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सीधीबात रामनामएकआधारा

एक पंडितजी को नदी में तर्पण करते देख एक फकीर अपनी बाल्टी से पानी गिराकर जाप करने लगा कि..

“मेरी प्यासी गाय को पानी मिले।”

पंडित जी के पूछने पर उस फकीर ने कहा कि…

जब आपके चढ़ाये जल और भोग आपके पुरखों को मिल जाते हैं तो मेरी गाय को भी मिल जाएगा।

इस पर पंडितजी बहुत लज्जित हुए।”

यह मनगढ़ंत कहानी सुनाकर एक इंजीनियर मित्र जोर से ठठाकर हँसने लगे और मुझसे बोले कि –

“सब पाखण्ड है जी..!”

शायद मैं कुछ ज्यादा ही सहिष्णु हूँ.⚔️

इसीलिए, लोग मुझसे ऐसी बकवास करने से पहले ज्यादा सोचते नहीं है क्योंकि, पहले मैं सामने वाली की पूरी बात सुन लेता हूँ… उसके बाद उसे जबाब देता हूँ।

खैर… मैने कुछ कहा नहीं ….

बस, सामने मेज पर से ‘कैलकुलेटर’ उठाकर एक नंबर डायल किया…
और, अपने कान से लगा लिया।

बात न हो सकी… तो, उस इंजीनियर साहब से शिकायत की।

इस पर वे इंजीनियर साहब भड़क गए।

और, बोले- ” ये क्या मज़ाक है…??? ‘कैलकुलेटर’ में मोबाइल का फंक्शन भला कैसे काम करेगा..???”

तब मैंने कहा…. तुमने सही कहा…
वही तो मैं भी कह रहा हूँ कि…. स्थूल शरीर छोड़ चुके लोगों के लिए बनी व्यवस्था जीवित प्राणियों पर कैसे काम करेगी ???

इस पर इंजीनियर साहब अपनी झेंप मिटाते हुए कहने लगे-
“ये सब पाखण्ड है , अगर ये सच है… तो, इसे सिद्ध करके दिखाइए”

इस पर मैने कहा…. ये सब छोड़िए और, ये बताइए कि न्युक्लियर पर न्युट्रॉन के बम्बार्डिंग करने से क्या ऊर्जा निकलती है ?

वो बोले – ” बिल्कुल ! इट्स कॉल्ड एटॉमिक एनर्जी।”

फिर, मैने उन्हें एक चॉक और पेपरवेट देकर कहा, अब आपके हाथ में बहुत सारे न्युक्लियर्स भी हैं और न्युट्रॉन्स भी…!

अब आप इसमें से एनर्जी निकाल के दिखाइए…!!

साहब समझ गए और थोड़े संकोच से बोले-
“जी , एक काम याद आ गया; बाद में बात करते हैं “

कहने का मतलब है कि….. यदि, हम किसी तथ्य को प्रत्यक्षतः सिद्ध नहीं कर सकते तो इसका अर्थ है कि हमारे पास समुचित ज्ञान, संसाधन या अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं है।

इसका मतलब ये कतई नहीं कि वह तथ्य ही गलत है.

क्योंकि, सिद्धांत रूप से तो हवा में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन दोनों मौजूद है.. फिर , हवा से ही पानी क्यों नहीं बना लेते ???

अब आप हवा से पानी नहीं बना रहे हैं तो… इसका मतलब ये थोड़े न घोषित कर दोगे कि हवा में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन ही नहीं है।

हमारे द्वारा श्रद्धा से किए गए सभी कर्म दान आदि आध्यात्मिक ऊर्जा के रूप में हमारे पितरों तक अवश्य पहुँचते हैं।

इसीलिए, व्यर्थ के कुतर्को मे फँसकर अपने धर्म व संस्कार के प्रति कुण्ठा न पालें…!

और हाँ…

जहाँ तक रह गई वैज्ञानिकता की बात तो….

क्या आपने किसी भी दिन पीपल और बरगद के पौधे बीज बोकर लगाए हैं…या, किसी को ऐसा करते हुए देखा है ?
क्या पीपल या बरगद के बीज मिलते हैं ?
इसका जवाब है नहीं….।

ऐसा इसीलिए है क्योंकि… बरगद या पीपल की कलम जितनी चाहे उतनी रोपने की कोशिश करो परंतु वह नहीं लगेगी।

इसका कारण यह है कि प्रकृति ने यह दोनों उपयोगी वृक्षों को लगाने के लिए अलग ही व्यवस्था कर रखी है।

जब कौए इन दोनों वृक्षों के फल को खाते हैं तो उनके पेट में ही बीज की प्रोसेसिंग होती है और तब जाकर बीज उगने लायक होते हैं।

उसके पश्चात कौवे जहां-जहां बीट करते हैं, वहां-वहां पर ये दोनों वृक्ष उगते हैं।

और… किसी को भी बताने की आवश्यकता नहीं है कि पीपल जगत का एकमात्र ऐसा वृक्ष है जो round-the-clock ऑक्सीजन देता है और वहीं बरगद के औषधीय गुण अपरम्पार है।

साथ ही आप में से बहुत लोगों को यह मालूम ही होगा कि मादा कौआ भादो महीने में अंडा देती है और नवजात बच्चा पैदा होता है।

तो, कौवे की इस नयी पीढ़ी को पौष्टिक और भरपूर आहार मिलना जरूरी है…

शायद, इसीलिए ऋषि मुनियों ने कौवों के इन नवजात बच्चों के लिए ही हर छत पर श्राद्ध पक्ष में पौष्टिक आहार की व्यवस्था कर दी होगी।

जिससे कि कौवों की नई पीढ़ी का पालन पोषण हो जाये……

इसीलिए…. श्राघ्द का तर्पण करना न सिर्फ हमारी आस्था का विषय है बल्कि यह प्रकृति के रक्षण के लिए नितांत आवश्यक है।

साथ ही… जब आप पीपल के पेड़ को देखोगे तो अपने पूर्वज तो याद आएंगे ही क्योंकि उन्होंने श्राद्ध पक्ष का प्रावधान दिया था इसीलिए यह दोनों उपयोगी पेड़ हम देख रहे हैं।

अतः…. सनातन धर्म और उसकी परंपराओं पे उंगली उठाने वालों से इतना ही कहना है कि….
जब दुनिया में तुम्हारे तथा-कथित विद्वानों आदि का नामोनिशान नहीं था…

उस समय भी हमारे ऋषि मुनियों को मालूम था कि धरती गोल है और हमारे सौरमंडल में 9 ग्रह हैं।

साथ ही… हमें ये भी पता था कि किस बीमारी का इलाज क्या है…
कौन सी चीज खाने लायक है और कौन सी नहीं…?

जय_श्रीराम 🚩🚩🚩.🙏

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एक बार अकबर बीरबल हमेशा की तरह टहलने जा रहे थे।

रास्ते में एक तुलसी का पौधा दिखा, मंत्री बीरबल ने झुक कर प्रणाम किया!

अकबर ने पूछा कौन हे ये?

बीरबल – मेरी माता हे!

अकबर ने तुलसी के झाड़ को उखाड़ कर फेक दिया

और बोला – कितनी माता हैं तुम हिन्दू लोगो की…!

बीरबल ने उसका जबाब देने की एक तरकीब सूझी!

आगे एक बिच्छुपत्ती (खुजली वाला ) झाड़ मिला। बीरबल उसे दंडवत प्रणाम कर

कहा – जय हो बाप मेरे!

अकबर को गुस्सा आया… दोनों हाथो से झाड़ को उखाड़ने लगा।

इतने में अकबर को भयंकर खुजली होने लगी तो बोला – बीरबल ये क्या हो गया?

बीरबल ने कहा आप ने मेरी माँ को मारा इस लिए ये गुस्सा हो गए!

अकबर जहाँ भी हाथ लगता खुजली होने लगती।

बोला – बीरबल जल्दी कोई उपाय बतायो!

बीरबल बोला – उपाय तो है लेकिन वो भी हमारी माँ है। उससे विनती करनी पड़ेगी!

अकबर बोला – जल्दी करो!

आगे गाय खड़ी थी बीरबल ने कहा गाय से विनती करो कि…

हे माता दवाई दो…

गाय ने गोबर कर दिया… अकबर के शरीर पर उसका लेप करने से फौरन खुजली से राहत मिल गई!

अकबर बोला – बीरबल अब क्या राजमहल में ऐसे ही जायेंगे?

बीरबल ने कहा – नहीं बादशाह हमारी एक और माँ है! सामने गंगा बह रही थी।

आप बोलिए हर- हर गंगे… जय गंगा मईया की… और कूद जाइए!

नहा कर अपने आप को तरोताजा महसूस करते हुए अकबर ने गंगा मैया को नमन किया तो बीरबल ने अकबर से कहा “महाराज ये तुलसी माता, गौ माता, गंगा माता तो जगत जगत जननी है सबकी माता हैं बिना भेदभाव सबका कल्याण करने वाली है” !

इनको मानने वालों को ही “हिन्दू” कहते हैं..!

हिन्दू एक “संस्कृति” है, “सभ्यता” है…
सम्प्रदाय नहीं..!

गौ, गंगा, गीता और गायत्री का सम्मान कीजिये ये सनातन संस्कृति के प्राण स्तंभ है
|| जय श्री राम || 🏹

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અદભુત પ્રસંગ…

ચારસો મીટર ની રેસ માં કેન્યા નો રનર અબેલ મુત્તાઈ સહુથી આગળ હતો ..

ફિનિશિંગ લાઈન થી ચાર પાંચ ફૂટ ની દુરી પર એ અટકી પડ્યો…એને લાગ્યુ કે આ દોરેલા પટ્ટા જ ફિનિશિંગ લાઈન છે.
મૂંઝવણ અને ગેરસમજ માં, એ ત્યાં જ અટકી પડ્યો.

તેની પાછળ બીજા નંબરે દોડી રહેલ સ્પેનિશ રનર ઈવાન ફર્નાન્ડિઝે આ જોયું અને તેને લાગ્યુ કે આ કૈંક ગેર સમજ છે…

તેણે પાછળ થી બૂમ પાડી અને મુત્તાઈ ને કહ્યું કે તે દોડવાનું ચાલુ રાખે…

પરંતુ.., મુત્તાઈ ને સ્પેનિશ ભાષા માં સમજ ના પડી….

આ આખો ખેલ માત્ર ગણતરી ની સેકન્ડ નો હતો…

સ્પેનિશ રનર ઈવાને પાછળ થી આવી અને અટકી પડેલા મુત્તાઈ ને જોર થી ધક્કો માર્યો અને, મુત્તાઈ ફિનિશ રેખા ને પાર કરી ગયો….!!

ખુબ નાનો, પણ અતિ મહત્વ નો પ્રસંગ. …

આ રેસ હતી …
અંતિમ પડાવ પૂરો કરી
વિજેતા બનવાની રેસ…
ઈવાન ધારત તો પોતે વિજેતા બની શકત …

ફિનિશ રેખા પાસે આવી ને અટકી પડેલા મુત્તાઈ ને અવગણી ને ઈવાન વિજેતા બની શકત…

આખરે વિજેતા મુત્તાઈ ને ગોલ્ડ મેડલ મળ્યો અને ઈવાન ને સિલ્વર….

એક પત્રકારે ઈવાન ને પૂછ્યું.., “તમે આમ કેમ કર્યું?
તમે ધારત તો જીતી શકત.. પણ તમે આજે ગોલ્ડ મેડલ ને હાથ થી જવા દીધો… “

ઈવાને સુંદર જવાબ આપ્યો…
“મારુ સ્વ્પ્ન છે કે.., ક્યારેક આપણે એવો સમાજ બનાવીયે.., જ્યાં વ્યક્તિ બીજી વ્યક્તિ ને ધક્કો મારે, પરંતુ પોતે આગળ જવા માટે નહિ…. પરંતુ…. બીજા ને આગળ લાવવા, મદદ કરવા, એની શક્તિ ને બહાર લાવવા ધક્કો મારે…,

એવો સમાજ જ્યાં એક બીજા ને મદદ કરીને બંને વિજેતા બને …”

પત્રકારે ફરી થી પૂછ્યું ,
“તમે એ કેન્યન મુત્તાઈ ને કેમ જીતવા દીધો? તમે જીતી શકત…”

જવાબ માં ઈવાને કહ્યું.., “મેં એને જીતવા નથી દીધો. એ જીતતો જ હતો. આ રેસ એની જ હતી…

અને છતાં જો હું એને અવગણી ને ફિનિશ લાઈન પાર કરી જાત, તો પણ મારી જીત તો કોઈ બીજા પાસે થી પડાવેલી જીત જ હોત..”
આ જીત પર હું કેવી રીતે ગર્વ કરી શકત ?
આવો જીતેલો ચંદ્રક હું મારી માં ને શી રીતે બતાવી શકું?
હું મારા અંતરાત્મા ને શું જવાબ આપું ? “

સંસ્કાર અને નીતિમત્તા એ વારસા માં મળેલી ભેટ છે… એક પેઢી થી બીજી પેઢી ને મળતો વારસો છે….

આમ થાય… અને આમ ના જ થાય… આ જ પુણ્ય અને પાપ છે…આ જ ધર્મ છે…

આપણે જ નક્કી કરશું કે કાલ નો સમાજ કેવો હશે..

કોઈ નો યશ ચોરી લેવો… કોઈની સફળતા પોતાને નામ કરવી.., બીજાને ધક્કો મારી પોતે આગળ આવવાનો પ્રયત્ન કરવો. આ બધું કદાચ થોડી ક્ષણો માટે જીતી ગયા નો ભાવ અપાવે… પણ ખુશી નહિ જ અપાવે…

કારણ..,
અંતરમન અને અંતરઆત્મા તો સાચું જાણે જ છે…

🌹 🌹 🌹

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एक 8 साल के बच्चे ने अपना गोलक (piggy bank)
तोडा और उसमे जितने भी रुपये थे वो बड़े अच्छे से दो- तीन बार गिने. वो बच्चा रुपये लेकर एक दवाइयों की
दुकान (Pharmacy) में गया. फार्मेसी पर उस बच्चे ने
देखा कि कुछ लोग खड़े है इसलिए वो भी खड़ा हो गया
और इधर उधर दवाईयों की तरफ देखने लगा. जब सब
लोग दुकान से चले गए तो दूकानदार ने उस बच्चे को
देखा और आश्चर्य में पुछा “बेटा…… .तुम्हे क्या
चाहिए?”
बच्चा: मुझे एक चमत्कारी दवाई चाहिए। मेरी बहन
बहुत बीमार है और मेरे पापा कहते है कि सिर्फ
चमत्कार ही मेरी बहन को बचा सकता है.
दुकानदार: नहीं बीटा… ऐसी कोई दवाई यहाँ पर
नहीं मिलती।
बच्चा: मेरे पास पैसे है, अगर आपको और पैसे चाहिए तो
मैं ला दूंगा मगर मुझे वो चमत्कारी दवाई दे दीजिये
वर्ना मेरी बहन मुझे छोड़ कर चली जायेगी. मुझे
बताईये कितने पैसे लगेंगे.
उस बच्चे के बगल में लम्बा सा व्यक्ति खड़ा हुआ था जो
ये सब सुन रहा था. उस व्यक्ति ने बच्चे से पूछा
“तुम्हारी बहन को क्या हुआ और तुम्हे कैसी चमत्कारी
दवाई चाहिए, मुझे बताओ”
उस बच्चे ने कहा “मुझे सिर्फ इतना पता है कि मेरी
बहन बहुत बीमार है, उसके सिर में बहुत दर्द होता है
और डॉक्टर कहते है कि इसके लिए ऑपरेशन करना
पड़ेगा लेकिन मेरे पापा के पास पैसे नहीं है. इसलिए
मेरे पापा कहते है कि अब मेरी बहन को बस कोई
चमत्कार ही बचा सकता है. मैं अपनी बहन को बचाने
के लिए अपने सारे पैसे लेकर आया हूँ “उस व्यक्ति ने बच्चे से पुछा “कितने पैसे है तुम्हारे पास?”
बच्चे ने कहा “मेरे पास 260 रुपये है”
उस व्यक्ति ने कहा “चमत्कार के लिए इतने पैसे काफी है, मुझे जल्दी से अपनी बहन के पास ले चलो, मैं देखता हूँ
कि क्या कर सकता हूँ”
उस छोटी बच्ची को Brain Tumour था और ये
व्यक्ति बहुत ही प्रसिद्ध डॉक्टर थे. बच्ची का
ऑपरेशन सफल रहा और उसकी जान बच गयी. ऑपरेशन के
बाद बच्ची के पापा ने डॉक्टर से पुछा “ऑपरेशन के पैसे
कितने हुए?”
डॉक्टर ने उस बच्चे की तरफ देखते हुए माँ को कहा ”
मुझे इस ऑपरेशन की फीस आपके बेटे ने दे दी है, इसकी
फीस थी 260 रुपये”
माँ सब समझ गयी और उसने अपने बेटे को गले लगा कर
खूब प्यार किया.
.
.
दोस्तों, ये इंसानियत पर कहानी हमें बताती है कि आज के युग में अच्छे इंसान भी होते है और
चमत्कार भी होते है !

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. “भोला किसान” एक बार एक किसान जंगल में लकड़ी बिनने गया तो उसने एक अद्भुत बात देखी। एक लोमड़ी के दो पैर नहीं थे, फिर भी वह खुशी-खुशी घसीट कर चल रही थी। यह कैसे जीवित रहती है जबकि किसी शिकार को भी नहीं पकड़ सकती, किसान ने सोचा। तभी उसने देखा कि एक शेर अपने दांतो में एक शिकार दबाए उसी तरफ आ रहा है। सभी जानवर भागने लगे, वह किसान भी पेड़ पर चढ़ गया। उसने देखा कि शेर, उस लोमड़ी के पास आया। उसे खाने की जगह, प्यार से शिकार का थोड़ा हिस्सा डालकर चला गया। दूसरे दिन भी उसने देखा कि शेर बड़े प्यार से लोमड़ी को खाना देकर चला गया। किसान ने इस अद्भुत लीला के लिए भगवान का मन में नमन किया। उसे अहसास हो गया कि भगवान जिसे पैदा करते है उसकी रोटी का भी इंतजाम कर देते हैं। यह जानकर वह भी एक निर्जन स्थान चला गया और वहां पर चुपचाप बैठ कर भोजन का रास्ता देखता। कई दिन व्यतीत हो गए, कोई नहीं आया। वह मरणासन्न होकर वापस लौटने लगा, तभी उसे एक विद्वान महात्मा मिले। उन्होंने उसे भोजन पानी कराया, तो वह किसान उनके चरणों में गिरकर वह लोमड़ी की बात बताते हुए बोला, महाराज, भगवान ने उस अपंग लोमड़ी पर दया दिखाई पर मैं तो मरते-मरते बचा; ऐसा क्यों हुआ कि भगवान् मुझ पर इतने निर्दयी हो गए ? महात्मा उस किसान के सिर पर हाथ फिराकर मुस्कुराकर बोले, तुम इतने नासमझ हो गए कि तुमने भगवान का इशारा भी नहीं समझा इसीलिए तुम्हें इस तरह की मुसीबत उठानी पड़ी। तुम ये क्यों नहीं समझे कि भगवान् तुम्हे उस शेर की तरह मदद करने वाला बनते देखना चाहते थे, निरीह लोमड़ी की तरह नहीं। हमारे जीवन में भी ऐसा कई बार होता है कि हमें चीजें जिस तरह समझनी चाहिए उसके विपरीत समझ लेते हैं। ईश्वर ने हम सभी के अंदर कुछ न कुछ ऐसी शक्तियाँ दी हैं जो हमें महान बना सकती हैं। चुनाव हमें करना है, शेर बनना है या लोमड़ी। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे"


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बुराईकाबीज

बुरा फल अच्छाई का बीज अच्छा फल

एक समय में एक निर्दयी राजा हुवा करता था | वह अपनी जनता पर बड़ा जुल्म और अत्याचार करता था | वह अपनी एशो-इसरत के लिए कुछ भी कर देता था | वह बच्चे, औरत, बुजर्ग सब पर जुल्म करता | सारी जनता उसको बद-दुवा देती और उसकी शीघ्र म्रत्यु की कामना करते एक दिन अचानक राजा ने स्वम घोषणा की वो किसी को दुःख नहीं पहुचायेगा और ना ही किसी पर अत्याचार करेगा | ये फेसला सुनकर जनता हेरान थी और ज्यादा सतर्क हो गए की राजा कोई नहीं चाल तो नहीं चल रहा है ?

पर राजा अब एक सच्चे राजा राजा की तरह अपने नियमो का पालन करता और अपनी जनता की सहायता भी करता | अब जनता भी धीरे धीरे राजा से प्रसन्न होने लगी और जनता विस्वास भी करने लगी | पर सब के मन में एक प्रशन था की ये सब कैसे बदला ? काफी दिन बाद मंत्री ने हिम्मत कर राजा से ये सवाल पूछ ही लिया | तो राजा ने मुस्कुराते हुए जबाब दिया की में एक बार जंगल में शिकार पर गया था | तो एक कुत्ता एक मासूम से हिरन के बच्चे को मारने के लिए पीछे दोड़ लगा रहा था, हिरन का बच्चा तो जान बचा कर भाग तो गया पर कुत्ते ने उसे जख्मी कर दिया जब में पास वाले गाँव में आया तो उसी कुत्ते को वहा देखा, वो एक आदमी के पीछे भोक रहा था | उस आदमी ने उस कुत्ते को एक भारी से पत्थर से मारा तो कुत्ते की टांग टूट गयी फिर थोड़ी देर बाद वो आदमी कही जाने के लिए एक तांगे के पास खड़ा था, अचानक घोड़े ने उस आदमी के लात मारकर उसके पैर का घुठना तोड़ दिया फिर घोडा लात मार के भाग रहा था, तो अचानक वो एक गहरे गड्डे में गिर गया और घोड़े की आगे की दोनों टाँगे टूट गयी तो मैंने सोचा कि बुरे कर्मों के बीज बोने में उसका फल भी तो मुझे भर ही मिलेगा सो बेहतर होगा की में कुछ अच्छे कर्मो के बीज बोना शुरू करू.

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गुरु का रंग

इब्राहिम सम्राट था, अपने गुरु के पास गया और गुरु ने ऐसी मांग की जो उसने कभी अपने किसी और शिष्य से न की थी। इब्राहिम झुका तो गुरु ने कहा कि सच में झुक रहे हो? इब्राहिम ने कहा कि नहीं झुकना होता तो आता ही नहीं। कोई मुझे लाया नहीं, अपने से आया हूं; झुक रहा हूं। तो इब्राहिम से पूछा उसके गुरु ने, प्रमाण दे सकोगे? इब्राहिम हाथ फैलाकर खड़ा हो गया और उसने कहा, आज्ञा दें। और बड़ी अजीब आज्ञा दी गुरु ने।

गुरु ने कहा, कपड़े फेंक दो, नग्न हो जाओ। इब्राहिम ने एक क्षण भी सोचा नहीं, कपड़े फेंक दिये और नग्न हो गया। सम्राट था! और गुरु भी अदभुत था! गुरु ने कहा, उठा लो वह जुता जो पड़ा है, निकल जाओ, बाजार में, मारते जाओ अपने सिर पर जूता, इकट्ठी होने दो भीड़, पूरे गांव का चक्कर लगा कर आ जाओ। और इब्राहिम चला गया। अपनी ही राजधानी में, नंगा, सिर पर जूता मारता!

जो गुरु के पुराने शिष्य थे उन्होंने कहा—यह जरा ज्यादती है। ऐसा आपने हमसे तो कभी नहीं कहा था। और सम्राट के साथ तो थोड़ा सहृदय होना था, बिचारा आया झुकने को यही क्या कम था? गुरु ने कहा मुझसे मत पूछो, इब्राहिम से ही पूछ लेना।

और इब्राहिम जब लौटा कोई घंटे भर बाद अपनी ही राजधानी में खुद को जूता मारते हुए—हजारों की भीड़ इकट्ठी है, लोग उसे पागल कह रहे हैं, लोग पत्थर फेंक रहे हैं, लोग कह रहे हैं यह हो क्या गया, लोग मजाक कर रहे हैं, सारा गांव हंस रहा है, बच्चे, बूढ़े, स्त्रिया, सब इकट्ठे हो गये हैं, जुलूस चल रहा है उसके पीछे और इब्राहिम हंस रहा है, आनंदित हो रहा है और जूते मार रहा है और नग्न घूम रहा है—लौट आया। जब इब्राहिम लौट कर आया तो वह आदमी ही दूसरा था। गुरु ने अपने शिष्यों को कहा, इब्राहिम से पूछ लो। इब्राहिम ने कहा कि इस एक घड़ी में जो जानने को मिल गया, वह जन्मों—जन्मों में नहीं जाना था। और जो मैं पाने आया था, वह मुझे मिल ही गया। मेरा अहंकार गिर गया। यही बाधा थी। वह गुरु के चरणों में गिर पड़ा और उसने कहा—तुम्हारी कृपा! एक क्षण में मिटा दिया, एक घड़ी भर में मिटा दिया! मैं तो सोचता था वर्षों तपश्चर्या करनी पड़ेगी। सम्राट हूं, अकड़ा हुआ, अहंकार से भरा हुआ, अहंकार में ही जीया हूं, कैसे छूटेगा यह अहंकार—मैं तो यही सोचते—सोचते आया था, कैसे छूटेगा? और तुमने क्षणभर में छुड़ा दिया। और जरा—से उपाय से छुड़ा दिया।

अब तुम यह मत सोचना कि जूते मारने से कोई अहंकार छूट जाता है। नहीं तो एकांत में खड़ा होकर नग्न, तुम अपने को जूते मार लो, कि जब विधि काम करती है तो अपने कमरे में बंद हो गये, जूता लिया, नंगे हो गये और मार लिया जूता। घड़ी भर नहीं, दो घड़ी मारते रहे तो भी कुछ न होगा। न नग्न होने से कुछ होगा। बात समझो। भाव समझो। यह तो सिर्फ उपाय था। लेकिन इब्राहिम ने एक इशारा दे दिया कि अब जो कहोगे! यह बिलकुल पगलपन की बात है। इब्राहिम को कहना चाहिए था कि यह क्या पागलपन करवा रहे हो? नंगे होने से क्या होगा? यही मित्र ने पूछा है—नंगे होने से क्या होगा? गैरिक वस्त्र पहनने से क्या होगा? उन्होंने यह भी पूछा है कि क्या आप मुझे बिना गैरिक वस्त्रों के संन्यास नहीं दे सकते? कल तुम मुझसे कहोगे— ध्यान से क्या होगा? क्या आप मुझे ध्यान के बिना संन्यास नहीं दे सकते? प्रार्थना से क्या होगा? क्या मैं बिना प्रार्थना के संन्यासी नहीं हो सकता? यह तो सिर्फ इशारा है, यह तो इस बात का इशारा है कि आप जो भी कहेंगे, यह पागलपन तो यह पागलपन सही।

भक्त अपने को देने जाता है। इसलिए देनेवाला शर्ते नहीं रख सकता। भक्त समर्पित होता है, समर्पण बेशर्त ही हो सकता है।

कल मैंने धर्मयुग में मेरी एक संन्यासिनी ‘प्रीति’ पर एक लेख देखा। उसमें एक शब्द मुझे पसंद आया। जिसने रिपोर्ट लिखी है ‘प्रीति’ के ऊपर धर्मयुग में, उसने शब्द उपयोग किया है ‘रंग रजनीशी’। वह मुझे जंचा। वह गैरिक नहीं है, ‘रंग रजनीशी’! उसकी तैयारी हो तो ही संन्यास संभव है। उतना छोड़ने के लिए मन राजी हो, तो ही।

और बहुत कुछ छोड़ना पड़ेगा, यह तो शुरुआत है। यह तो ऐसा समझो कि सम्राट से उसके गुरु ने कहा होता, पहले टोपी छोड़ो। और वह कहता — टोपी छोड़ने से क्या होगा? क्या बिना टोपी छोड़े ज्ञान नहीं हो सकता? वह टोपी छुड़वाना तो सिर्फ शुरुआत थी। फिर वह कहता—अचकन गिराओ, कमीज गिराओ, कोट गिराओ, अब पाजामा भी गिर जाने दो, अब ‘अंड़रवियर’ भी छोड़ दो, ऐसा धीरे—धीरे! मैं जानता हूं कि तुम इकट्ठे नग्न न हो सकोगे। तुम्हारी इतनी हिम्मत नहीं है। तुमसे कहता हूं टोपी उतारो। चलो जी टोपी ही सही, उतारो तो! कुछ तो उतारो, थोड़ा तो भार हल्का हो!

गुरु के रंग में रंग जाना शिष्यत्व है। और उसी रंग में रंगने से तुम्हें परमात्मा के रंग में रंगने की कला आएगी।

ओशो

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य)
प्रवचन–27

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. “सच्ची पूजा का फल” किसी नगर में एक बुढ़िया रहती थी। वह ग्वालिन थी उसके चार पुत्र और एक पुत्री थी। एक समय नगर में हैजा की बीमारी फैली। एक-एक करके बुढ़िया के पति और चारों पुत्र चल बसे। अब एक मात्र लड़की रह गयी। पति और पुत्रों के न रहने पर बुढ़िया की पीड़ा असह्य हो गयी। बुढ़िया के पास अधिक जगह-जमीन न थी। एक आम का बगीचा था। उसके पति ने एक चबूतरा बना कर महावीर जी की ध्वजा खड़ी कर शिवलिंग की स्थापना की थी। बुढ़िया के पति का एक नियम था कि वह प्रतिदिन स्नान करके एक लोटा जल शिवजी पर चढ़ाता, धूप देता और प्रसाद के रूप में थोड़ा बतासा चढ़ाकर छोटे-छोटे बच्चों को बाँट देता था। पति के मर जाने के बाद बुढ़िया ने इस काम को अपने हाथ में लिया। वह भी नियम पूर्वक शिवजी की पूजा करती थी। बतासा या मिठाई न होने पर वह धूप देकर महादेव जी को गुड़ का ही भोग अवश्य लगाती थी। आम के दिनों में आम बेचकर गुजर करती थी। अपनी लड़की की सहायता से कुछ गोबर इकट्ठा कर गोइठा बनाती। इसे बेचकर माँ-बेटी गुजारा करती थीं। जब उसकी लड़की विवाह करने योग्य हुई, तब बुढ़िया की चिन्ता बढ़ गयी। वह सोचने लगी कि पैसे हैं नहीं, इसका विवाह कैसे होगा। साथ ही बुढ़िया के मन में यह भी चाह थी कि उसकी लड़की किसी अच्छे घर में जाय, जिससे वह सुखी रहे। प्रतिदिन शिवजी की पूजा कर वह मन ही मन प्रार्थना करती- "हे भोलेनाथ ! मेरी बिटिया का विवाह एक सम्पन्न घर में करा दो, बिटिया को गोबर न इकट्ठा करना पड़े।" एक दिन जब बुढ़िया शिव-पूजा करने के लिए हाथ में एक लोटा जल तथा कुछ मिठाई लेकर आयी, तब एक नौजवान पुरुष घोड़े से उसके सामने उतरा और एक वृक्ष के सहारे बैठ गया। वह आदमी सूर्य की चिलचिलाती हुई किरणों से अत्यन्त तप्त हो रहा था। प्यास से उसका गला सूख गया था। वह बोलने में असमर्थ था। इशारे से उसने बुढ़िया से जल माँगा। बुढ़िया ने शिवजी की पूजा का जल और मिठाई उस नौजवान को दे दी। उस आदमी ने मिठाई खाकर जलपान किया। थोड़ी देर के बाद उसको बोलने की शक्ति हुई तो उस नौजवान ने बुढ़िया से पूछा- "हे माता ! तुम इस दोपहर में मिठाई और जल लेकर क्यों आयी थी ?" उसने कहा, "शिवजी की पूजा करने का मेरा प्रतिदिन का नियम है इसलिए आयी थी।" नौजवान ने कहा, "तब तुमने इन वस्तुओं को मुझे क्यों दे दिया ?" बुढ़िया ने कहा- "बेटा ! प्यासे को पानी और भूखे को अन्न देना ही पूजा है। पूजा के लिए जल और प्रसाद फिर ले आऊँगी।" उस नौजवान ने बुढ़िया से पूछा, "तुम्हारे परिवार में कितने लोग हैं ?" उसने कहा- "बेटा ! मैं क्या कहूँ ? आज से कुछ वर्ष पहले हैजे से मेरे चार पुत्र और पतिदेव की मृत्यु हो गयी।" मेरी एक बारह वर्ष की लड़की बची है। उसका विवाह करना है। रुपये पास में हैं नहीं। कैसे करूँ ? यही शिवजी से मनाती हूँ, 'हे भोले बाबा ! मेरी बिटिया की शादी अच्छे घर में करा दो जिससे वह सुखी रहे।' नौजवान ने कहा- "माता ! तुम कल सूर्यास्त के समय इसी स्थान पर आना। भूलना नहीं, मैं अवश्य आऊँगा।" बुढ़िया के बहुत पूछने पर भी उसने अपना नाम या ग्राम नहीं बतलाया और वह घोड़े पर सवार होकर चला गया। दूसरे दिन बुढ़िया सूर्यास्त के समय आयी। वह शिवजी के चबूतरे पर बैठकर प्रतीक्षा करने लगी। अन्धेरा होने लगा। अकेली बुढ़िया बगीचे में डरने लगी। वह मन ही मन सोचने लगी- "शायद वह भूल गया होगा या झूठे ही कह दिया होगा ! अब मैं घर चलूँ।" इतने में घोड़े के पैरों की आवाज सुनायी पड़ी और वह नवजवान पुरुष आ गया। बुढ़िया को प्रणाम करके ५०००) के नोट उसके हाथ में देते हुए कहा- "जाओ तुम्हारी बिटिया मेरी बहन है। उसका विवाह अच्छे घर में ठीक करो । विवाह के दिन मैं फिर आऊँगा। आटा, घी, चीनी, लकड़ी, कपड़े आदि वस्तुएँ विवाह के दिन से पहले तुम्हारे घर आ जायेंगी।" बुढ़िया ने कहा- "बेटा विवाह का दिन तुमको कैसे जनाऊँगी ? तुम अपना नाम और ग्राम तो बतलाते नहीं हो।" उसने कहा- "इसकी चिन्ता मत करो। मैं मालूम कर लूँगा। देखो उसका कन्यादान मैं करूँगा। सब काम ठीक हो जाने पर कन्यादान करने के समय मैं आऊँगा। कन्यादान करके चला जाऊँगा। घर आकर बुढ़िया ने अपने भाई से सब बातें कह दीं। पुत्र और पति के मरने के बाद वही उनकी देखभाल करता था। उसने तुरन्त बी० ए० पास लड़के को ४०००) तिलक देकर ठीक किया। विवाह का दिन निश्चित हो गया। १०००) में बुढ़िया के घर की छावनी सुधार दी गयी। विवाह के ठीक एक दिन पहले सायंकाल ५ बैलगाड़ियाँ आटा, चावल, दाल, कपड़ा, घी, चीनी, नमक, मसाला, जलावन आदि सामग्री से भरी हुई आयीं। बुढ़िया का घर पूछकर गाड़ीवानों ने उसके घर पर चीजें रख दीं और उसी समय वे चल दिये। किसने भेजा, कहाँ की गाड़ियाँ हैं- उन लोगों ने कुछ नहीं बतलाया। विवाह के दिन कन्यादान के ठीक १० मिनट पहले घोड़े पर चढ़ा हुआ वह व्यक्ति आया और घर के भीतर चला गया। पुरोहित जी से लेकर उसने कुश की अँगूठी पहन ली और लड़की के दाहिने हाथ के अँगूठे को पकड़ कर संकल्प किया। उसने वर के हाथ में लड़की का अँगूठा देकर पाँच गिन्नी दक्षिणा दी। अन्त में १०५) रुपये पुरोहित को देकर वह चलने को तैयार हुआ। बुढ़िया के बहुत कहने पर एक मिठाई खाकर उसने जलपान किया। घोड़े पर चढ़कर वह कहाँ चला गया किसी को मालूम नहीं हो सका। × × × × × × #शिक्षा

  1. हमें प्राण बचानेवाले के प्रति सदा कृतज्ञ रहना चाहिये और उसकी पूरी भलाई करनी चाहिये।
  2. उपकार करने वाले को अपना नाम गुप्त रखना चाहिये, क्योंकि कहने से उसका फल घट जाता है।
  3. सच्चे मन से की गई पूजा का फल अवश्य मिलता है।
    ———-:::×:::——– "जय जय श्री राधे"

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एक सभा में गुरु जी ने प्रवचन के दौरान
एक 30 वर्षीय युवक को खडा कर पूछा कि

  • आप मुम्बई मेँ जुहू चौपाटी पर चल रहे हैं और सामने से एक सुन्दर लडकी आ रही है तो आप क्या करोगे ?
    युवक ने कहा – उस पर नजर जायेगी, उसे देखने लगेंगे।
    गुरु जी ने पूछा – वह लडकी आगे बढ गयी तो क्या पीछे मुडकर भी देखोगे ?
    लडके ने कहा – हाँ, अगर धर्मपत्नी साथ नहीं है तो। (सभा में सभी हँस पडे)
    गुरु जी ने फिर पूछा – जरा यह बताओ वह सुन्दर चेहरा आपको कब तक याद रहेगा ?
    युवक ने कहा 5 – 10 मिनट तक, जब तक कोई दूसरा सुन्दर चेहरा सामने न आ जाए।

गुरु जी ने उस युवक से कहा – अब जरा सोचिए,
आप जयपुर से मुम्बई जा रहे हैं और मैंने आपको एक पुस्तकों का पैकेट देते हुए कहा कि मुम्बई में अमुक महानुभाव के यहाँ यह पैकेट पहुँचा देना।
आप पैकेट देने मुम्बई में उनके घर गए।
उनका घर देखा तो आपको पता चला कि ये तो बडे अरबपति हैं।
घर के बाहर 10 गाडियाँ और 5 चौकीदार खडे हैं। आपने पैकेट की सूचना अन्दर भिजवाई तो वे महानुभाव खुद बाहर आए। आप से पैकेट लिया। आप जाने लगे तो आपको आग्रह करके घर में ले गए। पास में बैठकर गरम खाना खिलाया। जाते समय आप से पूछा – किसमें आए हो ? आपने कहा- लोकल ट्रेन में। उन्होंने ड्राइवर को बोलकर आपको गंतव्य तक पहुँचाने के लिए कहा और आप जैसे ही अपने स्थान पर पहुँचने वाले थे कि उस अरबपति महानुभाव का फोन आया – भैया, आप आराम से पहुँच गए।
अब आप बताइए कि आपको वे महानुभाव कब तक याद रहेंगे ?
युवक ने कहा – गुरु जी ! जिंदगी में मरते दम तक उस व्यक्ति को हम भूल नहीं सकते।

गुरु जी ने युवक के माध्यम से सभा को संबोधित करते हुए कहा
“यह है जीवन की हकीकत।”

“सुन्दर चेहरा थोड़े समय ही याद रहता है,
पर हमारा सुन्दर व्यवहार जीवन भर याद रहता है।”

बस यही है जीवन का गुरु मंत्र ,अपने चेहरे और शरीर की सुंदरता से ज़्यादा अपने व्यवहार की सुंदरता पर ध्यान दे,जीवन आनंददायक बन जाएगा।
🙏🙏जय सीताराम जी🙏🙏

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. “सबसे बड़ा धनी” जब केवट प्रभु के चरण धो चुका तो भगवान कहते हैं- "भाई ! अब तो गंगा पार करा दे। इस पर केवट कहता है- "प्रभु ! नियम तो आपको पता ही है कि जो पहले आता है उसे पहले पार उतारा जाता है। इसलिए प्रभु अभी थोड़ा और रुकिये।" भगवान् कहते हैं- "भाई ! यहाँ तो मेरे सिवा और कोई दिखायी नहीं देता। इस घाट पर तो केवल मैं ही हूँ। फिर पहले किसे पार लगाना है ?" केवट बोला- "प्रभु ! अभी मेरे पूर्वज बैठे हुए हैं, जिनको पार लगाना है।" केवट झट गंगा जी में उतरकर प्रभु के चरणामृत से अपने पूर्वजों का तर्पण करता है। धन्य है केवट जिसने अपना, अपने परिवार और सारे कुल का उद्धार करवाया। फिर भगवान् को नाव में बैठाता है, दूसरे किनारे तक ले जाने से पहले फिर घुमाकर वापस ले आता है। जब बार-बार केवट ऐसा करता है तो प्रभु पूछते हैं- "भाई ! बार-बार चक्कर क्यों लगवा रहे हो ? मुझे चक्कर आने लगे हैं।" केवट कहता है- "प्रभु ! यही तो मैं भी कह रहा हूँ। ८४ लाख योनियों के चक्कर लगाते-लगाते मेरी बुद्धि भी चक्कर खाने लगी है, अब और चक्कर मत लगवाईये।" गंगा पार पहुँचकर केवट प्रभु को दंडवत प्रणाम करता है। उसे दंडवत करते देख भगवान् को संकोच हुआ कि मैंने इसे कुछ दिया नहीं। केवट उतरि दंडवत कीन्हा, प्रभुहि सकुच एहि नहि कछु दीन्हा। कितना विचित्र दृश्य है, जहाँ देने वाले को संकोच हो रहा है और लेने वाला केवट उसकी भी विचित्र दशा है कहता है - नाथ आजु मैं काह न पावा, मिटे दोष दुःख दारिद्र दावा। बहुत। काल मैं कीन्ही मजूरी, आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी।। लेने वाला कहे बिना लिए ही कह रहा है कि "हे नाथ ! आज मैंने क्या नहीं पाया मेरे दोष दुःख और दरिद्रता सब मिट गये। आज विधाता ने बहुत अच्छी मजदूरी दे दी। आपकी कृपा से अब मुझे कुछ नहीं चाहिये।" भगवान् उसको सोने की अंगूठी देने लगते हैं तो केवट कहता है प्रभु उतराई कैसे ले सकता हूँ। हम दोनों एक ही बिरादरी के हैं और बिरादरी वाले से मजदूरी नहीं लिया करते। दरजी, दरजी सेे न ले सिलाई, धोबी, धोबी से न ले धुलाई। नाई, नाई से न ले बाल कटाई, फिर केवट, केवट से कैसे ले उतराई।। आप भी केवट, मैं भी केवट, अंतर इतना है कि हम नदी में इस पार से उस पार लगाते हैं, आप संसार सागर से पार लगाते हैं, हमने आपको पार लगा दिया, अब जब मेरी बारी आये तो आप मुझे पार लगा देना। प्रभु आज तो सबसे बड़ा धनी मैं ही हूँ। क्योंकि वास्तव में धनी वो होता है, जिसके पास आपका नाम है, आपकी कृपा है। आज मेरे पास दोनों ही हैं। मैं ही सबसे बड़ा धनी हूँ। ----------:::×:::--------- "जय श्री राम"


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