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पत्थरबाजों का समर्थन दिखा रहा है ख़ूनी रंग. श्रीनगर मस्जिद के बाहर DSP की पीट – पीट कर हत्या…

डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित मस्जिद के बाहर ड्यूटी कर रहे थे, तभी उन पर भीड़ ने हमला किया…

न्यूज़ चैनल वाले DSP के परिवार वालो के मुह में माइक डालकर सवाल पूछ रहे थे …..

रोते हुए एक महिला के मुहँ से सच निकल गया ….

उस महिला ने बुर्खे के अन्दर से बोला ” भीड़ ने मेरे अयूब को “पंडित” समझकर पिट डाला वो उसको मुखबिर समझ रहे थे …..

पहले अयूब से पूछ लेते वो तो वहां नमाज पढने गया था …. 

अगर भीड़ सिर्फ नाम में “पंडित” होने पर ही आपको पीटकर मार डालती है तो इसका मतलब आप समझ सकते हो 

कश्मीर में “कश्मीरी पंडितो ” की हालात हुई होगी…..

मुसलमान को ‘हिन्दू’ समझकर मुसलमानों ने मार डाला वह भी मस्जिद के सामने … 
अब क्या होगा ..?

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और उस पर उस मुसलमान की माँ कह रही है की पूंछ तो लेते “”हिन्दू”” है की नहीं….
अखलाक को भीड ने माराऔरDSPअयूब को भी,तब फिर अखलाक ही अकेला मासूम क्यो

एकविचार

क्या मासूमियत भी मरने व मारने वाले के धर्म से तय होगी

यदि मुस्लिम समुदाय के लिए रमजान एक पाक महिना है तो फिर इस महीने में जिस तरह DSP का खून बहाया गया उस पर अभी तक किसी मुस्लिम धर्म गुरु की कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं आई ? 
क्या वो इस हत्या को इस्लाम के हिसाब से जायज मान रहे हैं ?
#कश्मीर

Dr. Dhananjay Singh

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जिन्ना ने दिया था हिंदुओं को सौ वर्ष का अभय दान

 

सभी जानते हैं 1947 भारत के बटवारे की मूल वजह क़ायदे-आज़म मोहम्मद अली जिन्ना थे और जिन्ना  की जिद्द के कारण अंग्रेजों ने भारत को दो हिस्से में बाँटकर हिंदुस्तान और पाकिस्तान बना दिया क्योंकि जिन्ना का यह मत था कि हिंदुओं की संस्कृति और जीवन शैली मुसलमानों से एकदम भिन्न है अतः हिंदू और मुसलमान एक साथ एक देश में नहीं रह सकते | अगर हिंदू हिंदुस्तान में रहता है तो मुसलमानों को भी एक पाक स्थान पाकिस्तान के रूप में दिया जाना चाहिए परिणाम स्वरुप एक बड़ी हिंसा के बाद हिंदुस्तान का बाँटवारा हो गया और भारत के तीन टुकड़ों में बाँट गया | जो पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के रूप में मुसलमानों को दे दिया गया | बाद को कालांतर में श्रीमती इंदिरा गांधी की राजनीतिक सूझबूझ से पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान बाँटकर कर पुनः दो हिस्से हो गये | पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश के नाम से जाना जाने लगा और पश्चिमी पाकिस्तान पाकिस्तान के नाम से जाना जाने लगा | सुनने में तो बहुत बुरा लगता है लेकिन यह एक बहुत बड़ा सत्य है कि जिन्ना की इसी बेवकूफी के कारण हिंदुस्तान में हिंदुओं को 100 वर्ष का अभय दान मिल गया |

 

आज स्पष्ट रुप से देखा जाता है जिन स्थानों पर मुसलमानों की जनसंख्या 30% से अधिक है वहां से हिंदू प्रति वर्ष पलायन कर रहा है | 4 जनवरी 1990 को कश्मीर के अंदर तो खुलेआम मस्जिदों के लाऊडस्पीकरों से घोषणा की गई हिंदू अपने घर की बहू-बेटी व संपत्ति छोड़कर तत्काल चले जाएं वरना उनकी हत्या कर दी जाएगी | परिणामता: 2,00,000 कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़कर पलायन करना पड़ा | इसी तरह पश्चिम उत्तर प्रदेश मैं आज बहुत बड़ी मात्रा में हिंदू पलायन कर रहा है | बंगाल के अंदर भी बांग्लादेशियों की घुसपैठ के कारण मुसलमानों की जनसंख्या तेजी से बढ़ने के कारण वहां से बहुत बड़ी मात्रा में हिंदूओं को पलायन करना पड़ रहा है | इतना ही नहीं भारत में जहां-जहां मुसलमानों की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है वहां-वहां से हिंदू पलायन करके दूसरे स्थानों पर जा रहे हैं |

 

कल्पना कीजिए अगर जिन्ना ने अलग पाकिस्तान की मांग न की होती तो वर्तमान समय में पाकिस्तान के अंदर रहने वाला 19 करोड़ मुसलमान और बंगलादेश के अंदर रहने वाला 16 करोड़ मुसलमान तथा भारत के अंदर रहने वाले 25 करोड़ मुसलमान मिलाकर कुल भारत के अंदर 70  करोड़ मुसलमान होते जो 80 करोड़ हिंदुओं को भारत छोड़ कर भागने के लिए बाध्य कर देते | यह तो जिन्ना की नासमझी और जिद्द का परिणाम था कि हिंदुस्तान का बंटवारा हुआ और हिंदुस्तान की बहुत बड़ी मुसलमान आबादी पाकिस्तान चली गई | जिससे हिंदुस्तान में हिंदुओं को 100  वर्ष तक अपने तरीके से जिंदगी जीने का अधिकार प्राप्त हो गया वर्ना जब हिंदुस्तान के अंदर मुसलमानों की जनसंख्या 50 करोड़  होती तो या तो  हिंदुस्तान का हिंदू मुसलमान हो गया होता या हिंदुस्तान छोड़कर चला गया होता | जैसे देश के बंटवारे के समय पाकिस्तान में 12% हिन्दू था जो आज मात्र 1% दयनीय अवस्था में रह गया है | और हिन्दुस्थान का नाम मुगलिस्थान हो गया होता |

 

अगर हिंदुओं की यह पलायनवादी सोच नहीं समाप्त हुई तो वह दिन दूर नहीं जब भारत के अंदर राष्ट्रपति से लेकर होमगार्ड तक सभी मुसलमान होंगे और उनके समक्ष हिंदुओं के हितों की रक्षा करने के लिए कोई भी व्यक्ति नहीं होगा | जैसे आज बांग्लादेश व पाकिस्तान में हो रहा है |

Naveen Thuli

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संक्षिप्त जानकारी :-
🙏 23 जून/बलिदान-दिवस 🙏
*डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का बलिदान*
👉छह जुलाई, 1901 को कोलकाता में श्री आशुतोष मुखर्जी एवं योगमाया देवी के घर में जन्मे डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को दो कारणों से सदा याद किया जाता है।

 👉पहला तो यह कि वे योग्य पिता के योग्य पुत्र थे। श्री आशुतोष मुखर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय के संस्थापक उपकुलपति थे।1924 में उनके देहान्त के बाद केवल 23 वर्ष की अवस्था में ही श्यामाप्रसाद को विश्वविद्यालय की प्रबन्ध समिति में ले लिया गया। 33 वर्ष की छोटी अवस्था में ही उन्हें कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति की उस कुर्सी पर बैठने का गौरव मिला, जिसे किसी समय उनके पिता ने विभूषित किया था। चार वर्ष के अपने कार्यकाल में उन्होंने विश्वविद्यालय को चहुँमुखी प्रगति के पथ पर अग्रसर किया।
👉दूसरे जिस कारण से डा. मुखर्जी को याद किया जाता है, वह है जम्मू कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय की माँग को लेकर उनके द्वारा किया गया सत्याग्रह एवं बलिदान। 1947 में भारत की स्वतन्त्रता के बाद गृहमन्त्री सरदार पटेल के प्रयास से सभी देसी रियासतों का भारत में पूर्ण विलय हो गया; पर प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू के व्यक्तिगत हस्तक्षेप के कारण जम्मू कश्मीर का विलय पूर्ण नहीं हो पाया। उन्होंने वहाँ के शासक राजा हरिसिंह को हटाकर शेख अब्दुल्ला को सत्ता सौंप दी। शेख जम्मू कश्मीर को स्वतन्त्र बनाये रखने या पाकिस्तान में मिलाने के षड्यन्त्र में लगा था।
👉शेख ने जम्मू कश्मीर में आने वाले हर भारतीय को अनुमति पत्र लेना अनिवार्य कर दिया। 1953 में प्रजा परिषद तथा भारतीय जनसंघ ने इसके विरोध में सत्याग्रह किया। नेहरू तथा शेख ने पूरी ताकत से इस आन्दोलन को कुचलना चाहा; पर वे विफल रहे। पूरे देश में यह नारा गूँज उठा – एक देश में दो प्रधान, दो विधान, दो निशान: नहीं चलेंगे।
👉डा. मुखर्जी जनसंघ के अध्यक्ष थे। वे सत्याग्रह करते हुए बिना अनुमति जम्मू कश्मीर में गये। इस पर शेख अब्दुल्ला ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। 20 जून को उनकी तबियत खराब होने पर उन्हें कुछ ऐसी दवाएँ दी गयीं, जिससे उनका स्वास्थ्य और बिगड़ गया। 22 जून को उन्हें अस्पताल में भरती किया गया। उनके साथ जो लोग थे, उन्हें भी साथ नहीं जाने दिया गया। रात में ही अस्पताल में ढाई बजे रहस्यमयी परिस्थिति में उनका देहान्त हुआ।

मृत्यु के बाद भी शासन ने उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया। उनके शव को वायुसेना के विमान से दिल्ली ले जाने की योजना बनी; पर दिल्ली का वातावरण गरम देखकर शासन ने विमान को अम्बाला और जालन्धर होते हुए कोलकाता भेज दिया। कोलकाता में दमदम हवाई अड्डे से रात्रि 9.30 बजे चलकर पन्द्रह कि.मी दूर उनके घर तक पहुँचने में सुबह के पाँच बज गये। 24 जून को दिन में ग्यारह बजे शुरू हुई शवयात्रा तीन बजे शमशान पहुँची। हजारों  लोगों ने उनके अन्तिम दर्शन किये।

आश्चर्य की बात तो यह है कि डा. मुखर्जी तथा उनके साथी शिक्षित तथा अनुभवी लोग थे; पर पूछने पर भी उन्हें दवाओं के बारे में नहीं बताया गया। उनकी मृत्यु जिन सन्देहास्पद स्थितियों में हुई तथा बाद में उसकी जाँच न करते हुए मामले पर लीपापोती की गयी, उससे इस आशंका की पुष्टि होती है कि यह नेहरू और शेख अब्दुल्ला द्वारा करायी गयी चिकित्सकीय हत्या थी।
👉डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने अपने बलिदान से जम्मू-कश्मीर को बचा लिया। अन्यथा शेख अब्दुल्ला उसे पाकिस्तान में मिला देता।🙏🙏
जगवीर जैन【 I.T & MEDIA 】प्रमुख, भाजपा गोहाना, 

☎- 9468152681

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प्रणाम का महत्व


🙏 *प्रणाम का महत्व* 🙏

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महाभारत का युद्ध चल रहा था –

एक दिन दुर्योधन के व्यंग्य से आहत होकर “भीष्म पितामह” घोषणा कर देते हैं कि –
“मैं कल पांडवों का वध कर दूँगा”
उनकी घोषणा का पता चलते ही पांडवों के शिविर में बेचैनी बढ़ गई –
भीष्म की क्षमताओं के बारे में सभी को पता था इसलिए सभी किसी अनिष्ट की आशंका से परेशान हो गए|
तब –
श्री कृष्ण ने द्रौपदी से कहा अभी मेरे साथ चलो –
श्री कृष्ण द्रौपदी को लेकर सीधे भीष्म पितामह के शिविर में पहुँच गए –
शिविर के बाहर खड़े होकर उन्होंने द्रोपदी से कहा कि – अन्दर जाकर पितामह को प्रणाम करो –
द्रौपदी ने अन्दर जाकर पितामह भीष्म को प्रणाम किया तो उन्होंने –

“अखंड सौभाग्यवती भव” का आशीर्वाद दे दिया , फिर उन्होंने द्रोपदी से पूछा कि !!
“वत्स, तुम इतनी रात में अकेली यहाँ कैसे आई हो, क्या तुमको श्री कृष्ण यहाँ लेकर आये है” ?
तब द्रोपदी ने कहा कि –
“हां और वे कक्ष के बाहर खड़े हैं” तब भीष्म भी कक्ष के बाहर आ गए और दोनों ने एक दूसरे से प्रणाम किया –
भीष्म ने कहा –
“मेरे एक वचन को मेरे ही दूसरे वचन से काट देने का काम श्री कृष्ण ही कर सकते है”
शिविर से वापस लौटते समय श्री कृष्ण ने द्रौपदी से कहा कि –
*”तुम्हारे एक बार जाकर पितामह को प्रणाम करने से तुम्हारे पतियों को जीवनदान मिल गया है “* –
*” अगर तुम प्रतिदिन भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य, आदि को प्रणाम करती होती और दुर्योधन- दुःशासन, आदि की पत्नियां भी पांडवों को प्रणाम करती होंती, तो शायद इस युद्ध की नौबत ही न आती “* –

……तात्पर्य्……
वर्तमान में हमारे घरों में जो इतनी समस्याए हैं उनका भी मूल कारण यही है कि –
*”जाने अनजाने अक्सर घर के बड़ों की उपेक्षा हो जाती है “*
*” यदि घर के बच्चे और बहुएँ प्रतिदिन घर के सभी बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लें तो, शायद किसी भी घर में कभी कोई क्लेश न हो “*
बड़ों के दिए आशीर्वाद कवच की तरह काम करते हैं उनको कोई “अस्त्र-शस्त्र” नहीं भेद सकता –
“निवेदन 🙏 सभी इस संस्कृति को सुनिश्चित कर नियमबद्ध करें तो घर स्वर्ग बन जाय।”
*क्योंकि*:-
*प्रणाम प्रेम है।*

*प्रणाम अनुशासन है।*

प्रणाम शीतलता है।

प्रणाम आदर सिखाता है।

*प्रणाम से सुविचार आते है।*

प्रणाम झुकना सिखाता है।

प्रणाम क्रोध मिटाता है।

प्रणाम आँसू धो देता है।

*प्रणाम अहंकार मिटाता है।*

*प्रणाम हमारी संस्कृति है।*
🙏🙏🙏

 

🙏 *सबको प्रणाम*  🙏

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मीरा


कांग्रेस का हनी ट्रैप – और बर्बाद हो गया था मीरा कुमार का पूरा परिवार
दिल्ली : कैसे मीरा कुमार के दलित पिता बाबू जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए इंदिरा गाँधी ने कैसे साजिश रची थी
इसके लिए इंदिरा ने अपनी बहु मेनका गाँधी का सहारा लिया था ..क्योकि तब संजय गाँधी जिन्दा थे और इंदिरा और मेनका में खूब जमती थी . जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए उनके बेटे सुरेश राम का सेक्स स्कैंडल यानी उनकी फोटो अपनी पत्रिका सूर्या में छापी थी ..
मित्रो साल 1977 में जनता पार्टी की लहर में इंदिरा गांधी चुनाव हार गई थीं. उस समय जगजीवन राम पीएम पद के सबसे बड़े दावेदार माने जा रहे थे. कहा जाता है कि जाने-माने नेता जगजीवन राम के बेटे सेक्स स्कैंडल में न फंसे होते तो वह देश के पहले दलित पीएम बन सकते थे.

दुर्भाग्यवश 1978 में सूर्या नाम की एक पत्रिका में ऐसी तस्वीरें छपीं, जिसमें जगजीवन राम के बेटे सुरेश राम को यूपी के बागपत जिले के एक गांव की एक महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाते हुए आपत्तिजनक स्थिति में दिखाया गया. इन तस्वीरों ने सियासी गलियारे में तूफान ला दिया.
सूर्या पत्रिका की संपादक कोई और नहीं बल्कि इंदिरा गांधी की बहू मेनका गांधी थीं. इस सेक्स स्कैंडल जिस वक्त खुलासा हुआ उस वक्त जगजीवन राम, मोरारजी देसाई की सरकार में रक्षा मंत्री थे. उनकी गिनती कद्दावर नेताओं में होती थी, लेकिन स्कैंडल ने उनके पीएम बनने के सपने के तोड़ दिया.
इस स्कैंडल में सुरेश राम के साथ दिख रही युवती दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज की छात्रा थी. कहा जाता है कि इसके बाद सुरेश ने उससे शादी भी की थी. लेकिन सुरेश की मौत के बाद जगजीवराम के परिवारवालों ने उसका बहिष्कार कर दिया था.
दबे जुबान ये भी कहा जाता है कि इस सेक्स स्कैंडल का खुलासा जगजीवन राम के राजनैतिक करियर को खत्म करने के लिए किया गया था. इसमें उन्हीं के पार्टी के कई नेता शामिल थे. इन नेताओं में केसी त्यागी, ओमपाल सिंह और एपी सिंह का नाम अप्रत्यक्ष रूप से आता है.

इस चर्चित सेक्स स्कैंडल का सूत्रधार खुशवंत सिंह को माना जाता है. वह उस समय कांग्रेस के अखबार नेशनल हेराल्ड के प्रधान संपादक और मेनका की पत्रिका सूर्या के कंसल्टिंग एडिटर भी थे. वह बंद लिफाफे में तस्वीरें लेकर पहुंचे. इसके बाद इसे सूर्या पत्रिका में छाप दिया गया .।

नवीन थूली

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डा. मार्क एक प्रसिद्ध कैंसर स्पैश्लिस्ट हैं


डा. मार्क एक प्रसिद्ध कैंसर स्पैश्लिस्ट हैं, एक बार किसी सम्मेलन में भाग लेने लिए किसी दूर के शहर जा रहे थे। वहां उनको उनकी नई मैडिकल रिसर्च के महान कार्य  के लिए पुरुस्कृत किया जाना था। वे बड़े उत्साहित थे व जल्दी से जल्दी वहां पहुंचना चाहते थे। उन्होंने इस शोध के लिए बहुत मेहनत की थी। बड़ा उतावलापन था, उनका उस पुरुस्कार को पाने के लिए।

उड़ने के लगभग दो घण्टे बाद उनके जहाज़ में तकनीकी खराबी आ गई, जिसके कारण उनके हवाई जहाज को आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी। डा. मार्क को लगा कि वे अपने सम्मेलन में सही समय पर नहीं पहुंच पाएंगे, इसलिए उन्होंने स्थानीय कर्मचारियों से रास्ता पता किया और एक टैक्सी कर ली, सम्मेलन वाले शहर जाने के लिए। उनको पता था की अगली प्लाईट 10 घण्टे बाद है। टैक्सी तो मिली लेकिन ड्राइवर के बिना इसलिए उन्होंने खुद ही टैक्सी चलाने का निर्णय लिया।

जैसे ही उन्होंने यात्रा शुरु की कुछ देर बाद बहुत तेज, आंधी-तूफान शुरु हो गया। रास्ता लगभग दिखना बंद सा हो गया। इस आपा-धापी में वे गलत रास्ते की ओर मुड़ गए। लगभग दो घंटे भटकने के बाद उनको समझ आ गया कि वे रास्ता भटक गए हैं। थक तो वे गए ही थे, भूख भी उन्हें बहुत ज़ोर से लग गई थी। उस सुनसान सड़क पर भोजन की तलाश में वे गाड़ी इधर-उधर चलाने लगे। कुछ दूरी पर उनको एक झोंपड़ी दिखी।

झोंपड़ी के बिल्कुल नजदीक उन्होंने अपनी गाड़ी रोकी। परेशान से होकर गाड़ी से उतरे और उस छोटे से घर का दरवाज़ा खटखटाया। एक स्त्री ने दरवाज़ा खोला। डा. मार्क ने उन्हें अपनी स्थिति बताई और एक फोन करने की इजाजत मांगी। उस स्त्री ने बताया कि उसके यहां फोन नहीं है। फिर भी उसने उनसे कहा कि आप अंदर आइए और चाय पीजिए। मौसम थोड़ा ठीक हो जाने पर, आगे चले जाना।

भूखे, भीगे और थके हुए डाक्टर ने तुरंत हामी भर दी। उस औरत ने उन्हें बिठाया, बड़े सम्मान के साथ चाय दी व कुछ खाने को दिया। साथ ही उसने कहा, “आइए, खाने से पहले भगवान से प्रार्थना करें और उनका धन्यवाद कर दें।”

डाक्टर उस स्त्री की बात सुन कर मुस्कुरा दिेए और बोले,”मैं इन बातों पर विश्वास नहीं करता। मैं मेहनत पर विश्वास करता हूं। आप अपनी प्रार्थना कर लें।”

टेबल से चाय की चुस्कियां लेते हुए डाक्टर उस स्त्री को देखने लगे जो अपने छोटे से बच्चे के साथ प्रार्थना कर रही थी। उसने कई प्रकार की प्रार्थनाएं की। डाक्टर मार्क को लगा कि हो न हो, इस स्त्री को कुछ समस्या है। जैसे ही वह औरत अपने पूजा के स्थान से उठी, तो डाक्टर ने पूछा,”आपको भगवान से क्या चाहिेए? क्या आपको लगता है कि भगवान आपकी प्रार्थनाएं सुनेंगे?”

उस औरत ने धीमे से उदासी भरी मुस्कुराहट बिखेरते हुए कहा,”ये मेरा लड़का है और इसको एक रोग है जिसका इलाज डाक्टर मार्क नामक व्यक्ति के पास है परंतु मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैंं उन तक, उनके शहर जा सकूं क्योंकि वे दूर किसी शहर में रहते हैं। यह सच है की कि भगवान ने अभी तक मेरी किसी प्रार्थना का जवाब नहीं दिया किंतु मुझे विश्वास है कि भगवान एक न एक दिन कोई रास्ता बना ही देंगे। वे मेरा विश्वास टूटने नहीं देंगे। वे अवश्य ही मेरे बच्चे का इलाज डा. मार्क से करवा कर इसे स्वस्थ कर देंगे।”

डाक्टर मार्क तो सन्न रह गए। वे कुछ पल बोल ही नहीं पाए। आंखों में आंसू लिए धीरे से बोले,”भगवान बहुत महान हैं।”

(उन्हें सारा घटनाक्रम याद आने लगा। कैसे उन्हें सम्मेलन में जाना था। कैसे उनके जहाज को इस अंजान शहर में आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी। कैसे टैक्सी के लिए ड्राइवर नहीं मिला और वे तूफान की वजह से रास्ता भटक गए और यहां आ गए।)

वे समझ गए कि यह सब इसलिए नहीं हुआ कि भगवान को केवल इस औरत की प्रार्थना का उत्तर देना था बल्कि भगवान उन्हें भी एक मौका देना चाहते थे कि वे भौतिक जीवन में धन कमाने, प्रतिष्ठा कमाने, इत्यादि से ऊपर उठें और असहाय लोगों की सहायता करें। वे समझ गए की भगवान चाहते हैं कि मैं उन लोगों का इलाज करूं जिनके पास धन तो नहीं है किंतु जिन्हें भगवान पर विश्वास है।

मित्रों:- हर इंसान को ये ग़लतफहमी होती है की जो हो रहा है वो उस पर उसका कण्ट्रोल है और वह इन्सान ही सब कुछ कर रहा है ।।

पर अचानक ही कोई अनजानी ताकत सबकुछ बदल देती है कुछ ही सेकण्ड्स लगते हैं सबकुछ बदल जाने में फिर हम याद करते हैं भगबान को।
लष्मीकांत वर्शनय

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पंडित जी और नाविक की कहानी।


पंडित जी और नाविक की कहानी।
आज गंगा पार होनेके लिए कई लोग एक नौकामें बैठे, धीरे-धीरे नौका सवारियों के साथ सामने वाले किनारे की ओर बढ़ रही थी,एक पंडित जी भी उसमें सवार थे। पंडित जी ने नाविक से पूछा “क्या तुमने भूगोल पढ़ी है
भोला- भाला नाविक बोला “भूगोल क्या है इसका मुझे कुछ पता नहीं।
पंडितजी ने पंडिताई का प्रदर्शन करते कहा, “तुम्हारी पाव भर जिंदगी पानी में गई।
फिर पंडित जी ने दूसरा प्रश्न किया, “क्या इतिहास जानते हो? महारानी लक्ष्मीबाई कब और कहाँ हुई तथा उन्होंने कैसे लडाई की
नाविक ने अपनी अनभिज्ञता जाहिर की तो  पंडित जी ने विजयीमुद्रा में कहा “ ये भी नहीं जानते तुम्हारी तो आधी जिंदगी पानी में गई।
फिर विद्या के मद में पंडित जी ने तीसरा प्रश्न पूछा “महाभारत का भीष्म-नाविक संवाद या रामायण का केवट और भगवान श्रीराम का संवाद जानते हो
अनपढ़ नाविक क्या कहे, उसने इशारे में ना कहा, तब पंडित जी मुस्कुराते हुए बोले “तुम्हारी तो पौनी जिंदगी पानी में गई।
तभी अचानक गंगा में प्रवाह तीव्र होने लगा। नाविक ने सभी को तूफान की चेतावनी दी, और पंडितजी से पूछा “नौका तो तूफान में डूब सकती है, क्या आपको तैरना आता है
पंडित जी गभराहट में बोले “मुझे तो तैरना-वैरना नहीं आता है
नाविक ने स्थिति भांपते हुए कहा ,“तब तो समझो आपकी पूरी जिंदगी पानी में गयी। ”
कुछ ही देर में नौका पलट गई। और पंडित जी बह गए।
मित्रों ,विद्या वाद-विवाद के लिए नहीं है और ना ही दूसरों को नीचा दिखाने के लिए है। लेकिन कभी-कभी ज्ञान के अभिमान में कुछ लोग इस बात को भूल जाते हैं और दूसरों का अपमान कर बैठते हैं। याद रखिये शाश्त्रों का ज्ञान समस्याओं के समाधान में प्रयोग होना चाहिए शश्त्र बना कर हिंसा करने के लिए नहीं।
कहा भी गया है, जो पेड़ फलों से लदा होता है उसकी डालियाँ झुक जाती हैं। धन प्राप्ति होने पर सज्जनों में शालीनता आ जाती है। इसी तरह , विद्या जब विनयी के पास आती है तो वह शोभित हो जाती है। इसीलिए संस्कृत में कहा गया है , ‘विद्या विनयेन शोभते। ’