी “कहां मैं और कहां यह राधा?

जिस राधा को मैं फटे पुराने कपड़े देती थी, उसने आज मुझे नया टावेल दिया, नया गाउन दिया और मेरे लिए नई बेडशीट लगाई। धन्य है यह राधा

एक तरफ मेरे दिमाग में यह सब चल रहा था तब दूसरी तरफ राधा गरम गरम चपाती और आलू की सब्जी बना रही थी।
थोड़ी देर मे वह थाली लगाकर ले आई। वह बोली “आप और बेटा दोनों खाना खा लीजिए।”

राधा को मालूम था कि मेरा बेटा आलू की सब्जी ही पसंद करता है और उसे गरम गरम रोटी चाहिए। इसलिए उसने रानी से तैयार करवा दी थी।

रानी बड़े प्यार से मेरे बेटे को आलू की सब्जी और रोटी खिला रही थी और मैं इधर प्रायश्चित की आग में जल रही थीसोच रही थी कि जब भी इसका बेटा राजू मेरे घर आता था मैं उसे एक तरफ बिठा देती थी, उसको नफरत से देखती थी और इन लोगों के मन में हमारे प्रति कितना प्रेम है

यह सब सोच सोच कर मैं आत्मग्लानि से भरी जा रही थी। मेरा मन दुख और पश्चाताप से भर गया था।

तभी मेरी नज़र राजू के पैरों पर गई जो लंगड़ा कर चल रहा था।

मैंने राधा से पूछा “राधा इसके पैर को क्या हो गया तुमने इलाज नहीं करवाया ?”
राधा ने बड़े दुख भरे शब्दों में कहा मैडम इसके पैर का ऑपरेशन करवाना है जिसका खर्च करीबन ₹ 10000 रुपए है।

मैंने और राजू के पापा ने रात दिन मेहनत कर के ₹5000 तो जोड़ लिए हैं ₹5000 की और आवश्यकता है। हमने बहुत कोशिश की लेकिन कहीं से मिल नहीं सके ।

ठीक है, भगवान का भरोसा है, जब आएंगे तब इलाज हो जाएगा। फिर हम लोग कर ही क्या सकते हैं?
तभी मुझे ख्याल आया कि राधा ने एक बार मुझसे ₹5000 अग्रिम मांगे थे और मैंने बहाना बनाकर मना कर दिया था।

आज वही राधा अपने पल्लू में बंधे सारे रुपए हम पर खर्च कर के खुश थी और हम उसको, पैसे होते हुए भी मुकर गए थे और सोच रहे थे कि बला टली।

आज मुझे पता चला कि उस वक्त इन लोगों को पैसों की कितनी सख्त आवश्यकता थी।

मैं अपनी ही नजरों में गिरती ही चली जा रही थी।

अब मुझे अपने शारीरिक जख्मों की चिंता बिल्कुल नहीं थी बल्कि उन जख्मों की चिंता थी जो मेरी आत्मा को मैंने ही लगाए थे। मैंने दृढ़ निश्चय किया कि जो हुआ सो हुआ लेकिन आगे जो होगा वह सर्वश्रेष्ठ ही होगा।

मैंने उसी वक्त राधा के घर में जिन जिन चीजों का अभाव था उसकी एक लिस्ट अपने दिमाग में तैयार की। थोड़ी देर में मैं लगभग ठीक हो गई।

मैंने अपने कपड़े चेंज किए लेकिन वह गाउन मैंने अपने पास ही रखा और राधा को बोला “यह गाऊन अब तुम्हें कभी भी नहीं दूंगी यह गाऊन मेरी जिंदगी का सबसे अमूल्य तोहफा है।”

राधा बोली मैडम यह तो बहुत हल्की रेंज का है। राधा की बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैं घर आ गई लेकिन रात भर सो नहीं पाई ।

मैंने अपनी सहेली के मिस्टर, जो की हड्डी रोग विशेषज्ञ थे, उनसे राजू के लिए अगले दिन का अपॉइंटमेंट लिया। दूसरे दिन मेरी किटी पार्टी भी थी । लेकिन मैंने वह पार्टी कैंसिल कर दी और राधा की जरूरत का सारा सामान खरीदा और वह सामान लेकर में राधा के घर पहुंच गई।

राधा समझ ही नहीं पा रही थी कि इतना सारा सामान एक साथ में उसके घर मै क्यों लेकर गई।

मैंने धीरे से उसको पास में बिठाया और बोला मुझे मैडम मत कहो मुझे अपनी बहन ही समझो यह सारा सामान मैं तुम्हारे लिए नहीं लाई हूं मेरे इन दोनों प्यारे बच्चों के लिए लाई हूं और हां मैंने राजू के लिए एक अच्छे डॉक्टर से अपॉइंटमेंट ले लिया है अपन को शाम 7:00 बजे उसको दिखाने चलना है उसका ऑपरेशन जल्द से जल्द करवा लेंगे और तब राजू भी अच्छी तरह से दोड़ने लग जाएगा।

राधा यह बात सुनकर खुशी के मारे रो पड़ी लेकिन यह भी कहती रही कि “मैडम यह सब आप क्यों कर रहे हो?” हम बहुत छोटे लोग हैं हमारे यहां तो यह सब चलता ही रहता है। वह मेरे पैरों में गिरने लगी। यह सब सुनकर और देखकर मेरा मन भी द्रवित हो उठा और मेरी आंखों से भी आंसू के झरने फूट पड़े। मैंने उसको दोनों हाथों से ऊपर उठाया और गले लगा लिया मैंने बोला बहन रोने की जरूरत नहीं है अब इस घर की सारी जवाबदारी मेरी है।

मैंने मन ही मन कहा राधा तुम क्या जानती हो कि मैं कितनी छोटी हूं और तुम कितने बड़ी हो आज तुम लोगों के कारण मेरी आंखे खुल सकीं।

मेरे पास इतना सब कुछ होते हुए भी मैं भगवान से और अधिक की भीख मांगती रही मैंने कभी संतोष का अनुभव नहीं किया। लेकिन आज मैंने जाना के असली खुशी पाने में नहीं देने में है

🙏प्रणाम🙏

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#यहइतिहासबताताहैकिअंग्रजोंकादलाल
#चाटूकारकौनथा.?
लन्दन के बकिंघम पैलेस में ब्रिटेन की महारानी/महाराजा से ‘नाइटहुड’ (सर) की उपाधि लेने की प्रक्रिया अत्यन्त अपमानजनक है। यह उपाधि लेनेवाले व्यक्ति को ब्रिटेन के प्रति वफादारी की शपथ लेनी पड़ती है और इसके पश्चात् उसे महारानी/महाराजा के समक्ष सिर झुकाकर एक कुर्सी पर अपना दायाँ घुटना टिकाना पड़ता है। ठीक इसी समय महारानी/महाराजा उपाधि लेनेवाले व्यक्ति की गरदन के पास दोनों कन्धों पर नंगी तलवार से स्पर्श करते हैं। तत्पश्चात् महारानी/महाराजा उपाधि लेनेवाले व्यक्ति को ‘नाइटहुड’ पदक देकर बधाई देते हैं।
यह प्रक्रिया सैकड़ों वर्ष पुरानी है और भारत में जिस जिसको यह उपाधि मिली वो सभी ‘सर’ इस प्रक्रिया से गुजरे थे।
ब्रिटेन अपने देश और अपने उपनिवेशों में अपने चाटुकारों को ब्रिटेन के प्रति निष्ठवान बनाने के लिए ऐसी अनेक उपाधियाँ देता रहा है। नाइटहुड (सर) की उपाधि उनमें सर्वोच्च होती थी।
गुलाम भारत में ब्रिटिश शासकों द्वारा देश के अनेक राजा-महाराजा, सेठ-साहूकार, राजनीतिज्ञ, शिक्षाविद् आदि ब्रिटेन के प्रति वफादार रहने की शपथ लेने के बाद ही ‘नाइटहुड’ से सम्मानित किए गए थे।
इतिहास बताता है कि ब्रिटिश हुकूमत उसी को नाइटहुड (सर) की सर्वोच्च उपाधि से सम्मानित करती थी जिसे वो अपना वफादार चाटूकार दलाल मुखबिर मानती थी। हालांकि औपचारिक रूप से कहा यह जाता था कि व्यक्ति को अपने कार्यक्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए यह उपाधि दी जाती है। इसीलिए कभी कभी दिखावे के लिए कुछ वैज्ञानिकों चिकित्सकों शिक्षाविदों को भी यह उपाधि दे दी जाती थी।
कुछ अपवादों को छोड़कर देश के लगभग सभी राजा महाराजा नवाब और सेठ साहूकार आदि ब्रिटिश शासकों के तलुए चाटा करते थे। यह रहस्य किसी से छुपा नहीं है।
अतः उनको दरकिनार कर के आइए जानिए तत्कालीन राजनीति से जुड़े कुछ ऐसे #बड़े नामों को जिन्होंने ब्रिटेन के प्रति वफादार रहने की शपथ लेकर नाइटहुड (सर) की उपाधि ब्रिटिश दरबार में घुटना टेक कर ग्रहण की थी।
#पहला_नाम
सन 1890 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष फिरोजशाह मेहता बने थे। मेहता जी ने भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई इतने जुझारू तरीके से लड़ी थी कि 1904 में ब्रिटिश शासकों ने उनको नाइटहुड (सर) की उपाधि से सम्मानित किया था।

#दूसरा_नाम
सन 1900 में नारायण गणेश चंदावरकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना था। वह देश के प्रति कितना वफादार था और अंग्रेजों के प्रति कितना वफादार था यह इसी से स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के साल भर बाद ही अंग्रेज़ी हुकूमत ने नारायण गणेश चंदावरकर को 1901 में बॉम्बे हाईकोर्ट का जज नियुक्त कर दिया था। देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए बनी कांग्रेस के उस राष्ट्रीय अध्यक्ष नारायण गणेश चंदावरकर ने जज बनकर अंग्रेजों की इतनी गज़ब सेवा की कि 1910 में ब्रिटिश शासकों ने नारायण गणेश चंदावरकर को नाइटहुड (सर) की उपाधि से नवाजा था। 1913 में जज के पद से रिटायर होने के बाद यह चंदावरकर फिर कांग्रेस का बड़ा नेता बन गया था।

#तीसरा_नाम
1907 और 1908 में लगातार 2 बार अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रासबिहारी घोष ने कांग्रेस के झंडे तले अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई इतनी जोरदारी और ईमानदारी से लड़ी थी कि सन 1915 में ब्रिटिश शासकों ने रासबिहारी घोष को नाइटहुड (सर) की उपाधि से सम्मानित किया था।

#चौथा_नाम
सन 1897 में अंग्रेज़ सरकार का एडवोकेट जनरल चेत्तूर संकरन नायर कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना था। नायर ने कांग्रेस के झंडे तले देश की आज़ादी की लड़ाई इतने भीषण तरीके से लड़ी थी कि अंग्रेजों ने 1904 में उसको कम्पेनियन ऑफ इंडियन एम्पायर की तथा 1912 में नाइटहुड (सर) की उपाधि देकर समान्नित तो किया ही था साथ ही साथ 1908 में ब्रिटिश सरकार ने उसे मद्रास हाईकोर्ट का जज नियुक्त किया था। 1915 में वह उसी पद से रिटायर हुआ था।

यह👆🏼चार नाम किसी छोटे मोटे कांग्रेसी नेता के नहीं बल्कि कांग्रेस के उन राष्ट्रीय अध्यक्षों के हैं जिन्होंने ब्रिटिश दरबार में घुटने टेक कर ब्रिटेन के प्रति वफ़ादार रहने की कसम खायी थी।
अतः आज यह प्रश्न स्वाभाविक है कि पेशे से वकील इन राजनेताओं ने ऐसा कौन सा उल्लेखनीय कार्य किया था जिससे ब्रिटिश सरकार इतनी गदगद हो गयी थी कि उन्हें नाइटहुड (सर) की सर्वोच्च उपाधि से सम्मानित कर डाला था.?

अंग्रेजों के वफादार रहे कुछ और नामों के ऐसे उदाहरण भी हैं जिनको आजादी मिलने के बाद महत्वपूर्ण पद सौंप दिए गए।
आइए उनमें से कुछ नामों से आज आप भी परिचित होइए…
पहला नाम है फ़ज़ल अली का। इसे अंग्रेजों ने पहले खान साहिब फिर खान बहादुर की उपाधि दी और फिर 1942 में नाइटहुड (सर) की उपाधि से तब नवाजा गया था जब देश “अंग्रेजों भारत छोड़ो” आन्दोलन की तैयारी कर रहा था।
लेकिन 1947 में आज़ादी मिलने के बाद नेहरू सरकार ने इस फ़ज़ल अली को उड़ीसा का गवर्नर बनाया फिर असम का गवर्नर बनाया। फ़ज़ल अली 1959 में असम के गवर्नर के रूप में ही मरा था।

एन गोपालस्वामी अय्यंगर नाम के एक नौकरशाह की ब्रिटेन के प्रति वफादारी से अंग्रेज़ हुक्मरान इतना गदगद थे कि अंग्रेजों ने 1941 में उसको नाइटहुड (सर) की उपाधि से तो नवाजा ही था साथ ही साथ दीवान बहादुर, आर्डर ऑफ दी इंडियन एम्पायर, कम्पेनियन ऑफ दी ऑर्डर ऑफ दी स्टार ऑफ इंडिया सरीखीे 7 अन्य उपाधियों से भी नवाजा था।
1947 में देश को आज़ादी मिलते ही बनी पहली कांग्रेस सरकार का प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस गोपालस्वामी अय्यंगर पर इतना मेहरबान हुआ था कि उसे बिना विभाग का मंत्री बनाकर अपनी केबिनेट में जगह दी फिर 1948 से 1952 तक देश का पहला रेलमंत्री नियुक्त किया तत्पश्चात 1952 में उसे देश के रक्षामंत्री सरीखा महत्वपूर्ण पद सौंप दिया था।
पोस्ट बहुत लंबी हो जाएगी इसलिए बस इतने उदाहरण ही पर्याप्त हैं। क्योंकि अपने चाटूकार वफादारों दलेलौं को ब्रिटिश हुक्मरान राय बहादुर, साहेब बहादुर, खान बहादुर सरीखी उपाधियों से भी सम्मानित करती थी। उपरोक्त उपाधि पाने वालों की सूची में दर्ज तत्कालीन कांग्रेसी नेताओं के नाम भी यदि लिखूंगा तो पोस्ट बहुत लंबी हो जाएगी।
अतः केवल सर्वोच्च उपाधि नाइटहुड (सर) के इन👆🏼उदाहरणों के उल्लेख के साथ ही यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि 1947 से पहले ब्रिटिश हुकूमत का वफादार होने का मतलब ही हिंदुस्तान का गद्दार होना होता था।
अतः कांग्रेस को यह बताना चाहिए कि ब्रिटिश शासकों ने RSS के, हिन्दू महासभा के कितने नेताओं/कार्यकर्ताओं को नाइटहुड (सर) या राय बहादुर, साहेब बहादुर, खान बहादुर की उपाधि से सम्मानित किया था.?
मित्रों इसका जवाब शून्य ही है।
अतः इस सच्चाई व ऊपर उल्लिखित नाइटहुड (सर) की उपाधि पाए नामों को पढ़कर यह आप स्वयं तय कर लीजिए कि 1947 से पहले अंग्रेजों का वफादार दलाल मुखबिर कौन था.?
सोज़न्य से Satish Chandra Mishra
नीचे दाहिना घुटना टिकाकर सम्मान लेने की प्रक्रिया का छायाचित्र

Posted in आयुर्वेद - Ayurveda

❄पूरी तरह से गंजे हो चुके व्यक्ति के भी जड़ो से नए बाल फूटने लगते है इस पत्ते से❄

आजकल अधिकतर युवा बाल सफ़ेद होने व असमय गिरने की समस्या से परेशान हैं। इस समस्या के कारण बहुत से युवा समय से पहले ही ज्यादा उम्र के दिखने लगते हैं। किसी व्यक्ति के बालों का समय से पहले झड़ जाने का रोग गंजापन कहलाता है। बहुत से लोगों में गंजेपन का रोग अनुवांशिक कारणों से भी होता है जैसे किसी व्यक्ति के पुराने पूर्वजों के समय से ही गंजेपन का रोग होता है। यह रोग साबुन से सिर को धोने से, एक-दूसरे का कंघा इस्तेमाल करने से या गलत शैंपू को सिर में लगाने से हो जाता है।आज हम आपके लिए लाये हैं एक ऐसा प्रयोग जिससे आपकी बालो की सभी समस्याओं से उभर पाएंगे वो भी बड़ी आसानी से।

🌻आवश्यक सामग्री :
चुकन्दर के पत्ते : 50 ग्राम

नारियल का तेल : 10 दिन तक नीले कांच की बोतल में सूरज की धूप में रखे।

🌻चमत्कारी चिकित्सा :
चुकन्दर के पत्ते का रस सिर में मालिश करने से गंजेपन का रोग मिट जाता है और सिर में नये बाल आना शुरू हो जाते हैं। बंद जड़ो से नए बाल निकलने लगते है।

गंजेपन के रोग में सूर्य किरण और रंग चिकित्सा के माध्यम से तैयार सूर्य चार्ज नारियल का नीला तेल दिन में 2 बार सिर पर अच्छी तरह से लगाने से लाभ होता है। इसके साथ ही नीले सैलोफिन कागज से 5-10 मिनट सूर्य की रोशनी देने से गंजापन दूर होकर सिर में नए बाल पैदा हो जाते हैं।

🌻किन बातो का रखना है ख्याल :

चुकन्दर के बीजों का अधिक मात्रा में सेवन आमाशय के लिए हानिकारक होता है। चुकन्दर का रस उपयोग करते समय ध्यान रखे कि यह आंखों में ना जाये क्योंकि ये हानिकारक हो सकता है।

🌻बालों की सभी समस्याओं के लिए 12 कारगर घरेलु उपाय :

1:-प्याज का पेस्ट : कुछ दिनों तक, नहाने से 1/2 घंटा पहले रोजाना सिर में प्याज का पेस्ट लगाएं। इससे सफेद बाल ( Safed baal ) काले और लम्बे होने लगेंगे।

2:-कच्चे पपीता का पेस्ट : सप्ताह में कम से कम 3 दिन दस मिनट का कच्चे पपीता का पेस्ट सिर में लगाएं। इससे बाल नहीं झड़ेंगे और डेंड्रफ भी नहीं होगी और सफेद बाल ( Safed baal ) काले भी होने लगेंगे ।

3:-भृंगराज और अश्वगंधा और नारियल तेल : भृंगराज और अश्वगंधा की जड़ें बालों के लिए वरदान मानी जाती हैं। इनका पेस्ट नारियल के तेल के साथ बालों की जड़ों में लगाएं और 1 घंटे बाद गुनगुने पानी से अच्छीं तरह से बाल धो लें। इससे भी बाल काले होते है।

4:-निम्बू और आंवला : निम्बू के रस में आंवला पाउडर मिलाकर उसे सिर पर लगाने से भी सफेद बाल काले हो जाते हैं।

5:-गाय का शुद्ध देसी घी : प्रतिदिन गाय का शुद्ध देसी घी से सिर की मालिश करके भी सफेद बालों को काला किया जा सकता है ।

6:-अदरक और शहद : अदरक को कद्दूकस कर शहद के रस में मिला लें। इसे बालों पर कम से कम सप्ताह में दो बार नियमित रूप से लगाएं। बालों का सफेद होना कम हो जाएगा।

7:-दही और टमाटर – नींबू रस और नीलगिरी : दही के साथ टमाटर को पीस लें। उसमें थोड़ा-सा नींबू रस और नीलगिरी का तेल मिलाएं। इससे सिर की मालिश सप्ताह में दो बार करें। बाल लंबी उम्र तक काले और घने बने रहेंगे।

8:-नारियल तेल या जैतून के तेल : 1/2 कप नारियल तेल या जैतून के तेल को हल्का गर्म करें। इसमें 4 ग्राम कर्पूर मिला कर इस तेल से मालिश करें। इसकी मालिश सप्ताह में एक बार जरूर करनी चाहिए। कुछ ही समय में रूसी खत्म हो जाएगी, बाल भी काले और लम्बे रहेंगे।

9:-आंवले के पाउडर में नींबू का रस : आंवले के पाउडर में नींबू का रस मिलाकर उसे नियमित रूप से लगाएं । शैंपू के बाद आंवला पाउडर पानी में घोलकर लगाने से भी बालों लम्बे तो होंगे साथ में इनकी कंडीशनिंग भी होती है, और बाल भी काले होते है । आंवला किसी ना किसी रुप मे सेवन भी अवश्य करते रहे ।

10:-तिल का तेल : जाड़े अर्थात ठंड में तिल अधिक से अधिक खाएं। तिल का तेल भी बालों को काला करने में मदद करता है।

11:-काली मिर्च, दही और नींबू रस : आधा कप दही में चुटकी भर काली मिर्च और चम्मच भर नींबू रस मिलाकर बालों में लगाए। 15 मिनट बाद बाल धो लें। बाल सफेद से फिर से काले होने लगेंगे।

12:–कारगर चमत्कारी पेस्ट : एक कटोरी मेहंदी पाउडर लें, इसमें दो बड़े चम्मच चाय का पानी, दो चम्मच आंवला पावडर, एक चम्मच नीबू का रस, दो चम्मच दही, शिकाकाई व रीठा पावडर, एक अंडा (अगर आप लेना चाहे तो ), आधा चम्मच नारियल तेल व थोड़ा-सा कत्था। यह सब चीजें लोहे की कड़ाही में डालकर पेस्ट बनाकर रात को भिगो दें। इसे सुबह बालों में लगाए।फिर दो घंटे बाद धो लें। इससे बाल बिना किसी नुकसान के काले और लम्बे हों जाएँगे। ऐसा माह में कम से कम एक बार अवश्य ही करें।

संजय गुप्ता

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‌( एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके कर्म और भाग्य अलग अलग क्यों? -एक प्रेरक कथा

एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों और ज्योतिष प्रेमियों की सभा बुलाकर प्रश्न किया कि-
“ मेरी जन्म पत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था मैं राजा बना , किन्तु उसी घड़ी मुहूर्त में अनेक जातकों ने जन्म लिया होगा जो राजा नहीं बन सके क्यों ? इसका क्या कारण है ?
राजा के इस प्रश्न से सब निरुत्तर हो गये ..क्या जबाब दें कि एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके भाग्य अलग अलग क्यों हैं ?
सब सोच में पड़ गये कि अचानक एक वृद्ध खड़े हुये और बोले – महाराज की जय हो ! आपके प्रश्न का उत्तर यहां भला कौन दे सकता है ? आप यहाँ से कुछ दूर घने जंगल में यदि जाएँ तो वहां पर आपको एक महात्मा मिलेंगे उनसे आपको उत्तर मिल सकता है ।
राजा की जिज्ञासा बढ़ी और घोर जंगल में जाकर देखा कि एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठ कर अंगार ( गरमा गरम कोयला ) खाने में व्यस्त हैं , सहमे हुए राजा ने महात्मा से जैसे ही प्रश्न पूछा महात्मा ने क्रोधित होकर कहा “तेरे प्रश्न का उत्तर देने के लिए मेरे पास समय नहीं है ,मैं भूख से पीड़ित हूँ ।तेरे प्रश्न का उत्तर यहां से कुछ आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं ,वे दे सकते हैं ।”
राजा की जिज्ञासा और बढ़ गयी, पुनः अंधकार और पहाड़ी मार्ग पार कर बड़ी कठिनाइयों से राजा दूसरे महात्मा के पास पहुंचा किन्तु यह क्या महात्मा को देखकर राजा हक्का बक्का रह गया ,दृश्य ही कुछ ऐसा था, वे महात्मा अपना ही माँस चिमटे से नोच नोच कर खा रहे थे ।
राजा को देखते ही महात्मा ने भी डांटते हुए कहा ” मैं भूख से बेचैन हूँ मेरे पास इतना समय नहीं है , आगे जाओ पहाड़ियों के उस पार एक आदिवासी गाँव में एक बालक जन्म लेने वाला है ,जो कुछ ही देर तक जिन्दा रहेगा सूर्योदय से पूर्व वहाँ पहुँचो वह बालक तेरे प्रश्न का उत्तर का दे सकता है ”
सुन कर राजा बड़ा बेचैन हुआ, बड़ी अजब पहेली बन गया मेरा प्रश्न, उत्सुकता प्रबल थी। कुछ भी हो यहाँ तक पहुँच चुका हूँ ,वहाँ भी जाकर देखता हूँ ,क्या होता है ।
राजा पुनः कठिन मार्ग पार कर किसी तरह प्रातः होने तक उस गाँव में पहुंचा, गाँव में पता किया और उस दंपति के घर पहुंचकर सारी बात कही और *शीघ्रता से बच्चा लाने को कहा जैसे ही बच्चा हुआ दम्पत्ति ने नाल सहित बालक राजा के सम्मुख उपस्थित किया ।
राजा को देखते ही बालक ने हँसते हुए कहा राजन् ! मेरे पास भी समय नहीं है ,किन्तु अपना उत्तर सुन लो –
तुम,मैं और दोनों महात्मा सात जन्म पहले के चारों भाई व राजकुमार थे । एक बार शिकार खेलते खेलते हम जंगल में भटक गए। तीन दिन तक भूखे प्यासे भटकते रहे ।
अचानक हम चारों भाइयों को आटे की एक पोटली मिली ।जैसे-तैसे हमने चार बाटी सेंकी और
अपनी अपनी बाटी लेकर खाने बैठे ही थे कि भूख प्यास से तड़पते हुए एक महात्मा वहां आ गये । अंगार खाने वाले भइया से उन्होंने कहा –
“बेटा ,मैं दस दिन से भूखा हूँ ,अपनी बाटी में से मुझे भी कुछ दे दो , मुझ पर दया करो , जिससे मेरा भी जीवन बच जाय , इस घोर जंगल से पार निकलने की मुझमें भी कुछ सामर्थ्य आ जायेगी ।”
इतना सुनते ही भइया गुस्से से भड़क उठे और बोले तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या आग खाऊंगा ? चलो भागो यहां से ….।
वे महात्मा जी फिर मांस खाने वाले भइया के निकट आये उनसे भी अपनी बात कही किन्तु उन भईया ने भी महात्मा से गुस्से में आकर कहा कि “बड़ी मुश्किल से प्राप्त ये बाटी तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या अपना मांस नोचकर खाऊंगा ? ”
भूख से लाचार वे महात्मा मेरे पास भी आये , मुझसे भी बाटी मांगी… तथा दया करने को कहा किन्तु मैंने भी भूख में धैर्य खोकर कह दिया कि ” चलो आगे बढ़ो मैं क्या भूखा मरुँ …?”।
बालक बोला “अंतिम आशा लिये वो महात्मा , हे राजन !आपके पास भी आये,दया की याचना की, सुनते ही आपने उनकी दशा पर दया करते हुये ख़ुशी से अपनी बाटी में से आधी बाटी आदर सहित उन महात्मा को दे दी ।
बाटी पाकर महात्मा बड़े खुश हुए और जाते हुए बोले “तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा । ”
बालक ने कहा “इस प्रकार हे राजन ! उस घटना के आधार पर हम अपना भोग, भोग रहे हैं ,धरती पर एक समय में अनेकों फूल खिलते हैं,किन्तु सबके फल रूप, गुण,आकार-प्रकार,स्वाद में भिन्न होते हैं।”
इतना कहकर वह बालक मर गया । राजा अपने महल में पहुंचा और माना कि शास्त्र भी तीन प्रकार के हॆ-ज्योतिष शास्त्र, कर्तव्य शास्त्र और व्यवहार शास्त्र । एक ही मुहूर्त में अनेकों जातक जन्मते हैं किन्तु सब अपना किया, दिया, लिया ही पाते हैं । जैसा भोग भोगना होगा वैसे ही योग बनेंगे । जैसा योग होगा वैसा ही भोग भोगना पड़ेगा यही है जीवन
“गलत पासवर्ड से एक छोटा सा मोबाइल नही खुलता..
तो सोचो..
गलत कर्मो से स्वर्ग के दरवाजे कैसे खुलेंगे ”
~जय श्री कृष्णा~

संजय गुप्ता

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सम्राट चंद्रगुप्त अपने मंत्रियों के साथ एक विशेष मंत्रणा में व्यस्त
थे कि प्रहरीने सूचित किया कि आचार्य चाणक्य राजभवन में पधार रहे हैं । सम्राट चकित रह गए । इस असमय में गुरू का आगमन ! वह घबरा भी गए । अभी वह कुछ सोचते ही कि लंबे-लंबे डग भरते चाणक्य ने सभा में प्रवेश किया । सम्राट चंद्रगुप्त सहित सभी सभासद सम्मान में उठ गए । सम्राट ने गुरूदेव को सिंहासन पर आसीन होने को कहा ।

आचार्य चाणक्य बोले – ”भावुक न बनो सम्राट, अभी तुम्हारे समक्ष तुम्हारा गुरू नहीं, तुम्हारे राज्य का एक याचक खड़ा है, मुझे कुछ
याचना करनी है ।”चंद्रगुप्त की आँखें डबडबा आईं। बोले – ” आप
आज्ञा दें, समस्त राजपाट आपके चरणों में डाल दूं ।” चाणक्य ने
कहा – ” मैंने आपसे कहा भावना में न बहें, मेरी याचना सुनें । ” गुरूदेव की मुखमुद्रा देख सम्राट चंद्रगुप्त गंभीर हो गए । बोले -” आज्ञा दें ।
चाणक्य ने कहा – ” आज्ञा नहीं , याचना है कि मैं
किसी निकटस्थ सघन वन में साधना करना चाहता हूं । दो माह के लिए राजकार्य से मुक्त कर दें और यह स्मरण रहे वन में अनावश्यक मुझसे कोई मिलने न आए । आप भी नहीं । मेरा उचित प्रबंध करा दें ।
चंद्रगुप्त ने कहा – ” सब कुछ स्वीकार है । ” दूसरे दिन प्रबंध कर
दिया गया । चाणक्य वन चले गए । अभी उन्हें वन गए एक सप्ताह
भी न बीता था कि यूनान से सेल्युकस (सिकन्दर का सेनापति) अपने जामाता चंद्रगुप्त से मिलने भारत पधारे । उनकी पुत्री हेलेन का विवाह चंद्रगुप्त से हुआ था । दो – चार दिन के बाद उन्होंने चाणक्य से मिलने की इच्छा प्रकट कर दी । सेल्युकस ने कहा – ”सम्राट, आप वन में अपने गुप्तचर भेज दें । उन्हें मेरे बारे में कहें । वह मेरा बड़ा आदर करते है । वह कभी इन्कार नहीं करेंगे ।“ अपने श्वसुर की बात मान चंद्रगुप्त ने ऐसा ही किया। गुप्तचर भेज दिए गए । चाणक्य ने उत्तर दिया – ”ससम्मान सेल्युकस वन लाए जाएं, मुझे उनसे मिल कर प्रसन्नता होगी ।”

सेना के संरक्षण में सेल्युकस वन पहुंचे । औपचारिक अभिवादन के बाद चाणक्यने पूछा – ”मार्ग में कोई कष्ट तो नहीं हुआ । ”इस पर सेल्युकस ने कहा – ”भला आपके रहते मुझे कष्ट होगा ? आपने मेरा बहुत ख्याल रखा ।“

न जाने इस उत्तर का चाणक्य पर क्या प्रभाव पड़ा कि वह बोल उठे – “हां, सचमुच आपका मैंने बहुत ख्याल रखा ।”इतना कहने के बाद चाणक्य ने सेल्युकस के भारत की भूमि पर कदम रखने के बाद से वन आने तक की सारी घटनाएं सुना दीं । उसे इतना तक
बताया कि सेल्युकस ने सम्राट से क्या बात की, एकांत में अपनी पुत्री से क्या बातें हुईं । मार्ग में किस सैनिक से क्या पूछा ।

सेल्युकस व्यथित हो गए । बोले – ”इतना अविश्वास ? मेरी गुप्तचरी की गई । मेरा इतना अपमान ।“
चाणक्य ने कहा – ”न तो अपमान, न अविश्वास और न ही गुप्तचरी । अपमान की तो बात मैं सोच भी नहीं सकता । सम्राट भी इन
दो महीनों में शायद न मिल पाते । आप हमारे अतिथि हैं । रह गई बात सूचनाओं की तो वह मेरा ”राष्ट्रधर्म” है । आप कुछ भी हों, पर
विदेशी हैं । अपनी मातृभूमि से आपकी जितनी प्रतिबद्धता है, वह इस राष्ट्र से नहीं हो सकती । यह स्वाभाविक भी है । मैं तो सम्राज्ञी की भी प्रत्येक गतिविधि पर दृष्टि रखता हूं । मेरे इस ‘धर्म‘ को अन्यथा न लें । मेरी भावना समझें ।“

सेल्युकस हैरान हो गया । वह चाणक्य के पैरों में गिर पड़ा ।
उसने कहा – ” जिस राष्ट्र में आप जैसे राष्ट्रभक्त हों, उस देश की ओर कोई आँख उठाकर भी नहीं देख सकता ।” सेल्युकस वापस लौट गया ।

मित्रों… क्या हम भारतीय राष्ट्रधर्म का पालन कर रहे है???

कुलदीप सकसेना

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बहुत सुंदर प्रसंग,, बड़े भाव से पढ़े
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भक्त नरसी जी भगवान के अनन्य भक्त थे, वे सत्संग करते हुए ठाकुर जी को केदारा राग सुनाया करते थे।
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जिसे सुनकर ठाकुर जी के गले की माला अपने आप नरसी जी के गले में आ जाया करती थी।
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एक बार भक्त नरसी जी के घर संतों की मंडली आई तो नरसी जी एक सेठ से राशन उधार लेने गये, पर सेठ ने राशन के बदले कुछ गिरवी रखने को कहा,
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नरसी जी ने अपना केदारा राग का भजन गिरवी रख दिया और सेठ को वादा किया कि उधार चुकाने तक इस राग को नही गाऊंगा और सेठ से राशन लाकर संतो को भोजन करवाया।
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उधर राजा को नरसी जी से जलने वाले पंडितो ने भड़काया कि नरसी जी सब ढोंग करते है।
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भजन गाते हुए माला को कच्ची डोर से बांधते है जिससे माला अपने आप गिरती है।
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राजा ने परीक्षा लेने के लिए नरसी जी को उनके भक्त समाज सहित महल में भजन सत्संग करने के लिए बुलाया और कहा कि हम भी ठाकुर जी की कृपा के दर्शन करना चाहते है।
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नरसी जी संतो के साथ राजा के महल में आये और सत्संग शुरू कर दिया।
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राजा ने अभिमान में आकर रेशम की मजबूत डोर मंगाई और उसमें हार पिरोकर ठाकुर जी को पहनाया।
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नरसी जी ने कीर्तन आरंभ किया.. आनंद बरसने लगा.. नरसी जी ने बहुत से भावपूर्ण भजन गाये पर माला नही गिरी।
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नरसी जी के विरोधी बहुत प्रसन्न हुए कि अब राजा नरसी जी को दंड देगा।
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क्यूंकि ठाकुर जी की माला केदारा राग सुनने से ही गिरती थी और नरसी जी केदारा राग को गिरवी रखे हुए थे।
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अब नरसी जी ठाकुर जी को उलाहना देते हुए गाने लगे.. कि ठाकुर जी आप माला पहने रखो, भक्तो की लाज जाती है तो जाये, माला संभाले रखो आप।
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ठाकुर जी की लीला देखिये,नरसी जी का रूप बनाकर सेठ के घर गये और दरवाजा खटखटाया।
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सेठ जी सो रहे थे पत्नी ने कहा कि नरसी जी भजन छुड़वाने आये है। सेठ ने सोते सोते ही कहा कि पैसे ले लो और रसीद बनाकर भजन सहित दे दो।
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उधर नरसी जी भाव से कीर्तन कर ऱहे थे.. पर सब संत हैरान थे कि आज नरसी जी केदारा राग क्यूं नही गा रहे..
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पर नरसी जी के मन की तो भगवान ही जानते थे।
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भगवान ने एक भक्त का रूप बनाया और नरसी जी के पास जाकर उनकी गोद में सेठ की पत्नी द्वारा दी हुई भजन की रसीद डाल दी।
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बस फिर क्या था नरसी जी जान गये कि ये ठाकुर जी की लीला है.. उन्होने उसी समय भाव से केदारा राग का वो भजन गाना शुरू किया।
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सब समाज आनंद से भर गया और इस बार ठाकुर जी सिहांसन से उठे.. नुपुरों की झन्न झन्न ध्वनि करते हुए स्वयं जाकर नरसी जी के गले में हार पहनाया.. और अपने भक्त का मान बढ़ाया।
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राजा और नरसी जी के विरोधी पंडित नरसी जी की भक्ति से प्रभावित हुए और नरसी जी के संग से वो भी ठाकुर जी के भक्त बन गये।

हमारे ठाकुर जी का स्वभाव कुछ ऐसा ही है।

  अपना मान टले टल जाये
 भक्त का मान ना टलते देखा।

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देव शर्मा

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मूर्ख कौन? – बोध कथा


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