Posted in रामायण - Ramayan

रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः। ‘जिसमें योगी लोगों का मन रमण करता है उसी को कहते हैं ‘राम’।’


विजय कृष्ण पांडेय 

 

★रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः।
‘जिसमें योगी लोगों का मन
रमण करता है उसी को कहते
हैं ‘राम’।’

एक राम घट-घट में बोले,
दूजो राम दशरथ घर डोले।
तीसर राम का सकल पसारा,
ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।★★

प्रभु श्री राम द्वारा रामेश्वर
महादेव की स्थापना,,,,

सैल बिसाल आनि कपि देहीं।
कंदुक इव नल नील ते लेहीं।।

देखि सेतु अति सुन्दर रचना।
बिहसि कृपानिधि बोले बचना।।

परम रम्य उत्तम यह धरनी।
महिमा अमित जाइ नही बरनी।।

करिहउँ इहाँ संभु थापना।
मोरे हृदय परम कलपना।।

सुनि कपीस बहु दूत पठाए।
मुनिबर सकल बोली लै आये।।

लिंग थापि बिधिवत करि पूजा।
सिव समानप्रिय मोहि न दूजा।।

सिव द्रोही मम भगत कहावा।
सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा।।

संकर बिमुख भगती चह मोरी।
सो नारकी मूढ़ मति थोरी।।

संकरप्रिय मम द्रोही
सिव द्रोही मम दास।
ते नर करहिं कलप भरि
घोर नरक महूँ बास।।

भावार्थ:-

वानर बड़े-बड़े पहाड़ ला-लाकर
देते हैं और नल-नील उन्हें गेंद की
तरह ले लेते हैं।
सेतु की अत्यंत सुंदर रचना देखकर
कृपासिन्धु श्री रामजी हँसकर वचन
बोले-
यह(यहाँ की)भूमि परम रमणीय और
उत्तम है।
इसकी असीम महिमा वर्णन नहीं की
जा सकती।

मैं यहाँ शिवजी की स्थापना करूँगा।
मेरे हृदय में यह महान्‌ संकल्प है।

श्री रामजी के वचन सुनकर वानरराज
सुग्रीव ने बहुत से दूत भेजे,जो सब श्रेष्ठ
मुनियों को बुलाकर ले आए।

शिवलिंग की स्थापना करके विधि
पूर्वक उसका पूजन किया
(फिर भगवान बोले-)
शिवजी के समान मुझको दूसरा कोई
प्रिय नहीं है।
जो शिव से द्रोह रखता है और मेरा
भक्त कहलाता है,वह मनुष्य स्वप्न में
भी मुझे नहीं पाता।
शंकरजी से विमुख होकर (विरोध
करके) जो मेरी भक्ति चाहता है,वह
नरकगामी,मूर्ख और अल्पबुद्धि है।

जिनको शंकरजी प्रिय हैं,परन्तु जो
मेरे द्रोही हैं एवं जो शिवजी के द्रोही
हैं और मेरे दास (बनना चाहते) हैं,
वे मनुष्य कल्पभर घोर नरक में
निवास करते हैं।

समस्त चराचर प्राणियोँ एवं विश्व का
कल्याण करो प्रभु रामेश्वर महादेव,,,

मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधे
पूर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुज
भास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं
तापहम्।
मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ
स्वःसम्भवं शङ्करं वन्दे
ब्रह्मकुलं कलङ्कशमनं
श्रीरामभूपप्रियम्।।

धर्म रुपी बृक्ष के मूल,विवेक रुपी समुद्र
को आनंद देने वाले पूर्णचंद्र,वैराग्य रूपी
कमल के सूर्य,पाप रूपी घोर अन्धकार
को निश्चय ही मिटने वाले,तीनों तापों को
हरने वाले,मोहरूपी बादलों के समूह को
छिन्न छिन्न भिन्न करने की विधि में
आकाश से उत्पन्न पवन स्वरुप,ब्रह्मा
जी के वंशज(आत्मज) तथा कलंक
नाशक मेरे(महाराज श्री राम चन्द्र जी)
प्रिय श्री शंकर जी की मैं वंदना करता हूँ।

कष्ट हरो,,काल हरो,,
दुःख हरो,,दारिद्र्य हरो,,,
हर,,,हर,,,महादेव,,,

रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं
कालमत्तेभसिंह योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं
गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्।
मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्म
वृन्दैकदेवं वन्दे कन्दावदातं
सरसिजनयनं देवमुर्वीशरुपम्।।

कामदेव के शत्रु शिव जी के सेव्य,
भव (जन्म-मृत्यु) के भय को हरने
वाले,कालरुपी मतवाले हाथी के
लियेसिंह के समान,योगियोँ के
स्वामी (योगीश्वर),ज्ञान के द्वारा
जानने योग्य,गुणोँ के निधि,अजेय.
निर्गुण,निर्विकार,माया से परे,देवताओँ
के स्वामी, दुष्टोँ के वध मेँ तत्पर,ब्राह्मण
वृन्द के एकमात्र देवता (रक्षक),जलवाले
मेघ के समान सुन्दर श्याम.कमल के से
नेत्रवाले,पृथ्वीपति (राजा) के रुप मेँ परम
देव श्रीराम जी की मैँ वन्दना करता हुँ।

राम से बड़ा राम का नाम !!!

★ऐसी बात नहीं है कि अवधपुरी में राजा
दशरथ के घर श्रीराम अवतरित हुए तब
से ही लोग श्रीराम का भजन करते हैं।★

★राजा दिलीप,राजा रघु एवं राजा
दशरथ के पिता राजा अज भी श्रीराम
का ही भजन करते थे क्योंकि श्रीराम
केवल दशरथ के पुत्र ही नहीं हैं,बल्कि
रोम-रोम में जो चेतना व्याप्त रही है,
रोम-रोम में जो रम रहा है उसका ही
नाम है ‘राम’।

★राम जी के अवतरण से हजारों-लाखों
वर्ष पहले राम नाम की महिमा वेदों में
पायी जाती है।★

रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः।

‘जिसमें योगी लोगों का मन रमण
करता है उसी को कहते हैं ‘राम’।’

एक राम घट-घट में बोले,
दूजो राम दशरथ घर डोले।
तीसर राम का सकल पसारा,
ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।

शिष्य ने कहाः “गुरुजी ! आपके कथनानुसार तो चार राम हुए।
ऐसा कैसे ?”

गुरूः “थोड़ी साधना कर,जपध्यानादि
कर,फिर समझ में आ जायेगा।”

साधना करके शिष्य की बुद्धि सूक्ष्म हुई,
तब गुरु ने कहाः

जीव राम घट-घट में बोले।
ईश राम दशरथ घर डोले।
बिंदु राम का सकल पसारा।
ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।

शिष्य बोलाः “गुरुदेव ! जीव,ईश,बिंदु
व ब्रह्म इस प्रकार भी तो राम चार ही
हुए न ?”
गुरु ने देखा कि साधना आदि करके
इसकी मति थोड़ी सूक्ष्म तो हुई है।

किंतु अभी तक चार राम दिख रहे हैं।

गुरु ने करूणा करके समझाया कि,
“वत्स ! देख,घड़े में आया हुआ आकाश,
मठ में आया हुआ आकाश,मेघ में आया
हुआ आकाश और उससे अलग व्यापक
आकाश,ये चार दिखते हैं।

अगर तीनों उपाधियों – घट,मठ,और
मेघ को हटा दो तो चारों में आकाश तो
एक-का-एक ही है।

इसी प्रकारः

वही राम घट-घट में बोले।
वही राम दशरथ घर डोले।
उसी राम का सकल पसारा।
वही राम है सबसे न्यारा।।

★रोम-रोम में रमने वाला चैतन्यतत्व
वही का वही है और उसी का नाम है
चैतन्य “राम” वे ही श्री राम जिस दिन
दशरथ कौशल्या के घर साकार रूप
में अवतरित हुए,
उस दिन को भारतवासी श्रीरामनवमी
के पावन पर्व के रूप में मनाते हैं।

कैसे हैं वे श्रीराम ? भगवान श्रीराम
नित्य कैवल्य ज्ञान में विचरण करते थे।

वे आदर्श पुत्र,आदर्श शिष्य,आदर्श
मित्र एवं आदर्श शत्रु थे।

आदर्श शत्रु ! हाँ,आदर्श शत्रु थे,तभी तो
शत्रु भी उनकी प्रशंसा किये बिना न रह
सके।

कथा आती है कि लक्ष्मण जी के द्वारा
मारे गये मेघनाद की दाहिनी भुजा सती
सुलोचना के समीप जा गिरी।

सुलोचना ने कहाः’अगर यह मेरे पति की
भुजा है तो हस्ताक्षर करके इस बात को
प्रमाणित कर दे।’

कटी भुजा ने हस्ताक्षर करके सच्चाई
स्पष्ट कर दी।

सुलोचना ने निश्चय किया कि ‘मुझे अब सती हो जाना चाहिए।’
किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था।
फिर वह कैसे सती होती ! जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर
अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा।

तब रावण ने उत्तर दियाः “देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव
प्राप्त करो।

जिस समाज में बालब्रह्मचारी श्रीहनुमान,
परम जितेन्द्रिय श्री लक्ष्मण तथा एकपत्नी
व्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं,
उस समाज में तुम्हें जाने से डरना
नहीं चाहिए।

★मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य
महापुरुषोंके द्वारा तुम निराश
नहीं लौटायी जाओगी।”★

जब रावण सुलोचना से ये बातें कह
रहा था,उस समय कुछ मंत्री भी उसके
पास बैठे थे।

उन लोगों ने कहाः
“जिनकी पत्नी को आपने बंदिनी बना
कर अशोक वाटिका में रख छोड़ा है,
उनके पास आपकी बहू का जाना
कहाँ तक उचित है ?

यदि यह गयी तो क्या सुरक्षित वापस
लौट सकेगी ?”

यह सुनकर रावण बोलाः “मंत्रियो !
लगता है तुम्हारी बुद्धि विनष्ट हो गयी है।

★अरे ! यह तो रावण का काम है जो
दूसरे की स्त्री को अपने घर में बंदिनी
बनाकर रख सकता है, राम का नहीं।★

धन्य है श्रीराम का दिव्य चरित्र !

जिसका विश्वास शत्रु भी करता है
और प्रशंसा करते थकता नहीं !
प्रभु श्रीराम का पावन चरित्र दिव्य
होते हुए भी इतना सहज सरल है
कि मनुष्य चाहे तो अपने जीवन
में भी उसका अनुसरण कर सकता है।

—नर या नारायण कौन थे ‘राम’

श्रीराम पूर्णतः ईश्वर हैं।
भगवान हैं।
साथ ही पूर्ण मानव भी हैं।
उनके लीला चरित्र में जहां एक ओर
ईश्वरत्व का वैचित्रमय लीला विन्यास
है,वहीं दूसरी ओर मानवता का प्रकाश
भी है।

विश्वव्यापिनी विशाल यशकीर्ति के
साथ सम्यक निरभिमानिता है।
वज्रवत न्याय कठोरता के साथ
पुष्यवत प्रेमकोमलता है।

अनंत कर्ममय जीवन के साथ
संपूर्ण वैराग्य और उपरति है।

समस्त निषमताओं के साथ
नित्य सहज समता है।
अनंत वीरता के साथ मनमोहक
नित्य सौंदर्य है।

इस प्रकार असंख्य परस्पर विरोधी
गुणों और भावों का समन्वय है।

भगवान श्री राम की लीला चरित्रों का
श्रद्धा भक्ति के साथ चिंतन,अध्ययन
व विचार करने पर साधारण नर नारी
भी सर्वगुण समन्वित एवं सर्वगुण
रहित अखिल विश्व व्यापी,सर्वातीत,
सर्वमय श्रीराम को अपने निकटस्थ
अनुभव कर सकते हैं।

श्री राम में नर और नारायण तथा मानव और ईश्वर की दूरी मिटाकर भगवान के नित्य परिपूर्ण स्वरूप का परिचय मिलता है।

भगवान पुरुषोत्तम ने श्री राम के रूप में प्रकट होकर मानवीय रूप में सांसारिक लोगों के दिलो दिमाग पर नित्य प्रभुत्व की प्रतिष्ठा कर समस्त भारतीय संस्कृति को आध्यात्म भाव से ओतप्रोत कर दिया है।

रामचरितमानस महाकवि तुलसीदास
की अमर कृति है।

यह एक ऐसा सर्वोपयोगी आदर्श
प्रदर्शित करने वाला पवित्र धर्मग्रंथ है।
जिसने मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्रीराम को समस्त नर नारियों के हृदय में परम देवत्व रूप के साथ अत्यंत आत्मीय रूप
में प्रतिष्ठित किया है।

इसने शिक्षित अशिक्षित आबाल वृद्ध
स्त्री पुरुष सभी प्रकार के जीवन को
श्रीराम के प्रति भक्ति तथा प्रेम के
दिव्य,मधुर सुधारस से अभिषिक्त
कर अपना अद्भुत प्रभाव विस्तार
किया है।

श्रीरामचरितमानस के श्रीराम
सर्वसद्गुण संपन्न मर्यादारक्षक
परम आदर्श शिरोमणि होने के
साथ ही स्वमहिमा में स्थित
महामानव है।

श्रीरामचरित मानस के श्रवण,मनन
तथा चिंतन से अत्यंत विष्यासक्त,
असदाचारी कठोर हृदय मानव भी
पवित्र विचार परायण एवं सदाचारी
होकर निर्मल प्रेम भक्ति की रसधारा
में सराबोर होकर मुक्ति प्राप्त कर
सकता है।

इस ग्रंथ के सभी पात्र आदर्श चरित्र
से परिपूर्ण हैं।

इसमें गुरु शिष्य,माता पिता,भ्राता पुत्र
स्वामी सेवक,प्रेम सेवा,क्षमा,वीरता,दान,
त्याग,धर्मनीति आदि संपूर्ण आदर्शों के
प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं।

यही कारण है कि इस ग्रंथ का सर्वत्र समादर है।
तथा यह सर्वप्रिय ग्रंथ है।
श्रीरामचरितमानस की चौपाइयों को अधिकांश मानव मंत्रवत कर जप
परायण करते हैं।

वाल्मीकि ने श्री रामायण की रचना करते समय श्रीराम कथा के रूप में मानवता की
कथा कही है।

उन्होंने श्रीराम के चरित्र के माध्यम से विश्व के मानवों को मानवता का संदेश दिया है।
राम जैसा नर मानव है।

राम के समान चरित से मानवता की
प्राप्ति होती है।

राम एक ऐसे सेतु हैं जहां एक छोर
से शुरू होकर मनुष्य दूसरे छोर पर
परमात्मा तक पहुंच जाता है।

उन्हीं पूर्णाभिराम श्रीराम के दिव्य गुणों
को अपने जीवन में अपनाकर श्रीराम
तत्त्व की ओर प्रयाण करने के पथ पर
अग्रसर हो,
यही अभ्यर्थना… यही शुभ कामना….

नमामि रामं रघुवंशनाथं !
#साभार_संकलित;

ॐ नमः शिवाय
नमामि रामं रघुवंश नाथं

जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,
जयति पुण्य भूमि भारत,,

सदा सर्वदा सुमंगल,,
ॐ नमः शिवाय,,,
जय भवानी,,
जय श्री राम

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Author:

Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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