Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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♥️ Story-2 ♥️

महामारी एक बार एक राजा के राज्य में महामारी फैल गयी। चारो ओर लोग मरने लगे। राजा ने इसे रोकने के लिये बहुत सारे उपाय करवाये मगर कुछ असर न हुआ और लोग मरते रहे। दुःखी राजा ईश्वर से प्रार्थना करने लगा। तभी अचानक आकाशवाणी हुई, आसमान से आवाज़ आई कि हे राजा! तुम्हारी राजधानी के बीचों-बीच जो पुराना सूखा कुंआ है अगर अमावस्या की रात को राज्य के प्रत्येक घर से एक – एक बाल्टी दूध उस कुएं में डाली जाये तो अगली ही सुबह ये महामारी समाप्त हो जायेगी और लोगों का मरना बन्द हो जायेगा।

राजा ने तुरन्त ही पूरे राज्य में यह घोषणा करवा दी कि महामारी से बचने के लिए अमावस्या की रात को हर घर से कुएं में एक-एक बाल्टी दूध डाला जाना अनिवार्य है।
अमावस्या की रात जब लोगों को कुएं में दूध डालना था उसी रात राज्य में रहने वाली एक कंजूस बुढ़िया ने सोंचा कि सारे लोग तो कुंए में दूध डालेंगे अगर मै अकेली एक बाल्टी “पानी” डाल दूं तो किसी को क्या पता चलेगा। इसी विचार से उस कंजूस बुढ़िया ने रात में चुपचाप एक बाल्टी पानी कुंए में डाल दिया। अगले दिन जब सुबह हुई तो लोग वैसे ही मर रहे थे।
कुछ भी नहीं बदला था क्योंकि महामारी समाप्त नहीं हुई थी।
राजा ने जब कुंए के पास जाकर इसका कारण जानना चाहा तो उसने देखा कि सारा कुंआ पानी से भरा हुआ है।
दूध की एक बूंद भी वहां नहीं थी।
राजा समझ गया कि इसी कारण से महामारी दूर नहीं हुई और लोग अभी भी मर रहे हैं।
दरअसल ऐसा इसलिये हुआ कि जो विचार उस बुढ़िया के मन में आया था वही विचार पूरे राज्य के लोगों के मन में आ गया और किसी ने भी कुंए में दूध नहीं डाला।

मित्रों , जैसा इस कहानी में हुआ वैसा ही हमारे जीवन में भी होता है।
जब भी कोई ऐसा काम आता है जिसे बहुत सारे लोगों को मिल कर करना होता है तो अक्सर हम अपनी जिम्मेदारियों से यह सोच कर पीछे हट जाते हैं कि कोई न कोई तो कर ही देगा और हमारी इसी सोच की वजह से स्थितियां वैसी की वैसी बनी रहती हैं।
अगर हम दूसरों की परवाह किये बिना अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने लग जायें तो पूरे देश में भी ऐसा बदलाव ला सकते हैं जिसकी आज ज़रूरत है। _____♥️_____

Heartfulness Meditation 💌

HFN Story Team Jodhpur

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રાજસ્થાનમાં રાસવીર નામનું એક નાનું ગામ છે. આ ગામમાં રહેતા અને ઊંટ ગાડીમાં પાણીના ફેરા કરીને પરિવારનું ગુજરાન ચલાવતા રામધનભાઈનો નાનો દીકરો પ્રેમસુખ 6 વર્ષનો થયો એટલે ગામની સરકારી શાળામાં ભણવા માટે બેસાડ્યો. પરિવારની પરિસ્થિતિ બહુ નબળી એટલે પ્રેમસુખને ભણવા ઉપરાંત આટલી નાની ઉંમરે બીજા કામ પણ કરવાના.

શાળાએથી આવીને પ્રેમસુખ ઢોર ચરાવવા માટે જાય. બીજા છોકરાઓ પણ ઢોર ચરાવવા જતા હશે પણ બીજા છોકરા કરતા પ્રેમસુખ જરા જુદો હતો. ઢોર ચરાવવા જાય પણ સાથે ચોપડી લઇ જાય. ઢોર ચરતા હોય અને પ્રેમસુખ સાથે લઈ ગયેલી ચોપડી વાંચતો હોય. ગામડાનો વિદ્યાર્થી થોડું ભણીને અભ્યાસ છોડી દે અને કામે વળગી જાય પણ પ્રેમસુખે કામ કરતા કરતા 10માં ધોરણ સુધીનો અભ્યાસ પૂરો કર્યો.

આગળ ભણાવાની ઈચ્છા હતી પણ આગળના અભ્યાસ માટે હવે જિલ્લા મથકે બિકાનેર જવું પડે અને પરિવારની પરિસ્થિતિ જોતા એ શક્ય નહોતું. દીકરાની ભણવાની ઈચ્છા જાણીને માતા-પિતાએ નક્કી કર્યું કે આપણે વધુ કામ કરશું પણ દીકરાને ભણાવવો છે. પ્રેમસુખ આગળના અભ્યાસ માટે બિકાનેર આવ્યો. શહેરી જીવનનો ઝાકઝમાળ અને ઠાઠમાઠ વાળું હોય પણ પ્રેમસુખને પરિવારની સ્થિતિ ખબર હતી.

બિકાનેરના અભ્યાસ દરમ્યાન ખર્ચમાં બચત થાય એટલે પ્રેમસુખ પોતાની જાતે જ રસોઈ બનાવીને જમી લેતો. જ્યાં રહેતો ત્યાંથી શાળા અને પછી કોલેજ બંને ઘણું દૂર થતું. બાઇક તો એકબાજુ રહ્યું પણ શાળાએ જવા સાયકલ પણ નહોતી એટલે પ્રેમસુખ ચાલીને શાળા-કોલેજ જતો.

ગામડાના સામાન્ય પરિવારના આ છોકરાએ એક અસામાન્ય કારકિર્દીનું સપનું જોયું. ભારત દેશની સૌથી કઠિન ગણાતી યુપીએસસીની પરીક્ષા આપીને ઉચ્ચ અધિકારી અધિકારી બનવાનું સપનું. જેણે જેણે પ્રેમસુખની આ વાત સાંભળી હશે એ કદાચ એના પર હસ્યા હશે પરંતુ આ છોકરાએ બીજા પોતાના વિશે શુ વિચારે છે એને બાજુએ રાખીને પોતાએ શુ કરવાનું છે એના પર ધ્યાન કેન્દ્રિત કર્યું.

ગામડામાં ઢોર ચારવા જતા પ્રેમસુખે પ્રચંડ પુરુષાર્થના બળે ભારતની સૌથી અઘરી ગણાતી યુપીએસસીની પરીક્ષા પાસ કરી એટલું જ નહીં પણ લાખો વિદ્યાર્થીઓમાંથી 170મો રેન્ક હાંસલ કરીને આઈ.પી.એસ. કેડર મેળવી. પ્રેમસુખ ડેલુ સાહેબને આપણા ગુજરાતમાં જ પોસ્ટિંગ મળ્યું.

જગતમાં કશું જ અશક્ય નથી. ફરિયાદો કરવાને બદલે હિંમત હાર્યા વગર અવિરત મહેનત કરતા રહેશો તો નસીબ અવશ્ય સાથ આપશે અને સફળતાનાં શિખર સુધી લઈ જશે.

શૈલેષ સાગપરિયા

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ભાભા ઢોર ચારતા નથી,
ચપટી બોર લાવતા નથી.

છોકરાઓને સમજાવતા નથી,
છોકરાઓ હવે રીસાતાં નથી.

આડાઅવળા સંતાતા નથી,
ને ક્યાંય છોલાઈને આવતા નથી.

માડી વાર્તા કહેતા નથી,
ને વાર્તા કોઈ સાંભળતા નથી.

કોઈ કોઈની સામું જોતા નથી,
ને કોઈ કોઈને ઓળખતા નથી.

એકબીજાને કનડતા નથી,
કે લાડ પણ કોઈ કરતા નથી.

નિરાંતે ખાતા પીતા નથી,
બસ મોબાઈલ હેઠો મૂકતા નથી.

M D Parmar

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एक बार जरूर पढ़े🙏🏻
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शादी की सुहागसेज पर बैठी एक स्त्री का पति जब भोजनका थाल लेकर अंदर आया तो पूरा कमरा उस स्वादिष्ट भोजन की खुशबू से भर गया रोमांचित उस स्त्री ने अपने पति से निवेदन किया कि मांजी को भी यहीं बुला लेते तो हम तीनों साथ बैठकर भोजन करते। पति ने कहा छोड़ो उन्हें वो खाकर सो गई होंगी आओ हम साथ में भोजन करते है प्यार से, उस स्त्री ने पुनः अपने पति से कहा कि नहीं मैंने उन्हें खाते हुए नहीं देखा है, तो पति ने जवाब दिया कि क्यों तुम जिद कर रही हो शादी के कार्यों से थक गयी होंगी इसलिए सो गई होंगी, नींद टूटेगी तो खुद भोजन कर लेंगी। तुम आओ हम प्यार से खाना खाते हैं। उस स्त्री ने तुरंत Divorce लेने का फैसला कर लिया
और Divorce
लेकर उसने दूसरी शादी कर ली और इधर उसके पहले पति ने भी दूसरी शादी कर ली। दोनों अलग- अलग सुखी घर गृहस्ती बसा कर खुशी खुशी
रहने लगे।
इधर उस स्त्री के दो बच्चे हुए जो बहुत ही सुशील और आज्ञाकारी थे। जब वह स्त्री ६० वर्ष की हुई तो वह बेटों को बोली में चारो धाम की यात्रा करना चाहती हूँ ताकि तुम्हारे सुखमय जीवन के लिए प्रार्थना कर सकूँ। बेटे तुरंत अपनी माँ को लेकर चारों धाम की यात्रा पर निकल गये। एक जगह तीनों माँ बेटे भोजन के लिए रुके और बेटे भोजन परोस कर मां से खाने
की विनती करने लगे। उसी समय उस स्त्री की नजर सामने एक फटेहाल, भूखे और गंदे से एक वृद्ध पुरुष पर पड़ी जो इस स्त्री के भोजन और बेटों की तरफ बहुत ही कातर नजर से देख रहा था। उस स्त्री को उस पर दया आ गईं और बेटों को बोली जाओ पहले उस वृद्ध को नहलाओ और उसे वस्त्र दो फिर हम सब मिलकर भोजन करेंगे। बेटे जब उस वृद्ध को नहलाकर कपड़े पहनाकर उसे उस स्त्री के सामने लाये तो वह स्त्री
आश्चर्यचकित रह गयी वह वृद्ध वही था जिससे उसने शादी की सुहागरात को ही divorce ले लिया था। उसने उससे पूछा कि क्या हो गया जो तुम्हारी हालत इतनी दयनीय हो गई तो उस वृद्ध ने नजर झुका के कहा कि
सब कुछ होते ही मेरे बच्चे मुझे भोजन नहीं देते थे, मेरा तिरस्कार करते थे, मुझे घर से बाहर निकाल दिया। उस स्त्री ने उस वृद्ध से कहा कि इस बात का अंदाजा तो मुझे
तुम्हारे साथ सुहागरात को ही लग गया था जब तुमने पहले अपनी बूढ़ी माँ को भोजन कराने के बजाय उस स्वादिष्ट भोजन की थाल लेकर मेरेकमरे में आ गए और मेरे बार-बार कहने के बावजूद भी आप ने अपनी माँ का तिरस्कार किया। उसी का फल आज आप भोग रहे हैं।

जैसा व्यहवार हम अपने
बुजुर्गों के साथ करेंगे उसी
देखा-देख कर हमारे बच्चों
में भी यह गुण आता है कि
शायद यही परंपरा होती है
सदैव माँ बाप की सेवा ही
हमारा दायित्व बनता है
जिस घर में माँ बाप हँसते है
वहीं प्रभु बसते है🙏🙏🙏🙏

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🌹🌹 एक प्लेट हलवे की कीमत🌹🌹

जगदीश प्रसादजी चुपचाप बैठे हुए बड़ी बहू गीता की बातों को सुनते जा रहे थे लग रहा था कि किसी भी समय वो अपना धीरज खो बैठेंगे, पर किसी तरह उन्होंने अपने-आप को काबू में रखा हुआ था | गीता थी कि अनवरत बोलती जा रही थी | बात बस इतनी सी थी कि पिछले 3-4 दिन से जगदीश प्रसादजी के दांतों में कष्ट हो रहा था दर्द से बेहाल थे | डॉक्टर को दिखाया तो उसने दांत को निकलवाने की सलाह दी थी पर दर्द के कारण ये संभव न था अतः डॉक्टर
ने दर्द कम करने की दवा दी थी व कहा था कि दर्द खत्म हो जाए तभी दांत निकाला जाएगा | दांत दर्द की वजह से वे कुछ खा-पी नहीं पा रहे थे, इसीलिए बहू को खिचड़ी बनाने के लिए कहा था पर उसने दो सूखी चपाती और सूखी सब्जी बेटे के हाथ भिजवा दी थी | जगदीश प्रसादजी ने थाली को हाथ भी नहीं लगाया और अब बहू गीता जोर जोर से चिल्ला चिल्ला कर बोल रही थी कि जब खाना नहीं होता तो पहले से ही बता दिया करो, कितना भी करो इनके नखरे नहीं खत्म होते | वो ये बात समझने के लिए तैयार ही नहीं थी कि दांत-दर्द की वजह से ससुरजी चपाती चबाने में असमर्थ हैं, और गुस्से में थाली उठा कर बाहर चली गयी | जगदीश प्रसादजी ने एक गहरी सांस ली और अपनी छड़ी उठा कर अपने लंगोटिया दोस्त कैलाशनाथजी के घर की ओर चल दिए | आज उनका दिल बहुत उदास था | अपनी दिवंगत पत्नी की याद उन्हें आने लगी ओर सड़क के किनारे बने एक बेंच पर वे बैठ गए | अतीत ने तीव्रता के साथ उनकी यादों में प्रवेश किया |
जगदीश प्रसादजी सरकारी कार्यालय में सेवारत थे | उनके 3 बेटे थे अनिल, सुनील और राजेश | तीनो ही पढने में अच्छे थे | उनकी पत्नी, कांता एक कम पढ़ी लिखी लेकिन मेहनती व स्वाभिमानी स्त्री थी जो कुशलता के साथ उनके घर का संचालन करती थी | मितव्यता क्या होती है यह जगदीश प्रसादजी ने पत्नी से ही सीखा था इसीलिए महीने के अंत में अपनी पूरी पगार वो पत्नी के हाथ में सौंप देते थे और खुद निश्चिन्त हो जाते थे | घर के मामलों में वे कभी भी नहीं बोलते थे पर पत्नी को जब भी उनकी सलाह की ज़रुरत होती तो वे हरदम उसके साथ होते थे | समय के साथ उनकी उन्नति होती गयी और बच्चे भी अच्छी शिक्षा प्राप्त कर चुके थे। अपने जीवनकाल में उनकी पत्नी ने एक जो सबसे अच्छा काम किया था वो था मकान बनवाना | शहर की एक अच्छी सी कालोनी में उसने अपने सपनो का संसार बसाया था | जगदीश प्रसादजी ने ऑफिस से लोन लेकर, कुछ दोस्तों से मदद लेकर पत्नी के इस सपने को पूरा किया | पहले मकान एक मंजिला था पर जब बच्चे बड़े हो गए तो जगदीश प्रसादजी ने हिम्मत कर के मकान की दो मंजिले और भी बनवा दी | उनके तीनो बेटों की शादी हो गयी थी और तीनो बेटों के दो दो बच्चे भी हो गए थे और अब जगदीश प्रसादजी अपने छोटे बेटे के साथ निचली मंजिल पर रहते थे | अनिल व सुनील दूसरी और तीसरी मंजिल पर रहते थे | रसोइयां सबकी अलग अलग थी बस त्यौहार वाले दिन सब एक जगह इकठे हो कर त्यौहार मनाते थे | मुंह से तो कोई कुछ नहीं कहता था पर राजेश की पत्नी को बहुत तकलीफ होती थी के सारा काम मुझे ही करना पड़ता है दोनों भाभियां बस हाथ हिलाने के लिए आ जाती हैं | उधर दोनों का कहना था कि भई रसोई तो तुम्हारी है तो जिम्मेदारी भी तुम्हारी है | पर ये बातें कभी भी झगडे का रूप धारण नहीं कर पाती थी क्योंकि कांताजी खुद भी एक मेहनती महिला थी जो उम्र के इस दौर में भी चुस्त दुरुस्त थी | सारा दिन कुछ न कुछ करते रहना उनकी आदत थी | इसी कारण काम को लेकर बहुएं ही उन पर निर्भर थी |
जगदीश प्रसादजी जब भी अपनी पत्नी के साथ बैठते थे तो कहते थे के अब हमें किसी प्रकार की चिंता नहीं है | पेंशन तो आयेगी ही बस आराम से गुजरा हो जायेगा |जवानी में जो सपने मैं तुम्हारे पूरे नहीं कर पाया वो अब करूंगा और पत्नी हल्के से मुस्करा मुस्करा कर अपनी सहमति प्रकट कर देती थे पर जगदीश प्रसादजी का ये सपना कभी पूरा नहीं हो पाया और एक दिन पत्नी उन्हें अचानक छोड़ कर हमेशा के लिए चली गयी| जगदीश प्रसादजी के तो जैसे दुनिया ही उजड गयी पर होनी को कौन टाल सकता था |
जिस पत्नी ने इतने यत्न से मकान की नींव बनाई थी उसमे अब दरारें पड़नी शुरू हो गयी थी हालात इतने बदल गए थे कि त्यौहार के समय एक दूसरे को बधाई देने में भी सब को कष्ट होने लगा था | सब अपनी अपनी गृहस्थी में मस्त हो गए थे, एक अकेले जगदीश प्रसादजी ही रह गए थे जो सब कुछ समझ रहे थे पर उम्र के इस दौर में अपने आप को असहाय सा महसूस करने लगे थे | दो दिन पहले ही वो जब अचानक घर में घुसे तो उन्हें बेटों व बहुओं की आवाज़ सुनाई दी कोतुहल वश वे चुपचाप खड़े हो गए और उनके दुःख का ठिकाना न रहा जब उन्होंने सुना कि तीनो बेटों ने उन्हें दो-दो महीने के लिए बाँट लिया है | छोटी बहू को शिकायत थी कि जब मकान में सब का बराबर का हिस्सा है तो पिताजी की सेवा में भी सबका बराबर का हिस्सा होना चाहिए मैं भी थोडा आज़ाद रहना चाहती हूँ जो पिताजी के कारण संभव नहीं हो पा रहा | तकलीफ तो सब को हो गयी थी पर कोई चारा ना था और अब जगदीश प्रसादजी तीन हिस्सों में बंट गए थे।
ज़िन्दगी यूँही चलती जा रही थी, दो महीने कभी एक बेटे के पास फिर दूसरे और फिर तीसरे के पास | मुसीबत तो तब आती थी जब कभी महीने के अंत में यदि उनकी तबियत ख़राब हो जाती तो इलाज यह सोचकर नहीं कराया जाता था कि अब दो-चार दिन के बाद दूसरे बेटे के पास तो जाना ही है वो ही इलाज करा देगा।

आज जगदीश प्रसादजी के सब्र का बाँध टूट गया था. दो दिन पहले ही उन्होंने दांत निकलवाया था उनका दिल कुछ मीठा कुछ गर्म कुछ नरम खाने का हो रहा था उन्होंने अपनी मंझली बहू को हलवा बनाने के लिए कहा और अलका का जवाब था कि मैं अभी खाली नहीं हूँ आप को और कुछ तो सूझता नहीं है इस उम्र में भी खाने की पड़ी है दो दिन के बाद मोना (छोटी बहू) के पास जायेंगे तो वहीँ खा लेना, मैं किटी पार्टी के लिए लेट हो रही हूँ और जगदीश प्रसादजी के सब्र का पैमाना छलक गया. आज तक वो अपने बेटे बहुओं की सब ज्याद्तियाँ बर्दाशत कर रहे थे पर आज तो हद हो गयी. आँखे आसूँओ से भर गयी और वे कैलाशजी के घर चल दिए।

कैलाशजी उनके बचपन के मित्र थे. शिक्षाप्राप्ति से लेकर सेवानिवृति तक दोनों साथ ही रहे. कैलाशनाथ जी थोड़े व्यवहारिक बुद्धिवाले व्यक्ति थे वे दिल से नहीं दिमाग से सोचते थे. उन्होंने अपने दोस्त को कई बार समझाया था कि थोडा रौब रखा करो, किस बात की तुम्हे कमी है, मकान अभी तुम्हारे नाम है. बेटे बहू जब भी सिर पर बैठने कि कोशिश करें तो धमकी दे दिया करो कि किसी को भी हिस्सा नहीं दूंगा पर जगदीश प्रसादजी को ये बात नामंजूर थी उनका कहना था कि जब मकान बनवाया ही बच्चों के लिए है तो ऐसा सोचना किसलिये? लेकिन आज उन्हें लग रहा था कि अब कुछ करने का समय आ ही गया है

कैलाश नाथजी से सलाह मशवरा कर के जगदीश प्रसादजी घर आकर पत्नी की तस्वीर के सामने आकर खड़े हो गए जैसे मन ही मन उनसे विचार विमर्श कर रहे हों. एक दृढ निश्चय उनके चेहरे पर आया और वो भूखे पेट ही सो गए. किसी ने भी खाने के लिए नहीं पुछा. उन्हें पता था कि उनके तीनो बेटे पत्निओं के साथ गर्मी की छुटियो में बाहर जा रहे हैं किसी को भी यह ख्याल नहीं था कि पिताजी क्या खायेंगे, कैसे रहेंगे. जगदीश प्रसादजी ने भी कुछ नहीं कहा उन्हें अपनी योजना को अंतिम रूप देने का अवसर मिल रहा था । वैसे भी उनका मानना था के जब बेटे ही माँ-बाप को नहीं पूछते तो बहुओं से क्या उम्मीद रखना. बहुएँ तो चाहती ही हैं के किसी की सेवा न करनी पड़े. वे तो पति और बच्चो में ही अपना परिवार देखती है. सास-ससुर उन्हें बोझ लगने लगते हैं. वे अपने अधिकारों के प्रति तो सचेत रहती हैं पर अपने कर्तव्यों की तरफ से आँख मूँद लेती हैं।
जगदीश प्रसादजी अपने मित्र के साथ प्रोपर्टी डीलर के पास गए. प्रोपर्टी डीलर कैलाश नाथजी के पुत्र का ख़ास दोस्त था उनसे मिलकर अपनी व्यथा बताई कुछ सलाह मशवरा किया व वापस आ गए।

20 दिन के बाद जब बेटे बहुएँ प्रसन्नचित घर लौटे तो मकान पर ताला देख कर सबकी त्योरियां चढ़ गयी। छोटी बहु मोना बोलने लगी हद हो गयी लापरवाही की पता था कि हम आज आ रहे हैं घर नहीं बैठ सकते उसके गुस्से के कारण भी था कि अब दो महीने पिताजी को उसके पास रहना था. काफी देर इंतज़ार करने के बाद अनिल व सुनील कैलाश नाथजी के घर की और चल दिए और उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गयी जब उन्हें पता चला कि पिताजी ने मकान 90 लाख में बेच दिया है और अब वे कहाँ हैं किसी को कुछ पता नहीं. तीनो परिवारों को समझ नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो गया है उन्हें लग रहा था कि यह एक भद्दा मजाक है तो पिताजी ने उनके साथ किया है। गुस्से में तीनो भाई उबल रहे थे पिताजी ऐसा कैसे कर सकते हैं, मकान की कीमत लगभग 1 करोड़ की थी तो पिताजी ने 10 लाख का घटा क्यों उठाया ये उन सबकी समझ से बाहर था। कोई चारा न देख कर सब अपने अपने ससुराल चले गए। अगले दिन बड़े बेटे के पास कैलाश नाथजी का फ़ोन आया और उन्होंने तीनो पुत्रों को अपने पास आने के लिए कहा कि कुछ आवश्यक सूचना देनी है। शाम तक का भी इंतज़ार सबको भारी पड़ रहा था।

कैलाश नाथजी के पास से जो सूचना उन्हें मिली उससे तीनो की जुबान पर ताला लग गया था, दिमाग जैसे कुंद हो गया, सोचने-समझने की शक्ति ने जैसे साथ ही छोड़ दिया. कैलाश नाथजी के अनुसार जगदीश प्रसादजी हरिद्वार चले गए हैं और उन्होंने वहां पर एक घर ले लिया है और अब वहीँ रहेंगे. ये समाचार पूरे परिवार पर एक भारी प्रहार था. बहुत अनुनय-विनय करने पर कैलाश नाथजी से वे पिताजी का पता प्राप्त कर सके और हरिद्वार की ओर उड़ चले।पिताजी का यह कदम उनकी समझ से बाहर था।
हरिद्वार पहुँच कर पिताजी को देखकर एक और झटका लगा।पिताजी तो प्रसन्चित और स्वस्थ लग रहे थे। बेटे-बहुओं को देख कर उनके होंठो पर मुस्कान आ गयी। प्रसन्न दिल से उनका स्वागत किया और ‘दीपक’ कह कर किसी को आवाज़ दी. आवाज़ उनते ही 10-11 साल का एक लड़का सामने खड़ा हो गया। सबने कोतूहल से उसे देखा। जगदीश प्रसादजी ने सबकी नजरों को नज़रअंदाज़ किया और दीपक को 6 प्लेट गरम गरम हलवा लाने के लिए कहा। इसी बीच जगदीश प्रसादजी सबसे बच्चों की कुशलता के बारे में जानते रहे। बेटे एक दूसरे की तरफ देख रहे थे कि कौन पहल करे पर किसी कि हिम्मत नहीं हो पा रही थी कुछ पूछने की। इतने में दीपक एक ट्रे में 6 प्लेट लेकर आ गया और सबको एक-एक प्लेट पकड़ा दी। किसी ने भी प्लेट को हाथ नहीं लगाया। किसी को बोलते न देख कर जगदीश प्रसादजी ने कमान अपने हाथ में ली और बोलने लगे तुम सब को हैरानी हो रही होगी और गुस्सा भी आ रहा होगा की पिताजी को ये क्या सनक सवार हो गयी है। लेकिन कारण भी तुम लोग ही हो। मैंने और तुम्हारी मां ने तुम लोगों को कभी भी किसी प्रकार की कमी नहीं आने दी। तुम्हारी माँ ने मेरी एक अकेली तन्खवाह से कितनी कुशलता से घर को चलाया ये मुझे तुम सब को बताने की जरूरत नहीं है और आज मुझे ये कहने में कोई भी शर्म नहीं है कि उसने अकेले तुम सभी को को अपने प्यार से बाँध रखा था पर तुम 6 लोगों ने अपने एक बाप को ही किस्तों में बाँट लिया, पर चलो कोई बात नहीं कम से कम दो वक़्त की रोटी तो शांति से दे सकते थे पर वो भी नहीं हो पाया। पार्लर और किट्टी पार्टी में जाने की लिए सभी के पास वक़्त था पर मेरी दो रोटियां सब को भारी पड़ रही थी। तुम सभी को अच्छी तरह से मालूम था कि जिसके पास भी मैं रहता था अपनी पेंशन वहीँ खर्च करता था लेकिन मेरी दवाई के लिए किसी के पास पैसे नहीं होते थे। तुम सब को अपने अधिकार पता थे पर इस बूढ़े के प्रति तुम्हारे कुछ कर्त्तव्य भी हैं, यह तुम में से किसी को भी याद नहीं रहा। और फिर जब मेरे बेटे ही ऐसे हैं तो बहुओं से मैं क्या उम्मीद रखूँ” कहते कहते जगदीश प्रसादजी का गला रूंध गया। तीनो बेटे-बहुएँ नज़रे झुका कर बैठे रहे। जगदीश प्रसादजी ने दोबारा बोलना शुरू किया “मेरा ये फैसला तुम्हे पसंद नहीं आएगा, यह मैं जानता हूँ पर इसके जिम्मेदार भी तुम लोग हो. तुम्हे पता चल गया हो गया के मैंने मकान बेच दिया है। 10 लाख के घाटे में बेचा है पर मुझे इसका कोई मलाल नहीं है. 5-5 लाख मैंने अपने पोते-पोतियों के नाम से फिक्स्ड डिपोसिट करा दिए हैं जो उनके बड़े होने पर उन्हें ही मिलेंगे। मैंने यह घर खरीद लिया है। दो कमरे, किचेन, बाथरूम, टॉयलेट सभी सुविधाएँ है उनमे जो कमी थी वो मैंने जुटा ली हैं। मैंने इसके लिए आश्रम को 15 लाख रुपये दे दिए हैं। मेरे मरने के बाद यह घर आश्रम की सम्पति हो जायेगा।अभी अभी जिस लड़के को तुमने देखा है वो एक अनाथ लड़का है जो अब मेरे साथ रहता है। मैंने एक स्कूल में उसका नाम लिखवा दिया है। पढता भी है और मेरी सेवा भी करता है। 2 लाख रुपये मैंने इसके नाम से भी जमा करा दिए हैं। बाकि जो बचा, कितना बचा उसका हिसाब तुम लगा लो, मैंने बैंक में जमा करा दिए हैं।बैंक से जो इंटरेस्ट आएगा और मेरी पेंशन से मेरा और दीपक का खर्च आराम से चल जायेगा अब तुम लोगों को मेरी तरफ से पूरी आज़ादी है जैसे चाहो वैसे रहो” ये सब कह कर जगदीश प्रसादजी चुप हो गए और आरामकुर्सी पर बैठ कर अपनी आँखें बंद कर ली तीनो बेटे-बहुओं को समझ नहीं आ रही कि पिताजी की इन बातों पर अपनी क्या प्रतिक्रिया प्रकट करें. और सामने पड़ी हलवे की प्लेट को देखकर अलका सोच रही थी कि एक प्लेट हलवे की कितनी बड़ी कीमत सबको चुकानी पड़ गयी है।

🌹 राधे राधे जी🌹
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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♥️ Story-1 ♥️

जिदंगी का वास्तविक अनुभव पढ़ाई पूरी करने के बाद एक छात्र किसी बड़ी कंपनी में नौकरी पाने की चाह में इंटरव्यू देने के लिए पहुंचा। छात्र ने बड़ी आसानी से पहला इंटरव्यू पास कर लिया। अब फाइनल इंटरव्यू कंपनी के डायरेक्टर को लेना था। और डायरेक्टर को ही तय करना था कि उस छात्र को नौकरी पर रखा जाए या नहीं। डायरेक्टर ने छात्र का सीवी (curricular vitae) देखा और पाया कि पढ़ाई के साथ- साथ यह छात्र

अतिरिक्त/अन्य गतिविधियों (extra curricular activities) में भी हमेशा अव्वल रहा।
डायरेक्टर- “क्या तुम्हें पढ़ाई के दौरान कभी छात्रवृत्ति (scholarship) मिली…?”
छात्र- “जी नहीं…”
डायरेक्टर- “इसका मतलब स्कूल-कॉलेज की फीस तुम्हारे पिता अदा करते थे।”
छात्र- “जी हाँ , श्रीमान ।”
डायरेक्टर- “तुम्हारे पिताजी क्या काम करते है?”

छात्र- “जी वो लोगों के कपड़े धोते हैं। ” यह सुनकर कंपनी के डायरेक्टर ने कहा- “ज़रा अपने हाथ तो दिखाना। “ छात्र के हाथ रेशम की तरह मुलायम और नाज़ुक थे।

डायरेक्टर- “क्या तुमने कभी कपड़े धोने में अपने पिताजी की मदद की ?” छात्र- "जी नहीं, मेरे पिता हमेशा यही चाहते थे कि मैं पढ़ाई करूं और ज़्यादा से ज़्यादा किताबें पढ़ूं। हां , एक बात और, मेरे पिता बड़ी तेजी से कपड़े धोते हैं। " डायरेक्टर- "क्या मैं तुम्हें एक काम कह सकता हूं?"छात्र- "जी, आदेश कीजिए। " डायरेक्टर- "आज घर वापस जाने के बाद अपने पिताजी के हाथ धोना। फिर कल सुबह मुझसे आकर मिलना। " छात्र यह सुनकर प्रसन्न हो गया।

उसे लगा कि अब नौकरी मिलना तो पक्का है, तभी तो डायरेक्टर ने कल फिर बुलाया है। छात्र ने घर आकर खुशी-खुशी अपने पिता को ये सारी बातें बताईं और अपने हाथ दिखाने को कहा। पिता को थोड़ी हैरानी हुई। लेकिन फिर भी उसने बेटे की इच्छा का मान करते हुए अपने दोनों हाथ उसके हाथों में दे दिए। छात्र ने पिता के हाथों को धीरे-धीरे धोना शुरू किया। कुछ देर में ही हाथ धोने के साथ ही उसकी आंखों से आंसू भी झर-झर बहने लगे। पिता के हाथ रेगमाल (emery paper) की तरह सख्त और जगह-जगह से कटे हुए थे। यहां तक कि जब भी वह कटे के निशानों पर पानी डालता, चुभन का अहसास

पिता के चेहरे पर साफ़ झलक जाता था। छात्र को ज़िंदगी में पहली बार एहसास हुआ कि ये वही हाथ हैं जो रोज़ लोगों के कपड़े धो-धोकर उसके

लिए अच्छे खाने, कपड़ों और स्कूल की फीस का इंतज़ाम करते थे। पिता के हाथ का हर छाला सबूत था उसके एकेडैमिक कैरियर की एक-एक कामयाबी का। पिता के हाथ धोने के बाद छात्र को पता ही नहीं चला कि उसने उस दिन के बचे हुए सारे कपड़े भी एक-एक कर धो डाले। उसके पिता रोकते ही रह गए , लेकिन छात्र अपनी धुन में कपड़े धोता चला गया।

उस रात बाप- बेटे ने काफ़ी देर तक बातें कीं। अगली सुबह छात्र फिर नौकरी के लिए कंपनी के डायरेक्टर के ऑफिस में था। डायरेक्टर का सामना करते हुए छात्र की आंखें गीली थीं। डायरेक्टर- "हाँ , तो फिर कैसा रहा कल घर पर ?क्या तुम अपना अनुभव मेरे साथ शेयर करना पसंद करोगे?" छात्र- " जी हाँ , श्रीमान कल मैंने जिंदगी का एक वास्तविक अनुभव सीखा।

नंबर एक – मैंने सीखा कि सराहना क्या होती है। मेरे पिता न होते तो मैं पढ़ाई में इतनी आगे नहीं आ सकता था।

नंबर दो – पिता की मदद करने से मुझे पता चला कि किसी काम को करना कितना सख्त और मुश्किल होता है |

नंबर तीन- मैंने रिश्तों की अहमियत पहली बार इतनी शिद्दत के साथ महसूस की। “ डायरेक्टर- "यही सब है जो मैं अपने मैनेजर में देखना चाहता हूँ। मैं यह नौकरी केवल उसे देना चाहता हूं जो दूसरों की मदद की कद्र करें, ऐसा व्यक्ति जो काम किए जाने के दौरान दूसरों की तकलीफ भी महसूस करे। ऐसा शख्स जिसने सिर्फ पैसे को ही जीवन का ध्येय न बना रखा हो। मुबारक हो, तुम इस नौकरी के पूरे हक़दार हो।" शिक्षा- एक दूसरे का हाथ बंटाते हुए काम करने का जज्ब़ा अपने अंदर लाएं। _____♥️_____

Heartfulness Meditation💌

HFN Story Team Jodhpur

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मैं जब छोटा था तो मेरे गांव में बहुत मदारी आते थे। फिर पता नहीं मदारी कहां चले गए! फिर मैं पूछने लगा कि मदारियों का क्या हुआ? मेरे गांव के बीच में ही बाजार है। उस बाजार में एक ही काम होता था: सुबह-शाम डमरू बज जाता। मदारी आते ही रहते, भीड़ इकट्ठी होती रहती। वही बकवास–कि जमूरे, नाचेगा? और जमूरा कहता–नहीं। और मदारी कहता–लड्डू खिलाएंगे, नाचेगा? वह कहता–नहीं।
बर्फी खिलाएंगे, नाचेगा?
वह कहता–नहीं!

ऐसा मदारी कहता ही चला जाता। आखिर में वह उसको राजी कर लेता कि नाचेगा। बस इसी बीच डमरू बजता रहता, और जमूरे से पूछताछ चलती रहती और भीड़ इकट्ठी होती रहती। उस भीड़ में मैंने पढ़े-लिखे लोग देखे, दुकानदार देखे, डाक्टर देखे, वैद्य देखे, पंडित देखे, पुरोहित देखे। बच्चे इकट्ठे होते थे, यह तो ठीक था; मैंने बड़ों को भी इकट्ठे देखा।

फिर धीरे-धीरे मदारी नदारद हो गए। उन्नीस सौ सैंतालीस के बाद मदारियों का पता ही नहीं। सब बंदर, सब मदारी, सब डमरू दिल्ली चले गए।
आते हैं पांच साल में, जब चुनाव का वक्त आता है, तब वे डमरू बजाते हैं –कि जमूरे, नाचेगा? जमूरा कहता है कि नहीं। नाचने का मतलब–वोट देगा? कि जमूरे, वोट देगा? जमूरा कहता है–नहीं। कि लड्डू खिलाएंगे, वोट देगा? नहीं। नगद रुपये लेगा। नगद नोट देख कर लेगा कि असली है कि नकली।

–इसी तरह बंदरों का नचाना और डमरू का बजाना! और सब मदारी दिल्ली में इकट्ठे हो गए हैं। इसलिए तो आजकल जगह-जगह मदारी नहीं दिखाई पड़ते। फिर पांच साल के लिए सब मदारी नदारद हो जाते हैं।

प्रेम सदा से चुप है। अहंकार खूब ढोल बजाता है, डुंडी पीटता है, बड़ा शोरगुल करता है। भीड़ जो इकट्ठी करनी है। तुम देखते हो, कोई मदारी खड़ा हो जाए बाजार में आकर। इधर डमरू बजाया उसने, इधर बंदर नचाया उसने, कि बस लोग आने लगे। दिशाओं-दिशाओं से लोग इकट्ठे होने लगते हैं। कोई हो मदारी, कोई हो बंदर, कोई डमरू बजाए, लोग इकट्ठे होने लगते हैं। शोरगुल भर करो, उछल-कूद भर मचाओ…।

राजनीति इसी तरह का शोरगुल है; अहंकार की बड़ी राजनीति है। असल में, अहंकार का फैलाव ही राजनीति है। और अहंकार का विसर्जन ही धर्म है।

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बसयूँही

चाय : चरित्रहीन या चरित्रवान…!!

कल कुमार विश्वास को सुन रहा था…. वो अपना एक प्रसंग सुना रहे थे… कि कैसे उन्हें पता चला कि… चाय भी चरित्रवान
और चरित्र हीन हो सकती है…….!!!
चाय का मुझे भी बचपन से ही शौक रहा है….. और जिंदगी का भी कुछ ऐसा मसला रहा… कि… 40 बसंत देखने तक…. पैरों
में चक्कर ही रहा….. घाट घाट का पानी पिलाया जिंदगी ने…
और घाट घाट की चाय भी….
सन 85 की बात है…. किस्मत मद्रास ले गई…. तब तक वह मद्रास ही था… चेन्नई तो बहुत बाद में हुआ….ख़ैर..
यहाँ मैंने जिंदगी में पहली बार चाकलेट चाय पी… चाकलेट चाय… यानी चाकलेट के टेस्ट वाली चाय… यह और कुछ नहीं चाकलेट के फ्लेवर वाली चाय पत्ती होती थी… जिसे साधारण चाय के साथ मिला कर बनाने में, चाकलेट का टेस्ट आता था… आज यह सभी जगह उपलब्ध है … मगर उस दौर में यह सिर्फ दक्षिणी राज्यों में ही मिलती थी….
चाय से संबंधित जो एक और काबिले ज़िक्र बात है, वो चाय परोसने से ताल्लुक रखती है…हमारे यहाँ, उस समय कुल्हड़
चलन में थे …. मगर मद्रास में अलग ही रिवाज था… पीतल या स्टील की कटोरी और उसमें रखा छोटा सा स्टील का ग्लास….. और उस गिलास में चाय…. गिलास का उपरी भाग , बाहर की तरफ मुड़ा होता था.. ताकि आसानी से पकड़ा जा सके… अब आप गिलास से कटोरी में चाय डालिये… और घूंट घूंट मजा लीजिये…
ख़ैर.. बात हो रही थी कुमार विश्वास और उनकी चाय की… तो एक बार कुमार अपने किसी आचार्य के घर पहुंचे तो चाय को पूछा गया… कुमार के हाँ कहने पर… प्रश्न हुआ.. “कौन सी चाय पियेंगे…?? चरित्रहीन चाय…. या चरित्र वान चाय “…??
कुमार को असमंजस में पड़ा देख… आचार्य ने खुलासा किया…
” चरित्रहीन चाय….. चीनी मिट्टी के प्याले में होती है.. और एक ही प्याली न जाने कितने अधरों को छूती है …. हर बार धुल पुंछ के, नया श्रंगार कर … फ़िर नये प्रेमी के पास पहुंच जाती है” …..
और चरित्रवान चाय…..” मिट्टी, अग्नि आदि पंच तत्वों से बने…
कुल्हड़ में आती है… एक ही होंठ को छूती है….. और फिर मिट्टी में ही मिल… नया जन्म लेकर आती है”….
बात चाहे हास – परिहास में लें… मगर अर्थ बहुत गहरा है…. तार सीधे हमारी संस्कृति से जुड़े है…. मिट्टी का बर्तन, गर्म पदार्थ के उष्ण प्रभाव को कम करने में सहायक होता है…
अच्छी बात है कि… आज हम फ़िर अपनी जड़ों की तरफ लौट रहे हैं.. कप.. गिलास से फिर…. कुल्हड़ पर आ रहे हैं.. .............. इति...........

गुरमीतसिंहमोंगा

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एक गांव में दो भाई रहते थे। दोनों भाई में बहुत प्रेम था। मानो राम लक्ष्मण की जोड़ी। दोनों भाई की शादी हो चुकी थी।जीतना प्रेम इन दोनों भाइयों में था उतना ही उनकी पत्नियों में भी। बड़े भाई की एक लड़की और एक लड़का तथा छोटे भाई का एक लड़का था।

एक दिन बच्चे आपस में खेल रहे थे, अचानक किसी बात को लेकर आपस में झगड़ गए, बच्चों के झगड़े को लेकर…. आपस में उनकी मां भी झगड़ गई। छोटे भाई की पत्नी गुस्से में आकर अपनी बड़ी जेठानी को बोल दी…मैं आपकी शक्ल नहीं देखना चाहती ऐसा बोलकर वह अपने कमरे में प्रवेश कर दरवाजे बंद कर दी।

शाम का समय हो चला था सब लोग घर पर आ गए थे। चाय का समय बिता जा रहा था। दोनों भाई अपनी अपनी पत्नी की चेहरा देखकर समझ गए कुछ गड़बड़ है और वे दोनों अपनी अपनी पत्नी के साथ कमरे में चले गए। दोनों ही अपने-अपने पति को झगड़े के बारे में बता रही थी। सारी बात सुनकर छोटे भाई ने अपनी पत्नी को बोला… तुम्हें जाकर भाभी से माफी मांगना चाहिए और अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए। पत्नी बोली मुझे भी ऐसा ही लग रहा था और मैं ऐसे ही करने वाली थी। आपने मुझे यह कह कर मेरे सकारात्मक विचार में खुशियां ला दि।

थोड़ा देर के बाद छोटे भाई की पत्नी ने चाय लेकर बड़े भाई की पत्नी के दरवाजे को खटख टा आई, दरवाजा खुला…. सामने देख कर जेठानी बोली… तुम तो मेरा चेहरा नहीं देखना चाहती हो फिर यहां क्यों आई हो? तब छोटे भाई की पत्नी ने विनम्र भाव में पलके झुकाए बोली…. माफ करिए दीदी मुझसे गलती हुई है। बच्चों के झगड़े के लिए आपस में लड़ना अच्छा नहीं है। मैं काफी शर्मिंदा हूं, मुझे माफ करिए। अगर ऐसा होता है तो हममें और बच्चे में क्या अंतर रहेगा।

इतना सुनकर जेठानी की आंखों में आंसू आ गया, और वह बोली… अरे पगली तुझ में नहीं मेरे में गलती है ऐसे कहते हुए उसे पकड़ कर गले लगा लिया और दोनों के आंखों में प्रेम के आंसू बहने लगे।

फिर क्या था, सब लोग हर रोज की तरह बैठकर चाय का आनंद लेने लगे।

निष्कर्ष:
“माफी मांग लेने से इंसान छोटा नहीं होता है, यह उसका बड़प्पन है।”❣️🙏

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एक 6 वर्ष का लडका अपनी 4 वर्ष की छोटी बहन के साथ बाजार से जा रहा था।
अचानक से उसे लगा की,उसकी बहन पीछे रह गयी है।
वह रुका, पीछे मुडकर देखा तो जाना कि, उसकी बहन एक खिलौने के दुकान के सामने खडी कोई चीज निहार रही है।
लडका पीछे आता है और बहन से पुछता है, “कुछ चाहिये तुम्हे ?” लडकी एक गुड़िया की तरफ उंगली उठाकर दिखाती है।
बच्चा उसका हाथ पकडता है, एक जिम्मेदार बडे भाई की तरह अपनी बहन को वह गुड़िया देता है। बहन बहुत खुश हो गयी है।
दुकानदार यह सब देख रहा था, बच्चे का व्यवहार देखकर आश्चर्यचकित भी हुआ ….
अब वह बच्चा बहन के साथ काउंटर पर आया और दुकानदार से पुछा, “सर, कितनी कीमत है इस गुड़िया की ?”
दुकानदार एक शांत व्यक्ती है, उसने जीवन के कई उतार चढाव देखे होते है। उन्होने बडे प्यार और अपनत्व से बच्चे से पुछा, “बताओ बेटे, आप क्या दे सकते हो?”
बच्चा अपनी जेब से वो सारी सीपें बाहर निकालकर दुकानदार को देता है जो उसने थोडी देर पहले बहन के साथ समुंदर किनारे से चुन चुन कर लायी थी।
दुकानदार वो सब लेकर युं गिनता है जैसे पैसे गिन रहा हो।
सीपें गिनकर वो बच्चे की तरफ देखने लगा तो बच्चा बोला,”सर कुछ कम है क्या?”
दुकानदार :-” नही नही, ये तो इस गुड़िया की कीमत से ज्यादा है, ज्यादा मै वापिस देता हूं” यह कहकर उसने 4 सीपें रख ली और बाकी की बच्चे को वापिस दे दी।
बच्चा बडी खुशी से वो सीपें जेब मे रखकर बहन को साथ लेकर चला गया।
यह सब उस दुकान का नौकर देख रहा था, उसने आश्चर्य से मालिक से पुछा, ” मालिक ! इतनी महंगी गुड़िया आपने केवल 4 सिपों के बदले मे दे दी ?”
दुकानदार हंसते हुये बोला,
“हमारे लिये ये केवल सीप है पर उस 6साल के बच्चे के लिये अतिशय मूल्यवान है। और अब इस उम्र मे वो नही जानता की पैसे क्या होते है ?
पर जब वह बडा होगा ना…
और जब उसे याद आयेगा कि उसने सिपों के बदले बहन को गुड़िया खरीदकर दी थी, तब ऊसे मेरी याद जरुर आयेगी, वह सोचेगा कि,,,,,,
“यह विश्व अच्छे मनुष्यों से भरा हुआ है।”
यही बात उसके अंदर #सकारात्मक #दृष्टीकोण बढाने मे मदद करेगी और वो भी अच्छा इंन्सान बनने के लिये प्रेरित होगा।
……………………………………………………
#राधे_राधे 🙏 🙏 🙏 🙏

अनिल पटेल