Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🙏पाखंड….

एक बार सन् 1989 में सुबह टीवी पर जगत गुरु शंकराचार्य कांची कामकोटि जी से प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम चल रहा था।

एक व्यक्ति ने जगत गुरु शंकराचार्य जी से प्रश्न किया कि हम भगवान को भोग क्यों लगाते हैं ?

हम जो कुछ भी भगवान को चढ़ाते हैं, उसमें से भगवान क्या खाते हैं..? क्या पीते हैं..?
क्या हमारे चढ़ाए हुए पदार्थ के रुप रंग स्वाद या मात्रा में कोई परिवर्तन होता है..?

यदि नहीं तो हम यह कर्म क्यों करते हैं। क्या यह पाखंड नहीं है..? यदि यह पाखंड है तो हम भोग लगाने का पाखंड क्यों करें… ?

मेरी भी जिज्ञासा बढ़ गई थी, कि शायद प्रश्नकर्ता ने आज जगद्गुरु शंकराचार्य जी को बुरी तरह घेर लिया है देखूं क्या उत्तर देते हैं।

किंतु जगद्गुरु शंकराचार्य जी तनिक भी विचलित नहीं हुए। बड़े ही शांत चित्त से उन्होंने उत्तर देना शुरू किया।

उन्होंने कहा यह समझने की बात है कि जब हम प्रभु को भोग लगाते हैं तो वह उसमें से क्या ग्रहण करते हैं।

मान लीजिए कि आप लड्डू लेकर भगवान को भोग चढ़ाने मंदिर जा रहे हैं और रास्ते में आपका जानने वाला कोई मिलता है और पूछता है यह क्या है तब आप उसे बताते हैं कि यह लड्डू है। फिर वह पूछता है कि किसका है..? तब आप कहते हैं कि यह मेरा है।

फिर जब आप वही मिष्ठान्न (लडडू) प्रभु के श्री चरणों में रख कर उन्हें समर्पित कर देते हैं और उसे लेकर घर को चलते हैं तब फिर आपको जानने वाला कोई दूसरा मिलता है और वह पूछता है कि यह क्या है… ?

तब आप कहते हैं कि यह प्रसाद है फिर वह पूछता है कि किसका है तब आप कहते हैं कि यह हनुमान जी का है।

अब समझने वाली बात यह है कि लड्डू वही है। उसके रंग रूप स्वाद परिमाण में कोई अंतर नहीं पड़ता है तो प्रभु ने उसमें से क्या ग्रहण किया कि उसका नाम बदल गया। वास्तव में प्रभु ने मनुष्य के मम कार को हर लिया। यह मेरा है का जो भाव था, अहंकार था प्रभु के चरणों में समर्पित करते ही उसका हरण हो गया।

प्रभु को भोग लगाने से मनुष्य विनीत स्वभाव का बनता है शीलवान होता है। अहंकार रहित स्वच्छ और निर्मल चित्त मन का बनता है।

इसलिए इसे पाखंड नहीं कहा जा सकता है। यह मनो विज्ञान है। इतना सुन्दर उत्तर सुन कर मैं भाव विह्वल हो गया।

कोटि-कोटि नमन है देश के संतों को जो हमें अज्ञानता से दूर ले जाते हैं और हमें ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित करते हैं…

और अगर आपके बुरे वक्त मे जो भाई बन्धु – मित्रगण या रिश्तेदार आपका साथ छोड़ रहे उन्हें अनदेखा किजिये। सदैव सकारात्मक रहे इसी सोच के साथ सदैव हंसते रहें, मुस्काराते रहें
🙏राधे राधे जय श्री कृष्ण 🚩

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♦️♦️♦️रात्रि कहांनी ♦️♦️♦️

8 साल का एक बच्चा 1 रूपये का सिक्का मुट्ठी में लेकर एक दुकान पर जाकर कहा,
–क्या आपके दुकान में ईश्वर मिलेंगे?🏵️ 🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅

दुकानदार ने यह बात सुनकर सिक्का नीचे फेंक दिया और बच्चे को निकाल दिया।

बच्चा पास की दुकान में जाकर 1 रूपये का सिक्का लेकर चुपचाप खड़ा रहा!

— ए लड़के.. 1 रूपये में तुम क्या चाहते हो?
— मुझे ईश्वर चाहिए। आपके दुकान में है?

दूसरे दुकानदार ने भी भगा दिया।

लेकिन, उस अबोध बालक ने हार नहीं मानी। एक दुकान से दूसरी दुकान, दूसरी से तीसरी, ऐसा करते करते कुल चालीस दुकानों के चक्कर काटने के बाद एक बूढ़े दुकानदार के पास पहुंचा। उस बूढ़े दुकानदार ने पूछा,

— तुम ईश्वर को क्यों खरीदना चाहते हो? क्या करोगे ईश्वर लेकर?

पहली बार एक दुकानदार के मुंह से यह प्रश्न सुनकर बच्चे के चेहरे पर आशा की किरणें लहराईं৷ लगता है इसी दुकान पर ही ईश्वर मिलेंगे !
बच्चे ने बड़े उत्साह से उत्तर दिया,

—-इस दुनिया में मां के अलावा मेरा और कोई नहीं है। मेरी मां दिनभर काम करके मेरे लिए खाना लाती है। मेरी मां अब अस्पताल में हैं। अगर मेरी मां मर गई तो मुझे कौन खिलाएगा ? डाक्टर ने कहा है कि अब सिर्फ ईश्वर ही तुम्हारी मां को बचा सकते हैं। क्या आपके दुकान में ईश्वर मिलेंगे?

— हां, मिलेंगे…! कितने पैसे हैं तुम्हारे पास?

— सिर्फ एक रूपए।

— कोई दिक्कत नहीं है। एक रूपए में ही ईश्वर मिल सकते हैं।

दुकानदार बच्चे के हाथ से एक रूपए लेकर उसने पाया कि एक रूपए में एक गिलास पानी के अलावा बेचने के लिए और कुछ भी नहीं है। इसलिए उस बच्चे को फिल्टर से एक गिलास पानी भरकर दिया और कहा, यह पानी पिलाने से ही तुम्हारी मां ठीक हो जाएगी।

अगले दिन कुछ मेडिकल स्पेशलिस्ट उस अस्पताल में गए। बच्चे की मां का अॉप्रेशन हुआ। और बहुत जल्द ही वह स्वस्थ हो उठीं।

डिस्चार्ज के कागज़ पर अस्पताल का बिल देखकर उस महिला के होश उड़ गए। डॉक्टर ने उन्हें आश्वासन देकर कहा, “टेंशन की कोई बात नहीं है। एक वृद्ध सज्जन ने आपके सारे बिल चुका दिए हैं। साथ में एक चिट्ठी भी दी है”।

महिला चिट्ठी खोलकर पढ़ने लगी, उसमें लिखा था-
“मुझे धन्यवाद देने की कोई आवश्यकता नहीं है। आपको तो स्वयं ईश्वर ने ही बचाया है … मैं तो सिर्फ एक ज़रिया हूं। यदि आप धन्यवाद देना ही चाहती हैं तो अपने अबोध बच्चे को दिजिए जो सिर्फ एक रूपए लेकर नासमझों की तरह ईश्वर को ढूंढने निकल पड़ा। उसके मन में यह दृढ़ विश्वास था कि एकमात्र ईश्वर ही आपको बचा सकते है। विश्वास इसी को ही कहते हैं। ईश्वर को ढूंढने के लिए करोड़ों रुपए दान करने की ज़रूरत नहीं होती, यदि मन में अटूट विश्वास हो तो वे एक रूपए में भी मिल सकते हैं।”

आइए, इस महामारी से बचने के लिए हम सभी मन से ईश्वर को ढूंढे … उनसे प्रार्थना करें… उनसे माफ़ी मांगे…!!!

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आज सोने से पहले एक अध्यापक बच्चों को कुछ सीखा रहे थे, उन्होंने एक छोटे बरतन में पानी भरा और उसमें एक मेंढक को डाल दिया, पानी में डालते ही मेंढक आराम से

पानी में खेलने लगा, अब अध्यापक ने उस बर्तन को गैस पर रखा और नीचे से गर्म करना शुरू किया, जैसे ही थोड़ा तापमान बढ़ा तो मेंढक ने अभी अपने शरीर के तापमान को थोड़ा उसी तरह adjust कर लिया, अब जैसे ही बर्तन का थोड़ा तापमान बढ़ता मेंढक भी अपने शरीर के तापमान को उसी तरह adjust कर लेता और उसी बर्तन में मजे से पड़ा रहता, धीरे धीरे तापमान बढ़ना शुरू हुआ, एक समय ऐसा भी आया जब पानी उबलने लगा और अब मेंढक की क्षमता जवाब देने लगी, अब बर्तन में रुके रहना संभव ना था, बस फिर क्या था मेंढक ने बर्तन से बाहर निकलने के लिए छलांग लगायी लेकिन अफ़सोस ऐसा हो ना सका,मेंढक अपनी पूरी ताकत लगाने के बावजूद उस पानी से भरे बर्तन से नहीं निकल पा रहा था क्योंकि वह अपने शरीर का तापमान adjust करने में ही सारी ताकत खो चुका था, कुछ ही देर में गर्म पानी में पड़े पड़े मेंढक ने प्राण त्याग दिए, अब अध्यापक ने बच्चों से पूछा कि मेंढक को किसने मारा ?

कुछ बच्चों ने कहा – गर्म पानी ने……

लेकिन अध्यापक ने बताया कि मेंढक को गर्म पानी ने नहीं मारा बल्कि वो खुद अपनी सोच से मरा है, क्यों…. जब मेंढक को छलांग मारने की

आवश्यकता थी उस समय तो वो तापमान को adjust करने में लगा था उसने अपनी क्षमता का प्रयोग नहीं किया जब तापमान बहुत ज्यादा बढ़ गया तब तक वह कमजोर हो चुका था, यह हम सब लोगों के जीवन की भी कहानी है, हम अपनी परिस्थितियों से हमेशा समझौता करने में लगे रहते हैं, हम परिस्थितियों से निकलने का प्रयास नहीं करते उनसे समझौता करना सीख लेते हैं और सारा जीवन ऐसे ही निकाल देते हैं जब परिस्थितियां हमें बुरी तरह घेर लेती हैं तब हम पछताते हैं, काश हमने भी समय पर छलांग मारी होती..... अच्छी बुरी हर तरह की परिस्थितियां इंसान के सामने आती हैं, लेकिन हमको परिस्थितियों से समझौता नहीं करना है, बहुत सारे लोग बुरी परिस्थितियों को अपना भाग्य मानकर ही पूरा जीवन दुखों में काट देते हैं, बहुत अफ़सोस होता है कि लोग समय पर छलांग क्यों नहीं मारते,

संघर्ष ही इंसान को जीना सिखाता है-स्वामी विवेकानंद *कोई फरिश्ता तुम्हारे आंसू पोंछने नहीं आएगा, कोई फरिश्ता तुमको ऊँगली पकड़ के सफलता तक नहीं ले जायेगा, अगर कोई इंसान आपकी मदद कर सकता है तो वो हैं आप खुद, आप ही वो इंसान है जो खुद को सबसे बेहतर तरीके से जानते हैं, खुद को मरने मत दीजिये अपने अंदर के जोश को ठंडा मत होने दीजिये, उठिए देखिये आपकी मंजिल आपका इंतजार कर रही है,*

शुभ-रात्रि
जय श्री कृष्णा
🙏🏻😊🙏🏻

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एक बेटे ने पिता से पूछा-
पापा.. ये ‘सफल जीवन’ क्या होता है ?

पिता, बेटे को पतंग उड़ाने ले गए।
बेटा पिता को ध्यान से पतंग उड़ाते देख रहा था…

थोड़ी देर बाद बेटा बोला-
पापा.. ये धागे की वजह से पतंग अपनी आजादी से और ऊपर की और नहीं जा पा रही है, क्या हम इसे तोड़ दें !! ये और ऊपर चली जाएगी….

*पिता ने धागा तोड़ दिया **..

पतंग थोड़ा सा और ऊपर गई और उसके बाद लहरा कर नीचे आयी और दूर अनजान जगह पर जा कर गिर गई…

तब पिता ने बेटे को जीवन का दर्शन समझाया…

बेटा..
‘जिंदगी में हम जिस ऊंचाई पर हैं..
हमें अक्सर लगता की कुछ चीजें, जिनसे हम बंधे हैं वे हमें और ऊपर जाने से रोक रही हैं
जैसे :
-घर-
-परिवार-
-अनुशासन-
-माता-पिता-
-गुरू-और-
-समाज-
और हम उनसे आजाद होना चाहते हैं…

वास्तव में यही वो धागे होते हैं जो हमें उस ऊंचाई पर बना के रखते हैं..

‘इन धागों के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे परन्तु बाद में हमारा वो ही हश्र होगा जो बिन धागे की पतंग का हुआ…’

“अतः जीवन में यदि तुम ऊंचाइयों पर बने रहना चाहते हो तो, कभी भी इन धागों से रिश्ता मत तोड़ना..”

*”धागे और पतंग जैसे जुड़ाव के सफल संतुलन से मिली हुई ऊंचाई को ही ‘सफल जीवन’ कहते हैं..”।।

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गंगा दशहरा


Gangāvataraṇaगंगा नदी का वंशस्वर्ग से पृथ्वी तक । आकाशीय गंगा नदी का क्रिस्टल साफ पानी, जब धरती पर उतरता है, एक देवी के रूप में प्रकट हुआ, पवित्र धर्मों, दार्शनिकों और कलाकारों द्वारा सुंदर मैदान । उसकी माचिस क्रिस्टल स्पष्ट चमकदार सुंदरता सभी प्राणियों के निर्माता थी । वह पानी है, वह सब कुछ है; उसके बिना, कुछ भी नहीं है । गंगा पृथ्वी पर नदी । आप एक इच्छा पूर्ति करने वाली रेंग कलपलाता है जो दुनिया को फल प्रदान करता है । आप दुखों के नाशक हैं । तुम समुद्र में बह जाओ एक युवा पुरुष की खुशी के साथ, भंवर दूर एक तरफ झलक के साथ ।कल्पलतामिव फलदां लोके प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके ।पारावारविहारिणि गङ्गे विमुखयुवतिकृततरलापाङ्गे ॥६॥ (गंगा स्तोत्र)प्राचीन साहित्य से प्रेरणा है पेंटिंग, स्वर्गीय गंगा नदी की स्तुति । भारत की मनाई गई नदी । बरसने वाले बादल शक्तिशाली हाथियों के रूप में देखे जा सकते हैं, बारिश में पिघलते हुए, दिव्य गूस (हंस) स्वर्ग से दिव्य कमल पर ओस की बूंदों को चढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं । आसमान में उड़ते हुए गूज ला रहे हैं बादलों की माला गंगा मैया का अभिवादन करने के लिएरेशम सफेद नौ यार्ड मराठी साड़ी में सुरुचिपूर्ण गंगा चढ़ी हुई है । खिले सफ़ेद कमल पकड़े हैं नाथ, प्रसिद्ध मराठी नाक के आभूषण । उसके कान के गहने मत्स्य कुंडल, कंठार, हेर और मेखला मोती हैं । उसके लंबे काले बाल सुबह के ओस के मोतियों को प्लमेट करते हुए नजर आते हैं । वो पानी है तो बदन भीगा भीगा हुआ है उसके उतरने की कोमल गीत सभी एनिमैट, जागरूक और फलती फूलती है । मकर, उसकी वान, और यक्ष दोनों प्रजनन और समृद्धि के प्रतीक हैं । दोनों को उसकी सबसे खुशी की नज़र मिल रही है । सभी सरीसृप, जलीय जानवर, आश्चर्यजनक रूप से उसके वंश को देखते हैं । पेंटिंग का हर हिस्सा आकाशीय से सांसारिक दुनिया अमुर्ता से मुरता तक उसके आगमन का आनंद ले रहा है । जीवन को पानी ।IIश्रीIIPainting © by Dr. Shriikant Pradhan कैनवास पर 4 फीट एक्स 3 फीट एक्रिलिक ।

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गंगा दशहरा


गंगा जल पीकर प्रेत की हुई मुक्ति
एक ब्राह्मण प्रयागराज से 5 कोस (1 कोस = करीब2 मील) की दूरी पर रहता था । वह प्रत्येक संक्रांति के दिन स्नान करने के लिए प्रयाग में जाया करता था । माघ मास की संक्रांति के दिन तो वह अपने परिवारसहित अवश्य ही वहाँ जाता था ।

जब वह ब्राह्मण बूढ़ा और चलने में असमर्थ हो गया, तब एक बार माघ की संक्रांति आने पर उसने अपने पुत्र को बुलाकर कहा : ‘‘हे पुत्र ! तुम प्रयागराज जाओ, त्रिवेणी में स्नान करके मेरे लिए भी त्रिवेणी के जल की गागर भरकर लाना और संक्रांति के पुण्यकाल में मुझे स्नान कराना, देर मत करना ।

पिता के वचन का पालन करते हुए उसका पुत्र प्रयाग के लिए चल पड़ा । त्रिवेणी में स्नान कर जब वह जल से भरी गागर पिता के स्नान के लिए ला रहा था तो रास्ते में उसे एक प्रेत मिला । वह प्यास के कारण बहुत व्याकुल हो रहा था और गंगाजल पीने की इच्छा से रास्ते में पड़ा था ।

लड़के ने प्रेत से कहा : ‘‘मुझे रास्ता दो । प्रेत : ‘‘तुम कहाँ से आये हो ? तुम्हारे सिर पर क्या है ?
‘‘त्रिवेणी का जल है ।‘‘
“मैं इसी इच्छा से रास्ते में पड़ा हूँ कि कोई दयालु मुझे गंगाजल पिलाये तो मैं इस प्रेत-योनि से मुक्त हो जाऊँ क्योंकि मैंने गंगाजल का प्रभाव अपने नेत्रों से देखा है ।
‘‘क्या प्रभाव देखा है ?”

एक ब्राह्मण बड़ा विद्वान था । उसने शास्त्रार्थ द्वारा दिग्विजय प्राप्त करके बहुत धन उपार्जित कर रखा था । लेकिन क्रोधवश उसने किसी ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण को मार दिया । उस पाप के कारण मरने पर वह ब्रह्मराक्षस हुआ और हमारे साथ 8 वर्षों तक रहा । 8 वर्षों के बाद उसके पुत्र ने उसकी हड्डियाँ लाकर श्रीगंगाजी के निर्मल तीर्थ कनखल में डालकर गंगाजी से प्रार्थना की : ‘हे पापनाशिनी गंगा माते ! मेरे पिता को सद्गति प्रदान कीजिये । तब तत्काल ही वह ब्राह्मण ब्रह्मराक्षस भाव से मुक्त हो गया ।

उसीने मरते समय मुझे गंगाजल का माहात्म्य सुनाया था । मैं उसको मुक्त हुआ देखकर गंगाजल-पान की इच्छा से यहाँ पड़ा हूँ । अतः मुझको भी गंगाजल पिलाकर मुक्त कर दे, तुझे महान पुण्य होगा ।

‘‘मैं लाचार हूँ क्योंकि मेरे पिता बीमार हैं और उनका संक्रांति के स्नान का नियम है । यदि मैंने यह गंगाजल तुझे पिला दिया तो स्नान के पुण्यकाल तक न पहुँचने के कारण मेरे पिता का नियम भंग हो जायेगा ।”
‘‘तुम्हारे पिता का नियम भी भंग न हो और मेरी भी सद्गति हो जाय, ऐसा उपाय करो । पहले मुझे जल पिला दो,फिर नेत्रबंद करने पर मैं तुम्हें तत्काल श्रीगंगाजी के तट पर पहुँचाकर,तुम्हारे पिता के पास पहुँचा दूँगा ।”

ब्राह्मणपुत्र ने प्रेत की दुर्दशा पर दया करके उसे जल पिला दिया । तब प्रेत ने कहा : ‘‘अब नेत्रबंद करो और त्रिवेणी का जल लिये हुए स्वयं को अपने पिता के पास पहुँचा हुआ पाओ । ब्राह्मणपुत्र ने नेत्रबंद किये, फिर देखा कि वह त्रिवेणी के जल से गागर भरकर पिताजी के पास पहुँच गया है ।

गंगाजी की महिमा के विषय में भगवान व्यासजी ‘पद्म पुराण में कहते हैं : ‘‘अविलंब सद्गति का उपाय सोचनेवाले सभी स्त्री-पुरुषों के लिए गंगाजी ही एक ऐसा तीर्थ हैं, जिनके दर्शनमात्र से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ।

भगवान शंकर नारदजी से कहते हैं : ‘‘समुद्रसहित पृथ्वी का दान करने से मनीषी पुरुष जो फल पाते हैं, वही फल गंगा-स्नान करनेवाले को सहज में प्राप्त हो जाता है । राजा भगीरथ ने भगवान शंकर की आराधना करके गंगाजी को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा था । जिस दिन वे गंगाजी को पृथ्वी पर लेकर आये वही दिन ‘गंगा दशहरा के नाम से जाना जाता है ।

हर हर गंगे🙏🙏

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एक राजा था। उसने दस खूंखार जंगली कुत्ते पाल रखे थे। उसके दरबारियों और मंत्रियों से जब कोई मामूली सी भी गलती हो जाती तो वह उन्हें उन कुत्तों को ही खिला देता।

एक बार उसके एक विश्वासपात्र सेवक से एक छोटी सी भूल हो गयी, राजा ने उसे भी उन्हीं कुत्तों के सामने डालने का हुक्म सुना दिया।

उस सेवक ने उसे अपने दस साल की सेवा का वास्ता दिया, मगर राजा ने उसकी एक न सुनी।

फिर उसने अपने लिए दस दिन की मोहलत माँगी जो उसे मिल गयी।

अब वह आदमी उन कुत्तों के रखवाले और सेवक के पास गया
और उससे विनती की कि वह उसे दस दिन के लिए अपने साथ काम करने का अवसर दे।

किस्मत उसके साथ थी, उस रखवाले ने उसे अपने साथ रख लिया।

दस दिनों तक उसने उन कुत्तों को खिलाया, पिलाया, नहलाया, सहलाया और खूब सेवा की।

आखिर फैसले वाले दिन राजा ने जब उसे उन कुत्तों के सामने फेंकवा दिया तो वे उसे चाटने लगे, उसके सामने दुम हिलाने और लोटने लगे।

राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ।

उसके पूछने पर उस आदमी ने बताया कि महाराज इन कुत्तों ने मेरी मात्र दस दिन की सेवा का इतना मान दिया ।
बस महाराज ने वर्षों की सेवा को एक छोटी सी भूल पर भुला दिया।
राजा को अपनी गलती का अहसास हो गया।
और उसने उस आदमी को तुरंत
भूखे मगरमच्छों के सामने डलवा दिया।

सीख:- आखिरी फैसला अधिकारियों का ही होता है उसपर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता…

सरकारी कर्मचारियों को समर्पित*
😃😃😃😃😃

अनुज जैसवाल

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एक गरीब एक दिन एक सिक्ख के पास अपनी जमीन बेचने गया, बोला सरदार जी मेरी 2 एकड़ जमीन आप रख लो.
सिक्ख बोला, क्या कीमत है ?
गरीब बोला, 50 हजार रुपये.
सिक्ख थोड़ी देर सोच कर बोला, वो ही खेत जिसमें ट्यूबवेल लगा है ?
गरीब: जी. आप मुझे 50 हजार से कुछ कम भी देंगे, तो जमीन आपको दे दूँगा.
सिक्ख ने आँखें बंद कीं, 5 मिनट सोच कर बोला: नहीं, मैं उसकी कीमत 2 लाख रुपये दूँगा.
गरीब: पर मैं तो 50 हजार मांग रहा हूँ, आप 2 लाख क्यों देना चाहते हैं ?
सिक्ख बोला, तुम जमीन क्यों बेच रहे हो ?
गरीब बोला, बेटी की शादी करना है इसीलिए मज़बूरी में बेचना है. पर आप 2 लाख क्यों दे रहे हैं ?
सिक्ख बोला, मुझे जमीन खरीदनी है, किसी की मजबूरी नहीं. अगर आपकी जमीन की कीमत मुझे मालूम है तो मुझे आपकी मजबूरी का फायदा नहीं उठाना, मेरा वाहेगुरू कभी खुश नहीं होगा.
ऐसी जमीन या कोई भी साधन, जो किसी की मजबूरियों को देख के खरीदा जाये वो जिंदगी में सुख नहीं देता, आने वाली पीढ़ी मिट जाती है.
सिक्ख ने कहा: मेरे मित्र, तुम खुशी खुशी, अपनी बेटी की शादी की तैयारी करो, 50 हजार की व्यवस्था हम गांव वाले मिलकर कर लेंगे, तेरी जमीन भी तेरी ही रहेगी.
मेरे गुरु नानक देव साहिब ने भी अपनी बानी में यही हुक्म दिया है.
गरीब हाथ जोड़कर नीर भरी आँखों के साथ दुआयें देता चला गया।
ऐसा जीवन हम भी बना सकते हैं.
बस किसी की मजबूरी न खरीदें, किसी के दर्द, मजबूरी को समझ कर, सहयोग करना ही सच्चा तीर्थ है, एक यज्ञ है. सच्चा कर्म और बन्दगी है

रत्नलालजी जीनगर

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एक बार नारदजी भगवान के पास पहुंचे और अपनी डींग मारने लगे कि भगवन् मैं आपके नाम का जप निरन्तर करता रहता हूँ।भगवन् क्या मेरे जैसा आपका कोई और भक्त भी है?
भगवान ने एक पता दिया ठाकुर राजेश सिंह का;
नारद बिना देर किये राजेश सिंह के घर पहुंच कर राजेश सिंह की गतिविधि को बारीकी से अध्ययन कर के पुनः भगवान के पास पहुँचे और बोले; भगवन् मैं तीन दिन लगातार चौबीस घण्टे उनपर दृष्टि जमाये रखा किन्तु प्रभु उनको मैंने देखा सुबह उठे तो आपका नाम लिया, पूजा भी किया तो मन ही मन पता नही थोड़ी देर बुदबुदाये और हरवाह के साथ खेत पर जाकर नौकर से उलटे सीधे बकते रहे।दोपहर में भोजन के समय फिर आपका नाम लेते देखा।संध्याहुई तो हाँथ पाँव धो कर फिर आपका नाम लिया।भोजन कर के जब शयन के लिए गए तो तीन चार बार आपका नाम ले कर सो गए।
मैं तीन दिन तक बराबर यही दिनचर्या देखा।प्रभु वे चार बार आपका नाम ले कर मुझसे भी कैसे महान होगये।भगवान ने कहा इस बात को नारद जी यहीं छोडो।मेरा एक काम कर दो, यह घृत से भरा कटोरा गोलोक धाम में यज्ञ हो रहा है इसे वहां पहुंचा दो।किन्तु ये ध्यान रखना कि कामधेनु का घृत है एक बूँद भी छलकने न पाये।
नारद ;जैसी प्रभु की आज्ञा।कह कर नारद जब गोलोक घृत पहुंचा कर वापस आये तब भगवान ने पूँछा-नारदजी इस लोक से गोलोक तक के आने जाने के मार्ग में मुझे कितनी बार याद किया।नारद ने कहा भगवन् मेरा सारा ध्यान तो घृत पर था।आते समय यह खुशी थी कि सकुशल घी पहुंचा दिया।इस दोनों के चक्कर ने आपका नाम विस्मृत करा दिया।
भगवान बोले नारद जी एक कटोरे घृत ने मुझे भुला दिया,यदि राजेश सिंह के जैसा गृहस्थी का भार सौप दिया जाय तो ? मुझे कभी याद भी नही करोगे।एक वह मेरा भक्त गृहस्थी काबोझ,सन्सार के व्यवहार का बोझ, फिर भी मुझे चार बार तो याद किया।
इस लिए जगत का व्यवहार निपटाते हुए जितना समय हो सके हरि स्मरण में लगाते रहें।
भगवान स्वयं कहते हैं मैं अपने भक्त के योग(अप्राप्ति की प्राप्ति)और क्षेम(दिए हुए की रक्षा) के भार को मई स्वयं वहन करता हूँ। हरि ॐ नमोनारायण

नंदकिशोर वैश्य

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एक बार दो आदमी एक मंदिर के पास बैठे गपशप कर रहे थे
वहां अंधेरा छा रहा था और बादल मंडरा रहे थे
थोड़ी देर में वहां एक आदमी आया और वो भी उन दोनों के साथ बैठकर गपशप करने लगा

कुछ देर बाद वो आदमी बोला उसे बहुत भुख लग रही है, उन दोनों को भी भुख लगने लगी थी
पहला आदमी बोला मेरे पास 3 रोटी है, दुसरा बोला मेरे पास 5 रोटी के, हम तीनों मील बांट कर खा लेते है
उसके बाद सवाल आया कि 8 (3+5) रोटी तीन आदमियों में कैसे बांट पाएंगे ??
पहले आदमी ने राय दी कि ऐसा करते है कि हर रोटी के 3 तुकडे करते हैं, अर्थात 8 रोटी के 24 तुकडे (8 X 3 = 24) हो तुकडे हो जाएंगे और हम तीनों में 8 – 8 तुकडे बराबर बराबर बंट जाएंगे
तीनों को उसकी राय अच्छी लगी और 8 रोटी के 24 तुकडे करके प्रत्येक ने 8 – 8 रोटी के टुकड़े खाकर भुख शांत की और फिर बारीश के कारण मंदिर के प्रांगण में ही सो गए
सुबह उठने पर तीसरे आदमी ने उनके उपकार के लिए दोनों को धन्यवाद दिया और प्रेम से 8 रोटी के तुकडों के बदले दोनों को उपहार स्वरूप 8 सोने की गिन्नी देकर अपने घर की ओर चला गया
उसके जाने के बाद पहला आदमी ने दुसरे आदमी से कहा हम दोनों 4 – 4 गिन्नी बांट लेते है
दुसरा बोला नहीं मेरी 5 रोटी थी और तुम्हारी सिर्फ 3 रोटी थी अतः मै 5 गिन्नी लुंगा, तुम्हें 3 गिन्नी मिलेंगी
इस पर दोनों में बहस और झगड़ा होने लगा
इसके बाद वे दोनों सलाह और न्याय के लिए मंदिर के पुजारी के पास गए और उसे समस्या बताई तथा न्यायपूर्ण समाधान के लिए प्रार्थना की
पुजारी भी असमंजस में पड़ गया, उसने कहा तुम लोग ये 8 गिन्नीया मेरे पास छोड़ जाओ और मुझे सोचने का समय दो, मै कल सबेरे जवाब दे पाऊंगा
पुजारी दिलमें वैसे तो दुसरे आदमी की 3 – 5 की बात ठीक लगी रही थी पर फिर भी वह गहराई से सोचते सोचते गहरी नींद में सो गया
कुछ देर बाद उसके सपने में भगवान प्रगट हुए तो पुजारी ने सब बातें बताई और न्यायीक मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना की और बताया कि मेरे ख्याल से 3 – 8 बंटवारा ही उचित लगता है
भगवान मुस्कुरा कर बोले नहीं पहले आदमी को 1 गिन्नी मिलनी चाहिए और दुसरे आदमी को 7 गिन्नी मिलनी चाहिए
भगवान की बात सुनकर पुजारी अचंभित हो गया और अचरज से पुछा प्रभू ऐसा कैसे ?

भगवन फिर एकबार मुस्कुराए और बोले :

इसमें कोई शंका नहीं कि पहले आदमी ने अपनी 3 रोटी के 9 तुकडे किये परंतु उन 9 में से उसने सिर्फ 1 बांटा और 8 तुकडे स्वयं खाया अर्थात उसका त्याग सिर्फ 1 रोटी के टुकड़े का था इसलिए वो सिर्फ 1 गिन्नी का ही हकदार है
दुसरे आदमी ने अपनी 5 रोटी के 15 तुकडे किये जिसमें से 8 तुकडे उसने स्वयं खाते और 7 तुकडे उसने बांट दिए इसलिए वो न्याया नुसार 7 गिन्नी का हकदार है .. येही मेरा गणित है और येही मेरा न्याय है
ईश्वर की न्याय का सटीक विश्लेषण सुनकर पुजारी उनके चरणों में नतमस्तक हो गया

हम अपने त्याग का गुणगान करते है परंतु ईश्वर हमारे त्याग की तुलना हमारे सामर्थ्य से करता है ।

रामचंद्र आर्य