Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

सैफ अली खान ने अपने बेटे का नाम तैमूर रखा उससे हम्हे कोई एतराज नहीं है। यह उनकी सामान्य प्रवृत्ति है। लेकिन पृथ्वीराज कपूर जिनका परिवार पाकिस्तान में मुसलमानों के भय से पाकिस्तान से विस्थापित होकर आया था उनकी पोती ने वयोवृद्ध एक सेकंड हैंड मुसलमान से विवाह किया यह भी हम्हे कोई बड़ी घटना नहीं है। हम हिन्दुओं को दुख इस बात का है किस फिल्मों में स्वयं को बहुत बोल्ड और आजाद दिखाने वाली एक लड़की अपने पति से मात्र इतना कहने का साहस नहीं कर पाई कि मेरे बेटे का नाम तो कम से कम मेरे पूर्वजों के हत्यारे के नाम पर मत रखो। यह नारी के पित्र सत्ता स्वीकार करने का और गुलामी का बहुत बड़ा प्रतीक है। इस कायर से अधिक साहस तो गांव की देसी महिलाओं में होता है।

Ravindra Kant Tyagiji द्वारा

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महाराणा प्रताप जयंती विशेष

एक बार महाराणा प्रताप पुंगा की पहाड़ी बस्ती में रुके हुए थे । बस्ती के भील बारी-बारी से प्रतिदिन राणा प्रताप के लिए भोजन पहुँचाया करते थे।

इसी कड़ी में आज दुद्धा की बारी थी। लेकिन उसके घर में अन्न का दाना भी नहीं था।

दुद्धा की मांँ पड़ोस से आटा मांँगकर ले आई और रोटियाँ बनाकर दुद्धा को देते हुए बोली,
“ले! यह पोटली महाराणा को दे आ ।”

दुद्धा ने खुशी-खुशी पोटली उठाई और पहाड़ी पर दौड़ते-भागते रास्ता नापने लगा ।

घेराबंदी किए बैठे अकबर के सैनिकों को दुद्धा को देखकर शंका हुई।

एक ने आवाज लगाकर पूछा:

“क्यों रे ! इतनी जल्दी-जल्दी कहाँ भागा जा रहा है ?”

दुद्धा ने बिना कोई जवाब दिये, अपनी चाल बढ़ा दी। मुगल सैनिक उसे पकड़ने के लिये उसके पीछे भागने लगा, लेकिन उस चपल-चंचल बालक का पीछा वह जिरह-बख्तर में कसा सैनिक नहीं कर पा रहा था ।

दौड़ते-दौड़ते वह एक चट्टान से टकराया और गिर पड़ा, इस क्रोध में उसने अपनी तलवार चला दी ।

तलवार के वार से बालक की नन्हीं कलाई कटकर गिर गई । खून फूट कर बह निकला, लेकिन उस बालक का जिगर देखिये, नीचे गिर पड़ी रोटी की पोटली उसने दूसरे हाथ से उठाई और फिर सरपट दौड़ने लगा. बस, उसे तो एक ही धुन थी – कैसे भी करके राणा तक रोटियाँ पहुँचानी हैं।

रक्त बहुत बह चुका था , अब दुद्धा की आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा।

उसने चाल और तेज कर दी, जंगल की झाड़ियों में गायब हो गया । सैनिक हक्के-बक्के रह गये कि कौन था यह बालक?

जिस गुफा में राणा परिवार समेत थे, वहांँ पहुंँचकर दुद्धा चकराकर गिर पड़ा।
उसने एक बार और शक्ति बटोरी और आवाज लगा दी —

“राणाजी !”
आवाज सुनकर महाराणा बाहर आये, एक कटी कलाई और एक हाथ में रोटी की पोटली लिये खून से लथपथ 12 साल का बालक युद्धभूमि के किसी भैरव से कम नहीं लग रहा था ।

राणा ने उसका सिर गोद में ले लिया और पानी के छींटे मारकर होश में ले आए , टूटे शब्दों में दुद्धा ने इतना ही कहा-

“राणाजी ! …ये… रोटियाँ… मांँ ने.. भेजी हैं ।”

फौलादी प्रण और तन वाले राणा की आंँखों से शोक का झरना फूट पड़ा। वह बस इतना ही कह सके,

“बेटा, तुम्हें इतने बड़े संकट में पड़ने की कहा जरूरत थी ? “

वीर दुद्धा ने कहा – “अन्नदाता!…. आप तो पूरे परिवार के साथ… संकट में हैं …. माँ कहती है आप चाहते तो अकबर से समझौता कर आराम से रह सकते थे….. पर आपने धर्म और संस्कृति रक्षा के लिये… कितना बड़ा…. त्याग किया उसके आगे मेरा त्याग तो कुछ नही है….. ।”

इतना कह कर वीरगति को प्राप्त हो गया दुद्धा ।

राणा जी की आँखों मेंं आंँसू थे । मन में कहने लगे ….
“धन्य है तेरी देशभक्ति, तू अमर रहेगा, मेरे बालक। तू अमर रहेगा।”

अरावली की चट्टानों पर वीरता की यह कहानी आज भी देशभक्ति का उदाहरण बनकर बिखरी हुई है।

क्षत्रिय होना गर्व हैं

ठाकुर साहब

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🌸🌸चमत्कारी कथा “ब्रज की माटी”🌸🌸

देवताओं ने व्रज में कोई ग्वाला कोई गोपी कोई गाय, कोई मोर तो कोई तोते के रूप में जन्म लिया।कुछ देवता और ऋषि रह गए थे।वे सभी ब्रह्माजी के पास आये और कहने लगे कि ब्रह्मदेव आप ने हमें व्रज में क्यों नही भेजा? आप कुछ भी करिए किसी भी रूप में भेजिए।ब्रह्मा जी बोले व्रज में जितने लोगों को भेजना संभव था उतने लोगों को भेज दिया है अब व्रज में कोई भी जगह खाली नहीं बची है। देवताओं ने अनुरोध किया प्रभु आप हमें ग्वाले ही बना दें ब्रह्माजी बोले जितने लोगों को बनाना था उतनों को बना दिया और ग्वाले नहीं बना सकते।देवता बोले प्रभु ग्वाले नहीं बना सकते तो हमे बरसाने को गोपियां ही बना दें ब्रह्माजी बोले अब गोपियों की भी जगह खाली नही है।देवता बोले गोपी नहीं बना सकते, ग्वाला नहीं बना सकते तो आप हमें गायें ही बना दें। ब्रह्माजी बोले गाएं भी खूब बना दी हैं।अकेले नन्द बाबा के पास नौ लाख गाएं हैं।अब और गाएं नहीं बना सकते।
देवता बोले प्रभु चलो मोर ही बना दें।नाच-नाच कर कान्हा को रिझाया करेंगे।ब्रह्माजी बोले मोर भी खूब बना दिए। इतने मोर बना दिए की व्रज में समा नहीं पा रहे।उनके लिए अलग से मोर कुटी बनानी पड़ी।

देवता बोले तो कोई तोता, मैना, चिड़िया, कबूतर, बंदर कुछ भी बना दीजिए। ब्रह्माजी बोले वो भी खूब बना दिए, पुरे पेड़ भरे हुए हैं पक्षियों से।देवता बोले तो कोई पेड़-पौधा,लता-पता ही बना दें।
||
ब्रह्मा जी बोले- पेड़-पौधे, लता-पता भी मैंने इतने बना दिए की सूर्यदेव मुझसे रुष्ट है कि उनकी किरने भी बड़ी कठिनाई से ब्रिज की धरती को स्पर्श करती हैं।देवता बोले प्रभु कोई तो जगह दें हमें भी व्रज में भेजिए।ब्रह्मा जी बोले-कोई जगह खाली नही है।तब देवताओ ने हाथ जोड़ कर ब्रह्माजी से कहा प्रभु अगर हम कोई जगह अपने लिए ढूंढ़ के ले आएं तो आप हम को व्रज में भेज देंगे।ब्रह्मा जी बोले हाँ तुम अपने लिए कोई जगह ढूंढ़ के ले आओगे तो मैं तुम्हें व्रज में भेज दूंगा। देवताओ ने कहा धुल और रेत कणो कि तो कोई सीमा नहीं हो सकती और कुछ नहीं तो बालकृष्ण लल्ला के चरण पड़ने से ही हमारा कल्याण हो जाएगा हम को व्रज में धूल रेत ही बना दे।ब्रह्मा जी ने उनकी बात मान ली।
||
इसलिए जब भी व्रज जाये तो धूल और रेत से क्षमा मांग कर अपना पैर धरती पर रखे, क्योंकि व्रज की रेत भी सामान्य नही है, वो ही तो रज देवी – देवता एवं समस्त ऋषि-मुनि हैं…!!

जय श्रीराधे जी…🙏🙏

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થપ્પો….
52 વર્ષની વયે કાલ મેં 50વર્ષની પત્નીને કહ્યું,
ચાલને, થપ્પો રમીએ.
પત્નીએ કહ્યું, હાય, હાય, તમેય શું બાળક જેવી વાત કરો છો ??

આ ઉંમર કંઈ થપ્પો રમવાની છે !

મે કહયુ: મને તારી સાથે થપ્પો રમવાનું ખૂબ મન થયું છે.
આજે ઘરમાં આપણા બે સિવાય કોઈ નથી.
ચાલને થપ્પો રમી લઈએ.

પત્નીએ પહેલો દાવ લીધો. એકથી વીસ ગણ્યા.
હું સોફા નીચે છુપાઈ ગયો.

પત્નીએ બધા રૂમ જોયા.
પછી સોફા નીચેથી મને શોધી કાઢ્યો.

એ પછી દાવ લેવાનો વારો આવ્યો મારો.
મેં ધીમે ધીમે 20 સુધી ગણતરી કરી.
એ પછી પત્નીને શોધવા આખું ઘર ફંફોસી નાખ્યું.

બધા રૂમ બે બે વાર જોયા.
ફળીયુ નવેરૂ જોયું

બધાં કબાટ ખોલીને બરાબર ચેક કર્યું.
બાથરુમ-વોશરૂમ જોયા.
પત્ની ક્યાંય ના મળે.

હુ તો ગભરાઈ ગયો.
એવી તો કઈ જગ્યાએ છુપાઈ ગઈ
કે મળતી નથી ?

ત્રીજી વખત રસોડામાં ગયો.
રસોડા મા ફ્રીજ ની બાજુમાં એક નાનકડો ખાંચો હતો તેમાં તે કશુંક ઓઢીને સંતાઈ ગયેલ.

મે તાળીઓ પાડીને થપ્પો કરી નાખ્યો.
પછી બન્ને જોડે ચ્હા પીવા બેઠાં.

પત્ની કહે, મને થપ્પો રમવાની ખૂબ મજા આવી.
હવે આપણે રોજ થપ્પો રમીશું.

મે હસતાં હસતાં કહયુ
થેક્યુ,
બસ મારે એટલે જ થપ્પો
રમવો હતો.
તું વર્ષોથી રસોડામાં ખોવાઈ ગઈ હતી,
મારે તને શોધવી હતી.

આજે તું જડી ગઈ.
પત્નીની આંખમાં હર્ષનાં આંસુ આવી ગયાં.

ક્યારેક ક્યારેક આ રીતે
થપ્પો રમી લેવો જોઈએ.

ક્યાંક કોઈ ખોવાઈ ગયું હોય
તો જડી પણ જાય……મિત્રો આ karonakal મા જીંદગી મન ભરી ને જીવી લ્યો. બંગલા મોટર ગાડી vavar નાં ચકર માં થી બહાર નીકળો . દુનિયા જાય તેલ પીવા. જીવાય એટલી જીંદગી જીવી લ્યો. મોજ કરો સાથે કઈ આવવાનું નથી.

પ્રમોદ વોરા

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राजमहल के द्वार पर एक वृद्ध भिखारी आया।
द्वारपाल से उसने कहा, ‘भीतर जाकर राजा से कहो कि तुम्हारा भाई मिलने आया है।’
द्वारपाल ने समझा कि शायद कोई दूर के रिश्ते में राजा का भाई हो।

☸सूचना मिलने पर राजा ने भिखारी को भीतर बुलाकर अपने पास बैठा लिया।
उसने राजा से पूछा,
‘कहिए बड़े भाई!
आपके क्या हालचाल हैं?’

☸राजा ने मुस्कराकर कहा,
‘मैं तो आनंद में हूं, आप कैसे हैं?’
भिखारी बोला,
‘मैं जरा संकट में हूं।
जिस महल मे रहता हूं, वह पुराना और जर्जर हो गया है।
कभी भी टूटकर गिर सकता है। मेरे बत्तीस नौकर थे,
वे भी एक एक कर चले गए। पांचों रानियां भी वृद्ध हो गईं।

☸यह सुनकर राजा ने भिखारी को सौ रुपए देने का आदेश दिया। भिखारी ने सौ रुपए कम बताए, तो राजा ने कहा,
‘इस बार राज्य में सूखा पड़ा है।’
तब भिखारी बोला,
‘मेरे साथ सात समंदर पार चलिए।
वहां सोने की खदानें हैं।
मेरे पैर पड़ते ही समुद्र सूख जाएगा।
मेरे पैरों की शक्ति तो आप देख ही चुके हैं।’

☸अब राजा ने भिखारी को एक हजार रुपए देने का आदेश दिया।
भिखारी के जाने के बाद राजा बोला,
‘भिखारी बुद्धिमान था।
भाग्य के दो पहलू होते हैं राजा व रंक।
इस नाते उसने मुझे भाई कहा।
जर्जर महल से आशय उसके वृद्ध शरीर से था,
बत्तीस नौकर दांत और पांच रानियां पंचेंद्रीय हैं।
समुद्र के बहाने उसने मुझे उलाहना दिया कि राजमहल मे उसके पैर रखते ही मेरा खजाना सूख गया, इसलिए मैं उसे सौ रुपए दे रहा हूं।
उसकी बुद्धिमानी देखकर मैंने उसे हजार रुपए दिए और कल मैं उसे अपना सलाहकार नियुक्त करूंगा।’

☸कई बार अति सामान्य लगने वाले लोग भीतर से बहुत गहरे होते हैं,
इसलिए व्यक्ति की परख उसके बाह्य रहन सहन से नहीं बल्कि आचरण से करनी चाहिये।

!! जय श्री हरि…!!

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बहुत सुंदर प्रसंग
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एक राजा ने यह ऐलान करवा दिया कि कल सुबह जब मेरे महल का मुख्य दरवाज़ा खोला जायेगा तब जिस शख़्स ने भी महल में जिस चीज़ को हाथ लगा दिया वह चीज़ उसकी हो जाएगी।
इस ऐलान को सुनकर सब लोग आपस में बातचीत करने लगे कि मैं तो सबसे क़ीमती चीज़ को हाथ लगाऊंगा।
कुछ लोग कहने लगे मैं तो सोने को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग चांदी को तो कुछ लोग कीमती जेवरात को, कुछ लोग घोड़ों को तो कुछ लोग हाथी को, कुछ लोग दुधारू गाय को हाथ लगाने की बात कर रहे थे।
जब सुबह महल का मुख्य दरवाजा खुला और सब लोग अपनी अपनी मनपसंद चीज़ों के लिये दौड़ने लगे।
सबको इस बात की जल्दी थी कि पहले मैं अपनी मनपसंद चीज़ों को हाथ लगा दूँ ताकि वह चीज़ हमेशा के लिए मेरी हो जाऐ।
राजा अपनी जगह पर बैठा सबको देख रहा था और अपने आस-पास हो रही भाग दौड़ को देखकर मुस्कुरा रहा था।
उसी समय उस भीड़ में से एक शख्स राजा की तरफ बढ़ने लगा और धीरे-धीरे चलता हुआ राजा के पास पहुँच कर उसने राजा को छू लिया।
राजा को हाथ लगाते ही राजा उसका हो गया और राजा की हर चीज भी उसकी हो गयी।
जिस तरह राजा ने उन लोगों को मौका दिया और उन लोगों ने गलतियां की।
ठीक इसी तरह सारी दुनियाँ का मालिक भी हम सबको हर रोज़ मौक़ा देता है, लेकिन अफ़सोस हम लोग भी हर रोज़ गलतियां करते हैं।
हम प्रभु को पाने की बजाए उस परमपिता की बनाई हुई दुनियाँ की चीजों की कामना करते हैं। लेकिन कभी भी हम लोग इस बात पर गौर नहीं करते कि क्यों न दुनियां के बनाने वाले प्रभु को पा लिया जाए
अगर प्रभु हमारे हो गए तो ही उसकी बनाई हुई हर चीज भी हमारी हो जाएगी
🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩
☀!! श्री हरि: शरणम् !! ☀
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महाभारत का एक सार्थक प्रसंग जो अंतर्मन को छूता है …. !!🙏🙏

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था. युद्धभूमि में यत्र-तत्र योद्धाओं के फटे वस्त्र, मुकुट, टूटे शस्त्र, टूटे रथों के चक्के, छज्जे आदि बिखरे हुए थे और वायुमण्डल में पसरी हुई थी घोर उदासी …. !
गिद्ध , कुत्ते , सियारों की उदास और डरावनी आवाजों के बीच उस निर्जन हो चुकी उस भूमि में द्वापर का सबसे महान योद्धा “देवव्रत” (भीष्म पितामह) शरशय्या पर पड़ा सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहा था — अकेला …. !

तभी उनके कानों में एक परिचित ध्वनि शहद घोलती हुई पहुँची , “प्रणाम पितामह” …. !!

भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मरी हुई मुस्कुराहट तैर उठी , बोले , ” आओ देवकीनंदन …. ! स्वागत है तुम्हारा …. !!

मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था” …. !!

कृष्ण बोले , “क्या कहूँ पितामह ! अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि कैसे हैं आप” …. !

भीष्म चुप रहे , कुछ क्षण बाद बोले,” पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव … ?
उनका ध्यान रखना , परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रासाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है” …. !

कृष्ण चुप रहे …. !

भीष्म ने पुनः कहा , “कुछ पूछूँ केशव …. ?
बड़े अच्छे समय से आये हो …. !
सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे अनेक भ्रम समाप्त हो जाँय ” …. !!

कृष्ण बोले – कहिये न पितामह ….!

एक बात बताओ प्रभु ! तुम तो ईश्वर हो न …. ?

कृष्ण ने बीच में ही टोका , “नहीं पितामह ! मैं ईश्वर नहीं … मैं तो आपका पौत्र हूँ पितामह … ईश्वर नहीं ….”

भीष्म उस घोर पीड़ा में भी ठठा के हँस पड़े …. ! बोले , ” अपने जीवन का स्वयं कभी आकलन नहीं कर पाया कृष्ण , सो नहीं जानता कि अच्छा रहा या बुरा , पर अब तो इस धरा से जा रहा हूँ कन्हैया , अब तो ठगना छोड़ दे रे …. !! “

कृष्ण जाने क्यों भीष्म के पास सरक आये और उनका हाथ पकड़ कर बोले …. ” कहिये पितामह …. !”

भीष्म बोले , “एक बात बताओ कन्हैया ! इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या …. ?”

“किसकी ओर से पितामह …. ? पांडवों की ओर से …. ?”

” कौरवों के कृत्यों पर चर्चा का तो अब कोई अर्थ ही नहीं कन्हैया ! पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ वो सही था …. ? आचार्य द्रोण का वध , दुर्योधन की जंघा के नीचे प्रहार , दुःशासन की छाती का चीरा जाना , जयद्रथ के साथ हुआ छल , निहत्थे कर्ण का वध , सब ठीक था क्या …. ? यह सब उचित था क्या …. ?”

इसका उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ पितामह …. !
इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने यह किया ….. !!
उत्तर दें दुर्योधन का वध करने वाले भीम , उत्तर दें कर्ण और जयद्रथ का वध करने वाले अर्जुन …. !!

मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं पितामह …. !!

“अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे कृष्ण …. ?
अरे विश्व भले कहता रहे कि महाभारत को अर्जुन और भीम ने जीता है , पर मैं जानता हूँ कन्हैया कि यह तुम्हारी और केवल तुम्हारी विजय है …. !
मैं तो उत्तर तुम्ही से पूछूंगा कृष्ण …. !”

“तो सुनिए पितामह …. !
कुछ बुरा नहीं हुआ , कुछ अनैतिक नहीं हुआ …. !
वही हुआ जो हो होना चाहिए …. !”

“यह तुम कह रहे हो केशव …. ?
मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है ….? यह छल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा, फिर यह उचित कैसे गया ….. ? “

“इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह , पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है …. !

हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है …. !!
राम त्रेता युग के नायक थे , मेरे भाग में द्वापर आया था …. !
हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह …. !!”

” नहीं समझ पाया कृष्ण ! तनिक समझाओ तो …. !”

” राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह …. !
राम के युग में खलनायक भी ‘ रावण ‘ जैसा शिवभक्त होता था …. !!
तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण जैसे सन्त हुआ करते थे ….. ! तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे …. ! उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था …. !!
इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया …. ! किंतु मेरे युग के भाग में में कंस , जरासन्ध , दुर्योधन , दुःशासन , शकुनी , जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं …. !! उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह …. ! पाप का अंत आवश्यक है पितामह , वह चाहे जिस विधि से हो …. !!”

“तो क्या तुम्हारे इन निर्णयों से गलत परम्पराएं नहीं प्रारम्भ होंगी केशव …. ?
क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुशरण नहीं करेगा …. ?
और यदि करेगा तो क्या यह उचित होगा ….. ??”

” भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह …. !

कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा …. !

वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा …. नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा …. !

जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ सत्य एवं धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह …. !
तब महत्वपूर्ण होती है विजय , केवल विजय …. !

भविष्य को यह सीखना ही होगा पितामह ….. !!”

“क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव …. ?
और यदि धर्म का नाश होना ही है , तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है ….. ?”

“सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह …. !

ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता ….. !केवल मार्ग दर्शन करता है*

सब मनुष्य को ही स्वयं करना पड़ता है …. !
आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न …. !
तो बताइए न पितामह , मैंने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या ….. ?
सब पांडवों को ही करना पड़ा न …. ?
यही प्रकृति का संविधान है …. !
युद्ध के प्रथम दिन यही तो कहा था मैंने अर्जुन से …. ! यही परम सत्य है ….. !!”

भीष्म अब सन्तुष्ट लग रहे थे …. !
उनकी आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं थी …. !
उन्होंने कहा – चलो कृष्ण ! यह इस धरा पर अंतिम रात्रि है …. कल सम्भवतः चले जाना हो … अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना कृष्ण …. !”

कृष्ण ने मन मे ही कुछ कहा और भीष्म को प्रणाम कर लौट चले , पर युद्धभूमि के उस डरावने अंधकार में भविष्य को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मिल चुका था …. !

जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ सत्य और धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है ….।।

अहिंसा परमो धर्म~!!?!!
धर्म हिन्सा तथैव च~√√
धर्म एव हतो हन्ति~√√
धर्मों रक्षति रक्षितः √√

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श्री विष्णु हरी के श्रीमुख से सुने कौन है उन्हें सबसे अधिक प्रिय,,,,

एक बार की बात है भगवान नारायण वैकुण्ठलोक में सोये हुए थे। उन्होंने स्वप्न में देखा कि करोड़ों चन्द्रमाओं की कांतिवाले, त्रिशूल-डमरू-धारी त्रिलोचन भगवान शिव प्रेम और आनंदित होकर उनके सामने नृत्य कर रहे हैं। उन्हें देखकर भगवान विष्णु हर्ष से गद्‍गद्‍ हो उठे और अचानक उठकर बैठ गए, और कुछ देर मग्न हो गए। उन्हें इस प्रकार बैठे देखकर श्रीलक्ष्मी जी उनसे पूछने लगीं, भगवन! आपके इस प्रकार अचानक निद्रा से जापने का क्या कारण है?”

भगवान ने कुछ देर तक उनके इस प्रशन का कोई उत्तर नहीं दिया और आनंद में निमग्न हुए चुपचाप बैठे रहे, कुछ देर बाद हर्षित होते हुए बोले, “देवी, मैंने अभी स्वप्न में भगवान शंकर के दर्शन किए। उनकी छवि ऐसी आनंदमय एवं मनोहर थी कि देखते ही बनती थी। मुझे एेसा लग रहा है कि, भोलेनाथ ने मुझे स्मरण किया है। चलो, कैलाश में चलकर हम लोग महादेव के दर्शन करते हैं।”

ऐसा विचार कर दोनों कैलाश की ओर चल दिए। भगवान शिव के दर्शन के लिए कैलाश मार्ग के आधे दूर गए कि देखते हैं भगवान शंकर स्वयं पार्वती माता के साथ उनकी ओर चले आ रहे हैं। अब भगवान के आनंद का तो ठिकाना ही नहीं रहा। पास आते ही दोनों परस्पर बड़े प्रेम से मिले।

ऐसा लगा, मानों प्रेम और आनंद का समुद्र चारों ओर उमड़ पड़ा हो। एक-दूसरे को देखकर दोनों के नेत्रों से आनन्दाश्रु बहने लगे। दोनों ही एक-दूसरे से लिपटे हुए कुछ देर खड़े रहे। जब विष्णु भगवान ने शिव शंकर से पूछा तो मालूम हुआ कि शंकर जी को भी रात्रि में इसी प्रकार का स्वप्न हुआ कि मानों विष्णु भगवान को वे उसी रूप में देख रहे हैं, जिस रूप में अब उनके सामने खड़े थे।

दोनों के स्वप्न के वृत्तान्त से अवगत होने के बाद दोनों एक-दूसरे को अपने निवास ले जाने का आग्रह करने लगे। नारायण ने कहा कि वैकुण्ठ चलो और भोलेनाथ कहने लगे कि कैलाश की ओर प्रस्थान किया जाए। दोनों के आग्रह में इतना अलौकिक प्रेम था कि यह निर्णय करना कठिन हो गया कि कहां चला जाए?

इतने में ही क्या देखते हैं कि वीणा बजाते, हरिगुण गाते नारद जी कहीं से आ निकले। बस, फिर क्या था? लगे दोनों उनसे निर्णय कराने कि कहां चला जाए? बेचारे नारदजी तो स्वयं परेशान थे, उस अलौकिक-मिलन को देखकर। वे तो स्वयं अपनी सुध-बुध भूल गये और लगे मस्त होकर दोनों का गुणगान करने। अब निर्णय कौन करे? अंत में यह तय हुआ कि भगवती उमा जो कह दें, वही ठीक है।

भगवती उमा पहले तो कुछ देर चुप रहीं। अंत में वे दोनों की ओर मुख करते हुए बोलीं, “हे नाथ, हे नारायण, आप लोगों के निश्चल, अनन्य एवं अलौकिक प्रेम को देखकर तो यही समझ में आता है कि आपके निवास अलग-अलग नहीं हैं, जो कैलाश है, वही वैकुण्ठ है और जो वैकुण्ठ है, वही कैलाश है, केवल नाम में ही भेद है। यहीं नहीं, मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि आपकी आत्मा भी एक ही है, केवल शरीर देखने में दो हैं।”

मुझे तो स्पष्ट लग रहा है कि आपकी पत्नियां भी एक ही हैं। जो मैं हूं, वही लक्ष्मी हैं और जो लक्ष्मी हैं, वही मैं हूं। केवल इतना ही नहीं, मेरी तो अब यह दृढ़ धारणा हो गई है कि आप लोगों में से एक के प्रति जो द्वेष करता है, वह मानों दूसरे के प्रति ही करता है। एक की जो पूजा करता है, वह मानों दूसरे की भी पूजा करता है। मैं तो तय समझती हूं कि आप दोनों में जो भेद मानता है, उसका चिरकाल तक घोर पतन होता है।

मैं देखती हूं कि आप मुझे इस प्रसंग में अपना मध्यस्थ बनाकर मानो मेरी प्रवंचना कर रहे हैं, मुझे असमंजस में डाल रहे हैं, मुझे भुला रहे हैं। अब मेरी यह प्रार्थना है कि आप लोग दोनों ही अपने-अपने लोक की ओर पधारिये। श्री विष्णु यह समझें कि हम शिव रूप में वैकुण्ठ जा रहे हैं और महेश्वर यह मानें कि हम विष्णु रूप में कैलाश-गमन कर रहे हैं।

इस उत्तर को सुनकर दोनों परम प्रसन्न हुए और भगवती उमा की प्रशंसा करते हुए, दोनों ने एक-दूसरे को प्रणाम किया और अत्यंत हर्षित होकर अपने-अपने लोक को प्रस्थान किया। लौटकर जब श्री विष्णु वैकुण्ठ पहुंचे तो श्रीलक्ष्मी जी ने उनसे प्रशन किया, “हे प्रभु, आपको सबसे अधिक प्रिय कौन है?”

भगवन बोले, “प्रिये, मेरे प्रियतम केवल श्रीशंकर हैं। देहधारियों को अपने देह की भांति वे मुझे अकारण ही प्रिय हैं। एक बार मैं और श्री शंकर दोनों पृथ्वी पर घूमने निकले। मैं अपने प्रियतम की खोज में इस आशय से निकला कि मेरी ही तरह जो अपने प्रियतम की खोज में देश-देशांतर में भटक रहा होगा, वही मुझे अकारण प्रिय होगा।

थोड़ी देर के बाद मेरी श्री शंकर जी से भेंट हो गई। वास्तव में मैं ही जनार्दन हूं और मैं ही महादेव हूं। अलग-अलग दो घड़ों में रखे हुए जल की भांति मुझमें और उनमें कोई अंतर नहीं है। शंकरजी के अतिरिक्त शिव की चर्चा करने वाला शिवभक्त भी मुझे अत्यंत प्रिय है। इसके विपरीत जो शिव की पूजा नहीं करते, वे मुझे कदापि प्रिय नहीं हो सकते।”

इस तरह जो शिव की पूजा करता है वह वैकुंठवासी विष्णु को भी स्वीकार है और जो श्री विष्णु की वंदना करता है, वह त्रिपुरारी को भी मना लेता है।
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आध्यात्मिक जीवन ,,,,,,
आत्मा के कल्याण की अनेक साधनायें हैं। सभी का अपना-अपना महत्त्व है और उनके परिणाम भी अलग-अलग हैं।
‘स्वाध्याय’ से ,,,,सन्मार्ग,,,,,, की जानकारी होती है।
‘सत्संग’ से ,,,,,,स्वभाव और संस्कार,,,,, बनते हैं। कथा सुनने से सद्भावनाएँ जाग्रत होती हैं।
‘तीर्थयात्रा’ से ,,,,,,,भावांकुर,,,,,, पुष्ट होते हैं।
‘कीर्तन’ से ,,,,,,,तन्मयता,,,,,, का अभ्यास होता है।
दान-पुण्य से ,,,,,,सुख-सौभाग्यों,,,,,, की वृद्धि होती है।
‘पूजा-अर्चना से ,,,,,,आस्तिकता,,,,,,, बढ़ती है।
@इस प्रकार यह सभी साधन ऋषियों ने बहुत सोच-समझकर प्रचलित किये हैं। पर ,,,,,,,,,,,,,,,,‘तप’ (परिश्रम ),,,,,,,,,,,,, का महत्त्व इन सबसे अधिक है। तप की अग्नि में पड़कर ही आत्मा के मल विक्षेप और पाप-ताप जलते हैं। तप के द्वारा ही आत्मा में वह प्रचण्ड बल पैदा होता है, जिसके द्वारा सांसारिक तथा आत्मिक जीवन की समस्याएँ हल होती हैं। तप की सामर्थ्य से ही नाना प्रकार की सूक्ष्म शक्तियाँ और दिव्य सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इसलिए तप साधन को सबसे शक्तिशाली माना गया है। तप के बिना आत्मा में अन्य किसी भी साधन से तेज प्रकाश बल एवं पराक्रम उत्पन्न नहीं होता।
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” जीवन का सत्य आत्मिक कल्याण है ना की भौतिक सुख !”
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जिस प्रकार मैले दर्पण में सूर्य देव का प्रकाश नहीं पड़ता है उसी प्रकार मलिन अंतःकरण में ईश्वर के प्रकाश का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता है अर्थात मलिन अंतःकरण में शैतान अथवा असुरों का राज होता है ! अतः ऐसा मनुष्य ईश्वर द्वारा प्रदत्त अनेक दिव्य सिद्धियों एवं निधियों का अधिकारी नहीं बन सकता है !
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“जब तक मन में खोट और दिल में पाप है, तब तक बेकार सारे मन्त्र और जाप है !”
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,,,,सच्चे संतो की वाणी से अमृत बरसता है , आवश्यकता है ,,,उसे आचरण में उतारने की ….
Note ; कृपया पोस्ट के साथ ही देवलोक गौशाला का page भी लाइक करें और हमेशा के लिए सत्संग का लाभ उठाएं ! देवलोक गौशाला सदैव आपको सन्मार्ग दिखाएगी और उस पर चलने के लिए प्रेरित करती रहेगी! ! सर्वदेवमयी यज्ञेश्वरी गौमाता को नमन
जय गौमाता की 🙏👏🌹🌲🌿🌹
शरीर परमात्मा का दिया हुआ उपहार है ! चाहो तो इससे ” विभूतिया ” (अच्छाइयां / पुण्य इत्यादि ) अर्जित करलो चाहे घोरतम ” दुर्गति ” ( बुराइया / पाप ) इत्यादि !
परोपकारी बनो एवं प्रभु का सानिध्य प्राप्त करो !
प्रभु हर जीव में चेतना रूप में विद्यमान है अतः प्राणियों से प्रेम करो !
शाकाहार अपनाओ , करुणा को चुनो !
choice is yours . 🚩🙏🙏🚩

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

(((( ईश्वर का आशीर्वाद ))))
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तीरथ नाम का एक कुम्हार जितना कमाता था, उससे उसका घर आसानी से चल जाता था.
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तीरथ को अधिक धन की चाह थी भी नहीं थी. वह दिन भर बर्तन बनाता. दोपहर में बर्तन बेचने जाता. शाम को घंटों बांसुरी बजाता.
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इसी तरह उसके दिन आनंद-उमंग में बीतते जा रहे थे. परिवार वालों ने तीरथ की एक सुंदर लड़की कल्याणी से शादी कर दी.
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कल्याणी जितनी सुंदर थी उतनी ही सुशील. वह पति के काम में हाथ बंटाती, घर भी संभालती. इससे तीरथ की कमाई पहले से काफी बढ़ गई.
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पति-पत्नी दोनों जीवन का आनंद ले रहे थे. उनके पड़ोसी तीरथ और कल्याणी दोनों को हमेशा खुश देखकर जलते थे.
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उन्हें जलन होती कि पति-पत्नी दोनों दिन भर मिलकर काम करते है, पति प्रतिदिन शाम को बांसुरी बजाता और पत्नी गीत गुनगुनाती रहती है. दोनों में झगड़ा भी नहीं होता.
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पड़ोस की महिलाओं द्वारा सिखाने पर एक दिन कल्याणी ने तीरथ से कहा- तुम जितना कमाते हो वह रोज खर्च हो जाता है.
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आमदनी बढ़ानी पड़ेगी. पड़ोसी घर खर्च में से कुछ न कुछ भविष्य के लिए बचाकर रखते हैं. हमें भी अपनी कमाई से बचत करनी चाहिए.
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तीरथ बोला- “हमें ज्यादा कमा कर क्या करना है ? ईश्वर ने हमें इतना कुछ दिया है, मैं इसी से संतुष्ट हूं. छोटा ही सही, पर हमारा अपना घर है.
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दोनों वक्त हम पेटभर खाते हैं, भगवान की पूजा-पाठ करते खुशी से जीवन बिता रहे हैं. हमें और क्या चाहिए ?”
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इस पर कल्याणी बोली – “ईश्वर का दिया हमारे पास सब कुछ है और मैं इससे खुश भी हूं. परन्तु आड़े वक्त के लिए भी हमें कुछ बचाकर रखना चाहिए.”
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कल्याणी के समझाने पर तीरथ मान गया. बचत करने के लिए दोनों पहले से अधिक मेहनत करने लगे.
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कल्याणी अब सुबह 4 बजे उठकर काम में लग जाती. तीरथ भी रात देर तक काम करता. लेकिन फिर भी दोनों अधिक बचत नहीं कर पाते.
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न तीरथ पहले की तरह बांसुरी बजाता न कल्याणी उसकी धुन पर गुनगुनाती. दोनों ने फैसला किया कि अपना सुख-चैन खोना उचित नहीं है.
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बचत का इरादा छोड़ वे पहले की तरह मस्त रहने लगे. एक दिन तीरथ बर्तन बेचकर बाजार से घर लौट रहा था.
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अचानक उसकी निगाह एक चमचमाती थैली पर गई. उसने थैली उठाई तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा. थैली में चांदी के सिक्के भरे थे.
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तीरथ ने सोचा कि यह थैली जरूर किसी की गिर गई है. वह थैली के मालिक को खोजने लगा.
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उसने चारों तरफ खोजबीन की लेकिन दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दिया. हारकर वह इसे ईश्वर का दिया उपहार समझकर घर ले आया.
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घर आकर तीरथ ने सारा किस्सा कल्याणी को कह सुनाया.
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तीरथ बोला- “तुम आड़े वक्त के लिए कुछ बचाकर रखना चाहती थी. सो ईश्वर ने ऐसे आड़े समय के लिए हमें यह उपहार दिया है.
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ईश्वर को धन्यवाद कर कल्याणी ने थौली खोलकर धन गिना. थैली में चांती के पूरे निन्यानवे सिक्के थे.
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दोनों खुश होकर विचार-विमर्श करने लगे. कल्याणी बोली- “इन्हें हमें आड़े समय के लिए रख लेना चाहिए.
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कल को परिवार बढ़ेगा तो खर्चे भी बढ़ेंगे. तीरथ बोला- “पर निन्यानवे तो शुभ नहीं है. क्यों न हम इसे पूरे सौ बना दें. फिर इन्हें भविष्य के लिए बचा कर रखे देंगे.
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दोनों जानते थे कि चांदी के निन्यानवे रुपये को सौ रुपये करना बहुत कठिन काम है. फिर भी दोनों ने इरादा पक्का किया.
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तीरथ और कल्याणी पहले से चौगुनी मेहनत करने लगे. तीरथ सुबह-सुबह बर्तन बेचने निकल जाता.
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शाम तक लौटता फिर बर्तन बनाता. काम खत्म होते देर रात हो जाती. कल्याणी दिन में बर्तन सुखाती और पकाती.
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इस तरह दोनों लोग थक कर चूर हो जाते. अब तीरथ बांसुरी नहीं बजाता न ही कल्याणी खुशी के गीत गुनगुनाती. उसे फुरसत ही नहीं थी.
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वह अड़ोस-पड़ोस या मोहल्ले में भी नहीं जा पाती थी. दिन-रात एक करके दोनों पैसे जोड़ रहे थे. पैसे बचाने के लिए उन्होंने एक वक्त का खाना भी छोड़ दिया.
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लेकिन चांदी के सौ रुपये पूरे ही नहीं हो पा रहे थे. इस तरह तीन महीने बीत गए.
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तीरथ के पड़ोसी खुसर-फुसर करने लगे कि इनके घर में जरूर कोई परेशानी है तभी तो दोनों दिन-रात काम करते हैं और थके-थके रहते हैं.
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किसी तरह छ: महीने बीतने पर उन्होंने सौ रुपये पूरे कर लिए.
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लेकिन चांदी का रुपया जोड़ने के चक्कर में तीरथ और कल्याणी को पैसे जोड़ने का लालच पड़ चुका था.
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दोनों को भविष्य के लिए सौ सिक्के कम लगने लगा. उन्होंने तय किया कि अच्छे भविष्य के लिए कम से कम सौ सिक्के और जोड़ने होंगे.
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उन्होंने आगे भी उसी तरह मेहनत जारी रखी. पैसे कमाने की धुन में पति-पत्नी में मामूली बातों पर किचकिच भी होने लगी.
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अगर एक बर्तन भी गलती से फूट जाता तो पति-पत्नी को उसमें बड़ा नुकसान दिखता. दोनों झगड़ने लगते. इधर पड़ोसियों की बेचैनी भी बढ़ती जा रही थी.
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एक पड़ोसन से न रहा गया. वह कल्याणी के घर की थाह लेने के लिए नजर रखने लगी.
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एक दोपहर को वह कल्याणी के घर जा धमकी. कल्याणी बर्तन बनाने में व्यस्त थी. उसने कल्याणी से पूछा कि वह पहले की तरह रोज शाम गुनगुनाती क्यों नहीं ?
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कल्याणी ने बात टालने की कोशिश की लेकिन पड़ोसन मानने वाली कहां थी.
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कल्याणी के मन की बात निकालने के लिए पड़ोसन पुचकारते हुए कहा- तुम बहुत थक जाती हो. मेरे पास समय रहता है. कहो तो मैं रोज तुम्हारी मदद कर दिया करूं.
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कल्याणी प्यार भरे शब्द सुनकर पिघल गई. उसने सारा किस्सा कह सुनाया.
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पड़ोसन जोर-जोर से हंसने लगी. उसे हंसता देखकर कल्याणी को गुस्सा आया. कल्याणी ने कहा- किसी की परेशानी पर खुश नहीं होना चाहिए. दूसरो के कष्ट पर हंसने वालों को ईश्वर पसंद नहीं करते.
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अब पड़ोसन की बारी थी. उसने कल्याणी से कहा-” बहन, तुम दोनों जिस चक्कर में पड़े उसमें पड़ा इंसान कहीं का नहीं रहता.
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उसके अच्छे गुण धीरे-धीरे खत्म हो जाते हैं. रोज बांसुरी बजाने वाला तुम्हारा पति बिना बात झगड़ता है.
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खुशी के गीत गानेवाली कल्याणी बांसुरी की जगह सिक्कों की खनक सुनना चाहती है. दोनों पेटभर भोजन नहीं करते.
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बहन तुम किस खुशी और किस भविष्य के लिए काम कर रही हो. कल्याणी को पड़ोसन की बात समझ में आ रही थी.
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पड़ोसन ने समझाया निन्यानवे का चक्कर छोड़ो. इस चक्कर में फंसकर तुमने ईश्वर के कई आशीर्वाद ठुकरा दिए.
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रोज भरपेट भोजन मिलना ईश्वर का बड़ा आशीर्वाद है, तुमने उसे ठुकराया. घर की सुख-शांति उससे भी बड़ा उपहार है- उसे भी गंवा दिया.
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पति-पत्नी के बीच प्रेम और ईश्वर की भक्ति में दिन बीतना गृहस्थ जीवन का सबसे बड़ा सुख है. तुम लोग इससे भी वंचित हो गए.
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अब खुद निर्णय करो कि तुम दोनों हाड़-तोड़ मेहनत से पा रहे हो या गंवा रहे हो. इसे ही तो कहते हैं निन्यान्वे का फेर.
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हे किशोरी जू ….
शिकवा नहीं शुकराना करना सीख गए,
तेरी संगत में खुद को झुकाना सीख गए।
पहले मायूस हो जाते थे कुछ ना मिलने पर,
अब तेरी रज़ा में राजी होना सीख गए।।
Thanks ((((((( जय जय श्री राधे )))))))

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

. “लालची सेठ” एक गरीब ब्राह्मण था। उसको अपनी कन्या का विवाह करना था। उसने विचार किया कि कथा करने से कुछ पैसा आ जायेगा तो काम चल जायेगा। ऐसा विचार करके उसने भगवान् राम के एक मंदिर में बैठ कर कथा आरम्भ कर दी। उसका भाव यह था कि कोई श्रोता आये, चाहे न आये पर भगवान् तो मेरी कथा सुनेंगे ! पंडित जी की कथा में थोड़े से श्रोता आने लगे। एक बहुत कंजूस सेठ था। एक दिन वह मंदिर में आया। जब वह मंदिर कि परिक्रमा कर रहा था, तब भीतर से कुछ आवाज आई। ऐसा लगा कि दो व्यक्ति आपस में बात कर रहे हैं। सेठ ने कान लगा कर सुना, भगवान् राम हनुमान जी से कह रहे थे कि इस गरीब ब्राह्मण के लिए सौ रूपए का प्रबंध कर देना, जिससे कन्यादान ठीक हो जाये। हनुमान जी ने कहा ठीक है महाराज ! इसके सौ रूपए कल हो जायेंगे। सेठ ने यह सुना तो वह कथा समाप्ति के बाद पंडित जी से मिले और उनसे कहा कि महाराज ! कथा में रूपए आ रहें कि नहीं ? पंडित जी बोले श्रोता बहुत कम आते हैं तो रूपए कैसे आयेंगे। सेठ ने कहा कि मेरी एक शर्त है- कथा में जितना पैसा आये वह मेरे को दे देना और मैं आप को पचास रूपए दे दूँगा। पंडित जी ने सोचा कि उसके पास कौन से इतने पैसे आते हैं पचास रूपए तो मिलेंगे, पंडित जी ने सेठ कि बात मान ली। उन दिनों पचास रूपए बहुत सा धन होता था। इधर सेठ कि नीयत थी कि भगवान् कि आज्ञा का पालन करने हेतु हनुमान जी सौ रूपए पंडित जी को जरूर देंगे। मुझे सीधे-सीधे पचास रूपए का फायदा हो रहा है। जो लोभी आदमी होते हैं वे पैसे के बारे में ही सोचते हैं। सेठ ने भगवान् जी कि बातें सुनकर भी भक्ति कि और ध्यान नहीं दिया बल्कि पैसे कि और आकर्षित हो गए। अब सेठ जी कथा के उपरांत पंडित जी के पास गए और उनसे कहने लगे कि कितना रुपया आया है। सेठ के मन विचार था कि हनुमान जी सौ रूपए तो भेंट में जरूर दिलवाएंगे। मगर पंडित जी ने कहा कि पांच सात रूपए ही आये हैं। अब सेठ को शर्त के मुताबिक पचास रूपए पंडित जी को देने पड़े। सेठ को हनुमान जी पर बहुत ही गुस्सा आ रहा था कि उन्हों ने पंडित जी को सौ रूपए नहीं दिए। वह मंदिर में गया और हनुमान जी कि मूर्ति पर घूँसा मारा। घूँसा मारते ही सेठ का हाथ मूर्ति पर चिपक गया। अब सेठ जोर लगाये अपना हाथ छुड़ाने के लिए पर नाकाम रहा हाथ हनुमान जी कि पकड़ में ही रहा। हनुमान जी किसी को पकड़ लें तो वह कैसे छूट सकता है। सेठ को फिर आवाज सुनाई दी। उसने ध्यान से सुना, भगवान् हनुमान जी से पूछ रहे थे कि तुमने ब्राह्मण को सौ रूपए दिलाये कि नहीं ? हनुमान जी ने कहा 'महाराज पचास रूपए तो दिला दिए हैं, बाकी पचास रुपयों के लिए सेठ को पकड़ रखा है। ये पचास रूपए दे देगा तो छोड़ देंगे'। सेठ ने सुना तो विचार किया कि मंदिर में लोग आकर मेरे को देखेंगे तो बड़ी बेईज्जती होगी, वह चिल्लाकर बोला- 'हनुमान जी महाराज ! मेरे को छोड़ दो, मैं पचास रूपय दे दूँगा।' हनुमान जी ने सेठ को छोड़ दिया। सेठ ने जाकर पंडित जी को पचास रूपए दे दिए। ----------::;×:::---------- "जय श्री राम"


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