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जुम्मन भाई की बकरी
चोरी होना


पूरे गांव में कोहराम मच गया। जुम्मन भाई की बकरी चोरी हो गई थी। उनकी पत्नी चिल्ला चिल्ला कर रोने लगी, जिससे मोहल्ले के लोग इकट्ठे हो गए। जुम्मन भाई बाहर चिंताग्रस्त मुद्रा में टूटी खाट पर बैठ गए । लोग उन्हें सांत्वना देने के लिए इकट्ठे हो गए। जुम्मन भाई रूंधे गले से बता रहे थे कि किस तरह वह बकरी ‘बहुउद्देशीय’ थी। उसके दूध से दिनभर चाय बनती थी ,उसके मेमनों को मुंबई एक्सपोर्ट किया जाता था जिससे अच्छे खासे रुपए मिल जाते थे और उसके कई वंशज त्योंहार पर कुर्बानी देने के काम भी आते थे।
मोहल्ले के एक नेता का कहना था कि इस घटना के पीछे कहीं ना कहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हाथ है। विश्व हिंदू परिषद के कई नेता भी इस क्षेत्र में सक्रिय हो गए हैं । उन्हीं की शह पर किसी ने इस घटना को अंजाम दिया होगा। कुछ लोग जुम्मन मियां को पुलिस में रिपोर्ट करने की सलाह देने लगे। जुम्मन मियां पुलिस और कोर्ट कचहरी से घबराते थे लेकिन लोगों के भारी दबाव में आकर वे थाने पहुंचे ।
पुलिस जी का कहना था कि यह पुलिस के स्तर का मामला नहीं है। संभव है कि बकरी ‘एक्स्ट्रा मैरिटल रिलेशंस’ के चलते किसी बकरे के साथ भाग गई हो। थानेदार का यह भी कहना था कि सामान्यत: वे लड़कियों की गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज नहीं करते और जब गुमशुदा लड़की के साथ बलात्कार हो जाता है तो जरूर वे मीडिया के दबाव में रिपोर्ट कर अपराधियों को पकड़ने का प्रयास करते हैं।
गांव के कुछ नेता टाइप लोगों ने विधायक को फोन पर बताया कि पुलिस रिपोर्ट लिखने को तैयार नहीं है, इसलिए आप पुलिस पर दबाव बनाएं।
एमएलए लल्लू सिंह ने पुलिस जी को फोन किया और कहा,’ थानेदार जी, आप रिपोर्ट काहे नहीं लिख रहे हैं? आपको पता नहीं कि जुम्मन हमारा खास आदमी है और उसका मोहल्ला जिसको भी वोट डालता है, एकमुश्त वोट डालता है। उसकी रिपोर्ट लिखा जाना मेरे राजनीतिक भविष्य से जुड़ा है इसलिए चुपचाप रिपोर्ट लिख लें।’
पुलिस जी ने विनम्रता से कहा,’ सर जी ,हमारे पास पेंडिंग केसेज इतने हो गए हैं कि एसपी साहब वैसे ही नाराज हैं। इसलिए अभी एफआईआर दर्ज करना संभव नहीं है । हां, आपके कहने से मैं गुमशुदगी रिपोर्ट दर्ज कर लेता हूं। जैसे कि लोगों के मोबाइल चोरी हो जाने पर भी हम गुमशुदगी रिपोर्ट दर्ज करते हैं ।जहां तक जुम्मन का सवाल है उसको मैं समझा दूंगा ।’
पुलिस जी ने जुम्मन को अपने चेंबर में बुलाया तो वह बेचारा डर से कांप रहा था ।पुलिस जी ने कहा , ‘देखो जुम्मन , हम तुम्हारी बकरी की गुमशुदगी रिपोर्ट लिख रहे हैं। लेकिन यदि तुम एफआईआर करवाओगे तो पुलिस घर की औरतों को थाने बुलाकर बयान लेगी और यदि पुलिस को कोई बकरी बरामद होती है तो शिनाख्त के लिए बार-बार घर की औरतों को भी बेपर्दा होकर यहां आना पड़ेगा। शिनाख्त परेड में बहुत सारी बकरियों के बीच में तुम्हारी बकरी खड़ी करके तुमसे पहचानने को कहा जाएगा और यदि तुमने गलत बकरी पहचान ली तो उल्टे तुम पर धोखाधड़ी और पुलिस को गुमराह करने का मुकदमा बन जाएगा। यही नहीं बाद में कई साल तक कोर्ट में जाकर पूरे खानदान को गवाही भी देनी पड़ेगी। आजकल जज साहब भी पशु प्रेमियों की एक एनजीओ के दबाव में बहुत सख्त हैं। हो सकता है कि तुम पर पशुओं के साथ क्रूरता बरतने के आरोप में नगद जुर्माना लगा दे। इसलिए तुम इस तरह की गुमशुदगी रिपोर्ट दर्ज करा दो कि मेरी बकरी स्वेच्छा से कहीं घूमने गई थी और रास्ता भटक कर गुम हो गई है।पुलिस जी से निवेदन है कि वह मेरी बकरी को ढूंढने में सहयोग करें।’
पुलिस की इस कार्रवाई से जुम्मन भाई संतुष्ट थे। जुम्मन भाई को इस बात पर भी संतुष्टि थी कि पुलिस जी ने खुद उन्हें स्टूल पर बैठने के लिए कहा। कई बार तो पुलिस जी डंडा पहले मारती है ,बात बाद में सुनती है ।
लेकिन जुम्मन भाई के मोहल्ले के पार्षद और कुछ नेता इससे संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने पुलिस थाने पर पथराव शुरू कर दिया जवाब में पुलिस ने लाठियां भी चलाई और न जाने कहां से गुड की भेली पर भिनभिनाने वाली मक्खियों की तरह दुनिया भर के पत्रकार अपने टीवी कैमरे सहित थाने के बाहर आ गए। कुछ पत्रकार तो बाकायदा चिल्ला-चिल्लाकर भीड़ को उकसा रहे थे।
जुम्मन तो डर से कोने में चुपचाप खड़ा था पर कई लोग उसकी ओर से टेलिविजन चैनल्स को ‘ बाइट ‘ दे रहे थे। कुछ चैनल्स ने घटना का लाइव प्रसारण भी शुरू कर दिया। भीड़ केंद्र सरकार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के विरुद्ध नारे लगा रही थी।
कुछ ‘ लिबरल हिन्दू’ अपनी पिटी हुई दुकान चलाने के उद्देश्य से बाबा रामदेव के खिलाफ भी नारे लगाने लगे। इन लोगों का कहना था कि बाबा जी योग के नाम पर धर्म का प्रचार कर रहे हैं जो कि धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है और वे मर जाएंगे लेकिन संविधान का ‘उल्लंघन’ नहीं होने देंगे।
दूसरी ओर विश्व हिंदू परिषद और के लोग भी उत्तेजित हो गए ।उनका कहना था कि वे शाकाहारी लोग हैं और उन पर बकरी चोरी का आरोप अत्यंत गंभीर है इसलिए सरकार से जुम्मन को तुरंत गिरफ्तार करने की मांग करते हैं । इन लोगों का कहना था कि जुम्मन खुद अकेला ही गांव की डेमोग्राफी को बदल रहा है। जुम्मन ने अपना मकान भी पंचायत की जमीन पर अवैध रूप से बनाया तथा उसमें खेत के आसपास की गोचर भूमि पर भी कब्जा कर रखा है । उसके सभी अवैध कब्जे हटाए जाए। कुछ नेता गांव के झोलाछाप ‘डॉक्टर’ तनवीर अहमद को गिरफ्तार करने की मांग करने लगे। उनका कहना था कि जावेद अख्तर द्वारा जिस डॉक्टर ऑर्थो के घुटने के तेल का प्रचार किया जा रहा है उसे बेच बेचकर कर तनवीर मालामाल हो गया लेकिन किसी का घुटना ठीक नहीं हुआ । डॉ(?) तनवीर का दावा था कि ‘डॉ ऑर्थो’ के तेल से जुम्मन मियां की बकरी के घुटने का दर्द भी ठीक हुआ है।
अपनी मांग के समर्थन में विश्व हिंदू परिषद ने पटवारी कार्यालय पर भी प्रदर्शन किया। लोगों के उग्र प्रदर्शन के चलते वहां पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े।
गांव में हो गए सांप्रदायिक तनाव को के मद्देनजर हैदराबाद और इलाहाबाद से अनेक नेता जुम्मन के समर्थन और विरोध में इकट्ठे हो गए और उन्होंने आम सभा करने का प्रयास किया। पुलिस ने इसकी अनुमति नहीं दी लेकिन इन नेताओं ने मीडिया को संबोधित किया और आरोप लगाया कि जब से नरेंद्र मोदी की सरकार सत्ता में आई है तब से जुम्मन भाई ही नहीं, उनके समुदाय के अनेक लोगों की बकरियां चोरी हो रही हैं ।
गांव में एक समझदार व्यक्ति बाबा देवीशंकर जी थे ।उन्होंने दोनों पक्षों को बुलाकर समझाया तथा यह प्रस्ताव दिया कि वह अपने रुपयों से जुम्मन को नयी बकरी दिलाने को तैयार हैं ताकि यह विवाद खत्म हो जाए और गांव के लोग शांति से एक दूसरे के साथ पहले की तरह मिलजुल कर रहें। जुम्मन मियां इस प्रस्ताव पर सहर्ष तैयार थे लेकिन उनके साथ वाले लोगों का कहना था कि एक तो जुम्मन का अपनी बकरी के साथ भावनात्मक लगाव था इसलिए वह कोई अन्य बकरी स्वीकार नहीं करेगा, दूसरा यदि इस तरह पीछे हट गए तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के लोगों के हौसले बुलंद हो जाएंगे।फिर वे हावी होने का प्रयास करेंगे।
हैदराबाद से आए नेता ने भी लोगों से डटे रहने का आह्वान किया।
उधर इलाहाबाद से आए एक नेता का कहना था जुम्मन की बकरी और बकरे ने गांव में पशुओं की संख्या इतनी बढ़ा दी है कि चारों ओर इससे गंदगी फैलती है और ये किसी के भी खेत में घुसकर उसकी फसल खा जाते हैं ।इसलिए सरकार को जुम्मन के बकरी पालने पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए ।
गांव में दो-तीन निष्क्रिय वामपंथी नेता भी थे। उन्हें अपने क्रियाकलापों के लिए यह माहौल उपयुक्त लगा इसलिए वे भी सक्रिय हो गए। उन्होंने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर दी और कोर्ट से कहा कि जुम्मन का मौलिक अधिकार है कि वह बकरी पाले लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ सदस्य केंद्र सरकार की शह पर असामाजिक तत्वों के साथ मिलकर उनको बकरी पालने में रुकावटें पैदा कर रहे हैं । यही नहीं इस बार तो उन्होंने उनकी बकरी भी चोरी कर कहीं गायब कर दी। इससे जुम्मन भाई को न केवल आर्थिक हानि हो रही है वरन उनके परिवार का भरण पोषण मुश्किल हो गया है। उनका पूरा परिवार बकरी से भावनात्मक लगाव के कारण ‘डिप्रेशन’ में आ गया है। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से इस याचिका को बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की तरह मानने का भी आग्रह किया। यह जनहित याचिका शनिवार को देर से दायर की गई थी और अगले दिन रविवार था लेकिन मामले की नजाकत को समझते हुए कोर्ट ने ई-मेल से केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस भेजे तथा इसकी सुनवाई रविवार को सुबह पांच बजे से करने का निर्णय लिया। कोर्ट के बाहर सुबह से ही विभिन्न समुदायों के अलग-अलग लोगों के झुंड पहुंचने लगे। ‘सचमुच’ और ‘ दिनरात’ न्यूज़चैनल के संवाददाताओं में भी न्यूज़ को कवर करने की होड़ लगी हुई थी। दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायालय ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि वह तीन दिन में बकरी को ढूंढ कर न्यायालय के सामने प्रस्तुत करें और इस बीच जुम्मन को प्रतिदिन चार लीटर दूध और अदरक -इलायची भी मुआवजे के तौर पर दी जाए ताकि वह अपने परिवार के सभी सदस्यों को समय-समय पर पहले की तरह चाय बनाकर पिला सके।
कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि जुम्मन की धार्मिक भावनाओं को चोट ना पहुंचे इसलिए उन्हें भैंस का दूध दिया जाए। केंद्र सरकार को जुम्मन की सुरक्षा के लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस की एक बटालियन भी गांव में तैनात करने के निर्देश दिए गए। राज्य सरकार ने न्यायालय के आदेशों की पालना करते हुए एक डीआईजी रेंक के पुलिस अधिकारी के नेतृत्व में बकरी ढूंढने के लिए एसआईटी का गठन कर दिया तथा एक आईएएस अधिकारी को जुम्मन के घर बकरी मिलने तक दूध पहुंचाने के लिए तैनात कर दिया। राज्य सरकार ने अंतरिम मुआवजा के तौर पर जुम्मन को पंद्रह हजार ₹ की नगद सहायता देने की घोषणा की ।
न्यायालय के फैसले से जुम्मन काफी संतुष्ट थे लेकिन लोग उन्हें लगातार कह रहे थे कि उनके साथ अन्याय हुआ है और उन्हें उनकी बकरी मिलनी चाहिए। यदि उनकी बकरी नहीं मिलती है तो वह अनशन पर मुख्यमंत्री निवास के बाहर बैठ जाएं ।उधर जुम्मन भाई के पास पुलिस जी का गुप्त संदेश आया कि ऊपर से आदेश आया है कि जुम्मन को कोई भी एक बकरी ला कर दे दी जाए तथा उस से लिखवा लिया जाए कि यही मेरी बकरी है और अब मैं पूरी तरह से संतुष्ट हूं। उससे कोर्ट में एक एफिडेविट भी दाखिल करा दिया जाए कि मेरी बकरी मिल गई है और मैं राज्य सरकार एवं पुलिस के सहयोग के लिए उनका आभारी हूं ।पुलिस जी का मानना था कि जुम्मन संतुष्टि पत्र दे देंगे तो उससे उनके डीआईजी साहब की आईजी पद पर पदोन्नति हो जाएगी। उनके यहां दूध पहुंचाने वाले आईएएस अधिकारी का कहना था कि जुम्मन थोड़ा सा सहयोग करके संतुष्टि पत्र दे दें तो उन्हें भी राज्य सरकार पदोन्नत कर किसी महत्वपूर्ण पद पर लगा देगी, फिलहाल वे बर्फ पर लगे हुए हैं। गांव में तनाव के हालात को देखते हुए प्रसिद्ध पत्रकार चरखा दत्त , राज देसाई और खाना अयूब अपनी-अपनी कैमरा टीम लेकर गांव में पहुंच गए।
चरखा दत्त ने न्यूयार्क टाइम्स को एक लेख भेजा , जिसमें लिखा गया की जुम्मन भाई की बकरी चोरी होना एक मामूली घटना नहीं होकर केंद्र सरकार के संरक्षण में चल रही असहिष्णुता और एक धर्म विशेष के लोगों को परेशान करने की नीति की प्रतीक है । इस मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ में नहीं उठाए गया तो भारत के करोड़ों अल्पसंख्यकों की बकरियां संकट में पड़ जाएंगी।
कई टेलीविजन चैनलों पर एंकर इस विषय पर लाइव डिबेट करने लगे कि आखिर कब जुम्मन के घर बकरी और रौनक लौटेगी , जुम्मन भाई की बकरी चोरने का अपराधी कौन, कब होगी मुजरिमों की गिरफ्तारी आदि।
राष्ट्रीय स्तर की एक धर्मनिरपेक्ष पार्टी जनहित दल के अध्यक्ष ने जुम्मन भाई के प्रति सहानुभूति व्यक्त करते हुए कहां कि वे एक रात उनके घर व्यतीत करेंगे तथा उन्हीं के घर खाना खाएंगे। जुम्मन मियां शुरू में इसके लिए तैयार नहीं हुए। उनका कहना था कि लोगों की राजनीति के चलते उनकी शांति से चल रही दाल रोटी भी खतरे में पड़ गई है और गांव में पहले सभी समुदायों के लोगों से उनके प्यार मोहब्बत वाले संबंध थे। अब दूसरे समुदायों के लोग उन्हें अजीब सी निगाहों से देखते हैं इसलिए वह किसी सियासी झगड़े में नहीं पड़ना चाहते हैं।लेकिन नेताओं ने उन्हें समझाया और कहा कि जनहित दल सांप्रदायिक सद्भावना को बढ़ावा देता है इसलिए उसके अध्यक्ष को एक दिन उनके घर में आने दिया जाए और ये लोग कहने को तो गरीबों के घर का खाना खाते हैं लेकिन दरअसल खाना किसी फाइव स्टार होटल से पैक हो कर आता है, जिसे किसी गरीब की थाली में परोस कर मीडिया के सामने इस प्रकार दिखाया जाएगा जैसे वह जुम्मन की बीबियों ने बनाया हो। जनहित दल के 58 वर्षीय युवा नेता जुम्मन मियां के आए। रात भर रुके और देशभर के पत्रकारों -फोटोग्राफरों द्वारा इस एडवेंचर पिकनिक को कवर करने के बाद हेलीकॉप्टर से वापस लौट गए। लौट चलें उन्होंने पत्रकारों से कहा कि जुम्मन मियां की बकरी चोर ने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हाथ है और वे यह मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में उठाएंगे।
कुल मिलाकर पूरी दुनिया में जुम्मन मियां की बकरी की धूम मच गई ।
अचानक पुलिस जी को एक बड़ी कामयाबी मिली। पास के गांव के एक बहुत बड़े माफिया यूसुफ को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। इस माफिया के चेले आसपास के गांव से मोटरसाइकिलें, गाय व भैंस आदि चुरा कर लाते थे। इनके एक नए चेले आलम ने जुम्मन की बकरी चुरा ली थी। आलम पुलिस की गिरफ्त में आ गया। जब आलम को पुलिस जी ने रात को मानव अधिकारों के सोने के बाद ‘ आओ प्यार करें ‘ लिखे हुए एक लकड़ी के फट्टे से पीटना शुरू किया तो उसने कबूल कर लिया कि उसने ही जुम्मन मियां की बकरी चुराई है। बकरी बरामद हो गई। चारों ओर चैनल के पत्रकारों में उदासी का माहौल छा गया। चार-पांच दिन से चल रहा मुद्दा खत्म हो गया। अब उन्हें फिर कोई नया शिकार ढूंढना पड़ेगा।
चरखा दत्त भी अपना सामान समेटकर दिल्ली चली गई ।
जुम्मन भाई अपनी बकरी को पाकर बहुत प्रसन्न थे लेकिन उन्हें इस बात का अफसोस भी था कि इस प्रकरण में गांव के कुछ नेताओं ने अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए पूरे गांव में वैमनस्य पैदा कर दिया।

  • वेद माथुर

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वो जिसके हम मामा हैं

एक सज्जन बनारस पहुँचे। स्टेशन पर उतरे ही थे कि एक लड़का दौड़ता आया।
‘मामाजी! मामाजी!’ – लड़के ने लपक कर चरण छूए।
वे पहचाने नहीं। बोले – ‘तुम कौन?’
‘मैं मुन्ना। आप पहचाने नहीं मुझे?’
‘मुन्ना?’ वे सोचने लगे।
‘हाँ, मुन्ना। भूल गए आप मामाजी! खैर, कोई बात नहीं, इतने साल भी तो हो गए।’
‘तुम यहाँ कैसे?’
‘मैं आजकल यहीं हूँ।’
‘अच्छा।’
‘हाँ।’
मामाजी अपने भानजे के साथ बनारस घूमने लगे। चलो, कोई साथ तो मिला। कभी इस मंदिर, कभी उस मंदिर।
फिर पहुँचे गंगाघाट। सोचा, नहा लें।
‘मुन्ना, नहा लें?’
‘जरूर नहाइए मामाजी! बनारस आए हैं और नहाएँगे नहीं, यह कैसे हो सकता है?’
मामाजी ने गंगा में डुबकी लगाई। हर-हर गंगे।
बाहर निकले तो सामान गायब, कपड़े गायब! लड़का… मुन्ना भी गायब!
‘मुन्ना… ए मुन्ना!’
मगर मुन्ना वहाँ हो तो मिले। वे तौलिया लपेट कर खड़े हैं।
‘क्यों भाई साहब, आपने मुन्ना को देखा है?’
‘कौन मुन्ना?’
‘वही जिसके हम मामा हैं।’
‘मैं समझा नहीं।’
‘अरे, हम जिसके मामा हैं वो मुन्ना।’
वे तौलिया लपेटे यहाँ से वहाँ दौड़ते रहे। मुन्ना नहीं मिला।
भारतीय नागरिक और भारतीय वोटर के नाते हमारी यही स्थिति है मित्रो! चुनाव के मौसम में कोई आता है और हमारे चरणों में गिर जाता है। मुझे नहीं पहचाना मैं चुनाव का उम्मीदवार। होनेवाला एम.पी.। मुझे नहीं पहचाना? आप प्रजातंत्र की गंगा में डुबकी लगाते हैं। बाहर निकलने पर आप देखते हैं कि वह शख्स जो कल आपके चरण छूता था, आपका वोट लेकर गायब हो गया। वोटों की पूरी पेटी लेकर भाग गया।
समस्याओं के घाट पर हम तौलिया लपेटे खड़े हैं। सबसे पूछ रहे हैं – क्यों साहब, वह कहीं आपको नजर आया? अरे वही, जिसके हम वोटर हैं। वही, जिसके हम मामा हैं।
पाँच साल इसी तरह तौलिया लपेटे, घाट पर खड़े बीत जाते हैं। (शरद जोशी )

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राजा अकबर ने बीरबल से पूछा कि तुम लोग सारा दिन भगवान की भक्ति करते हो, सिमरन करते हो ,उसका नाम लेते हो।
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आखिर भगवान तुम्हें देता क्या है ?

बीरबल ने कहा कि महाराज मुझे कुछ दिन का समय दीजिए ।

बीरबल एक बूढी भिखारन के पास जाकर कहा कि मैं तुम्हें पैसे भी दूँगा और रोज खाना भी खिलाऊंगा, पर तुम्हें मेरा एक काम करना होगा ।

बुढ़िया ने कहा ठीक है – जनाब बीरबल ने कहा कि आज के बाद

-अगर कोई तुमसे पूछे कि क्या चाहिए तो कहना अकबर, -अगर कोई पूछे किसने दिया तो कहना अकबर शहंशाह ने ।

वह भिखारिन अकबर को बिल्कुल नहीं जानती थी, पर वह रोज-रोज हर बात में अकबर का नाम लेने लगी ।

कोई पूछता -क्या चाहिए तो वह कहती अकबर, -कोई पूछता किसने दिया, तो कहती अकबर मेरे मालिक ने दिया है ।

धीरे धीरे यह सारी बातें अकबर के कानों तक भी पहुँच गई ।

वह खुद भी उस भिखारन के पास गया और पूछा यह सब तुझे किसने दिया है ?

तो उसने जवाब दिया, मेरे शहंशाह अकबर ने मुझे सब कुछ दिया है ।

फिर पूछा और क्या चाहिए ?

तो बड़े अदब से भिखारन ने कहाअकबर का दीदार, मैं उसकी हर रहमत का शुक्राना अदा करना चाहती हूँ, बस और मुझे कुछ नहीं चाहिए ।

अकबर उसका प्रेम और श्रद्धा देख कर निहाल हो गया और उसे अपने महल में ले आया ।

भिखारन तो हक्की बक्की रह गई और अकबर के पैरों में लेट गई, धन्य है मेरा शहंशाह 👏🆚

अकबर ने उसे बहुत सारा सोना दिया, रहने को घर, सेवा करने वाले नौकर भी दे कर उसे विदा किया ।
तब बीरबल ने कहा महाराज यह आपके उस सवाल का जवाब है ।

जब इस भिखारिन ने सिर्फ केवल कुछ दिन सारा दिन आपका ही नाम लिया तो आपने उसे निहाल कर दिया – इसी तरह जब हम सारा दिन सिर्फ मालिक को ही याद करेंगे तो वह हमें अपनी दया मेहर से निहाल और मालामाल कर देगा जी।

जीवन में निरंतर प्रभु स्‍मरण की आदत बनानी चाहिए । यह सबसे आवश्‍यक और जरूरी साधन है । जीवन भर प्रभु का स्‍मरण हर पल, हर लम्‍हें रहना चाहिए । इससे हमारा अन्‍त सुधर जायेगा, हमारी गति सुधर जायेगी ।
परमात्मा ना गिनकर देता है

ना तौलकर देता है

परमात्मा जिसे भी देता है

दिल खोलकर देता है

टेक ले माथा परमात्मा के चरणों में

नसीब का बंद ताला भी खुल जायेगा

जो नहीं भी मांगा होगा

“ईश्वर”के दर से*

बिन मांगे मिल जायेगा.

🙏

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एक सच्ची घटना है कुछ वर्ष पहले शायद आपने भी न्यूज में पढ़ी हो तो….

एक नामी घराने में इनकम टैक्स का छापा पड़ा था
(पेपर में नाम नही बताया गया था)
इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने उनके पूरे घर की तलाशी शुरु की…
फिर अंत मे एक कमरा बचा था तलाशी का वो कमरा उनकी माताजी का था !

उनके कमरे की तलाशी शुरू हुई , वहां एक संदूक था.. माता जी ने उसकी तलाशी नही दी और माताजी हठ करके बैठ गई इसकी तलाशी नही लेने दूंगी। उनको इनकम टैक्स ऑफिसर्स ने खूब समझाया तो वो मान गई, लेकिन उनकी शर्त थी ये संदूक आपका बड़ा अधिकारी ही खोले और वो भी सिर्फ अकेले में।

अधिकारी आये , वो अकेले ही संदूक के पास गए और उन्होंने संदूक खोला तो आश्चर्य चकित रह गए….उसमे 2 रोटियां रखी थी….!

अफसर ने अकेले में माताजी से पूछा तो उन्होंने बताया मुझे 2 रोटी सुबह और 2 रोटी शाम को दी जाती है…फिर दिन में भूख लग जाए इसलिए बचा कर रखती हूं …!

उसके बाद अफसर की मनोदशा बदल गई…उन्होंने अपने पैसों से राजस्थान में एक अनाथ आश्रम खोला …और आज भी बुजुर्गों की सेवा करते है❗


Via- तीखे व्यंग्य

humanity

Posted in रामायण - Ramayan

प्राचीन रोम के राजा भगवान राम को भी पूजते थे, ओर खुद को भगवान राम का वंसज ही मानते थे ।। मिस्र के एक राजा का नाम जिसका नाम राम द्वित्य है, यह उनकी प्रतिमा है । इजराइल के साथ लगातार युद्ध करने वाला palestine उसकी एक राजधानी का नाम भी ” राम-लला ” है । उसी क्षेत्र में एक देश है जॉर्डन, वह वास्तव में जनार्दन शब्द का अपभ्रंस है, जनार्दन नाम भी भगवान राम का ही है, ब्रिटेन में समुद्र के किनारे एक टाउन है, वह ब्रिटेन के द्वार की तरह प्रतीत होता है, उसका नाम है “Ramsgate ” यानि रामद्वार, संभव है, भगवान राम उसी रास्ते मे ब्रिटेन की सीमा में प्रवेश किये हो ।। इंडोनेशिया आदि में तो राम लीला आज भी होती है, जर्मनी का एक प्राचीन उपन्यास है, जिसका नाम है ” रिचर्ड द लोइन मेन ” उसकी कहानी ठीक रामायण से मेल खाती है । इटली में एक शहर है, जिसका नाम है रावण, ठीक उसके विपरित राम नाम से भी नगर है । अमेरिका में हालही में हनुमानजी की विशालकाय मूर्ति मिली है ।

बंगाली, अंग्रेज ओर बहुत से गैर हिंदी भाषी लोग ” आ ” स्वर को “ओ” उच्चारण के साथ पढ़ते है, अगर राम के ” आ ” स्वर का उच्चारण ” ओ ” हो जाये, तो यह बनता है ” रोम ” । ओर रामन साम्राज्य बनता है, #रोमन साम्राज्य ।। अफ्रीका में एक प्राचीन राजवंश है, जिसका नाम है Kushite kingdom( कुश राजवंश ) ओर वहां की प्रजा आज भी खुद को कुशाइत यानी कुश की प्रजा ही कहती है । कुश भगवान राम के ज्येष्ठ पुत्र का नाम है । इजिप्ट नाम भी #अजपति का अपभ्रंस है ।।

भगवान राम और रामायण के प्रमाण विश्व के प्रत्येक कौने में है ।

Statue of “Ram”ses II at Museum Memphis, Egypt…

शैलेश नाथवानी

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🙏🏻 मेरे यहां ग्राहक तो बहुत आते हैं किन्तु इंसान कभी-कभार ही आता है।🙏🏻बनारस में एक चर्चित दूकान पर लस्सी का ऑर्डर देकर सब दोस्त-यार आराम से बैठकर एक दूसरे की खिंचाई और हंसी-मजाक में लगे ही थे कि एक लगभग 70-75 साल की बुजुर्ग स्त्री पैसे मांगते हुए मेरे सामने हाथ फैलाकर खड़ी हो गई।

उनकी कमर झुकी हुई थी, चेहरे की झुर्रियों में भूख तैर रही थी। नेत्र भीतर को धंसे हुए किन्तु सजल थे। उनको देखकर एक मित्र के मन मे न जाने क्या आया कि उसने जेब मे सिक्के निकालने के लिए डाला हुआ हाथ वापस खींचते हुए उनसे पूछ लिया,

“दादी लस्सी पियोगी ?”

उसकी
इस बात पर दादी कम अचंभित हुईं और उनके मित्र अधिक। क्योंकि अगर वो उनको पैसे देता तो बस 5 या 10 रुपए ही देता लेकिन लस्सी तो 40 रुपए की एक है। इसलिए लस्सी पिलाने से उसके गरीब हो जाने की और उस बूढ़ी दादी के द्वारा * उसे ठग कर अमीर हो जाने की संभावना बहुत अधिक बढ़ गई थी।*

दादी ने सकुचाते हुए हामी भरी और अपने पास जो मांग कर जमा किए हुए 6-7 रुपए थे वो अपने कांपते हाथों से मित्र की ओर बढ़ाए। उसे कुछ समझ नही आया तो उनसे पूछा,

“ये किस लिए?”

“इनको मिलाकर मेरी लस्सी के पैसे चुका देना बाबूजी !”

भावुक तो वो उनको देखकर ही हो गया था… रही सही कसर उनकी इस बात ने पूरी कर दी।

एकाएक मित्र की आंखें छलछला आईं और भरभराए हुए गले से उसने दुकान वाले से एक लस्सी बनाने को कहा… उन्होने अपने पैसे वापस मुट्ठी मे बंद कर लिए और पास ही जमीन पर बैठ गई।

अब मित्र को अपनी लाचारी का अनुभव हुआ क्योंकि वो वहां पर मौजूद दुकानदार, अपने दोस्तों और कई अन्य ग्राहकों की वजह से उनको कुर्सी पर बैठने के लिए नहीं कह सका।

डर था कि कहीं कोई टोक ना दे…..कहीं किसी को एक भीख मांगने वाली बूढ़ी महिला के उनके बराबर में बिठाए जाने पर आपत्ति न हो जाये… लेकिन वो कुर्सी जिसपर वो बैठा था उसे काट रही थी…..

लस्सी कुल्लड़ों मे भरकर सभी मित्रों और बूढ़ी दादी के हाथों मे आते ही वो मित्र अपना कुल्लड़ पकड़कर दादी के पास ही जमीन पर बैठ गया क्योंकि ऐसा करने के लिए तो वो स्वतंत्र था…इससे किसी को आपत्ति नही हो सकती थी… हां! दोस्तों ने अपने मित्र को एक पल के लिए घूरा… लेकिन वो कुछ कहते उससे पहले ही दुकान के मालिक ने आगे बढ़कर दादी को उठाकर कुर्सी पर बैठा दिया और उस मित्र की ओर मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर कहा,

“ऊपर बैठ जाइए साहब! *मेरे यहां ग्राहक तो बहुत आते हैं किन्तु इंसान कभी-कभार ही आता है।
*हमारी संवेदनाएं को कभी मरने ना दें ,संवेदनाएं मौजूद है तो ही मानव जीवन सफल है।
🙏🙏🙏

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, PM Narendra Modi

1990 की घटना..
आसाम से दो सहेलियाँ रेलवे में भर्ती हेतु गुजरात रवाना हुई।
रास्ते में एक स्टेशन पर गाडी बदलकर आगे का सफ़र उन्हें तय करना था, लेकिन पहली गाड़ी में कुछ लड़को ने उनसे छेड़-छाड़ की इस वजह से अगली गाड़ी में तो कम से कम सफ़र सुखद हो, यह आशा मन में रखकर भगवान से प्रार्थना करते हुए दोनों सहेलियाँ स्टेशन पर उतर गयी। और भागते हुए रिजरवेशन चार्ट तक वे पहुची और चार्ट देखने लगी.चार्ट देख दोनों परेशान और भयभीत हो गयी, क्यों की उनका रिजर्वेशन कन्फर्म नहीं हो पाया था।
मायूस और न चाहते उन्होंने नज़दीक खड़े TC से गाड़ी में जगह देने के लिए विनती की TC ने भी गाड़ी आने पर कोशिश करने का आश्वासन दिया….एक दूसरे को शाश्वती देते दोनों गाड़ी का इंतज़ार करने लगी।
आख़िरकार गाड़ी आ ही गयी और दोनों जैसे तैसे गाड़ी में एक जगह बैठ गए…अब सामने देखा तो क्या! सामने दो पुरूष बैठे थे। पिछले सफ़र में हुई बदसलूकी कैसे भूल जाती लेकिन अब वहा बैठने के अलावा कोई चारा भी नहीं था क्यों की उस डिब्बे में कोई और जगह ख़ाली भी नहीं थी। गाडी निकल चुकी थी और दोनों की निगाहें TC को ढूंढ रही थी, शायद कोई दूसरी जगह मिल जाये……कुछ समय बाद गर्दी को काटते हुए TC वहा पहुँच गया और कहने लगा, कही जगह नहीं और इस सीट का भी रिजर्वेशन अगले स्टेशन से हो चूका है, कृपया आप अगले स्टेशन पर दूसरी जगह देख लीजिये। यह सुनते ही दोनों के पैरो तले जैसे जमीन ही खिसक गयी। क्योंकी रात का सफ़र जो था.गाड़ी तेज़ी से आगे बढ़ने लगी। जैसे जैसे अगला स्टेशन पास आने लगा दोनों परेशान होने लगी लेकिन सामने बैठे पुरूष उनके परेशानी के साथ भय की अवस्था बड़े बारीकी से देख रहे थे। जैसे अगला स्टेशन आया, दोनो पुरूष उठ खड़े हो गए, और चल दिये….अब दोनों लड़कियो ने उनकी जगह पकड़ ली, और गाड़ी निकल पड़ी। कुछ देर बाद वो नौजवान वापस आये और कुछ कहे बिना नीचे सो गए।
दोनों सहेलियाँ यह देख अचम्भित हो गयी और डर भी रही थी, जिस प्रकार सुबह के सफ़र में हुआ था उसे याद कर डरते सहमते हुए सो गयी….सुबह चाय वाले की आवाज़ सुन नींद खुली दोनों ने उन पुरूषों को धन्यवाद कहा तो उनमे से एक पुरूष ने कहा ” बहनजी गुजरात में कोई मदद चाहिए हो तो जरुर बताना” …अब दोनों सहेलियों का उनके बारे में मत बदल चुका था। खुद को बिना रोके एक लड़की ने अपनी बुक निकाली और उनसे अपना नाम और संपर्क लिखने को कहा…दोनों ने अपना नाम और पता बुक में लिखा और “हमारा स्टेशन आ गया है” ऐसा कह वे दोनों ट्रेन से उतर गए!
दोनों सहेलियों ने उस बुक में लिखे नाम पढ़े वो नाम थे। नरेंद्र मोदी और शंकर सिंह वाघेला……
यह लेखिका फ़िलहाल General Manager of the centre for railway information system Indian railway New Delhi में कार्यरत है और यह लेख “The Hindu” इस अंग्रेजी पेपर में पेज नं 1 पर “A train journey and two names to remember” इस नाम से दिनांक 1 जून 2014 को प्रकाशित हुआ..
तो क्या आप, अब भी सोचते है की हमने गलत प्रधानमन्त्री चुना है?


*प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जैसे राष्ट्रतपस्वी का विश्वास रखें, भारत देश सुरक्षित हाथों में है।* *भारत माता की - जय।*

*👏👍🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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ચાલો ટાઈમ અપ! હવે નીચે એક પછી એક જવાબ રજૂ કરું છું.
શાંતિથી વાંચી જજો. એન્ટરટેઇનમેન્ટની પૂરી ગેરંટી સાથે…..

આ રહ્યા જવાબો.

સવાલ : (1) આપણે સૌ જાણીએ છીએ કે કલાસમાં નબળા વિદ્યાર્થીને સામાન્ય રીતે સાવ ‘ઢ’ છે એમ ઉપમા અપાતી હોય છે. હવે આપણો સવાલ : ‘ ઢ ‘ જ શા માટે? ‘ક’, ‘ખ’ ‘ગ’ કે કોઈ અન્ય મૂળાક્ષર શા માટે નહીં?

આ રહ્યો જવાબ : ગુજરાતી ભાષાનું સ્વતંત્ર અસ્તિત્વ નથી. એ સંસ્કૃતમાંથી ઉતરી આવેલી છે એ આપ સૌ જાણો છો. સંસ્કૃતમાંથી પ્રાકૃત, અપભ્રંશ, પ્રાચીન ગુજરાતી અને છેલ્લે અર્વાચીન ગુજરાતી. તમને એ જાણીને નવાઈ લાગશે કે આજ સુધીના ગુજરાતી ભાષાના તમામ સંસ્કરણોમાં માત્ર ઢ વર્ણ એવો ને એવો જ રહ્યો છે. તેનો આકાર ક્યારેય બદલાયો નથી. અનેક ભાષાકિય પરિવર્તન બાદ પણ ઢ મૂળાક્ષર ‘ઢ’ જ રહ્યો, બાકીના બધા થોડા ઘણાં બદલાયા.
😄😃😃😃
એટલે જ કોઈ શિક્ષકે ક્યારેક કોઈ એવો વિદ્યાર્થી કે જે સતત જ્ઞાન આપવા છતાં બદલાતો જ નથી, એવો ને એવો મૂઢ જ રહે છે એના માટે ‘ઢ’ ઉપમા વાપરી હશે! કેવા જ્ઞાની હશે એ શિક્ષકો જે આવી ચતુરાઈભરી ઉપમા શોધી લાવ્યા હશે!
😄😄😄😜😜😜😜

સવાલ (2) બે વાક્ય આમ છે : ‘ એ લોકો આવ્યા ‘ અને બીજું વાક્ય ‘એ લોકો આવ્યાં ‘ આ બન્નેમાંથી એક વાક્યમાં ‘ આવ્યા ‘ પર અનુસ્વાર છે અને એકમાં નથી. હવે આપણો સવાલ : બંને વાક્યોનો અલગ અર્થ થાય છે. શું તફાવત છે જણાવો.

આ રહ્યો જવાબ : બંને વાક્યોમાં માત્ર અનુસ્વારનો ફરક છે. જે અનુસ્વારવાળું વાક્ય છે તે સ્ત્રી અને પુરુષ બંનેનો અથવા માત્ર સ્ત્રીઓનો સમુદાય સૂચવે છે. અર્થાત આવનારાઓમાં સ્ત્રીઓ પણ સામેલ હતી એવું સૂચવાયું છે. અનુસ્વાર વગરનું વાક્ય માત્ર પુરુષ સમુદાય સૂચવે છે. અર્થાત આવનારા માત્ર પુરુષો જ હતા! બોલો, છે ને મજેદાર વાત! કેટલું ઝીણું કાત્યું છે આપણી માતૃભાષાએ!

😄😄😂😂😂

સવાલ નંબર (3):
કોઈને નોતરું આપવા માટે આપણે સારી ભાષામાં ‘આમંત્રણ’ કે ‘નિમંત્રણ’ શબ્દ વાપરતા હોઈએ છીએ. હવે આપણો સવાલ : આમંત્રણ અને નિમંત્રણ માં શું ફરક?

લો, આ રહ્યો જવાબ : આમંત્રણ હંમેશા મોટા સમૂહ માટે હોય, નિમંત્રણ હંમેશા વ્યક્તિગત અથવા નાનકડા સમૂહ માટે હોય! અને એટલે જ ‘જાહેર આમંત્રણ’ લખાય, જાહેર નિમંત્રણ એમ ન લખાય. મળ્યું ને નવું જાણવા?

😉😉😉😂😂😄😄

સવાલ નંબર (4):
કેટલાંક શબ્દો જુઓ : ‘માહિતી’ , ‘મોજણી’ , ‘વાટાઘાટ’ , ‘ચળવળ’ , ‘પેઢી’ , ‘નિદાન’ અને ‘ચંબુ’. હવે આપણો સવાલ : આ બધા શબ્દોમાં એક સામ્યતા છે તે શોધી કાઢો.

લો ભાઈ, આ રહી સામ્યતા : આ તમામ શબ્દો મરાઠી ભાષાના છે અને ગુજરાતી બની ગયા છે!

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લાગી ને નવાઈ? હજી બીજા ઘણા મરાઠી શબ્દો ગુજરાતી બની ગયા છે. આ ઉપરાંત રુડી ગુજરાતી રાણીએ પોર્ટુગીઝ, તુર્કી, અરબી, ઉર્દૂ, સ્પેનિશ અને બીજી ઘણી ભાષાના શબ્દોને આવકારો આપ્યો છે. એની પણ યાદી ક્યારેક જાહેર કરીશું.

😄😃😃😃😃😃

સવાલ નંબર (5):
કવિ દીપક બરડોલીકર અને મિલ્લત અખબાર વચ્ચે શું સામ્યતા છે?

બસ આવો સહેલો સવાલ અને કોઈ જવાબ નહિ? મૂંઝાઓ છો શા માટે, આ રહ્યો જવાબ : કવિ શ્રી દીપક બારડોલીકર ગુજરાતી ભાષાના પ્રખર કવિ છે અને પાકિસ્તાની છે!
😄😄😄

મિલ્લત અખબાર પણ ગુજરાતી ભાષાનું દૈનિક છે અને આજે પણ પાકિસ્તાનના કરાંચી શહેરમાંથી બહાર પડે છે.
👏👏👏👏👏👏
પાકિસ્તાનનો મોટો સમુદાય ગુજરાતી ભાષા બોલે છે. જાણ્યું હતું આવું ક્યારેય?

નિલેશ દવે