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सोया भाग्य


सोया भाग्य
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एक व्यक्ति जीवन से हर प्रकार से निराश था । लोग उसे मनहूस के नाम से बुलाते थे ।

एक ज्ञानी पंडित ने उसे बताया कि तेरा भाग्य फलां पर्वत पर सोया हुआ है , तू उसे जाकर जगा ले तो भाग्य तेरे साथ हो जाएगा । बस ! फिर क्या था वो चल पड़ा अपना सोया भाग्य जगाने ।

रास्ते में जंगल पड़ा तो एक शेर उसे खाने को लपका , वो बोला भाई ! मुझे मत खाओ , मैं अपना सोया भाग्य जगाने जा रहा हूँ ।

शेर ने कहा कि तुम्हारा भाग्य जाग जाये तो मेरी एक समस्या है , उसका समाधान पूछते लाना । मेरी समस्या ये है कि मैं कितना भी खाऊं … मेरा पेट भरता ही नहीं है , हर समय पेट भूख की ज्वाला से जलता रहता है..

मनहूस ने कहा– ठीक है । आगे जाने पर एक किसान के घर उसने रात बिताई । बातों – बातों में पता चलने पर कि वो अपना सोया भाग्य जगाने जा रहा है ,किसान ने कहा कि मेरा भी एक सवाल है .. अपने भाग्य से पूछकर उसका समाधान लेते आना … मेरे खेत में , मैं कितनी भी मेहनत कर लूँ . पैदावार अच्छी होती ही नहीं । मेरी शादी योग्य एक कन्या है, उसका विवाह इन परिस्थितियों में मैं कैसे कर पाऊंगा ?

मनहूस बोला — ठीक है । और आगे जाने पर वो एक राजा के घर मेहमान बना । रात्री भोज के उपरान्त राजा ने ये जानने पर कि वो अपने भाग्य को जगाने जा रहा है , उससे कहा कि मेरी परेशानी का हल भी अपने भाग्य से पूछते आना । मेरी परेशानी ये है कि कितनी भी समझदारी से राज्य चलाऊं… मेरे राज्य में अराजकता का बोलबाला ही बना रहता है ।
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मनहूस ने उससे भी कहा — ठीक है । अब वो पर्वत के पास पहुँच चुका था । वहां पर उसने अपने सोये भाग्य को झिंझोड़ कर जगाया— उठो ! उठो ! मैं तुम्हें जगाने आया हूँ । उसके भाग्य ने एक अंगडाई ली और उसके साथ चल दिया ।

उसका भाग्य बोला — अब मैं तुम्हारे साथ हरदम रहूँगा।अब वो मनहूस न रह गया था बल्कि भाग्य शाली व्यक्ति बन गया था और अपने भाग्य की बदौलत वो सारे सवालों के जवाब जानता था।
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वापसी यात्रा में वो उसी राजा का मेहमान बना और राजा की परेशानी का हल बताते हुए वो बोला — चूँकि तुम एक स्त्री हो और पुरुष वेश में रहकर राज – काज संभालती हो , इसीलिए राज्य में अराजकता का बोल बाला है । तुम किसी योग्य पुरुष के साथ विवाह कर लो , दोनों मिलकर राज्य का भार संभालो तो तुम्हारे राज्य में शांति स्थापित हो जाएगी ।
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रानी बोली — तुम्हीं मुझ से ब्याह कर लो और यहीं रह जाओ।भाग्य शाली बन चुका वो मनहूस इन्कार करते हुए बोला — नहीं नहीं ! मेरा तो भाग्य जाग चुका है । तुम किसी और से विवाह कर लो । तब रानी ने अपने मंत्री से विवाह किया और सुखपूर्वक राज्य चलाने लगी |
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कुछ दिन राजकीय मेहमान बनने के बाद उसने वहां से विदा ली।चलते चलते वो किसान के घर पहुंचा और उसके सवाल के जवाब में बताया कि तुम्हारे खेत में सात कलश हीरे जवाहरात के गड़े हैं , उस खजाने को निकाल लेने पर तुम्हारी जमीन उपजाऊ हो जाएगी और उस धन से तुम अपनी बेटी का ब्याह भी धूमधाम से कर सकोगे।

किसान ने अनुग्रहित होते हुए उससे कहा कि मैं तुम्हारा शुक्रगुजार हूँ , तुम ही मेरी बेटी के साथ ब्याह कर लो ।पर भाग्य शाली बन चुका वह व्यक्ति बोला कि नहीं !नहीं ! मेरा तो भाग्योदय हो चुका है , तुम कहीं और अपनी सुन्दर कन्या का विवाह करो। किसान ने उचित वर देखकर अपनी कन्या का विवाह किया और सुखपूर्वक रहने लगा।
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कुछ दिन किसान की मेहमान नवाजी भोगने के बाद वो जंगल में पहुंचा और शेर से उसकी समस्या के समाधान स्वरुप कहा कि यदि तुम किसी बड़े मूर्ख को खा लोगे तो तुम्हारी ये क्षुधा शांत हो जाएगी ।

शेर ने उसकी बड़ी आवभगत की और यात्रा का पूरा हाल जाना । सारी बात पता चलने के बाद शेर ने कहा कि भाग्योदय होने के बाद इतने अच्छे और बड़े दो मौके गंवाने वाले ऐ इंसान ! तुझसे बड़ा मूर्ख और कौन होगा ? तुझे खाकर ही मेरी भूख शांत होगी और इस तरह वो इंसान शेर का शिकार बनकर मृत्यु को प्राप्त हुआ ।

यदि आपके पास सही मौका परखने का विवेक और अवसर को पकड़ लेने का ज्ञान नहीं है तो भाग्य भी आपके साथ आकर आपका कुछ भला नहीं कर सकता है|

जय श्री राम..

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एक बार नारद मुनि जी की एक ब्राह्मण से मुलाकात हुई।


एक बार नारद मुनि जी की एक ब्राह्मण से मुलाकात हुई। ब्राह्मण ने उनसे जाते हुये पूछा की अब आप कहाँ जा रहे हैं? मैं जानता हूँ कि आपकी भगवान से मुलाकात होती रहती है, अतः उनसे पूछियेगा कि मैं उनके पास कब आऊँगा? नारद जी ने कहा – अच्छा।

कुछ ही दूरी पर नारदजी को एक मोची मिला, जो कि एक बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर जूते सिल रहा था। बातों ही बातों में उसने भी नारदजी से वही बात पूछी जो ब्राह्मण ने पूछी थी।

नारदजी जब वैकुण्ठ लोक पहुँचे तो नारदजी ने भगवान नारायण से उन दोनों के बारे में पूछा। भगवान नारायण ने कहा – वो मोची तो इसी जन्म के बाद मेरे पास आ जायेगा, किन्तु उस ब्राह्मण को अभी बहुन जन्म लेने पड़ेंगे।

नारदजी ने हैरानी से कहा – मैं इस बात का रहस्य समझा नहीं।

भगवान मुस्कुराये और बोले – जब आप उनसे मिलेंगे तो आप उनको यह जरूर बोलना की मैं सुई के छेद में से हाथी को निकाल रहा था।

जब नारद जी पृथ्वी पर लौटे तो पहले ब्राह्मण से मिलने गये। ब्राह्मण ने उनका स्वागत किया और पूछा की जब आप वैकुण्ठ में गये तो भगवान क्या कर रहे थे? नारद जी ने कहा – भगवान सुई के छेद में से हाथी को निकाल रहे थे।

ब्राह्मण ने कहा – मैं ऐसी अविश्वासी बातों पर विश्वास नहीं करता।

नारदजी को समझते देर नहीं लगी कि इस आदमी की भगवान में तनिक भी श्रद्धा नहीं है। इसे केवल कोरा किताबी ज्ञान है।
फिर नारदजी मोची के पास गये। मोची ने भी वही प्रश्न किया जिसका नारदजी ने वही उत्तर दिया की भगवान सुई के छेद में से हाथी को निकाल रहे थे।

मोची यह सुनते ही रोने लगा। उसकी आँखों में आँसू आ गये और वह बोला – हे मेरे प्रभु! आप कितने विचित्र हैं। आप सब कुछ कर सकते हैं।

नारदजी ने पूछा – क्या आपको विश्वास है की भगवान सुई के छेद में से हाथी को निकाल सकते हैं?
मोची ने कहा – क्यों नहीं? मुझे पूरा विश्वास है। आप देख रहे हैं कि मैं इस बरगद के पेड़ के नीचे बैठा हूँ और उसमें से नित्य अनेक फल गिरते हैं। और उन फलों के हर बीज में इस बड़े वृक्ष की ही तरह एक बरगद का वृक्ष समाया हुआ है। यदि एक छोटे से बीज के भीतर इतना बड़ा वृक्ष समाया रह सकता है तो फिए भगवान द्वारा एक सुई के छेद से हाथी को निकालना कोई कठिन काम कैसे हो सकता है?

इसे श्रद्धा कहते हैं। यह अन्ध-विश्वास नहीं है। विश्वास के पीछे कारण होता है। यदि भगवान
इतने नन्हें नन्हें बीजों के भीतर एक एक विशाल वृक्ष भर सकते हैं तो उनके लिये अपनी शक्ति के द्वारा सारे लोकों को अन्तरिक्ष में तैरते रखना कौन सी बड़ी बात है?
अब यदि भगवान का हाथ उसके पीछे न रहे तो प्रकृति इतने आश्चर्यजनक ढंग से कार्य नहीं कर सकती।
जय श्री कृष्णा

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बहुत समय पहले की बात है एक महा ज्ञानी पंडित हिमालय की पहाड़ियों में कहीं रहते थे


बहुत समय पहले की बात है एक महा ज्ञानी पंडित हिमालय की पहाड़ियों में कहीं रहते थे . लोगों के बीच रह कर वह थक चुके थे और अब ईश्वर भक्ति करते हुए एक सादा जीवन व्यतीत करना चाहते थे . लेकिन उनकी प्रसिद्धि इतनी थी की

लोग दुर्गम पहाड़ियों , सकरे रास्तों , नदी-झरनो को पार कर के भी उससे मिलना चाहते थे , उनका मानना था कि यह विद्वान उनकी हर समस्या का समाधान कर सकता है .

इस बार भी कुछ लोग ढूंढते हुए उसकी कुटिया तक आ पहुंचे . पंडित जी ने उन्हें इंतज़ार करने के लिए कहा .

तीन दिन बीत गए , अब और भी कई लोग वहां पहुँच गए , जब लोगों के लिए जगह कम पड़ने लगी तब पंडित जी बोले ,” आज मैं आप सभी के प्रश्नो का उत्तर दूंगा , पर आपको वचन देना होगा कि यहाँ से जाने के बाद आप किसी और से इस स्थान के बारे में नहीं बताएँगे , ताकि आज के बाद मैं एकांत में रह कर अपनी साधना कर सकूँ …..चलिए अपनी -अपनी समस्याएं बताइये “

यह सुनते ही किसी ने अपनी परेशानी बतानी शुरू की , लेकिन वह अभी कुछ शब्द ही बोल पाया था कि बीच में किसी और ने अपनी बात कहनी शुरू कर दी . सभी जानते थे कि आज के बाद उन्हें कभी पंडित जी से बात करने का मौका नहीं मिलेगा ; इसलिए वे सब जल्दी से जल्दी अपनी बात रखना चाहते थे . कुछ ही देर में वहां का दृश्य मछली -बाज़ार जैसा हो गया और अंततः पंडित जी को चीख कर बोलना पड़ा ,” कृपया शांत हो जाइये ! अपनी -अपनी समस्या एक पर्चे पे लिखकर मुझे दीजिये . “

सभी ने अपनी -अपनी समस्याएं लिखकर आगे बढ़ा दी . पंडित जी ने सारे पर्चे लिए और उन्हें एक टोकरी में डाल कर मिला दिया और बोले , ” इस टोकरी को एक-दूसरे को पास कीजिये , हर व्यक्ति एक पर्ची उठाएगा और उसे पढ़ेगा . उसके बाद उसे निर्णय लेना होगा कि क्या वो अपनी समस्या को इस समस्या से बदलना चाहता है ?”

हर व्यक्ति एक पर्चा उठाता , उसे पढता और सहम सा जाता . एक -एक कर के सभी ने पर्चियां देख ली पर कोई भी अपनी समस्या के बदले किसी और की समस्या लेने को तैयार नहीं हुआ; सबका यही सोचना था कि उनकी अपनी समस्या चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हो बाकी लोगों की समस्या जितनी गंभीर नहीं है . दो घंटे बाद सभी अपनी-अपनी पर्ची हाथ में लिए लौटने लगे , वे खुश थे कि उनकी समस्या उतनी बड़ी भी नहीं है जितना कि वे सोचते थे .

Friends, ऐसा कौन होगा जिसकी life में एक भी problem न हो ? हम सभी के जीवन में समस्याएं हैं , कोई अपनी health से परेशान है तो कोई lack of wealth से …हमें इस बात को accept करना चाहिए कि life है तो छोटी -बड़ी समस्याएं आती ही रहेंगी , ऐसे में दुखी हो कर उसी के बारे में सोचने से अच्छा है कि हम अपना ध्यान उसके निवारण में लगाएं … और अगर उसका कोई solution ही न हो तो अन्य productive चीजों पर focus करें … हमें लगता है कि सबसे बड़ी समस्या हमारी ही है पर यकीन जानिए इस दुनिया में लोगों के पास इतनी बड़ी -बड़ी problems हैं कि हमारी तो उनके सामने कुछ भी नहीं … इसलिए ईश्वर ने जो भी दिया है उसके लिए thankful रहिये और एक खुशहाल जीवन जीने का प्रयास करिये

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एक नगर में एक मशहूर चित्रकार रहता था ।


एक नगर में एक मशहूर चित्रकार रहता था ।
चित्रकार ने एक बहुत सुन्दर तस्वीर बनाई
और उसे नगर के चौराहे मे लगा दिया
और नीचे लिख दिया कि जिस किसी को ,
जहाँ भी इस में कमी नजर आये वह वहाँ निशान लगा दे ।
जब उसने शाम को तस्वीर देखी उसकी पूरी तस्वीर पर निशानों से ख़राब हो चुकी थी ।
यह देख वह बहुत दुखी हुआ ।
उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करे वह दुःखी बैठा हुआ था ।
तभी उसका एक मित्र वहाँ से गुजरा उसने उस के दुःखी होने का कारण पूछा तो उसने उसे पूरी घटना बताई ।
उसने कहा एक काम करो कल दूसरी तस्वीर बनाना और उस मे लिखना कि जिस किसी को इस तस्वीर मे जहाँ कहीं भी कोई कमी नजर आये उसे सही कर दे ।
उसने अगले दिन यही किया । शाम को जब उसने अपनी तस्वीर देखी तो उसने देखा की तस्वीर पर किसी ने कुछ नहीं किया । वह संसार की रीति समझ गया ।
“कमी निकालना , निंदा करना , बुराई करना आसान लेकिन उन कमियों को दूर करना अत्यंत कठिन होता ह This is life……..
जब दुनिया यह कहती है कि
‘हार मान लो’
तो आशा धीरे से कान में कहती है कि.,,,,
‘एक बार फिर प्रयास करो’
और यह ठीक भी है..,,,
“जिंदगी आईसक्रीम की तरह है, टेस्ट करो तो भी पिघलती है;.,,,
वेस्ट करो तो भी पिघलती है,,,,,,
इसलिए जिंदगी को टेस्ट करना सीखो,
वेस्ट तो हो ही रही है.,,,,
Life is very beautiful !!!

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बड़ा तपस्वी


बड़ा तपस्वी

कौशिक नामक एक ब्राह्मण बड़ा तपस्वी था। तप के प्रभाव से उसमें बहुत आत्म बल आ गया था। एक दिन वह वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था कि ऊपर बैठी हुई चिड़िया ने उस पर बीट कर दी। कौशिक को क्रोध आ गया। लाल नेत्र करके ऊपर को देखा तो तेज के प्रभाव से चिड़िया जल कर नीचे गिर पड़ी। ब्राह्मण को अपने बल पर गर्व हो गया।

दूसरे दिन वह एक सद्गृहस्थ के यहाँ भिक्षा माँगने गया। गृहस्वामिनी पति को भोजन परोसने में लगी थी। उसने कहा- “भगवन्, थोड़ी देर ठहरो अभी आपको भिक्षा दूँगी।” इस पर ब्राह्मण को क्रोध आया कि मुझ जैसे तपस्वी की उपेक्षा करके यह पति-सेवा को अधिक महत्व दे रही है। गृहस्वामिनी ने दिव्य दृष्टि से सब बात जान ली। उसने ब्राह्मण से कहा- “क्रोध न कीजिए मैं चिड़िया नहीं हूँ। अपना नियत कर्तव्य पूरा करने पर आपकी सेवा करूंगी।”

ब्राह्मण क्रोध करना तो भूल गया, उसे यह आश्चर्य हुआ कि चिड़िया वाली बात इसे कैसे मालूम हुई? ब्राह्मणी ने इसे पति सेवा का फल बताया और कहा कि इस संबंध में अधिक जानना हो तो मिथिलापुरी में तुलाधार वैश्य के पास जाइए। वे आपको अधिक बता सकेंगे।

भिक्षा लेकर कौशिक चल दिया और मिथिलापुरी में तुलाधार के घर जा पहुँचा। वह तौल-नाप के व्यापार में लगा हुआ था। उसने ब्राह्मण को देखते ही प्रणाम अभिवादन किया और कहा- “तपोधन कौशिक देव? आपको उस सद्गृहस्थ गृहस्वामिनी ने भेजा है सो ठीक है। अपना नियत कर्म कर लूँ तब आपकी सेवा करूंगा। कृपया थोड़ी देर बैठिये। “ब्राह्मण को बड़ा आश्चर्य हुआ कि मेरे बिना बताये ही इसने मेरा नाम तथा आने का उद्देश्य कैसे जाना? थोड़ी देर में जब वैश्य अपने कार्य से निवृत्त हुआ तो उसने बताया कि मैं ईमानदारी के साथ उचित मुनाफा लेकर अच्छी चीजें लोक-हित की दृष्टि से बेचता हूँ। इस नियत कर्म को करने से ही मुझे यह दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई है। अधिक जानना हो तो मगध के निजाता चाण्डाल के पास जाइए।

कौशिक मगध चल दिये और चाण्डाल के यहाँ पहुँचे। वह नगर की गंदगी झाड़ने में लगा हुआ था। ब्राह्मण को देखकर उसने साष्टाँग प्रणाम किया और कहा- “भगवन् आप चिड़िया मारने जितना तप करके उस सद्गृहस्थ देवी और तुलाधार वैश्य के यहाँ होते हुये यहाँ पधारे यह मेरा सौभाग्य है। मैं नियत कर्म कर लूँ, तब आपसे बात करूंगा। तब तक आप विश्राम कीजिये।”

चाण्डाल जब सेवा-वृत्ति से निवृत्त हुआ तो उन्हें संग ले गया और अपने वृद्ध माता पिता को दिखाकर कहा- “अब मुझे इनकी सेवा करनी है। मैं नियत कर्त्तव्य कर्मों में निरन्तर लगा रहता हूँ इसी से मुझे दिव्य दृष्टि प्राप्त है।”

तब कौशिक की समझ में आया कि केवल तप साधना से ही नहीं, नियत कर्त्तव्य, कर्म निष्ठापूर्वक करते रहने से भी ‘आध्यात्मिक का लक्ष्य’ पूरा हो सकता है और सिद्धियाँ मिल सकती है​ ।

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अपनी खूबी पहचानें


”अपनी खूबी पहचानें“
एक बार भगवान ने एक मेंढक की भक्ति से प्रसन्न होकर उससे उसकी इच्छा पूछी। मेंढक ने कहा – ”हे ईश्वर मेरे मन में कोई आकांक्षा नहीं है।” उसने कहा कि भक्ति में मुझे हर पल आनंद आता है और मैं इसमें बेहद खुश हूं। मगर एक कठिनाई है, मैं जब भी ध्यान करने बैठता हूं, एक चूहा मेरे ध्यान में विघ्न डालने की कोशिश करता है।

भगवान ने कहा – ”मैं तुम्हे बिल्ली के रूप में परिवर्तित कर देता हूं, फिर तुम निर्भय होकर रह पाओगे।“

मेंढक ने बिन सोचे समझे हामी भर दी और बिल्ली बन गया। अब बिल्ली को कुत्ते का भय सताने लगा। एक दिन पुनः भगवान प्रकट हुए, तो बिल्ली ने अपनी पूरी समस्या रखी। तब भगवान ने उसे बिल्ली से कुत्ता बना दिया।
अब अपने भय के कारण वो कुत्ते से चीता और फिर चीते से शेर बन गया। शेर बनने के बाद अब उसे शिकारी का भय सताने लगा। इस तरह मेंढक रोज़ रोज़ के बदलाव से थक चुका था। उसने बहुत सोचा और अपने पुरूषार्थ पर भरोसा करने का दृढ़ निश्चय लिया।

उसने भगवान से दोबारा प्रार्थना की और मेंढक पुनः अपने मूल रूप में वापिस आ गया। दरअसल, हम सभी को भगवान ने इस संसार में जो कुछ भी दिया है, वो बेहद सोच समझ कर दिया है। चाहे वो जीवन हो, दुख हो यां फिर सुख।

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ईमानदारी_की_दवाई


ईमानदारीकीदवाई

वैसे तो हर रोज किसी को कुछ न कुछ हुआ करता है, किसी को जुकाम है तो किसी को खाँसी। किसी को घुटने में दर्द रहता है तो किसी को सिर में दर्द। किसी को जुलाब लगे होते हैं तो किसी को कब्जी हुई होती है। कई बार तो ये सब देख कर मन करता है कि सरकार से अनुरोध करूँ कि हे सरकार जी ! मुझे कुछ दे या न दे पर मेरे घर में एक सरकारी अस्पताल का पट्टा ही लगा दे कम से कम कालेज में प्रोफेसर साहब को भी मुझे बकने की बीमारी से मुक्ति मिले और मुझे भी उनकी किच-किच से मोक्ष मिले। लास्ट इअर चल रहा है इन बचे हुए महीनों में तो शान से सिर उठा कर समय पर कालेज जा सकूँ….

पर, जिसकी किस्मत में शकून से जीने का एक पल भी शेष न बचा हो वहाँ विधाता भी बेचारा क्या लिखे.?..

एक दिन विधाता भी मिला था, अचानक तब मैं खुद से खुद की नजरें बचाता बाजार में सबसे सस्ती सब्जी आधे दाम में ढूढ़ रहा था….

क्या करूँ भाई साहब पापा ने फतवा जारी कर ये बोल दिया है कि सब्ज़ी आज के बाद तू ही लाएगा मजबूरी है अब पापा की बात माननी ही है न….

आदमी कुछ खाकर बीमार हो तो बीमारी के आगे शर्मिंदा नहीं होना पड़ता। दूसरी ओर घर के सफल मुखिया होने का भ्रम भी बना रहता है….

और बंधु, क्या हाल हैं?’ विधाता ने पीछे से मेरा झोला खींचा…

कौन?
मुझे गुस्सा आया पर फिर शांत हो गया सोचा कि #राज तू इस वक्त बाजार में है और बाजार में किसी का कुछ भी खींचा जा सकता है। पीछे मुड़ा तो अजीब-सा बंदा देखा। बंदे बड़े-बड़े देखे पर ऐसा न देखा था। मैंने अपना गुस्सा आगे के बंदे पर बबूल गम की तरह चबाते हुए कहा,,,,आपको मैंने पहले कहीं देखा नहीं, माफ कीजिएगा !!!!

वो बोला यार मैं वही हूँ जिसके आगे तुम सबेरे उठने से पहले रोज नाक रगड़ते हो कि हे विधाता, आज से तो मेरी किस्मत बदल दे। आज कुछ फुर्सत में था तो मैंने सोचा कि आज क्यों न खुद-ब-खुद चलकर. . .इतना कहकर अपने को विधाता कहने वाला मुस्कुराया ! !

मैंने बोला तो यार, क्या किस्मत लिख कर तूने मुझे इस लोक में भेजा?

जा मैं तुझसे कोई बात नहीं करता गधे की भी इससे अच्छी किस्मत होती है। और मैं तो आदमी हूँ !

गुस्सा थूको मित्र ! कुछ मेरी सुनो तो सच का पता चले।’ कह कर विधाता ने बड़ी आत्मीयता से मेरे परेशानियों के भार से टूटे कंधों पर अपने दोनों हाथ रखे तो मेरा गुस्सा कुछ शांत हुआ…..

मैंने कहा…….तो कहो, क्या कहना चाहते हो? वैसे भी आज तक मैंने सभी को सुना ही है। कहने का मौका तो आप ने मेरी किस्मत में लिखा ही नहीं।’ कहते कहते मेरा जुकाम से बंद हुआ गला और रुँध गया।

वो बोला मैं कहना यह चाहता हूँ कि मैंने तो तुम्हें यहाँ भेजते हुए तुम्हारी किस्मत में मौज की मौज लिखी थी, पर तुमने घर, गृहस्थी, शादी, बीवी, बच्चे, कार, बंगला आदि के सपनो में पड़ कर चादर से बाहर पाँव निकाल लिए तो मैं भी क्या करूँ? पाँव चादर के अंदर ही रखना किसका धर्म बनता है? मेरा या तुम्हारा? वैसे विश्वास न हो तो ये रिकार्ड देख लो।’ कह वह अपने सूटकेस को वहीं खोलता आगे बोला, ‘आप लोगों के साथ सबसे बड़ी मुश्किल यही है। पंगा खुद लेते हो और दोष मुझे देते हो। अब मैं तो आप लोगों की जानदार किस्मत ही लिख सकता हूँ न। किस्मत की इज्जत बचाए रखने के लिए संभल कर चलना समय के अनुरूप सपने देखना तो आप लोगों का ही काम है न ? फिर दोष मुझे देते फिरते हो। ये कहाँ का न्याय है बंधु? अब मैं चुप! बंदे ने कुछ कहने लायक छोड़ा ही नहीं। बात उसकी बिलकुल सच थी।

फिर मैने पूछा….तो अब कुछ हो सकता है क्या?’

‘क्यों नहीं, इस देश में हर चीज का इलाज करने वाले संसद से सड़क तक झोला खोले बैठे हैं करके, करवाके तो देखो…हां करने या करवाने की इच्छा न हो तो बहाने हजारों हैं, सरकार की तरह…

मैने पूंछा कैसे?
यहाँ तो हर दवाई में खोट है। खोट वाली दवाई क्या इलाज करेगी?
सरकार आतंकवाद का इलाज करती है तो वो लाइलाज जाता है
सरकार महंगाई का इलाज करती है तो वह इलाज से बाहर हो जाती है,
सरकार भुखमरी का इलाज करती है तो वह इलाज से बाहर हो जाती है,
सरकार बेरोजगारी का इलाज करती है तो वह इलाज से परे हो जाती है, सरकार भ्रष्टाचार का इलाज करती है तो वह इलाज से परे हो जाता है,
सरकार भय का इलाज करती है तो वह इलाज से परे हो जाता है,
ऐसे में मैं कौन सी दवाई लूँ?’

वो बोला ईमानदार होने की दवाई लो….
इतना कह कर वे अंतर्ध्यान हो गए….

अब मेरी मुश्किल ये है कि ये दवाई किस स्टोर पर मिलेगी भाई साहब? पूरे चेन्नई शहर तो छान चुका हूँ। यहाँ के दवाई वालों के पास तो यह आउट ऑफ स्टाक चल रही है। आपके शहर मिलती हो तो कृपया हमे भी बताने कृपा करें..

-Raj-
साभार राज तिवारी