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जिसने भोगा ही नहीं है, वह त्याग कैसे करेगा? और जिसके पास है ही नहीं, वह छोड़ेगा कैसे?J

एक यहूदी फकीर हुआ बालसेन। एक दिन एक धनपति उससे मिलने आया। वह उस गांव का सबसे बड़ा धनपति था, यहूदी था। और बालसेन से उसने कहा कि कुछ शिक्षा मुझे भी दो। मैं क्या करूं?

बालसेन ने उसे नीचे से ऊपर तक देखा, वह आदमी तो धनी था लेकिन कपड़े चीथड़े पहने हुए था। उसका शरीर रूखा-सूखा मालूम पड़ता था। लगता था, भयंकर कंजूस है। तो बालसेन ने पूछा कि पहले तुम अपनी जीवन-चर्या के संबंध में कुछ कहो। तुम किस भांति रहते हो? तो उसने कहा कि मैं इस भांति रहता हूं जैसे एक गरीब आदमी को रहना चाहिये। रूखी-सूखी रोटी खाता हूं। बस नमक, चटनी और रोटी से काम चलाता हूं। एक कपड़ा जब तक जार-जार न हो जाए तब तक पहनता हूं। खुली जमीन पर सोता हूं, एक गरीब साधु का जीवन व्यतीत करता हूं।

बालसेन एकदम नाराज हो गया और कहा, नासमझ! जब भगवान ने तुझे इतना धन दिया तो तू गरीब की तरह जीवन क्यों बिता रहा है? भगवान ने तुझे धन दिया ही इसलिए है कि तू सुख से रह, ठीक भोजन कर। खा कसम कि आज से ठीक भोजन करेगा, अच्छे कपड़े पहनेगा, सुखद शैया पर सोयेगा, महल में रहेगा।

धनपति भी थोड़ा हैरान हुआ। उसने कहा कि मैंने तो सुना है कि यही साधुता का व्यवहार है। पर बालसेन ने कहा कि मैं तुझसे कहता हूं कि यह कंजूसी है, साधुता नहीं है। काफी समझा-बुझाकर कसम दिलवा दी। वह आदमी जरा झिझकता तो था, क्योंकि जिंदगी भर का कंजूस था। जिसको वह साधुता कह रहा था वह साधुता थी नहीं, सिर्फ कृपणता थी। लेकिन लोग कृपणता को भी साधुता के आवरण में छिपा लेते हैं। कृपण भी अपने को कहता है कि मैं साधु हूं इसलिए ऐसा जीता हूं। पर बालसेन ने उसे समझा-बुझाकर कसम दिलवा दी।

जब वह चला गया तो बालसेन के शिष्यों ने पूछा कि यह तो हद्द हो गई। उस आदमी की जिंदगी खराब कर दी। वह साधु की तरह जी रहा था। और हमने तो सदा यही सुना है कि सादगी से जीना ही परमात्मा को पाने का मार्ग है। यही तुम हमसे कहते रहे। और इस आदमी के साथ तुम बिलकुल उल्टे हो गये। क्या इसको नरक भेजना है?

बालसेन ने कहा, ‘यह आदमी अगर रूखी रोटी खायेगा तो यह कभी समझ ही न पायेगा कि गरीब का दुख क्या है! यह आदमी रूखी रोटी खायेगा तो समझेगा कि गरीब तो पत्थर खाये तो भी चल जाएगा। इसे थोड़ा सुखी होने दो ताकि यह दुख को समझ सके; ताकि जितने लोग इसके कारण गरीब हो गये हैं इस गांव में, उनकी पीड़ा भी इसको खयाल में आये। लेकिन यह सुखी होगा तो ही उनका दुख दिखाई पड़ सकता है। अगर यह खुद ही महादुख में जी रहा है, इसको किसी का दुख नहीं दिखाई पड़ेगा। कोई गरीब इसके द्वार पर भीख मांगने नहीं जा सकता, क्योंकि यह खुद ही भिखारी की तरह जी रहा है। यह किसी की पीड़ा अनुभव नहीं कर सकता।

विपरीत का अनुभव चाहिये। अगर सुख ही सुख हो संसार में तो तुम्हें सुख का पता ही न चलेगा। और तुम सुख से इस बुरी तरह ऊब जाओगे जितने कि तुम दुख से भी नहीं ऊबे हो। और तुम उस सुख का त्याग कर देना चाहोगे।

देखो पीछे लौटकर इतिहास में। महावीर और बुद्ध जैसे त्यागी गरीब घरों में पैदा नहीं होते; हो नहीं सकते। क्योंकि सुख से ऊब पैदा होनी चाहिये, तब त्याग होता है। बुद्ध के जीवन में इतना सुख है कि उस सुख का स्वाद मर गया। जिसने रोज सुस्वादु भोजन किये हों, तो स्वाद मर जाए। कभी-कभी उपवास जरूरी है भूख का रस लेने के लिये। अगर भूख का मौका ही न मिले और रोज उत्सव चलता रहे घर में, और मिष्ठान्न बनते रहें तो जल्दी ही स्वाद मर जाएगा। भूख ही मर जाएगी।

इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि गरीबों के धार्मिक उत्सव सदा भोजन के उत्सव होते हैं। और अमीरों के धार्मिक उत्सव सदा उपवास के होते हैं। अगर जैनों का धार्मिक पर्व उपवास का है, तो उसका अर्थ है। लेकिन एक मुसलमान, एक गरीब हिंदू–जब उसका धार्मिक दिन आता है तो ताजे और नये कपड़े पहनता है। अच्छे से अच्छा भोजन बनाता है। हलवा और पूड़ी उस दिन बनाता है। वह धार्मिक दिन है। जिसके तीन सौ चौंसठ दिन भूख से गुजरते हों, उसका धार्मिक दिन उपवास का नहीं हो सकता। होना भी नहीं चाहिये; वह अन्याय हो जाएगा। लेकिन जो तीन सौ चौंसठ दिन उत्सव मनाता हो भोजन का, उसका धार्मिक दिन उपवास का ही होना चाहिये।

हम अपने स्वाद को विपरीत से पाते हैं। इसलिए जब जैनों का पर्युषण होता है, तभी पहली दफा उन्हें भूख का अनुभव होता है। और पर्युषण के बाद पहली दफा दो चार दिन खाने में मजा आता है, और खाने के संबंध में सोचने में मजा आता है। और पर्युषण के दिनों में ही सपने देखते हैं वे खाने के, बाकी दिन नहीं देखते क्योंकि सपनों की कोई जरूरत नहीं है। बाकी दिन वे सलाह लेते हैं चिकित्सक से कि भूख मर गई है।

जिन मुल्कों में भी धन बढ़ जाता है, वहीं उपवास को मानने वाले संप्रदाय पैदा हो जाते हैं। यह जानकर हैरानी होगी कि अमेरिका में आज उपवास का बड़ा प्रभाव है। गरीब मुल्कों में उपवास का प्रभाव हो भी नहीं सकता। लोग वैसे ही उपवासे हैं। लेकिन अमेरिका में लोग महीनों के उपवास के लिए जाते हैं। नेचरोपेथी के क्लिनिक हैं, चिकित्सालय हैं, जहां कुल काम इतना है कि लोगों को उपवास करवाना।

अगर सुख ही सुख हो और दुख का उपाय न हो तो तुम ऊब जाओगे सुख से। एक बड़े मजे की बात है कि दुख से आदमी कभी नहीं ऊबता, क्योंकि दुख में आशा बनी रहती है। आज दुख है, कल सुख होगा। सपना जिंदा रहता है। मन कामना करता रहता है और कल पर हम आज को टालते रहते हैं। दुखी आदमी कभी नहीं ऊबता। सुखी आदमी ऊबता है; क्योंकि उसकी कोई आशा नहीं बचती। सुख तो आज उसे मिल गया, कल के लिये कुछ बचा नहीं।

तुम्हें पता नहीं है कि महावीर और बुद्ध क्यों संन्यासी हुए? जैनों के चौबीस तीर्थंकर राजाओं के बेटे क्यों हैं, हिंदुओं के सब अवतार राजपुत्र क्यों हैं? बात जाहिर है, साफ है। गणित सीधा है। सुख इतना था कि वे ऊब गये। और ज्यादा पाने का कोई उपाय नहीं था। जितना हो सकता था वह था, वह पहले से मिला था।

इसलिए जिस दिन महावीर नग्न होकर रास्ते पर भिखमंगे की तरह चले, उन्हें जो आनंद मिला है, तुम भूल मत करना नग्न चलकर रास्ते पर; तुम्हें वह न मिलेगा। क्योंकि तुम गणित ही चूक रहे हो। उसके पहले राजा होना जरूरी है। वस्त्रों से जब कोई इतना ऊब गया हो कि वे बोझिल मालूम होने लगे तब कोई नग्न खड़ा हो जाए रास्ते पर तो स्वतंत्रता का अनुभव होगा–मुक्ति! उसे लगेगा कि मोक्ष मिला। जो भोजन से इतना पीड़ित हो गया हो, वह जब पहली दफा उपवास करेगा तो शरीर फिर से जीवंत होगा; फिर से भूख जगेगी। और जो महलों में रह-रहकर कारागृह में बंद हो गया हो, जब वह खुले आकाश के नीचे, वृक्ष के नीचे सोयेगा तब उसे पहली दफा पता चलेगा कि जीवन का आनंद क्या है!

महावीर की बात सुनकर कई साधारण-जन भी त्यागी हो जाते हैं। वे बड़ी मुश्किल में पड़ते हैं क्योंकि जो आनंद महावीर को मिला, वह उन्हें मिलता हुआ मालूम नहीं पड़ता। तो वे सोचते हैं शायद अपनी कोई साधना में भूल है। साधना में कोई भूल नहीं, शुरुआत में ही भूल है।

महावीर उतरते हैं राज-सिंहासन से। राज-सिंहासन से ऊब गये हैं इसलिए उतरते हैं; क्योंकि उसके आगे और कोई सीढ़ी नहीं है। वे आखिरी सीढ़ी पर थे; और कोई विकास का उपाय न था। आकांक्षा को जाने की जगह न थी। नीचे उतरते हैं। सिंहासन से नीचे उतरकर जीवन में फिर से उमंग आती है। फिर से रस आता है। फिर से खोज शुरू होती है।

तुम्हारे जीवन में यह नहीं हो सकता। जिसने भोगा ही नहीं है, वह त्याग कैसे करेगा? और जिसके पास है ही नहीं, वह छोड़ेगा कैसे? जो तुम्हारे पास है, वही तुम छोड़ सकते हो। जो तुम्हारे पास नहीं है, उसे तुम कैसे छोड़ोगे? उस भ्रांति में पड़ना ही मत।

बिन बाती बिन तेल

ओशो

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एक सन्त कुएं पर स्वयं को लटका कर ध्यान करता था और कहता था जिस दिन यह जंजीर टूटेगी मुझे ईश्वर मिल जाएंगे।

उनसे पूरा गांव प्रभावित था सभी उनकी भक्ति,उनके तप की तारीफें करते थे। एक व्यक्ति के मन में इच्छा हुई कि मैं भी ईश्वर दर्शन करूँ।

वह कुए पर रस्सी से पैर को बांधकर कुएं में लटक गया और कृष्ण जी का ध्यान करने लगा जब रस्सी टूटी उसे कृष्ण अपनी गोद मे उठा लिए और दर्शन भी दिए।

तब व्यक्ति ने पूछा आप इतनी जल्दी मुझे दर्शन देने क्यों चले आये जबकि वे संत महात्मा तो वर्षों से आपको बुला रहे हैं।

कृष्ण बोले ! वो कुएं पर लटकते जरूर हैं किंतु पैर को लोहे की जंजीर से बांधकर । उसे मुझसे ज्यादा जंजीर पर विश्वाश है।

तुझे खुद से ज्यादा मुझ पर विश्वाश है इसलिए मैं आ गया।

आवश्यक नहीं कि दर्शन में वर्षों लगें आपकी शरणागति आपको ईश्वर के दर्शन अवश्य कराएगी और शीघ्र ही कराएगी। प्रश्न केवल इतना है आप उन पर कितना विश्वाश करते हैं।…

ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
  भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया ॥

        हे अर्जुन ! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं। शरीररूपी यंत्र पर आरूढ़(चढ़े) हुए सब प्राणियों को, वे अपनी माया से घुमाते रहते हैं।

          कृष्ण शरणं मम ।।

इसे सदैव याद रखें और बुद्धि में धारण करने के साथ व्यवहार में भी धारण करें।। प्रभु दर्शन अवश्य होंगे।

🌹🌻🌼🍀हरे कृष्णा 🌸🌺🌻🌹                                   🔥🌿🔥🌿🔥🌿🔥🌿🔥🌿🔥

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संत और देवता
एक ऐसे ही संत हुए जो बड़े ही सदाचारी और लोकसेवी थे. उनके जीवन का मुख्य लक्ष्य परोपकार था. एक बार उनके आश्रम के निकट से देवताओं की टोली जा रही थी. संत आसन जमाये साधना में लीन थे. आखें खोली तो देखा सामने देवता गण खड़े हैं. संत ने उनका अभिवादन कर उन सबको आसन दिया. उनकी खूब सेवा की.
देवता गण उनके इस व्यवहार और उनके परोपकार के कार्य से प्रसन्न होकर उनसे वरदान मांगने जो कहा. संत ने आदरपूर्वक कहा – “हे देवगण! मेरी कोई इच्छा नहीं है. आपलोगों की दया से मेरे पास सब कुछ है.”
देवता गण बोले – “आपको वरदान तो माँगना पड़ेगा नहीं क्योंकि मेरे वचन किसी भी तरह से खाली नहीं जा सकता.”
संत बोले – “हे देवगण! आप तो सब कुछ जानते हैं. आप जो वरदान देंगें वह नुझे सहर्ष स्वीकार होगा.”
देवगण बोले – “जाओ! तुम दूसरों की भलाई करों. तुम्हारे हाथों दूसरों का कल्याण हो.”
संत ने कहा – “महाराज! यह तो बहुत कठिन कार्य है?”
देवगण बोले – “कठिन! इसमें क्या कठिन है?”
संत ने कहा – “मैंने आजतक किसी को भी दूसरा समझा ही नहीं है फिर मैं दूसरों का कल्याण कैसे कर सकूँगा?”
सभी देवतागण संत की यह बात सुन एक दूसरे का मुंह देखने लगे. उन्हें अब ज्ञात हो गया कि ये एक सच्चा संत हैं. देवों ने अपने वरदान को दुहराते हुए कहा – “हे संत! अब आपकी छाया जिस पर पड़ेगी . उसका कल्याण होगा.”
संत ने आदर के साथ कहा – “हे देव! हम पर एक और कृपा करें. मेरी वजह से किस- किस की भलाई हो रही है इसका पता मुझे न चले, नहीं तो इससे उत्पन्न अहंकार मुझे पतन के मार्ग पर ले जायेगा.”
देवगण संत के इस वचन को सुन अभिभूत हो गए. परोपकार करनेवाले संत के ऐसे ही विचार होते है.
सन्तमत विचार- यदि परोपकार का यह विचार लोगों में आ जाए तो पूरे संसार में कहीं दुःख नहीं होगा, कहीं गरीबी नहीं होगा, कही अभाव और अशिक्षा नहीं होगी. ऐसा नहीं है कि ऐसे लोग वर्तमान समय में नहीं हैं. ऐसे लोग अभी भी हैं जिन्होंने लोक कल्याण के बहुत सारे कार्य किया हैं और कर रहे हैं, लेकिन उनकी संख्या बहुत काम है. इसलिए जितना हो सके दूसरों की भलाई करनी चाहिए.

परहित सरिस धर्म नहिं भाई।

जय भगवती।

शुभरात्रि ।

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महाराज रणजीत सिंह जी और उनकी धर्मपरायणता

यह महाराजा रणजीत सिंह जी की सेना का ध्वज है। रक्त वर्ण के ध्वज के मध्य में अष्टभुजा जगदम्बा दुर्गा, बायें हनुमान जी और दायें कालभैरव विराज रहे हैं। पठानों की छाती फ़ोड़ कर अक्टूबर 1836 को ख़ैबर के जमरूद के किले पर यही पवित्र ध्वज फहराया गया था।

यह ध्वज कुछ समय पूर्व शायद सिदबी द्वारा लंदन में नीलाम किया गया था। अब किसी के व्यक्तिगत कलेक्शन का हिस्सा है।

ये स्थापित सत्य है, महराजा रणजीत सिह हिन्दू देवी देवताओं मे अगाध श्रद्धा रखते थे, अपनी वसीयत मे उन्होंने कोहिनूर हीरा जगन्नाथ मन्दिर मे चढाने की इच्छा जतायी थी

स्वर्ण मंदिर नाम है ..स्वर्ण गुरुद्वारा नहीं …. इसी में बहुत कुछ निहित है

1984 से पहले स्वर्ण मंदिर में भी दुर्गा जी की प्रतिमा रखी थी।

परिक्रमा में अनेकों देवी-देवताओं की प्रतिमाएं थीं। हरि मंदिर तब महंत सम्हालते थे मगर यह 70-80 वर्ष से अधिक पुरानी बात है

इससे दो बाते सामने आती एक माहारजा रणजीत सिंह जी सनातनी तो थे हि और अगर सिख थे तो तब तक सिख हिन्दु सनातन संसकृती को मानते थे ज़िस्से पता चलता है की सिख हिन्दु धर्म का हि एक पंथ है ज़िस्से खालिस्तानियो ने बिगाड दिया है

महाराजा रंजीत सिंह जी को सिख संगत सिख बताती हैं। सत्य यह है कि महाराजा रंजीत सिंह जी केवल सिखों के नहीं अपितु समस्त हिन्दू समाज के रक्षक थे। महाराजा रंजीत सिंह जी के झंडे में शूरता की प्रतीक चंडी देवी, बल और ब्रह्मचर्य के प्रतीक वीर हनुमान बजरंग बली और शत्रुओं को रुलाने वाले काल भैरव का चित्र अंकिता था। अफगानिस्तान के शासक शाहशुजा ने महाराजा रंजीत सिंह के समक्ष अपने राज्याधिकार को वापिस दिलाने की जब अपील की थी तब महाराजा रंजीत सिंह जी ने दो शर्तें उनके समक्ष रखी थी। पहली की वे अपने राज्य में गौहत्या पर प्रतिबन्ध लगाए। दूसरी की सोमनाथ मंदिर से लूटे गए विशालकाय कवाड़ वापिस किये जाये। रणजीत सिंह जी ने जहां अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को स्वर्ण से मंडित किया था वहीं पूरी के जगन्नाथ मंदिर और बनारस के विश्वनाथ मंदिर को दान देकर अपने कर्त्तव्य का निर्वाहन भी किया था।

आज के अलगाववादी सिखों को उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।

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कर्मों का फल तो झेलना पडे़गा


#कर्मोंकाफलतोझेलना_पडे़गा।
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एक दृष्टान्त

✍…भीष्म पितामह रणभूमि में शरशैया पर पड़े थे। हल्का सा भी हिलते तो शरीर में घुसे बाण भारी वेदना के साथ रक्त की पिचकारी सी छोड़ देते।

ऐसी दशा में उनसे मिलने सभी आ जा रहे थे। श्री कृष्ण भी दर्शनार्थ आये। उनको देखकर भीष्म जोर से हँसे और कहा…. आइये जगन्नाथ।..

आप तो सर्व ज्ञाता हैं। सब जानते हैं, बताइए मैंने ऐसा क्या पाप किया था जिसका दंड इतना भयावह मिला ?

कृष्ण: पितामह! आपके पास वह शक्ति है, जिससे आप अपने पूर्व जन्म देख सकते हैं। आप स्वयं ही देख लेते।

भीष्म: देवकी नंदन! मैं यहाँ अकेला पड़ा और कर ही क्या रहा हूँ ?

मैंने सब देख लिया …अभी तक 100 जन्म देख चुका हूँ।
मैंने उन 100 जन्मो में एक भी कर्म ऐसा नहीं किया जिसका परिणाम ये हो कि मेरा पूरा शरीर बिंधा पड़ा है, हर आने वाला क्षण …
और पीड़ा लेकर आता है।

कृष्ण: पितामह ! आप एक भव और पीछे जाएँ, आपको उत्तर मिल जायेगा।

भीष्म ने ध्यान लगाया और देखा कि 101 भव पूर्व वो एक नगर के राजा थे। …एक मार्ग से अपनी सैनिकों की एक टुकड़ी के साथ कहीं जा रहे थे।

एक सैनिक दौड़ता हुआ आया और बोला “राजन! मार्ग में एक सर्प पड़ा है। यदि हमारी टुकड़ी उसके ऊपर से गुजरी तो वह मर जायेगा।”

भीष्म ने कहा ” एक काम करो। उसे किसी लकड़ी में लपेट कर झाड़ियों में फेंक दो।”
सैनिक ने वैसा ही किया।…उस सांप को एक बाण की नोक पर में उठाकर कर झाड़ियों में फेंक दिया।

दुर्भाग्य से झाडी कंटीली थी। सांप उनमें फंस गया। जितना प्रयास उनसे निकलने का करता और अधिक फंस जाता।…

कांटे उसकी देह में गड गए। खून रिसने लगा जिसे झाड़ियों में मोजूद कीड़ी नगर से चीटियाँ रक्त चूसने लग गई। धीरे धीरे वह मृत्यु के मुंह में जाने लगा।… 5-6 दिन की तड़प के बाद उसके प्राण निकल पाए।

भीष्म: हे त्रिलोकी नाथ। आप जानते हैं कि मैंने जानबूझ कर ऐसा नहीं किया। अपितु मेरा उद्देश्य उस सर्प की रक्षा था। तब ये परिणाम क्यों ?

कृष्ण: तात श्री! हम जान बूझ कर क्रिया करें या अनजाने में …किन्तु क्रिया तो हुई न।

उसके प्राण तो गए ना।… ये विधि का विधान है कि जो क्रिया हम करते हैं उसका फल भोगना ही पड़ता है।….

आपका पुण्य इतना प्रबल था कि 101 भव उस पाप फल को उदित होने में लग गए। किन्तु अंततः वह हुआ।….

जिस जीव को लोग जानबूझ कर मार रहे हैं…

उसने जितनी पीड़ा सहन की.. वह उस जीव (आत्मा) को इसी जन्म अथवा अन्य किसी जन्म में अवश्य भोगनी होगी।

ये बकरे, मुर्गे, भैंसे, गाय, ऊंट आदि वही जीव हैं जो ऐसा वीभत्स कार्य पूर्व जन्म में करके आये हैं।… और इसी कारण पशु बनकर, यातना झेल रहे हैं।

अतः हर दैनिक क्रिया सावधानी पूर्वक करें।.कर्मों का फल तो झेलना पड़ता है।
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ગુજરાતી પુસ્તકાલય – Gujarati Ebooks


નીચે કેટલીક વેબ સાઈટ આપી છે…જેમાં અસંખ્ય પુસ્તકો વાચવા મળશે….

૧) http://www.sivohm.com/2014/12/home.html

૨) http://pustakalay.com/sahitya.htm

૩) https://www.scribd.com/search?content_type=books&page=1&query=%E0%AA%97%E0%AB%81%E0%AA%9C%E0%AA%B0%E0%AA%BE%E0%AA%A4%E0%AB%80

૪) https://issuu.com/search?q=%E0%AA%97%E0%AB%81%E0%AA%9C%E0%AA%B0%E0%AA%BE%E0%AA%A4%E0%AB%80

 

બીજી કોઈ સાઈટ તમારા ધ્યાન માં હોય તો કહેજો…

 

 

 

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महारानी पद्मावती को काल्पनिक कहने वाले विकृत मानसिकता के लोग


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#महारानी पद्मावती को काल्पनिक कहने वाले विकृत मानसिकता के लोग
चित्र में जो दिख रहा है यही वो असंख्य नमन करने वाला स्थल है जिसमें महारानी पद्मावती ने म्लेच्छ आक्रान्ताओं से अपनी रक्षा करने के लिए धधकती ज्वाला के कुंड में छलांग लगाई थी। चित्तौड़गढ़ के किले में आज उस कुंड की ओर जाने वाला रास्ता बेहद अंधेरे वाला है जिसपर कोई जाने का साहस नहीं करता । उस रास्ते की दीवारों तथा कई गज दूर भवनों में आज भी कुंड की अग्नि के चिन्ह और उष्णता अनुभव किया जा सकता है । विशाल अग्निकुंड की ताप से दीवारों पर चढ़े हुए चूने के प्लास्टर जल चुके हैं। चित्र में कुंड के समीप जो दरवाज़ा दिख रहा है कहा जाता है की माँ पद्मावती वहीँ से कुंड में कूद गयी थी। स्थानीय लोग आज भी विश्वास के साथ कहते हैं कि इस कुंड से चीखें यदा-कदा सुनायी पड़ती रहती है और सैंकड़ों वीरांगनाओं की आत्माएं आज भी इस कुंड में मौजूद हैं।

वो चीखें आज के युग में एक सबक है, “उन हिन्दू बहनों और बेटियों के लिए जिन पर वर्तमान मलेच्छों की बुरी नज़र है। ”
ये चीखें नहीं एक दहाड़ है , जो यह कहता है की ,”हे हिन्दू पुत्रियाँ हर युगों में इन मलेच्छों से सतर्क रहना। ”
ये चीखें नहीं एक आत्मबल है जो यह कहता है कि,” हे हिन्दू पुत्रियाँ तुम अबला नहीं सबला हो ।”
ये चीखें नहीं एक वेदना है जो यह कहती हैं की, ” हे हिन्दू वीरों और वीरंगनाओं हमें भूल न जाना। ”
महारानी पद्मावती जी हम सहस्त्र जन्म लेकर भी आपका उपकार नहीं चुका पाएँगे।
असंख्य नमन….चित्र में जो दिख रहा है यही वो असंख्य नमन करने वाला स्थल है जिसमें महारानी पद्मावती ने म्लेच्छ आक्रान्ताओं से अपनी रक्षा करने के लिए धधकती ज्वाला के कुंड में छलांग लगाई थी। चित्तौड़गढ़ के किले में आज उस कुंड की ओर जाने वाला रास्ता बेहद अंधेरे वाला है जिसपर कोई जाने का साहस नहीं करता । उस रास्ते की दीवारों तथा कई गज दूर भवनों में आज भी कुंड की अग्नि के चिन्ह और उष्णता अनुभव किया जा सकता है । विशाल अग्निकुंड की ताप से दीवारों पर चढ़े हुए चूने के प्लास्टर जल चुके हैं। चित्र में कुंड के समीप जो दरवाज़ा दिख रहा है कहा जाता है की माँ पद्मावती वहीँ से कुंड में कूद गयी थी। स्थानीय लोग आज भी विश्वास के साथ कहते हैं कि इस कुंड से चीखें यदा-कदा सुनायी पड़ती रहती है और सैंकड़ों वीरांगनाओं की आत्माएं आज भी इस कुंड में मौजूद हैं।

वो चीखें आज के युग में एक सबक है, “उन हिन्दू बहनों और बेटियों के लिए जिन पर वर्तमान मलेच्छों की बुरी नज़र है। ”
ये चीखें नहीं एक दहाड़ है , जो यह कहता है की ,”हे हिन्दू पुत्रियाँ हर युगों में इन मलेच्छों से सतर्क रहना। ”
ये चीखें नहीं एक आत्मबल है जो यह कहता है कि,” हे हिन्दू पुत्रियाँ तुम अबला नहीं सबला हो ।”
ये चीखें नहीं एक वेदना है जो यह कहती हैं की, ” हे हिन्दू वीरों और वीरंगनाओं हमें भूल न जाना। ”
महारानी पद्मावती जी हम सहस्त्र जन्म लेकर भी आपका उपकार नहीं चुका पाएँगे।
असंख्य नमन….
Praveen Gulati 

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

शिवलिंग पहले अलग होता है, फिर स्वमेव जुड़ने भी लगता है यह शिवलिंग !!


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विजय कृष्ण पांडेय 

ॐ नमः शिवाय !

चमत्कारः (काठगढ़ महादेव)

शिवलिंग पहले अलग होता है,
फिर स्वमेव जुड़ने भी लगता है
यह शिवलिंग !!

326 ई पूर्व में जब मकदूनिया का राजा
सिकंदर विश्वविजेता बनकर अपने अंतिम
शिविर के दौरान व्यास नदी के कारण यहां
ठहरा था तो यहां स्थापित शिवलिंग की
दैवीय शक्ति के कारण उसका विजयी
अभियान अचानक रुक गया।

देवभूमि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा
जिले के इंदौरा उपमंडल में स्थित
काठगढ़ महादेव मंदिर लोगों की
आस्था का केंद्र है।

इस मंदिर के साथ कई
पौराणिक किंवदंतियां
जुड़ी हुई है।

लोगों के कथनानुसार मंदिर में
स्थापित शिवलिंग स्वयंभू प्रकट है।

इस शिव मंदिर में विशाल शिवलिंग दो
भागों में बंटा हुआ है,जिसे मां पार्वती
और भगवान शिव के रूपों में माना
जाता है।

खास बात यह है कि ग्रहों और नक्षत्रों
के अनुसार इनके दोनों भागों के बीच
का अंतर घटता-बढ़ता रहता है।

माता पार्वती और उनका प्रिय
सर्प भी स्वयं-भू प्रकट है।

ग्रीष्म ऋतु में यह अलग हो जाते हैं
और सर्दियों में आपस में जुड़ जाते हैं।

इसी रहस्य के कारण यह मंदिर लोगों
की आस्था का केंद्र बना हुआ है।

काठगढ़ मंदिर के महत्व के
विषय में कर्इ कथाएं प्रचलित हैं।

शिव पुराण में भी है मंदिर की
व्याख्या —

कहा जाता है कि व्यास नदी के किनारे
स्थित इस मंदिर के बारे में शिव पुराण
में भी व्याख्या मिलती है।

जब श्री ब्रहमा और श्री विष्णु में आपसी बड़प्पन के कारण युद्ध हुआ था तो उन्हें शांत करने के लिए भोले नाथ ने अग्नि तुल्य स्तंभ का रूप धारण किया था।

युद्ध में दोनों(श्री ब्रहमा और श्री विष्णु)
ने एक-दूसरे को हीन सिद्ध करने के लिए
महेश्वर और पाशुपात अस्त्रा का प्रयोग
करने के लिए प्रयासरत थे।

इससे तीनों लोकों में नाश की
आशंका होने लगी और भगवान
शिव शंकर महाअग्नि तुल्य स्तंभ
के रूप में श्री ब्रहमा और श्री विष्णु
के बीच में प्रकट हो गए और युद्ध
शांत हो गया।

महाराज दशरथ ने की थी यहां पूजा–

काठगढ़ नामक यह स्थान महाराजा
दशरथ का भी पूजा स्थल रहा है।

ऐसा कहा जाता है कि त्रेता युग
में जब महाराज दशरथ का विवाह
हुआ था तब उनकी बारात पानी पीने
के लिए यहां रूकी थी और यहां एक
कुएं का निर्माण किया गया था।

जोकि आज भी यहां स्थापित हैं।

जब भी भरत व शत्रुघन अपने ननिहाल
कैकेय देश(वर्तमान कश्मीर)जाते थे तो
व्यास नदी के पवित्रा जल से स्नान करके
राजपुरोहित व मंत्रियों सहित यहां
स्थापित शिवलिंग की पूजा-अर्चना
कर आगे बढ़ते थे।

यहीं आकर रुका था सिकंदर का विजयी
अभियान एक किंवदंती में कहा गया है
कि लुटेरे सिकंदर ने भी अपना अभियान
यहीं आकर रोका था।

326 ई पूर्व में जब मकदूनिया का राजा
सिकंदर विश्वविजेता बनकर अपने अंतिम
शिविर के दौरान व्यास नदी के कारण यहां
ठहरा था तो यहां स्थापित शिवलिंग की
दैवीय शक्ति के कारण उसका विजयी
अभियान अचानक रुक गया।

भोले नाथ के इस अलौकिक स्वरूप
को देखते हुए सिकंदर ने यहां पूजा
अर्चना भी की थी।

यहां तक कि यूनानी सभ्यता की पहचान
छोड़ते हुए शिवलिंग के चारों ओर अष्ट
कोणिय चबूतरों का निर्माण करवाया था।

महाराजा रणजीत सिंह ने
बनवाया था मंदिर–

बताया जाता है कि इस मंदिर ने
महाराजा रणजीत सिंह के कार्य
काल में सर्वाधिक प्रसिद्धि प्राप्त
की थी।

क्योंकि इससे पहले यहां पर मंदिर
का निर्माण नहीं था और भगवान
भोले शंकर खुले आसमान के नीचे
बिना छत के रह रहे थे।

जब इस बात का पता महाराजा रणजीत
सिंह को चला तो उन्होंने यहां मंदिर का
निर्माण करवाया और शिवलिंग की इस
महिमा का गुणगान भी चारों ओर
करवाया।

समूचे भारतवर्ष से आते हैं श्रद्धालु
यहां सदाशिव महादेव के दर्शन के
लिए हिमाचल व पंजाब दोनों तरफ
से पहुंचा जा सकता है।

हिमचाल की तरफ से जाने के लिए
कांगड़ा से नूरपुर राजमार्ग पर जाना
पड़ता है।

इसके बाद इंदौरा जाना पड़ता है।

पठानकोट से इंदौरा कस्बे के प्रवेश
मार्ग से मात्रा 6 किलोमीटर की दूरी
पर स्थित इस मंदिर में बारह महीने
श्रद्धालु माथा टेकने के लिए आते
रहते हैं।

हर वर्ष महाशिवरात्रि के दिन से यहां
तीन दिवसीय मेले का आयोजन भी
किया जाता है।

शिव स्तुति –
यमुना प्रसाद चतुर्वेदी ‘प्रीतम’

जय जयति जगदाधार जगपति,
जय महेश नमामिते।
वाहन वृषभ वर सिद्धि दायक,
विश्वनाथ उमापते।

सिर गंग भव्य भुजंग भूसन
भस्म अंग सुसोभिते।
सुर जपति शिव,शशिधर कपाली,
भूत पति शरणागते।

जय जयति गौरीनाथ जय
काशीश जय कामेश्वरम।
कैलाशपति,जोगीश,जय
भोगीश, वपु गोपेश्वरम।

जय नील लोहित गरल-गर-
हर-हर विभो विश्वंभरम।
रस रास रति रमणीय रंजित
नवल नृत्यति नटवरम।

तत्तत्त ताता ता तताता थे
इ तत्ता ताण्डवम।
कर बजत डमरू डिमक-डिम-
डिम गूंज मृदु गुंजित भवम।

बम-बम बदत वेताल भूत
पिशाच भूधर भैरवम।
जय जयति खेचर यक्ष किन्नर
नित्य नव गुण गौरवम।

जय प्रणति जन पूरण मनोरथ
करत मन महि रंजने।
अघ मूरि हारी धूरि जटि तुम
त्रिपुर अरि-दल गंजने।

जय शूल पाणि पिनाक धर
कंदर्प दर्प विमोचने।
‘प्रीतम’ परसि पद होइ पावन
हरहु कष्ट त्रिलोचने।
#साभारसंकलित;;
=============

न मृत्युर्न शङ्का न मे जातिभेदः
पिता नैव मे नैव माता न जन्मः।

न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यं
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

न(मेरी)मृत्यु है,न इसकी कोई शंका
है,न मेरे लिए कोई जातिभेद है,न(मेरे)
कोई पिता है,न ही माता है,न(मेरा)
जन्म है।

न (मेरा) भाई है,न मित्र है न ही कोई
गुरु या शिष्य है,मैं कल्याणकारी,
चिदानंद रूप शिव हूँ।

समस्त चराचर प्राणियोँ एवं सकल
विश्व का कल्याण करो प्रभु !

ॐ नमः शिवाय !

कष्ट हरो,,काल हरो,,
दुःख हरो,,दारिद्रय हरो,,
हर,,हर,,महादेव,,
जयमहाकाल,
जय भवानी,
जय श्री राम,,

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धार्मिक या वैज्ञानिक ? ? ?

एक माँ अपने पूजा-पाठ से फुर्सत पाकर अपने विदेश में रहने वाले बेटे से फोन पर बात करते समय पूँछ बैठी: … बेटा! कुछ पूजा-पाठ भी करते हो या फुर्सत ही नहीं मिलती?

बेटे ने माँ को बताया – “माँ,  मैं एक आनुवंशिक वैज्ञानिक हूँ …
मैं अमेरिका में मानव के विकास पर काम कर रहा हूँ …
विकास का सिद्धांत, चार्ल्स डार्विन… क्या आपने उसके बारे में सुना है ?”

उसकी माँ मुस्कुरा कर बोली – “मैं डार्विन के बारे में जानती हूँ, बेटा … मैं यह भी जानती हूँ कि तुम जो सोचते हो कि उसने जो भी खोज की, वह वास्तव में सनातन-धर्म के लिए बहुत पुरानी खबर है…“

“हो सकता है माँ !” बेटे ने भी व्यंग्यपूर्वक कहा …

“यदि तुम कुछ होशियार हो, तो इसे सुनो,” उसकी माँ ने प्रतिकार किया…
… “क्या तुमने दशावतार के बारे में सुना है ? विष्णु के दस अवतार ?”

बेटे ने सहमति में कहा “हाँ! पर दशावतार का मेरी रिसर्च से क्या लेना-देना?”

माँ फिर बोली: लेना-देना है मेरे लाल… मैं तुम्हें बताती हूँ कि तुम और मि. डार्विन क्या नहीं जानते हैं ?

पहला अवतार था मत्स्य अवतार, यानि मछली | ऐसा इसलिए कि जीवन पानी में आरम्भ हुआ | यह बात सही है या नहीं ?”

बेटा अब और अधिक ध्यानपूर्वक सुनने लगा |

उसके बाद आया दूसरा कूर्म अवतार, जिसका अर्थ है कछुआ, क्योंकि जीवन पानी से जमीन की ओर चला गया ‘उभयचर (Amphibian)’ | तो कछुए ने समुद्र से जमीन की ओर विकास को दर्शाया |

तीसरा था वराह अवतार, जंगली सूअर, जिसका मतलब जंगली जानवर जिनमें बहुत अधिक बुद्धि नहीं होती है | तुम उन्हें डायनासोर कहते हो, सही है ? बेटे ने आंखें फैलाते हुए सहमति जताई |

चौथा अवतार था नृसिंह अवतार, आधा मानव, आधा पशु, जंगली जानवरों से बुद्धिमान जीवों तक विकास |

पांचवें वामन अवतार था, बौना जो वास्तव में लंबा बढ़ सकता था | क्या तुम जानते हो ऐसा क्यों है ? क्योंकि मनुष्य दो प्रकार के होते थे, होमो इरेक्टस और होमो सेपिअंस, और होमो सेपिअंस ने लड़ाई जीत ली |”

बेटा दशावतार की प्रासंगिकता पर स्तब्ध हो रहा था जबकि उसकी माँ पूर्ण प्रवाह में थी…

छठा अवतार था परशुराम – वे, जिनके पास कुल्हाड़ी की ताकत थी, वो मानव जो गुफा और वन में रहने वाला था | गुस्सैल, और सामाजिक नहीं |

सातवां अवतार था मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम, सोच युक्त प्रथम सामाजिक व्यक्ति, जिन्होंने समाज के नियम बनाए और समस्त रिश्तों का आधार |

आठवां अवतार था जगद्गुरु श्री कृष्ण, राजनेता, राजनीतिज्ञ, प्रेमी जिन्होंने ने समाज के नियमों का आनन्द लेते हुए यह सिखाया कि सामाजिक ढांचे में कैसे रहकर फला-फूला जा सकता है |

नवां अवतार था भगवान बुद्ध, वे व्यक्ति जो नृसिंह से उठे और मानव के सही स्वभाव को खोजा | उन्होंने मानव द्वारा ज्ञान की अंतिम खोज की पहचान की |

और अंत में दसवां अवतार कल्कि आएगा, वह मानव जिस पर तुम काम कर रहे हो | वह मानव जो आनुवंशिक रूप से अति-श्रेष्ठ होगा |

बेटा अपनी माँ को अवाक होकर सुनता रहा |
अंत में बोल पड़ा “यह अद्भुत है माँ, भारतीय दर्शन वास्तव में अर्थपूर्ण है |”

…पुराण अर्थपूर्ण हैं | सिर्फ आपका देखने का नज़रिया होना चाहिए धार्मिक या वैज्ञानिक ?
🙏🌹🌹 ॐ नमोः नारायणा 🌹🌹🙏

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

Nandi, the vehicle of Lord Shiva


Nandi, the vehicle of Lord Shiva

There was once a sage called as Shilada. Shilada did not have any children. of his own, but he adored children. He wanted to adopt a child, but he did not want to adopt just any child. He wanted a special child blessed by Lord Shiva. So he worshipped Lord Shiva for many years.

Lord Shiva finally appeared before Shilada, “What boon do you seek, Shilada?”

“A child. I wish to have a child, Lord Shiva.” Shilada said bowing before Lord Shiva.

Shiva smiled. “You shall have it soon” He said and vanished.
Shilada returned home a happy man, knowing that the Lord would bless him with a very good child. The next day he went to the farm to begin his ploughing, when he found a beautiful baby in the field before his plough. The baby’s skin glowed with a beautiful white light.

Shilada stared at the baby transfixed, when he heard a voice from the heaven, “SHILADA, TAKE THE CHILD. BRING HIM UP WELL!”

Shilada was overjoyed as he took the boy home. He named the boy Nandi. Right from his childhood, Nandi was devoted to Lord Shiva. Shilada brought up the child with love and care. Shilada taught the child the Vedas and gave the child a good education. Nandi was a brilliant boy and learnt everything very fast. Shilada felt very proud of the child.

Some years later, two sages – Mitra and Varuna came to Shilada’s home. “Welcome great sages!” Shilada gave the rishis some refreshments, “Please sit and make yourself comfortable.”
“Nandi!” Shilada called his son. Nandi came from inside the house. “Nandi please make sure these sages are well looked after.”

Nandi smiled and nodded his head. “Yes father!”

Nandi looked after the two sages well and after enjoying the stay, the sages said that it was time they left. Before they were about to live, Shilada and Nandi both prostrated before the two sages.

Mitra and Varuna first blessed Shilada, “Have a long and happy life, Shilada. You have made us very happy!”

When Nandi fell at the feet, the two sages looked slightly sad.

Slowly they said, “Be well son! Be good to your parents and your teachers!” And they walked off, outside the house
However Shilada noticed the change in the expression of the sages. He ran outside the house, “Great rishis!” He said breathlessly. He turned around and made sure that Nandi was inside the house and could not hear him, and talked to the sages, “You looked sad while blessing my son!” Shilada said feeling terrified, as he was thinking of unpleasant things…”Is…is something wrong?”

Mitra looked at Shilada with pity, “I cannot wish your son a long life….” Mitra said softly.

Shilada looked in absolute panic. “What is going to happen to my son?” He whispered.

“Your son, does not…” Varuna cleared his throat, “…does not have long to live, Shilada. I am sorry…” He said lamely, looking at the horrified expression on Shilada”a face.

Shilada stood there transfixed for a long time. After a long time, he slowly walked back home with stooping shoulders and a broken heart.

Nandi immediately guessed something was wrong, “What is it father? What happened? What…” Nandi asked, vigorously shaking his father.

Slowly and painfully, Shilada narrated his conversation with the two sages.

He expected Nandi to be scared or even that Nandi would even start crying. However Shilada was surprised when he heard Nandi’s laugh. “You were scared of what the sages said!” He said still laughing.

Shilada wondered what could be so funny and looked at his son without any expression.

“Father, you have told me that you have seen Lord Shiva…” Nandi said with great devotion in his eyes. “Anybody who has seen Lord Shiva cannot be afraid of what the sages just said.”
Shilada still looked dumbly at his son, not understanding.

“Father, it is my fate to die, then Lord Shiva can reverse my fate! He is the most powerful God and can do anything. Do you think he would let anything happen to us, when we worship him?” Nandi looked at his father challengingly. “I don’t think so., father..” Nandi said softly.

Shilada looked at his son as if looking at him for the first time. Slowly Shilada nodded his head and smiled.

Nandi bowed to his father. “Bless me father!”

Shilada blessed his son, “Be victorious my son!”

Nandi then went near the River Bhuvana. He entered the river and began his penance. His devotion was so great and his concentration was so high, that Lord Shiva appeared almost instantaneously.

“Nandi, open you eyes!” said the three eyed God tenderly, looking at Nandi.

Nandi opened his eyes and before his eyes stood the most beautiful person he had seen in his whole life. Nandi looked at the God wanting to savour his image. He felt that he had nothing more left to ask. If only I could stay with the Lord always…

Shiva looked at Nandi with lots of love, “Nandi, you penance was so powerful that it dragged me here immediately! Ask me anything I will grant it to you!” Shiva said.

“Lord I wish to be with you always.” The words were out of Nandi’s mouth before he could stop them.

Shiva smiled. “Nandi I have just lost my bull, on which I used to travel. Henceforth Nandi, you shall have a face of a bull. You shall stay in my home at Kailash. You shall be the head of all my Ganas…You will be my companion, my vehicle and my friend, always!”

Nandi closed his eyes as tears flowed through them. The Lord had granted him his wish and a lot more…

Since then Nandi became Shiva’s vehicle, doorman, his companion and the head of all of Shiva’s attendants – the Ganas. Thus by sheer devotion Nandi was not only able to overcome his fate, he also rewrote it!

A few days later the Devas and the Asuras together churned the ocean for nectar. However the first thing that emerged from the churning was the poison Halahal. The poison was so strong that it threatened to destroy the whole world. To protect the world,

Lord Shiva collected the poison in his hand and swallowed it. Goddess Parvati who was near Lord Shiva clutched Shiva’s throat to make sure that the poison was stored in the throat and would not affect Lord Shiva.

However some Halahal slipped out of Shiva’s hands and fell on the ground. Nandi gathered the fallen Halahal and seeing his master drink it, he also drank it!

The Devas were staring shocked at what Nandi had done! Lord Shiva was a God and besides he had Goddess Parvati to protect him, so nothing would happen to Lord Shiva. But Nandi…

However nothing happened to Nandi. Shiva looked at the dumb folded gods and smiled, “Nandi is my greatest devotee! All my powers are his too and Parvati’s protection will go to him too!”

The three of them smiled and then returned to Kailash.

From
Hinduism (The forgotten facts)