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धन का सृजन

हिंदुस्तान पांच हजार साल से दरिद्र है, और दरिद्र होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि हमने धन का सम्मान नहीं किया है। कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति धन का सम्मान करेगा। धन का मोह नहीं कह रहा हूं, सम्मान कह रहा हूं। अगर आपको स्वस्थ रहना है, तो खून का सम्मान करना पड़ेगा। खून चलेगा शरीर में, तभी आप स्वस्थ रहेंगे और अगर आपने कहा कि हम तो खून को इनकार करते हैं, हम खून को मानते ही नहीं, तो फिर पीलिया पकड़ लेगा और बीमार हो जाएंगे और सब समाप्त हो जाएगा

धन समाज की नसों में दौड़ता हुआ खून है। जितना खून समाज की नसों में दौड़ता है, उतना समाज स्वस्थ होता है। धन खून है। और इसलिए अगर कोई खून हाथ में रोक ले बांध कर, तो बीमार पड़ जाएगा,क्योंकि खून अगर रुकता है तो गति बंद हो जाती है। इसलिए जो लोग धन को तिजोरियों में रोकते हैं, वे समाज की खून की गति में बाधा डालते हैं। खून की गति रुक जाती है, समाज बीमार पड़ जाता है। लेकिन जितना अतिरिक्त खून हो, उतना जरूरी है। जितना अतिरिक्त धन हो, उतना जरूरी है। लेकिन गांधीजी का विचार यह कहता है, धन?नहीं, धन की कोई जरूरत नहीं है। वे तो असल में उन लोगों से प्रभावित हैं–टालस्टाय जैसे लोगों से–जो कहते हैं, मुद्रा समाप्त कर देनी चाहिए। जो कहते हैं, रुपया होना नहीं चाहिए। वे चाहते तो अंत में यह हैं कि एक बार्टर सिस्टम, जैसा पुराना था दुनिया में लेन-देन का, मैं आपको गेहूं दे दूं, आप एक बकरी दे दें। मैं एक मुर्गा दे दूं, आप मुझे एक जूते की जोड़ी दे दें। वे तो चाहते हैं कि अंततः समाज ऐसा हो जहां चीजों का लेन-देन हो।

लेकिन ध्यान रहे, चीजों का लेन-देन करने वाला समाज कभी भी सुखी और संपन्न नहीं हो सका है। यह तो लेन-देन इतना उपद्रवपूर्ण है कि मुझे जूता चाहिए, आपकी बकरी बेचनी है; और आपको जूता नहीं चाहिए,आपको गेहूं चाहिए। अब यह गेहूं वाले आदमी को हम खोजने जाते हैं,जो उसे गेहूं दे सकेगा। लेकिन उसे जूता नहीं चाहिए, आपको गेहूं चाहिए। अब यह गेहूं वाले आदमी को हम खोजने जाते हैं, जो उसे गेहूं दे सकेगा। लेकिन उसे न जूता चाहिए, न बकरी चाहिए, उसे मुर्गी चाहिए। अब हम एक आदमी को खोजने जाते हैं जो मुर्गी बेचे। रुपये ने यह व्यवस्था कर दी है कि किसी को कुछ भी चाहिए हो, रुपया माध्यम बन जाता है। कोई फिक्र नहीं, आपको जूता चाहिए, मुझे मुर्गी चाहिए, रुपये से काम हो जाएगा।

रुपया बहुत अदभुत चीज है। अगर मेरे खीसे में एक रुपया नहीं पड़ा है,तेरे खीसे में एक ही साथ करोड़ों चीजें पड़ी हैं। वैकल्पिक संभावनाएं पड़ी हैं। अगर मैं चाहूं तो एक रुपये में खाना ले लूं, मेरे खीसे में खाना पड़ा है। अगर मैं चाहूं तो जूता खरीद लूं; मेरे खीसे में जूता पड़ा है। अगर मैं चाहूं तो एक मोची खरीद लूं; मेरे खीसे में मोची पड़ा है। अगर मैं चाहूं तो दवा ले लूं; मेरे खीसे में दवा पड़ी हुई है। रुपये ने इतना अदभुत काम किया है। लेकिन गांधी जैसे विचारक रुपया और मुद्रा के विरोध में हैं। अगर रुपया दुनिया से हट जाए, तो आदमी वहां पहुंच जाएगा, जहां जंगली आदमी हैं, आज भी आदिवासी हैं। उसको तेल चाहिए तब बेचारा गेहूं लाकर देगा, तब तेल देगा। गेहूं लाकर देगा, तो नमक ले पाएगा! लेकिन वैसी दुनिया में…!

रुपया जो है वह गति है, वह स्पीड है जिंदगी में चलने की। अगर थिर बनाना हो समाज को, जड़ बनाना हो तो रुपया हटा दो। लेकिन इस मुल्क में रुपये का बहुत पुराना…। हम धन के दुश्मन हैं इसलिए हम दरिद्र हैं। हम धन के ऐसे दुश्मन हैं, जिसका कोई हिसाब नहीं। हम कहते हैं, धन की कोई जरूरत ही नहीं है। हम कहते हैं, जो धन छोड़ देता है,वह बड़ा संन्यासी है। हम कहते हैं, जो धन को मानता ही नहीं है, वह बड़ा त्यागी है। वह होगा बड़ा त्यागी, होगा बड़ा संन्यासी, लेकिन वह समाज के लिए खतरनाक है। क्योंकि समाज के भीतर चाहिए धन को पैदा करने की तीव्र व्यवस्था। समाज के भीतर चाहिए कि हम धन का सृजन कर सकें, तो हमारी साख चारों दिशाओं में फैल सकेगी।

देख कबीरा रोया

ओशो

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मुँहसेनिकले_शब्द

एक किसान की एक दिन अपने पड़ोसी से खूब जमकर लड़ाई हुई। बाद में जब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ, तो उसे ख़ुद पर शर्म आई वह इतना शर्मसार हुआ कि एक साधु के पास पहुँचा और पूछा, ‘‘मैं अपनी गलती का प्रायश्चित करना चाहता हूँ।’’ साधु ने कहा कि पंखों से भरा एक थैला लाओ और उसे शहर के बीचों-बीच उड़ा दो। किसानने ठीक वैसा ही किया, जैसा कि साधु ने उससे कहा था और फिर साधु के पास लौट आया। लौटने पर साधु ने उससे कहा, ‘‘अब जाओ और जितने भी पंख उड़े हैं उन्हें बटोर कर थैले में भर लाओ।’’ नादान किसान जब वैसा करने पहुँचा तो उसे मालूम हुआ कि यह काम मुश्किल नहीं बल्कि असंभव है। खैर, खाली थैला ले, वह वापस साधु के पास आ गया। यह देख साधु ने उससे कहा, ‘‘ऐसा ही मुँह से निकले शब्दों के साथ भी होता है।

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. “नकारात्मक सोच” एक व्यक्ति, एक हाथी को रस्सी से बांध कर ले जा रहा था। एक दूसरा व्यक्ति ये सब देख रहा था। उसे बढ़ा आश्चर्य हुआ की इतना बड़ा जानवर इस हलकी सी रस्सी से बंधा जा रहा है दूसरे व्यक्ति ने हाथी के मालिक से पूछा "यह कैसे संभव है की इतना बड़ा जानवर एक हलकी सी रस्सी को नहीं तोड़ पा रहा और तुम्हारे पीछे-पीछे चल रहा है। हाथी के मालिक ने बताया जब ये हाथी छोटे होते हैं तो इन्हें रस्सी से बांध दिया जाता है उस समय यह कोशिश करते है रस्सी को तोड़ने की पर बार-बार कोशिश करने पर भी यह उस रस्सी को नहीं तोड़ पाते तो हाथी सोच लेते हैं कि वह इस रस्सी को नही तोड़ सकते और बड़े होने पर कोशिश करना ही छोड़ देते है। हम भी ऐसी बहुत सी नकारात्मक बातें अपने दिमाग में बैठा लेते हैं की हम नहीं कर सकते। और एक ऐसी ही रस्सी से अपने को बांध लेते हैं जो सच में होती ही नहीं है। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे"


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✍🏼पिता का समाज व पुत्रों के नाम पत्र:

लखनऊ के एक उच्चवर्गीय बूढ़े पिता ने अपने पुत्रों के नाम एक चिट्ठी लिखकर खुद को गोली मार ली।
चिट्टी क्यों लिखी और क्या लिखा। यह जानने से पहले संक्षेप में चिट्टी लिखने की पृष्ठभूमि जान लेना जरूरी है।

पिता सेना में कर्नल के पद से रिटार्यड हुए । वे लखनऊ के एक पॉश कॉलोनी में अपनी पत्नी के साथ रहते थे। उनके दो बेटे थे। जो सुदूर अमेरिका में रहते थे। यहां यह बताने की जरूरत नहीं है कि माता-पिता ने अपने लाड़लों को पालने में कोई कोर कसर नहीं रखी। बच्चे सफलता की सीढ़िंया चढते गए। पढ़-लिखकर इतने योग्य हो गए कि दुनिया की सबसे नामी-गिरामी कार्पोरेट कंपनी में उनको नौकरी मिल गई। संयोग से दोनों भाई एक ही देश में,लेकिन अलग-अलग अपने परिवार के साथ रहते थे।

एक दिन अचानक पिता ने रूंआसे गले से बेटों को खबर दी। बेटे! तुम्हारी मां अब इस दुनिया में नहीं रही । पिता अपनी पत्नी की मिट्टी के साथ बेटों के आने का इंतजार करते रहे। एक दिन बाद छोटा बेटा आया, जिसका घर का नाम चिंटू था।

पिता ने पूछा चिंटू! मुन्ना क्यों नहीं आया। मुन्ना यानी बड़ा बेटा।पिता ने कहा कि उसे फोन मिला, पहली उडान से आये।

धर्मानुसार बडे बेटे का आना सोच वृद्व फौजी ने जिद सी पकड़ ली।

छोटे बेटे के मुंह से एक सच निकल पड़ा। उसने पिता से कहा कि मुन्ना भईया ने कहा कि, “मां की मौत में तुम चले जाओ। पिता जी मरेंगे, तो मैं चला जाऊंगा।”

कर्नल साहब (पिता) कमरे के अंदर गए। खुद को कई बार संभाला फिर उन्होंने चंद पंक्तियो का एक पत्र लिखा। जो इस प्रकार था-

प्रिय बेटो मैंने और तुम्हारी मां ने बहुत सारे अरमानों के साथ तुम लोगों को पाला-पोसा। दुनिया के सारे सुख दिए। देश-दुनिया के बेहतरीन जगहों पर शिक्षा दी। जब तुम्हारी मां अंतिम सांस ले रही थी, तो मैं उसके पास था।वह मरते समय तुम दोनों का चेहरा एक बार देखना चाहती थी और तुम दोनों को बाहों में भर कर चूमना चाहती थी। तुम लोग उसके लिए वही मासूम मुन्ना और चिंटू थे। उसकी मौत के बात उसकी लाश के पास तुम लोगों का इंतजार करने लिए मैं था। मेरा मन कर रहा था कि काश तुम लोग मुझे ढांढस बधाने के लिए मेरे पास होते। मेरी मौत के बाद मेरी लाश के पास तुम लोगों का इंतजार करने के लिए कोई नहीं होगा। सबसे बड़ी बात यह कि मैं नहीं चाहता कि मेरी लाश निपटाने के लिए तुम्हारे बड़े भाई को आना पड़े। इसलिए सबसे अच्छा यह है कि अपनी मां के साथ मुझे भी निपटाकर ही जाओ। मुझे जीने का कोई हक नहीं क्योंकि जिस समाज ने मुझे जीवन भर धन के साथ सम्मान भी दिया, मैंने समाज को असभ्य नागरिक दिये। हाँ अच्छा रहा कि हम अमरीका जाकर नहीं बसे, सच्चाई दब जाती।

मेरी अंतिम इच्छा है कि मेरे मैडल तथा फोटो बटालियन को लौटाए जाए तथा घर का पैसा नौकरों में बाटा जाऐ। जमापूँजी आधी वृद्ध सेवा केन्द्र में तथा आधी सैनिक कल्याण में दी जाऐ।
तुम्हारा पिता

कमरे से ठांय की आवाज आई। कर्नल साहब ने खुद को गोली मार ली।

यह क्यों हुआ, किस कारण हुआ? कोई दोषी है या नहीं। मुझे इसके बारे में कुछ नहीं कहना।
हाँ यह काल्पनिक कहानी नहीं। पूरी तरह सत्य घटना है।

🙏🏻✍🏼😷

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. “सत्कर्म” एक समय मोची का काम करने वाले व्यक्ति को रात में भगवान ने सपना दिया और कहा कि कल सुबह मैं तुझसे मिलने तेरी दुकान पर आऊँगा। मोची की दुकान काफी छोटी थी और उसकी आमदनी भी काफी सीमित थी। खाना खाने के बर्तन भी थोड़े से थे। इसके बावजूद वह अपनी जिंदगी से खुश रहता था। एक सच्चा ईमानदार और परोपकार करने वाला इंसान था। इसलिए ईश्वर ने उसकी परीक्षा लेने का निर्णय लिया। मोची ने सुबह उठते ही तैयारी शुरू कर दी। भगवान को चाय पिलाने के लिए दूध चायपत्ती और नाश्ते के लिए मिठाई ले आया। दुकान को साफ कर वह भगवान का इंतजार करने लगा। उस दिन सुबह से भारी बारिश हो रही थी। थोड़ी देर में उसने देखा कि एक सफाई करने वाली बारिश के पानी में भीगकर ठिठुर रही है। मोची को उसके ऊपर बड़ी दया आई और भगवान के लिए लाए गये दूध से उसको चाय बनाकर पिलाई। दिन गुजरने लगा। दोपहर बारह बजे एक महिला बच्चे को लेकर आई और कहा कि मेरा बच्चा भूखा है इसलिए पीने के लिए दूध चाहिए। मोची ने सारा दूध उस बच्चे को पीने के लिए दे दिया। इस तरह से शाम के चार बज गए। मोची दिन भर बड़ी बेसब्री से भगवान का इंतजार करता रहा। तभी एक बूढ़ा आदमी जो चलने से लाचार था आया और कहा कि मै भूखा हूँ और अगर कुछ खाने को मिल जाए तो बड़ी मेहरबानी होगी।मोची ने उसकी बेबसी को समझते हुए मिठाई उसको दे दी। इस प्रकार दिन बीत गया और रात हो गई। रात होते ही मोची के सब्र का बांध टूट गया और वह भगवान को उलाहना देते हुए बोला कि, "वाह रे भगवान ! सुबह से रात कर दी मैंने तेरे इंतजार में, लेकिन तू वादा करने के बाद भी नहीं आया। क्या मैं गरीब ही तुझे बेवकूफ बनाने के लिए मिला था ?" तभी आकाशवाणी हुई और भगवान ने कहा कि मैं आज तेरे पास एक बार नहीं तीन बार आया और तीनों बार तेरी सेवाओं से बहुत खुश हुआ और तू मेरी परीक्षा में भी पास हुआ है। क्योंकि तेरे मन में परोपकार और त्याग का भाव सामान्य मानव की सीमाओं से परे हैं। भगवान ना जाने किस रूप में हमसे मिल ले हम नही जान पाते हैं। अतः सत्कर्म करते रहने चाहिये। ---------:::×:::--------- "जय जय श्री राधे"


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दीवान टोडरमल जैन और विश्व में जमीन का सबसे महंगा सौदा :-

क्या आप जानते हैं कि विश्व मे अब तक का सबसे महंगा जमीन का सौदा कंहा हुआ है ?

लंदन में ?? पैरिस में ?? न्यू यॉर्क में ??

नहीं…..विश्व में आज तक किसी एक भूमि के टुकड़े का सबसे अधिक दाम चुकाया गया है हमारे भारत में । वह भी पंजाब में स्थित सरहिन्द में और विश्व की इस सबसे महंगी भूमि को ख़रीदने वाले महान व्यक्ति का नाम था दीवान टोडर मल जैन ।

गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे-छोटे साहिबज़ादों बाबा फ़तह सिंह और बाबा ज़ोरावर सिंह की शहादत की दास्तान शायद आप सबने कभी ना कभी कहीं ना कहीं से सुनी होगी……यहीं सिरहिन्द के फ़तहगढ़ साहिब में मुग़लों के तत्कालीन फ़ौजदार वज़ीर खान ने दोनो साहिबज़ादों को जीवित ही दीवार में चिनवा दिया था.

दीवान टोडर मल जो कि इस क्षेत्र के एक धनी व्यक्ति थे और गुरु गोविंद सिंह जी एवं उनके परिवार के लिए अपना सब कुछ क़ुर्बान करने को तैयार थे उन्होंने वज़ीर खान से साहिबज़ादों के पार्थिव शरीर की माँग की और वह भूमि जहाँ वह शहीद हुए थे वहीं पर उनकी अंत्येष्टि करने की इच्छा प्रकट की …. वज़ीर खान ने धृष्टता दिखाते हुए भूमि देने के लिए एक अटपटी और अनुचित माँग रखी…. वज़ीर खान ने माँग रखी कि इस भूमि पर सोने की मोहरें बिछाने पर जितनी मोहरें आएँगी वही इस भूमि का दाम होगा…….दीवान टोडर मल के अपने सब भंडार ख़ाली करके जब मोहरें भूमि पर बिछानी शुरू कीं तो वज़ीर खान ने धृष्टता की पराकाष्ठा पार करते हुए कहा कि मोहरें बिछा कर नहीं बल्कि खड़ी करके रखी जाएँगी ताकि अधिक से अधिक मोहरें वसूली जा सकें………..….तब टोडरमल जी अपने सारे सिक्के बिछा डाले कुल 78000 सोने के सिक्के बिछाये गये और 4 वर्ग मीटर जमीन खरीदी गयी । उस समय के हिसाब से 78000 सोने के सिक्को की कीमत 2 अरब 50 करोड़ रुपये थे , ये आज तक की सबसे महंगी जमीन की कीमत थी , दुनिया में इतने कीमत की इतनी कम जमीन आज तक किसी ने नहीं खरीदी । लेकिन टोडरमल जी ने यह जमीन इस रेट में खरीदी ताकि गुरु जी के साहिबज़ादों का अंतिम संस्कार वहाँ किया जा सके……विश्व के इतिहास में ना तो ऐसे त्याग की कहीं कोई और मिसाल मिलती है ना ही कहीं पर किसी भूमि के टुकड़े का इतना भारी मूल्य कहीं और आज तक चुकाया गया.

जब बाद में गुरु गोविन्द सिंह जी को इस बारे में पता चला तो उन्होंने दीवान टोडर मल से कृतज्ञता प्रकट की और उनसे कहा की वे उनके त्याग से बहुत प्रभावित हैं और उनसे इस त्याग के बदले में कुछ माँगने को कहा.

ज़रा सोचिए दीवान टोडर मल ने क्या माँगा होगा गुरु जी से ????
दीवान जी ने गुरु जी से जो माँगा उसकी कल्पना करना भी असम्भव है !

दीवान टोडर मल जी ने गुरु जी से कहा की यदि कुछ देना ही चाहते हैं तो कुछ ऐसा वर दीजिए की मेरे घर पर कोई पुत्र ना जन्म ले और मेरी वंशावली यहीं मेरे साथ ही समाप्त हो जाए.

इस अप्रत्याशित माँग पर गुरु जी सहित सब लोग हक्के-बक्के रह गए…..गुरु जी ने दीवान जी से इस अद्भुत माँग का कारण पूछा तो दीवान जी का उत्तर ऐसा था जो रोंगटे खड़े कर दे.

दीवान टोडर मल ने उत्तर दिया कि गुरु जी, यह जो भूमि इतना महंगा दाम देकर ख़रीदी गयी और आपके चरणों में न्योछावर की गयी मैं नहीं चाहता की कल को मेरे वंश आने वाली नस्लों में से कोई कहे की यह भूमि मेरे पुरखों ने ख़रीदी थी.

यह थी निस्वार्थ त्याग और भक्ति की आज तक की सबसे बड़ी मिसाल…….

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बन्द मुठ्ठी लाख की !!

एक समय एक राज्य में राजा ने घोषणा की कि वह राज्य के मंदिर में पूजा अर्चना करने के लिए अमुक दिन जाएगा।
इतना सुनते ही मंदिर के पुजारी ने मंदिर की रंग रोगन और सजावट करना शुरू कर दिया, क्योंकि राजा आने वाले थे। इस खर्चे के लिए उसने ₹6000/- का कर्ज लिया ।
नियत तिथि पर राजा मंदिर में दर्शन, पूजा, अर्चना के लिए पहुंचे और पूजा अर्चना करने के बाद आरती की थाली में चार आने दक्षिणा स्वरूप रखें और अपने महल में प्रस्थान कर गए !
पूजा की थाली में चार आने देखकर पुजारी बड़ा नाराज हुआ, उसे लगा कि राजा जब मंदिर में आएंगे तो काफी दक्षिणा मिलेगी पर चार आने !!
बहुत ही दुखी हुआ कि कर्ज कैसे चुका पाएगा, इसलिए उसने एक उपाय सोचा !!!
गांव भर में ढिंढोरा पिटवाया की राजा की दी हुई वस्तु को वह नीलाम कर रहा है। नीलामी पर उसने अपनी मुट्ठी में चार आने रखे पर मुट्ठी बंद रखी और किसी को दिखाई नहीं।
लोग समझे की राजा की दी हुई वस्तु बहुत अमूल्य होगी इसलिए बोली रु10,000/- से शुरू हुई।
रु 10,000/- की बोली बढ़ते बढ़ते रु50,000/- तक पहुंची और पुजारी ने वो वस्तु फिर भी देने से इनकार कर दिया। यह बात राजा के कानों तक पहुंची ।
राजा ने अपने सैनिकों से पुजारी को बुलवाया और पुजारी से निवेदन किया कि वह मेरी वस्तु को नीलाम ना करें मैं तुम्हें रु50,000/-की बजाय सवा लाख रुपए देता हूं और इस प्रकार राजा ने सवा लाख रुपए देकर अपनी प्रजा के सामने अपनी इज्जत को बचाया !
तब से यह कहावत बनी बंद मुट्ठी सवा लाख की खुल गई तो खाक की !!
यह मुहावरा आज भी प्रचलन में है।
ईश्वर ने सृष्टि की रचना करते समय तीन विशेष रचना की…
1. अनाज में कीड़े पैदा कर दिए, वरना लोग इसका सोने और चाँदी की तरह संग्रह करते।

2. मृत्यु के बाद देह (शरीर) में दुर्गन्ध उत्पन्न कर दी, वरना कोई अपने प्यारों को कभी भी जलाता या दफ़न नहीं करता।

3. जीवन में किसी भी प्रकार के संकट या अनहोनी के साथ रोना और समय के साथ भुलना दिया, वरना जीवन में निराशा और अंधकार ही रह जाता, कभी भी आशा, प्रसन्नता या जीने की इच्छा नहीं होती।

जीना सरल है…
प्यार करना सरल है..
हारना और जीतना भी सरल है…
तो फिर कठिन क्या है?
सरल होना बहुत कठिन है।
खुःश रहै,स्वस्थ रहै ।

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देवराज इंद्र और धर्मात्मा तोते की यह कथा महाभारत से है। कहानी कहती है, अगर किसी के साथ ने अच्छा वक्त दिखाया है तो बुरे वक्त में उसका साथ छोड़ देना ठीक नहीं। एक शिकारी ने शिकार पर तीर चलाया। तीर पर सबसे खतरनाक जहर लगा हुआ था। पर निशाना चूक गया। तीर हिरण की जगह एक फले-फूले पेड़ में जा लगा। पेड़ में जहर फैला। वह सूखने लगा। उस पर रहने वाले सभी पक्षी एक-एक कर उसे छोड़ गए। पेड़ के कोटर में एक धर्मात्मा तोता बहुत बरसों से रहा करता था। तोता पेड़ छोड़ कर नहीं गया, बल्कि अब तो वह ज्यादातर समय पेड़ पर ही रहता। दाना-पानी न मिलने से तोता भी सूख कर कांटा हुआ जा रहा था। बात देवराज इंद्र तक पहुंची। मरते वृक्ष के लिए अपने प्राण दे रहे तोते को देखने के लिए इंद्र स्वयं वहां आए।

धर्मात्मा तोते ने उन्हें पहली नजर में ही पहचान लिया। इंद्र ने कहा, ‘देखो भाई इस पेड़ पर न पत्ते हैं, न फूल, न फल। अब इसके दोबारा हरे होने की कौन कहे, बचने की भी कोई उम्मीद नहीं है। जंगल में कई ऐसे पेड़ हैं, जिनके बड़े-बड़े कोटर पत्तों से ढके हैं। पेड़ फल-फूल से भी लदे हैं। वहां से सरोवर भी पास है। तुम इस पेड़ पर क्या कर रहे हो, वहां क्यों नहीं चले जाते?’ तोते ने जवाब दिया, ‘देवराज, मैं इसी पर जन्मा, इसी पर बढ़ा, इसके मीठे फल खाए। इसने मुझे दुश्मनों से कई बार बचाया। इसके साथ मैंने सुख भोगे हैं। आज इस पर बुरा वक्त आया तो मैं अपने सुख के लिए इसे त्याग दूं? जिसके साथ सुख भोगे, दुख भी उसके साथ भोगूंगा, मुझे इसमें आनंद है। आप देवता होकर भी मुझे ऐसी बुरी सलाह क्यों दे रहे हैं?’ यह कह कर तोते ने तो जैसे इंद्र की बोलती ही बंद कर दी। तोते की दो-टूक सुन कर इंद्र प्रसन्न हुए, बोल, ‘मैं तुमसे प्रसन्न हूं, कोई वर मांग लो।’ तोता बोला, ‘मेरे इस प्यारे पेड़ को पहले की तरह ही हरा-भरा कर दीजिए।’ देवराज ने पेड़ को न सिर्फ अमृत से सींच दिया, बल्कि उस पर अमृत बरसाया भी। पेड़ में नई कोंपलें फूटीं। वह पहले की तरह हरा हो गया, उसमें खूब फल भी लग गए। तोता उस पर बहुत दिनों तक रहा, मरने के बाद देवलोक को चला गया। युधिष्ठिर को यह कथा सुना कर भीष्म बोले, ‘अपने आश्रयदाता के दुख को जो अपना दुख समझता है, उसके कष्ट मिटाने स्वयं ईश्वर आते हैं। बुरे वक्त में व्यक्ति भावनात्मक रूप से कमजोर हो जाता है। जो उस समय उसका साथ देता है, उसके लिए वह अपने प्राणों की बाजी लगा देता है। किसी के सुख के साथी बनो न बनो, दुख के साथी जरूर बनो। यही धर्मनीति है और कूटनीति भी।’

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लालचकीदुनिया 🌿🌿🌿

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एक दिन गाँव की एक बहू सफाई कर रही थी मुँह में सुपारी थी पीक आया तो उसने गलती से यज्ञवेदी में थूक दिया।
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उसे आश्चर्य तब हुआ जब उसका थूक स्वर्ण में बदल गया।
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अब तो वह प्रतिदिन जान बूझकर वेदी में थूकने लगी और उसके पास धीरे-धीरे स्वर्ण बढ़ने लगा।
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महिलाओं में बात तेजी से फैलती है इसलिऐ कई और महिलाएं भी अपने-अपने घर में बनी यज्ञवेदी में थूक-थूक कर सोना उत्पादन करने लगीं।
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धीरे-धीरे पूरे गाँव में यह सामान्य चलन हो गया।
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सिवाय एक महिला के, उस महिला को भी अनेक दूसरी महिलाओं ने उकसाया, समझाया, अरी ! तू क्यों नहीं थूकती ?
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जी, बात यह है कि मैं अपने पति की अनुमति बिना यह कार्य हर्गिज नहीं करूँगी और जहाँ तक मुझे ज्ञात है वह अनुमति नहीं देंगे।
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किन्तु ग्रामीण महिलाओं ने ऐसा वातावरण बनाया कि आखिर उसने एक रात डरते-डरते अपने पति को पूछ ही लिया।
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खबरदार जो ऐसा किया तो, यज्ञवेदी क्या थूकने की चीज़ है ?
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पति की गरजदार चेतावनी के आगे बेबस वह महिला चुप हो गई पर जैसा वातावरण था और जो चर्चाएँ होती थी, उनसे वह साध्वी स्त्री बहुत व्यथित रहने लगी।
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खास कर उसके सूने गले को लक्ष्य कर अन्य स्त्रियाँ अपने नए-नए कण्ठ-हार दिखाती तो वह अन्तर्द्वन्द में घुलने लगी।
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पति की व्यस्तता और स्त्रियों के उलाहने उसे धर्मसंकट में डाल देते।
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यह शायद मेरा दुर्भाग्य है, अथवा कोई पूर्वजन्म का पाप कि एक सती स्त्री होते हुए भी मुझे एक रत्ती सोने के लिए भी तरसना पड़ रहा है,
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शायद यह मेरे पति का कोई गलत निर्णय है, ओह ! इस धर्माचरण ने मुझे दिया ही क्या है ?
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जिस नियम के पालन से दिल कष्ट पाता रहे उसका पालन क्यों करूँ ? और हुआ यह कि वह बीमार रहने लगी।
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पतिदेव इस रोग को ताड़ गए और उन्होंने एक दिन ब्रह्म मुहूर्त में ही सपरिवार ग्राम त्यागने का निश्चय किया।
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गाड़ी में सारा सामान डालकर वे रवाना हो गए। सूर्योदय से पहले-पहले ही वे बहुत दूर निकल जाना चाहते थे।
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किन्तु ! अरे ! यह क्या ? ज्यों ही वे गाँव की कांकड़ (सीमा) से बाहर निकले ! पीछे भयानक विस्फोट हुआ।
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पूरा गांव धू-धू कर जल रहा था। सज्जन दम्पत्ति अवाक् रह गए।
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अब उस स्त्री को अपने पति का महत्त्व समझ आ गया।
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वास्तव में, इतने दिन गाँव बचा रहा, तो केवल इस कारण, कि उसका परिवार गाँव की परिधि में था।
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धर्मांचरण करते रहें, कुछ पाने के लालच में इंसान बहुत कुछ खो बैठता है। इसलिए लालच से बचें, भजन सिमरण करते रहें।

जय श्री हरि…
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लालचकीदुनिया 🌿🌿🌿

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एक दिन गाँव की एक बहू सफाई कर रही थी मुँह में सुपारी थी पीक आया तो उसने गलती से यज्ञवेदी में थूक दिया।
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उसे आश्चर्य तब हुआ जब उसका थूक स्वर्ण में बदल गया।
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अब तो वह प्रतिदिन जान बूझकर वेदी में थूकने लगी और उसके पास धीरे-धीरे स्वर्ण बढ़ने लगा।
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महिलाओं में बात तेजी से फैलती है इसलिऐ कई और महिलाएं भी अपने-अपने घर में बनी यज्ञवेदी में थूक-थूक कर सोना उत्पादन करने लगीं।
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धीरे-धीरे पूरे गाँव में यह सामान्य चलन हो गया।
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सिवाय एक महिला के, उस महिला को भी अनेक दूसरी महिलाओं ने उकसाया, समझाया, अरी ! तू क्यों नहीं थूकती ?
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जी, बात यह है कि मैं अपने पति की अनुमति बिना यह कार्य हर्गिज नहीं करूँगी और जहाँ तक मुझे ज्ञात है वह अनुमति नहीं देंगे।
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किन्तु ग्रामीण महिलाओं ने ऐसा वातावरण बनाया कि आखिर उसने एक रात डरते-डरते अपने पति को पूछ ही लिया।
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खबरदार जो ऐसा किया तो, यज्ञवेदी क्या थूकने की चीज़ है ?
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पति की गरजदार चेतावनी के आगे बेबस वह महिला चुप हो गई पर जैसा वातावरण था और जो चर्चाएँ होती थी, उनसे वह साध्वी स्त्री बहुत व्यथित रहने लगी।
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खास कर उसके सूने गले को लक्ष्य कर अन्य स्त्रियाँ अपने नए-नए कण्ठ-हार दिखाती तो वह अन्तर्द्वन्द में घुलने लगी।
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पति की व्यस्तता और स्त्रियों के उलाहने उसे धर्मसंकट में डाल देते।
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यह शायद मेरा दुर्भाग्य है, अथवा कोई पूर्वजन्म का पाप कि एक सती स्त्री होते हुए भी मुझे एक रत्ती सोने के लिए भी तरसना पड़ रहा है,
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शायद यह मेरे पति का कोई गलत निर्णय है, ओह ! इस धर्माचरण ने मुझे दिया ही क्या है ?
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जिस नियम के पालन से दिल कष्ट पाता रहे उसका पालन क्यों करूँ ? और हुआ यह कि वह बीमार रहने लगी।
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पतिदेव इस रोग को ताड़ गए और उन्होंने एक दिन ब्रह्म मुहूर्त में ही सपरिवार ग्राम त्यागने का निश्चय किया।
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गाड़ी में सारा सामान डालकर वे रवाना हो गए। सूर्योदय से पहले-पहले ही वे बहुत दूर निकल जाना चाहते थे।
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किन्तु ! अरे ! यह क्या ? ज्यों ही वे गाँव की कांकड़ (सीमा) से बाहर निकले ! पीछे भयानक विस्फोट हुआ।
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पूरा गांव धू-धू कर जल रहा था। सज्जन दम्पत्ति अवाक् रह गए।
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अब उस स्त्री को अपने पति का महत्त्व समझ आ गया।
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वास्तव में, इतने दिन गाँव बचा रहा, तो केवल इस कारण, कि उसका परिवार गाँव की परिधि में था।
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धर्मांचरण करते रहें, कुछ पाने के लालच में इंसान बहुत कुछ खो बैठता है। इसलिए लालच से बचें, भजन सिमरण करते रहें।

जय श्री हरि…
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