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“श्रीराम से बड़ा है राम का नाम”

रामायण के अनुसार अश्वमेघ यज्ञ पूर्ण होने के पश्चात भगवान श्रीराम ने बड़ी सभा का आयोजन कर सभी देवताओं, ऋषि-मुनियों, किन्नरों, यक्षों व राजाओं आदि को उसमें आमंत्रित किया। सभा में आए नारद मुनि के भड़काने पर एक राजन ने भरी सभा में ऋषि विश्वामित्र को छोड़कर सभी को प्रणाम किया। ऋषि विश्वामित्र गुस्से से भर उठे और उन्होंने भगवान श्रीराम से कहा कि अगर सूर्यास्त से पूर्व श्रीराम ने उस राजा को मृत्यु दंड नहीं दिया तो वो राम को श्राप दे देंगे।

इस पर श्रीराम ने उस राजा को सूर्यास्त से पूर्व मारने का प्रण ले लिया। श्रीराम के प्रण की खबर पाते ही राजा भागा-भागा हनुमान जी की माता अंजनी की शरण में गया तथा बिना पूरी बात बताए उनसे प्राण रक्षा का वचन मांग लिया। तब माता अंजनी ने हनुमान जी को राजन की प्राण रक्षा का आदेश दिया। हनुमान जी ने श्रीराम की शपथ लेकर कहा कि कोई भी राजन का बाल भी बांका नहीं कर पाएगा परंतु जब राजन ने बताया कि भगवान श्रीराम ने ही उसका वध करने का प्रण किया है तो हनुमान जी धर्म संकट में पड़ गए कि राजन के प्राण कैसे बचाएं और माता का दिया वचन कैसे पूरा करें तथा भगवान श्रीराम को श्राप से कैसे बचाएं। धर्म संकट में फंसे हनुमानजी को एक योजना सूझी। हनुमानजी ने राजन से सरयू नदी के तट पर जाकर राम नाम जपने के लिए कहा। हनुमान जी खुद सूक्ष्म रूप में राजन के पीछे छिप गए। जब राजन को खोजते हुए श्रीराम सरयू तट पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि राजन राम-राम जप रहा है।

प्रभु श्रीराम ने सोचा, “ये तो भक्त है, मैं भक्त के प्राण कैसे ले लूं”।
श्री राम ने राज भवन लौटकर ऋषि विश्वामित्र से अपनी दुविधा कही। विश्वामित्र अपनी बात पर अडिग रहे और जिस पर श्रीराम को फिर से राजन के प्राण लेने हेतु सरयू तट पर लौटना पड़ा। अब श्रीराम के समक्ष भी धर्मसंकट खड़ा हो गया कि कैसे वो राम नाम जप रहे अपने ही भक्त का वध करें। राम सोच रहे थे कि हनुमानजी को उनके साथ होना चाहिए था परंतु हनुमानजी तो अपने ही आराध्य के विरुद्ध सूक्ष्म रूप से एक धर्मयुद्ध का संचालन कर रहे थे। हनुमानजी को यह ज्ञात था कि राम नाम जपते हु‌ए राजन को कोई भी नहीं मार सकता, खुद मर्यादा पुरुषोत्तम राम भी नहीं। श्रीराम ने सरयू तट से लौटकर राजन को मारने हेतु जब शक्ति बाण निकाला तब हनुमानजी के कहने पर राजन राम-राम जपने लगा। राम जानते थे राम-नाम जपने वाले पर शक्तिबाण असर नहीं करता। वो असहाय होकर राजभवन लौट गए। विश्वामित्र उन्हें लौटा देखकर श्राप देने को उतारू हो गए और राम को फिर सरयू तट पर जाना पड़ा। श्री राम ने राज भवन लौटकर ऋषि विश्वामित्र से अपनी दुविधा कही। विश्वामित्र अपनी बात पर अडिग रहे और जिस पर श्रीराम को फिर से राजन के प्राण लेने हेतु सरयू तट पर लौटना पड़ा। इस बार राजा हनुमान जी के इशारे पर जय जय सियाराम जय जय हनुमान गा रहा था। प्रभु श्री राम ने सोचा कि मेरे नाम के साथ-साथ ये राजन शक्ति और भक्ति की जय बोल रहा है। ऐसे में कोई अस्त्र-शस्त्र इसे मार नहीं सकता। इस संकट को देखकर श्रीराम मूर्छित हो गए। तब ऋषि व‌शिष्ठ ने ऋषि विश्वामित्र को सलाह दी कि राम को इस तरह संकट में न डालें। उन्होंने कहा कि श्रीराम चाह कर भी राम नाम जपने वाले को नहीं मार सकते क्योंकि जो बल राम के नाम में है और खुद राम में नहीं है। संकट बढ़ता देखकर ऋषि विश्वामित्र ने राम को संभाला और अपने वचन से मुक्त कर दिया। मामला संभलते देखकर राजा के पीछे छिपे हनुमान वापस अपने रूप में आ गए और श्रीराम के चरणों मे आ गिरे।

हनुमानजी ने इस प्रसंग से सिद्ध कर दिया है कि भक्ति की शक्ति सैदेव आराध्य की ताकत बनती है तथा सच्चा भक्त सदैव भगवान से भी बड़ा रहता है। इस प्रकार हनुमानजी ने राम नाम के सहारे श्री राम को भी हरा दिया। “जिस सागर को बिना सेतु के, लांघ सके न राम। कूद गए हनुमान जी उसी को, लेकर राम का नाम। तो अंत में निकला ये परिणाम कि “राम से बड़ा राम का नाम”

संतोष चौधरी

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#हिन्दूधर्मऔरपवित्रध्वनियां
हिन्दू धर्म का नृत्य, कला, योग और संगीत से गहरा नाता रहा है। हिन्दू धर्म मानता है कि ध्वनि और शुद्ध प्रकाश से ही ब्रह्मांड की रचना हुई है। आत्मा इस जगत का कारण है। चारों वेद, स्मृति, पुराण और गीता आदि धार्मिक ग्रंथों में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को साधने के हजारोहजार उपाय बताए गए हैं। उन उपायों में से एक है संगीत। संगीत की कोई भाषा नहीं होती। संगीत आत्मा के सबसे ज्यादा नजदीक होता है। शब्दों में बंधा संगीत विकृत संगीत माना जाता है।

प्राचीन परंपरा : भारत में संगीत की परंपरा अनादिकाल से ही रही है। हिन्दुओं के लगभग सभी देवी और देवताओं के पास अपना एक अलग वाद्य यंत्र है। विष्णु के पास शंख है तो शिव के पास डमरू, नारद मुनि और सरस्वती के पास वीणा है, तो भगवान श्रीकृष्ण के पास बांसुरी। खजुराहो के मंदिर हो या कोणार्क के मंदिर, प्राचीन मंदिरों की दीवारों में गंधर्वों की मूर्तियां आवेष्टित हैं। उन मूर्तियों में लगभग सभी तरह के वाद्य यंत्र को दर्शाया गया है। गंधर्वों और किन्नरों को संगीत का अच्छा जानकार माना जाता है।

सामवेद उन वैदिक ऋचाओं का संग्रह मात्र है, जो गेय हैं। संगीत का सर्वप्रथम ग्रंथ चार वेदों में से एक सामवेद ही है। इसी के आधार पर भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र लिखा और बाद में संगीत रत्नाकर, अभिनव राग मंजरी लिखा गया। दुनियाभर के संगीत के ग्रंथ सामवेद से प्रेरित हैं।

संगीत का विज्ञान : हिन्दू धर्म में संगीत मोक्ष प्राप्त करने का एक साधन है। संगीत से हमारा मन और मस्तिष्क पूर्णत: शांत और स्वस्थ हो सकता है। भारतीय ऋषियों ने ऐसी सैकड़ों ध्वनियों को खोजा, जो प्रकृति में पहले से ही विद्यमान है। उन ध्वनियों के आधार पर ही उन्होंने मंत्रों की रचना की, संस्कृत भाषा की रचना की और ध्यान में सहायक ध्यान ध्वनियों की रचना की। इसके अलावा उन्होंने ध्वनि विज्ञान को अच्छे से समझकर इसके माध्यम से शास्‍‍त्रों की रचना की और प्रकृति को संचालित करने वाली ध्वनियों की खोज भी की। आज का विज्ञान अभी भी संगीत और ध्वनियों के महत्व और प्रभाव की खोज में लगा हुआ है, लेकिन ऋषि-मु‍नियों से अच्छा कोई भी संगीत के रहस्य और उसके विज्ञान को नहीं जान सकता।

प्राचीन भारतीय संगीत दो रूपों में प्रचलन में था-1. मार्गी और 2. देशी। मार्गी संगीत तो लुप्त हो गया लेकिन देशी संगीत बचा रहा जिसके मुख्यत: दो विभाजन हैं- 1. शास्त्रीय संगीत और 2. लोक संगीत।

शास्त्रीय संगीत शास्त्रों पर आधारित और लोक संगीतकाल और स्थान के अनुरूप प्रकृति के स्वच्छंद वातावरण में स्वाभाविक रूप से पलता हुआ विकसित होता रहा। हालांकि शास्त्रीय संगीत को विद्वानों और कलाकरों ने अपने-अपने तरीके से नियमबद्ध और परिवर्तित किया और इसकी कई प्रांतीय शैलियां विकसित होती चली गईं तो लोक संगीत भी अलग-अलग प्रांतों के हिसाब से अधिक समृद्ध होने लगा।

बदलता संगीत : मुस्लिमों के शासनकाल में प्राचीन भारतीय संगीत की समृद्ध परंपरा को अरबी और फारसी में ढालने के लिए आवश्यक और अनावश्यक और रुचि के अनुसार उन्होंने इसमें अनेक परिवर्तन किए। उन्होंने उत्तर भारत की संगीत परंपरा का इस्लामीकरण करने का कार्य किया जिसके चलते नई शैलियां भी प्रचलन में आईं, जैसे खयाल व गजल आदि। बाद में सूफी आंदोलन ने भी भारतीय संगीत पर अपना प्रभाव जमाया। आगे चलकर देश के विभिन्न हिस्सों में कई नई पद्धतियों व घरानों का जन्म हुआ। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान पाश्चात्य संगीत से भी भारतीय संगीत का परिचय हुआ। इस दौर में हारमोनियम नामक वाद्य यंत्र प्रचलन में आया।

दो संगीत पद्धतियां : इस तरह वर्तमान दौर में हिन्दुस्तानी संगीत और कर्नाटकी संगीत प्रचलित है। हिन्दुस्तानी संगीत मुगल बादशाहों की छत्रछाया में विकसित हुआ और कर्नाटक संगीत दक्षिण के मंदिरों में विकसित होता रहा।

हिन्दुस्तानी संगीत : यह संगीत उत्तरी हिन्दुस्तान में- बंगाल, बिहार, उड़ीसा, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, गुजरात, जम्मू-कश्मीर तथा महाराष्ट्र प्रांतों में प्रचलित है।

कर्नाटक संगीत :  यह संगीत दक्षिण भारत में तमिलनाडु, मैसूर, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश आदि दक्षिण के प्रदेशों में प्रचलित है।

वाद्य यंत्र : मुस्लिम काल में नए वाद्य यंत्रों की भी रचना हुई, जैसे सरोद और सितार। दरअसल, ये वीणा के ही बदले हुए रूप हैं। इस तरह वीणा, बीन, मृदंग, ढोल, डमरू, घंटी, ताल, चांड, घटम्, पुंगी, डंका, तबला, शहनाई, सितार, सरोद, पखावज, संतूर आदि का आविष्कार भारत में ही हुआ है। भारत की आदिवासी जातियों के पास विचित्र प्रकार के वाद्य यंत्र मिल जाएंगे जिनसे निकलने वाली ध्वनियों को सुनकर आपके दिलोदिमाग में मदहोशी छा जाएगी।

उपरोक्त सभी तरह की संगीत पद्धतियों को छोड़कर आओ हम जानते हैं, हिन्दू धर्म के धर्म-कर्म और क्रियाकांड में उपयोग किए जाने वाले उन 10 प्रमुख वाद्य यंत्रों को जिनकी ध्वनियों को सुनकर जहां घर का वस्तु दोष मिटता है वहीं मन और मस्तिष्क भी शांत हो जाता है।

  1. मंदिर की घंटी (bells) : जब सृष्टि का प्रारंभ हुआ तब जो नाद था, घंटी की ध्वनि को उसी नाद का प्रतीक माना जाता है। यही नाद ओंकार के उच्चारण से भी जाग्रत होता है।

    जिन स्थानों पर घंटी बजने की आवाज नियमित आती है, वहां का वातावरण हमेशा शुद्ध और पवित्र बना रहता है। इससे नकारात्मक शक्तियां हटती हैं। नकारात्मकता हटने से समृद्धि के द्वार खुलते हैं। प्रात: और संध्या को ही घंटी बजाने का नियम है, वह भी लयपूर्ण।

घंटी या घंटे को काल का प्रतीक भी माना गया है। ऐसा माना जाता है कि जब प्रलय काल आएगा, तब भी इसी प्रकार का नाद यानी आवाज प्रकट होगी।

  1. शंख (conch) : शंख को नादब्रह्म और दिव्य मंत्र की संज्ञा दी गई है। शंख समुद्र मंथन के समय प्राप्त 14 अनमोल रत्नों में से एक है। लक्ष्मी के साथ उत्पन्न होने के कारण इसे लक्ष्मी भ्राता भी कहा जाता है। यही कारण है कि जिस घर में शंख होता है वहां लक्ष्मी का वास होता है।

कई देवी-देवतागण शंख को अस्त्र रूप में धारण किए हुए हैं। महाभारत में युद्धारंभ की घोषणा और उत्साहवर्धन हेतु शंख नाद किया गया था।

शंख के मुख्यतः 3 प्रकार होते हैं- वामावर्ती, दक्षिणावर्ती तथा गणेश शंख। उक्त 3 प्रकार के अनेक प्रकार होते हैं- इसके अलावा गोमुखी शंख, विष्णु शंख, पांचजन्य शंख, अन्नपूर्णा शंख, मोती शंख, हीरा शंख, शेर शंख आदि।

शंख सूर्य व चंद्र के समान देवस्वरूप हैं जिसके मध्य में वरुण, पृष्ठ में ब्रह्मा तथा अग्र में गंगा और सरस्वती नदियों का वास है। तीर्थाटन से जो लाभ मिलता है, वही लाभ शंख के दर्शन और पूजन से मिलता है।

  1. बांसुरी (flute) : ढोल मृदंग, झांझ, मंजीरा, ढप, नगाड़ा, पखावज और एकतारा में सबसे प्रिय बांस निर्मित बांसुरी भगवान श्रीकृष्ण को अतिप्रिय है।

इसे वंसी, वेणु, वंशिका और मुरली भी कहते हैं। बांसुरी से निकलने वाला स्वर मन-मस्तिष्क को शांति प्रदान करता है। जिस घर में बांसुरी रखी होती है वहां के लोगों में परस्पर प्रेम तो बना रहता है, साथ ही सुख-समृद्धि भी बनी रहती है।

  1. वीणा (lyre) : वीणा एक ऐसा वाद्य यंत्र है जिसका प्रयोग शास्त्रीय संगीत में किया जाता है, जैसे दुर्गा के हाथों में तलवार, लक्ष्मी के हाथों में कमल का फूल होता है उसी तरह मां सरस्वती के हाथों में ‍वीणा होती है।

वीणा शांति, ज्ञान और संगीत का प्रतीक है। सरस्वती और नारद का वीणा वादन तो जगप्रसिद्ध है ही।

वीणा के प्रमुख दो प्रकार हैं- रुद्र वीणा और विचित्र वीणा। यह मूलत: 4 तार की होती है, लेकिन यह शुरुआत में यह एक तार की हुआ करती थी। वीणा से निकली ध्वनी मन के तार छेड़ देती है। इसे सुनने से मन और शरीर के सारे रोग मिट जाते हैं। वीणा से ही सितार, गिटार और बैंजो का आविष्कार हुआ।

  1. मंजीरा : इसे भारत के अलग-अलग राज्यों में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है, जैसे झांझ, तला, मंजीरा, कफी आदि। ये फैले हुए शंकु के आकार के ब्रास के बने दो छल्ले होते हैं, जो आपस में एक धागे की सहायता से बंधे होते हैं।

इन्हें दोनों हाथों में पकड़कर आपस में लड़ाकर बजाया जाता है। कुछ कलाकार इन्हें एक हाथ की ही उंगलियों में फंसाकर बजाते हैं।

मंजीरा को आसानी से कहीं भी भजन-कीर्तन में बजते देखा-सुना जा सकता है। अधिकतर इसका प्रयोग राजस्थान के प्राय: सभी लोकनाट्यों तथा नृत्यों में किया जाता है।
 

  1. करतल : इसे खड़ताल भी कहते हैं। इस वाद्य यंत्र को आपने नारद मुनि के चित्र में उनके हाथों में देखा होगा। यह भी भजन और कीर्तन में उपयोग किया जाना वाला यंत्र है। इसका आकार धनुष की तरह होता है।

इस वाद्य का निर्माण लगभग एक फीट की दो लकड़ी के टुकड़े पर किया जाता है। इस लकड़ी के सिरे पर लोहे या पीतल के गोल-गोल टुकड़े लगा दिए जाते हैं।

एक हाथ में दोनों टुकड़ों को पकड़कर उन्हें आपस में लड़ाया जाता है जिससे ताल निकलती है। राजस्थानी लोक संगीत में भी करतल का बहुत उपयोग होता है।

  1. पुंगी या बीन : यह वाद्य यंत्र भी भारत में प्राचीनकाल से ही प्रचलित है। अक्सर यह सपेरों के पास देखा जाता है। हालांकि इसके और भी काम होते हैं लेकिन सपेरों के पास देखे जाने के कारण यह मान्यता प्रचलित हो गई कि इसे सांप को पकड़ने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

यह आमतौर पर बांस की दो पतली छड़ों का बना होता है जिसमें से एक का काम होता है धुन पैदा करना वहीं दूसरी नली ताल निकालने में काम आती है। बांस की दोनों ही नलियां एक बड़े खोखले टुकड़े से जुड़ी होती हैं, जो कई बार नारियल के खोल से भी बनता है। फूंक मारकर बजाने पर बांस की नलियों में कंपन होता है जिससे एक पतली आवाज निकलती है।

  1. ढोल : ढोलक कई प्रकार के होते हैं। अक्सर इन्हें मांगलिक कार्यों के दौरान बजाया जाता है। ढोल भारत के बहुत पुराने ताल वाद्य यंत्रों में से है। ये हाथ या छड़ी से बजाए जाने वाले छोटे नगाड़े हैं, जो मुख्य रूप से लोक संगीत या भक्ति संगीत को ताल देने के काम आते हैं।

ढोलक आम, बीजा, शीशम, सागौन या नीम की लकड़ी से बनाई जाती है। लकड़ी को पोला करके दोनों मुखों पर बकरे की खाल को मजबूत सूत की रस्सियों से कसा जाता है। रस्सी में छल्ले रहते हैं, जो ढोलक का स्वर मिलाने में काम आते हैं। चमड़े अथवा सूत की रस्सी द्वारा इसको खींचकर कसा जाता है। ढोलक और ढोलकी को अधिकतर हाथ से बजाया जाता है जबकि ढोल को अलग-अलग तरह की छड़ियों से।

प्राचीनकाल में ढोल का प्रयोग महत्वपूर्ण था। यह पूजा और नृत्य गान के अलवा खूंखार जानवरों को भगाने के काम भी आता था। इसके अलावा इसका उपयोग चेतावनी के रूप में भी किया जाता था।

  1. नगाड़ा : नगाड़ा प्राचीन समय से ही प्रमुख वाद्य यंत्र रहा है। इसे बजाने के लिए लकड़ी की डंडियों से पीटकर ध्वनि निकाली जाती है। वास्तव में नक्कारा, नगारा या नगाड़ा संदेश प्रणाली से जुड़ा हुआ शब्द है।

हालांकि बाद में इसका उपयोग लोक उत्सवों, आरती आदि के अवसर पर भी किया जाना लगा। इसे दुंदुभी भी कहा जाता है।

  1. मृदंग : यह दक्षिण भारत का एक थाप यंत्र है। कर्नाटक संगीत में इसका ताल यंत्र के रूप में उपयोग होता है। बहुत ही मधुर आवाज के इस यंत्र का इस्तेमाल गांवों में कीर्तन गीत गाने के दौरान किया जाता है। ढोल के दोनों सिरे समान होते हैं जबकि मृदंग का एक सिरा काफी छोटा और दूसरा सिरा काफी बड़ा (लगभग 10 इंच) होता है।

नवरात्रि उत्सव के दौरान इसका उपयोग होगा है। अधिकतर आदिवासी इलाके में ढोल के साथ मृदंग का उपयोग भी होता है।

  1. डमरू : डमरू या डुगडुगी एक छोटा संगीत वाद्य यंत्र होता है। डमरू का हिन्दू, तिब्बती वबौद्ध धर्म में बहुत महत्व माना गया है। भगवान शंकर के हाथों में डमरू को दर्शाया गया है। साधु और मदारियों के पास अक्सर डमरू मिल जाएगा।

    शंकु आकार के बने इस ढोल के बीच के तंग हिस्से में एक रस्सी बंधी होती है जिसके पहले और दूसरे सिरे में पत्थर या कांसे का एक-एक टुकड़ा लगाया जाता है। जब डमरू को बीच में से पकड़कर हिलाया जाता है तो यह डला (टुकड़ा) पहले एक मुख की खाल पर प्रहार करता है और फिर उलटकर दूसरे मुख पर, जिससे ‘डुग-डुग’ की आवाज उत्पन्न होती है।

अंत में कुछ खास ध्वनियां…

चिमटा : लगभग एक मीटर लंबे लोहे के चिमटे की दोनों भुजाओं पर पीतल के छोटे-छोटे चक्के कुछ ढीलेपन के साथ लगाकर इस यंत्र का निर्माण किया जाता। इसे हिलाकर या हाथ पर मारकर बजाया जाता है। अधिकतर इसका उपयोग नाथ साधु करते हैं।

तुनतुना : यह लंबाई में एक से दो फुट का होता है जिसमें मोटे डंडे पर एक तार दो सिरों के बीच कसा होता है। एक सिरे पर तार को कसने और उसमें तनाव पैदा करने के लिए गुठली होती है और दूसरे सिरे पर एक खोखले सिलेंडर के आकार का बर्तन जिससे ध्वनि निकलती है।

घाटम : घाटम मिट्टी का बना एक बर्तन होता है। इसका सबसे ज्यादा प्रयोग दक्षिण भारत के सांस्कृतिक संगीत में होता है। इसे हाथ की थाप मारकर बजाया जाता है।

दोतार : यह लकड़ी की आसान बनावट का एक वाद्य यंत्र होता है जिसका लोक संगीत में बहुत प्रयोग होता है। यह एक ऐसा यंत्र है, जो किसी न किसी रूप में भारत के हर हिस्से के लोक संगीत में पुराने समय से ही शामिल रहा है।

तबला : इसका प्रयोग शास्त्रीय संगीत से लेकर हर तरह के संगीत में किया जाता है। भारत के महाराष्ट्र राज्य में भोज की गुफाओं में 200 ईपू की मूर्तियों में महिलाएं तबला बजाते और नृत्य करते हुए अंकित की गई हैं।

संकलन
देवशर्मा
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चौबे जी का लड़का है अशोक, एमएससी पास।
नौकरी के लिए चौबे जी निश्चिन्त थे, कहीं न कहीं तो जुगाड़ लग ही जायेगी।
ब्याह कर देना चाहिए।
मिश्रा जी की लड़की है ममता, वह भी एमए पहले दर्जे में पास है, मिश्रा जी भी उसकी शादी जल्दी कर देना चाहते हैं।
सयानों से पोस्ट ग्रेजुएट लड़के का भाव पता किया गया।
पता चला वैसे तो रेट पांच से छः लाख का चल रहा है, पर बेकार बैठे पोस्ट ग्रेजुएटों का रेट तीन से चार लाख का है।
सयानों ने सौदा साढ़े तीन में तय करा दिया।
बात तय हुए अभी एक माह भी नही हुआ था, कि पब्लिक सर्विस कमीशन से पत्र आया कि अशोक का डिप्टी कलक्टर के पद पर चयन हो गया है।
चौबे- साले, नीच, कमीने… हरामजादे हैं कमीशन वाले…!
पत्नि- लड़के की इतनी अच्छी नौकरी लगी है नाराज क्यों होते हैं?
चौबे- अरे सरकार निकम्मी है, मैं तो कहता हूँ इस देश में क्रांति होकर रहेगी… यही पत्र कुछ दिन पहले नहीं भेज सकते थे, डिप्टी कलेक्टर का 40-50 लाख यूँ ही मिल जाता।
पत्नि- तुम्हारी भी अक्ल मारी गई थी, मैं न कहती थी महीने भर रुक जाओ, लेकिन तुम न माने… हुल-हुला कर सम्बन्ध तय कर दिया… मैं तो कहती हूँ मिश्रा जी को पत्र लिखिये वो समझदार आदमी हैं।
प्रिय मिश्रा जी,
अत्रं कुशलं तत्रास्तु !
आपको प्रसन्नता होगी कि अशोक का चयन डिप्टी कलेक्टर के लिए हो गया है। विवाह के मंगल अवसर पर यह मंगल हुआ। इसमें आपकी सुयोग्य पुत्री के भाग्य का भी योगदान है।
आप स्वयं समझदार हैं, नीति व मर्यादा जानते हैं। धर्म पर ही यह पृथ्वी टिकी हुई है। मनुष्य का क्या है, जीता मरता रहता है। पैसा हाथ का मैल है, मनुष्य की प्रतिष्ठा बड़ी चीज है। मनुष्य को कर्तव्य निभाना चाहिए, धर्म नहीं छोड़ना चाहिए। और फिर हमें तो कुछ चाहिए नहीं, आप जितना भी देंगे अपनी लड़की को ही देंगे।वर्तमान ओहदे के हिसाब से देख लीजियेगा फिर वरना हमें कोई मैचिंग रिश्ता देखना होगा।
मिश्रा परिवार ने पत्र पढ़ा, विचार किया और फिर लिखा-
प्रिय चौबे जी,
आपका पत्र मिला, मैं स्वयं आपको लिखने वाला था। अशोक की सफलता पर हम सब बेहद खुश हैं। आयुष्मान अब डिप्टी कलेक्टर हो गया हैं। अशोक चरित्रवान, मेहनती और सुयोग्य लड़का है। वह अवश्य तरक्की करेगा।
आपको जानकर प्रसन्नता होगी कि ममता का चयन आईएएस के लिए हो गया है। कलेक्टर बन कर आयुष्मति की यह इच्छा है कि अपने अधीनस्थ कर्मचारी से वह विवाह नहीं करेगी।
मुझे यह सम्बन्ध तोड़कर अपार हर्ष हो रहा है।
बेटी पढाओ, दहेज मिटाओ
एक रोटी कम खाओ,
पर, बेटी जरूर पढ़ाओ

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#नारीकीबुद्धिमानता

एक अमीर आदमी की शादी बुद्धिमान स्त्री से हुई।

अमीर हमेशा अपनी बीवी से तर्क और
वाद-विवाद मेँ हार जाता था।

बीवी ने कहा की स्त्रिया मर्दो से कम नहीँ..
अमीर ने कहा मैँ दो वर्षो के लिये परदेश चला जाता हुँ।
एक महल,बिजनेस मेँ मुनाफा और एक बच्चा पैदा करके दिखा दो।
आदमी परदेश चला गया…

बीवी ने सारे कर्मचारियोँ मेँ ईमानदारी का बोध जगा के और मेहनत का गुण भर दिया।
पगार भी बढ़ा दी।
सारे कर्मचारी खुश होकर दिल लगा के काम करने लगे।
मुनाफा काफी बढ़ा…
बीवी ने महल बनवा दिये..
बीवी ने दस गाय पाले..
काफी खातिदारी की…
गाय का दूध काफी अच्छा हुआ..
दूध से दही जमा के परदेश मेँ दही बेचने चली गई वेश बदल के..
अपने पति के पास बदले वेश मेँ दही बेची..
और रूप के मोहपाश मेँ फँसा कर संबंध बना ली।
फिर एक दो बार और संबंध बना के अँगुठी उपहार मेँ लेकर घर लौट आई।
बीवी एक बच्चे की माँ भी बन गई।

दो साल पूरे होने पर पति घर आया।
महल और शानो-शौकत देखकर पति दंग और
प्रसन्न रह गया।

मगर जैसे बीवी की गोद मेँ बच्चा देखा
क्रोध से चीख उठा किसका है ये ?????

बीवी ने जब दही वाली गूजरी की याद दिलाई और
उनकी दी अँगुठी दिखाई तो अमीर काफी खुश हुआ।

बीवी ने कहा-ः
अगर वो दही वाली गुजरी मेरी जगह कोई और होती तो?

इस ”तो” का उत्तर तो पूरी पुरूष जाति के पास नहीँ है।

???????????????????

नारी नर की सहचरी,,उसके धर्म की रक्षक,,
उसकी गृहलक्ष्मी तथा उसे “देवत्व” तक
पहुँचाने वाली “साधिका” है।–

संजय गुप्ता

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ભીખુદાન ગઢવી   કે   શાહબુદિન… નો એક જોક યાદ છે……….
નવા વર્ષના દીવાસે એક નામાંકિત સ્પ્રે.. વાળાની દુકાનમા..ં ડબ્બાવાળો સંડાસ સફાઈ કામદાર સફાઈ કરવા આવીયો .. તો દુકાનદારને થયું કે આ બિચારો આખું વરસ સફાઈ કરે છે તો આ નવા વર્ષે આને સારા માં સારો સ્પ્રે ગિફ્ટ આપું.. પેલા ને સ્પ્રે આપતા પહેલા એના કપડાં પર સ્પ્રે લગાવી ને કહીયું લે મેપા તારી આ નવા વર્ષ ની  બોની…પણ સ્પ્રે ની સુગંધ નાક માં જતા જ મેપો તો બેભાન થય ગયો ને પગ ઘસવા મંડિયો.. લોકો ભેગા થય ગયા ને દુકાનદાર ને ખિજાવા માંડયા .. કે શેઠ આ શું કરીયું કે મેપો બેભાન થય ગયો .. શેઠ તો બિચારો મુંજાય ગયો..
ત્યાં મેપા ની ઘરવાલી ડબ્બો લય ને ત્યાં આવી .. ટોળું જોયું તો ત્યાં ગઇ ને મેપાની હાલત જોય ને મેપી કે મારા મેપા ને શું થયું શેઠ.. 😡 ..
શેઠ કે મેપીબેન કાઇ નથી ક રિયું .. સારા માં સારો સ્પ્રે બોનીમાં આપીયો ને એના કપડાં પર લગાવીઓ તો એ બેભાન થય ગયો…
એ સાંભળીને મેપી હાસવાલાગી ..
બધાને કહે દૂર જવો .. અને એમ કહી ને સાથે લાવેલી સદાસનો ડબ્બો મેપા ના નાક ઉપર ઊંધો રાખીયો તો મેપો તરત બેઠો થઈ ગયો 😃🤣..
મેપી પેલા શેઠ ને કહે .. શેઠ અમારા નસીબ માં સુગંધ છે જ નહીં અમે અને અમારી પેઢીઓ દુર્ગંધ થી ટેવાઇ ગયેલ છે.. એટલે મેપો સુગંધ ના કારણે બેભાન થઇ ગયેલો.. 😃😃🤣
બોધ:- આવીજ રીતે ભારત ના નાગરિકો 60 વરસ થી સડેલા અર્થતંત્ર થી તેવા ટેવાઈ ગયા છે .. એને આ 3 વર્ષ ની નવી કેડી ઓ પર ચાલવાની આદત નથી .. નોટબંધી.. GST.. એ બધા નવા રસ્તાઓ છે… સાલ્લુ એક ગુજરાતી થઇ ને આપણા પોતાના સપૂત ને આપણે ઓળખી નથી શકતા..
… જો આ માણસ સત્તાનો જ લાલચુ હોત તો નોટબંધ ને GST શું કામ લાવત..
BJP .. Congress ..  બધી પાર્ટીઓ ભૂલી જાવ સાહેબ .. એ માણસ માટે તો ગૌરવ લાયો સાહેબ કે આપણો ગુજરાતી છે.. જેવો છે એવો આપણો તો છે..  મને આ માણસ માટે હંમેશા ગૌરવ છે ને રાહશે .. જો ગોળીઓ નો વરસાદ થતો હોય ને તો આ માણસ ની ઢાલ બની ને ફના પણ થાય જાવ ..
આજ આ ગુજરાતી નો હાથ પકડો ..ગુજરાત ને અને ભારત ને બચાવવા નો મોકો ફરી કયારેય નહીં મળે… ..
60 વર્ષ ની દુર્ગંધ માંથી બહાર આવી ને નવી સુગંધ લેવા ની ટેવ પાડો … ચંદન માંથી સુગંદ  મેળવવાં એને ઘસવું પડે..

હું પણ એક ખેડૂતનો દીકરો છું પણ મેં કયારેય સંભાળિયું નથી કે મારા વિસ્તાર માં ખેડૂતના દીકરાઓ એ ક્યારેય આત્મહત્યા ઓ કરી હોય..
મોરારીબાપુ જેવા મહાત્મા પણ કહે છે કે એક ગુજરાતી તરીકે આપણે મોદીજી માટે ગૌરવ હોવું જ જોઈએ..  shree

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स्वस्ति पन्थामनुचरेम सूर्याचन्द्रमसाविव
पुनर्ददताघ्नता जानता संगमे महि।।-ऋक्
५.५१.१५
    *********  हम कल्याण मार्ग के राही
                     करें सदा कल्याण ।
                       (१)
जैसे सूर्य-चन्द्रमा चलते,स्फूर्ति, तेज, अमृत-कण झरते ।
षड् ऋतुओं के विविध दृश्य रच,  करते सदा प्रयाण।।
                         (२)
दाता और अहिंसक ज्ञानी, द्वन्दरहित हो बोले वाणी।
भद्र पुरुष मिल बैठ विश्वहित सोचें एक समान।।
                        (३)
अनुशासन में बंधी प्रकृति है, जडता नहीं अटूट प्रगति है ।
नियम बद्ध गति शील व्यक्ति ही, बनता सदा महान्।।
                       (४)
गलते मेघ उमडती नदियां, सुरभि मधुप को देती कलियां।
मुक्त हस्त कर रहे वायु जल , जैसे जीवन दान ।।

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सगाई के दौरान लड़की- लड़का दोनों एकदूसरे की अनामिका उंगली में अंगूठी पहनाते हैं ।
ये  अंगूठी अनामिका में ही क्यूँ पहनी जाती है ?
एक सुंदर प्रयोग बताती हूँ …..
आप भी कर के देखें ……

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बुद्धिजीवियों के अनुसार हमारे हाथ की दसों उंगलियां ये एक कुटुम्ब है ।
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. हाथ के अंगूठे हमारे माता-पिता का प्रतीक हैं
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अंगूठे के पास वाली उंगली (तर्जनी) हमारे भाई-बहन की प्रतीक ।
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बीच की उंगली (मध्यमा) हम खुद
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चौथी अनामिका…
मतलब हमारा जोड़ीदार,
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और अंतिम सबसे छोटी उंगली (करंगली)
हमारे बच्चे
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ये हो गया कुटुंब
अब देखते हैं कुटुंब के लोगों से हमारे संबंध कैसे ईश्वर ने स्थापित किये हैं
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.अब फोन को एक ओर रख दोनों हाथ नमस्कार मुद्रा में जोड़ें 
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बीच की दोनों उंगली को अंदर की ओर fold कर हथेली से लगा लें ।
अब दोनो अंगूठे एक दूसरे से दूर करे वो हो जाएंगे
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.कारण माता-पिता का साथ हमें जन्मभर नही मिलता, कभी न कभी वो हमें छोड़ कर जाते हैं ।
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अब अंगूठे छोड़ उसके पास वाली उंगली को खोलें
वो भी खुलेगी
कारण भाई-बहन का अपना परिवार है , उनका खुद का अपना जीवन है ।
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अब वो उंगलियां जोड़ हाथ के आखरिवाली सबसे छोटी उंगली को आपस मे खोलें
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वो भी खुलेंगी, कारण आपके बच्चे बड़े होने पर घोसला छोड़ उड़ान भरने ही वाले हैं ।
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छोटी उंगलियों को अब जोड़ लें
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.अब अंगूठी वाली अनामिका को एक दूजे से दूर करे
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आश्चर्य होगा;
पर वो दूर नही होती । कारण जोड़ीदार, मतलब पति-पत्नी, जीवनभर एक साथ रहने वाले होते हैं । सुख और दुःख में एक दूजे के जीवनसाथी…..
“ये आयुष्य का सुंदर अर्थ
अनामिका सिवाय सब व्यर्थ”
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