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स्वामि निष्ठ चेतक


(((( स्वामि निष्ठ चेतक ))))
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भारत के इतिहास में राजा महाराणा प्रताप का नाम अमर है । महाराणा प्रताप राजस्थान के शूरवीर एवं स्वाभिमानी राजा थे ।
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जयपुर के राणा मानसिंह ने अकबर द्वारा अपने राज्य को कष्ट न हो; इसलिए अपनी बहन का विवाह अकबर से किया ।
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एक बार अपने वैभव के प्रदर्शन हेतु राजपूत दिल्ली जाते समय मार्ग में स्थित महाराणा प्रताप से मिलने कुंभलगढ गये ।
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महाराणा प्रताप ने उन सभी का योग्य आदर सत्कार किया; परंतु उसने साथ बैठकर भोजन न करने की इच्छा व्यक्त की ।
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मानसिंह द्वारा कारण पूछने पर महाराणा प्रताप ने कहा,
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“समशेरी (मुगल शासक) से अपने राज्य की रक्षा करने की अपेक्षा अपनी बेटी-बहनों को मुगलों के हाथ देकर उनसे राज्य की रक्षा कराने वाले स्वाभिमान शून्य राजपूतों के साथ बैठकर मैं भोजन नहीं करता ।”
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महाराणा प्रताप जी द्वारा कहे गए कटु सत्य सुनकर मानसिंह भोजन की थाली छोड़, खड़ा हुआ और क्रोधित होकर चिल्लाया,
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“महाराणा प्रताप ! रणक्षेत्र में तेरा सत्यानाश नहीं किया, तो मेरा नाम मानसिंह नहीं !”
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कुछ समय उपरांत मानसिंह, अकबर के पुत्र सलीम एवं प्रचंड सैन्य के साथ महाराणा प्रताप से युद्ध करने निकला ।
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यह सूचना मिलते ही महाराणा प्रताप ने तत्परता से अरावली पर्वत से आने वाले मार्ग पर मानसिंह की सेना पर आक्रमण आरंभ किया और उनकी अधिकांश सेना को मिट्टी में मिला दिया ।
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महाराणा प्रताप जी की तलवार से सलीम का वध होने वाला था; परंतु वह वार उसके हाथी पर हुआ और सलीम बच गया ।
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महाराणा प्रताप की तलवार के भय से मानसिंह सेना के पीछे था ।
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महाराणा अपनी धारदार चमकती तलवार से शत्रु के घेरे से बाहर निकलने का प्रयास कर रहे थे ।
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इतने में किसी शत्रु सैनिक ने महाराणा जी के घोड़े ‘चेतक’ के एक पैर में तीर मारकर उसे घायल कर दिया ।
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ऐसी स्थिति में भी वह स्वामी निष्ठ घोड़ा अपनी पीठ पर बैठे महाराणा जी को बचाने के लिए भाग कर उस घेरे को भेदने का प्रयास करने लगा ।
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इतने में मार्ग में नाला आया । चेतक ने छलांग लगा कर वह नाला पार किया, परंतु हृदय गति रुकने के कारण उसने अपने प्राण त्याग दिए ।
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महाराणा प्रताप जी ने पीछे मुड़कर देखा, तो अकबर की सेना में भर्ती हुआ उनका छोटा भाई शक्तिसिंह, चार-पांच मुगल सैनिकों को जान से मार रहा था ।
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वह दृश्य देखकर महाराणा जी आश्चर्यचकित हुए ।
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इतने में उन पांच सैनिकों के प्राण लेकर शक्तिसिंह महाराणा के पास आया एवं उन्हें आलिंगन में लेकर कहने लगा,
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“भैया ! मैं मुगलों की सेना में हूं, तो भी आपका असीम शौर्य, पराक्रम के कारण आप ही मेरा आदर्श हैं । मैं आपके इस स्वामी निष्ठ घोड़े से भी तुच्छ हूं ।”
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मेवाड़ का इतिहास लिखने वाले कर्नल टॉण्ड ने महाराणा प्रताप जी का गौरव बताते हुए कहा है,
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`उत्कट महत्वाकांक्षी, शासन निपुणता एवं अपरिमित साधन संपत्ति के बल पर अकबर ने दृढनिश्चयी, धैर्यशाली, उज्ज्वल कीर्तिमान और साहसी महाराणा प्रताप के आत्मबल को गिराने का प्रयास किया; परंतु वह निष्फल हुआ ।’
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मित्रों, आपको अभी शूरवीर तथा स्वाभिमानी राजा राणा प्रताप जी की कथा ज्ञात हुई ।
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यदि हम सर्व प्राणीमात्र से प्रेम करें, तो पशु भी हमसे प्रेम करने लगते हैं । यह आपको घोड़े ‘चेतक’ के उदाहरण से ध्यान में आया होगा ।
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उस स्वामि निष्ठ घोड़े ने अपने प्राणों की चिंता किये बिना राजा को बचाया ।
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महाराणा प्रताप के भाई शक्तिसिंह ने भी स्वामी निष्ठ चेतक को श्रेष्ठ बताया ।
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हमें भी सबसे प्रेम करना सीखना चाहिए । साथ ही अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए ।
साभार :- बालसंस्कार

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रामायण – आखिर क्यों हंसने लगा मेघनाद का कटा सिर?

महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित धर्मग्रंथ ‘रामायण’ में उल्लेख मिलता है कि रावण के बेटे का नाम मेघनाद था। उसका एक नाम इंद्रजीत भी था। दोनों नाम उसकी बहादुरी के लिए दिए गए थे। दरअसल मेघनाद, इंद्र पर जीत हासिल करने के बाद इंद्रजीb बXत कहलाया। और मेघनाद, का मेघनाद नाम मेघों की आड़ में युद्ध करने के कारण पड़ा। वह एक वीर राक्षस योद्धा था।

मेघनाद, श्रीराम और लक्ष्मण को मारना चाहता था। एक युद्ध के किदौरान उसने सारे प्रयत्न किए लेकिनछहH वह विफल रहा। इसी युद्ध में लक्ष्मण के घातक बाणों से मेघनाद मारा गया। लक्ष्मण जी ने मेघनाद का सिर उसके शरीर से अलग कर दिया।

उसका सिर श्रीराम के आगे रखा गया। उसे वानर और रीछ देखने लगे। तब श्रीराम ने कहा, ‘इसके सिर को संभाल कर रखो। दरअसल, श्रीराम मेघनाद की मृत्यु की सूचना मेघनाद की पत्नी सुलोचना को देना चाहते थे। उन्होंने मेघनाद की एक भुजा को, बाण के द्वारा मेघनाद के महल में पहुंचा दिया। वह भुजा जब मेघनाद की पत्नी सुलोचना ने देखी तो उसे विश्वास नहीं हुआ कि उसके पति की मृत्यु हो चुकी है। उसने भुजा से कहा अगर तुम वास्तव में मेघनाद की भुजा हो तो मेरी दुविधा को लिखकर दूर करो।

सुलोचना का इतना कहते ही भुजा हरकत करने लगी, तब एक सेविका ने उस भुजा को खड़िया लाकर हाथ में रख दी। उस कटे हुए हाथ ने आंगन में लक्ष्मण जी के प्रशंसा के शब्द लिख दिए। अब सुलोचना को विश्वास हो गया कि युद्ध में उसका पति मारा गया है। सुलोचना इस समाचार को सुनकर रोने लगीं। फिर वह रथ में बैठकर रावण से मिलने चल पड़ी। रावण को सुलोचना ने, मेघनाद का कटा हुआ हाथ दिखाया और अपने पति का सिर मांगा। सुलोचना रावण से बोली कि अब में एक पल भी जीवित नहीं रहना चाहती में पति के साथ ही सती होना चाहती हूं।

तब रावण ने कहा, ‘पुत्री चार घड़ी प्रतिक्षा करो में मेघनाद का सिर शत्रु के सिर के साथ लेकर आता हूं। लेकिन सुलोचना को रावण की बात पर विश्वास नहीं हुआ। तब सुलोचना मंदोदरी के पास गई। तब मंदोदरी ने कहा तुम राम के पास जाओ, वह बहुत दयालु हैं।’

सुलोचना जब राम के पास पहुंची तो उसका परिचय विभीषण ने करवाया। सुलोचना ने राम से कहा, ‘हे राम में आपकी शरण में आई हूं। मेरे पति का सिर मुझे लौटा दें ताकि में सती हो सकूं। राम सुलोचना की दशा देखकर दुखी हो गए। उन्होंने कहा कि मैं तुम्हारे पति को अभी जीवित कर देता हूं।’ इस बीच उसने अपनी आप-बीती भी सुनाई।

सुलोचना ने कहा कि, ‘मैं नहीं चाहती कि मेरे पति जीवित होकर संसार के कष्टों को भोगें। मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि आपके दर्शन हो गए। मेरा जन्म सार्थक हो गया। अब जीवित रहने की कोई इच्छा नहीं।’

राम के कहने पर सुग्रीव मेघनाद का सिर ले आए। लेकिन उनके मन में यह आशंका थी कि कि मेघनाद के कटे हाथ ने लक्ष्मण का गुणगान कैसे किया। सुग्रीव से रहा नहीं गया और उन्होंने कहा में सुलोचना की बात को तभी सच मानूंगा जब यह नरमुंड हंसेगा।

सुलोचना के सतीत्व की यह बहुत बड़ी परीक्षा थी। उसने कटे हुए सिर से कहा, ‘हे स्वामी! ज्लदी हंसिए, वरना आपके हाथ ने जो लिखा है, उसे ये सब सत्य नहीं मानेंगे। इतना सुनते ही मेघनाद का कटा सिर जोर-जोर से हंसने लगा। इस तरह सुलोचना अपने पति की कटा हुए सिर लेकर चली गईं।’

              Sn vyas,

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रामचरितमानस के अरण्यकांड में प्रभुश्रीराम ओर ऋषिवर अत्रि का मिलन, माताअनसूयाजी द्वारा माता सीता को पतिव्रतधर्म का उपदेश


रामचरितमानस के अरण्यकांड में प्रभुश्रीराम ओर ऋषिवर अत्रि का मिलन, माताअनसूयाजी द्वारा माता सीता को पतिव्रतधर्म का उपदेश,,,,

*रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना॥
बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना॥

भावार्थ:-चित्रकूट में बसकर श्री रघुनाथजी ने बहुत से चरित्र किए, जो कानों को अमृत के समान (प्रिय) हैं। फिर (कुछ समय पश्चात) श्री रामजी ने मन में ऐसा अनुमान किया कि मुझे सब लोग जान गए हैं, इससे (यहाँ) बड़ी भीड़ हो जाएगी॥

  • सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई॥
    अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ॥

भावार्थ:-(इसलिए) सब मुनियों से विदा लेकर सीताजी सहित दोनों भाई चले! जब प्रभु अत्रिजी के आश्रम में गए, तो उनका आगमन सुनते ही महामुनि हर्षित हो गए॥ अब प्रभु अत्रिजी के आश्रम में आये हैं। दोनों भाइयों ने दंडवत प्रणाम किया और ऋषि ने उन्हें ह्रदय से लगा लिया है। श्री रामजी की छवि देखकर मुनि के नेत्र शीतल हो गए। भगवान को खाने के लिए कंद-मूल और फल दिए हैं। अब प्रभु आसन पर विराजमान हैं। मुनि भगवान की स्तुति करते हैं –

मामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं॥ भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं॥

हे भक्त वत्सल! हे कृपालु! हे कोमल स्वभाव वाले! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निष्काम पुरुषों को अपना परमधाम देने वाले आपके चरण कमलों को मैं भजता हूँ॥ मुझे अपने चरण कमलों की भक्ति दीजिए।

फिर परम शीलवती और विनम्र श्री सीताजी अनसूयाजी (आत्रिजी की पत्नी) के चरण पकड़कर उनसे मिलीं। उन्होंने आशीष देकर सीताजी को पास बैठा लिया और उन्हें ऐसे दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाए, जो नित्य-नए निर्मल और सुहावने बने रहते हैं। कभी भी मैले और पुराने नही होते। फिर माँ अनसूयाजी ने सुंदर शिक्षा दी है जानकी जी को-

हे राजकुमारी! सुनिए- माता, पिता, भाई सभी हित करने वाले हैं, परन्तु ये सब एक सीमा तक ही (सुख) देने वाले हैं, परन्तु हे जानकी! पति तो (मोक्ष रूप) असीम (सुख) देने वाला है। वह स्त्री अधम है, जो ऐसे पति की सेवा नहीं करती॥

धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री- इन चारों की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है। वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अंधा, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन-ऐसे भी पति का अपमान करने से स्त्री यमपुर में भाँति-भाँति के दुःख पाती है।

एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा॥ शरीर, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम करना स्त्री के लिए, बस यह एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एक ही नियम है॥

जगत में चार प्रकार की पतिव्रताएँ हैं। वेद, पुराण और संत सब ऐसा कहते हैं कि उत्तम श्रेणी की पतिव्रता के मन में अपने पति को छोड़कर दूसरा पुरुष स्वप्न में भी नहीं है॥

मध्यम श्रेणी की पतिव्रता पराए पति को कैसे देखती है, जैसे वह अपना सगा भाई, पिता या पुत्र हो (अर्थात समान अवस्था वाले को वह भाई के रूप में देखती है, बड़े को पिता के रूप में और छोटे को पुत्र के रूप में देखती है।

जो धर्म को विचारकर और अपने कुल की मर्यादा समझकर बची रहती है, वह निकृष्ट (निम्न श्रेणी की) स्त्री है, ऐसा वेद कहते हैं॥

और जो स्त्री मौका न मिलने से या भयवश पतिव्रता बनी रहती है, जगत में उसे अधम स्त्री जानना। पति को धोखा देने वाली जो स्त्री पराए पति से रति करती है, वह तो सौ कल्प तक रौरव नरक में पड़ी रहती है॥

क्षणभर के सुख के लिए जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मों के दुःख को नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कौन होगी। जो स्त्री छल छोड़कर पतिव्रत धर्म को ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गति को प्राप्त करती है॥

किन्तु जो पति के प्रतिकूल चलती है, वह जहाँ भी जाकर जन्म लेती है, वहीं जवानी पाकर (भरी जवानी में) विधवा हो जाती है॥

स्त्री जन्म से ही अपवित्र है, किन्तु पति की सेवा करके वह अनायास ही शुभ गति प्राप्त कर लेती है। पतिव्रत धर्म के कारण ही) आज भी ‘तुलसीजी’ भगवान को प्रिय हैं और चारों वेद उनका यश गाते हैं॥

हे सीता! सुनो, तुम्हारा तो नाम ही ले-लेकर स्त्रियाँ पतिव्रत धर्म का पालन करेंगी। तुम्हें तो श्री रामजी प्राणों के समान प्रिय हैं, यह (पतिव्रत धर्म की) कथा तो मैंने संसार के हित के लिए कही है॥

जानकीजी ने सुनकर परम सुख पाया और आदरपूर्वक उनके चरणों में सिर नवाया।

तब कृपा की खान श्री रामजी ने मुनि से कहा- आज्ञा हो तो अब दूसरे वन में जाऊँ॥ मुझ पर निरंतर कृपा करते रहिएगा और अपना सेवक जानकर स्नेह न छोड़िएगा।

श्री रामजी के वचन सुनकर ज्ञानी मुनि प्रेमपूर्वक बोले- मैं किस प्रकार कहूँ कि हे स्वामी! आप अब जाइए? हे नाथ! आप अन्तर्यामी हैं, आप ही कहिए। और मुनि की आँखों से प्रेम के आंसू टपकने लगे।

Sanjay gupta

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ડોંગરેજી મહારાજ


ડોંગરેજી મહારાજ

ડોંગરેજી મહારાજના જીવનનો એક કિસ્સો જાણવા જેવો છે.

એક કેન્સર હૉસ્પિટલ માટે ફંડ ઊભું કરવા ડોંગરેજી મહારાજની કથા મુંબઈમાં યોજાઈ હતી. દાયકાઓ અગાઉ યોજાયેલી એ કથા થકી આશરે દોઢ કરોડ રૂપિયા જેટલી રકમ કૅન્સર હૉસ્પિટલ માટે એકઠી થઈ ગઈ હતી.

એ કથાના છેલ્લા દિવસે ડોંગરેજી મહારાજ કથા સંભળાવી રહ્યા હતા ત્યારે તેમના કોઈ સ્નેહી ગંભીર ચહેરે તેમની પાસે ગયા. તેમણે ડોંગરેજી મહારાજને કાનમાં કહ્યું કે તમારા પત્ની મૃત્યુ પામ્યા છે.

એ આઘાતજનક સમાચાર સાંભળ્યા પછી બીજી જ ક્ષણે ડોંગરેજીએ સ્વસ્થતા મેળવી લીધી અને દુ:ખદ સમાચાર લઈને આવેલા સ્નેહીને જવાબ આપીને ફરી કથા શરૂ કરી દીધી! તેમણે એ દિવસે કથા પૂરી કરી. કથાના આયોજકોને ખબર પડી કે ડોંગરેજીના પત્ની મૃત્યુ પામ્યાં છે ત્યારે તેઓ ચિંતામાં મુકાઈ ગયા, પણ ડોંગરેજીએ કથા યથાવત્ ચાલુ રાખી એને કારણે તેઓ ગદ્ગદ થઈ ગયા.

એ પછી ડોંગરેજી મહારાજે પત્નીના દેહાંત પછીની વિધિઓ હાથ ધરી. તેઓ થોડા દિવસ પછી પત્નીના અસ્થિ લઈને ગોદાવરી નદીમાં અસ્થિ વિસર્જન માટે નાશિક ગયા. એ વખતે અસ્થિ વિસર્જનની વિધિ કરનારા બ્રાહ્મણોને દક્ષિણા આપવા માટે તેમની પાસે પૈસા નહોતા જે સ્નેહીએ તેમને તેમના પત્નીના મૃત્યુના સમાચાર આપ્યા હતા એ તેમની સાથે હતા.

ડોંગરેજી મહારાજે તેમને પોતાના પત્નીનું મંગળસૂત્ર આપીને કહ્યું કે આ વેચીની પૈસા લઈ આવો. બ્રાહ્મણોને દક્ષિણા આપવા માટે મારી પાસે કંઈ નથી. પેલા સ્નેહી સ્તબ્ધ થઈ ગયા. તેમની આંખો છલકાઈ ગઈ. જે માણસે થોડા દિવસો અગાઉ કૅન્સર હૉસ્પિટલ માટે પોતાની કથા થકી દોઢ કરોડનું ફંડ એકઠું કરી આપ્યું હતું. તેની પાસે મામૂલી રકમ પણ નહોતી!

સાદગીના પર્યાયસમા ડોંગરેજી મહારાજના જીવનના આવા તો અનેક કિસ્સાઓ છે. એ વાતો ફરી ક્યારે કરીશું. ઘણા ફાઈવસ્ટાર બાબાઓ, બાપુઓ, સ્વામીઓ અને મહારાજો કરોડો અબજો રૂપિયામાં આળોટતા હોય છે તેમની બોચી ઝાલીને નિત્ય પ્રાત:કાળે આવા કિસ્સાઓનું પઠન કરવાની તેમને ફરજ પાડવી જોઈએ.

Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

बेटियाँ चावल उछाल बिना पलटे, महावर लगे कदमों से विदा हो जाती हैं ।


बेटियाँ चावल उछाल
बिना पलटे,
महावर लगे कदमों से विदा हो जाती हैं ।

छोड़ जाती है बुक शेल्फ में,
कवर पर अपना नाम लिखी किताबें ।
दीवार पर टंगी खूबसूरत आइल पेंटिंग के एक कोने पर लिखा अपना नाम ।
खामोशी से नर्म एहसासों की निशानियां,
छोड़ जाती है ……
बेटियाँ विदा हो जाती हैं ।

रसोई में नए फैशन की क्राकरी खरीद,
अपने पसंद की सलीके से बैठक सजा,
अलमारियों में आउट डेटेड ड्रेस छोड़,
तमाम नयी खरीदादारी सूटकेस में ले,
मन आँगन की तुलसी में दबा जाती हैं …
बेटियाँ विदा हो जाती हैं।

सूने सूने कमरों में उनका स्पर्श,
पूजा घर की रंगोली में उंगलियों की महक,
बिरहन दीवारों पर बचपन की निशानियाँ,
घर आँगन पनीली आँखों में भर,
महावर लगे पैरों से दहलीज़ लांघ जाती है…

बेटियाँ चावल उछाल विदा हो जाती हैं ।

एल्बम में अपनी मुस्कुराती तस्वीरें ,
कुछ धूल लगे मैडल और कप ,
आँगन में गेंदे की क्यारियाँ उसकी निशानी,
गुड़ियों को पहनाकर एक साड़ी पुरानी,
उदास खिलौने आले में औंधे मुँह लुढ़के,
घर भर में वीरानी घोल जाती हैं ….

बेटियाँ चावल उछाल विदा हो जाती हैं।

टी वी पर शादी की सी डी देखते देखते,
पापा हट जाते जब जब विदाई आती है।
सारा बचपन अपने तकिये के अंदर दबा,
जिम्मेदारी की चुनर ओढ़ चली जाती हैं ।
बेटियाँ चावल उछाल बिना पलटे विदा हो जाती हैं ।
……बस यही एक ऐसा पौधा है ..जो बीस पच्चीस साल का होकर भी दूसरे आंगन मे जा के फिर उस आंगन का होकर खुशबू, छांव , फल , सकून और हरियाली देता है …ये तुलसी से कम योग्य नहीं …..ये भी पूजने योग्य है …

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

बेटी या बहू


👉 बेटी या बहू

🔷 सुजाता को लड़का हुआ, नॉर्मल डिलीवरी होने के कारण उसी दिन हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गई, घर में सभी बहुत खुश थे क्योंकी पहले एक तीन साल की लड़की थी, सासू जी बहू के आराम के लिए हाल के पास वाले कमरे में बिस्तर लगा रही थी।

🔶 बहू शाम को घर आ गई, बच्चे को देखने और सुजाता की खबर पूछने रिश्तेदार व पड़ोसी आने लगे, सासु माँ घर का सारा काम भी करती, सुजाता व बच्चे का ध्यान रखती और आनेवालों का स्वागत भी करती।

🔷 कहते हैं सभी एक जैसे नहीं होते, सभी अपनी अपनी सलाह सुजाता की सास को देकर जाते, सुजाता को सब अंदर सुनाई देता था, उसी समय एक पड़ोसी की पत्नी आई और कहने लगी, देखो वैसे तो हम डिलीवरी में पूरा मेवा “काजु,बदाम,पिस्ता सब डालकर लड्डू बनाते हैं पर अपनी बेटियों के लिए, अब बहु है तो थोड़ा कम ज्यादा भी चल जाता है, बादाम बहुत मंहंगी है इसलिए 500 ग्राम के बदले 150 ग्राम ले लेना और वैसे ही सभी मेवा थोड़ा थोड़ा कम कर देना और लड्डू कम न बने इसके लिए गेहूं का आटा ज्यादा ले लेना, सुजाता की सास सब सुनती रही अंदर सुजाता भी सब सुन रही थी, पड़ोसन चली गई, ससुर जी बोले ” देखो में बाजार जा रहा हूँ तूम मुझे क्या लाना है लिखवा दो?

🔶 कोई चीज बाकी ना रहे, तभी सुजाता की सास ने सामान लिखवाया, हर चीज बेटी की डिलीवरी के समय से ज्यादा ही थी ससुर जी ने पूछा इस बार सभी सामान ज्यादा है क्या तूम भी लड्डू खाने वाली हो? तब सुजाता की सास बोली “सुनों जब बेटी को डिलिवरी आई थी तब हमारी परिस्थिति अच्छी नहीं थी और आवक भी कम थी तब आप अकेले कमाते थे अब बेटा भी कमाता है इसलिए मैं चाहती हूँ की बहू के समय, में वो सब चीजें बनाऊँ जो बेटी के समय नहीं कर पाई, क्या बहू हमारी बेटी नहीं है।

🔷 और सबसे बड़ी बात यह की बच्चा होते समय तकलीफ तो दोनों को एक सी ही होती है इसलिए मैंने बादाम ज्यादा लिखे हैं लड्डू में तो डालूंगी पर बाद में भी हलवा बनाकर खिलाउंगी, जिससे बहू को कमजोरी नहीं आये और बहू -पोता, हमेंशा स्वस्थ रहें!

🔶 सुजाता अंदर सबकुछ सुन रही थी और सोच रही थी में कितनी खुशकिस्मत हूँ। और थोड़ी देर बाद जब सासुजी रूम में आई तो सुजाता बोली “क्या मैं आपको मम्मीजी की जगह मम्मी कहूँ?

🔷 बस फिर क्या? दोनों की आँखों में आँसू थे।

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महर्षि दधीचि की- देवताओं की प्राण रक्षा के लिए किया था अपनी अस्थियों का दान


महर्षि दधीचि की- देवताओं की प्राण रक्षा के लिए किया था अपनी अस्थियों का दान,,,,

एक बार देवराज इंद्र के मन में अभिमान पैदा हो गया जिसके फलस्वरूप उसने देवगुरु बृहस्पति का अपमान कर दिया। उसके आचरण से क्षुब्ध होकर देवगुरु इंद्रपुरी छोड़कर अपने आश्रम में चले गए। बाद में जब इंद्र को अपनी भूल का आभास हुआ तो वह बहुत पछताया, क्योंकि अकेले देवगुरु बृहस्पति ही ऐसे व्यक्ति थे, जिनके कारण देवता, दैत्यों के कोप से बचे रहते थे।

पश्चाताप करता इंद्र देवगुरु को मनाने के लिए उनके आश्रम में पहुंचा। उसने हाथ जोड़कर देवगुरु को प्रणाम किया और कहा, “आचार्य। मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया था। उस समय क्रोध में भरकर मैंने आपके लिए जो अनुचित शब्द कह दिए थे, मैं उनके लिए आपसे क्षमा मांगता हूं।

आप देवों के कल्याण के लिए पुनः इंद्रपुरी लौट चलिए। हम सारे देव मिलकर आपकी भली-भांति सेवा…।” इंद्र का शेष वाक्य अधूरा ही रह गया क्योंकि देवगुरु अपने तपोबल से अदृश्य हो चुके थे। इंद्र ने उनकी बहुत खोज की किन्तु जब देवगुरु का कुछ पता न चला तो वह थक-हार कर इंद्रपुरी लौट गया।

दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने जब यह समाचार सुना तो उन्होंने दैत्यों से कहा, “दैत्यों ! यही अवसर है जब तुम देवलोक पर अधिकार कर सकते हो। आचार्य बृहस्पति के चले जाने के बाद देवों की शक्ति आधी रह गई है। तुम लोग चाहो तो अब आसानी से देवलोक पर अधिकार कर सकते हो।”

उचित अवसर देखकर दैत्यों ने अमरावती को चारों ओर से घेर लिया और चारों और मार-काट मचा दी। इंद्र किसी तरह जान बचाकर वहां से भाग निकला और पितामह ब्रह्मा की शरण में पहुंच गया।

वह करबद्ध होकर ब्रह्माजी से बोला, “पितामह, देवों की रक्षा कीजिए। दैत्यों ने अचानक हमला करके अमरावती में मार-काट मचा दी है। वे चुन-चुनकर देव योद्धाओं का वध कर रहे है। मैं किसी तरह जान बचाकर यहां तक पहुंचा हूं।”

पितामह ब्रह्मा आचार्य बृहस्पति के देवलोक छोड़ जाने की बात सुन चुके थे। बोले, “यह सब तुम्हारे अहंकार के कारण हुआ है, देवराज। अब भी यदि तुम आचार्य बृहस्पति की मना सको और उन्हें देवलोक में ले आओ तो वे दैत्यों पर विजय प्राप्त करने का कोई उपाय तुम्हे बता देंगे।

“मैं अपनी भूल पर बहुत पश्चाताप करता उन्हें खोजने के लिए गया था, पितामह। किन्तु मेरे देखते ही देखते वे अपने तपोबल से अदृश्य हो गए।” इंद्र ने कहा।

“आचार्य तुमसे कुपित है, इंद्र।” ब्रह्माजी ने कहा, “अब जब तक तुम उनकी आराधना करके उन्हें स्वयं सम्मानपूर्वक देवलोक नहीं ले जाओगे, वे अमरावती नहीं आएंगे।”

“फिर क्या किया जाए, पितामह ? आचार्य का कुछ पता-ठिकाना भी तो हमारे पास नहीं है। उन्हें खोजने में समय लगेगा। तब तक तो दैत्य सम्पूर्ण अमरावती को जलाकर राख कर देंगे।”

इंद्र की बात सुनकर ब्रह्माजी ने अपने नेत्र बन्द कर लिए। वे चिंतन में डूब गए। कुछ देर बाद उन्होंने अपने नेत्र खोले और इंद्र से कहा, “इंद्र ! इस समय भूमण्डल में सिर्फ एक ही व्यक्ति है जो तुम्हे इस आपदा से मुक्ति दिला सकता है और वह है महर्षि त्वष्टा का महाज्ञानी पुत्र विश्वरूप। अगर तुम उसे अपना पुरोहित नियुक्त कर लो तो वह तुम्हें इस संकट से मुक्त करा देगा।”

ब्रह्मा जी ने उपाय बताया।

पितामह का परामर्श मानकर देवराज इंद्र महर्षि विश्वरूपं के पास पहुंचे। विश्वरूप के तीन मुख थे। पहले मुख से वे सोमवल्ली लता का रस निकालकर यज्ञ करते समय पीते थे। दूसरे मुख से मदिरा पान करते तथा तीसरे मुख से अन्न आदि भोजन का आहार करते थे। इंद्र ने उन्हें प्रणाम किया तो महर्षि ने पूछा, “आज यहां कैसे आगमन हुआ, देवराज ? आप किसी विपत्ति में तो नही फंस गए ?”

“आपने ठीक अनुमान लगाया है मुनिश्रेष्ठ।” इंद्र ने कहा, “देवो पर इस समय बहुत बड़ी विपत्ति आई हुई है, दैत्यों ने अमरावती को घेर रखा है। चारो ओर त्राहि-त्राहि मची हुई है।”

विश्वरूप मुस्कुराए। बोले, ” तो देवो और दैत्यों का पुराना झगड़ा है, देवराज। दोनों हो महर्षि कश्यप की सन्ताने है। इसलिए कोई एक-दूसरे से छोटा नहीं बनना चाहता। तुम्हारे इस झगड़े में मैं क्या कर सकता हूं ?”

“देवो को इस समय आपकी सहायता की आवश्यकता है मुनिश्रेष्ठ। सिर्फ आप ही उनका भय दूर कर सकते है।”

इस प्रकार इंद्र ने जब विश्वरूप की बहुत अनुनय-विनय की तो विश्वरूप पिघल गए। उन्होंने देवो के यज्ञ का होता (पुरोहित) बनना स्वीकार कर लिया। वे बोले, “देवो की दुर्दशा देखकर ही मैने आपके यज्ञ का होता बनना स्वीकार किया है, देवराज।”

ततपश्चात उन्होंने देवराज को नारायण कवच प्रदान करते हुए कहा, “यह कवच ले जाओ देवराज। दैत्यों से युद्ध करते समय यह न सिर्फ तुम्हारी रक्षा करेगा बल्कि तुम्हे विजयश्री भी प्रदान करेगा।”

विश्वरूप से नारायण कवच प्राप्त करके देवराज पुनः अमरावती पहुंचे। उनके वहां पहुचने से देवो में नए उत्साह का संचरण हो गया और वे पूरी शक्ति के साथ दैत्यों पर टूट पड़े। भयंकर युद्ध छिड़ गया। इस बार इंद्र के पास नारायण कवच होने के कारण दैत्य मैदान में नहीं ठहर सके। वे पराजित होकर भाग खड़े हुए। विजयश्री देवताओं के हाथ लगी।

युद्ध समाप्त होने पर देवराज विश्वरूप का आभार व्यक्त करने के लिए उनके पास पहुंचे। बोले, “आपकी कृपा से हमने दैत्यों पर विजय प्राप्त कर ली है, मुनिवर। अब हम एक इस यज्ञ करना चाहते है जिसके फलस्वरूप देवलोक हमेशा के लिए दैत्यों के भय से मुक्त रह सके। और आप हमे वचन दे ही चुके है कि उस यज्ञ के होता होंगे, तो कृपा करके अब आप हमारे साथ चलिए।”

देवराज के अनुरोध पर विश्वरूप अमरावती पहुंचे। उन्होंने यज्ञ में आहुतियां डालनी आरम्भ कर दी। उसी समय एक दैत्य ब्राह्मण का वेश धारण कर महर्षि विश्वरूप के पास आ बैठा। उसने धीरे से महर्षि विश्वरूप से कहा, “महर्षि ! देवताओं का पक्ष लेकर आप जो यह यज्ञ दैत्यों के विनाश के लिए कर रहे है, यह उचित नहीं है।”

“क्यों उचित नहीं है ?” विश्वरूप ने पूछा।

“इसलिए उचित नहीं है कि देव और दैत्य एक ही पिता की सन्ताने है। आप भूल रहे है कि स्वयं आपकी माताजी दैत्य परिवार से है। क्या आप चाहेंगे कि आपका मातृकुल हमेशा के लिए नष्ट हो जाए ?”

बात विश्वरूप की समझ में आ गई। उन्होंने आहुतियां देते समय देवो के साथ-साथ दैत्यों का नाम भी लेना आरम्भ कर दिया।

यज्ञ समाप्त हुआ, लेकिन उसका कोई लाभ देवो को न मिला। इस पर देवराज इंद्र ने विश्वरूप से कहा, “मुनिवर ! इतने बड़े यज्ञ का कोई अच्छा सुफल नहीं मिला। देवताओ की शक्ति में तो किंचित भी बदलाव नहीं आया। वे तो जैसे पहले थे, वैसे ही अब भी है।”

तभी इंद्र का एक गुप्तचर उनके पास पहुंचा, उसने इंद्र को बताया, “यज्ञ का सुफल कैसे मिलता देवराज। मुनिवर देवो के साथ-साथ दैत्यों को भी तो आहुतियां देते रहे है। इस यज्ञ का जितना लाभ देवो को मिला है उतना ही दैत्यों को भी मिला है।”

गुप्तचर के मुख से यह समाचार सुनकर इंद्र गुस्से से भर उठे। उन्होंने तलवार निकाल ली और ऋषि विश्वरूप पर झपटे, “ढोंगी ऋषि। तूने देवो के साथ विश्वासघात किया है। यज्ञ देवो ने कराया और तू आहुतियां अपने मातृकुल के लोगो को देता रहा। अब मैं तुझे जीवित नहीं छोडूंगा।” कहते हुए उसने तलवार के एक ही वार से विश्वरूप के तीनों सिर काट दिए।

इंद्र द्वारा एक ब्राह्मण की यज्ञस्थल पर ही हत्या किए जाने की सर्वज्ञ निंदा होने लगी। देवो के साथ-साथ ऋषि-मुनि और ब्राह्मण भी उसे धिक्कारने लगे, “इंद्र तू हत्यारा है-तूने ब्रह्म हत्या की है, तेरे जैसे व्यक्ति को इंद्र पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं। तेरे लिए यही उचित है कि किसी कुएं या बावली में कूद कर अपने प्राणों का विसर्जन कर डाल।” आदि-आदि।

नित्य प्रति की धिक्कार और प्रताड़ना सुनकर इंद्र दुखी रहने लगा। उधर, जब यह समाचार महर्षि त्वष्टा तक पहुंचा तो वे बेहद क्रोधित हुए। गुस्से दहाड़ते हुए बोले, “इंद्र की ऐसी हिम्मत कैसे हुई कि वह मेरे पुत्र का वध करके इन्द्रासन पर बैठा रहे। मैं उसे मिट्टी में मिला दूंगा। मेरे पुत्र की हत्या करने का परिणाम उसे भोगना ही पड़ेगा।”

त्वष्टा उसी दिन यज्ञ करने के लिए बैठ गए। यज्ञ की समाप्ति पर यज्ञ वेदी से एक पर्वत के समान आकार वाला दैत्य प्रकट हुआ। उसके एक हाथ में गदा और दूसरे में शंख था। उसने झुककर ऋषि को प्रणाम किया। ऋषि ने उसको नाम दिया-वृत्रासुर।

“आज्ञा दीजिए ऋषिवर ?” वृत्रासुर ने सिर झुकाकर कहा।

“वृत्रासुर। तुम तत्काल अमरावती जाओ और कपटी इंद्र के साथ-साथ समस्त देवताओं का विनाश कर दो।” महर्षि त्वष्टा ने क्रोध से कांपते हुए आदेश दिया। त्वष्टा का आदेश पाते ही वृत्रासुर वायुवेग से देवलोक की ओर उड़ चला।

वृत्रासुर ने अमरावती में पहुंचकर देवो का विध्वंस करना शुरू कर दिया। जो भी सामने आता, वह निःसंकोच होकर उसका वध कर डालता। उसने अमरावती में ऐसा कोहराम मचाया कि देवता त्राहि-त्राहि कर उठे। इंद्र अपने ऐरावत पर चढ़कर उसके सामने पहुंचा और उस पर वज्र प्रहार किया, किन्तु वृत्रासुर ने एक ही झटके में उसके हाथ से वज्र छीनकर दूर फेंक दिया। इस पर इंद्र ने उस पर आग्नेय अस्त्रों से आक्रमण किया, किन्तु उनका किंचित भी असर वृत्रासुर पर न हुआ।

किसी खिलौने की तरह उसने इंद्र के हाथ से उसका धनुष छीन लिया और उसे तोड़कर एक और फेंक दिया। फिर वह अपना भयंकर मुख खोलकर इंद्र को खाने के लिए उसकी ओर झपटा। यह देखकर इंद्र भयभीत हो गया और ऐरावत से कूद कर अपनी जान बचाने के लिए भाग निकला। पीछे वृत्रासुर अपने भयंकर अट्टहासों से अमरावती को गुंजाता रहा।

देवराज भागकर सीधे पहुंचे विष्णुलोक में भगवान विष्णु के पास।

“रक्षा कीजिए देव। देवताओं को बचाइए।” उसने आर्त्त स्वर में भगवान से विनती की, “देवो को वृत्रासुर के कोप से बचाइए अन्यथा वह समस्त देवजाति का विनाश कर डालेगा।”

यह सुनकर भगवान विष्णु ने भी उसे धिक्कारा। कहा, “इंद्र। एक ब्राह्मण, और वह भी ऐसा जो तुम्हारे यज्ञ का संचालन कर रहा हो, उसका यज्ञस्थल पर ही वध करके तुमने समस्त देवजाति को कलंकित कर दिया। तुमने अक्षम्य अपराध किया है। महर्षि त्वष्टा ने तुम्हारे लिए उचित ही दंड का निर्णय किया है।”

“मुझे अपने कृत्य पर बहुत पश्चाताप हो रहा है, प्रभु। मैं उस समय क्रोध में अंधा हो रहा था, इसलिए ब्रह्म हत्या जैसा पाप कर बैठा। मुझे क्षमा कर दीजिए और मुझे उस महाभयंकर दैत्य से मुक्ति दिलाइए।” इंद्र ने शर्मिंदगी भरे स्वर में कहा।

“देवेंद्र।” श्री हरि बोले, “इस समय मैं तो क्या स्वयं भगवान शिव अथवा ब्रह्मा जी भी तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकते। तुम्हारी रक्षा तो पृथ्वी पर एक ही व्यक्ति कर सकता है।”

“वह कौन है देव ?”

“महर्षि दधीचि।” विष्णु बोले, “सिर्फ वे ही तुम्हारी रक्षा कर सकते है। तुम महर्षि दधीचि के आश्रम में जाओ और उन्हें प्रसन्न करके किसी तरह उनके शरीर की हड्डियां प्राप्त कर लो। फिर उन हड्डियों से वज्र बनाकर यदि तुम वृत्रासुर से युद्ध करोगे तो विजयश्री तुम्हें ही मिलेगी।”

भगवान विष्णु का परामर्श मानकर इंद्र दधीचि के आश्रम में पहुंचा। महर्षि दधीचि उस समय समाधि लगाए बैठे थे। उनकी कामधेनु उनके निकट खड़ी थी। इंद्र महर्षि की समाधि भंग होने की प्रतीक्षा करने लगा। फिर जब महर्षि ने अपनी समाधि भंग की तो उनकी दृष्टी करबद्ध खड़े इंद्र पर पड़ी। महर्षि ने हंसते हुए पूछा, “देवेंद्र ! आज इस मृत्युलोक में तुम्हारा आगमन क्योकर हुआ ? देवलोक में सब कुशल से तो है ?”

“कुशलता कैसी महर्षि।” इंद्र ने शर्मसार होते हुए कहा, “देवो के दुर्दिन आ गए है। वृत्रासुर के भय से देव अमरावती छोड़कर जंगलों और गिरिकन्दराओ में छिपते फिर रहे है।”

फिर महर्षि के पूछने पर इंद्र ने सारी बाते उन्हें बता दी। सुनकर दधीचि बोले, “यह तो बड़ी अशुभ बाते बताई तुमने, देवेंद्र। अब इनका निराकरण कैसे हो ?”

“महर्षि ! मैं भगवान विष्णु के पास गया था।” इंद्र बोला, “उन्होंने परामर्श दिया है कि यदि आप प्रसन्न होकर मुझे अपनी हड्डियो का दान दे दे और उनसे वज्र बनाकर यदि वृत्रासुर से युद्ध किया जाए तो वह दैत्य उस वज्र के प्रहार से मर सकता है। हे ऋषिश्रेष्ठ। देवो पर कृपा करके अपनी अस्थियों का दान दे दीजिये।”

“देवेंद्र !” महर्षि दधीचि बोले, “यदि मेरी अस्थियों से मानव और देव जाति का कुछ हित होता है तो मैं सहर्ष अपनी अस्थियों का दान देने के लिए तैयार हूं।”

तत्पश्चात अपने शरीर पर मिष्ठान का लेपन करके महर्षि समाधिस्थ होकर बैठ गए। कामधेनु ने उनके शरीर को चाटना आरम्भ कर दिया। कुछ ही देर में महर्षि के शरीर की त्वचा, मांस और मज्जा उनके शरीर से विलग हो गए। मानव देह के स्थान पर सिर्फ उनकी अस्थियां ही शेष रह गई।

इंद्र ने उन अस्थियों को श्रद्धापुर्वक नमन किया और उन्हें ले जाकर उन हड्डियों से ‘तेजवान’ नामक वज्र बनाया। तत्पश्चात उस वज्र के बल पर उसने वृत्रासुर को ललकारा। दोनों के मध्य भयंकर युद्ध हुआ, लेकिन वृत्रासुर ‘तेजवान’ वज्र के आगे देर तक टिका न रह सका। इंद्र ने वज्र प्रहार करके उसका वध कर डाला। देवता उसके भय से मुक्त हो गए।

संजय गुप्ता

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आइये जानते है अवधूत पशुपति नाथ के बारे में


आइये जानते है अवधूत पशुपति नाथ के बारे में :-

  1. ऋग्वेद में शिव के लिए रूद्र नामक देवता का उल्लेख है।
  2. अथर्ववेद में शिव को भव शर्व, पशुपति और भूपति कहा गया है।

  3. लिंगपूजा का प्रथम स्पष्ट वर्णन मत्स्यपुराण में मिलता है।

  4. महाभारत के अनुशासन पर्व में शैव सम्प्रदाय की चार संख्या बताई गयी है पाशुपत कापालिक, कालमुख तथा लिंगायत।

  5. वर्णन के आधार पर पाशुपत सम्प्रदाय सबसे प्राचीन है । इस के संस्थापक लावकुलिश थे जो 18 वें शिवांश थें।

6.शिव पुराण में शिव के दशावतार बताये गए है ये तंत्र-शास्त्र से सम्बंधित बताये गए हैं । ये इस प्रकार हैं :-

महाकाल ,तारा, भुवनेश , षोडस , भैरव, छिन्न-मस्तक गिरिजा, धूम्रवान, बगलामुख, मातंग, एवम् कमल।

  1. शिव के अन्य 11 अवतार इस प्रकार है :-

कपाली, पिंगल, भीम, विरूपाक्ष, विलोहित , शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य्, शम्भ, चण्ड एवम् भव।

  1. पुराणों में 7 शैवतीर्थ का वर्णन इस प्रकार है :-

वरणस् (बनारस) केदारनाथ, सोमनाथ, रामेश्वर, चिदम्बरम, अमरनाथ एवम् कैलाश , मानसरोवर ।

  1. 12 ज्योतिर्लिंग इस प्रकार हैं :-

सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ओम्कारेश्वर, वैद्यनाथ भीमशंकर, रामेश्वर, नागेश्वर, विश्वनाथ, त्रयमकेश्वर, केदारनाथ , घुश्मेश्वरनाथ ।

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नामी से नाम बड़ा एक दिन देवर्षि नारद


नामी से नाम बड़ा

एक  दिन देवर्षि नारद ने एक प्रश्न उठाया कि नाम और नामी में कौन श्रेष्ठ है ? ऐसे प्रश्न को सुनकर ऋषियों ने कहा – नारद जी! नामी से तुम्हारा क्या तात्पर्य है, स्पष्ट करो।

नारद जी ने कहा – ऋषियों नाम तथा नामी से तात्पर्य है कि भगवान नाम का जप-भजन श्रेष्ठ है या स्वयं भगवान श्रेष्ठ हैं ?

नारद जी की बात सुनकर ऋषियों ने हंसकर कहा – अरे नारद! तुमने यह कैसे बच्चों जैसा प्रश्न किया है।

निश्चय ही भगवान श्रेष्ठ हैं क्योंकि उन्हीं के नाम का तो जप किया जाता है।

नारद ने कहा – नहीं आपकी यह धारणा ठीक नहीं है। मेरे विचार से भगवान से बढ़कर उनका नाम है।

भक्त को भगवान के नाम के जप से ही शक्ति मिलती है।

क्योंकि नाम के भजन के बिना भगवान कहाँ कृपा करते हैं।

पर यह बात सबने आसानी से स्वीकार नहीं की तो नारद ने कहा – अपने मत की प्रतिष्ठा के लिए मैं इसे उचित समय पर प्रमाणित करूंगा।

इसके कुछ देर बाद राजदरबार स्थगित हो गया। हनुमान उस दिन दरबार में उपस्थित नहीं थे इसलिए हुनमान को इस विवाद के बारे में कुछ नहीं पता था।

दूसरे दिन राजदरबार लगने से पहले नारद ने हनुमान को बुलाया और कहा – हनुमान! राजदरबार में जाने पर तुम श्रीराम तथा उपस्थित ऋषियों को विनय पूर्वक प्रणाम करना। पर विश्वामित्र को प्रणाम मत करना। वे भले ही ऋषि का चोला धारण किए है पर वे ब्राह्मण नहीं हैं। क्षत्रियों की पूजा ब्राह्मणों जैसी नहीं होती।

हनुमान ने सोचा नारद देवताओं के ऋषि हैं, ठीक ही कह रहे होंगे। उनकी बात अवश्य माननी चाहिए। उन्होंने कहा – ठीक है देवर्षि, मैं ऐसा ही करूंगा।

दरबार में भगवान श्रीराम सिंहासन पर बैठे थे। मंत्री तथा ऋषि आदि भी अपने-अपने आसन पर विराजमान थे। थोड़ी ही देर में हनुमान जी आए। भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम किया फिर ऋषियों का चरण स्पर्श कर प्रणाम किया फिर उन्हीं के बीच बैठे विश्वामित्र को न तो उन्होंने प्रणाम किया और न किसी प्रकार का आदरभाव दिखाया। हनुमान के इस व्यवहार से विश्वामित्र ने अपने को बड़ा अपमानित समझा।

वे राजा तथा ऋषियों के बीच इस प्रकार अपनी उपेक्षा था अपमान को सहन न कर सके। तत्काल ही क्रोध में उठ खड़े हुए और श्रीराम से बोले- श्रीराम! तुमने अपने इस मुंहलगे सेवक की धृष्टता देखी ?

भरे दरबार में इसने किस प्रकार मेरी उपेक्षा की तथा उद्धत भाव से मेरा अपमान किया।

श्रीराम ने कहा – गुरुदेव शांत हो जाइए। मैं हनुमान से इस धृष्टता का कारण पूछूंगा।

विश्वामित्र का क्रोध शांत नहीं हुआ, उन्होंने कहा – यह तो आपने प्रत्यक्ष देखा, पूछने की क्या आवश्यकता है ?

अस्त्र-शस्त्र के क्षेत्र में मैं तुम्हारा गुरु रहा हूँ। यह गुरु-आज्ञा है, इसे दण्ड दीजिये।

नारद ने भी विश्वामित्र की हाँ में हाँ मिलाई तथा कहा – भगवान! विश्वामित्र ठीक कहते हैं। हनुमान ने इनका प्रत्यक्ष अपमान किया है। आपके उदण्ड सेवक को दण्ड मिलना चाहिए।

नारद की बार सुनकर हनुमान असमंजस में पड़ गए। भरे दरबार में अपनी स्थिति देखकर कुछ बोल तो न सके, पर सोचने लग गए कि जिस नारद के कहने से मैंने ऐसा किया, व्ही नारद अब मेरा बचाव न करके मुझे दण्ड देने की बात में सहमति जता रहे हैं।

नारद का यह चरित्र समझ में नहीं आता। इधर की उधर लगाना और दो लोगों के बीच भ्रम पैदा करके उन्हें लड़ने में इन्हें कौन-सा आनंद आता है ? भले काम को बिगाड़ने वाला यह कैसे ऋषि है ?

भगवान श्रीराम किसी प्रकार की दण्ड की घोषणा करते इससे पहले ही नारद ने कहा – भगवन! इस संबंध में शांत भाव से विचार कर कल दण्ड दीजिएगा। उत्तेजित अवस्था में अभी इस समय हनुमान को दण्ड देना उचित नहीं।

सबने इस सुझाब को स्वीकार किया और सभा स्थगित हो गई।

रात को हनुमान नारद के आश्रम में आए और कहा – देवर्षि! आप यह कौन-सा खेल खेल रहे हैं ? मेरा वध कराकर आपको क्या मिलेगा ? मैंने तो जो कुछ अविनय किया वह आपकी आज्ञा से ही किया था।

नारद हंस कर कहा – हनुमान निराश मत होओ। चिंता मत करो। मेरे कहने से तुमने जो किया है, उसके लिए दिए जाने दण्ड से तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। तुम्हें दण्ड मिलेगा, पर तुम्हारा बाल भी बांका नहीं होगा।

मैं जैसा कहता हूँ, बस वैसा ही कल करना।

कल प्रातः काल सूर्य तट पर ‘ऊँ रां रामाय नमः ‘ इस मंत्र का जाप करते रहना। कोई कुछ कहे, तुम कुछ मत सुनना, बस यह मंत्र प्रेम-भाव से जपते रहना।

प्रातः हुई। हनुमान जी स्नान कर सरयू तट पर खड़े होकर मंत्र जाप करते। दरबार लग जाने पर जब हनुमान दरबार में उपस्थिति न हुए तो श्रीराम ने पूछा – हनुमान कहाँ है अभी तक नहीं आए ?

विश्वामित्र ने कहा – आप आज दण्ड देने वाले थे शायद इसलिए डर कर नहीं आया।

नारद ने कहा – मैंने अभी थोड़ी देर पहले सरयू तात पर उसे स्नान ध्यान करते हुए देखा है।

भगवान राम ने कहा – यह हनुमान की एक और उद्दण्डता है। हम स्वयं तात पर जाकर वहीं हनुमान को दण्डित करेंगे।

राम विश्वामित्र, ऋषियों तथा मंत्रियों के साथ सरयू तात पर हनुमान को दण्ड देने के लिए पधारे। श्रीराम अपने भक्त को बार-बार करुणा भरी दृष्टि से देखते तथा सोचते कि अपने दुर्दिन के साथी ऐसे परम् भक्त पर कैसे बाण चलाए।

उधर गुरु विश्वामित्र के कोप का डर भी उन्हें सत्ता रहा था।

गुरु की मर्यादा की रक्षा के लिए उन्होंने हनुमान को दण्ड देने का निश्चय किया। श्रीराम ने धनुष पर बाण चढ़ाए और हनुमान को लक्ष्य बनाकर बाण छोड़ दिए। अरे यह क्या ? बाण तो हनुमान जी के शरीर से कुछ दुरी पहले ही रुक गया। राम बाण पर बाण मारते रहे पर एक भी बाण हनुमान के शरीर को नहीं छुआ। उधर हनुमान राम के बाणों के प्रहार से निश्चित नारद के बताए मन्त्र का जप करते रहे।

वह मन्त्र जैसे हनुमान का कवच बन गया।

यह देखकर श्रीराम को बड़ा आश्चर्य हुआ। हनुमान में यह कैसी शक्ति आ गयी है।

उनके दण्ड का प्रयास व्यर्थ हो रहा था। विश्वामित्र को लग रहा था कि राम अपने भक्त को बचाने के लिए जानबूझ कर इस तरह बाण चला रहे हैं कि उनको चोट न पहुंचे।

अपनी इस असफलता से विचलित होकर राम ने ब्रह्मास्त्र उठा लिया।

राम ने ब्रह्मास्त्र हाथ में लिया तो हाहाकार मच गया। नारद ने कहा – ऋषिवर विश्वामित्र, हनुमान के अपराध को क्षमा करें। अगर राम का ब्रह्मास्त्र छूट गया तो सिर्फ हनुमान ही नहीं मरेंगे बल्कि सारे लोक में प्रलय मच जाएगा।

ब्रह्मास्त्र से निकली ज्वाला देखकर विश्वामित्र भी डर गए।

उन्होंने राम को रोकते हुए कहा – राम ब्रह्मास्त्र को वापस तूणीर में रखिए। हनुमान के अविनय को मैंने क्षमा किया। इतना सुनते ही हनुमान को जैसे जीवनदान मिला। राम को धर्म-संकट से मुक्ति मिली।

सब लोग प्रसन्न हुए।

हनुमान ने आकर विश्वामित्र से क्षमा मांगी और नारद जी की और देखा। नारद ने हंस कर कहा – प्रभु इसका कारण मैं हूँ। मैं कहा था ना भगवान से बढ़कर भगवान का नाम-जपना श्रेष्ठ है। उसे प्रत्यक्ष सिद्ध कर दिया।

हनुमान ने इष्ट देव भगवान राम के नाम के बीज-मन्त्र से भगवान की शक्ति क्षीण कर दी। जिस प्रभु के नाम का जप होता है, वह प्रभु अपने नाम-जाप की शक्ति के आगे शक्तिहीन हो जाते हैं।

इसलिए कहता हूँ कि नामी से नाम बड़ा। यह कहकर नारद देवलोक को चले गए।

संजय गुप्ता

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एक संन्यासी सारी दुनिया की यात्रा करके


🎡 जय श्री कृष्णा 🎡
    
एक संन्यासी सारी दुनिया की यात्रा करके भारत वापस लौटा था |

एक छोटी सी रियासत में मेहमान हुआ |

उस रियासत के राजा ने जाकर संन्यासी को कहा :-
स्वामी, एक प्रश्न बीस वर्षो से निरंतर पूछ रहा हूं | कोई उत्तर नहीं मिलता | क्या आप मुझे उत्तर देंगे ?

स्वामी ने कहा :- निश्चित दूंगा |
उस संन्यासी ने उस राजा से कहा :- नहीं, आज तुम खाली नहीं लौटोगे | पूछो |

उस राजा ने कहा :- मैं ईश्वर से मिलना चाहता हूं | ईश्वर को समझाने की कोशिश मत करना | मैं सीधा मिलना चाहता हूं |

उस संन्यासी ने कहा :- अभी मिलना चाहते हैं कि थोड़ी देर ठहर कर ?

राजा ने कहा : – माफ़ करिए, शायद आप समझे नहीं | मैं परम परमात्मा की बात कर रहा हूं, आप यह तो नहीं समझे कि किसी ईश्वर नाम वाले आदमी की बात कर रहा हूं। जो आप कहते हैं कि अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हो ?

उस संन्यासी ने कहा :- महानुभाव, भूलने की कोई गुंजाइश नहीं है | मैं तो चौबीस घंटे परमात्मा से मिलाने का धंधा ही करता हूं | अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हैं, सीधा जवाब दें |

बीस साल से मिलने को उत्सुक हो और आज वक्त आ गया तो मिल लो |

राजा ने हिम्मत की, उसने कहा :- अच्छा मैं अभी मिलना चाहता हूं मिला दीजिए |

संन्यासी ने कहा : -कृपा करो, इस छोटे से कागज पर अपना नाम पता लिख दो ताकि मैं भगवान के पास पहुंचा दूं कि आप कौन हैं |

राजा ने लिखा – अपना नाम, अपना महल, अपना परिचय, अपनी उपाधियां और उसे दीं |
वह संन्यासी बोला कि महाशय, ये सब बाते मुझे झूठ और असत्य मालूम होती हैं जो आपने कागज पर लिखीं |
उस संन्यासी ने कहा :- मित्र, अगर तुम्हारा नाम बदल दें तो क्या तुम बदल जाओगे ?
तुम्हारी चेतना, तुम्हारी सत्ता, तुम्हारा व्यक्तित्व दूसरा हो जाएगा ?

उस राजा ने कहा :- नहीं, नाम के बदलने से मैं क्यों बदलूंगा ? नाम नाम है, मैं मैं हूं |

तो संन्यासी ने कहा : -एक बात तय हो गई कि नाम तुम्हारा परिचय नहीं है, क्योंकि तुम उसके बदलने से बदलते नहीं | आज तुम राजा हो, कल गांव के भिखारी हो जाओ तो बदल जाओगे ?

उस राजा ने कहा : -नहीं, राज्य चला जाएगा, भिखारी हो जाऊंगा, लेकिन मैं क्यों बदल जाऊंगा ?
मैं तो जो हूं हूं | राजा होकर जो हूं, भिखारी होकर भी वही होऊंगा |
न होगा मकान, न होगा राज्य, न होगी धन- संपति, लेकिन मैं ? मैं तो वही रहूंगा जो मैं हूं |

तो संन्यासी ने कहा :- तय हो गई दूसरी बात कि राज्य तुम्हारा परिचय नहीं है, क्योंकि राज्य छिन जाए तो भी तुम बदलते नहीं |

संन्यासी ने कहा ::  तुम्हारी उम्र कितनी है ?

उसने कहा : – चालीस वर्ष |

संन्यासी ने कहा : -तो पचास वर्ष के होकर तुम दुसरे हो जाओगे ? बीस वर्ष या जब बच्चे थे तब दुसरे थे ?

उस राजा ने कहा :- नही | उम्र बदलती है, शरीर बदलता है लेकिन मैं ? मैं तो जो बचपन में था, जो मेरे भीतर था, वह आज भी है |

उस संन्यासी ने कहा :- फिर उम्र भी तुम्हारा परिचय न रहा, शरीर भी तुम्हारा परिचय न रहा |
फिर तुम कौन हो ? उसे लिख दो तो पहुंचा दूं भगवान के पास, नहीं तो मैं भी झूठा बनूंगा तुम्हारे साथ |
यह कोई भी परिचय तुम्हारा नहीं है|

राजा बोला :- तब तो बड़ी कठिनाई हो गई | उसे तो मैं भी नहीं जानता फिर ! जो मैं हूं, उसे तो मैं नहीं जानता ! इन्हीं को मैं जानता हूं मेरा होना I

उस संन्यासी ने कहा :- फिर बड़ी कठिनाई हो गई, क्योंकि जिसका मैं परिचय भी न दे सकूं, बता भी न सकूं कि कौन मिलना चाहता है, तो भगवान भी क्या कहेंगे कि किसको मिलना चाहता है ?

तो जाओ पहले इसको खोज लो कि तुम कौन हो |

और मैं तुमसे कहे देता हूं कि जिस दिन तुम यह जान लोगे कि तुम कौन हो, उस दिन तुम आओगे नहीं भगवान को खोजने |

क्योंकि खुद को जानने में वह भी जान लिया जाता है जो परमात्मा है I
        
             
श्री वासुदेव सर्वम
संजय गुप्ता