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क्रोध शमन उपचार


क्रोध शमन उपचार
क्रोध मन का एक अस्वस्थ आवेग है। जीवन में अप्रिय प्रसंग, वंचनाएं, भूलें, असावधानियां, मन-वचन-काया की त्रृटियों से, जाने अनजाने में विभिन्न दुष्करण  होते रहते है। मनोकामनाएं असीम होती है, कुछेक की पूर्ति हो जाती है और अधिकांश शेष रहती है। पूर्ति न हो पाने और संतोषवृति के अभाव में क्रोधोदय की स्थितियां उत्पन्न होती है।  क्रोध एक ऐसा आवेश है जो उठकर शीघ्र चला भी जाय, किन्तु अपने पिछे परेशानियों का अम्बार लगा जाता है। क्रोध आपके स्वभाव में घृणा भाव को स्थाई बना देता है।
क्रोध एक व्यापक रोग है। यह अपने उदय और निस्तारीकरण के मध्य क्षण मात्र का भी अवकाश नहीं देता। जबकि यही वह क्षण होता है जब विवेक को त्वरित जगाए रखना बेहद जरूरी होता है। यदपि  क्षमा, सहनशीलता और सहिष्णुता ही क्रोध  नियंत्रण के श्रेष्ठ उपाय है। तथापि क्रोध को मंद करने के लिए निम्न प्रथमोपचार कारगर हो सकते है, यथा…
1- किसी की भी गलती को कल पर टाल दो!

2- स्वयं को मामले में अनुपस्थित समझो!

3- मौन धारण करो!

4- वह स्थान कुछ समय के लिए छोड दो!

5- क्रोध क्यों आ रहा है, इस बात पर स्वयं से तर्क करो!

6- क्रोध के परिणामों पर विचार करो!
क्रोध के परिणाम –
संताप – क्रोध केवल और केवल संताप ही पैदा करता है।
अविनय – क्रोध, विनम्रता की लाश लांघ कर आता है। क्रोधावेश में व्यक्ति बद से बदतरता में भी, प्रतिपक्षी से कम नहीं उतरना चाहता।
अविवेक – क्रोध सर्वप्रथम विवेक को नष्ट करता है क्योंकि विवेक ही क्रोध की राह का प्रमुख रोडा है। यहाँ तक कि क्रोधी व्यक्ति स्वयं का हित-अहित भी नहीं सोच पाता।
असहिष्णुता – क्रोध परस्पर सौहार्द को समाप्त कर देता है। यह प्रीती को नष्ट करता है और द्वेष भाव को प्रबल बना देता है। क्रोध के लगातार सेवन से स्वभाव ही असहिष्णु बन जाता है। इस प्रकार क्रोध, वैर की अविरत परम्परा का सर्जन करता है।
उद्वेग – क्रोध उद्वेग का जनक है। आवेश, आक्रोश एवं क्रोध निस्तार से स्वयं की मानसिक शान्ति भंग होती है। जिसके परिणाम स्वरूप तनाव के संग संग, मानसिक विकृतियां भी पनपती है। इस तरह क्रोध जनित उद्वेग, अशांति और तनाव सहित, कईं शारीरिक समस्याओं को भी जन्म देता है।
पश्चाताप – क्रोध सदैव पश्चाताप पर समाप्त होता है। चाहे क्रोध के पक्ष में कितने भी सुविधाजनक तर्क रखे जाय, अन्ततः क्रोध घोर अविवेक ही साबित होता है। यह अप्रिय छवि का निर्माण करता है और अविश्वसनीय व्यक्तित्व बना देता है। अधिकांश, असंयत व्यक्ति अनभिज्ञ ही रहता है कि उसकी समस्त परेशानियों का कारण उसका अपना क्रोध है। जब मूल समझ में आता है सिवा पश्चाताप के कुछ भी शेष नहीं रहता।
क्रोध के परिणामों पर चिंतन-मनन, क्रोध शमन’ में कारगर उपचार है।

आचार्य विकास शर्मा

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Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

याज्ञवल्क्य छोड़ कर जा रहा है।


याज्ञवल्क्य छोड़ कर जा रहा है। जीवन के अंतिम दिन आ गए हैं और अब वह चाहता है कि दूर खो जाए किन्हीं पर्वतों की गुफाओं में। उसकी दो पत्नियां थीं और बहुत धन था उसके पास। वह उस समय का प्रकांड पंडित था। उसका कोई मुकाबला नहीं था पंडितों में। तर्क में उसकी प्रतिष्ठा थी। ऐसी उसकी प्रतिष्ठा थी कि कहानी है कि जनक ने एक बार एक बहुत बड़ा सम्मेलन किया और एक हजार गौएं, उनके सींग सोने से मढ़वा कर और उनके ऊपर बहुमूल्य वस्त्र डाल कर महल के द्वार पर खड़ी कर दीं और कहा: जो पंडित विवाद जीतेगा, वह इन हजार गौओं को अपने साथ ले जाने का हकदार होगा। यह पुरस्कार है।
बड़े पंडित इकट्ठे हुए। दोपहर हो गई। बड़ा विवाद चला। कुछ तय भी नहीं हो पा रहा था कि कौन जीता, कौन हारा। और तब दोपहर को याज्ञवल्क्य आया अपने शिष्यों के साथ। दरवाजे पर उसने देखा–गौएं खड़ी-खड़ी सुबह से थक गई हैं, धूप में उनका पसीना बह रहा है। उसने अपने शिष्यों को कहा, ऐसा करो, तुम गौओं को खदेड़ कर घर ले जाओ, मैं विवाद निपटा कर आता हूं।
जनक की भी हिम्मत नहीं पड़ी यह कहने की कि यह क्या हिसाब हुआ, पहले विवाद तो जीतो! किसी एकाध पंडित ने कहा कि यह तो नियम के विपरीत है–पुरस्कार पहले ही!
लेकिन याज्ञवल्क्य ने कहा, मुझे भरोसा है। तुम फिक्र न करो। विवाद तो मैं जीत ही लूंगा, विवादों में क्या रखा है! लेकिन गौएं थक गई हैं, इन पर भी कुछ ध्यान करना जरूरी है।
शिष्यों से कहा, तुम फिक्र ही मत करो, बाकी मैं निपटा लूंगा।
शिष्य गौएं खदेड़ कर घर ले गए। याज्ञवल्क्य ने विवाद बाद में जीता। पुरस्कार पहले ले लिया। बड़ी प्रतिष्ठा का व्यक्ति था। बहुत धन उसके पास था। बड़े सम्राट उसके शिष्य थे। और जब वह जाने लगा, उसकी दो पत्नियां थीं, उसने उन दोनों पत्नियों को बुला कर कहा कि आधा-आधा धन तुम्हें बांट देता हूं। बहुत है, सात पीढ़ियों तक भी चुकेगा नहीं। इसलिए तुम निश्चिंत रहो, तुम्हें कोई अड़चन न आएगी। और मैं अब जंगल जा रहा हूं। अब मेरे अंतिम दिन आ गए। अब ये अंतिम दिन मैं परमात्मा के साथ समग्रता से लीन हो जाना चाहता हूं। अब मैं कोई और दूसरा प्रपंच नहीं चाहता। एक क्षण भी मैं किसी और बात में नहीं लगाना चाहता।
एक पत्नी तो बड़ी प्रसन्न हुई, क्योंकि इतना धन था याज्ञवल्क्य के पास, उसमें से आधा मुझे मिल रहा है, अब तो मजे ही मजे करूंगी। लेकिन दूसरी पत्नी ने कहा कि इसके पहले कि आप जाएं, एक प्रश्न का उत्तर दे दें। इस धन से आपको शांति मिली? इस धन से आपको आनंद मिला? इस धन से आपको परमात्मा मिला? अगर मिल गया तो फिर कहां जाते हो? और अगर नहीं मिला तो यह कचरा मुझे क्यों पकड़ाते हो? फिर मैं भी तुम्हारे साथ चलती हूं।
और याज्ञवल्क्य जीवन में पहली बार निरुत्तर खड़ा रहा। अब इस स्त्री को क्या कहे! कहे कि नहीं मिला, तो फिर बांटने की इतनी अकड़ क्या! बड़े गौरव से बांट रहा था कि देखो इतने हीरे-जवाहरात, इतना सोना, इतने रुपये, इतनी जमीन, इतना विस्तार! बड़े गौरव से बांट रहा था। उसमें थोड़ा अहंकार तो रहा ही होगा उस क्षण में कि देखो कितना दे जा रहा हूं! किस पति ने कभी अपनी पत्नियों को इतना दिया है! लेकिन दूसरी पत्नी ने उसके सारे अहंकार पर पानी फेर दिया। उसने कहा, अगर तुम्हें इससे कुछ भी नहीं मिला तो यह कचरा हमें क्यों पकड़ाते हो? यह उलझन हमारे ऊपर क्यों डाले जाते हो? अगर तुम इससे परेशान होकर जंगल जा रहे हो तो आज नहीं कल हमें भी जाना पड़ेगा। तो कल क्यों, आज ही क्यों नहीं? मैं चलती हूं तुम्हारे साथ।
तो जो धन बांट रहा है वह क्या खाक बांट रहा है! उसके पास कुछ और मूल्यवान नहीं है। और जो ज्ञान बांट रहा है, पाठशालाएं खोल रहा है, धर्मशास्त्र समझा रहा है, अगर उसने स्वयं ध्यान और समाधि में डुबकी नहीं मारी है, तो कचरा बांट रहा है। उसका कोई मूल्य नहीं है। बांटने योग्य तो बात एक ही है: परमात्मा।

K S Saxena

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इस लेख को पढ़ते समय एक बात याद रखियेगा  ये वही “ 1962 “ था , जब आधा  हिंदुस्तान भुखमरी की  कगार पर था और चीन  हमारे सम्मान को रौंदने वाला था : 

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 जैकलीन 1962 में नौ दिन की भारत यात्रा पर आई थीं. चूँकि ये एक निजी यात्रा थी, इसलिए उन्हें सलाह दी गई कि किसी अमरीकी एयरलाइन के बजाए एयर इंडिया से भारत जाएं. उन्होंने ऐसा ही किया. उन्होंने रोम से दिल्ली के लिए एयर इंडिया की फ़्लाइट ली.उनके साथ उनकी बहन राजकुमारी ली रैद्ज़ीविल और उनकी आया प्रोवी भी भारत आई थी. 
हाँलाकि ये एक निजी यात्रा थी, लेकिन तब भी भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पालम हवाई अड्डे पर जैकलीन केनेडी के विमान का इंतज़ार कर रहे थे. विमान पालम के चक्कर पर चक्कर लगाए जा रहा था, लेकिन उतरने का नाम नहीं ले रहा था.

नेहरू ने उस समय अमरीका में भारत के राजदूत बीके नेहरू से कहा कि पता लगाएं कि माजरा क्या है.

बीके नेहरू अपनी आत्मकथा ‘नाइस गाइज़ फ़िनिश सेकेंड’ में लिखते हैं, “मैंने प्रधानमंत्री को बताया कि जहाज़ के न उतरने का कारण ये है कि जैकलीन ने अपना मेकअप पूरा नहीं किया है. नेहरू को थोड़ा अचरज हुआ और वो थोड़ा मुस्कराए. मैंने उनसे कहा कि अमरीका की इस प्रथम महिला को प्रोटोकॉल वगैरह की परवाह नहीं है. उनके लिए सुंदर दीखना, समय पर पहुंचने से ज़्यादा महत्वपूर्ण है.”

बहरहाल जैकलीन उतरी और नेहरू ने गुलदस्तों से उनका स्वागत किया. पालम से तीनमूर्ति निवास तक के पूरे रास्ते में हज़ारों लोग जैकलीन कैनेडी के स्वागत में सड़कों के दोनों ओर खड़े थे. उनमें बहुत से लोग अपनी बैलगाड़ियों में ‘अमरीका की इस महारानी’ के दर्शन करने आए थे.

अमरीकी दूतावास पहुंचने के थोड़ी देर बाद भारत में अमरीकी राजदूत केन गालब्रेथ ने बीके नेहरू से कहा कि जैकलीन चाहती हैं कि भारत में वो जहाँ भी जाएं, आप उनके साथ चलें. इस तरह बीके नेहरू अपने ही देश में विदेशी राजदूत के मेहमान के मेहमान बन गए.

जैकलीन और उनकी बहन ने पहली रात प्रधानमंत्री निवास में बिताई. नेहरू ने उनके सम्मान में ज़बरदस्त भोज दिया. खाना जल्दी ख़त्म हो गया और इन दोनों के पास अपने अपने कमरों में जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहा. तभी परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष होमी भाभा ने सलाह दी कि आप हमारे साथ नाचती क्यों नहीं.

जैकलीन की बहन ली तो इसके लिए फ़ौरन तैयार हो गई लेकिन जैकलीन थोड़ा झिझक रही थीं. बीके नेहरू और भाभा ने जैकलीन को उनके कमरे में छोड़ा और ली के साथ उस समय के दिल्ली के बेहतरीन होटल इंपीरियल के ‘द टैवर्न’ में डांस करने चले गए.

अगले दिन जैकलीन और उनकी बहन ली, केन और किटी गालब्रेथ, बीके नेहरू और विदेश मंत्रालय की एक अधिकारी सूनू कपाडिया जिन्हें जैकलीन का लियाज़ां अफ़सर बनाया गया था, एक विशेष रेलगाड़ी से आगरा के लिए रवाना हुए.

रेलवे बोर्ड ने जैकलीन के लिए भारत में उपलब्ध बेहतरीन रेल सैलून का बंदोबस्त किया था. खाने और वाइन का भी अच्छा प्रबंध था. जैकलीन को ये सब बहुत अच्छा लग रहा था, क्योंकि अमरीका में वो विमान से उड़ने की आदी थी और अर्से बाद वो ट्रेन से सफ़र कर रही थीं. जैकलीन ने फ़तहपुर सीकरी का अकबर का महल और ताज महल देखा. अगले दिन उन्हें विमान से अपनी यात्रा जारी रखनी थी, लेकिन जैकलीन ने इच्छा प्रकट की कि वो यहाँ से वाराणसी जाना चाहेंगी और वो भी ट्रेन से.

नेहरू लिखते हैं, “सूनू मेरे पास दौड़ी दौड़ी आईं और पूछने लगी कि क्या इतने कम नोटिस पर वाराणसी की यात्रा आयोजित की जा सकती है. मैंने रेलवे बोर्ड के चेयरमैन करनैल सिंह को फ़ोन मिलाया. उन्होंने आनन फानन में इसकी व्यवस्था कराई और हम सब लोग ट्रेन से वाराणसी के लिए रवाना हो गए. लेकिन अपने उत्साह में मैं इसके बारे में विदेश मंत्रालय को बताना भूल गया. दिल्ली वापस लौटने पर मुझे इस बात की डांट पिलाई गई कि मैंने अमरीका के राष्ट्रपति की पत्नी की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किया है.”

वाराणसी से जैकी उदयपुर गईं जहाँ महाराणा के महल में दो रातें रूकी. महल इतना भव्य था कि जैकी ने अपने पति को चिट्ठी लिख कर कहा कि इसके एक विंग में पूरा का पूरा व्हाइट हाउस समा जाएगा.

जैकलीन का अगला पड़ाव जयपुर था. महाराजा जयपुर और महारानी गायत्री देवी दोनों जैकलीन की बहन ली रैद्ज़ीविल के निजी दोस्त थे.

उन्होंने दोनों मेहमानों को न्योता दिया था कि वो दोनों बहनें उनके साथ ही ठहरें और दोनों इसके लिए राज़ी भी थीं. लेकिन राज्य सरकार को इस पर ऐतराज़ था. कारण ये था कि उस समय राज्य सरकार और महाराजा के बीच उनके अधिकारों को ले कर एक तरह की जंग छिड़ी हुई थी.

सरकार को इस बात पर आपत्ति थी कि अगर अमरीका के राष्ट्रपति की पत्नी राज भवन के बजाए महाराजा के साथ रूकती हैं तो इससे उनके रसूख में वृद्धि होगी. जैकलीन का तर्क ये था कि ये एक निजी यात्रा है और भारत सरकार को कोई अधिकार नहीं है कि वो ये तय करे कि उन्हें रहना कहाँ है. व्हाइट हाउस और भारत सरकार के बीच चले कई संवादों के बाद बीच का रास्ता ये निकाला गया कि जैकलीन एक रात राज भवन में रूकेंगी और फिर दो रातों के ले महाराजा के महल में चली जाएंगी.

उस समय गुरुमुख निहाल सिंह राजस्थान के राज्यपाल हुआ करते थे. वो स्वतंत्रता सेनानी थे. शालीन और विनम्र भी थे. लेकिन उनमें इस पद के लिए ज़रूरी लालित्य और स्टाइल का अभाव था.

दिल्ली लौटने पर मुख्य समारोह अमरीकी राजदूत के यहाँ था. उन्होंने एक रात्रि भोज का आयोजन किया था जिसमें प्रधानमंत्री नेहरू भी शामिल हुए थे.

अगला दिन जैकलीन कैनेडी की भारत यात्रा का अंतिम दिन था और संयोग से उस दिन होली थी. हवाई अड्डे जाने से पहले जैकलीन नेहरू को गुड बाई कहने उनके निवास स्थान तीनमूर्ति भवन गईं.

उन्होंने हमेशा की तरह काफ़ी फ़ैशनेबल कपड़े पहन रखे थे. अमरीकी राजदूत गालब्रैथ को होली के बारे में पता था, इसलिए वो कुर्ता पायजामा पहन कर आए थे.

बीके नेहरू लिखते हैं, “मैंने भी होली के मिज़ाज के ख़िलाफ़ लाउंज सूट पहन रखा था. मुझे पता था कि नेहरू होली खेलने के शैकीन थे. जैसे ही जैकलीन पहुंची, एक चाँदी की ट्रे में छोटी छोटी कटोरियों में कई रंगों के गुलाल उनके सामने लाए गए. नेहरू ने जैकलीन के माथे पर गुलाल का टीका लगाया. उन्होंने भी नेहरू के माथे पर टीका लगा दिया. वहाँ मौजूद इंदिरा गांधी ने भी यही किया.”

“लेकिन जब मेरी बारी आई तो मैंने एक मुट्ठी भर हरा गुलाल ले कर जैकलीन की पूरी नाक रंग दी. जैकलीन पहले ही नेहरू से कह चुकी थी कि मुझे उस दिन इन कपड़ो में नहीं आना चाहिए था और गालब्रेथ की तरह ही कपड़े पहनने चाहिए थे. जैसे ही मैंने जैकलीन को रंग लगाया, वो बोली मैं आपको सबक सिखाती हूँ. उन्होंने हरे गुलाल की पूरी कटोरी उठा कर मेरे सूट पर पलट दी.”

रंग गीले नहीं थे, इसलिए बी के नेहरू का सूट ख़राब नहीं हुआ. थोड़े पानी की मदद से जैकलीन का चेहरा और बीके नेहरू का सूट दोनों साफ़ हो गए. उन्होंने अमरीकी राजदूत गालब्रेथ के साथ पालम हवाई अड्डे पर जैकलीन कैनेडी को विदाई दी

दुर्गेश दुबे

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नोबेल पुरस्कार विजेता स्पेनिश कवि पाब्लो नेरुदा की कविता  “You  Start  Dying  Slowly” का हिन्दी अनुवाद…
1) #आप_धीरे_धीरे_मरने_लगते_हैं_अगर_आप :

– करते नहीं कोई यात्रा,

– पढ़ते नहीं कोई किताब,

– सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,

– करते नहीं किसी की तारीफ़।
2) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, जब आप :

– मार डालते हैं अपना स्वाभिमान,

– नहीं करने देते मदद अपनी और न ही करते हैं मदद दूसरों की।
3) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप :

– बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के, 

– चलते हैं रोज़ उन्हीं रोज़ वाले रास्तों पे,

– नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार,

– नहीं पहनते हैं अलग-अलग रंग, या

– आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान।
4) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप :

– नहीं महसूस करना चाहते आवेगों को, और उनसे जुड़ी अशांत भावनाओं को, वे जिनसे नम होती हों आपकी आँखें, और करती हों तेज़ आपकी धड़कनों को।
5) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप :

– नहीं बदल सकते हों अपनी ज़िन्दगी को, जब हों आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से,

– अग़र आप अनिश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हों निश्चित को,

– अगर आप नहीं करते हों पीछा किसी स्वप्न का,

– अगर आप नहीं देते हों इजाज़त खुद को, अपने जीवन में कम से कम एक बार, किसी समझदार सलाह से दूर भाग जाने की…।

#तब_आप_धीरे_धीरे_मरने_लगते_हैं…!!!”

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पाणिनी के पकवान

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पाणिनी ने तक्षशिला और कंधार से लेकर कामरूप और इधर विन्ध्याचल से ऊपर के भारत का पैदल भ्रमण करके उस समय प्रचलित शब्दों को एकत्रित किया था। बाद में इनका वर्गीकरण किया और एक मानक कोश की रचना की। यही कारण है कि पाणिनी का “अष्‍टाध्‍यायी” केवल एक व्याकरण ग्रंथ ही नहीं है, उसमें तत्कालीन भारतीय समाज के लोकाचार के अनेक वर्णन मिलते हैं। 
किंतु मेरे जैसे “भोजन-भट” के लिए विशेष रुचि का विषय है पाणि‍नी द्वारा “अष्‍टाध्‍यायी” में किया गया विभिन्‍न पकवानों का वर्णन। आज से ढाई हज़ार साल पहले भारतभूमि पर क्या पकवान पकाए जाते थे, भोजन-प्रबंध की क्या रीति थी, पर्व, उत्सव, सत्कार के क्या व्यंजन थे, इस सबका रसवंत विवरण उसमें प्राप्त होता है।
उदाहरण के तौर पर, पाणिनी ने लिखा है कि उत्‍तरी राजस्‍थान के साल्‍व जनपद में “यवागू” (जौ की लपसी) खाने की प्रथा थी। जौ को ओखल में कूटकर पानी में उबाला जाता और फिर दूध-शकर मिलाकर “यावक” नामक व्‍यंजन बनाया जाता। सत्‍तू को पानी में घोलकर नमक डालकर सेंका जाता, तो “पिष्‍टक” बनकर तैयार हो जाता। आज इसे ही “पीठा” कहते हैं। 
पाणिनी के काल में हलवे को “संयाव” कहा जाता था। मालपुए “अपूप” कहलाते थे। सनद रहे कि “अपूप'” हमारे देश की सबसे प्राचीन मिठाई है और ऋग्‍वेद में भी घृतवंत अपूपों का वर्णन है। पाणिनी के युग में पूरन भरे अपूप ब्‍याह-बारात, तीज-त्‍योहार पर ख़ूब बनाए जाते थे।
पाणिनी के काल में उन सभी खाद्य पदार्थों को “दाधिक” कहा जाता था, जिनमें या तो दही का उपयोग हुआ है या जो दही से बने हैं, लेकिन पाणिनी ने इन “दाधिकों” को अलग-अलग विश्‍लेषित किया है। मिसाल के तौर पर यदि दही के साथ पूरियां खाई जाएं तो वे उसे “दध्‍ना संसृष्‍टं” कहते थे, यदि दही में पकौड़ी भिगो दी जाए तो वह “दध्‍ना उपसिक्‍तम्” कहलाती थी। इसे ही आज “दहीबड़ा” कहा जाता है। और यदि दही के साथ आलू पकाए जाएं तो उस व्‍यंजन का नामकरण पाणिनी ने “दध्‍ना संस्‍कृतं” किया है।
पाणिनी के काल में पच्‍चीस मन का बोझ “आचित” कहलाता था और जो रसोइया इतने अन्‍न का प्रबंध संभाल सके, उसे “आचितक” कहते थे। पाणिनी ने छह प्रकार के धान का भी उल्‍लेख किया है : “ब्रीहि”, “शालि”, “महाब्रीहि”, “हायन”, “षष्टिका” और “नीवार”। साथ ही “मैरेय”, “कापिशायन”, “अवदातिका कषाय”, “कालिका” नामक मादक पदार्थों का भी “अष्‍टाध्‍यायी” में उल्‍लेख है।
दलित चिंतक कांचा एलैया ने कटाक्ष करते हुए कहा था कि किसान की भाषा में तकनीकी शब्दों की भरमार होती है और पंडित के लोक में खाने पीने की चीज़ों की। क्यूंकि पंडित पेटू होता है जबकि किसान श्रमजीवी होता है। एलैया जी को यह जानकर संतोष होना चाहिए कि अगर आचार्य विद्यानिवास मिश्र की “हिंदी की शब्द संपदा” में पूरे ग्यारह अध्याय खेती-किसानी से जुड़े परंपरागत और पारिभाषिक शब्दों पर एकाग्र हैं तो महापंडित पाणिनी ने भी खेती-किसानी से जुड़े लोक-व्यवहार के शब्दों का “अष्‍टाध्‍यायी” में दत्तचित्त होकर संकलन किया है।
अस्तु, पाणिनी ने किसानों का वर्गीकरण उनके द्वारा प्रयुक्‍त हलों के आधार पर किया है। “अहलि”, जिसके पास अपना कोई हल न हो। “दुर्हलि”, जिसका हल पुराना हो गया हो। और “सुहल”, जिसके पास बढ़ि‍या हल हो। ऐसे ही “सुहल” किसानों के लिए कात्‍यायन ने आशीर्वादपरक वाक्‍य लिखा है : “स्‍वस्ति भवते सहलाय।”
पाणिनी के यहां हलों के भी तीन भाग वर्णित हैं : “ईषा”, “पौत्र” और “कुशी”। हल खींचने वाले बैल “हालिक” या “सैरिक” कहे जाते थे। बैलों के गले में डाली जाने वाली जोत की रस्‍सी “यौत्र” कहलाती थी। खेती के कुछ प्रमुख औज़ारों में शामिल थे : “खनित्र” यानी कुदाल, “आखन” यानी खुरपा, “दात्र” यानी हंसिया, “तोत्र” यानी चाबुक इत्‍यादि।
उस काल में खेतों के नाम उसमें बोई जाने वाली फ़सल के नाम पर रखे जाते थे : जैसे “ब्रेहेय” यानी धान का खेत। “शालेय” यानी जड़हन का खेत। “यव्‍य” यानी जौ का खेत। “तिल्‍य” यानी तिल का खेत। “माष्‍य” यानी उड़द का खेत। “उम्‍य” यानी अलसी का खेत। खेतों का नामकरण बीज की तौल के आधार पर किया गया है, जैसे “प्रास्थिक” यानी ढाई पाव बीज बोने लायक़ खेत, “द्रौणिक” यानी दस सेर बीज बोने लायक़ खेत इत्‍यादि।
और आज जो फ़सलें रबी-खरीफ़ कहलाती हैं, पाणिनी के काल में “ग्रैष्‍मक” और “वासंतक” कहलाती थी। वहीं हरी फ़सल को “शस्‍य” और पकी फ़सल को “मुष्टि” कहा जाता था।
पाणिनी के विषय में कहा जाता है : “महती सूक्ष्मेक्षिका वर्तते सूत्रकारस्य” यानी वैयाकरण पाणिनी की दृष्ट‍ि अत्यंत पैनी है। पाणिनी के वर्गीकरणों का इतना महत्व है कि कालांतर में भाषा के जो प्रयोग “अष्‍टाध्‍यायी” के निकष पर खरे नहीं उतरे हैं, उन्हें “अपाणिनीय” कहकर अशुद्ध घोषित कर दिया जाने लगा। कहा जाता है कि पाणिनि के सूत्र में एक भी शब्द अनर्थक नहीं है। यह अकारण नहीं है कि सहसा इधर पाणिनी पश्च‍िमी भाषाशास्त्र‍ियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए हैं, एक हम भारतीयों को ही आज उनके बारे में बात करने में भी लज्जा आती है।

Posted in ઉત્સવ

पृथ्वी के नाना रूप और वर्जनाएं

#आनंद_का_आषाढ़ 
विक्रमीय संवत्सर में आषाढ़ मास की कई परंपराएं प्राचीन स्मृतियों की संधारक है और उन मान्यताओं का बने रहना विश्वास से कहीं अधिक वैज्ञानिक भी हो सकता है। जेठ के समापन और आषाढ़ के आरंभ के 3-3 दिन पृथ्वी के ऋतुमती होने के माने जाते हैं। यह मत मुनि पराशर का है जिनका कृषि शास्त्र पुष्कर से लेकर उदयगिरि तक पालनीय रहा है। 
प्राचीन काल में ये छह दिन इतने खास माने गए थे कि औजार लेकर कोई भी खुदाई करने खेत की ओर नहीं जाता और न ही बीजों की बुवाई करता। पराशर के शास्त्र में कहा है कि एेसी चेष्टा करने वाला पाप से नष्ट हो जाता है :
वृषान्ते मिथुनादौ च त्रिण्यहानि रजस्वला। 

बीजं न वापयेत्तत्र जन: पापाद् विनश्यति।।
देवी भागवत, जिसमें मध्यकालीन परंपराएं प्रचुरता लिए हैं, में “अंबुवाची योग” के नाम से भूमि के अस्पर्श होने की धारणा मिलती है। हालांकि, यहां आर्द्रा नक्षत्र के प्रथम चरण को गिना गया है लेकिन यह साफ तौर पर कह दिया गया है कि इस अवधि में जो पृथ्वी को खोदते हैं, वे ब्रह्महत्या के भागी होते हैं। वे मरकर भी चार युगों तक कीट के कांटे वाले नरक में रहते हैं। 
लगता है कि एक तरह से यह विचार एक धर्मशास्त्रीय निर्देश के रूप में है क्योंकि पुराणकार दो बार यह मत जोर देकर लिखा है। (९, १०, १४ व ९, ३४, ४८) स्पष्टत: यह परंपरा उत्तरी भारत में रही क्योंकि पुराणकार यह भी संकेत करता है : अंबुवाच्यां भूखननं जलशौचादिकं च ये। कुर्वन्ति भारते वर्षे ब्रह्महत्यां लभन्ति ते।। (४८) 
यही नहीं, पराशर ने भी यह मत दोहराया है : 
मृगशिरसि निवृत्ते रौद्रपादेऽम्बुवाची। 

भवति ऋतुमती क्ष्मा वर्जयेत् त्रीण्यहानी।। (१७६)
आषाढ़ की अन्य वर्जनाओं में भूमि का कीचड़मय होना भी है : आषाढे कर्दमान्विता। बारिश होते ही भूमि कर्दमी हो जाती है और फिर तत्काल, बगैर तैयारी बुवाई लाभकारी नहीं होती। एेसे में तैयारी करके ही बीजों को स्पर्श करने का मत है।
है न आषाढ़ की अनूठी परंपराएं और मान्यताएं ! इनका विकास किसी एक काल की देन नहीं है लेकिन इनसे यह भी तो जाहिर होता है कि कृषि की ये गूढ़ बातें आदमी से पहले औरतों ने जानी होंगी और बहुत परखी होंगी तभी औरों ने मानी होंगी।

जय जय।
बारिश के पूर्वानुमान का मास : आषाढ़

#आनंद_का_आषाढ़
ज्येष्ठ के बाद आषाढ़ मास को बारिश के योग परीक्षण का अवसर माना गया है। ज्योतिर्विदों ने ज्येष्ठ पूर्णिमा के बाद पूर्वाषाढ़ा आदि 27 नक्षत्रों यानी लगभग इतने ही दिनों तक बारिश कैसी और कब होती है, उसके अनुसार वर्षाकाल पर विचार करना अभीष्ट माना है। 
यूं तो पूर्वकाल में बारिश के हाल को जानने और बताने की दैवज्ञों में दीवानगी ही थी। वे मेघ गर्भधारण से लेकर उनके 195 दिन तक पकने और बरसने पर चातक की तरह ध्यान लगाए रखते थे और अपनी बात को सच्ची सिद्ध करने को कमर बांधे रखते थे। यदि वराहमिहिर की माने तो बारिश के हाल के अध्ययन के लिए तब तक गर्ग, पराशर, काश्यप और वज्रादि के शास्त्र और उनके निर्देश कंठस्थ होते थे और दैवज्ञ दिन-रात मेघों पर ध्यान लगाए रहते थे जिनके लिए वराहमिहिर ने ‘विहितचित्त द्युनिशो” कहा है। 
एेसे मानसून अध्येता वराह के इलाके से लेकर मेवाड़ तक आज भी इक्का-दुक्का मिल जाते हैं और ‘गरभी’ कहे जाते हैं जिनमें कुछ के तुक्का तीर की तरह लग भी जाते हैं। हालांकि वे वराह जैसे शास्त्र नहीं पढ़े होंगे।
आषाढ़ में नक्षत्रों के अनुसार भी कितनी और कहां बारिश होती है, इसके अनुसार आने वाले वर्षणकाल में कहां कितना पानी गिरेगा ? यह कहने की रोचक परंपरा रही है। कश्यप ने एक प्रदेश में ही पर्याप्त वर्षा के आधार पर अच्छी वर्षा की गणना की बात कही तो देवल ने 10 योजन तक बारिश को अनुमान का आधार बनाने का विचार दिया। गर्ग, वसिष्ठ व पराशर ने 12 योजन तक वृष्टि होने पर वर्षाकाल में उत्तम बरसात बताई। इस प्रकार तीन तरह की धारणाएं 6वीं सदी तक थीं और वराह ने इनका न केवल अनुसरण किया बल्कि उन मतों काे यथारूप महत्व भी दिया। बृहत्संहिता ही नहीं, समाससंहिता और पंचसिद्धांतिका में ये विश्वास जनहित में प्रस्तुत किए।
ये विचार प्रवर्षणकाल को लेकर लिखे गए और आषाढ़ मास यह कालावधि है : 
आषाढादिषु वृृष्टेषु योजन द्वादशात्मके।

प्रवृष्टे शोभनं वर्षं वर्षाकाले विनिर्दिशेत्।। (गर्गसंहिता प्रवर्षणाध्याय)
हां, यह भी आषाढ़ के प्रवर्षण नक्षत्र की बढ़ाई वाली बात ये है कि वही नक्षत्र प्रसव काल में भी बरसता है। तो है न आषाढ़ आनंददायी ! बहुत कुछ बता और सीखा सकता है लेकिन कब, जबकि हम ध्यान लगाए रहें। हां, इस संबंध में कुछ अपना अनुभव भी हो तो बताइयेगा। 
अाषाढ़ : वर्षा योग पर विचार के दिन
हमारे यहां ज्‍येष्‍ठ की पूर्णिमा के बीतने और आषाढ़ लगने पर जिस भी नक्षत्र में बारिश होती, उस के आधार पर पूरे चौमासे में वर्षा की न्‍यू‍नाधिकता का अनुमान लगाया जाता था। यह वर्षा संबंधी नक्षत्रों में बारिश का समय 27 दिन की अवधि का ‘प्रवर्षण काल’ के नाम से जाना जाता था। गर्गसंहिता, जो अब विलुप्‍त हो चुकी है (श्रीकृष्‍ण चरित्र वाली 16वीं सदी की वर्तमान में उपलब्‍ध रचना से अलग, संभवत: शुंगकाल में लिखित गर्गसंहिता) में यही कहा गया है कि ज्‍येष्‍ठ के बीत जाने पर प्रतिपदा तिथि से आगे की तिथियों पर, मूल नक्षत्र को छोड़कर परिवेश में होने वाले निमित्‍तों को देखकर वर्षा का अनुमान किया जाना चाहिए। गर्ग संहिता का यह श्‍लोक वराहमिहिर की बृहत्‍संहिता की भटोत्‍पलीय विवृत्ति में उपलब्‍ध है – 
ज्‍येष्‍ठे मूलमतिक्रम्‍य मासि प्रतिपदग्रत:। 

वर्षासु वृष्टिज्ञानार्थं निमित्‍तान्‍युपलक्षयेत्।।
बाद में, इसके साथ पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र के अनुसार वर्षाफल देखने की परंपरा जुड़ी क्‍योंकि तब तक यह मान लिया गया था कि पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र वर्षा का अनुमान देने वाला नक्षत्र है। उस समय एक हाथ के बराबर व्‍यास वाले और एक हाथ गहरे गोलाकार कुण्‍ड से जल का मापन किया जाता था। इसमें करीब 50 पल प्रमाण जल जमा होता था। यह 50 पल एक आढ़क (करीब 4 किलो) कहा जाता था और 4 आढ़क के बराबर एक द्रोण होता था। 
वराहमिहिर सिद्ध करते हैं कि उनसे पहले जिन दैवज्ञों, मुनियों ने वर्षा के अनुमान के लिए अपनी धारणाएं दी थी, वे कश्‍यप, देवल और गर्ग थे। कश्‍यप मुनि का मानना था कि जिस प्रदेश में प्रवर्षण काल में बारिश होती, तो वह पूरे देश के लिए विचारणीय होती थी। देवल कहते थे कि इस काल में यदि दस योजन तक बारिश हो तो उत्‍तम बारिश होती है और गर्ग, वसिष्‍ठ व पराशर मानते थे कि 12 योजन तक किसी नक्षत्र में बारिश हो जाए तो बेहतर वृष्टि जाननी चाहिए। यह भी विचार था कि प्रवर्षण काल में पूर्वाषाढ़ा आदि जिस किसी नक्षत्र में बारिश होती है, प्रसव काल में उसी नक्षत्र में फिर बरसात होती है और यदि न हो तो प्रसव काल में भी सूखा ही रहता है।
प्रवर्षण काल में हस्‍त, पूर्वाषाढ़ा, मृगशिरा, चित्रा, रेवती या धनिष्‍ठा नक्षत्र में बरसात हो तो पूरे सोलह द्रोण बारिश होती है… ऐसे कई अनुमान हैं जो अनुभव आधारित रहे हैं। उस काल का अपना वर्षा विज्ञान था। मयूरचित्रकम्, संवत्‍सरफलम्, घाघ भड्डरी, डाक वचनार, गुरु‍संहिता, काश्‍यपीय महासंहिता, कृषि पराशर, गार्गिसंहिता आदि में ढेर सारे प्रमाण दिए गए हैं।* यानी कि यह विषय बहुत महत्वपूर्ण है।
जय जय।

– डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू’
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* परिमल पब्लिकेशंस, 27-28 शक्तिनगर, दिल्‍ली से आई डाॅ. अनुभूति चौहान संपादित ‘वृष्टिविज्ञान’ में भी इस संबंध में विशेष विमर्श है।

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70 साल हो गए कोई भारतीय PM इजराइल नहीं आया, मेरे मित्र मोदी आएंगे : बेंजामिन नेतन्याहू                                                  अभी जो आप नीचे पढ़ने वाले है, हो सकता है आपको जानकर बहुत गुस्सा आये आप यकीन न कर पाएं पर ये चीजें सच है अगर एक सवाल किया जाये कि भारत का इस दुनिया में सबसे करीबी मित्र देश कौन सा है तो फटाक से आपके मुँह से इजराइल का नाम निकल आएगा !  1999 में कारगिल युद्ध हो रहा था, दुश्मन पहाड़ी के ऊपर था भारत के पास लेजर गाइडेड मिसाइल नहीं थे, रूस ने भी नहीं दिया और न ही अमरीका ने , इजराइल ने हमे लेजर गाइडेड मिसाइल दिया, अमेरिका के ऐतराज़ के बाबजूद दिया, और हमने उसका इस्तेमाल किया इजराइल भारत का सबसे करीबी मित्र रहा है, पर आपको हम बताएं कि 1947 से आजतक भारत का कोई भी प्रधानमंत्री इजराइल कभी गया ही नहीं तो आपको शायद यकीन न हो, अरे आजतक कोई प्रधानमंत्री इजराइल गया ही नहीं देखिये इजराइल प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के ऑफिस के आधिकारिक ट्वीट्स — बैंजामिन नेतन्याहू ने कहा, “मेरे मित्र मोदी अगले हफ्ते इजराइल आ रहे हैं, ये एक ऐतहासिक यात्रा है, 70 साल हो गए पर आजतक कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री इजराइल नहीं आया, मोदी आ रहे हैं”, मोदी अभी अमरीका की यात्रा पर है, वहां से नीदरलैंड और इजराइल की यात्रा है आप देख रहे है इजराइल के प्रधानमंत्री ने क्या बोला है, उन्होंने हमारे देश के सेकुलरिज्म की पोल खोल दी है इजराइल भारत का सबसे करीबी मित्र है, युद्ध के समय भारत का साथ देने वाला मित्र और आजतक कोई भारतीय प्रधानमंत्री इजराइल ही नहीं गया क्यों नहीं गया उसका कारण देखिये कोई भी प्रधानमंत्री  इजराइल नहीं गया क्यूंकि इस से भारत में मुस्लिम नाराज हो सकते है क्यूंकि मुस्लिमो की आस्था फिलिस्तीन में है, इजराइल से नफरत करते है, और हमारे वोट बैंक वाले प्रधानमंत्रियों ने इसी कारण कभी इजराइल की यात्रा की ही नहीं हमारे देश के नेताओं ने भारत का लाभ नहीं बल्कि वोटबैंक देखा, देशहित से अधिक वरीयता तुष्टिकरण को दी नरेंद्र मोदी ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने तुष्टिकरण को नहीं बल्कि भारत को वरीयता दी, इजराइल से भारत की करीबी का साफ़ मतलब है भारत का फायदा क्यूं कि इजराइल दुनिया में युद्ध तकनीक में नंबर 1 है हम एक बात आज पक्के दावे से कह सकते है नरेंद्र मोदी भारत के आज तक के सबसे सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री हैं, और ये चीज अब स्पष्ट हो चुकी है क्यूंकि पहले के प्रधानमंत्री ( लाल बहादुर शास्त्री को छोड़कर क्योंकि उनको इतना समय नहीं मिला था ) वोटबैंक के सामने देशहित की अवहेलना करते रहे, पर मोदी ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने तुष्टिकरण नहीं बल्कि देशहित को वरीयता दी !!
गोविंद दिक्सित