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इन्द्रप्रस्थ की खोज –

पश्चिमी देशो में उनके ग्रंथो में वर्णित कई प्राचीन नगर या इमारतो की खोज की जा रही है ।बेबीलोन के झूलते बगीचे आज तक नहीं मिले पर अब भी उसकी खोज जारी है ,मिस्र में अलेक्सान्देरिया का लाइट हाउस अब तक नहीं मिला पर उसकी खोज जारी है ,यूनानियो की महागाथा इलिअत में वर्णित ट्रॉय की खोज अब तक जारी है ,यु तो ट्रॉय मिल चूका है पर वह इलिअत में वर्णित ट्रॉय की तरह विशाल और मजबूत दीवारों वाला नहीं है ।
और भारत में अब तक कई प्राचीन नगर या महल अब तक नहीं मिले और जो है जैसे की राम सेतु उसे मानव निर्मित न कहकर हिंदू धर्म और वैदिक ग्रंथो को 100% झूठ करार दे दिया है ।
क्या केवल विदेशी ही सच लिखते है ?? भारतीय नहीं ??
आप येसु के पानी पर चलने की बात स्वीकार लेते हो यह कहकर की येसु जमे हुए पानी पर चले थे पर श्री राम का राम सेतु बनाना आपके लिए मिथक है बस ।
पर अब जैसे जैसे हिंदू जाग रहा है वैसे वैसे सबको सच पता चल जायेगा ।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने पुराना किला या इन्द्रप्रस्थ में दुबारा खुदाई शुरू कर दी है । भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का लक्ष्य है पांडवो के इन्द्रप्रस्थ के साक्ष्य खोजना और महाभारत को एक सच्चा इतिहास सिद्ध करना ।
भारत या भारतीय उपमहाद्वीप में यु तो अधिकतर पुरातात्विक स्थलों पर आम आदमी को जाने की मनाई है पर पहली बार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने आम जनता को पुराने किले में घुमने और खोजकरताओ को खोज करते देखने की अनुमति दे दी है ।
अभी तक पुराने किले में मुग़ल ,सल्तनत ,राजपूत,गुप्त,शुंग और मौर्य काल के अवशेष मिले है ,पुरातत्वविदो अब भूरे बर्तन वाली संस्कृति के अवशेष खोज रहे है क्युकी भूरे बर्तन वाली संस्कृति एक लोह युग संस्कृति है और 1600 ईसापूर्व पुरानी है जो यमुना गंगा घाटी में फैली थी ।
भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विदेशी कालगणना का उपयोग करता है बजाये हिंदू कालगणना के और विदेशी कालगणना अनुसार मगध का राजा जरासंध 1500 ईसापूर्व में हुआ था और वह महाभारत युगीन है इसीलिए पुरातत्वविद इन्द्रप्रस्थ और पांडवो को भूरे बर्तन की संस्कृति से जोड़ रहे है जो गलत है ।
मैं अब यह ही आशा करता हु की इन्द्रप्रस्थ मिल जाये और महाभारत एक सत्य घटना सिद्ध हो जाए ।

जय माँ भारती
आचार्य विकाश शर्मा

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               महर्षि ऋभु
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          महर्षि ऋभु ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक हैं ।ये स्वभाव से ही ब्रह्मतत्त्वज्ञ तथा निवृत्तिपरायण भक्त हैं ।तथापि सद्गुरु मर्यादा की रक्षा के लिए इन्होंने श्रद्धा भक्तियुक्त  होकर अपने बड़े भाई सनत्सुजात की शरण ली थी ।उनसे सम्प्रदायगत मन्त्र, योग और ज्ञान प्राप्त करके ये सर्वदा सहज स्थिति में ही रहने लगे ।मल, विक्षेप तथा आवरण से रहित होकर ये जहाँ कहीं भी पड़े रहते।शरीर के अतिरिक्त इनकी कोई कुटी नहीं थी।
          यों ही विचरते हुए महर्षि ऋभु एक दिन पुलस्त्य ऋषि के आश्रम के समीप जा पहुँचे।वहाँ पुलस्त्य का पुत्र निदाघ वेदाध्ययन कर रहा था ।निदाघ ने आगे आकर नमस्कार किया ।उसके अधिकार को देखकर महर्षि ऋभु को बड़ी दया आयी ।उन्होंने कहा — ‘इस जीवन का वास्तविक लाभ आत्मज्ञान प्राप्त करना है ।यदि वेदों को सम्पूर्णतः रटा जाय और वस्तुतत्त्व का ज्ञान न हो तो वह किस काम का है? निदाघ ! तुम आत्मज्ञान का सम्पादन करो।’
            महर्षि ऋभु की बात सुनकर उसकी जिज्ञासा जग गयी।उसने इन्हीं की शरण ली।अपने पिता का आश्रम छोड़ कर वह इनके साथ भ्रमण करने लगा।उसकी सेवा में तन्मयता और त्याग देखकर महर्षि ने उसे तत्त्वज्ञान का उपदेश किया ।उपदेश के पश्चात आज्ञा की कि ‘निदाघ ! जाकर गृहस्थधर्म  का अवलम्बन लो ।मेरी आज्ञा का पालन करो।’
          गुरुदेव की आज्ञा पाकर निदाघ अपने पिता के पास आया।उन्होंने उसका विवाह कर दिया ।इसके पश्चात देविका नदी के तट पर वीरनगर के पास एक उपवन में निदाघ ने अपना आश्रम बनाया और वहाँ वह अपनी पत्नी के साथ गार्हस्थ्य का पालन करने लगा।कर्मपरायण हो गया ।
            बहुत  दिनों के बाद ऋभु को उसकी याद आयी।अपने अंगीकृत जन का कल्याण करने के लिए वे वहाँ पहुँच गये ।महापुरुष जिसे एक बार स्वीकार कर लेते हैं, उसे फिर कभी नहीं छोड़ते।वे बलिवैश्यदेव के समय निदाघ के द्वार पर उपस्थित हुए ।निदाघ ने उन्हें न पहचानने पर भी गृहस्थधर्मानुसार अतिथि को भगवद्रूप समझकर उनकी रुचि के अनुसार भोजन कराया ।अन्त में उसने प्रश्न किया कि ‘महाराज ! भोजन से तृप्त हो गये क्या? आप कहाँ रहते हैं? कहाँ से आ रहे हैं और किधर पधारने की इच्छा है? ‘ महर्षि ऋभु ने अपने कृपालु स्वभाव के कारण उपदेश करते हुए उत्तर दिया — ‘ब्राह्मण ! भूख और प्यास प्राणों को ही लगती है ।मैं प्राण नहीं हूँ ।जब भूख प्यास मुझे लगती ही नहीं, तब तृप्ति अतृप्ति क्या बताऊँ?स्वस्थता और तृप्ति मन के ही धर्म हैं ।आत्मा इनसे सर्वथा पृथक है ।रहने और आने जाने के सम्बन्ध में जो पूछा, उसका उत्तर सुनो।आत्मा आकाश की भाँति सर्वगत है ।उसका आना जाना नहीं बनता।मैं न आता हूँ, न जाता हूँ और न किसी एक स्थान पर रहता ही हूँ ।तृप्ति – अतृप्ति के हेतु ये सब रस आदि विषय परिवर्तनशील हैं ।कभी अतृप्तिकर पदार्थ तृप्तिकर हो जाते हैं और कभी तृप्तिकर अतृप्तिकर हो जाते हैं ।अतः विषमस्वभाव पदार्थों पर आस्था मत करो; इनकी ओर से दृष्टि मोड़कर त्रिगुण, त्र्यवस्था और समस्त अनात्म वस्तुओं से ऊपर उठकर अपने आप में स्थिर हो जाओ।ये सब संसारी लोग माया के चक्कर में पड़कर अपने स्वरूप को भूले हुए हैं ।तुम इस माया पर विजय प्राप्त करो।’ महर्षि ऋभु के इन अमृतमय वचनों को सुनकर निदाघ उनके चरणों पर गिर पड़े ।फिर उन्होंने बतलाया कि ‘मैं तुम्हारा गुरु ऋभु हूँ ।’ निदाघ को बड़ी प्रसन्नता हुई, महर्षि चले गये।
          बहुत दिनों के पश्चात फिर महर्षि ऋभु वहाँ पधारे ।संयोगवश उस दिन वीरपुरनरेश की सवारी निकल रही थी।सड़क पर बड़ी भीड़ थी।निदाघ एक ओर खड़े होकर भीड़ हट जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे ।इतने में ही महर्षि ने इनके पास आकर पूछा— ‘यह भीड़ कैसी है? ‘
           निदाघ ने उत्तर दिया — ‘राजा की सवारी निकलने के कारण भीड़ है ।’ उन्होंने पूछा — ‘तुम तो जानकार जान पड़ते हो।मुझे बताओ इनमें कौन राजा है और कौन दूसरे लोग हैं? ‘ निदाघ ने कहा — ‘जो इस पर्वत के समान ऊँचे हाथी पर सवार हैं, वे राजा हैं ।उनके अतिरिक्त दूसरे लोग हैं ।’ ऋभु ने पूछा — महाराज  ! मुझे हाथी और राजा का ऐसा लक्षण बताओ कि मैं समझ सकूँ कि ऊपर क्या है? ‘ यह प्रश्न सुनकर निदाघ झपटकर उन पर सवार हो गये और कहा — ‘देखो, मैं राजा की भाँति ऊपर हूँ ।तुम हाथी के समान नीचे हो।अब समझ जाओ राजा और हाथी कौन हैं।’महर्षि ऋभु ने बड़ी शान्ति से कहा — यदि तुम राजा और मैं हाथी की भाँति स्थित हूँ तो बताओ तुम कौन हो और मैं कौन हूँ? ‘ यह बात सुनते ही निदाघ उनके चरणों पर गिर पड़े, वह हाथ जोड़कर कहने लगे — प्रभु ! आप अवश्य ही मेरे गुरुदेव ऋभु हैं ।आपके समान अद्वैत संस्कार-संस्कृतचित्त और किसी का नहीं है ।आप अवश्य अवश्य मेरे गुरुदेव हैं, मैंने अनजान में बड़ा अपराध किया ।संत स्वभावतः क्षमाशील होते हैं ।आप कृपया मुझे क्षमा करें ‘।ऋभु ने हँसते हुए कहा —
            ‘कौन किसका अपराध करता है? यदि एक वृक्ष की दो शाखाएँ परस्पर रगड़ खायँ तो उनमें किसका अपराध है? मैंने तुम्हें पहले व्यतिरेक मार्ग से आत्मा का उपदेश किया था।उसे तुम भूल गये।अब अन्वय-मार्ग से किया है ।इस पर परिनिष्ठित हो जाओ।यदि इन दोनों मार्गों पर विचार करोगे तो संसार में रहकर भी तुम इससे अलिप्त रहोगे।’ निदाघ ने उनकी बड़ी स्तुति की।वे स्वच्छन्दतया चले गये।
           ऋभु की इस क्षमाशीलता को सुनकर सनकादि गुरुओं को बड़ा आश्चर्य हुआ ।उन्होंने ब्रह्मा के सामने इनकी महिमा गायी और इनका नाम क्षमा का एक अक्षर लेकर ऋभुक्ष रख दिया ।तब से साम्प्रदायिक लोग इन्हें ऋभुक्षानन्द के नाम से स्मरण करते हैं ।इनकी कृपा से निदाघ आत्मनिष्ठ हो गये।आज भी महर्षि ऋभु हमारे पास न जाने किस रूप में आते होंगे ।उन्होंने न जाने निदाघ जैसे कितनों को संसारसागर से पार उतारा होगा।
             (भक्त चरितांक)
               कल्याण –40

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गृहस्थ धर्म की विशेषता  :-

महाभारत में एक कथा आती है! एक बार अर्जुन और सुंधवा के बीच भयंकर द्वंद्व युद्ध छिड़ा। दोनों महाबली थे और युद्धविधा में पारंगत भी। घमासान लड़ाई चली। विकरालता बढ़ती जा रही थी, लेकिन निर्णायक स्थिति नहीं आ रही थी। अंतिम बाजी इस बात पर अड़ी कि फैसला आखिरी तीन बाणों में होगा।

कृष्ण को भी अर्जुन की सहायता के लिए आना पड़ा। उन्होंने हाथ में जल लेकर संकल्प किया  “गोवर्धन पर्वत उठाने और ब्रज की रक्षा करने का पुण्य मैं अर्जुन के बाण के साथ जोड़ता हूं।” इससे आग्नेयास्त्र और भी प्रचंड हो गया।

काटने का सामान्य उपाय हल्का पड़ रहा था तो सुंधवा ने भी संकल्प किया  “एक पत्नीव्रत पालने का मेरा पुण्य भी इस अस्त्र के साथ जुड़े।” दोनों अस्त्र आकाश मार्ग में चले। दोनों ने एक-दूसरे का बीच में काटने का प्रयत्न किया। अर्जुन का अस्त्र कट गया और सुंधवा का बाण आगे बढ़ा किंतु निशाना चूक गया।

दूसरा अस्त्र उठाया गया। कृष्ण ने कहा – ‘गज को ग्राह से और द्रौपदी की लाज बचाने का मेरा पुण्य अर्जुन के बाण के साथ जुड़े।”

उधर सुंधवा ने कहा – “मैंने नीतिपूर्वक ही उपार्जन किया और चरित्र की किसी पक्ष में त्रुटि नहीं आने दी हो तो इसका पुण्य इस अस्त्र के साथ जुड़े।”

इस बार भी दोनों अस्त्र आकाश में टकराए और सुंधवा के बाण से अर्जुन का तीर आकाश में ही कटकर धराशायी हो गया।

तीसरा अस्त्र शेष था। इसी पर अंतिम निर्णय निर्भर था। कृष्ण ने कहा – ‘मेरे बार-बार अवतार लेकर धरती का भार उतारनेका पुण्य अर्जुन के बाण के साथ जुड़े।” दूसरी ओर सुंधवा ने कहा – ”यदि मैंने स्वार्थ का क्षणभर चिंतन किए बिना मन को निरंतर परमार्थ में निरत रखा हो तो मेरा पुण्य बाण के साथ जुड़े।”

इस बार भी अर्जुन के तीर को काट सुंधवा का बाण विजयी हुआ। दोनों पक्षों में कौन अधिक समर्थ है, इसकी जानकारी देवलोक तक पहुंची तो देवतागण सुंधवा पर आकाश से पुष्प बरसाने लगे। युद्ध समाप्त कर दिया गया।

भगवान कृष्ण ने सुंधवा की सराहना करते हुए कहा – “नरश्रेष्ठ, तुमने सिद्ध कर दिया कि नैष्ठिक गृहस्थ साधक किसी भी तपस्वी से कम नहीं होता।” पूरी निष्ठा और सही ढंग से साधा गया गृहस्थ धर्म किस प्रकार फलता है, यह उपरोक्त प्रसंग से स्पष्ट होता है।

सुप्रभातम् सुमंगलम्। आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलमय हो ।

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गृहस्थ धर्म की विशेषता  :-

महाभारत में एक कथा आती है! एक बार अर्जुन और सुंधवा के बीच भयंकर द्वंद्व युद्ध छिड़ा। दोनों महाबली थे और युद्धविधा में पारंगत भी। घमासान लड़ाई चली। विकरालता बढ़ती जा रही थी, लेकिन निर्णायक स्थिति नहीं आ रही थी। अंतिम बाजी इस बात पर अड़ी कि फैसला आखिरी तीन बाणों में होगा।

कृष्ण को भी अर्जुन की सहायता के लिए आना पड़ा। उन्होंने हाथ में जल लेकर संकल्प किया  “गोवर्धन पर्वत उठाने और ब्रज की रक्षा करने का पुण्य मैं अर्जुन के बाण के साथ जोड़ता हूं।” इससे आग्नेयास्त्र और भी प्रचंड हो गया।

काटने का सामान्य उपाय हल्का पड़ रहा था तो सुंधवा ने भी संकल्प किया  “एक पत्नीव्रत पालने का मेरा पुण्य भी इस अस्त्र के साथ जुड़े।” दोनों अस्त्र आकाश मार्ग में चले। दोनों ने एक-दूसरे का बीच में काटने का प्रयत्न किया। अर्जुन का अस्त्र कट गया और सुंधवा का बाण आगे बढ़ा किंतु निशाना चूक गया।

दूसरा अस्त्र उठाया गया। कृष्ण ने कहा – ‘गज को ग्राह से और द्रौपदी की लाज बचाने का मेरा पुण्य अर्जुन के बाण के साथ जुड़े।”

उधर सुंधवा ने कहा – “मैंने नीतिपूर्वक ही उपार्जन किया और चरित्र की किसी पक्ष में त्रुटि नहीं आने दी हो तो इसका पुण्य इस अस्त्र के साथ जुड़े।”

इस बार भी दोनों अस्त्र आकाश में टकराए और सुंधवा के बाण से अर्जुन का तीर आकाश में ही कटकर धराशायी हो गया।

तीसरा अस्त्र शेष था। इसी पर अंतिम निर्णय निर्भर था। कृष्ण ने कहा – ‘मेरे बार-बार अवतार लेकर धरती का भार उतारनेका पुण्य अर्जुन के बाण के साथ जुड़े।” दूसरी ओर सुंधवा ने कहा – ”यदि मैंने स्वार्थ का क्षणभर चिंतन किए बिना मन को निरंतर परमार्थ में निरत रखा हो तो मेरा पुण्य बाण के साथ जुड़े।”

इस बार भी अर्जुन के तीर को काट सुंधवा का बाण विजयी हुआ। दोनों पक्षों में कौन अधिक समर्थ है, इसकी जानकारी देवलोक तक पहुंची तो देवतागण सुंधवा पर आकाश से पुष्प बरसाने लगे। युद्ध समाप्त कर दिया गया।

भगवान कृष्ण ने सुंधवा की सराहना करते हुए कहा – “नरश्रेष्ठ, तुमने सिद्ध कर दिया कि नैष्ठिक गृहस्थ साधक किसी भी तपस्वी से कम नहीं होता।” पूरी निष्ठा और सही ढंग से साधा गया गृहस्थ धर्म किस प्रकार फलता है, यह उपरोक्त प्रसंग से स्पष्ट होता है।

सुप्रभातम् सुमंगलम्। आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलमय हो ।
संजय गुप्ता

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हलवाईऔरकुत्ता

देवऋषि नारद और ऋषि अन्गरा कहीं जा रहे थे। रास्ते में उनकी नजर एक मिठाई की दुकान पर पड़ी। दुकान के नजदीक ही झूठी पतलों का ढेर लगा हुआ था। उस जूठ को खाने के लिए जैसे ही एक कुत्ता आता है, ऐसे ही उस दुकान का मालिक उसको जोर से डन्डा मारता है। डन्डे की मार खा कर कुत्ता चीखता हुआ वहां से चला जाता है।

ये दृष देख कर, देवऋषि को हंसी आ गयी । ऋषि अन्गरा ने उन से हंसी का कारण पूछा, नारद बोले :

हे ऋषिवर ! यह दुकान पहले एक कन्जूस व्यक्ति की थी। अपनी जिंदगी में उसने बहुत सारा पैसा इकट्ठा किया। और इस जन्म में वो कुत्ता बन कर पैदा हुआ और यह दुकान मालिक उसी का पुत्र है, देखें ! जिस के लिए उस ने बेशुमार धन इकट्ठा किया। आज उसी के हाथों से, उसे जूठा भोजन भी नहीं मिल सका। कर्मफल के इस खेल को देखकर मुझे हंसी आ गई।

मनुष्य को अपने शुभ और अशुभ कर्मों का फल जरूर मिलता है बेशक इस लिए उसे जन्मों-जन्मों की यात्रा क्यों न करनी पड़े।

🙏 राधे राधे जी 🙏
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संजय गुप्ता

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(((  जय  हो   योग कृष्णा . )))

महाभारत युद्ध के पश्चात् जब श्रीकृष्ण सहित सभी पांडव गांधारी से मिलने गए, तब पुत्रशोक में विह्वल गांधारी ने आंखों की पट्टी के भीतर से ही राजा युधिष्ठिर के पैरों की अंगुलियों के अग्रभाग को एक क्षण के लिए देखा। इतने देखने मात्र से ही युधिष्ठिर के पैरों के नाखून काले पड़ गए। गांधारीजी यह बात अच्छी तरह से जानती थीं कि महाभारत का पूरा युद्ध जिस योद्धा के बलबूते पर लड़ा गया है और जिसके कारण पाण्डवों को विजय मिली है, वह श्रीकृष्ण ही हैं। अत: गांधारीजी का सारा क्रोध्र श्रीकृष्ण पर ही केन्द्रित हो गया। वे श्रीकृष्ण को सम्बोधित करती हुई कहती हैं–

‘मधुसूदन! माधव! जनार्दन! कमलनयन! तुम शक्तिशाली थे, तुममें महान बल है, तुम्हारे पास बहुत-से सैनिक थे, दोनों पक्षों से अपनी बात मनवा लेने की सामर्थ्य तुममें थी, तुमने वेदशास्त्र और महात्माओं की बात सुनी और जानी हैं, यह सब होते हुए भी तुमने स्वेच्छा से कुरुवंश के नाश की उपेक्षा की; जानबूझकर इस वंश का नाश होने दिया। यह तुम्हारा महान दोष है, अत: तुम इसका फल प्राप्त करो।’ .

इतना सब सुनकर भी श्रीकृष्ण शान्त, गम्भीर और मौन रहे। गांधारी के क्रोध ने प्रचण्डरूप धारण कर लिया और वे नागिन की भांति फुफकार कर बोली–

‘चक्रगदाधर! मैंने पति की सेवा से जो कुछ भी तप प्राप्त किया है, उस तपोबल से तुम्हें शाप दे रही हूँ–आज से छत्तीसवां वर्ष आने पर तुम्हारा समस्त परिवार आपस में लड़कर मर जाएगा। तुम सबकी आंखों से ओझल होकर अनाथ के समान वन में घूमोगे और किसी निन्दित उपाय से मृत्यु को प्राप्त होगे। इन भरतवंश की स्त्रियों के जैसे तुम्हारे कुल की स्त्रियां भी इसी तरह सगे-सम्बन्धियों की लाशों पर गिरेंगी।’

ऐसा घोर शाप सुनकर भला कौन न भय से कांप उठता, परन्तु श्रीकृष्ण ने उसी गम्भीर मुस्कान के साथ कहा–‘मैं जानता हूँ, ऐसा ही होने वाला है। वृष्णिकुल का संहारक मेरे अतिरिक्त और हो भी कौन सकता है? यादवों को देव, दानव और मनुष्य तो मार नहीं सकते, अत: वे आपस में ही लड़कर नष्ट होंगे।’

शाप सुनकर भी भगवान श्रीकृष्ण गांधारी से कहते हैं–’उठो! शोक मत करो। प्रतिदिन युद्ध के लिए जाने से पूर्व जब तुम्हारा पुत्र दुर्योधन तुमसे आशीर्वाद लेने आता था और कहता था कि मां मैं युद्ध के लिए जा रहा हूँ, तुम मेरे कल्याण के लिए आशीर्वाद दो, तब तुम सदा यही उत्तर देती थीं ‘यतो धर्मस्ततो जय:’ अर्थात् धर्म की जय हो।’

यह कहकर समत्वयोगी श्रीकृष्ण निर्विकार भाव से खड़े रहे और गांधारी मौन हो गयीं।

प्रसंग का सार

इस प्रसंग का सार यही है कि सुख-दु:ख को मेहमान समझकर स्वागत करें। दु:ख में विचलित न होकर धैर्य के साथ उसका सामना करें। क्योंकि वाल्मीकिरामायण में कहा गया है–‘दुर्लभं हि सदा सुखम्।’ अर्थात् सदा सुख मिले यह दुर्लभ है।

संजय गुप्ता

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🏵️   श्री राधा रानी के एक बार नाम लेने की कीमत – 🏵️
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एक बार एक व्यक्ति था।
वह एक संत जी के पास गया। और कहता है कि संत जी, मेरा एक बेटा है। वो न तो पूजा पाठ करता है और न ही भगवान का नाम लेता है। आप कुछ ऐसा कीजिये कि उसका मन भगवान में लग जाये।

संत जी कहते है- “ठीक है बेटा, एक दिन तू उसे मेरे पास लेकर आ जा।” अगले दिन वो व्यक्ति अपने बेटे को लेकर संत जी के पास गया। अब संत जी उसके बेटे से कहते है- “बेटा, बोल राधे राधे…”
बेटा कहता है- मैं क्यू कहूँ?

संत जी कहते है- “बेटा बोल राधे राधे…”
वो इसी तरह से मना करता रहा और अंत तक उसने यही कहा कि- “मैं क्यू कहूँ राधे राधे…”

संत जी ने कहा- जब तुम मर जाओगे और यमराज के पास जाओगे तब यमराज तुमसे पूछगे कि कभी भगवान का नाम लिया। कोई अच्छा काम किया। तब तुम कह देना की मैंने जीवन में एक बार ‘श्री राधा रानी’ के नाम को बोला है। बस एक बार। इतना बताकर वह चले गए।
समय व्यतीत हुआ और एक दिन वो मर गया। यमराज के पास पहुंचा। यमराज ने पूछा- कभी कोई अच्छा काम किया है।
उसने कहा- हाँ महाराज, मैंने जीवन में एक बार ‘श्री राधा रानी’ के नाम को बोला है। आप उसकी महिमा बताइये।

यमराज सोचने लगा की एक बार नाम की महिमा क्या होगी? इसका तो मुझे भी नही पता है। यम बोले- चलो इंद्र के पास वो ही बतायेगे। तो वो व्यक्ति बोला मैं ऐसे नही जाऊंगा पहले पालकी लेकर आओ उसमे बैठ कर जाऊंगा।

यमराज ने सोचा ये बड़ी मुसीबत है। फिर भी पालकी मंगवाई गई और उसे बिठाया। 4 कहार (पालकी उठाने वाले) लग गए। वो बोला यमराज जी सबसे आगे वाले कहार को हटा कर उसकी जगह आप लग जाइये। यमराज जी ने ऐसा ही किया।
फिर सब मिलकर इंद के पास पहुंचे और बोले कि एक बार ‘श्री राधा रानी’ के नाम लेने की महिमा क्या है?
इंद्र बोले- महिमा तो बहुत है। पर क्या है ये मुझे भी नही मालूम। बोले की चलो ब्रह्मा जी को पता होगा वो ही बतायेगे।

वो व्यक्ति बोला इंद्र जी ऐसा है दूसरे कहार को हटा कर आप यमराज जी के साथ मेरी पालकी उठाइये। अब एक ओर यमराज पालकी उठा रहे है और दूसरी तरफ इंद्र लगे हुए है। पहुंचे ब्रह्मा जी के पास।

ब्रह्मा ने सोचा कि ऐसा कौन सा प्राणी ब्रह्मलोक में आ रहा है जो स्वयं इंद्र और यमराज पालकी उठा कर ला रहे है। ब्रह्मा के पास पहुंचे। सभी ने पूछा कि एक बार ‘श्री राधा रानी’ के नाम लेने की महिमा क्या है?
ब्रह्मा जी बोले- महिमा तो बहुत है पर वास्तविकता क्या है कि ये मुझे भी नही पता। लेकिन हाँ भगवान शिव जी को जरूर पता होगा।
वो व्यक्ति बोला कि तीसरे कहार को हटाइये और उसकी जगह ब्रह्मा जी आप लग जाइये। अब क्या करते महिमा तो जाननी थी। अब पालकी के एक ओर यमराज है, दूसरी तरफ इंद्र और पीछे ब्रह्मा जी है। सब मिलकर भगवान शिव जी के पास गए और भगवान शिव से पूछा कि प्रभु ‘श्री राधा रानी’ के नाम की महिमा क्या है? केवल एक बार नाम लेने की महिमा आप कृपा करके बताइये।

भगवान शिव बोले कि मुझे भी नही पता। लेकिन भगवान विष्णु जी को जरूर पता होगी। वो व्यक्ति शिव जी से बोला की अब आप भी पालकी उठाने में लग जाइये। इस प्रकार ब्रह्मा, शिव, यमराज और इंद्र चारों उस व्यक्ति की पालकी उठाने में लग गए और विष्णु जी के लोक पहुंचे। विष्णु से जी पूछा कि एक बार ‘श्री राधा रानी’ के नाम लेने की महिमा क्या है?
विष्णु जी बोले- अरे! जिसकी पालकी को स्वयं मृत्य का राजा यमराज, स्वर्ग का राजा इंद्र, ब्रह्म लोक के राजा ब्रह्मा और साक्षात भगवान शिव उठा रहे हो इससे बड़ी महिमा क्या होगी। जब सिर्फ एक बार ‘श्री राधा रानी’ नाम लेने के कारण, आपने इसको पालकी में उठा ही लिया है। तो अब ये मेरी गोद में बैठने का अधिकारी हो गया है।

भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं कहा है की जो केवल ‘रा’ बोलते है तो मैं सब काम छोड़ कर खड़ा हो जाता हूँ। और जैसे ही कोई ‘धा’ शब्द का उच्चारण करता है तो मैं उसकी ओर दौड़ लगा कर उसे अपनी गोद में भर लेता हूँ।

।। बोलो राधे राधे ।।
💐💐💐💐💐
संजय गुप्ता

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इन्द्र से वर प्राप्त करके रघुनन्दन राम महर्षि अगस्त्य के आश्रम में पहुँचे। वे शम्बूक वध की कथा सुनकर बहुत प्रसन्न हुये और उन्होंने विश्वकर्मा द्वारा दिया हुआ एक दिव्य आभूषण श्रीराम को अर्पित किया। वह आभूषण सूर्य के समान दीप्तिमान, दिव्य, विचित्र तथा अद्भुत था। उसे देखकर श्री राम ने महर्षि अगस्त्य से पूछा, “मुनिवर! विश्वकर्मा का यह अद्भुत आभूषण आपके पास कहाँ से आया? जब यह आभूषण इतना विचित्र है तो इसकी कथा भी विचित्र ही होगी। यह जानने का मेरे मन में कौतूहल हो रहा है।”

श्रीराम की जिज्ञासा और कौतूहल को शान्त करने के लिये महर्षि ने कहा, “प्राचीन काल में एक बहत विस्तृत वन था जो चारों ओर सौ योजन तक फैला हुआ था, परन्तु उस वन में कोई प्राणी-पशु-पक्षी तक भी नहीं रहता था। उसमें एक मनोहर सरोवर भी था। उस स्थान को पूर्णतया एकान्त पाकर मैं वहाँ तपस्या करने के लिये चला गया था। सरोवर के चारों ओर चक्कर लगाने पर मुझे एक पुराना विचित्र आश्रम दिखाई दिया। उसमें एक भी तपस्वी नहीं था। मैंने रात्रि वहीं विश्राम किया। जब मैं प्रातःकाल स्नानादि के लिये सरोवर की ओर जाने लगा तो मुझे सरोवर के तट पर हृष्ट-पुष्ट निर्मल शव दिखाई दिया। मैं आश्चर्य से वहा बैठकर उस शव के विषय में विचार करने लगा। थोड़ी देर पश्चात् वहाँ एक दिव्य विमान उतरा जिस पर एक सुन्दर देवता विराजमान था। उसके चारों ओर सुन्दर वस्त्राभूषणों से अलंकृत अनेक अप्सराएँ बैठी थीं। उनमें से कुछ उन पर चँवर डुला रही थीं। फिर वह देवता सहसा विमान से उतरकर उस शव के पास आया और उसने मेरे देखते ही देखते उस शव को खाकर फिर सरोवर में जाकर हाथ-मुँह धोने लगा। जब वह पुनः विमान पर चढ़ने लगा तो मैंने उसे रोककर पूछा कि हे तेजस्वी पुरुष! कहाँ आपका यह देवोमय सौम्य रूप और कहाँ यह घृणित आहार? मैं इसका रहस्य जानना चाहता हूँ। मेरे विचार से आपको यह घृणित कार्य नहीं करना चाहिये था।

“मेरी बात सुकर वह दिव्य पुरुष बोला कि मेरे महायशस्वी पिता विदर्भ देश के पराक्रमी राजा थे। उनका नाम सुदेव था। उनकी दो पत्नियाँ थीं जिनसे दो पुत्र उत्पन्न हुये। एक का नाम था श्वेत और दूसरे का सुरथ। मैं श्वेत हूँ। पिता की मृत्यु के बाद मैं राजा बना और धर्मानुकूल राज्य करने लगा। एक दिन मुझे अपनी मृत्यु की तिथि का पता चल गया और मैं सुरथ को राज्य देकर इसी वन में तपस्या करने के लिये चला आया। दीर्घकाल तक तपस्या करके मैं ब्रह्मलोक को प्राप्त हुआ, परन्तु अपनी भूख-प्यास पर विजय प्राप्त न कर सका। जब मैंने ब्रह्माजी से कहा तो वे बोले कि तुम मृत्युलोक में जाकर अपने ही शरीर का नित्य भोजन किया करो। यही तुम्हारा उपचार है क्योंकि तुमने किसी को कभी कोई दान नहीं दिया, केवल अपने ही शरीर का पोषण किया है। ब्रह्मलोक भी तुम्हें तुम्हारी तपस्या के कारण ही प्राप्त हुआ है। जब कभी महर्षि अगस्त्यत उस वन में पधारेंगे तभी तुम्हें भूख-प्यास से छुटकारा मिल जायेगा। अब आप मुझे मिल गये हैं, अतएव आप मेरा उद्धार करें और मेरा उद्धार करने के प्रतिदान स्वरूप यह दिव्य आभूषण ग्रहण करें। यह आभूषण दिव्य वस्त्र, स्वर्ण, धन आदि देने वाला है। इसके साथ मैं अपनी सम्पूर्ण कामनाएँ आपको समर्पित कर रहा हूँ। मेरे आभूषण लेते ही राजर्षि श्वेत पूर्णतः तृप्त होकर स्वर्ग को प्राप्त हुये और वह शव भी लुप्त हो गया।”

~  राजा श्वेत की कथा  – उत्तरकाण्ड

Satish

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सुखी रहने का तरीका


सुखी रहने का तरीका


एक बार की बात है संत तुकाराम अपने आश्रम में बैठे हुए थे। तभी उनका एक शिष्य, जो स्वाभाव से थोड़ा क्रोधी था उनके समक्ष आया और बोला-

गुरूजी, आप कैसे अपना व्यवहार इतना मधुर बनाये रहते हैं, ना आप किसी पे क्रोध करते हैं और ना ही किसी को कुछ भला-बुरा कहते हैं? कृपया अपने इस अच्छे व्यवहार का रहस्य बताइए?

संत बोले- मुझे अपने रहस्य के बारे में तो नहीं पता, पर मैं तुम्हारा रहस्य जानता हूँ !

“मेरा रहस्य! वह क्या है गुरु जी?” शिष्य ने आश्चर्य से पूछा।

”तुम अगले एक हफ्ते में मरने वाले हो!” संत तुकाराम दुखी होते हुए बोले।

कोई और कहता तो शिष्य ये बात मजाक में टाल सकता था, पर स्वयं संत तुकाराम के मुख से निकली बात को कोई कैसे काट सकता था?

शिष्य उदास हो गया और गुरु का आशीर्वाद ले वहां से चला गया।

उस समय से शिष्य का स्वभाव बिलकुल बदल सा गया। वह हर किसी से प्रेम से मिलता और कभी किसी पे क्रोध न करता, अपना ज्यादातर समय ध्यान और पूजा में लगाता। वह उनके पास भी जाता जिससे उसने कभी गलत व्यवहार किया था और उनसे माफ़ी मांगता। देखते-देखते संत की भविष्यवाणी को एक हफ्ते पूरे होने को आये।

शिष्य ने सोचा चलो एक आखिरी बार गुरु के दर्शन कर आशीर्वाद ले लेते हैं। वह उनके समक्ष पहुंचा और बोला-

गुरुजी, मेरा समय पूरा होने वाला है, कृपया मुझे आशीर्वाद दीजिये!”

“मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है पुत्र। अच्छा, ये बताओ कि पिछले सात दिन कैसे बीते? क्या तुम पहले की तरह ही लोगों से नाराज हुए, उन्हें अपशब्द कहे?”

संत तुकाराम ने प्रश्न किया।

“नहीं-नहीं, बिलकुल नहीं। मेरे पास जीने के लिए सिर्फ सात दिन थे, मैं इसे बेकार की बातों में कैसे गँवा सकता था?
मैं तो सबसे प्रेम से मिला, और जिन लोगों का कभी दिल दुखाया था उनसे क्षमा भी मांगी” शिष्य तत्परता से बोला।

“संत तुकाराम मुस्कुराए और बोले, “बस यही तो मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है।”
“मैं जानता हूँ कि मैं कभी भी मर सकता हूँ, इसलिए मैं हर किसी से प्रेमपूर्ण व्यवहार करता हूँ, और यही मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है।

शिष्य समझ गया कि संत तुकाराम ने उसे जीवन का यह पाठ पढ़ाने के लिए ही मृत्यु का भय दिखाया था ।

वास्तव में हमारे पास भी सात दिन ही बचें हैं :-

रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि, आठवां दिन तो बना ही नहीं है ।

🌹👏  “आइये आज से परिवर्तन आरम्भ करें  और  हरे कृष्ण महामंत्र का जप करे

🙏🏻सदैव जपिये…
जयश्री कृष्ण
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

🙏🏻खुश रहिये…..☺🙏🏻

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एक बार एक व्यक्ति था।


एक बार एक व्यक्ति था।
वह एक संत जी के पास गया। और कहता है कि संत जी, मेरा एक बेटा है। वो न तो पूजा पाठ करता है और न ही भगवान का नाम लेता है। आप कुछ ऐसा कीजिये कि उसका मन भगवान में लग जाये।

संत जी कहते है- “ठीक है बेटा, एक दिन तू उसे मेरे पास लेकर आ जा।” अगले दिन वो व्यक्ति अपने बेटे को लेकर संत जी के पास गया। अब संत जी उसके बेटे से कहते है- “बेटा, बोल राधे राधे…”
बेटा कहता है- मैं क्यू कहूँ?

संत जी कहते है- “बेटा बोल राधे राधे…”
वो इसी तरह से मना करता रहा और अंत तक उसने यही कहा कि- “मैं क्यू कहूँ राधे राधे…”

संत जी ने कहा- जब तुम मर जाओगे और यमराज के पास जाओगे तब यमराज तुमसे पूछगे कि कभी भगवान का नाम लिया। कोई अच्छा काम किया। तब तुम कह देना की मैंने जीवन में एक बार ‘श्री राधा रानी’ के नाम को बोला है। बस एक बार। इतना बताकर वह चले गए।
समय व्यतीत हुआ और एक दिन वो मर गया। यमराज के पास पहुंचा। यमराज ने पूछा- कभी कोई अच्छा काम किया है।
उसने कहा- हाँ महाराज, मैंने जीवन में एक बार ‘श्री राधा रानी’ के नाम को बोला है। आप उसकी महिमा बताइये।

यमराज सोचने लगा की एक बार नाम की महिमा क्या होगी? इसका तो मुझे भी नही पता है। यम बोले- चलो इंद्र के पास वो ही बतायेगे। तो वो व्यक्ति बोला मैं ऐसे नही जाऊंगा पहले पालकी लेकर आओ उसमे बैठ कर जाऊंगा।

यमराज ने सोचा ये बड़ी मुसीबत है। फिर भी पालकी मंगवाई गई और उसे बिठाया। 4 कहार (पालकी उठाने वाले) लग गए। वो बोला यमराज जी सबसे आगे वाले कहार को हटा कर उसकी जगह आप लग जाइये। यमराज जी ने ऐसा ही किया।
फिर सब मिलकर इंद के पास पहुंचे और बोले कि एक बार ‘श्री राधा रानी’ के नाम लेने की महिमा क्या है?
इंद्र बोले- महिमा तो बहुत है। पर क्या है ये मुझे भी नही मालूम। बोले की चलो ब्रह्मा जी को पता होगा वो ही बतायेगे।

वो व्यक्ति बोला इंद्र जी ऐसा है दूसरे कहार को हटा कर आप यमराज जी के साथ मेरी पालकी उठाइये। अब एक ओर यमराज पालकी उठा रहे है और दूसरी तरफ इंद्र लगे हुए है। पहुंचे ब्रह्मा जी के पास।

ब्रह्मा ने सोचा कि ऐसा कौन सा प्राणी ब्रह्मलोक में आ रहा है जो स्वयं इंद्र और यमराज पालकी उठा कर ला रहे है। ब्रह्मा के पास पहुंचे। सभी ने पूछा कि एक बार ‘श्री राधा रानी’ के नाम लेने की महिमा क्या है?
ब्रह्मा जी बोले- महिमा तो बहुत है पर वास्तविकता क्या है कि ये मुझे भी नही पता। लेकिन हाँ भगवान शिव जी को जरूर पता होगा।
वो व्यक्ति बोला कि तीसरे कहार को हटाइये और उसकी जगह ब्रह्मा जी आप लग जाइये। अब क्या करते महिमा तो जाननी थी। अब पालकी के एक ओर यमराज है, दूसरी तरफ इंद्र और पीछे ब्रह्मा जी है। सब मिलकर भगवान शिव जी के पास गए और भगवान शिव से पूछा कि प्रभु ‘श्री राधा रानी’ के नाम की महिमा क्या है? केवल एक बार नाम लेने की महिमा आप कृपा करके बताइये।

भगवान शिव बोले कि मुझे भी नही पता। लेकिन भगवान विष्णु जी को जरूर पता होगी। वो व्यक्ति शिव जी से बोला की अब आप भी पालकी उठाने में लग जाइये। इस प्रकार ब्रह्मा, शिव, यमराज और इंद्र चारों उस व्यक्ति की पालकी उठाने में लग गए और विष्णु जी के लोक पहुंचे। विष्णु से जी पूछा कि एक बार ‘श्री राधा रानी’ के नाम लेने की महिमा क्या है?
विष्णु जी बोले- अरे! जिसकी पालकी को स्वयं मृत्य का राजा यमराज, स्वर्ग का राजा इंद्र, ब्रह्म लोक के राजा ब्रह्मा और साक्षात भगवान शिव उठा रहे हो इससे बड़ी महिमा क्या होगी। जब सिर्फ एक बार ‘श्री राधा रानी’ नाम लेने के कारण, आपने इसको पालकी में उठा ही लिया है। तो अब ये मेरी गोद में बैठने का अधिकारी हो गया है।

भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं कहा है की जो केवल ‘रा’ बोलते है तो मैं सब काम छोड़ कर खड़ा हो जाता हूँ। और जैसे ही कोई ‘धा’ शब्द का उच्चारण करता है तो मैं उसकी ओर दौड़ लगा कर उसे अपनी गोद में भर लेता हूँ।

।। बोलो राधे राधे ।।
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