Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

The telephone rang. It was a call from his mother. He answered it and his mother told him, “Mr. Belser died last night. The funeral is Wednesday.”

The telephone rang. It was a call from his mother. He answered it and his mother told him, “Mr. Belser died last night. The funeral is Wednesday.”

Memories flashed through his mind like an old newsreel as he sat quietly remembering his childhood days.

“Jack, did you hear me?”

“Oh, sorry, Mom. Yes, I heard you. It’s been so long since I thought of him. I’m sorry, but I honestly thought he died years ago,” Jack said.

“Well, he didn’t forget you. Every time I saw him he’d ask how you were doing. He’d reminisce about the many days you spent over ‘his side of the fence’ as he put it,” Mom told him.

“I loved that old house he lived in,” Jack said.

“You know, Jack, after your father died, Mr. Belser stepped in to make sure you had a man’s influence in your life,” she said.

“He’s the one who taught me carpentry,” he said. “I wouldn’t be in this business if it weren’t for him. He spent a lot of time teaching me things he thought were important. Mom, I’ll be there for the funeral,” Jack said.

As busy as he was, he kept his word. Jack caught the next flight to his hometown. Mr. Belser’s funeral was small and uneventful. He had no children of his own, and most of his relatives had passed away.

The night before he had to return home, Jack and his Mom stopped by to see the old house next door one more time. Standing in the doorway, Jack paused for a moment. It was like crossing over into another dimension, a leap through space and time. The house was exactly as he remembered.

Every step held memories. Every picture, every piece of furniture…Jack stopped suddenly…

“What’swrong, Jack?” his Mom asked.

“The box is gone,” he said.

“What box?” Mom asked.

“There was a small gold box that he kept locked on top of his desk. I must have asked him a thousand times what was inside. All he’d ever tell me was ‘the thing I value most,'” Jack said.

It was gone. Everything about the house was exactly how Jack remembered it, except for the box. He figured someone from the Belser family had taken it.

“Now I’ll never know what was so valuable to him,” Jack said.

“I better get some sleep. I have an early flight home, Mom.”

It had been about two weeks since Mr. Belser died. Returning home from work one day Jack discovered a note in his mailbox. “Signature required on a package. No one at home. Please stop by the main post office within the next three days,” the note read.

Early the next day Jack went to the post office and retrieved the package. The small box was old and looked like it had been mailed a hundred years ago. The handwriting was difficult to read, but the return address caught his attention.

“Mr. Harold Belser” it read.

Jack took the box out to his car and ripped open the package. There inside was the gold box and an envelope.

Jack’s hands shook as he read the note inside.

“Upon my death, please forward this box and its contents to Jack Bennett. It’s the thing I valued most in my life.” A small key was taped to the letter. His heart racing, as tears filled his eyes, Jack carefully unlocked the box. There inside he found a beautiful gold pocket watch.

Running his fingers slowly over the finely etched casing, he unlatched the cover. Inside he found these words engraved: “Jack, Thanks for your time! — Harold Belser.”

“The thing he valued most was my time!”

Jack held the watch for a few minutes, then called his office and cleared his appointments for the next two days.*

“Why?” Janet, his assistant asked.

“I need some time to spend with the people I love and say I care for,” he said. “Oh, by the way, Janet, thanks for your time!”

“Life is not measured by the number of breaths we take but by the moments that take our breath away.”

Think about this. You may not realize it, but it’s 100 percent true.

  1. At least 15 people in this world love you in some way.
  2. A smile from you can bring happiness to anyone, even if they don’t like you.
  3. Every night, SOMEONE thinks about you before they go to sleep.
  4. You mean the world to someone.
  5. If not for you, someone may not be living.
  6. You are special and unique.
  7. Have trust sooner or later you will get what you wish for or something better.
  8. When you make the biggest mistake ever, something good can still come from it.
  9. When you think the world has turned its back on you, take a hard look: you most likely turned your back on the world and the people who love and care for you.
  10. Someone that you don’t even know exists loves you.
  11. Always remember the compliments you received. Forget about the rude remarks.
  12. Always tell someone how you feel about them; you will feel much better when they know and you’ll both be happy.
  13. If you have a great friend, take the time to let them know that they are great.

To everyone who read this just now….

“Thanks for your time.”

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स्टेट बैंक के बाहर राजू केले बेच रहा था

स्टेट बैंक के बाहर राजू केले बेच रहा था।बिजली विभाग के एक बड़े अधिकारी ने पूछा : ” केले कैसे दिए” ?राजू : केले किस लिए खरीद रहे हैं साहब ?अधिकारी :- मतलब ?? राजू :- मतलब ये साहब कि,मंदिर के प्रसाद के लिए ले रहे हैं तो 10 रुपए दर्जन। वृद्धाश्रम में देने हों तो 15 रुपए दर्जन। बच्चों के टिफिन में रखने हों तो 20 रुपए दर्जन। घर में खाने के लिए ले जा रहे हों तो, 25 रुपए दर्जन और अगर पिकनिक के लिए खरीद रहे हों तो 30 रुपए दर्जन।अधिकारी : – ये क्या बेवकूफी है ? अरे भई, जब सारे केले एक जैसे ही हैं तो,भाव अलग अलग क्यों बता रहे हो ??राजू : – ये तो पैसे वसूली का, आप ही का स्टाइल है साहब। 1 से 100 रीडिंग का रेट अलग, 100 से 200 का अलग, 200 से 300 का अलग। अरे आपके बाप की बिजली है क्या ?आप भी तो एक ही खंभे से बिजली देते हो। तो फिर घर के लिए अलग रेट, दूकान के लिए अलग रेट, कारखाने के लिए अलग रेट, फिर इंधन भार, विज आकार…..और हाँ, एक बात और साहब, मीटर का भाड़ा।मीटर क्या अमेरिका से आयात किया है ? 25 सालों से उसका भाड़ा भर रहा हूँ। आखिर उसकी कीमत है कितनी ?? आप ये तो बता दो मुझे एक बार। जागो ग्राहक जागो


बिजली बिल से पीड़ित एक आम नागरिक की व्यथा !किसी ने मुझे सेंड की मुझे अच्छी लगी तो आगे सेंड कर रहा हूँ, और अगर आपको अच्छी लगे तो…😊👍🏼

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नालायक बेटा,

,नालायक बेटा,,, कहानी।”बेटा , हमारा एक्सीडेंट हो गया है ।मुझे ज्यादा चोट नहीं आई पर तेरी माँ की हालत गंभीर है।कुछ पैसों की जरुरत है और तेरी माँ को खून चढ़ाना है।”बासठ साल के माधव जी ने अपने बड़े बेटे से फोन पर कहा।”पापा, मैं बहुत व्यस्त हूँ आजकल।मेरा आना नहीं हो सकेगा।मुझे विदेश मे नौकरी का पैकेज मिला है तो उसी की तैयारी कर रहा हूँ।आपका भी तो यही सपना था ना? इसलिये हाथ भी तंग चल रहा है।पैसे की व्यवस्था कर लीजिए मैं बाद मे दे दूँगा।”उनके बडे़ इंजिनियर बेटे ने जबाब दिया।उन्होनें अपने दूसरे डाॅक्टर बेटे को फोन किया तो उसने भी आने से मना कर दिया । उसे अपनी ससुराल में शादी मे जाना था।हाँ इतना जरुर कहा कि पैसों की चिंता मत कीजिए मैं भिजवा दूँगा।यह अलग बात है कि उसने कभी पैसे नहीं भिजवाए।उन्होंने बहुत मायूसी से फोन रख दिया।अब उस नालालक को फोन करके क्या फायदा।जब ये दो लायक बेटे कुछ नहीं कर रहे तो वो नालायक क्या कर लेगा?उन्होंने सोचा और बोझिल कदमों से अस्पताल में पत्नी के पास पहुंचे और कुर्सी पर ढेर हो गये।पुरानी बातें याद आने लगे, ——————-माधव राय जी स्कूल मे शिक्षक थे।उनके तीन बेटे और एक बेटी थी।बड़ा इंजिनियर और मझला डाक्टर था।दोनों की शादी बड़े घराने में हुई थी।दोनो अपनी पत्नियों के साथ अलग अलग शहरों मेंरहते थे।बेटी की शादी भी उन्होंने खूब धूमधाम से की थी।सबसे छोटा बेटा पढ़ाई में ध्यान नहीं लगा पाया था।ग्यारहवीं के बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी और घर में ही रहने लगा। कहता था मुझे नौकरी नहीं करनी अपने माता पिता की सेवा करनी है पर मास्टर साहब उससे बहुत नाराज रहते थे।उन्होंने उसका नाम नालायक रख दिया था ।दोनों बड़े भाई पिता के आज्ञाकारी थे पर वह गलत बात पर उनसे भी बहस कर बैठता था। इसलिये माधव जी उसे पसंद नही करते थे।जब माधव जी रिटायर हुए तो जमा पुँजी कुछ भी नही थी।सारी बचत दोनों बच्चों की उच्च शिक्षा और बेटी की शादी मे खर्च हो गई थी।शहर में एक घर , थोड़ी जमीन और गाँव में थोडी सी जमीन थी।घर का खर्च उनके पेंशन से चल रहा था।माधव जी को जब लगा कि छोटा सुधरने वाला नही तो उन्होंने बँटवारा कर दिया और उसके हिस्से की जमीन उसे देकर उसे गाँव में ही रहने भेज दिया। हालाँकि वह जाना नहीं चाहता था पर पिता की जिद के आगे झुक गया और गाँव में ही झोपड़ी बनाकर रहने लगा।माधव जी सबसे अपने दोनो होनहार और लायक बेटों की बड़ाई किया करते।उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था।पर उस नालायक का नाम भी नहीं लेते थे।दो दिन पहले दोनों पति पत्नी का एक्सीडेन्ट हो गया था । वह अपनी पत्नी के साथ सरकारी अस्पताल मे भर्ती थे।डाॅक्टर ने उनकी पत्नी को आपरेशन करने को कहा था।——————“पापा, पापा!” सुन कर तंद्रा टुटी तो देखा सामने वही नालायक खड़ा था।उन्होंने गुस्से से मुँह फेर लिया।पर उसने पापा के पैर छुए और रोते हुए बोला “पापा आपने इस नालायक को क्यों नहीं बताया? पर मैने भी आप लोगों पर जासूस छोड़ रखे हैं।खबर मिलते ही भागा आया हूँ।”पापा के विरोध के वावजूद उसने उनको एक बड़े अस्पताल मे भरती कराया।माँ का आपरेशन कराया ।अपना खून दिया । दिन रात उनकी सेवा में लगा रहता कि एक दिन वह गायब हो गया।वह उसके बारे मे फिर बुरा सोचने लगे थे कि तीसरे दिन वह वापस आ गया।महीने भर में ही माँ एकदम भली चंगी हो गई।वह अस्पताल से छुट्टी लेकर उन लोगों को घर ले आया। माधव जी के पूछने पर बता दिया कि खैराती अस्पताल था पैसे नहीं लगे हैं।घर मे नौकरानी थी ही।वह उन लोगों को छोड़ कर वापस गाँव चला गया।——————-धीरे धीरे सब कुछ सामान्य हो गया।एक दिन यूँ ही उनके मन मे आया कि उस नालायक की खबर ली जाए।दोनों जब गाँव के खेत पर पहुँचे तो झोपड़ी में ताला देख कर चौंके।उनके खेत मे काम कर रहे आदमी से पूछा तो उसने कहा “यह खेत अब मेरे हैं।””क्या?पर यह खेत तो….” उन्हे बहुत आश्चर्य हुआ।”हाँ।उसकी माँ की तबीयत बहुत खराब थी। उसके पास पैसे नहीं थे तो उसने अपने सारे खेत बेच दिये। वह रोजी रोटी की तलाश में दूसरे शहर चला गया है।बस यह झोपडी उसके पास रह गई है।यह रही उसकी चाबी।”उस आदमी ने कहा।वह झोपड़ी मे दाखिल हुये तो बरबस उस नालायक की याद आ गई।टेबल पर पड़ा लिफाफा खोल कर देखा तो उसमे रखा अस्पताल का नौ लाख का बिल उनको मुँह चिढ़ाने लगा।उन्होंने अपनी पत्नी से कहा – “जानकी तुम्हारा बेटा नालायक तो था ही झूठा भी है।”अचानक उनकी आँखों से आँसू गिरने लगे और वह जोर से चिल्लाये -“तूँ कहाँ चला गया नालायक, अपने पापा को छोड़ कर।एक बार वापस आ जा फिर मैं तुझे कहीं नही जाने दूँगा।”उनकी पत्नी के आँसू भी बहे जा रहे थे।और माधव जी को इंतजार था अपने नालायक बेटे को अपने गले से लगाने का।सचमुच बहुत नालायक था वो,,,,ये पोस्ट पढ़ते वक्त अगर आँखें नम हुई तो समझो हमारे अंदर भी एक ऩालायक है,,,बेटा हो तो ऐसा।

Posted in रामायण - Ramayan

Ram darbar made of wood. 20th century Varanasi.

Ram darbar made of wood. 20th century Varanasi.

Posted in रामायण - Ramayan

श्रीरामचरितमानस अखण्ड पाठ

श्री प्राचीन शिव मंदिर पुरानी कॉलोनी बानमोर, जिला मुरैना म.प्र. में श्रीरामचरितमानस अखण्ड पाठ दि. 24.07.2010 को प्रारंभ हुआ था जो प्रभु कृपा और आपश्री के सहयोग से अभी भी निरंतर चल रहा है।।। जय श्री राम ।।

Posted in रामायण - Ramayan

राम मंदिर निर्माण

अयोध्या राम मंदिर की नींव के दर्शनप्रभु श्रीराम के जन्म स्थल पर राम मंदिर की नीव के लिए 40 फ़ीट नीचे से काँक्रीट की लेयर्स डालने का कार्य चल रहा है, ये 400 से 300 फ़ीट लम्बी-चौड़ी हैं, ऐसी 45 लेयर्स डालने के बाद 12 फ़ीट ऊँचे चबूतरे पर भव्य #राममंदिर के गर्भगृह-मण्डप का निर्माण शुरू होगा

Posted in हास्यमेव जयते

महान वैज्ञानिक सर आइजैक न्यूटन ने जब अपने आँखों के सामने पेड़ से एक सेव को गिरते देखा तो उन्होंने गुरुत्वाकर्षण के नियम की खोज़ कर डाली…..लेकिन अगर न्यूटन के साथ यही घटना आज के दौर में अपने देश में हुई होती तो हमारे विभिन्न न्यूज़ चैनलों की हैडलाइन संभवतः कुछ इस प्रकार होती…….


आज खुलेगा राज अब होगा पर्दाफाश
जानेंगे सेव गिरने का कारण क्या था ख़ास…

रिपब्लिक टीवी

क्या न्यूटन के सिर पर मंडरा रहा था काल
या फ़िर सेव गिरने के पीछे पाक की थी कोई चाल…

इंडिया टीवी

एक बार फ़िर पाक हुआ बेनक़ाब
सेव गिराकर बुन रहा है कोई खौफ़नाक ख़्वाब…

एबीपी न्यूज़

कितना बड़ा था सेव , कितना विशाल था पेड़
जानेंगे उस शक़्स से जो वहीं चरा रहा था भेड़…

ज़ी न्यूज़

खौफ़ खाए पाक ने बम के बदले गिराए सेव
हिन्द का सीना हुआ चौड़ा ,जयते सत्यमेव…

न्यूज़ 24

चीन की दादागिरी या है ये अमेरिका की मनमानी
जानेंगे न्यूटन के सिर पर सेव गिरने की पूरी कहानी…

टीवी 9

आसमान से था वो टपका या फ़िर पेड़ से था गिरा
बताएंगे सेव की पूरी दास्तान, क्या न्यूटन था सिरफिरा…

इंडिया न्यूज

आम के पेड़ के नीचे क्यों नहीं सोया न्यूटन
सेव गिरने के बाद कैसे कौतूहल से भरा था उसका मन
कहीं जाइएगा मत छोटे से ब्रेक के बाद जानेंगे टनाटन…

न्यूज़ नेशन

यूं ही गिरा था सेव या पेड़ पर थी कोई आत्मा
स्टूडियो में बैठकर खुलासा करेंगें एक महात्मा…

सहारा समय

क्या था कोई भूत प्रेत डायन चुड़ैल का साया
या सेव ख़ुद ही हताश होकर नीचे चला आया…


बेबस ग़रीब के सिर पर गिरा सेव आख़िर है किसका ये दोष
फ़िलहाल वो ख़तरे से बाहर लेकिन सरकार के ख़िलाफ़ रोष..


पेड़ के नीचे बैठे एक व्यक्ति के आगे गिरा सेव
ब्रेक के बाद देखेंगे गोबर से खाद बनाने का कलेव…

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

सत्य नारायण

जिसके पिता ने लिखी सत्यनारायण कथा, उसके 3 बेटों ने ‘इज्जत लूटने वाले’ अंग्रेज को मारा और चढ़ गए फाँसी पर
आज अगर कोई कहे कि घर में पूजा है, तो ये माना जा सकता है कि “सत्यनारायण कथा” होने वाली है। ऐसा हमेशा से नहीं था। दो सौ साल पहले के दौर में घरों में होने वाली पूजा में सत्यनारायण कथा सुनाया जाना उतना आम नहीं था। हरि विनायक ने कभी 1890 के आस-पास स्कन्द पुराण में मौजूद इस संस्कृत कहानी का जिस रूप में अनुवाद किया, हमलोग लगभग वही सुनते हैं। हरि विनायक की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी और वो दरबारों और दूसरी जगहों पर कीर्तन गाकर आजीविका चलाते थे।
कुछ तो आर्थिक कारणों से और कुछ अपने बेटों को अपना काम सिखाने के लिए उन्होंने अपनी कीर्तन मंडली में अलग से कोई संगीत बजाने वाले नहीं रखे। उन्होंने अपने तीनों बेटों को इसी काम में लगा रखा था। दामोदर, बालकृष्ण और वासुदेव को इसी कारण कोई ख़ास स्कूल की शिक्षा नहीं मिली। हाँ ये कहा जा सकता है कि संस्कृत और मराठी जैसी भाषाएँ इनके लिए परिवार में ही सीख लेना बिलकुल आसान था। ऊपर से लगातार दरबार जैसी जगहों पर आने-जाने के कारण अपने समय के बड़े पंडितों के साथ उनका उठना-बैठना था। दामोदर हरि अपनी आत्मकथा में भी यही लिखते हैं कि दो चार परीक्षाएँ पास करने से बेहतर शिक्षा उन्हें ज्ञानियों के साथ उठने-बैठने के कारण मिल गई थी।
आज अगर पूछा जाए तो हरि विनायक को उनके सत्यनारायण कथा के अनुवाद के लिए तो नहीं ही याद किया जाता। उन्हें उनके बेटों की वजह से याद किया जाता है। सर्टिफिकेट के आधार पर जो तीनों कम पढ़े-लिखे बेटे थे और अपनी पत्नी के साथ हरि विनायक पुणे के पास रहते थे। आज जिसे इंडस्ट्रियल एरिया माना जाता है, वो चिंचवाड़ उस दौर में पूरा ही गाँव हुआ करता था। 1896 के अंत में पुणे में प्लेग फैला और 1897 की फ़रवरी तक इस बीमारी ने भयावह रूप धारण कर लिया। ब्युबोनिक प्लेग से जितनी मौतें होती हैं, पुणे के उस प्लेग में उससे दोगुनी दर से मौतें हो रही थीं। तब तक भारत के अंतिम बड़े स्वतंत्रता संग्राम को चालीस साल हो चुके थे और फिरंगियों ने पूरे भारत पर अपना शिकंजा कस रखा था।
अंग्रेजों को दहेज़ में मिले मुंबई (तब बॉम्बे) के इतने पास प्लेग के भयावह स्वरूप को देखते हुए आईसीएस अधिकारी वॉल्टर चार्ल्स रैंड को नियुक्त किया गया। उसके प्लेग नियंत्रण के तरीके दमनकारी थे। उसके साथ के फौजी अफसर घरों में जबरन घुसकर लोगों में प्लेग के लक्षण ढूँढते और उन्हें अलग कैंप में ले जाते। इस काम के लिए वो घरों में घुसकर औरतों-मर्दों सभी को नंगा करके जाँच करते। तीनों भाइयों को साफ़ समझ में आ रहा था कि महिलाओं के साथ होते इस दुर्व्यवहार के लिए वॉल्टर रैंड ही जिम्मेदार है। उन्होंने देशवासियों के साथ हो रहे इस दमन के विरोध में वाल्टर रैंड का वध करने की ठान ली।
थोड़े समय बाद (22 जून 1897 को) रानी विक्टोरिया के राज्याभिषेक की डायमंड जुबली मनाई जाने वाली थी। दामोदर, बालकृष्ण और वासुदेव ने इसी दिन वॉल्टर रैंड का वध करने की ठानी। हरेक भाई एक तलवार और एक बन्दूक/पिस्तौल से लैस होकर निकले। आज जिसे सेनापति बापत मार्ग कहा जाता है, वो वहीं वॉल्टर रैंड का इन्तजार करने वाले थे मगर ढकी हुई सवारी की वजह से वो जाते वक्त वॉल्टर रैंड की सवारी को पहचान नहीं पाए। लिहाजा अपने हथियार छुपाकर दामोदर हरि ने लौटते वक्त वॉल्टर रैंड का इंतजार किया। जैसे ही वॉल्टर रवाना हुआ, दामोदर हरि उसकी सवारी के पीछे दौड़े और चिल्लाकर अपने भाइयों से कहा “गुंडया आला रे!”
सवारी का पर्दा खींचकर दामोदर हरि ने गोली दाग दी। उसके ठीक पीछे की सवारी में आय्रेस्ट नाम का वॉल्टर का ही फौजी एस्कॉर्ट था। बालकृष्ण हरि ने उसके सर में गोली मार दी, जिससे उसकी फ़ौरन मौत हो गयी। वॉल्टर फ़ौरन नहीं मरा था, उसे ससून हॉस्पिटल ले जाया गया और 3 जुलाई 1897 को उसकी मौत हुई। इस घटना की गवाही द्रविड़ बंधुओं ने दी थी। उनकी पहचान पर दामोदर हरि गिरफ्तार हुए और उन्हें 18 अप्रैल 1898 को फाँसी दी गई। बालकृष्ण हरि भागने में कामयाब तो हुए मगर जनवरी 1899 को किसी साथी की गद्दारी की वजह से पकड़े गए। बालकृष्ण हरि को 12 मई 1899 को फाँसी दी गई।
भाई के खिलाफ गवाही देने वाले द्रविड़ बंधुओं का वासुदेव हरि ने वध कर दिया था। अपने साथियों महादेव विनायक रानाडे और खांडो विष्णु साठे के साथ उन्होंने उसी शाम (9 फ़रवरी 1899) को पुलिस के चीफ कॉन्स्टेबल रामा पांडू को भी मारने की कोशिश की, मगर पकड़े गए। वासुदेव हरि को 8 मई 1899 और महादेव रानाडे को 10 मई 1899 को फाँसी दी गई। खांडो विष्णु साठे उस वक्त नाबालिग थे इसलिए उन्हें दस साल कैद-ए-बामुशक्कत सुनाई गई।
मैंने स्कूल के इतिहास में भारत का स्वतंत्रता संग्राम पढ़ते वक्त दामोदर चापेकर, बालकृष्ण चापेकर और वासुदेव चापेकर की कहानी नहीं पढ़ी थी। जैसे पटना में सात शहीदों की मूर्ती दिखती है, वैसे ही चापेकर बंधुओं की मूर्तियाँ पुणे के चिंचवाड़ में लगी हैं। उनकी पुरानी किस्म की बंदूकें देखकर जब हमने पूछा कि ये क्या 1857 के सेनानी थे? तब चापेकर बंधुओं का नाम और उनकी कहानी मालूम पड़ी। भारत के स्वतंत्रता संग्राम को अहिंसक साबित करने की जिद में शायद इनका नाम किताबों में शामिल करना उपन्यासकारों को जरूरी नहीं लगा होगा। काफी बाद में (2018) भारत सरकार ने दामोदर हरि चापेकर का डाक टिकट जारी किया है।
बाकी इतिहास खंगालिएगा भी तो चापेकर के किए अनुवाद से पहले, सत्यनारायण कथा के पूरे भारत में प्रचलित होने का कोई पुराना इतिहास नहीं निकलेगा। चापेकर बंधुओं को किताबों और फिल्मों आदि में भले कम जगह मिली हो, धर्म अपने बलिदानियों को कैसे याद रखता है, ये अगली बार सत्यनारायण की कथा सुनते वक्त जरूर याद कर लीजिएगा। धर्म है, तो राष्ट्र भी है!

साभार K P Singh Saroha jee ka Post


Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक


पश्चिम बंगाल के एक गांव में वामा चरण नाम के बालक का जन्म हुआ । बालक के जन्म के कुछ समय बाद उसके पिता का देहांत हो गया । माता भी गरीब थी । इसलिए बच्चों के पालन पोषण की समस्या आई । उन्हें मामा के पास भेज दिया गया । मामा तारापीठ के पास के गांव में रहते थे । जैसा कि आमतौर पर अनाथ बच्चों के साथ होता है । दोनों बच्चों के साथ बहुत अच्छा व्यवहार नहीं हुआ ।
धीरे-धीरे वामाचरण की रुचि साधु संगति की तरफ होने लगी। गांव के मशान में आने वाले बाबाओं की संगत में रहते हुए बामाचरण में भी देवी के प्रति रुझान बढ़ने
लगा। अब वह तारा माई को बड़ी मां कहते और अपनी मां को छोटी मां ।

बामा चरण कभी श्मशान में जलती चिता के पास जाकर बैठ जाता, तो कभी यूं ही हवा में बातें करता रहता। ऐसे ही वह युवावस्था तक पहुंच गया। उसकी हरकतों की वजह से उसका नाम बामाचरण से वामा खेपा पड़ चुका था। खेपा का मतलब होता है पागल। यानी गांव वाले उसको आधा पागल समझते थे। उसके नाम के साथ उन्होंने पागल उपनाम जोड़ दिया था। वे यह नहीं जानते थे कि वस्तुत: कितनी उच्च कोटि का महामानव उनके साथ है।

वह भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि थी । मंगलवार का दिन था । भगवती तारा की सिद्धि का परम सिद्ध मुहूर्त । रात का समय था । बामाखेपा जलती हुई चिता के बगल में श्मशान में बैठा हुआ था तभी !

नीले आकाश से ज्योति फूट पड़ी और चारों तरफ प्रकाश ही प्रकाश फैल गया।

उसी प्रकाश में वामाचरण को माँ तारा के दर्शन हुए। ।
कमर में बाघ की खाल पहने हुए !

एक हाथ में कैंची लिए ।

एक हाथ में खोपड़ी लिए ।

एक हाथ में नीले कमल का पुष्प लिए ।

एक हाथ में खड्ग लिए हुए।

महावर लगे सुंदर पैरो में पायल पहने ।

खुले हुए कमर तक बिखरे केश से युक्त ,

परम ब्रह्मांड की स्वामिनी, सौंदर्य की प्रतिमूर्ति ।

नील वर्णी , मंद मंद मुसकाती माँ तारा, वामाखेपा के सामने खड़ी थी…….

वामाखेपा उस भव्य और सुंदर देवी को देखकर खुशी से भर गए। माता ने उसके सर पर हाथ फेरा और वामाखेपा वही समाधिस्थ हो गए ।

3 दिन और 3 रात उसी समाधि की अवस्था में वे श्मशान में रहे । 3 दिन के बाद उन्हें होश आया और होश आते ही वह मां मां चिल्लाते हुए इधर उधर दौडने लगे । अब गांव वालों को पूरा यकीन हो गया कि बामा पूरा पागल हो गया है । बामा की यह स्थिति महीने भर रही ….

कुछ दिन बाद वहां की रानी जी को सपने में भगवती तारा ने दर्शन दिए और निर्देश दिया कि मसान के पास मेरे लिए मंदिर का निर्माण करो और बामा को पुजारी बनाओ। अगले दिन से मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ हो गया। कुछ ही दिनों में मंदिर बनकर तैयार हो गया और बामा को मंदिर का पुजारी बना दिया गया। बामा बेहद खुश हो गए क्योंकि उनकी बड़ी मां अब उनके साथ थी……

रानी के द्वारा बनाया मंदिर अर्थात मोटे चढ़ावे की संभावना। अब ऐसे मंदिर में एक आधे पागल को पुजारी बनाना बहुत से पण्डों को रास नहीं आया। वे बामाखेपा को निपटाने का मार्ग खोजते रहते थे। बामाखेपा की हरकतें अजीब अजीब हुआ करती थी । कई बार वह दिन भर पूजा करता । कई बार दो-तीन दिन तक पूजा ही नहीं करता। कभी देवी को माला पहनाता कभी खुद पहन लेता । इनमें से कोई भी क्रम पंडों के हिसाब से शास्त्रीय पूजन विधि से मैच नहीं खाता था । यह बात उनको खटक रही थी।

फिर एक दिन ऐसा हुआ कि प्रसाद बना और प्रसाद बनने के बाद जब मंदिर में पहुंचा तो देवी को भोग लगाने से पहले वामा चरण के मन में विचार आया, कि इसे चख कर देख लो कि यह माता के खाने के लायक है या नहीं । बस फिर क्या था । उन्होंने प्रसाद की थाली में हाथ डाला और चखने के लिए अपने मुंह में डाल लिया । चखने के बाद जब सही लगा तो बाकी प्रसाद उन्होंने माई को अर्पित कर दिया ।

इतना बड़ा अवसर पंडित कहाँ छोड़ते । उन्होंने बवाल मचा दिया कि, देवी के प्रसाद को बामा ने खा लिया है । उसे जूठा कर दिया है। जूठा प्रसाद देवी को चढ़ा दिया
है । अब देवी रुष्ट हो जाएगी, उसका प्रकोप सारे गांव को झेलना पड़ेगा । उसके बाद भीड़तंत्र का बोलबाला हुआ और गांव वालों ने मिलकर पंडों के साथ बामाचरण की कस कर पिटाई कर दी । उसे श्मशान में ले जाकर फेंक दिया ।
मंदिर पर पण्डों का कब्जा हो गया । उन्होंने शुद्धिकरण और तमाम प्रक्रियाएं की । उस दिन पूजन पण्डों के अनुसार संपन्न हुआ ।

उधर बामाखेपा को होश आया तो वह माई पर गुस्सा हो गया – मैंने गलत क्या किया जो तूने मुझे पिटवा दिया । तुझे देने से पहले खाना स्वादिष्ट है या नहीं देख रहा था । इसमें मेरी गलती क्या थी ? मैं तो तुम्हें स्वादिष्ट भोग लगाने का प्रयास कर रहा था और चाहता था कि तुझे अच्छे स्वाद का प्रसाद ही मिले । अगर स्वाद गड़बड़ होता तो उसे फेककर दूसरा बनवाता । लेकिन तूने बेवजह मुझे पिटवाया जा मैं अब तेरे पास नही आऊंगा ।

मसान घाट पर बैठकर बामाचरण ने मां को सारी बातें सुना दी और वहां से उठकर चला गया जंगल की ओर । जंगल में जाकर एक गुफा में बैठ गया । यह स्थिति बिलकुल वैसे ही थी जैसे अपनी मां से रूठ कर बच्चे किसी कोने में जाकर छुप जाते हैं । बामाचरण और तारा माई के बीच में मां और बेटे जैसा रिश्ता था । यह रिश्ता बिल्कुल वैसा ही था जैसे एक अबोध शिशु और उसकी मां की बीच में होता है ।

अपने शिशु की व्यथा तारा माई को सहन नहीं हुई । उसी रात रानी के स्वप्न में माई प्रकट हुई ।

क्रोधित माई ने रानी को फटकार लगाई – तेरे पण्डों ने मेरे पुत्र को बुरी तरह से मारा है । मैं तेरा मंदिर छोड़ कर जा रही हूं । अब तुझे और तेरे राज्य को मेरा प्रकोप सहना पड़ेगा, अगर उससे बचना चाहती है तो कल के कल मेरे पुत्र को वापस लाकर मंदिर में पूजा का भार सौंप, वरना प्रतिफल भुगतने के लिए तैयार रह ।

एक तो तारा माई का रूप ऐसे ही भयानक है । क्रोधित अवस्था में तो सीधी सरल माता भी काली से कम नहीं दिखाई देती । क्रोधित माई का स्वरूप व्याख्या से परे
था ।

रानी हड़बड़ा कर पलंग पर उठ बैठी । रानी के लिए रात बिताना भी मुश्किल हो गया । उसने सारी रात जागकर बिताई ।

अगले दिन अपने सेवकों को दौड़ाया और मामले का पता लगाने के लिए कहा । जैसे ही पूरी जानकारी प्राप्त हुई रानी अपने लाव लश्कर के साथ मंदिर पहुंच गई । सारे पण्डों को कसकर फटकार लगाई और मंदिर में प्रवेश से प्रतिबंधित कर दिया । अपने सेवकों को आदेश दिया कि जैसे भी हो बामाखेपा को ढूंढ कर लाओ ।

अब सारे सेवक चारों तरफ बामाखेपा की खोज में लग गए । एक सेवक को गुफा में बैठा हुआ बामाखेपा मिल गया । बड़ी मनोव्वल के बाद भी वह नहीं माना तो सेवक ने जाकर रानी को बात बताई । अंततः रानी खुद गुफा तक पहुंची ।

बामा ने उनपर भी अपना गुस्सा उतारा – आप के कहने पर मैं पूजा कर रहा था और मुझे देखो इन लोगों ने कितना मारा !

उनकी बाल सुलभ सहजता को देखकर रानी का नारी हृदय भी ममत्व से भर गया । उनकी समझ में आ गया कि तारा माई का मातृत्व इस बामाखेपा के प्रति क्यों है ।

उन्होंने फरमान जारी कर दिया – इस मंदिर का पुजारी बामाखेपा है । उसकी जैसी मर्जी हो जैसी विधि वह करना चाहे उस प्रकार से पूजा करने के लिए वह स्वतंत्र है। कोई भी उसके मार्ग में आएगा तो दंड का भागी होगा। यह मंदिर बामाखेपा का है और तारा माई भी बामाखेपा की है। वह जिस विधान को सही समझे, उस विधान से पूजा करेगा और वही विधान यहां पर सही माना जाएगा।

बामाखेपा को तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गई । मां और बेटे का मिलन हो चुका था । मंदिर व्यवस्था फिर से बामाखेपा के हिसाब से चलने लगी ।

ऐसा माना जाता है कि तारा माई खुद बामाखेपा के हाथ से प्रसाद ग्रहण करती थी । ऐसे अद्भुत ढंग से बामाखेपा तारा माई के पूजन करते जिसका कोई नियम नहीं था । कभी सुबह 4 बजे पूजा चल रही है तो कभी दोपहर 12 बजे तक पूजा प्रारंभ नहीं होती । कभी रात भर पूजा चल रही है तो कभी पूरे दिन भर मंदिर की ओर बामाखेपा के दर्शन ही नहीं होते थे। उनकी पूजन विधि लोगों को पसंद नहीं थी, लेकिन उनके पास कोई उपाय नहीं था, क्योंकि रानी का फरमान था । बामाखेपा अपनी मस्ती में जीते थे और लोग उन्हें नीचा दिखाने का रास्ता खोजते ।

एक दिन बामाखेपा की मां का निधन हो गया । नदी में बाढ़ थी । नदी के उस पार गांव था ।बामा जिद पर अड़ गए छोटी मां का दाह संस्कार बड़ी मां के पास वाले श्मशान में किया जाएगा । गांव वाले बाढ़ वाली नदी को पार करने में जान का खतरा है यह जानते थे, लेकिन बामा को समझाना किसी के बस की बात नहीं ।

नाव वाले से बाबा ने देह को नदी के पार पहुंचाने की बात की । नाव वाले ने साफ इंकार कर दिया । बाबा ने नाव देने के लिए कहा । नाव वाला हाथ जोड़कर बोला –
“बाबा यही मेरे जीवन का सहारा है अगर बाढ़ में यह बह गया तो मैं घर कैसे चलाउँगा ?”

बामा के चेहरे में रहस्यमई मुस्कान बिखर गई । जैसे उन्होंने कोई निर्णय ले लिया हो । उन्होंने अपनी माता के शव को उठाया और खुद नदी पर चलते हुए इस पार पहुंच गए । गांव वाले आंखें फाड़े उस दृश्य को देखते रह गए । बामा की इच्छा के अनुसार ही उन्होंने माई के मंदिर के पास वाले श्मशान में अपनी मां का दाह संस्कार संपन्न किया ।

मृत्यु भोज के लिए आसपास के सारे गांव में जितने लोग हैं, सभी को निमंत्रित करने के लिए बामाखेपा ने अपने घर के लोगों और आसपास के लोगों को कहा । सब इसे बामाखेपा का पागलपन समझकर शांत रहें । जिसके पास दो वक्त की रोटी का पता नहीं वह आसपास के 20 गांव को खाना कैसे खिलाएंगा यह उनके लिए कल्पना से भी परे की बात थी ।

जब कोई भी निमंत्रण देने जाने को तैयार नहीं हुआ तो बामाखेपा अकेले निकल पड़े । उन्होंने आसपास के 20 गांवों में हर किसी को मृत्यु भोज के लिए आमंत्रित कर लिया । सारे गांव वाले यह देखने के लिए तारापीठ पहुंचने लगे कि देखा जाए यह पगला किस प्रकार से इतने सारे लोगों को मृत्यु भोज कराता है ।

गांव वालों की आंखें उस समय फटी की फटी रह गई जब सुबह से बैल गाड़ियों में भर-भर कर अनाज सब्जी आदि तारापीठ की तरफ आने लगी । बैल गाड़ियों का पूरा एक काफिला मंदिर के पास पहुंच गया । अनाज और सब्जियों का ढेर लग गया । जो लोग आए थे उन्होंने खाना बनाना भी प्रारंभ कर दिया । दोपहर होते-होते सुस्वादु भोजन की गंध से पूरा इलाका महक रहा था ।

प्रकृति भी अपना परीक्षण कब छोड़ती है, आसमान में बादल छाने लगे। प्रकृति ने भी उग्र रूप धारण कर लिया। बिजली कड़कने लगी । हवाएं चलने लगी और जोरदार बारिश के आसार नजर आने लगे । बामाखेपा अपनी जगह से उठे और जिस जगह पर श्राद्ध भोज होना था, उस पूरे जगह को बांस के डंडे से एक घेरा बनाकर घेर दिया ।

घनघोर बारिश चालू हो गई लेकिन घेरे के अंदर एक बूंद पानी भी नहीं गिरी । गांव वाले देख सकते थे कि वे जहां बैठकर भोजन कर रहे हैं वह पूरा हिस्सा सूखा हुआ है, और उस घेरे के बाहर पानी की मोटी मोटी बूंदें बरस रही है । जमीन से जल धाराएं बह रही हैं । वह पूरा इलाका जिसमें भोज का आयोजन था ,पूरी तरह से सूखा हुआ था । 20 गांव से आए हुए सभी लोगों ने छक कर भोजन किया । हर कोई तृप्त हो गया ।

अब बारी थी वापस अपने अपने गांव जाने की । घनघोर बारिश को देखते हुए वापस जाने के लिए दिक्कत आएगी यह सोचकर सभी चिंतित थे ।

बामाखेपा ने माई के सामने अपना अनुरोध पेश किया और कुछ ही क्षणों में आसमान पूरी तरह से साफ हो गया और धूप खिल गई । सारे लोग बड़ी सहजता से अपने अपने गांव तक पहुंच गए ।

इस घटना के बाद बामाखेपा की अलौकिकता के बारे में लोगों को पता लगा । धीरे-धीरे लोगों की भीड़ बामाखेपा की तारा पीठ में बढ़ने लगी । कोई बीमार आता तो बामाखेपा उस पर हाथ फेर देते तो वह स्वस्थ हो जाता
है । निसंतानों को संतान की प्राप्ति हो जाती और सभी आगंतुकों की इच्छा और मनोकामना तारापीठ में पूरी होने लगी ।

बामाखेपा कभी भी बिना चखे माई को भोजन नहीं कराते थे । माई स्वयं अपने हाथ से उनको भोजन खिलाती थी और उनके हाथों से भोजन ग्रहण करती थी । ऐसे अद्भुत महामानव बामाखेपा अपने अंत समय में माई की प्रतिमा में लीन हो गए ।


साभार Pramod Sharma

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रविवार के दिन जरूर पढ़े सूर्य देव की व्रत कथा, होगी असीम कृपा

प्राचीन काल की बात है। एक बुढ़िया थी जो नियमित तौर पर रविवार के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर नित्यकर्मों से निवृत्त होकर अपने आंगन को गोबर से लीपती थी जिससे वो स्वच्छ हो सके। इसके बाद वो सूर्य देव की पूजा-अर्चना करती थी। साथ ही रविवार की व्रत कथा भी सुनती थी। इस दिन वो एक समय भोजन करती थी और उससे पहले सूर्य देव को भोग भी लगाती थी। सूर्य देव उस बुढ़िया से बेहद प्रसन्न थे। यही कारण था कि उसे किसी भी तरह का कष्ट नहीं था और वो धन-धान्य से परिपूर्ण थी।

जब उसकी पड़ोसन ने देखा की वो बहुत सुखी है तो वो उससे जलने लगी। बढ़िया के घर में गाय नहीं थी इसलिए वो अपनी पड़ोसन के आंगन गोबर लाती थी। क्योंकि उसके यहां गाय बंधी रहती थी। पड़ोसन ने बुढ़िया को परेशान करने के लिए कुछ सोचकर गाय को घर के अंदर बांध दिया। अगले रविवार बुढ़िया को आंगन लीपने के लिए बुढ़िया को गोबर नहीं मिला। इसी के चलते उसने सूर्य देवता को भोग भी नहीं लगाया। साथ ही खुद भी भोजन नहीं किया और पूरे दिन भूखी-प्यासी रही और फिर सो गई।

अगले दिन जब वो सोकर उठी को उसने देखा की उसके आंगन में एक सुंदर गाय और एक बछड़ा बंधा था। बुढ़िया गाय को देखकर हैरान रह गई। उसने गाय को चारा खिलाया। वहीं, उसकी पड़ोसन बुढ़िया के आंगन में बंधी सुंदर गाय और बछड़े को देखकर और ज्यादा जलने की। तो वह उससे और अधिक जलने लगी। पड़ोसन ने उसकी गायब के पास सोने का गोबर पड़ा देखा तो उसने गोबर को वहां से उठाकर अपनी गाय के गोबर के पास रख दिया।

सोने के गोबर से पड़ोसन कुछ ही दिन में धनवान हो गई। ये कई दिन तक चलता रहा। कई दिनों तक बुढ़िया को सोने के गोबर के बारे में कुछ पता नहीं था। ऐसे में बुढ़िया पहले की ही तरह सूर्यदेव का व्रत करती रही। साथ ही कथा भी सुनती रही। इसके बाद जिस दिन सूर्यदेव को पड़ोसन की चालाकी का पता चला। तब उन्होंने तेज आंधी चला दी। तेज आंधी को देखकर बुढ़िया ने अपनी गाय को अंदर बांध दिया। अगले दिन जब बुढ़िया उठी तो उसने सोने का गोबर देखा। तब उसे बेहद आश्चर्य हुआ।

तब से लेकर आगे तक उसने गाय को घर के अंदर ही बांधा। कुछ दिन में ही बुढ़िया बहुत धनी हो गई। बुढ़िया की सुखी और धनी स्थिति देख पड़ोसन और जलने लगी। पड़ोसने उसने अपने पति को समझा-बुझाकर उसे नगर के राजा के पास भेजा। जब राजा ने उस सुंदर गाय को देखा तो वो बहुत खुश हुआ। सोने के गोबर को देखकर तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहउसे नगर के राजा के पास भेज दिया। सुंदर गाय को देखकर राजा बहुत खुश हुआ। सुबह जब राजा ने सोने का गोबर देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा।
वहीं, बुढ़िया भूखी-प्यासी रहकर सूर्य भगवान से प्रार्थना कर रही थी। सूर्यदेव को उस पर करुणा आई। उसी रात सूर्यदेव राजा के सपने में आए और उससे कहा कि हे राजन, बुढ़िया की गाय व बछड़ा तुरंत वापस कर दो। अगर ऐसा नहीं किया तो तुम पर परेशानियों का पहाड़ टूट पड़ेगा। सूर्यदेव के सपने ने राजा को बुरी तरह डरा दिया। इसके बाद राजा ने बुढ़िया को गाय और बछड़ा लौटा दिया।

राजा ने बुढ़िया को ढेर सारा धन दिया और क्षमा मांगी। वहीं, राजा ने पड़ोसन और उसके पति को सजा भी दी। इसके बाद राजा ने पूरे राज्य में घोषणा कराई की रविवार को हर कोई व्रत किया करे। सूर्यदेव का व्रत करने से व्यक्ति धन-धान्य से परिपूर्ण हो जाता है। साथ ही घर में खुशहाली भी आती है।