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राजस्थानी कहावतें हिन्दी व्याख्या सहित


http://www.gyandarpan.com/2009/02/2.htmlघणा बिना धक् जावे पण थोड़ा बिना नीं धकै |
अधिक के बिना तो चल सकता है,लेकिन थोड़े के बिना नही चल सकता |

मनुष्य के सन्दर्भ में अधिक की तो कोई सीमा नही है – दस,बीस,सौ,हजार,लाख,अरब-खरब भी सीमा का अतिक्रमण नही कर सकते | सामान्य अथवा गरीब व्यक्ति के लिए अधिक धन के बिना तो जीवन चल सकता है,लेकिन थोड़े के बिना एक घड़ी भी नही चल सकता | ऐश्वर्य का अभाव उतना नही खलता,जितना न्यूनतम जरूरतों की पूर्ति का न होना भयंकर कष्ट दायक होता है | बड़े से बड़ा दार्शनिक भी इतने सरल शब्दों में इतनी बड़ी बात नही कह सकता | जितनी यहाँ एक छोटी सी कहावत के द्वारा आम आदमी द्वारा कह दी जाती है | सीधी और सहज उक्ति ही सुगम्भीर ज्ञान झेल सकती है,वाग्जाल से बात बनती नही |

गाभां में सै नागा = कपड़ो में सब नंगे |
बाहरी लिबास पर ही लोक-द्रष्टि अटक कर रह जाती है | वह वस्त्रो के ठेठ भीतर तक देख लेती है कि बाहरी पहनावे से सब अलग-अलग दीखते है,पर भीतर से सब एक है – निपट निरावर्त और पशु | हर व्यक्ति अपनी कमजोरियों को अनदेखा करना चाहता है,लेकिन लोक द्रष्टि से कुछ भी छिपा नही रहता कि ऐसा कोई मनुष्य हो जो अवगुणों से परे हो | पशुता को ढकने से वह ढकी नही रह जाती | चाहे संत-सन्यासी हो,चाहे दरवेश या कोई आम आदमी | – आदमी पहले पशु है,फ़िर नागरिक |
अन्तर बाजै तौ जंतर बाजै = अन्तर बजे तो साज सजे |
कितना सटीक निरिक्षण है कि ह्रदय की वीणा मौन तो हाथ की वीणा भी मौन | भीतर से उदभासित होने पर ही प्रत्येक कला निखरती है | साहित्य या अन्य कला का स्त्रोत अंतरात्मा से उगमता है तो बाहर तरह-तरह के फूल खिलते है | और तरह-तरह की सौरभ महकती है | ह्रदय की आँखे न खुलें तब तक बाहर की झांकी या ब्रह्म की झलक जीवंत रूप में द्रष्टिगोचर नही होती | पानी केवल पानी ही दीखता है,बिजली केवल बिजली ही नजर आती है | उन में प्राणों का स्पंदन महसूस नही होता | कितने सरल शब्दों में सहज भाव से लोक द्रष्टि ने कला के मूल उत्स की पड़ताल कर ली | अपने देश के ऋषि-मुनि अंतप्रज्ञा से जो ज्ञान प्राप्त करते थे,उसे लोक जीवन अपने सामूहिक अवचेतन से अर्जित करता है,पर दोनों की उंचाईयों में किसी भी प्रकार का अन्तर नही है |

चोरी रो गुड मिठो = चोरी का गुड मीठा |
अपने घर में शक्कर,खांड,मिश्री,और गुड के भंडार भरे हो,पर चोरी का गुड अधिक मीठा लगता है | इसलिए कि चोरी के गुड में जीवट का मिठास घुला होता है | जो वस्तु सहज ही उपलब्ध हो जाती है,उसके उपयोग में आनंद नही मिलता, जितना अप्राप्य वस्तु प्राप्त करने में मिलता है |

धणी गोङै जावता छिनाल नह बाजै = पति के पास जाने पर छिनाल नही कहलाती |
सामाजिक स्वीकृति के बिना प्राकृतिक जरूरतों के लिए किए गए कार्य भी अवैध कहलाते है | नारी और पुरूष का स्वाभाविक व प्राकृतिक मिलन,जब तक समाज के द्वारा मान्यता प्राप्त न हो,वह संगत या वैध नही होता | पर उसी कर्म को जब सामाजिक मान्यता मिल जाती है तो वह प्रतिष्ठित मान लिया जाता है | मैथुन कर्म वही है, पर पर पति-पत्नी दुराचारी या लम्पट नही कहलाते | किंतु पर-पुरूष और पर-नारी के बीच यही नैसर्गिक कर्म असामाजिक हो जाता है | सामाजिक प्रथाये समय के अनुरूप बदलती रहती है,फ़िर भी मनुष्य का सामाजिक मान्यताओ को माने बिना काम नही चल सकता | वह पशुओं कि भांति अकेला जीवन व्यतीत नही करता,समाज को मान कर चलना अनिवार्य है |

ये थी कुछ राजस्थानी कहावते और वर्तमान सन्दर्भ में उनकी हिंदी व्याख्या | ये तो सिर्फ़ बानगी है ऐसी ही 15028 राजस्थानी कहावतों को हिंदी व्याख्या सहित लिखा है राजस्थान के विद्वान लेखक और साहित्यकार विजयदान देथा ने | विजयदान देथा किसी परिचय के मोहताज नही शायद आप सभी इनका नाम पहले पढ़ या सुन चुके होंगे | और इन कहावतों को वृहद् आठ भागो में प्रकाशित किया है राजस्थानी ग्रंथागार सोजती गेट जोधपुर ने |

 

Posted in आओ संस्कृत सीखे.

संस्कृत वाक्य


मेरे मित्र ने पुस्तक पढ़ी I मम मित्रं पुस्तकं अपठत् I
वे लोग घर पर क्या करेंगे I ते गृहे किम करिष्यन्ति I
यह गाय का दूध पीता है I सः गोदुग्धम पिवति I
हम लोग विद्यालय जाते है I वयं विद्यालयं गच्छाम: I
तुम शीघ्र घर जाओ I त्वं शीघ्रं गृहम् गच्छ I
हमें मित्रों की सहायता करनी चाहिये I वयं मित्राणां सहायतां कुर्याम I
विवेक आज घर जायेगा I विवेकः अद्य गृहं गमिष्यामि I
सदाचार से विश्वास बढता है I सदाचारेण विश्वासं वर्धते I
वह क्यों लज्जित होता है ? सः किमर्थम् लज्जते ?
हम दोनों ने आज चलचित्र देखा I आवां अद्य चलचित्रम् अपश्याव I
हम दोनों कक्षा में अपना पाठ पढ़ेंगे | आवां कक्षायाम्‌ स्व पाठम पठिष्याव: I
वह घर गई I सा गृहम्‌ अगच्छ्त्‌ I
सन्तोष उत्तम सुख है I संतोषः उत्तमं सुख: अस्ति I
पेड़ से पत्ते गिरते है I वृक्षात्‌ पत्राणि पतन्ति I
मै वाराणसी जाऊंगा I अहं वाराणासीं गमिष्यामि I
मुझे घर जाना चाहिये I अहं गृहं गच्छेयम्‌ I
यह राम की किताब है I इदं रामस्य पुस्तकम्‌ अस्ति I
हम सब पढ़ते हैं I वयं पठामः I
सभी छात्र पत्र लिखेंगे I सर्वे छात्राः पत्रं लिखिष्यन्ति I
मै विद्यालय जाऊंगा I अहं विद्यालयं गमिष्यामि I
प्रयाग में गंगा -यमुना का संगम है | प्रयागे गंगायमुनयो: संगम: अस्ति |
हम सब भारत के नागरिक हैं | वयं भारतस्य नागरिका: सन्ति |
वाराणसी गंगा के पावन तट पर स्थित है | वाराणसी गंगाया: पावनतटे स्थित: अस्ति |
वह गया | स: आगच्छ्त् |
वह किसका घोड़ा है ? स: कस्य अश्व: अस्ति ?
तुम पुस्तक पढ़ो | त्वं पुस्तकं पठ |
हम सब भारत के नागरिक हैं | वयं भारतस्य नागरिका: सन्ति |
देशभक्त निर्भीक होते हैं | देशभक्ता: निर्भीका: भवन्ति |
सिकन्दर कौन था ? अलक्षेन्द्र: क: आसीत् ?
राम स्वभाव से दयालु हैं | राम: स्वभावेन दयालु: अस्ति |
वृक्ष से फल गिरते हैं | वृक्षात् फलानि पतन्ति |
शिष्य ने गुरु से प्रश्न किया | शिष्य: गुरुं प्रश्नम् अपृच्छ्त् |
मैं प्रतिदिन स्नान करता हूँ | अहं प्रतिदिनम् स्नानं कुर्यामि |
मैं कल दिल्ली जाऊँगा | अहं श्व: दिल्लीनगरं गमिष्यामि |
प्रयाग में गंगा-यमुना का संगम है | प्रयागे गंगायमुनयो: संगम: अस्ति |
वाराणसी की पत्थर की मूर्तियाँ प्रसिद्ध हैं | वाराणस्या: प्रस्तरमूर्त्तय: प्रसिद्धा: |
अगणित पर्यटक दूर देशो से वाराणसी आते हैं | अगणिता: पर्यटका: सुदूरेभ्य: देशेभ्य: वाराणसी नगरिम् आगच्छन्ति |
यह नगरी विविध कलाओ के लिए प्रसिद्ध हैं | इयं नगरी विविधानां कलानां कृते प्रसिद्धा अस्ति |
वे यहा नि:शुल्क विद्या ग्रहण करते हैं | ते अत्र नि:शुल्कं विद्यां गृह्णन्ति |
वाराणसी में मरना मंगलमय होता है | वाराणस्यां मरणं मंगलमयं भवति |
सूर्य उदित होगा और कमल खिलेंगे | सूर्य: उदेष्यति कमलानि च हसिष्यन्ति |
रात बीतेगी और सवेरा होगा | रात्रि: गमिष्यति, भविष्यति सुप्रभातम् |
कुँआ सोचता है कि हैं अत्यन्त नीच हूँ | कूप: चिन्तयति नितरां नीचोsस्मीति |
भिक्षुक प्रत्येक व्यक्ति के सामने दीन वचन मत कहो | भिक्षुक! प्रत्येकं प्रति दिन वच: न वद्तु |
हंस नीर- क्षीर विवेक में प्रख्यात हैं | हंस: नीर-क्षीर विवेक प्रसिद्ध अस्ति |
सत्य से आत्मशक्ति बढ़ती है | सत्येन आत्मशक्ति: वर्धते |
अपवित्रता से दरिद्रता बढ़ती है | अशौचेन दारिद्रयं वर्धते|
अभ्यास से निपुणता बढ़ती है| अभ्यासेन निपुणता वर्धते |
उदारता से अधिकतर बढ़ते है | औदार्येण प्रभुत्वं वर्धते |
उपेक्षा से शत्रुता बढ़ती है | उपेक्षया शत्रुता वर्धते|
मानव जीवन को संस्कारित करना ही संस्कृति है | मानव जीवनस्य संस्करणाम् एव संस्कृति: अस्ति
भारतीय संस्कृति सर्वश्रेष्ठ है | भारतीया: संस्कृति: सर्वश्रेष्ठ: अस्ति |
सभी निरोग रहें और कल्याण प्राप्त करें | सर्वे संतु निरामया: सर्वे भद्राणि पश्यंतु च |
काम करके ही फल मिलता है | कर्म कृत्वा एव फलं प्राप्यति |
हमारे पूर्वज धन्य थे | अस्माकं पूर्वजा: धन्या: आसन्|
हम सब एक ही संस्कृति के उपासक हैं| वयं सर्वेsपि एकस्या: संस्कृते: समुपासका: सन्ति |
जन्म भूमि स्वर्ग से भी बड़ी है | जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी|
विदेश में धन मित्र होता है| विदेशेषु धनं मित्रं भवति |
विद्या सब धनों में प्रधान है | विद्या सर्व धनं प्रधानम् |
मनुष्य को निर्लोभी होना चाहिये | मनुष्य: लोभहीन: भवेत्|
आज मेरे विद्यालय मे उत्सव होगा| अद्य मम् विद्यालये उत्सव: भविष्यति |
ताजमहल यमुना किनारे पर स्थित है | ताजमहल: यमुना तटे स्थित: अस्ति |
हमे नित्य भ्रमण करना चाहिये | वयं नित्यं भ्रमेम |
गाय का दूध गुणकारी होता है | धेनो: दुग्धं गुणकारी भवति |
जंगल मे मोर नाच रहे हैं | वने मयूरा: नृत्यन्ति |
किसी के साथ बुरा कार्य मत करो | केनापि सह दुष्कृतं मा कुरु|
सच और मीठा बोलो | सत्यं मधुरं च वद |
Posted in आओ संस्कृत सीखे.

संस्कृत वाकय


अजीर्णे भोजनं विषम्
अपाचन हुआ हो तब भोजन विष समान है ।

कुभोज्येन दिनं नष्टम् ।
बुरे भोजन से पूरा दिन बिगडता है ।

मनः शीघ्रतरं वातात् ।
मन वायु से भी अधिक गतिशील है ।

न मातुः परदैवतम् ।
माँ से बढकर कोई देव नहीं है ।

गुरुणामेव सर्वेषां माता गुरुतरा स्मृता ।
सब गुरु में माता को सर्वश्रेष्ठ गुरु माना गया है ।

वस्त्रेण किं स्यादिति नैव वाच्यम् ।
वस्त्रं सभायामुपकारहेतुः ॥
अच्छे या बुरे वस्त्र से क्या फ़र्क पडता है एसा न बोलो, क्योंकि सभा में तो वस्त्र बहुत उपयोगी बनता है !

वृध्दा न ते ये न वदन्ति धर्मम् ।
जो धर्म की बात नहीं करते वे वृद्ध नहीं हैं ।

अन्तो नास्ति पिपासयाः ।
तृष्णा का अन्त नहीं है ।

मृजया रक्ष्यते रूपम् ।
स्वच्छता से रूप की रक्षा होती है ।

भिन्नरूचिर्हि लोकः ।
मानव अलग अलग रूचि के होते हैं ।

तृणाल्लघुतरं तूलं तूलादपि च याचकः ।
तिन्के से रुई हलका है, और याचक रुई से भी हलका है ।

मौनं सर्वार्थसाधनम् ।
मौन यह सर्व कार्य का साधक है ।

सर्वस्य लोचनं शास्त्रम् ।
शास्त्र सबकी आँख है ।

षटकर्णो भिद्यते मन्त्रः ।
मंत्र षटकर्णी हो तो उसका नाश होता है ।

बालादपि सुभाषितम् ग्राह्यम्।
बालक के पाससे भी अच्छी बात (सुभाषित) ग्रहण करनी चाहिए ।

साक्षरा विपरीताश्र्चेत् राक्षसा एव केवलम् ।
साक्षर अगर विपरीत बने तो राक्षस बनता है ।
कुलं शीलेन रक्ष्यते ।
शील से कुल की रक्षा होती है
शीलं भूषयते कुलम् ।
शील कुल को विभूषित करता है ।
अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ।
अप्रिय हितकर वचन बोलनेवाला और सुननेवाला दुर्लभ है ।

उत्तिष्ठत जाग्रत
प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया
दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥ कठ उपनिषद् 1.3.14 ॥

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

सप्तश्लोकी गीता


ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।

य: प्रयाति त्यजन्देह स याति परमां गतिम्।।1।।

 

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।

रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघा:।।2।।

 

सर्वत:पाणिपादं तत्सर्वतोSक्षिशिरोमुखम् ।

सर्वत:श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ।।3।।

 

कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्य: ।

सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं  तमस: परस्तान्।।4।।

 

ऊर्ध्वमूलमध:शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।

छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।5।।

 

सर्वस्य चहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।

वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।6।।

 

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां   नमस्कुरु ।

मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण:।।7।।

 

इति श्रीमद्भागवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे

श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सप्तश्लोकी गीता सम्पूर्ण ।

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

सप्तश्लोकी गीता — astroprabha


ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। य: प्रयाति त्यजन्देह स याति परमां गतिम्।।1।। स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघा:।।2।। सर्वत:पाणिपादं तत्सर्वतोSक्षिशिरोमुखम् । सर्वत:श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ।।3।। कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्य: । सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमस: परस्तान्।।4।। ऊर्ध्वमूलमध:शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।5।। सर्वस्य चहं […]

via सप्तश्लोकी गीता — astroprabha

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मन्दिरो में दान देने वाले हिन्दू भाइ-बहन सुप्रीम कोर्ट की ये न्यूज़ पढ़े


मन्दिरो में दान देने वाले हिन्दू भाइ-बहन सुप्रीम कोर्ट की ये न्यूज़ पढ़े:- मोनू स्वदेशी
आप सोचते हैं कि मन्दिरों में किया हुआ दान, पैसा/सोना,..इत्यादि हिन्दू धर्म के उत्थान के लिए काम आ रहा है ओर आपको पुन्य मिल रहा है तो आप निश्चित ही बड़े भोले… हैं।
स्वदेशी पत्रिका LIke करे
कर्नाटक सरकार के मन्दिर एवं पर्यटन विभाग (राजस्व) द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार 1997 से 2002 तक पाँच साल में कर्नाटक Congress सरकार को राज्य में स्थित मन्दिरों से
“सिर्फ़ चढ़ावे में” 391 करोड़ की रकम प्राप्त हुई, जिसे निम्न मदों में खर्च किया गया-
स्वदेशी पत्रिका LIke करे
1) मुस्लिम मदरसा उत्थान एवं हज मक्का मदिना सब्सिडी, विमान टिकट – 180 करोड़ (यानी 46%)
2) ईसाई चर्च को अनुदान (To convert poor Hindus into Christian) – 44 करोड़ (यानी 11.2%)
3) मन्दिर खर्च एवं रखरखाव – 84 करोड़
(यानी 21.4%)
4) अन्य – 83 करोड़ (यानी 21.2%)
कुल 391 करोड!!!!!
ये तो सिर्फ एक राज्य का हिसाब हैं….
सबसे अमीर- तिरुपति बालाजी, शिर्डि साइबाबा, ये दोनों मन्दिर Congress के कब्जे में है…. हर रोज हजारों करोड़ों पैसा/सोना दान …सच हिन्दुओं को ही पता नहीं चलेगा…
स्वदेशी पत्रिका LIke करे
भगवत् गीता मे भगवान ने बताया हैं कि दान देते वक्त अपनी विवेक बुद्धि से दान दे…ताकि वह समाज/देश की भलाई में इस्तेमाल हो, नहीं तो दानि पाप का ही भागीदार है….
हिन्दुओं के पैसों से, हिन्दुओं के ही विनाश का षड्यंत्र ६० साल से चल रहा है, ओर यह सच्चाई हिन्दुओं को पता ही नहीं….
कृपया अधिक से अधिक हिन्दुओ को भेजे तथा उन्हें जागरूक करें….

Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

श्रीरामचरित मानस के अनुसार रावण ने मंदोदरी को स्त्रियों के संबंध में कुछ बातें बताई थीं, जानिए वह बातें कौन-कौन थीं…


श्रीरामचरित मानस के अनुसार रावण ने मंदोदरी को स्त्रियों के संबंध में कुछ बातें बताई थीं, जानिए वह बातें कौन-कौन थीं…

क्या है प्रसंगश्रीरामचरित मानस के अनुसार जब श्रीराम वानर सेना सहित लंका पर आक्रमण के लिए समुद्र पार कर लंका पहुंच गए थे, तब रानी मंदोदरी को कई अपशकुन होते दिखाई दिए। इन अपशकुनों से मंदोदरी डर गई और वह रावण को समझाने लगी कि युद्ध ना करें और श्रीराम से क्षमा याचना करते हुए सीता को उन्हें सौंप दें। इस बात पर रावण ने मंदोदरी का मजाक बनाते हुए कहा कि-

नारि सुभाऊ सत्य सब कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं।साहस अनृत चपलता माया। भय अबिबेक असौच अदाया।

इस दोहे में रावण ने मंदोदरी से कहा है कि नारी के स्वभाव के विषय सभी सत्य ही कहते हैं कि अधिकांश स्त्रियों में आठ बुराइयां हमेशा रहती हैं।

रावण ने मंदोदरी को स्त्रियों की जो आठ बुराइयां बताई उसमें पहली है

साहस…
रावण के अनुसार स्त्रियों में अधिक साहस होता है, जो कि कभी-कभी आवश्यकता से अधिक भी हो जाता है। इसी कारण स्त्रियां कई बार ऐसे काम कर देती हैं, जिससे बाद में उन्हें और उनके परिवार के सदस्यों को पछताना पड़ता है। रावणमंदोदरी से कहता है कि स्त्रियां यह समझ नहीं पाती हैं कि साहस का कब और कैसे सही उपयोग किया जाना चाहिए। जब साहस हद से अधिक होता है तो वह दु:साहस बन जाता है और यह हमेशा ही नुकसानदायक है।

दूसरी बुराई है माया यानी छल करना

रावण के अनुसार स्त्रियां अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए कई प्रकार की माया रचती हैं। किसी अन्य व्यक्ति से अपने काम निकलवाने के लिए तरह-तरह केप्रलोभन देती हैं, रूठती हैं, मनाती हैं। यह सब माया है। यदि कोई पुरुष इस माया में फंस जाता है तो वह स्त्री के वश में हो जाता है। रावण मंदोदरी सेकहता है कि तूने माया रचकर मेरे शत्रु राम का भय सुनाया है, ताकि मैं तेरी बातों में आ जाऊं।

तीसरी बुराई है चंचलता-

स्त्रियों का मन पुरुषों की तुलना में अधिक चंचल होता है। इसी वजह से वे किसी एक बात पर लंबे समय तक अडिग नहीं रह पाती हैं। पल-पल में स्त्रियों के विचार बदलते हैं और इसी वजह से वे अधिकांश परिस्थितियों में सही निर्णयनहीं ले पाती हैं।

चौथी बुराई है झूठ बोलना-

रावण के अनुसार स्त्रियां बात-बात पर झूठ बोलती हैं। इस आदत के कारण अक्सरइन्हें परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है। कभी भी झूठ अधिक समय तक छिपनहीं सकता है, सच एक दिन सामने आ ही जाता है।

श्रीरामचरित मानस के अनुसार रावण ने मंदोदरी को स्त्रियों के संबंध में कुछ बातें बताई थीं, जानिए वह बातें कौन-कौन थीं…

क्या है प्रसंगश्रीरामचरित मानस के अनुसार जब श्रीराम वानर सेना सहित लंका पर आक्रमण के लिए समुद्र पार कर लंका पहुंच गए थे, तब रानी मंदोदरी को कई अपशकुन होते दिखाई दिए। इन अपशकुनों से मंदोदरी डर गई और वह रावण को समझाने लगी कि युद्ध ना करें और श्रीराम से क्षमा याचना करते हुए सीता को उन्हें सौंप दें। इस बात पर रावण ने मंदोदरी का मजाक बनाते हुए कहा कि-

नारि सुभाऊ सत्य सब कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं।साहस अनृत चपलता माया। भय अबिबेक असौच अदाया।

इस दोहे में रावण ने मंदोदरी से कहा है कि नारी के स्वभाव के विषय सभी सत्य ही कहते हैं कि अधिकांश स्त्रियों में आठ बुराइयां हमेशा रहती हैं।

रावण ने मंदोदरी को स्त्रियों की जो आठ बुराइयां बताई उसमें पहली है

साहस…
रावण के अनुसार स्त्रियों में अधिक साहस होता है, जो कि कभी-कभी आवश्यकता से अधिक भी हो जाता है। इसी कारण स्त्रियां कई बार ऐसे काम कर देती हैं, जिससे बाद में उन्हें और उनके परिवार के सदस्यों को पछताना पड़ता है। रावणमंदोदरी से कहता है कि स्त्रियां यह समझ नहीं पाती हैं कि साहस का कब और कैसे सही उपयोग किया जाना चाहिए। जब साहस हद से अधिक होता है तो वह दु:साहस बन जाता है और यह हमेशा ही नुकसानदायक है।

दूसरी बुराई है माया यानी छल करना

रावण के अनुसार स्त्रियां अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए कई प्रकार की माया रचती हैं। किसी अन्य व्यक्ति से अपने काम निकलवाने के लिए तरह-तरह केप्रलोभन देती हैं, रूठती हैं, मनाती हैं। यह सब माया है। यदि कोई पुरुष इस माया में फंस जाता है तो वह स्त्री के वश में हो जाता है। रावण मंदोदरी सेकहता है कि तूने माया रचकर मेरे शत्रु राम का भय सुनाया है, ताकि मैं तेरी बातों में आ जाऊं।

तीसरी बुराई है चंचलता-

स्त्रियों का मन पुरुषों की तुलना में अधिक चंचल होता है। इसी वजह से वे किसी एक बात पर लंबे समय तक अडिग नहीं रह पाती हैं। पल-पल में स्त्रियों के विचार बदलते हैं और इसी वजह से वे अधिकांश परिस्थितियों में सही निर्णयनहीं ले पाती हैं।

चौथी बुराई है झूठ बोलना-

रावण के अनुसार स्त्रियां बात-बात पर झूठ बोलती हैं। इस आदत के कारण अक्सरइन्हें परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है। कभी भी झूठ अधिक समय तक छिपनहीं सकता है, सच एक दिन सामने आ ही जाता है।

Posted in संस्कृत साहित्य

संघ है क्या…??


संघ है क्या…??

“राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विशुद्ध रूप से एक राष्ट्रवादी संघटन है”, जिसके सिद्धान्त हिंदुत्व में निहित और आधारित हैं।

संघ की शुरुआत सन् 1925 में विजयदशमी के दिन परमपूज्य डा०केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा की गयी थी और आपको यह जानकर काफी ख़ुशी होगी कि बीबीसी के अनुसार संघ विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संस्थान है।

भारत में संघ की लगभग पचास हजार से
भी ज्यादा शाखा लगती हैं और संघ में लगभग 25 करोड़ स्वयंसेवी हैं । वस्तुत: शाखा ही तो संघ की बुनियाद है जिसके ऊपर आज यह इतना विशाल संगठन खड़ा हुआ है।

शाखा की सामान्य गतिविधियों में खेल, योग वंदना और भारत एवं विश्व के सांस्कृतिक पहलुओं पर बौद्धिक चर्चा परिचर्चा शामिल है। जो भी सदस्य शाखा में स्वयं की इच्छा से आते हैं , वे “स्वयंसेवक” कहलाते हैं …!

शाखा में बौद्धिक और शारीरिक रूप से स्वयंसेवकों को संघ की जानकारी तो दी ही जाती हैं साथ-साथ समाज, राष्ट्र और धर्म की शिक्षा भी दी जाती है.

सिर्फ इतना ही नहीं हिंदू धर्म में सामाजिक समानता के लिए संघ ने दलितों और पिछड़े वर्गों को मंदिर में पुजारी पद के लिए प्रशिक्षण का समर्थन किया है |

यहाँ तक कि … महात्मा गाँधी के 1934 RSS के एक कैम्प की यात्रा के दोरान उन्होंने वहां पर पूर्ण अनुशासन पाया और छुआछूत की अनुपस्थिति पायी |

राहत और पुर्नवास संघ की पुरानी परंपरा रही है… उदाहरण के तौर पर संघ ने 1971 के उडीसा चक्रवात और 1977 के आंध्र प्रदेश चक्रवात में राहत कार्यों में महती भूमिका निभाई है |

इतना ही नहीं … संघ से जुडी “सेवा भारती” ने जम्मू कश्मीर से आतंकवाद से परेशान 57 अनाथ बच्चों को गोद लिया हे जिनमे 38 मुस्लिम (जबकि मुस्लिम संघ को गाली देते हैं फिर भी और 19 हिंदू हैं |

संघ की उपस्थिति भारतीय समाज के हर क्षेत्र में महसूस की जा सकती है जिसकी शुरुआत सन 1925 से होती है। उदाहरण के तौर पर सन 1962 के भारत-चीन युद्ध में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू संघ की भूमिका से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने संघ को सन 1963 के गणतंत्र दिवस की परेड में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया। और आप यह जान कर ख़ुशी से झूम उठेंगे कि.. सिर्फ़ दो दिनों की पूर्व सूचना पर तीन हजार से भी ज्यादा स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में वहाँ उपस्थित हो गये।

वर्तमान समय में संघ के दर्शन का पालन करने वाले कतिपय लोग देश के सर्वोच्च पदों तक पहुँचने मे भीं सफल रहे हैं। ऐसे प्रमुख व्यक्तियों में उपराष्ट्रपति पद पर भैरोंसिंह शेखावत, प्रधानमंत्री पद पर अटल बिहारी वाजपेयी एवं उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री के पद पर लालकृष्ण आडवाणी , नरेन्द्र भाई मोदी जैसे दिग्गज लोग शामिल हैं। इतना ही नहीं… जिस दिन सारे स्वयंसेवक सिर्फ एक लाइन बना कर ही सीमा पर खड़े हो गए उस दिन चीन से ले कर बांग्लादेश तक गणवेशधारी स्वयंसेवक ही स्वयंसेवक नजर आयेंगे !

इसीलिए ये शर्म नहीं बल्कि हमारे लिए काफी गर्व की बात होती है ……. जब हमें संघ का स्वयंसेवक कहा जाता है ….!
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐक वटवृक्ष है जिसके कई तने और कई शाखाये है।
संघ दुनिया के लगभग 80 से अधिक देशो में कार्यरत है।”संघ के लगभग 50 से ज्यादा संगठन राष्ट्रीय ओर अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है ओर लगभग 200 से अधिक संघठन क्षेत्रीय प्रभाव रखते हैं।
जिसमे कुछ प्रमुख संगठन है जो संघ की विचारधारा को आधार मानकर राष्ट्र और सामाज के बीच सक्रीय है।जिनमे कुछ राष्ट्रवादी,सामाजिक, राजनेतिक, युवा वर्गे के बीच में कार्य करने वाले,शिक्षा के क्षेत्र में,सेवा के क्षेत्र में,सुरक्षा के क्षेत्र में,धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में, संतो के बीच में, विदेशो में,अन्य कई क्षेत्रो में संघ परिवार के संघठन सक्रीय रहते है,जिनमे प्रमुख है:-
🐅विश्व हिन्दू परिषद्
🐅 बजरंगदल
🐅अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्
🐅सेवा भारती
🐅भारतीय किसान संघ
🐅भारतीय जनता पार्टी
🐅भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा
🐅भारतीय जनता पार्टी महिला मोर्चा👩
🐅भारतीय मजदूर संघ
🐅भारतीय शिक्षक संघ
🐅विद्या भारती-सरस्वती शिशु मंदिर
🐅भारतीय स्वाभिमान मंच
🐅स्वदेशी जागरण मंच
🐅धर्म जागरण विभाग
🐅युवा क्रांति मंच
🐅नव निर्माण मंच
🐅श्रीराम सेना
🐅भारत जागो!-विश्व जगाओ
🐅धर्म रक्षा मंच
🐅संस्कृति रक्षा मंच
🐅हिन्दू स्वयंसेवक संघ
🐅प्रवासी भारतीय संघ
🐅नर्मदा बचाओ जागरण मंच
🐅धर्मांतरण विरुद्ध विभाग
🐅वनवासी कल्याण परिषद्
🐅एकल विद्यालय योजना
🐅दुर्गा वाहिनी👩
🐅मातृशक्ति👩
🐅राष्ट्र सेविका👩
🐅ग्राम भारती
🐅🐅🐅🐅🐅🐅🐅🐅🐅🐅🐅

आओ नमन करे इस मातृभूमि को
और दुनिया के सबसे बड़े संघठन से जुड़े।।

🚩हिंदुत्व का आधार।👊
👇👇👇
“संघ शक्ति”🐅🐅
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(और)
🚩 “संघ परिवार”!!🚩

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मृत्यु


अर्जुन श्री कृष्णजी से बोले :-
केशव ,जब मृत्यु सभी की होनी है तो हम सत्संग भजन सेवा सिमरन क्यों करे जो इंसान मौज मस्ती करता है मृत्यु तो उसकी भी होगी ।
श्री कृष्णजी ने अर्जुन से कहा :- हे पार्थ
बिल्ली जब चूहे को पकड़ती है तो दांतो से पकड़कर उसे मार कर खा जाती है । लेकिन उन्ही दांतो से जब अपने बच्चे को पकड़ती है तो उसे मारती नहीं बहुत ही नाजुक तरीके से एक जगह से दूसरी जगह पंहुचा देती है । दांत भी वही है मुह भी वही है पर परिणाम अलग अलग । ठीक उसी प्रकार मृत्यु भी सभी की होगी पर एक प्रभु के धाम में और दूसरा 84 के चक्कर में

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हम गुलाम क्यों और कैसे बने


हम गुलाम क्यों और कैसे बने
बाबर और राणा सांगा में भयानक युद्ध चल रहा था। उन दिनों युद्ध केवल दिन में लड़ा जाता था, शाम के समय दोनों तरफ के सैनिक अपने अपने शिविर में आराम करते थे ! फिर सुबह युद्ध होता था ! लड़ते लड़ते शाम हो चली थी, दोनों तरफ के सैनिक अपने अपने शिविर में भोजन कर रहे थे !
बाबर टहलते हुऐ अपने शिविर के बाहर खड़ा दुश्मन सेना के कैम्प को देख रहा था तभी उसे राणा सांगा की सेना के शिविर से कई जगह से धुंआ उठता दिखाई दिया। बाबर को लगा कि दुश्मन के शिविर में आग लग गई है, उसने तुरंत अपने सेनापति मीर बांकी को बुलाया और पूछा कि देखो दुश्मन के शिविर में आग लग गई है ! शिवीर में पचासों जगहों से धुंआ निकल रहा हैं ।
सेनापति ने अपने गुप्तचरों को आदेश दिया, जाओ पता लगाओं कि दुश्मन के सैन्य शिविर से इतनी बड़ी संख्या में इतनी जगहों से धूंओ का गुब्बार क्यों निकल रहा है ?
गुप्तचर कुछ देर बाद लौटे उन्होंने बताया कि हुजूुर दुश्मन सैनिक हैं वे एक साथ एक जगह बैठकर खाना नहीं खाते । सेना में कई जातियों के सैनिक है जो एक दूसरे का छुआ तक नहीं खाते | इस लिए वे सब अपना अपना भोजन अलग अलग बनाते हैं और अलग अलग ही खाते हैं । एक दुसरे का छुवा पानी तक भी नहीं पीते।
यह सुन कर बाबर खूब जोर से ठहाका लगा कर हंसा | काफी देर हंसने के बाद उसने अपने सेनापति से कहा कि मीर बांकी फ़तेह हमारी ही होगी ! वे हमसे क्या लड़ेंगे जिनकी सेना एक साथ मिल बैठ कर खाना तक नहीं खा सकती; वे एक साथ मिल कर दुश्मन के खिलाफ कैसे लड़ेगी ?
बाबर सही था । केवल तीन ही दिनों में राणा सांगा की सेना मार दी गई और बाबर ने मुग़ल शासन की नीव भारत में गाड़ दी। लेकिन हम आज भी वेसे के वैसे ही हैं जैसे पहले थे। इसी घटिया और नीच सोच तथा व्यवस्था ने देश और धर्म का सत्यानाश कर डाला।