Posted in Nehru Family

1971 की #विजय_पर #इंदिरा_गांधी_का #गुणगान_करने_वालों_को_कुछ #तथ्य_बताना_चाहता_हूँ… 
#सैम_मानेकशॉ ने आधा पाकिस्तान और 94435 पाकिस्तानी सैनिक इंदिरा को दिए थे, अर्थात पूरी पाक सेना भारत के पास गिरवी पड़ी थी, किन्तु शिमला समझौते में वार्ता की मेज पर इंदिरा बिना #कश्मीर व् #आधा #पाकिस्तान लिए सब कुछ #लुटा कर चलीं आयी थी ?

#कारण_अज्ञात_हैं… 
2500-3000 भरतीय सैनिकों ने 1971 युद्ध में #प्राणों_की_आहुति दी थी, बंग्लादेशियों शरणार्थियों पर भी लगभग डेढ़ लाख करोड़ रू भारत ने खर्च भी किया था, भारत ने धन भी खर्च किया और सपूतों का बलिदान भी दिया, #बदले_में_क्या_मिला ?  

#केवल_बंगलादेशी_घुसपैठिये… 
जबकि #भारतीय_सेना ने विश्व की #स्वर्णिम #विजयश्री दिलवायी थी, राष्ट्र को, सैम मानेकशॉ #आशान्वित थे, कि 94435 पाकिस्तानियों के बदले हमारा कश्मीर वापस पा लिया जायेगा, और #पूर्वी पाकिस्तान का भारत में विलय होगा, किन्तु जब वो शिमला समझौते के बाद वे इंदिरा से मिले तो कहा 

“sweety, Pakistanis have made a monkey out of you” 

अर्थात पाकिस्तानियों ने तुम्हे वार्ता की मेज से मूर्ख बनाकर वापस भेजा है, उसके बावजूद कांग्रेसी ऐसे प्रचार करते हैं जैसे इंदिरा ने जग जीत लिया था, कई कांग्रेसियों ने तो ये अफवाह फैला रखी है कि तब #अटल_बिहारी_वाजपेयी_ने_इंदिरा_को #दुर्गा कहा था, ये झूठ इतनी बार बोला गया है, कि लोगों ने इसे अब सत्य मान लिया है,  उन्होंने #कभी इंदिरा को दुर्गा #नहीं_कहा_था

Aashish Raguvanshi

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

शर्मिंदा 


शर्मिंदा

फ़ोन की घंटी तो सुनी मगर आलस की वजह से रजाई में ही लेटी रही। उसके पति राहुल को आखिर उठना ही पड़ा। दूसरे कमरे में पड़े फ़ोन की घंटी बजती ही जा रही थी।इतनी सुबह कौन हो सकता है जो सोने भी नहीं देता, इसी चिड़चिड़ाहट में उसने फ़ोन उठाया। “हेल्लो, कौन” तभी दूसरी तरफ से आवाज सुन सारी नींद खुल गयी।

“नमस्ते पापा।” “बेटा, बहुत दिनों से तुम्हे मिले नहीं सो हम दोनों ११ बजे की गाड़ी से आ रहे है। दोपहर का खाना साथ में खा कर हम ४ बजे की गाड़ी वापिस लौट जायेंगे। ठीक है।” “हाँ पापा, मैं स्टेशन पर आपको लेने आ जाऊंगा।”

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फ़ोन रख कर वापिस कमरे में आ कर उसने रचना को बताया कि मम्मी पापा ११ बजे की गाड़ी से आरहे है और दोपहर का खाना हमारे साथ ही खायेंगे।

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रजाई में घुसी रचना का पारा एक दम सातवें आसमान पर चढ़ गया। “कोई इतवार को भी सोने नहीं देता, अब सबके के लिए खाना बनाओ। पूरी नौकरानी बना दिया है।” गुस्से से उठी और बाथरूम में घुस गयी। राहुल हक्का बक्का हो उसे देखता ही रह गया।

जब वो बाहर आयी तो राहुल ने पूछा “क्या बनाओगी।” गुस्से से भरी रचना ने तुनक के जवाब दिया “अपने को तल के खिला दूँगी।” राहुल चुप रहा और मुस्कराता हुआ तैयार होने में लग गया, स्टेशन जो जाना था।

थोड़ी देर बाद ग़ुस्सैल रचना को बोल कर वो मम्मी पापा को लेने स्टेशन जा रहा है वो घर से निकल गया।

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रचना गुस्से में बड़बड़ाते हुए खाना बना रही थी।

दाल सब्जी में नमक, मसाले ठीक है या नहीं की परवाह किए बिना बस करछी चलाये जा रही थी। कच्चा पक्का खाना बना बेमन से परांठे तलने लगी तो कोई कच्चा तो कोई जला हुआ। आखिर उसने सब कुछ ख़तम किया, नहाने चली गयी।

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नहा के निकली और तैयार हो सोफे पर बैठ मैगज़ीन के पन्ने पलटने लगी।उसके मन में तो बस यह चल रहा था कि सारा संडे खराब कर दिया। बस अब तो आएँ , खाएँ और वापिस जाएँ ।

थोड़ी देर में घर की घंटी बजी तो बड़े बेमन से उठी और दरवाजा खोला। दरवाजा खुलते ही उसकी आँखें हैरानी से फटी की फटी रह गयी और मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल सका।

सामने राहुल के नहीं उसके अपने मम्मी पापा खड़े थे जिन्हें राहुल स्टेशन से लाया था।

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मम्मी ने आगे बढ़ कर उसे झिंझोड़ा “अरे, क्या हुआ। इतनी हैरान परेशान क्यों लग रही है। क्या राहुल ने बताया नहीं कि हम आ रहे हैं।” जैसे मानो रचना के नींद टूटी हो “नहीं, मम्मी इन्होंने तो बताया था पर…. रर… रर। चलो आप अंदर तो आओ।” राहुल तो अपनी मुसकराहट रोक नहीं पा रहा था।

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कुछ देर इधर उधर की बातें करने में बीत गया। थोड़ी देर बाद पापा ने कहाँ “रचना, गप्पे ही मारती रहोगी या कुछ खिलाओगी भी।” यह सुन रचना को मानो साँप सूँघ गया हो। क्या करती, बेचारी को अपने हाथों ही से बनाए अध पक्के और जले हुए खाने को परोसना पड़ा। मम्मी पापा खाना तो खा रहे थे मगर उनकी आँखों में एक प्रश्न था जिसका वो जवाब ढूँढ रहे थे। आखिर इतना स्वादिष्ट खाना बनाने वाली उनकी बेटी आज उन्हें कैसा खाना खिला रही है।

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रचना बस मुँह नीचे किए बैठी खाना खा रही थी। मम्मी पापा से आँख मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं हो पा रही थी। खाना ख़तम कर सब ड्राइंग रूम में आ बैठे। राहुल कुछ काम है अभी आता हुँ कह कर थोड़ी देर के लिए बाहर निकल गया। राहुल के जाते ही मम्मी, जो बहुत देर से चुप बैठी थी बोल पड़ी “क्या राहुल ने बताया नहीं था की हम आ रहे हैं।”

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तो अचानक रचना के मुँह से निकल गया “उसने सिर्फ यह कहाँ था कि मम्मी पापा लंच पर आ रहे हैं, मैं समझी उसके मम्मी पापा आ रहे हैं।”

फिर क्या था रचना की मम्मी को समझते देर नहीं लगी कि ये मामला है। बहुत दुखी मन से उन्होंने रचना को समझाया “बेटी, हम हों या उसके मम्मी पापा तुम्हे तो बराबर का सम्मान करना चाहिए। मम्मी पापा क्या, कोई भी घर आए तो खुशी खुशी अपनी हैसियत के मुताबिक उसकी सेवा करो। बेटी, जितना किसी को सम्मान दोगी उतना तुम्हे ही प्यार और इज़्ज़त मिलेगी। जैसे राहुल हमारी इज़्ज़त करता है उसी तरह तुम्हे भी उसके माता पिता और सम्बन्धियों की इज़्ज़त करनी चाहिए। रिश्ता कोई भी हो, हमारा या उसका, कभी फर्क नहीं करना।”

रचना की आँखों में ऑंसू आ गए और अपने को शर्मिंदा महसूस कर उसने मम्मी को वचन दिया कि आज के बाद फिर ऐसा कभी नहीं होगा..!
Gud evening friends…….

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अनिष्ट ग्रहों से बचाव के उपाय

सूर्य : सूर्य अनिष्ट हो तो हृदय रोग उदर संबंधी नेत्र

संबंधी ऋण मानहानी अपयश होता है। ऐसे में जातक

सूर्य उपासना, रविवार का व्रत, हरिवंश पुराण का

पाठ करें।

चंद्र : चंद्र अगर कमजोर हो तो शारीरिक आर्थिक

मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है।

मिर्गी माता को कष्ट होता है। ऐसे में कुलदेवी की

उपासना चावल पानी का दान करें।

मंगल : भाई का विरोध, अचल सम्पत्ति, पुलिस

कार्रवाई अदालती अड़चने हिंसा, चोरी आदि मंगल

के कमजोर होने पर होते हैं। ऐसे में सुंदरकांड का पाठ,

हनुमान चालीसा, हनुमान जी की आराधना

फलदायक होती है।

बुध : पथरी, बवासीर, ज्वर, गुर्दा, स्नायुरोग, दंत,

विकार बुध की दुर्बलता से होता है। ऐसे में दुर्गा

सप्तशती का पाठ करें व पंता रत्न धारण करें।

गुरू : विवाह में बाधा, अपनों से वियोग घर में तनाव,

घर से विरक्ती होती है। ऐसे में श्रीमद भागवत का

पाठ, हरी पूजन व गुरुवार का व्रत करें।

शुक्र : वायु प्रकोप, संतान उत्पन्न करने में अक्षमता,

दुर्बल शरीर, अतिसार, अजीर्ण आदि शुक्र के कारण

होता है। ऐसे में मां लक्ष्मी की उपासना, खीर का

दान करें।

शनि : दाम्पत्य जीवन का कलह पूर्ण होना गुप्त रोग,

दुर्घटना, अयोग्य संतान आदि शनि के कारण होता

है। भैरव जी की आराधना शनि उपासना, मांस

मदिरा से परहेज करें।

राहु : आकस्मिक घटना भूत–प्रेत बाधा ज्वर विदेश

यात्रा टीबी, बवासीर आदि रोग होते हैं। राहु का

प्रभाव राजनीति क्षेत्र में माना जाता है। ऐसे में

कन्या दान, भैरव आराधना करें।

केतु : घुटने में दर्द मधुमेह ऐश्वर्य नाश ऋण का बढ़ना

पुत्रों पर संकट आदि होता है। कुत्ते को रोटी, कम्बल

का दान आदि किया जाता है।

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹राधे राधे🙏🏻

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पंचामृत का सांकेतिक अर्थ  व पूजा में उसका महत्व


#पंचामृत_का_सांकेतिक_अर्थ

#व

#पूजा_में_उसका_महत्व
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भगवान को चढ़ने वाले पंचामृत में भी एक गूढ़ संदेश है…

पंचामृत दूध, दही, शहद व घी को गंगाजल में मिलाकर बनता है …
1. दूधः  – जब तक बछड़ा पास न हो गाय दूध नहीं देती. बछड़ा मर जाए तो उसका प्रारूप खड़ा किए बिना दूध नहीं देती. दूध मोह का प्रतीक है …
2. शहदः  – मधुमक्खी कण-कण भरने के लिए शहद संग्रह करती है. इसे लोभ का प्रतीक माना गया है …
3. दहीः  – इसका तासीर गर्म होता है. क्रोध का प्रतीक है …
4. घीः – यह समृद्धि के साथ आने वाला है, अहंकार का प्रतीक …
5. गंगाजलः – मुक्ति का प्रतीक है. गंगाजल मोह, लोभ, क्रोध और अहंकार को समेटकर शांत करता है …
पंचामृत से अर्चना का अर्थ हुआ हम मोह, लोभ, क्रोध और अहंकार को समेटकर भगवान को अर्पित करके उनके श्री चरणों में शरणागत हों …
☆☆☆☆☆राधे राधे☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆

Posted in ज्योतिष - Astrology

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वास्तुशास्‍त्र की आठ प्रमुख दिशाएं एवं उनक महत्व
वास्तुशास्‍त्र में आठ प्रमुख दिशाओं का जिक्र आता है, जो मनुद्गय के समस्त कार्य-व्यवहारों को प्रभावित करती हैं। इनमें से प्रत्येक दिशा का अपना-अपना विशेष महत्व है। अगर आप घर या कार्यस्थल में इन दिशाओं के लिए बताए गए वास्तु सिद्धांतों का अनुपालन करते हैं, तो इसका सकारात्मक परिणाम आपके जीवन पर होता है। इन आठ दिद्गााओं को आधार बनाकर आवास/कार्यस्थल एवं उनमें निर्मित प्रत्येक कमरे के वास्तु विन्यास का वर्णन वास्तुशास्‍त्र में आता है।
वास्तुशास्‍त्र कहता है कि ब्रहांड अनंत है। इसकी न कोई दशा है और न दिशा। लेकिन हम पृथ्वीवासियों के लिए दिद्गााएं हैं। ये दिद्गााएं पृथ्वी पर जीवन को संभव बनाने वाले गृह सूर्य एवं पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र पर आधारित हैं। यहां उल्लेखनीय है कि आठों मूल दिद्गााओं के प्रतिनिधि देव हैं, जिनका उस दिशा पर विशेष प्रभाव पड़ता है। इसका विस्तृत वर्णन नीचे किया गया है।
यहां हम आठ मूलभूत दिशाओं और उनके महत्व के साथ-साथ प्रत्येक दिशा के उत्तम प्रयोग का वर्णन कर रहे हैं। चूंकि वास्तु का वैज्ञानिक आधार है, इसलिए यहां वर्णित दिशा-निर्देश पूर्णतः तर्क संगत हैं।
पूर्व दिशा :

इस दिशा के प्रतिनिधि देवता सूर्य हैं। सूर्य पूर्व से ही उदित होता है। यह दिशा शुभारंभ की दिशा है। भवन के मुखय द्वार को इसी दिद्गाा में बनाने का सुझाव दिया जाता है। इसके पीछे दो तर्क हैं। पहला- दिशा के देवता सूर्य को सत्कार देना और दूसरा वैज्ञानिक तर्क यह है कि पूर्व में मुखय द्वार होने से सूर्य की रोशनी व हवा की उपलब्धता भवन में पर्याप्त मात्रा में रहती है। सुबह के सूरज की पैरा बैंगनी किरणें रात्रि के समय उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं को खत्म करके घर को ऊर्जावान बनाएं रखती हैं।
उत्तर दिशा :

इस दिशा के प्रतिनिधि देव धन के स्वामी कुबेर हैं। यह दिशा ध्रूव तारे की भी है। आकाश में उत्तर दिशा में स्थित धू्रव तारा स्थायित्व व सुरक्षा का प्रतीक है। यही वजह है कि इस दिशा को समस्त आर्थिक कार्यों के निमित्त उत्तम माना जाता है। भवन का प्रवेश द्वार या लिविंग रूम/ बैठक इसी भाग में बनाने का सुझाव दिया जाता है। भवन के उत्तरी भाग को खुला भी रखा जाता है। चूंकि भारत उत्तरी अक्षांश पर स्थित है, इसीलिए उत्तरी भाग अधिक प्रकाशमान रहता है। यही वजह है कि उत्तरी भाग को खुला रखने का सुझाव दिया जाता है, जिससे इस स्थान से घर में प्रवेश करने वाला प्रकाश बाधित न हो।
उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) :

यह दिशा बाकी सभी दिशाओं में सर्वोत्तम दिशा मानी जाती है। उत्तर व पूर्व दिशाओं के संगम स्थल पर बनने वाला कोण ईशान कोण है। इस दिशा में कूड़ा-कचरा या शौचालय इत्यादि नहीं होना चाहिए। ईशान कोण को खुला रखना चाहिए या इस भाग पर जल स्रोत बनाया जा सकता है। उत्तर-पूर्व दोनों दिशाओं का समग्र प्रभाव ईशान कोण पर पडता है। पूर्व दिशा के प्रभाव से ईद्गाान कोण सुबह के सूरज की रोद्गानी से प्रकाशमान होता है, तो उत्तर दिशा के कारण इस स्थान पर लंबी अवधि तक प्रकाश की किरणें पड ती हैं। ईशान कोण में जल स्रोत बनाया जाए तो सुबह के सूर्य कि पैरा-बैंगनी किरणें उसे स्वच्छ कर देती हैं।
पश्चिम दिशा :

यह दिशा जल के देवता वरुण की है। सूर्य जब अस्त होता है, तो अंधेरा हमें जीवन और मृत्यु के चक्कर का एहसास कराता है। यह बताता है कि जहां आरंभ है, वहां अंत भी है। शाम के तपते सूरज और इसकी इंफ्रा रेड किरणों का सीधा प्रभाव पश्चिमी भाग पर पड ता है, जिससे यह अधिक गरम हो जाता है। यही वजह है कि इस दिद्गाा को द्गायन के लिए उचित नहीं माना जाता। इस दिशा में शौचालय, बाथरूम, सीढियों अथवा स्टोर रूम का निर्माण किया जा सकता है। इस भाग में पेड -पौधे भी लगाए जा सकते हैं।
उत्तर- पश्चिम (वायव्य कोण) :

यह दिशा वायु देवता की है। उत्तर- पश्चिम भाग भी संध्या के सूर्य की तपती रोशनी से प्रभावित रहता है। इसलिए इस स्थान को भी शौचालय, स्टोर रूम, स्नान घर आदी के लिए उपयुक्त बताया गया है। उत्तर-पद्गिचम में शौचालय, स्नानघर का निर्माण करने से भवन के अन्य हिस्से संध्या के सूर्य की उष्मा से बचे रहते हैं, जबकि यह उष्मा द्गाौचालय एवं स्नानघर को स्वच्छ एवं सूखा रखने में सहायक होती है।
दक्षिण दिशा :

यह दिशा मृत्यु के देवता यमराज की है। दक्षिण दिशा का संबंध हमारे भूतकाल और पितरों से भी है। इस दिशा में अतिथि कक्ष या बच्चों के लिए शयन कक्ष बनाया जा सकता है। दक्षिण दिशा में बॉलकनी या बगीचे जैसे खुले स्थान नहीं होने चाहिएं। इस स्थान को खुला न छोड़ने से यह रात्रि के समय न अधिक गरम रहता है और न ज्यादा ठंडा। लिहाजा यह भाग शयन कक्ष के लिए उत्तम होता है।
दक्षिण- पश्चिम (नैऋत्य कोण) :

यह दिशा नैऋुती अर्थात स्थिर लक्ष्मी (धन की देवी) की है। इस दिद्गाा में आलमारी, तिजोरी या गृहस्वामी का शयन कक्ष बनाना चाहिए। चूंकि इस दिशा में दक्षिण व पश्चिम दिशाओं का मिलन होता है, इसलिए यह दिशा वेंटिलेशन के लिए बेहतर होती है। यही कारण है कि इस दिशा में गृह स्वामी का द्गायन कक्ष बनाने का सुझाव दिया जाता है। तिजोरी या आलमारी को इस हिस्से की पश्चिमी दीवार में स्थापित करें।
दक्षिण-पूर्व (आग्नेय कोण) :

इस दिशा के प्रतिनिध देव अग्नि हैं। यह दिशा उष्‍मा, जीवनशक्ति और ऊर्जा की दिशा है। रसोईघर के लिए यह दिशा सर्वोत्तम होती है। सुबह के सूरज की पैराबैंगनी किरणों का प्रत्यक्ष प्रभाव पडने के कारण रसोईघर मक्खी-मच्छर आदी जीवाणुओं से मुक्त रहता है। वहीं दक्षिण- पश्चिम यानी वायु की प्रतिनिधि दिशा भी रसोईघर में जलने वाली अग्नि को क्षीण नहीं कर पाती

Posted in संस्कृत साहित्य

महाराज जटायु की वंशावली – 


महाराज जटायु की वंशावली –
धर्मात्मा महाराज जटायु कोई पक्षी गिद्ध नहीं – क्षत्रिय वर्ण के मनुष्य थे
ऋषि मरीचि कुलोत्त्पन्न – ऋषि ताक्षर्य कश्यप
और महाराज दक्ष कुलोत्त्पन्न – विनीता
ताक्षर्य कश्यप और विनीता के दो पुत्र –
गरुड़ और अरुण
अरुण के दो पुत्र हुए –
सम्पात्ति और जटायु
इन सभी महापुरषो का विवरण धीरे धीरे प्रस्तुत किया जायेगा – फिलहाल आज हम चर्चा करेंगे –
धर्मात्मा महाराज जटायु के बारे में –
महाराज जटायु – ऋषि ताक्षर्य कश्यप और विनीता के पुत्र थे, आप गृध्रराज भी कहे जाते हैं, क्योंकि गृध्र एक पर्वत क्षेत्र है – जिसकी आकृति एक गिद्ध की चोंच जैसी है – इनका राज्य – अवध (अयोध्या और मिथिला) के बीच का हिस्सा था – जो एक पहाड़ी क्षेत्र था। ऐसा में कोई भ्रान्ति वश नहीं लिख रहा हु – ना ही मेरी कोई कपोल कल्पना है – आप रामायण में रावण और जटायु का संवाद पढ़े तो स्पष्ट दीखता है – देखिये –
रावण को अपना परिचय देते हुए जटायु ने कहा –
मैं गृध कूट का भूतपूर्व राजा हूँ और मेरा नाम जटायु हैं
सन्दर्भ – अरण्यक 50/4 (जटायुः नाम नाम्ना अहम् गृध्र राजो महाबलः | 50/4)
क्योंकि उस समय में आश्रम व्यवस्था की मान्यता थी जिसकी वजह से समाज और देश व्यवस्थित थे – आज ये वयवस्था चरमरा गयी है जिसके कारण ही देश पतन की और अग्रसर है – खैर – उस समय धर्मात्मा जटायु वानप्रस्थ आश्रम में होंगे – तभी वे अपने राज्य को युवा हाथो में सौंप देश और समाज की व्यवस्था में लग गए – इसका महत्वपूर्ण परिणाम था की माता सीता को रावण से बचाने के लिए अपनी प्राणो की भी बाजी लगा दी –
कुछ लोग धर्मात्मा जटायु को – एक पक्षी – या फिर बहुत बड़ा शरीर वाला गिद्ध समझते हैं – ऐसे लोग केवल वो पढ़ते हैं जिससे उन्हें अपना मनोरथ सिद्ध करना हो – जो सत्य और न्याय से परिपूर्ण हो वो पढ़ना नहीं चाहते – क्योंकि यदि पक्षपात और दुराग्रह त्याग कर – सत्य अन्वेषी बने तो सब कुछ साफ़ और स्पष्ट है की वे एक मनुष्य ही थे – देखिये
1. जैसे की ऊपर वंशावली दी गयी है – धर्मात्मा जटायु – ऋषि मरीचि के कुल में उत्पन्न ताक्षर्य कश्यप ऋषि और महाराज दक्ष के कुल में उत्पन्न विनीता के पुत्र थे – तो भाई क्या एक मनुष्य के गिद्ध संतान उत्पन्न हो सकती है ?
2. प्रभु राम ने धर्मात्मा जटायु को अरण्य काण्ड में “गृध्राज जटायु” अनेक बार बोला है क्योंकि वो उन्हें जान गए थे की वो गृध्र प्रदेश नरेश जटायु हैं।
3. जटायु राज को इसी सर्ग में श्री राम ने द्विज कहकर सम्बोधित किया – जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए ही उपयोग होता है –
4. जटायु राज को श्री राम इसी सर्ग में अपने पिता दशरथ का मित्र बताते हैं।
5. जिस समय रावण सीता का अपहरण कर उसे ले जा रहा था तब जटायु को देख कर सीता ने कहाँ – हे आर्य जटायु ! यह पापी राक्षसपति रावण मुझे अनाथ की भान्ति उठाये ले जा रहा हैं । (सन्दर्भ-अरण्यक 49/38) – यहाँ भी जटायु महाराज को द्विज सम्बोधन है – और यहाँ द्विज किसी भी प्रकार से पक्षी के लिए नहीं हो सकता – क्योंकि रावण को अपना परिचय देते हुए – जटायु महाराज अपने को – गृध्र प्रदेश का भूतपूर्व राजा बता रहे हैं।
6. जटायु राज का इसी सर्ग के बाद अगले सर्ग में दाह संस्कार स्वयं श्री राम ने किया – कुछ लोग ध्यान पूर्वक पढ़ लेवे – क्योंकि बहुत से हिन्दू भाइयो के मन में विचार आता है की जटायु – एक बहुत विशाल – पर्वत तुल्य – और बृहद पक्षी (गिद्ध) थे – तो भाई मुझे केवल इतना बताओ –
यदि जटायु महाराज इतने ही विशाल गिद्ध थे – तो बाल्मीकि रामायण के अरण्यकाण्ड सर्ग 68 में – प्रभु श्री राम बाल्मीकि के शव को अपनी गोद में रखते हुए बड़े प्रेम से लक्ष्मण को कहते हैं – लक्ष्मण इनका दाह संस्कार हम करेंगे – प्रबंध करो – तब चिता पर जटायु महाराज को चिता पर लेटाकर – उनका दाह संस्कार प्रभु राम ने किया। तो बताओ भाई श्री राम इतने पर्वत तुल्य गिद्ध शरीर – को कैसे उठा कर चिता पर रखकर – दाह किया होगा ?
कुछ भाई अरण्य काण्ड के सर्ग ६७ का एक श्लोक प्रस्तुत करके कहते हैं की – श्री राम ने भी जटायु को गिद्ध ही समझा था – क्योंकि उन्होंने कहा की
“ये पर्वत के किंग्रे के तुल्य ने ही वैदेही सीता खा ली है, इसमें कोई संदेह नहीं।”
यहाँ पर्वत के किंग्रे तुल्य का सही अर्थ ना जानकार व्यर्थ ही आक्षेप करते हैं – पर्वत के किंग्रे तुल्य अर्थ बड़ा डील वाला – यानी औसत शरीर से बड़ा – और यहाँ वैदेही सीता खा ली है से तात्पर्य है की – उस वन में अनेक “जंगली – असभ्य – राक्षस प्रवर्ति के लोग निवास करते थे जो मांसभक्षी थे – इसलिए प्रभु राम ने ऐसी सम्भावना व्यक्त की। भाई कृपया समझ कर पढ़िए –
यदि पर्वत के किंग्रे तुल्य का अर्थ इतना ही बड़ा होगा – तो बताओ कैसे इतने बड़े भरी भरकम शरीर को प्रभु राम ने उठाकर चिता पर रखा होगा ? कैसे अपनी गोद में उस धर्मात्मा जटायु के सर को रखकर लक्ष्मण से वार्ता की होगी ?
इसी दाह संस्कार के बाद प्रभु राम ने – महाराज जटायु के लिए उदककर्म भी संपन्न किया था।
अब जहाँ तक हिन्दुओ को भी पता होगा – ये उदककर्म – मनुष्यो द्वारा – मनुष्यो के लिए ही किया जाता है – अब यदि फिर भी कोई धर्मात्मा जटायु को गिद्ध समझे – तो ये उसकी मूरखता ही सिद्ध होगी।
कृपया अपने महापुरषो के सत्य स्वरुप को जानिये – उनके बल, पराक्रम, शौर्य और वीरता को व्यर्थ ना करे। उनके पुरषार्थ का मजाक न बनाये। उन्हें पशु पक्षी तुल्य जानकार बताकर – समझकर – उनके चरित्र का मजाक ना स्वयं बनाये न किसी को बनाने ही दे।
कृपया वेदो की और लौटिए – सत्य और न्याय की और लौटिए
धन्यवाद

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वो, एक शहर के अंतररास्ट्रीय प्रसिद्धि के विद्यालय के बगीचे में बिना तेज धूप और गर्मी की परवाह किये,


वो, एक शहर के अंतररास्ट्रीय प्रसिद्धि के विद्यालय के बगीचे में बिना तेज धूप और गर्मी की परवाह किये, बड़ी लग्न से पेड़ पौधों की काट छाट में लगा था की तभी विद्यालय के चपरासी की आवाज सुनाई दी, “गंगादास तुझे प्रधानाचार्या जी अभी तुरंत बुला रही है”। गंगादास को आखिरी पांच शब्दो में काफी तेजी महसूस हुई और उसे लगा कि कोई महत्वपूर्ण बात हुई है जिसकी वजह से प्रधानाचार्या ने उसे तुरंत ही बुलाया है।

वो बहुत ही शीघ्रता से उठा, अपने हाथों को धोकर साफ किया और फिर द्रुत गति से प्रधानाचार्य के कार्यलय की ओर चल पढ़ा। उसे प्रधानाचार्य महोदय का कार्यालय की दूरी मीलो की दूरी लग रही थी जो खत्म होने का नाम नही ले रही थी। उसकी ह्र्दयगति बडी गई थी। वो सोच रहा था कि उससे क्या गलत हो गया जो आज उसको प्रधानाचार्य महोदया ने उसे तुरंत ही उनके कार्यालय में आने को कहा। वो एक ईमानदार कर्मचारी था और अपने कार्य को पूरी निष्ठा से पूर्ण करता था पता नही क्या गलती हो गयी वो इसी चिंता के साथ प्रधानाचार्य के कार्यालय पहुचा “मैडम क्या मैं अंदर आ जाऊ, आपने मुझे बुलाया था”।

“हा, आओ अंदर आओ और ये देखो” प्रधानाचार्या महोदया की आवाज में कड़की थी और उनकी उंगली एक पेपर पर इशारा कर रही थी। “पढ़ो इसको” प्रधानाचार्या ने आदेश दिया।

“मैं, मैं, मैडम! मैं तो इग्लिश पढ़ना नही जानता मैडम!” गंगादास ने घबरा कर उत्तर दिया। “मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ मैडम यदि कोई गलती हो गयी हो तो। मैं आपका और विद्यालय का पहले से बहुत ऋणी हूँ क्योंकि आपने मेरी बिटिया को इस विद्यालय में निशुल्क पढ़ने की अनुमति दी। मुझे कृपया एक और मौका दे मेरी कोई गलती हुई है तो सुधारने का। मैं आप का सदैव ऋणी रहूंगा।” गंगादास बिना रुके घबरा कर बोलता चला जा रहा था कि उसे प्रधानाचार्या ने टोका “तुम बिना वजह अनुमान लगा रहे हो। थोड़ा इंतज़ार करो मैं तुम्हारी बिटिया की कक्षा की अध्यापिका को बुलाती हूँ।

वो पल जब तक उसकी बिटिया की अध्यापिका प्रधानाचार्या के कार्यालय में पहुची बहुत ही लंबे हो गए थे गंगादास के लिए। वो सोच रहा था कि क्या उसकी बिटिया से कोई गलती हो गयी, कही मैडम उसकी विद्यालय से निकाल तो नही रही। उसकी चिंता और बड़ गयी थी।

कक्षा अध्यापिका के पहुचते ही प्रधानाचार्या महोदया ने कहा “हमने तुम्हारी बिटिया की प्रतिभा को देखकर और परख कर ही उसे अपने विद्यालय में पढ़ने की अनुमति दी थी।” अब ये मैडम इस पेपर जो लिखा है उसे पढ़कर और हिंदी में तुम्हे सुनाएगी गौर से सुनो”।

कक्षा अध्यापिका ने पेपर को पढ़ना शुरू करने से पहले बताया “आज मातृ दिवस था और आज मैने कक्षा में सभी बच्चों को अपनी अपनी माँ के बारे में एक लेख लिखने को कहा, तुम्हारी बिटिया ने जो लिखा उसे सुनो।” उसके बाद कक्षा अध्यापिका ने पेपर पढ़ना शुरू किया।

मैं एक गाँव में रहती थी, एक ऐसा गांव जहा शिक्षा और चिकित्सा की सुविधाओं का आज भी आभाव है। चिकित्सक के आभाव में कितनी ही माँ दम तोड़ देती है बच्चों के जन्म के समय। मेरी माँ भी उनमें से एक थी। उसने मुझे छुआ भी नही की वो चलबसी। मेरे पिता ही वो पहले व्यक्ति थे मेरे परिवार के जिन्होंने मुझे गोद में लिया। पर सच कहूँ तो मेरे परिवार के वो अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने मुझे गोद में उठाया था। बाकी की नजर में मैं अपनी माँ को खा गई थी। मेरे पिताजी ने मुझे माँ का प्यार दिया पर मेरे दादा दादी चाहते थे कि मेरे पिताजी दुबारा विवाह करके एक पोते को इस दुनिया में लाये ताकि उनका वंश आगे चल सके। परंतु मेरे पिताजी ने उनकी एक न सुनी और दुबारा विवाह करने से मना कर दिया। इस वजह से मेरे दादा दादीजी ने उनको अपने से अलग कर दिया और पिताजी सबकुछ, जमीन, खेती बाड़ी, घर सुविधा आदि छोड़ कर मुझे साथ लेकर शहर चले आये और मेरे विद्यालय में माली का कार्य करने लगे। वो मुझे बहुत ही लाड़ प्यार से बड़ा करने लगे। मेरी जरूरतों पर माँ की तरह हर पल उनका ध्यान रहता है।

आज मुझे समझ आता है कि वो क्यो हर उस चीज को जो मुझे पसंद थी ये कह कर खाने से मना करदेते थे कि वो उन्हें पसंद नही है क्योंकि वो आखिरी टुकड़ा होती थी। आज मुझे बड़ा होने पर उनके इस त्याग का महत्व पता चला।

मेरे पिता ने अपनी क्षमताओं में मेरी हर प्रकार की सुख सुविधाओं का ध्यान रखा। और मेरे विद्यालय ने उनको ये सबसे बड़ा पुरुस्कार दिया जो मुझे यहा पढ़ने की अनुमति मिली। वो दिन मेरे पिता की खुशी का कोई ठिकाना न था।

यदि माँ, प्यार और देखभाल करने का नाम है तो मेरी माँ मेरे पिताजी है।

यदि दयाभाव, माँ को परिभाषित करता है तो मेरे पिताजी उस परिभाषा के हिसाब से पूरी तरह मेरी माँ है।

यदि त्याग, माँ को परिभाषित करता है तो मेरे पिताजी इस वर्ग में भी सर्वोच्च स्थान पर है।

यदि संक्षेप में कहूँ की प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग माँ की पहचान है तो मेरे पिताजी उस पहचान पर खरे उतरते है। और मेरे पिताजी विश्व की सबसे अच्छी माँ है।

आज मातृ दिवस पर मैं अपने पिताजी को शुभकामना दूंगी और कहूंगी की आप संसार के सबसे अच्छे पालक है। बहुत गर्व से कहूंगी की ये जो हमारे विद्यालय के परिश्रमी माली है मेरे पिता है।

मैं जानती हूं कि मैं आज की लेखन परीक्षा में असफल हो जाऊंगी क्योकि मूझे माँ पर लेख लिखना था पर मैने पिता पर लिखा, पर ये बहुत ही छोटी सी कीमत होगी जो उस सब की जो मेरे पिता ने मेरे लिए किया। धन्यवाद”। आखरी शब्द पढ़ते पढ़ते अध्यापिका का गला भर आया था और प्रधानाचार्या के कार्यालय में शांति छा गयी थी।

इस शांति मैं केवल गंगादास के सिसकने की आवाज सुनाई दे रही थी। बगीचे में धूप की गर्मी उसकी कमीज को गीला न कर सकी पर उस पेपर पर बिटिया के लिखे शब्दो ने उस कमीज को पिता के आसुंओ से गीला कर दिया था। वो केवल हाथ जोड़ कर वहां खड़ा था। उसने उस पेपर को अध्यापिका से लिया और अपने हृदय से लगाया और रो पड़ा।

प्रधानाचार्या ने खड़े होकर उसे एक कुर्सी पर बैठाया और एक गिलास पानी दिया तथा कहा, पर इस बार उनकी आवाज काफी मिठास व सौम्य थी “गंगादास तुम्हारी बिटिया को इस लेख के लिए पूरे 10/10 नम्बर दिए गए है। ये लेख मेरे अबतक के पूरे विद्यालय जीवन का सबसे अच्छा मातृ दिवस का लेख है। हम कल मातृ दिवस अपने विद्यालय में बड़े जोर शोर से मना रहे है। इस दिवस पर विद्यालय एक बहुत बड़ा कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा है। विद्यालय की प्रबंधक कमेटी ने आपको इस कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाने का निर्णय लिया है। ये सम्मान होगा उस प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग का जो एक आदमी अपने बच्चे के पालन के लिए कर सकता है, ये सिद्ध करता है कि आपको एक औरत होना आवश्यक नही है एक पालक बनने के लिए। साथ ही ये अनुशंषा करना है उस विश्वाश का जो विश्वास आपकी बेटी ने आप पर दिखाया। हमे गर्व है कि संसार का सबसे अच्छा पिता हमारे विद्यालय में पढ़ने वाली बच्ची का है जैसा कि आपकी बिटिया ने अपने लेख में लिखा। गंगादास हमे गर्व है कि आप एक माली है और सच्चे अर्थों में माली की तरह न केवल विद्यालय के बगीचे के फूलों की देखभाल की बल्कि अपने इस घर के फूल को भी सदा खुशबू दार बनाकर रखा जिसकी खुशबू से हमारा विद्यालय महक उठा। तो क्या आप हमारे विद्यालय के इस मातृ दिवस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बनेगे

Laxmikant Vershnay