Posted in छोटी कहानिया - Chooti Kahaniya

*A DINNER DATE*🙏
एक दिन अचानक मेरी पत्नी मुझसे बोली – “सुनो, अगर मैं तुम्हे किसी और के साथ डिनर और फ़िल्म के लिए बाहर जाने को कहूँ तो तुम क्या कहोगे”।

मैं बोला – ” मैं कहूँगा कि अब तुम मुझे प्यार नहीं करती”।

उसने कहा – “मैं तुमसे प्यार करती हूँ, लेकिन मुझे पता है कि यह औरत भी आपसे बहुत प्यार करती है और आप के साथ कुछ समय बिताना उनके लिए सपने जैसा होगा”। 
वह अन्य औरत कोई और नहीं मेरी माँ थी। जो मुझ से अलग अकेली रहती थी। अपनी व्यस्तता के कारण मैं उन से मिलने कभी कभी ही जा पाता था। 
मैंने माँ को फ़ोन कर उन्हें अपने साथ रात के खानेे और एक फिल्म के लिए बाहर चलने के लिए कहा।
“तुम ठीक तो हो,ना। तुम दोनों के बीच कोई परेशानी तो नहीं” माँ ने पूछा
मेरी माँ थोडा शक्की मिजाज़ की औरत थी। उनके लिए मेरा इस किस्म का फ़ोन मेरी किसी परेशानी का संकेत था।

” नहीं कोई परेशानी नहीं। बस मैंने सोचा था कि आप के साथ बाहर जाना एक सुखद अहसास होगा” मैंने जवाब दिया और कहा ‘बस हम दोनों ही चलेंगे”।
उन्होंने इस बारे में एक पल के लिए सोचा और फिर कहा, ‘ठीक है।’ 
शुक्रवार की शाम को जब मैं उनके घर पर पहुंचा तो मैंने देखा है वह भी दरवाजे पर इंतजार कर रही थी। वो एक सुन्दर पोशाक पहने हुए थी और उनका चहेरा एक अलग सी ख़ुशी में चमक रहा था।
कार में माँ ने कहा ” ‘मैंने अपनी friends को बताया कि मैं अपने बेटे के साथ बाहर  खाना खाने के लिए जा रही हूँ। वे काफी प्रभावित थी”।
हम लोग माँ की पसंद वाले एक रेस्तरां पहुचे जो बहुत सुरुचिपूर्ण तो नहीं मगर  अच्छा और आरामदायक था। हम बैठ गए, और मैं मेनू देखने लगा। मेनू पढ़ते हुए मैंने आँख उठा कर देखा तो पाया कि वो मुझे ही देख रहीं थी और एक उदास सी मुस्कान उनके होठों पर थी। 
‘जब तुम छोटे थे तो ये मेनू मैं तुम्हारे लिए पढ़ती थी’ उन्होंने कहा।
‘माँ इस समय मैं इसे आपके लिए पढना चाहता हूँ,’ मैंने जवाब दिया।
खाने के दौरान, हम में एक दुसरे के जीवन में घटी हाल की घटनाओं पर चर्चा होंने लगी। हम ने आपस में इतनी ज्यादा बात की, कि पिक्चर का समय कब निकल गया हमें पता ही नही चला।
बाद में वापस घर लौटते समय माँ ने कहा कि अगर अगली बार मैं उन्हें बिल का पेमेंट करने दूँ, तो वो मेरे साथ दोबारा डिनर के लिए आना चाहेंगी।

मैंने कहा “माँ जब आप चाहो और बिल पेमेंट कौन करता है इस से क्या फ़र्क़ पड़ता है।

माँ ने कहा कि फ़र्क़ पड़ता है और अगली बार बिल वो ही पे करेंगी।
“घर पहुँचने पर पत्नी ने पूछा” – कैसा रहा।

“बहुत बढ़िया, जैसा सोचा था उससे कही ज्यादा बढ़िया” – मैंने जवाब दिया।
इस घटना के कुछ दिनबाद, मेरी माँ का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। यह इतना अचानक हुआ कि मैं उनके लिए कुछ नहीं कर पाया । 
माँ की मौत के कुछ समय बाद, मुझे एक लिफाफा मिला जिसमे उसी रेस्तरां की एडवांस पेमेंट की रसीद के साथ माँ का एक ख़त था जिसमे माँ ने लिखा था ” मेरे बेटे मुझे पता नहीं कि मैं तुम्हारे साथ दोबारा डिनर पर जा पाऊँगी या नहीं इसलिए मैंने दो लोगो के खाने के अनुमानित बिल का एडवांस पेमेंट कर दिया है। अगर मैं नहीं जा पाऊँ तो तुम अपनी पत्नी के साथ भोजन करने जरूर जाना।

उस रात तुमने कहा था ना कि क्या फ़र्क़ पड़ता है।  मुझ जैसी अकेली रहने वाली बूढी औरत को फ़र्क़ पड़ता है, तुम नहीं जानते उस रात तुम्हारे साथ बीता हर पल मेरे जीवन के सबसे बेहतरीन समय में एक था।

भगवान् तुम्हे सदा खुश रखे।

I love you”.

तुम्हारी माँ
उस पल मुझे अपनों को समय देने और उनके प्यार को महसूस करने का महत्त्व मालूम हुआ।
जीवन में कुछ भी आपके अपने परिवार से भी ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है।
ना व्हाट्सएप
ना फेसबूक
ना मोबाइल
ना लैपटॉप
और
ना ही टीवी।
अपने परिजनों को उनके हिस्से का समय दीजिए क्योंकि आपका साथ ही उनके जीवन में खुशियाँ का आधार है।
इस मेसेज को उन सब व्यक्तियों के साथ शेयर कीजिए
जिनके बूढ़े माता पिता हो
जिनके छोटे बच्चे हो
और
जिनको प्यार करने वाला और उनका इंतज़ार कोई हो…
क्योंकि

      🌺धन तो आता जाता है मगर अपने गए तो लौट के नहीं आते🌺

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आप बीती ..
प्रिया शर्मा की फ्रेंड रिक्वेस्ट।

कुछ दिन पहले मेरे पास एक फ्रेंड रिक्वेस्ट आई ।

यह किसी प्रिया शर्मा के नाम से थी ।

अमूमन मेरे पास पुरुषों की रिक्वेस्ट तो आती रहती हैं

मगर इस बार एक सुकन्या ने रिक्वेस्ट भेजी थी सो चौंकना स्वभाविक था ।

एक्सैप्ट करने से पहले मैने आदतन उसकी प्रोफाइल को चैक किया

तो पता चला अभी तक उसकी मित्रता सूची में कोई भी नहीं है ।

शक हुआ कि कहीं कोई फेक तो नहीं है ।फिर सोचा नहीं…., हो सकता है

फेसबुक ने इस यूजर को नया मानते हुए इसे मेरे साथ मित्रता करने के लिए सज्जेस्ट किया हो

प्रोफाइल फोटो नदारद देखकर मैनें अंदाजा लगाया शायद नई हो

और उसे फोटो अपलोड करनी नहीं आती या फिर वो संकोची हो सकती है ,खैर मैनें रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली ।

सबसे पहले उसकी ओर से धन्यवाद आया फिर मेरे हर स्टेटस को लाईक और कमेंटस मिलने शुरू हो गए ।

मैं अपने इस नए कद्रदान को पाकर बेहद खुश हुआ, सिलसिला आगे बढ़ा और

अब मेरी निजी जिंदगी से संबधित कमेंटस आने लगे । मेरी पसंद नापसंद को पूछा जाने लगा ।

अब वो कुछ रोमांटिक सी शायरी भी पोस्ट करने लगी थी.

एक दिन मोहतरमा ने पूछा : क्या आप अपनी बीवी से प्यार करते हैं ?

मैनें झट से कह दिया : हाँ.

वो चुप हो गई ।

अगले दिन उसने पूछा : क्या आपकी मैडम सुंदर है ?

इस बार भी मैने वही जवाब दिया :हाँ बहुत सुंदर है ।

अगले दिन वो बोली : क्या आपकी बीवी खाना अच्छा बनाती है?

” बहुत ही स्वादिष्ट” मैनें जवाब दिया ।

फिर कुछ दिन तक वो नजर नहीं आई ।

अचानक कल सुबह उसने मैसेज बाक्स में लिखा “मैं आपके शहर में आई हूँ

क्या आप मुझसे मिलना चाहेंगे”

मैनें कहा : जरूर

“तो ठीक है आ जाइये m,g रिसोर्ट में मिल भी लेंगे और मूवी भी देख लेंगे” ।

मैनें कहा नहीं- “मैडम आप आ जाइये मेरे घर पर, मेरे बीवी बच्चे आपसे मिलकर खुश होंगे ।

मेरी बीवी के हाथ का खाना भी खाकर देखियेगा ।

बोली : नहीं, मैं आपकी मैडम के सामने नहीं आऊँगी ,आपने आना है तो आ जाओ ।

मैंने उसे अपने यहाँ बुलाने की काफी कोशिश की मगर वो नहीं मानी ।

वो बार बार अपनी पसंद की जगह पर बुलाने की जिद पर अड़ी थी

और मैं उसे अपने यहाँ ।

वो झुंझला उठी और बोली : ठीक है मैं वापिस जा रही हूँ । तुम डरपोक अपने घर पर ही बैठो ।

मैनें फिर उसे समझाने का प्रयास किया और सार्वजनिक स्थल पर मिलने के खतरे गिनायें पर वो नहीं मानी ।

हार कर मैंने कह दिया : मुझसे मिलना है तो मेरे परिवार वालों के सामने मिलो नहीं तो अपने घर जाओ ।

वो ऑफलाइन हो गई । शाम को घर पहुँचा,तो डायनिंग टेबल पर लज़ीज खाना सजा हुआ था ।

मैनें पत्नी से पूछा: कोई आ रहा है क्या खाने पर ?

हाँ, प्रिया शर्मा आ रही है ।

क्या !!

वो तुम्हें कहाँ मिली तुम उसे कैसे जानती हो?

“तसल्ली रखिये साहब,

वो मैं ही थी, आप मेरे जासूसी मिशन के दौरान परीक्षा में पास हुए.

आओ मेरे सच्चे हमसफर, खाना खायें, ठंडा हो रहा है

Vijay Khattar

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हमारे गौरवशाली इतिहास का एक प्रेरणादायक पृष्ठ 
डॉ विवेक आर्य 
        भारत विश्व का संभवत एक मात्र ऐसा देश होगा जहाँ का इतिहास उस देश के इतिहासकारों ने नहीं अपितु विदेशी इतिहासकारों ने लिखा है।  इन पक्षपाती इतिहासकारों ने गौरी , गजनी और अकबर को महान लिखकर भारतीयों को हीन भावना से ग्रस्त करने का प्रयास किया । भारतीय इतिहास में अनेक ऐसे प्रसंग मिलते है जिन्हें पढ़कर पाठक अपने हमारे देशभक्त वीरों पर गर्व करेंगे। उन महान वीरों में से एक हथे नरसिम्हा देव प्रथम। आप ओड़िसा के शासक थे। सन 1243 में बंगाल के मेदिनापुर में आपका बंगाल के शासक तुगहन खान से सामना हुआ। युद्ध रणनीति में कुशल राजा ने अपनी सेनाओं को एक घने जंगल में छिपा दिया और मुसलमानों की सेना की प्रतीक्षा करने लगे। तुगहन खान आश्वस्त हो गया कि नरसिम्हा देव की सेना भाग गई है।  इसलिए उसने अपनी सेना को आराम करने का आदेश दे दिया। छापामार रणनीति का पालन करते हुए तुगहन खान ने आराम करती सेना पर नरसिम्हा देव ने हमला कर दिया। उसकी सेना में भगदड़ मच गई। बड़ी कठिनाई से तुगहन खान ने अपनी भागकर जान बचाई। 
    सन 1247 में बंगाल सूबे का नया गवर्नर इख़्तियार नियुक्त हुआ। उसने अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए फिर से ओड़िसा पर चढ़ाई कर दी। उसने पूरी का मंदिर घेर लिया। इस बार नरसिम्हा देव ने बड़ी दूर की रणनीति बनाई। उन्होंने अपना संदेशवाहक भेज कर इख़्तियार को सन्देश दिया कि उन्हें अपनी हार स्वीकार है। वे सामूहिक रूप से इस्लाम स्वीकार करने और पूरी के मंदिर को सौंपने के लिए तैयार है। तुर्क सेना यह सुनते ही खुशी के मारे नशे में डूब गई। इतने में पूरी के मंदिर की घंटियां बजने लगी। यह राजा नरसिम्हा देव का गुप्त ईशारा था। ओड़िया सेना ने अप्रत्याशित छापामार हमला कर इख़्तियार और उसकी सेना का बंगाल तक खदेड़ दिया। इस विजय के उपलक्ष में राजा नरसिम्हा देव ने कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण कर इस विजय को चिरस्थायी बनाया। इस मंदिर में राजा नरसिम्हा देव को हाथी पर बैठ कर एक विदेशी मेहमान से जिराफ रूपी उपहार लेते हुए दिखाया गया है। 

 

मुसलमानों ने दो बार एक ही हिन्दू राजा से मुँह की खाई। इतिहास की यह प्रेरणादायक घटना न किसी इतिहास पुस्तक में देखने को मिलती है। न ही इस पर कोई वृत्तचित्र बना है। खेद है ऐसे प्रेरणादायक एतिहासिक घटना के स्थान पर हमें अकबर महान आदि को पढ़ाया जाता है।

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रामप्रसाद बिस्मिल

मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर देने वाले वीरों में पंडित रामप्रसाद बिस्मिल का एक विशिष्ट स्थान है। जीवन के समस्त सुखों को त्यागकर महानतम उद्देश्य के लिए क्रांति पथ का वरण करनेवाली ऐसी विभूतियां कम ही जन्म लेती हैं। बिस्मिल सदृश क्रांतिकारी वीरों के बलिदान का भी इस देश को स्वतन्त्रता दिलाने में विशेष योगदान है।
यद्यपि आज क्रांतिकारियों के बलिदान को हम विस्तृत-सा कर बैठे हैं, तथापि इससे उनके त्याग का महत्त्व किसी प्रकार कम नहीं होता। स्वतंत्र भारत का प्रत्येक व्यक्ति, इस देश की मिट्टी का कण-कण सदा-सदा के लिए पंडित रामप्रसाद बिस्मिल तथा उनके साथी क्रांतिकारियों का ऋणी रहेगा।
स्वतंत्रता संग्राम क्रांतिकारियों का संदर्भ आते ही, जो वीर हमारी स्मृति में कौंध जाते हैं, उनमें रामप्रसाद बिस्मिल का नाम अग्रणी है। मध्य प्रदेश ग्वालियर के माता-पिता की संतान के रूप में बिस्मिल मैनपुरी उत्तर प्रदेश में जन्मे जो संभवत: उनकी ननिहाल था, वह पिता के कठोर अनुशासन में पले बढ़े और उन्होंने अनेकों विद्वानों और साधुजन की संगति पाई, लेकिन अंग्रेज सरकार के प्रति विद्रोह की आग जो उनके सीने में एक बार बैठी, वह दिनों दिन धधकती चली गई। इस आग ने उनके देश प्रेम से ओत-प्रोत कवि को जगाया और उत्तरोत्तर देश के अतिरिक्त शेष सब प्रसंगों से विरक्त होते चले गए। यहां तक कि उनके उद्वेग ने उनके प्राणों के प्रति मोह को भी पीछे छोड़ दिया।
 यह सब जानते हैं कि उन्होंने हंसते हुए फांसी का फंदा गले में यह कहते हुए डाल लिया कि अंग्रेज साम्राज्य का विनाश उनकी अंतिम इच्छा है, लेकिन उनका पूरा जीवन वृत्तांत भी सब जानें और विस्मृत न हो, यह भी बहुत जरूरी है क्योंकि देश हर एक युग में रामप्रसाद बिस्मिल मांग सकता है।

विश्वास है यह पुस्तक उस आग को जिलाए रखने में भरपूर समर्थ होगी। 

रामप्रसाद बिस्मिल पारिवारिक पृष्ठभूमि व प्रारम्भिक जीवन वर्तमान मध्य प्रदेश में अंग्रेजों के शासन में एक देशी रियासत थी, ‘ग्वालियर’। यहीं चम्बल नदी के तट पर दो गांव हैं। इन दोनों गांवों के निवासी उस समय बड़े ही उद्दंड स्वभाव के थे। यहां के लोगों पर राज्य के कानूनों का कोई प्रभाव नहीं था। जमींदार लोग जब चाहें, अपनी इच्छा से भूमिकर देते थे, जब इच्छा नहीं होती, नहीं देते थे। इस संबंध में जब कभी कोई राज्य का अधिकारी इन गांवों में पहुंचता, तो जमींदार लोग अपनी समस्त सम्पत्ति को लेकर अपने पशुओं आदि के साथ चम्बल के बीहड़ों में निकल जाते। राज्य के कानूनों एवं आदेशों की खुलेआम अवहेलना करना इनके लिए एक सामान्य बात थी। इनके इस प्रकार के व्यवहार पर भी यदा-कदा तत्त्कालीन शासन ने इन पर अपनी उदारता दिखाई थी। इसे उदारता कहा जाए अथवा सनक कि इसी व्यवहार के कारण एक जमींदार को भूमिकर से मुक्ति मिल गई थी। इस घटना का वर्णन करते हुए पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है-
‘‘एक जमींदार के संबंध में एक कथा प्रचलित है कि मालगुजारी न देने के कारण ही उनको कुछ भूमि माफी में मिल गई। पहले तो कई साल तक भागे रहे। एक बार धोखे से पकड़ लिए गए तो तहसील के अधिकारियों ने उन्हें खूब सताया। कई दिन तक बिना खाना पानी बंधा रहने दिया। अन्त में जलाने की धमकी दे पैरों पर सूखी घास डालकर आग लगवा दी। किन्तु उन जमींदार महोदय ने भूमिकर देना स्वीकार नहीं किया और यही उत्तर दिया कि ग्वालियर महाराज के कोष में मेरे कर न देने से घाटा न पड़ जाएगा। संसार क्या जानेगा कि अमुक व्यक्ति उद्दण्डता के कारण ही अपना समय व्यतीत करता है। राज्य को लिखा गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि उतनी भूमि उन महोदय को माफी में दे दी गई।’’
इस प्रकार की उद्दण्डता करना यहां के निवासी अपने लिए बड़े गौरव की बात समझते थे। एक बार इन लोगों ने राज्य के ऊंटों की चोरी की और इस पर भी राजकोप से बच गए। इस घटना का वर्णन शहीद बिस्मिल ने निम्नलिखित शब्दों में किया है-
‘‘…….एक समय इन ग्रामों के निवासियों को एक अद्भुत खेल सूझा। उन्होंने महाराज के रिसाले के साठ ऊंट चुराकर बीहड़ों में छिपा दिए। राज्य को लिखा गया, जिस पर राज्य की ओर से आज्ञा हुई कि दोनों ग्राम तोप लगाकर उड़वा दिए जाएं। न जाने किस प्रकार समझाने-बुझाने से ऊंट वापस कर दिए गए और अधिकारियों को समझाया गया कि इतने बड़े राज्य में थोड़े से वीर लोगों का निवास है, इनका विध्वंस न करना ही उचित होगा। तब तोपें लौटाई गईं और ग्राम उड़ाए जाने से बचे।’’
देसी रियासतें आन्तरिक प्रशासन के लिए उसके शासन के अधीन थीं। इस रियासत के निवासी लूट-पाट आदि की घटनाएं प्राय: अपनी रियासत में नहीं करते थे। इस प्रकार की घटनाओं के लिए इन लोगों का कार्यक्षेत्र समीप का अंग्रेजी राज्य होता था। ये लोग अंग्रेजी राज्य के समीपवर्ती क्षेत्र के धनवान लोगों के घरों में डकैतियां डाल रातों-रात चम्बल के बीहड़ों में जा छिपते और इस प्रकार पुलिस इनका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाती। ये दोनों गाँव अंग्रेजी राज्य की सीमा से प्राय: पन्द्रह मील की दूरी पर हैं। यहीं एक गाँव में पण्डित श्री नारायण लाल रहते थे। पण्डितजी की पारिवारिक परिस्थिति अत्यन्त सामान्य स्तर की थी। घर में उनकी भाभी का एकाधिकार चलता था, जो एक स्वार्थी प्रवृत्ति की महिला थी। पण्डित नारायण लाल के लिए धीरे-धीरे भाभी का दुर्व्यवहार असहनीय हो गया। इसलिए उन्होंने घर छोड़ देने का निर्णय लिया और अपनी धर्मपत्नी तथा दो अबोध पुत्रों को साथ लेकर घर से निकल पड़े। इस समय उनके बड़े पुत्र मुरलीधर की अवस्था आठ वर्ष तथा छोटे पुत्र कल्याणमल की केवल छ: वर्ष थी। 
घर छोड़ने के बाद पण्डित नारायण लाल कई दिनों तक अजीविका की तलाश में इधर-उधर भटकते रहे। तथा अन्त में शाहजहांपुर में उत्तर प्रदेश में पहुँचे और यहीं अहरिया नामक गांव में रहने लगे। इस समय देश में भयंकर आकाल पड़ रहा था। अत्याधिक प्रयत्न करने पर शाहजहांपुर में एक अतार महोदय के यहां पण्डित नारायण लाल को एक मामूली सी नौकरी मिली, जिसमें नाममात्र के लिए तीन रुपए प्रतिमास वेतन मिलता था। भयंकर अकाल में परिवार के चार प्राणियों का भरण-पोषण कर पाना अत्यधिक कठिन कार्य था। दादीजी एक समय, वह भी केवल आधा पेट भोजन करतीं, तब भी परिवार का निर्वाह न हो पाता ! अत्यधिक निर्धनता एवं कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। इसका उल्लेख करते हुए पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल ने लिखा है- 
‘‘दादीजी ने बहुत प्रयत्न किया कि अपने आप केवल एक समय आधे पेट भोजन करके बच्चों का पेट पाला जाए, किन्तु फिर भी निर्वाह न हो सका। बाजरा, कुकनी, सामा, ज्वार इत्यादि खाकर दिन काटने चाहे, किन्तु फिर भी गुजारा न हुआ। तब आधा बथुआ, चना या कोई दूसरा साग, जो सबसे सस्ता हो उसे लेकर, सबसे सस्ता अनाज उसमें आधा मिलाकर थोड़ा सा नमक डालकर उसे स्वयं खाती, लड़को को चना या जौ की रोटी देती और इस तरह दादाजी भी समय व्यतीत करते थे। बड़ी कठिनता से आधा पेट खाकर दिन तो कट जाता, किन्तु पेट में घोटूं दबाकर रात काटना कठिन हो जाता।’’
भोजन के साथ ही वस्त्र एवं रहने के लिए मकान की समस्या भी विकट थी। अत: दादीजी ने कुछ घरों में कुटाई-पिसाई का काम करने का विचार किया, परन्तु इस अकाल के समय में यह काम मिलना भी सरल नहीं था। बड़ी ही कठिनाई के साथ कुछ घरों में इस तरह का काम मिल पाया, परन्तु इसे भी उन्हीं लोगों के घर में करना पड़ता था, जो लोग काम देते थे। यह काम भी बहुत ही कम मिल पाता था-मुश्किल से दिन में पाँच-छ: सेर जिसका पारिश्रमिक उन दिनों एक पैसा प्रति पसेरी मिलता था। अपनी पारिवारिक विवशताओं के कारण उन्हें उन्हीं एक डेढ़ पैसों के लिए तीन-चार घण्टे काम करना पड़ता था। इसके बाद ही घर आकर बच्चों के भोजन की व्यवस्था करनी पड़ती। फिर भी दादीजी संतोष और धैर्य के साथ विपत्ति का सामना करतीं। वह बड़ी ही साहसी महिला थीं। पण्डित नारायण लाल कभी-कभी पत्नी एवं बच्चों के कष्टों को देखकर दु:खी हो जाते और अपनी पत्नी से पुन: अपने मूल निवास स्थान ग्वालियर चल पड़ने को कहते, किन्तु दादी बड़ी स्वाभिमानी महिला थीं। ऐसे अवसरों पर वे अपने पति का साहस बढ़ाती और कहतीं कि जिन लोगों के कारण घर छोड़ना पड़ा, फिर उन्हीं की शरण में जाना एक स्वाभिमानी व्यक्ति को शोभा नहीं देता। स्वाभिमान की रक्षा करते हुए प्राणों का परित्याग कर देना अच्छा है; किन्तु स्वाभिमान का परित्याग मृत्यु से भी बढ़कर है। दु:ख-सुख सदा लगे रहते हैं। दु:ख के बाद सुख भी प्राप्त होता है। ये दिन भी सदा नहीं रहेंगे। अत: दादीजी फिर कभी लौटकर ग्वालियर राज्य नहीं गईं। 
धीरे-धीरे चार-पांच वर्ष बीत गए। पण्डित नारायण लाल का कुछ स्थानीय लोगों से परिचय भी बढ़ गया। अकाल भी बीत गया। पण्डित जी के परिवार पर लोगों का विश्वास एवं स्नेह भी बढ़ गया। ब्राह्मण होने के कारण लोग भी सम्मान भी देने लगे। दादीजी को कभी-कभी कुछ लोग अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित करने लगे। पहले की तुलना में काम भी अधिक मिलने लगा। कभी कुछ दान दक्षिणा भी मिल जाती। इस प्रकार धीरे-धीरे कठिनाइयां कुछ कम होने लगीं।

पण्डित नारायण लाल भी ब्राह्मणवृत्ति करने लगे। कठिन परिश्रम से घर की स्थिति में कुछ सुधार हुआ। धीरे-धीरे बच्चे भी बड़े हो गए थे। बढ़ा पुत्र पाठशाला में पढ़ने जाने लगा। पण्डितजी के कठिन परिश्रम से अब उनका वेतन भी बढ़कर सात रूपए प्रतिमाह हो गया था। परिवार की स्थिति को सुधारने में दादीजी के परिश्रम की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। ऐसे दुर्दिनों में उन्होंने जिस साहस का परिचय दिया, एक सामान्य ग्रामीण महिला से ऐसी अपेक्षा प्राय: कम ही की जाती है।
सरफ़रोशी की तमन्ना (गीत)

रामप्रसाद ‘बिस्मिल’
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है ज़ोर कितना बाजुए-क़ातिल में है
है लिए हथियार दुश्मन ताक़ में बैठा उधर

और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर

ख़ून से खेलेंगे होली ग़र वतन मुश्क़िल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
हाथ जिनमें हो जुनूं कटते नहीं तलवार से

सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से

और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
हम तो घर से निकले ही थे बांधकर सर पर क़फ़न

जां हथेली में लिए लो बढ़ चले हैं ये क़दम

ज़िन्दगी तो अपनी मेहमां मौत की महफ़िल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्क़लाब

होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको न आज

दूर रह पाए जो हमसे, दम कहाँ मन्ज़िल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
रामप्रसाद ‘बिस्मिल’
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है ज़ोर कितना बाजुए-क़ातिल में है
क्यों नहीं करता कोई भी दूसरा कुछ बातचीत

देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तिरी महफ़िल में है
ऐ शहीदे-मुल्क़ो-मिल्लत मैं तिरे ऊपर निसार

अब तिरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है
वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां

हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है
खींच कर लाई है सबको क़त्ल होने की उमीद

आशिक़ों का आज जमघट कूँचा-ए-क़ातिल में है
यूँ खड़ा मक़तल में क़ातिल कह रहा है बार-बार

क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है
अब न अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़

एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है….!.

नीरज आर्य अँधेड़ी

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सूर्यवंशी मौर्य क्षत्रिय राजपूत वंश की गौरव गाथा—–

सूर्यवंशी मौर्य क्षत्रिय राजपूत वंश की गौरव गाथा——-

मौर्य वंश से जुडी भ्रांतियों का तर्कपूर्ण खण्डन टीम राजपूताना सोच और क्षत्रिय इतिहास द्वारा,
जरूर पढ़ें और अधिक से अधिक शेयर भी करें।।
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मौर्यो के रघुवंशी क्षत्रिय होने के प्रमाण——–

महात्मा बुध का वंश शाक्य गौतम वंश था जो सूर्यवंशी क्षत्रिय थे।कौशल नरेश प्रसेनजित के पुत्र विभग्ग ने शाक्य क्षत्रियो पर हमला किया उसके
बाद इनकी एक शाखा पिप्लिवन में जाकर रहने लगी। वहां मोर पक्षी की अधिकता के कारण मोरिय कहलाने लगी।

बौद्ध रचनाओं में कहा गया है कि ‘नंदिन’(नंदवंश) के कुल का कोई पता नहीं चलता (अनात कुल) और चंद्रगुप्त को असंदिग्ध रूप से अभिजात कुल का बताया गया है।

चंद्रगुप्त के बारे में कहा गया है कि वह मोरिय नामक क्षत्रिय जाति की संतान था; मोरिय जाति शाक्यों की उस उच्च तथा पवित्र जाति की एक शाखा थी, जिसमें महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था। कथा के अनुसार, जब अत्याचारी कोसल नरेश विडूडभ ने शाक्यों पर आक्रमण किया तब मोरिय अपनी मूल बिरादरी से अलग हो गए और उन्होंने हिमालय के एक सुरक्षित स्थान में जाकर शरण ली। यह प्रदेश मोरों के लिए प्रसिद्ध था, जिस कारण वहाँ आकर बस जाने वाले ये लोग मोरिय कहलाने लगे, जिनका अर्थ है मोरों के स्थान के निवासी। मोरिय शब्द ‘मोर’ से निकला है, जो संस्कृत के मयूर शब्द का पालि पर्याय है।

एक और कहानी भी है जिसमें मोरिय नगर नामक एक स्थान का उल्लेख मिलता है। इस शहर का नाम मोरिय नगर इसलिए रखा गया था कि वहाँ की इमारतें मोर की गर्दन के रंग की ईंटों की बनी हुई थीं। जिन शाक्य गौतम क्षत्रियों ने इस नगर का निर्माण किया था, वे मोरिय कहलाए।

महाबोधिवंस में कहा गया है कि ‘कुमार’ चंद्रगुप्त, जिसका जन्म राजाओं के कुल में हुआ था (नरिंद-कुलसंभव), जो मोरिय नगर का निवासी था, जिसका निर्माण साक्यपुत्तों ने किया था, चाणक्य नामक ब्राह्मण (द्विज) की सहायता से पाटलिपुत्र का राजा बना।
महाबोधिवंस में यह भी कहा गया है कि ‘चंद्रगुप्त का जन्म क्षत्रियों के मोरिय नामक वंश में’ हुआ था (मोरियनं खत्तियनं वंसे जातं)। बौद्धों के दीघ निकाय नामक ग्रन्थ में पिप्पलिवन में रहने वाले मोरिय नामक एक क्षत्रिय वंश का उल्लेख मिलता है। दिव्यावदान में बिन्दुसार (चंद्रगुप्त के पुत्र) के बारे में कहा गया है कि उसका क्षत्रिय राजा के रूप में विधिवत अभिषेक हुआ था (क्षत्रिय-मूर्धाभिषिक्त) और अशोक (चंद्रगुप्त के पौत्र) को क्षत्रिय कहा गया है।

मौर्यो के 1000 हजार साल बाद विशाखदत्त ने मुद्राराक्षस ग्रन्थ लिखा।जिसमे चन्द्रगुप्त को वृषल लिखा।
वर्षल का अर्थ आज तक कोई सही सही नही बता पाया पर हो सकता है जो अभिजात्य न हो।
चन्द्रगुप्त क्षत्रिय था पर अभिजात्य नही था एक छोटे से गांव के मुखिया का पुत्र था।
अब इस ग्रन्थ को लिखने के भी 700 साल बाद यानि अब से सिर्फ 300 साल पहले किसी ढुंढिराज ने इस पर एक टीका लिखी जिसमे मनगढंत कहानी लिखी।

जबकि हजारो साल पुराने भविष्य पुराण में लिखा है कि मौर्यो ने विष्णुगुप्त ब्राह्मण की मदद से नन्दवंशयो का शासन समाप्त कर पुन क्षत्रियो की प्रतिष्ठा स्थापित की।

दो हजार साल पुराने बौद्ध और जैन ग्रन्थ और पुराण जो पण्डो ने लिखे उन सबमे मौर्यो को क्षत्रिय लिखा है।
1300 साल पुराने जैन ग्रन्थ कुमारपाल प्रबन्ध में चित्रांगद मौर्य को रघुवंशी क्षत्रिय लिखा है।

महापरिनिव्वानसुत में लिखा है कि महात्मा बुद्ध के देहावसान के समय सबसे बाद मे पिप्पलिवन के मौर्य आए ,उन्होंने भी खुद को शाक्य वंशी गौतम क्षत्रिय बताकर बुद्ध के शरीर के अवशेष मांगे,

एक पुराण के अनुसार इच्छवाकु वंशी मान्धाता के अनुज मांधात्री से मौर्य वंश की उतपत्ति हुई है।

इतने प्रमाण होने और आज भी राजपूतो में मौर्य वंश का प्रचलन होने के बावजूद सिर्फ 200-300 साल पुराने ग्रन्थ के आधार पर कुछ लोग मौर्यो को क्षत्रिय नही घोषित कर देते हैं।

ये वो हैं जिन्हें सही इतिहास की जानकारी नही है

हर ऑथेंटिक पुराण में मौर्य को क्षत्रिय सत्ता दोबारा स्थापित करने वाला वंश लिखा है
वायु पुराण विष्णु पुराण भागवत पुराण मत्स्य पुराण सबमें मौर्य वंश को सूर्यवँशी क्षत्रिय लिखा है।।

मत्स्य पुराण के अध्याय 272 में यह कहा गया है की दस मौर्य भारत पर शासन करेंगे और जिनकी जगह शुंगों द्वारा ली जाएगी और शतधन्व इन दस में से पहला मौरिया(मौर्य) होगा।
विष्णु पुराण की पुस्तक चार, अध्याय 4 में यह कहा गया है की “सूर्य वंश में मरू नाम का एक राजा था जो अपनी योग साधना की शक्ति से अभी तक हिमालय में एक कलाप नाम के गाँव में रह रहा होगा” और जो “भविष्य में क्षत्रिय जाती की सूर्य वंश में पुनर्स्थापना करने वाला होगा” मतलब कई हजारो वर्ष बाद।

इसी पुराण के एक दुसरे भाग पुस्तक चार, अध्याय 24 में यह कहा गया है की “नन्द वंश की समाप्ति के बाद मौर्यो का पृथ्वी पर अधिकार होगा, क्योंकि कौटिल्य राजगद्दी पर चन्द्रगुप्त को बैठाएगा।”

कर्नल टॉड मोरया या मौर्या को मोरी का विकृत रूप मानते थे जो वर्तमान में एक राजपूत वंश का नाम है।

महावंश पर लिखी गई एक टीका के अनुसार मोरी नगर के क्षत्रिय राजकुमारों को मौर्या कहा गया।

संस्कृत के विद्वान् वाचस्पति के कलाप गाँव को हिमालय के उत्तर में होना मानते हैं-मतलब तिब्बत में। ये ही बात भागवत के अध्याय 12 में भी कही गई है. “वायु पुराण यह कहते हुए प्रतीत होता है की वो(मारू) आने वाले उन्नीसवें युग में क्षत्रियो की पुनर्स्थापना करेगा।”
(खण्ड 3, पृष्ठ 325) विष्णु पुराण की पुस्तक तीन के अध्याय छः में एक कूथुमि नाम के ऋषि का वर्णन है।

गुहिल वंश के बाप्पा रावल के मामा चित्तौड़ के राजा मान मौर्य थे।
चित्तौड की स्थापना चित्रांगद मौर्य ने की थी।
कुमारपाल प्रबन्ध में 36 क्षत्रिय वंशो की सूची में मौर्य वंश का भी नाम है
गुजरात के जैन कवि ने चित्रांगद मौर्य को रघुवंशी लिखा था 7 वी सदी में।।

मौर्यो ने पुरे भारत और मध्य एशिया तक पर राज किया।दूसरे वंशो के राज्य उनके सामने बहुत छोटे हैं
कोई 100 गांव की स्टेट कोई 500 गांव की स्टेट वो सब मशहूर हो गए।
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चन्द्रगुप्त मौर्य का जीवन—–

चन्द्रगुप्त मोरिय के पिता
पिप्लिवंन के सरदार थे जो मगध के राजा नन्द के हमले में मारे गये।
ब्राह्मण चाणक्य का नन्द राजा ने अपमान किया जिसके बाद चाणक्य ने देश को शूद्र राजा के चंगुल से मुक्ति दिलाने का संकल्प लिया। एक दिन
चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को देखा तो उसके भीतर छिपी प्रतिभा को पहचान
गया। उसने च्न्द्र्गुप्र के वंश का पता कर उसकी माँ से शिक्षा देने के लिए
चन्द्रगुप्त को अपने साथ लिया। फिर वो उसे तक्षिला ले गया जहाँ
चन्द्रगुप्त को शिक्षा दी गयी।

उसी समय यूनानी राजा सिकन्दर ने भारत
पर हमला किया।
चन्द्रगुप्त और चानक्य ने पर्वतीय राजा पर्वतक से मिलकर नन्द राजा पर
हमला कर उसे मारकर देश को मुक्ति दिलाई। साथ ही साथ
यूनानी सेना को भी मार भगाया। उसके बाद बिन्दुसार और अशोक राजा
हुए। सम्राट अशोक बौध बन गया।

अशोक के कई पुत्र हुए जिनमे महेंद्र कुनाल,जालोंक दशरथ थे
जलोक को कश्मीर मिला,दशरथ को मगध की गद्दी मिली।
कुणाल के पुत्र सम्प्रति को
पश्चिमी और मध्य भारत यानि आज का गुजरात राजस्थान मध्य प्रदेश
आदि मिला।
सम्प्रति जैन बन गया उसके बनाये मन्दिर आज भी राजस्थान में मिलते हैं, सम्प्रति के के वंशज आज के मेवाड़ उज्जैन इलाके में राज करते रहे।

पश्चिम भारत के मौर्य क्षत्रिय राजपूत माने गये। चित्तौड पर इनके राजाओ के नाम महेश्वर भीम
भोज धवल और मान थे।

मौर्य और राजस्थान——–
राजस्थान के कुछ भाग मौर्यों के अधीन या प्रभाव
क्षत्र में थे। अशोक का बैराठ का शिलालेख
तथा उसके उत्तराधिकारी कुणाल के पुत्र
सम्प्रति द्वारा बनवाये गये मन्दिर मौर्यां के
प्रभाव की पुश्टि करते हैं। कुमारपाल प्रबन्ध
तथा अन्य जैन ग्रंथां से अनुमानित है कि चित्तौड़
का किला व चित्रांग तालाब मौर्य राजा चित्रांग
का बनवाया हुआ है। चित्तौड़ से कुछ दूर
मानसरोवर नामक तालाब पर राज मान का,
जो मौर्यवशी माना जाता है, वि. सं. 770
का शिलालेख कर्नल टॉड को मिला, जिसमें
माहेश्वर, भीम, भोज और मान ये चार नाम
क्रमशः दिये हैं। कोटा के निकट कणसवा (कसुंआ)
के शिवालय से 795 वि. सं. का शिलालेख
मिला है, जिसमें मौर्यवंशी राजा धवल का नाम है।
इन प्रमाणां से मौर्यों का राजस्थान में अधिकार
और प्रभाव स्पष्ट हाता है।
चित्तौड़ के ही एक और मौर्य शासक धरणीवराह का भी नाम मिलता है

शेखावत गहलौत राठौड़ से पहले शेखावाटी क्षेत्र और मेवाड़ पर मौर्यो की सत्ता थी।शेखावाटी से मौर्यो ने यौधेय जोहिया राजपूतों को हटाकर जांगल देश की ओर विस्थापित कर दिया था।
पृथ्वीराज रासो में पृथ्वीराज चौहान के सामन्तों में भीम मौर्य और सारण मौर्य मालंदराय मौर्य और मुकुन्दराय मौर्य का भी नाम आता है।
ये मौर्य सम्राट अशोक के पुत्र सम्प्रति के वंशज थे।मौर्य वंश का ऋषि गोत्र भी गौतम है।

गहलौत वंशी बाप्पा रावल के मामा चित्तौड के मान मौर्य थे, बाप्पा रावल ने मान मौर्य से चित्तौड का किला जीत
लिया और उसे अपनी राजधानी बनाया।

इसके बाद मौर्यों की एक शाखा
दक्षिण भारत चली गयी और मराठा राजपूतो में मिल गयी जिन्हें आज मोरे मराठा कहा जाता है वहां इनके कई राज्य थे। आज भी मराठो में मोरे वंश उच्च कुल माना जाता है।

खानदेश में मौर्यों का एक लेख मिला है…जो ११ वी शताब्दी का है।जिसमे उल्लेख है के ये मौर्य काठियावाड से यहाँ आये….! एपिग्रफिया इंडिका,वॉल्यूम २,पृष्ठ क्रमांक २२१….सदर लेख वाघली ग्राम,चालीसगांव तहसील से मिला है….

एक शाखा उड़ीसा चली गयी ।वहां के राजा धरणीवराह के वंशज रंक उदावाराह के प्राचीन लेख में उन्होंने सातवी सदी में चित्तौड या चित्रकूट से आना लिखा है।

कुछ मोरी या मौर्य वंशी
राजपूत आज भी आगरा मथुरा निमाड़ मालवा उज्जैन में मिलते हैं। इनका गोत्र गौतम है। बुद्ध का गौत्र भी गौतम था जो इस बात का प्रमाण है कि मौर्य
और गौतम वंश एक ही वंश की दो शाखाएँ हैं,
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मौर्य और परमार वंश का सम्बन्ध—–

13 वी सदी में मेरुतुंग ने स्थिरावली की रचना की थी
जिसमे उज्जैन के सम्राट गंधर्वसेन को जो विक्रमादित्य परमार के पिता थे उन्हें मौर्य सम्राट सम्प्रति का पौत्र लिखा था।
जिन चित्तौड़ के मौर्यो को भाट ग्रंथो में मोरी लिखा है वहां मोरी को परमार की शाखा लिख दिया।जबकि परमार नाम बहुत बाद में आया।उन्ही को समकालीन विद्वान रघुवंशी मौर्य लिखते है।
उज्जैन अवन्ति मरुभूमि तक सम्प्रति का पुरे मालवा और पश्चिम भारत पर राज था जो उसके हिस्से में आया था।इसकी राजधानी उज्जैन थी।इसी उज्जैन में स्थिरावली के अनुसार सम्प्रति मौर्य के पौत्र के पुत्र विक्रमादित्य ने राज किया जिन्हें भाट ग्रंथो में परमार लिखा गया।

परमार राजपूतो की उत्पत्ति अग्नि वंश से मानी जाती है परन्तु अग्नि से किसी की उत्पत्ति नही होती है. राजस्थान के जाने माने विद्वान सुरजन सिंंह झाझड, हरनाम सिंह चौहान के अनुसार परमार राजवंश मौर्य वंश की शाखा है.इतिहासकार गौरीशंकर ओझा के अनुसार सम्राट अशोक के बाद मौर्यो की एक शाखा का मालवा पर शासन था. भविष्य पुराण मे भी इसा पुर्व मे मालवा पर परमारो के शासन का उल्लेख मिलता है.

“राजपूत शाखाओ का इतिहास ” पेज # २७० पर देवी सिंंह मंडावा महत्वपूर्न सूचना देते है. लिखते है कि विक्रमादित्य के समय शको ने भारत पर हमला किया तथा विक्रमादित्य न उन्हेे भारत से बाहर खदेडा. विक्रमादित्य के वंशजो ने ई ५५० तक मालवा पर शासन किया. इन्ही की एक शाखा ने ६ वी सदी मे गढवाल चला गया और वहा परमार वंश की स्थापना की.

अब सवाल उठता है कि विक्रमादित्य किस वंश से थे? कर्नल जेम्स टाड के अनुसार भारत के इतिहास मे दो विक्रमादित्य आते है. पहला मौर्यवंशी विक्रमादित्य जिन्होने विक्रम संवत की सुरुआत की. दूसरा गुप्त वंश का चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य जो एक उपाधि थी..

मिस्टर मार्सेन ने “ग्राम आफ सर्वे “मे लिखा है कि शत्धनुष मौर्य के वंश मे महेन्द्रादित्य का जन्म हुआ और उसी का पुत्र विक्रमादित्य हुआ..

कर्नल जेम्स टाड पेज # ५४ पर लिखते है कि मौर्य तक्षक वंशी थे जो बाद मे परमार राजपूत कहलाये. अत: स्पष्ट हो जाता है कि परमार वंश मौर्य वंश की ही शाखा है.

कालीदास , अमरिसंह , वराहमिहिर,धनवंतरी, वररुिच , शकु आदि नवरत्न विक्रमाद्वित्य के दरबार को सुशोभित करते थे तथा इसी राजवंश मे जगत प्रिसद्ध राजा भोज का जन्म हुआ.

इसी आधार पर मौर्य और परमार को एक मानने के प्रमाण हैं।
अधिकतर पश्चिम भारत के मौर्य परमार कहलाने लगे और छोटी सी शाखा बाद तक मोरी मौर्य राजपूत कहलाई जाती रही और भाट इन्हें परमार की शाखा कहने लगे जबकि वास्तव में उल्टा हो सकता है।
कर्नल जेम्स टॉड ने भी चन्द्रगुप्त मौर्य को
परमार वंश से लिखा है।

चन्द्रगुप्त के समय के सभी जैन और बौध धर्म मौर्यों को शुद्ध सूर्यवंशी क्षत्रिय प्रमाणित करते है ।चित्तौड के मौर्य राजपूतो को पांचवी सदी में
सूर्यवंशी ही माना जाता था
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मौर्य वंश आज राजपूतो में कहाँ गायब हो गया??????

मौर्य वंश अशोक के पोत्रो के समय दो भागो में बंट गया।
पश्चिमी भाग सम्प्रति मौर्य के हिस्से में आया।वो जैन बन गया था।उसकी राजधानी उज्जैन थी।उसके वंशजो ने लम्बे समय तक मालवा और राजस्थान में राज किया।

पूर्वी भाग के राजा बौद्ध बने रहे और पुष्यमित्र शुंग द्वारा मारे गए।

पश्चिमी भारत के मौर्य परमार राजपूतो के नाम से प्रसिद्ध हुए।

इनकी चित्तौड़ शाखा मौर्य ही कहलाती रही।
चित्तौड़ शाखा के ही वंश भाई सिंध के भी राजा थे।उनका नाम साहसी राय मौर्य था जिन्हें मारकर चच ब्राह्मण ने सिंध पर राज किया तब उनके रिश्ते के भाई चित्तौड़ से वहां चच ब्राह्मण से लड़ने गए थे जिसका जिक्र 8 वी सदी में लिखी चचनामा में मिलता है।

जब बापा रावल ने मान मोरी को हराकर चित्तौड़ से निकाल दिया तो यहाँ के मौर्य मोरी राजपूत इधर उधर बिखर गए—-

1-एक शाखा रंक उदवराह के नेतृत्व में उड़ीसा चली गयी।वहां के अधिकतर सूर्यवँशी आज उसी के वंशज होने का दावा करते हैं।

2-एक शाखा हिमाचल प्रदेश गयी और चम्बा में भरमोर रियासत की स्थापना की।इनके लेख में इन्हे 5 वी सदी के पास चित्तौड़ से आना लिखा है।ये स्टेट आज भी मौजूद है और इनके राजा को सूर्यवँशी कहा जाता है।इस शाखा के राजपूत अब चाम्बियाल राजपूत कहलाते हैं
https://en.m.wikipedia.org/wiki/Chambial

3-एक शाखा मालवा की और पहले से थी और आज भी निमाड़ उज्जैन और कई जिलो में शुद्ध मौर्य राजपूत मिलते हैं।
एक शाखा आगरा के पास 24 गाँव में है और शुद्ध मोरी राजपूत कहलाती है।
इस राठौर राजपूत ठिकाने की लड़की मौर्य राजपूत ठिकाने में ब्याही है
http://www.indianrajputs.com/view/maswadia

4-एक शाखा महाराष्ट्र चली गयी।उनमे खानदेश में आज भी मौर्य राजपूत हैं जबकि कुछ मराठा बन गए और मोरे मराठा कहलाते हैं।

5-एक शाखा गुजरात चली गयी और जमीन राज्य न रहने से राजपूतो में मिल गयी और कार्डिया कहलाती है।

वास्तव में मौर्य अथवा मोरी वंश एक शुद्ध सूर्यवंशी क्षत्रिय राजपूत वंश है जो आज भी राजपूत समाज का अभिन्न अंग है।
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मौर्य मोरी वंश के गोत्र प्रवर आदि—
गोत्र–गौतम और कश्यप
प्रवर तीन–गौतम वशिष्ठ ब्राह्स्पत्य
वेद–यजुर्वेद
शाखा–वाजसनेयी
कुलदेव–खांडेराव
गद्दी–कश्मीर,पाटिलिपुत्र, चित्तौड़, उज्जैनी,भरमौर, सिंध,
निवास–आगरा, मथुरा, फतेहपुर सीकरी, उज्जैन, निमाड़, हरदा,इंदौर, खानदेश महाराष्ट्र ,तेलंगाना, गुजरात(karadiya में),हिमाचल प्रदेश,मेवाड़
सांस्कृतिक रिवाज–शुभ कार्यो में मोर पंख रखते हैं।
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रेफरेंस—
1–http://www.theosophy.wiki/en/Morya
2–पुराणों में मौर्य वंश
http://www.katinkahesselink.net/blavatsky/…/v6/y1883_173.htm
3-https://en.m.wikipedia.org/…/Ancestry_of_Chandragupta_Maurya
4–आचार्य चाणक्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र
5-जयशंकर प्रसाद कृत “चन्द्रगुप्त”
6-http://www.indianrajputs.com/view/maswadia

Posted in छोटी कहानिया - Chooti Kahaniya

एक नगर में एक मशहूर चित्रकार रहता था ।

एक नगर में एक मशहूर चित्रकार रहता था ।
चित्रकार ने एक बहुत सुन्दर तस्वीर बनाई और उसे नगर के चौराहे मे लगा दिया और नीचे लिख दिया कि जिस किसी को , जहाँ भी इस में कमी नजर आये वह वहाँ निशान लगा दे ।
जब उसने शाम को तस्वीर देखी उसकी पूरी तस्वीर पर निशानों से ख़राब हो चुकी थी ।
यह देख वह बहुत #दुखी हुआ ।
उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करे वह दुःखी बैठा हुआ था ।
तभी उसका एक मित्र वहाँ से गुजरा उसने उस के दुःखी होने का कारण पूछा तो उसने उसे पूरी घटना बताई ।
उसने कहा एक काम करो कल दूसरी तस्वीर बनाना और उस मे लिखना कि जिस किसी को इस तस्वीर मे जहाँ कहीं भी कोई कमी नजर आये उसे सही कर दे ।
उसने अगले दिन यही किया । शाम को जब उसने अपनी तस्वीर देखी तो उसने देखा की तस्वीर पर किसी ने कुछ नहीं किया । वह संसार की # रीति समझ गया ।
“कमी निकालना , निंदा करना , बुराई करना आसान लेकिन उन कमियों को दूर करना अत्यंत कठिन होता ह This is life……..
जब दुनिया यह कह्ती है कि
‘हार मान लो’
तो आशा धीरे से कान में कह्ती है कि.,,,,
‘एक बार फिर प्रयास करो’
और यह ठीक भी है..,,,
“जिंदगी आईसक्रीम की तरह है, टेस्ट करो तो भी पिघलती है;.,,,
वेस्ट करो तो भी पिघलती है,,,,,,
इसलिए जिंदगी को टेस्ट करना सीखो,
वेस्ट तो हो ही रही है.,,,,

Life is very beautiful !!!