Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

अमृतसर में हिन्दुओ और सिखों की लाशों से भरी ट्रैन आती थी लिखा रहता था, “ये आज़ादी का नजराना”  


अमृतसर में हिन्दुओ और सिखों की लाशों से भरी ट्रैन आती थी लिखा रहता था, “ये आज़ादी का नजराना”
 http://www.dainikbharat.org/2017/06/blog-post_958.html
पहली ट्रेन पाकिस्तान से (15.8.1947)😢
अमृतसर का लाल इंटो वाला रेलवे स्टेशन अच्छा खासा शरणार्थियों कैम्प बना हुआ था । पंजाब के पाकिस्तानी हिस्से से भागकर आये हुए हज़ारों हिन्दुओ-सिखों को यहाँ से दूसरे ठिकानों पर भेजा जाता था ! वे धर्मशालाओं में टिकट की खिड़की के पास, प्लेट फार्मों पर भीड़ लगाये अपने खोये हुए मित्रों और रिश्तेदारों को हर आने वाली गाड़ी मै खोजते थे…
15 अगस्त 1947 को तीसरे पहर के बाद स्टेशन मास्टर छैनी सिंह अपनी नीली टोपी और हाथ में सधी हुई लाल झंडी का सारा रौब दिखाते हुए पागलों की तरह रोती-बिलखती भीड़ को चीरकर आगे बढे…थोड़ी ही देर में 10 डाउन, पंजाब मेल के पहुँचने पर जो द्रश्य सामने आने वाला था,उसके लिये वे पूरी तरह तैयार थे….मर्द और औरतें थर्ड क्लास के धूल से भरे पीले रंग के डिब्बों की और झपट पडेंगे और बौखलाए हुए उस भीड़ में किसी ऐसे बच्चे को खोजेंगे, जिसे भागने की जल्दी में पीछे छोड़ आये थे !
चिल्ला चिल्ला कर लोगों के नाम पुकारेंगे और व्यथा और उन्माद से विहल होकर भीड़ में एक दूसरे को ढकेलकर-रौंदकर आगे बढ़ जाने का प्रयास करेंगे ! आँखो में आँसू भरे हुए एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे तक भाग भाग कर अपने किसी खोये हुए रिश्तेदार का नाम पुकारेंगे! अपने गाँव के किसी आदमी को खोजेंगे कि शायद कोई समाचार लाया हो ! आवश्यक सामग्री के ढेर पर बैठा कोई माँ बाप से बिछडा हुआ कोई बच्चा रो रह होगा, इस भगदड़ के दौरान पैदा होने वाले किसी बच्चे को उसकी माँ इस भीड़-भाड़ के बीच अपना ढूध पिलाने की कोशिश कर रही होगी….
स्टेशन मास्टर ने प्लेट फार्म एक सिरे पर खड़े होकर लाल झंडी दिखा ट्रेन रुकवाई ….जैसे ही वह फौलादी दैत्याकार गाड़ी रुकी, छैनी सिंह ने एक विचित्र द्रश्य देखा..चार हथियार बंद सिपाही, उदास चेहरे वाले इंजन ड्राइवर के पास अपनी बंदूकें सम्भाले खड़े थे !! जब भाप की सीटी और ब्रेको के रगड़ने की कर्कश आवाज बंद हुई तो स्टेशन मास्टर को लगा की कोई बहुत बड़ी गड़बड़ है…प्लेट फार्म पर खचाखच भरी भीड़ को मानो साँप सुंघ गया हो..उनकी आँखो के सामने जो द्रश्य था उसे देखकर वह सन्नाटे में आ गये थे !
स्टेशन मास्टर छेनी सिंह आठ डिब्बों की लाहौर से आई उस गाड़ी को आँखे फाड़े घूर रहे थे! हर डिब्बे की सारी खिड़कियां खुली हुई थी, लेकिन उनमें से किसी के पास कोई चेहरा झाँकता हुआ दिखाई नहीँ दे रहा था, एक भी दरवाजा नहीँ खुला.. एक भी आदमी नीचे नहीँ उतरा,उस गाड़ी में इंसान नहीँ #भूत आये थे..स्टेशन मास्टर ने आगे बढ़कर एक झटके के साथ पहले डिब्बे के द्वार खोला और अंदर गये..एक सेकिंड में उनकी समझ में आ गया कि उस रात न.10 डाउन पंजाब मेल से एक भी शरणार्थी क्यों नही उतरा था..
वह भूतों की नहीँ बल्कि #लाशों की गाड़ी थी..उनके सामने डिब्बे के फर्श पर इंसानी कटे-फटे जिस्मों का ढेर लगा हुआ था..किसी का गला कटा हुआ था.किसी की खोपडी चकनाचूर थी ! किसी की आते बाहर निकल आई थी…डिब्बों के आने जाने वाले रास्ते मे कटे हुए हाथ-टांगे और धड़ इधर उधर बिखरे पड़े थे..इंसानों के उस भयानक ढेर के बीच से छैनी सिंह को अचानक किसी की घुटी.घुटी आवाज सुनाई दी !
यह सोचकर की उनमें से शायद कोई जिन्दा बच गया हो उन्होने जोर से आवाज़ लगाई.. “अमृतसर आ गया है यहाँ सब हिंदू और सिख है. पुलिस मौजूद है, डरो नहीँ”..उनके ये शब्द सुनकर कुछ मुरदे हिलने डुलने लगे..इसके बाद छैनी सिंह ने जो द्रश्य देखा वह उनके दिमाग पर एक भयानक स्वप्न की तरह हमेशा के लिये अंकित हो गया …एक स्त्री ने अपने पास पड़ा हुआ अपने पति का ‘कटा सर’ उठाया और उसे अपने सीने से दबोच कर चीखें मारकर रोने लगी…
उन्होंने बच्चों को अपनी मरी हुई माओ के सीने से चिपट्कर रोते बिलखते देखा..कोई मर्द लाशों के ढेर में से किसी बच्चे की लाश निकालकर उसे फटी फटी आँखों से देख रहा था..जब प्लेट फार्म पर जमा भीड़ को आभास हुआ कि हुआ क्या है तो उन्माद की लहर दौड़ गयी…
स्टेशन मास्टर का सारा शरीर सुन्न पड़ गया था वह लाशों की कतारो के बीच गुजर रहा था…हर डिब्बे में यही द्रश्य था अंतिम डिब्बे तक पहुँचते पहुँचते उसे मतली होने लगी और जब वह ट्रेन से उतरा तो उसका सर चकरा रहा था उनकी नाक में मौत की बदबू बसी हुई थी और वह सोच रहे थे की रब ने यह सब कुछ होने कैसे दिया ?
जिहादी कौम इतनी निर्दयी हो सकती है कोई सोच भी नहीँ सकता था….उन्होने पीछे मुड़कर एक बार फ़िर ट्रेन पर नज़र डाली…हत्यारों ने अपना परिचय देने के लिये अंतिम डिब्बे पर मोटे मोटे सफेद अक्षरों से लिखा था…..”यह गाँधी और नेहरू को हमारी ओर से आज़ादी का नज़राना है ” !
हिन्दुओ और सिखों की लाखों लाशों पर बनी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठकर नेहरू ने इस देश पर शासन किया
Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

ऐतिहासिक सत्य घटना


ऐतिहासिक सत्य घटना

अंग्रेजो ने दिल्ली के अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को बन्दी बना लिया और मुगलो का जम कर कत्लेआम किया । सल्तनत खत्म होने से मुगल सेना कई टुकड़ो में बिखर गयी और देश के कई हिस्सों में जान बचा कर छुप गयी । पेट भरने के लिए कोई रोजगार उन्हें आता नही था क्योंकि मुगल सदैव चोरी लूटपाट और बलात्कार जेसे गन्दे और घ्रणित कार्यो में ही व्यस्त रहे इसलिए वो छोटे गिरोह बना कर लूटपाट करने लगे ।

बीकानेर रियासत में न्याय प्रिय राजा गंगा सिंह जी का शासन था जिन्होंने गंग नहर(सबसे बड़ी नहर) का निर्माण करवाया जिसको कांग्रेस सरकार ने इन्दिरा गांधी नहर नाम देकर हड़प लिया बनवाई थी ।
उन्ही की रियासत के गाँव आसलसर के जागीरदार श्री दीप सिंह जी शेखावत की वीरता और गौ और धर्म रक्षा के चर्चे सब और होते थे ।

“तीज” का त्यौहार चल रहा था और गाँव की सब महिलाये और बच्चियां गांव से 2 किलोमीटर दूर गाँव के तालाब पर गणगौर पूजने को गयी हुई थी और तालाब के समीप ही गांव की गाये भी चर रही थी उसी समय धूल का गुबार सा उठता सा नजर आया और कोई समझ पाता उससे पहले ही करीब 150 घुड़सवारों ने गायों को घेर कर ले जाना शुरू कर दिया । चारो तरफ भगदड़ मच गयी और सब महिलाये गाँव की और दौड़ी , उन गौओ में से एक उन मुगल लुटेरो का घेरा तोड़ कर भाग निकली तो एक मुसलमान ने भाला फेक मारा जो गाय की पीठ में घुस गया पर गाय रुकी नही और गाँव की और सरपट भागी ।

दोपहर का वक्त था और आसल सर के जागीरदार दीप सिंह जी भोजन करने बेठे ही थे की गाय माता की करुण रंभाने की आवाज सुनी , वो तुरन्त उठे और देखते ही समझ गए की मुसलमानो का ही कृत्य है उन्होंने गाँव के ढोली राणा को नगारा बजाने का आदेश दिया जिससे की गाँव के वीर लोग युद्ध के लिए तैयार हो सके पर सयोंगवश सब लोग खेतो में काम पर गए हुए थे , केवल पांच लोग इकट्ठे हुये और वो पाँच थे दीप सिंह जी के सगे भाई ।

सब ने शस्त्र और कवच पहने और घोड़ो पर सवार हुई तभी दो बीकानेर रियासत के सिपाही जो की छुटी पर घर जा रहे थे वो भी आ गए , दीप सिंह जी उनको कहा की आप लोग परिवार से मिलने छुट्टी लेकर जा रहे हो ,आप जाइये ,पर वो वीर कायम सिंह चौहान जी के वंशज नही माने और बोले हमने बीकानेर रियासत का नमक खाया है हम ऐसे नही जा सकते | युद के लिए रवाना होते ही सामने एक और वीर पुरुष चेतन जी भी मिले वो भी युद्ध के लिए साथ हो लिए । इस तरह आठ “8” योद्धा 150 मुसलमान सेनिको से लड़ने निकल पड़े और उनके साथ युद्ध का नगाड़ा बजाने वाले ढोली राणा जी भी ।

मुस्लिम सेना की टुकड़ी के चाल धीमी पड़ चुकी थी क्योंकि गायो को घेर कर चलना था । और उनका पीछा कर रहे जागीरदार दीप सिंह जी ने जल्दी ही उन मुगल सेनिको को “धाम चला” नामक धोरे पर रोक लिया , मुस्लिम टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे मुखिया को इस बात का अंदाज नही था की कोई इतनी जल्दी अवरोध भी सामने आ सकता है ? उसे आश्चर्य और घबराहट दोनों महसूस हुई , आश्चर्य इस बात का की केवल आठ 8 लोग 150 अति प्रशिक्षित सैनिको से लड़ने आ गए और घबराहट इस बात की कि उसने आसल सर के जागीरदार दीप सिंह जी की वीरता के चर्चे सुने थे , उस मुसलमान टुकड़ी के मुखिया ने प्रस्ताव रखा की इस लूट में दो गाँवों की गाये शामिल है अजितसर और आसलसर , आप आसलसर गाँव की गाय वापस ले जाए और हमे निकलने दे पर धर्म और गौ रक्षक श्री दीप सिंह जी शेखावत ने बिलकुल मना कर दिया और कहा की “” ऐ मलेच्छ दुष्ट , ये गाय हमारी माता के सम्मान पूजनीय है कोई व्यपार की वस्तु नही ,तू सभी गौ माताओ को यही छोडेगा और तू भी अपने प्राण यही त्यागेगा ये मेरा वचन है ” मुगल टुकड़ी के मुखिया का मुँह ये जवाब सुनकर खुला ही रह गया और फिर क्रोधित होकर बोला की “मार डालो सबको” ।

आठो वीरो ने जबरदस्त हमला किया जो मुसलमानो ने सोचा भी नही था कई घण्टे युद्ध चला और 150 मुसलमानो की टुकड़ी की लाशें जमीन पर आठ वीर योद्धाओ ने बिछा थी, ।
सभी गऊ माता को गाँव की और रवाना करवा दिया और गंभीर घायल सभी वीर पास में ही खेजड़ी के पेड़ के निचे अपने घावों की मरहमपट्टी करने लगे और गाँव की ही एक बच्ची को बोल कर पीने का पानी मंगवाया ,.| सूर्य देव रेगिस्तान की धरती को अपने तेज से तपा रहे थे और धरती पर मौजूद धर्म रक्षक देव अपने धर्म से ।।

सभी लोग खून से लथपथ हो चुके थे और गर्मी और थकान से निढाल हो रहे थे ,
आसमान में मानव मांस के भक्षण के आदि हो चुके सेंकडो गिद्द मंडरा रहे थे ., इतने ज्यादा संख्या में मंडरा रहे गीधों को लगभग 5 किलोमीटर दूर मौजूद दूसरी मुस्लिमो की टुकड़ी के मुखिया ने देखा तो किसी अनहोनी की आशंका से सिहर उठा ,उसने दूसरे साथियो को कहा ” जरूर कोई खतरनाक युद्ध हुआ है वहां और काफी लोग मारे गए है इसलिए ही इतने गिद्ध आकाश में मंडरा रहे है ” उसने तुरन्त उसी दिशा में चलने का आदेश दिया और वहां का द्रश्य देख उसे चक्कर से आ गए, 150 सेनिको की लाशें पड़ी है जिनको गिद्ध खा रहे है और दूर खेजड़ी के नीचे 8 आठ घायल लहू लुहान आराम कर रहे है ।

‘” अचानक दीप सिंह शेखावत जी को कुछ गड़बड़ का अहसास हुआ और उन्होंने देखा की 150 मुस्लिम सेनिक बिलकुल नजदीक पहुँच चुके है । वो तुरन्त तैयार हुए और अन्य साथियो को भी सचेत किया , सब ने फिर से कवच और हथियार धारण कर लिए और घायल शेर की तरह टूट पड़े ,,
खून की कमी तेज गर्मी और गंभीर घायल वीर योद्धा एक एक कर वीरगति को प्राप्त होने लगे , दीप सिंह जी छोटे सगे भाई रिड़मल सिंह जी और 3 तीन अन्य सगे भाई वीरगति को प्राप्त हुए पर तब तक इन वीरो ने मुगल सेना का बहुत नुकसान कर दिया था ।

“7 ” सात लोग वीरगति को प्राप्त कर चुके थे और युद्ध अपनी चरम सीमा पर था , अब जागीरदार दीप सिंह जी अकेले ही अपना युद्ध कोशल दिखा कर मलेछो के दांत खट्टे कर रहे की तभी एक मुगल ने धोखे से वार करके दीप सिंह की गर्दन धड़ से अलग कर दी ।
और और मुगल सेना के मुखिया ने जो द्रश्य देखा तो उसकी रूह काँप गयी । दीप सिंह जी धड़ बिना सिर के दोनों हाथो से तलवार चला रहा था धीरे धीरे दूसरी टुकड़ी के 150 मलछ् में से केवल दस ग्यारह मलेच्छ ही जिन्दा बचे थे । बूढ़े मुगल मुखिया ने देखा की धड़ के हाथ नगारे की आवाज के साथ साथ चल रहे है उसने तुरंत जाकर निहथे ढोली राणा जी को मार दिया । ढोली जी के वीरगति को प्राप्त होते ही दीप सिंह का शरीर भी ठंडा पड़ गया ।

वो मुग़ल मुखिया अपने सात” 7″ आदमियो के साथ जान बचा कर भाग निकला और जाते जाते दीप सिंह जी की सोने की मुठ वाली तलवार ले भागा ।
लगभग 100 किलोमीटर दूर बीकानेर रियासत के दूसरे छोर पर भाटियो की जागीरे थी जो अपनी वीरता के लिए जाने पहचाने जाते है। मुगल टुकड़ी के मुखिया ने एक भाटी जागीरदार के गाँव में जाकर खाने पीने और ठहरने की व्यवस्था मांगी और बदले में सोने की मुठ वाली तलवार देने की पेशकश करी ।।
भाटी जागीरदार ने जेसे ही तलवार देखी चेहरे का रंग बदल गया और जोर से चिल्लाये ,,”” अरे मलेछ ये तलवार तो आसलसर जागीरदार दीप सिंह जी की है तेरे पास कैसे आई ?”

मुसलमान टुकड़ी के मुखिया ने डरते डरते पूरी घटना बताई और बोला ठाकुर साहब 300 आदमियो की टुकड़ी को गाजर मूली जेसे काट डाला और हम 10 जने ही जिन्दा बच कर आ सके । भाटी जागीरदार दहाड़ कर गुस्से से बोले अब तुम दस भी मुर्दो में गिने जाओगे और उन्होंने तुरंत उसी तलवार से उन मलेछो के सिर कलम कर दिए ।।
और उस तलवार को ससम्मान आसलसर भिजवा दिया।।

ये सत्य घटना आसलसर गाँव की है और दीप सिंह जी जो इस गाँव के जागीरदार थे आज भी दीपसिंह जी की पूजा सभी समाज के लोग श्रदा से करते है। और हाँ वो “धामचला ” धोरा जहाँ युद्ध हुआ वहां आज भी युद्ध की आवाजे आती है और इनकी पत्नी सती के रूप में पूजी जाती है और उनके भी चमत्कार के चर्चे दूर दूर तक है।

आज जो टीवी फिल्मो के माध्यम से दिखाया जाता है किसी भी गाँव के जागीरदार या सामंत सिर्फ शोषण करते थे और कर वसूल करते थे उनके लिए करारा जवाब है । गाँव के मुखिया होते हुए भी इनकी जान बहुत सस्ती हुआ करती थी कैसी भी मुसीबत आये तो मुकाबले में आगे भी ठाकुर ही होते थे। गाँव की औरतो बच्चो गायों और ब्राह्मणों की रक्षा हेतु सदैव तत्पर रहते थे। सत् सत् नमन है ऐसे वीर योद्धाओ को *****

Posted in ज्योतिष - Astrology

श्री हनुमत प्रश्नावली यंत्र से जाने अपनी समस्याओं का समाधान


Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

कलियुग  का  लक्ष्मण


कलियुग  का  लक्ष्मण

——————-
” भैया, परसों नये मकान पे हवन है। छुट्टी (इतवार) का दिन है। आप सभी को आना है, मैं गाड़ी भेज दूँगा।”  छोटे भाई लक्ष्मण ने बड़े भाई भरत से मोबाईल पर बात करते हुए कहा।

” क्या छोटे, किराये के किसी दूसरे मकान में शिफ्ट हो रहे हो ?”

” नहीं भैया, ये अपना मकान है, किराये का नहीं ।”

” अपना मकान”, भरपूर आश्चर्य के साथ भरत के मुँह से निकला।

“छोटे तूने बताया भी नहीं कि तूने अपना मकान ले लिया है।”

” बस भैया “, कहते हुए लक्ष्मण ने फोन काट दिया।

” अपना मकान” ,  ” बस भैया ”  ये शब्द भरत के दिमाग़ में हथौड़े की तरह बज रहे थे।

भरत और लक्ष्मण दो सगे भाई और उन दोनों में उम्र का अंतर था करीब  पन्द्रह साल। लक्ष्मण जब करीब सात साल का था तभी उनके माँ-बाप की एक दुर्घटना में मौत हो गयी। अब लक्ष्मण के पालन-पोषण की सारी जिम्मेदारी भरत पर थी। इस चक्कर में उसने जल्द ही शादी कर ली कि जिससे लक्ष्मण की देख-रेख ठीक से हो जाये।

प्राईवेट कम्पनी में क्लर्क का काम करते भरत की तनख़्वाह का बड़ा हिस्सा दो कमरे के किराये के मकान और लक्ष्मण की पढ़ाई व रहन-सहन में खर्च हो जाता। इस चक्कर में शादी के कई साल बाद तक भी भरत ने बच्चे पैदा नहीं किये। जितना बड़ा परिवार उतना ज्यादा खर्चा।

पढ़ाई पूरी होते ही लक्ष्मण की नौकरी एक अच्छी कम्पनी में लग गयी और फिर जल्द शादी भी हो गयी। बड़े भाई के साथ रहने की जगह कम पड़ने के कारण उसने एक दूसरा किराये का मकान ले लिया। वैसे भी अब भरत के पास भी दो बच्चे थे, लड़की बड़ी और लड़का छोटा।

मकान लेने की बात जब भरत ने अपनी बीबी को बताई तो उसकी आँखों में आँसू आ गये। वो बोली, ”  देवर जी के लिये हमने क्या नहीं किया। कभी अपने बच्चों को बढ़िया नहीं पहनाया। कभी घर में महँगी सब्जी या महँगे फल नहीं आये। दुःख इस बात का नहीं कि उन्होंने अपना मकान ले लिया, दुःख इस बात का है कि ये बात उन्होंने हम से छिपा के रखी।”

इतवार की सुबह लक्ष्मण द्वारा भेजी गाड़ी, भरत के परिवार को लेकर एक सुन्दर से मकान के आगे खड़ी हो गयी। मकान को देखकर भरत के मन में एक हूक सी उठी। मकान बाहर से जितना सुन्दर था अन्दर उससे भी ज्यादा सुन्दर। हर तरह की सुख-सुविधा का पूरा इन्तजाम। उस मकान के दो एक जैसे हिस्से देखकर भरत ने मन ही मन कहा, ” देखो छोटे को अपने दोनों लड़कों की कितनी चिन्ता है। दोनों के लिये अभी से एक जैसे दो हिस्से  (portion) तैयार कराये हैं। पूरा मकान सवा-डेढ़ करोड़ रूपयों से कम नहीं होगा। और एक मैं हूँ, जिसके पास जवान बेटी की शादी के लिये लाख-दो लाख रूपयों का इन्तजाम भी नहीं है।”

मकान देखते समय भरत की आँखों में आँसू थे जिन्हें  उन्होंने बड़ी मुश्किल से बाहर आने से रोका।

तभी पण्डित जी ने आवाज लगाई, ” हवन का समय हो रहा है, मकान के स्वामी हवन के लिये अग्नि-कुण्ड के सामने बैठें।”

लक्ष्मण के दोस्तों ने कहा, ” पण्डित जी तुम्हें बुला रहे हैं।”

यह सुन लक्ष्मण बोले, ” इस मकान का स्वामी मैं अकेला नहीं, मेरे बड़े भाई भरत भी हैं। आज मैं जो भी हूँ सिर्फ और सिर्फ इनकी बदौलत। इस मकान के दो हिस्से हैं, एक उनका और एक मेरा।”

हवन कुण्ड के सामने बैठते समय लक्ष्मण ने भरत के कान में फुसफुसाते हुए कहा, ” भैया, बिटिया की शादी की चिन्ता बिल्कुल न करना। उसकी शादी हम दोनों मिलकर करेंगे ।”

पूरे हवन के दौरान भरत अपनी आँखों से बहते पानी को पोंछ रहे थे, जबकि हवन की अग्नि में धुँए का नामोनिशान न था ।
भरत जैसे आज भी

मिल जाते हैं इन्सान

पर लक्ष्मण जैसे बिरले ही

मिलते  इस  जहान

Posted in संस्कृत साहित्य

ब्राह्म मुहूर्त का महत्व !  विजय कृष्ण पांडेय


ब्राह्म मुहूर्त का महत्व !

विजय कृष्ण पांडेय

रात्रि के अंतिम प्रहर को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं।
हमारे ऋषि मुनियों ने इस मुहूर्त का विशेष महत्व बताया है।
उनके अनुसार यह समय निद्रा त्याग के लिए
सर्वोत्तम है।

ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य,बल,विद्या,बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घण्टे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये।
इस समय सोना शास्त्र निषिद्ध है।

“ब्रह्ममुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी।
तां करोति द्विजो मोहात् पादकृच्छेण शुद्धय्ति।।”

ब्रह्ममुहूर्त की पुण्य का नाश करने वाली होती है।
इस समय जो भी शयन करता है उसे इस पाप से मुक्ति हेतु पादकृच्छ नामक (व्रत) से प्रायश्चित
करना चाहिए।
विवश अवस्था में यह क्षम्य है।

आँखों के खुलते ही दोनों हाथों की हथेलियों को देखते हुए निम्न श्लोक का पाठ करें ;-

कराग्रे वसते लक्ष्मी: करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो परब्रह्म प्रभाते करदर्शनम्।।

कर (हाथ) के अग्रभाग में लक्ष्मी,मध्य में सरस्वती तथा हाथ के मूल भाग में ब्रह्मा जी निवास करते हैं अतः प्रातःकाल दोनों करों का दर्शन करना चाहिए।

शय्या से उठ कर भूमि पर पैर रखने के पूर्व पृथ्वी माता का अभिवादन करें तथा पैर रखने की विवशता के लिए माता से क्षमा मांगते हुए निम्न श्लोक का पाठ करें;-

समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डिते।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्वमें।

समुद्र रूपी वस्त्रों को धारण करनेवाली,पर्वतरूप स्तनों से मण्डित भगवान विष्णु की पत्नी पृथ्वी देवि !
आप मेरे पद स्पर्श को क्षमा करें।

तत्पश्चात गोरोचन,चन्दन,सुवर्ण,शंख,मृदंग,दर्पण,मणि
आदि मांगलिक वस्तुओं का दर्शन करें।
गुरु अग्नि तथा सूर्य को नमस्कार करे।

निम्नलिखित श्लोक को पढ़ते हुए सभी अंगों पर
जल छिड़कने से मानसिक स्नान हो जाता है;-

ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि।।
अतिनीलघनश्यामं नलिनायतलोचनम्।
स्मरामि पुण्डरीकाक्षं तेन स्नातो भवाम्यहम्।।

ब्रह्म मुहूर्त का विशेष महत्व बताने के पीछे हमारे विद्वानों की वैज्ञानिक सोच निहित थी।
वैज्ञानिक शोधों से ज्ञात हुआ है कि ब्रह्म मुहुर्त में
वायु मंडल प्रदूषण रहित होता है।

इसी समय वायु मंडल में ऑक्सीजन (प्राण वायु)
की मात्रा सबसे अधिक (41 प्रतिशत) होती है,
जो फेफड़ों की शुद्धि के लिए महत्वपूर्ण होती है।
शुद्ध वायु मिलने से मन,मस्तिष्क भी स्वस्थ रहता है।

आयुर्वेद के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है।
यही कारण है कि इस समय बहने वाली वायु को अमृततुल्य कहा गया है।
इसके अलावा यह समय अध्ययन के लिए भी सर्वोत्तम बताया गया है क्योंकि रात को आराम
करने के बाद सुबह जब हम उठते हैं तो शरीर
तथा मस्तिष्क में भी स्फूर्ति व ताजगी बनी रहती है।

प्रमुख मंदिरों के पट भी ब्रह्म मुहूर्त में खोल दिए
जाते हैं तथा भगवान का श्रृंगार व पूजन भी ब्रह्म मुहूर्त में किए जाने का विधान है।

ब्रह्ममुहूर्त के धार्मिक,पौराणिक व व्यावहारिक पहलुओं और लाभ को जानकर हर रोज इस
शुभ घड़ी में जागना शुरू करें तो बेहतर नतीजे मिलेंगे।

आइये जाने ब्रह्ममुहूर्त का सही वक्त व खास फायदे –

धार्मिक महत्व –
व्यावहारिक रूप से यह समय सुबह
सूर्योदय से पहले चार या पांच बजे के बीच माना जाता है।
किंतु शास्त्रों में साफ बताया गया है कि रात के आखिरी प्रहर का तीसरा हिस्सा या चार घड़ी
तड़के ही ब्रह्ममुहूर्त होता है।
मान्यता है कि इस वक्त जागकर इष्ट या भगवान
की पूजा,ध्यान और पवित्र कर्म करना बहुत शुभ होता है।
क्योंकि इस समय ज्ञान,विवेक,शांति, ताजगी,निरोग और सुंदर शरीर,सुख और ऊर्जा के रूप में ईश्वर
कृपा बरसाते हैं।

भगवान के स्मरण के बाद दही,घी,आईना,सफेद सरसों,बैल,फूलमाला के दर्शन भी इस काल में बहुत पुण्य देते हैं।

पौराणिक महत्व – वाल्मीकि रामायण के मुताबिक माता सीता को ढूंढते हुए श्रीहनुमान ब्रह्ममुहूर्त में ही अशोक वाटिका पहुंचे।
जहां उन्होंने वेद व यज्ञ के ज्ञाताओं के मंत्र उच्चारण की आवाज सुनी।

व्यावहारिक महत्व –
व्यावहारिक रूप से अच्छी सेहत,ताजगी और ऊर्जा पाने के लिए ब्रह्ममुहूर्त बेहतर समय है।
क्योंकि रात की नींद के बाद पिछले दिन की शारीरिक और मानसिक थकान उतर जाने पर दिमाग शांत और स्थिर रहता है।
वातावरण और हवा भी स्वच्छ होती है।
ऐसे में देव उपासना,ध्यान,योग,पूजा तन,मन
और बुद्धि को पुष्ट करते हैं।

इस तरह शौक-मौज या आलस्य के कारण देर
तक सोने के बजाय इस खास वक्त का फायदा उठाकर बेहतर सेहत,सुख, शांति और नतीजों
को पा सकते हैं।

जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,,
जयति पुण्य भूमि भारत,,,
सदा सुमंगल,,,
ॐ श्री सूर्याय नमः
जय भवानी
जय श्री राम

विजय कृष्ण पांडेय
Posted in संस्कृत साहित्य

शूद्र कभी नहीं कहते कि वे दलित हैं


Image may contain: 1 person, sitting
Pramod Kumar

अधिकांशतः आप देखियेगा –

शूद्र कभी नहीं कहते कि वे दलित हैं , सनातन वैदिक धर्माचार्य कभी नहीं कहते कि शूद्र दलित हैं परन्तु विदेशी शिक्षानीति से उपजे छद्म बुद्धिजीवी ही ये शब्द प्रयोग करते हैं कि शूद्र दलित हैं । और इस दलितवादी मानसिकता की उपज कहॉ से शुरू हुई, इसे आप देखेंगे तो पायेंगे कि अंग्रेजों के जाने के बाद देश में अपना वर्चस्व चाहने वाले राजनीतिक लोगों ने ये एक हवा चलाई कि शूद्र दलित हैं ।

हिन्दू आधिक्य (मेजोरिटी) वाले, गुरुकुलीय परम्परा वाले देश का प्रथम शिक्षामन्त्री एक मुस्लिम को बनाया गया और बच्चों के पाठ्यक्रम में उनके ही हिन्दू धर्म के विरुद्ध जहर घोलती ऐसी शिक्षा परोसी गयी कि वह बच्चा जब कुछ बडा हो जाये तो अपने ही सनातन वैदिक धर्म से, अपने पूर्वजों से ईर्ष्या करने लगे ! इतना कर चुके तो फिर ये मन्थरानुयायी धन मान पद का लोभ शूद्रों को परोसना भला कैसे भूलते ? इनको येन केन प्रकारेण शूद्र वर्ग को सनातन वैदिक धर्म की मुख्य धारा से अलग जो करना है !

अब सनातन वैदिक धर्म का इतिहास देखिये –

ब्राह्मण नगर गॉवों से सुदूर एकान्त वन प्रदेशों में २५ वर्ष गुरुकुल में रहता था , जहॉ वह वेद शास्त्रों का अध्ययन करता था , फिर जब शास्त्र संस्कारों की शिक्षा लेकर घर आता था तो २५ से ५० वर्ष तक गृहस्थी के धर्मों के पालन में डूब जाता था , जिसमें पंचमहायज्ञों से लेकर विविध व्रतोपवासों के दुरूह नियमों का पालन उसे करना पड़ता था , जो उन्हीं मनु स्मृति आदि शास्त्रों में आदेश किये गये हैं , जिन्हें ये तथाकथित छद्म बुद्धिजीवी ब्राह्मणों की रचना बताते हैं । उन नियमों में कहीं कोई चूक हुई तो प्रायश्चित्त के ऐसे कठोर नियम वर्णित हैं कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते । अस्तु ,

इसके उपरान्त जब ५० वर्ष तक वह गृहस्थ का निर्वाह करके पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा कर ही पाता था कि , फिर ५० से ७५ वर्ष तक के लिये फिर से घर परिवार समाज को छोड़कर वानप्रस्थ आश्रम के पालन के लिये वन चला जाता था , इसके उपरान्त तो फिर संन्यासी ही हो जाता था ।

तो कुल मिलाकर आप देखिये कि जीवन का ७५% एक ब्राह्मण परिवार- गॉव- नगर समाज से दूर रहकर एकाकी होकर स्वाध्याय तपस्या में बिताता था , और जो २५ % उसे मिलता , उसमें वह घर परिवार भी संभालता और अपने गृहस्थी के नियम भी पूरे कर अपनी जिम्मेदारियों को सम्पन्न करता ।

पर फिर भी कुछ मन्थरानुयायी ये विष घोलते हैं कि
शूद्रों को शोषित किया, उनको पीड़ित किया , उनको पिछड़ा बनाया आदि आदि ।

उन शूद्रों को , जिनके लिये किसी भी प्रकार की तपस्या का कोई विधान ही नही था , बस राजाओं की सेवा- बढाई करते हुए खा पी के आजीवन गृहस्थी का आनन्द उठाने में ही जिनके मोक्ष का मार्ग था ।

दुरूह वेदों के नियमों का तप करना पड़ता था तो ब्राह्मण करते थे , राष्ट्र पर संकट आता और युद्ध होता था तो क्षत्रिय मरते थे , पर शूद्रों को न कभी किसी ब्राह्मण ने तप कराया न किसी क्षत्रिय राजा ने युद्ध में मरवाया ।

ये प्रकृति का नियम है कि प्राणी को अपने सेवक पर सदैव विशेष प्रीति होती है । शूद्र जिन ब्राह्मण और क्षत्रियों की सेवा में सदैव तत्पर रहते थे , उन अपने परम आत्मीय जनों को ये वर्ण इतना प्रेम से पाल – पोष के लाये , उन को कुछ कथित विदेशी स्लीपर सेल #दलित बोलकर क्या स्वयं उनके स्वाभिमान का अपमान नहीं करते हैं?

ऋग्वेद का मन्त्र देखिये –

ब्राह्मणोsस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः ।
उरु तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रोsजायत ।।

मन्त्र से स्पष्ट है कि वेदों की रक्षा करने वाले ब्राह्मण को यदि एक ओर मुख की संज्ञा बतायी गयी है तो समाज सेवा का अपना धर्म निभाने वाले शूद्र को भी दूसरी ओर ईश्वरीय शक्ति के चरणों की संज्ञा बतायी गयी है ।

ब्राह्मण व शूद्र का सम्बन्ध एक ही शरीर के मुख और चरण की भॉति रहा । चरण व मुख का क्या सम्बन्ध होता है ?

पैर में कॉटा चुभता है तो ऑख से ऑसू निकलता है , ये होता है चरण और मुख का सम्बन्ध । नेत्र देखते हैं और चरण चलते हैं , यदि चलते समय नेत्र नहीं देखेंगे तो पैरों को ठोकर लगेगी , रक्त पैरों से बहेगा और उसका संज्ञान मस्तिष्क को ही होगा । जब शयन का समय आता है तो पुरुष चादर से पहले अपने चरण को ढकता है , फिर अपने उदर को फिर हाथों को और मुख तो प्रायः चादर के बाहर ही रखता है । सनातन वैदिक समाज में जब भी आपत्ति आयी , तो यहॉ सर्वप्रथम शूद्र की रक्षा की गयी , क्योंकि वह वर्ग ही तो वह प्रजा था , जिसकी रक्षा करना अन्य वर्गों का प्रथम धर्म था ।

सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ।।

इस प्रकार युगों से परस्पर प्रीतिपूर्वक सनातन वैदिक समाज चल के आया । इतनी आत्मीयता जहॉ के सिद्धान्त में गुम्फित रही , वहॉ पर कुछ छद्म बुद्धिजीवी बार – बार जोर देकर कान भरते जाते हैं कि शूद्र दलित हैं ! किमाश्चर्यमतः परम् !

।। जय श्री राम ।।

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक शहर में एक प्रसिद्ध बनारसी विद्वान् “ज्योतिषीत” का आगमन हुआ.


एक शहर में एक प्रसिद्ध बनारसी विद्वान् “ज्योतिषीत” का आगमन हुआ..!! माना जाता है कि उनकी वाणी में सरस्वती विराजमान है और वे जो भी बताते है वह 100% सच ही होता है। “शर्मा जी” ने अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाते हुए ज्योतिषी को कहा.., “महाराज, मेरी मृत्यु कब, कहॉ और किन परिस्थितियों में होगी?”
.
.
.
ज्योतिषी ने शर्मा जी की हस्त रेखाऐं देखीं,
चेहरे और माथे को अपलक निहारते रहे।
स्लेट पर कुछ अंक लिख कर जोड़ते–घटाते रहे। बहुत देर बाद वे गंभीर स्वर में बोले..,
“शर्मा जी, आपकी भाग्य रेखाएँ कहती है कि जितनी आयु आपकी माता को प्राप्त होगी उतनी ही आयु आप भी पाएँगे।
जिन परिस्थितियों में और जहाँ आपकी माता की मृत्यु होगी, उसी स्थान पर और उसी तरह, आपकी भी मृत्यु होगी।”
.
यह सुन कर “शर्मा जी” भयभीत हो उठे और चल पडे ……
एक घण्टे बाद …
.
.
.
“शर्मा जी” वृद्धाश्रम से अपनी वृद्ध माता को साथ लेकर घर लौट रहे थे..!!

Prasad Davrani

%d bloggers like this: