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નરેન્દ્ર મોદી દ્વારા લિખિત એક રચના

પ્રારબ્ધને અહીંયાં ગાંઠે કોણ ?
હું પડકાર ઝીલનારો માણસ છું.

હું તેજ ઉછીનું લઉં નહીં
હું જાતે બળતું ફાનસ છું.
ઝળાંહળાંનો મોહતાજ નથી
મને મારું અજવાળું પૂરતું છે;

અંધારાના વમળને કાપે
કમળ તેજ તો સ્ફુરતું છે
ધુમ્મસમાં મને રસ નથી
હું ખુલ્લો અને નિખાલસ છું;

પ્રારબ્ધને અહીંયાં ગાઠે કોણ ?
હું પડકાર ઝીલનારો માણસ છું.

કુંડળીને વળગવું ગમે નહીં
ને ગ્રહો કને શિર નમે નહીં
કાયરોની શતરંજ પર જીવ
સોગઠાંબાજી રમે નહીં.

હું પોતે જ મારો વંશજ છું
હું પોતે મારો વારસ છું.
પ્રારબ્ધને અહીંયાં ગાંઠે કોણ ?
હું પડકાર ઝીલનારો માણસ છું.

– નરેન્દ્ર મોદી

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🌞सुप्रभात🌞
शुभोपदेश दातारो वयोवृद्धा बहुश्रुताः ।
कुशला धर्मशास्त्रेषु पर्युपास्या मुहुर्मुहुः ॥

शुभ उपदेश देनेवाले, वयोवृद्ध, ज्ञानी, धर्मशास्त्र में कुशल – ऐसे लोगों की सदैव सेवा करनी चाहिए ।
॥ॐ॥

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जनेऊ


क्यों पहनते हैं जनेऊ और क्या है इसके लाभ, जानिए?????

भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥
गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई॥

भावार्थ:-ज्यों ही सब भाई कुमारावस्था के हुए, त्यों ही गुरु, पिता और माता ने उनका यज्ञोपवीत संस्कार कर दिया। श्री रघुनाथजी (भाइयों सहित) गुरु के घर में विद्या पढ़ने गए और थोड़े ही समय में उनको सब विद्याएँ आ गईं॥

जनेऊ को उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। इसे उपनयन संस्कार भी कहते हैं। ‘उपनयन’ का अर्थ है, ‘पास या सन्निकट ले जाना।’ किसके पास? ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना।

जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म।

क्यों पहनते हैं जनेऊ :हिन्दू धर्म के सोलह संस्कारों में से एक ‘उपनयन संस्कार’ के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे ‘यज्ञोपवीत संस्कार’ भी कहा जाता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं। प्राचीनकाल में पहले शिष्य, संत और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। इस दीक्षा देने के तरीके में से एक जनेऊ धारण करना भी होता था। प्राचीनकाल में गुरुकुल में दीक्षा लेने या संन्यस्त होने के पूर्व यह संकार होता था।

यज्ञोपवीत को व्रतबन्ध भी कहते हैं। व्रतों से बंधे बिना मनुष्य का उत्थान सम्भव नहीं। यज्ञोपवीत को व्रतशीलता का प्रतीक मानते हैं। इसीलिए इसे सूत्र भी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में यम-नियम को व्रत माना गया है। बालक की आयुवृद्धि हेतु गायत्री तथा वेदपाठ का अधिकारी बनने के लिए उपनयन (जनेऊ) संस्कार अत्यन्त आवश्यक है।

दीक्षा देना :दीक्षा देने का प्रचलन वैदिक ऋषियों ने प्रारंभ किया था। प्राचीनकाल में पहले शिष्य और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। माता-पिता अपने बच्चों को जब शिक्षा के लिए भेजते थे तब भी दीक्षा दी जाती थी। हिन्दू धर्मानुसार दिशाहीन जीवन को दिशा देना ही दीक्षा है। दीक्षा एक शपथ, एक अनुबंध और एक संकल्प है। दीक्षा के बाद व्यक्ति द्विज बन जाता है। द्विज का अर्थ दूसरा जन्म। दूसरा व्यक्तित्व।

अन्य धर्मों में यह संस्कार :सनातन धर्म से प्रेरित यह उपनयन संस्कार सभी धर्मों में मिल जाएगा। यह दीक्षा देने की परंपरा प्राचीनकाल से रही है, हालांकि कालांतर में दूसरे धर्मों में दीक्षा को अपने धर्म में धर्मांतरित करने के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा। इस आर्य संस्कार को सभी धर्मों में किसी न किसी कारणवश भिन्न-भिन्न रूप में अपनाया जाता रहा है। मक्का में काबा की परिक्रमा से पूर्व यह संस्कार किया जाता है।

सारनाथ की अति प्राचीन बुद्ध की प्रतिमा का सूक्ष्म निरीक्षण करने से उसकी छाती पर यज्ञोपवीत की सूक्ष्म रेखा दिखाई देती है।

जैन धर्म में भी इस संस्कार को किया जाता है। वित्र मेखला अधोवसन (लुंगी) का सम्बन्ध पारसियों से भी है। सिख धर्म में इसे अमृत संचार कहते हैं। बौद्ध धर्म से इस परंपरा को ईसाई धर्म ने अपनाया जिसे वे बपस्तिमा कहते हैं। यहूदी और इस्लाम धर्म में खतना करके दीक्षा दी जाती है।

जनेऊ को हर उस हिन्दू को धारण करना चाहिए जो मांस और शराब को छोड़कर सादगीपूर्ण जीवन यापन करना चाहता है। हम यहां जनेऊ पहनने के आपको लाभ बता रहे हैं। जनेऊ के नियमों का पालन करके आप निरोगी जीवन जी सकते हैं।

जीवाणुओं-कीटाणुओं से बचाव :जो लोग जनेऊ पहनते हैं और इससे जुड़े नियमों का पालन करते हैं, वे मल-मूत्र त्याग करते वक्त अपना मुंह बंद रखते हैं। इसकी आदत पड़ जाने के बाद लोग बड़ी आसानी से गंदे स्थानों पर पाए जाने वाले जीवाणुओं और कीटाणुओं के प्रकोप से बच जाते हैं।

गुर्दे की सुरक्षा :यह नियम है कि बैठकर ही जलपान करना चाहिए अर्थात खड़े रहकर पानी नहीं पीना चाहिए। इसी नियम के तहत बैठकर ही मूत्र त्याग करना चाहिए। उक्त दोनों नियमों का पालन करने से किडनी पर प्रेशर नहीं पड़ता। जनेऊ धारण करने से यह दोनों ही नियम अनिवार्य हो जाते हैं।

हृदय रोग व ब्लडप्रेशर से बचाव :शोधानुसार मेडिकल साइंस ने भी यह पाया है कि जनेऊ पहनने वालों को हृदय रोग और ब्लडप्रेशर की आशंका अन्य लोगों के मुकाबले कम होती है। जनेऊ शरीर में खून के प्रवाह को भी कंट्रोल करने में मददगार होता है। ‍चिकित्सकों अनुसार यह जनेऊ के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है, क्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होने लगता है।

लकवे से बचाव :जनेऊ धारण करने वाला आदमी को लकवे मारने की संभावना कम हो जाती है क्योंकि आदमी को बताया गया है कि जनेऊ धारण करने वाले को लघुशंका करते समय दांत पर दांत बैठा कर रहना चाहिए। मल मूत्र त्याग करते समय दांत पर दांत बैठाकर रहने से आदमी को लकवा नहीं मारता।

कब्ज से बचाव :जनेऊ को कान के ऊपर कसकर लपेटने का नियम है। ऐसा करने से कान के पास से गुजरने वाली उन नसों पर भी दबाव पड़ता है, जिनका संबंध सीधे आंतों से है। इन नसों पर दबाव पड़ने से कब्ज की श‍िकायत नहीं होती है। पेट साफ होने पर शरीर और मन, दोनों ही सेहतमंद रहते हैं।

शुक्राणुओं की रक्षा :दाएं कान के पास से वे नसें भी गुजरती हैं, जिसका संबंध अंडकोष और गुप्तेंद्रियों से होता है। मूत्र त्याग के वक्त दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से वे नसें दब जाती हैं, जिनसे वीर्य निकलता है। ऐसे में जाने-अनजाने शुक्राणुओं की रक्षा होती है। इससे इंसान के बल और तेज में वृद्ध‍ि होती है।

स्मरण शक्ति‍ की रक्षा :कान पर हर रोज जनेऊ रखने और कसने से स्मरण शक्त‍ि का क्षय नहीं होता है। इससे स्मृति कोष बढ़ता रहता है। कान पर दबाव पड़ने से दिमाग की वे नसें एक्ट‍िव हो जाती हैं, जिनका संबंध स्मरण शक्त‍ि से होता है। दरअसल, गलतियां करने पर बच्चों के कान पकड़ने या ऐंठने के पीछे भी मूल कारण यही होता था।

आचरण की शुद्धता से बढ़ता मानसिक बल :कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य बुरे कार्यों से दूर रहने लगता है। पवित्रता का अहसास होने से आचरण शुद्ध होने लगते हैं। आचरण की शुद्धत से मानसिक बल बढ़ता है।

बुरी आत्माओं से रक्षा :ऐसी मान्यता है कि जनेऊ पहनने वालों के पास बुरी आत्माएं नहीं फटकती हैं। इसका कारण यह है कि जनेऊ धारण करने वाला खुद पवित्र आत्मरूप बन जाता है और उसमें स्वत: ही आध्यात्म‍िक ऊर्जा का विकास होता है।

कान में ही क्यों लपेटते हैं जनेऊ…क्यों कान पर लपेटते हैं जनेऊं :मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसें, जिनका संबंध पेट की आंतों से होता है, आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है, जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा कान के पास ही एक नस से मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है।

जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय के रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते।

कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है। कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है। जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति नियमों में बंधा होता है। वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता।

जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों से बचाती है। इसी कारण जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है।

  • चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है। वैज्ञानिकों अनुसार बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से इस समस्या से मुक्ति मिल जाती है।
  • माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है। यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कमर तक स्थित है। जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।

  • विद्यालयों में बच्चों के कान खींचने के मूल में एक यह भी तथ्य छिपा हुआ है कि उससे कान की वह नस दबती है, जिससे मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करती है। इसलिए भी यज्ञोपवीत को दायें कान पर धारण करने का उद्देश्य बताया गया है।

जनेऊ पहने का धार्मिक और सामाजिक ओर धार्मिक महत्व…

जनेऊ का धार्मिक महत्व :यज्ञोपवीत को व्रतबन्ध कहते हैं। व्रतों से बंधे बिना मनुष्य का उत्थान सम्भव नहीं। यज्ञोपवीत को व्रतशीलता का प्रतीक मानते हैं। इसीलिए इसे सूत्र (फार्मूला, सहारा) भी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में यम-नियम को व्रत माना गया है। बालक की आयुवृद्धि हेतु गायत्री तथा वेदपाठ का अधिकारी बनने के लिए उपनयन (जनेऊ) संस्कार अत्यन्त आवश्यक है। जनेऊ से पवित्रता का अहसास होता है। यह मन को बुरे कार्यों से बचाती है। कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य बुरे कार्यों से दूर रहने लगता है।

धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि जनेऊ धारण करने से शरीर शुद्घ और पवित्र होता है। शास्त्रों अनुसार आदित्य, वसु, रुद्र, वायु, अग्नि, धर्म, वेद, आप, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में माना गया है। अत: उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है। आचमन अर्थात मंदिर आदि में जाने से पूर्व या पूजा करने के पूर्व जल से पवित्र होने की क्रिया को आचमन कहते हैं। इस्लाम धर्म में इसे वजू कहते हैं।

द्विज :स्वार्थ की संकीर्णता से निकलकर परमार्थ की महानता में प्रवेश करने को, पशुता को त्याग कर मनुष्यता ग्रहण करने को दूसरा जन्म कहते हैं। शरीर जन्म माता-पिता के रज-वीर्य से वैसा ही होता है, जैसा अन्य जीवों का। आदर्शवादी जीवन लक्ष्य अपना लेने की प्रतिज्ञा करना ही वास्तविक मनुष्य जन्म में प्रवेश करना है। इसी को द्विजत्व कहते हैं। द्विजत्व का अर्थ है दूसरा जन्म।

सामाजिक महत्व :आदमी को दो जनेऊ धारण कराया जाता है। धारण करने के बाद उसे बताता है कि उसे दो लोगों का भार या जिम्मेदारी वहन करना है, एक पत्नी पक्ष का और दूसरा अपने पक्ष का अर्थात् पति पक्ष का।

अब एक-एक जनेऊ में 9-9 धागे होते हैं जो हमें बताते हैं कि हम पर पत्नी और पत्नी पक्ष के 9-9 ग्रहों का भार ये ऋण है उसे वहन करना है। अब इन 9-9 धागों के अंदर से 1-1 धागे निकालकर देखें तो इसमें 27-27 धागे होते हैं। अर्थात् हमें पत्नी और पति पक्ष के 27-27 नक्षत्रों का भी भार या ऋण वहन करना है। अब अगर अंक विद्या के आधार पर देंखे तो 27+9 = 36 होता है, जिसको एकल अंक बनाने पर 36= 3+6 = 9 आता है, जो एक पूर्ण अंक है।

अब अगर इस 9 में दो जनेऊ की संख्या अर्थात 2 और जोड़ दें तो 9+2= 11 होगा जो हमें बताता है की हमारा जीवन अकेले अकेले दो लोगों अर्थात् पति और पत्नी (1 और 1) के मिलने से बना है। 1+1 = 2 होता है जो अंक विद्या के अनुसार चंद्रमा का अंक है। जब हम अपने दोनों पक्षों का ऋण वहन कर लेते हैं तो हमें अशीम शांति की प्राप्ति हो जाती है।

यज्ञोपवीत धारण करने के नियम :

  • यज्ञोपवीत धारण करने वाले व्यक्ति को सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। एक बार जनेऊ धारण करने के बाद मनुष्य इसे उतार नहीं सकता। मैला होने पर उतारने के बाद तुरंत ही दूसरा जनेऊ धारण करना पड़ता है।
  • लड़की भी पहन सकती है जनेऊ :वह लड़की जिसे आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना हो, वह जनेऊ धारण कर सकती है। ब्रह्मचारी तीन और विवाहित छह धागों की जनेऊ पहनता है। यज्ञोपवीत के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के बतलाए गए हैं।

  • कब पहने जनेऊ :जिस दिन गर्भ धारण किया हो उसके आठवें वर्ष में बालक का उपनयन संस्कार किया जाता है। जनेऊ पहनने के बाद ही विद्यारंभ होता है, लेकिन आजकल गुरु परंपरा के समाप्त होने के बाद अधिकतर लोग जनेऊ नहीं पहनते हैं तो उनको विवाह के पूर्व जनेऊ पहनाई जाती है। लेकिन वह सिर्फ रस्म अदायिगी से ज्यादा कुछ नहीं, क्योंकि वे जनेऊ का महत्व नहीं समझते हैं।

  • ।।यथा-निवीनी दक्षिण कर्णे यज्ञोपवीतं कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजेत।।
    अर्थात : अशौच एवं मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ रखना आवश्यक है। हाथ पैर धोकर और कुल्ला करके ही इसे उतारें।

    • किसी भी धार्मिक कार्य, पूजा-पाठ, यज्ञ आदि करने के पूर्व जनेऊ धारण करना जरूरी है।
  • विवाह तब तक नहीं होता जब तक की जनेऊ धारण नहीं किया जाता है।

  • जब भी मूत्र या शौच विसर्जन करते वक्त जनेऊ धारण किया जाता है।

  • यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए।

  • यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित प्रतिमा शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।

  • जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है। जिनके गोद में छोटे बच्चे नहीं हैं, वे महिलाएं भी यज्ञोपवीत संभाल सकती हैं; किन्तु उन्हें हर मास मासिक शौच के बाद उसे बदल देना पड़ता है।

  • यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित की एक माला जप करने या बदल लेने का नियम है।

  • देव प्रतिमा की मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि न बांधें। इसके लिए भिन्न व्यवस्था रखें। बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए।

  • जनेऊ क्या है : आपने देखा होगा कि बहुत से लोग बाएं कांधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे।

    तीन सूत्र क्यों : जनेऊ में मुख्‍यरूप से तीन धागे होते हैं। प्रथम यह तीन सूत्र त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं। द्वितीय यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं और तृतीय यह सत्व, रज और तम का प्रतीक है। चतुर्थ यह गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक है। पंचम यह तीन आश्रमों का प्रतीक है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।

    नौ तार : यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह कुल तारों की संख्‍या नौ होती है। एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ होते हैं। हम मुख से अच्छा बोले और खाएं, आंखों से अच्छा देंखे और कानों से अच्छा सुने।

    पांच गांठ : यज्ञोपवीत में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्ध, काम और मोक्ष का प्रतीक है। यह पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का भी प्रतीक भी है।

    जनेऊ की लंबाई : यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं होती है। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि।

    जनेऊ धारण वस्त्र : जनेऊ धारण करते वक्त बालक के हाथ में एक दंड होता है। वह बगैर सिला एक ही वस्त्र पहनता है। गले में पीले रंग का दुपट्टा होता है। मुंडन करके उसके शिखा रखी जाती है। पैर में खड़ाऊ होती है। मेखला और कोपीन पहनी जाती है।

    मेखला, कोपीन, दंड : मेखला और कोपीन संयुक्त रूप से दी जाती है। कमर में बांधने योग्य नाड़े जैसे सूत्र को मेखला कहते हैं। मेखला को मुंज और करधनी भी कहते हैं। कपड़े की सिली हुई सूत की डोरी, कलावे के लम्बे टुकड़े से मेखला बनती है। कोपीन लगभग 4 इंच चौड़ी डेढ़ फुट लम्बी लंगोटी होती है। इसे मेखला के साथ टांक कर भी रखा जा सकता है। दंड के लिए लाठी या ब्रह्म दंड जैसा रोल भी रखा जा सकता है। यज्ञोपवीत को पीले रंग में रंगकर रखा जाता है।

    जनेऊ धारण : बगैर सिले वस्त्र पहनकर, हाथ में एक दंड लेकर, कोपीन और पीला दुपट्टा पहनकर विधि-विधान से जनेऊ धारण की जाती है। जनेऊ धारण करने के लिए एक यज्ञ होता है, जिसमें जनेऊ धारण करने वाला लड़का अपने संपूर्ण परिवार के साथ भाग लेता है। यज्ञ द्वारा संस्कार किए गए विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है। तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है। अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है।

    गायत्री मंत्र : यज्ञोपवीत गायत्री मंत्र से शुरू होता है। गायत्री- उपवीत का सम्मिलन ही द्विजत्व है। यज्ञोपवीत में तीन तार हैं, गायत्री में तीन चरण हैं। ‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ प्रथम चरण, ‘भर्गोदेवस्य धीमहि’ द्वितीय चरण, ‘धियो यो न: प्रचोदयात्’ तृतीय चरण है। गायत्री महामंत्र की प्रतिमा- यज्ञोपवीत, जिसमें 9 शब्द, तीन चरण, सहित तीन व्याहृतियां समाहित हैं।

    यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र है-

    यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।
    आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।

    ऐसे करते हैं संस्कार : यज्ञोपवित संस्कार प्रारम्भ करने के पूर्व बालक का मुंडन करवाया जाता है। उपनयन संस्कार के मुहूर्त के दिन लड़के को स्नान करवाकर उसके सिर और शरीर पर चंदन केसर का लेप करते हैं और जनेऊ पहनाकर ब्रह्मचारी बनाते हैं। फिर होम करते हैं।

    फिर विधिपूर्वक गणेशादि देवताओं का पूजन, यज्ञवेदी एवं बालक को अधोवस्त्र के साथ माला पहनाकर बैठाया जाता है। फिर दस बार गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित करके देवताओं के आह्‍वान के साथ उससे शास्त्र शिक्षा और व्रतों के पालन का वचन लिया जाता है।

    फिर उसकी उम्र के बच्चों के साथ बैठाकर चूरमा खिलाते हैं फिर स्नान कराकर उस वक्त गुरु, पिता या बड़ा भाई गायत्री मंत्र सुनाकर कहता है कि आज से तू अब ब्राह्मण हुआ अर्थात ब्रह्म (सिर्फ ईश्वर को मानने वाला) को माने वाला हुआ।

    इसके बाद मृगचर्म ओढ़कर मुंज (मेखला) का कंदोरा बांधते हैं और एक दंड हाथ में दे देते हैं। तत्पश्चात्‌ वह बालक उपस्थित लोगों से भीक्षा मांगता है। शाम को खाना खाने के पश्चात्‌ दंड को साथ कंधे पर रखकर घर से भागता है और कहता है कि मैं पढ़ने के लिए काशी जाता हूं। बाद में कुछ लोग शादी का लालच देकर पकड़ लाते हैं। तत्पश्चात वह लड़का ब्राह्मण मान लिया जाता है।

    संजय गुप्ता

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    पढ़े===एक== उपयोगी== कहानी
    ===तीन कठिन कार्य =======
    एक बार यशोधन नामक राजा अपने दरबार में दरबारियों से चर्चा कर रहे थे। अचानक यशोधन ने पूछा कि दुनिया में ऐसे तीन कौन से कार्य हैं जिन्हें करना मनुष्य के लिए सबसे कठिन होता है? राजा के प्रश्न सुनकर सभी दरबारी विचारमग्न हो गए। काफी सोचने के बाद एक दरबारी बोला, ‘महाराज, भारी-भरकम वजन उठाना दुनिया में सबसे कठिन कार्य है।’ दूसरा दरबारी बोला, ‘मेरे विचार में तो पहाड़ पर चढ़ना सबसे दुष्कर कार्य है।
    यह प्रत्येक व्यक्ति के बस की बात नहीं है।’ यह सुनकर एक अन्य व्यक्ति बोला, ‘महाराज, मेरे ख्याल से पानी पर चलना और आग में जलना सबसे मुश्किल है। अग्नि की जरा सी चिंगारी व्यक्ति की जान ले लेती है।’ इस प्रकार अपने-अपने अनुसार सभी ने अनेक ऐसे कार्यों को गिना दिया, जिन्हें कठिन माना जा सकता था किंतु राजा किसी के भी जवाब से सहमत नहीं हुए। उन्होंने स्वामी गिरिनंद का बहुत नाम सुना था।
    स्वामी गिरिनंद लोगों की सभी समस्याओं का समाधान करते थे। यशोधन स्वयं स्वामी गिरिनंद के आश्रम में गए और उन्हें प्रणाम कर उनके पास बैठ गए। स्वामी जी समझ गए कि राजा कुछ पूछने के लिए उनके पास आए हैं। स्वामी जी के पूछने पर राजा बोले, ‘महाराज, आप मुझे तीन ऐसे कार्य बताइए जो बेहद कठिन हैं।’ यह सुनकर स्वामी गिरिनंद मुस्कराते हुए बोले, ‘तीन कठिन कार्य तो मैं बता दूंगा लेकिन तुमको उन कार्यों को करने का प्रयास करना पड़ेगा।’
    राजा ने उन कार्यों को करने का वचन दे दिया। तब स्वामी जी बोले, ‘दुनिया के तीन कठिनतम कार्य शारीरिक नहीं हैं। वे कुछ और ही हैं। उनमें पहला है-घृणा के बदले प्रेम करना। दूसरा है अपने स्वार्थ व क्रोध का त्याग और तीसरा है-यह कहना कि मैं गलती पर था।’ यह सुनकर राजा ने कहा, ‘आप एकदम सही कह रहे हैं। मुझे आशीर्वाद दें कि मैं ये कार्य कर सकूं।’ स्वामी जी ने राजा को आशीर्वाद दिया।
    दोस्तों यह कहानी आपको कैसी लगी मुझे जरूर बताना
    धन्यवाद

    संजय गुप्ता

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                  आरण्यक मुनि
                  ☆☆☆☆☆
               महर्षि लोमश जी ने कहा — ‘हे वत्स ! पूर्ण सनातन परात्पर परमात्मा ही श्री राम हैं ।समस्त विश्व–ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति इन्हीं से हुयी है ; यही सबके आधार, सबमें फैले हुए, सबके स्वामी, सबके सृजन, पालन और संहार करने वाले हैं ।सारा विश्व इन्हीं की लीला का विकास है ।समस्त योगेश्वरों के भी परम ईश्वर दयासागर ये प्रभु जीवों की दुर्गति देखकर उन्हें घोर नरक से बचाने के लिए जगत में अपनी लीला और गुणों का विस्तार करते हैं, जिनका गान करके पापी से पापी मनुष्य भी तर जाते हैं ।ये श्री राम इसी हेतु अवतार धारण करते हैं ।’
              इसके बाद लोमश जी ने भगवान श्री राम का पवित्र चरित्र संक्षेप में सुनाया और कहा — ‘त्रेता के अन्त में भगवान श्री राम अवतार धारण करेंगे ।उस समय जब वे अश्वमेध यज्ञ करने लगेंगे, तब अश्व के साथ उनके छोटे भाई शत्रुघ्न जी आपके आश्रम में पधारेंगे।तब आप श्री राम के दर्शन करके उनमें लीन हो सकेंगे ।’
              महर्षि लोमश के उपदेशानुसार आरण्यक मुनि रेवा नदी के किनारे एक कुटिया बनाकर रहने लगे ।वे निरंतर राम नाम का जप करते थे और श्री राम के पूजन ध्यान में ही लगे रहते थे ।बहुत समय बीत जाने पर जब अयोध्या में मर्यादा पुरुषोत्तम ने श्री राघवेन्द्र के रूप में अवतार धारण करके लंका-विजय आदि लीलाएँ सम्पन्न कर लीं और अयोध्या में वे अश्वमेध यज्ञ करने लगे, तब यज्ञ का अश्व छोड़ा गया ।अश्व के पीछे पीछे उसकी रक्षा करते हुए बड़ी भारी सेना के साथ शत्रुघ्न जी चल रहे थे ।अश्व जब रेवा तट पर मुनि के आश्रम के समीप पहुँचा, शत्रुघ्न जी ने अपने साथी सुमति से पूछा  —- ‘यह किसका आश्रम है? ‘ सुमति से परिचय प्राप्त कर वे मुनि की कुटिया पर गये।मुनि ने उनका स्वागत किया और शत्रुघ्न जी का परिचय पाकर तो वे आनन्दमग्न हो गये ।’अब मेरी बहुत दिनों की इच्छा पूरी होगी ।अब मैं अपने नेत्रों से भगवान श्री राम के दर्शन करूँगा ।मेरा जीवन धारण करना अब सफल हो जायगा।’ इस प्रकार सोचते हुए मुनि अयोध्या की ओर चल पड़े ।
              आरण्यक मुनि देवदुर्लभ परम रमणीय अयोध्या नगरी में पहुँचे।उन्होंने सरयू के तट पर यज्ञशाला में यज्ञ की दीक्षा लिये, नियम के कारण आभूषणरहित, मृगचर्म का उत्तरीय बनाये, हाथ में कुश लिये, नवदूर्वादलश्याम श्री राम को देखा।वहाँ दीनदरिद्रों को मनमानी वस्तुएँ दी जा रही थीं ।विप्रों का सत्कार हो रहा था ।ऋषिगण मन्त्रपाठ कर रहे थे ; परंतु आरण्यक मुनि तो एकटक श्री राम की रूपमाधुरी देखते हुए जहाँ के तहाँ खड़े रह गये।उनका शरीर पुलकित हो गया ।वे वेसुध से होकर उस भुवनमंगल छवि को देखते ही रहे ।मर्यादा पुरुषोत्तम ने मुनि को देखा और देखते ही वे उठ खड़े हुए ।इन्द्रादि देवता तथा लोकपाल भी जिनके चरणों में मस्तक झुकाते हैं, वे ही सर्वेश्वर श्री राम ‘मुनिवर ! आज आपके पधारने से मैं पवित्र हो गया ।’ यह कहकर मुनि के चरणों पर गिर पड़े ।तपस्वी आरण्यक मुनि ने झटपट अपनी भुजाओं से उठाकर श्री राम को हृदय से लगा लिया ।इसके पश्चात मुनि को उच्चासन पर बैठाकर राघवेन्द्र ने स्वयं अपने हाथों से उनके चरण धोये और वह चरणोदक अपने मस्तक पर छिड़क लिया ।भगवान ब्रह्मण्यदेव हैं ।उन्होंने ब्राह्मण की स्तुति की — ‘मुनिश्रेष्ठ ! आपके चरणजल से मैं अपने बन्धु-बान्धवों के साथ पवित्र हो गया ।आपके पधारने से मेरा अश्वमेध यज्ञ सफल हो गया ।अब निश्चय ही मैं आपकी चरणरज से पवित्र होकर इस यज्ञ द्वारा रावण–कुम्भकर्णादि ब्राह्मण संतान के वध के दोष से छूट जाऊँगा ।’
              भगवान की प्रार्थना सुनकर मुनि ने कुछ हँसते हुए कहा — ‘प्रभो ! मर्यादा के आप ही रक्षक हैं, वेद तथा ब्राह्मण आपकी ही मूर्ति हैं ।अतएव आपके लिए ऐसी बातें करना ठीक ही है ।दूसरे राजाओं के सामने उच्च आदर्श रखने के लिए ही आप ऐसा आचरण कर रहे हैं ।ब्रह्महत्या के पाप से छूटने के लिए आप अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं, यह सुनकर मैं अपनी हँसी रोक नहीं पाता।मर्यादा पुरुषोत्तम ! आपका मर्यादा पालन धन्य है ।सारे शास्त्रों के विपरीत आचरण करने वाला सर्वथा मूर्ख और महापापी भी जिसका नाम स्मरण करते ही पापों के समुद्र को भी लाँघकर परमपद पा जाता है, वह ब्रह्महत्या के पाप से छूटने के लिए अश्वमेध यज्ञ करे—- यह क्या कम हँसी की बात है?  भगवन् !  जब तक मनुष्य आपके नाम का भलीभाँति उच्चारण नहीं करता, तभी तक उसे भय देने के लिए बड़े बड़े पाप गरजा करते हैं ।राम नाम रूपी सिंह की गर्जना सुनते ही महापापरूपी गजों का पता तक नहीं लगता।मैंने मुनियों से सुना है कि जब तक राम नाम का भलीभाँति उच्चारण नहीं होता, तभी तक पापी मनुष्यों को पाप-ताप भयभीत करते हैं ।श्री राम  ! आज मैं धन्य हो गया ।आज आपके दर्शन पाकर मैं संसार के ताप से छूट गया ।’
               भगवान श्री राम ने मुनि के बचन सुनकर उनका पूजन किया ।सभी ऋषि -मुनि भगवान की यह लीला देखकर ‘धन्य-धन्य ‘ कहने लगे।आरण्यक मुनि ने भावावेश में सबसे कहा — ‘मुनिगण ! आपलोग मेरे भाग्य को तो देखें कि सर्वलोकमहेश्वर मुझे प्रणाम करते हैं ।ये सबके परमाराध्य मेरा स्वागत करते हैं ।श्रुतियाँ जिनके चरण-कमलों की खोज करती हैं, वे मेरा चरणोदक लेकर अपने को पवित्र मानते हैं ।मैं आज धन्य हो गया ।’ यह कहते–कहते सबके सामने ही मुनि का ब्रह्मरन्ध्र फट गया ।बड़े जोर का धड़ाका हुआ ।स्वर्ग में दुन्दुभियाँ बजने लगीं ।देवता फूलों की वर्षा करने लगे ।ऋषि मुनियों ने देखा कि आरण्यक मुनि के मस्तक से एक विचित्र तेज निकला और वह श्री राम के मुख में प्रविष्ट हो गया ।
                  (भक्त चरितांक)
                  (कल्याण -40)

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    #मैंनेभगवानकोमुस्करातेहुएदेखाप्रेरणादायक_कहानी। गरमी का मौसम था, मैने सोचा काम पे जाने से पहले गन्ने का रस पीकर काम पर जाता हूँ। एक छोटे से गन्ने की रस की दुकान पर गया !! वह काफी भीड-भाड का इलाका था, वहीं पर काफी छोटी-छोटी फूलो की, पूजा की सामग्री ऐसी और कुछ दुकानें थीं। और सामने ही एक बडा मंदिर भी था, इसलिए उस इलाके में हमेशा भीड रहती है!

    मैंने रस वाले को रस का आर्डर दिया, मेरी नज़र पास में ही फूलों की दुकान पे गयी, वहीं पर एक तकरीबन 37 वर्षीय सज्जन व्यक्ति ने 500 रूपयों वाले एक फूलों का हार बनाने का आर्डर दिया, तभी उस व्यक्ति के पिछे से, एक 10 वर्षीय गरीब बालक ने आकर हाथ लगाकर उसे रस पिलाने की गुजारिश की !!

    पहले तो उस व्यक्ति का बच्चे की तरफ ध्यान नहीं था,
    जब देखा… तब उस व्यक्ति ने उसे अपने से दूर किया
    और अपना हाथ रूमाल से साफ करते हुए बोला”
    चल हट ….”कहते हुए भगाने की कोशिश की!!

    उस बच्चे ने भूख और प्यास का वास्ता दिया !! वो भीख नहीं मांग रहा था,

    लेकिन उस व्यक्ति के दिल में दया नहीं आयी !!

    बच्चे की आँखें कुछ भरी और सहमी हुई थी,
    भूख और प्यास से लाचार दिख रहा था !!

    इतने में मेरा आर्डर दिया हुआ रस आ गया…

    मैंने एक और रस का आर्डर दिया और उस बच्चे को पास बुलाकर उसे भी रस पीलाया !!

    बच्चे ने रस पीया और मेरी तरफ बडे प्यार से देखा और मुस्कुराकर चला गया !!

    उस की मुस्कान में मुझे भी खुशी और संतोष हुआ…….
    लेकिन….. वह व्यक्ति मेरी तरफ देख रहा था, जैसे कि उसके अहम को चोट लगी हो !!

    फिर मेरे पास आकर कहा:-
    “आप जैसे लोग ही इन भिखारियों को सिर चढाते है”

    मैंने मुस्कराते हुए कहा- आपको मंदिर के अंदर इंसान के द्वारा बनाई पत्थर की मूर्ति में ईश्वर नजर आता है,
    लेकिन ईश्वर द्वारा बनाए इंसान के अंदर ईश्वर नजर नहीं आता है…!!
    मुझे नहीं पता आपके 500 रूपये के फूलों के हार से आपका मंदिर का भगवान मुस्करायेगा या नहीं,
    लेकिन मेरे 10 रूपये के चढावे से मैंने भगवान को मुस्कराते हुए देखा और मुझे संतुष्टी भी देकर गया है !!

       Satish sashank

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    🌹🌹🌹🌹🌹
    भगवान निरन्तर हम पर कृपा करते रहते है

    लेकिन हम कभी-कभी उनकी किरपा को महसूस नही कर पाते।

    एक सुन्दर कथा के माध्यम से समझिए…….

    एक बार की बात है बहुत तेज बारिश हो रही थी।

    दो मटके(घड़े) बाहर रखे हुए थे।

    बारिश में दोनों भीग रहे थे।

    थोड़ी देर के बाद जब बारिश बंद हुई तो एक मटका भर गया और दूसरा खाली रह गया।

    जो मटका खाली रह गया गया वो वर्षा से कहता है अरी वर्षा तू पक्षपात(भेदभाव)करती है।

    तूने इसे भर दिया है लेकिन मुझे नहीं भरा।

    तब बारिश कहती है।
    मटके तू ऐसा क्यों बोल रहा है।

    मैंने तुम दोनों मटको पर बराबर बारिश की है।

    लेकिन तू अपना मुँह तो देख।

    तेरा मुँह नीचे की ओर है।

    दोस्तों वो मटका उल्टा रखा हुआ था।

    गलती खुद की है लेकिन दोष दुसरो पर ।

    ठीक इसी तरह भगवान भी हम पर कृपा(kripa) करते है

    लेकिन गलती हमारी ही होती है।

    हमारी ही झोली छोटी पड़ जाये तो भगवान को दोषी क्यों ठहराए

    ।जिस तरह से सूर्य देव सब पर बराबर धूप डालते है।

    अब हम खुद ही मुख मोड़ के बैठ जाये तो हमारी गलती है ना की सुर्य देवता की।

    भगवान की कृपा संत जन समझ पाते है। वो प्रत्येक कर्म में भगवान की किरपा(kirpa) का अनुभव करते है।

    चाहे कुछ अच्छा हो या बुरा।
    🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

    Sadhna sharma

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    श्री राम जय राम जय जय राम

    बहुत साल पहले की बात है। एक आलसी लेकिन भोलाभाला युवक था आनंद। दिन भर कोई काम नहीं करता बस खाता ही रहता और सोए रहता। घर वालों ने कहा चलो जाओ निकलो घर से, कोई काम धाम करते नहीं हो बस पड़े रहते हो। वह घर से निकल कर यूं ही भटकते हुए एक आश्रम पहुंचा। वहां उसने देखा कि एक गुरुजी हैं उनके शिष्य कोई काम नहीं करते बस मंदिर की पूजा करते हैं।

    उसने मन में सोचा यह बढ़िया है कोई काम धाम नहीं बस पूजा ही तो करना है। गुरुजी के पास जाकर पूछा, क्या मैं यहां रह सकता हूं, गुरुजी बोले हां, हां क्यों नहीं?

    लेकिन मैं कोई काम नहीं कर सकता हूं

    गुरुजी : कोई काम नहीं करना है बस पूजा करना होगी

    आनंद : ठीक है वह तो मैं कर लूंगा …

    अब आनंद महाराज आश्रम में रहने लगे। ना कोई काम ना कोई धाम बस सारा दिन खाते रहो और प्रभु मक्ति में भजन गाते रहो।

    महीना भर हो गया फिर एक दिन आई एकादशी। उसने रसोई में जाकर देखा खाने की कोई तैयारी नहीं। उसने गुरुजी से पूछा आज खाना नहीं बनेगा क्या

    गुरुजी ने कहा नहीं आज तो एकादशी है तुम्हारा भी उपवास है ।

    उसने कहा नहीं अगर हमने उपवास कर लिया तो कल का दिन ही नहीं देख पाएंगे हम तो …. हम नहीं कर सकते उपवास… हमें तो भूख लगती है आपने पहले क्यों नहीं बताया?

    गुरुजी ने कहा ठीक है तुम ना करो उपवास, पर खाना भी तुम्हारे लिए कोई और नहीं बनाएगा तुम खुद बना लो।

    मरता क्या न करता

    गया रसोई में, गुरुजी फिर आए ”देखो अगर तुम खाना बना लो तो राम जी को भोग जरूर लगा लेना और नदी के उस पार जाकर बना लो रसोई। 

    ठीक है, लकड़ी, आटा, तेल, घी, सब्जी लेकर आंनद महाराज चले गए, जैसा तैसा खाना भी बनाया, खाने लगा तो याद आया गुरुजी ने कहा था कि राम जी को भोग लगाना है। 

    लगा भजन गाने

    आओ मेरे राम जी , भोग लगाओ जी

    प्रभु राम आइए, श्रीराम आइए मेरे भोजन का भोग लगाइए…..

    कोई ना आया, तो बैचैन हो गया कि यहां तो भूख लग रही है और राम जी आ ही नहीं रहे। भोला मानस जानता नहीं था कि प्रभु साक्षात तो आएंगे नहीं । पर गुरुजी की बात मानना जरूरी है। फिर उसने कहा , देखो प्रभु राम जी, मैं समझ गया कि आप क्यों नहीं आ रहे हैं। मैंने रूखा सूखा बनाया है और आपको तर माल खाने की आदत है इसलिए नहीं आ रहे हैं…. तो सुनो प्रभु … आज वहां भी कुछ नहीं बना है, सबकी एकादशी है, खाना हो तो यह भोग ही खालो…

    श्रीराम अपने भक्त की सरलता पर बड़े मुस्कुराए और माता सीता के साथ प्रकट हो गए। भक्त असमंजस में। गुरुजी ने तो कहा था कि राम जी आएंगे पर यहां तो माता सीता भी आईं है और मैंने तो भोजन बस दो लोगों का बनाया हैं। चलो कोई बात नहीं आज इन्हें ही खिला देते हैं।

    बोला प्रभु मैं भूखा रह गया लेकिन मुझे आप दोनों को देखकर बड़ा अच्छा लग रहा है लेकिन अगली एकादशी पर ऐसा न करना पहले बता देना कि कितने जन आ रहे हो, और हां थोड़ा जल्दी आ जाना। राम जी उसकी बात पर बड़े मुदित हुए। प्रसाद ग्रहण कर के चले गए। अगली एकादशी तक यह भोला मानस सब भूल गया। उसे लगा प्रभु ऐसे ही आते होंगे और प्रसाद ग्रहण करते होंगे।

    फिर एकादशी आई। गुरुजी से कहा, मैं चला अपना खाना बनाने पर गुरुजी थोड़ा ज्यादा अनाज लगेगा, वहां दो लोग आते हैं। गुरुजी मुस्कुराए, भूख के मारे बावला है। ठीक है ले जा और अनाज लेजा।

    अबकी बार उसने तीन लोगों का खाना बनाया। फिर गुहार लगाई

    प्रभु राम आइए, सीताराम आइए, मेरे भोजन का भोग लगाइए…

    प्रभु की महिमा भी निराली है। भक्त के साथ कौतुक करने में उन्हें भी बड़ा मजा आता है। इस बार वे अपने भाई लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न जी को लेकर आ गए। भक्त को चक्कर आ गए। यह क्या हुआ। एक का भोजन बनाया तो दो आए आज दो का खाना ज्यादा बनाया तो पूरा खानदान आ गया। लगता है आज भी भूखा ही रहना पड़ेगा। सबको भोजन लगाया और बैठे-बैठे देखता रहा। अनजाने ही उसकी भी एकादशी हो गई।

    फिर अगली एकादशी आने से पहले गुरुजी से कहा, गुरुजी, ये आपके प्रभु राम जी, अकेले क्यों नहीं आते हर बार कितने सारे लोग ले आते हैं? इस बार अनाज ज्यादा देना। गुरुजी को लगा, कहीं यह अनाज बेचता तो नहीं है देखना पड़ेगा जाकर। भंडार में जाकर कहा इसे जितना अनाज चाहिए दे दो और छुपकर उसे देखने चल पड़े।

    इस बार आनंद ने सोचा, खाना पहले नहीं बनाऊंगा, पता नहीं कितने लोग आ जाएं। पहले बुला लेता हूं फिर बनाता हूं। 

    फिर टेर लगाई प्रभु राम आइए , श्री राम आइए, मेरे भोजन का भोग लगाइए…

    सारा राम दरबार मौजूद… इस बार तो हनुमान जी भी साथ आए लेकिन यह क्या प्रसाद तो तैयार ही नहीं है। भक्त ठहरा भोला भाला, बोला प्रभु इस बार मैंने खाना नहीं बनाया, प्रभु ने पूछा क्यों? बोला, मुझे मिलेगा तो है नहीं फिर क्या फायदा बनाने का, आप ही बना लो और खुद ही खा लो….

    राम जी मुस्कुराए, सीता माता भी गदगद हो गई उसके मासूम जवाब से… लक्ष्मण जी बोले क्या करें प्रभु…

    प्रभु बोले भक्त की इच्छा है पूरी तो करनी पड़ेगी। चलो लग जाओ काम से। लक्ष्मण जी ने लकड़ी उठाई, माता सीता आटा सानने लगीं। भक्त एक तरफ बैठकर देखता रहा। माता सीता रसोई बना रही थी तो कई ऋषि-मुनि, यक्ष, गंधर्व प्रसाद लेने आने लगे। इधर गुरुजी ने देखा खाना तो बना नहीं भक्त एक कोने में बैठा है। पूछा बेटा क्या बात है खाना क्यों नहीं बनाया?

    बोला, अच्छा किया गुरुजी आप आ गए देखिए कितने लोग आते हैं प्रभु श्रीराम  के साथ….. 

    गुरुजी बोले, मुझे तो कुछ नहीं दिख रहा तुम्हारे और अनाज के सिवा।

    भक्त ने माथा पकड़ लिया, एक तो इतनी मेहनत करवाते हैं प्रभु, भूखा भी रखते हैं और ऊपर से गुरुजी को दिख भी नहीं रहे यह और बड़ी मुसीबत है।

    प्रभु से कहा, आप गुरुजी को क्यों नहीं दिख रहे हैं?

    प्रभु बोले : मैं उन्हें नहीं दिख सकता।

    बोला : क्यों , वे तो बड़े पंडित हैं, ज्ञानी हैं विद्वान हैं उन्हें तो बहुत कुछ आता है उनको क्यों नहीं दिखते आप?

    प्रभु बोले , माना कि उनको सब आता है पर वे सरल नहीं हैं तुम्हारी तरह। इसलिए उनको नहीं दिख सकता…. 

    आनंद ने गुरुजी से कहा, गुरुजी प्रभु कह रहे हैं आप सरल नहीं है इसलिए आपको नहीं दिखेंगे, गुरुजी रोने लगे वाकई मैंने सबकुछ पाया पर सरलता नहीं पा सका तुम्हारी तरह, और प्रभु तो मन की सरलता से ही मिलते हैं।

    प्रभु प्रकट हो गए और गुरुजी को भी दर्शन दिए। इस तरह एक भक्त के कहने पर प्रभु ने रसोई भी बनाई।

    यह भक्ति कथा लोकश्रुति पर आधारित है।

    जय श्रीराम

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    (((((  ॐ नमो   नारायणा   ))))

    श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
    अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥

    श्रवण (परीक्षित), कीर्तन (शुकदेव), स्मरण (प्रह्लाद), पादसेवन (लक्ष्मी), अर्चन (पृथुराजा), वंदन (अक्रूर), दास्य (हनुमान), सख्य (अर्जुन) और आत्मनिवेदन (बलि राजा) – इन्हें नवधा भक्ति कहते हैं।

    श्रवण: ईश्वर की लीला, कथा, महत्व, शक्ति, स्रोत इत्यादि को परम श्रद्धा सहित अतृप्त मन से निरंतर सुनना।

    कीर्तन: ईश्वर के गुण, चरित्र, नाम, पराक्रम आदि का आनंद एवं उत्साह के साथ कीर्तन करना।

    स्मरण: निरंतर अनन्य भाव से परमेश्वर का स्मरण करना, उनके महात्म्य और शक्ति का स्मरण कर उस पर मुग्ध होना।

    पाद सेवन: ईश्वर के चरणों का आश्रय लेना और उन्हीं को अपना सर्वस्य समझना।

    अर्चन: मन, वचन और कर्म द्वारा पवित्र सामग्री से ईश्वर के चरणों का पूजन करना।

    वंदन: भगवान की मूर्ति को अथवा भगवान के अंश रूप में व्याप्त भक्तजन, आचार्य, ब्राह्मण, गुरूजन, माता-पिता आदि को परम आदर सत्कार के साथ पवित्र भाव से नमस्कार करना या उनकी सेवा करना।

    दास्य: ईश्वर को स्वामी और अपने को दास समझकर परम श्रद्धा के साथ सेवा करना।

    सख्य: ईश्वर को ही अपना परम मित्र समझकर अपना सर्वस्व उसे समर्पण कर देना तथा सच्चे भाव से अपने पाप पुण्य का निवेदन करना।

    आत्मनिवेदन: अपने आपको भगवान के चरणों में सदा के लिए समर्पण कर देना और कुछ भी अपनी स्वतंत्र सत्ता न रखना। यह भक्ति की सबसे उत्तम अवस्था मानी गई हैं।

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    • जगत की रीत –

    एक बार एक गाँव में पंचायत लगी थी | वहीं थोड़ी दुरी पर एक संत ने अपना बसेरा किया हुआ था|जब पंचायत किसी निर्णय पर नहीं पहुच सकी तो किसी ने कहा कि क्यों न हम महात्मा जी के पास अपनी समस्या को लेकर चलें अतः सभी संत के पास पहुंचे | जब संत ने गांव के लोगों को देखा तो पुछा कि कैसे आना हुआ? तो लोगों ने कहा ‘महात्मा जी गाँव भर में एक ही कुआँ हैं और कुँए का पानी हम नहीं पी सकते, बदबू आ रही है । मन भी नहीं होता पानी पीने को।

    संत ने पुछा–हुआ क्या?पानी क्यों नहीं पी सक रहे हो?

    लोग बोले–तीन कुत्ते लड़ते लड़ते उसमें गिर गये थे । बाहर नहीं निकले, मर गये उसी में । अब जिसमें कुत्ते मर गए हों, उसका पानी कौन पिये महात्मा जी ?
    संत  ने कहा — ‘एक काम करो ,उसमें गंगाजल डलवाओ,
    तो कुएं में गंगाजल भी आठ दस बाल्टी छोड़ दिया गया ।
    फिर भी समस्या जस की तस !
    लोग फिर से संत के पास पहुंचे,अब संत ने कहा”
    भगवान की कथा कराओ”।

    लोगों ने कहा ••••ठीक है ।

    कथा हुई , फिर भी समस्या जस की तस
    लोग फिर संत के पास पहुंचे !
    अब संत ने कहा
    उसमें सुगंधित द्रव्य डलवाओ।

    लोगों ने फिर कहा ••••• हाँ, अवश्य ।
    सुगंधित द्रव्य डाला गया|
    नतीजा फिर वही…ढाक के तीन पात
    लोग फिर संत के पास
    अब संत खुद चलकर आये ।
    लोगों ने कहा– महाराज ! वही हालत है, हमने सब करके देख लिया । गंगाजल भी डलवाया, कथा भी करवायी, प्रसाद भी बाँटा और उसमें सुगन्धित पुष्प और बहुत चीजें डालीं; लेकिन महाराज ! हालत वहीं की वहीं ।अब संत आश्चर्यचकित हुए कि अभी भी इनका मन कैसे नहीं बदला।
    तो संत ने पुछा– कि तुमने और सब तो किया, वे तीन कुत्ते मरे पड़े थे, उन्हें निकाला कि नहीं?
    लोग बोले — उनके लिए न आपने कहा था न हमने निकाला, बाकी सब किया । वे तो वहीं के वहीं पड़े हैं ।
    संत बोले — जब तक उन्हें नहीं निकालोगे, इन उपायों का कोई प्रभाव नहीं होगा।
    *👉सही बात यह है कि हमारे आपके जीवन की यह कहानी है । इस शरीर नामक गाँव के अंतःकरण के कुएँ में ये काम, क्रोध और लोभ के तीन कुत्ते लड़ते झगड़ते गिर गये हैं । इन्हीं की सारी बदबू है ।
    हम उपाय पूछते हैं तो लोग बताते हैं– तिर्थयात्रा कर लो, थोड़ा यह कर लो, थोड़ा पूजा करो, थोड़ा पाठ। सब करते हैं, पर बदबू उन्हीं दुर्गुणों की आती रहती है ।
    तो पहले इन्हें निकाल कर बाहर करें तभी जीवन उपयोगी होगा ।
    Jai shree krishna