Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

काँच और हीरा…..
एक राजा का दरबार लगा हुआ था, क्योंकि सर्दी का दिन था इसलिये राजा का दरवार खुले मे लगा हुआ था.
पूरी आम सभा सुबह की धूप मे बैठी थी ..

महाराज के सिंहासन के सामने… एक शाही मेज थी…और उस पर कुछ कीमती चीजें रखी थीं.
पंडित लोग, मंत्री और दीवान आदि सभी दरबार मे बैठे थे और राजा के परिवार के सदस्य भी बैठे थे.. ..उसी समय एक व्यक्ति आया और प्रवेश माँगा..प्रवेश मिल गया तो उसने कहा

“मेरे पास दो वस्तुएं हैं,
मै हर राज्य के राजा के पास जाता हूँ और

अपनी वस्तुओं को रखता हूँ पर कोई परख नही पाता सब हार जाते है और मै विजेता बनकर घूम रहा हूँ”.. अब आपके नगर मे आया हूँ

राजा ने बुलाया और कहा “क्या वस्तु है”
तो उसने दोनो वस्तुएं….उस कीमती मेज पर रख दीं..वे दोनों वस्तुएं बिल्कुल समान आकार, समान रुप रंग, समान प्रकाश सब कुछ नख-शिख समान था..
… ..राजा ने कहा ये दोनो वस्तुएं तो एक हैं. तो उस व्यक्ति ने कहा हाँ दिखाई तो एक सी ही देती है लेकिन हैं भिन्न. इनमें से एक है बहुत कीमती हीरा और एक है काँच का टुकडा।
लेकिन रूप रंग सब एक है.

कोई आज तक परख नही पाया क़ि कौन सा हीरा है और कौन सा काँच का टुकड़ा..
कोइ परख कर बताये की….ये हीरा है और ये काँच.. अगर परख खरी निकली…तो मैं हार जाऊंगा और.. यह कीमती हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी मे जमा करवा दूंगा.
पर शर्त यह है क़ि यदि कोई नहीं पहचान पाया तो इस हीरे की जो कीमत है उतनी धनराशि आपको मुझे देनी होगी.. इसी प्रकार से मैं कई राज्यों से… जीतता आया हूँ..
राजा ने कहा मै तो नही परख सकूगा.. दीवान बोले हम भी हिम्मत नही कर सकते क्योंकि दोनो बिल्कुल समान है..
सब हारे कोई हिम्मत नही जुटा पा रहा था.. ..हारने पर पैसे देने पडेगे…इसका कोई सवाल नही था, क्योंकि राजा के पास बहुत धन था,

पर राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी, इसका सबको भय था..
कोई व्यक्ति पहचान नही पाया.. .. आखिरकार पीछे थोडी हलचल हुई

एक अंधा आदमी हाथ मे लाठी लेकर उठा.. उसने कहा मुझे महाराज के पास ले चलो…
मैने सब बाते सुनी है…और यह भी सुना है कि….कोई परख नही पा रहा है…एक अवसर मुझे भी दो.. .. एक आदमी के सहारे….वह राजा के पास पहुंचा..
उसने राजा से प्रार्थना की… मै तो जनम से अंधा हू…. फिर भी मुझे एक अवसर दिया जाये..

जिससे मै भी एक बार अपनी बुद्धि को परखूँ.. और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊं.. और यदि सफल न भी हुआ…
तो वैसे भी आप तो हारे ही है.. राजा को लगा कि….. इसे अवसर देने मे क्या हर्ज है… राजा ने कहा क़ि ठीक है.. तो तब उस अंधे आदमी को… दोनो चीजे छुआ दी गयी..
और पूछा गया….. इसमे कौन सा हीरा है….

और कौन सा काँच….?? .. यही तुम्हें परखना है.. ..
कथा कहती है कि….

उस आदमी ने एक क्षण मे कह दिया कि यह हीरा है और यह काँच.. ..जो आदमी इतने राज्यो को जीतकर आया था वह नतमस्तक हो गया.. और बोला…. “सही है
आपने पहचान लिया.. धन्य हो आप… अपने वचन के मुताबिक….. यह हीरा…..

मै आपके राज्य की तिजोरी मे दे रहा हूँ ” ..

सब बहुत खुश हो गये
और जो आदमी आया था वह भी बहुत प्रसन्न हुआ कि कम से कम कोई तो मिला परखने वाला.. उस आदमी, राजा और अन्य सभी लोगो ने उस अंधे व्यक्ति से एक ही जिज्ञासा जताई कि तुमने यह कैसे पहचाना कि यह हीरा है
और वह काँच.. .. उस अंधे ने कहा की सीधी सी बात है मालिक धूप मे हम सब बैठे है.. मैने दोनो को छुआ .. जो ठंडा रहा वह हीरा….. जो गरम हो गया वह काँच…

जीवन मे भी देखना…..
जो बात बात मे गरम हो जाये, उलझ जाये… वह व्यक्ति “काँच” हैं

और

जो विपरीत परिस्थिति मे भी ठंडा रहे…..

वह व्यक्ति “हीरा” है!!!!!!!

राम चन्द्र आर्य

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अच्छाई पलट-पलट कर आती रहती है…

ब्रिटेन के स्कॉटलैंड में फ्लेमिंग नाम का एक गरीब किसान था। एक दिन वह अपने खेत पर काम कर रहा था। अचानक पास में से किसी के चीखने की आवाज सुनाई पड़ी । किसान ने अपना साजो सामान व औजार फेंका और तेजी से आवाज की तरफ लपका।

आवाज की दिशा में जाने पर उसने देखा कि एक बच्चा दलदल में डूब रहा था । वह बालक कमर तक कीचड़ में फंसा हुआ बाहर निकलने के लिए संघर्ष कर रहा था। वह डर के मारे बुरी तरह कांप पर रहा था और चिल्ला रहा था।

किसान ने आनन-फानन में लंबी टहनी ढूंढी। अपनी जान पर खेलकर उस टहनी के सहारे बच्चे को बाहर निकाला।अगले दिन उस किसान की छोटी सी झोपड़ी के सामने एक शानदार गाड़ी आकर खड़ी हुई।उसमें से कीमती वस्त्र पहने हुए एक सज्जन उतरे

उन्होंने किसान को अपना परिचय देते हुए कहा- ” मैं उस बालक का पिता हूं और मेरा नाम राँडॉल्फ चर्चिल है।”

फिर उस अमीर राँडाल्फ चर्चिल ने कहा कि वह इस एहसान का बदला चुकाने आए हैं ।

फ्लेमिंग नामक उस किसान ने उन सज्जन के ऑफर को ठुकरा दिया ।
उसने कहा, “मैंने जो कुछ किया उसके बदले में कोई पैसा नहीं लूंगा।
किसी को बचाना मेरा कर्तव्य है, मानवता है , इंसानियत है और उस मानवता इंसानियत का कोई मोल नहीं होता ।”

इसी बीच फ्लेमिंग का बेटा झोपड़ी के दरवाजे पर आया।
उस अमीर सज्जन की नजर अचानक उस पर गई तो उसे एक विचार सूझा ।
उसने पूछा – “क्या यह आपका बेटा है ?”

किसान ने गर्व से कहा- “हां !”

उस व्यक्ति ने अब नए सिरे से बात शुरू करते हुए किसान से कहा- “ठीक है अगर आपको मेरी कीमत मंजूर नहीं है तो ऐसा करते हैं कि आपके बेटे की शिक्षा का भार मैं अपने ऊपर लेता हूं । मैं उसे उसी स्तर की शिक्षा दिलवाने की व्यवस्था करूंगा जो अपने बेटे को दिलवा रहा हूं।फिर आपका बेटा आगे चलकर एक ऐसा इंसान बनेगा , जिस पर हम दोनों गर्व महसूस करेंगे।”

किसान ने सोचा “मैं तो अपने पुत्र को उच्च शिक्षा दिला पाऊंगा नहीं और ना ही सारी सुविधाएं जुटा पाऊंगा, जिससे कि यह बड़ा आदमी बन सके ।अतः इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता हूँ।”

बच्चे के भविष्य की खातिर फ्लेमिंग तैयार हो गया ।अब फ्लेमिंग के बेटे को सर्वश्रेष्ठ स्कूल में पढ़ने का मौका मिला।
आगे बढ़ते हुए उसने लंदन के प्रतिष्ठित सेंट मेरीज मेडिकल स्कूल से स्नातक डिग्री हासिल की।
फिर किसान का यही बेटा पूरी दुनिया में “पेनिसिलिन” का आविष्कारक महान वैज्ञानिक सर अलेक्जेंडर फ्लेमिंग के नाम से विख्यात हुआ।

यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती! कुछ वर्षों बाद, उस अमीर के बेटे को निमोनिया हो गया ।
और उसकी जान पेनिसिलीन के इंजेक्शन से ही बची।
उस अमीर राँडाल्फ चर्चिल के बेटे का नाम था- विंस्टन चर्चिल , जो दो बार ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे !
हैं न आश्चर्यजनक संजोग।

इसलिए ही कहते हैं कि व्यक्ति को हमेशा अच्छे काम करते रहना चाहिए । क्योंकि आपका किया हुआ काम आखिरकार लौटकर आपके ही पास आता है ! यानी अच्छाई पलट – पलट कर आती रहती है!यकीन मानिए मानवता की दिशा में उठाया गया प्रत्येक कदम आपकी स्वयं की चिंताओं को कम करने में मील का पत्थर साबित होगा ।

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ये कहानी आपके जीने की सोच बदल देगी!

एक दिन एक किसान का बैल कुएँ में गिर गया।
वह बैल घंटों ज़ोर -ज़ोर से रोता रहा और किसान सुनता रहा और विचार करता रहा कि उसे क्या करना चाहिऐ और क्या नहीं।
अंततः उसने निर्णय लिया कि चूंकि बैल काफी बूढा हो चूका था अतः उसे बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था और इसलिए उसे कुएँ में ही दफना देना चाहिऐ।।
किसान ने अपने सभी पड़ोसियों को मदद के लिए बुलाया सभी ने एक-एक फावड़ा पकड़ा और कुएँ में मिट्टी डालनी शुरू कर दी।
जैसे ही बैल कि समझ में आया कि यह क्या हो रहा है वह और ज़ोर-ज़ोर से चीख़ चीख़ कर रोने लगा और फिर ,अचानक वह आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गया।
सब लोग चुपचाप कुएँ में मिट्टी डालते रहे तभी किसान ने कुएँ में झाँका तो वह आश्चर्य से सन्न रह गया..
अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े की मिट्टी के साथ वह बैल एक आश्चर्यजनक हरकत कर रहा था वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर एक कदम बढ़ाकर उस पर चढ़ जाता था।
जैसे-जैसे किसान तथा उसके पड़ोसी उस पर फावड़ों से मिट्टी गिराते वैसे -वैसे वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को गिरा देता और एक सीढी ऊपर चढ़ आता जल्दी ही सबको आश्चर्यचकित करते हुए वह बैल कुएँ के किनारे पर पहुंच गया और फिर कूदकर बाहर भाग गया ।
ध्यान रखे आपके जीवन में भी बहुत तरह से मिट्टी फेंकी जायेगी बहुत तरह की गंदगी आप पर गिरेगी जैसे कि ,
आपको आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई बेकार में ही आपकी आलोचना करेगा
कोई आपकी सफलता से ईर्ष्या के कारण आपको बेकार में ही भला बुरा कहेगा
कोई आपसे आगे निकलने के लिए ऐसे रास्ते अपनाता हुआ दिखेगा जो आपके आदर्शों के विरुद्ध होंगे…
ऐसे में आपको हतोत्साहित हो कर कुएँ में ही नहीं पड़े रहना है बल्कि साहस के साथ हर तरह की गंदगी को गिरा देना है और उससे सीख ले कर उसे सीढ़ी बनाकर बिना अपने आदर्शों का त्याग किये अपने कदमों को आगे बढ़ाते जाना है।
सकारात्मक रहे.. सकारात्मक जिए!
इस संसार में….
सबसे बड़ी सम्पत्ति “बुद्धि “
सबसे अच्छा हथियार “धैर्य”
सबसे अच्छी सुरक्षा “विश्वास”
सबसे बढ़िया दवा “हँसी” है
और आश्चर्य की बात कि “ये सब निशुल्क हैं “

सोच बदलो जिंदगी बदल जायेगी

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આજ એક મહાન વ્યક્તિની પુણ્યતિથિ દિવસ છે……

1800 પાદરના ધણી એવા મહારાજા સાહેબ શ્રી કૃષ્ણકુમારસિંહજી ગોહિલ જેમની ખાનદાની અને ખમીરની હુ શું વાત કરું પરંતુ મને એક નાનો એવો પ્રસંગ યાદ આવે છે….
આઝાદી પછીનાં સમય દરમ્યાન રજવાડાં એકત્રીકરણ માટે જ્યારે વલ્લભભાઈ પટેલ પોતે મહારાજા સાહેબ શ્રી કૃષ્ણકુમારસિંહજી ગોહિલ ને મળે છે ત્યારે વલ્લભભાઈ પટેલ અખંડિત અને એક ભારતની વાત જ્યારે મહારાજા સાહેબ શ્રી કૃષ્ણકુમારસિંહજી ગોહિલ ને કરે છે ત્યારે 1800 પાદરનાં ધણી પોતે સૌપ્રથમ પોતાનું રજવાડું વલ્લભભાઈ પટેલને સોંપે છે….

રજવાડું સોંપતી વખતે મહારાજા સાહેબ શ્રી કૃષ્ણકુમારસિંહજી ગોહિલ પોતે પોતાની બધી જ સંપત્તિ આપી દે પરંતું મહારાણી સાહેબ ના દાયજામાં આવેલ સંપત્તિ માટે મહારાણી સાહેબ ને એક નોકર દ્વારા પુછાવવામાં આવે ત્યારે મહારાણી સાહેબ નો જવાબ આવે છે….

“હાથી જતો હોય તો એનો શણગાર પણ સાથે જ જાય એને ઉતારવાનો ના હોય.. “

વાહ શું ખાનદાની !!

એક પ્રજાવત્સલ રાજવી મહારાજા સાહેબ શ્રી કૃષ્ણકુમારસિંહજી ગોહિલની આજે પુણ્યતિથિ દિન છે…..

આજ આ પ્રજા ને જે રાજા થકિ અખંડિત ભારતનું નિર્માણ થયું તે રાજવીને ભાવેનાની પ્રજા વતી. સત..સત… વંદન
પ્રજાવત્સલ રાજવી મહારાજા સાહેબ શ્રી કૃષ્ણકુમારસિંહજી ગોહિલ નું સુત્ર પણ હતું “મારી પ્રજાનું કલ્યાણ થજો”…મોહનભાઈ બોરીચા.. ભાવનગર

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साहिल स्कूल से आते ही मम्मी का मोबाइल लेकर गेम खेलना शुरू कर देेता या सोशल साइट्स पर चैटिंग करने लगता। एक बार वह खेलने बैठता, तो घंटों तक खेलता ही रहता। उसे न होमवर्क की चिंता रहती और न ही खाने की। फुटबॉल खेलना, गिटार बजाना और मोबाइल पर गेम खेलना उसकी हॉबी थी। पर अब वह सब कुछ भूलकर सुबह से लेकर शाम तक बस मोबाइल पर ही खेलता रहता।
मम्मी-पापा दोनों के मना करने के बावजूद साहिल नहीं मानता। अपनी इस आदत की वजह से वह पढ़ाई में भी पिछड़ता जा रहा था। फिजिकल एक्टिविटी न होने से उसका वजन भी लगातार बढ़ता जा रहा था। मम्मी चाहती थीं कि साहिल खेलने के साथ-साथ पढ़ाई और अपनी हेल्थ पर भी ध्यान दे। पर साहिल उनकी कोई बात मानने को तैयार ही नहीं था। मम्मी अब उसे समझाने के लिए कोई और तरीका सोच रही थीं।
परीक्षा खत्म हो चुकी थी। इस बार छुट्टियों में मम्मी-पापा साहिल को लेकर गांव जाने की योजना बना रहे थे। दरअसल मम्मी चाहती थीं कि साहिल इस बार छुट्टियां दादाजी के साथ बिताए। उनके साथ गांव घूमे। उनसे अच्छी आदतें सीखे और जैसे वे फिट रहते हैं, वैसे ही साहिल भी रहे।
छुट्टियों में साहिल भी मम्मी-पापा के साथ जाने को तैयार हो गया। उसने सोचा, ‘वहां जाकर तो मम्मी मुझे पढ़ाई के लिए टोकेंगी नहीं। मैं मजे से पूरा दिन मोबाइल पर खेलता रहूंगा। वाह! कितना मजा आएगा।’
मम्मी ने साहिल की मोबाइल पर खेलने की लत के बारे में दादाजी को पहले ही बता दिया था। उन्होंने भी साहिल को ‘वर्चुअल वर्ल्ड’ से निकालकर वास्तविक दुनिया में लाने और पढ़ाई तथा सेहत की ओर ध्यान दिलाने की पूरी तैयारी कर रखी थी।
छुट्टी होते ही साहिल मम्मी-पापा के साथ गांव पहुंचा। वहां पहुंचते ही दादाजी ने उसे गले लगा लिया। उसे अपने कमरे में ही रखा। सोते समय सुबह जल्दी उठकर अपने साथ सैर पर चलने को कहा। साहिल ने भी उनका मन रखने के लिए हां कह दिया।
अगले दिन सुबह जब साहिल नहीं उठा, तो दादाजी ने स्वयं जाकर उसे उठाया। जैसे-तैसे वह उठा और तैयार होकर दादाजी के साथ चल पड़ा। थोड़ी देर बाद घूमते-घूमते साहिल को भी मजा आने लगा। रास्ते में दादाजी ने उसे कई पंछी दिखाए और जब उनके नाम पूछे, तो साहिल बता नहीं पाया। दादाजी ने कहा, “बेटा, मैंने तो सुना है, तुम अपनी मम्मी का स्मार्ट फोन बहुत इस्तेमाल करते हो। क्या उस पर यह सब पता नहीं चलता?”
दादाजी की बात सुनकर साहिल को शर्मिंदगी महसूस हुई। दरअसल वह दादाजी को नहीं बता पाया कि वह तो बस मोबाइल पर गेम खेलता है या दोस्तों से चैटिंग करता है।
दादाजी ने रास्ते में साहिल को कई तरह के पेड़-पौधे, खेत-खलिहान और अपने गांव की नदी भी दिखाई। हालांकि नदी में पानी ज्यादा नहीं था। साहिल को सुबह का यह नजारा बहुत अच्छा लगा।
घर लौटते ही साहिल तो बिस्तर पर लेट गया और दादाजी ने आंगन में कसरत शुरू कर दी। उन्हें देखकर साहिल की आंखें खुली की खुली रह गईं। कुछ देर बाद साहिल की मम्मी उसके लिए नाश्ता ले आईं, तब जाकर साहिल को राहत मिली।
दो दिन बाद साहिल के ममेरे भाई अमित का जन्मदिन था। दादाजी ने आसपास के सभी बच्चों को घर बुला लिया था। पार्टी के लिए दादाजी ने पूरा इंतजाम कर रखा था।
बच्चों को घर आया देख साहिल भी कमरे से बाहर आ गया और उनके साथ खेलने लगा। सब बच्चों ने खूब मस्ती की। साहिल को उनके साथ बहुत मजा आ रहा था। इस तरह की मस्ती उसने बहुत समय बाद की थी। पार्टी के बाद सब बच्चे अपने-अपने घर जाने लगे, तोे दादाजी ने सबको अगले दिन शाम को फिर आने को कहा।
दरअसल अगले दिन दादाजी ने बच्चों के लिए ‘वन मिनिट गेम’ और ‘कविता प्रतियोगिता’ रखी थी, जिसमें विजेता को पुरस्कार भी मिलने वाला था। प्रतियोगिता का निर्णय करने के लिए दादाजी ने अपने कुछ दोस्तों को भी बुलाया था।
शाम को जब बच्चे घर पर इकट्ठे हो गए, तो साहिल ने केवल ‘वन मिनिट गेम’ में हिस्सा लिया। वह सोचने लगा, ‘जब मैं तीसरी कक्षा में था, तो स्कूल में हर बार कविता प्रतियोगिता में भाग लेता था। कभी मैं खुद अपनी लिखी कविता सुनाता था, तो कभी मम्मी मुझे प्रतियोगिता की तैयारी करवाती थीं। कई बार तो मुझे पहला पुरस्कार भी मिला। पर अब अपने घर में कविता प्रतियोगिता है, तो मैं भाग नहीं ले पा रहा हूं।’
साहिल की समझ में नहीं आ रहा था कि कौन सी कविता सुनाए। जब बाकी बच्चे अपनी कविता सुना रहे थे, तब साहिल सोच रहा था, ‘जब से मैंने मोबाइल पर गेम खेलना शुरू किया है तब से ही मैंने पढ़ाई और स्कूल की एक्टिविटी पर ध्यान देना बंद कर दिया है। और तो और, अब मैं घर आकर मम्मी को बताता तक नहीं हंू कि स्कूल में कब क्या चल रहा है।’ अब साहिल ने मन ही मन तय कर लिया था कि वह मोबाइल पर इतनी ज्यादा देर तक नहीं खेलेगा।
कविता प्रतियोगिता समाप्त होने के बाद दादाजी ने तीन विजेताओं को ईनाम दिया। फिर सबने खूब डांस किया और खाना खाने के बाद अपने-अपने घर लौट गए।
कुछ दिनों बाद साहिल भी मम्मी-पापा के साथ शहर वापस आ गया। गांव से आने के बाद साहिल बदल चुका था। अब वह अपनी पढ़ाई के साथ-साथ सेहत पर भी ध्यान देने लगा था। वह रोज होमवर्क करने के बाद पार्क में घूमने जाने लगा।
एक हफ्ते बाद जब मम्मी दादाजी से फोन पर बात कर रही थीं तो उसने सुना कि मम्मी कह रही हैं, “थैंक्स पापाजी! आपका प्लान काम कर गया।”
साहिल को गांव जाने और दादाजी की पूरी योजना को समझने में देर नहीं लगी। वह कमरे से बाहर आया और मम्मी के गले लग गया। फिर बोला, “आप दुनिया की सबसे अच्छी मम्मी हो। मुझे फिर से पहले जैसा साहिल बनाने के लिए थैंक्स मम्मी।”

रामचंद्र आर्य

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अत्यंत गंभीर एवं विचारणीय बिन्दु है.

एक बार एक 100 लोगों के होस्टल के कैंटीन वाले के रोज रोज नाश्ते में उपमा बना देने से परेशान 80 लोगों ने होस्टल वार्डन से शिकायत की और बदल बदल के नाश्ता देने को कहा…
100 में से सिर्फ 20 लोग ही ऐसे थे जिनको उपमा बहुत पसंद था और वो लोग चाहते थे कि उपमा तो रोज ही बने,बाकी के 80 लोग कुछ अलग चाहते थे…

वार्डन फैसला किया कि वोटिंग करवाई जाये…
और..
जिस चीज को सबसे ज्यादा वोट मिलें,वही रोज बनाया जाये….

वोटिंग हुई…

उन 20 लोगो ने जिनको उपमा बहुत पसंद था,उपमा के लिए वोट किया,बाकी बचे 80 लोगो ने आपस में कोई सामंजस्य नहीं रखा और कोई वार्तालाप भी नहीं किया और अपनी बुद्धि, विवेक एवं टेस्ट के हिसाब से वोट दिया…
अब उनमें से 18 लोगों ने डोसा चुना..
16 ने परांठा…
14 ने रोटी…
12 ने ब्रेड बटर…
10 ने नूडल्स..
और 10 ने पूरी सब्जी के लिये वोट दिया…

अब सोचो,क्या हुआ होगा…???
उस कैंटीन में वो 80 लोग आज भी रोज उपमा खा रहे हैं…

समझे………….
मतलब…………..
It means………..
कुछ समझे……………?

आऒ, सिम्पल तरीके से समझाता हूँ…………
जब तक हम 80% आपस में ही लड़ते रहेंगे
तब तक 20% वालों का ही वर्चस्व रहेगा..!!!
समझदार बंधुगण मैसेज का भावार्थ समझ गये होंगे

राम चन्द्र आर्य

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લાલ_ઝંડી

ઉમેદનું કદાવર શરીર.. પોતાની કુળદેવીનો ભુવો , એટલે ચોટલી રાખે.. અને લગભગ ટકો જ કહેવાય , એટલા ટુંકા વાળ રાખે.. રેલ્વે જંકશનમાં એને બધા ભુવાના નામથી જ ઓળખે..
એ રેલ્વેમાં ખલાસી હતો.. પાટા તપાસના ઈજનેરની હાથગાડીને ધક્કો મારવાની એની નોકરી.. આ કામમાં બેની જોડી હોય.. ઉમેદ લોંઠકો એવો કે બીજા ખલાસી એની જોડીમાં આવવાનું વધારે પસંદ કરે..
ઉમેદ વાતોડિયો પણ એવો.. જંકશનના પ્લેટફોર્મ પછી પાટાની લાઈનો.. અને એ પછી થોડે દુર ઘણી ઓરડીઓ.. એમાં એક ઓરડી ઉમેદની.. એની ઓરડી સામે પીપળનું ઝાડ હતું , તેની નીચે ખાટલો નાખીને એની બેઠક.. એ બેઠો હોય ત્યારે બીજા બે ત્રણ જણા પણ પોતાનાો ખાટલો લાવીને ગોઠવાઈ ગયા હોય..
ઉમેદની ઘરવાળી ઉજી.. ઉજીનો ખોળો જાજા વરસે ભરાયો હતો.. દિકરી થઈ.. ઉમેદ એને માતાજીની દીધેલ માનતો.. અને નામ પાડ્યું હતું ” અંબા..”


પાટાના ઈજનેરને મશીન વાળી ગાડીઓ આવી.. એટલે એ કામમાંથી બઢતી આપી ઉમેદને શન્ટર બનાવ્યો.. શન્ટર એટલે જંકશનમાં ગાડી કે માલગાડીના ડબા જોડવા છોડવાનું કામ..
એન્જીન પાછું ચાલીને ડબો લઈ આવતું હોય.. ઉમેદ ઉભેલા ડબા પાસે ઉભો રહે.. હાથમાં લાલ લીલી ઝંડી હોય.. મોઢામાં વધારે અવાજ કરે તેવી સીસોટી હોય.. ઝંડી હલાવીને ડ્રાયવરને આવવાની કે રોકાવાની સુચના આપે.. સાંધો થઈ જાય એટલે લીલી ઝંડી બતાવે અને સીસોટી વગાડી કામ થઈ ગયાની નિશાની આપે..


અંબા આઠેક વરસની થઈ હતી.. ઉમેદ નોકરી પર હતો.. એની ઓરડીની સામે જ શન્ટીંગ ચાલતું હતું.. આજે થોડા જ ડબા હતા.. કામ પતાવી એ જંકશનમાંથી સીધો શહેરમાં ખરીદી કરવા જવાનો હતો..
ઉજીનો ભાઈ કંઈ કામે શહેરમાં આવ્યો હતો.. એટલે બેન બનેવીને મળવા આવ્યો.. તે જાજીવાર રોકાવાનો હતો નહીં..
ઓરડીની સામે જ , પણ દુર ઉમેદ દેખાતો હતો.. ઉજીએ અંબાને સમાચાર દેવા મોકલી કે.. ” તમે પહેલાં ઘરે આવજો , પછી શહેરમાં જજો..”
પાટા કુદતી કુદતી અંબા ગઈ.. આ એની રોજની આદત હતી..ઉમેદ લીલી ઝંડી હલાવી રહ્યો હતો.. ઉંધે મોંએ એન્જીન ડબો લઈને આવી રહ્યું હતું.. એક તરફ ઉમેદ હતો .. વચ્ચે પાટા.. અને બીજી તરફ અંબા.. અંબાને એમ કે ડબો આવે તે પહેલાં પોતે બાપુજી પાસે પહોંચી જશે.. પણ..
પણ.. એ ના પહોંચી શકી.. બે ડબાના તોતીંગ બમ્પર વચ્ચે ભીંસાઈ ગઈ..
પોતાની નજર સામે થયેલી ઘટના ઉમેદથી સહન થઈ નહીં.. એણે માનસિક સમતુલા ગુમાવી દીધી.. એને પેન્શન પર ઉતારી દેવામાં આવ્યો.. પાગલ ઉમેદને ઉજી વતનના ગામમાં લઈ ગઈ..
આજે પણ ઉમેદ લાલઝંડી બગલમાં દબાવીને રાખે છે.. ગામમાં ફરે છે.. ને કોઈ નાનું છોકરું રસ્તો ઓળંગતું હોય , ત્યાં વચ્ચે ઉભો રહી લાલઝંડી હલાવે છે..
પણ હવે તેની લાલઝંડીને કોઈ ગણકારતું નથી..

  • જયંતીલાલ ચૌહાણ ૩-૬-૨૧
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आज का अमृत
एक जादूगर जो मृत्यु के करीब था, मृत्यु से पहले अपने बेटे को चाँदी के सिक्कों से भरा थैला देता है और बताता है की “जब भी इस थैले से चाँदी के सिक्के खत्म हो जाएँ तो मैं तुम्हें एक प्रार्थना बताता हूँ, उसे दोहराने से चाँदी के सिक्के फिर से भरने लग जाएँगे । उसने बेटे के कान में चार शब्दों की प्रार्थना कही और वह मर गया । अब बेटा चाँदी के सिक्कों से भरा थैला पाकर आनंदित हो उठा और उसे खर्च करने में लग गया । वह थैला इतना बड़ा था की उसे खर्च करने में कई साल बीत गए, इस बीच वह प्रार्थना भूल गया । जब थैला खत्म होने को आया तब उसे याद आया कि “अरे! वह चार शब्दों की प्रार्थना क्या थी ।” उसने बहुत याद किया, उसे याद ही नहीं आया ।

अब वह लोगों से पूँछने लगा । पहले पड़ोसी से पूछता है की “ऐसी कोई प्रार्थना तुम जानते हो क्या, जिसमें चार शब्द हैं । पड़ोसी ने कहा, “हाँ, एक चार शब्दों की प्रार्थना मुझे मालूम है, “ईश्वर मेरी मदद करो ।” उसने सुना और उसे लगा की ये वे शब्द नहीं थे, कुछ अलग थे । कुछ सुना होता है तो हमें जाना-पहचाना सा लगता है । फिर भी उसने वह शब्द बहुत बार दोहराए, लेकिन चाँदी के सिक्के नहीं बढ़े तो वह बहुत दुःखी हुआ । फिर एक फादर से मिला, उन्होंने बताया की “ईश्वर तुम महान हो” ये चार शब्दों की प्रार्थना हो सकती है, मगर इसके दोहराने से भी थैला नहीं भरा । वह एक नेता से मिला, उसने कहा “ईश्वर को वोट दो” यह प्रार्थना भी कारगर साबित नहीं हुई । वह बहुत उदास हुआ ।

उसने सभी से मिलकर देखा मगर उसे वह प्रार्थना नहीं मिली, जो पिताजी ने बताई थी । वह उदास होकर घर में बैठा हुआ था तब एक भिखारी उसके दरवाजे पर आया । उसने कहा, “सुबह से कुछ नहीं खाया, खाने के लिए कुछ हो तो दो ।” उस लड़के ने बचा हुआ खाना भिखारी को दे दिया । उस भिखारी ने खाना खाकर बर्तन वापस लौटाया और ईश्वर से प्रार्थना की, “हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद ।” अचानक वह चोंक पड़ा और चिल्लाया की “अरे! यही तो वह चार शब्द थे ।” उसने वे शब्द दोहराने शुरू किए-“हे ईश्वर तुम्हारा धन्यवाद”……..और उसके सिक्के बढ़ते गए… बढ़ते गए… इस तरह उसका पूरा थैला भर गया ।
इससे समझें की जब उसने किसी की मदद की तब उसे वह मंत्र फिर से मिल गया । “हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद ।” यही उच्च प्रार्थना है क्योंकि जिस चीज के प्रति हम धन्यवाद देते हैं, वह चीज बढ़ती है । अगर पैसे के लिए धन्यवाद देते हैं तो पैसा बढ़ता है, प्रेम के लिए धन्यवाद देते हैं तो प्रेम बढ़ता है । ईश्वर या गुरूजी के प्रति धन्यवाद के भाव निकलते हैं की ऐसा ज्ञान सुनने तथा पढ़ने का मौका हमें प्राप्त हुआ है । बिना किसी प्रयास से यह ज्ञान हमारे जीवन में उतर रहा है वर्ना ऐसे अनेक लोग हैं, जो झूठी मान्यताओं में जीते हैं और उन्हीं मान्यताओं में ही मरते हैं । मरते वक्त भी उन्हें सत्य का पता नहीं चलता । उसी अंधेरे में जीते हैं, मरते हैं ।

ऊपर दी गई कहानी से समझें की “हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद” ये चार शब्द, शब्द नहीं प्रार्थना की शक्ति हैं । अगर यह चार शब्द दोहराना किसी के लिए कठिन है तो इसे तीन शब्दों में कह सकते हैं, “ईश्वर तुम्हारा धन्यवाद ।” ये तीन शब्द भी ज्यादा लग रहे हों तो दो शब्द कहें, “ईश्वर धन्यवाद !” और दो शब्द भी ज्यादा लग रहे हों तो सिर्फ एक ही शब्द कह सकते हैं, “धन्यवाद ।” आइए, हम सब मिलकर एक साथ धन्यवाद दें उस ईश्वर को, जिसने हमें मनुष्य के रूप में जन्म दिया।
🌹नारायण सेवा ज्योतिष संस्थान🌹

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मैं जब छोटा था तो मेरे गांव में बहुत मदारी आते थे। फिर पता नहीं मदारी कहां चले गए! फिर मैं पूछने लगा कि मदारियों का क्या हुआ? मेरे गांव के बीच में ही बाजार है। उस बाजार में एक ही काम होता था: सुबह-शाम डमरू बज जाता। मदारी आते ही रहते, भीड़ इकट्ठी होती रहती। वही बकवास–कि जमूरे, नाचेगा? और जमूरा कहता–नहीं। और मदारी कहता–लड्डू खिलाएंगे, नाचेगा? वह कहता–नहीं।
बर्फी खिलाएंगे, नाचेगा?
वह कहता–नहीं!

ऐसा मदारी कहता ही चला जाता। आखिर में वह उसको राजी कर लेता कि नाचेगा। बस इसी बीच डमरू बजता रहता, और जमूरे से पूछताछ चलती रहती और भीड़ इकट्ठी होती रहती। उस भीड़ में मैंने पढ़े-लिखे लोग देखे, दुकानदार देखे, डाक्टर देखे, वैद्य देखे, पंडित देखे, पुरोहित देखे। बच्चे इकट्ठे होते थे, यह तो ठीक था; मैंने बड़ों को भी इकट्ठे देखा।

फिर धीरे-धीरे मदारी नदारद हो गए। उन्नीस सौ सैंतालीस के बाद मदारियों का पता ही नहीं। सब बंदर, सब मदारी, सब डमरू दिल्ली चले गए।
आते हैं पांच साल में, जब चुनाव का वक्त आता है, तब वे डमरू बजाते हैं –कि जमूरे, नाचेगा? जमूरा कहता है कि नहीं। नाचने का मतलब–वोट देगा? कि जमूरे, वोट देगा? जमूरा कहता है–नहीं। कि लड्डू खिलाएंगे, वोट देगा? नहीं। नगद रुपये लेगा। नगद नोट देख कर लेगा कि असली है कि नकली।

–इसी तरह बंदरों का नचाना और डमरू का बजाना! और सब मदारी दिल्ली में इकट्ठे हो गए हैं। इसलिए तो आजकल जगह-जगह मदारी नहीं दिखाई पड़ते। फिर पांच साल के लिए सब मदारी नदारद हो जाते हैं।

प्रेम सदा से चुप है। अहंकार खूब ढोल बजाता है, डुंडी पीटता है, बड़ा शोरगुल करता है। भीड़ जो इकट्ठी करनी है। तुम देखते हो, कोई मदारी खड़ा हो जाए बाजार में आकर। इधर डमरू बजाया उसने, इधर बंदर नचाया उसने, कि बस लोग आने लगे। दिशाओं-दिशाओं से लोग इकट्ठे होने लगते हैं। कोई हो मदारी, कोई हो बंदर, कोई डमरू बजाए, लोग इकट्ठे होने लगते हैं। शोरगुल भर करो, उछल-कूद भर मचाओ…।

राजनीति इसी तरह का शोरगुल है; अहंकार की बड़ी राजनीति है। असल में, अहंकार का फैलाव ही राजनीति है। और अहंकार का विसर्जन ही धर्म है।

प्रकाश नागराज

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पोस्ट 1👉बेटे के जन्मदिन पर …..
रात के 1:30 बजे फोन आता है, बेटा फोन उठाता है तो माँ बोलती है:- “जन्म दिन मुबारक लल्ला”
बेटा गुस्सा हो जाता है और माँ से कहता है: – सुबह फोन करतीं। इतनी रात को नींद खराब क्यों की? कह कर फोन रख देता है।
थोडी देर बाद पिता का फोन आता है। बेटा पिता पर गुस्सा नहीं करता बल्कि कहता है:- सुबह फोन करते।
फिर पिता ने कहा: – मैनें तुम्हें इसलिए फोन किया है कि तुम्हारी माँ पागल है जो तुम्हें इतनी रात को फोन किया। वो तो आज से 25 साल पहले ही पागल हो गई थी। जब उसे डॉक्टर ने ऑपरेशन करने को कहा और उसने मना किया था। वो मरने के लिए तैयार हो गई पर ऑपरेशन नहीं करवाया। रात के 1:30 बजे को तुम्हारा जन्म हुआ। शाम 6 बजे से रात 1:30 तक वो प्रसव पीड़ा से परेशान थी। लेकिन तुम्हारा जन्म होते ही वो सारी पीड़ा भूल गयी। उसके ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। तुम्हारे जन्म से पहले डॉक्टर ने दस्तखत करवाये थे कि अगर कुछ हो जाये तो हम जिम्मेदार नहीं होंगे। तुम्हे साल में एक दिन फोन किया तो तुम्हारी नींद खराब हो गई……
मुझे तो रोज रात को 25 साल से रात के 1:30 बजे उठाती है और कहती है देखो हमारे लल्ला का जन्म इसी वक्त हुआ था। बस यही कहने के लिए तुम्हें फोन किया था। इतना कहके पिता फोन
रख देते हैं।
बेटा सुन्न हो जाता है। सुबह माँ के घर जाकर माँ के पैर पकड़कर
माफी मांगता है….तब माँ कहती है, देखो जी मेरा लाल आ गया।
फिर पिता से माफी मांगता है तब पिता कहते हैं:- आज तक ये कहती थी कि हमें कोई चिन्ता नहीं हमारी चिन्ता करने वाला हमारा लाल है। पर अब तुम चले जाओ मैं तुम्हारी माँ से कहूंगा कि चिन्ता मत करो। मैं तुम्हारा हमेशा की तरह आगे भी ध्यान रखूंगा!
तब माँ कहती है:- माफ कर दो
बेटा है।
सब जानते हैं दुनियाँ में एक माँ ही है जिसे जैसा चाहे कहो फिर भी वो गाल पर प्यार से हाथ फेरेगी।
पिता अगर तमाचा न मारे तो बेटा
सर पर बैठ जाये। इसलिए पिता का सख्त होना भी जरुरी है।
माता पिता को आपकी दौलत नहीं बल्कि आपका प्यार और
वक्त चाहिए। उन्हें प्यार दीजिए। माँ की ममता तो अनमोल है।
दोस्तों आज मातृ-पितृ दिवस है 🙏
निवेदन:- इसको पढ़कर अगर आँखों में आंसू बहने लगें तो रोकिये मत, बह जाने दीजिये। मन हल्का हो जायेगा!*
🌴 भगवान से बढ़कर माता पिता होते हैं 🌴आपका दोस्त 🙏🙏

पवन शर्मा