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मूर्तिपूजा का इतिहास, जानिए?

मूर्तिपूजकों तथा मूर्तिभंजकों के संघर्षों से इतिहास भरा पड़ा है। प्रारंभ में मूर्तिपूजकों के धर्म ही थे। मूर्तिपूजकों के धर्म के अंतर्गत ही मूर्तिभंजकों की एक धारा भी प्राचीनकाल से चली आ रही थी। मूर्तियां तीन तरह के लोगों ने बनाईं- एक वे जो वास्तु और खगोल विज्ञान के जानकार थे, तो उन्होंने तारों और नक्षत्रों के मंदिर बनाए। ऐसे दुनियाभर में सात मंदिर थे।

दूसरे वे, जो अपने पूर्वजों या प्रॉफेट के मरने के बाद उनकी याद में मूर्ति बनाते थे। तीसरे वे, जिन्होंने अपने-अपने देवता गढ़ लिए थे। हर कबीले का एक देवता होता था। कुलदेवता और कुलदेवी भी होती थी।

शोधकर्ताओं के अनुसार अरब के मक्का में पहले मूर्तियां ही रखी होती थीं। वहां उस काल में बृहस्पति, मंगल, अश्विनी कुमार, गरूड़, नृसिंह और महाराजा बलि सहित लगभग 360 मूर्तियां रखी हुई थीं। ऐसा माना जाता है हालांकि इसमें कितनी सचाई है यह हम नहीं जानते कि जाट और गुर्जर इतिहास अनुसार तुर्किस्तान पहले नागवंशियों का गढ़ था। यहां नागपूजा का प्रचलन था।

भारत में वैसे तो मूर्तिपूजा का प्रचलन पूर्व आर्य काल (वैदिक काल) से ही रहा है। भगवान कृष्ण के काल में नाग, यक्ष, इन्द्र आदि की पूजा की जाती थी। वैदिक काल के पतन और अनीश्वरवादी धर्म के उत्थान के बाद मूर्तिपूजा का प्रचलन बढ़ गया।

वेद काल में न तो मंदिर थे और न ही मूर्ति, क्योंकि इसका इतिहास में कोई साक्ष्य नहीं मिलता। इन्द्र और वरुण आदि देवताओं की चर्चा जरूर होती है, लेकिन उनकी मूर्तियां थीं इसके भी साक्ष्य नहीं मिलते हैं।

भगवान कृष्ण के काल में लोग इन्द्र नामक देवता से जरूर डरते थे। भगवान कृष्ण ने ही उक्त देवी-देवताओं के डर को लोगों के मन से निकाला था। इसके अलावा हड़प्पा काल में देवताओं (पशुपति-शिव) की मूर्ति का साक्ष्य मिला है, लेकिन निश्चित ही यह आर्य और अनार्य का मामला रहा होगा।

प्राचीन अवैदिक मानव पहले आकाश, समुद्र, पहाड़, बादल, बारिश, तूफान, जल, अग्नि, वायु, नाग, सिंह आदि प्राकृतिक शक्तियों की शक्ति से परिचित था और वह जानता था कि यह मानव शक्ति से कहीं ज्यादा शक्तिशाली है इसलिए वह इनकी प्रार्थना करता था। बाद में धीरे-धीरे इसमें बदलाव आने लगा। वह मानने लगा कि कोई एक ऐसी शक्ति है, जो इन सभी को संचालित करती है। वेदों में सभी तरह की प्राकृतिक शक्तियों का खुलासा कर उनके महत्व का गुणागान किया गया है। हालांकि वेदों का केंद्रीय दर्शन ‘ब्रह्म’ ही है।

पूर्व वैदिक काल में वैदिक समाज जन इकट्ठा होकर एक ही वेदी पर खड़े रहकर ब्रह्म (ईश्वर) के प्रति अपना समर्पण भाव व्यक्त करते थे। वे यज्ञ द्वारा भी ईश्वर और प्रकृति तत्वों का आह्वान और प्रार्थना करते थे। बाद में धीरे-धीरे लोग वेदों का गलत अर्थ निकालने लगे। हिन्दू धर्म मूलत: अद्वैतवाद और एकेश्वरवाद का समर्थक है जिसका मूल ऋग्वेद, उपनिषद और गीता में मिलता है। अथर्ववेद की रचना के बाद हिन्दू समाज में दो फाड़ हो गई- ऋग-यजु और साम-अथर्व।

इस तरह वेदों में ईश्वर उपासना के दो रूप प्रचलित हो गए- साकार तथा निराकार। निराकारवादी प्रायः साकार उपासना या मूर्तिपूजा का विरोध करते हैं, पर वे यह भूल जाते हैं कि ऋषि-मनीषियों ने दोनों उपासना पद्धतियों का निर्माण मनुष्य के बौद्धिक स्तर की अनुकूलता के अनुरूप किया था।

शिवलिंग की पूजा का प्रचलन अथर्व और पुराणों की देन है। शिवलिंग पूजन के बाद धीरे-धीरे नाग और यक्षों की पूजा का प्रचलन हिन्दू-जैन धर्म में बढ़ने लगा। बौद्धकाल में बुद्ध और महावीर की मूर्ति‍यों को अपार जन-समर्थन मि‍लने के कारण विष्णु, राम और कृष्ण की मूर्तियां बनाई जाने लगीं।

मान्यता के अनुसार महाभारत काल तक अर्थात द्वापर युग के अंत तक देवी और देवता धरती पर ही रहते थे और वे भक्तों के समक्ष कभी भी प्रकट हो जाते थे। तब उनके साक्षात रूप की पूजा या प्रार्थना होती थी। लेकिन कलयुग के प्रारंभ होने के बाद उनके विग्रह रूप की पूजा होने लगी। विग्रह रूप अर्थात शिवलिंग, शालिग्राम, जल, अग्नि, वायु, आकाश और वृक्ष रूप आदि की।

अब सवाल यह उठता है कि हिन्दू धर्म के धर्मग्रंथ वेद, उपनिषद और गीता भी मूर्ति पूजा को नहीं मानते हैं तो हिन्दू क्यों मूर्ति या पत्थर की पूजा करते हैं और इस पूजा का प्रचलन आखिर कैसे, क्यूं और कब हुआ?

भारत में जो लोग अनीश्वरवादी थे, वे निराकार ईश्‍वर को नहीं मानते थे। उन्होंने अपने प्रॉफेटों, पूर्वजों आदि की मूर्तियां बनाकर उन्हें पूजना आरंभ कर दिया। इन अनीश्वरवादियों में जैन, चार्वाक, न्यायवादी आदि धर्म के लोग थे।

महावीर स्वामी और बुद्ध के जाने के बाद मूर्तिपूजा का प्रचलन बढ़ा और हजारों की संख्या में संपूर्ण देश में जैन और बौद्ध मंदिर बनने लगे। जिसमें बुद्ध और महावीर की मूर्तियां रखकर उनकी पूजा होने लगी। इन मंदिरों में हिन्दू भी बड़ी संख्या में जाने लगा जिसके चलते बाद में राम और कृष्ण के मंदिर बनाए जाने लगे और इस तरह भारत में मूर्ति आधारित मंदिरों का विस्तार हुआ।

मूर्तिपूजा का पक्ष : मूर्तिपूजा के समर्थक कहते हैं कि ईश्वर तक पहुंचने में मूर्तिपूजा रास्ते को सरल बनाती है। मन की एकाग्रता और चित्त को स्थिर करने में मूर्ति की पूजा से सहायता मिलती है। मूर्ति को आराध्य मानकर उसकी उपासना करने और फूल आदि अर्पित करने से मन में विश्वास और खुशी का अहसास होता है। इस विश्वास और खुशी के कारण ही मनोकामना की पूर्ति होती है। विश्वास और श्रद्धा ही जीवन में सफलता का आधार है।

प्राचीन मंदिर ध्यान या प्रार्थना के लिए होते थे। उन मंदिरों के स्तंभों या दीवारों पर ही मूर्तियां आवेष्टित की जाती थीं। मंदिरों में पूजा-पाठ नहीं होता था। यदि आप खजुराहो, कोणार्क या दक्षिण के प्राचीन मंदिरों की रचना देखेंगे तो जान जाएंगे कि ये मंदिर किस तरह के होते हैं।

ध्यान या प्रार्थना करने वाली पूरी जमात जब खत्म हो गई है तो इन जैसे मंदिरों पर पूजा-पाठ का प्रचलन बढ़ा। पूजा-पाठ के प्रचलन से मध्यकाल के अंत में मनमाने मंदिर बने। मनमाने मंदिर से मनमानी पूजा-आरती आदि कर्मकांडों का जन्म हुआ, जो वेदसम्मत नहीं माने जा सकते।

मूर्तिपूजा के पक्ष में  हैं- ‘जड़ (मूल) ही सबका आधार हुआ करती है। जड़ सेवा के बिना किसी का भी कार्य नहीं चलता। दूसरे की आत्मा की प्रसन्नतापूर्वक उसके आधारभूत जड़ शरीर एवं उसके अंगों की सेवा करनी पड़ती है।

परमात्मा की उपासना के लिए भी उसके आश्रय स्वरूप जड़ प्रकृति की पूजा करनी पड़ती है। हम वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, प्रकाश आदि की उपासना में प्रचुर लाभ उठाते हैं, तब मूर्तिपूजा से क्यों घबराना चाहिए? उसके द्वारा तो आप अणु-अणु में व्याप्त चेतन (सच्चिदानंद) की पूजा कर रहे होते हैं।

आप जिस बुद्धि को या मन को आधारभूत करके परमात्मा का अध्ययन कर रहे होते हैं, क्यों वे जड़ नहीं हैं? परमात्मा भी जड़ प्रकृति के बिना कुछ नहीं कर सकता, सृष्टि भी नहीं रच सकता। तब सिद्ध हुआ कि जड़ और चेतन का परस्पर संबंध है। तब परमात्मा भी किसी मूर्ति के बिना उपास्य कैसे हो सकता है?

वैसे तो पूरा विश्व ही मूर्तिपूजक है। पंचभूतों से निर्मित किसी आकार पर श्रद्धा स्थिर करना मूर्तिपूजा है। मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा, पुस्तक, आकाश इत्यादि सभी मूर्तिपूजा के अंतर्गत हैं। कौन मूर्तिपूजक नहीं है?

यह एक निर्विवाद सत्य है कि भारत में सबसे अधिक मूर्तियां हैं, मंदिर हैं; किंतु भारत मूर्तिपूजक नहीं है। ये मंदिर, मूर्तियां आध्यात्मिक देश भारत में अध्यात्म की शिशु कक्षाएं हैं।

मारकंडेय पुराण में वर्णित कथानक ही देवी मृतिका मूर्ति पूजा का आधार है। परब्रह्म परमात्मा सर्वविश्व में निहित है। इसलिए मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा कर मूर्ति का प्रचलन अनादि काल से चला आ रहा है। वेदों की ऋचाओं में जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि, आकाश में निहित प्राण सत्ता में ईश्वरीय सत्ता की अभिव्यक्ति है। पौराणिक युग में इसे विग्रह के रूप में स्थापित कर पूजन प्रारंभ हुआ।

मारकंडेय पुराण के अनुसार राजा और वैश्य जो महामोह से ग्रसित थे, देवी की मूर्ति बनाकर आराधना करने लगे। राजा को राज्य व वैश्य को ज्ञान की प्राप्ति हुई। इस प्रकार वह देवी लौकिक व पारलौकि दोनों अभिष्टों को प्रदान करने वाली मानी गई।

Sanjay Gupta

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एक कहानी जो आपके जीवन से जुडी है ।
ध्यान से अवश्य पढ़ें–👇

एक अतिश्रेष्ठ व्यक्ति थे , एक दिन उनके पास एक निर्धन आदमी आया और बोला की मुझे अपना खेत कुछ साल के लिये उधार दे दीजिये ,मैं उसमे खेती करूँगा और खेती करके कमाई करूँगा,

वह अतिश्रेष्ठ व्यक्ति बहुत दयालु थे
उन्होंने उस निर्धन व्यक्ति को अपना खेत दे दिया और साथ में पांच किसान भी सहायता के रूप में खेती करने को दिये और कहा की इन पांच  किसानों को साथ में लेकर खेती करो, खेती करने में आसानी होगी,
इस से तुम और अच्छी फसल की खेती करके कमाई कर पाओगे।
वो निर्धन आदमी ये देख के बहुत खुश हुआ की उसको उधार में खेत भी मिल गया और साथ में पांच सहायक किसान भी मिल गये।

लेकिन वो आदमी अपनी इस ख़ुशी में बहुत खो गया, और वह पांच किसान अपनी मर्ज़ी से खेती करने लगे और वह निर्धन आदमी अपनी ख़ुशी में डूबा रहा,  और जब फसल काटने का समय आया तो देखा की फसल बहुत ही ख़राब  हुई थी , उन पांच किसानो ने खेत का उपयोग अच्छे से नहीं किया था न ही अच्छे बीज डाले ,जिससे फसल अच्छी हो सके |

जब वह अतिश्रेष्ठ दयालु व्यक्ति ने अपना खेत वापस माँगा तो वह निर्धन व्यक्ति रोता हुआ बोला की मैं बर्बाद हो गया , मैं अपनी ख़ुशी में डूबा रहा और इन पांच किसानो को नियंत्रण में न रख सका न ही इनसे अच्छी खेती करवा सका।

अब यहाँ ध्यान दीजियेगा-

वह अतिश्रेष्ठ दयालु व्यक्ति हैं -” भगवान”

निर्धन व्यक्ति हैं -“हम”

खेत है -“हमारा शरीर”

पांच किसान हैं हमारी इन्द्रियां–आँख,कान,नाक,जीभ और मन |

प्रभु ने हमें यह शरीर रुपी खेत अच्छी फसल(कर्म) करने को दिया है और हमें इन पांच किसानो को अर्थात इन्द्रियों को अपने नियंत्रण में रख कर कर्म करने चाहियें ,जिससे जब वो दयालु प्रभु जब ये शरीर वापस मांग कर हिसाब करें तो हमें रोना न पड़े।

इस ज्ञान को अपने जीवन में लगायें।।
🙏🌹Jai shree Krishna ji 🌹🙏
Shubh ratri..

Biba sinha

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प्रिय मित्रो!प्रेम

🌿🌿🌿एक सूफी कहानी है। एक फकीर एक वृक्ष के नीचे ध्यान करता है। रोज एक लकड़हारे को लकड़ी काटते ले जाते देखता है। एक दिन उससे कहा कि सुन भाई, दिन— भर लकड़ी काटता है, दो जून रोटी भी नहीं जुट पाती। तू जरा आगे क्यों नहीं जाता : वहां आगे चंदन का जंगल है। एक दिन काट लेगा, सात दिन के खाने के लिए काफी हो जाएगा।

गरीब लकड़हारे को भरोसा तो नहीं आया, क्योंकि वह तो सोचता था कि जंगल को जितना वह जानता है और कौन जानता है! जंगल में ही तो जिंदगी बीती। लकड़ियां काटते ही तो जिंदगी बीती। यह फकीर यहां बैठा रहता है वृक्ष के नीचे, इसको क्या खाक पता होगा?  मानने का मन तो न हुआ, लेकिन फिर सोचा कि हर्ज क्या है, कौन जाने ठीक ही कहता हो!  फिर झूठ कहेगा भी क्यों?  शांत आदमी मालूम पड़ता है, मस्त आदमी मालूम पड़ता है। कभी बोला भी नहीं इसके पहले। एक बार प्रयोग करके देख लेना जरूरी है।
तो गया। लौटा फकीर के चरणों में सिर रखा और कहा कि मुझे क्षमा करना, मेरे मन में बड़ा संदेह आया था, क्योंकि मैं तो सोचता था कि मुझसे ज्यादा लकड़ियां कौन जानता है। मगर मुझे चंदन की पहचान ही न थी। मेरा बाप भी लकड़हारा था, उसका बाप भी लकड़हारा था। हम यही काटने की, जलाऊ—लकड़ियां काटते—काटते जिंदगी बिताते रहे, हमें चंदन का पता भी क्या, चंदन की पहचान क्या! हमें तो चंदन मिल भी जाता तो भी हम काटकर बेच आते उसे बाजार में ऐसे ही। तुमने पहचान बताई, तुमने गंध जतलाई, तुमने परख दी। जरूर जंगल है।  मैं भी कैसा अभागा !  काश, पहले पता चल जाता ! फकीर ने कहा कोई फिक्र न करो, जब पता चला तभी जल्दी है। जब घर आ गए तभी सबेरा है। दिन बड़े मजे में कटने लगे। एक दिन काट लेता, सात— आठ दिन, दस दिन जंगल आने की जरूरत ही न रहती। एक दिन फकीर ने कहा; मेरे भाई, मैं सोचता था कि तुम्हें कुछ अक्ल आएगी। जिंदगी— भर तुम लकड़ियां काटते रहे, आगे न गए;  तुम्हें कभी यह सवाल नहीं उठा कि इस चंदन के आगे भी कुछ हो सकता है? उसने कहा;  यह तो मुझे सवाल ही न आया।  क्या चंदन के आगे भी कुछ है?  उस फकीर ने कहा : चंदन के जरा आगे जाओ तो वहां चांदी की खदान है।  लकडिया—वकडिया काटना छोड़ो।  एक दिन ले आओगे, दो—चार छ: महीने के लिए हो गया।

अब तो भरोसा आया था। भागा।  संदेह भी न उठाया। चांदी पर हाथ लग गए, तो कहना ही क्या !  चांदी ही चांदी थी ! चार—छ: महीने नदारद हो जाता। एक दिन आ जाता, फिर नदारद हो जाता। लेकिन आदमी का मन ऐसा मूढ़ है कि फिर भी उसे खयाल न आया कि और आगे कुछ हो सकता है। फकीर ने एक दिन कहा कि तुम कभी जागोगे कि नहीं, कि मुझी को तुम्हें जगाना पड़ेगा। आगे सोने की खदान है मूर्ख! तुझे खुद अपनी तरफ से सवाल, जिज्ञासा, मुमुक्षा कुछ नहीं उठती कि जरा और आगे देख लूं? अब छह महीने मस्त पड़ा रहता है, घर में कुछ काम भी नहीं है, फुरसत है। जरा जंगल में आगे देखकर देखूं यह खयाल में नहीं आता?

उसने कहा कि मैं भी मंदभागी, मुझे यह खयाल ही न आया, मैं तो समझा चांदी, बस आखिरी बात हो गई, अब और क्या होगा? गरीब ने सोना तो कभी देखा न था, सुना था। फकीर ने कहा : थोड़ा और आगे सोने की खदान है। और ऐसे कहानी चलती है। फिर और आगे हीरों की खदान है। और ऐसे कहानी चलती है। और एक दिन फकीर ने कहा कि नासमझ, अब तू हीरों पर ही रुक गया? अब तो उस लकड़हारे को भी बडी अकड़ आ गई, बड़ा धनी भी हो गया था, महल खड़े कर लिए थे। उसने कहा अब छोड़ो, अब तुम मुझे परेशांन न करो। अब हीरों के आगे क्या हो सकता है?

उस फकीर ने कहा. हीरों के आगे मैं हूं। तुझे यह कभी खयाल नहीं आया कि यह आदमी मस्त यहां बैठा है, जिसे पता है हीरों की खदान का, वह हीरे नहीं भर रहा है, इसको जरूर कुछ और आगे मिल गया होगा! हीरों से भी आगे इसके पास कुछ होगा, तुझे कभी यह सवाल नहीं उठा?

रोने लगा वह आदमी। सिर पटक दिया चरणों पर। कहा कि मैं कैसा मूढ़ हूं मुझे यह सवाल ही नहीं आता। तुम जब बताते हो, तब मुझे याद आता है। यह तो मेरे जन्मों—जन्मों में नहीं आ सकता था खयाल कि तुम्हारे पास हीरों से भी बड़ा कोई धन है। फकीर ने कहा : उसी धन का नाम ध्यान है। अब खूब तेरे पास धन है, अब धन की कोई जरूरत नहीं। अब जरा अपने भीतर की खदान खोद, जो सबसे आगे है।

यही मैं तुमसे कहता हूं : और आगे, और आगे। चलते ही जाना है। उस समय तक मत रुकना जब तक कि सारे अनुभव शांत न हो जाएं। परमात्मा का अनुभव भी जब तक होता रहे, समझना दुई मौजूद है, द्वैत मौजूद है, देखनेवाला और दृश्य मौजूद है। जब वह अनुभव भी चला जाता है तब निर्विकल्प समाधि। तब सिर्फ दृश्य नहीं बचा, न द्रष्टा बचा, कोई भी नहीं बचा। एक सन्नाटा है, एक शून्य है। और उस शून्य में जलता है बोध का दीया। बस बोधमात्र, चिन्मात्र! वही परम है। वही परम—दशा है, वही समाधि है।

ओशो♣️

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बहलोल खान #अकबर का बड़ा सिपहसालार था।नाश्ते में एक बकरा खा लेता था, दो शराब पिये मदमस्त लड़ते हाथियों के बीच घुस कर सूंडे पकड़ कर धकेल देता था इतना बलवान था।
महाराणा प्रताप से युद्ध करने कोई जाना नहीं चाहता ,
जो जावे गुरिल्ला रणनीति के आगे मारा जावे।
अकबर ने दरबार में बीड़ा फेरा राणा को जिंदा ,मुर्दा पकड़ लाने का ।
और तो किसी ने उठाया नही,इस बहादुर ने उठा लिया !बड़ी वाहवाही हुई।लेकिन इसके मन में भय था ।
घर गया ,अपनी सारी बेगमों की हत्या कर दी।पता नहीं वापस लौटूं न लौटूं ? इन्हे कोई दूसरे भोगेंगे बस इसी लिये सबको मार डाला।
आ गया मेवाड़ में …महाराणा के गुप्तचरों ने खबर दी,
दायें बायें होने की सलाह दी।
महाराणा ने सामान्यभाव में कह दिया कि” देखस्यां”..
माने आने दो देखेंगे।

आखिर सामना हो गया।#महाराणा के एक ही वार ने बहलोल खान को उसके शिरस्त्राण,बख्तरबंद,घोड़ा,उसके रक्षाकवच सहित दो फाड़ कर दिया।
ऐसे महावीर थे महाराणा।अकबर तो कभी युद्ध करने आया ही नहीं, सलीम एकबार सामने पड़ा तो मरते मरते बचा।
प्रभू श्रीराम ने 14 वर्ष वनवास भोगा, महाराणा ने पच्चीस वर्ष का वनवास भोगा।
घोड़े की पीठ पर कितनी रातें गुजारी..जैसा तैसा पीठ पर ही मिला
सो खाया नहीं खाया।लेकिन स्वतंत्रता की अलख जगाये रहे।
पूरे भारत को दबा देने वाले आततायी की नाक में दम बनाके रख दिया।
अन्ततः मेवाड़ को आज़ाद करवा लिया ।
और इन हरामी #वामपंथी_इतिहासकारों के लिये ये महावीर महान नहीं, धूर्त आततायी, विदेशी हमलावर अकबर महान हुआ???
शर्म भी तो इन्हें छूती नहीं है कमीनो को !
Chandan dube

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शिकागो धर्मसभा में जहाँ सभी विद्वान् दुनिया भर के चोटी के विद्वानों, वैज्ञानिकों और चिंतकों की उक्तियों के साथ अपने उद्बोधन दे रहे थे वहीं
जब आप स्वामी विवेकानंद द्वारा उस धर्म-सम्मेलन में दिए गये भाषण को पढ़ेंगे तो आपको दिखेगा कि अपने पूरे भाषण में उन्होंने किसी आधुनिक वैज्ञानिक, आधुनिक चिंतन का जिक्र नहीं किया, किसी पश्चिम के बड़े विद्वान्, किसी मानवतावादी, किसी नारी-मुक्ति का लट्ठ भांजने वाले का भी जिक्र नहीं किया, मज़े की बात ये भी है कि जिनके प्रेरणा से स्वामी विवेकानंद वहां बोल रहे थे वो उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस उन अर्थों में अनपढ़ थे जिन अर्थों में आज साक्षरता को लिया जाता है. वहां सवामी जी जितना बोले वो केवल वही था जो हमारे बचपन में हमारी दादी-नानी और माँ हमें किस्से-कहानियों के रूप में सुनाती थी यानि राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर की कहानियां और हमारे उपनिषदों और पुराणों से ली गई बातें.

क्या पढ़ा था रामकृष्ण परमहंस ने और क्या कह रहे थे वहां विवेकानंद , केवल वही जिसे मिथक कहकर प्रगतिशील लोग खिल्ली उड़ाते हैं, वहीँ  जिसकी प्रमाणिकता को लेकर हम खुद शंकित रहते हैं और वही जिसे गप्प कहकर हमारे पाठ्यक्रमों से बाहर कर दिया गया पर इन्हीं बातों को शिकागो धर्मसभा में रखने वाले विवेकानंद को सबसे अधिक तालियाँ मिली, बेपनाह प्यार मिला और सारी दुनिया में भारत और हिन्दू धर्म का डंका बज गया. 

अपने ग्रन्थ, अपनी विरासत, अपने पूर्वज और अपने अतीत पर गर्व कीजिये. आधुनिक और रोजगारपरक शिक्षा के साथ-साथ अपने बच्चों को राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर की कहानियाँ सुनाइए..उपनिषद, रामायण, महाभारत और पुराणों की बातें बताइए फिर देखिए उसकी मानसिक चेतना और उत्थान किस स्तर तक  पहुँचता है.

ये घटना विश्व-विख्यात ‘शिकागो धर्म सम्मलेन’ के बाद का है जब स्वामी विवेकानंद अमेरिका में थे.  एक बार किसी रेलवे स्टेशन से उतरने के दौरान एक नीग्रो कुली जल्दी से उनके पास आया है हाथ मिलाकर कहने लगा- बधाई हो ! मुझे बड़ी ख़ुशी है कि मेरी जाति का एक व्यक्ति इतना सम्मानित किया गया है. इस देश के सारे नीग्रो लोगों को आप पर गर्व है. स्वामी जी ने बड़े उत्साह से उससे हाथ मिलाया और कहा- धन्यवाद बंधु, धन्यवाद बंधु. उन्होंने वहां किसी को भी ये जाहिर न होने दिया कि वो कोई नीग्रो नहीं बल्कि भारतवासी हैं.

इसी तरह कई बार उन्हें अमेरिकी होटलों  में नीग्रो होने के संदेह में घुसने नहीं दिया गया तब भी उन्होंने नहीं कहा कि वो नीग्रो नहीं हैं. उनके किसी अमेरिकी शिष्य ने इन घटनाओं पर उनसे पूछा कि आपने उन्हें बताया क्यूँ नहीं बताया कि आप नीग्रो नहीं हैं?

स्वामी जी का जबाब था, किसी दूसरे की कीमत पर क्या बड़ा बनना. इस हेतू मैं धरती पर नहीं आया. उन्होंने आगे कहा, ये नीग्रो भी इन्सान है जिनके रंग के कारण अमेरिकी उनसे घृणा करते हैं, अगर वो नीग्रो मुझे नीग्रो समझते हैं तो मेरे लिए ये गर्व की बात है क्योंकि अगर इससे उनमें स्वाभिमान भाव जागृत होता है तो मेरा उद्देश्य सफल हो जाता है.

इंडोनेशिया दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में स्थित एक देश है जो करीब सत्रह हज़ार द्वीपों का समूह है. इस देश में आज दुनिया की सबसे अधिक मुस्लिम आबादी निवास करती है. भारत की तरह ही यह देश भी तकरीबन साढ़े तीन सौ साल से अधिक समय तक डचों के अधीन थी, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसे डचों से आजादी मिली. डचों से आजादी के लिये इण्डोनेशियाई लोगों के संघर्ष के दौरान एक बड़ी रोचक घटना हुई. इंडोनेशिया के कई द्वीपों को आजादी मिल गई थी पर एक द्वीप पर डच अपना कब्जा छोड़ने को तैयार नहीं थे. डचों का कहना था कि इंडोनेशिया इस बात का कोई प्रमाण नहीं दे पाया है कि यह द्वीप कभी उसका हिस्सा रहा है, इसलिये हम उसे छोड़ नहीं सकते. जब डचों के तरफ से ये बात उठी तो इंडोनेशिया यह मामला लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ चला गया. संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इंडोनेशिया को सबूत पेश करने को कहा तो इंडो लोग अपने यहाँ की प्रचलित रामकथा के दस्तावेज लेकर वहां पहुँच गये और कहा कि जब सीता माता की खोज करने के लिये वानरराज सुग्रीव ने हर दिशा में अपने दूत भेजे थे तो उनके कुछ दूत माता की खोज करते-करते हमारे इस द्वीप तक भी पहुंचे थे पर चूँकि वानरराज का आदेश था कि माता का खोज न कर सकने वाले वापस लौट कर नहीं आ सकते तो जो दूत यहाँ इस द्वीप पर आये थे वो यहीं बस गए और उनकी ही संताने इन द्वीपों पर आज आबाद है और हम उनके वंशज है. बाद में उन्हीं दस्तावेजों को मान्यता देते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने वो द्वीप इंडोनेशिया को सौंप दिया.

इसका अर्थ ये है कि हिन्दू संस्कृति के चिन्ह विश्व के हर भूभाग में मिलते हैं और इन चिन्हों में साम्यता ये है कि श्रीराम इसमें हर जगह हैं. भारत के सुदुर पूर्व में बसे जावा, सुमात्रा, मलेशिया और इंडोनेशिया हो या दक्षिण में बसा श्रीलंका या फिर चीन, मंगोलिया या फिर मध्य-पूर्व के देशों के साथ-साथ अरब-प्रायद्वीप के देश, राम नाम और रामकथा का व्याप किसी न किसी रूप में हर जगह है. अमेरिका और योरोप की माया, इंका या आयर सभ्यताओं में भी राम हैं तो मिश्री लोककथायें भी राम और रामकथा से भरी पड़ी हैं. इटली, तुर्की, साइप्रस और न जिनके कितने देश हैं जहाँ राम-कथा आज भी किसी न किसी रूप में सुनी और सुनाई जाती है.
भारतीय संस्कृति के विश्व-संचार का सबसे बड़ा कारण राम हैं. राम विष्णु के ऐसे प्रथम अवतार थे जिनके जीवन-वृत को कलम-बद्ध किया गया ताकि दुनिया उनके इस धराधाम को छोड़ने के बाद भी उनके द्वारा स्थापित आदर्शों से विरत न हो और मानव-जीवन, समाज-जीवन और राष्ट्र-जीवन के हरेक पहलू पर दिशा-दर्शन देने वाला ग्रन्थ मानव-जाति के पास उपलब्ध रहे. इसलिये हरेक ने अपने समाज को राम से जोड़े रखा.
आज दुनिया के देशों में भारत को बुद्ध का देश तो कहा जाता है पर राम का देश कहने से लोग बचते हैं. दलील है कि बुद्ध दुनिया के देशों को भारत से जोड़ने का माध्यम हैं पर सच ये है कि दुनिया में बुद्ध से अधिक व्याप राम का और रामकथा का है. भगवान बुद्ध तो बहुत बाद के कालखंड में अवतरित हुए पर उनसे काफी पहले से दुनिया को श्रीराम का नाम और उनकी पावन रामकथा ने परस्पर जोड़े रखा था और चूँकि भारत-भूमि को श्रीराम अवतरण का सौभाग्य प्राप्त था इसलिये भारत उनके लिये पुण्य-भूमि थी. राम भारत भूमि को उत्तर से दक्षिण तक एक करने के कारण राष्ट्र-नायक भी हैं.

” भारत को दुनिया में जितना सम्मान राम और रामकथा ने दिलवाया है, इतिहास में उनके सिवा और कौन दूसरा है जो इस गौरव का शतांश हासिल करने योग्य भी है ? ”

आज जो लोग राम को छोड़कर भारत को विश्वगुरु बनाने का स्वप्न संजोये बैठे हैं उनसे सीधा प्रश्न है राम के बिना कैसा भारत और कैसी गुरुता ? राम को छोड़कर किस आदर्श-राज्य की बात ? राम की अयोध्या को पददलित और उपेक्षित कर भारत के कल्याण की कैसी कामना ? राम का नाम छोड़कर वंचितों और वनवासियों के उद्धार का कैसा स्वप्न ?

~ अभिजीत

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बालीवुड‬ और टीवी सीरियल के नजरिए से ‪हिन्दू‬ को कैसे देखा जाता है एक झलक:—-

ब्राह्मण – ढोंगी पंडित, लुटेरा,

‪राजपूत – अक्खड़, मुच्छड़, क्रूर, बलात्कारी

वैश्य या साहूकार – लोभी, कंजूस,

गरीब हिन्दू दलित – कुछ पैसो या शराब की लालच में बेटी को बेच देने वाला चाचा या झूठी गवाही देने वाला

सिक्ख– जोकर आदि बनाकर मजाक उड़ाना

जाट खाप पंचायत का अड़ियल बेटी और बेटे के प्यार का विरोध करने वाला और महिलाओ पर अत्याचार करने वाला

जबकि दूसरी तरफ

मुस्लिम – अल्लाह का नेक बन्दा, नमाजी, साहसी, वचनबद्ध, हीरो-हीरोइन की मदद करने वाला टिपिकल रहीम चाचा या पठान।

ईसाई – जीसस जैसा प्रेम, अपनत्व, हर बात पर क्रॉस बना कर प्रार्थना करते रहना।

ये बॉलीवुड इंडस्ट्री, सिर्फ हमारे धर्म, समाज और संस्कृति पर घात करने का सुनियोजित षड्यंत्र है और वह भी हमारे ही धन से ।

हम हिन्दू और सिक्ख अव्वल दर्जे के CARTOON बन चुके हैं।

क्योकि ये कभी वीर हिन्दू पुत्रों महाराणा प्रताप, गुरु गोविन्द सिंह गुरु तेग बहादुर
चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक,
विक्रमादित्य,  वीर शिवाजी संभाजी राणा साँगा, पृथ्वीराज की कहानी नही बता सकते।

कभी गहराई से विचार कीजियेगा…!!

अगर यही बॉलीवुड देश की संस्कृति सभ्यता दिखाए ..
तो सत्य मानिये हमारी युवा पीढ़ी  अपने रास्ते से कभी नही भटकेगी…

समझिये ..जानिए और
आगे बढिए…

ये संदेश उन हिन्दू  छोकरों के लिए है जो फिल्म देखने के बाद गले में क्रोस मुल्ले जैसी छोटी सी दाड़ी रख कर
खुद को मॉडर्न समझते हैं

हिन्दू नौजवानौं के रगो में धीमा जहर  भरा जा रहा है

फिल्म जेहाद
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सलीम – जावेद की जोड़ी की लिखी हुई फिल्मो को देखे, तो उसमे आपको अक्सर बहुत ही चालाकी से हिन्दू धर्म का मजाक तथा मुस्लिम / इसाई / साईं बाबा को महान दिखाया जाता मिलेगा.

इनकी लगभग हर फिल्म में एक महान मुस्लिम चरित्र अवश्य होता है और हिन्दू मंदिर का मजाक तथा संत के रूप में पाखंडी ठग देखने को मिलते है.

फिल्म “शोले” में धर्मेन्द्र भगवान् शिव की आड़ लेकर “हेमामालिनी” को प्रेमजाल में फंसाना चाहता है जो यह साबित करता है कि – मंदिर में लोग लडकियां छेड़ने जाते है. इसी फिल्म में ए. के. हंगल इतना पक्का नमाजी है कि – बेटे की लाश को छोड़कर, यह कहकर नमाज पढने चल देता है.कि- उसे और बेटे क्यों नहीं दिए कुर्बान होने के लिए.

“दीवार” का अमिताभ बच्चन नास्तिक है और वो भगवान् का प्रसाद तक नहीं खाना चाहता है, लेकिन 786 लिखे हुए बिल्ले को हमेशा अपनी जेब में रखता है और वो बिल्ला भी बार बार अमिताभ बच्चन की जान बचाता है.

“जंजीर” में भी अमिताभ नास्तिक है और जया भगवान से नाराज होकर गाना गाती है लेकिन शेरखान एक सच्चा इंसान है.

फिल्म “शान” में अमिताभ बच्चन और शशिकपूर साधू के वेश में जनता को ठगते है लेकिन इसी फिल्म में “अब्दुल” जैसा सच्चा इंसान है जो सच्चाई के लिए जान दे देता है.

फिल्म “क्रान्ति” में माता का भजन करने वाला राजा (प्रदीप कुमार) गद्दार है और करीमखान (शत्रुघ्न सिन्हा) एक महान देशभक्त, जो देश के लिए अपनी जान दे देता है.

अमर-अकबर-अन्थोनी में तीनो बच्चो का बाप किशनलाल एक खूनी स्मग्लर है लेकिन उनके बच्चों अकबर और अन्थोनी को पालने वाले मुस्लिम और ईसाई महान इंसान है. साईं बाबा का महिमामंडन भी इसी फिल्म के बाद शुरू हुआ था.

फिल्म “हाथ की सफाई” में चोरी – ठगी को महिमामंडित करने वाली प्रार्थना भी आपको याद ही होगी.

कुल मिलाकर आपको इनकी फिल्म में हिन्दू नास्तिक मिलेगा या धर्म का उपहास करता हुआ कोई कारनामा दिखेगा और इसके साथ साथ आपको शेरखान पठान, DSP डिसूजा, अब्दुल, पादरी, माइकल, डेबिड, आदि जैसे आदर्श चरित्र देखने को मिलेंगे. हो सकता है आपने पहले कभी इस पर ध्यान न दिया हो लेकिन अबकी बार ज़रा ध्यान से देखना.

केवल सलीम / जावेद की ही नहीं बल्कि कादर खान, कैफ़ी आजमी, महेश भट्ट, आदि की फिल्मो का भी यही हाल है.  फिल्म इंडस्ट्री पर दाउद जैसों का नियंत्रण रहा है.

इसमें अक्सर अपराधियों का महिमामंडन किया जाता है और पंडित को धूर्त, ठाकुर को जालिम, बनिए को सूदखोर, सरदार को मूर्ख कामेडियन, आदि ही दिखाया जाता है.

“फरहान अख्तर” की फिल्म “भाग मिल्खा भाग”  में “हवन करेंगे” का आखिर क्या मतलब था ?

“pk” में भगवान् का रोंग नंबर बताने वाले आमिर खान क्या कभी अल्ला के रोंग नंबर 786 पर भी  कोई फिल्म बनायेंगे ?

मेरा मानना है कि – यह सब महज इत्तेफाक नहीं है बल्कि सोची समझी साजिश है एक चाल है ।

यदि सहमत हों तो सर्वत्र फैलायै

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स्वर्ग से राजा नहुष का पतन


!!!—: स्वर्ग से राजा नहुष का पतन :—!!!

आज की यह प्रसिद्ध कथा आप महाभारत के अध्याय 11 से 17 में पढ सकते हैं ।
इस कथा की शिक्षा है—अहंकार पतन का मूल कारण है , सदाचार धर्म का पालन भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है ।
कथा इस प्रकार हैः—
देवताओं के राजा देवेन्द्र विभिन्न युद्धों से उद्विग्न हो गए । वे इससे शान्ति पाना चाहते थे । अतः वे बिना किसी को बताए वन में स्वाध्याय और सन्ध्या के लिए चले गए ।
सम्पूर्ण संसार में इन्द्र के बिना अराजकता फैल गई । देवता तथा देवर्षि भी सोचने लगे कि अब हमारा राजा कौन होगा । देवताओं में से कोई भी देवता देवेन्द्र बनने का विचार नहीं कर रहा था ।
यह देखकर ऋषियों और सम्पूर्ण देवताओं ने पृथिवीलोक के चन्द्रवंशी राजा नहुष को देवराज के पद पर प्रतिष्ठित करने का विचार किया । ऐसा निश्चय करके वे सब लोग राजा नहुष के पास गए और उन्हें इन्द्र पद को प्रतिष्ठित करने का निवेदन किया ।
नहुष ने अपने हित की इच्छा से कहा, “मैं तो दुर्बल हूँ । मुझमें आप लोगों की रक्षा करने की शक्ति नहीं है । इन्द्र में ही बल की सत्ता है ।”
यह सुनकर सम्पूर्ण देवताओं और ऋषियों ने कहा, “राजेन्द्र, आप हमारी तपस्या से संयुक्त होकर स्वर्ग पर राज्य का पालन कीजिए । देवता, दानव, यक्ष, ऋषि, राक्षस, पिता, गन्धर्व और भूत जो भी आपके नेत्रों के सामने आ जाएगा, उन्हें देखते ही आप उनका तेज हर लेंगे और बलवान् हो जाएँगे । अतः सदा धर्म को सामने रखते हुए आप सम्पूर्ण लोकों के अधिपति बनें ।”
तत्पश्चात् राजा नहुष इन्द्र पद पर प्रतिष्ठित हो गए । वे दर्लभ वर पाकर निरन्तर धर्म परायण रहते हुए भी काम भोग में आसक्त हो गए । अनेक प्रकार के भोग-विलास और नन्दन कानन में विहार करते हुए एक दिन उनकी दृष्टि देवराज इन्द्र की पत्नी शची पर पडी । उन्हें देखकर नहुष ने स्वर्ग के समस्त सभासदों से कहा,
“इन्द्र की महारानी शची मेरी सेवा में क्यों नहीं उपस्थित होती । मैं देवताओं का इन्द्र हूँ और सम्पूर्ण लोकों का अधीश्वर हूँ । अतः शची देवी आज ही मेरे भवन में पधारें ।”
यह सुनकर शची देवी मन-ही-मन बहुत दुःखी हुई । वे देवगुरु बृहस्पति की शरण में गई और बोलीं—“हे ब्रह्म, आप नहुष से मेरी रक्षा कीजिए ।”
बृहस्पति ने शची को दिलासा देते हुए कहा, “देवि, तुम्हें नहुष से डरना नहीं चाहिए । तुम शीघ्र ही इन्द्र को यहाँ देखोगी ।”
इधर जब नहुष ने सुना कि शची देवगुरु बृहस्पति की शरण में गई है तो वे बहुत कुपित हुए और शची को तत्काल बुलावा भेजा । शची के आने पर नहुष ने कहा, “मैं तीनों लोकों का स्वामी इन्द्र हूँ । अतः तुम मुझे अपना पति बना लो ।”
नहुष के ऐसा कहने पर शची ने उत्तर दिया, “देवेश्वर, मैं आपसे कुछ समय की अवधि लेना चाहती हूँ । अभी यह पता नहीं है कि देवेन्द्र किस अवस्था में, या कहाँ तले गए । पता लगाने पर यदि कोई बात मालूम न हो सकी, तो मैं आपकी सेवा में उपस्थित हो जाऊँगी । शची के ऐसा कहने पर नहुष बहुत प्रसन्न हुआ ।
तत्पश्चात् नहुष से विदा लेकर शची अपने भवन में गई और संकट से उबरने का उपाय सोचने लगी । उसने रात्रि में अधिष्ठात्री देवी उपथ्रति का आह्वान किया, “हे देवि, जहाँ देवराज इन्द्र हों, वह स्थान मुझे दिखाइए ।”
शची की स्तुति से से प्रसन्न होकर उपथ्रति देवी मूर्तिमान होकर वहाँ आयी और उन्होंने शची से सायं में लेकर एक कमल नाल में अत्यन्त सूक्ष्म रूप से छिपे इन्द्र को दिखाया । वहाँ शची को देखकर इन्द्र ने कहा, “शुभे, तुम गुप्त रूप से एक कार्य करो । तुम एकान्त में नहुष के पास जाकर कहो कि आप दिव्य ऋषियान (ऋषियों द्वारा ढोयी जाने वाली पालकी) पर बैठकर मेरे पास आइए । ऐसा होने पर मैं प्रसन्नतापूर्वक आपके वश में हो जाऊँगी ।
इन्द्र के इस प्रकार उपदेश देने पर शची वहाँ से नहुष के पास आई और इन्द्र के कथनानुसार सब बातें कहीं । इन्द्राणी के ऐसा कहने पर नहुष ने प्रसन्न होकर कहा, “मैं ऐसा ही करूँगा ।”
तत्पश्चात् नहुष ने सप्त ऋषियों को कहार बनाकर एक सुन्दर पालकी पर बैठकर शची के भवन के लिए चला । सप्त ऋषियों द्वारा ढोये जाने से नहुष के समस्त पुण्य नष्ट हो गए । उसी समय उसने महर्षि अगस्त के सिर में लात मार दी । तब उन्होंने नहुष को शाप दिया, “तू ब्रह्मा जी के समान तेजस्वी ऋषियों को वाहन बनाकर अपनी पालकी ढुलवा रहे हो । तुम्हारा पुण्य क्षीण हो गया है । अतः स्वर्ग से भ्रष्ट होकर नीचे गिर जाओ और दस हजार वर्षों तक महान् सर्प का रूप धारण कर विचरण करो ।
इस प्रकार नहुष भ्रष्ट होकर पृथिवीलोक में आ गया । इन्द्र को उसका खोया हुआ राज्य मिल गया ।

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भगदत्त नामक एक पौराणिक पात्र का उल्लेख महाकाव्य ‘महाभारत’ में मिलता है।


भगदत्त नामक एक पौराणिक पात्र का उल्लेख महाकाव्य ‘महाभारत’ में मिलता है। यह प्राग्ज्योतिषपुर का राजा तथा नरकासुर का ज्येष्ठ पुत्र था। श्रीकृष्ण ने नरकासुर को मारकर भगदत्त को सिंहासनारूढ़ कराया था। वहाँ श्रीकृष्ण ने भौमासुर द्वारा राजाओं को जीतकर हारी गयी 16000 हज़ार राजकन्याओं को देखा। उन्होंने सुन्दर वस्त्र एवं आभूषण पहनाकर पालकियों द्वारा उन राजकन्याओं को, बहुत-से घोड़ों को तथा ऐरावत कुल में उत्पन्न हुए चतुर्दन्त 64 सफ़ेद हाथियों को द्वारिका भेजा। युधिष्ठिर के ‘राजसूय यज्ञ’ के समय भगदत्त अर्जुन से आठ दिनों तक लड़ा, पर अंत में परास्त होकर उसने युधिष्ठिर की अधीनता स्वीकार कर ली। महाभारत के युद्ध में भगदत्त कौरवों की ओर से लड़ा तथा बड़ी वीरता का प्रदर्शन किया। अन्त में वह और उसका हाथी सुप्रतीक, दोनों अर्जुन के हाथों मारे गये।

महाभारत युद्ध में अर्जुन से सामना
महाभारत द्रोण पर्व में उल्लेख मिलता है कि जब भगवत्त और अर्जुन का घमासान युद्ध चल रहा था, तब अर्जुन ने भगदत्त के धनुष को काटकर उसके तूणीरों के भी टुकड़े-टुकड़े कर दिये। फिर तुरंत ही बहत्तर बाणों से उसके सम्‍पूर्ण मर्मस्‍थानों में गहरी चोट पहुँचायी। अर्जुन के उन बाणों से घायल होकर अत्‍यन्‍त पीड़ित हो भगदत्त ने वैष्णवास्त्र प्रकट किया। उसने कुपित हो अपने अंकुश को ही वैष्‍णवास्‍त्र से अभिमन्त्रित करके पाण्‍डुनन्‍दन अर्जुन की छाती पर छोड़ दिया। भगदत्त का छोड़ा हुआ अस्त्र सबका विनाश करने वाला था। भगवान श्रीकृष्‍ण ने अर्जुन को ओट में करके स्‍वयं ही अपनी छाती पर उसकी चोट सह ली। श्रीकृष्ण से अर्जुन से कहा- “मैंने तुम्‍हारी रक्षा के लिये भगदत्त के उस अस्‍त्र को दूसरे प्रकार से उसके पास से हटा दिया है। पार्थ! अब वह महान् असुर उस उत्‍कृष्‍ट अस्‍त्र से वंचित हो गया है। अत: तुम उसे मार डालो।”महात्‍मा केशव के ऐसा कहने पर कुन्‍तीकुमार अर्जुन उसी समय भगदत्त पर सहसा पैने बाणों की वर्षा करने लगे।

भगदत्त के हाथी का अंत
महाबाहु महामना पार्थ ने बिना किसी घबराहट के भगदत्त के पराक्रमी हाथी सुप्रतीक के कुम्‍भस्‍थल में एक नाराच का प्रहार किया। वह नाराच उस हाथी के मस्‍तक पर पहुँचकर उसी प्रकार लगा, जैसे वज्र पर्वत पर चोट करता है। जैसे सर्प बाँबी में समा जाता है, उसी प्रकार वह बाण हाथी के कुम्‍भस्‍थल में पंख सहित घुस गया। वह हाथी बारंबार भगदत्त के हाँकने पर भी उसकी आज्ञा का पालन नहीं करता था, जैसे दुष्‍टा स्त्री अपने दरिद्र स्‍वामी की बात नहीं मानती है। उस महान् गजराज ने अपने अंगों को निश्‍चेष्‍ट करके दोनों दाँत धरती पर टेक दिये और आर्त स्‍वर से चीत्‍कार करके प्राण त्‍याग दिये।

अर्जुन द्वारा भगदत्त का वध
भगवान श्रीकृष्‍ण ने गाण्‍डीवधारी अर्जुन से कहा- “कुन्‍तीनन्‍दन! यह भगदत्त बहुत बड़ी अवस्‍था का है। इसके सारे बाल पक गये हैं और ललाट आदि अंगों में झुर्रियाँ पड़ जाने के कारण पलकें झपी रहने से इसके नेत्र प्राय: बंद से रहते हैं। यह शूरवीर तथा अत्‍यन्‍त दुर्जय है। इस राजा ने अपने दोनों नेत्रों को खुले रखने के लिये पलकों को कपड़े की पट्टी से ललाट में बाँध रखा है।” भगवान श्रीकृष्‍ण के कहने से अर्जुन ने बाण मारकर भगदत्त के शिर की पट्टी अत्‍यन्‍त छिन्‍न-भिन्‍न कर दी। उस पट्टी के कटते ही भगदत्त की आँखें बंद हो गयीं। फिर तो प्रतापी भगदत्त को सारा जगत् अन्‍धकारमय प्रतीत होने लगा। उस समय झुकी हुई गाँठ वाले एक अर्धचन्‍द्राकार बाण के द्वारा पाण्‍डुनन्‍दन अर्जुन ने राजा भगदत्त के वक्ष:स्‍थल को विदीर्ण कर दिया। किरीटधारी अर्जुन के द्वारा हृदय विदीर्ण कर दिये जाने पर राजा भगदत्त ने प्राणशून्‍य हो अपने धनुष-बाण त्‍याग दिये। उसके सिर से पगड़ी और पट्टी का वह सुन्‍दर वस्‍त्र खिसककर गिर गया, जैसे कमलनाल के ताडन से उसका पत्‍ता टूट कर गिर जाता है। सोने के आभूषणों से विभूषित उस पर्वताकार हाथी से सुवर्णमालाधारी भगदत्त पृथ्वी पर गिर पड़ा, मानो सुन्‍दर पुष्‍पों से सुशोभित कनेर का वृक्ष हवा के वेग से टूट कर पर्वत के शिखर से नीचे गिर पड़ा हो। इस प्रकार इन्‍द्रकुमार अर्जुन ने इन्‍द्र के सखा तथा इन्‍द्र के समान ही पराक्रमी राजा भगदत्त को युद्ध में मारकर कौरव सेना के अन्‍य विजयालिभाषी वीर पुरुषों को भी उसी प्रकार मार गिराया, जैसे प्रबल वायु वृक्षों को उखाड़ फेंकती है।

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एक सन्त कुएं पर स्वयं को लटका कर ध्यान करता था


🌞 सीता राम  जी🙏

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एक सन्त कुएं पर स्वयं को लटका कर ध्यान करता था और कहता था जिस दिन यह जंजीर टूटेगी मुझे ईश्वर मिल जाएंगे।

उनसे पूरा गांव प्रभावित था सभी उनकी भक्ति,उनके तप की तारीफें करते थे। एक व्यक्ति के मन में इच्छा हुई कि मैं भी ईश्वर दर्शन करूँ।

वह कुए पर रस्सी से पैर को बांधकर कुएं में लटक गया और कृष्ण जी का ध्यान करने लगा जब रस्सी टूटी उसे कृष्ण अपनी गोद मे उठा लिए और दर्शन भी दिए।

तब व्यक्ति ने पूछा आप इतनी जल्दी मुझे दर्शन देने क्यों चले आये जबकि वे संत महात्मा तो वर्षों से आपको बुला रहे हैं।

कृष्ण बोले ! वो कुएं पर लटकते जरूर हैं किंतु पैर को लोहे की जंजीर से बांधकर । उसे मुझसे ज्यादा जंजीर पर विश्वाश है।

तुझे खुद से ज्यादा मुझ पर विश्वाश है इसलिए मैं आ गया।

आवश्यक नहीं कि दर्शन में वर्षों लगें आपकी शरणागति आपको ईश्वर के दर्शन अवश्य कराएगी और शीघ्र ही कराएगी। प्रश्न केवल इतना है आप उन पर कितना विश्वाश करते हैं।…

ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
  भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया ॥

        हे अर्जुन ! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं। शरीररूपी यंत्र पर आरूढ़(चढ़े) हुए सब प्राणियों को, वे अपनी माया से घुमाते रहते हैं।

          कृष्ण शरणं मम ।।

इसे सदैव याद रखें और बुद्धि में धारण करने के साथ व्यवहार में भी धारण करें।। प्रभु दर्शन अवश्य होंगे।

🌹🌻🌼🍀हरे कृष्णा 🌸🌺🌻🌹                                   🔥🌿🔥🌿🔥🌿🔥🌿🔥🌿🔥