Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

हैफा (इजराइल) हीरो – N S Shekhawat


हैफा (इजराइल) हीरो

मेजर ठाकुर दलपत सिंह शेखावत

1918 के प्रथम विश्व युद्ध में जोधपुर लांसर्स के घुड़सवार शूरवीरों ने जर्मन सेना की मशीनगनों का मुकाबला करते हुए इजरायल के हैफा शहर पर महज एक घंटे में कब्जा कर लिया था…. नेतृत्व कर रहे थे जोधपुर लांसर के मेजर ठाकुर दलपतसिंह शेखावत और कैप्टन अमान सिंह
जोधा। 23 सितंबर 1918 को हुए इस युद्ध में मेजर दलपतसिंह समेत सात हिन्दुस्तानी शहीद हुए।

दिल्ली स्थित तीन मूर्ति स्मारक इसी युद्ध के दौरान शहीद मेजर ठाकुर दलपत सिंह शेखावत शहीदों को समर्पित है।

खास बात यह है कि एक मूर्ति मेजर दलपत सिंह शेखावत की है, इजरायल 2018 में इस विजय
दिवस की शताब्दी मनाएगा। गौर करने लायक तथ्य है कि इस विजय गाथा को इजराइली
बच्चे अपने स्कूली पाठ्यक्रम में पढ़ते हैं।

इनकी याद में आज भी इजराइल और भारतीय सेना हर साल 23 सितम्बर को हैफा दिवस मनाती है।

प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) आटोमन यानी उस्मानी तुर्क सेनाओं ने इजराइल के हैफा शहर पर कब्जा कर लिया , तुर्किश सेना वहां के यहूदियों पर अत्याचार कर रही थी। भारतीय सेना को इसे मुक्त कराने की जिम्मेदारी मिली। जोधपुर लांसर के मेजर दलपत सिंह शेखावत अपनी टुकड़ी के साथ निकल पड़े। युद्ध में जर्मन सेना लगातार उन पर तोप व मशीनगनों से गोले दागती रही। इस दौरान मेजर दलपत सिंह शेखावत शहीद हो गए। जोधपुर लांसर के कैप्टन अमान सिंह जोधा ने कमान संभालते हुए जर्मन सेना का मुकाबला किया, एक घंटे के भीतर हैफा शहर उनके कब्जे में था, जर्मन मशीनगनों पर हौसला पड़ा भारी, उस वक्त जोधपुर रियासत के घुड़सवारों के पास हथियार के नाम पर मात्र बंदूकें थी। वहीं, जर्मन सेना तोपों तथा मशीनगनों से लैस थी। लेकिन राजपुताना के रणबांकुरों के हौसले के आगे दुश्मन पस्त हो गया।

23 सितम्बर 1918 को इजराइल से तुर्की सेना को खदेड़कर मेजर ठाकुर दलपत सिंह शेखावत के बहादुर जवानों ने इजराइल के हैफा शहर को मुक्त कराया।

हैफा के युद्ध में ब्रिटिश सेना ने उन्हें कमान
सौंपी दलपत सिंह शेखावत को मिलिट्री क्रॉस, अमान सिंह को इंडियन आर्डर ऑफ मेरिट मेजर
दलपत सिंह को मिलिट्री क्रॉस जबकि कैप्टन अमान सिंह जोधा को सरदार बहादुर की
उपाधि देते हुए आईओएम (इंडियन आर्डर ऑफ मेरिट) तथा ओ.बी.ई (ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश
इंपायर) से सम्मानित किया गया था। 700 सैनिक बंदी बनाए, असलहा कब्जे में किया
23 सितंबर, 1918 को दिन में 2 बजे जोधपुर लांसर व मैसूर लांसर के घुड़सवारों ने हैफा
शहर पर चढ़ाई की और एक घंटे में ही हैफा शहर के दुर्ग पर विजय पताका फहरा दी।
भारतीय शूरवीरों ने जर्मन- तुर्की सेना के 700 सैनिकों को युद्धबंदी बना लिया। इनमें
23 तुर्की तथा 2 जर्मन अफसर भी थे। वहीं, 17 तोपें, 11 मशीनगन व हजारों की संख्या
में जिंदा कारतूस भी जब्त किए गए।

जय राजपुताना…..

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संस्कार


“संस्कार ”

Shiv Sharma
एक पार्क मे दो बुजुर्ग बैठे बातें कर रहे थे
पहला-मेरी एक पोती है शादी के लायक है BA किया है ,job करती है ,कद -5″2 इंच है
सुंदर है ,कोई लडका नजर मे हो तो बताइएगा..
दूसरा -आपकी पोती को किस तरह का परिवार
चाहिए
पहला-कुछ खास नही, लडका ME /M.TECH
किया हो ,अपना घर हो ,कार हो ,घर मे
एसी हो ,अपने बाग बगीचा हो
अच्छा job ,अच्छी सैलरी, कोई लाख रू.
तक हो
दूसरा-और कुछ
पहला-हाँ सबसे जरूरी बात अकेला होना चाहिए
मां बाप ,भाई बहन ,नही होने चाहिए
वो कया है लडाई झगड़े होते है
दूसरे की आँखें भर आई फिर आँसू पोछते हुए बोला -मेरे एक दोस्त का पोता है उसके भाई बहन नही है ,मां बाप एक accident मे चल बसे ,अच्छी job है डेढ़ लाख सैलरी है ,गाड़ी है बंगला है ,मगर उसकी भी यही शर्त है लडकी वालों के भी मां बाप ,भाई बहन या कोई रिश्ते दार ना हो ,कहते कहते गला भर आया
फिर बोले-अगर आपका परिवार आत्महत्या कर ले तो बात बन सकती है आपकी पोती की शादी उससे हो जाएगी और वो बहुत सुखी रहेगी
पहला-ये कया बकवास है ,हमारा परिवार कयो आत्महत्या करे कल को उसकी खुशियों मे दुख मे कौन उसके साथ उसके पास होगा
दूसरा -वाह मेरे दोस्त, खुद का परिवार, परिवार और दूसरे का कुछ नही, मेरे दोस्त अपने बच्चो को परिवार का महत्व समझाओ ,घरके बडे ,घरके छोटे सभी अपनो के लिए जरूरी होते है वरना इंसान खुशियों का और गम का महत्व ही भूल जाएगा, जिंदगी नीरस बन जाएगी
पहला वाले बुजुर्ग बेहद शर्मिंदा थे ,दोस्तों परिवार है तो जीवन मे हर खुशी, खुशी लगती है अगर परिवार नही तो किससे अपनी खुशियाँ और गम बांटोगे ….

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जीव(न) + आत्मा = जीवात्मा !!!


जीव(न) + आत्मा = जीवात्मा !!!

Neeraj Varma

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहङ्‍कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश एवं मन, बुद्धि और अहंकार; इस प्रकार यह उपर्युक्त प्रकृति अर्थात मुझ ईश्वर की मायाशक्ति आठ प्रकार से भिन्न है – विभाग को प्राप्त हुई है ।

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्‌ ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्‌ ॥

यह (उपर्युक्त) मेरी अपरा प्रकृति अर्थात परा नहीं, किन्तु निकृष्ट है, अशुद्ध है और अनर्थ करने वाली है एवं संसार बन्धनरूपा है । और हे महाबाहो! इस उपर्युक्त प्रकृति में दूसरी जीवरूपा अर्थात प्राणधारण की निमित्त बनी हुई जो क्षेत्रज्ञरूपा प्रकृति है, अंतर में प्रवृष्ट हुई जिस प्रकृति के द्वारा यह समस्त जगत धारण किया जाता है उसको तू मेरी परा प्रकृति जान अर्थात उसे मेरी आत्मरूपा उत्तम और शुद्ध प्रकृति जान ।

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥

यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ रूप दोनों ‘परा’ और ‘अपरा’ प्रकृति ही जिनकी योनि – कारण हैं ऐसे ये समस्त भूत प्राणी प्रकृति रूप कारण से ही उत्पन्न हुए हैं, ऐसा जान क्योंकि मेरी दोनों प्रकृतियाँ ही समस्त भूतों की योनि यानी कारण हैं, इसलिए समस्त जगत का प्रभव – उत्पत्ति और प्रलय – विनाश मैं ही हूँ । अर्थात इन दोनों प्रकृतियों द्वारा मैं सर्वज्ञ ईश्वर ही समस्त जगत का कारण हूँ ।
(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय – ७, श्लोक – ४ से ६)

केवल एक तत्त्व से किसी नए तत्त्व/पदार्थ/वस्तु की उत्पत्ति संभव नहीं है।अतः कम से कम दो या दो से अधिक तत्त्वों (कारणों) के निश्चित अनुपात में मेल या मिश्रण से ही एक नई वस्तु/पदार्थ (कार्य) की उत्पत्ति होती है। तीसरे श्लोक में भगवान् स्पष्ट कह रहे हैं कि समस्त भूत प्राणी की उत्पत्ति का कारण मेरी ही ‘परा’ और ‘अपरा’ प्रकृति है। दूसरे शब्दों में, सभी भूत प्राणी इन्हीं दो प्रकृति रुप कारण से उत्पन्न हुए हैं।

मूलभूत तत्त्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश (५) क्रमशः अपने गुणों गंध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द (५) के साथ स्थित हैं। इन गुणों को क्रमशः व्यक्त करनेवाली नाक, जीभ, आँख, त्वचा और कान (५) नाम की पाँच ज्ञानेन्द्रियों की हमारे शरीर में उत्पत्ति होती है। चेष्टा के लिए इन्हीं पाँच मूल तत्त्वों से बने हाँथ, पैर, वाणी, उपस्थ और गुदा (५) नाम की पाँच कर्मेन्द्रियाँ की भी हमारे शरीर में उत्पत्ति होती है। उपरोक्त ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ बाह्य करण हैं जबकि मन, बुद्धि और अहंकार (३) अंतःकरण हैं। इस प्रकार, इन २३ का संघात यानी समूह ही हमारा शरीर है। पहले श्लोक में भगवान् ने इसे ही क्षेत्र रुपा अपरा प्रकृति बताया है।

करण का अर्थ है, जिससे कार्य किया जाए।जैसे कान से सुनना, मन से मनन करना, आदि। करण अर्थात् यंत्र मात्र। इस युक्ति से मन, बुद्धि और अहंकार भी ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों की तरह यंत्र मात्र ही हुए किंतु सूक्ष्म स्तर पर।

जीवन धारण के लिए जल, वायु और अन्न (पृथ्वी तत्त्व)अनिवार्य हैं। इन तीनों से, शरीर संरचना में महत्त्वपूर्ण तीनों के अंश से बना जड़ – जैसे मिट्टी, जिसकी अपनी कोई शक्ति नहीं, केवल जाग्रत अवस्था में उपयोगी, २३ का समूह – शरीर ही पोषित होता है, आत्मा नहीं!

दूसरे श्लोक में भगवान् अपनी परा प्रकृति के साथ प्राण का संबंध बता रहे हैं। प्राण की उत्पत्ति भगवान् की परा प्रकृति से होती है। पाँच भागों (मुख्य प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान) में विभक्त प्राण ही जड़ शरीर का वाहन है! हमारे शरीर के अंदर और बाहर की ओर गति, श्वास-प्रश्वास, रक्त संचार तथा जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति में भी जो गति है वह प्राण द्वारा ही संचालित है। पाँच वृत्तियों वाला होने से और मन, बुद्धि तथा इन्द्रियों की तरह पुरुष के लिए उपयोगी होने के करण प्राण भी जड़ है। अतः प्राण भी पुरुष का उपकरण है।

२३ का समूह शरीर और ५ प्राण – हम सब के “जीवन” के जड़ समुदाय हैं। नित्य, अनादि-अनंत, सर्वव्याप्त, स्थिर (जो चालायमान नहीं है) तथा चेतन सत्ता – आत्मा (‘मैं’ जिसकी आवाज है) के नगण्य अंश के आश्रय में ही समस्त २८ सक्रिय होते हैं और शक्ति युक्त प्रतीत होते हैं। जड़ समुदाय और आत्मा रुप “कारण” से ही “जीवात्मा” (जीवन + आत्मा) “कार्य” के रुप में संसार में सक्रिय होता है!

जीवन तीव्र गति से मृत्यु की ओर अग्रसर है। आत्मा, जीवन (२८) नहीं, चेतन है। अतः आत्मा की मृत्यु असंभव है। जीवन (२८) का मृत्यु में परिणत होना नहीं, बल्कि जीवन (२८) का सहज ही छूट जाना फलस्वरूप केवल सर्वव्याप्त आत्मसत्ता का बचना। इसी सर्वव्याप्त आत्मसत्ता की उपलब्धि का नाम ‘मोक्ष’ है !!!

जय श्री कृष्ण !!

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लड़कियों के स्कूल में आने वाली नई टीचर ख़ूबसूरत और शैक्षणिक तौर पर भी मज़बूत थी


लड़कियों के स्कूल में आने वाली नई टीचर ख़ूबसूरत और शैक्षणिक तौर पर भी मज़बूत थी, लेकिन उसने अभी तक शादी नहीं की थी…।
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एक दिन सब लड़कियाँ उसके इर्द-गिर्द जमा हो गईं और मज़ाक़ करने लगीं कि मैडम आपने अभी तक शादी क्यों नहीं की…?
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मैडम ने दास्तान कुछ यूँ शुरू की:-
एक महिला की पाँच बेटियाँ थीं, पति ने उसको धमकी दी कि अगर इस बार भी बेटी हुई तो उस बेटी को बाहर किसी सड़क या चौक पर फैंक आऊँगा,
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ईश्वर की मर्जी वो ही जाने कि छटी बार भी बेटी पैदा हुई और पति ने बेटी को उठाया और रात के अंधेरे में शहर के बीचों-बीच चौक पर रख आया, माँ पूरी रात उस नन्ही सी जान के लिए दुआ करती रही और बेटी को ईश्वर के सुपुर्द कर दिया।
🍁💕
दूसरे दिन सुबह पिता जब चौक से गुज़रा तो देखा कि बच्ची को कोई ले नहीं गया!!!
बाप, बेटी को वापस घर लाया लेकिन दूसरी रात फिर बेटी को चौक पर रख आया! रोज यही होता रहा हर बार पिता बाहर रख आता और जब कोई लेकर ना जाता तो मजबूरन वापस उठा लाता!
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यहाँतक कि उसका पिता थक गया और ईश्वर की मर्जी पर राज़ी हो गया। फिर ईश्वर ने कुछ ऐसा किया कि एक साल बाद माँ फिर पेट से हो गई और इस बार उनको बेटा हुआ, लेकिन कुछ ही दिन बाद बेटियों में से एक की मौत भी हो गई! यहाँ तक कि माँ पाँच बार पेट से हुई और पाँच बेटे हुए, लेकिन हर बार उसकी बेटियों में से एक इस दुनिया से चली जाती!
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सिर्फ एक ही बेटी ज़िंदा बची और वो वही बेटी थी जिससे बाप जान छुड़ाना चाह रहा था, माँ भी इस दुनिया से चली गई!
इधर पाँच बेटे और एक बेटी सब बड़े हो गए… टीचर ने कहा- “पता है वो बेटी जो ज़िंदा रही, कौन है? “वो मैं हूँ” और मैंने अभी तक शादी इसलिए नहीं की कारण, बाप इतने बूढ़े हो गए हैं कि अपने हाथ से खाना भी नहीं खा सकते और कोई दूसरा नहीं जो उनकी सेवा करें। बस मैं ही उनकी खिदमत किया करती हूँ और वो पाँच बेटे कभी-कभी आकर पिता का हालचाल पूछ जाते हैं।
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पिता हमेशा शर्मिंदगी के साथ रो रो कर मुझ से कहा करते हैं, मेरी प्यारी बेटी जो कुछ मैंने बचपन में तेरे साथ किया उस पर मुझे माफ करना,

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दुरजन जण बबूल-वन, जे सींचै अभियेण। तोइस कांटा बींधणा, जाती तणै गुणेण।।


दुरजन जण बबूल-वन, जे सींचै अभियेण।
तोइस कांटा बींधणा, जाती तणै गुणेण।।

अर्थ- दुर्जन तो बबलू के वन समान होते हैं यदि उसे अमृत से भी सींचा जाए, तो भी उसके तो बींधने वाले कांटे ही होंगे क्योंकि यह उनका जातीय गुण है।
एक शिकारी ने सोचा कि क्यों न तजकीब भिड़ा कर एक जीवित सिंह पकड़ा जाए और एक पिंजरे में बंद करके रखा जाए, जिससे कि उसे देखने के लिए आस पास के और दूर दूर के लोगों की भीड़ अपने घर में बनी रहे। शिकारी ने युक्ति विचारी और उसके अनुसार खूब मोटी मोटी लोहे की छडें चारों ओर लगाकर एक बड़ा सा पिंजरा बनवाया। पिंजरे का दरवाजा इतनी कारीगरी से बनाया गया था कि उसमें घुसते ही प्राणी अपने आप बंद हो जाए। पिंजरा कोई बाहर से ही खोले तो खुले। पिंजरे में एक जीवित बैल बांधकर तथा उसका दरवाजा खुला छोड़कर उस पिंजरे को ऐसे स्थान पर रख दिया, जहां से होकर अक्सर शेर शेरनियां पानी पीने के लिए झरने पर जाया करते थे। शिकारी तो पिंजरा रखकर अपने घर चला गया और वह बैल मस्ती से हरी भरी घास चरने लगा, जो कि पर्याप्त मात्रा में उसके सामने डाली हुई थी। उसे पता नहीं था कि मौत उसे किसी भी क्षण आ दबोचने वाली है। थोडी ही रात बीती होगी कि झरने पर पानी पीने के लिए जाती हुई एक शेरनी उधर से निकली। शेरनी की नजर बैल पर पडी तो उसके मुंह में पानी भर आया। वह दौड़ कर पिंजरे में घुसी और उसने बैल पर झपटटा मारा। बैल को तो वह आनन फानन में चट गई, लेकिन पिंजरे का दरवाजा बंद हो चुका था। अब शेरनी के निकलने का कोई मार्ग नहीं रहा था। वह तो पिंजरे में इधर से उधर और उधर से इधर दहाड़ मारती और सिर पटकती फिरने लगी। सारी रात बीत गई, शेरनी सिर पटकते पटकते लहुलुहान हो गई लेकिन दरवाजा तो नहीं खुला। वह थक कर और निराश होकर बैठ गई कि इतने में सवेरा हुआ। सवेरे एक ब्राह्मण उस रास्ते से गुजर रहा था। शेरनी ने गिड़गिड़ाकर उस ब्राह्मण से कहा कि हे ब्राह्मण देवता, अगर तू य पिंजरा खोलकर मुझे बाहर निकाल दे तो तेरा अहसान जन्म जन्मान्तर नहीं भूलूं। ब्राह्मण ने कहा कि तू हिंसक जीव है, जीवित प्राणी देखते ही तेरी तो जीभ लपलपाती है। मैं दरवाजा खोलूं और तू मुझे ही गटक जाए तो क्या भरोसा। शेरनी ने कहा कि भोले ब्राह्मण, तुम भी कैसी नादानी की बातें करती हो? तुम जो मेरा इतना उपकार करोगे मेरे प्राणों की रक्षा करोगे,उसी को मैं खा जाऊं। भला यह भी कोई सोचने की बात है? ब्राह्मण को दया आ गई और वह दरवाजा खोलने वाला ही था कि उसे नीति के वचन याद आ गए और वह ठिठक कर रूक गया।
ब्राह्मण को रूकते देखकर शेरनी ने कहा कि ब्राह्मण देवता, तू जरा भी मत डर। नि: शंक होकर पिंजरा खोल दे। एक क्षण के लिए भी मत सोच कि मैं तेरा अपकार या अहित करूंगी। तुझे वचन देती हूं, मेरे से बनेगा सो तेरा प्रत्युपकार ही करूं गी। अपने दिये हुए वचन का मैं पालन करूंगी। ब्राह्मण पढा लिखा तो था, लेकिन था भोला। अत चिकनी चुपड़ी बातों द्वारा शेरनी ने उसे विश्वास दिला दिया कि उसने पिंजरा खोल दिया। पिंजरा खुलने की देर थी शेरनी तो अपना दिया हुआ वचन भूल गई और ब्राह्मण से बोली कि मैं तुझे खाऊंगी। अब गिड़गिड़ाने की बारी ब्राह्मण की थी। वह बहुत रोया गिड़गिड़ाया शेरनी को अपने द्वारा किये गए उपकार की बात याद दिराई, शेरनी द्वारा किये हुए वायदे की याद दिराई, लेकिन चिकने घड़े पर पानी का असर हो तो शेरनी के मन पर ब्राह्मण के वचनों का असर हो। आखिर ब्राह्मण ने यह कहा कि तू तेरे जचे जिस जीव से पंचायती करा ले, कोई भी कहे कि तुम्हें मुझको खाना चाहिए तो तुम ऐसा कर सकती हो। शेरनी ने सोचा कि इसमें अपना कोई कर्ज नहीं है, क्योंकि कोई भी जीव मेरे खिलाफ फैसला देने का साहस नहीं कर सकेगा। शेरनी ने ब्राह्मण की यह बात मान ली और दोनों ने मिलकर एक लोमड़ी को पंच बनाया। भाग्य की बात कि इतने में ही उधर से गुजरती हुई एक लोमड़ी दीख पडी। ब्राह्मण ने उसे पुकारा। लोमडी डरते डरते वहां आई तो शेरनी और ब्राह्मण ने सारी बात बताई। लोमडी चतुर तो थी ही, साथ ही चालाक भी। उसने भोली बनते हुए कहा कि देखो, यों तो मैं समझूंगी नहीं, क्योंकि यह बात मेरी बुद्धि में ही नहीं आती कि शेरनी जैसा जीव भी कभी पिंजरें में बंद हो सकता है। अतः पहले यथास्थिति करो। शेरनी कहां थी, ब्राह्मण कहां था, फिर मैं पूछूं उस उस तरह बताते जाओ। मैं कभी तुरंत तुहारे झगड़े का फैसला किये देती हूं। शेरनी पिंजरे में घुसी और बोली कि में यहां थी कि इतने में पिंजरे का दरवाजा फिर बंद हो गया। तब लोमडी ने कहा कि यहां थी तो यहीं रह। और ब्राह्मण से बोली कि तू अपने घर चला जा। न्याय हो चुका। इस शेरनी को पिंजरे में भूखी-प्यासी मरने दे। भविष्य में अनहोनी बात पर कभी विश्वास मत करना। शेर शेरनी जैसा हिंसक जीव कोई विश्वास करने लायक होता है क्या? शेरनी बहुत चिल्लाई, लोमडी को बहुत भला बुरा कहा, लेकिन अब क्या होना था।

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पंच केदार


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उत्तराखंड कुमाउगढ्वाल और नेपाल का डोटी भाग में असीम प्राकृतिक सौंदर्य को अपने गर्भ में छिपाए, हिमालय की पर्वत शृंखलाओं के मध्य, सनातन हिन्दू संस्कृति का शाश्वत संदेश देनेवाले, अडिग विश्वास के प्रतीक केदारनाथ और अन्य चार पीठों सहित, नव केदार के नाम से जाने जाते हैं। श्रद्धालु तीर्थयात्री, सदियों से इन पावन स्थलों के दर्शन कर, कृतकृत्य और सफल मनोरथ होते रहे हैं।

धर्मात्मा पाण्डब ब्रह्महत्या, गुरुहत्या और गोत्र हत्याके पापसे मुक्त होने और बिश्वमे शान्ती , राज्यमे समृद्धि, और यज्ञ हेतु भागवान भुतनाथ इश्वर से असिर्बाद लेने हेतु और क्षमा पुजा कर्ने हेतु भागवान भोलेनाथ कि सरण मे उत्तराखण्ड आए। क्यु कि उपमन्यु को दिए बचन के मुताबिक भागवान भोले नाथ कालीयुग आने से १००  बर्स तक कैलास से उतरकर उत्तराखण्ड मे रहने लगे। प्रभु ने उपमन्यु को बचन दे रखाथा कि कृश्ण के लौट जाने से कुछ बर्सपुर्ब तक वो यही रहङे। |पान्डबौको अप्ने गुरु, भायि, पितामह ,पुत्रौ कि याद ज सताने लागि, रात दिन रोने लगे, सारा सन्शार उन्हे सुन्य लग्ने लगा। भागवान शृकृश्ण समिप होते तो उन्हे शान्ती मिल्ती जब वो सम्मुख नही होते उन्हे युद्धा और बिगत उन्हे भयन्कर दुख देने लगा। वो अकर्मण्य बन गए। ब्रह्महत्या और कुल हत्या उन्हे सताने लागि। इस्के बाद उन्हौ ने प्रभु शृकृष्ण को हस्तीनपुर बुलया और अप्नी मुक्ती का मार्ग पुछा। शृहरी ने कहा, हे पाण्डु पुत्रो तुमने क्ष्तृय धर्मका पालन किया सो तुम ने कोइ पाप नही किया, तुम तो मुक्त हो फिर भि तुम्हारे मन मे जो बिशाल्तम दया है इसिलिए वो तुम्हे प्रायस्चित्त के मार्ग लेजा रही है। और भागवानभोलेनाथ शंकर यह नही चाह्ते है कि तुम लोग सारीर त्यागे बिना स्वोर्ग जाए। उन्हौ ने केबल पापियौ को नस्ट कर्ने हेतु तुम्हे पशुपतास्त्र दिया था जो तुमने आभी नही लौटाया। इसके बाद पाण्डब और नारायण कृश्ण बेदव्यासके शरण मे गए और मधुशुदन ने प्रभु बेद व्यासको अप्ने पाण्डबौको दिएपाप मुक्त होने के सुझाव के बारेमे बताया। महात्मा ब्यास ने सुझाव को सर्बोतम कहते हुए पान्डबौको बिलम्ब किए बिना भागवान चन्द्रमौली के शरण मे जाने को कहा। पान्डब द्रोपदी सहित उत्तराखण्ड कि यात्रा मे चल पडे | पाण्डब बिना कृश्ण के अकेले दर्शन कर्ने गए । पान्डबौको नारायण कृश्ण ने यह कहकर बिदा किया था कि भागवान भुत नाथ अब लौकिक रूप के बजाय बहुँदा रूप मे ज्योतिर्लिङ के रूप मे कुछ शक्ती धर्ती मे छोडना चाह्ते है क्यु कि उपम्न्यु को दिए बरदान का समय आब समाप्त हो रहे । इसिलिए तुम्हे वो बैल के रूप मे मिलेङे तुम उस बैल को पकडना ता कि इश्वर  अप्ने बहु रूप कर सके क्यु कि तुम्हे दिया हुवा पशुपताश्त्र आब तुम्हार सारीर का हिस्साबन गया, यिसिलिए वो जैसे तुमने पाया था उसि मार्ग से वो भि प्रभुमे समाहित होना चाहता है, सो तुमने शिब के सरणमे जाना हि होगा। शृकृश्ण और भागवान बेदब्यास कि आज्ञा पाकार पान्डब केदार का दर्शन गए। उन्हौने केदारखण्ड कि केदार घाटी मे पहुचते हि रात्री मे अति सुन्दर तेजस्ह्वी बैल को देख्। वो समय मार्ग्शिर्सका महिना था,दिपावाली के बाद का समय था। आकाश खुला था कोइ बादल नहिथे और खुला आकाशमे तारे और अन्य आकाशिय पिण्ड स्पस्ट दिखायिदे रहेथे। बस्तियौमे फुल फुले थे , वो बैले बिचित्र था, वो इत्ना बिशाल था कि उस बैले से दिखाइ देने वाला सारा आकाश ब्यप्त था, उस्के सिङौ तारौको छेद कर रहे थे, तारा पुन्ज उस बैले के सिङौ मे ऐसे लग्रहे थे मानौ कोइ मोतिकी माला हो, उस बैले के सर के रोमौ ने पुरा आकाश गङ्गा ब्याप्त कर रखिथी , उस बैले का शिर हिल्ता तो कोइ नए तारे दिखायी देते और कोइ तारे सिङौकी ओट मे छिप जाते। और उस्के शिरमे चन्द्रमा था, इस बिचित्र अनन्त बिशाल बैल को देख कर पान्डब प्रसन्न हुए|वोह बैल रातृमे तारौकी और चन्द्रमाकी कान्ती को फिका कर्ती जगमगारही थि। उस बैलका रङ सफेद था और बैल के तीन नेत्र स्पस्ट दिखायी देते थे। बैले के घाटी मे मालथी वो सारे रुद्राक्ष और सर्प डोरी बन बैठे थे। डमरू घन्टे का रूप बनाके उस बैल के गलेमे लटक रही थि और बिपरित तर्फ दृस्टी गोचार होने वाली दिशा उस घण्टे से ब्याप्त था, पान्डबौ मे से नकुल उस घण्टे को दर्शन कर्के उस्की बिशालता को माप्ते मगर उस घण्टी का पछला भाग कहा तक है अनौमान नही लगापाए। अर्जुन पाशुपताश्त्र के सहारे बैल के सिङौ तक जाने कि कामना कर्ने लगे भिम अप्नी गदाके चमत्कारके सहारे उस बैलेके आकाशमे ब्याप्त मुख के सम्मुख पहुच्ने के कल्पना कर्ने लगे। पाण्डब भागवान के स्तुती कर्ने लगे उसि समय जो अनन्त बैलथा उसकी पुछ नजिदिक दिखायी दिया और युधिस्ठिर ने आज्ञा दिया कि हे बलशाली भिम तुम यिस पुछको पकडो और अर्जुन तुम्हे पकडे क्युकी श्रीहरी कृश्ण कि यही आज्ञा है। यही हमारी बडी प्रर्थाना है। जैसे हि भिम ने बैल के पुछ पकड्कर अप्ने शिर मे लगाया, भागवान भुतनाथ प्रकट हुए। पान्डबौको पापमुक्त होने का बारादान दिया। और आज्ञा दि कि हे पाण्डबौ मै भि अब कृश्ण के जाने के बाद यहाँअ केबल अप्नी कुछ शक्ती छोडुङा और काली युग मे साक्षात नही मिलुङा इसिलिए मै अप्ने सारे अङौसे ज्योतिर्लिङ मे शक्ती स्थापित कर्ता हु और जहाँ जहाँ तुम मेरे इन अङौको जाते देखोगे और जहाँ वो प्रकट होङे वहा मेरे मन्दिर बन्वावो। पान्डबौ ने ऐसा हि किय और सारे मन्दिरौका निर्माण किया, बाद मे कत्युर साशकौ ने यिन सारे मन्दिरौका जिर्णोद्धार किया। । गुरु पुत्र अश्व्स्थामा कि भयन्कर पिडा देखकर द्रोपदी का मन द्रबित हुवा और उन्की पिडा को भि मुक्त कर्ने के लिए प्रभु से प्रर्थाना कि। द्रोपदी कि यही प्रर्थाना कालीयुग मे पिछे जाकर भारतके लिए अभिशप्त बनी। भोलेनाथ ने अश्वस्थामा को जो कल्पान्तर कि पिडा का स्राप मिलाथा उसे घटाके २८०० बर्स कर्दी। ठिक पान्डबौकी उत्तराखण्ड्की यात्रा के ४० बर्स बाद नारायण मे बैकुन्ठ चले गए और पान्डब दुबारा उत्तराखण्डकी यात्रा मे निक्ले, मृत्यु बरण कर्ने और डोटी राज्यकी हिमालौ के कठिन निर्जन पहाडौमे उन्हौने अप्ने प्राण त्यागे ,ठिक यिसी बक्त कली पृथिबिकी यात्रा मे चल पडा, अन्तरक्षमे भिशण घटना घटाते वो पृथिबी कि यात्रामे चल पडा और नारायण कृश्णके धर्तिको छोड्ते हो हि भारतबर्स के पस्चिमी भाग सागरके पार और पृथिबिके पस्चिमी दक्षिणी गोलार्धा तथा भारत बर्सके पुरबके समुद्रके पार भागको मोहके मोहके अदृशअनधकार से ढक्ता हुवा उतरा ब्याप्त कर्ता हुवा गर्जनाकरने लगा। यिसी दिन यबनौ देशमे बडी राज्नितिक उथल्पुथल हुयिथी| पुराने सारे यबन सासकौकी हत्या हुयिथी और नए सिद्धान्त वाले आएथे जो कालान्तरमे ग्रीक सभ्यता बनी।यही कारण गृक लोग उन्की सभ्यताको ५००० बर्स पुरानी कहते है, क्यु कि ५६०० बर्स पहले के यबन आन्धुनिक (२०००-३०००) बर्स पहलेकी जैसी नही थि। वो सन्तानतो यबनौकी हि है मगर जिवन जिनेका सिद्दान्त बिल्कुल भिन्न है|| पान्डबकि उत्तराखण्डकी यात्राके २६०० बर्स बाद अश्वस्थामा पिडा मुक्त होकर भारत से बाहर के जङलौ मे चले गए ,उनका यही पलायन भारत बर्सके महाश्राप जैसा बना। ऐसी जनस्रुती है |। जनस्रुती के अनुसार अश्वस्थामा का असर जो है उससे मुक्त होने भारत बर्सको अभी बहुत समयका इन्ताजार कर्ना पडसक्ता है ||अगर रानी द्रोपदी कृश्ण के हजारौ बार “तुम पाप मुक्त हो” कहने के पस्चात भि ग्लानी रहित हो गयी होती और पान्डबौ का केबल बिनाशका मात्र जिबन का उद्देश्य बनाएवाले गुरुपुत्रके प्रति, उनके मागे बिना उनके लिए भि बरदान न माग्ती तो आजका समय कुछ और हि होता। “पान्डब महान थे”। युद्धके पस्चात वो सारे बिकारौ से रहित थे। ऐसी जनस्रुती है

भोलेनाथ पाण्डबौको पापमुक्त होने और अश्स्वथामा कि पिडाका समय घटदेनेके पस्चात प्रभु अन्तर्ध्यान होगए और बिभिन्न जगह उन्के ज्योतिर्लिङ प्रकट हुए, शिर के भाग के प्रतिकके रूप मे पशुपति, बाहु के रूप मे केदार (उन्के नौ भुजा थि यिसिलिए नौ केदार उतपन्न हुए) जिसमे पन्चकेदार कुमाउगढ्वाल मे और सयुक्त चारभुजा नेपाल के बैतडी मे , बाद मे वो चार भुजा भि अलग होकर आज उत्तराख्ण्डमे ९ केदार है अन्य चार स्थलों पर शेष भाग दिखाई दिए, जो कि शिव के उन रूपों के आराधना स्थल बने। रुद्रनाथ,  कल्पेश्वर, मध्यमेश्वर , तुंगनाथ , श्रीकेदार्, रौलाकेदार्, ध्वाजकेदार्, अशिमकेदार। कहा जाता हैकी यिस बक्त पाण्डब पुरा एक बर्स तक उत्तराखण्ड और डोटी क्षेत्र मे रहे यहाँ सारे मन्दिरौका निर्माण कर्नेके पस्चात वो हस्तिनापुर लौटे। और दुस्रे बर्स नेपाल के पशुपती मन्दिर और उज्ज्यानिका महाकाल मन्दिर एबम काशी बिश्वनाथका मन्दिर निर्माण किया मगर इस सन्धर्भ मे नेपालके डोटी राज्यकी जन स्रुती और कुमाउगढ्वालकी जन स्रुती मे भिन्नता है। डोटी राज्यकी जन स्रुती के अनुसार यह नौ केदार भुजाए है, शिर पशुपती और नेत्र उज्ज्यनिका महाकाल्, उदर सोमनाथ। उनके तृशुल्, रुद्रक्ष और सर्प आदी सभी भारतबर्स मे किसी न किसी देबता के रुपमे रहते है, जैसे रुद्राक्ष=भागेश्वर्, जट=शिगाश्, तृशुल्=महारुद्र्, डमरू=नागर्जुन आदी। मगर कुमाउगढ्वालकी जन स्रुतिके मुताबिक  मुख – रुद्रनाथ, जटा-सिर – कल्पेश्वर, पेट का भाग – मध्यमेश्वर और हाथ – तुंगनाथ और ए सारे कुमाउगढ्वाल मे हि है। ए जन स्रुती को मान्नेके लिए किसी किसी को थोडा सन्कोच होता है क्युकी केदार के ५००० बर्स पुराने ज्योतिर्लिङ (केदारेश्वर्) कुमाउ से बाहर डोटी राज्य मे भि है ||| हमारे यहाँ (डोटी) कि जन स्रुती मे यही कथा है

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ब्राह्मण क्यों देवता ?


ब्राह्मण क्यों देवता ?

नोट–_कुछ आदरणीय मित्रगण कभी -कभी मजाक में या
कभी जिज्ञासा में,
कभी गंभीरता से
एक प्रश्न करते है कि_
ब्राम्हण को इतना सम्मान क्यों दिया जाय या दिया जाता है ?

_इस तरह के बहुत सारे प्रश्न
समाज के नई पिढियो के लोगो कि भी जिज्ञासा का केंद्र बना हुवा है ।_

_*तो आइये
देखते है हमारे
धर्मशास्त्र क्या कहते है इस विषय में—-*_

शास्त्रीय मत

पृथिव्यां यानी तीर्थानि तानी तीर्थानि सागरे ।
सागरे सर्वतीर्थानि पादे विप्रस्य दक्षिणे ।।
चैत्रमाहात्मये तीर्थानि दक्षिणे पादे वेदास्तन्मुखमाश्रिताः ।
सर्वांगेष्वाश्रिता देवाः पूजितास्ते तदर्चया ।।
अव्यक्त रूपिणो विष्णोः स्वरूपं ब्राह्मणा भुवि ।
नावमान्या नो विरोधा कदाचिच्छुभमिच्छता ।।

•अर्थात पृथ्वी में जितने भी तीर्थ हैं वह सभी समुद्र में मिलते हैं और समुद्र में जितने भी तीर्थ हैं वह सभी ब्राह्मण के दक्षिण पैर में है । चार वेद उसके मुख में हैं अंग में सभी देवता आश्रय करके रहते हैं इसवास्ते ब्राह्मण को पूजा करने से सब देवों का पूजा होती है । पृथ्वी में ब्राह्मण जो है विष्णु रूप है इसलिए जिसको कल्याण की इच्छा हो वह ब्राह्मणों का अपमान तथा द्वेष नहीं करना चाहिए ।

•देवाधीनाजगत्सर्वं मन्त्राधीनाश्च देवता: ।
ते मन्त्रा: ब्राह्मणाधीना:तस्माद् ब्राह्मण देवता ।

•अर्थात् सारा संसार देवताओं के अधीन है तथा देवता मन्त्रों के अधीन हैं और मन्त्र ब्राह्मण के अधीन हैं इस कारण ब्राह्मण देवता हैं ।

ऊँ जन्मना ब्राम्हणो, ज्ञेय:संस्कारैर्द्विज उच्चते।
विद्यया याति विप्रत्वं, त्रिभि:श्रोत्रिय लक्षणम्।।

ब्राम्हण के बालक को जन्म से ही ब्राम्हण समझना चाहिए।
संस्कारों से “द्विज” संज्ञा होती है तथा विद्याध्ययन से “विप्र” नाम धारण करता है।

जो वेद,मन्त्र तथा पुराणों से शुद्ध होकर तीर्थस्नानादि के कारण और भी पवित्र हो गया है,वह ब्राम्हण परम पूजनीय माना गया है।

ऊँ पुराणकथको नित्यं, धर्माख्यानस्य सन्तति:।_
अस्यैव दर्शनान्नित्यं ,अश्वमेधादिजं फलम्।।

जिसके हृदय में गुरु,देवता,माता-पिता और अतिथि के प्रति भक्ति है। जो दूसरों को भी भक्तिमार्ग पर अग्रसर करता है,जो सदा पुराणों की कथा करता और धर्म का प्रचार करता है ऐसे ब्राम्हण के दर्शन से ही अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त होता है।

पितामह भीष्म जी ने पुलस्त्य जी से पूछा–
गुरुवर!मनुष्य को देवत्व, सुख, राज्य, धन, यश, विजय, भोग, आरोग्य, आयु, विद्या, लक्ष्मी, पुत्र, बन्धुवर्ग एवं सब प्रकार के मंगल की प्राप्ति कैसे हो सकती है?
यह बताने की कृपा करें।*

पुलस्त्यजी ने कहा–
राजन!इस पृथ्वी पर ब्राम्हण सदा ही विद्या आदि गुणों से युक्त और श्रीसम्पन्न होता है।
तीनों लोकों और प्रत्येक युग में विप्रदेव नित्य पवित्र माने गये हैं।
ब्राम्हण देवताओं का भी देवता है।
संसार में उसके समान कोई दूसरा नहीं है।
वह साक्षात धर्म की मूर्ति है और सबको मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करने वाला है।

ब्राम्हण सब लोगों का गुरु,पूज्य और तीर्थस्वरुप मनुष्य है।

पूर्वकाल में नारदजी ने ब्रम्हाजी से पूछा था–
ब्रम्हन्!किसकी पूजा करने पर भगवान लक्ष्मीपति प्रसन्न होते हैं?”

ब्रम्हाजी बोले–जिस पर ब्राम्हण प्रसन्न होते हैं,उसपर भगवान विष्णुजी भी प्रसन्न हो जाते हैं।
अत: ब्राम्हण की सेवा करने वाला मनुष्य निश्चित ही परब्रम्ह परमात्मा को प्राप्त होता है।
ब्राम्हण के शरीर में सदा ही श्रीविष्णु का निवास है।

जो दान,मान और सेवा आदि के द्वारा प्रतिदिन ब्राम्हणों की पूजा करते हैं,उसके द्वारा मानों शास्त्रीय पद्धति से उत्तम दक्षिणा युक्त सौ अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान हो जाता है।

जिसके घरपर आया हुआ ब्राम्हण निराश नही लौटता,उसके समस्त पापों का नाश हो जाता है।
पवित्र देशकाल में सुपात्र ब्राम्हण को जो धन दान किया जाता है वह अक्षय होता है।
वह जन्म जन्मान्तरों में फल देता है,उनकी पूजा करने वाला कभी दरिद्र, दुखी और रोगी नहीं होता है।जिस घर के आँगन में ब्राम्हणों की चरणधूलि पडने से वह पवित्र होते हैं वह तीर्थों के समान हैं।

ऊँ विप्रपादोदककर्दमानि,
न वेदशास्त्रप्रतिघोषितानि!
स्वाहास्नधास्वस्तिविवर्जितानि,
श्मशानतुल्यानि गृहाणि तानि।।

जहाँ ब्राम्हणों का चरणोदक नहीं गिरता,जहाँ वेद शास्त्र की गर्जना नहीं होती,जहाँ स्वाहा,स्वधा,स्वस्ति और मंगल शब्दों का उच्चारण नहीं होता है। वह चाहे स्वर्ग के समान भवन भी हो तब भी वह श्मशान के समान है।

भीष्मजी!पूर्वकाल में विष्णु भगवान के मुख से ब्राम्हण, बाहुओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य और चरणों से शूद्रों की उत्पत्ति हुई।

पितृयज्ञ(श्राद्ध-तर्पण), विवाह, अग्निहोत्र, शान्तिकर्म और समस्त मांगलिक कार्यों में सदा उत्तम माने गये हैं।

ब्राम्हण के मुख से देवता हव्य और पितर कव्य का उपभोग करते हैं। ब्राम्हण के बिना दान,होम तर्पण आदि सब निष्फल होते हैं।

जहाँ ब्राम्हणों को भोजन नहीं दिया जाता,वहाँ असुर,प्रेत,दैत्य और राक्षस भोजन करते हैं।

ब्राम्हण को देखकर श्रद्धापूर्वक उसको प्रणाम करना चाहिए।

उनके आशीर्वाद से मनुष्य की आयु बढती है,वह चिरंजीवी होता है।ब्राम्हणों को देखकर भी प्रणाम न करने से,उनसे द्वेष रखने से तथा उनके प्रति अश्रद्धा रखने से मनुष्यों की आयु क्षीण होती है,धन ऐश्वर्य का नाश होता है तथा परलोक में भी उसकी दुर्गति होती है।

चौ- पूजिय विप्र सकल गुनहीना।
शूद्र न गुनगन ग्यान प्रवीणा।।

कवच अभेद्य विप्र गुरु पूजा।
एहिसम विजयउपाय न दूजा।।

—— रामचरित मानस……

ऊँ नमो ब्रम्हण्यदेवाय,
गोब्राम्हणहिताय च।
जगद्धिताय कृष्णाय,
गोविन्दाय नमोनमः।।

जगत के पालनहार गौ,ब्राम्हणों के रक्षक भगवान श्रीकृष्ण जी कोटिशःवन्दना करते हैं।

जिनके चरणारविन्दों को परमेश्वर अपने वक्षस्थल पर धारण करते हैं,उन ब्राम्हणों के पावन चरणों में हमारा कोटि-कोटि प्रणाम है।।
ब्राह्मण जप से पैदा हुई शक्ति का नाम है,
ब्राह्मण त्याग से जन्मी भक्ति का धाम है।

ब्राह्मण ज्ञान के दीप जलाने का नाम है,
ब्राह्मण विद्या का प्रकाश फैलाने का काम है।

ब्राह्मण स्वाभिमान से जीने का ढंग है,
ब्राह्मण सृष्टि का अनुपम अमिट अंग है।

ब्राह्मण विकराल हलाहल पीने की कला है,
ब्राह्मण कठिन संघर्षों को जीकर ही पला है।

ब्राह्मण ज्ञान, भक्ति, त्याग, परमार्थ का प्रकाश है,
ब्राह्मण शक्ति, कौशल, पुरुषार्थ का आकाश है।

ब्राह्मण न धर्म, न जाति में बंधा इंसान है,
ब्राह्मण मनुष्य के रूप में साक्षात भगवान है।

ब्राह्मण कंठ में शारदा लिए ज्ञान का संवाहक है,
ब्राह्मण हाथ में शस्त्र लिए आतंक का संहारक है।

ब्राह्मण सिर्फ मंदिर में पूजा करता हुआ पुजारी नहीं है,
ब्राह्मण घर-घर भीख मांगता भिखारी नहीं है।

ब्राह्मण गरीबी में सुदामा-सा सरल है,
ब्राह्मण त्याग में दधीचि-सा विरल है।

ब्राह्मण विषधरों के शहर में शंकर के समान है,
ब्राह्मण के हस्त में शत्रुओं के लिए बेद कीर्तिवान है।

ब्राह्मण सूखते रिश्तों को संवेदनाओं से सजाता है,
ब्राह्मण निषिद्ध गलियों में सहमे सत्य को बचाता है।

ब्राह्मण संकुचित विचारधारों से परे एक नाम है,
ब्राह्मण सबके अंत:स्थल में बसा अविरल राम है..