Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

. “गुरु की कृपा” गुरु-कृपा अथवा सन्त-कृपा का बहुत विशेष माहात्म्य है। भगवान् की कृपा से जीव को मानव शरीर मिलता है और गुरु-कृपा से भगवान् मिलते हैं। लोग समझते हैं कि हम गुरु बनायेंगे, तब वे कृपा करेंगे। परन्तु यह कोई महत्त्व की बात नहीं है। अपने-अपने बालकों का सब पालन करते हैं। कुतिया भी अपने बच्चों का पालन करती है। परन्तु सन्त-कृपा बहुत विलक्षण होती है। दूसरा शिष्य बने या न बने, उनसे प्रेम करे या वैर करे-इसको सन्त नहीं देखते। दीन-दु:खी को देखकर सन्त का हृदय द्रवित हो जाता हैं। तो इससे उसका काम हो जाता है। जगाई-मधाई प्रसिद्ध पापी थे और साधुओं से वैर रखते थे, पर चैतन्य महाप्रभु ने उन पर भी दया करके उनका उद्धार कर दिया। सन्त सब पर कृपा करते हैं, पर परमात्मतत्त्व का जिज्ञासु ही उस कृपा को ग्रहण करता है; जैसे-प्यासा आदमी ही जल को ग्रहण करता है। वास्तव में अपने उद्धार की लगन जितनी तेज होती हैं, सत्य तत्त्व की जिज्ञासा जितनी अधिक होती है, उतना ही वह उस कृपा को अधिक ग्रहण करता है। सच्चे जिज्ञासु पर सन्त-कृपा अथवा गुरु-कृपा अपने-आप होती है। गुरु कृपा होने पर फिर कुछ बाकी नहीं रहता। परन्तु ऐसे गुरु बहुत दुर्लभ होते हैं। पारस से लोहा सोना बन जाता है, पर उस सोने में यह ताकत नहीं होती कि दूसरे लोहे को भी सोना बना दे। परन्तु असली गुरु मिल जाय तो उसकी कृपा से चेला भी गुरु बन जाता है, महात्मा बन जाता है- पारस में अरु संत में, बहुत अंतरौ जान। वह लोहा कंचन करे, वह करै आपु समान॥ यह गुरुकृपा की ही विलक्षणता है! यह गुरुकृपा चार प्रकार से होती है-स्मरण से, दृष्टि से, शब्द से और स्पर्श से। जैसे कछवी रेत के भीतर अण्डा देती है, पर खुद पानी के भीतर रहती हुई उस अण्डे को याद करती रहती है तो उसके स्मरण से अण्डा पक जाता है, ऐसे ही गुरु के याद करने मात्र से शिष्य को ज्ञान हो जाता है-यह ‘स्मरण-दीक्षा' है। जैसे मछली जल में अपने अण्डे को थोड़ी-थोड़ी देर में देखती रहती है तो देखने मात्र से अण्डा पक जाता है, ऐसे ही गुरु की कृपा-दृष्टि से शिष्य को ज्ञान हो जाता है-यह 'दृष्टि-दीक्षा' है। जैसे कुररी पृथ्वी पर अण्डा देती है और आकाश में शब्द करती हुई घूमती रहती है तो उसके शब्द से अण्डा पक जाता है, ऐसे ही गुरु अपने शब्दों से शिष्य को ज्ञान करा देता है-यह 'शब्द-दीक्षा' है। जैसे मयूरी अपने अण्डे पर बैठी रहती है तो उसके स्पर्श से अण्डा पक जाता है, ऐसे ही गुरु के हाथ के स्पर्श से शिष्य को ज्ञान हो जाता है—यह 'स्पर्श-दीक्षा' है। ईश्वर की कृपा से मानव-शरीर मिलता है, जिसको पाकर जीव स्वर्ग अथवा नरक में भी जा सकता है तथा मुक्त भी हो सकता हैं। परन्तु गुरुकृपा या सन्तकृपा से मनुष्य को स्वर्ग अथवा नरक नहीं मिलते, केवल मुक्ति ही मिलती है। गुरु बनाने से ही गुरुकृपा होती है-ऐसा नहीं है। बनावटी गुरु से कल्याण नहीं होता। जो अच्छे सन्त-महात्मा होते हैं, वे चेला बनाने से ही कृपा करते हों-ऐसी बात नहीं है। वे स्वत: और स्वाभाविक कृपा करते हैं। सूर्य को कोई इष्ट मानेगा, तभी वह प्रकाश करेगा यह बात नहीं है। सूर्य तो स्वत: और स्वाभाविक प्रकाश करता है, उस प्रकाश को चाहे कोई काम में ले ले। ऐसे ही गुरु की, सन्त-महात्मा की कृपा स्वतः स्वाभाविक होती है। जो उनके सम्मुख हो जाता है, वह लाभ ले लेता है। जो सम्मुख नहीं होता, वह लाभ नहीं लेता। जैसे, वर्षा बरसती है तो उसके सामने पात्र रखने से वह जल से भर जाता है। परन्तु पात्र उलटा रख दें तो वह जल से नहीं भरता और सूखा रह जाता है। सन्तकृपा को ग्रहण करने वाला पात्र जैसा होता है, वैसा ही उसको लाभ होता है। सतगुरु भूठा इन्द्र सम, कमी न राखी कोय। वैसा ही फल नीपजै, जैसी भूमिका होय॥ वर्षा सब पर समान रूप से होती है, पर बीज जैसा होता है, वैसा ही फल पैदा होता है। इसी तरह भगवान् की और सन्त-महात्माओं की कृपा सब पर सदा समान रूप से रहती है। जो जैसा चाहे, लाभ उठा सकता है।

गौरव गुप्ता

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