Posted in काश्मीर - Kashmir

सुबह मेरे पास एक महानुभाव आये और बोले … नमस्ते भाई ..कुछ योगदान कर दो .। मैंने पूछा क्या योगदान ???


सुबह मेरे पास एक महानुभाव आये और बोले …
नमस्ते भाई ..कुछ योगदान कर दो .।
मैंने पूछा क्या योगदान ???

मित्र : कश्मीर में जो बाढ़ आई है ..उसके लिए
कुछ …जो आपकी श्रधा हो

मै : महानुभाव सबसे पहले तो आप हमारे
दो काम करवा दो —

१. धारा ३७० हटवा दो ,और
दूसरा कश्मीरियों के द्वारा एक शपथ पत्र
दिलवा दो कि आगे से हमारी भारतीय
सेना पर पत्थर बाजी न करें .
महानुभाव गुमसुम…बिन जबाब दिए चुपचाप चले
गए ..
मित्रो क्या मेरी मांग जायज नही थी ?????
आप ही बताएं ?????
जय हिन्द जय भारत वन्देमातरम

Posted in हिन्दू पतन

टीपू सुलतान की तलवार


श्रीरंगपट्टनम हारने के बाद (4 मई 1799) ज़ब्त
की गई टीपू सुलतान की तलवार की मूठ पर
लिखा है – “मेरी तलवार काफिरों के लिए
चमकती है, ऐ खुदा!! उसे विजयी बना,
जो पैगम्बर पर भरोसा करता है, जो मोहम्मद पर
विश्वास नहीं करते उनका नाश करना और
जो इस तरफ झुकाव रखते हैं, उन्हें बचाना…”.
पुर्तगाली इतिहासकार फ़्रां ‪#‎बार्तोलोमेको‬ ने
Voyage of East Indies के पृष्ठ १४१-१४२
पर लिखा है कि, “टीपू द्वारा कालीकट क्षेत्र के
अधिकाँश हिन्दू पुरुषों-स्त्रियों को फाँसी पर
लटका दिया गया था, उसने सभी मंदिरों एवं
चर्चों को नष्ट करवा दिया था, स्वयं मैंने कई
पीड़ितों को वलाप्पुज़ा नदी पार करने में मदद
की…”.
इस जैसे कई उदाहरण बाकायदा लिखित में,
“सुलतान-ए-तवारीख” तथा “तारीख-ए-खुदादा
दी” में मिल जाएँगे, जो इण्डिया ऑफिस
लायब्रेरी, लन्दन में रखी हुई हैं. एक पत्र है
(मार्च 22, 1788) जो अब्दुल खादर
को लिखा गया है – “12,000 से अधिक हिंदुओं ने
इस्लाम स्वीकार कर लिया है, कुछ और
स्थानीय हिन्दू बचे हैं उन्हें भी इस्लाम के झण्डे
तले लाया जाएगा. एक
भी नम्बूदिरी को नहीं छोड़ा जाएगा…”.
==================
जिसे “रोमिला” छाप अथवा “बिपन चंद्रा” छाप
इतिहास, को समझना-मानना हो, वह स्वतन्त्र
है. हमारा प्रयास तो भारत
की जनता को गहरी नींद से झकझोरकर “जगाने”
का है…

श्रीरंगपट्टनम हारने के बाद (4 मई 1799) ज़ब्त
की गई टीपू सुलतान की तलवार की मूठ पर
लिखा है - "मेरी तलवार काफिरों के लिए
चमकती है, ऐ खुदा!! उसे विजयी बना,
जो पैगम्बर पर भरोसा करता है, जो मोहम्मद पर
विश्वास नहीं करते उनका नाश करना और
जो इस तरफ झुकाव रखते हैं, उन्हें बचाना...".
पुर्तगाली इतिहासकार फ़्रां #बार्तोलोमेको ने
Voyage of East Indies के पृष्ठ १४१-१४२
पर लिखा है कि, "टीपू द्वारा कालीकट क्षेत्र के
अधिकाँश हिन्दू पुरुषों-स्त्रियों को फाँसी पर
लटका दिया गया था, उसने सभी मंदिरों एवं
चर्चों को नष्ट करवा दिया था, स्वयं मैंने कई
पीड़ितों को वलाप्पुज़ा नदी पार करने में मदद
की...".
इस जैसे कई उदाहरण बाकायदा लिखित में,
"सुलतान-ए-तवारीख" तथा "तारीख-ए-खुदादा
दी" में मिल जाएँगे, जो इण्डिया ऑफिस
लायब्रेरी, लन्दन में रखी हुई हैं. एक पत्र है
(मार्च 22, 1788) जो अब्दुल खादर
को लिखा गया है - "12,000 से अधिक हिंदुओं ने
इस्लाम स्वीकार कर लिया है, कुछ और
स्थानीय हिन्दू बचे हैं उन्हें भी इस्लाम के झण्डे
तले लाया जाएगा. एक
भी नम्बूदिरी को नहीं छोड़ा जाएगा...".
==================
जिसे "रोमिला" छाप अथवा "बिपन चंद्रा" छाप
इतिहास, को समझना-मानना हो, वह स्वतन्त्र
है. हमारा प्रयास तो भारत
की जनता को गहरी नींद से झकझोरकर "जगाने"
का है...
Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

Thanjavur Palace


Photograph of the pyramidal tower at Thanjavur Palace in thanjavur, from the ‘Photographs to Illustrate the Ancient Architecture of Southern India’ collection, taken by Edmund David Lyon c. 1868. Thanjavur was established and ruled by the Cholas ; then ruled by Nayaka’s and then by the Marathas . The Palace at Thanjavur was built by the Nayakas in the early 15th century and was later enlarged by the Marathas. As a result, it employs a mix of Nayaka and Maratha architectural styles where the main structures are arranged around a series of courtyards with cylindrical columns and square capitals. This photograph is a view from the main courtyard looking towards the pyramidal tower located at the south end, which rises above the main residential block of the palace. The shape of the pyramidal tower is an anomaly in Nayaka palace architecture, but the elaborate stucco-work resembles the decorative technique used at Madurai.

Photograph of the pyramidal tower at Thanjavur Palace in thanjavur, from the 'Photographs to Illustrate the Ancient Architecture of Southern India' collection, taken by Edmund David Lyon c. 1868. Thanjavur was established and ruled by the Cholas ; then ruled by Nayaka's  and then  by the Marathas . The Palace at Thanjavur was built by the Nayakas in the early 15th century and was later enlarged by the Marathas. As a result, it employs a mix of Nayaka and Maratha architectural styles where the main structures are arranged around a series of courtyards with cylindrical columns and square capitals. This photograph is a view from the main courtyard looking towards the pyramidal tower located at the south end, which rises above the main residential block of the palace. The shape of the pyramidal tower is an anomaly in Nayaka palace architecture, but the elaborate stucco-work resembles the decorative technique used at Madurai.
Posted in काश्मीर - Kashmir

जिन मुल्लो ने अभी एक-डेढ़ महीने पहले सहारनपुर में १०-१५००० की संख्या में इकठ्ठा होकर गुरूद्वारे पर हमला किया।


जिन मुल्लो ने अभी एक-डेढ़ महीने पहले सहारनपुर में १०-१५००० की संख्या में इकठ्ठा होकर गुरूद्वारे पर हमला किया। ………… सिक्खो को मारा। ………। उनकी १५० के लगभग दुकाने लूटी वो भी रमजान के महीने। …………. काफिरो पर अत्याचार करके धार्मिक शबाब लूटा। ………… और काफिरो के धन और सामान लूट कर ईद का जश्न मनाया। ……………… वही सिख अपने सबसे पवित्र स्थान अमृतसर के गुरूद्वारे से १ लाख मोमिनो के लिए रोज खाना-पानी बना कर पैक करके उनकी खिदमत में बिछे जा रहे है। …………. चाहे कितना भी गधे को नहला लो। ……… आखिर वो धूल में ही लौट लगाएगा।

क्षमा वीरस्य भूषणम्। ………………।
क्षमा वीर पुरुषो का आभूषण है। ……… . .
मुहम्मद गौरी ने को पृथ्वीराज चौहान ने १७ बार युद्ध में हराया था लेकिन हर बार उसको अभय दान देदिया था। ……। लेकिन जब पृथ्वीराज चौहान युद्ध हर गए तो उनको एक बार भी अभयदान नहीं दिया। …………।
ठीक अभी एक ऐसा ही घटनाक्रम दोहराया जा रहा है। ……… हम वो लोग है जिन्होंने कभी अपने इतिहास से सबक नहीं लिया। ………….
जिन मुल्लो ने अभी एक-डेढ़ महीने पहले सहारनपुर में १०-१५००० की संख्या में इकठ्ठा होकर गुरूद्वारे पर हमला किया। ………… सिक्खो को मारा। ………। उनकी १५० के लगभग दुकाने लूटी वो भी रमजान के महीने। …………. काफिरो पर अत्याचार करके धार्मिक शबाब लूटा। ………… और काफिरो के धन और सामान लूट कर ईद का जश्न मनाया। ……………… वही सिख अपने सबसे पवित्र स्थान अमृतसर के गुरूद्वारे से १ लाख मोमिनो के लिए रोज खाना-पानी बना कर पैक करके उनकी खिदमत में बिछे जा रहे है। …………. चाहे कितना भी गधे को नहला लो। ……… आखिर वो धूल में ही लौट लगाएगा। ………… दया ही दुःख का कारण बनने वाली है। ………। खिदमत का बदला खंजर से ही मिलेगा। ………. अभयदान की परम्परा का निर्वाह करते रहो। ………. मिटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा तुम लोगो के पास। …………… मुझे लगता है की लिखने वाले ने गलत लिखा है सूत्र। ………………. भारतीय हिन्दू लोगो के लिए सूत्र होना चाहिए। …………………” क्षमा कायरस्य भूषणम् ” ………………………. अलख निरंजन।

Posted in काश्मीर - Kashmir

NDTV का रिपोर्टर बाढ़ में फँसे कश्मीरी मुसलमानों का इंटरव्यू ले रहे हैं ….


NDTV का रिपोर्टर बाढ़ में फँसे कश्मीरी मुसलमानों का इंटरव्यू ले रहे हैं ……… और मेरा दिल कर रहा है कि उन कश्मीरियों की बातों का जवाब दूं ….
एक कश्मीरी 1 – सब तबाह हो गया … हमारा घर बह गया ….

मेरा मन — तुम्हारा घर ??? कौन सा घर ??? ये तो कश्मीरी पंडितों के घर थे ….. तुमने तो उन्हें मार के उनकी जगह छीन ली …… कुत्तों … तबाह तो वो पंडित हुए थे जिनकी जन्नत तुमने उनसे छीन ली …..

कश्मीरी 2- कल मेरी शादी थी …. मेरा शादी का सारा सामान बह गया ?

मेरा मन – साले … शादी थी … आज नहीं कल हो ही जाएगी ……… पर उन कश्मीरी हिन्दू लड़कियों की शादी शायद कभी नहीं हुई होगी जिनकी तुमने आबरू लूट ली . .. या हो भी गयी होगी तो वो बलात्कार का दंश हर पल महसूस करती होंगी ……..
और शादी के अपने सामान की इतनी चिंता ???? अरे तुम लोगों ने उन पंडितों के बसे बसाये घर मकानों पर कब्जा कर लिया … उनके खेत .. पशुओं पर दांत गढ़ा दिए … उनके गहने कपड़े हड़प लिए …… शर्म नहीं आयी तुम भिखारियों को ……. जिन हिन्दुओं और हिंदुस्तान को गाली देते हो …. उन्हीं के फेंके और छीने टुकड़ों पर जीते हो ……

कश्मीरी 3- यहाँ हमें अभी तक कोई मदद वदद नहीं मिली …… हम भूखे हैं …… कहाँ है वो इनका लंगर वंगर ….

मेरा मन चीख उठा — सूअर की औलाद ….. लंगर वंगर याद आ रहा है तुझे ….. खबीस की औलाद …… उसी लंगर को जलाया था न अमरनाथ यात्रा के दौरान …… हवन कुंड में मूत्र विसर्जन किया था न …….. अब जा उसी मूत को पी ….. चल भग …. DK बोस

Posted in रामायण - Ramayan

हनुमान् के कई अर्थ हैं


Arun Upadhyay हनुमान् के कई अर्थ हैं-(१) पराशर संहिता के अनुसार उनके मनुष्य रूप में ९ अवतार हुये थे।
(२) आध्यात्मिक अर्थ तैत्तिरीय उपनिषद् में दिया है-दोनों हनु के बीच का भाग ज्ञान और कर्म की ५-५ इन्द्रियों का मिलन विन्दु है। जो इन १० इन्द्रियों का उभयात्मक मन द्वार
ा समन्वय करता है, वह हनुमान् है।
(३) ब्रह्म रूप में गायत्री मन्त्र के ३ पादों के अनुसार ३ रूप हैं-स्रष्टा रूप में यथापूर्वं अकल्पयत् = पहले जैसी सृष्टि करने वाला वृषाकपि है। मूल तत्त्व के समुद्र से से विन्दु रूपों (द्रप्सः -ब्रह्माण्ड, तारा, ग्रह, -सभी विन्दु हैं) में वर्षा करता है वह वृषा है। पहले जैसा करता है अतः कपि है। अतः मनुष्य का अनुकरण कार्ने वाले पशु को भी कपि कहते हैं। तेज का स्रोत विष्णु है, उसका अनुभव शिव है और तेज के स्तर में अन्तर के कारण गति मारुति = हनुमान् है। वर्गीकृत ज्ञान ब्रह्मा है या वेद आधारित है। चेतना विष्णु है, गुरु शिव है। उसकी शिक्षा के कारण जो उन्नति होती है वह मनोजव हनुमान् है।
(४) हनु = ज्ञान-कर्म की सीमा। ब्रह्माण्ड की सीमा पर ४९वां मरुत् है। ब्रह्माण्ड केन्द्र से सीमा तक गति क्षेत्रों का वर्गीकरण मरुतों के रूप में है। अन्तिम मरुत् की सीमा हनुमान् है। इसी प्रकार सूर्य (विष्णु) के रथ या चक्र की सीमा हनुमान् है। ब्रह्माण्ड विष्णु के परम-पद के रूप में महाविष्णु है। दोनों हनुमान् द्वारा सीमा बद्ध हैं, अतः मनुष्य (कपि) रूप में भी हनुमान् के हृदय में प्रभु राम का वास है।
(५) २ प्रकार की सीमाओं को हरि कहते हैं-पिण्ड या मूर्त्ति की सीमा ऋक् है,उसकी महिमा साम है-ऋक्-सामे वै हरी (शतपथ ब्राह्मण ४/४/३/६)। पृथ्वी सतह पर हमारी सीमा क्षितिज है। उसमें २ प्रकार के हरि हैं-वास्तविक भूखण्ड जहां तक दृष्टि जाती है, ऋक् है। वह रेखा जहां राशिचक्र से मिलती है वह साम हरि है। इन दोनों का योजन शतपथ ब्राह्मण के काण्ड ४ अध्याय ४ के तीसरे ब्राह्मण में बता या है अतः इसको हारियोजन ग्रह कहते हैं। हारियोजन से होराइजन हुआ है।
(६) हारियोजन या पूर्व क्षितिज रेखा पर जब सूर्य आता है, उसे बाल सूर्य कहते हैं। मध्याह्न का युवक और सायं का वृद्ध है। इसी प्रकार गायत्री के रूप हैं। जब सूर्य का उदय दीखता है, उस समय वास्तव में उसका कुछ भाग क्षितिज रेखा के नीचे रहता है और वायुमण्डल में प्रकाश के वलन के कारण दीखने लगता है। सूर्य सिद्धान्त में सूर्य का व्यास ६५०० योजन कहा है, यह भ-योजन = २७ भू-योजन = प्रायः २१४ किमी. है। इसे सूर्य व्यास १३,९२,००० किमी. से तुलना कर देख सकते हैं। वलन के कारण जब पूरा सूर्य बिम्ब उदित दीखता है तो इसका २००० योजन भाग (प्रायः ४,२८,००० किमी.) हारियोजन द्वारा ग्रस्त रहता है। इसी को कहा है-बाल समय रवि भक्षि लियो …)। इसके कारण ३ लोकों पृथ्वी का क्षितिज, सौरमण्डल की सीमा तथा ब्रह्माण्ड की सीमा पर अन्धकार रहता है। यहां युग सहस्र का अर्थ युग्म-सहस्र = २००० योजन है जिसकी इकाई २१४ कि.मी. है।

Posted in ज्योतिष - Astrology

ब्रह्म मुहूर्त का ही विशेष महत्व क्यों?


●आइये जानते हैं कि ब्रह्म मुहूर्त क्या है।● 
        ■इसके वैज्ञानिक लाभ क्या हैं।■

ब्रह्म मुहूर्त का ही विशेष महत्व क्यों?

रात्रि के अंतिम प्रहर को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने इस मुहूर्त का विशेष महत्व बताया है। उनके अनुसार यह समय निद्रा त्याग के लिए सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घण्टे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये। इस समय सोना शास्त्र निषिद्ध है।

“ब्रह्ममुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी”।
(ब्रह्ममुहूर्त की पुण्य का नाश करने वाली होती है।)

ब्रह्म मुहूर्त का विशेष महत्व बताने के पीछे हमारे विद्वानों की वैज्ञानिक सोच निहित थी। वैज्ञानिक शोधों से ज्ञात हुआ है कि ब्रह्म मुहुर्त में वायु मंडल प्रदूषण रहित होता है। इसी समय वायु मंडल में ऑक्सीजन (प्राण वायु) की मात्रा सबसे अधिक (41 प्रतिशत) होती है, जो फेफड़ों की शुद्धि के लिए महत्वपूर्ण होती है। शुद्ध वायु मिलने से मन, मस्तिष्क भी स्वस्थ रहता है।

आयुर्वेद के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है। यही कारण है कि इस समय बहने वाली वायु को अमृततुल्य कहा गया है। इसके अलावा यह समय अध्ययन के लिए भी सर्वोत्तम बताया गया है क्योंकि रात को आराम करने के बाद सुबह जब हम उठते हैं तो शरीर तथा मस्तिष्क में भी स्फूर्ति व ताजगी बनी रहती है। प्रमुख मंदिरों के पट भी ब्रह्म मुहूर्त में खोल दिए जाते हैं तथा भगवान का श्रृंगार व पूजन भी ब्रह्म मुहूर्त में किए जाने का विधान है।

ब्रह्ममुहूर्त के धार्मिक, पौराणिक व व्यावहारिक पहलुओं और लाभ को जानकर हर रोज इस शुभ घड़ी में जागना शुरू करें तो बेहतर नतीजे मिलेंगे।

आइये जाने ब्रह्ममुहूर्त का सही वक्त व खास फायदे –

धार्मिक महत्व - व्यावहारिक रूप से यह समय सुबह सूर्योदय से पहले चार या पांच बजे के बीच माना जाता है। किंतु शास्त्रों में साफ बताया गया है कि रात के आखिरी प्रहर का तीसरा हिस्सा या चार घड़ी तड़के ही ब्रह्ममुहूर्त होता है। मान्यता है कि इस वक्त जागकर इष्ट या भगवान की पूजा, ध्यान और पवित्र कर्म करना बहुत शुभ होता है। क्योंकि इस समय ज्ञान, विवेक, शांति, ताजगी, निरोग और सुंदर शरीर, सुख और ऊर्जा के रूप में ईश्वर कृपा बरसाते हैं। भगवान के स्मरण के बाद दही, घी, आईना, सफेद सरसों, बैल, फूलमाला के दर्शन भी इस काल में बहुत पुण्य देते हैं।

पौराणिक महत्व - वाल्मीकि रामायण के मुताबिक माता सीता को ढूंढते हुए श्रीहनुमान ब्रह्ममुहूर्त में ही अशोक वाटिका पहुंचे। जहां उन्होंने वेद व यज्ञ के ज्ञाताओं के मंत्र उच्चारण की आवाज सुनी।

व्यावहारिक महत्व - व्यावहारिक रूप से अच्छी सेहत, ताजगी और ऊर्जा पाने के लिए ब्रह्ममुहूर्त बेहतर समय है। क्योंकि रात की नींद के बाद पिछले दिन की शारीरिक और मानसिक थकान उतर जाने पर दिमाग शांत और स्थिर रहता है। वातावरण और हवा भी स्वच्छ होती है। ऐसे में देव उपासना, ध्यान, योग, पूजा तन, मन और बुद्धि को पुष्ट करते हैं।

इस तरह शौक-मौज या आलस्य के कारण देर तक सोने के बजाय इस खास वक्त का फायदा उठाकर बेहतर सेहत, सुख, शांति और नतीजों को पा सकते हैं।

●आइये जानते हैं कि ब्रह्म मुहूर्त क्या है।●
■इसके वैज्ञानिक लाभ क्या हैं।■

ब्रह्म मुहूर्त का ही विशेष महत्व क्यों?

रात्रि के अंतिम प्रहर को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने इस मुहूर्त का विशेष महत्व बताया है। उनके अनुसार यह समय निद्रा त्याग के लिए सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घण्टे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये। इस समय सोना शास्त्र निषिद्ध है।

“ब्रह्ममुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी”।
(ब्रह्ममुहूर्त की पुण्य का नाश करने वाली होती है।)

ब्रह्म मुहूर्त का विशेष महत्व बताने के पीछे हमारे विद्वानों की वैज्ञानिक सोच निहित थी। वैज्ञानिक शोधों से ज्ञात हुआ है कि ब्रह्म मुहुर्त में वायु मंडल प्रदूषण रहित होता है। इसी समय वायु मंडल में ऑक्सीजन (प्राण वायु) की मात्रा सबसे अधिक (41 प्रतिशत) होती है, जो फेफड़ों की शुद्धि के लिए महत्वपूर्ण होती है। शुद्ध वायु मिलने से मन, मस्तिष्क भी स्वस्थ रहता है।

आयुर्वेद के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है। यही कारण है कि इस समय बहने वाली वायु को अमृततुल्य कहा गया है। इसके अलावा यह समय अध्ययन के लिए भी सर्वोत्तम बताया गया है क्योंकि रात को आराम करने के बाद सुबह जब हम उठते हैं तो शरीर तथा मस्तिष्क में भी स्फूर्ति व ताजगी बनी रहती है। प्रमुख मंदिरों के पट भी ब्रह्म मुहूर्त में खोल दिए जाते हैं तथा भगवान का श्रृंगार व पूजन भी ब्रह्म मुहूर्त में किए जाने का विधान है।

ब्रह्ममुहूर्त के धार्मिक, पौराणिक व व्यावहारिक पहलुओं और लाभ को जानकर हर रोज इस शुभ घड़ी में जागना शुरू करें तो बेहतर नतीजे मिलेंगे।

आइये जाने ब्रह्ममुहूर्त का सही वक्त व खास फायदे –

धार्मिक महत्व – व्यावहारिक रूप से यह समय सुबह सूर्योदय से पहले चार या पांच बजे के बीच माना जाता है। किंतु शास्त्रों में साफ बताया गया है कि रात के आखिरी प्रहर का तीसरा हिस्सा या चार घड़ी तड़के ही ब्रह्ममुहूर्त होता है। मान्यता है कि इस वक्त जागकर इष्ट या भगवान की पूजा, ध्यान और पवित्र कर्म करना बहुत शुभ होता है। क्योंकि इस समय ज्ञान, विवेक, शांति, ताजगी, निरोग और सुंदर शरीर, सुख और ऊर्जा के रूप में ईश्वर कृपा बरसाते हैं। भगवान के स्मरण के बाद दही, घी, आईना, सफेद सरसों, बैल, फूलमाला के दर्शन भी इस काल में बहुत पुण्य देते हैं।

पौराणिक महत्व – वाल्मीकि रामायण के मुताबिक माता सीता को ढूंढते हुए श्रीहनुमान ब्रह्ममुहूर्त में ही अशोक वाटिका पहुंचे। जहां उन्होंने वेद व यज्ञ के ज्ञाताओं के मंत्र उच्चारण की आवाज सुनी।

व्यावहारिक महत्व – व्यावहारिक रूप से अच्छी सेहत, ताजगी और ऊर्जा पाने के लिए ब्रह्ममुहूर्त बेहतर समय है। क्योंकि रात की नींद के बाद पिछले दिन की शारीरिक और मानसिक थकान उतर जाने पर दिमाग शांत और स्थिर रहता है। वातावरण और हवा भी स्वच्छ होती है। ऐसे में देव उपासना, ध्यान, योग, पूजा तन, मन और बुद्धि को पुष्ट करते हैं।

इस तरह शौक-मौज या आलस्य के कारण देर तक सोने के बजाय इस खास वक्त का फायदा उठाकर बेहतर सेहत, सुख, शांति और नतीजों को पा सकते हैं।

Posted in ज्योतिष - Astrology

श्राद्ध पक्ष के समय क्यों नहीं किए जाते हैं शुभ कार्य ?


श्राद्ध पक्ष के समय क्यों नहीं किए जाते हैं शुभ कार्य ?

श्राद्ध पितृत्व के प्रति सच्ची श्रद्धा का प्रतीक हैं। सनातन धर्मानुसार प्रत्येक शुभ कार्य के आरंभ करने से पहले में मां-बाप तथा पितृगण को प्रणाम करना हमारा धर्म है। क्योंकि हमारे पुरखों की वंश परंपरा के कारण ही हम आज जीवित रहे हैं। सनातन धर्म के मतानुसार हमारे ऋषिमुनियों ने हिंदू वर्ष में सम्पादित 24 पक्षों में से एक पक्ष को पितृपक्ष अर्थात श्राद्धपक्ष का नाम दिया। पितृपक्ष में हम अपने पितृगण का श्राद्धकर्म, अर्ध्य, तर्पण तथा पिण्डदान के माध्यम से विशेष क्रिया संपन्न करते हैं। धर्मानुसार पितृगण की आत्मा को मुक्ति तथा शांति प्रदान करने हेतु विशिष्ट कर्मकाण्ड को ‘श्राद्ध’ कहते हैं।

श्राद्धपक्ष में शुभकार्य वर्जित क्यों: हमारी संस्कृति में श्राद्ध का संबंध हमारे पूर्वजों की मृत्यु की तिथि से है। अतः श्राद्धपक्ष शुभ तथा नए कार्यों के प्रारंभ हेतु अशुभ काल माना गया है। जिस प्रकार हम अपने किसी परिजन की मृत्यु के बाद शोकाकुल अवधि में रहते हैं तथा शुभ, नियमित, मंगल, व्यावसायिक कार्यों को एक समय अविधि तक के लिए रोक देते हैं। उसी प्रकार पितृपक्ष में भी शुभ कार्यों पर रोक लग जाती है। श्राद्धपक्ष की 16 दिनों की समय अवधि में हम अपने पितृगण से तथा हमारे पितृगण हमसे जुड़े रहते हैं। अत: शुभ-मांगलिक कार्यों को वंचित रखकर हम पितृगण के प्रति पूरा सम्मान व एकाग्रता बनाए रखते हैं।

धर्मशास्त्रों के मतानुसार पितृऋण: शास्त्रों के अनुसार मनुष्य योनी में जन्म लेते ही व्यक्ति पर तीन प्रकार के ऋण समाहित हो जाते हैं। इन तीन प्रकार के ऋणों में से एक ऋण है पितृऋण। अत: धर्मशास्त्रों में पितृपक्ष में श्राद्धकर्म के अर्ध्य, तर्पण तथा पिण्डदान के माध्यम से पितृऋण से मुक्ति पाने का रास्ता बतलाया गया है।

पितृऋण से मुक्ति पाए बिना व्यक्ति का कल्याण होना असंभव है। शास्त्रानुसार पृथ्वी से ऊपर सत्य, तप, महा, जन, स्वर्ग, भुव:, भूमि ये सात लोक माने गए हैं। इन सात लोकों में से भुव: लोक को पितृलोक माना गया है।

श्राद्धपक्ष की सोलह दिन की अवधी में पितृगण पितृलोक से चलकर भूलोक को आ जाते हैं। इन सोलह दिन की समयावधि में पितृलोक पर जल का अभाव ही जाता है, अतः पितृपक्ष में पितृगण पितृलोक से भूलोक आकार अपने वंशजो से तर्पण करवाकर तृप्त होते हैं। अतः जब व्यक्ति पर ऋण अर्थात कर्जा हो तो वो खुशी मनाकर शुभकार्य कैसे सम्पादित कर सकता है। पितृऋण के कारण ही पितृपक्ष में शुभकार्य नहीं किए जाते।

पितृऋण से मुक्ति: शास्त्र कहते हैं की पितृऋण से मुक्ति के लिए श्राद्ध से बढ़कर कोई कर्म नहीं है। श्राद्धकर्म का अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में सर्वाधिक महत्व कहा गया है। इस समय सूर्य पृथ्वी के नजदीक रहते हैं, जिससे पृथ्वी पर पितृगण का प्रभाव अधिक पड़ता है इसलिए इस पक्ष में कर्म को महत्वपूर्ण माना गया है। शास्त्रों के अनुसार एक श्लोक इस प्रकार है।

एवं विधानतः श्राद्धं कुर्यात्‌ स्वविभावोचितम्‌। आब्रह्मस्तम्बपर्यंतं जगत्‌ प्रीणाति मानवः॥

अर्थात् – जो व्यक्ति विधिपूर्वक श्राद्ध करता है, वह ब्रह्मा से लेकर घास तक सभी प्राणियों को संतृप्त कर देता है तथा अपने पूर्वजों के ऋण से मुक्ति पाता है। अतः स्वयं पर पितृत्व के कर्जों के मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

श्राद्ध पक्ष के समय क्यों नहीं किए जाते हैं शुभ कार्य ?

श्राद्ध पितृत्व के प्रति सच्ची श्रद्धा का प्रतीक हैं। सनातन धर्मानुसार प्रत्येक शुभ कार्य के आरंभ करने से पहले में मां-बाप तथा पितृगण को प्रणाम करना हमारा धर्म है। क्योंकि हमारे पुरखों की वंश परंपरा के कारण ही हम आज जीवित रहे हैं। सनातन धर्म के मतानुसार हमारे ऋषिमुनियों ने हिंदू वर्ष में सम्पादित 24 पक्षों में से एक पक्ष को पितृपक्ष अर्थात श्राद्धपक्ष का नाम दिया। पितृपक्ष में हम अपने पितृगण का श्राद्धकर्म, अर्ध्य, तर्पण तथा पिण्डदान के माध्यम से विशेष क्रिया संपन्न करते हैं। धर्मानुसार पितृगण की आत्मा को मुक्ति तथा शांति प्रदान करने हेतु विशिष्ट कर्मकाण्ड को 'श्राद्ध' कहते हैं।

श्राद्धपक्ष में शुभकार्य वर्जित क्यों: हमारी संस्कृति में श्राद्ध का संबंध हमारे पूर्वजों की मृत्यु की तिथि से है। अतः श्राद्धपक्ष शुभ तथा नए कार्यों के प्रारंभ हेतु अशुभ काल माना गया है। जिस प्रकार हम अपने किसी परिजन की मृत्यु के बाद शोकाकुल अवधि में रहते हैं तथा शुभ, नियमित, मंगल, व्यावसायिक कार्यों को एक समय अविधि तक के लिए रोक देते हैं। उसी प्रकार पितृपक्ष में भी शुभ कार्यों पर रोक लग जाती है। श्राद्धपक्ष की 16 दिनों की समय अवधि में हम अपने पितृगण से तथा हमारे पितृगण हमसे जुड़े रहते हैं। अत: शुभ-मांगलिक कार्यों को वंचित रखकर हम पितृगण के प्रति पूरा सम्मान व एकाग्रता बनाए रखते हैं।

धर्मशास्त्रों के मतानुसार पितृऋण: शास्त्रों के अनुसार मनुष्य योनी में जन्म लेते ही व्यक्ति पर तीन प्रकार के ऋण समाहित हो जाते हैं। इन तीन प्रकार के ऋणों में से एक ऋण है पितृऋण। अत: धर्मशास्त्रों में पितृपक्ष में श्राद्धकर्म के अर्ध्य, तर्पण तथा पिण्डदान के माध्यम से पितृऋण से मुक्ति पाने का रास्ता बतलाया गया है। 

पितृऋण से मुक्ति पाए बिना व्यक्ति का कल्याण होना असंभव है। शास्त्रानुसार पृथ्वी से ऊपर सत्य, तप, महा, जन, स्वर्ग, भुव:, भूमि ये सात लोक माने गए हैं। इन सात लोकों में से भुव: लोक को पितृलोक माना गया है। 

श्राद्धपक्ष की सोलह दिन की अवधी में पितृगण पितृलोक से चलकर भूलोक को आ जाते हैं। इन सोलह दिन की समयावधि में पितृलोक पर जल का अभाव ही जाता है, अतः पितृपक्ष में पितृगण पितृलोक से भूलोक आकार अपने वंशजो से तर्पण करवाकर तृप्त होते हैं। अतः जब व्यक्ति पर ऋण अर्थात कर्जा हो तो वो खुशी मनाकर शुभकार्य कैसे सम्पादित कर सकता है। पितृऋण के कारण ही पितृपक्ष में शुभकार्य नहीं किए जाते।

पितृऋण से मुक्ति: शास्त्र कहते हैं की पितृऋण से मुक्ति के लिए श्राद्ध से बढ़कर कोई कर्म नहीं है। श्राद्धकर्म का अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में सर्वाधिक महत्व कहा गया है। इस समय सूर्य पृथ्वी के नजदीक रहते हैं, जिससे पृथ्वी पर पितृगण का प्रभाव अधिक पड़ता है इसलिए इस पक्ष में कर्म को महत्वपूर्ण माना गया है। शास्त्रों के अनुसार एक श्लोक इस प्रकार है।

एवं विधानतः श्राद्धं कुर्यात्‌ स्वविभावोचितम्‌। आब्रह्मस्तम्बपर्यंतं जगत्‌ प्रीणाति मानवः॥

अर्थात् - जो व्यक्ति विधिपूर्वक श्राद्ध करता है, वह ब्रह्मा से लेकर घास तक सभी प्राणियों को संतृप्त कर देता है तथा अपने पूर्वजों के ऋण से मुक्ति पाता है। अतः स्वयं पर पितृत्व के कर्जों के मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
Posted in गंगा माँ

जय माँ गंगा


गंगा का भावार्थ : गम्यते प्राप्यते भगवद पदम येन सा गंगा .
अर्थात जो भगवन का प्यार मेरे सर से लेकर पाव तक अविरत बहता है उसको गंगा कहते है .

मुझे हर पल वो संभालता है . मुज पर प्यार करता है . इतना ज्ञान आते ही आदमी पवित्र हो जाता है .
मेरे पास भगवन है , मेरे साथ भगवन है वो दूसरा नहीं , वो दूर नहीं . इतनी समाज आते ही धरे धीरे आदमी के विकार दूर होने लगते है . वो पवित्र बनने लगता है .

जय माँ गंगा

जैसे हम गंगा को माँ मानते है वैसे ब्रिटेन में लंदन के अंदर थेम्स नदी को वो लोग फादर थेम्स कह कर उनकी पूजा करते है . थेम्स १९६० इतनी गन्दी थी की गूगल में जाकर देख सकते है . लोगो में उनके प्रति वह प्रेम खड़ा किया . आदर खड़ा किया . गर्वे खड़ा किया . आज २०१४ में उसके पानी की अंदर की जमीं तक देख सकते है इतनी स्वछ है.

जब कोई योजना बनती है तो समज लो काम होने वाला नहीं . जब कोई कमिटी बनती है तो समज लो सिर्फ मीटिंग और चर्चा ही होगी .

मई पूछता हु , माँ से प्रेम करने के लिए कोई कमिटी की जरूर है ? कोई योजना की जरूर है ?

Posted in हिन्दू पतन

सत्य गटना


उत्तरप्रदेश के हिन्दू शेर … योगीजी की जय हो …….
योगी जी के रहते … गोरखपुर में … हिन्दुओ की तरफ …
बुरी नियत से आँख उठाकर देखने की … किसी की हिम्मत
नही होती … मुझे याद है 2007 में … मुहर्रम का जुलुस
निकला था … जब ये जुलुस … हिन्दुओ के घरो के सामने से गुज़र
रहा था … तो एक हिन्दू की बालिका … अपने दरवाज़े पे
खड़ी होकर … जुलुस को जाते देख रही थी … तभी लांडे समुदाय के
कुछ लांडे … उस लडकी से छेड़खानी करने लगे … लडकी घर के
भीतर गयी … अंदर उसका भाई मौजूद था … जब उसे इस बात
का पता चला … तो वो गुस्से में उन लांडो के पास गया …
कहासुनी हुई … फिर हाथापाई होने लगी … पास में तैनात पुलिस
वाले भागकर आये … दोनों पक्षोंको शांत कराया … और पुलिस
की जिप्सी में ये कहकर बैठा लिया कि … थाने में पूछताछ करके
छोड़ेंगे … हिन्दू लड़का अभी जिप्सी में बैठा ही था कि … लांडे
समुदाय के कुछ अन्य लांडे आये … और उसे पुलिस की गाड़ी से
खीचकर … चाकुओ से गोदकर … पुलिस के सामने ही उसे मार
डाला … दुर्भाग्य से उस वक्त भी … नमाजवादी की ही सरकार
थी … प्रशासन करवाई के नाम पे लीपापोती करने लगा … जब ये
बात योगी जी को पता चली … तब उन्होंने गर्जना की कि …
यदि कोई एक हिन्दू को मारता है … तो कोई एफ़ आई आर
नही करेगा … बल्कि एक बदले दस मारो … फिर तो गोरखपुर में
ऐसा तांडव हुआ कि … जिसे सोचकर आज भी लांडो की … रूह काँप
जाती होगी … उनकी कई बस्तियों में आग लगा दी गयी … दुकाने
फूंक दी गयी … उनको भी लग गया कि … अब हिन्दू भी कायर
नही रहा … वो भी ईट का जवाब बम से देना सीख गया हैं … तब से
लेकर आजतक … गोरखपुर में कोई छोटा मोटा दंगा भी नही हुआ …
इस मामले में योगी जी पर … रासुका भी लगा लेकिन वे
जरा भी विचलित नही हुए … उस दंगे के चार पांच सालो तक …
गोरखपुर शहर में मोहर्रम का जुलुस नही निकलने दिया …….