Posted in Rajniti Bharat ki

आडवाणी जी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार क्यों नही बन पाए , इसे समझने के लिए महाभारत के एक प्रसंग को समझना जरूरी होगा ।
महाभारत के युद्ध पश्चात श्रीकृष्ण लौटे तो रोष में भरी रुक्मिणी ने पूछा..,

“आपने द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह जैसे धर्मपरायण लोगों के वध में क्यों साथ दिया ?”
श्री कृष्ण ने उत्तर दिया.., “ये सही है कि उन दोनों ने जीवनपर्यंत धर्म का पालन किया किन्तु उनके किये एक पाप ने उनके सारे पुण्यों को हर लिया ”

“वो कौन सा पाप था ?”
श्री कृष्ण ने कहा : “भरी सभा में जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था तब ये दोनों भी वहां उपस्थित थे। बड़े होने के नाते ये दुशासन को आज्ञा भी दे सकते थे किंतु इन्होंने ऐसा नहीं किय। उनके इस एक पाप से बाकी धर्मनिष्ठता छोटी पड गई”
रुक्मिणी ने पूछा, “और कर्ण ? वो अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध था ।कोई उसके द्वार से खाली हाथ नहीं गया। उसकी क्या गलती थी ?”

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श्रीकृष्ण ने कहा, “जब अभिमन्यु सभी वीरों को धूल चटाने के बाद युद्धक्षेत्र में आहत होकर भूमि पर पड़ा था तो उसने करण से पानी माँगा। कर्ण जहाँ खड़ा था उसके पास पानी का एक गड्ढा था किंतु कर्ण ने मरते हुए अभिमन्यु को पानी नहीं दिया। इसलिये उसका जीवन भर दानवीरता से कमाया हुआ पुण्य नष्ट हो गया। बाद में उसी गड्ढे में उसके रथ का पहिया फंस गया और वो मारा गया”

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अब आप लोग खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि पाकिस्तान जाकर जिन्ना की मजार पर आडवाणी जी ने जो भाषण दिया , उस भाषण के पाप का वजन कितना था ?

Sanjay dvivedi

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कांग्रेस के चाचा के कुकर्म :
डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद और पंडित नेहरू के बीच गम्भीर मतभेदों की ओर अधिक चर्चा करना जरूरी हो गया है।

 यह सर्वविदित तथ्य है कि डाॅ. प्रसाद ने एक पत्र लिखकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को उनकी चीन नीति के बारे में कड़ी चेतावनी दी थी। यह पत्र डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद और नेहरू के पत्राचार में शामिल है। डाॅ. प्रसाद ने लिखा था कि चीन कभी भी भारत के लिए खतरा बन सकता है इसलिए तिब्बत का प्रभुत्व स्वीकार करना देशहित में नहीं होगा। तिब्बत को यथावत बफर स्टेट के रूप में बरकरार रखना देशहित में होगा मगर नेहरू ने डाॅ. प्रसाद के इस मशवरे को नहीं माना और इसकी भारी कीमत 1962 में देश को अदा करनी पड़ी। चीन ने भारत की जिस दो लाख किलोमीटर वर्ग भूमि पर कब्जा किया था उसे आज तक भारत खाली नहीं करवा सका। त्रासदी यह है कि दिसम्बर, 1962 में संसद में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया गया था जिसमें कहा गया कि जब तक भारत चीन के कब्जे से एक-एक इंच अपनी भूमि आजाद नहीं करवा लेता चीन से बातचीत नहीं की जाएगी। लज्जाजनक बात यह है कि इस संकल्प के बावजूद हम आज तक 23 बार चीन के साथ वार्तालाप कर चुके हैं। मगर उससे कुछ भी हासिल नहीं हुआ। चीन का रूख आज भी भारत के प्रति रूख आक्रामक है और वह तवांग पर अपना दावा ठोक रहा है।
नेहरू जी के साथ अपने मतभेदों की कीमत डाॅ. प्रसाद को अदा करनी पड़ी। नेहरू जी के विरोध के कारण कांग्रेस ने डाॅ. प्रसाद को राष्ट्रपति के रूप में तीसरी बार मनोनीत करने से इनकार कर दिया और नेहरू जी के दबाव के कारण डाॅ. राधाकृष्णन को राष्ट्रपति बनााया गया।
देशरत्न डाॅ. प्रसाद से अपने द्वेष को नेहरू राष्ट्रपति पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी नहीं भूले। संविधान और परम्परा के अनुसार केन्द्र सरकार सेवानिवृत्त राष्ट्रपति के लिए जहां वह चाहे आवास की व्यवस्था करती है मगर पंडित नेहरू ने बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री डाॅ. श्रीकृष्ण सिन्हा पर इस बात के लिए दबाव डाला कि वह सरकारी तौर पर पटना में डाॅ. प्रसाद के लिए आवास की कोई व्यवस्था न करें।
डाॅ. प्रसाद के अंतिम दिनों में मुझे उनके दर्शन करने का सौभाग्य पटना में प्राप्त हुआ। क्योंकि डाॅ. प्रसाद के पास उनका आवास नहीं था इसलिए उन्होंने अंतिम दिन सदाकत आश्रम के एक कमरे में बिताए। यह कमरा बहुत ही छोटा और सीलन भरा था। मुझे डाॅ. प्रसाद की चिकित्सा करने वाले डाॅक्टरों ने बताया कि क्योंकि डाॅ. प्रसाद दमा के मरीज हैं इसलिए यह सीलन भरा वातावरण उनके स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। कहा जाता है कि डाॅ. प्रसाद के परिजनों ने बिहार सरकार से अनुरोध किया था कि डाॅ. प्रसाद के लिए आवास की व्यवस्था की कहीं और की जाए। मगर नेहरू के व्यक्तिगत दबाव के कारण बिहार सरकार को डाॅ. प्रसाद को आवास देने की हिम्मत नहीं हुई। सबसे दुखद बात यह है कि उन दिनों डाॅ. प्रसाद की हालत गम्भीर चल रही थी और बलगम को निकालने के लिए राज्य सरकार ने उनके डाॅक्टरों को एक मशीन दी हुई थी। मगर न जाने किसके दबाव के कारण इस मशीन को सदाकत आश्रम से वापस मंगवा लिया गया। उसी रात को डाॅ. प्रसाद की हालत गम्भीर हो गई। क्योंकि मशीन उपलब्ध नहीं थी। इसलिए उनके जीवन को बचाया न जा सका और भारत माता का यह सपूत नेहरू जी की जिद का शिकार हो गया।
इस संदर्भ में यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि डाॅ. प्रसाद के निधन के बाद उनकी अंत्येष्टि में न तो पंडित नेहरू शामिल हुए थे और न ही उन्होंने किसी अन्य मंत्री को पटना जाकर अंत्येष्टि में भाग लेने की अनुमति प्रदान की थी।

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आदणीय अग्रज Manmohan Sharma जी का आलेख।

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#राष्ट्रपति_विमर्श

और 

#दूषित्त_कांग्रेस

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हर युवा को हर तथ्य और हर सत्य जानने 

का अधिकार है।
दादा Sumant Bhattacharya जी की वाल से साभार

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

यह भारत है..


*”यह भारत है…!”*

*”जहाँ वाहवाही लूटने वाले कोई ओर*

*व*

*पुरुषार्थ करने वाले कोई ओर होते हैं!”*
करीब तीस साल का एक युवक मुंबई के प्रसिद्ध टाटा कैंसर अस्पताल के सामने फुटपाथ पर खड़ा था।

युवक वहाँ अस्पताल की सीढिय़ों यानि मौत के द्वार पर खड़े मरीजों को बड़े ध्यान दे देख रहा था…

जिनके चेहरों पर दर्द और विवषता के भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे…!

रोगियों के साथ उनके रिश्तेदार भी परेशान थे!
यह दृश्य थोड़ी देर में ही उस युवक को परेशान करने लगा!
वहाँ मौजूद रोगियों में से अधिकांश, दूरदराज के गाँवों के थे, जिन्हें यह भी नहीं पता था कि क्या करें, किससे मिलें? इन लोगों के पास दवा और भोजन के भी पैसे नहीं थे!
टाटा कैंसर अस्पताल के सामने का यह दृश्य देख कर वह तीस साल का युवक भारी मन से अपने घर लौट आया! मगर उसने यह ठान लिया कि इनके लिए कुछ करूँगा।

कुछ करने की चाह ने उसे रात-दिन सोने नहीं दिया। अंतत: उसे एक रास्ता सूझा…
उस युवक ने अपने होटल को किराये पर देकर कुछ पैसा उठाए और  इन पैसों से टाटा कैंसर अस्पताल के ठीक सामने एक भवन लेकर, धर्मार्थ कार्य (चेरिटी वर्क) शुरु कर दिया।
उस युवक की इस गतिविधि को अब तकरीबन तीन दशक के आसपास हो चुके हैं और ये गतिविधियाँ नित नई प्रगति के साथ आगे बढ़ रही हैं।

उक्त चेरिटेबिल संस्था, कैंसर रोगियों और उनके रिश्तेदारों को निःशुल्क भोजन उपलब्ध कराती है।

करीब पचास लोगों से शुरु किए गए इस कार्य में संख्या लगातार बढ़ती गई। मरीजों की संख्या बढऩे पर मदद के लिए हाथ भी बढऩे लगे। सर्दी, गर्मी, बर्षात हर मौसम को झेलने के बावजूद यह काम नहीं रुका।
ऐसे पुनीत काम की शुरुआत करने वाले उस युवक का नाम था हरकचंद सावला।
एक काम में सफलता मिलने के बाद हरकचंद सावला ने जरूरतमंदों को निःशुल्क दवा की आपूर्ति करना भी आरंभ कर दिया।
इसके लिए उन्होंने मैडीसिन बैंक बनाया है, जिसमें तीन डॉक्टर और तीन फार्मासिस्ट, स्वैच्छिक सेवा देते हैं। इतना ही नहीं उन्होंने कैंसर पीड़ित बच्चों के लिए खिलौनों का एक बैंक भी खोल दिया। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि सावला द्वारा कैंसर पीडि़तों के लिए स्थापित ‘जीवन ज्योति ट्रस्ट’ आज 60 से भी अधिक प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है।
उम्र 60 साल के आसपास भी सावला में उत्साह और ऊर्जा 27 साल पहले जैसी ही है।

मानवता के लिए उनके योगदान को नमन करने की जरूरत है।

यह विडंबना ही है कि आज लोग 20 साल में 200 टेस्ट मैच खेलने वाले सचिन को कुछ शतक और तीस हजार रन बनाने के लिए भगवान के रूप में देखते हैं, जबकि 10 से 12 लाख कैंसर रोगियों को मुफ्त भोजन कराने वाले “सावला जी” को कोई जानता तक नहीं…!
यहाँ मीडिया की भी भूमिका पर सवाल खड़े होते हैं, जो सावला जैसे लोगों को नजर अंदाज करते हैं…!
यहाँ यह भी बताना आवश्यक है कि “गूगल” के पास भी सावला की एक तस्वीर तक नहीं है…!

अब समय आ गया है जब हमें यह समझना होगा कि पंढरपुर, शिरडी साई मंदिर, तिरुपति बालाजी आदि स्थानों पर लाखों ₹ दान करने से भगवान नहीं मिलेगा।

अरे भगवान तो हमारे आसपास ही रहता है। लेकिन हम बापू, महाराज या बाबा के रूप में विभिन्न स्टाइलिश देवपुरुषों के पीछे, पागलों की तरह चल रहे हैं, मग़र फिर भी जीवन में कठिनाईयाँ कम नहीं हो रही हैं और ये मृत्यु तक यूँ ही बनी रहेंगी। परंतु बीते टी दशकों से कैंसर रोगियों और उनके रिश्तेदारों को हरकचंद सावला के रूप में, ये भगवान नहीं तो और क्या है?
इस संदेश को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ ताकि हरकचंद सावला को उनके हिस्से की प्रसिद्धि मिल सके और ऐसे कार्य करने वालों को देखकर समाज के अन्य सेवाभावी उत्साही वर्ग की प्रेरणा व प्रोत्साहन मिल सके।
सवाल तो मेरे मन में एक यह भी है कि-

*”भारत-रत्न”* के हक़दार हरकचंद सावला जैसे लोग हैं या सचिन तेन्दुलकर, राजीव गाँधी जैसे लोग?

🙏✍🇮🇳✍🙏

~(योगिअंश रमेश चन्द्र भार्गव)

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राम तत्व की महिमा


राम तत्व की महिमा
ऐसी बात नहीं है कि अवधपुरी में राजा दशरथ के घर श्रीराम अवतरित हुए तब से ही लोग श्रीराम का भजन करते हैं। नहीं, नहीं, राजा दिलीप, राजा रघु एवं राजा दशरथ के पिता राजा अज भी श्रीराम का ही भजन करते थे क्योंकि श्रीराम केवल दशरथ के पुत्र ही नहीं हैं, बल्कि रोम-रोम में जो चेतना व्याप्त रही है, रोम-रोम में जो रम रहा है उसका ही नाम है ‘राम’। राम जी के अवतरण से हजारों-लाखों वर्ष पहले राम नाम की महिमा वेदों में पायी जाती है।

रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः।

‘जिसमें योगी लोगों का मन रमण करता है उसी को कहते हैं ‘राम’।’
एक राम घट-घट में बोले,

दूजो राम दशरथ घर डोले।

तीसर राम का सकल पसारा,

ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।
शिष्य ने कहाः “गुरुजी ! आपके कथनानुसार तो चार राम हुए। ऐसा कैसे ?”

गुरूः “थोड़ी साधना कर, जप-ध्यानादि कर, फिर समझ में आ जायेगा।” साधना करके शिष्य की बुद्धि सूक्ष्म हुई, तब गुरु ने कहाः
जीव राम घट-घट में बोले।

ईश राम दशरथ घर डोले।

बिंदु राम का सकल पसारा।

ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।
शिष्य बोलाः “गुरुदेव ! जीव, ईश, बिंदु व ब्रह्म इस प्रकार भी तो राम चार ही हुए न ?”

गुरु ने देखा कि साधना आदि करके इसकी मति थोड़ी सूक्ष्म तो हुई है। किंतु अभी तक चार राम दिख रहे हैं। गुरु ने करूणा करके समझाया कि “वत्स ! देख, घड़े में आया हुआ आकाश, मठ में आया हुआ आकाश, मेघ में आया हुआ आकाश और उससे अलग व्यापक आकाश, ये चार दिखते हैं। अगर तीनों उपाधियों – घट, मठ, और मेघ को हटा दो तो चारों में आकाश तो एक-का-एक ही है। इसी प्रकारः
वही राम घट-घट में बोले।

वही राम दशरथ घर डोले।

उसी राम का सकल पसारा।

वही राम है सबसे न्यारा।।
रोम-रोम में रमने वाला चैतन्यतत्त्व वही का वही है और उसी का नाम है चैतन्य राम”

वे ही श्रीराम जिस दिन दशरथ-कौशल्या के घर साकार रूप में अवतरित हुए, उस दिन को भारतवासी श्रीरामनवमी के पावन पर्व के रूप में मनाते हैं।

कैसे हैं वे श्रीराम ? भगवान श्रीराम नित्य कैवल्य ज्ञान में विचरण करते थे। वे आदर्श पुत्र, आदर्श शिष्य, आदर्श मित्र एवं आदर्श शत्रु थे। आदर्श शत्रु ! हाँ, आदर्श शत्रु थे, तभी तो शत्रु भी उनकी प्रशंसा किये बिना न रह सके। कथा आती है कि लक्ष्मण जी के द्वारा मारे गये मेघनाद की दाहिनी भुजा सती सुलोचना के समीप जा गिरी। सुलोचना ने कहाः ‘अगर यह मेरे पति की भुजा है तो हस्ताक्षर करके इस बात को प्रमाणित कर दे।’ कटी भुजा ने हस्ताक्षर करके सच्चाई स्पष्ट कर दी। सुलोचना ने निश्चय किया कि ‘मुझे अब सती हो जाना चाहिए।’ किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती ! जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दियाः “देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो। जिस समाज में बालब्रह्मचारी श्रीहनुमान, परम जितेन्द्रिय श्री लक्ष्मण तथा एकपत्नीव्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।”

जब रावण सुलोचना से ये बातें कह रहा था, उस समय कुछ मंत्री भी उसके पास बैठे थे। उन लोगों ने कहाः “जिनकी पत्नी को आपने बंदिनी बनाकर अशोक वाटिका में रख छोड़ा है, उनके पास आपकी बहू का जाना कहाँ तक उचित है ? यदि यह गयी तो क्या सुरक्षित वापस लौट सकेगी ?”

यह सुनकर रावण बोलाः “मंत्रियो ! लगता है तुम्हारी बुद्धि विनष्ट हो गयी है। अरे ! यह तो रावण का काम है जो दूसरे की स्त्री को अपने घर में बंदिनी बनाकर रख सकता है, राम का नहीं।”
धन्य है श्रीराम का दिव्य चरित्र, जिसका विश्वास शत्रु भी करता है और प्रशंसा करते थकता नहीं ! प्रभु श्रीराम का पावन चरित्र दिव्य होते हुए भी इतना सहज सरल है कि मनुष्य चाहे तो अपने जीवन में भी उसका अनुसरण कर सकता है!
जय श्री राम
रामचंद्र आर्य

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जब कश्मीर के राजपूत महाराजा हरिसिंह को मिला नेहरू और शेख अब्दुल्ला के हांथों धोखा—–

दुष्ट कांग्रेस पार्टी,राजपूतों की सबसे बड़ी दुश्मन—
क्श्मीर के आखिरी राजपूत राजा महाराजा हरि सिंह, जिन्होंने भारत में आजादी की परिकल्पना से कई साल पहले सन् 1925 में कश्मीर राज्य को स्वाधीन कराने का लक्ष्य देकर राष्ट्र्रीयता की भावना का जो परिचय पूरे भारत के सामने दिया था, को जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला जैसे सत्तालोभी नेताओं द्वारा बुरी तरह नष्ट कर दिया गया। महाराजा हरि सिंह की भारत के तत्कालीन राष्ट्र्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद को लिखे गए पत्र में इस घटना का खुलासा हुआ है कि कैसे नेहरू और शेख अब्दुल्ला ने साजिश के तहत मनमाने तरीके से कश्मीर के भारत में विलय को अंजाम दिया, जिससे इतनी बड़ी कश्मीर समस्या का जन्म हुआ।
17 अगस्त 1952 को लिखे गए अपने 9000 शब्दों के इस पत्र में महाराजा हरि सिंह ने देश के प्रथम राष्ट्रपति  डॉ राजेंद्र प्रसाद को आगाह किया है कि कैसे जवाहर लाल नेहरू, शेख अब्दुल्ला और लुई माउंटबेटन जिसे लोगों ने मिलकर भारतीय प्रांतों की आजादी के समय होने वाले विलय के नियमों के साथ खिलवाड़ कर अपनी मनमानी दिखाई जिसका प्रभाव आजतक कश्मीर में देखा जा सकता है। कश्यप मुनि की धरती कश्मीर का भारत में विलय राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों ही रूप से महत्वपूर्ण था। किंतु भारत के हुक्मरानों ने ऐसी चाल चली जिसे ना तो सरकारी अनुदान प्राप्त इतिहासकारों ने दिखाया और ना ही आगे आने वाली सरकारों ने ऐसे किसी पत्र को सामने आने दिया। इतिहास के साथ साथ लोगों की मानसिकता के साथ खिलवाड़ करने वाले ऐसे लोगों का सच सामने लाने के लिए सरकार को हर एक दस्तावेज को सार्वजनिक करना होगा जो भारत के इतिहास से जुड़ा हुआ है। इसके बाद ही जनता नायकों, खलनायकों, धूर्तों और चाटुकारों में फर्क कर पाएगी।
महाराजा हरि सिंह ने अपने पत्र में लिखा है कि कैसे सन् 1925 में उनके जैसे देशभक्त के कश्मीर की सत्ता संभालते ही अंग्रेज तिलमिला गए क्योंकि कश्मीर उनके लिए बहुत महत्व रखता था। अंग्रजों ने वहां के मुसलमानों को भड़काकर धार्मिक विद्रोह की शुरूआत की तथा हिंदु राज का अंत और इस्लाम खतरे में जैसे नारों को जन्म दिया। कश्मीर प्रांत में चौधरी गुलाम अब्बास तथा मौलाना यूसुफ शाह जैसे नेताओं ने हिंदु विरोधी नारों के साथ नेशनल कानफ्रेंस नामक पार्टी की स्थापना की जिसे कांग्रेस पार्टी का पूरा समर्थन भी मिला। नेहरू की हिंदु विरोधी विचारधारा को देखते हुए मांउटबेटन ने हरि सिंह के पाकिस्तान में शामिल होने की संभावना के तरफ इसारा भी किया था। सन् 1947 में सरदार बल्लभ भाई पटेल ने राजा हरि सिंह को पत्र लिखकर मेहर चंद महाजन को प्रधानमंत्री बनाने की सूरत में पूरा सहयोग देने का अश्वासन दिया था। हरि सिंह द्वारा महाजन को प्रधानमंत्री बनाए जाने के बाद पटेल ने शेख अब्दुल्ला की कश्मीर को लेकर बुरी नीयत के बारे में महाजन को अगाह भी किया था।
जवाहरलाल नेहरू ने भी महाजन को कुछ ऐसे ही लिखे पत्र में शेख अब्दुल्ला को जम्मू कश्मीर की अंतरिम सरकार का मुखिया बनाकर हरि सिंह को हटाने की बीच में से हटाने की मांग की थी। नेहरू का कहना था कि शेख अब्दुल्ला ही कश्मीर का सबसे प्रसिद्ध नेता है इसलिए उसे ही राज्य का मुख्यमंत्री बनना चाहिए। उन्होंने यहां तक कि कश्मीर विलय पर चल रहे कार्यक्रम को तब तक के लिए स्थगित कर दिया था जब तक शेख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री नहीं बन जाता। महाराजा हरि सिंह को कश्मीर को लेकर मिले हुए विशेषाधिकारों के बावजूद नेहरू ने राजा पर अब्दुल्ला को बड़ा पद देने के लिए दबाव बनाना भी शुरू कर दिया था। नेहरू के कहने पर भारत की अंतरिम सरकार में मंत्री एन गोपालस्वामी अयंगार ने अब्दुल्ला के हस्ताक्षर किए हुए पत्र को स्वीकृति के लिए महाराजा के पास भेजा जिसमें अब्दुल्ला को विशेष स्थान देने की बात कही गई थी।
शेख अब्दुल्ला ने ताकत मिलते ही राजा हरि सिंह को परेशान करना शुरू कर दिया। हरि सिंह ने राष्ट्रपति से शिकायत की थी कि शेख जानबूझ कर उनको नजरअंदाज कर रहा है और नेहरू के समर्थन से अअपनी मनमानी करने में कामयाब हो रहा है। यहां तक कि राजा हरि सिंह के कश्मीर में घूमने और वहां की जनता से मिलने पर भी अब्दुल्ला ने रोक लगा दिया था। नेहरू के दबाव में हरि सिंह को कुछ महीनो के लिए मजबूरन कश्मीर छोड़ना पड़ा और इसी दौरान शेख अब्दुल्ला ने सरकारी समेत राजा की निजी संपत्तियों पर भी कब्जा करना शुरू कर दिया था। अब्दुल्ला ने हिंदुओं के खिलाफ जाते हुए राजा के धर्मार्थ ट्रस्ट को परेशान करने की नीयत से पैसे निकालने पर रोक लगा दी। अब्दुल्ला ने हिंदु मंदिरो और देव स्थानों पर पूजा करने पर भी रोक लगा दी जो नेहरू के स्वतंत्र भारत में धर्मनिरपेक्षता का पहला उदाहरण है।
हरि सिंह ने डा राजेंद्र प्रसाद को लिखे पत्र में नेहरू द्वारा भारत के संविधान के विपरीत जाते हुए अनुच्छेद 370 का दुरूपयोग कर उसे शेख अब्दुल्ला के पक्ष में परिवर्तित करने का आरोप लगाया था। राजा ने पूछा था कि “क्या भारत सरकार उस व्यक्ति को अनदेखा कर सकती है जिसने सरकार को कश्मीर में प्रवेश करने की आज्ञा दी ? वह इंसान, जिसने कश्मीर के भारत में विलय की नींव रखी, आज उसे ही कश्मीर से निकाला जा रहा है |” महाराजा हरि सिंह के नेहरू, माउंटबेटन और भारत सरकार के भरोसे और नेक सोच पर चलने के बावजूद एक ऐसे तरीके से उनका अंत करना ना ही सम्मानजक है और ना ही सही |