Posted in संस्कृत साहित्य

आरती की महिमा


आरती की महिमा
〰〰🌼〰〰
आरती को आरात्रिक , आरार्तिक अथवा नीराजन भी कहते हैं। पूजा के अंत में आरती की जाती है। जो त्रुटि पूजन में रह जाती है वह आरती में पूरी हो जाती है।

स्कन्द पुराण में कहा गया है-
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं यत् कृतं पूजनं हरे:।
सर्वं सम्पूर्णतामेति कृते निराजने शिवे ।।

अर्थात – पूजन मंत्रहीन तथा क्रियाहीन होने पर भी नीराजन (आरती) कर लेने से उसमे सारी पूर्णता आ जाती है।

आरती करने का ही नहीं, देखने का भी बड़ा पूण्य फल प्राप्त होता है। हरि भक्ति विलास में एक श्लोक है-

नीराजनं च यः पश्येद् देवदेवस्य चक्रिण:।सप्तजन्मनि विप्र: स्यादन्ते च परमं पदम।।

अर्थात – जो भी देवदेव चक्रधारी श्रीविष्णु भगवान की आरती देखता है, वह सातों जन्म में ब्राह्मण होकर अंत में परम् पद को प्राप्त होता है।

श्री विष्णु धर्मोत्तर में कहा गया है-

धूपं चरात्रिकं पश्येत काराभ्यां च प्रवन्देत।
कुलकोटीं समुद्धृत्य याति विष्णो: परं पदम्।।

अर्थात – जो धुप और आरती को देखता है और दोनों हाथों से आरती लेता है, वह करोड़ पीढ़ियों का उद्धार करता है और भगवान विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है।

आरती में पहले मूल मंत्र (जिस देवता का, जिस मंत्र से पूजन किया गया हो, उस मंत्र) के द्वारा तीन बार पुष्पांजलि देनी चाहिये और ढोल, नगाड़े, शख्ङ, घड़ियाल आदि महावाद्यो के तथा जय-जयकार के शब्दों के साथ शुभ पात्र में घृत से या कर्पूर से विषम संख्या में अनेक बत्तियाँ जलाकर आरती करनी चाहिए-

ततश्च मुलमन्त्रेण दत्त्वा पुष्पाञ्जलित्रयम्।
महानिराजनं कुर्यान्महावाद्यजयस्वनैः।।
प्रज्वलेत् तदर्थं च कर्पूरेण घृतेन वा।
आरार्तिकं शुभे पात्रे विषमानेकवर्दिकम्।।

अर्थात – साधारणतः पाँच बत्तियों से आरती की जाती है, इसे ‘पञ्चप्रदीप’ भी कहते है। एक, सात या उससे भी अधिक बत्तियों से आरती की जाती है। कर्पूर से भी आरती होती है।

पद्मपुराण में कहा है-

कुङ्कुमागुरुकर्पुरघृतचंदननिर्मिता:।
वर्तिका: सप्त वा पञ्च कृत्वा वा दीपवर्तिकाम्।।
कुर्यात् सप्तप्रदीपेन शङ्खघण्टादिवाद्यकै:।

अर्थात – कुङ्कुम, अगर, कर्पूर, घृत और चंदन की पाँच या सात बत्तियां बनाकर शङ्ख, घण्टा आदि बाजे बजाते हुवे आरती करनी चाहिए।

आरती के पाँच अंग होते है:

पञ्च नीराजनं कुर्यात प्रथमं दीपमालया।
द्वितीयं सोदकाब्जेन तृतीयं धौतवाससा।।
चूताश्वत्थादिपत्रैश्च चतुर्थं परिकीर्तितम्।
पञ्चमं प्रणिपातेन साष्टाङ्गेन यथाविधि।।

अर्थात – प्रथम दीपमाला के द्वारा, दूसरे जलयुक्त शङ्ख से, तीसरे धुले हुए वस्त्र से, आम व् पीपल अदि के पत्तों से और पाँचवे साष्टांग दण्डवत से आरती करें।

आदौ चतुः पादतले च विष्णो द्वौं नाभिदेशे मुखबिम्ब एकम्।
सर्वेषु चाङ्गेषु च सप्तवारा नारात्रिकं भक्तजनस्तु कुर्यात्।।

अर्थात – आरती उतारते समय सर्वप्रथम भगवान की प्रतिमा के चरणों में उसे चार बार घुमाए, दो बार नाभिदेश में, एक बार मुखमण्डल पर और सात बार समस्त अंङ्गो पर घुमाए।

यथार्थ में आरती पूजन के अंत में इष्टदेवता की प्रसन्नता के हेतु की जाती है। इसमें इष्टदेव को दीपक दिखाने के साथ ही उनका स्तवन तथा गुणगान किया जाता है। आरती के दो भाव है जो क्रमशः ‘नीराजन’ और ‘आरती’ शब्द से व्यक्त हुए है। नीराजन (निःशेषण राजनम् प्रकाशनम्) का अर्थ है- विशेषरूप से, निःशेषरूप से प्रकाशित करना। अनेक दिप-बत्तियां जलाकर विग्रह के चारों ओर घुमाने का यही अभिप्राय है कि पूरा-का-पूरा विग्रह एड़ी से चोटी तक प्रकाशित हो उठे- चमक उठे, अंङ्ग-प्रत्यङ्ग स्पष्ट रूप से उद्भासित हो जाये, जिसमें दर्शक या उपासक भलिभांति देवता की रूप-छटा को निहार सके, हृदयंगम कर सके। दूसरा ‘आरती’ शब्द (जो संस्कृत के आर्ति का प्राकृत रूप है और जिसका अर्थ है अरिष्ट) विशेषतः माधुर्य-उपासना से सम्बंधित है।

आरती-वारना का अर्थ है आर्ति-निवारण, अनिष्ट से अपने प्रियतम प्रभु को बचाना। इस रूप में यह एक तांत्रिक क्रिया है, जिसमे प्रज्वलित दीपक अपने इष्टदेव के चारों ओर घुमाकर उनकी सारी विघ्न बधाये टाली जाती है। आरती लेने से भी यही तात्पर्य है कि उनकी आर्ति (कष्ट) को अपने ऊपर लेना। बलैया लेना, बलिहारी जाना, बली जाना, वारी जाना न्यौछावर होना आदि प्रयोग इसी भाव के द्योतक है। इसी रूप में छोटे बच्चों की माताए तथा बहिने लोक में भी आरती उतारती है। यह आरती मूल रूप में कुछ मंत्रोच्चारण के साथ केवल कष्ट-निवारण के लिए उसी भाव से उतारी जाती रही है।
आज कल वैदिक उपासना में उसके साथ-साथ वैदिक मंत्रों का उच्चारण भी होता है तथा पौराणिक एवं तांत्रिक उपासना में उसके साथ सुंदर-सुंदर भावपूर्ण पद्य रचनाएँ भी गायी जाती है। ऋतू, पर्व पूजा के समय आदि भेदों से भी आरती गायी जाती है।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

भगवान ने अब छठे वर्ष में प्रवेश किया।


भगवान ने अब छठे वर्ष में प्रवेश किया।
एक दिन भगवान मैया से बोले – ‘मैया…अब हम बड़े हो गये हैं।
.
मैया ने कहा- अच्छा लाला…तुम बड़े हो गये तो बताओ क्या करे?
भगवान ने कहा – मैया अब हम बछड़े नहीं चरायेगे, अब हम गाये चरायेगे।
.
मैया ने कहा – ठीक है। बाबा से पूँछ लेना…झट से भगवान बाबा से पूंछने गये।
.
बाबा ने कहा – लाला…, तुम अभी बहुत छोटे हो,
अभी बछड़े ही चराओ।
भगवान बोले- बाबा मै तो गाये ही चराऊँगा।
.
जब लाला नहीं माने तो बाबा ने कहा -ठीक है लाला,.. जाओ पंडित जी को बुला लाओ, वे गौ-चारण का मुहूर्त देखकर बता देगे।
.
भगवान झट से पंडितजी के पास गए और बोले पंडितजी…. बाबा ने बुलाया है। गौचारण का मुहूर्त देखना है आप आज ही का मुहूर्त निकल दीजियेगा,
यदि आप ऐसा करोगे तो मैं आप को बहुत सारा माखन दूँगा।
.
पंडितजी घर आ गए पंचाग खोल कर बार-बार अंगुलियों पर
गिनते,.. बाबा ने पूँछा -पंडित जी क्या बात है?
आप बार-बार क्या गिन रहे है ?
.
पंडित जी ने कहा – क्या बताये,..नंदबाबाजी, केवल आज ही का मुहूर्त निकल रहा है इसके बाद तो एक वर्ष तक कोई मुहूर्त है ही नहीं।
.
बाबा ने गौ चारण की स्वीकृति दे दी।
.
भगवान जिस समय, जो काम करे, वही मुहूर्त बन जाता है।
उसी दिन भगवान ने गौचारण शुरू किया वह शुभ दिन कार्तिक-माह का “गोपा-अष्टमी” का दिन था।
माता यशोदा जी ने लाला का श्रृंगार कर दिया और जैसे ही पैरों में जूतियाँ पहनाने लगी तो बाल कृष्ण ने मना कर दिया और कहने लगे मैया !
यदि मेरी गौ जूते नही पहनती तो मै कैसे पहन सकता हूँ।
.
यदि पहना सकती हो तो सारी गौओं को जूतियाँ पहना दो।
फिर मैं भी पहन लूंगा और भगवान जब तक वृंदावन में रहे कभी भगवान ने पैरों में जूतियाँ नहीं पहनी।
.
अब भगवान अपने सखाओं के साथ गौए चराते हुए वृन्दावन में जाते और अपने चरणों से वृन्दावन को अत्यंत पावन करते।
यह वन गौओ के लिए हरी हरी घास से युक्त एवं रंग- बिरंगे पुष्पों की खान हो रहा था,
आगे आगे गौएँ उनके पीछे-पीछे बाँसुरी बजाते हुए श्यामसुन्दर तदन्तर बलराम और फिर श्रीकृष्ण के यश का गान करते हुए ग्वालबाल।
.
इस प्रकार विहार करने के लिए उन्होंने उस वन में प्रवेश किया। और तब से भगवान गौ चरण लीला करने लगे।
.
.
हे गोपाल !

Posted in नहेरु परिवार - Nehru Family

अपना अमूल्य समय देकर इस पोस्ट का अवश्य पाठन करें, डॉ होमी भामा, जो भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक भी कहे जाते है — પ્રહલાદ પ્રજાપતિ


‎Santosh Kumar Hande‎ to I SUPPORT .P. M. MODI (BJP) 2019 अपना अमूल्य समय देकर इस पोस्ट का अवश्य पाठन करें, डॉ होमी भामा, जो भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक भी कहे जाते है डॉक्टर भाभा ने युद्ध से बहुत पहले ही ये बता दिया था कि, मैंने वो टेक्नॉलॉजी खोज ली है जो मेरे देश […]

via अपना अमूल्य समय देकर इस पोस्ट का अवश्य पाठन करें, डॉ होमी भामा, जो भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक भी कहे जाते है — પ્રહલાદ પ્રજાપતિ

Posted in Uncategorized

इतिहास जो हमें जानना चाहिए ….
बंगाल (बांग्लादेश सहित) आज इस्लामी हो गया, वहीँ ओडिसा आज भी 95% हिन्दू है …. कैसे ?

सन 1248 ( 13वी शताब्दी ) बादशाह तुगन खान ने उडीसा पर हमला किया । उस समय वहां पर राजा नरसिम्हादेवा का राज था ।

राजा नरसिम्हादेव ने फ़ैसला किया कि इस्लामी हमलावर को इसका जवाब छल से दिया जाना चाहिये । उन्होने तुगन खान को ये संदेश दिया कि वो भी बंगाल के राजा लक्ष्मणसेन की तरह समर्पण करना चाहते हैं, जिसने बिना युद्ध लडे तुगन खान के सामने हथियार डाल दिये थे।

तुगन खान ने बात मान ली और कहा कि वो अपना समर्पण “पूरी” शहर में करे, इस्लाम कबूल करे और जगन्नाथ मंदिर को मस्जिद में बदल दे ।

राजा नरसिम्हादेव राज़ी हो गए और इस्लामिक लश्कर “पूरी” शहर की तरफ़ बढने लगा, इस बात से अन्जान कि ये एक जाल।है। राजा नरसिम्हादेव के हिंदू सैनिक शहर के सारे चौराहों , गली के नुक्कड़ ओर घरों में छुप गये ।

जब तुगन खान के इस्लामिक लश्कर ने जगन्नाथ मंदिर के सामने पहुंचे, उसी समय मंदिर की घंटिया बजने लगी और ‘जय जगन्नाथ’ का जयघोष करते हिंदू सैनिको ने इस्लामिक लश्कर पर हमला कर दिया। दिनभर युद्ध चला, ज्यादातर इस्लामिक लश्कर को कब्जे में कर लिया गया और कुछ भाग गये । इस तरह की युद्धनीति का उपयोग पहले कभी नहीं हुआ था । किसी हिंदू राजा द्वारा जेहाद का जवाब धर्मयुद्ध के द्वारा दिया गया ।

राजा नरसिम्हादेवा ने इस विजय के उपलक्ष्य में ” कोनार्क” मंदिर का निर्माण किया ।

गूगल पर कम से कम ज़रूर देखिये इस शानदार मंदिर को ।
अगर लड़ोगे तो जीतने की गुंजाइश तो होगी ही, मुर्दे लड़ नहीं सकते इसीलिए वो धर्मनिरपेक्षता का ढोंग करते हैं ।

संजय द्विवेदी

Posted in Uncategorized

अपनी जन्म कुंडली अनुसार जानिए
की इन घरेलु उपायों से केसे करें
लक्ष्मी की प्राप्ति —-
दान का महत्व तीनों लोक में विशिष्ट महत्व रखता है।
इसके प्रभाव से पाप-पुण्य व ग्रह के प्रभाव कम व ज्यादा होते
हैं। इसमें शुक्र और गुरु को विशेष धनप्रदाय ग्रह माना गया है।
आकाश मंडल के सभी ग्रहों का कारतत्व
पृथ्वी में पाए जाने वाले पेड़-पौधों व पशु-पक्षियों पर
पाया जाता है। गाय पर शुक्र ग्रह का विशेष प्रभाव पाया जाता है।
– गाय की सेवा भी इस श्रेणी में
विशेष महत्व रखती है। जिस घर से गाय के लिए भोजन
की पहली रोटी या प्रथम
हिस्सा जाता है
वहाँ भी लक्ष्मी को अपना निवास
करना पड़ता है।
– साथ ही घर के भोजन का कुछ भाग श्वान
को भी देना चाहिए, क्योंकि ये भगवान भैरव के गण माने
जाते हैं, इनको दिया गया भोजन आपके रोग, दरिद्रता में
कमी का संकेत देता है।
– इसी तरह पीपल के वृक्ष में गुरु का वास
माना गया है। अतः पीपल के वृक्ष में यथासंभव
पानी देना चाहिए तथा परिक्रमा करनी चाहिए।
यदि घर के पास कोई पीपल के वृक्ष के पास से गंदे
पानी का निकास स्थान हो तो इसे बंद कराना चाहिए। वृक्ष
के समीप किसी भी प्रकार
की गंदगी गुरु ग्रह के कोप का कारण बन
सकती है।
– घर के वृद्धजन भी गुरु ग्रह के कारतत्व में आते
हैं। घर के वृद्धजनों की स्थिति व उनका मान-सम्मान
भी आपकी आर्थिक
स्थिति को काफी प्रभावित करते हैं। यदि आपके घर में
वृद्धों का सम्मान होता है तो निश्चित रूप से आपके घर में
समृद्धि का वास होगा, अन्यथा इसके ठीक
विपरीत स्थिति होगी।
– व्यय भाव में अशुभ ग्रह
की स्थिति भी दरिद्रता का कारक
होती है।
– बारहवें भाव के स्वामी ग्रह का दान अवश्य
करना चाहिए, क्योंकि इससे आपके व्यय में
कमी आती है।
– जन्म पत्रिका के बारहवें भाव में जिस तरह के ग्रह हों उससे
संबंधित धन से जीवन में आने
वाली विपत्तियों से मुक्ति आती है।
– व्यय भाव में मंगल होने पर व्यक्ति को सांड को गुड़, चना या बंदर
को चना खिलाना चाहिए।
– व्यय भाव में गुरु होने पर विद्वान
व्यक्ति को शिक्षा सामग्री उपलब्ध कराना चाहिए,
यथासंभव दान करना चाहिए।
– व्यय भाव में शनि होने पर व्यक्ति को काले कीड़े
जहाँ रहते हों उस स्थान पर भुना हुआ आटा डालना चाहिए।
– व्यय भाव में सूर्य की स्थिति होने पर लाल मुँह के
बंदर को खाद्य सामग्री देना चाहिए।
– राहु की व्यय भाव में स्थिति होने पर
कोढ़ी व्यक्ति को दान देना चाहिए। गूगे-बहरे
लोगों को दिया गया दान भी फलदायक रहेगा।
– धन की व्यय भाव में स्थिति रहने पर मिट्ठू
की सेवा अथवा बकरी को पत्तियाँ वगैरह
का सेवन करवाना चाहिए।
– द्रव्य की व्यय भाव में स्थिति होने पर
गर्मी के दिनों में प्याऊ
की व्यवस्था करवाना चाहिए।
– केतु की व्यय भाव में स्थिति होने पर लंगड़े, अपंग
व्यक्ति को दान व यथासंभव सहयोग करना चाहिए।
घर की बहू-बेटियों पर भी शुक्र का कारतत्व
है। अतः व्यक्ति को नारी जाति का सम्मान कर बहन-
बेटियों की यथासंभव मदद करना चाहिए क्योंकि इनके लिए
किया गया कोई भी कार्य आपके पुण्यों में वृद्धि करता है
तथा दरिद्रता दूर करने में सहायक होता है।
अतः व्यक्ति को अपनी जन्म पत्रिका के छठे व व्यय भाव
से संबंधित
ग्रहों की जानकारी किसी विद्वान
व्यक्ति से लेकर संबंधित दान, जप, पूजन, नियमित रुप से
करना चाहिए। साथ ही अन्य
व्यक्तियों को भी इस कार्य के लिए प्रेरित करना चाहिए।
छठे भाव के ग्रह का दान करने से रोग, कर्ज व शत्रु नष्ट होते हैं
तथा व्यय भाव से संबंधित दान करने से विपत्तियों में
कमी आती है। यदि शत्रु, रोग, कर्ज व
विपत्ति कम होगी तो निश्चित रुप से धन व
समृद्धि बढ़ेगी ही। अतः इस सरल दान, जप
को करने से प्रत्येक घर में सुख-समृद्धि व
लक्ष्मी का वास होता है।

Posted in Uncategorized

व्यापार / लक्ष्मी बंधन दूर करने और धन वर्षा का उपाय


मित्रों
एक समस्या जो अक्सर सुनने में आती है
या जिसका समाधान अक्सर पूछा जाता है वो है व्यापार
या लक्ष्मी बंधन का।
लोग कहते हैं की अच्छा खासा चलता बिजनेस या दुकान
अचानक से ठप हो गयी। पैसे की आवक
ख़त्म हो गयी रोजमर्रा की जरूरतें
पूरी करना भी मुश्किल हो रहा है।
ये सिर्फ बिजनेस
वालो की नहीं नौकरी वालों की भी समस्या होती है
की अचानक ऑफिस में माहौल और सम्बन्ध बिगड़ जाते
हैं तनख्वाह कट जाती है किसी नुकसान
का जिम्मेदार आपको ठहरा दिया जाता है। जो पैसे मिलते है उसमे
आवश्यकता पूर्ति नहीं हो पाती
जबकि उतने ही पैसों में पहले
जिन्दगी आराम से चल रही थी।
अक्सर लोगों को पता भी होता है की उनके
इस कठिन समय के लिए कौन जिम्मेदार है या किसने ये किया कराया है
तो कई बार वे इससे बिलकुल अनभिज्ञ रहते हैं।
मित्रों एक अचूक उपाय बता रहा हूँ जिन्हें करके आप इस
मुसीबत से छुटकारा पा सकते हैं इससे न सिर्फ व्यापार
या लक्ष्मी का बंधन कटेगा बल्कि धनागम
भी सुचारू और बेहतर होगा साथ ही नियम
पूर्वक करने पर धन वर्षा का भी आनंद लेंगे।
वैसे तो ये प्रयोग नवरात्र या दीपावली पर
करना अधिक प्रभावी होता है पर जब पैसे के लाले पड़े
हों तब कोई इतना लम्बा इंतजार कैसे करेगा और ये चीज़
तुरंत खोलनी चाहिए इसलिए ये प्रयोग आप
किसी भी पक्ष
की अष्टमी अथवा किसी भी शुक्रवार
के दिन एक
लकड़ी की चौकी या पाटे पर एक
लाल वस्त्र बिछाएं। उस पर माँ काली का एक विग्रह
या चित्र स्थापित करें ।
पाटे या चौकी के चरों कोनो पर एक एक उड़द
की ढेरी बना कर उस पर एक एक लघु
नारियल स्थापित करें।
माँ के चारों ओर उड़द और चावल की पांच ढेरियाँ बनाकर
प्रत्येक पर 3 -3 गांठ
काली हल्दी की रखें और
दो दो गोमती चक्र चढ़ाएं।
विग्रह के सामने तीन मुट्ठी अक्षत और
सवा मुट्ठी उड़द की ढेरियाँ बनायें।
चावल वाली ढेरी पर सियार
सिंगी का जोड़ा और उड़द
वाली ढेरी पर
हत्था जोड़ी स्थापित करें।
चमेली या तिल के तेल का दीपक जलाएं।
अब भगवान श्री गणेश जी का पूजन कर
प्रार्थना करें की आपका ये अनुष्ठान सफलता पूर्वक
संपन्न हो और आपके सभी कष्ट दूर हों। फिर माँ और
सभी वस्तुओं की पंचोपचार पूजा करें। चन्दन
की धूप या धूनी जलाएं।
माँ को खीर का भोग अर्पित करें।
निम्न मन्त्र की 11 माला करें
ॐ श्रीं ह्रीं क्रीं फट
स्वाहा। ॐ किली किली स्वाहा।
इस प्रकार उक्त सामग्री यूँ ही रहने दें।
आगे 10 दिन तक 11 माला करें।
अंतिम दिन पुनः खीर का भोग लगायें बिच के दिनों में
बर्फी पैडा या ड्राई फ्रूट आदि का भोग लगा सकते हैं।
11वें दिन उक्त सारा सामान अर्थात सियार सिंगी,
हत्था जोड़ी, काली हल्दी और
प्रत्येक धेरी में से एक गोमती चक्र
को उठाकर एक चाँदी की डिब्बी में
सिंदूर भर कर रख लें। लाल कपडे को अपने गल्ले में निचे बिछा दें और
पैसे उसके ऊपर या उसमे लपेट कर रखें।
अन्य सभी सामग्री अर्थात चावल उड़द
खिचड़ी , प्रत्येक ढेरी पर बचे हुए एक
गोमती चक्र और लघु नारियल को एक काले कपडे में लपेट
लें और अपनी दुकान प्रतिष्ठान गल्ले के ऊपर से 21
बार घडी की उलटी दिशा में उतार
कर नदी में प्रवाहित कर दें।
उक्त प्रयोग के बाद यदि आप उक्त मन्त्र को प्रतिदिन ३ माला 6
माह तक नियमित रूप से कर लें तो आपको स्वयं
ही अनुभूति होगी की धनवर्षा हो रही है।
नोट या पैसे आसमान से नहीं बरसेंगे बल्कि अप्को कम
मेहनत में भी अच्छा खासा लाभ होगा।
मित्रों ये बेहद प्रभावी और कारगर उपाय है। इसके
करने से न सिर्फ व्यापार और लक्ष्मी का बंधन
खुलेगा बल्कि कुछ ही वक्त में धन का अवागमन सुचारू
हो जायेगा साथ ही आपके शत्रुओं के पूर्व में किये और
भविष्य में किये जाने वाले सभी टोटके
आदि भी निष्फल हो जायेंगे।
इसके आलावा
सिद्ध दक्षिणावर्ती शंख को स्थापित कर उसमे प्रतिदिन
जल भरकर छिडकाव करने से
भी लक्ष्मी बंधन दूर होता है।
सिद्ध एकाक्षी नारियल और श्वेतार्क गणपति स्थापित कर
उनका नियमित पूजन करने से भी उक्त लाभ होता है।
इसके साथ ही यदि आपको अपने कार्य स्थल में आलस
आता हो, कमर या पैरों में दर्द रहता हो, आंखे लाल
हो जाती हों जबान लडखडाती हो यइ
सभी चीजें भी उक्त प्रयोग से
समाप्त हो जाएँगी।

Vikram prakash

Posted in Uncategorized

दर्द
.
पचास वर्षीय राजेश बाबू ने सुबह सुबह करवट ली और हमेशा की तरह अपनी पत्नी मीता को चाय बनाने को कहा और फिर रजाई ढक कर करवट ले ली.
कुछ पल उन्होने इंतजार की पर कोई हलचल ना होने पर उन्होने दुबारा आवाज दी.
.
ऐसा कभी भी नही हुआ था इसलिए राजेश बाबू ने लाईट जलाई और मीता को हिलाया पर कोई हलचल ना होने पर ना जाने वो घबरा से गए.
रजाई हटाई तो मीता निढाल सी एक ओर पडी थी.
ना जाने रात ही रात मे क्या हो गया.
.
अचानक मीता का इस तरह से उनकी जिंदगी से हमेशा हमेशा ले लिए चले जाना …. असहनीय था.
धीरे धीरे जैसे पता चलता रहा लोग इकठठे होते रहे और उसका अंतिम संस्कार कर दिया.
.
एक हफ्ता किस तरह बीता उन्हे कुछ याद ही नही. उन का एक ही बेटा था जो कि अमेरिका रहता था.
पढाई के बाद वही नौकरी कर ली थी.
बेटा आकर जाने की भी तैयारी कर रहा था.
.
उसने अपने पापा को भी साथ चलने को कहा और वो तैयार भी हो गए. पर मीता की याद को अपने दिल से लगा लिया था.
अब उन्हे हर बात मे उसकी अच्छाई ही नजर आने लगी.उन्हे याद आता कि कितना ख्याल रखती थी मीता उनका पर वो कोई भी मौका नही चूकते थे उसे गलत साबित करने का. ना कभी उसकी तारीफ करते और ना कभी उसका मनोबल बढाते बल्कि कर काम मे उसकी गलती निकालने मे उन्हे असीम शांति मिलती थी.
.
उधर मीता दिनभर काम मे जुटी रहती थी.
एक बार् जब काम वाली बाई 2 महीने की छुट्टी पर गई थी तब भी मीता इतने मजे से सारा काम बिना किसी दर्द और शिकन के आराम से गुनगुनाते हुए किया जबकि कोई दूसरी महिला होती तो अशांत हो जाती .
दिन रात राजेश बाबू उनकी यादो के सहारे जीने लगे.
काश वह तब उसकी कीमत जान पाते. काश वो तब उसकी प्रशंसा कर पाते. काश …. !!! पर अब बहुत देर हो चुकी थी.
.
आज राजेश अमेरिका जाने के लिए सामान पैक कर रहे थे.
पैक करते करते मीता की फोटो को देख कर अचानक फफक कर रो पडे और बोले मीता,मुझे माफ कर दो.
प्लीज वापिस आ जाओ . मै तुम्हारे बिना कुछ नही हूं. आज जान गया हूं कि मै तुमसे कितना कितना प्यार करता हूं…
.
तभी उन्हें किसी ने पीठ से झकोरा.
इससे पहले वो खुद को सम्भाल पाते अचानक उनकी आखं खुल गई.
मीता उन्हे घबराई हुई आवाज मे उठा रही थी.
वो सब सपना था.
.
एक बार तो उन्हे विश्वास ही नही हुआ पर दूसरे पल उन्होने मीता का हाथ अपने हाथो मे ले लिया पर आखो से आसूं लगातार बहे जा रहे थे.
बस एक ही बात कह पाए … आई लव यू मीता !!!! आई लव यू !!!
और मीता नम हुई आखो से अपलक राजेश को ही देखे जा रही थी…

Posted in Uncategorized

इसबगोल के विभिन्न रोगो में उपयोग।
ईसबगोल प्लेनटेगो आवेटा तथा प्लेंटेगो सिलियम नामक पौधे के लाल भूरे एवं काले बीजो से इसबगोल प्राप्त होता हैं। यह एक झाड़ी के रूप में उगता है, जिसकी अधिकतम ऊँचाई ढाई से तीन फुट तक होती है। इसके पत्ते महीन होते हैं तथा इसकी टहनियों पर गेहूँ की तरह बालियाँ लगने का बाद फूल आते हैं। फूलों में नाव के आकार के बीज होते हैं। इसके बीजों पर पतली सफ़ेद झिल्ली होती है। यह झिल्ली ही ‘ईसबगोल की भूसी’ कहलाती है। यह एक स्वादिष्ट एवं महक रहित आयुर्वेदीय औषिधि हैं। इसबगोल का बीज तथा बीज का छिलका (भूसी या हस्क) औषिधीय कार्यो में बेहद उपयोगी हैं।

आइये जाने इनको प्रयोग।
अमीबिका (पेचिश):
100 ग्राम ईसबगोल की भूसी में 50-50 ग्राम सौंफ और मिश्री को 2-2 चम्मच की मात्रा में रोजाना 3 बार सेवन करने से लाभ मिलता है।

जोड़ों का दर्द:
ईसबगोल की पुल्टिश (पोटली) पीड़ित स्थान पर बांधने से जोड़ों के दर्द में लाभ मिलता है।

पायरिया:
ईसबगोल को सिरके में मिलाकर दांतों पर मालिश करने से पायरिया के रोग में लाभ मिलता है।

स्वप्नदोष:
ईसबगोल और मिश्री मिलाकर एक-एक चम्मच एक कप दूध के साथ सोने से 1 घंटा पहले लें और सोने से पहले पेशाब करके सोयें।

आंव:
1 चाय की चम्मच ईसबगोल गर्म दूध में फुलाकर रात्रि को सेवन करें। प्रात: दही में भिगोकर, फुलाकर उसमें सोंठ, जीरा मिलाकर 4 दिन तक लगातार सेवन करने से आंव निकलना बंद हो जाएगा।

पुरानी कब्ज, आंव, आंतों की सूजन :
पुरानी आंव या आंतों की सूजन में 100-100 ग्राम बेल का गूदा, सौंफ, ईसबगोल की भूसी और छोटी इलायची को एक साथ पीसकर पाउडर बना लेते हैं। अब इसमें 300 ग्राम देशी खांड या बूरा मिलाकर कांच की शीशी में भरकर रख देते हैं।
इस चूर्ण की 2 चम्मच मात्रा सुबह नाश्ता करने के पहले ताजे पानी के साथ लेते हैं और 2 चम्मच शाम को खाना खाने के बाद गुनगुने पानी या गर्म दूध के साथ 7 दिनों तक सेवन करने से लाभ मिल जाता है। लगभग 45 दिन तक यह प्रयोग करने के बाद बंद कर देते हैं। इससे कब्ज, पुरानी आंव और आंतों की सूजन के रोग दूर हो जाते हैं।

श्वास या दमा:
1 वर्ष या 6 महीने तक लगातार रोजाना सुबह-शाम 2 चम्मच ईसबगोल की भूसी गर्म पानी से सेवन करते रहने से सभी प्रकार के श्वांस (सांस) रोग दूर हो जाते हैं। 6 महीने से लेकर 2 साल तक सेवन करते रहने से 20 से 22 साल तक का पुराना दमा रोग भी इस प्रयोग से चला जाता है। 1-1 चम्मच ईसबगोल की भूसी को दूध के साथ लगातार सुबह और शाम कुछ महीनों तक सेवन करने से दमा के रोग में लाभ मिलता है।

पेशाब की जलन:
1 गिलास पानी में 3 चम्मच ईसबगोल की भूसी को भिगोकर उसमें स्वाद के मुताबिक बूरा (खांड या चीनी) डालकर पीने से पेशाब की जलन दूर हो जाती है।

श्वेतप्रदर:
ईसबगोल को दूध में देर तक उबालकर, उसमें मिश्री मिलाकर खाने से स्त्रियों के श्वेत प्रदर में बहुत लाभ मिलता है।

सिर दर्द:
ईसबगोल को बादाम के तेल में मिलाकर मस्तक पर लेप करने से सिर दर्द दूर हो जाता है।

कान का दर्द:
ईसबगोल के लुवाब में प्याज का रस मिलाकर, हल्का सा गर्म करके कान में बूंद-बूंद करके डालने से कान के दर्द में लाभ मिलता है।

मुंह के छाले:
ईसबगोल को पानी में डालकर रख दें। लगभग 2 घंटे के बाद उस पानी को कपड़े से छानकर कुल्ले करने से मुंह के छाले दूर हो जाते हैं।
3 ग्राम ईसबगोल की भूसी को मिश्री में मिलाकर हल्के गर्म पानी के साथ सेवन करें। इससे मुंह के छाले और दाने ठीक हो जाते हैं। ईसबगोल से कब्ज व छाले नष्ट होते हैं। ईसबगोल को गर्म पानी में घोलकर दिन में 2 बार कुल्ला करने से मुंह के छालों में आराम होगा।

आंतों की जलन- संग्रहणी
आंतों की जलन- संग्रहणी की दाहजन्य पीड़ा में ईसबगोल को दूध में पकाकर मिसरी मिलाकर दूध ठंडा होने के बाद पिलाने से आंतों की जलन कम होती है। यह औषधि भूख बढ़ाती है, मल को बांधती हैं।

पित्तजन्य सिरदर्द में
पित्त विकार के कारण सिरदर्द एवं आंखों का दर्द हो तो ईसबगोल के बीज की 10 ग्राम मात्रा लेकर पानी में भिगो दें तथा 3-4 घंटे बाद मसलकर छानकर मिसरी मिलाकर ठंडे पानी या ठंडे दूध के साथ पीने से लाभ मिलता है।

बवासीर एवं दस्त रोगों में (ईसबगोल का विशिष्ट योग)-
ईसबगोल 50 ग्राम, छोटी इलायची 25 ग्राम और धनिया के बीज 25 ग्राम लेकर सबको मिलाकर चूर्ण बना लें तथा नित्य 5 ग्राम की मात्रा में नित्य प्रात: एवं शाम को पानी या दूध के साथ सेवन करने से बवासीर, रक्तस्राव, मूत्रकृच्छ, प्रमेह, कब्ज, वर में दस्त, पुराना दस्त रोग, नकसीर एवं पित्तविकार के कारण दस्त में लाभ होता है। दस्त रोगों में चूर्ण को जल के साथ ही लेना उचित रहता है। ईसबगोल बवासीर एवं कब्ज

Posted in Uncategorized

इसबगोल के विभिन्न रोगो में उपयोग।
ईसबगोल प्लेनटेगो आवेटा तथा प्लेंटेगो सिलियम नामक पौधे के लाल भूरे एवं काले बीजो से इसबगोल प्राप्त होता हैं। यह एक झाड़ी के रूप में उगता है, जिसकी अधिकतम ऊँचाई ढाई से तीन फुट तक होती है। इसके पत्ते महीन होते हैं तथा इसकी टहनियों पर गेहूँ की तरह बालियाँ लगने का बाद फूल आते हैं। फूलों में नाव के आकार के बीज होते हैं। इसके बीजों पर पतली सफ़ेद झिल्ली होती है। यह झिल्ली ही ‘ईसबगोल की भूसी’ कहलाती है। यह एक स्वादिष्ट एवं महक रहित आयुर्वेदीय औषिधि हैं। इसबगोल का बीज तथा बीज का छिलका (भूसी या हस्क) औषिधीय कार्यो में बेहद उपयोगी हैं।

आइये जाने इनको प्रयोग।
अमीबिका (पेचिश):
100 ग्राम ईसबगोल की भूसी में 50-50 ग्राम सौंफ और मिश्री को 2-2 चम्मच की मात्रा में रोजाना 3 बार सेवन करने से लाभ मिलता है।

जोड़ों का दर्द:
ईसबगोल की पुल्टिश (पोटली) पीड़ित स्थान पर बांधने से जोड़ों के दर्द में लाभ मिलता है।

पायरिया:
ईसबगोल को सिरके में मिलाकर दांतों पर मालिश करने से पायरिया के रोग में लाभ मिलता है।

स्वप्नदोष:
ईसबगोल और मिश्री मिलाकर एक-एक चम्मच एक कप दूध के साथ सोने से 1 घंटा पहले लें और सोने से पहले पेशाब करके सोयें।

आंव:
1 चाय की चम्मच ईसबगोल गर्म दूध में फुलाकर रात्रि को सेवन करें। प्रात: दही में भिगोकर, फुलाकर उसमें सोंठ, जीरा मिलाकर 4 दिन तक लगातार सेवन करने से आंव निकलना बंद हो जाएगा।

पुरानी कब्ज, आंव, आंतों की सूजन :
पुरानी आंव या आंतों की सूजन में 100-100 ग्राम बेल का गूदा, सौंफ, ईसबगोल की भूसी और छोटी इलायची को एक साथ पीसकर पाउडर बना लेते हैं। अब इसमें 300 ग्राम देशी खांड या बूरा मिलाकर कांच की शीशी में भरकर रख देते हैं।
इस चूर्ण की 2 चम्मच मात्रा सुबह नाश्ता करने के पहले ताजे पानी के साथ लेते हैं और 2 चम्मच शाम को खाना खाने के बाद गुनगुने पानी या गर्म दूध के साथ 7 दिनों तक सेवन करने से लाभ मिल जाता है। लगभग 45 दिन तक यह प्रयोग करने के बाद बंद कर देते हैं। इससे कब्ज, पुरानी आंव और आंतों की सूजन के रोग दूर हो जाते हैं।

श्वास या दमा:
1 वर्ष या 6 महीने तक लगातार रोजाना सुबह-शाम 2 चम्मच ईसबगोल की भूसी गर्म पानी से सेवन करते रहने से सभी प्रकार के श्वांस (सांस) रोग दूर हो जाते हैं। 6 महीने से लेकर 2 साल तक सेवन करते रहने से 20 से 22 साल तक का पुराना दमा रोग भी इस प्रयोग से चला जाता है। 1-1 चम्मच ईसबगोल की भूसी को दूध के साथ लगातार सुबह और शाम कुछ महीनों तक सेवन करने से दमा के रोग में लाभ मिलता है।

पेशाब की जलन:
1 गिलास पानी में 3 चम्मच ईसबगोल की भूसी को भिगोकर उसमें स्वाद के मुताबिक बूरा (खांड या चीनी) डालकर पीने से पेशाब की जलन दूर हो जाती है।

श्वेतप्रदर:
ईसबगोल को दूध में देर तक उबालकर, उसमें मिश्री मिलाकर खाने से स्त्रियों के श्वेत प्रदर में बहुत लाभ मिलता है।

सिर दर्द:
ईसबगोल को बादाम के तेल में मिलाकर मस्तक पर लेप करने से सिर दर्द दूर हो जाता है।

कान का दर्द:
ईसबगोल के लुवाब में प्याज का रस मिलाकर, हल्का सा गर्म करके कान में बूंद-बूंद करके डालने से कान के दर्द में लाभ मिलता है।

मुंह के छाले:
ईसबगोल को पानी में डालकर रख दें। लगभग 2 घंटे के बाद उस पानी को कपड़े से छानकर कुल्ले करने से मुंह के छाले दूर हो जाते हैं।
3 ग्राम ईसबगोल की भूसी को मिश्री में मिलाकर हल्के गर्म पानी के साथ सेवन करें। इससे मुंह के छाले और दाने ठीक हो जाते हैं। ईसबगोल से कब्ज व छाले नष्ट होते हैं। ईसबगोल को गर्म पानी में घोलकर दिन में 2 बार कुल्ला करने से मुंह के छालों में आराम होगा।

आंतों की जलन- संग्रहणी
आंतों की जलन- संग्रहणी की दाहजन्य पीड़ा में ईसबगोल को दूध में पकाकर मिसरी मिलाकर दूध ठंडा होने के बाद पिलाने से आंतों की जलन कम होती है। यह औषधि भूख बढ़ाती है, मल को बांधती हैं।

पित्तजन्य सिरदर्द में
पित्त विकार के कारण सिरदर्द एवं आंखों का दर्द हो तो ईसबगोल के बीज की 10 ग्राम मात्रा लेकर पानी में भिगो दें तथा 3-4 घंटे बाद मसलकर छानकर मिसरी मिलाकर ठंडे पानी या ठंडे दूध के साथ पीने से लाभ मिलता है।

बवासीर एवं दस्त रोगों में (ईसबगोल का विशिष्ट योग)-
ईसबगोल 50 ग्राम, छोटी इलायची 25 ग्राम और धनिया के बीज 25 ग्राम लेकर सबको मिलाकर चूर्ण बना लें तथा नित्य 5 ग्राम की मात्रा में नित्य प्रात: एवं शाम को पानी या दूध के साथ सेवन करने से बवासीर, रक्तस्राव, मूत्रकृच्छ, प्रमेह, कब्ज, वर में दस्त, पुराना दस्त रोग, नकसीर एवं पित्तविकार के कारण दस्त में लाभ होता है। दस्त रोगों में चूर्ण को जल के साथ ही लेना उचित रहता है। ईसबगोल बवासीर एवं कब्ज

Posted in Uncategorized

माता लक्ष्मी जी की अनोखी कहानी

एक दिन भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर भ्रमण करने और वहाँ पर रहने वाले लोगों को देखने की इच्छा माता लक्ष्मी को बतायी । तो माता लक्ष्मी ने कहा कि हे प्रभु मैं भी आपके साथ चल सकती हूँ क्या । तब विष्णु भगवान ने एक मिनट सोचा और कहा कि ठीक है चलो परन्तु एक शर्त है । तुम उत्तर दिशा की तरफ नहीं देखोगी ।

माता लक्ष्मी ने अपनी सहमति दे दी और वे शीघ्र ही पृथ्वी पर भ्रमण के लिये निकल गये । पृथ्वी बहुत ही सुन्दर दिख रही थी और वहाँ पर बहुत ही शान्ति थी । देखते ही माता लक्ष्मी बहुत ही खुश हुई और भूल गयी कि भगवान विष्णु ने उनसे क्या कहा था । वह उत्तर दिशा में देखने लगी । तभी उन्हें बहुत ही खुबसूरत फूलों का एक बगीचा दिखा जहाँ पर बहुत ही सुन्दर खुशबू आ रही थी । वह एक छोटा सा फूलों का खेत था । माता लक्ष्मी बिना सोचे ही उस खेत पर उतरी और वहाँ से एक फूल तोड़ लिये ।

भगवान विष्णु ने जब यह देखा तो उन्होंने माता लक्ष्मी को अपनी भूल याद दिलायी । और कहा कि किसी से बिना पूछे कुछ भी नहीं लेना चाहिये । इस पर भगवान विष्णु के आँसू आ गये ।

माता लक्ष्मी ने अपनी भूल स्वीकार की और भगवान विष्णु से माफी माँगी । तब भगवान विष्णु बोले कि तुमने जो भूल की है उसके लिये तुम्हें सजा भी भुगतनी पड़ेगी । तुम जिस फूल को बिना उसके माली से पूछे लिया है अब तुम उसी के घर में 3 साल के लिये नौकरानी बनकर उसकी देखभाल करोगी । तभी मैं तुम्हें बैकुण्ड में वापिस बुलाऊंगा ।

माता लक्ष्मी एक औरत का रुप लिया और उस खेत के मालिक के पास गयी । मालिक का नाम माधवा था । वह एक गरीब तथा बड़े परिवार का मुखिया था । उसके साथ उसकी पत्नी, दो बेटे और तीन बेटियां एक छोटी सी झोपड़ी में रहती थी । उनके पास सम्पत्ति के नाम पर सिर्फ वही एक छोटा सा भूमि का टुकड़ा था । वे उसी से ही अपना गुजर बसर करता था ।

माता लक्ष्मी उसके घर में गयी तो माधवा ने उन्हें देखा और पूछा कि वह कौन है । तब माता लक्ष्मी ने कहा कि मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं है मुझ पर दया करो और मुझे अपने यहाँ रहने दो मैं आपका सारा काम करुँगी । माधव एक दयालु हृदय का इनसान था लेकिन वह गरीब भी था, और वह जो कमाता था उसमें तो बहुत ही मुश्किल से उसी के घर का खर्चा चलता था परन्तु फिर भी उसने सोचा कि यदि मेरे तीन की जगह चार बेटियाँ होती तब भी तो वह यहाँ रहती यह सोचकर उसने माता लक्ष्मी को अपने यहाँ शरण दे दी । और इस तरह माता लक्ष्मी तीन साल तक उसके यहाँ नौकरानी बनकर रही ।

जैसे ही माता लक्ष्मी उसके यहाँ आयी तो उसने एक गाय खरीद ली और उसकी कमाई भी बढ़ गयी अब तो उसने कुछ जमीन और जेवर भी खरीद लिये थे और इस तरह उसने अपने लिये एक घर और अच्छे कपड़े खरीदे । तथा अब हर किसी के लिये एक अलग से कमरा भी था ।

इतना सब मिलने पर माधव ने सोचा कि यह सब कुछ मुझे इसी औरत (माता लक्ष्मी) के घर में प्रवेश करने के बाद मिला है वही हमारे भाग्य को बदलने वाली है । 2.5 साल निकलने के बाद माता लक्ष्मी ने उस घर में प्रवेश किया और उनके साथ एक परिवार के सदस्य की तरह रही परन्तु उन्होंने खेत पर काम करना बन्द नहीं किया । उन्होनें कहा कि मुझे अभी अपने 6 महीने और पूरे करने है । जब माता लक्ष्मी ने अपने 3 साल पूरे कर लिये तो एक दिन की बात है कि माधव अपना काम खत्म करके बैलगाड़ी पर अपने घर लौटा तो अपने दरवाजे पर अच्छे रत्न जड़ित पोशाक पहने तथा अनमोल जेवरों से लदी हुई एक खुबसूरत औरत को देखा । और उसने कहा कि वह कोई और नहीं माता लक्ष्मी है ।

तब माधव और उसके घर वाले आश्चर्य चकित ही रह गये कि जो स्त्री हमारे साथ रह रही थी वह कोई और नहीं माता लक्ष्मी स्वयं थी । इस पर उन सभी के नेत्रों से आँसू की धारा बहने लगी और माधवा बोला कि यह क्या माँ हमसे इतना बड़ा अपराध कैसे हो गया । हमने स्वयं माता लक्ष्मी से ही काम करवाया ।

माता हमें माफ कर देना । तब माधव बोला कि हे माता हम पर दया करो । हममे से कोई भी नहीं जानता था कि आप माता लक्ष्मी है । हे माता हमें वरदान दीजिये । हमारी रक्षा करिये ।

तब माता लक्ष्मी मुस्कुरायी और बोली कि हे माधव तुम किसी प3कार की चिन्ता मत करो तुम एक बहुत ही दयालु इनसान हो और तुमने मुझे अपने यहाँ आसरा दिया है उन तीन सालों की मुझे याद है मैं तुम लोगों के साथ एक परिवार की तरह रही हूँ ।

इसके बदले में मैं तुम्हें वरदान देती हूँ कि तुम्हारे पास कभी भी धन की और खुशियों की कमी नहीं होगी । तुम्हें वो सारे सुख मिलेंगे जिसके तुम हकदार हो ।

यह कहकर लक्ष्मी जी अपने सोने से बने हुये रथ पर सवार होकर बैकुण्ठ लोक चली गयी ।

यहाँ पर माता लक्ष्मी ने कहा कि जो लोग दयालु, और सच्चे हृदय वाले होते है मैं हमेशा वहाँ निवास करती हूँ । हमें गरीबों की सेवा करनी चाहिये ।

इस कहानी यह उपदेश है कि जब छोटी सी गलती पर भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी को भी सजा दी तो हम तो बहुत ही मामूली इनसान है । फिर भी भगवान की हमेशा हम पर कृपा बनी रहती है । हर किसी इनसान को दूसरे इनसान के प्रति दयालुता का भाव रखना चाहिये हमें जो भी कष्ट और सुख मिल रहे है वह हमारे पुराने जन्मों के कर्म है ।

अतः अन्त में यही कहना चाहूँगी कि हर किसी को भगवान पर श्रद्घा और सबुरी रखनी चाहिये अन्त में वही हमारी नैया पार लगाते है ।

विक्रम प्रकाश