Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक ब्राह्मण एक गांव से एक बकरी खरीदकर वापस लौट रहा है। बड़ी प्रसिद्ध है कहानी, लेकिन आधी सुनी होगी। मैं पूरी ही सुनाना चाहता हूं। वह बकरी को रखकर कंधे पर वापस लौट रहा है। सांझ हो गयी है, दो चार गुंडों ने उसे देखा है। उन्होंने कहा, अरे, यह बकरी तो बड़ी स्वादिष्ट मालूम पड़ती है। इस नासमझ ब्राह्मण के साथ जा रही है, इसको मजा भी क्या आयेगा, ब्राह्मण को भी क्या, बकरी को भी क्या। इस बकरी को छीन लेना चाहिए। एक गुंडे ने आकर उसके सामने उस ब्राह्मण से कहा, नमस्कार पंडित जी। बड़ा अच्छा कुत्ता खरीद लाये। उसने कहा, कुत्ता! बकरी है महाशय! आंखें कमजोर हैं आपकी? उसने कहा, बकरी कहते हैं इसे आप? आश्चर्य है। हम भी बकरी को जानते हैं। लेकिन आपकी मर्जी, अपनी-अपनी मर्जी, कोई कुत्ते को बकरी कहना चाहे तो कहे। वह आदमी चल पड़ा। उस ब्राह्मण ने सोचा, अजीब पागल हैं इस गांव के। बकरी को कुत्ता कहते हैं? लेकिन फिर भी एक दफे टटोलकर देखा शक तो थोड़ा आया ही। लेकिन उसने पाया कि बकरी है, बिलकुल फिजूल की बात है। अभी दस कदम आगे बढ़ा था। शक मिटाकर किसी तरह आश्वस्त हुआ था कि दूसरा उनका साथी मिला। उसने कहा, नमस्कार पंडित जी! लेकिन आश्चर्य, ब्राह्मण होकर कुत्ता सिर पर रखें! जाति से बाहर होना है? उसने कहा, कुत्ता! लेकिन अब वह उतनी हिम्मत से न कह सका कि यह बकरी है। हिम्मत कमजोर पड़ गयी। उसने कहा, आपको कुत्ता दिखायी पड़ता है? उसने कहा, दिखायी पड़ता है? है। नीचे उतारिए, गांव का कोई आदमी देख लेगा पड़ोस का तो मुश्किल में पड़ जायेंगे।
वह आदमी गया तो उस ब्राह्मण ने उस बकरी को नीचे उतारकर गौर से देखा। वह बिलकुल बकरी थी। यह तो बिलकुल बकरी है, लेकिन दो-दो आदमी भूल कर जायें, यह जरा मुश्किल है। फिर भी सोचा, मजाक भी कर सकते हैं। चला फिर कंधे पर रखकर, लेकिन अब वह डरकर चल रहा है, अब वह जरा अंधेरे में से बचकर निकल रहा है। अब वह गलियों में से चलने लगा है, अब वह रास्ते पर नहीं चल रहा है। तीसरा आदमी उसे एक गली के किनारे पर मिला। उसने कहा, पंडित जी हद्द कर दी। कुत्ता कहां मिल गया? कुत्ते की तलाश मुझे भी है। कहां से ले आये हैं यह कुत्ता, ऐसा मैं भी चाहता हूं। तब तो वह यह भी न कह सका कि क्या कह रहे हैं। उसने कहा कि जी हां, खरीदकर ला रहा हूं। वह आदमी गया कि फिर उसने उतारकर भी नहीं देखा, उसे छोड़ा एक कोने में और भागा। उसने कहा कि अब इससे भाग ही जाना उचित है। झंझट हो जायेगी, गांव के लोग देख लेंगे। पैसे तो मुफ्त गये ही गये, जाति और चली जायेगी।
यह जो तीन आदमी कह गये हैं एक बात को तो बड़ी सच मालूम पड़ने लगती है। यह तो आधी कहानी है। दूसरे जन्म में ब्राह्मण फिर बकरी लेकर चलता था। बकरी लेकर लौट रहा है लेकिन पिछले जन्म की याद है। वह जिसको याद रह जाये उसी को तो ब्राह्मण कहना चाहिए, किसी और को ब्राह्मण कहना नहीं चाहिए। बकरी लेकर लौट रहा है, वही गुंडे। असल में हम भूल जाते हैं इसलिए खयाल नहीं रहता है, कि वही वही बार-बार हमको कई बार मिलते हैं, कई जन्मों में वही लोग बार-बार मिल जाते हैं। वही तीन गुंडे, उन्होंने देखा अरे! ब्राह्मण बकरी को लिए चला जा रहा है। छीन लो, उन्हें कुछ पता नहीं है कि पहले भी छीन चुके हैं। किसको पता है? अगर हमें पता हो कि हम पहले भी यही कर चुके हैं तो शायद फिर दुबारा करना मुश्किल हो जाये। फिर उन्होंने षडयंत्र रच लिया है, फिर एक गुंडा उसे रास्ते पर मिला है। उसने कहा, नमस्कार पंडित जी। बड़ा अच्छा कुत्ता कहां ले जा रहे हैं? पंडित जी ने कहा, कुत्ता सच में बड़ा अच्छा है। उसने गौर से देखा, गुंडे ने सोचा, हमको तो बकरी दिखायी पड़ती थी, हम तो धोखा देने के लिए कुत्ता कहते थे। और उस पंडित ने कहा, कुत्ता सच में बड़ा अच्छा है, बड़ी मुश्किल से मिला, बहुत मांगकर लाया, बड़ी मेहनत की, खुशामद की किसी आदमी की, तब मिला। उस गुंडे ने बहुत गौर से फिर से देखा कि मामला क्या है, भूल हो गयी है? लेकिन उसने कहा, नहीं पंडित जी, कुत्ता ही है न! उसने कहा, कैसी बात कर रहे हैं आप, कुत्ता ही है। अब वह गुंडा मुश्किल में पड़ गया है, वह यह भी नहीं कह सकता कि बकरी है, क्योंकि खुद उसने कुत्ता कहा था। दूसरे कोने पर दूसरा गुंडा मिला। उसने कहा कि धन्य हैं। धन्य महाराज, आप कुत्ता सिर पर लिए हुए हैं?
ब्राह्मण ने कहा, कुत्ते से मुझे बड़ा प्रेम है। आपको पसंद नहीं आया कुत्ता? उस आदमी ने गौर से देखा, उसने कहा, कुत्ता! तीसरे चौरस्ते पर मिला है तीसरा आदमी, लेकिन उन दोनों ने उसको खबर दे दी कि मालूम होता है, हम ही गलती में हैं। हमें बकरी दिखायी पड़ रही है। उस तीसरे आदमी ने गौर से देखा। और उस पंडित ने कहा, क्या देख रहे हैं गौर से? उसने कहा, कुछ नहीं, आपका कुत्ता देख रहा हूं। काफी अच्छा है।
हम भीड़ से जी रहे हैं और चल रहे हैं और पुनरुक्ति हमारा आधार बन गया है। चारों तरफ जो हो वह हमें स्वीकार हो जाता है। और अगर पुनरुक्ति की जाये बार-बार असत्य की भी तो वह सत्य मालूम पड़ने लगता है। यह बात बहुत बार दोहरायी गयी है कि संन्यासी वह है जो भाग रहा है जिंदगी से। जो भाग रहा है वह संन्यासी तो क्या है, गृहस्थ भी नहीं है। संन्यासी होना तो बहुत मुश्किल है। जो जिंदगी को जी रहा है वह संन्यासी है। और जो सिर्फ जिंदगी जीने का इंतजाम कर रहा है, और जी नहीं रहा है, वह गृहस्थ है। जो सिर्फ जिंदगी का इंतजाम कर रहा है और जी नहीं रहा है वह गृहस्थ है। और जो जिंदगी को जी रहा है वह संन्यासी है।
अगर भागने की भाषा में सोचना हो तो गृहस्थ जिंदगी से भागा हुआ हो सकता है, संन्यासी भागा हुआ नहीं हो सकता। लेकिन हम भागे हुए संन्यासियों को जानते हैं। असल में हमने भागे हुओं को ही संन्यासी समझ रखा है। इसलिए बड़ी भूल हो गयी है। संन्यासी और जिंदगी से भागेगा? तो फिर जिंदगी को जीयेगा कौन? फिर जिंदगी को जीयेगा कौन? और संन्यासी अगर जिंदगी से भागेगा तो परमात्मा को फिर जानेगा कौन? क्योंकि कहीं अगर परमात्मा है तो जिंदगी में ही छिपा है। नहीं, संन्यासी जिंदगी को जीता है वह उसकी परिपूर्णता में। लेकिन निश्चित ही परिपूर्णता में जीने के लिए बहुत-सी बातें उससे छूटकर गिर जाती हैं। आप यह मत सोचना कि वह छोड़ देता है। मेरे हाथों में कंकड़-पत्थर भरे हों और मुझे हीरों की खदान मिल जाये और मैं पत्थर छोड़ दूं हाथ से और हीरों की खदान से हीरे बीनने लगूं और आप कहें कि यह आदमी बड़ा पागल मालूम होता है, इसने कंकड़-पत्थरों का त्याग कर दिया। तो पागल मैं हूं या आप? आपको हीरे नहीं दिखायी पड़ रहे हैं, आपको हीरे की खदानें नहीं दिखायी पड़ रही हैं। आपको सिर्फ इतना ही दिखायी पड़ रहा है कि मेरे हाथों में कंकड़-पत्थर थे, वे मैंने छोड़ दिये। मैं बड़ा त्यागी हूं। अब तक किसी संन्यासी ने कोई त्याग नहीं किया। सिर्फ नासमझ त्याग कर लेते हैं, बात दूसरी है।
संन्यासी तो और वृहत्तर आनंद को उपलब्ध हो जाता है, इसलिए क्षुद्र से उसे हाथ खाली करने पड़ते हैं। वह हाथ से छोड़ता नहीं है, चीजें छूट जाती हैं, बेमानी हो जाती हैं। अगर आपको हीरा मिल जाये तो आप पत्थर को हाथ में लेकर चलेंगे? या कि पत्थर आपको छोड़ना पड़ेगा? नहीं, पता ही नहीं चलेगा कि कब पत्थर हाथ से छूट गया और हीरा आ गया। हां, दूसरे, जिनके हाथों में अभी भी पत्थर हैं, वे समझेंगे कि बड़ा त्यागी आदमी है। उन्हें वह हीरा दिखायी नहीं पड़ रहा है। और कुछ ऐसे हीरे हैं जो दिखायी नहीं पड़ते। धर्म का उन्हीं हीरों से संबंध है जो दिखायी नहीं पड़ते। कुछ ऐसे भोग हैं जो दिखायी नहीं पड़ते।
संन्यासी वह नहीं है जिसने भोग छोड़ दिया, संन्यासी वह है जो भोग की पूर्णता को उपलब्ध हुआ, जो अब परमात्मा को भी भोग रहा है। इसे ठीक से ही समझ लेना–जो परमात्मा को भी भोग रहा है। जो भोजन कर रहा है तो सिर्फ भोजन ही नहीं कर रहा है, भोजन में परमात्मा का स्वाद भी समाविष्ट है। और जो अगर आपके सुंदर चेहरे को देख रहा है तो आपके सुंदर चेहरे को ही नहीं देख रहा है, आपके भीतर से जो सौंदर्य की अनंत धारा जुड़ी है प्रभु से, वह भी उसे दिखायी पड़ गयी है। संन्यासी का अर्थ है–वह जिसने भोग का राज जान लिया, जिसने जीवन के रस की उपलब्धि की कला, कीमिया सीख ली। लेकिन हम तो यही सोचते रहे हैं कि भागने वाला संन्यासी है। भागने वाला रुग्ण है, संन्यासी नहीं है। भागने वाला विक्षिप्त है। भागने वाला, जो हाथ में था कंकड़-पत्थर वह भी छोड़ दिया है, और हीरे तो उसे मिले नहीं। वह बड़ी मुश्किल में पड़ गया है। इसलिए जिसे हम इस देश में संन्यासी कह रहे हैं, सारी दुनिया में वह बड़ी मुश्किल में पड़ा हुआ आदमी है। उसने घर भी छोड़ दिया, पत्नी भी छोड़ दी, बच्चे भी छोड़ दिये, और परमात्मा भी उसे मिला नहीं। वह त्रिशंकु की भांति बीच में अटका रह गया।

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🌹तिल चौथ की कहानी🌹

एक शहर में देवरानी जेठानी रहती थी । जेठानी अमीर थी और देवरानी गरीब थी। देवरानी गणेश जी की भक्त थी। देवरानी का पति जंगल से लकड़ी काट कर बेचता था और अक्सर बीमार रहता था। देवरानी जेठानी के घर का सारा काम करती और बदले में जेठानी बचा हुआ खाना, पुराने कपड़े आदि उसको दे देती थी। इसी से देवरानी का परिवार चल रहा था।

माघ महीने में देवरानी ने तिल चौथ का व्रत किया। पाँच रूपये का तिल व गुड़ लाकर तिलकुट्टा बनाया। पूजा करके तिल चौथ की कथा

( तिल चौथ की कहानी ) सुनी और तिलकुट्टा छींके में रख दिया और सोचा की चाँद उगने पर पहले तिलकुट्टा और उसके बाद ही कुछ खायेगी।

कथा सुनकर वह जेठानी के यहाँ चली गई। खाना बनाकर जेठानी के बच्चों से खाना खाने को कहा तो बच्चे बोले माँ ने व्रत किया हैं और माँ भूखी हैं। जब माँ खाना खायेगी हम भी तभी खाएंगे। जेठजी को खाना खाने को कहा तो जेठजी बोले ” मैं अकेला नही खाऊँगा , जब चाँद निकलेगा तब सब खाएंगे तभी मैं भी खाऊँगा ” जेठानी ने उसे कहा कि आज तो किसी ने भी अभी तक खाना नहीं खाया तुम्हें कैसे दे दूँ तुम सुबह सवेरे ही बचा हुआ खाना ले जाना।

देवरानी के घर पर पति , बच्चे सब आस लगाए बैठे थे की आज तो त्यौहार हैं इसलिए कुछ पकवान आदि खाने को मिलेगा। परन्तु जब बच्चो को पता चला कि आज तो रोटी भी नहीं मिलेगी तो बच्चे रोने लगे। उसके पति को भी बहुत गुस्सा आया कहने लगा सारा दिन काम करके भी दो रोटी नहीं ला सकती तो काम क्यों करती हो ? पति ने गुस्से में आकर पत्नी को कपड़े धोने के धोवने से मारा धोवना हाथ से छूट गया तो पाटे से मारा। वह बेचारी गणेश जी को याद करती हुई रोते रोते पानी पीकर सो गयी।

उस दिन गणेश जी देवरानी के सपने में आये और कहने लगे ” धोवने मारी पाटे मारी सो रही है या जाग रही है ”वह बोली ” कुछ सो रही हूँ , कुछ जाग रही हूँ ”

गणेश जी बोले ,” भूख लगी हैं , कुछ खाने को दे ”देवरानी बोली ” क्या दूँ , मेरे घर में तो अन्न का एक दाना भी नहीं हैं ”

जेठानी बचा खुचा खाना देती थी आज वो भी नहीं मिला। पूजा का बचा हुआ तिल कुट्टा छींके में पड़ा हैं वही खा लो तिलकुट्टा खाने के बाद गणेश जी बोले – ” धोवने मारी पाटे मारी निमटाई लगी है , कहाँ निमटे ”वो बोली ” ये पड़ा घर , जहाँ इच्छा हो वहाँ निमट लो ”फिर गणेश जी बोले ” अब कहाँ पोंछू :

अब देवरानी को बहुत गुस्सा आया कि कब के तंग करे जा रहे हैं , सो बोली ” मेरे सर पर पोछो और कहाँ पोछोगे ”सुबह जब देवरानी उठी तो यह देखकर हैरान रह गई कि पूरा घर हीरे-मोती से जगमगा रहा है , सिर पर जहाँ बिंदायकजी पोछनी कर गये थे वहाँ हीरे के टीके व बिंदी जगमगा रहे थे।

उस दिन देवरानी जेठानी के काम करने नहीं गई। बड़ी देर तक राह देखने के बाद जेठानी ने बच्चो को देवरानी को बुलाने भेजा। जेठानी ने सोचा कल खाना नहीं दिया इसीलिए शायद देवरानी बुरा मान गई है। बच्चे बुलाने गए और बोले चाची चलो माँ ने बुलाया है सारा काम पड़ा हैं दुनियां में चाहे कोई मौका चूक जाए पर देवरानी जेठानी आपस में कहने का मौके नहीं छोड़ती।

देवरानी ने कहा ” बेटा बहुत दिन तेरी माँ के यहाँ काम कर लिया ,अब तुम अपनी माँ को ही मेरे यहाँ काम करने भेज दो ”बच्चो ने घर जाकर माँ को बताया कि चाची का तो पूरा घर हीरे मोतियों से जगमगा रहा है। जेठानी दौड़ती हुई देवरानी के पास आई और पूछा कि ये सब हुआ कैसे ? देवरानी ने उसके साथ जो हुआ वो सब कह डाला।

घर लौटकर जेठानी अपने पति से कहा कि आप मुझे धोवने और पाटे से मारो। उसका पति बोला कि भलीमानस मैंने कभी तुम पर हाथ भी नहीं उठाया। मैं तुम्हे धोवने और पाटे से कैसे मार सकता हूँ। वह नहीं मानी और जिद करने लगी। मजबूरन पति को उसे मारना पड़ा। उसने ढ़ेर सारा घी डालकर चूरमा बनाया और छीकें में रखकर और सो गयी। रात को चौथ विन्दायक जी सपने में आये कहने लगे , “भूख लगी है , क्या खाऊँ ”

जेठानी ने कहा ” हे गणेश जी महाराज , मेरी देवरानी के यहाँ तो आपने सूखा चूंटी भर तिलकुट्टा खाया था , मैने तो झरते घी का चूरमा बनाकर आपके लिए छींके में रखा हैं , फल और मेवे भी रखे है जो चाहें खा लीजिये ”गणेश जी बोले ,”अब निपटे कहाँ ”

जेठानी बोली ,”उसके यहाँ तो टूटी फूटी झोपड़ी थी मेरे यहाँ तो कंचन के महल हैं जहाँ चाहो निपटो ”फिर गणेश जी ने पूछा ,”अब पोंछू कहाँ ”

जेठानी बोली ” मेरे ललाट पर बड़ी सी बिंदी लगाकर पोंछ लो ”धन की भूखी जेठानी सुबह बहुत जल्दी उठ गयी। सोचा घर हीरे जवाहरात से भर चूका होगा पर देखा तो पूरे घर में गन्दगी फैली हुई थी तेज बदबू आ रही थी। उसके सिर पर भी बहुत सी गंदगी लगी हुई थी। उसने कहा “हे गणेश जी महाराज , ये आपने क्या किया

मुझसे रूठे और देवरानी पर टूटे। जेठानी ने घर और की सफाई करने की बहुत ही कोशिश करी परन्तु गंदगी और ज्यादा फैलती गई जेठानी के पति को मालूम चला तो वह भी बहुत गुस्सा हुआ और बोला तेरे पास इतना सब कुछ था फिर भी तेरा मन नहीं भरा।

परेशान होकर चौथ के बिंदायक जी ( गणेशजी ) से मदद की विनती करने लगी। बिंदायक जी ने कहा ” देवरानी से जलन के कारण तूने जो किया था यह उसी का फल है। अब तू अपने धन में से आधा उसे दे देगी तभी यह सब साफ होगा ”

उसने आधा धन बाँट दिया किन्तु मोहरों की एक हांडी चूल्हे के नीचे गाढ़ रखी थी। उसने सोचा किसी को पता नहीं चलेगा और उसने उस धन को नहीं बांटा । उसने कहा ” हे चौथ बिंदा यक जी , अब तो अपना यह बिखराव समेटो ” वे बोले , पहले चूल्हे के नीचे गाढ़ी हुयी मोहरो की हांडी सहित ताक में रखी दो सुई की भी पांति कर। इस प्रकार बिंदायकजी ने सुई जैसी छोटी चीज का भी बंटवारा करवाकर अपनी माया समेटी।

हे गणेश जी महाराज , जैसी आपने देवरानी पर कृपा करी वैसी सब पर करना। कहानी कहने वाले , सुनने वाले व हुंकारा भरने वाले सब पर कृपा करना। किन्तु जेठानी को जैसी सजा दी वैसी किसी को मत देना।

बोलो गणेश जी महाराज की – जय !!!

चौथ माता की – जय !!!

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एक छोटी घटना और–जों अष्टावक्र के जीवन से संबंधित नहीं, रामकृष्ण और विवेकानंद के जीवन से संबंधित है, लेकिन अष्टावक्र से उसका जोड़ है-‘फिर हम सूत्रों में प्रवेश करें।

विवेकानंद रामकृष्ण के पास आये, तब उनका नाम ‘नरेंद्रनाथ’ था।’विवेकानंद’ तो बाद में रामकृष्ण ने उनको पुकारा। जब आये रामकृष्ण के पास तो अति विवादी थे, नास्तिक थे, तर्कवादी थे। हर चीज के लिए प्रमाण चाहते थे।

कुछ चीजें हैं जिनके लिए कोई प्रमाण नहीं-‘मजबूरी है। परमात्मा के लिए कोई प्रमाण नहीं है; है और प्रमाण नहीं है। प्रेम के लिए कोई प्रमाण नहीं है; है और प्रमाण नहीं है। सौंदर्य के लिए कोई प्रमाण नहीं है; है और प्रमाण नहीं है।

अगर वृक्षों के सौंदर्य को देखना हो तो कला की आंख चाहिए–और कोई प्रमाण नहीं है। अगर किसी के प्रेम को पहचानना हो तो प्रेमी का हृदय चाहिए–और कोई प्रमाण नहीं है। और परमात्मा तो इस जगत के सारे सौंदर्य और सारे प्रेम और सारे सत्य का इकट्ठा नाम है। उसके लिए तो ऐसा निर्विकार चित्त चाहिए, ऐसा साक्षी-भाव चाहिए, जहां कोई शब्द न रह जाये, कोई विचार न रह जाये, कोई तरंग न उठे। वहां कोई धूल न रह जाये मन की और चित्त का दर्पण परिपूर्ण शुद्ध हो! प्रमाण कहां? रामकृष्ण से विवेकानंद ने कहा : प्रमाण चाहिए। है परमात्मा तो प्रमाण दें।

और विवेकानंद को देखा रामकृष्ण ने। बड़ी थी संभावनाएं इस युवक की। बड़ी थी यात्रा इसके भविष्य की। बहुत कुछ होने को पड़ा था इसके भीतर। बड़ा खजाना था, उससे यह अपरिचित है। रामकृष्ण ने देखा, इस युवक के पिछले जन्मों में झांका। यह बड़ी संपदा, बड़े पुण्य की संपदा ले कर आ रहा है। यह ऐसे ही तर्क में दबा न रह जाये। कराह उठा होगा पीड़ा और करुणा से रामकृष्ण का हृदय। उन्होंने कहा, ‘छोड़, प्रमाण वगैरह बाद में सोच लेंगे। मैं जरा बूढ़ा हुआ, मुझे पढ़ने में अड़चन होती है। तू अभी जवान, तेरी आंख अभी तेज–यह किताब पड़ी है, इसे तू पढ़।’ वह थी अष्टावक्र–गीता।’ जरा मुझे सुना दे।’

कहते हैं, विवेकानंद को इसमें तो कुछ अड़चन न मालूम पड़ी, यह आदमी कुछ ऐसी तो कोई खास बात नहीं मांग रहा है! दो-चार सूत्र पढ़े और एक घबड़ाहट, और रोआं-रोआं कंपने लगा! और विवेकानंद ने कहा, मुझसे नहीं पढ़ा जाता। रामकृष्ण ने कहा : पढ़ भी! इसमें हर्ज क्या है? तेरा क्या बिगाड़ लेगी यह किताब? तू जवान है अभी। तेरी आंख अभी ताजी हैं। और मैं बूढ़ा हुआ, मुझे पढ़ने में दिक्कत होती है। और यह किताब मुझे पढ़नी है तो तू पढ़ कर सुना दे।

कहते हैं उस किताब को सुनाते-सुनाते ही विवेकानंद डूब गये। रामकृष्ण ने देखा इस व्यक्ति के भीतर बड़ी संभावना है, बड़ी शुद्ध संभावना है, जैसी एक बोधिसत्व की होती है जो कभी न कभी बुद्ध होना जिसका निर्णीत है, आज नहीं कल, भटके कितना ही, बुद्धत्व जिसके पास चला आ रहा है। क्यों अष्टावक्र की गीता रामकृष्ण ने कही कि तू पढ़ कर मुझे सुना दे? क्योंकि इससे ज्यादा शुद्धतम वक्तव्य और कोई नहीं। ये शब्द भी अगर तुम्हारे भीतर पहुंच जायें तो तुम्हारी सोयी हुई आत्मा को जगाने लगेंगे। ये शब्द तुम्हें तरंगायित करेंगे। ये शब्द तुम्हें आह्लादित करेंगे। ये शब्द तुम्हें झकझोरेंगे। इन शब्दों के साथ क्रांति घटित हो सकती है।

अष्टावक्र की गीता को मैंने यूं ही नहीं चुना है। और जल्दी नहीं चुना–बहुत देर करके चुना है, सोच-विचार कर। दिन थे, जब मैं कृष्ण की गीता पर बोला, क्योंकि भीड़-भाड़ मेरे पास थी। भीड़-भाड़ के लिए अष्टावक्र-गीता का कोई अर्थ न था। बड़ी चेष्टा करके भीड़-भाड़ से छुटकारा पाया है। अब तो थोड़े–से विवेकानंद यहां हैं। अब तो उनसे बात करनी है, जिनकी बड़ी संभावना है। उन थोड़े से लोगों के साथ मेहनत करनी है, जिनके साथ मेहनत का परिणाम हो सकता है। अब हीरे तराशने हैं, कंकड़-पत्थरों पर यह छैनी खराब नहीं करनी। इसलिए चुनी है अष्टावक्र की गीता। तुम तैयार हुए हो, इसलिए चुनी है। ओशो, अष्टावक्र महागीता--भाग--1--(प्रवचन--1)

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खाली पेट – (लघुकथा)

लगभग दस साल का बालक राधा का गेट बजा रहा है।
राधा ने बाहर आकर पूंछा
“क्या है ? “
“आंटी जी क्या मैं आपका गार्डन साफ कर दूं ?”
“नहीं, हमें नहीं करवाना।”
हाथ जोड़ते हुए दयनीय स्वर में “प्लीज आंटी जी करा लीजिये न, अच्छे से साफ करूंगा।”
द्रवित होते हुए “अच्छा ठीक है, कितने पैसा लेगा ?”
“पैसा नहीं आंटी जी, खाना दे देना।”
” ओह !! अच्छे से काम करना।”
“लगता है, बेचारा भूखा है।पहले खाना दे देती हूँ। राधा बुदबुदायी।”
“ऐ
लड़के ! पहले खाना खा ले, फिर काम करना।
“नहीं आंटी जी, पहले काम कर लूँ फिर आप खाना दे देना।”
“ठीक है ! कहकर राधा अपने काम में लग गयी।”
एक घंटे बाद “आंटी जी देख लीजिए, सफाई अच्छे से हुई कि नहीं।”
“अरे वाह! तूने तो बहुत बढ़िया सफाई की है, गमले भी करीने से जमा दिए।यहाॅं बैठ, मैं खाना लाती हूँ।”
जैसे ही राधा ने उसे खाना दिया वह जेब से पन्नी निकाल कर उसमें खाना रखने लगा।”
“भूखे काम किया है, अब खाना तो यहीं बैठकर खा ले।जरूरत होगी तो और दे दूंगी।”
“नहीं आंटी, मेरी बीमार माँ घर पर है।सरकारी अस्पताल से दवा तो मिल गयी है,पर डाॅ साहब ने कहा है दवा खाली पेट नहीं खाना है।”
राधा रो पड़ी..
और अपने हाथों से मासुम को उसकी दुसरी माँ बनकर खाना खिलाया..
फिर… उसकी माँ के लिए रोटियां बनाई .. और साथ उसके घर जाकर उसकी माँ को रोटियां दे आयी ..
और कह आयी .. बहन आप बहुत अमीर हो ..
जो दौलत आपने अपने बेटे को दी है वो हम अपने बच्चो को भी नहीं दे पाते ..
खुद्धारी की … Jai Shri Krishna.......

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दुर्बलता

दुर्बलता का संबंध शरीर से नहीं, मन से होता है। इस संबंध में श्री गुरुजी ने अपने जीवन का यह प्रसंग एक बार सुनाया था।
छात्र-जीवन में माधवराव अपने एक मित्र के साथ घूमने गये। एक सिनेमाघर के बाहर बहुत भीड़ देखकर वे रुक गये। पूछने पर पता लगा कि फिल्म तो समाप्त हो गयी है; पर महिलाओं वाले दरवाजे पर दो अंग्रेज खड़े हैं। उन्होंने शराब भी पी रखी है। वहाँ पुलिस भी थी और सिनेमा का प्रबन्धक भी; पर सब उनसे भयभीत थे।
यह देखकर माधवराव ने अपने मित्र से कहा – चलो, हम चलकर उन्हें हटाते हैं। पर वह मित्र भी डर गया। अब माधवराव ने अकेले वहाँ जाकर पहले तो उन्हें अंग्रेजी में डाँटा; पर जब वे नहीं हटे, तो उन्होंने एक का गला पकड़कर जोर से चाँटा जड़ दिया। चाँटा लगते ही उनका नशा उतर गया और वे वहाँ से भाग गये।
श्री गुरुजी कहते थे कि जब मेरे जैसा दुबला-पतला आदमी उनसे भिड़ सकता है, तो क्या इतना बड़ा भारत अंग्रेजों से नहीं लड़ सकता ? वस्तुत: हमारा शरीर नहीं, मन दुर्बल है। अत: पहले उसकी दुर्बलता दूर करना आवश्यक है।

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एक राजा ने दरबार में सुबह ही सुबह दरबारियों जो बुलाया । उसका दरबार भरता ही जाना था की एक अजनबी यात्री वहा आया । वह किसी दूर देश का रहने वाला होगा । उसके वस्त्र पहचाने हुए से नही मालूम पड़ते थे । उसकी शक्ल भी अपरिचित थी , लेकिन वह बड़े गरिमाशाली और गौरवशाली व्यक्तित्व का धनी मालूम होता था । सारे दरबार के लोग उसकी तरफ देखते ही रह गए । उसने एक बड़ी शानदार पगड़ी पहन रखी थी । वैसी पगड़ी उस देश में कभी नही देखी गयी थी । वह बहोत रंग – बिरंगी छापेदार थी । ऊपर चमकदार चीजे लगी थी । राजा ने पूछा – अतिथि ! क्या मै पूछ सकता हु की यह पगड़ी कितनी महंगी है और कहा से खरीदी गयी है ? उस आदमी ने कहा – यह बहुत महंगी पगड़ी है । एक हजार स्वर्ण मुद्रा मुझे खर्च करनी पड़ी है ।

वजीर राजा की बगल में बैठा था । और वजीर स्वभावतः चालाक होते है , नही तो उन्हें कौन वजीर बनाएगा ? उसने राजा के कान में कहा – सावधान ! यह पगड़ी बीस – पच्चीस रुपये से जादा की नही मालूम पड़ती । यह हजार स्वर्ण मुद्रा बता रहा है । इसका लूटने का इरादा है ।

उस अतिथि ने भी उस वजीर को , जो राजा के कान में कुछ कह रहा था , उसके चेहरे से पहचान लिया । वह अतिथि भी कोई नौसिखिया नही था । उसने भी बहोत दरबार देखे थे और बहोत दरबारों में वजीर और राजा देखे थे । वजीर ने जैसे ही अपना मुह राजा की कान से हटाया , वह नवांगतुक बोला – क्या मैं फिर लौट जाऊ ? मुझे कहाँ गया था की इस पगड़ी को खरीदने वाला सारी जमींन पर एक ही सम्राट है । एक ही राजा है । क्या मै लौट जाऊ इस दरबार से । और मैं समझू की यह दरबार , वह दरबार नही है जिसकी की मै खोज में हूँ ? मै कही और जाऊ ? मै बहुत से दरबारों से वापस आया हु । मुझे कहा गया है की एक ही राजा है इस ज़मीन पर , जो पगड़ी को एक हजार स्वर्ण मुद्राओं में खरीद सकता है । तो क्या मै लौट जाऊ ? क्या यह दरबार वह दरबार नही है ?

राजा ने कहा दो हजार स्वर्ण मुद्रा दो और पगड़ी खरीद लो । वजीर बहुत हैरान हुवा । जब वजीर चलने लगा तो उस आए हुए अतिथि ने वजीर के कान में कहा – मित्र ! ” यू मे बी नोइंग द प्राइस ऑफ़ द टर्बन , बट आइ नो द वीकनेसेस ऑफ़ द किंग ” तुम जानते हो की पगड़ी के दाम कितने है , लेकिन मै राजाओं की कमजोरियां जानता हूँ ।

पादरी , पुरोहित और धर्मगुरु ईश्वर को तो नही जानते है , आदमी की कमजोरियों को जानते है और यही उनसे खतरा है । उन्ही कमजोरियों का शोषण चल रहा है । आदमी बहोत कमजोर है और बड़ी कमजोरिया है उसमेँ । उसकी कमजोरियों का शोषण हो रहा है ।

स्मरण रखे – जो परमात्मा की शक्ति को जानता है , उसके लिए ज़मीन पर कोई कमजोरी नही रह जाती और जो परमात्मा को पहचानता है , उसके लिए शोषण असंभव है ।

~ ओशो ~

From : – क्या ईश्वर मर गया है ? ( पृष्ठ क्रमांक – १४ , १५ )

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मैंने सुना है, एक सम्राट का एक नाई था। वह बड़ा प्रसन्न था। सम्राट भीर् ईष्या करता था उससे। कि वह बड़ा मस्त आदमी था। सम्राट की मालिश करता, दाढ़ी बनाता, हजामत बनाता, गीत गुनगुनाता रहता, गपशप करता रहता। हमेशा प्रसन्न था।

एक दिन उदास हो गया। फिर उसकी उदासी बढ़ती गई। सम्राट ने पूछा, क्या मामला है? उसने कहा, मेरी तनख्वाह बड़ा दें। तनख्वाह दुगुनी कर दी गई। सम्राट उसको प्रेम करता था। लेकिन कुछ हल न हुआ। तनख्वाह तिगनी कर दी गई, कुछ हल न हुआ। वह और भी सूखता गया, और दुबला हो गया!

आखिर एक दिन सम्राट ने कहा, “सुन! तू जंगल तो नहीं गया था?”

उसने कहा, “मैं गया था।”

“तू एक पीपल वृक्ष के नीचे तो नहीं था, जहां किसी ने आवाज दी हो कि ले, यह धन अपने साथ ले जा?”

उसने कहा, “अरे! आपको पता कैसे चला?”

उसने कहा, “तू वह मटका वापस लौटा दे। उसी के चक्कर में तू पड़ा है। एक दफे मैं भी उसी चक्कर में पड़ चुका हूं। वह पीपल के वृक्ष में एक यक्ष रहता है। और उसके पास एक मटका है, जिसमें निन्यानबे रुपए हैं। और जो भी वहां से निकलता है, वह लोगों से कहता है कि ले जाओ। यह मटका ले जाओ।”

और जो भी ले जाता है, वह मुश्किल में पड़ जाता है। क्योंकि जब वह घर जाकर गिनता है निन्यानबे, तो सौ करने की

वासना पैदा होती है।

ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है जिसके पास निन्यानबे हों, और सौ करने की वासना पैदा न हो।

वह वैसा ही स्वाभाविक है, जैसे तुम्हारा दांत टूट जाता है तो जीभ वहीं-वहीं जाती है। पहले कभी नहीं जाती थी! वर्षों तक वह दांत वहां था, तुमने कभी चिंता न की, न जीभ ने उसकी खोज खबर ली। आज दांत टूट गया। उठते, बैठते, सोते, जागते जीभ वहीं-वहीं जाती है। वह जगह खाली हो गई। वह खाली जगह को भरने का मन होता है।

वे जो निन्यानबे रुपए हैं, खतरनाक हैं। उस राजा ने कहा, “तू जा वापस और मटका लौटाकर आ। मैं भी उस झंझट में पड़ चुका था। और बड़ी मेरी जान मुसीबत में पड़ गई थी।”

क्योंकि जिस दिन से वह मटका उस नाई को मिल गया, वह मुश्किल में पड़ गया। उसे एक रुपया रोज मिलता था राजा से। उसने सोचा, कल उपवास ही कर लें। एक दिन की ही तो बात है। एक रुपया डाल देंगे, सौ हो जाएंगे। लेकिन जब वे सौ हो गए, तो लगा, एक सौ एक करने में और भी ठीक रहेगा। फिर बढ़ती गई बात। फिर कभी अंत नहीं आता।

इस जगत में पूरा तो मिल ही नहीं सकता। पूरा तो सिर्फ परमात्मा ही मिल सकता है। और कोई चीज पूरी नहीं मिल सकती। पूरा तो तुम्हें तुम्हारा स्वरूप ही मिल सकता है और कोई चीज पूरी नहीं मिल सकती।

इसलिए जिन्होंने खोजा है, जिन्होंने पाया है, उन्होंने कहा है, जब तक अपने को ही न पा लोगे, तब तक दुखी ही रहोगे, तड़पोगे।

“पूरा मिल्या तबै सुख उपज्यो”
ओशो

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बोध कथा
“धर्म-अधर्म के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण समान सारथी होने का ध्येय रखनेवाले स्वामी विवेकानंद”

स्वामी विवेकानंदजी का बाल्यावस्था का नाम ‘नरेंद्र’ था । ‘विवेकानंद’ यह नाम उन्होंने आगे चलकर धारण किया । बचपन में नरेंद्र के खेल-कूद में ही लगे रहने के कारण उसके पिता दुःखी थे ।

बचपन में नरेंद्र नटखट थे । वे खेल-कूद में ही खो जाते थे । नरेंद्र के पिता कलकत्ते के एक विख्यात अधिवक्ता (वकिल) थे । एक दिन उन्हें न्यायालय से घर आने में विलंब हुआ । उस समय भी नरेंद्र बाहर खेल रहा था । उन्होंने पत्नी को बुलाया और नरेंद्र की ओर अंगुली निर्देश कर कहा, ‘‘मुझे नहीं लगता कि आप इस बच्चे की ओर ध्यान दे रही है । वास्तव में यदि आप ध्यान दे रही होती तो, आप उसे समझाती ।’’ यह सुनने के उपरांत माताजी नरेंद्र को घर लेकर आयी ।

धर्म-अधर्म के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण समान सारथी होने का व्यापक ध्येय माता ने बच्चे के सामने रखना
रात में भोजन के उपरांत सभी सदस्य सो गए । परंतु नरेंद्र और उसकी मां जगे थे । बिना कुछ बोले माताजी नरेंद्र को लेकर गीता बतानेवाले भगवान श्रीकृष्ण के बडे चित्र के सामने आकर खडी हो गई । ‘भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को गीता बता रहे है’ इस चित्र में दिखाए दृश्य को देखकर उसे आधार लगता था । माता ने नरेंद्र से पूछा, ‘‘बेटे तुम आगे जाकर कौन बनना चाहते हो ?’’ नरेंद्र ने तुरंत उत्तर दिया, ‘‘टांगेवाला !’’ माता ने पूछा, ‘‘टांगेवाला क्यों ?’’

तब वह आनंदित होकर बोला, ‘‘मां, देखो ! मेरी दृष्टि के सामने चार घोडे लेकर जा रहा और उंचे स्थानपर बैठा हुआ वह टांगेवाला है । वह मुझे संकेत दे रहा है कि क्या यह लगाम तुम्हे तुम्हारे हाथ में चाहिए ?’’ नरेंद्र को पुचकारते हुए मां ने बताया, ‘‘बेटे, मूलतः ही हमारा ध्येय व्यापक होना चाहिए । तुम्हे टांगेवाले का, लगाम का और घोडों का आकर्षण है न ? तब ध्यान से देखो । सामने के चित्र में भगवान श्रीकृष्ण भी सारथी ही (टांगेवाला ही) है; परंतु किसके ? अधर्म के विरोध में लढने के लिए सिद्ध हुए अर्जुन के !’’

माता ने व्यापक ध्येय की तडप नरेंद्र के मनमें जागृत करना तथा उसे भी अपनी मां की व्याकुलता समझना
माता ने नरेंद्र से कहा, ‘‘बेटे केवल व्यापक ध्येय की आवश्यकता नहीं होती, तो उसकी प्राप्ति के लिए प्रयास आवश्यक हैं और उसके पहले शिक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है । क्या ज्ञान के बिना सीख संभव है ? तो अब महत्वपूर्ण क्या होगा ? सतत अपने ध्येय की तडप ! अपना ध्येय अपने मनपर अंकित करो । परंतु यह कार्य तुम अभी नहीं कर सकते । इसलिए उचित समय आनेतक तुम तुम्हारा संपूर्ण ध्यान पढाई की ओर लगाओ । नरेंद्र माता के कहने का अर्थ पूर्णतः नहीं समझ सका; परंतु उसे उसकी आर्तता समझ में आ रही थी । नरेंद्र की माता ने उसके मन में इस व्यापक ध्येय का बीज बोया था । समय के बीतते हुए नरेंद्र की शिक्षा पूरी हुई । उसने नौकरी ढुंढने के लिए सर्वत्र प्रयास किए । परंतु उसे मन के अनुरुप नौकरी नहीं मिली ।

नरेंद्र की रामकृष्ण परमहंस से भेंट होनेपर उन्होंने उसे धर्मप्रसार का कार्य सौंपना और केवल भारत में ही नहीं, अपितु पश्‍चिमी देशों में भी ‘सनातन धर्म’ की ध्वजा फहराना ।
एक बार नरेंद्र का मित्र उन्हें रामकृष्ण परमहंस के पास लेकर गया । रामकृष्ण परमहंस उन्हें देखकर ही कह पडे, ‘‘कहां थे तुम इतने दिन ? मैं कितने दिनों से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं !’’ रामकृष्णजी ने उनपर कृपा की और उन्हें धर्मप्रसार का महान कार्य सौंप दिया । नरेंद्र ने (स्वामी विवेकानंदजी ने) केवल भारत में ही नहीं, अपितु पश्‍चिमी देशों में भी ‘सनातन धर्म’की ध्वजा फहरायी ।
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देवी सिंग तोमर

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Jai shree bajrang bali ki jai ho Ji
(((( प्रेम की जड़ी-बूटी ))))
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बहुत समय पहले की बात है, एक वृद्ध सन्यासी हिमालय की पहाड़ियों में कहीं रहता था.
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वह बड़ा ज्ञानी था और उसकी बुद्धिमत्ता की ख्याति दूर -दूर तक फैली थी.
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एक दिन एक औरत उसके पास पहुंची और अपना दुखड़ा रोने लगी ,
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बाबा, मेरा पति मुझसे बहुत प्रेम करता था, लेकिन वह जबसे युद्ध से लौटा है ठीक से बात तक नहीं करता .
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युद्ध लोगों के साथ ऐसा ही करता है, सन्यासी बोला.
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लोग कहते हैं कि आपकी दी हुई जड़ी – बूटी इंसान में फिर से प्रेम उत्पन्न कर सकती है, कृपया आप मुझे वो जड़ी-बूटी दे दें, महिला ने विनती की.
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सन्यासी ने कुछ सोचा और फिर बोला, देवी मैं तुम्हे वह जड़ी-बूटी ज़रूर दे देता लेकिन उसे बनाने के लिए एक ऐसी चीज चाहिए जो मेरे पास नहीं है.
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आपको क्या चाहिए मुझे बताइए मैं लेकर आउंगी, महिला बोली.
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मुझे बाघ की मूंछ का एक बाल चाहिए, सन्यासी बोला.
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अगले ही दिन महिला बाघ की तलाश में जंगल में निकल पड़ी, बहुत खोजने के बाद उसे नदी के किनारे एक बाघ दिखा, बाघ
उसे देखते ही दहाड़ा,
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महिला सहम गयी और तेजी से वापस चली गयी.
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अगले कुछ दिनों तक यही हुआ, महिला हिम्मत कर के उस बाघ के पास पहुँचती और डर कर वापस चली जाती.
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महीना बीतते-बीतते बाघ को महिला की मौजूदगी की आदत पड़ गयी, और अब वह उसे देख कर सामान्य ही रहता.
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अब तो महिला बाघ के लिए मांस भी लाने लगी, और बाघ बड़े चाव से उसे खाता.
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उनकी दोस्ती बढ़ने लगी और अब महिला बाघ को थपथपाने भी लगी.
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और देखते देखते एक दिन वो भी आ गया जब उसने हिम्मत दिखाते हुए बाघ की मूंछ का एक बाल भी निकाल लिया.
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फिर क्या था, वह बिना देरी किये सन्यासी के पास पहुंची, और बोली.. मैं बाल ले आई बाबा.
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बहुत अच्छे, और ऐसा कहते हुए सन्यासी ने बाल को जलती हुई आग में फ़ेंक दिया
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अरे ये क्या बाबा, आप नहीं जानते इस बाल को लाने के लिए मैंने कितने प्रयत्न किये और आपने इसे जला दिया..!
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अब मेरी जड़ी-बूटी कैसे बनेगी ? महिला घबराते हुए बोली.
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अब तुम्हे किसी जड़ी-बूटी की ज़रुरत नहीं है, सन्यासी बोला.
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जरा सोचो, तुमने बाघ को किस तरह अपने वश में किया..
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जब एक हिंसक पशु को धैर्य और प्रेम से जीता जा सकता है तो क्या एक इंसान को नहीं ?
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जाओ जिस तरह तुमने बाघ को अपना मित्र बना लिया उसी तरह अपने पति के अन्दर प्रेम भाव जागृत करो.
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महिला सन्यासी की बात समझ गयी, अब उसे उसकी जड़ी-बूटी मिल चुकी थी.
Jai shree ram hanumantaye namah Ji

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दो रुपये रोज कमाने वाली कल्पना बनीं 700 करोड़ की मालिक, कभी बेचती थीं गोबर के उपले, राष्ट्र्पति भी कर चुके है पद्मश्री से सम्मानित।

पति करता था पिटाई, घरवाले देते थे ताने, एक समय मे खुदखुशी करने का भी सोचा था कल्पना ने।

मुंबई, 12 जनवरी: खुद पर भरोसा हो तो सफलता पाने से कोई नहीं रोक सकता। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है कल्पना सरोज ने। गरीब परिवार में जन्मी कल्पना आज करोड़पति हैं। वे आज 700 करोड़ की कंपनी की मालकिन हैं। कल्पना करोड़ों का टर्नओवर देने वाली कंपनी की चेयरपर्सन और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित हैं। आखिर कैसे मिली उन्हें सफलता? पढ़ते हैं इनके बारे में सबकुछ…कल्पना सरोज कमानी स्टील्स, केएस क्रिएशंस, कल्पना बिल्डर एंड डेवलपर्स, कल्पना एसोसिएट्स जैसी दर्जनों कंपनियों की मालकिन हैं।
समाजसेवा और उद्यमिता के लिए कल्पना को पद्मश्री और राजीव गांधी रत्न के अलावा देश-विदेश में दर्जनों पुरस्कार मिल चुके हैं।
कभी दो रुपए रोज कमाने वाली कल्पना आज 700 करोड़ के साम्राज्य पर राज कर रही हैं। कल्पना का जन्म सूखे का शिकार रह चुके महाराष्ट्र के ‘विदर्भ’ में हुआ था। घर के हालात खराब थे और इसी के चलते कल्पना गोबर के उपले बनाकर बेचा करती थीं। 12 साल की उम्र में ही कल्पना की शादी उससे 10 साल बड़े आदमी से कर दी गई। कल्पना विदर्भ से मुंबई की झोंपड़पट्टी में आ पहुंची। उनकी पढ़ाई रुक चुकी थी। ससुराल में घरेलू कामकाज में जरा सी चूक पर कल्पना रोज पिटतीं, शरीर पर जख्म पड़ चुके थे और जीने की ताकत खत्म हो चुकी थी। एक रोज इस नर्क से भागकर कल्पना अपने घर जा पहुंचीं।
ससुराल पहुंचने की सजा कल्पना के साथ-साथ उसके परिवार को मिली।
पंचायत ने परिवार का हुक्का-पानी बंद कर दिया। हुक्का-पानी के साथ कल्पना को जिंदगी के सभी रास्ते भी बंद नजर आने लगे। कल्पना के पास जीने का कोई मकसद नहीं बचा था । उन्होंने तीन बोतल कीटनाशक पीकर जान देने की कोशिश की लेकिन रिश्ते की एक महिला ने उसे बचा लिया। कल्पना बताती हैं कि जान देने की कोशिश उसकी जिंदगी में एक बड़ा मोड़ लेकर आई। ‘मैंने सोचा कि मैं क्यों जान दे रही हूं, किसके लिए? क्यों न मैं अपने लिए जिऊं, कुछ बड़ा पाने की सोचूं, कम से कम कोशिश तो कर ही सकती हूं।’ 16 साल की उम्र में कल्पना फिर मुंबई लौट आई। लेकिन इस बार एक नई जिंदगी शुरू करने के लिए।
मुंबई पहुंची कल्पना को हुनर के नाम पर कपड़े सिलने आते थे और उसी के बल पर उन्होंने एक गारमेंट कंपनी में नौकरी कर ली। यहां एक दिन में 2 रुपए की मजदूरी मिलती थी जो बेहद कम थी। कल्पना ने निजी तौर पर ब्लाउज सिलने का काम शरू किया।
एक ब्लाउज के 10 रुपए मिलते थे। इसी दौरान कल्पना की बीमार बहन की मौत हो गई। कल्पना बुरी तरह टूट गई। उन्होंने सोचा कि अगर रोज चार ब्लाउज सिले तो 40 रुपए मिलेंगे और घर की मदद भी होगी। उन्होंने ज्यादा मेहनत की, दिन में 16 घंटे काम करके कल्पना ने पैसे जोड़े और घरवालों की मदद की।
इसी दौरान कल्पना ने देखा कि सिलाई और बुटीक के काम में काफी स्कोप है और उन्होंने इसे एक बिजनेस के तौर पर समझने की कोशिश की। दलितों को मिलने वाला 50,000 का सरकारी लोन लेकर एक सिलाई मशीन और कुछ अन्य सामान खरीदा और एक बुटीक शॉप खोल ली। दिन रात की मेहनत से बुटीक शॉप चल निकली तो कल्पना अपने परिवार वालों को भी पैसे भेजने लगी।बचत के पैसों से कल्पना ने एक फर्नीचर स्टोर भी स्थापित किया जिससे काफी अच्छा रिस्पॉन्स मिला। इसी के साथ उन्होंने ब्यूटी पार्लर भी खोला और साथ रहने वाली लड़कियों को काम भी सिखाया।कल्पना ने दोबारा शादी की लेकिन पति का साथ लंबे समय तक नहीं मिल सका। दो बच्चों की जिम्मेदारी कल्पना पर छोड़ बीमारी से उनके पति की मौत हो गई।
कल्पना के संघर्ष और मेहनत को जानने वाले उसके मुरीद हो गए और मुंबई में उन्हें पहचान मिलने लगी। इसी जान-पहचान के बल पर कल्पना को पता चला कि 17 साल से बंद पड़ी ‘कमानी ट्यूब्स’ को सुप्रीम कोर्ट ने उसके कामगारों से शुरू करने को कहा है।
कंपनी के कामगार कल्पना से मिले और कंपनी को फिर से शुरू करने में मदद की अपील की। ये कंपनी कई विवादों के चलते 1988 से बंद पड़ी थी।कल्पना ने वर्करों के साथ मिलकर मेहनत और हौसले के बल पर 17 सालों से बंद पड़ी कंपनी में जान फूंक दी।
कल्पना ने जब कंपनी संभाली तो कंपनी के वर्करों को कई साल से सैलरी नहीं मिली थी, कंपनी पर करोड़ों का सरकारी कर्जा था, कंपनी की जमीन पर किराएदार कब्जा करके बैठे थे, मशीनों के कलपुर्जे या तो जंग खा चुके थे या चोरी हो चुके थे, मालिकाना और लीगल विवाद थे। कल्पना ने हिम्मत नहीं हारी और दिन रात मेहनत करके ये सभी विवाद सुलझाए और महाराष्ट्र के वाडा में नई जमीन पर फिर से सफलता की इबारत लिख डाली।
कल्पना की मेहनत का कमाल है कि आज करोड़ों का टर्नओवर दे रही है। कल्पना बताती हैं कि उन्हें ट्यूब बनाने के बारे में रत्तीभर की जानकारी नहीं थी और मैनेजमेंट उन्हें आता नहीं, लेकिन वर्करों के सहयोग और सीखने की ललक ने आज एक दिवालिया हो चुकी कंपनी को सफल बना दिया।

सरिता गर्ग