Posted in छोटी कहानिया - Chooti Kahaniya

एक बार की बात हे जब एक गाव में एक महाराज सत्यनारायण देव की कथा करवा रहे थे

https://www.facebook.com/samarpan.trivedi?pnref=story

एक बार की बात हे जब एक गाव में एक महाराज सत्यनारायण देव की कथा करवा रहे थे…गाव के सभी भाविक भक्त वह कथा का रसपान करने वहा आये हुए थे.
सभी ने मन लगाकर कथा सुनी. कथा जब पूर्ण हो गई तब कथा करने वाले महाराज को नियम अनुसार दक्षिणा और अनाज देने के लिए भक्त कतार में खड़े हो गए.
अब वह अनाज/दक्षिणा देते समय कतार में सबसे आगे एक स्त्री खड़ी थी,
उसने अनाज व दक्षिणा तो दिया साथ में महाराज के ललाट पर कुमकुम तिलक भी किया.और वह करने के बाद वह स्त्री निचे एक पीपल के वृक्ष का पर्ण पड़ा था वहा कुमकुम लगाके चली गई. कतार में सब खड़े थे सबने यह देखा, और एक के बाद एक सभी वही करने लगे.
सब महाराज को तिलक लगाते और निचे पड़े पर्ण पर भी तिलक करते.
ऐसा उन सभी लोगो ने किया जो कतार में खड़े थे. महाराज अपने दक्षिणा बटोरने में व्यस्त थे.
लेकिन वहा एक सज्जन युवान वह सब देख रहा था…
उसे प्रश्न हुआ की “सब महाराज को तिलक कर रहे हे वहा तक तो ठीक हे, लेकिन निचे पड़े पर्ण पर सब तिलक क्यों कर रहे हे?”
उसने यह प्रश्न सभी से पूछा सब का एक ही उत्तर था “आगे वाला कर रहा हे इस लिए”
तब वह युवान सबसे पहले जो स्त्री खड़ी थी उसके घर गया क्योकि अब तक वो घर जा चुकी थी.
वहा पोह्चने के बाद वह युवक ने वह स्त्री से पूछा “आपने वह पीपल के पर्ण पर तिलक क्यों किया?”
स्त्री ने कहा… “केसा तिलक? मेने तो वहा मेरा जो कुमकुम वाला हाथ था उसको पोछने के लिए वह पर्ण का उपयोग किया…”
वह युवक जोर-जोर से हसने लगा लोगो की मूर्खता पर और अपने घर चल दिया…
.
मित्रों इसे कहा जाता हे अंधानुकरण….
आज यह सार्वत्रिक देखने को मिल रहा हे.
चाहे वह सामजिक क्षेत्र हो, राजनीति, अर्थकारण, शिक्षण या आध्यात्म.
हर जगह पर मात्र अंधानुकरण.
सबसे ज्यादा यह आध्यात्म और धर्म में आज छुपा हुआ हे.
हमारा वैदिक धर्म सत्य और विज्ञान की नीव पर खड़ा हे.
प्रत्येक कृति के पीछे तर्क और विज्ञान आवश्यक हे.
Intellectual Love towards God… भगवान, आध्यात्म और धर्म के प्रति बौधिक प्रेम निर्माण होना चाहिए.
अंधानुकरण हमें निश्चित ही अधःपतन की दिशा में गतिशील करता हे.

Posted in छोटी कहानिया - Chooti Kahaniya

मनीषा पंचक स्तोत्रम्।

Image may contain: one or more people
मेनारिया-सन्देश

 

मनीषा पंचक स्तोत्रम्।
एक दिन यतिवर शंकर अपने शिष्यों के संग गंगा जी में स्नान करने काशी गये थे । गंगा स्नान के बाद जब वे वापस लौट रहे थे तो उन्हें एक चाण्डाल चार कुत्तों को साथ लिए उसी रास्ते में आता दिखाई दिया । यतिवर शंकर रुक कर एक किनारे खड़े हो गये ताकि कहीं उनसे चाण्डाल छू न जाय अन्यथा वे अपवित्र हो जायेंगे और उच्च स्वर में बोले, ” दूर हटो, दूर हटो ।”

यह सुनकर चण्डाल ने कहा, ” ब्राह्मण देवता, आप तो वेदान्त के अद्वैतवादी मत का प्रचार करते हुए भ्रमण करते हैं । फिर आपके लिये यह अस्पृश्यता-बोध (छुआ-छूत), भेद-भाव दिखाना कैसे संभव होता है ? मेरा शरीर छू जाने से आप अपवित्र हो जायेंगे, यह सोच कर आप आशंकित हैं ; किन्तु क्या हमदोनों का शरीर एक ही पंचतत्व के उपादानों से निर्मित नहीं है ? आपके भीतर जो आत्मा हैं और मेरे भीतर जो आत्मा हैं, वे एक नहीं हैं क्या ? हम दोनों के भीतर, सभी प्राणियों के भीतर क्या एक ही शुद्ध आत्मा विद्यमान नहीं हैं ?

आचार्य शंकर तत्क्षण समझ गए कि यह कोई साधारण चांडाल नहीं है और चांडाल के वेश में स्वयं भगवान् विश्वनाथ है । आचार्य उन्हें दंडवत प्रणाम किया और उनकी स्तुति की। आचार्य ने जिन श्लोको से चांडाल वेशधारी भगवान् विश्वनाथ की स्तुति वे श्लोक “मनीषा पंचकं” के नाम से प्रसिद्द हैं । इस स्त्रोत्र के प्रत्येक स्तुति के अन्त में कहा गया है- ” इस सृष्टि को जिस किसी ने भी अद्वैत-दृष्टि से देखना सीख लिया है, वह चाहे कोई ब्राह्मण हो चण्डाल हो; वही मेरा सच्चा गुरु है । “इन श्लोको कि संख्या पांच है और प्रत्येक के अंत में ‘मनीषा’ शब्द आता है इसीलिए इन्हें “मनीषा पंचकं” कहा गया है । जो इस प्रकार हैं –

चाण्डाल (वेश धारी भगवान शिव) ने श्री आद्य शंकराचार्य जी से पूछा –

अन्नामयादान्नमयम्थ्वा चैतन्यमेव चैतान्यात ।
द्विजवर दूरीकर्तु वाञछसि किं ब्रूहि गच्छ गच्छेति ॥

(हे द्विज श्रेष्ठ ! ” दूर हटो, दूर हटो” इन शब्दों के द्वारा आप किसे दूर करना चाहते हैं ? क्या आप (मेरे) इस अन्नमय शरीर को अपने शरीर से जो कि वह भी अन्नमय है अथवा शरीर के अंतर्गत स्थित उस चैतन्य (चेतना) को जो हमारे सभी क्रिया कलापों का दृष्टा और साक्षी है ? कृपया बताएं !)

किं गंगाम्बुनि बिम्बितेअम्बरमनौ चंडालवाटीपयः
पूरे वांतरमस्ति कांचनघटी मृत्कुम्भयोर्वाम्बरे ।
प्रत्यग्वस्तुनि निस्तारन्ग्सह्जान्न्दाव्बोधाम्बुधौ
विप्रोअयम्श्व्प्चोअय्मित्य्पिमहन्कोअयम्विभेद्भ्रमः ॥

(हे ब्राह्मण देवता ! कृपया मुझे बताएं कि क्या ब्राह्मण अथवा चांडाल सभी के शरीरो का साक्षी और दृष्टा एक नहीं है भिन्न है ? क्या साक्षी में नानात्व है ? क्या वह एक और अद्वितीय नहीं है ? आप (जैसे विद्वान) इस नानात्व के भ्रम में कैसे पड़ सकते हैं ? कृपया मुझे यह भी बताएं कि क्या एक सोने के बर्तन और एक मिट्टी के बर्तन में विद्यमान खाली जगह के बीच कोई अंतर है ? और क्या गंगाजल और मदिरा में प्रतिबिंबित सूर्य में किसी प्रकार का भेद है ? सूर्य के प्रतिबिम्ब भिन्न हो सकते हैं, पर बिम्ब रूप सूर्य तो एक ही है।)

तब भगवान् श्री आद्य शंकराचार्य ने उत्तर दिया –

|| मनीषा पञ्चकं ||

जाग्रत्स्वप्न सुषुत्पिषु स्फुटतरा या संविदुज्जृम्भते
या ब्रह्मादि पिपीलिकान्त तनुषु प्रोता जगत्साक्षिणी।
सैवाहं न च दृश्य वस्त्विति दृढ प्रज्ञापि यस्यास्तिचेत
चण्डालोस्तु स तु द्विजोस्तु गुरुरित्येषा मनीषा मम ॥ १ ॥

(जो चेतना जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति आदि तीनों अवस्थाओं के ज्ञान को प्रकट करती है जो चैतन्य विष्णु, शिव आदि देवताओं में स्फुरित हो रहा है वही चैतन्य चींटी आदि क्षुद्र जन्तुओ तक में स्फुरित है । जिस दृढबुद्धि पुरुष कि दृष्टि में सम्पूर्ण विश्व आत्मरूप से प्रकाशित हो रहा है वह चाहे ब्राह्मण हो अथवा चांडाल हो, वह वन्दनीय है यह मेरी दृढ निष्ठा है । जिसकी ऐसी बुद्धि और निष्ठा है कि “मैं चैतन्य हूँ यह दृश्य जगत नहीं”‘ वह चांडाल भले ही हो, पर वह मेरा गुरु है॥१॥)

ब्रह्मैवाहमिदं जगच्च सकलं चिन्मात्रविस्तारितं
सर्वं चैतदविद्यया त्रिगुणयाशेषं मया कल्पितम् ।
इत्थं यस्य दृढा मतिः सुखतरे नित्ये परे निर्मले
चण्डालोस्तु स तु द्विजोस्तु गुरुरित्येषा मनीषा मम ॥ २ ॥

(मैं ब्रह्म ही हूँ चेतन मात्र से व्याप्त यह समस्त जगत भी ब्रह्मरूप ही है । समस्त दृष्यजाल मेरे द्वारा ही त्रिगुणमय अविद्या से कल्पित है । मैं सुखी, सत्य, निर्मल, नित्य, पर ब्रह्म रूप में हूँ जिसकी ऐसी दृढ बुद्धि है वह चांडाल हो अथवा द्विज हो, वह मेरा गुरु है॥२॥)

शश्वन्नश्वरमेव विश्वमखिलं निश्चित्य वाचा गुरोः
नित्यं ब्रह्म निरन्तरं विमृशता निर्व्याज शान्तात्मना ।
भूतं भावि च दुष्कृतं प्रदहता संविन्मये पावके
प्रारब्धाय समर्पितं स्ववपुरित्येषा मनीषा मम ॥ ३ ॥

(जिसने अपने गुरु के वचनों से यह निश्चित कर लिया है कि परिवर्तनशील यह जगत अनित्य है । जो अपने मन को वश में करके शांत आत्मना है । जो निरंतर ब्रह्म चिंतन में स्थित है । जिसने परमात्म रुपी अग्नि में अपनी सभी भूत और भविष्य की वासनाओं का दहन कर लिया है और जिसने अपने प्रारब्ध का क्षय करके देह को समर्पित कर दिया है । वह चांडाल हो अथवा द्विज हो, वह मेरा गुरु है॥३॥)

या तिर्यङ्नरदेवताभिरहमित्यन्तः स्फुटा गृह्यते
यद्भासा हृदयाक्षदेहविषया भान्ति स्वतो चेतनाः ।
ताम् भास्यैः पिहितार्कमण्डलनिभां स्फूर्तिं सदा भावय
न्योगी निर्वृतमानसो हि गुरुरित्येषा मनीषा मम ॥ ४ ॥

(सर्प आदि तिर्यक, मनुष्य देवादि द्वारा “अहम्” मैं ऐसा गृहीत होता है । उसी के प्रकाश से स्वत: जड़, हृदय, देह और विषय भाषित होते हैं । मेघ से आवृत सूर्य मंडल के समान विषयों से आच्छादित उस ज्योतिरूप आत्मा की सदा भावना करने वाला आनंदनिमग्न योगी मेरा गुरु है । ऐसी मेरी मनीषा है॥४॥)

यत्सौख्याम्बुधि लेशलेशत इमे शक्रादयो निर्वृता
यच्चित्ते नितरां प्रशान्तकलने लब्ध्वा मुनिर्निर्वृतः।
यस्मिन्नित्य सुखाम्बुधौ गलितधीर्ब्रह्मैव न ब्रह्मविद्
यः कश्चित्स सुरेन्द्रवन्दितपदो नूनं मनीषा मम ॥ ५ ॥

(प्रशांत काल में एक योगी का अंत:करण जिस परमानंद कि अनुभूति करता है जिसकी एक बूँद मात्र इन्द्र आदि को तृप्त और संतुष्ट कर देती है । जिसने अपनी बुद्धि को ऐसा परमानंद सागर में विलीन कर लिया है वह मात्र ब्रह्मविद ही नहीं स्वयं ब्रह्म है । वह अति दुर्लभ है जिसके चरणों की वन्दना देवराज भी करते हैं वह मेरा गुरु है । ऐसी मेरी मनीषा है॥५॥)

जय जय शंकर , हर हर शंकर !!!

॥ जय श्री राम ॥

Dr. Praveen Sharma

Posted in छोटी कहानिया - Chooti Kahaniya

*तुलसी कौन थी?*

*तुलसी कौन थी?*

तुलसी(पौधा) पूर्व जन्म मे एक लड़की थी जिस का नाम वृंदा था, राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थी.बड़े ही प्रेम से भगवान की सेवा, पूजा किया करती थी.जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया। जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था.
वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी.
एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा –
स्वामी आप युद्ध पर जा रहे है आप जब तक युद्ध में रहेगे में पूजा में बैठ कर आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुगी,और जब तक आप वापस नहीं आ जाते, मैं अपना संकल्प
नही छोडूगी। जलंधर तो युद्ध में चले गये,और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयी, उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके, सारे देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास गये।

सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि – वृंदा मेरी परम भक्त है में उसके साथ छल नहीं कर सकता ।
फिर देवता बोले – भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते है।

भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पँहुच गये जैसे
ही वृंदा ने अपने पति को देखा, वे तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए,जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया,उनका सिर वृंदा के महल में गिरा जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पडा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है?

उन्होंने पूँछा – आप कौन हो जिसका स्पर्श मैने किया, तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके,वृंदा सारी बात समझ गई, उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ, और भगवान तुंरत पत्थर के हो गये।

सभी देवता हाहाकार करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगे और प्रार्थना करने लगे यब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे
सती हो गयी।

उनकी राख से एक पौधा निकला तब
भगवान विष्णु जी ने कहा –आज से
इनका नाम तुलसी है, और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और में
बिना तुलसी जी के भोग
स्वीकार नहीं करुगा। तब से तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगे। और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में
किया जाता है.देव-उठावनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है !

इस कथा को कम से कम दो लोगों को अवश्य सुनाए आप को पुण्य अवश्य मिलेगा। या चार ग्रुप मे प्रेषित करें। 🙏🏼🙏🏼

Posted in Bollywood

बाहुबली

Forwarded:
A very interesting article: Must Read 
बाहुबली ने बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के अब तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए ! क्या इसको लेकर कोई शोर हुआ ? नहीं !

किसी फिल्म के सौ करोड़ पार करने मात्र से उछलकूद मचाने वाले एक हजार करोड़ का आकड़ा पहली बार पार करने पर भी चुप है ! आश्चर्य होता है, घोर आश्चर्य ! और तो और बाहुबली की ऐतिहासिक सफलता के बीच में अचानक दंगल के कलेक्शन की चर्चा की गई !

इसमें मजेदार बात यह थी की दंगल के करोड़ो का कलेक्शन चीन में दिखाया गया ! मानो चीन के खिलाड़ी आमिर खान से प्रेरित होकर अगले ओलिम्पिक में अपना पहला पदक जीतेंगे ! सब कुछ कितना हास्यासपद है !

मगर भारत की जनता इन खबरों को पढ़ने के लिए मजबूर है ! लेकिन इन बातों के पीछे के कारणों को नजरअंदाज कर देना ही हमारी सबसे बड़ी मूर्खता है ! मीडिया में एक मिनट का स्लॉट या एक कॉलम की खबर के कितने पैसे लगते हैं, इसका हमें शायद अंदाज नहीं मगर प्रेस्टीट्यूट के नाम से बदनाम खबरवाली ने ये खबर मुफ्त में चलाई होगी, ऐसा हो नहीं सकता , उलटा बाहुबली की खबर ना बनने देने के भी उसने अलग से पैसे लिए होंगे ! और अगर पैसे नहीं लिए होंगे तो नेटवर्क का इस्तेमाल किया गया होगा !

कोई पूछ सकता है की आखिरकार ये सब क्यों और किसलिए ? क्योंकि भारत में मीडिया को पढ़ने-सुनने वालो में एक वर्ग सदा ही ऐसा होता है जो हर खबर को सच मानता है ! ये खबरे आप के मन मस्तिष्क पर गहरे तक प्रभाव डालती है और धीरे धीर आपको नियंत्रित करने लगती हैं ! ऐसी खबर निरंतर दिखाते रहने से खबर प्रभावित लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है !

इस संख्या को बढ़ाना ही उद्देश्य है, उन लोगों का जो भारत के खिलाफ एक परसेप्शन बनाने का खेल बड़ी चतुराई से खेल रहे हैं !

यह परसेप्शन की लड़ाई, दशकों से लड़ी जा रही है !

इसका सबसे खतरकनाक पहलू यह है की हम-आम लोगों को इसका पता ही नहीं की हम पर निरंतर आक्रमण हो रहा है, जिसमे हर पल हमारा बहुत कुछ तबाह किया जा रहा है !

जेएनयू से लेकर जाधवपुर यूनिवर्सिटी में भारत के टुकड़े के नारे यूं ही नहीं लगते ! यह उसी षड्यंत्र का अंतिम लक्ष्य है जो इन गिरोह के सदस्यों के मुख से चीख चीख कर बोलता है !

आज भारत विरोधी षड्यंत्र का एक मुख्य केंद्र चीन बन चुका है ! जो विश्वशक्ति बनने के अपने सपने पर तेजी से काम कर रहा है ! पाकिस्तान को तो वो अपने कब्जे में पूरी तरह ले चुका है ! एकमात्र हिन्दू राष्ट्र नेपाल को इस ड्रेगन ने निगल लिया और हम देखते रहे ! मगर यह ना सोचे की हम बचे हुए हैं ! हमारे उपभोग का हर दूसरा सामान अब चीन से आ रहा है ! हमारी अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण के साथ साथ अब वो भारत के परसेप्शन की लड़ाई में भी अपनी सक्रियता बड़ा रहा है ! जिसमे उसका साथ दे रहा है हमारा स्थाई पड़ोसी और उसका ए बी सी डी गैंग !

इनके कई स्लीपर सेल हमारे देश में अनेक मुखौटा लगा कर उनके काम को बखूबी अंजाम दे रहे हैं ! ये राजनीति से लेकर धर्म कला साहित्य और बॉलीवुड में भी प्लांट किये गए हैं !और ये सब मिल कर देश के भीतर- बाहर से एक खतरनाक खेल खेल रहे हैं !

ये दंगल की चीन में अचानक ५०० करोड़ की कमाई उसी खेल का एक छोटा सा हिस्सा है ! क्योंकि परसेप्शन की लड़ाई में वे नहीं चाहते की १००० करोड़ का आकड़ा पार करने वाली एकमात्र भारतीय फिल्म वो हो जिसमे भारत के गौरवशाली इतिहास का प्रस्तुतिकरण हो !

इसलिए दंगल को भी १००० का आकड़ा पार करवाया गया और उसकी चर्चा अधिक की गयी ! उसमे भी दंगल से अधिक आमिर का परसेप्शन बनाये रखा गया जो उनका ब्रांड एम्बेसडर बन कर आगे भी उनके काम आता रहेगा !

बाहुबली में हिन्दुस्तान की अनेक सांस्कृतिक व परम्पराओं का भव्य प्रदर्शन किया गया है , जिसे हमारा दुश्मन कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता ! वो कभी नहीं चाहेगा की देश की जनता की निगाह में कोई ऐसी फिल्म बसी रहे जो उन के आत्मविश्वास और जोश को बढ़ाये और भारत की सभ्यता की जड़े मजबूत हो !

हमारे नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों पर बॉलीवुड ने कैसे धीरे से प्रहार कर नुकसान किया है, यह हम कम ही समझ पाते हैं ! तीन बौने खानों का कद लार्जर देन लाइफ बना देना कोई उनकी मात्र योग्यता के कारण नहीं हुआ , ना ही यह कोई महज संयोग है !

फिल्म पीके के द्वारा हिन्दुओं की कुरीतियों की बात करने वाले तथाकथित मिस्टर परफेक्शनिस्ट अगर ट्रिपल तलाक और हलाला पर चुप है , फिर भी आप इस दोगले कागजी समाज सुधारक को समझ नहीं पाते हैं तो आप मूर्ख हैं !और मूर्ख की चिंता करना उससे बड़ी मूर्खता है !

अब तक पीके ही सबसे सफल फिल्म के शिखर पर विराजमान कर रखी गई थी अर्थात शिव को दूध पिलाने वाले की हँसी उड़ाने वाला आप के मन मष्तिष्क पर राज कर रहा था, अब उसकी जगह कोई शिव की पूजा करने वाला बाहुबली ले ले, यह उन षड्यंत्रकारी लोगों को कैसे मंजूर हो सकता है !

उनका दशकों से जमाया गया सारा खेल ही मिनटों में खत्म हो जाए वो यह कैसे बर्दास्त कर सकते हैं ! ऐसे में जब आज अब पीके को तो फिर से पिक्चर हॉल में चलाया नहीं जा सकता तो उन्होंने दंगल को चला दिया ,वो भी चीन में, क्योंकि भारत के सिनेमा घरों से दंगल को उतरे हुए भी महीनो हो गए थे ! और आननफानन में चीन में उसके ५०० करोड़ के कलेक्शन की चर्चा करा दी गई ! जिसका परिणाम ये हुआ की अब बाहुबली अकेले १००० करोड़ की फिल्म नहीं रही !

अब क्या आप चीन के बॉक्स ऑफिस में कलेक्शन गिनने जाएंगे ? नहीं ! जिस देश से कोई सामान्य खबर भी बाहर नहीं आ पाती वहाँ हमारे एक फिल्म के कलेक्शन की खबर तुरंत आ जाती है , क्या मजेदार खेल है, वाह ! वो तो इस गिरोह का बस नहीं चल रहा वरना आज ये दंगल को बाहुबली से अधिल कलेक्शन दिखा कर नंबर एक कर दें ! दो चार हजार रूपये का कलेक्शन दिखाना इनके लिए बाएं हाथ का मैल है ! अब इनकी भी मजबूरी है क्योंकि जमीनी हकीकत कुछ और बयान कर रही है और बाहुबली भारत में ही नहीं विश्व के अनेक देशों में तीसरे सप्ताह भी फुल चल रही है !

ऐसे में कोई पूछ सकता है की एक आम आदमी क्या करे ? और क्यों ?

अब इस क्यों का जवाब तो संक्षिप्त में सिर्फ इतना कहा जा सकता है की अरे भाई आप की लड़ाई कोई और लड़ेगा क्या ? वैसे भी आपको अगर अपनी सांस्कृतिक विरासत और पारम्परिक स्वतंत्रता से प्यार है, अपनी मिट्टी की सुगंध में ही जीना-मरना चाहते हो तो तो आप को उसके लिए सतत संघर्ष करना होगा ! वरना आप जल्द ही एक कट्टर विचारधारा, क्रूर शासन व्यवस्था या कबीली धर्म के आतंक में जीने के लिए तैयार रहें !

अब सवाल उठता है की इस परसेप्शन की लड़ाई आखिर एक आम आदमी कैसे लड़े ? इस युद्ध में लड़ने के लिए सीमा पर जाने की जरूरत नहीं ,बन्दूक चलाने बम फोड़ने या सीने पर गोली खाने की भी जरूरत नहीं, बस दुश्मन को उसी के खेल में उसी के अस्त्र शस्त्र से मारना होगा !

तो क्यों ना जिन्होंने बाहुबली अब तक नहीं देखी है वो सपरिवार देखें , और जिन्होंने पहले ही देख रखी है वो दूसरी तीसरी चौथी बार देखें ! और इस परसेप्शन के युद्ध में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएं !

बाहुबली को उस ऊंचाई तक पहुंचा दें की कोई रईस या सुलतान चाहे जितना पीके भी दंगल करे उस तक ना पहुंच पाए ! वैसे भी लगता है की बाहुबली अगर २००० करोड़ का आकड़ा पार कर जाये तो कोई आश्चर्य नहीं होगा !

हमें ऐसा होने देने में मदद करनी चाहिए ,क्योंकि अभी कोई और नहीं है जो वहां तक जल्द पहुंच सके ! यह हमारे परसेप्शन की लड़ाई की पहली जीत होगी, जिसकी गूँज कई दिनों तक बॉलीवुड के कुछ रहस्यमयी परदों को चीर कर परदे के पीछे बैठे शैतान के कानों में बजती रहेगी !

Posted in ज्योतिष - Astrology

नाम बदलो भाग्य बदलेगा

नाम बदलो भाग्य बदलेगा

आम तौर पर हर व्यक्ति कर्म तो करता है लेकिन उसका भाग्य नहीं बदल पाता क्योंकि उसे नामांक की शक्ति पता नहीं होता। मूलांक और भाग्यांक तो अपरिवर्तनशील हैं लेकिन योजनाबद्ध ढंग से यदि नामांक, मूलांक और भाग्यांक का मेल हो जाये तो व्यक्ति का भाग्य बदलने में देर नहीं लगती। आजमाकर देखें तो सहीं। वेदशास्त्र एवं धर्म ग्रंथ कहते हैं, मनुष्य का भाग्य नहीं बदला जा सकता। मनुष्य जीवन की तीन मुखय घटनाएं यथा जन्म, विवाह एवं मृत्यु तो बिल्कुल भी नहीं बदली जा सकती क्योंकि विवाह के जोड़े आदि सब पहले से निश्चित होते हैं तथा जन्म और मृत्यु की तारीख भी नहीं बदली जा सकती। जन्म समय के ग्रह-नक्षत्र मनुष्य का भाग्य दर्शाते हैं जो उसके पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार बनता है। परंतु जन्म राशि, जन्म लग्न एवं अंक ज्योतिष का मूल आधार मूलांक व भाग्यांक तो जन्म की तारीख से बनते हैं जिसको बदला नहीं जा सकता। लेकिन नाम में परिवर्तन करके आप अपने जीवन की रूपरेखा में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन अवश्य ला सकते हैं।

अपना मूलांक और भाग्यांक जानने की सरल विधि यह है कि जन्म तारीख का योग करें वह आपका मूलांक और जन्म तारीख, माह और सन् के अंक का योग भाग्यांक कहलाता है। जैसे 3, 12, 21, 30 जन्म तारीख वाले का मूलांक 3 होगा और 18-01-1926 जन्म तारीख वाले का भाग्यांक 1 होगा। इसमे जन्म तारीख माह और सन् का योग करने से 28 अंक आया। इस का योग 2+8 = 10, यानि मूलांक 1 । अधिकतर जीवन के मूलांक और भाग्यांक वाले माह, तारीख तथा सन लाभकारी रहते हैं। यदि राशि के हिसाब से भी योगकारी ग्रह का अंक, मूलांक या भाग्यांक से मेल खाता है तो वह अंक बहुत लाभकारी रहेगा। इसी के साथ यदि व्यक्ति के नाम का अंक भी भाग्यांक या मूलांक से मेल खावे तो वह व्यक्ति जीवन में बहुत उन्नति करता है। नाम भी भाग्यांक के अनुसार रखें तो वह लाभकारी सिद्ध होगा। जो लोग जीवन में झंझावातों से जूझते देखे गये, उनमें प्रायः यह पाया गया कि उनके इन तीनों अंकों में तालमेल नहीं था।

यदि मूलांक, भाग्यांक और नामांक में तालमेल न हो तो हम नामांक बदल सकते हैं, क्योंकि जन्मांक और भाग्यांक तो जन्म लेते ही निश्चित हो जाते हैं। ये भगवान के दिये होते हैं। केवल नाम ही है, जिसे मनुष्य देता है- उसे बदला जा सकता है- यदि आवश्यक हो तो अपना नाम बदलें और उसका लाभ उठायें। कुछ व्यक्ति इतने भाग्यशाली होते हैं कि उनके मूलांक तथा भाग्यांक और नामांक में समन्वय रहता है और वे सुखी जीवन व्यतीत करते हैं। अंक ज्योतिष अंकों का गणित नहीं, बल्कि अंकों का विज्ञान है। यह ज्योतिष व हस्तरेखा जैसी ही विद्या है। अंक ज्योतिष का आधार वास्तव में नौ ग्रह ही हैं। अंग्रेजी के प्रत्येक अक्षर का तथा प्रत्येक ग्रह का भी एक अंक निर्धारित किया गया है।

जो इस प्रकार है :- हिंदी के अक्षरों को भी अंक शास्त्र में नंबर दियें गये हैं। अ से अं, अः तक 1 से 24 अंक सीरियल में तथा क, ख से ह तक 1 से 36 अंक सीरियल में दिये गये हैं। इन्हें भी आजमा कर देखें। यदि मूलांक या भाग्यांक के अनुसार नामांक भी हो तो जीवन में उन्नति की संभावना अधिक रहती है। इसके अतिरिक्त यदि जन्म/राशि लग्न के योगकारी ग्रह का अंक मूलांक या भाग्यांक से मिलता है तो उस अंक के अनुसार नामांक बना लें तो बहुत उन्नति होगी। कुछ वर्तमान प्रसिद्ध लोगों के इन अंकों के परीक्षण से सिद्ध होता है कि अंक शास्त्र उपयोगी है। 1. श्रीमती सोनिया गांधी जी की जन्म तारीख 9.12.1946 है। इनका मूलांक नौ (9) है और भाग्यांक पांच (5) है।

इन की राशि मिथुन और जन्म लग्न कर्क है। इनके जन्म लग्न के हिसाब से मंगल योगकारी है। मंगल का अंक 9 है। इनके नामांक का अंक भी 9 है। इसी कारण इन्हें इतनी प्रसिद्धि मिली। इनकी राशि का स्वामी बुध है और बुध का अंक 5 है जो इनका भाग्यांक है। इन्हीं कारणों से इन्होंने प्रसिद्धि अर्जित की। 2. फिल्म स्टार शाहरूख खान की जन्म तारीख 2.11.65 है। उसका मूलांक 2 है और भाग्यांक 7 है तथा नामांक 6 है। इनकी राशि मकर के लिए शुक्र योगकारी ग्रह है और शुक्र का अंक 6 है। नामांक 6 इसी कारण लाभकारी है और उसको बहुत प्रसिद्धि मिली तथा धन-दौलत मिली।

यह जन्म राशि के योगकारी ग्रह के अनुसार नामांक होने से उन्नति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। (इनकी जन्म पत्रिका में शश व रूचक नामक दो पंच महापुरुष राजयोग भी हैं॥ 3. प्रसिद्ध फिल्म स्टार हेमा मालिनी की जन्म तारीख 16.10.48 होने से भाग्यांक 3 है और उनका नामांक भी 3 है। यह अंक 3 गुरु का अंक है। उनका लग्न कर्क एवं राशि मीन होने से गुरु योगकारी है। उनका स्वभाव रहन-सहन गुरु प्रधान होने से उनका जीवन सुखी है। उनकी प्रवृत्ति भी सात्विक बनी। गुरु ने जन्मपत्री में हंस नामक पंच महापुरूष राजयोग भी बनाया। यह भी जन्म तारीख और जन्मपत्रिका के अनुसार नामांक से उन्नति + प्रसिद्धि का उत्तम उदाहरण है।

4. रितिक रोशन ने फिल्म जगत में एक ही फिल्म से धूम मचा दी। इसका कारण हम अंक शास्त्र के नजरिये से देखें तो उसकी जन्म तारीख 10.01.1974 है- उसका मूलांक एक सूर्य का अंक है और उसका भाग्यांक पांच बुध का नंबर है- उसकी जन्म राशि कर्क है उसके लिए योगकारी ग्रह मंगल का अंक नौ है- उसका नामांक दो है। उसका मूलांक सूर्य का अंक एक और नामांक चंद्र का अंक दो होने से वह सूर्य +चंद्र की भांति जगत में वर्षों तक जगमगाता रहेगा।

उसके मूलांक और नामांक के स्वामी एक एवं दो अंक परम मित्र – रायल ग्रह होने से उसका नाम तीव्र गति से रोशन हुआ। जैसे सूर्य और चंद्र के उदय होने पर अंधेरा दूर हो जाता है और प्रकाश चारों और फैल जाता है। उसके नामांक दो का स्वामी चंद्र होने से जीवन में सामन्जस्य बना रहेगा- मेष राशि के स्वग्रही मंगल ने केंद्र में रूचक नामक पंच महापुरुष राजयोग बनाया है और चंद्र-मंगल राजयोग, गजकेसरी जैसे राजयोगों के कारण उसकी बहुत उन्नति होगी।

परंतु हम अंक शास्त्र के अनुसार देखें तब भी उसकी उन्नति बहुत होगी क्योंकि मूलांक एक और नामांक दो के स्वामी सूर्य और चंद्र ज्योतिष में राजा रानी कहलाते हैं। इस अंक वाले को शिखर पर पहुंचा देते हैं- भगवान श्रीराम की कर्क राशि थी। श्री रितिक की राशि भी कर्क होने से वह अपना नाम रोशन करेगा। व्यापार के लिये, व्यापार संस्थान का नाम यदि हम इस शास्त्र के अनुसार रखें तो व्यापार में अच्छी उन्नति की संभावना बनती है। कई व्यापार संस्थाओं के नाम बदलने से उन्हें लाभ हुआ है।

Posted in रामायण - Ramayan

*अयोध्या में राम- मंदिर के प्रमाण*

*अयोध्या में राम- मंदिर के प्रमाण*

बाबरी मस्जिद के नीचे खुदाई हाई कोर्ट के ऑर्डर से सरकार की निगरानी में तथा मुस्लिम पर्सनल बोर्ड व अखाड़ा के नुमाईंदों की मौजूदगी में दो बार की गई । पहली 1977 में दूसरी 2003 में । इन खुदाईयों से जो भी तथ्य सामने आए उनसे यह सिद्ध होता है कि वहाँ (उस मस्जिद के नीचे) पहले एक मंदिर था–
1; खुदाई से मिले 14 स्तंभों (pillrs ) का आधार शिला (base) मन्दिरो के स्थापत्य को दर्शाता है और उस पर मन्दिरों की कलाकृतियां अंकित थी।
2, मंदिर के शिखर पर ‘अगलखा’ बना हुआ था जो मंदिर का सबूत दे रहा था।
3, खुदाई में ‘जलाभिषेक’ मिला जो सिर्फ मन्दिर में ही होता है , मस्जिद में नही।
4, खुदाई में टूटी मूर्तियां, पत्थर के हाथी, बैल, कमल फूल आदि मन्दिर की गवाही देते हैं।
5, 5×2 फुट के लाल पत्थरोँ पर नागरी व संस्कृत भाषा मे खुदे अनेक शिलालेख मिले है, जिस पर यह लिखा है कि यह मंदिर दस सर वाले रावण को मारने वाले प्रतापी राजा श्री राम जी का है और इस मंदिर का जीर्णोद्धार साकेत मण्डल के राजा ने किया है।
6, कवि तुलसीदास ने अपने महाकाव्य रामचरितमानस में लिखा है कि 1528 में मीर बाकी ने बड़ी बर्बरता पूर्वक राम मंदिर को ध्वस्त कर बाबरी मस्जिद का निर्माण किया ।
ऐसे अनेक प्रमाण यह सिद्ध करते हैं कि अयोध्या में राम मंदिर को तोड़फोड़ कर उसी स्थान पर एक मस्जिद का निर्माण किया गया जिसका नाम बाबरी मस्जिद रखा । अतः वहाँ पुनः राम मंदिर ही बनना चाहिए, मस्जिद नहीं।
सन्दीप आर्य
मंत्री आर्य समाज सांताक्रुज

Posted in छोटी कहानिया - Chooti Kahaniya

*चार शब्दों की उच्चतम प्रार्थना*

*चार शब्दों की उच्चतम प्रार्थना*

http://whatsupmessagess.blogspot.com/2017/05/Four-word-pray-whatsup-story.html

एक जादूगर जो मृत्यु के करीब था, मृत्यु से पहले अपने बेटे को चाँदी के सिक्कों से भरा थैला देता है और बताता है की “जब भी इस थैले से चाँदी के सिक्के खत्म हो जाएँ तो मैं तुम्हें एक प्रार्थना बताता हूँ, उसे दोहराने से चाँदी के सिक्के फिर से भरने लग जाएँगे । उसने बेटे के कान में चार शब्दों की प्रार्थना कही और वह मर गया । अब बेटा चाँदी के सिक्कों से भरा थैला पाकर आनंदित हो उठा और उसे खर्च करने में लग गया । वह थैला इतना बड़ा था की उसे खर्च करने में कई साल बीत गए, इस बीच वह प्रार्थना भूल गया । जब थैला खत्म होने को आया तब उसे याद आया कि “अरे! वह चार शब्दों की प्रार्थना क्या थी ।” उसने बहुत याद किया, उसे याद ही नहीं आया ।

अब वह लोगों से पूँछने लगा । पहले पड़ोसी से पूछता है की “ऐसी कोई प्रार्थना तुम जानते हो क्या, जिसमें चार शब्द हैं । पड़ोसी ने कहा, “हाँ, एक चार शब्दों की प्रार्थना मुझे मालूम है, “ईश्वर मेरी मदद करो ।” उसने सुना और उसे लगा की ये वे शब्द नहीं थे, कुछ अलग थे । कुछ सुना होता है तो हमें जाना-पहचाना सा लगता है । फिर भी उसने वह शब्द बहुत बार दोहराए, लेकिन चाँदी के सिक्के नहीं बढ़े तो वह बहुत दुःखी हुआ । फिर एक फादर से मिला, उन्होंने बताया की “ईश्वर तुम महान हो” ये चार शब्दों की प्रार्थना हो सकती है, मगर इसके दोहराने से भी थैला नहीं भरा । वह एक नेता से मिला, उसने कहा “ईश्वर को वोट दो” यह प्रार्थना भी कारगर साबित नहीं हुई । वह बहुत उदास हुआ ।

उसने सभी से मिलकर देखा मगर उसे वह प्रार्थना नहीं मिली, जो पिताजी ने बताई थी । वह उदास होकर घर में बैठा हुआ था तब एक भिखारी उसके दरवाजे पर आया । उसने कहा, “सुबह से कुछ नहीं खाया, खाने के लिए कुछ हो तो दो ।” उस लड़के ने बचा हुआ खाना भिखारी को दे दिया । उस भिखारी ने खाना खाकर बर्तन वापस लौटाया और ईश्वर से प्रार्थना की, *”हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद ।”* अचानक वह चोंक पड़ा और चिल्लाया की “अरे! यही तो वह चार शब्द थे ।” उसने वे शब्द दोहराने शुरू किए-“हे ईश्वर तुम्हारा धन्यवाद”……..और उसके सिक्के बढ़ते गए… बढ़ते गए… इस तरह उसका पूरा थैला भर गया ।

इससे समझें की जब उसने किसी की मदद की तब उसे वह मंत्र फिर से मिल गया । “हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद ।” यही उच्च प्रार्थना है क्योंकि जिस चीज के प्रति हम धन्यवाद देते हैं, वह चीज बढ़ती है । अगर पैसे के लिए धन्यवाद देते हैं तो पैसा बढ़ता है, प्रेम के लिए धन्यवाद देते हैं तो प्रेम बढ़ता है । ईश्वर या गुरूजी के प्रति धन्यवाद के भाव निकलते हैं की ऐसा ज्ञान सुनने तथा पढ़ने का मौका हमें प्राप्त हुआ है । बिना किसी प्रयास से यह ज्ञान हमारे जीवन में उतर रहा है वर्ना ऐसे अनेक लोग हैं, जो झूठी मान्यताओं में जीते हैं और उन्हीं मान्यताओं में ही मरते हैं । मरते वक्त भी उन्हें सत्य का पता नहीं चलता । उसी अंधेरे में जीते हैं, मरते हैं ।

*ऊपर दी गई कहानी से समझें की “हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद” ये चार शब्द, शब्द नहीं प्रार्थना की शक्ति हैं । अगर यह चार शब्द दोहराना किसी के लिए कठिन है तो इसे तीन शब्दों में कह सकते हैं, “ईश्वर तुम्हार धन्यवाद ।” ये तीन शब्द भी ज्यादा लग रहे हों तो दो शब्द कहें, “ईश्वर धन्यवाद !” और दो शब्द भी ज्यादा लग रहे हों तो सिर्फ एक ही शब्द कह सकते हैं, “धन्यवाद ।” आइए, हम सब मिलकर एक साथ धन्यवाद दें उस ईश्वर को, जिसने हमें मनुष्य जन्म दिया और उसमें दी दो बातें – पहली “साँस का चलना” दूसरी “सत्य की प्यास ।” यही प्यास हमें खोजी से भक्त बनाएगी । भक्ति और प्रार्थना से होगा आनंद, परम आनंद, तेज आनंद ।