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जब कश्मीर के राजपूत महाराजा हरिसिंह को मिला नेहरू और शेख अब्दुल्ला के हांथों धोखा—–

दुष्ट कांग्रेस पार्टी,राजपूतों की सबसे बड़ी दुश्मन—
क्श्मीर के आखिरी राजपूत राजा महाराजा हरि सिंह, जिन्होंने भारत में आजादी की परिकल्पना से कई साल पहले सन् 1925 में कश्मीर राज्य को स्वाधीन कराने का लक्ष्य देकर राष्ट्र्रीयता की भावना का जो परिचय पूरे भारत के सामने दिया था, को जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला जैसे सत्तालोभी नेताओं द्वारा बुरी तरह नष्ट कर दिया गया। महाराजा हरि सिंह की भारत के तत्कालीन राष्ट्र्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद को लिखे गए पत्र में इस घटना का खुलासा हुआ है कि कैसे नेहरू और शेख अब्दुल्ला ने साजिश के तहत मनमाने तरीके से कश्मीर के भारत में विलय को अंजाम दिया, जिससे इतनी बड़ी कश्मीर समस्या का जन्म हुआ।
17 अगस्त 1952 को लिखे गए अपने 9000 शब्दों के इस पत्र में महाराजा हरि सिंह ने देश के प्रथम राष्ट्रपति  डॉ राजेंद्र प्रसाद को आगाह किया है कि कैसे जवाहर लाल नेहरू, शेख अब्दुल्ला और लुई माउंटबेटन जिसे लोगों ने मिलकर भारतीय प्रांतों की आजादी के समय होने वाले विलय के नियमों के साथ खिलवाड़ कर अपनी मनमानी दिखाई जिसका प्रभाव आजतक कश्मीर में देखा जा सकता है। कश्यप मुनि की धरती कश्मीर का भारत में विलय राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों ही रूप से महत्वपूर्ण था। किंतु भारत के हुक्मरानों ने ऐसी चाल चली जिसे ना तो सरकारी अनुदान प्राप्त इतिहासकारों ने दिखाया और ना ही आगे आने वाली सरकारों ने ऐसे किसी पत्र को सामने आने दिया। इतिहास के साथ साथ लोगों की मानसिकता के साथ खिलवाड़ करने वाले ऐसे लोगों का सच सामने लाने के लिए सरकार को हर एक दस्तावेज को सार्वजनिक करना होगा जो भारत के इतिहास से जुड़ा हुआ है। इसके बाद ही जनता नायकों, खलनायकों, धूर्तों और चाटुकारों में फर्क कर पाएगी।
महाराजा हरि सिंह ने अपने पत्र में लिखा है कि कैसे सन् 1925 में उनके जैसे देशभक्त के कश्मीर की सत्ता संभालते ही अंग्रेज तिलमिला गए क्योंकि कश्मीर उनके लिए बहुत महत्व रखता था। अंग्रजों ने वहां के मुसलमानों को भड़काकर धार्मिक विद्रोह की शुरूआत की तथा हिंदु राज का अंत और इस्लाम खतरे में जैसे नारों को जन्म दिया। कश्मीर प्रांत में चौधरी गुलाम अब्बास तथा मौलाना यूसुफ शाह जैसे नेताओं ने हिंदु विरोधी नारों के साथ नेशनल कानफ्रेंस नामक पार्टी की स्थापना की जिसे कांग्रेस पार्टी का पूरा समर्थन भी मिला। नेहरू की हिंदु विरोधी विचारधारा को देखते हुए मांउटबेटन ने हरि सिंह के पाकिस्तान में शामिल होने की संभावना के तरफ इसारा भी किया था। सन् 1947 में सरदार बल्लभ भाई पटेल ने राजा हरि सिंह को पत्र लिखकर मेहर चंद महाजन को प्रधानमंत्री बनाने की सूरत में पूरा सहयोग देने का अश्वासन दिया था। हरि सिंह द्वारा महाजन को प्रधानमंत्री बनाए जाने के बाद पटेल ने शेख अब्दुल्ला की कश्मीर को लेकर बुरी नीयत के बारे में महाजन को अगाह भी किया था।
जवाहरलाल नेहरू ने भी महाजन को कुछ ऐसे ही लिखे पत्र में शेख अब्दुल्ला को जम्मू कश्मीर की अंतरिम सरकार का मुखिया बनाकर हरि सिंह को हटाने की बीच में से हटाने की मांग की थी। नेहरू का कहना था कि शेख अब्दुल्ला ही कश्मीर का सबसे प्रसिद्ध नेता है इसलिए उसे ही राज्य का मुख्यमंत्री बनना चाहिए। उन्होंने यहां तक कि कश्मीर विलय पर चल रहे कार्यक्रम को तब तक के लिए स्थगित कर दिया था जब तक शेख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री नहीं बन जाता। महाराजा हरि सिंह को कश्मीर को लेकर मिले हुए विशेषाधिकारों के बावजूद नेहरू ने राजा पर अब्दुल्ला को बड़ा पद देने के लिए दबाव बनाना भी शुरू कर दिया था। नेहरू के कहने पर भारत की अंतरिम सरकार में मंत्री एन गोपालस्वामी अयंगार ने अब्दुल्ला के हस्ताक्षर किए हुए पत्र को स्वीकृति के लिए महाराजा के पास भेजा जिसमें अब्दुल्ला को विशेष स्थान देने की बात कही गई थी।
शेख अब्दुल्ला ने ताकत मिलते ही राजा हरि सिंह को परेशान करना शुरू कर दिया। हरि सिंह ने राष्ट्रपति से शिकायत की थी कि शेख जानबूझ कर उनको नजरअंदाज कर रहा है और नेहरू के समर्थन से अअपनी मनमानी करने में कामयाब हो रहा है। यहां तक कि राजा हरि सिंह के कश्मीर में घूमने और वहां की जनता से मिलने पर भी अब्दुल्ला ने रोक लगा दिया था। नेहरू के दबाव में हरि सिंह को कुछ महीनो के लिए मजबूरन कश्मीर छोड़ना पड़ा और इसी दौरान शेख अब्दुल्ला ने सरकारी समेत राजा की निजी संपत्तियों पर भी कब्जा करना शुरू कर दिया था। अब्दुल्ला ने हिंदुओं के खिलाफ जाते हुए राजा के धर्मार्थ ट्रस्ट को परेशान करने की नीयत से पैसे निकालने पर रोक लगा दी। अब्दुल्ला ने हिंदु मंदिरो और देव स्थानों पर पूजा करने पर भी रोक लगा दी जो नेहरू के स्वतंत्र भारत में धर्मनिरपेक्षता का पहला उदाहरण है।
हरि सिंह ने डा राजेंद्र प्रसाद को लिखे पत्र में नेहरू द्वारा भारत के संविधान के विपरीत जाते हुए अनुच्छेद 370 का दुरूपयोग कर उसे शेख अब्दुल्ला के पक्ष में परिवर्तित करने का आरोप लगाया था। राजा ने पूछा था कि “क्या भारत सरकार उस व्यक्ति को अनदेखा कर सकती है जिसने सरकार को कश्मीर में प्रवेश करने की आज्ञा दी ? वह इंसान, जिसने कश्मीर के भारत में विलय की नींव रखी, आज उसे ही कश्मीर से निकाला जा रहा है |” महाराजा हरि सिंह के नेहरू, माउंटबेटन और भारत सरकार के भरोसे और नेक सोच पर चलने के बावजूद एक ऐसे तरीके से उनका अंत करना ना ही सम्मानजक है और ना ही सही |

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