Posted in Uncategorized

एक बहुत अरबपति महिला ने एक गरीब चित्रकार से अपना चित्र बनवाया, पोट्रट बनवाया। चित्र बन गया, तो वह अमीर महिला अपना चित्र लेने आयी। वह बहुत खुश थी। चित्रकार से उसने कहा, कि क्या उसका पुरस्कार दूं? चित्रकार गरीब आदमी था। गरीब आदमी वासना भी करे तो कितनी बड़ी करे, मांगे भी तो कितना मांगे?

हमारी मांग, सब गरीब आदमी की मांग है परमात्मा से। हम जो मांग रहे हैं, वह क्षुद्र है। जिससे मांग रहे हैं, उससे यह बात मांगनी नहीं चाहिए।

तो उसने सोचा मन में कि सौ डालर मांगूं, दो सौ डालर मांगूं, पांच सौ डालर मांगूं। फिर उसकी हिम्मत डिगने लगी। इतना देगी, नहीं देगी! फिर उसने सोचा कि बेहतर यह हो कि इसी पर छोड़ दूं, शायद ज्यादा दे। डर तो लगा मन में कि इस पर छोड़ दूं, पता नहीं दे या न दे, या कहीं कम दे और एक दफा छोड़ दिया तो फिर! तो उसने फिर भी हिम्मत की। उसने कहा कि आपकी जो मर्जी। तो उसके हाथ में जो उसका बैग था, पर्स था, उसने कहा,तो अच्छा तो यह पर्स तुम रख लो। यह बडा कीमती पर्स है।
पर्स तो कीमती था, लेकिन चित्रकार की छाती बैठ गयी कि पर्स को रखकर करूंगा भी क्या? माना कि कीमती है और सुंदर है, पर इससे कुछ आता-जाता नहीं। इससे तो बेहतर था कुछ सौ डालर ही मांग लेते। तो उसने कहा, नहीं-नहीं, मैं पर्स का क्या करूंगा, आप कोई सौ डालर दे दें।

उस महिला ने कहा, तुम्हारी मर्जी। उसने पर्स खोला, उसमें एक लाख डालर थे, उसने सौ डालर निकाल कर चित्रकार को दे दिये और पर्स लेकर वह चली गयी।
सुना है कि चित्रकार अब तक छाती पीट रहा है और रो रहा है–मर गये, मारे गये, अपने से ही मारे गये!
आदमी करीब-करीब इस हालत में है। परमात्मा ने जो दिया है, वह बंद है, छिपा है। और हम मांगे जा रहे हैं–दो-दो पैसे, दो-दो कौड़ी की बात। और वह जीवन की जो संपदा उसने हमें दी है, उस पर्स को हमने खोल कर भी नहीं देखा है।

जो मिला है, वह जो आप मांग सकते हैं, उससे अनंत गुना ज्यादा है। लेकिन मांग से फुरसत हो, तो दिखायी पड़े, वह जो मिला है। भिखारी अपने घर आये, तो पता चले कि घर में क्या छिपा है। वह अपना भिक्षापात्र लिये बाजार में ही खड़ा है! वह घर धीरे-धीरे भूल ही जाता है, भिक्षा-पात्र ही हाथ में रह जाता है। इस भिक्षापात्र को लिये हुए भटकते-भटकते जन्मों-जन्मों में भी कुछ मिला नहीं। कुछ मिलेगा नहीं।

ओशो… समाधि के सप्त द्वार

Posted in Uncategorized

🐘🐝
लुकमान की कहानी
हाथी  और मक्खी  

लुकमान की एक छोटी कहानी है। और लुकमान ने कहानियों में ही अपना संदेश दिया है। ईसप की प्रसिद्ध कहानियां आधे से ज्यादा लुकमान की ही कहानियां हैं, जिन्हें ईसप ने फिर से प्रस्तुत किया है। लुकमान कहता है, एक मक्खी एक हाथी के ऊपर बैठ गयी। हाथी को पता न चला मक्खी कब बैठी। मक्खी बहुत भिनभिनाई, आवाज की, और कहा, ‘भाई!’ मक्खी का मन होता है हाथी को भाई कहने का। कहा, ‘भाई! तुझे कोई तकलीफ हो तो बता देना। वजन मालूम पड़े तो खबर कर देना, मैं हट जाऊंगी।’ लेकिन हाथी को कुछ सुनाई न पड़ा। फिर हाथी एक पुल पर से गुजरता था बड़ी पहाड़ी नदी थी, भयंकर गङ्ढ था, मक्खी ने कहा कि ‘देख, दो हैं, कहीं पुल टूट न जाए! अगर ऐसा कुछ डर लगे तो मुझे बता देना। मेरे पास पंख हैं, मैं उड़ जाऊंगी।’ हाथी के कान में थोड़ी-सी कुछ भिनभिनाहट पड़ी, पर उसने कुछ ध्यान न दिया। फिर मक्खी के बिदा होने का वक्त आ गया। उसने कहा, ‘यात्रा बड़ी सुखद हुई। तीर्थयात्रा थी, साथी-संगी रहे, मित्रता बनी, अब मैं जाती हूं। कोई काम हो, तो मुझे कहना।’
तब मक्खी की आवाज थोड़ी हाथी को सुनाई पड़ी। उसने कहा, ‘तू कौन है कुछ पता नहीं। कब तू आयी, कब तू मेरे शरीर पर बैठी, कब तू उड़ गयी, इसका कोई हिसाब नहीं है। लेकिन मक्खी तब तक जा चुकी थी।

लुकमान कहता है, ‘हमारा होना भी ऐसा ही है। इस बड़ी पृथ्वी पर हमारे होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। इस बड़े अस्तित्व में हाथी और मक्खी के अनुपात से भी हमारा अनुपात छोटा है। क्या भेद पड़ता है? लेकिन हम बड़ा शोरगुल मचाते हैं। हम बड़ा शोरगुल मचाते हैं! वह शोरगुल किसलिये है? वह मक्खी क्या चाहती थी? वह चाहती थी हाथी स्वीकार करे, तू भी है; तेरा भी अस्तित्व है।

हमारा अहंकार अकेले तो नहीं जी सक रहा है। दूसरे उसे मानें, तो ही जी सकता है। इसलिए हम सब उपाय करते हैं कि किसी भांति दूसरे उसे मानें, ध्यान दें, हमारी तरफ देखें; उपेक्षा न हो। हम वस्त्र पहनते हैं तो दूसरों के लिये, स्नान करते हैं तो दूसरों के लिये, सजाते-संवारते हैं तो दूसरों के लिये। धन इकट्ठा करते, मकान बनाते, तो दूसरों के लिये। दूसरे देखें और स्वीकार करें कि तुम कुछ विशिष्ट हो। तुम कोई साधारण नहीं। तुम कोई मिट्टी से बने पुतले नहीं हो। तुम कोई मिट्टी से आये और मिट्टी में नहीं चले जाओगे, तुम विशिष्ट हो। तुम्हारी गरिमा अनूठी है। तुम अद्वितीय हो। अहंकार सदा इस तलाश में है-
वे आंखें मिल जाएं, जो मेरी छाया को वजन दे दें।

🌹🌹 ओशो 🌹🌹

Posted in Uncategorized

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परं शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।

जितेन्द्रिय, साधनापरायण और श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के  तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है।
– श्रीमद्भागवद्गीता 4/39

Posted in Uncategorized

“माँ का कर्ज और एक ईमानदार बेटे का फर्ज”

सच्ची घटना आपसे साझा कर रहा हूँ –
एक नवयुवक मुझे मिलने आया। जब उनसे अपना परिचय दिया, तो मुझे बीस बरस पहले घटी एक घटना याद हो आई।

एक मजदूर महिला, जो खेत में काम करने गई थी। जहां उसे एक जहरीले सांप ने काट लिया। उसे सांप का जहर उतारने वाले के पास ले जाया गया। वह ठीक तो हो गई, लेकिन कुछ ही दिनों के बाद उसके शरीर पर जहर के दुश्परिणाम दिखाई देने लगे।

उसके दोनों पैरों के पिछे की, ‘जंघा’ से लेकर ‘एड़ी’ तक पूरे पैर की चमड़ी धीरे-धीरे गलने लगी थी। और दोनों पैरों का पिछला हिस्सा घाव से भर गया था, ठीक वैसा ही जैसा जलने पर घाव हो जाता है।

वह ओंधेमुंह, अपने दोनों पैरों को ओंधा कर, उस पर कपड़ा डाले लेटी हुई थी। घाव से पानी रिस रहा था और कपड़ा घाव पर चिपक रहा था।

उसका पति, जो लकवा रोग से पीड़ित था, पंखा झलकर घाव से मख्खियां उड़ा रहा था।

उसे अस्पताल ले जाना बेहद जरूरी था। जबकि उसके पास शहर के अस्पताल जाने का किराया तक नहीं था। पति अपाहिज था, और बच्चे छोटे थे। महिला की मजदूरी के पैसे से ही घर का सारा खर्च चलता था।

भयभीत करने वाली बात यह थी कि महिला गर्भवती थी। और उसके पेट में छः से सात महीने का बच्चा था। संक्रमण का खतरा बढ़ रहा था। अतः माँ और बच्चा दोनों की जान पर खतरा मंडराने लगा था।

मेरे मन में रह रह कर एक ही ख़याल घूम रहा था ‘क्या होगा…? क्या यह बच्चा जन्म लेने के पहले ही…
नहीं… नहीं… ऐसा नहीं होना चाहिए।’

मैं रात को ठीक तरह से सो नहीं सका। मन में एक विचार आया कि ‘मैं भी किसान हूँ और मेरे परिवार के लोग भी कभी-कभी खेत में काम करने जाते हैं। यदि इसकी जगह पर, मेरी माँ, भाभी, पत्नी या बहन होती तो??’

सुबह होते ही मैं उसके घर गया और उसकी चिकित्सा की व्यवस्था करवाई।

कुछ दिनों के इलाज से महिला ठीक हो गई और उसने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।

यह वही बच्चा था, जो आज बीस बरस का हो चुका था। अपनी पहली तनख्वाह से मेरे रूपये लौटाने आया था, वही रूपये जब यह अपनी माँ के पेट में था और मैंने इसकी मां के इलाज पर खर्च किये थे।

“माँ कहती है, आप न होते तो हम न होते।” कहते हुए, उसने मेरे पैर छूकर धन्यवाद दिया।

स्वामी ध्यान उत्सव
नवीन जैन

Posted in Uncategorized

चाणक्य महान !!

नंद वंश का खात्मा कर लिया बदला,
बच्चे को बना दिया था भारत का सम्राट!!

बिहार की धरती पर एक से बढ़कर एक
महापुरुषों ने जन्म लिया है,उन्ही में से
एक ऐसे महापुरुष के बारे में हम चर्चा
करेंगे जिसकी बनाई नीतियों पर आज
भी बड़े-बड़े सूरमा चलना चाहते हैं।

जिसने कूटनीति, अर्थनीति और राजनीति
में ऐसे मानक स्थापित किए जो आज
भी लोगों के लिए आदर्श बने हुए हैं।

उसने राजा हो या रंक, स्त्री हो या पुरुष,
बालक हो या वृद्ध हर किसी के लिए कई
और महत्वपूर्ण नियम निर्धारित किए,
जिन पर चलकर आज भी कोई किसी
भी लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।

उस महाज्ञानी और महाविद्वान का
नाम है चाणक्य !

चाणक्य का नाम सुनते ही एक तेज-तर्रार
व्यक्ति की छवि दिमाग में दौड़ जाती है।

दुनिया भर में चाणक्य को एक महान
विचारक,कूटनीतिक,राजनीतिक और
उच्च कोटि के अर्थशास्त्री का दर्जा
प्राप्त है।

चाणक्य ने सदियों पहले जिस अर्थशास्त्र
की लिख डाला था उसे अभी भी अनुसरण 
किया जाता है।

भारतीय विचारक मानते हैं कि चाणक्य
उन लोगों में से एक हैं जिन्होने सबसे
पहले एकछत्र भारत की कल्पना की थी।

चाणक्य ने अपने जीवन में हमेशा उच्च
विचारों और ऊंचे आदर्शों को अपनाए रखा।

—गुणों की खान थे चाणक्य!!

चाणक्य को एक ओर पारंगत और
दूरदर्शी राजनीतिज्ञ के रूप में मौर्य
साम्राज्य का संस्थापक और संरक्षक
माना जाता है,तो दूसरी ओर उसे संस्कृति
साहित्य के इतिहास में अपनी अतुलनीय
एवं अद्भुत कृति के कारण अपने विषय
का एकमात्र विद्वान होने का गौरव प्राप्त है।

कौटिल्य की विद्वता, निपुणता और
दूरदर्शिता का बखान भारत के शास्त्रों,
काव्यों तथा अन्य ग्रंथों में किया गया है।

—भरी सभा में कहा था नंद वंश का
कर दूंगा समूल नाश!

चाणक्य ने नंद वंश के राजा से कहा था
कि व्यक्ति अपने गुणों से ऊपर बैठता है,
ऊंचे स्थान पर बैठने से कोई भी ऊंचा नहीं
हो जाता है।

ये बातें चाणक्य ने तत्कालीन शक्तिशाली
राजा महानंद के राजदरबार में कहीं थी।

तब मगध राज्य में किसी यज्ञ का
आयोजन किया गया था।

उस यज्ञ में चाणक्य भी सम्मिलित हुए
थे और जाकर एक प्रधान आसन पर
बैठ गए थे।

इनके काले कलूटे रंग को देखकर
महाराज नंद इन्हे आसन से उठवा
कर अपमानित किया था।

अपमान से क्रोधित होकर चाणक्य
ने भरी सभा में प्रतिज्ञा की कि जब
तक मैं नंद वंश का समूल नाश नहीं
कर दूंगा अपनी चोटी नहीं बाधूंगा।

—एकछत्र भारत का देखा था सपना!

चाणक्य एक बहुत ही क्रोधी और बुद्धिमान
ब्राम्हण थे जिन्हे कौटिल्य के नाम से भी
जाना जाता है।

चाणक्य को मौर्य साम्राज्य के संस्थापक
के रूप में भी याद किया जाता है।

चाणक्य की सबसे बड़ी इच्छा थी कि भारत
को एक गौरवशाली और विशाल राज्य के
रूप में देखना।

—चंद्रगुप्त के संग मिलकर लिया अपमान
का बदला!

उन दिनों राज्य से निकाले गए राजकुमार
चंद्रगुप्त से मुलाकात चाणक्य की
मुलाकात हुई।

चाणक्य ने इस राजकुमार को शिक्षा-दीक्षा
देकर योग्य राजकुमार बनाया।
जिसकी मदद से चाणक्य ने नंदवंश के ताबूत
में आखिरी कील ठोकी थी।

चाणक्य ने जो अखंड़ भारत का सपना था
उसे चंद्रगुप्त के साथ मिलकर पूरा किया।
चंद्रगुप्त चाणक्य की मदद से संपूर्ण भारत
को एक साम्राज्य के अधीन लाने में सफल
हो गए थे।

—मौर्य वंश की नींव!

मुद्रा राक्षस के मुताबिक चंद्रगुप्त मौर्य नंद वंश
के राजा सर्वार्थसिद्धि के पुत्र थे,
चंद्रगुप्त की माता का नाम मुरा था जो कि एक
शूद्र की पुत्री थी।

वहीं विष्णु पुराण से पता चलता है कि चंद्रगुप्त
नंद वंश का ही राजकुमार था जो मुरा नामक
दासी का पुत्र था।

नंद वंश की शुरुआत महापद्मानंद के द्वारा की
मानी जाती है,जिसे मगध का पहला शूद्र राजा
कहा जाता है।

आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान विभूति थे,
जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल
पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया।

मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य कुशल
राजनीतिज्ञ,चतुर कूटनीतिज्ञ,प्रकांड अर्थशास्त्री
के रूप में भी विश्वविख्‍यात हुए।

इतनी सदियाँ गुजरने के बाद आज भी
यदि चाणक्य के द्वारा बताए गए सिद्धांत ‍
और नीतियाँ प्रासंगिक हैं तो मात्र इसलिए
क्योंकि उन्होंने अपने गहन अध्‍ययन,चिंतन
और जीवानानुभवों से अर्जित अमूल्य ज्ञान
को,पूरी तरह नि:स्वार्थ होकर मानवीय
कल्याण के उद्‍देश्य से अभिव्यक्त किया।

वर्तमान दौर की सामाजिक संरचना,भूमंडलीकृत
अर्थव्यवस्था और शासन-प्रशासन को सुचारू
ढंग से बताई गई ‍नीतियाँ और सूत्र अत्यधिक
कारगर सिद्ध हो सकते हैं।

चाणक्य नीति के द्वितीय अध्याय से यहाँ प्रस्तुत
हैं कुछ अंश –

  1. जिस प्रकार सभी पर्वतों पर मणि नहीं
    मिलती,सभी हाथियों के मस्तक में मोती
    उत्पन्न नहीं होता,सभी वनों में चंदन का
    वृक्ष नहीं होता,उसी प्रकार सज्जन पुरुष
    सभी जगहों पर नहीं मिलते हैं।
  2. झूठ बोलना,उतावलापन दिखाना,
    दुस्साहस करना,छल-कपट करना,
    मूर्खतापूर्ण कार्य करना,लोभ करना,
    अपवित्रता और निर्दयता – ये सभी
    स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं।
    चाणक्य उपर्युक्त दोषों को स्त्रियों का
    स्वाभाविक गुण मानते हैं।
    हालाँकि वर्तमान दौर की शिक्षित स्त्रियों
    में इन दोषों का होना सही नहीं कहा जा
    सकता है।

  3. भोजन के लिए अच्छे पदार्थों का उपलब्ध
    होना,उन्हें पचाने की शक्ति का होना,सुंदर स्त्री
    के साथ संसर्ग के लिए कामशक्ति का होना,
    प्रचुर धन के साथ-साथ धन देने की इच्छा
    होना।
    ये सभी सुख मनुष्य को बहुत कठिनता से
    प्राप्त होते हैं।

  4. चाणक्य कहते हैं कि जिस व्यक्ति का
    पुत्र उसके नियंत्रण में रहता है,जिसकी
    पत्नी आज्ञा के अनुसार आचरण करती
    है और जो व्यक्ति अपने कमाए धन से
    पूरी तरह संतुष्ट रहता है,ऐसे मनुष्य के
    लिए यह संसार ही स्वर्ग के समान है।

  5. चाणक्य का मानना है कि वही गृहस्थी
    सुखी है,जिसकी संतान उनकी आज्ञा का
    पालन करती है।
    पिता का भी कर्तव्य है कि वह पुत्रों का
    पालन-पोषण अच्छी तरह से करे।
    इसी प्रकार ऐसे व्यक्ति को मित्र नहीं कहा
    जा सकता है,जिस पर विश्वास नहीं किया
    जा सके और ऐसी पत्नी व्यर्थ है जिससे
    किसी प्रकार का सुख प्राप्त न हो।

  6. जो मित्र आपके सामने चिकनी-चुपड़ी
    बातें करता हो और पीठ पीछे आपके कार्य
    को बिगाड़ देता हो,उसे त्याग देने में ही
    भलाई है।
    चाणक्य कहते हैं कि वह उस बर्तनके
    समान है,जिसके ऊपर के हिस्से में दूध
    लगा है परंतु अंदर विष भरा हुआ होता है।

  7. जिस प्रकार पत्नी के वियोग का दुख,
    अपने भाई-बंधुओं से प्राप्त अपमान का
    दुख असहनीय होता है,उसी प्रकार कर्ज
    से दबा व्यक्ति भी हर समय दुखी रहता है।
    दुष्ट राजा की सेवा में रहने वाला नौकर भी
    दुखी रहता है।
    निर्धनता का अभिशाप भी मनुष्य कभी
    नहीं भुला पाता।
    इनसे व्यक्ति की आत्मा अंदर ही अंदर
    जलती रहती है।

  8. ब्राह्मणों का बल विद्या है,राजाओं का
    बल उनकी सेना है,वैश्यों का बल उनका
    धन है और शूद्रों का बल दूसरों की सेवा
    करना है।
    ब्राह्मणों का कर्तव्य है कि वे विद्या ग्रहण करें।
    राजा का कर्तव्य है कि वे सैनिकों द्वारा अपने
    बल को बढ़ाते रहें।
    वैश्यों का कर्तव्य है कि वे व्यापार द्वारा धन
    बढ़ाएँ,शूद्रों का कर्तव्य श्रेष्ठ लोगों की सेवा
    करना है।

  9. चाणक्य का कहना है कि मूर्खता के समान
    यौवन भी दुखदायी होता है क्योंकि जवानी में
    व्यक्ति कामवासना के आवेग में कोई भी
    मूर्खतापूर्ण कार्य कर सकता है।
    परंतु इनसे भी अधिक कष्टदायक है दूसरों
    पर आश्रित रहना।

  10. चाणक्य कहते हैं कि बचपन में संतान
    को जैसी शिक्षा दी जाती है,उनका विकास
    उसी प्रकार होता है।
    इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे
    उन्हें ऐसे मार्ग पर चलाएँ, जिससे उनमें
    उत्तम चरित्र का विकास हो क्योंकि गुणी
    व्यक्तियों से ही कुल की शोभा बढ़ती है।

  11. वे माता-पिता अपने बच्चों के लिए शत्रु
    के समान हैं,जिन्होंने बच्चों को ‍अच्छी शिक्षा
    नहीं दी।
    क्योंकि अनपढ़ बालक का विद्वानों के समूह
    में उसी प्रकार अपमान होता है जैसे हंसों के
    झुंड में बगुले की स्थिति होती है।
    शिक्षा विहीन मनुष्य बिना पूँछ के जानवर
    जैसा होता है,इसलिए माता-पिता का कर्तव्य
    है कि वे बच्चों को ऐसी शिक्षा दें जिससे वे
    समाज को सुशोभित करें।

  12. चाणक्य कहते हैं कि अधिक लाड़
    प्यार करने से बच्चों में अनेक दोष उत्पन्न
    हो जाते हैं।
    इसलिए यदि वे कोई गलत काम करते हैं
    तो उसे नजरअंदाज करके लाड़-प्यार
    करना उचित नहीं है।
    बच्चे को डाँटना भी आवश्यक है।

  13. शिक्षा और अध्ययन की महत्ता बताते
    हुए चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य का जन्म
    बहुत सौभाग्य से मिलता है,इसलिए हमें
    अपने अधिकाधिक समय का वे‍दादि
    शास्त्रों के अध्ययन में तथा दान जैसे
    अच्छे कार्यों में ही सदुपयोग करना
    चाहिए।

  14. चाणक्य कहते हैं कि जो व्यक्ति अच्छा
    मित्र नहीं है उस पर तो विश्वास नहीं करना
    चाहिए,परंतु इसके साथ ही अच्छे मित्र के
    संबंध में भी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए,
    क्योंकि यदि वह नाराज हो गया तो आपके
    सारे भेद खोल सकता है।
    अत: सावधानी अत्यंत आवश्यक है।

चाणक्य का मानना है कि व्यक्ति को कभी
अपने मन का भेद नहीं खोलना चाहिए।
उसे जो भी कार्य करना है,उसे अपने मन में
रखे और पूरी तन्मयता के साथ समय आने
पर उसे पूरा करना चाहिए।

  1. चाणक्य के अनुसार नदी के किनारे
    स्थित वृक्षों का जीवन अनिश्चित होता है,
    क्योंकि नदियाँ बाढ़ के समय अपने किनारे
    के पेड़ों को उजाड़ देती हैं।
    इसी प्रकार दूसरे के घरों में रहने वाली स्त्री
    भी किसी समय पतन के मार्ग पर जा
    सकती है।
    इसी तरह जिस राजा के पास अच्छी सलाह
    देने वाले मंत्री नहीं होते,वह भी बहुत समय
    तक सुरक्षित नहीं रह सकता।
    इसमें जरा भी संदेह नहीं करना चाहिए।
  • चाणक्य कहते हैं कि जिस तरह वेश्या
    धन के समाप्त होने पर पुरुष से मुँह मोड़
    लेती है,उसी तरह जब राजा शक्तिहीन हो
    जाता है तो प्रजा उसका साथ छोड़ देती है।
    इसी प्रकार वृक्षों पर रहने वाले पक्षी भी
    तभी तक किसी वृक्ष पर बसेरा रखते हैं,
    जब तक वहाँ से उन्हें फल प्राप्त होते
    रहते हैं।
    अतिथि का जब पूरा स्वागत-सत्कार नही
    किया जाता है तो वह भी उस घर को छोड़
    देता है।

  • बुरे चरित्र वाले, अकारण दूसरों को
    हानि पहुँचाने वाले तथा अशुद्ध स्थान पर
    रहने वाले व्यक्ति के साथ जो पुरुष मित्रता
    करता है,वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
    आचार्य चाणक्य का कहना है मनुष्य को
    कुसंगति से बचना चाहिए।
    वे कहते हैं कि मनुष्य की भलाई इसी में
    है कि वह जितनी जल्दी हो सके,दुष्ट
    व्यक्ति का साथ छोड़ दे।

  • चाणक्य कहते हैं कि मित्रता,बराबरी
    वाले व्यक्तियों में ही करना ठीक रहता है।
    राज सेवा सर्वोत्तम सेवा होती है और
    अच्छे व्यापार के लिए व्यवहारकुशल
    होना आवश्यक है।
    इसी तरह सुंदर व सुशील स्त्री घर में ही
    शोभा देती है।
    –#साभार_संकलित;

  • उस महान विभूति को समस्त सनातनियों का कोटिशः नमन,वंदन,

    जयति पुण्य सनातन संस्कृति,
    जयति पुण्य भूमि भारत,

    सदा सर्वदा सुमंगल,,
    हर हर महादेव,,
    जय भवानी,,
    जय श्री राम,,

    विजय कृष्णा पांडेय

    Posted in Uncategorized

    ओ३म्

    🌷वेद के 120 अनमोल रत्न(सूक्तियाँ)🌷

    1) न यस्य हन्यते सखा न जीयते कदाचन ।। ऋ०१०/१५२/१
    ईश्वर के भक्त को न कोई नष्ट कर सकता है न जीत सकता है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    2) तस्य ते भक्तिवांसः स्याम ।। अ० ६/७९/३
    हे प्रभो हम तेरे भक्त हो।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    3) स नः पर्षद् अतिद्विषः ।। अ० ६/३४/१
    ईश्वर हमें द्वेषों से पृथक कर दे।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    4) न विन्धेऽस्य सुष्टुतिम् ।। ऋ० १/७/७
    मैं परमात्मा की स्तुति का पार नहीं पाता।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    5) यत्र सोमः सदमित् तत्र भद्रम् ।। अ० ७/१८/२
    जहां परमेश्वर की ज्योति है वहां सदा ही कल्याण है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    6) महे चन त्वामद्रिवः परा शुक्लाय देयाम् ।। ऋ० ८/१/५
    हे ईश्वर ! मैं तुझे किसी कीमत पर भी न छोडूँ।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    7) स एष एक एकवृदेक एव ।। अ० १३/४/२०
    वह ईश्वर एक और सचमुच एक ही है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    8) न रिष्यते त्वावतः सखा ।। ऋ०१/९१/८
    ईश्वर ! आपका मित्र कभी नष्ट नहीं होता।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    9) ओ३म् क्रतो स्मर ।। य० ४०/१५
    हे कर्मशील मनुष्य!तू ओ३म् का स्मरण कर।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    10) एको विश्वस्य भुवनस्य राजा ।। ऋ०६/३६/४
    वह सब लोकों का एक ही स्वामी है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    11) ईशावास्यमिदं सर्वम् ।। य०। ४०/१
    इस सारे जगत में ईश्वर व्याप्त है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    12) त्वमस्माकं तव स्मसि ।। ऋ०८/९२/३२
    प्रभु ! तू हमारा है, हम तेरे हैं।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    13) अधा म इन्द्र श्रृणवो हवेमा ।।ऋ०७/२९/३
    हे प्रभु !अब तो मेरी इन प्रार्थनाओं को सुन लो।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    14) तमेव विद्वान् न बिभाय मृत्योः ।। अ० १०/८/४४
    आत्मा को जानने पर मनुष्य मृत्यु से नहीं डरता।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    15) यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति ।। ऋ०१/१६४/३९
    जो उस ब्रह्म को नहीं जानता वह वेद से क्या करेगा।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    16) तवेद्धि सख्यम स्तृतम्।। ऋ० १/१५/५
    प्रभो! तेरी मैत्री ही सच्ची है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    17) स्वस्ति गोभ्यो जगते पुरूषेभ्यः ।। अ० १/३१/४
    सब पशु पक्षी और प्राणीमात्र का भला हो।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    18) स्वस्ति मात्र उत पित्रे नो अस्तु ।।अ० १/३१/४
    हमारे माता और पिता सुखी रहें।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    19) रमन्तां पुण्या लक्ष्मीर्याः पापीस्ताऽनीनशम् । अ०७/११५/४
    पुण्य की कमाई मेरे घर की शोभा बढावे और पाप की कमाई को मैं नष्ट कर देता हूं।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    20) मा जीवेभ्यः प्रमदः ।।। अ०८/१/७
    प्राणियों की और से बेपरवाह मत हो।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    21) मा प्रगाम पथो वयम् ।। अ० १३/१/५९
    सन्मार्ग से हम विचलित न हों।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    22) मान्तः स्थुर्नों अरातयः ।। ऋ० १०/५७/१
    हमारे अन्दर कंजूसी न हो।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    23) उतो रयिः पृणतो नोपदस्यति ।। ऋ० १०/११७/१
    दानी का दान घटता नहीं।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    24) अक्षैर्मा दीव्यः ।। ऋ० १०/३४/१३
    जुआ मत खेलो।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    25) जाया तप्यते कितवस्य हीना ।। ऋ० १०/३४/१०
    जुएबाज की स्त्री दीन हीन होकर दुःख पाती रहती है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    26) प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र उतार्ये ।। अ० १९/६२/१
    सबका कल्याण सोचो चाहे शूद्र हो चाहे आर्य।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    27) न स सखा यो न ददाति सख्ये ।। ऋ० १०/११७/४
    वह मित्र ही क्या जो अपने मित्र को सहायता नहीं देता।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    28) वयं स्याम पतयो रयीणाम् ।। यजु० १९/४४
    हम सर्व सम्पतियों के स्वामी हों।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    29) अनागोहत्या वै भीमा ।। अ० १०/१/२९
    निरपराध की हिंसा करना भयंकर है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    30) क्रत्वा चेतिष्ठो विशामुषर्भुत् ।(ऋ० १/६५/५)
    प्रातः जागने वाला प्रबुद्ध होता है, उसे सब स्नेह करते हैं।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    31) (सोम) न रिष्यत्त्वावतः सखा ।(ऋ० १/९१/८)
    हे सोम (परमात्मा) ! तेरा सखा कभी दुःखी नहीं होता।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    32) त्वं जोतिषा वि तमो ववर्थ ।(ऋ० १/९१/२२)
    अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    33) पितेव नः श्रृणुहि हूयमानः ।(ऋ० १/१०४/९)
    पुकारे जाने पर पिता की भाँति हमारी टेर सुनो।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    34) अघृणे न ते सख्यमपह्युवे ।(ऋ० १/१३८/४)
    हे प्रभो ! तेरी मित्रता से इन्कार नहीं करता।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    35) दिप्सन्त इद्रिपवो नाह देभुः ।(ऋ० १/१४७/३)
    दबाने वाले शत्रु उपासक को नहीं दबा सकते।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    36) न विन्धे अस्य सुष्टुतिम् ।(ऋ० १/७/७)
    मैं प्रभु की स्तुति का पार नहीं पाता।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    37) यत्र सोमः सदमित् तत्र भद्रम् ।(अथर्व० ७/१८/२)
    जहाँ परमेश्वर की ज्योति है, वहाँ कल्याण ही है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    38) मा श्रुतेन वि राधिषि ।(अथर्व० १/१/४)
    हम सुने हुए वेदोपदेश के विरुद्ध आचरण न करें ।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    39) अपृणन्तमभि सं यन्तु शोकाः ।(ऋ० १/१२५/७)
    लोकोपकारहीन कञ्जूस को शोक घेर लेता है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    40) मा प्र गाम पथो वयम् ।(ऋ० १०/५७/१)
    हम वैदिक मार्ग से पृथक न हों ।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    41) त्वमस्माकं तव स्मसि ।(ऋ० ८/१२/३२)
    प्रभो ! तू हमारा है, हम तेरे हैं।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    42) जाया तप्यते कितवस्य हीना ।(ऋ० १०/३४/१०)
    जूएबाज की पत्नी दीन-हीन होकर दुःख पाती है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    43) न स सखा यो न ददाति सख्ये ।(ऋ० १०/११७/४)
    मित्र की सहायता न करने वाला मित्र नहीं होता।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    44) मात्र तिष्ठः पराङ् मनाः ।(अथर्व० ८/१/९)
    इस संसार में उदासीन मन से मत रहो।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    45) अघमस्त्वघकृते ।(अथर्व० १०/१/५)
    पापी को दुःख ही मिलता है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    46) न स्तेयमद्मि ।(अथर्व० १४/१/५७)
    मैं चोरी का माल न खाऊँ।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    47) असन्तापं मे ह्रदयम् ।(अथर्व० १६/३/६)
    मेरा ह्रदय सन्ताप से रहित हो।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    48) उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुनः ।(ऋ० १०/१३७/१)
    हे विद्वानो ! गिरे हुओं को ऊपर उठाओ।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    49) अहं भूमिमददामार्याय ।(ऋ० ४/२६/२)
    मैं यह भूमि आर्यों को देता हूँ।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    50) मा भेर्मा संविक्थाऽऊर्जं धत्स्व ।(यजु:० ६/३५)
    मत डर,मत घबरा, धैर्य धारण कर ।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    51) तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः-(१०/८/१)
    उस ज्येष्ठ ब्रह्म को  हमारा नमस्कार।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    52) नेत् त्वा जहानि -(१३/१/१२)
    हे प्रभु! मैं तुझे कदापि न छोडूँ।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    53) तव स्मसि -(२०/१५/५)
    हे प्रभु ! हम तेरे हैं।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    54) न घा त्वद्रिगपवेति मे मनः -(२०/१७/२)
    मेरा मन तो तुझमें लगा है,तुझसे हटता ही नहीं।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    55) त्वे इत् कामं पुरुहूतं शिश्रय
    हे प्रभु ! मैंने अपनी चाह को तुझ में ही केन्द्रित कर दिया है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    56) त्वामीमहे शतक्रतो -(२०/१९/६)
    हे भगवन् ! हम तेरे आगे हाथ पसारते हैं।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    57) स्यामेदिन्द्रस्य शर्मणि -(२०/६८/६)
    हम प्रभु की ही शरण पकड़ें।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    58) हवामहे त्वोपगन्तवा उ -(२०/९६/५)
    हे प्रभु ! हम तेरे समीप पहुँचने के लिए पुकार रहे हैं।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    59) एक एव नमस्यः -(२/२/१)
    याद रखो,एक ही परमेश्वर है जो नमस्करणीय है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    60) एको राजा जगतो बभूव -(४/२/२)
    जगत् का राजा एक ही है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    61) एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति ।
    एक ही परमेश्वर को विप्रजन अनेक नामों से पुकारते हैं।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    62) द्यावाभूमी जनयन् देव एकः -(१३/२/२६)
    आकाश-भूमि को पैदा करने वाला देव एक ही है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    63) सखा नो असि परमं च बन्धुः -(५/११/११)
    तू हमारा सखा और परम बन्धु है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    64) सद्यः सर्वान् परिपश्यसि -(११/२/२५)
    तुरन्त तू सबको देख लेता है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    65) महस्ते सतो महिमा पनस्यते -(२०/५८/३)
    तुझ महान की महिमा का सर्वत्र गान हो रहा है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    66) न यस्य हन्यते सखा न जीयते कदाचन -(१/२०/४)
    प्रभु के मित्र को कोई मार या जीत नहीं सकता।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    67) द्वौ सन्निषद्य यन्मन्त्रयेते राजा तद् वेद वरुणस्तृतीयः -(४/१६/२)
    कोई दो बैठकर के जो मन्त्रणा करते हैं प्रभु तीसरा होकर उसे जान लेता है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    68) भीमा इन्द्रस्य हेतयः -(४/३७/८)
    प्रभु के दण्ड बड़े भयङ्कर हैं।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    69) यत्र सोमः सद्मित् तत्र भद्रम् -(७/१८/२)
    जहाँ प्रभु है,वहाँ कल्याण ही कल्याण है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    70) विष्णोः कर्माणि पश्यत् -(७/१९/१)
    व्यापक प्रभु के आश्चर्य-जनक कर्मों को देखो।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    71) न वा उ सोमो वृजिनं हिनोति -(७/२६/६)
    प्रभु पापी को कभी नहीं बढ़ाते।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    72) सनातनमेनमाहुरुताद्य स्यात् पुनर्णवः -(१०/८/२३)
    प्रभु सबसे पुरातन है,पर आज भी वह नया है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    73) ततः परं नाति पश्यामि किंचन -(अथर्व० १८/२/३२)
    प्रभु से बढ़कर मुझे कुछ नहीं दीखता।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    74) इन्द्रस्य कर्म सुकृता पुरुणि -( अथर्व० २०/११/६)
    प्रभु के सब कर्म शोभा के होते हैं।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    75) हत्वी दस्यून् प्रार्यं वर्णमावत् -(अथर्व० २०/११/९)
    प्रभु दुष्टों का विनाश कर आर्यजनों की रक्षा करता है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    76) प्रत्यङ् नः सुमना भव -(अथर्व० ३/२०/२)
    हे प्रभु ! हम पर कृपालु मन वाला हो।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    77) यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु -(७/८०/३०)
    हे प्रभु ! जिस शुभ इच्छा से हम तेरा आह्वान करें,वह हमारी पूर्ण हो।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    78) मा नो हिंसीः पितरं मातरं च -(अथर्व० ११/२/२९)
    हे प्रभु ! हमारे माता-पिता को कष्ट मत दो।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    79) वि द्विषो वि मृधो जहि -(अथर्व० १९/१५/१)
    हमारी द्वेषवृत्तियों और हिंसकवृत्तियों को नष्ट कर।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    80) अग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव -(अथर्व० २०/१३/३)
    हे प्रभु ! तेरी मैत्री पाकर हम विनाश से बच जायें।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    81) मा त्वायतो जरितुः काममूनयोः -(अथर्व० २०/२१/३)
    हे प्रभु ! तेरी चाह वाले मुझ भक्त के मनोरथ को अपूर्ण मत रख।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    82) न स्तोतारं निदे करः -(अ० २०/२३/६)
    मुझ स्तोता को निन्दा का पात्र मत कर।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    83) बहुप्रजा निऋर्तिमा विवेश ।।-(ऋ०१/१६४/32)
    बहुत सन्तान वाले बहुत कष्ट पाते हैं।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    84) मा ते रिषन्नुपसत्तारोऽग्ने ।।-(अथर्व० २/६/२)
    प्रभो ! आपके उपासक दुःखित न हों।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    85) कस्तमिन्द्र त्वावसुमा मतर्यों दधर्षति ।। (ऋ०७/३२/१४)
    ईश्वर भक्त का तिरस्कार कोई नहीं कर सकता।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    86) मा त्वा वोचन्नत्रराधसं जनासः ।।-(अथर्व० ५/११/७)
    लोग मुझे कंजूस न कहें।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    87) इमं नः श्रृणवद्धवम् ।।-(ऋ०१०/२६/९)
    वह प्रभु हमारी प्रार्थना को सुने।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    88) स्तोतुर्मघवन्काममा पृण ।।-(ऋ० १/५७/५)
    भगवान् ! भक्त की कामनाओं को पूर्ण करो।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    89) ओ३म् खं ब्रह्म ।।-(यजु० ४०/१७)
    ओ३म् परमात्मा सर्वव्यापक है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    90) विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि ।।-(ऋ०२/२३/२)
    सम्पूर्ण विद्याओं का आदि मूल तू ही है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    91) देवो देवानामसि ।।-(ऋ० १/९४/१३)
    तू देवों का देव है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    92) यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति ।।-(अथर्व० ९/१०/१८)
    जो उस प्रभु को नहीं जानता वह वेद से ही क्या फल प्राप्त करेगा।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    93) स नः पर्षदति द्विषः ।।-(ऋ० १०/१८७/५)
    वह परमात्मा हमें सब कष्टों से पार करे।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    94) आरे बाधस्व दुच्छुनाम् ।।-(यजु० १९/३८)
    दुष्ट पुरुषों को दूर भगाओ।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    95) मा नः प्रजां रीरिषः ।।-(ऋ० १०/१८/१)
    हे ईश्वर ! तू हमारी सन्तान का नाश न कर।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    96) सत्या मनसो मेऽस्तु ।।-( ऋ० १०/१२८/४)
    मेरे मन की भावनाएं सच्ची हों।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    97) लोकं कृणोतु साधुया ।।-(यजु० २३/४३)
    जनता को सच्चरित्र बनावें।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    98) तनूपाऽअग्न्रिः पातु दुरितादलद्यात् ।।-( यजु० ४/१५)
    ईश्वर हमें निन्दनीय दुराचरण से बचावे।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    99) दस्यूनव धूनुष्व ।।-(अथर्व० १९/४६/२)
    दस्युओं को धुन डाल।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    100) आ वीरोऽत्र जायताम् ।।-(अथर्व० ३/२३/२)
    वीर सन्तान उत्पन्न कर।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    101) भियं दधाना ह्रदयेषु शत्रुनः ।।-(ऋ० १०/८४/७)
    शत्रु के ह्रदय में भय उत्पन्न कर दो।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    102) सखा सखिभ्यो वरीयः कृणोतु ।।-(अथर्व० ७/५१/१)
    मित्र को मित्र की भलाई करनी चाहिये।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    103) दूर ऊनेन हीयते ।।-(अथर्व० १०/८/१५)
    बुरी संगत से मनुष्य अवनत होता है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    104) गोस्तु मात्रा न विद्यते ।।-(यजु० २३/४८)
    गौ का मूल्य नहीं है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    105) निन्दितारो निन्द्यासो भवन्तु ।।-(ऋ० ५/२/६)
    निन्दक सबसे निन्दित होते हैं।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    106) विश्वम्भर विश्वेन मा भरसा पाहि ।।-(अथर्व० २/१६/५)
    प्रभो ! अपनी शक्ति से मेरी रक्षा करो।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    107) न त्वदन्यो मघवन्नस्ति मर्डिता ।।-(ऋ० १/८४/१९)
    हे ईश्वर !तुम्हारे सिवाय सुख देने वाला दूसरा कोई नहीं है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    108) आर्य ज्योतिरग्राः ।।-(ऋ० ७/३३/७)
    आर्य प्रकाश (ज्ञान) को प्राप्त करने वाला होता है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    109) करो यत्र वरिवो बाधिताय ।।-( ऋ० ६/१८/१४)
    पीड़ितों की सहायता करने वाले हाथ ही उत्तम हैं।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    110) प्राता रत्नं प्रातरिश्वा दधाति ।।-(ऋ० १/१२५/१)
    प्रातः जागने वाला प्रभात बेला में ऐश्वर्य पाता है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    111) मिथो विघ्नाना उपयन्तु मृत्युम् ।।-(अथर्व० ६/३२/३)
    परस्पर लड़ने वाले मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    112) अधः पश्यस्व मोपरि ।।-(ऋ० ८/३३/१९)
    हे नारि ! नीचे देख ऊपर मत देख ।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    113) मा दुरेवा उत्तरं सुम्नमुन्नशन् ।।-(ऋ २/२३/८)
    दुराचारी उत्तम सुख को मत प्राप्त करें।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    114) प्रमृणीहि शत्रून् ।।-(यजु०१३/१३)
    शत्रुओं को कुचल डालो।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    115) परि माग्ने दुश्चरिताद् बाधस्व ।।-(यजु० ४/२८)
    हे ईश्वर ! आप मुझे दुष्ट आचरण से हटायें।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    116) शन्नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे ।।-(यजु० ३६/८)
    प्रभु हमारे दोपाये मनुष्यों और चौपाये पशुओं के लिए कल्याणकारी और सुखदायी हो।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    117) ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति ।।-(अथर्व० ११/५/१७)
    ब्रह्मचर्य रुपी तप के द्वारा राजा राष्ट्र का संरक्षण करता है।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    118) मा पुरा जरसो मृथाः ।।-(अथर्व० ५/३०/१७)
    हे मनुष्य ! तू बुढ़ापे से पहले मत मर।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    119) सहोऽसि सहो मयि धेहि ।।-(यजु० १९/९)
    हे प्रभो ! आप सहनशील हैं मुझमें सहनशीलता धारण करिये।
    🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

    120) नेनद्दवा आप्नुवन पूर्वमषत् ।। यजु. ४०/४
    परमात्मा भौतिक इन्द्रियों और अविद्वानों का विषय नहीं है।

                  ।। ओ३म् ।।

    Posted in Uncategorized

    महासती महारानी पद्मिनी…

    रावल समरसिंह के बाद उनका पुत्र रत्नसिंह चितौड़ की राजगद्दी पर बेठे | रत्नसिंह की रानी पद्मिनी अपूर्व सुन्दर थी | उसकी सुन्दरता की ख्याति दूर दूर तक फैली थी | उसकी सुन्दरता के बारे में सुनकर दिल्ली का तत्कालीन बादशाह अल्लाउद्दीन खिलजी पद्मिनी को पाने के लिए लालायित हो उठा और उसने रानी को पाने हेतु चितौड़ दुर्ग पर एक विशाल सेना के साथ चढ़ाई कर दी | उसने चितौड़ के किले को कई महीनों (8 माह तक) घेरे रखा पर चितौड़ की रक्षार्थ तैनात राजपूत सैनिको के अदम्य साहस व वीरता के चलते कई महीनों की घेरा बंदी व युद्ध के बावजूद वह चितौड़ के किले में घुस नहीं पाया |
    तब उसने कूटनीति से काम लेने की योजना बनाई और अपने दूत को चितौड़ रत्नसिंह के पास भेज सन्देश भेजा कि “हम तो आपसे मित्रता करना चाहते है रानी की सुन्दरता के बारे बहुत सुना है सो हमें तो सिर्फ एक बार रानी का मुंह दिखा दीजिये हम घेरा उठाकर दिल्ली लौट जायेंगे | सन्देश सुनकर रत्नसिंह आगबबुला हो उठे पर रानी पद्मिनी ने इस अवसर पर दूरदर्शिता का परिचय देते हुए अपने पति रत्नसिंह को समझाया कि ” मेरे कारण व्यर्थ ही चितौड़ के सैनिको का रक्त बहाना बुद्धिमानी नहीं है | ” रानी को अपनी नहीं पुरे मेवाड़ की चिंता थी वह नहीं चाहती थी कि उसके चलते पूरा मेवाड़ राज्य तबाह हो जाये और प्रजा को भारी दुःख उठाना पड़े क्योंकि मेवाड़ की सेना अल्लाउद्दीन की विशाल सेना के आगे बहुत छोटी थी | सो उसने बीच का रास्ता निकालते हुए कहा कि अल्लाउद्दीन चाहे तो रानी का मुख आईने में देख सकता है |
    अल्लाउद्दीन भी समझ रहा था कि राजपूत वीरों को हराना बहुत कठिन काम है और बिना जीत के घेरा उठाने से उसके सैनिको का मनोबल टूट सकता है साथ ही उसकी बदनामी होगी वो अलग सो उसने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया |

    चितौड़ के किले में अल्लाउद्दीन का स्वागत रत्नसिंह ने अथिती की तरह किया | रानी पद्मिनी का महल सरोवर के बीचों बीच था सो दीवार पर एक बड़ा आइना लगाया गया रानी को आईने के सामने बिठाया गया | आईने से खिड़की के जरिये रानी के मुख की परछाई सरोवर के पानी में साफ़ पड़ती थी वहीँ से अल्लाउद्दीन को रानी का मुखारविंद दिखाया गया | सरोवर के पानी में रानी के मुख की परछाई में उसका सौन्दर्य देख देखकर अल्लाउद्दीन चकित रह गया और उसने मन ही मन रानी को पाने के लिए कुटिल चाल चलने की सोच ली जब रत्नसिंह अल्लाउद्दीन को वापस जाने के लिए किले के द्वार तक छोड़ने आये तो अल्लाउद्दीन ने अपने सैनिको को संकेत कर रत्नसिंह को धोखे से गिरफ्तार कर लिया |
    रत्नसिंह को कैद करने के बाद अल्लाउद्दीन ने प्रस्ताव रखा कि रानी को उसे सौंपने के बाद ही वह रत्नसिंह को कैद मुक्त करेगा | रानी ने भी कूटनीति का जबाब कूटनीति से देने का निश्चय किया और उसने अल्लाउद्दीन को सन्देश भेजा कि -” मैं मेवाड़ की महारानी अपनी सात सौ दासियों के साथ आपके सम्मुख उपस्थित होने से पूर्व अपने पति के दर्शन करना चाहूंगी यदि आपको मेरी यह शर्त स्वीकार है तो मुझे सूचित करे | रानी का ऐसा सन्देश पाकर कामुक अल्लाउद्दीन के ख़ुशी का ठिकाना न रहा ,और उस अदभुत सुन्दर रानी को पाने के लिए बेताब उसने तुरंत रानी की शर्त स्वीकार कर सन्देश भिजवा दिया |
    उधर रानी ने अपने काका गोरा व भाई बादल के साथ रणनीति तैयार कर सात सौ डोलियाँ तैयार करवाई और इन डोलियों में हथियार बंद राजपूत वीर सैनिक बिठा दिए डोलियों को उठाने के लिए भी कहारों के स्थान पर छांटे हुए वीर सैनिको को कहारों के वेश में लगाया गया |इस तरह पूरी तैयारी कर रानी अल्लाउद्दीन के शिविर में अपने पति को छुड़ाने हेतु चली उसकी डोली के साथ गोरा व बादल जैसे युद्ध कला में निपुण वीर चल रहे थे | अल्लाउद्दीन व उसके सैनिक रानी के काफिले को दूर से देख रहे थे | सारी पालकियां अल्लाउदीन के शिविर के पास आकर रुकीं और उनमे से राजपूत वीर अपनी तलवारे सहित निकल कर यवन सेना पर अचानक टूट पड़े इस तरह अचानक हमले से अल्लाउद्दीन की सेना हक्की बक्की रह गयी और गोरा बादल ने तत्परता से रत्नसिंह को अल्लाउद्दीन की कैद से मुक्त कर सकुशल चितौड़ के दुर्ग में पहुंचा दिया |
    इस हार से अल्लाउद्दीन बहुत लज्जित हुआ और उसने अब चितौड़ विजय करने के लिए ठान ली | आखिर उसके छ:माह से ज्यादा चले घेरे व युद्ध के कारण किले में खाद्य सामग्री अभाव हो गया तब राजपूत सैनिकों ने केसरिया बाना पहन कर जौहर और शाका करने का निश्चय किया | जौहर के लिए गोमुख के उतर वाले मैदान में एक विशाल चिता का निर्माण किया गया | रानी पद्मिनी के नेतृत्व में 16000  #राजपूत_रमणियों ने गोमुख में स्नान कर अपने सम्बन्धियों को अन्तिम प्रणाम कर जौहर चिता में प्रवेश किया | थोडी ही देर में देवदुर्लभ सोंदर्य अग्नि की लपटों में स्वाहा होकर कीर्ति कुंदन बन गया | जौहर की ज्वाला की लपटों को देखकर अलाउद्दीन खिलजी भी हतप्रभ हो गया | महाराणा रतन सिंह के नेतृत्व में केसरिया बाना धारण कर 30000 राजपूत सैनिक किले के द्वार खोल भूखे सिंहों की भांति खिलजी की सेना पर टूट पड़े भयंकर युद्ध हुआ गोरा और उसके भतीजे बादल ने अद्भुत पराक्रम दिखाया बादल की आयु उस वक्त सिर्फ़ बारह वर्ष की ही थी उसकी वीरता का एक गीतकार ने इस तरह वर्णन किया –

    बादल बारह बरस रो,लड़ियों लाखां साथ |
    सारी दुनिया पेखियो,वो खांडा वै हाथ ||

    इस प्रकार छह माह और सात दिन के खुनी संघर्ष के बाद 18 अप्रेल 1303 को विजय के बाद असीम उत्सुकता के साथ खिलजी ने चित्तोड़ दुर्ग में प्रवेश किया लेकिन उसे एक भी पुरूष,स्त्री या बालक जीवित नही मिला जो यह बता सके कि आख़िर विजय किसकी हुई और उसकी अधीनता स्वीकार कर सके | उसके स्वागत के लिए बची तो सिर्फ़ जौहर की प्रज्वलित ज्वाला और क्षत-विक्षत लाशे और उन पर मंडराते गिद्ध और कौवे |
    रत्नसिंह युद्ध के मैदान में वीरगति को प्राप्त हुए और रानी पद्मिनी राजपूत नारियों की कुल परम्परा मर्यादा और अपने कुल गौरव की रक्षार्थ जौहर की ज्वालाओं में जलकर स्वाहा हो गयी जिसकी कीर्ति गाथा आज भी अमर है और सदियों तक आने वाली पीढ़ी को गौरवपूर्ण आत्म बलिदान की प्रेरणा प्रदान करती रहेगी |🙏🏼🙏🏼

    Posted in Uncategorized

    यमर्थसिद्धि: परमा न मोहयेत्
    तथैव काले व्यसनं न मोहयेत् ।
    सुखं च दु:खं च तथैव मध्यमं
    निषेवते य: स धुरन्धरो नर: ॥

    जिसको सफलता, विफलता विचलित न कर सके, किसी समय भी आई विपत्ति भी विचलित न कर सके तथा जो सुख दु:ख को और उनके बीच की स्थिति को समय के अनुसार सहन कर लेता है, वही मनुष्य धुरन्धर अथवा नेतृत्व करनेवाला होता है।

    Posted in Uncategorized

    कहते हैं जब नादिर शाह ने दिल्ली पर कब्ज़ा किया था, तो जामा मस्जिद के ऊपर चढ़कर एक तलवार छत पर गाड़ दी थी और अपने जिहादियों को हुक्म दिया था कि जब तक ये तलवार ना उठे, क़त्ल-ए-आम ना रुके..
    और रुका भी नहीं!

    अहमद शाह अब्दाली जब लाहौर से निकला, तो ये हुक्म दिया कि वापस आऊं तो शहर के चारों तरफ छकड़ों में नरमुंड का सैलाब हो..
    और यह हुआ भी!

    इनको सिर्फ लुटेरा बताकर इतिहास ख़त्म कर देने वाले वामी दोगले जब औरंगजेब को माननीय बताने लगते हैं, तो हैरानी कैसी!? ये तो इनके नायक हैं..

    दिल्ली में एक लाख लोगों को काटने वाला तैमूर हो या राजपूतों के खून का प्यासा अल्लाउद्दीन खिलजी..
    ये सब इनके नायक हैं! तारिक-बिन-जियाद से लेकर ओसामा बिन लादेन तक सब माननीय हैं..
    किसको फर्क पड़ता है कि गुरु तेग बहादुर के साथ क्या हुआ? या संभाजी के साथ क्या हुआ..?

    सहिष्णुता सिखाता है ना हिंदुत्व.. तो ये सब स्वीकार करो! अपने पूर्वजों के कातिलों को अपना भगवान स्वीकार करो और तब तक करो जब तक कि स्वयं ख़त्म ना हो जाओ! 😠

    तुम्हारे पास गंधार नहीं रहा, लाहौर नहीं रहा, सिंध, ननकाना साहिब, हिंगलाज भी नहीं रहा..
    और तुम्हारा वहम हट जाए तो जानोगे कि कश्मीर, बंगाल और केरल भी लगभग छिन ही चुके हैं। मगर जाने दो, कौन बेवकूफ सोचे..
    टी.वी. खोलो रे.. तैमूर की अम्मी की फिल्म आ रही है..
    😠
    #AD
    विक्रम अरोरा

    Posted in Uncategorized

    सुखी रहने का तरीका


          एक बार की बात है संत तुकाराम अपने आश्रम में बैठे हुए थे। तभी उनका एक शिष्य, जो स्वाभाव से थोड़ा क्रोधी था उनके समक्ष आया और बोला-

    गुरूजी, आप कैसे अपना व्यवहार इतना मधुर बनाये रहते हैं, ना आप किसी पे क्रोध करते हैं और ना ही किसी को कुछ भला-बुरा कहते हैं? कृपया अपने इस अच्छे व्यवहार का रहस्य बताइए?

    संत बोले- मुझे अपने रहस्य के बारे में तो नहीं पता, पर मैं तुम्हारा रहस्य जानता हूँ !

    “मेरा रहस्य! वह क्या है गुरु जी?” शिष्य ने आश्चर्य से पूछा।

    ”तुम अगले एक हफ्ते में मरने वाले हो!” संत तुकाराम दुखी होते हुए बोले।

    कोई और कहता तो शिष्य ये बात मजाक में टाल सकता था, पर स्वयं संत तुकाराम के मुख से निकली बात को कोई कैसे काट सकता था?

    शिष्य उदास हो गया और गुरु का आशीर्वाद ले वहां से चला गया।

    उस समय से शिष्य का स्वभाव बिलकुल बदल सा गया। वह हर किसी से प्रेम से मिलता और कभी किसी पे क्रोध न करता, अपना ज्यादातर समय ध्यान और पूजा में लगाता। वह उनके पास भी जाता जिससे उसने कभी गलत व्यवहार किया था और उनसे माफ़ी मांगता। देखते-देखते संत की भविष्यवाणी को एक हफ्ते पूरे होने को आये।

    शिष्य ने सोचा चलो एक आखिरी बार गुरु के दर्शन कर आशीर्वाद ले लेते हैं। वह उनके समक्ष पहुंचा और बोला-

    गुरुजी, मेरा समय पूरा होने वाला है, कृपया मुझे आशीर्वाद दीजिये!”

    “मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है पुत्र। अच्छा, ये बताओ कि पिछले सात दिन कैसे बीते? क्या तुम पहले की तरह ही लोगों से नाराज हुए, उन्हें अपशब्द कहे?”

    संत तुकाराम ने प्रश्न किया।

    “नहीं-नहीं, बिलकुल नहीं। मेरे पास जीने के लिए सिर्फ सात दिन थे, मैं इसे बेकार की बातों में कैसे गँवा सकता था?
    मैं तो सबसे प्रेम से मिला, और जिन लोगों का कभी दिल दुखाया था उनसे क्षमा भी मांगी” शिष्य तत्परता से बोला।

    “संत तुकाराम मुस्कुराए और बोले, “बस यही तो मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है।”
    “मैं जानता हूँ कि मैं कभी भी मर सकता हूँ, इसलिए मैं हर किसी से प्रेमपूर्ण व्यवहार करता हूँ, और यही मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है।

    शिष्य समझ गया कि संत तुकाराम ने उसे जीवन का यह पाठ पढ़ाने के लिए ही मृत्यु का भय दिखाया था ।

    वास्तव में हमारे पास भी सात दिन ही बचें हैं :-

    रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि, आठवां दिन तो बना ही नहीं है ।

    👏👏  “आइये आज से परिवर्तन आरम्भ करें।” 👏👏बृजमोहन ओजा