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🌹🌹 अपने अन्दर का ताला खोलो 🌹🌹

एक राजा ने कबीर साहिब जी से प्रार्थना की किः

“आप दया करके मुझे साँसारिक बन्धनों से छुड़ा दो।”

तो कबीर जी ने कहाः

“आप तो हर रोज पंडित जी से कथा करवाते हो, सुनते भी हो…?”

“हाँ जी महाराज जी ! कथा तो कथावाचक जी रोज़ सुनाते हैं,

विधि विधान भी बतलाते हैं,

लेकिन अभी तक मुझे भगवान के दर्शन नहीं हुए ,आप ही कृपा करें।”

कबीर साहिब जी बोले

“अच्छा मैं कल कथा के वक्त आ जाऊँगा।”

अगले दिन कबीर जी वहाँ पहुँच गये, जहाँ राजा कथा सुन रहा था।

राजा उठकर श्रद्धा से खड़ा हो गया, तो कबीर जी बोले-

“राजन ! अगर आपको प्रभु का दर्शन करना है तो आपको मेरी हर आज्ञा का पालन करना पड़ेगा।”

“जी महाराज मैं आपका हर हुक्म मानने को तैयार हूँ जी !

राजन! अपने वजीर को हुक्म दो कि वो मेरी हर आज्ञा का पालन करे।”

राजा ने वजीर को हुक्म दिया कि कबीर साहिब जी जैसा भी कहें, वैसा ही करना।

कबीर जी ने वज़ीर को कहा कि एक खम्भे के साथ राजा को बाँध दो, और दूसरे खम्भे के साथ कथावाचक को बाँध दो। राजा ने तुरंत वजीर को इशारा किया कि आज्ञा का पालन हो। दोनों को दो खम्भों से बाँध दिया गया।

कबीर जी ने कथावाचक को कहा

“देखो, राजा साहब बँधे हुए हैं, उन्हें तुम खोल दो।”

वह हैरान हो कर बोला-

महाराज ! मैं तो खुद ही बँधा हुआ हूँ। उन्हें कैसे खोल सकता हूँ भला ?”

फिर कबीर जी ने राजा से कहाः

“ये ,तुम्हारे पुरोहित हैं। वे बँधे हुए हैं। उन्हें खोल दो।”

राजा ने बड़ी दीनता से कहा

“महाराज ! मैं भी बँधा हुआ हूँ, भला उन्हें कैसे खोलूँ ?”

तब कबीर साहिब जी ने सबको समझायाः

बँधे को बँधा मिले छूटे कौन उपाय

सेवा कर निर्बन्ध की, जो पल में लेत छुड़ाय

जो खुद ही कर्मों के बन्धनो में फँसा हुआ है,

जन्म-मरण के बन्धन से छूटा नहीं,

भला वो तुम्हें कैसे छुड़ा सकता है ।

अगर तुम सारे बंधनों से छूटना चाहते हो, तो

किसी ऐसे प्रभु के प्यारों के पास जाओ , जो जन्म-मरण के बंधनों से छूट चुका हो

केवल एक सन्त सद्गुरु ही सारे बन्धनों से आज़ाद होते हैं। वही हमें इस चौरासी के

जेलखाने से आज़ाद होने की चाबी देते हैं ।

परमात्मा के महल पर लगा ताला कैसे खुलेगा,

इसकी युक्ति भी समझाते हैं

जो उनका हुक्म मान कर हर रोज़ प्रेम से भजन बन्दग़ी करता है

वो सहज ही सचखंड में पँहुच जाता है।

प्रवीण भाटिया

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ओशो…

मैं एक यूनिवर्सिटी में पढ़ता था। मेरे जो वाइस—चांसलर थे, नए— नए आए थे। तो मैं उनसे मिलने गया। जैसे ही मैं उनसे मिलने पहुंचा, उन्होंने मुझसे कहा, कैसे आए? तो मैंने कहा, जाता हूं। क्योंकि किसी काम से नहीं आया। सिर्फ राम—राम करने आया।

उन्होंने कहा, क्या मतलब! वे थोड़े हैरान हुए कि पढ़ा—लिखा लडका, राम—राम करने! मैंने कहा, आप अजनबी आए हैं, नए—नए आए हैं। मैं आपके पड़ोस में ही हूं। पड़ोसी हैं। सिर्फ राम—राम करने आया। और अब कभी नहीं आऊंगा। क्योंकि मैंने यह नहीं सोचा था कि आप पूछेंगे, कैसे आए?

इसका मतलब यह है कि आपके पास जो लोग आते हैं, काम से ही आते हैं, कोई गैर—काम नहीं आता। और आप भी जिनके पास जाते होंगे, काम से ही जाते होंगे, गैर—काम नहीं जाते। तो आपकी जिंदगी फिजूल है। सिर्फ काम ही काम है या कुछ और भी है उसमें!

मैं तो चला गया कहकर; वे नाराज भी हुए होंगे, परेशान भी हुए होंगे, सोचते भी रहे होंगे। दूसरे दिन उन्होंने मुझे बुलवाया कि मैं रात सो नहीं सका। तुम्हारा क्या मतलब है? सच में मुझे ऐसा लगने लगा रात, उन्होंने मुझसे कहा, कि मैंने यह पूछकर ठीक नहीं किया कि कैसे आए?

मैंने भी कहा, कम से कम मुझे बैठ तो जाने देते। यह बात पीछे भी हो सकती थी। राम—राम तो पहले हो जाती। मुझे कुछ काम नहीं है और कभी आपसे कोई काम पड़ने का काम भी नहीं है। कोई प्रयोजन भी नहीं है। लेकिन हम सोच ही नहीं सकते.।

फिर तो उनसे मेरा काफी संबंध हो गया। लेकिन अब भी वे मुझे कभी मिलते हैं, तो वे कहते हैं, वह मैं पहला दिन नहीं भूल पाता, जिस दिन मैंने तुम से पूछ लिया कि कैसे आए? और तुमने कहा कि सिर्फ राम—राम करने आया, कुछ काम से नहीं आया। उस दिन से पहले मैंने कभी सोचा ही नहीं था कि बेकाम कोई आएगा!

जिंदगी हमारी धंधे जैसी हो गई है। सब काम है। उसमें प्रेम, उसमें कुछ खेल, उसमें कुछ सहज—नहीं, कुछ भी नहीं है।

स्वार्थरहित का अर्थ है, जीवन के उत्सव में सम्मिलित, अकारण। कोई कारण नहीं है, खुश हो रहे हैं। और सदा अपने को केंद्र नहीं बनाए हुए हैं। सारी दुनिया को सदा अपने से नहीं सोच रहे हैं, कि मेरे लिए क्या होगा! मुझे क्या लाभ होगा! मुझे क्या हानि होगी! हर चीज के पीछे अपने को खड़ा नहीं कर रहे हैं।

चौबीस घंटे में अगर दों—चार घंटे भी ऐसे आपकी जिंदगी में आ जाएं, तो आप पाएंगे कि धर्म ने प्रवेश शुरू कर दिया। और आपकी जिंदगी में कहीं से परमात्मा आने लगा। कभी अकारण कुछ करें। और अपने को केंद्र बनाकर मत करें।

सब का प्रेमी, हेतुरहित दयालु..।
दया तो हम करते हैं, लेकिन उसमें हेतु हो जाता है। और हेतु बड़े छिपे हुए हैं।

आप बाजार से निकलते हैं और एक भिखमंगा आपसे दो पैसे मांगता है। अगर आप अकेले हों और कोई न देख रहा हो, तो आप उसकी तरफ ध्यान नहीं देते। लेकिन अगर चार साथी साथ में हों, तो इज्जत का सवाल हो जाता है। अब दो पैसे के लिए मना करने में ऐसा लगता है कि लोग क्या सोचेंगे कि अरे, इतने कृपण! ऐसे कंजूस कि दो पैसे न दे सके?

भिखमंगा भी देखता है; अकेले में आपको नहीं छेड़ता। अकेले में आपसे निकालना मुश्किल है। चार आदमी देख रहे हों, भीड़ खड़ी हो, बाजार में हों, पकड़ लेता है पैर। आपको देना पड़ता है। भिखमंगे को नहीं, अपने अहंकार की वजह। हेतु है वहां, कि लोग देख लेंगे, तो समझेंगे कि चलो, दयावान है। देता है। या देते हैं कभी, तो उसके पीछे कोई पुण्य—अर्जन का खयाल होता है। देते हैं कभी, तो उसके पीछे किसी भविष्य में, स्वर्ग में पुरस्कार मिलेगा, उसका खयाल होता है।

लेकिन बिना किसी कारण, हेतुरहित दया, दूसरा दुखी है इसलिए! इसलिए नहीं कि आपको इससे कुछ मिलेगा। दूसरा दुखी है इसलिए, दूसरा परेशान है इसलिए अगर दें, तो दान घटित होता है। अगर आप किसी कारण से दे रहे हैं, जिसमें आपका ही कोई हित है.।

मैं गया था एक कुंभ के मेले में। तो कुंभ के मेले में पंडित और पुजारी लोगों को समझाते हैं कि यहां दो, जितना दोगे, हजार गुना वहा, भगवान के वहा मिलेगा। हजार गुने के लोभ में कई नासमझ दे फंसते हैं। हजार गुने के लोभ में! कि यहां एक पैसा दो, वहा हजार पैसा लो! यह तो धंधा साफ है। लेकिन देने के पीछे अगर लेने का कोई भी भाव हो, तो दान तो नष्ट हो गया, धंधा हो गया, सौदा हो गया।

कृष्ण कहते हैं, हेतुरहित दयालु अगर कोई हो, तो परमात्मा उसमें प्रवेश कर जाता है। वह परमात्मा को प्यारा है।
सब का प्रेमी।

प्रेम हम भी करते हैं। किसी को करते हैं, किसी को नहीं करते हैं। तो जिसको हम प्रेम करते हैं, उतना ही द्वार परमात्मा के लिए हमारी तरफ खुला है। वह बहुत संकीर्ण है। जितना बड़ा हमारा प्रेम होता है, उतना बड़ा द्वार खुला है। अगर हम सबको प्रेम करते हैं, तो सभी हमारे लिए द्वार हो गए, सभी से परमात्मा हममें प्रवेश कर सकता है।

लेकिन हम एक को भी प्रेम करते हैं, यह भी संदिग्ध है। सबको तो प्रेम करना दूर, एक को भी करते हैं, यह भी संदिग्ध है। उसमें भी हेतु है; उसमें भी प्रयोजन है। पत्नी पति को प्रेम कर रही है, क्योंकि वही सुरक्षा है, आर्थिक आधार है। पति पत्नी को प्रेम, कर रहा है, क्योंकि वही उसकी कामवासना की तृप्ति है। लेकिन यह सब लेन—देन है। यह सब बाजार है। इसमें प्रेम कहीं है नहीं।

जब आप प्रेम भी कर रहे हैं और प्रयोजन आपका ही है कुछ, तो वह प्रेम परमात्मा के लिए द्वार नहीं बन सकता। इसीलिए हम कुछ को प्रेम करते हैं, जिनसे हमारा स्वार्थ होता है। जिनसे हमारा स्वार्थ नहीं होता, उनको हम प्रेम नहीं करते। जिनसे हमारे स्वार्थ में चोट पड़ती है, उनको हम घृणा करते हैं।

मगर हमेशा केंद्र में मैं हूं। जिससे मेरा लाभ हो, उसे मैं प्रेम करता हूं; जिससे हानि हो, उसको घृणा करता हूं। जिससे कुछ भी न हो, उसके प्रति मैं तटस्थ हूं उपेक्षा रखता हूं उससे कुछ लेना—देना नहीं है।

परमात्मा के लिए द्वार खोलने का अर्थ है, सब के प्रति। लेकिन सब के प्रति कब होगा? वह तभी हो सकता है, जब मुझे प्रेम में ही आनंद आने लगे, स्वार्थ में नहीं। इस बात को थोड़ा समझ लें। जब मुझे प्रेम में ही आनंद आने लगे, प्रेम से क्या मिलता है, यह सवाल नहीं है।

कोई पत्नी है, उससे मुझे कुछ मिलता है, कोई बेटा है, उससे मुझे कुछ मिलता है। कोई मां है, उससे मुझे कुछ मिलता है। कोई पिता है, कोई भाई है, कोई मित्र है, उनसे मुझे कुछ मिलता है। उन्हें मैं प्रेम करता हूं र क्योंकि उनसे मुझे कुछ मिलता है। अभी मुझे प्रेम का आनंद नहीं आया। अभी प्रेम भी एक साधन है, और कुछ मिलता है, उसमें मेरा आनंद है।

लेकिन प्रेम तो खुद ही अदभुत बात है। उससे कुछ मिलने का सवाल ही नहीं है। प्रेम अपने आप में काफी है। प्रेम इतना बड़ा आनंद है कि उससे आगे कुछ चाहने की जरूरत नहीं है।

जिस दिन मुझे यह समझ में आ जाए कि प्रेम ही आनंद है, और यह मेरा अनुभव बन जाए कि जब भी मैं प्रेम करता हूं तभी आनंद घटित हो जाता है, आगे—पीछे लेने का कोई सवाल नहीं है। तो फिर मैं काहे को कंजूसी करूंगा कि इसको करूं और उसको न करूं?

फिर तो मैं खुले हाथ, मुक्त— भाव से, जो भी मेरे निकट होगा, उसको ही प्रेम करूंगा। वृक्ष भी मेरे पास होगा, तो उसको भी प्रेम करूंगा, क्योंकि वह भी आनंद का अवसर क्यों छोड़ देना! एक पत्थर मेरे पास होगा, तो उसको भी प्रेम करूंगा, क्योंकि वह भी आनंद का अवसर क्यों छोड़ देना!

जिस दिन आपको प्रेम में ही रस का पता चल जाएगा, उस दिन आप जो भी है, जहां भी है, उसको ही प्रेम करेंगे। प्रेम आपकी श्वास बन जाएगी।

आप श्वास इसलिए नहीं लेते हैं कि उससे कुछ मिलेगा। श्वास जीवन है; उससे कुछ लेने का सवाल नहीं है। प्रेम और गहरी श्वास है, आत्मा की श्वास है; वह जीवन है। जिस दिन आपको यह समझ में आने लगेगा, उस दिन आप प्रेम को स्वार्थ से हटा देंगे। और प्रेम तब आपकी सहज चर्या बन जाएगी।

गीता दर्शन–(भाग–6) प्रवचन–146

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असली शिक्षा

पढ़ाई पूरी करने के बाद एक छात्र किसी बड़ी कंपनी में नौकरी पाने की चाह में इंटरव्यू देने के लिए पहुंचा….

छात्र ने बड़ी आसानी से पहला इंटरव्यू पास कर लिया…

अब फाइनल इंटरव्यू
कंपनी के डायरेक्टर को लेना था…

और डायरेक्टर को ही तय
करना था कि उस छात्र को नौकरी पर रखा जाए या नहीं…

डायरेक्टर ने छात्र का सीवी (curricular vitae) देखा और पाया कि पढ़ाई के साथ- साथ यह छात्र ईसी (extra curricular activities) में भी हमेशा अव्वल रहा…

डायरेक्टर- “क्या तुम्हें पढ़ाई के दौरान
कभी छात्रवृत्ति (scholarship) मिली…?”

छात्र- “जी नहीं…”

डायरेक्टर- “इसका मतलब स्कूल-कॉलेज की फीस तुम्हारे पिता अदा करते थे..”

छात्र- “जी हाँ , श्रीमान ।”

डायरेक्टर- “तुम्हारे पिताजी क्या काम करते है?”

छात्र- “जी वो लोगों के कपड़े धोते हैं…”

यह सुनकर कंपनी के डायरेक्टर ने कहा- “ज़रा अपने हाथ तो दिखाना…”

छात्र के हाथ रेशम की तरह मुलायम और नाज़ुक थे…

डायरेक्टर- “क्या तुमने कभी कपड़े धोने में अपने पिताजी की मदद की…?”

छात्र- “जी नहीं, मेरे पिता हमेशा यही चाहते थे
कि मैं पढ़ाई करूं और ज़्यादा से ज़्यादा किताबें
पढ़ूं…

हां , एक बात और, मेरे पिता बड़ी तेजी से कपड़े धोते हैं…”

डायरेक्टर- “क्या मैं तुम्हें एक काम कह सकता हूं…?”

छात्र- “जी, आदेश कीजिए…”

डायरेक्टर- “आज घर वापस जाने के बाद अपने पिताजी के हाथ धोना…
फिर कल सुबह मुझसे आकर मिलना…”

छात्र यह सुनकर प्रसन्न हो गया…
उसे लगा कि अब नौकरी मिलना तो पक्का है,

तभी तो डायरेक्टर ने कल फिर बुलाया है…

छात्र ने घर आकर खुशी-खुशी अपने पिता को ये सारी बातें बताईं और अपने हाथ दिखाने को कहा…

पिता को थोड़ी हैरानी हुई…
लेकिन फिर भी उसने बेटे
की इच्छा का मान करते हुए अपने दोनों हाथ उसके
हाथों में दे दिए…

छात्र ने पिता के हाथों को धीरे-धीरे धोना शुरू किया। कुछ देर में ही हाथ धोने के साथ ही उसकी आंखों से आंसू भी झर-झर बहने लगे…

पिता के हाथ रेगमाल (emery paper) की तरह सख्त और जगह-जगह से कटे हुए थे…

यहां तक कि जब भी वह कटे के निशानों पर पानी डालता, चुभन का अहसास
पिता के चेहरे पर साफ़ झलक जाता था…।

छात्र को ज़िंदगी में पहली बार एहसास हुआ कि ये
वही हाथ हैं जो रोज़ लोगों के कपड़े धो-धोकर उसके
लिए अच्छे खाने, कपड़ों और स्कूल की फीस का इंतज़ाम करते थे…

पिता के हाथ का हर छाला सबूत था उसके एकेडैमिक कैरियर की एक-एक
कामयाबी का…

पिता के हाथ धोने के बाद छात्र को पता ही नहीं चला कि उसने उस दिन के बचे हुए सारे कपड़े भी एक-एक कर धो डाले…

उसके पिता रोकते ही रह गए , लेकिन छात्र अपनी धुन में कपड़े धोता चला गया…

उस रात बाप- बेटे ने काफ़ी देर तक बातें कीं …

अगली सुबह छात्र फिर नौकरी के लिए कंपनी के डायरेक्टर के ऑफिस में था…

डायरेक्टर का सामना करते हुए छात्र की आंखें गीली थीं…

डायरेक्टर- “हूं , तो फिर कैसा रहा कल घर पर ?
क्या तुम अपना अनुभव मेरे साथ शेयर करना पसंद करोगे….?”

छात्र- ” जी हाँ , श्रीमान कल मैंने जिंदगी का एक वास्तविक अनुभव सीखा…

नंबर एक… मैंने सीखा कि सराहना क्या होती है…
मेरे पिता न होते तो मैं पढ़ाई में इतनी आगे नहीं आ सकता था…

नंबर दो… पिता की मदद करने से मुझे पता चला कि किसी काम को करना कितना सख्त और मुश्किल होता है…

नंबर तीन.. . मैंने रिश्तों की अहमियत पहली बार
इतनी शिद्दत के साथ महसूस की…”

डायरेक्टर- “यही सब है जो मैं अपने मैनेजर में देखना चाहता हूं…

मैं यह नौकरी केवल उसे देना चाहता हूं जो दूसरों की मदद की कद्र करे,
ऐसा व्यक्ति जो काम किए जाने के दौरान दूसरों की तकलीफ भी महसूस करे…

ऐसा शख्स जिसने
सिर्फ पैसे को ही जीवन का ध्येय न बना रखा हो…

मुबारक हो, तुम इस नौकरी के पूरे हक़दार हो…”

आप अपने बच्चों को बड़ा मकान दें, बढ़िया खाना दें,
बड़ा टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर सब कुछ दें…

लेकिन साथ ही अपने बच्चों को यह अनुभव भी हासिल करने दें कि उन्हें पता चले कि घास काटते हुए कैसा लगता है ?

उन्हें भी अपने हाथों से ये काम करने दें…

खाने के बाद कभी बर्तनों को धोने का अनुभव भी अपने साथ घर के सब बच्चों को मिलकर करने दें…

ऐसा इसलिए
नहीं कि आप मेड पर पैसा खर्च नहीं कर सकते,
बल्कि इसलिए कि आप अपने बच्चों से सही प्यार करते हैं…

आप उन्हें समझाते हैं कि पिता कितने भी अमीर
क्यों न हो, एक दिन उनके बाल सफेद होने ही हैं…

सबसे अहम हैं आप के बच्चे किसी काम को करने
की कोशिश की कद्र करना सीखें…

एक दूसरे का हाथ
बंटाते हुए काम करने का जज्ब़ा अपने अंदर
लाएं…

यही है सबसे बड़ी सीख…………..

उक्त कहानी यदि पसंद आई हो तो अपने परिवार में सुनाएँ और अपने बच्चों को सर्वोच्च शिक्षा प्रदान कराये JAI Shri Krishna good morning

महेश शर्मा

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एक बार की बात है कि श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे।

रास्ते में अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा कि प्रभु – एक जिज्ञासा है मेरे मन में, अगर आज्ञा हो तो पूछूँ ?

श्री कृष्ण ने कहा – अर्जन, तुम मुझसे बिना किसी हिचक, कुछ भी पूछ सकते हो।

तब अर्जुन ने कहा कि मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई है कि दान तो मै भी बहुत करता हूँ परंतु सभी लोग कर्ण को ही सबसे बड़ा दानी क्यों कहते हैं ?

यह प्रश्न सुन श्री कृष्ण मुस्कुराये और बोले कि आज मैं तुम्हारी यह जिज्ञासा अवश्य शांत करूंगा।

श्री कृष्ण ने पास में ही स्थित दो पहाड़ियों को सोने का बना दिया।

इसके बाद वह अर्जुन से बोले कि हे अर्जुन इन दोनों सोने की पहाड़ियों को तुम आस पास के गाँव वालों में बांट दो।

अर्जुन प्रभु से आज्ञा ले कर तुरंत ही यह काम करने के लिए चल दिया।

उसने सभी गाँव वालों को बुलाया।

उनसे कहा कि वह लोग पंक्ति बना लें अब मैं आपको सोना बाटूंगा और सोना बांटना शुरू कर दिया।

गाँव वालों ने अर्जुन की खूब जय जयकार करनी शुरू कर दी।

अर्जुन सोना पहाड़ी में से तोड़ते गए और गाँव वालों को देते गए।

लगातार दो दिन और दो रातों तक अर्जुन सोना बांटते रहे।

उनमे अब तक अहंकार आ चुका था।

गाँव के लोग वापस आ कर दोबारा से लाईन में लगने लगे थे।

इतने समय पश्चात अर्जुन काफी थक चुके थे।

जिन सोने की पहाड़ियों से अर्जुन सोना तोड़ रहे थे, उन दोनों पहाड़ियों के आकार में जरा भी कमी नहीं आई थी।

उन्होंने श्री कृष्ण जी से कहा कि अब मुझसे यह काम और न हो सकेगा। मुझे थोड़ा विश्राम चाहिए।

प्रभु ने कहा कि ठीक है तुम अब विश्राम करो और उन्होंने कर्ण बुला लिया।

उन्होंने कर्ण से कहा कि इन दोनों पहाड़ियों का सोना इन गांव वालों में बांट दो।

कर्ण तुरंत सोना बांटने चल दिये।

उन्होंने गाँव वालों को बुलाया और उनसे कहा – यह सोना आप लोगों का है , जिसको जितना सोना चाहिए वह यहां से ले जाये।

ऐसा कह कर कर्ण वहां से चले गए।

यह देख कर अर्जुन ने कहा कि ऐसा करने का विचार मेरे मन में क्यों नही आया?

श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को शिक्षा

इस पर श्री कृष्ण ने जवाब दिया कि तुम्हे सोने से मोह हो गया था।
तुम खुद यह निर्णय कर रहे थे कि किस गाँव वाले की कितनी जरूरत है।

उतना ही सोना तुम पहाड़ी में से खोद कर उन्हे दे रहे थे।

तुम में दाता होने का भाव आ गया था।

दूसरी तरफ कर्ण ने ऐसा नहीं किया। वह सारा सोना गाँव वालों को देकर वहां से चले गए। वह नहीं चाहते थे कि उनके सामने कोई उनकी जय जयकार करे या प्रशंसा करे। उनके पीठ पीछे भी लोग क्या कहते हैं उस से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता।

यह उस आदमी की निशानी है जिसे आत्मज्ञान हांसिल हो चुका है।
इस तरह श्री कृष्ण ने खूबसूरत तरीके से अर्जुन के प्रश्न का उत्तर दिया, अर्जुन को भी अब अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था।

रामचंद्र आर्य

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તમે કોની સંગતમાં છો?

એક રાજા હતો. એ ખૂબ જ શક્તિશાળી હતો. એ જેટલા પણ યુદ્ધ લડતો હતો એ તમામ યુદ્ધ જીતી જતો હતો. એનું કારણ હતું એનો માનીતો હાથી. એનો હાથી ખૂબ જ હોશિયાર અને ચપળ હતો. હાથીની હોશિયારીને લીધે રાજા મોટાભાગના યુદ્ધ જીતી જતો હતો. એક વખત એવું બન્યું કે હાથી
નહાવા માટે તળાવમાં ગયો. હાથી ત્યાં તળાવના કીચડમાં ફસાઈ ગયો. ત્યાર બાદ હાથીએ નીકળવા માટે ઘણી કોશિશ કરી. પરંતુ હાથીથી નીકળી શકાયું નહીં. આથી નિરાશ બનીને હાથી તળાવના કાદવની અંદર બેસી ગયો.પછી કોઈ જાતની કોશિશ કરી નહીં. પછી કેટલાક માણસો એકત્ર થઈ ગયા એમણે જોયું કે હાથી કીચડમાં ફસાઈ ગયો છે અને નીકળવાની કોશિશ કરતો નથી. પછી બધા માણસોએ ભેગા થઈને હાથીને કાઢવા ખૂબ જ કોશિશ કરી. પરંતુ હાથી નીકળતો નહોતો.

ત્યારબાદ કેટલાક માણસોએ રાજાને હાથીના સમાચાર પહોંચાડ્યા. આ સમાચાર સાંભળીને
રાજા તાબડતોબ હાથીની પાસે આવ્યો. આવીને હાથીને કાઢવા માટે ખૂબ જ કોશિશ કરી જોઈ. પરંતુ સફળતા મળી નહીં.

ત્યારે રાજાના એક શાણા મંત્રીએ રાજાને સલાહ આપી કે મહારાજ તમે આ હાથીની સાથે ઘણા યુદ્ધો લડ્યા છો. આથી આ હાથી યુદ્ધનું સંગીત સારી રીતે સમજી શકે છે. આથી મારી આપને નમ્ર વિનંતી છે કે અત્યારે યુદ્ધ ચાલુ થઈ ગયું હોય એ પ્રકારના નગારા વગાડો. હું માનું છું કે એ નગારા સાંભળીને હાથીને ચોક્કસ અસર થશે. રાજાને આ વિચાર ગમી ગયો અને રાજાએ તાત્કાલિક માણસોને મોકલીને યુદ્ધના નગારા મંગાવ્યા.સૈનિકોને સુચના આપી કે યુદ્ધ ચાલુ થઈ ગયું હોય એવી રીતે નગારા વગાડો. રાજાની આજ્ઞા પ્રમાણે સૈનિકોએ યુદ્ધના નગારા વગાડવાના શરૂ કર્યા. જેવા યુદ્ધના નગારા હાથીને કાને પડ્યા કે યુદ્ધ શરૂ થઈ ગયું છે એમ સમજી પોતાની તમામ તાકાત લગાવીને કીચડમાંથી ઉભો થઈ ગયો અને જોર કરીને પાણીની બહાર આવી ગયો અને એનો જીવ બચી ગયો.

આ વાર્તાનો બોધપાઠ એ છે કે માણસને જો યોગ્ય રીતે મોટીવેશન આપવામાં આવે તો માણસની અંદર આશા અને ઉર્જાનો સંચાર પણ કરી શકાય
છે અને માણસ નવી શક્તિ મેળવીને નવેસરથી જીવન પણ જીવી શકે છે. મહત્વ છે મોટીવેશનનું અને સંગતનું.અન્યના આ વિચારોની મન પર શું અસર થાય છે એનું ઉત્તમ ઉદાહરણ છે.

કર્દમ ર. મોદી,
પાટણ
૮૨૩૮૦ ૫૮૦૯૪

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एक बार की बात है कि श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे।

रास्ते में अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा कि प्रभु – एक जिज्ञासा है मेरे मन में, अगर आज्ञा हो तो पूछूँ ?

श्री कृष्ण ने कहा – अर्जन, तुम मुझसे बिना किसी हिचक, कुछ भी पूछ सकते हो।

तब अर्जुन ने कहा कि मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई है कि दान तो मै भी बहुत करता हूँ परंतु सभी लोग कर्ण को ही सबसे बड़ा दानी क्यों कहते हैं ?

यह प्रश्न सुन श्री कृष्ण मुस्कुराये और बोले कि आज मैं तुम्हारी यह जिज्ञासा अवश्य शांत करूंगा।

श्री कृष्ण ने पास में ही स्थित दो पहाड़ियों को सोने का बना दिया।

इसके बाद वह अर्जुन से बोले कि हे अर्जुन इन दोनों सोने की पहाड़ियों को तुम आस पास के गाँव वालों में बांट दो।

अर्जुन प्रभु से आज्ञा ले कर तुरंत ही यह काम करने के लिए चल दिया।

उसने सभी गाँव वालों को बुलाया।

उनसे कहा कि वह लोग पंक्ति बना लें अब मैं आपको सोना बाटूंगा और सोना बांटना शुरू कर दिया।

गाँव वालों ने अर्जुन की खूब जय जयकार करनी शुरू कर दी।

अर्जुन सोना पहाड़ी में से तोड़ते गए और गाँव वालों को देते गए।

लगातार दो दिन और दो रातों तक अर्जुन सोना बांटते रहे।

उनमे अब तक अहंकार आ चुका था।

गाँव के लोग वापस आ कर दोबारा से लाईन में लगने लगे थे।

इतने समय पश्चात अर्जुन काफी थक चुके थे।

जिन सोने की पहाड़ियों से अर्जुन सोना तोड़ रहे थे, उन दोनों पहाड़ियों के आकार में जरा भी कमी नहीं आई थी।

उन्होंने श्री कृष्ण जी से कहा कि अब मुझसे यह काम और न हो सकेगा। मुझे थोड़ा विश्राम चाहिए।

प्रभु ने कहा कि ठीक है तुम अब विश्राम करो और उन्होंने कर्ण बुला लिया।

उन्होंने कर्ण से कहा कि इन दोनों पहाड़ियों का सोना इन गांव वालों में बांट दो।

कर्ण तुरंत सोना बांटने चल दिये।

उन्होंने गाँव वालों को बुलाया और उनसे कहा – यह सोना आप लोगों का है , जिसको जितना सोना चाहिए वह यहां से ले जाये।

ऐसा कह कर कर्ण वहां से चले गए।

यह देख कर अर्जुन ने कहा कि ऐसा करने का विचार मेरे मन में क्यों नही आया?

श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को शिक्षा

इस पर श्री कृष्ण ने जवाब दिया कि तुम्हे सोने से मोह हो गया था।
तुम खुद यह निर्णय कर रहे थे कि किस गाँव वाले की कितनी जरूरत है।

उतना ही सोना तुम पहाड़ी में से खोद कर उन्हे दे रहे थे।

तुम में दाता होने का भाव आ गया था।

दूसरी तरफ कर्ण ने ऐसा नहीं किया। वह सारा सोना गाँव वालों को देकर वहां से चले गए। वह नहीं चाहते थे कि उनके सामने कोई उनकी जय जयकार करे या प्रशंसा करे। उनके पीठ पीछे भी लोग क्या कहते हैं उस से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता।

यह उस आदमी की निशानी है जिसे आत्मज्ञान हांसिल हो चुका है।
इस तरह श्री कृष्ण ने खूबसूरत तरीके से अर्जुन के प्रश्न का उत्तर दिया, अर्जुन को भी अब अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था।

रामचंद्र आर्य

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🌷 ganpati bappa morya Ji🌷
अच्छेकर्म
एक बार की बात है कि कर्म और दौलत में बहस हो गई।
दौलत कहती कि मैं बडी हूँ किसी को भी कुछ भी बना सकती हूँ।और कर्म कहता मेरे बिना दौलत किसी काम की नही।
दौलत कहती कि चलो देखते है कि कौन बडा है।
कर्म भी मान गया दोनों चल पडे।
रास्ते में जंगल में एक बहुत गरीब आदमी लकडी काट रहा था, दौलत उसके पास गई और एक थैली सोने की मोहरे की दी और चली गई।
वो आदमी बहुत खुश हुआ और घर को चल पडा घर पहुंचा तो घर के गेट का दरवाजा बंद था, उसने थैली दीवार पर रखी और दरवाजा खोलने लगा दरवाजा खुलते ही वो अन्दर चला गया और मोहरे दीवार पर ही भूल गया।
और वो मोहरे पडोसी ने उठा ली।

अगले दिन फिर वो आदमी लकडी काटने चला गया।
दौलत फिर उसके पास गई और उसको एक हीरा दिया और चली गई।
उसने हीरा जेब में डाला और घर की ओर कर चल पडा रास्ते में उसको बहुत प्यास लगी और वो एक झरने के किनारे बैठ कर पानी पीने लगा तो हीरा जेब से निकल कर झरने मे गिर गया और एक मछली के पेट मे चला गया।

वो आदमी उदास होकर घर चला गया।

अगले दिन फिर वो लकडी काटने चला गया अब कर्म ने दौलत से कहा कि तुमने दो बार कोशिश की अब मैं कोशिश करता हूँ।
देखना इसके कैसे नसीब खुलते है कर्म ने उस आदमी को 10 पैसे दिए और चला गया।
आदमी बहुत खुश हुआ और वह घर को चल पडा और रास्ते में सोचता है कि दाल से रोटी तो रोज खाते है क्यूँ ना आज मछली से खाएं है।
यह सोच उसने बाजार से मछली खरीदी और घर जाकर जब मछली काटी तो उसमें से हीरा निकला हीरा देखकर वह बहुत खुश हुआ और चिल्लाने लगा कि मिल गया मिल गया पडोसी ने सुना और सोचा कि इसे पता चल कि वो मोहरे की थैली मैंने चुराई है और वो मेरे पास है।*
उसने वो थैली उस आदमी के घर फैक दी।
इस तरह उस आदमी को वह थैली भी मिल गई।

वह बहुत खुश हुआ और परमात्मा का शुक्र किया।

कर्म जीत गया औरदौलत हार गई सो हमे भी हमेशा अच्छे कर्म ही करने चाहिए।
क्योंकि अच्छे कर्मो से ही सतगुरु का प्यारऔरआशीर्वाद मिलता है।
और जहां सतगुरू का प्यार औरआशीर्वाद होता है वहां फिर किसी चीज़ की कमी नहीं रहती। है प्रभु

ऐसा क्या बोलूं कि तेरे दिल को छू जाए,
ऐसी किससे दुआ मांगू कि तू मेरा हो जाए।

💞 Jai shree ganesh deva jiे💞

माधव गोयल

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

Jai shree ram hanumantaye namah Ji
☝🏼एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके कर्म और भाग्य अलग अलग क्यों*
एक प्रेरक कथा …

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👇🏾 इस कथा से बोध अवश्य लेवे❗⬇

एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों की सभा बुलाकर प्रश्न किया-

मेरी जन्म पत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था मैं राजा बना, किन्तु उसी घड़ी मुहूर्त में अनेक जातकों ने जन्म लिया होगा जो राजा नहीं बन सके क्यों ..?

इसका क्या कारण है ?
राजा के इस प्रश्न से सब निरुत्तर हो गये ..
अचानक एक वृद्ध खड़े हुये बोले – महाराज आपको यहाँ से कुछ दूर घने जंगल में एक महात्मा मिलेंगे उनसे आपको उत्तर मिल सकता है..

☝🏼राजा ने घोर जंगल में जाकर देखा कि एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठ कर अंगार ( गरमा गरम कोयला ) खाने में व्यस्त हैं..
राजा ने महात्मा से जैसे ही प्रश्न पूछा महात्मा ने क्रोधित होकर कहा “तेरे प्रश्न का उत्तर आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं ,वे दे सकते हैं ।”

राजा की जिज्ञासा और बढ़ गयी, पहाड़ी मार्ग पार कर बड़ी कठिनाइयों से राजा दूसरे महात्मा के पास पहुंचा..

राजा हक्का बक्का रह गया ,दृश्य ही कुछ ऐसा था, वे महात्मा अपना ही माँस चिमटे से नोच नोच कर खा रहे थे..

राजा को महात्मा ने भी डांटते हुए कहा ” मैं भूख से बेचैन हूँ मेरे पास समय नहीं है…
आगे आदिवासी गाँव में एक बालक जन्म लेने वाला है ,जो कुछ ही देर तक जिन्दा रहेगा..
वह बालक तेरे प्रश्न का उत्तर दे सकता है..

राजा बड़ा बेचैन हुआ, बड़ी अजब पहेली बन गया मेरा प्रश्न..

उत्सुकता प्रबल थी..
राजा पुनः कठिन मार्ग पार कर उस गाँव में पहुंचा..
गाँव में उस दंपति के घर पहुंचकर सारी बात कही..

जैसे ही बच्चा पैदा हुआ दम्पत्ति ने नाल सहित बालक राजा के सम्मुख उपस्थित किया..

राजा को देखते ही बालक हँसते हुए बोलने लगा ..
राजन् ! मेरे पास भी समय नहीं है ,किन्तु अपना उत्तर सुन लो –
तुम,मैं और दोनों महात्मा सात जन्म पहले चारों भाई राजकुमार थे..
एक बार शिकार खेलते खेलते हम जंगल में तीन दिन तक भूखे प्यासे भटकते रहे ।
अचानक हम चारों भाइयों को आटे की एक पोटली मिली ।हमने उसकी चार बाटी सेंकी..

अपनी अपनी बाटी लेकर खाने बैठे ही थे कि भूख प्यास से तड़पते हुए एक महात्मा वहां आ गये..
अंगार खाने वाले भइया से उन्होंने कहा –
“बेटा ,मैं दस दिन से भूखा हूँ ,अपनी बाटी में से मुझे भी कुछ दे दो , मुझ पर दया करो , जिससे मेरा भी जीवन बच जाय …

इतना सुनते ही भइया गुस्से से भड़क उठे और बोले..

तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या खाऊंगा आग …? चलो भागो यहां से ….।

वे महात्मा फिर मांस खाने वाले भइया के निकट आये उनसे भी अपनी बात कही..

किन्तु उन भईया ने भी महात्मा से गुस्से में आकर कहा कि..
बड़ी मुश्किल से प्राप्त ये बाटी तुम्हें दे दूंगा तो क्या मैं अपना मांस नोचकर खाऊंगा ?
भूख से लाचार वे महात्मा मेरे पास भी आये..
मुझसे भी बाटी मांगी…
किन्तु मैंने भी भूख में धैर्य खोकर कह दिया कि
चलो आगे बढ़ो मैं क्या भूखा मरुँ …?

अंतिम आशा लिये वो महात्मा , हे राजन !..
आपके पास भी आये,दया की याचना की..
दया करते हुये ख़ुशी से आपने अपनी बाटी में से आधी बाटी आदर सहित उन महात्मा को दे दी ।
बाटी पाकर महात्मा बड़े खुश हुए और बोले..
तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा ।
बालक ने कहा “इस प्रकार उस घटना के आधार पर हम अपना अपना भोग, भोग रहे हैं…
और वो बालक मर गया

धरती पर एक समय में अनेकों फल-फूल खिलते हैं,किन्तु सबके रूप, गुण,आकार-प्रकार,स्वाद भिन्न होते हैं ..।

राजा ने माना कि शास्त्र भी तीन प्रकार के हॆ–
ज्योतिष शास्त्र, कर्तव्य शास्त्र और व्यवहार शास्त्र

जातक सब अपना
किया, दिया, लिया

ही पाते हैं..
यही है जीवन…
“गलत पासवर्ड से एक छोटा सा मोबाइल नही खुलता..

तो सोचिये ..

गलत कर्मो से जन्नत के दरवाजे कैसे खुलेंगे
Jai shree ram hanumantaye namah Ji

माधव गोयल

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Jai maa saraswati Ji Jai ho
Jai maa sharde ji jai ho
एक बार विचार अवश्य कीजिएगा।
क्या भगवान मौजूद है?
ये बिलकुल ऐसा ही है की एक गर्भ में बैठा हुआ छोटा बच्चा सवाल करे कि क्या माँ होती हैं अगर होती हैं तो अभी कहाँ हैं दिखती क्यों नहीं हैं !!
एक मां के पेट में दो बच्चे थे। एक ने दुसरे से पूछा:
“आप प्रसव के बाद जीवन में विश्वास करते हो?”
दूसरे ने कहा, “क्यों, बिल्कुल। प्रसव के बाद कुछ जरुर होगा । शायद हम बाद में क्या होगा,इस के लिए खुद को तैयार करने के लिए यहां हैं। “
“बकवास” पहले ने कहा। “प्रसव के बाद कोई जीवन नहीं है। यहाँ से बाहर किस तरह का जीवन हो सकता है? “दूसरा- मैं नहीं जानता, लेकिन यहाँ की तुलना में बाहर अधिक प्रकाश होगा! उस ने फिर कहा, “हो सकता है कि हम अपने पैरों के साथ चलेंगे और हमारे मुंह से खाना जाएगा। ये सब हो सकता है पर अभी हम नहीं समझ सकते कि अन्य इंद्रियों के साथ और क्या सब कर सकते हैं! “
पहले ने फिर कहा “!..यह बेतुका है, “। चलना असंभव है। और हमारे मुंह से खाना जायेगा ये सिर्फ हास्यास्पद हैं ! गर्भनाल पोषण की और वह सब कुछ आपूर्ति करती है जिसकी हमें जरूरत है। लेकिन गर्भनाल इतना छोटा है की प्रसव के बाद जीवन को तार्किक रूप से असंभव समझा जाना चाहिए “
दूसरे ने फिर जोर दिया की “”वैसे मेरे हिसाब से यहाँ से बाहर कुछ है और यह हो सकता है यहाँ की तुलना में अलग है,”‘ हो सकता है कि अब हमें इस गर्भनाल की जरूरत ही नहीं होगी। “
पहले ने कहा, “बकवास। जीवन अगर इसके अलावा हैं कहीं तो , फिर क्यों कोई भी कभी भी वहाँ से वापस नहीं आया है? डिलिवरी जीवन का अंत है, और उसके बाद जीवन में सिर्फ अंधेरा सन्नाटा और गुमनामी हैं “
“ठीक है, मैं नहीं जानता,”, दूसरा बोला , “लेकिन निश्चित रूप से हम माँ से मिलेंगे और वह हमारा ध्यान रखेगी “
“माँ “” आप वास्तव में माँ में विश्वास करते हैं? यह हास्यास्पद है। माँ अगर मौजूद है, तो वह अभी कहाँ हैं ? “पहले ने जोर देके कहा !!
दूसरे ने कहाँ वह हमारे चारों तरफ है, ” हम उससे घिरे हैं। हम उसके अन्दर ही रहते हैं उसके बिना इस दुनिया का अस्तित्व ही नहीं हो सकता हैं ।
पहले ने कहा: “तार्किकता के हिसाब से चूँकि हम उसे देख नहीं सकते इसलिए वह मौजूद भी नहीं हैं “
इस पर दूसरे बच्चे ने कहा कि आप जब मौन रहते हैं या जब आप ध्यान केंद्रित करते हैं तब आप उसकी उपस्थिति अनुभव कर सकते हैं, और दूर से आती उसकी आवाज़ भी सुन सकते हैं “।
इसी तरह भगवान भी है और हम तर्क वितर्क में फसे है उस परम शक्ति को सिर्फ प्रेम समर्पण से ही प्राप्त किया जा सकता है

🙏♥️ Jai maa saraswati Ji Jai ho♥️🙏

माधव गोयल

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श्रीकृष्ण अपने पैर का अंगूठा क्यों पीते थे ?

श्रीकृष्ण सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा हैं । यह सारा संसार उन्हीं की आनन्दमयी लीलाओं का विलास है । श्रीकृष्ण की लीलाओं में हमें उनके ऐश्वर्य के साथ-साथ माधुर्य के भी दर्शन होते हैं । ब्रज की लीलाओं में तो श्रीकृष्ण संसार के साथ बिलकुल बँधे-बँधे से दिखायी पड़ते हैं । उन्हीं लीलाओं में से एक लीला है बालकृष्ण द्वारा अपने पैर का अंगूठे पीने की लीला ।

श्रीकृष्णावतार की यह बाललीला देखने, सुनने अथवा पढ़ने में तो छोटी-सी तथा सामान्य लगती है किन्तु इसे कोई हृदयंगम कर ले और कृष्ण के रूप में मन लग जाय तो उसका तो बेड़ा पार होकर ही रहेगा क्योंकि ‘नन्हे श्याम की नन्ही लीला, भाव बड़ा गम्भीर रसीला ।’

श्रीकृष्ण की पैर का अंगूठा पीने की लीला का भाव
भगवान श्रीकृष्ण के प्रत्येक कार्य को संतों ने लीला माना है जो उन्होंने किसी उद्देश्य से किया । जानते हैं संतों की दृष्टि में क्या है श्रीकृष्ण के पैर का अंगूठा पीने की लीला का भाव ?

संतों का मानना है कि बालकृष्ण अपने पैर के अंगूठे को पीने के पहले यह सोचते हैं कि क्यों ब्रह्मा, शिव, देव, ऋषि, मुनि आदि इन चरणों की वंदना करते रहते हैं और इन चरणों का ध्यान करने मात्र से उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ? कैसे इन चरण-कमलों के स्पर्श मात्र से गौतमऋषि की पत्नी अहिल्या पत्थर की शिला से सुन्दर स्त्री बन गई ?

कैसे इन चरण-कमलों से निकली गंगा का जल (गंगाजी विष्णुजी के पैर के अँगूठे से निकली हैं अत: उन्हें विष्णुपदी भी कहते हैं) दिन-रात लोगों के पापों को धोता रहता है ? क्यों ये चरण-कमल सदैव प्रेम-रस में डूबी गोपांगनाओं के वक्ष:स्थल में बसे रहते हैं ? क्यों ये चरण-कमल शिवजी के धन हैं । मेरे ये चरण-कमल भूदेवी और श्रीदेवी के हृदय-मंदिर में हमेशा क्यों विराजित हैं ।

जे पद-पदुम सदा शिव के धन,सिंधु-सुता उर ते नहिं टारे।
जे पद-पदुम परसि जलपावन,सुरसरि-दरस कटत अघ भारे।।
जे पद-पदुम परसि रिषि-पत्नी,बलि-मृग-ब्याध पतित बहु तारे।
जे पद-पदुम तात-रिस-आछत,मन-बच-क्रम प्रहलाद सँभारि।।

भक्तगण मुझसे कहते हैं कि—

हे कृष्ण ! तुम्हारे चरणारविन्द प्रणतजनों की कामना पूरी करने वाले हैं, लक्ष्मीजी के द्वारा सदा सेवित हैं, पृथ्वी के आभूषण हैं, विपत्तिकाल में ध्यान करने से कल्याण करने वाले हैं ।

भक्तों और संतों के हृदय में बसकर मेरे चरण-कमल सदैव उनको सुख प्रदान क्यों करते हैं ? बड़े-बड़े ऋषि मुनि अमृतरस को छोड़कर मेरे चरणकमलों के रस का ही पान क्यों करते हैं । क्या यह अमृतरस से भी ज्22यादा स्वादिष्ट है ?

विहाय पीयूषरसं मुनीश्वरा,
ममांघ्रिराजीवरसं पिबन्ति किम्।
इति स्वपादाम्बुजपानकौतुकी,
स गोपबाल: श्रियमातनोतु व:।।

अपने चरणों की इसी बात की परीक्षा करने के लिये बालकृष्ण अपने पैर के अंगूठे को पीने की लीला किया करते थे ।

साभार

प्रसाद देवरानी