Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

ये सारी उपलब्धियां पढ़ें

  1. हावड़ा में गंगा पर पुल बनाकर कलकत्ता शहर बसाया
  2. अंग्रेजों को ना तो नदी पर टैक्स वसूलने दिया और ना दुर्गा पूजा की यात्रा रोकने दिया
  3. कलकत्ता में दक्षिणेश्वर मंदिर बनवाया
  4. कलकत्ता में गंगा नदी पर बाबू घाट, नीमतला घाट बनवाया
  5. श्रीनगर में शंकराचार्य मंदिर का पुनरोद्धार करवाया
  6. मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि की दीवार बनवाई
  7. ढाका में मुस्लिम नवाब से 2000 हिंदुओं की स्वतंत्रता खरीदी
  8. रामेश्वरम से श्रीलंका के मंदिरों के लिए नौका सेवा शुरू किया
  9. कलकत्ता का क्रिकेट स्टेडियम इनके द्वारा दान दी गई भूमि पर बना है।
  10. सुवर्ण रेखा नदी से पुरी तक सड़क बनाया
  11. प्रेसिडेंसी कॉलेज और नेशनल लाइब्रेरी के लिए फंद दिया

क्या इस महान हस्ती को नेहरू, मौलवी, पादरी ने आपके सिलेबस में शामिल किया?

इन महान हस्ती का नाम रानी राशमणि है। ये कलकत्ता के जमींदार की विधवा थी। 1793 से 1863 तक के जीवन काल में रानी ने इतना यश कमाया है कि इनकी बड़ी बड़ी प्रतिमाएं दिल्ली और शेष भारत में लगनी चाहिए थी।

रानी राशमणि कैवर्त जाति की थी जो आजकल अनुसूचित जाति में शामिल है। क्या दलित नेताओं को रानी राशमणि को नायिका नहीं बनाना चाहिए था?
साभार: नीलम अरोड़ा

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द्वापर युग में १८ की संख्या का क्या महत्व है

यह था कि पहले महाभारत युद्ध के लिए युद्ध भूमि खोजी गई जो आज के कुरुक्षेत्र जिले में मिली। अब समय आ गई कि युद्ध भूमि की एक ऐसी सीमा निर्धारित कर दी जाय
जिससे योद्धा उस सीमा से बाहर न निकल जायं

कहा गया है कि
सबहिं नचावैं राम गुसाईं
अपुना रहइं दास की नाईं
और
होइहंइ वहि जो राम रचि राखा
को करि तर्क बढावहिं साखा।

वैसे तो यह चौपाई रामायण की है पर सटीक उतरती है।
यह कि इस सीमा का निर्धारण कौशल करे?याद रखें कि द्वापर युग के नियमानुसार इसे १८ मील लंबा चौड़ा होना था। श्रीकृष्ण ने सुझाव दिया कि यह कार्य तो बड़े भाई बलराम ही कर सकते हैं। ध्यान दीजिए कि बलराम जी ही उस नारायणी सेना के सेनापति थे जिसे कृष्ण ने दुर्योधन को दिया था।अब बलराम जी ने अपना हल कंधे से उतारा और रेखा खींचना शुरू कर दिया। एक माया रूपी वृद्ध गाय बराबर सामने आ कर खड़ी होती रही। कुछ देर तक बलराम जी मुंह से डांटकर भगाते रहे पर गऊ माता भी जिद पर अड़ी रही। उन्हें न हटना था और न हटीं।
अब बलराम जी क्रोधित हो गए।
क्रोधी तो थे ही।कटकटाकर हल छोड़कर गाय को धक्का दे दिया। संयोग या दुर्योग से गऊ माता के प्राण पखेरू उड़ गए। आपदा में अवसर का लाभ श्रीकृष्ण ने उठाया और कहा कि बड़े भैया यह क्या कर दिया?
अब आपको गऊ हत्या लग गई है।
जाइये प्रायश्चित करके आइए। अब वह देदव्यास के यहां पहुंचे अब इसे नियति का खेल कहें कौरवों का दुर्भाग्य कहें कि कृष्ण की लीला कहें कि व्यास जी आश्रम पर नहीं थे।मिले उनके पुत्र शुकदेव जी। उन्होंने विधान बताया कि बलराम जी आप १८ दिन तक १८
तीर्थों का भ्रमण करके दान पुण्य देते हुए यहां आ जाइए तभी यह
पलायन पूरा होगा। अब श्रीकृष्ण भाई से युद्ध करने से बच गए और अगले १८ दिनों में महाभारत युद्ध को समाप्त करा दिया। बलराम जी तब पहुंचे जब भीम दुर्योधन की जंघा पर गदा प्रहार कर चुके थे।बाद श्रीकृष्ण ने किसी तरह मनाकर उन्हें शांत कराया।

सनातन धर्म में ९ ,१८ ,१०८ सभी का बहुत महत्व है।सबका जोड़ ९
नौ को बहुत शुभ माना जाता है नौ एक पूर्णाक भी है
ग्रह नौ , गर्भ में शिशु नौ महीने रहता है , नव दुर्गा और नवरात्र

द्वापर युग = ८६४००० वर्ष
८ + ६+ ४+०+०+० = १८ =१+८= ९
त्रेता १२९६००९ वर्ष = जोड़ ९
सतयुग १७२८००० वर्ष = ९
पुराण व उप पुराण १८ = ९

महाभारत युद्ध १८ दिनों चला = १+८= ९
कंस वध १८ वर्ष की आयु में १+८=९

श्री मद्भागवत गीता अध्याय १८ ,१+८=९
माला के मनके १०८ १+०+८= ९

१२ राशियों और ९ ग्रहों की गुडंखंड १०८ = ९
काल के १८ भेद ( १साल १२ महीने ५ ऋतुएं)
= ९

सिद्धियां १८ , १+८= ९
विधाएं १८ शिवांग १०८ अर्थात १+८= ९
महाभारत युद्ध
१८ अक्षौहिणी सेना = ९
युद्ध का क्षेत्रफल कोस १८ =९
युद्ध में भाग ले रहे योद्धा १८= ९
अर्थात सूत्रधार मुख्यत १८ =९
१८ योद्धा शेष बचे भगवान विष्णु के (आठवें) अवतार श्री कृष्ण
माता देवकी के (आठावे) पुत्र
आठवें मुहूर्त में अष्टमी को जन्म

पृथ्वी का ऊपरी वृत ३६० डिग्री ३+६ = ९
सूर्य का व्यास १०८ गुना
चन्द्रमा का १०८ गुना
२४ घंटे सांसों की संख्या २१६००= ९
सूर्य की बदलती कलाएं २१६०००= ९
नक्षत्र २७ , २+७ = ९
द्वापरयुग में भगवान श्री कृष्ण ने अवतार लेकर कंस आदि दुष्टों का संहार किया और महाभारत के युद्ध में गीता का उपदेश दिया।
कहते हैं कि महाभारत युद्ध में 18 संख्‍या का बहुत महत्व है।
इस युद्ध के प्रमुख सूत्रधार भी 18 थे। इस युद्ध में कुल 18 योद्धा ही जीवित बचे महाभारत की पुस्तक में 18 अध्याय हैं। कृष्ण ने कुल 18 दिन तक अर्जुन को ज्ञान दिया। 18 दिन तक ही युद्ध चला। गीता में भी 18 अध्याय हैं। कौरवों और पांडवों की सेना भी कुल 18 अक्षोहिनी सेना थी जिनमें कौरवों की 11 और पांडवों की 7 अक्षोहिनी सेना थी। कुल 18 अध्याय हैं- अर्जुनविषादयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग, कर्मसंन्यासयोग, आत्मसंयमयोग, ज्ञानविज्ञानयोग, अक्षरब्रह्मयोग, राजविद्याराजगुह्ययोग, विभूतियोग, विश्वरूपदर्शनयोग एंव भक्तियोग, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञविभागयोग, गुणत्रयविभागयोग, पुरुषोत्तमयोग, दैवासुरसम्पद्विभागयोग, श्रद्धात्रयविभागयोग और मोक्षसंन्यासयोग। महाभारत ग्रंथ में कुल 18 पर्व हैं- आदि पर्व, सभा पर्व, वन पर्व, विराट पर्व, उद्योग पर्व, भीष्म पर्व, द्रोण पर्व, अश्वमेधिक पर्व, महाप्रस्थानिक पर्व, सौप्तिक पर्व, स्त्री पर्व, शांति पर्व, अनुशासन पर्व, मौसल पर्व, कर्ण पर्व, शल्य पर्व, स्वर्गारोहण पर्व तथा आश्रम्वासिक पर्व। मालूम हो क‍ि ऋषि वेदव्यास ने 18 पुराण भी रचे हैं। 18 का महाभारत तथा द्वापर युग में यही बहुत बड़ा रहस्मयि योगदान है |
हिंदू धर्म में 18 के अंक को बहुत ही शुभ माना जाता है।क्योंकि इसका योग 9 बनता है।और 9 अंक को सबसे पॉवरफुल अंक माना जाता है।ज्योतिष में इसका संबंध मंगल ग्रह से माना जाता है। इतना ही नहीं इस ज्ञान सागर में श्लोक भी 18 हजार हैं।समय की गति, जिसे हम चक्रकाल कहते हैं, इसके भी 18 भेद होते है |मां भगवती के 18 प्रसिद्ध स्वरूप हैं।

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♦️♦️♦️ रात्रि कहांनी ♦️♦️♦️

🟠👉🏿इन्द्र और तोते की कथा➖🏵️
🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅 *देवराज इन्द्र और धर्मात्मा तोते की यह कथा महाभारत से है।कहानी कहती है,अगर किसी के साथ ने अच्छा वक्त दिखाया है तो बुरे वक्त में उसका साथ छोड़ देना ठीक नहीं।* *एक शिकारी ने शिकार पर तीर चलाया। तीर पर सबसे खतरनाक जहर लगा हुआ था।पर निशाना चूक गया।तीर हिरण की जगह एक फले-फूले पेड़ में जा लगा।पेड़ में जहर फैला।वह सूखने लगा।उस पर रहने वाले सभी पक्षी एक-एक कर उसे छोड़ गए।पेड़ के कोटर में एक धर्मात्मा तोता बहुत बरसों से रहा करता था। तोता पेड़ छोड़ कर नहीं गया,बल्कि अब तो वह ज्यादातर समय पेड़ पर ही रहता।दाना-पानी न मिलने से तोता भी सूख कर काँटा हुआ जा रहा था।बात देवराज इन्द्र तक पहुँची। मरते वृक्ष के लिए अपने प्राण दे रहे तोते को देखने के लिए इन्द्र स्वयं वहाँ आए।* *धर्मात्मा तोते ने उन्हें पहली नजर में ही पहचान लिया।इन्द्र ने कहा,देखो भाई इस पेड़ पर न पत्ते हैं, न फूल,न फल।अब इसके दोबारा हरे होने की कौन कहे,बचने की भी कोई उम्मीद नहीं है।जंगल में कई ऐसे पेड़ हैं,जिनके बड़े-बड़े कोटर पत्तों से ढके हैं।पेड़ फल-फूल से भी लदे हैं।वहाँ से सरोवर भी पास है।तुम इस पेड़ पर क्या कर रहे हो,वहाँ क्यों नहीं चले जाते ?तोते ने जवाब दिया,देवराज,मैं इसी पर जन्मा,इसी पर बढ़ा,इसके मीठे फल खाए।इसने मुझे दुश्मनों से कई बार बचाया। इसके साथ मैंने सुख भोगे हैं।आज इस पर बुरा वक्त आया तो मैं अपने सुख के लिए इसे त्याग दूँ।जिसके साथ सुख भोगे,दुख भी उसके साथ भोगूँगा,मुझे इसमें आनन्द है।आप देवता होकर भी मुझे ऐसी बुरी सलाह क्यों दे रहे हैं ?' यह कह कर तोते ने तो जैसे इन्द्र की बोलती ही बन्द कर दी।तोते की दो-टूक सुन कर इन्द्र प्रसन्न हुए,बोल,मैं तुमसे प्रसन्न हूँ।कोई वर मांग लो।तोता बोला,मेरे इस प्यारे पेड़ को पहले की तरह ही हरा-भरा कर दीजिए।देवराज ने पेड़ को न सिर्फ अमृत से सींच दिया,बल्कि उस पर अमृत बरसाया भी।पेड़ में नई कोपलें फूटीं।वह पहले की तरह हरा हो गया,उसमें खूब फल भी लग गए।तोता उस पर बहुत दिनों तक रहा,मरने के बाद देवलोक को चला गया।* *युधिष्ठिर को यह कथा सुना कर भीष्म बोले,अपने आश्रयदाता के दुख को जो अपना दुख समझता है,उसके कष्ट मिटाने स्वयं ईश्वर आते हैं।बुरे वक्त में व्यक्ति भावनात्मक रूप से कमजोर हो जाता है। जो उस समय उसका साथ देता है,उसके लिए वह अपने प्राणों की बाजी लगा देता है।किसी के सुख के साथी बनो न बनो,दुख के साथी जरूर बनो।यही धर्मनीति है और कूटनीति भी*

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आज मेने अपने पिताजी को एक उपहार दिया और उनके पैर छुए …..
पिताजी बोले: पैर छूना तो तेरा नित्यकर्म है पर आज ये उपहार क्यों ?
मैंने बड़े विनम्रतापूर्वक, खुश होकर कहा :- क्योंकि पिताजी आज पितृदिवश है यानी पिताजी का दिन (FATHER’S DAY)

फिर क्या था

पिताजी ने जूता उतारा और बे मौसम वारिश कर दी
दे दना दन……..
कितने जूते मुझमे मारे याद नही
और बोले :- अभी में जिंदा हूँ, और तू मेरा श्राद निकाल रहा है! अरे मूर्ख हमारे यहाँ जिस दिन पिताजी की मृत्यु होती है उसे हर साल पिताजी का दिन कहा जाता है !

जब उनका गुस्सा ठंडा हुआ तब मैंने पूछा कि हुआ क्या ?
मेरे पिताजी बोले :- ये उन लोगो के लिए है जो पूरे बर्ष अपने माता पिता की कोई परवाह नही करते,न उनकी देखभाल करते, वो किस हाल में है ? यह जानने के लिए भी उनके पास समय नही है !
365 दिन में से 1 दिन पिता को और 1 दिन माँ को याद किया और इतिश्री कर ली ! वाकी 363 दिन उनका क्या हाल है ?
इससे कोई मतलब नही ।

हमारे हिंदुस्तान में 365 दिन ही माता पिता के होते है ! हमारी संस्कृति में माँ बाप के आशीर्वाद से ही दिन की शुरुआत होती है !!

और आखिर में बोले :- ये गलत शुरुआत तो तूने शुरू कर दी है इसका परिणाम तेरे बेटा बेटी या उनके बच्चे भोगेंगे । जब माँ बाप को सिर्फ 1 दिन ही याद किया जाएगा और इसे गलत भी नही माना जायेगा ! क्योकि तब तक ये परम्परा या रीति रिवाज का रूप ले चुका होगा !

उनकी ये बात मेरी समझ मे तो आ गयी और आपकी….?

अखिल भंडारी जैन

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भगवान शंकर ने ली श्रीराम की मर्यादा की परीक्षा !!
भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश की लीलाएं अत्यन्त न्यारी हैं । अपने भक्तों की परीक्षा वे अद्भुत तरीके से लेते रहते हैं । ऐसी ही परीक्षा भगवान शंकर ने अपने भक्त भगवान श्रीराम की ली थी ।

एक बार अयोध्या में राघवेंद्र भगवान श्रीराम ने अपने पितरों का श्राद्ध करने के लिए ब्राह्मण-भोजन का आयोजन किया । ब्राह्मण-भोजन में सम्मिलित होने के लिए दूर-दूर से ब्राह्मणों की टोलियां आने लगीं । भगवान शंकर को जब यह मालूम हुआ तो वे कौतुहलवश एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धर कर ब्राह्मणों की टोली में शामिल होकर वहां पहुंच गए और श्रीरामजी से बोले—‘मुझे भी भोजन करना है ।’

अन्तर्यामी भगवान श्रीराम बूढ़े ब्राह्मण को पहचान गए और समझ गए कि भगवान शंकर ही मेरी परीक्षा करने यहां पधारे हैं । ब्राह्मण-भोजन के लिए जैसे ही पंगत पड़ी, भगवान श्रीराम ने स्वयं उस वृद्ध ब्राह्मण के चरणों को अपने करकमलों से धोया और आसन पर बिठाकर भोजन-सामग्री परोसना शुरु कर दिया । छोटे भाई लक्ष्मणजी भगवान शंकर को जो भी वस्तु परोसते, शंकरजी उसे एक ही ग्रास में खत्म कर देते । उनकी पत्तल पर कोई सामान बचता ही नहीं था । सभी परोसने वाले उस बूढ़े ब्राह्मण की पत्तल में सामग्री भरने में लग गए, पर पत्तल तो खाली-की-खाली ही नजर आती । श्रीरामजी मन-ही-मन मुस्कराते हुए शंकरजी की यह लीला देख रहे थे ।

भोजन समाप्त होते देख महल में चिंता होने लगी गयी । माता सीता के पास भी यह समाचार पहुंचा कि श्राद्ध में एक ऐसे वृद्ध ब्राह्मण पधारे हैं, जिनकी पत्तल पर सामग्री परोसते ही साफ हो जाती है । श्राद्ध में आमन्त्रित सभी ब्राह्मणों को भोजन कराना भगवान श्रीराम की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया । माता सीता भी चिन्तित होने लगीं ।

जब बनाया गया सारा भोजन समाप्त हो गया फिर भी शंकरजी तृप्त नहीं हुए तो श्रीराम ने माता अन्नपूर्णा का स्मरण कर उनका आह्वान किया । सभी परोसने वाले व्यक्ति वहां से हटा दिये गये । माता अन्नपूर्णा वहां प्रकट हो गयीं ।

शंकरजी की क्षुधा केवल माता अन्नपूर्णा ही कर सकती हैं शान्त !!

श्रीरामजी ने माता अन्नपूर्णा से कहा—‘अपने स्वामी को आप ही भोजन कराइए, इन्हें आपके अतिरिक्त और कोई तृप्त नहीं कर सकता है ।’

मां अन्नपूर्णा ने जब अपने हाथ में भोजन पात्र लिया तो उसमें भोजन अक्षय हो गया । अब वे स्वयं विश्वनाथ को भोजन कराने लगीं । मां अन्नपूर्णा ने पत्तल में एक लड्डू परोसा । भगवान विश्वनाथ खाते-खाते थक गये पर वह समाप्त ही नहीं होता था । मां ने दोबारा परोसना चाहा तो भगवान शंकर ने मना कर दिया । शंकरजी हंसते हुए डकार लेने लगे और बोले—‘तुम्हें आना पड़ा, अब तो मैं तृप्त हो गया ।’

मां अन्नपूर्णा काशी की अधीश्वरी हैं इसलिए वहां एक कहावत प्रचलित है—

‘बाबा-बाबा सब कहै, माई कहे न कोय।
बाबा के दरबार में माई कहैं सो होय ।।

जिस प्रकार भगवती अन्नपूर्णा द्वारा भगवान शिव की पत्तल में परोसी गयी मिठाई बार-बार खाने पर भी कभी घटती नहीं, उसी प्रकार अच्छी नीयत से कमाया हुआ धन कितना भी खर्च करने पर घटता नहीं और खराब नीयत से अर्जित धन कभी ठहरता नहीं, साथ ही दु:ख का कारण भी बनता है । सत्यता और ईमानदारी से कमाया गया धन कभी घटता नहीं और चोरी, बेईमानी व अन्य गलत तरीकों से कमाये हुए धन की बरकत भी वैसी ही होती है । इसलिए अच्छे धन की अच्छी बरकत होती है ।

शंकरजी ने ली भगवान श्रीराम-सीता की मर्यादा की परीक्षा

अब शंकरजी श्रीरामजी से बोले—‘मैं इतना खा गया हूँ कि मुझसे अपने आप उठा नहीं जा रहा है । मुझे जरा उठाओ ।’ हनुमानजी अपने स्वामी का कार्य करने के लिए आगे बढ़े और शंकरजी को उठाने लगे परन्तु वे उन्हें उठा नहीं सके । श्रीरामजी ने लक्ष्मणजी से शंकरजी को उठाने के लिए कहा ।

अनन्त के अवतार की शक्ति भी अनन्त होती है । लक्ष्मणजी ने शंकरजी को उठाकर एक पलंग पर लिटा दिया । अब शंकरजी ने कहा—‘मेरा मुख और हाथ धो दो ।’

माता सीता ने जैसे ही मुख धोने के लिए जल दिया, शंकरजी ने मुख में पानी भरकर माता सीता पर कुल्ला कर दिया । माता सीता क्रुद्ध होने के बजाय हाथ जोड़कर शंकरजी से बोली—‘आपके उच्छिष्ट जल के मेरे ऊपर गिरने से मेरा शरीर पवित्र हो गया, मैं आपकी बहुत आभारी हूँ ।’

अब भगवान शंकर ने श्रीराम को चरण दबाने की आज्ञा दी । श्रीराम और लक्ष्मण दोनों शंकरजी के चरण दबाने लगे और माता सीता पंखा झलने लगीं ।

प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने कहा—‘मैंने तुम्हारी मर्यादा की परीक्षा ली जिसमें तुम सफल रहे । तुम्हारी जो इच्छा हो मुझसे मांग लो ।’

श्रीराम ने कहा—‘यद्यपि आपके पास जो चीजें हैं (विष का भोजन, विषधर सर्प, गजचर्म, बूढ़ा बैल, भूत-प्रेत पिशाच) वे हमारे किसी काम की नहीं हैं, इसलिए आप अपने चरणों की भक्ति दें और मेरी सभा में कथा सुनाया करें ।’

तब से शंकरजी राम सभा के कथावाचक बन गए और पूर्व कल्पों की कथाएं सुनाया करते थे।

राम चन्द्र गुप्ता

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समय का पहिया
यह सच्ची घटना 60वर्ष पुरानी है। लक्ष्मीचंद पढ़े लिखे और होनहार युवा हैं। उनके पिताजी गांव के समृद्धि सेठ हैं, लेकिन अपने बेटे की पढ़ाई में रुचि देखकर उन्होंने उसे पढ़ाया। उनके एक परिचित रिश्तेदार ने उनके लिए एक रिश्ता बताया । उन परिचित पर भरोसा करके उन्होंने लक्ष्मी चंद की बात तय कर दी ।”सब कुछ अच्छा ही होगा “
यह जानकर उन्होंने हां कह दी, और लड़की से मिले भी नहीं ।लड़की संपन्न और प्रतिष्ठित परिवार की है, यह जानकारी थी । बारात बस में गई, शादी हुई, उस समय परिवेश बिल्कुल परंपराओं से युक्त मुक्त था। सिर पर घुंघट लिया जाता था। लक्ष्मी चंद शादी करके दुल्हन के साथ घर आ गए। लेकिन एक दो दिन बाद ही दुल्हन की हरकतें सभी को समझ में आने लगी। वह मानसिक रूप से विक्षिप्त महिला थी। दाल चावल घर के कुएं में फेंक देना, अपने कपड़ों को जला देना ,इस तरह की हरकतें करने लगी। लक्ष्मी चंद जी पढ़े लिखे थे ,उन्होंने सोचा” प्रेम से उसके जीवन की दशा बदलू “उसके साथ घूमने गए, लेकिन वहां पर भी ऐसी हरकतें करते रही। पढ़े-लिखे युवा मन के सपने स्वाहा हो गए। मन में एक अजीब सी कशमकश और दुख आ गया।
घूमने के बाद घर वापस आए। घर वालों ने भी सोचा कि कुछ सुधार हो जाए, लेकिन नहीं हुआ ।तब लक्ष्मीचंद अपने ससुराल गए और अपने ससुर पर पर गुस्सा करते हुए लड़की को वही छोड़ कर आ गए, और बोला कि “आपने मेरा जीवन बर्बाद क्यों किया??
जीवन में एक नैराश्य की भावना आ गई ।अब शादी नहीं करना , ऐसा सोचने लगे।उस समय आचार्य विनोबा भावे का भूदान आंदोलन चल रहा था। लक्ष्मी चंद जी आचार्य विनोबा भावे से प्रेरित थे, अतः उनकी पद यात्राओं में उनसे जुड़ गए, जब भी अवसर लगता वह जाते। शासकीय नौकरी भी चल रही थी, जिस घर में रह रहे थे ,वहां पर ममतामई महिला कोकिला जिसे वह मासी कहते थे, रहते थे। उन्होंने उनसे उनके वैवाहिक जीवन के बारे में पूछा, तब उन्होंने सब बता दिया, और अपने जीवन में आई हुई निराशा के बारे में भी।
तब उन मासी ने उन्हे कहा कि मेरी निगाह में गरीब परिवार की एक लड़की है, तुम चाहो तो मैं तुम्हारी बात वहां पर करवा सकती हूं ।बात आगे बढ़ी। लक्ष्मी चंद जी ने रत्ना को देखा । रत्ना समझदार, सुलझी हुई लड़की थी। लक्ष्मी चंद जी ने अपने पिताजी से आज्ञा लेकर एक सादे समारोह में रत्ना को अपनी जीवनसंगिनी बना लिया।
समय का पहिया घूमता रहा, और रत्ना जैसी सहधर्मिणी को पाकर उनके जीवन की सारी निराशा आशा में बदल गई। दो पुत्रियों और एक पुत्र को जन्म दिया। सुंदर गृहस्थी धर्म का पालन किया, और अपने बच्चों को उत्तम संस्कारों से परिपूर्ण करके लक्ष्मीचंद और रत्ना नेअपने जीवन को धन्य बनाया। विषम स्थिति में भी उचित सामंजस्य से जीवन में किसी भी समस्या का समाधान किया जा सकता है ।

सुधा जैन

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💐💐💐💐ज्ञान की पोटली💐💐💐

🌹दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम🌹 *'एक' सेठ जी भगवान "कृष्ण"जी के परम भक्त थे,निरंतर उनका जाप और सदैव उनको अपने दिल में बसाए रखते थे।* *वो रोज स्वादिष्ट पकवान बना कर कृष्ण जी के मंदिर मे जाते थे अपने कान्हा जी को भोग लगाने।*

घर से तो सेठ जी निकलते पर रास्तें में ही उन्हें नींद आ जाती और उनके द्वारा बनाए हुए पकवान चोरी हो जाते।

सेठ जी बहुत दुखी होते और कान्हा जी से शिकायत करते हुये कहते

हेराधे हे मेरे कृष्ण,,,ऐसा क्यूँ होता हैं,मैं आपको भोग क्यू नही लगा पाता हूँ? *कान्हा जी,सेठ जी को कहते हे_वत्स दानें_दानें पे लिखा हैं खाने वाले का नाम, वो मेरे नसीब में नही हैं,इसलिए मुझ तक नही पहुंचता।* *सेठ थोड़ा गुस्सें से कहते हैं ऐसा नही हैं,प्रभु। कल मैं आपको भोग लगाकर ही रहूंगा आप देख लेना,और सेठ चला जाता हैं।कान्हा जी मुस्कुराते हैं और कहते हैं,ठीक है।* *दूसरे दिन सेठ सुबह_सुबह जल्दी नहा धोकर तैयार हो जाता हैं और अपनी पत्नी से चार डब्बें भर बढिया बढिया स्वादिष्ट पकवान बनाते हैं और उसे लेकर मंदिर के लिए निकल पड़ता हैं।* *सेठ डिब्बे पकड़ कर चलता है,रास्तें भर सोचता हैं,आज जो भी हो जाए सोऊगा नही कान्हा को भोग लगाकर रहूंगा।* *मंदिर के रास्तें में ही उसे एक भूखा बच्चा दिखाई देता है और वो सेठ के पास आकर हाथ फैलातें हुये कुछ देने की गुहार लगाता हैं।* *सेठ उसे ऊपर से नीचे तक देखता हैं।एक 5-6 साल का बच्चा हड्डियों का ढाँचा उसे उस पर तरस आ जाता हैं और वो एक लड्डू निकाल के उस बच्चें को दे देता हैं।* *जैसे ही वह उस बच्चें को लड्डू देता हैं,बहुत से बच्चों की भीड़ लग जाती हैं ना जाने कितने दिनो के खाए पीए नही, सेठ को उन पर करूणा आ जाती है।* *सेठ जी सब को पकवान बाँटने लगते हैं,देखते ही देखते वो सारे पकवान बाँट देते हैं। फिर उसे याद आता हैं,आज तो मैंने राधें जी कान्हा जी को भोग लगाने का वादा किया था।* *सेठ सोचते हैं कि मंदिर पहुंचने से पहले ही मैंने भोग खत्म कर दिया,अधूरा सा मन लेकर वह मंदिर पहुँच जाते हैं,और कान्हा की मूर्ति के सामने हाथ जोड़े बैठ जाते हैं।* *"कान्हा प्रकट होते हैं और सेठ को चिढ़ाते हुये कहते हैं, लाओ जल्दी लाओ मेरा भोग मुझे बहुत भूख लगी हैं,मुझे पकवान खिलाओं।* *सेठ सारी बात कान्हा को बता देते हैं।कान्हा मुस्कुराते हुए कहते हैं,मैंने तुमसे कहा था ना,दानें_दानें पर लिखा हैं खानें वाले का नाम,जिसका नाम था उसने खा लिया तुम क्यू व्यर्थ चिंता करते हो।* *सेठ कहता हैं,प्रभु मैंने बड़े अंहकार से कहा था,आज आपको भोग लगाऊंगा पर मुझे उन बच्चों की करूणा देखी नही गयी,और मैं सब भूल गया।* *कान्हा फिर मुस्कुराते और कहते हैं,चलो आओ मेरे साथ,और सेठ को उन बच्चों के पास ले जाते हैं जहाँ सेठ ने उन्हें खाना खिलाया था और सेठ से कहते हैं जरा देखो,कुछ नजर आ रहा हैं।* *"सेठ" की ऑखों से ऑसूओं का सैलाब बहने लगता हैं,स्वंय बाँके बिहारी लाल,उन भूखे बच्चों के बीच में खाना के लिए लड़ते नजर आते हैं।* *कान्हा जी कहते हैं वही वो पहला बच्चा हैं जिसकी तुमने भूख मिटाई,मैं हर जीव में हूँ, अलग अलग भेष में,अलग अलग कलाकारी में,अगर तुम्हें लगें मैं ये काम इसके लिए कर रहा था,पर वो दूसरे के लिए हो जाए,तो उसे मेरी ही इच्छा समझना,क्यूकि मैं तो हर कही हूँ।* *बस दानें नसीब की जगह से खाता हूँ,जिस जिस जगह नसीब का दाना हो वहाँ पहुँच जाता हूँ।फिर इसको तुम क्या कोई भी नही रोक सकता। क्यूकि नसीब का दाना,नसीब वाले तक कैसे भी पहुँच जाता हैं,चाहें तुम उसे देना चाहों या ना देना चाहों अगर उसके नसीब का हैं,तो उसे प्राप्त जरूर होगा।* *"सेठ" कान्हा के चरणों में गिर जाते हैं,और कहते हैं आपकी माया,आप ही जानें,*

प्रभु मुस्कुराते हैं और कहते हैं कल मेरा भोग मुझे ही देना दूसरों को नही,प्रभु और भक्त हंसने लगते हैं!! *प्यारे-दोस्तों ❗"आप लोगो के भी साथ ऐसा कई बार हुआ होगा मित्रों, किसी और का खाना,या कोई और चीज किसी और को मिल गयी,पर आप कभी इस पर गुस्सा ना करें,ये सब प्रभु की माया हैं,उसकी हर इच्छा में उनका धन्यवाद करे।।*

💐🌹🌷जय जय श्री राधे💐🌹🌷

💐💐💐💐शुभ प्रभात💐💐💐

🌷🌷आपका दिन मंगलमय हो🌷🌷

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जीवनधारा (भाग–सात)

एक दिन, ऑफिस के काम से रूपेश दूसरे शहर को जाता रहता है । पटना से थोड़ी ही दूर निकलकर हाइवे पर एक ढाबे पर कार रोक चाय पीने लगता है और अपने वॉलेट से नंदिनी की तस्वीर निकाल उसे देखते हुए कुछ सोचता रहता है ।

तभी, चाय बनाता हुआ ढाबेवाला बोलता है-“साहब, कितनी प्यारी बिटिया है । अभी कुछ दिनों पहले ऐसी ही एक प्यारी सी बच्ची अपने किसी रिश्तेदार के साथ इधर आयी थी । शायद बीमार थी, इसलिए बेहोश हो गई । फिर, उसके साथ वाला आदमी उसे अपनी गाड़ी में बिठा लेकर चला गया ।……….

…….. ढाबेवाले की बातें सुन रूपेश चाय पीना छोड़ उस लड़की के बारे में उससे विस्तार से पूछताछ करने लगा ।

“करीब दो-तीन दिन पहले, तकरीबन पैंतीस वर्ष की उम्र का एक आदमी ऐसी ही बच्ची को लेकर आया था । उस बच्ची की उम्र रही होगी- यही कोई चार-पांच साल के आसपास । आपके पास इसकी कोई और दूसरी तस्वीर है तो मुझे दिखाओ । तब शायद मैं उसे अच्छे से पहचान जाऊं, क्योंकि इसमें केवल बच्ची का चेहरा ही दिख रहा है। इसलिए मैं कंफ्यूज हो रहा हूँ।” उस ढाबेवाले ने रूपेश को बताया ।

आगे बढ़ने के बजाए रूपेश ने अपनी कार को वापस पटना की तरफ घुमाया और सीधे पूजा के घर पहुँच गया।

दरवाजे पर डोरबेल बजी और पूजा की मां ने दरवाजा खोला । इतने सालों बाद मिलने पर भी पूजा की मां ने रूपेश को झट से पहचान लिया ।

“कैसे हो बेटा ?” पूजा की मां ने रूपेश से उसका हालचाल पूछा ।

“नमस्ते आंटी, बहुत जरूरी काम हैं। पूजा को जल्दी से बुलाइए ।” रूपेश ने हड़बड़ाहट में कहा ।

पूजा की मां रूपेश को अंदर हाल में लेकर आयी और थोड़ा इंतजार करने बोलकर पूजा को बुलाने भीतर कमरे में चली गयी ।

सामने व्हील चेयर पर बैठे पूजा के पापा कोई पत्रिका पढ़ रहे थें । रूपेश ने उनका अभिवादन किया । खुश रहने का आशीर्वाद देकर पूजा के पापा ने उसे बताया कि उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है । एक तरफ जहां उनके कमर के निचले हिस्से ने काम करना बंद कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ अपनी बेटी की ऐसी हालत देखकर भी वह कुछ नही कर पा रहे है । तब, रूपेश ने उन्हे शहर के बाहर ढाबेवाले के द्वारा नंदिनी के फोटो को पहचानने की बात बताई । रूपेश की बात सुन पूजा के पिताजी के चेहरे पर उम्मीद की एक लकीर दिखी और उन्होंने हाथ जोड़कर रूपेश से अपने किए के लिए माफ़ी मांगा, जो उन्होंने उसके और उसके माता-पिता के साथ किया था ।

“अंकल, सब ठीक हो जाएगा । इतनी चिंता न करें, जो होना था सो हुआ । सब समय का दोष समझकर भूल जाइए।”–पूजा के पिताजी को हिम्मत बँधाते हुए रूपेश ने उनसे कहा।

तभी, भीतर के कमरे से पूजा आती है । रूपेश को अपने घर पर देखकर उसके आने का कारण पूछती है ।

“मुझे नंदिनी की दो-तीन तस्वीरें चाहिए, जिसमे वह पूरी दिखती हो । शहर के बाहर हाइवे के पास शायद उसे किसी ने देखा है । पर, नंदिनी की पूरी तस्वीर देखकर ही वह बता पाएगा कि वह नंदिनी थी या कोई और ।

पूजा कमरे से नंदिनी की कुछ तस्वीरें लेकर आती है और उसे रूपेश की ओर बढ़ा देती है। उन तस्वीरों को लेकर रूपेश लौटने लगता है तो पुजा खुद भी ढाबेवाले के पास चलने के लिए उससे आग्रह करती है।

फिर, रूपेश और पूजा ढाबेवाले की तरफ निकल पड़ते हैं। पूजा को चिंतित देख रूपेश उसे हिम्मत देते हुए कहता है कि चिंता न करो, नंदिनी जहां भी होगी, ठीक होगी और जल्दी ही मिल जायेगी ।

शहर से बाहर थोड़ी दूर चलने के पश्चात रूपेश अपनी कार सड़क के एक किनारे रोकता है और ढाबेवाले के पास पहुंच जाता है । वहाँ, नंदिनी की तस्वीर उसकी तरफ बढ़ाते हुए रूपेश कुछ कहता, इससे पहले ही वह ढाबेवाला नंदिनी को पहचान लेता है और बताता है कि इसी बच्ची को तो उसने उस दिन देखा था ।

रूपेश ने पूछा कि वो किस तरफ गए तो ढाबेवाले ने बताया- “जिसके साथ नंदिनी आयी थी, वह पास के ही एक गांव में रहता है और अक्सर इस ढाबे पर चाय पीने आता है । एकदिन, फोन पर किसी से बातचीत करते समय मैंने उसके पास के गांव में रहने की बात सुनी थी” ।

ढाबेवाले का मोबाइल नंबर ले रूपेश और पूजा, दोनों उसके बताए गाँव की तरफ बढ़ जाते हैं ।

हाइवे से थोड़ी दूर कार भगाने के बाद रूपेश एक कच्ची सड़क की तरफ मुड़ता है और थोड़ा अंदर आकर ही उस गांव में पहुंच जाता है ।

गांव में कुछ लोगों से पूछताछ करने के बाद शंभू नाम का एक ग्रामीण उस बच्ची को पहचान जाता हैं और उन्हे बताता है कि कुछ दिन पहले जब यह बच्ची बीमार थी तो कोई आदमी उसी के डिस्पेंसरी पर इसका इलाज करने लाया था ।

रूपेश शंभू से नंदिनी को ढूँढने में उनकी मदद करने की अनुरोध करता हैं। तब, शंभू बताता है कि डिस्पेन्सरी के रजिस्टर से शायद उस बच्ची का पता और मोबाइल नंबर मिल जाए । फिर, डिस्पेंसरी आकर रजिस्टर चेक करता है, जिसमें नंदिनी का दर्ज किया हुआ नाम और पता मिल जाता है, जो इसी गाँव का था ।

शंभू उन्हे रजिस्टर में दर्ज पते पर लेकर जाता है । रूपेश शंभू को उस घर के भीतर जाकर नंदिनी का हालचाल लेने बोलता है, ताकि पता चल सके कि वह अंदर है कि नही । रूपेश और पूजा थोड़ी दूरी पर जाकर खड़े हो जाते हैं, जहां से वह घर में होने वाली हरकतों पर नजर रख सकें और कोई उन्हे देख भी न पाये ।

शम्भू उस घर पर जाकर दरवाजा खटखटाता है । अंदर से एक आदमी बाहर निकलता है। यह वही आदमी था, जो नंदिनी को लेकर डिस्पेंसरी आया था । इसलिए दोनो एक-दूसरे को पहचान जाते हैं । शंभू उससे नंदिनी की तबीयत पूछता है और जांच करने के बहाने घर के अंदर चला जाता है । थोड़ी देर के बाद वह बाहर लौटता है और बिना इधर-उधर देखे अपनी डिस्पेन्सरी की ओर रवाना हो जाता है । रूपेश और पूजा भी उसके पीछे-पीछे चल देते हैं।

डिस्पेन्सरी पहुँच वह बताता है कि नंदिनी उस घर के भीतर ही है । उसके अलावा घर में एक और आदमी है ।

पूजा इस बार कोई भी गलती नही करना चाहती थी। इसीलिए उसने पुलिसवाले को फोन कर सारी बातें बताई और जल्दी से उस गाँव में पहुँचने का निवेदन किया। थोड़ी ही देर में पुलिसवाले आ गए । सभी उस घर पर पहुंचे, जहां नंदिनी थी ।

लेकिन यह क्या ? उस घर पर तो ताला लटका था।…..

क्रमशः………

धन्यवाद ।

मूल कृति : श्वेत कुमार सिन्हा
कृते WhiteBee

श्वेतकुमारसिन्हा #WhiteBee

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😊😇😊 इस बहाने मैं हँस तो लेता हूँ। 😊😇😊

एक सासु माँ और बहू थी।
🐾
सासु माँ हर रोज ठाकुर जी पूरे नियम और श्रद्धा के साथ सेवा करती थी।
🐾
एक दिन शरद रितु मेँ सासु माँ को किसी कारण वश शहर से बाहर जाना पडा।
🐾
सासु माँ ने विचार किया के ठाकुर जी को साथ ले जाने से रास्ते मेँ उनकी सेवा-पूजा नियम से नहीँ हो सकेँगी।
सासु माँ ने विचार किया के ठाकुर जी की सेवा का कार्य अब बहु को देना पड़ेगा लेकिन बहु को तो कोई अक्कल है ही नहीँ के ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी हैँ।

सासु माँ ने बहु ने बुलाया ओर समझाया के ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है।
कैसे ठाकुर जी को लाड लडाना है।
सासु माँ ने बहु को समझाया के बहु मैँ यात्रा पर जा रही हूँ और अब ठाकुर जी की सेवा पूजा का सारा कार्य तुमको करना है।
सासु माँ ने बहु को समझाया देख ऐसे तीन बार घंटी बजाकर सुबह ठाकुर जी को जगाना।
फिर ठाकुर जी को मंगल भोग कराना।
फिर ठाकुर जी स्नान करवाना।
ठाकुर जी को कपड़े पहनाना।
फिर ठाकुर जी का श्रृंगार करना ओर फिर ठाकुर जी को दर्पण दिखाना।
दर्पण मेँ ठाकुर जी का हंस्ता हुआ मुख देखना बाद मेँ ठाकुर जी राजभोग लगाना।

इस तरह सासु माँ बहु को सारे सेवा नियम समझाकर यात्रा पर चली गई।

अब बहु ने ठाकुर जी की सेवा कार्य उसी प्रकार शुरु किया जैसा सासु माँ ने समझाया था।

ठाकुर जी को जगाया नहलाया कपड़े पहनाये श्रृंगार किया और दर्पण दिखाया।

सासु माँ ने कहा था की दर्पण मेँ ठाकुर जी का हस्ता हुआ देखकर ही राजभोग लगाना।

दर्पण मेँ ठाकुर जी का हस्ता हुआ मुख ना देखकर बहु को बड़ा आशर्चय हुआ।

बहु ने विचार किया शायद मुझसे सेवा मेँ कही कोई गलती हो गई हैँ तभी दर्पण मे ठाकुर जी का हस्ता हुआ मुख नहीँ दिख रहा।

बहु ने फिर से ठाकुर जी को नहलाया श्रृंगार किया दर्पण दिखाया।
लेकिन ठाकुर जी का हस्ता हुआ मुख नहीँ दिखा।

बहु ने फिर विचार किया की शायद फिर से कुछ गलती हो गई।
बहु ने फिर से ठाकुर जी को नहलाया श्रृंगार किया दर्पण दिखाया।

जब ठाकुर जी का हस्ता हुआ मुख नही दिखा बहु ने फिर से ठाकुर जी को नहलाया ।

ऐसे करते करते बहु ने ठाकुर जी को 12 बार स्नान किया।
हर बार दर्पण दिखाया मगर ठाकुर जी का हस्ता हुआ मुख नहीँ दिखा।

अब बहु ने 13वी बार फिर से ठाकुर जी को नहलाने की तैयारी की।

अब ठाकुर जी ने विचार किया की जो इसको हस्ता हुआ मुख नहीँ दिखा तो ये तो आज पूरा दिन नहलाती रहेगी।

अब बहु ने ठाकुर जी को नहलाया कपड़े पहनाये श्रृंगार किया और दर्पण दिखाया।

अब बहु ने जैसे ही ठाकुर जी को दर्पण दिखाया तो ठाकुर जी अपनी मनमोहनी मंद मंद मुस्कान से हंसे।
बहु को संतोष हुआ की अब ठाकुर जी ने मेरी सेवा स्वीकार करी।

अब यह रोज का नियम बन गया ठाकुर जी रोज हंसते।
सेवा करते करते अब तो ऐसा हो गया के बहु जब भी ठाकुर जी के कमरे मेँ जाती बहु को देखकर ठाकुर जी हँसने लगते।

कुछ समय बाद सासु माँ वापस आ गई।
सासु माँ ने ठाकुर जी से कहा की प्रभु क्षमा करना अगर बहु से आपकी सेवा मेँ कोई कमी रह गई हो तो अब मैँ आ गई हूँ आपकी सेवा पूजा बड़े ध्यान से करुंगी।

तभी सासु माँ ने देखा की ठाकुर जी हंसे और बोले की मैय्या आपकी सेवा भाव मेँ कोई कमी नहीँ हैँ आप बहुत सुंदर सेवा करती हैँ लेकिन मैय्या दर्पण दिखाने की सेवा तो आपकी बहु से ही करवानी है…
इस बहाने मेँ हँस तो लेता हूँ।
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१) भरत, शत्रुघ्न
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३२) संजीवनी लाते समय बीच में जो बड़े मुँह वाली राक्षसी मिली थी
३३) भरत
३४) केवट
३५) लक्ष्मण
३६) जय श्री राम

जो ग़लत हों कृपया सुधारकर बताएँ । 🙏