Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

समय का पहिया
यह सच्ची घटना 60वर्ष पुरानी है। लक्ष्मीचंद पढ़े लिखे और होनहार युवा हैं। उनके पिताजी गांव के समृद्धि सेठ हैं, लेकिन अपने बेटे की पढ़ाई में रुचि देखकर उन्होंने उसे पढ़ाया। उनके एक परिचित रिश्तेदार ने उनके लिए एक रिश्ता बताया । उन परिचित पर भरोसा करके उन्होंने लक्ष्मी चंद की बात तय कर दी ।”सब कुछ अच्छा ही होगा “
यह जानकर उन्होंने हां कह दी, और लड़की से मिले भी नहीं ।लड़की संपन्न और प्रतिष्ठित परिवार की है, यह जानकारी थी । बारात बस में गई, शादी हुई, उस समय परिवेश बिल्कुल परंपराओं से युक्त मुक्त था। सिर पर घुंघट लिया जाता था। लक्ष्मी चंद शादी करके दुल्हन के साथ घर आ गए। लेकिन एक दो दिन बाद ही दुल्हन की हरकतें सभी को समझ में आने लगी। वह मानसिक रूप से विक्षिप्त महिला थी। दाल चावल घर के कुएं में फेंक देना, अपने कपड़ों को जला देना ,इस तरह की हरकतें करने लगी। लक्ष्मी चंद जी पढ़े लिखे थे ,उन्होंने सोचा” प्रेम से उसके जीवन की दशा बदलू “उसके साथ घूमने गए, लेकिन वहां पर भी ऐसी हरकतें करते रही। पढ़े-लिखे युवा मन के सपने स्वाहा हो गए। मन में एक अजीब सी कशमकश और दुख आ गया।
घूमने के बाद घर वापस आए। घर वालों ने भी सोचा कि कुछ सुधार हो जाए, लेकिन नहीं हुआ ।तब लक्ष्मीचंद अपने ससुराल गए और अपने ससुर पर पर गुस्सा करते हुए लड़की को वही छोड़ कर आ गए, और बोला कि “आपने मेरा जीवन बर्बाद क्यों किया??
जीवन में एक नैराश्य की भावना आ गई ।अब शादी नहीं करना , ऐसा सोचने लगे।उस समय आचार्य विनोबा भावे का भूदान आंदोलन चल रहा था। लक्ष्मी चंद जी आचार्य विनोबा भावे से प्रेरित थे, अतः उनकी पद यात्राओं में उनसे जुड़ गए, जब भी अवसर लगता वह जाते। शासकीय नौकरी भी चल रही थी, जिस घर में रह रहे थे ,वहां पर ममतामई महिला कोकिला जिसे वह मासी कहते थे, रहते थे। उन्होंने उनसे उनके वैवाहिक जीवन के बारे में पूछा, तब उन्होंने सब बता दिया, और अपने जीवन में आई हुई निराशा के बारे में भी।
तब उन मासी ने उन्हे कहा कि मेरी निगाह में गरीब परिवार की एक लड़की है, तुम चाहो तो मैं तुम्हारी बात वहां पर करवा सकती हूं ।बात आगे बढ़ी। लक्ष्मी चंद जी ने रत्ना को देखा । रत्ना समझदार, सुलझी हुई लड़की थी। लक्ष्मी चंद जी ने अपने पिताजी से आज्ञा लेकर एक सादे समारोह में रत्ना को अपनी जीवनसंगिनी बना लिया।
समय का पहिया घूमता रहा, और रत्ना जैसी सहधर्मिणी को पाकर उनके जीवन की सारी निराशा आशा में बदल गई। दो पुत्रियों और एक पुत्र को जन्म दिया। सुंदर गृहस्थी धर्म का पालन किया, और अपने बच्चों को उत्तम संस्कारों से परिपूर्ण करके लक्ष्मीचंद और रत्ना नेअपने जीवन को धन्य बनाया। विषम स्थिति में भी उचित सामंजस्य से जीवन में किसी भी समस्या का समाधान किया जा सकता है ।

सुधा जैन

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