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सिकन्दर उस जल की तलाश में था


*सिकन्दर उस जल की तलाश में था, जिसे पीने से मानव अमर हो जाते हैं.!* *दुनियाँ भर को जीतने के जो उसने आयोजन किए, वह अमृत की तलाश के लिए ही थे !* *काफी दिनों तक देश दुनियाँ में भटकने के पश्चात आखिरकार सिकन्दर ने वह जगह पा ही ली, जहाँ उसे अमृत की प्राप्ति होती !* *वह उस गुफा में प्रवेश कर गया, जहाँ अमृत का झरना था, वह आनन्दित हो गया !* 👉 *जन्म-जन्म की आकांक्षा पूरी होने का क्षण आ गया, उसके सामने ही अमृत जल कल – कल करके बह रहा था, वह अंजलि में अमृत को लेकर पीने के लिए झुका ही था कि तभी एक कौआ 🦅जो उस गुफा के भीतर बैठा था, जोर से बोला, ठहर, रुक जा, यह भूल मत करना…!’* *सिकन्दर ने🦅कौवे की तरफ देखा!* *बड़ी दुर्गति की अवस्था में था वह कौआ.🦅!* *पंख झड़ गए थे, पँजे गिर गए थे, अंधा भी हो गया था, बस कंकाल मात्र ही शेष रह गया था !* *सिकन्दर ने कहा, ‘तू रोकने वाला कौन…?’* 🦅 *कौवे ने उत्तर दिया, ‘मेरी कहानी सुन लो…मैं अमृत की तलाश में था और यह गुफा मुझे भी मिल गई थी !, मैंने यह अमृत पी लिया !* 🦅 *अब मैं मर नहीं सकता, पर मैं अब मरना चाहता हूँ… !* 🦅 *देख लो मेरी हालत…अंधा हो गया हूँ, पंख झड़ गए हैं, उड़ नहीं सकता, पैर गल गए हैं, एक बार मेरी ओर देख लो फिर उसके बाद यदि इच्छा हो तो अवश्य अमृत पी लेना!* 🦅 *देखो…अब मैं चिल्ला रहा हूँ…चीख रहा हूँ…कि कोई मुझे मार डाले, लेकिन मुझे मारा भी नहीं जा सकता !* 🦅 *अब प्रार्थना कर रहा हूँ परमात्मा से कि प्रभु मुझे मार डालो !* 🦅 *मेरी एक ही आकांक्षा है कि किसी तरह मर जाऊँ !* 🦅 *इसलिए सोच लो एक बार, फिर जो इच्छा हो वो करना.’!* 🦅 *कहते हैं कि सिकन्दर सोचता रहा….बड़ी देर तक…..!* *आखिर उसकी उम्र भर की तलाश थी अमृत !*💧 *उसे भला ऐसे कैसे छोड़ देता !* *सोचने के बाद फिर चुपचाप गुफा से बाहर वापस लौट आया, बिना अमृत पिए !* *सिकन्दर समझ चुका था कि जीवन का आनन्द ✨उस समय तक ही रहता है, जब तक हम उस आनन्द को भोगने की स्थिति में होते हैं!* *इसलिए स्वास्थ्य की रक्षा कीजिये !* *जितना जीवन मिला है,उस जीवन का भरपूर आनन्द लीजिये !* ❣🥀 *हमेशा खुश रहिये ?*❣🥀 *दुनियां में सिकन्दर कोई नहीं, वक्त सिकन्दर होता है..* 🙏🏼🌸सहृदय नमस्कार🌸 🙏🏼

ठुकराल वेद

वेद

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गोरखपुर नगर के पश्चिम ४५ कि मी की दूरी पर संत कबीर नगर


गोरखपुर नगर के पश्चिम ४५ कि मी की दूरी पर संत कबीर नगर जनपद मुख्यालय खलीलाबाद से मात्र सात कि.मी. की दूरी पर स्थित देवाधिदेव महादेव बाबा तामेश्वरनाथ मंदिर (ताम्रेश्वरनाथ धाम) की महत्ता अन्नत (आदि) काल से चली आ रही है। वर्तमान में भी इस स्थान की महिमा व आस्था का केन्द्र होने के कारण भक्तों का तांता लगा रहता है। कालांतर में तामेश्वरनाथ मंदिर जनश्रुति के अनुसार यह स्थल महाभारत काल में महाराजा विराट के राज्य का जंगली इलाका रहा। यहां पांडवों का वनवास क्षेत्र रहा है और अज्ञातवास के दौरान कुंती ने पांडवों के साथ यहां कुछ दिनों तक निवास किया था। इसी स्थल पर माता कुंती ने शिवलिंग की स्थापना की थी,यह वही शिवलिंग है। यही वह स्थान है जहां क़रीब ढाई हज़ार वर्ष पूर्व दुनिया में बौद्ध धर्म का संदेश का परचम लहराने वाले महात्मा बुद्ध ने मुण्डन संस्कार कराने के पश्चात अपने राजश्री वस्त्रों का परित्याग कर दिया था। भगवान बुद्ध के यहां मुण्डन संस्कार कराने के नाते यह स्थान मुंडन के लिए प्रसिद्ध है। महाशिव रात्रि पर यहां भारी संख्या में लोग यहां अपने बच्चों का मुंडन कराने के लिए उपस्थित होते है। इसके बाद इस स्थान की महत्ता दिन-प्रतिदिन बढ़ती गयी और कालांतर में यह ताम्रगढ़ बांसी नरेश राज्य में आ गया जिन्होंने यहां पर आने वाले श्रद्धालुओं की भारी तादाद को देखते हुए मंदिर का निर्माण कराया। जहां स्थापित शिव लिंग पर जलाभिषेक व यहां रूद्धाभिषेक,शिव आराधना के लिए दूर-दराज के भक्त आते और मनवांछित फल प्राप्त करते रहते हैं। बांसी के राजा ने क़रीब डेढ़ सौ साल पहले मंदिर की पूजा अर्चना के लिए गोरखपुर जनपद के हरनही के समीप जैसरनाथ गांव से गुसाई परिवार बुलाकर उन्हें जिम्मदारी सौंप दी। तबसे उन्हीं के वंशज यहां के पूजा पाठ का जिम्मा संभाल रहे हैं। इस बात की पुष्टि अवकाश प्राप्त शिक्षक और महंत रामरक्षा भारती करते हैं। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वजों में एक बुजुर्ग ने तामेश्वरनाथ मंदिर के सामने जीवित समाधि ले ली थी,वे सिद्ध व्यक्ति थे। उनकी समाधि पर आज भी शिवार्चन के बाद गुड़भंगा चढ़ाया जाता है। तामेश्वरनाथ मंदिर और महंत यह मंदिर आठ फुट ऊंचे चबूतरे पर बना हुआ है। इससे प्राचीन मंदिर परिसर में छोटे-बड़े नौ और सटे ही पांच अन्य मन्दिर है। इनमें एक मंदिर मुख्य मंदिर के ठीक सामने है जो देवताओं का नहीं अपितु देव स्वरूप उस मानव का है जिसने जीते जी यहां पर समाधि ले ली थी। समाधि लिए मानव के बारे में लोगों का कहना है कि वह समय समय पर उपस्थित होकर विघ्र बाधा व कठिनाईयों का निराकरण करते है,जिन्हें गोस्वामी बुझावन भारती बाबा के नाम से पुकारा जाता है। इन्हीं के वंशज यहां के गोस्वामी भारतीगण है,जो बाबा तामेश्वरनाथ मंदिर की देखभाल करते है। इस स्थान का नाम ताम्रगढ़ और बाद में तामा पड़ा। बताया जाता है कि तामा गांव के उत्तर दो बड़े तालाब थे जिसे वर्तमान में लठियहवां व झझवा नाम से पुकारा जाता है। पूरब दिशा में भी इसी तरह का तालाब-पोखरे व भीटा स्थित है। इसके सटे ही कोटिया है। इस नाम से प्रतीत होता है कि यहां पर कोई कोटि या दुर्ग रहा है। पुराने लोगों का यह भी कहना है कि यहां पहले थारू जाति के लोग रहा करते थे। इसका बिगड़ा रूप तामा है जो अब तामेश्वरनाथ धाम नाम से प्रचलित है। लोगों का मानना है मंदिर निर्माण से पूर्व शिव लिंग ऊपर उठ गया था और ऐसा शिव लिंग किसी भी स्थान पर नहीं मिलता। मंदिर के ठीक पूरब ईटों से बना एक विशाल पोखरा है। यहीं से जल लेकर लोग जलाभिषेक करते है। इस पोखरे में लाखो रंगबिरंगी मछलिया हैं,श्राद्धालु जलाभिषेक के बाद इन मछलियों को लईया(मूढ़ी) देना नही भूलते। लईया की सैकड़ों दुकानें यहाँ सजी रहती हैं। तालाब में लईया डालते समय मछलियों का कल्लोल दर्शनीय है,मनभावन होता है। बड़ा आनंद आता है। उसी समय एक विशालकाय कच्छप महाराज भी आहार पाने हेतु उस जलाशय में प्रगट होते हैं। यहाँ के पुजारी श्री के अनुसार कच्छप महाराज कितने काल से इस जलाशय में विराजमान हैं,,कोई नही जानता। बताया जाता है कि प्रसिद्ध संत देवरहवा बाबा को यहीं से प्रेरणा प्राप्त हुई थी। शिवलिंग के बारे में किवदंती ताम्रवर्ण के शिवलिंग तामेश्वरनाथ के बारे में किवदंती है कि साढ़े तीन सौ साल पहले खलीलाबाद से 8 किमी दक्षिण एक वृद्धा ब्राह्मणी को मायके पैदल जाते समय,खेत में कुछ उभरे तामई वर्ण के शिवलिंग का पहले साक्षात्कार हुआ। इसकी जानकारी जब अन्य लोगों को हुई तो उत्सुकता वश उसे खोद कर निकालना चाहा पर उसकी जड़ नहीं पा सके। इस अचानक निकले शिवलिंग की चर्चा औरंगजेब के कारकून खलीलुर्रहमान (नवाब) तक पहुंची तो उसने मजदूर लगवाकर उसे खेत से निकाल कर अन्यत्र ले जाने का प्रयास किया। पूरे दिन खुदाई करने के बाद भी रात में फिर मंदिर जस का तस हो जाता था। यह क्रम महीनों चलता रहा जिससे क्षुब्ध होकर नवाब ने मूर्ति ही निकालनी चाही तो शिव लिंग के पास भारी संख्या में बिच्छू,सर्प व मधुमक्खियां निकलने लगी और कई लोगों की जाने गयीं। घबड़ाकर उसने काम बंद करवा दिया। मजबूर होकर नवाब को फैसला वापस लेना पड़ा। अंत में हिंदू मान्यता का समादर करते हुए वहीं मंदिर बनाकर छत लगाना पड़ा। तब से इस स्थान का महात्म्य बढ़ गया। बाद में ज्यो ज्यो लोगों की मनौतियां पूरी होती गई आस्था बढ़ती गई। तामेश्वरनाथ मंदिर में पूजा पाठ तामेश्वरनाथ मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं का यही कहना है कि यहां मनौती करने वालों की सारी मनोकामनाएं यहां दर्शन और जलाभिषेक करने से पूर्ण हो जाती हैं। तामेश्वरनाथ मे वैसे तो हर सोमवार को लोग आकर जलाभिषेक करते है और मेला जैसा दृश्य रहता है। लेकिन वर्ष में तीन बार यहां विशाल मेला लगता है जिसमें ज़िले ही नहीं पूरे पूर्वांचल के लोग जुटकर जलाभिषेक करते है। इस स्थान पर अनेक संतों और महात्माओं ने अनुष्ठान एवं सत्संग के आयोजन किए है। पर इस क्षेत्र के लोग जो देश विदेश में कार्यरत हैं,वे भी घर आने पर भगवान शिव का अभिषेक एवं पूजा पाठ कराते हैं। लोगों के अनुसार यहां अंगे्रजों के जमाने में अचानक काशी से एक फक्कड़ बाबा पहुंचे। उनका मन यहां रम गया। उनके पास जो भी अपना दुख दर्द लेकर पहुंचता था तो वे कहते बाबा को जल चढ़ाओ, बाबा से मांगो,पर स्वयं से मांगने पर गाली देते थे। शिवरात्रि पर सुदूर प्रांतों से भी लोग यहां दर्शन पूजा के लिए आते हैं। स्वामी करपात्रीजी,जगद्गुरु शंकराचार्य अभिनव विद्यार्थी जी महाराज,महर्षि देवरहवा बाबा आदि महापुरुषों ने इस मंदिर पर आकर पूजा अर्चना की है। श्रावण मास के शुभारम्भ से पूर्व ही मेले जैसा दृश्य रहता है। श्रावण मास में जलाभिषेक के लिए दूर-दराज से श्रद्धालु उमड़े रहते है। कावंरियों व शिव भक्तों के जमावड़े से धाम गुलज़ार रहती है। सोमवार को यह दृश्य देखते ही बनता जब जयकारे से पूरा वातावरण गुंजायमान होता रहता है। तेरस पर्व के अवसर पर भारी तादाद में श्रद्धालु लोग दूर -दराज से यहां पहुंचते है। तामेश्वरनाथ धाम में शिवरात्रि पर्व पर मेले हर साल दस दिनों तक चलता है। ऐतिहासिक शिवमंदिर तामेश्वरनाथ को पर्यटन स्थल घोषित किया जा चुका है। नमः सर्वहितार्थाय जगदाधारहेतवे। साष्टाङ्गोऽयं प्रणामस्ते प्रयत्नेन मया कृतः।। पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसम्भवः। त्राहि मां पार्वतीनाथ सर्वपापहरो भव।। ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीनर्मदेश्वरसाम्बसदाशिवाय नमः प्रार्थनापूर्वक नमस्कारान् समर्पयामि ॐ पार्वतीपतये नमः ॐ नमः शिवाय जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,,जयति पुण्य भूमि भारत,,, ॐ नमः शिवाय, समस्त चराचर प्राणियोँ का कल्याण करो प्रभु ! कष्ट हरो,,काल हरो,, दुःख हरो,,दारिद्रय हरो,, हर,,हर,,महादेव,, जयमहाकाल,,,

विजय कृष्ण पांडेय

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किस प्रकार धर्मराज युधिष्ठिर के कारण


किस प्रकार धर्मराज युधिष्ठिर के कारण चारो पांडव पुनर्जीवित हो उठे? यक्ष युधिष्ठिर संवाद – यक्ष प्रश्न यक्ष युधिष्ठिर संवाद महाभारत के वन पर्व का एक बहुत ही रोचक प्रसंग है। युधिष्ठिर की वाक्चातुर्य और प्रतिउत्पन्न मति के कारण उनके चारो भाई पुनर्जीवित हो उठे। यक्ष के प्रश्न का उत्तर नहीं दिए जाने के कारण यक्ष ने उनलोगों को मार दिया था। यक्ष प्रश्न इतना जटिल था की आज भी किसी जटिल प्रश्न को लोग यक्ष प्रश्न की संज्ञा दे देते हैं। युधिष्ठिर संवाद” पांडवों के 12 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञात वास हुआ था। अपने वनवास की अवधी वो पूरा कर चुके थे अब उन्हें १ वर्ष के अज्ञात वास की चिंता सता रही थी। इस बारे में वो कृष्ण से विचार विमर्श कर रहे थे, तभी रोते हुए एक ब्राम्हण उनके पास आया। रोने का कारण पूछने पर उसने कहा वीर पुत्रों – मेरे कुटिया के बाहर अरणी की लकड़ी टंगी थी। एक हिरण आया और उस लकड़ी से अपने सिर में खुजली करने लगा। ऐसा करते हुए लकड़ी उसके सींग में फँस गयी जिससे घबड़ाकर ओ जंगल की ओर भाग गया। अरणी के लकड़ी के विना मैं आग कैसे उत्पन्न करूँगा और विना आग के मैं अपने दैनिक होम आदि कैसे कर पाउँगा। ब्राम्हण की दीन पुकार सुनकर युधिष्ठिर सहित पांचो पांडव उस हिरण की खोज में निकल पड़े। तेजी से भागते हिरण का पीछा करते हुए वो दूर घने जंगल में जा पहुंचे। थकानजनित प्यास से बुरा हाल था हिरण के नहीं मिलने से लज्जित होकर वो एक बरदग की पेड़ की छाव में बैठकर विश्राम करने लगे और नकुल से जल लाने को कहा। प्यासे नकुल भाइयो की आज्ञा से जल की तलाश में निकले। कुछ दूर जाने पर उन्हें एक सरोवर दिखा। सरोवर बहुत ही मनोरम था उसके सुन्दर और स्वच्छ जल थे। प्यास से परेशान नकुल शीघ्रता से सरोवर की और बढे। तभी उन्हें एक आवाज सुनाई दी। माद्री पुत्र ये सरोवर मेरे द्वारा रक्षित है पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो फिर जल पियो। तृष्णा से क्षिप्त नकुल ने उस ध्वनि को अनसुनी कर के सरोवर से जल पी लिया। जल पीते ही ओ प्राणहीन होकर सरोवर तट पर गिर गए। बहुत देर प्रतीक्षा करने के बाद युधिष्ठिर ने सहदेव को नकुल की सुध लेने के लिए भेजा। उस अदृश्य पुरुष ने सहदेव को भी वैसे ही आवाज देकर पहले प्रश्नों के उत्तर देने के लिए रोका। सहदेव ने भी उस पुरुष के बात की अनदेखी के और जल पीकर प्राणहीन होकर गिर पड़े। सहदेव के नहीं आने पर अर्जुन और भीम को एक एक कर भेजा। ये दोनों भाई भी नकुल और सहदेव की भाति प्रश्न की अनसुनी कर के मृतवत सरोवर तट पर पर गए। बहुत देर की प्रतीक्षा के बाद युधिष्ठिर अपने भाइयों की खोज में निकल पड़े। कुछ दूर जाने के पश्चात उन्होंने सरोवर तट पर अपने चारों भाइयों को मृत देखा। युधिष्ठिर से भी उस अदृश्य पुरुष ने कहा पहले मेरे प्रश्न के उत्तर दो फिर जल पियो। युधिष्ठिर ने पूछा की तुम कौन हो इस तरह मेरे भाइयों को क्यों मार दिए हो। उस पुरुष ने उत्तर दिया- मैं यक्ष हूँ मेरे प्रश्न की अवहेलना करने के कारण तुम्हारे भाई मृत्यु को प्राप्त हुए हैं। तुम मेरे प्रश्न का उत्तर दो तो मैं तुम्हारे किसी एक भाई को जीवित कर सकता हूँ। युधिष्ठिर की स्वीकारोक्ति पर यक्ष ने प्रश्न पूछना आरम्भ किया। यक्ष उवाच (“बोला”) – मनुष्य का सच्चा मित्र कौन है कौन मनुष्य का साथ देता है? युधिष्ठिर उवाच (“बोले”) – धैर्य ही मनुष्य का सच्चा साथी है। यक्ष उवाच (“बोला”) – यश लाभ करने का सरल उपाय क्या है ? युधिष्ठिर उवाच (“बोले”) – दान करने से यश लाभ होता है। यक्ष उवाच (“बोला”) – हवा से तेज गति किसकी है ? युधिष्ठिर उवाच (“बोले”) – मन की गति सबसे तेज है। यक्ष उवाच (“बोला”) – विदेश जाने वाले का साथी कौन ? युधिष्ठिर उवाच (“बोले”) – सुविद्या ही विदेश में साथी है। यक्ष उवाच (“बोला”) – किस चीज का त्याग कर देने से मनुष्य प्रिय हो जाता है ? युधिष्ठिर उवाच (“बोले”) – अहंकार का त्याग कर देने से आदमी प्रिय हो जाता है। यक्ष उवाच (“बोला”) – किस चीज़ के नष्ट जानें पर दुःख नहीं होता ? युधिष्ठिर उवाच (“बोले”) – क्रोध यक्ष उवाच (“बोला”) – किस चीज़ को त्याग कर मनुष्य धनी बन सकता है ? युधिष्ठिर उवाच (“बोले”) – लोभ यक्ष उवाच (“बोला”) – सर्वोत्तम लाभ क्या है ? युधिष्ठिर उवाच (“बोले”) – आरोग्य , स्वस्थ शरीर यक्ष उवाच (“बोला”) – धर्म से बढ़कर संसार में और क्या है ? युधिष्ठिर उवाच (“बोले”) – दया यक्ष उवाच (“बोला”) संसार में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ? युधिष्ठिर उवाच (“बोले”) -नित्य प्रति दिन लोग मरते है और जमलोक को जाते है, इसके बावजूद को अपने को यही रहने वाला अमरनशील मान लेता है इससे बड़ा कोई आश्चर्य नहीं है। यक्ष उवाच (“बोला”) – सही मार्ग क्या है युधिष्ठिर उवाच (“बोले”) – तर्क वितर्क का अंत नहीं है शास्त्र पुराण इतने है जिनका पार पाना सम्भव नहीं है। अतः महापुरुष लोग जिस रास्ते पर जाते है वही सही मार्ग है। यक्ष उवाच (“बोला”) – वार्ता क्या है बातचीत किसे कहते हैं ? युधिष्ठिर उवाच (“बोले”) – इस महान मोह रूपी कटाह में सूर्य की अग्नि, दिन रात रूपी ईंधन से , महीनों और ऋतुओं के कलछी से काल जीवों को पकता है। यही वार्ता है। यक्ष उवाच (“बोला”) – कौन दिन रात प्रसन्न रहता है ? युधिष्ठिर उवाच (“बोले”) -दिन के पांचवे या छठे पहर में जो यथा उपलब्ध साग पका के खता है, जिसपर कोई कर्ज नहीं है और जो प्रवास में नहीं जी रहा ऐसा मनुष्य दिन रात खुश रहता है। इसप्रकार युधिष्ठिर की बात सुनकर यक्ष बहुत प्रसन्न हुआ। अपने वादे के अनुसार मैं तुम्हारे किस एक भाई को जीवित कर सकता हूँ। बोलो किसको जीवित देखना चाहोगे। कुछ सोचने के बाद युधिष्ठिर ने उत्तर दिया मैं अपने छोटे भाई नकुल को जीवित देखना चाहता हूँ। युधिष्ठिर की बात सुनकर यक्ष ने आश्चर्य प्रकट किया। तुम अर्जुन भीम इन दो वीर भाइयों में से किसी का जीवन क्यों नहीं मांगते। इसपर यधिष्ठिर ने उत्तर दिया हम कुंती और माद्री इन दो माताओं से पांच भाई थे। जिसमे कुंती का एक पुत्र मई जीवित हूँ। मई चाहता हूँ माँ माद्री का भी एक पुत्र जीवित हो जाए। युधिष्ठिर की इस बात को सुनकर यक्ष द्रवित हो गया। यक्ष ने कहा वत्स तुमने मुझे जीत लिया। मैं नकुल सहित तुम्हारे शेष तीन भाइयों को भी जीवित कर देता हूँ। इस प्रकार धर्मराज युधिष्ठिर के कारण चारो पांडव पुनर्जीवित हो उठे।

संजय गुप्ता

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यह_कहानी_नहीं_सच_है


#यह_कहानी_नहीं_सच_है .. वह थीं गोरी चिट्टी,खूबसूरत खत्री हिन्दू, एमबीबीएस,एमएस, #डॉक्टर, महिला रोग विभाग की विभागाध्यक्ष, इतना बड़ा पद और आयु बमुश्किल 30 वर्ष,अविवाहित !! डॉक्टर साहिबा अपनी स्वास्थ्य विभाग की कार से अस्पताल आती-जाती थी ! कार के ड्राइवर महबूब मियां उम्र 25-26 साल,पढ़ाई आठवी पास ,दरमियाना कद,रंग गेहुआ,अच्छा गठा शरीर !! पहले तो ड्राइवर,ड्राइवर की औकात में ही रहा,मगर धीरे- धीरे उसने लगभग नामुमकिन से काम यानी डॉक्टरनी साहिबा पर जेहाद ए मोहब्बत का दांव खेलना शुरू किया ! वर्दी उतर गई,शानदार लिवास में महबूब मियां रहने लगे,डॉक्टरनी की घरेलु मदद भी होने लगी ,डॉक्टरनी को बताया कि हम भी राजपूत हिंदु थे सिर्फ एक पीढ़ी पहले तक !! मगर ‘लोगों’ ने इतना सताया कि वालिद को इस्लाम कुबूल करना पड़ा,हालाँकि दिल से अभी तक हिंदु ही हैं .. बात आगे बढ़ी, इत्तेहाद,हिंदु-मुस्लिम एकता और खून के एक ही रंग की बाते भी महबूब मियां ने शुरू कीं ! शेरो-शायरी भी शुरू हुई, डॉक्टरनी को लगने लगा कि बेशक ड्राइवर है,सिर्फ आठ तक पढ़ा है,गरीब है मगर है ज़हीन और भरोसे लायक ! डॉक्टरनी खुलने लगीं , महबूब ने एक दिन बग़ैर डरे प्रेम निवेदन किया – डॉक्टरनी ने शायद कमज़ोर क्षणों में हाँ कर दी ! सम्बन्ध बने और गोपनीयता की दीवार के पीछे एक ऊंचाइयों तक पहुँच गए ! हिंदु-मुस्लिम की दीवार डॉक्टरनी ने तोड़ दी ! लेकिन महबूब का मकसद सिर्फ यहीं तक महदूद नहीं था ! सिर्फ 15 दिन में, खूबसूरत, MBBS, MS, खत्री हिंदु सरकारी डॉक्टर अपने परिवार के भरसक विरोध के वाबजूद ,कुछ ‘कमज़ोर क्षणों’ की बदौलत एक लफंगे मुस्लिम ड्राइवर के साथ निकाह करने के लिए मजबूर हो गई ! बुरका आया,नाम बदला !! मगर दोस्त, यह सच्चा किस्सा अभी भी खत्म नहीं हुआ ! डॉक्टरनी 5 साल में 3 मुस्लिम नामधारी बच्चों की माँ बन गईं ,ड्राइवर साहेब कभी -कभी तनखाह लेने अस्पताल जाते थे ! डॉक्टरनी ने बदनामी के चलते दूसरे शहर ट्रांसफर कराया ! मगर ड्राइवर ने लखनऊ से भागदौड़ और राजनीतिक संपर्कों के चलते पुनः डॉक्टरनी को वापस बुला लिया ! डॉक्टरनी ने सरकारी नौकरी के वाबजूद शहर के सबसे समृद्ध इलाके में अस्पताल खोल दिया ,और अस्पताल के मालिक बने महबूब मियां ड्राइवर ! ड्राइवर साहेब ,आज एक राजनीतिक दल के स्थानीय सर्वेसर्वा हैं,लखनऊ तक हनक है , लक्सरी गाड़ियों का काफिला है महबूब ‘ड्राइवर’ के पास ! महबूब मियां कई मज़हबी इदारों के मुतवल्ली हैं ! डॉक्टरनी सरकारी नौकरी छोड़ चुकी हैं और बुरका और हिजाब उनकी मज़हबी पहचान बन चुके हैं ! और आज भी महबूब मियां को पाल रही हैं, डॉक्टरनी की संपूर्ण अकूत संपत्ति ,महबूब मियां के नाम से है ! एक हिंदु औरत की आत्मा को मरे हुए 30 बरस हो चुके हैं !!

संजय द्विवेदी

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एक चूहा एक व्यापारी के घर में बिल बना कर रहता था


*एक चूहा एक व्यापारी के घर में बिल बना कर रहता था.* *एक दिन चूहे ने देखा कि उस व्यापारी ने और उसकी पत्नी एक थैले से कुछ निकाल रहे हैं. चूहे ने सोचा कि शायद कुछ खाने का सामान है.* *उत्सुकतावश देखने पर उसने पाया कि वो एक चूहेदानी थी. ख़तरा* *भाँपने पर उस ने पिछवाड़े में जा कर कबूतर को यह बात बताई कि घर में चूहेदानी आ गयी है.* *कबूतर ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि मुझे क्या?* *मुझे कौनसा उस में फँसना है?* *निराश चूहा ये बात मुर्गे को बताने गया.* *मुर्गे ने खिल्ली उड़ाते हुए कहा… जा भाई..ये मेरी समस्या नहीं है.* *हताश चूहे ने बाड़े में जा कर बकरे को ये बात बताई… और बकरा हँसते हँसते लोटपोट होने लगा।* *उसी रात चूहेदानी में खटाक की आवाज़ हुई जिस में एक ज़हरीला साँप फँस गया था.* *अँधेरे में उसकी पूँछ को चूहा समझ कर उस व्यापारी की पत्नी ने उसे निकाला और साँप ने उसे डंस लिया.* *तबीयत बिगड़ने पर उस व्यक्ति ने वैद्य को बुलवाया. वैद्य ने उसे कबूतर का सूप पिलाने की सलाह दी.* *कबूतर अब पतीले में उबल रहा था ।* *खबर सुनकर उस व्यापारी के कई रिश्तेदार मिलने आ पहुँचे जिनके भोजन प्रबंध हेतु अगले दिन मुर्गे को काटा गया.* *कुछ दिनों बाद उस व्यापारी की पत्नी सही हो गयी…* *तो खुशी में उस व्यक्ति ने कुछ अपने शुभचिंतकों के लिए एक दावत रखी तो बकरे को काटा गया..* *चूहा दूर जा चुका था…बहुत दूर ……….* *अगली बार कोई आप को अपनी समस्या बातये और आप को लगे कि ये मेरी समस्या नहीं है तो रुकिए और दुबारा सोचिये….* *समाज का एक अंग, एक तबका, एक नागरिक खतरे में है तो पूरा देश खतरे में है…* *अपने-अपने दायरे से बाहर निकलिये.* *स्वयंम तक सीमित मत रहिये. .* *समाजिक बनिये…* *और राष्ट्र धर्म के लिए एक बनें..*

विष्णु अरोडाजी

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जिन घरों में हर रोज पूजा की जाती है


जिन घरों में हर रोज पूजा की जाती है, वहां का वातावरण सकारात्मक (Positive) और पवित्र रहता है। दरिद्रता दूर रहती है। दीपक और अगरबत्ती के धुएं से स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले सूक्ष्म कीटाणु भी मर जाते हैं। यहां जानिए कुछ. नियम जो कि घर के मंदिर में पूजा करते समय ध्यान रखना चाहिए… 1. सभी प्रकार की पूजा में चावल विशेष रूप से चढ़ाए जाते हैं। पूजन के लिए ऐसे चावल का उपयोग करना चाहिए जो अखंडित (पूरे चावल) हो यानी टूटे हुए ना हो। चावल चढ़ाने से पहले इन्हें हल्दी से पीला करना बहुत शुभ माना गया है। इसके लिए थोड़े से पानी में हल्दी घोल लें और उस घोल में चावल को डूबोकर पीला किया जा सकता है। 2. पूजन में पान का पत्ता भी रखना चाहिए। ध्यान रखें पान के पत्ते के साथ इलाइची, लौंग, गुलकंद आदि भी चढ़ाना चाहिए। पूरा बना हुआ पान चढ़ाएंगे तो श्रेष्ठ रहेगा। 3. पूजन कर्म में इस बात का विशेष ध्यान रखें कि पूजा के बीच में दीपक बुझना नहीं चाहिए। ऐसा होने पर पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो पाता है। 4. किसी भी भगवान के पूजन में उनका आवाहन (आमंत्रित करना) करना, ध्यान करना, आसन देना, स्नान करवाना, धूप-दीप जलाना, अक्षत (चावल), कुमकुम, चंदन, पुष्प (फूल), प्रसाद आदि अनिवार्य रूप से होना चाहिए। 5. देवी-देवताओं को हार-फूल, पत्तियां आदि अर्पित करने से पहले एक बार साफ पानी से अवश्य धो लेना चाहिए। 6. भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए पीले रंग का रेशमी कपड़ा चढ़ाना चाहिए। माता दुर्गा, सूर्यदेव व श्रीगणेश को प्रसन्न करने के लिए लाल रंग का, भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सफेद वस्त्र अर्पित करना चाहिए। 7. किसी भी प्रकार के पूजन में कुल देवता, कुल देवी, घर के वास्तु देवता, ग्राम देवता आदि का ध्यान करना भी आवश्यक है। इन सभी का पूजन भी करना चाहिए। 8. पूजन में हम जिस आसन पर बैठते हैं, उसे पैरों से इधर- उधर खिसकाना नहीं चाहिए। आसन को हाथों से ही खिसकाना चाहिए। 9. यदि आप प्रतिदिन घी का एक दीपक भी घर में जलाएंगे तो घर के कई वास्तु दोष भी दूर हो जाएंगे। 10. सूर्य, गणेश, दुर्गा, शिव और विष्णु, ये पंचदेव कहलाते हैं, इनकी पूजा सभी कार्यों में अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। प्रतिदिन पूजन करते समय इन पंचदेव का ध्यान करना चाहिए। इससे लक्ष्मी कृपा और समृद्धि प्राप्त होती है। 11. घी के दीपक के लिए सफेद रुई की बत्ती उपयोग किया जाना चाहिए। जबकि तेल के दीपक के लिए लाल धागे की बत्ती श्रेष्ठ बताई गई है। 12. पूजन में कभी भी खंडित दीपक नहीं जलाना चाहिए। धार्मिक कार्यों में खंडित सामग्री शुभ नहीं मानी जाती है। 13. शिवजी को बिल्व पत्र अवश्य चढ़ाएं और किसी भी पूजा में मनोकामना की सफलता के लिए अपनी इच्छा के अनुसार भगवान को दक्षिणा अवश्य चढ़ानी चाहिए, दान करना चाहिए। दक्षिणा अर्पित करते समय अपने दोषों को छोड़ने का संकल्प लेना चाहिए। दोषों को जल्दी से जल्दी छोड़ने पर मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होंगी। 14. भगवान सूर्य की 7, श्रीगणेश की 3, विष्णुजी की 4 और शिवजी की 3 परिक्रमा करनी चाहिए। 15. भगवान शिव को हल्दी नहीं चढ़ाना चाहिए और न ही शंख से जल चढ़ाना चाहिए।पूजन स्थल पर पवित्रता का ध्यान रखें। चप्पल पहनकर कोई मंदिर तक नहीं जाना चाहिए। चमड़े का बेल्ट या पर्स अपने पास रखकर पूजा न करें। पूजन स्थल पर कचरा इत्यादि न जमा हो पाए।

विक्रम प्रकाश रासनोई

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सूर्य की कृपा पाने के लिए रविवार को करें |


सूर्य की कृपा पाने के लिए रविवार को करें | यदि आप भी सूर्य से शुभ फल पाना चाहते हैं तो यहां बताए जा रहे उपाय रविवार को कर सकते हैं… 1. सुबह स्नान के बाद भगवान सूर्य को जल अर्पित करें। इसके लिएl तांबे के लोटे में जल भरे, इसमें चावल, फूल डालकर सूर्य को अर्घ्य दें। 2. जल अर्पित करने के बाद सूर्य मंत्र स्तुति अोर गायत्री का पाठ करें। इस पाठ के साथ शक्ति, बुद्धि, स्वास्थ्य और सम्मान की कामना से करें। 3. इस प्रकार सूर्य की आराधना करने के बाद धूप, दीप से सूर्य देव का पूजन करें। 4. सूर्य से संबंधित चीजें जैसे तांबे का बर्तन, पीले या लाल वस्त्र, गेहूं, गुड़, माणिक्य, लाल चंदन आदि का दान करें। अपनी श्रद्धानुसार इन चीजों में से किसी भी चीज का दान किया जा सकता है। 5. सूर्य के निमित्त व्रत करें। एक समय फलाहार करें और सूर्यदेव का पूजन करें। . .

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वीर सावरकर कौन थे


*वीर सावरकर कौन थे..?* जिन्हें आज कांग्रेसी और वामपंथी कोस रहे हैं और क्यों..?? ये 25 बातें पढ़कर आपका सीना गर्व से चौड़ा हो उठेगा। इसको पढ़े बिना आज़ादी का ज्ञान अधूरा है! आइए जानते हैं एक ऐसे महान क्रांतिकारी के बारे में जिनका नाम इतिहास के पन्नों से मिटा दिया गया। जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के द्वारा इतनी यातनाएं झेलीं की उसके बारे में कल्पना करके ही इस देश के करोड़ों भारत माँ के कायर पुत्रों में सिहरन पैदा हो जायेगी। जिनका नाम लेने मात्र से आज भी हमारे देश के राजनेता भयभीत होते हैं क्योंकि उन्होंने माँ भारती की निस्वार्थ सेवा की थी। वो थे हमारे परमवीर सावरकर। 1. वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी देशभक्त थे जिन्होंने 1901 में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया की मृत्यु पर नासिक में शोक सभा का विरोध किया और कहा कि वो हमारे शत्रु देश की रानी थी, हम शोक क्यूँ करें? क्या किसी भारतीय महापुरुष के निधन पर ब्रिटेन में शोक सभा हुई है.? 2. वीर सावरकर पहले देशभक्त थे जिन्होंने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह का उत्सव मनाने वालों को त्र्यम्बकेश्वर में बड़े बड़े पोस्टर लगाकर कहा था कि गुलामी का उत्सव मत मनाओ..! 3. विदेशी वस्त्रों की पहली होली पूना में 7 अक्तूबर 1905 को वीर सावरकर ने जलाई थी…! 4. वीर सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने विदेशी वस्त्रों का दहन किया, तब बाल गंगाधर तिलक ने अपने पत्र केसरी में उनको शिवाजी के समान बताकर उनकी प्रशंसा की थी *जबकि इस घटना की दक्षिण अफ्रीका के अपने पत्र ‘इन्डियन ओपीनियन’ में गाँधी ने निंदा की थी…!* *5. सावरकर द्वारा विदेशी वस्त्र दहन की इस प्रथम घटना के 16 वर्ष बाद गाँधी उनके मार्ग पर चले और 11 जुलाई 1921 को मुंबई के परेल में विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया…!* 6. सावरकर पहले भारतीय थे जिनको 1905 में विदेशी वस्त्र दहन के कारण पुणे के फर्म्युसन कॉलेज से निकाल दिया गया और दस रूपये जुरमाना किया… इसके विरोध में हड़ताल हुई… स्वयं तिलक जी ने ‘केसरी’ पत्र में सावरकर के पक्ष में सम्पादकीय लिखा…! 7. वीर सावरकर ऐसे पहले बैरिस्टर थे जिन्होंने 1909 में ब्रिटेन में ग्रेज-इन परीक्षा पास करने के बाद *ब्रिटेन के राजा के प्रति वफ़ादार होने की शपथ नहीं ली…* इस कारण उन्हें *बैरिस्टर होने की उपाधि का पत्र कभी नहीं दिया गया…!* 8. वीर सावरकर पहले ऐसे लेखक थे जिन्होंने अंग्रेजों द्वारा ग़दर कहे जाने वाले संघर्ष को ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ नामक ग्रन्थ लिखकर सिद्ध कर दिया…! 9. सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी लेखक थे जिनके लिखे ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ पुस्तक पर ब्रिटिश संसद ने प्रकाशित होने से पहले प्रतिबन्ध लगाया था…। 10. *‘1857 का स्वातंत्र्य समर’* विदेशों में छापा गया और भारत में भगत सिंह ने इसे छपवाया था जिसकी एक एक प्रति तीन-तीन सौ रूपये में बिकी थी…! भारतीय क्रांतिकारियों के लिए यह पवित्र गीता थी… पुलिस छापों में देशभक्तों के घरों में यही पुस्तक मिलती थी…! 11. वीर सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जो समुद्री जहाज में बंदी बनाकर ब्रिटेन से भारत लाते समय आठ जुलाई 1910 को समुद्र में कूद पड़े थे और तैरकर फ्रांस पहुँच गए थे…! 12. सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जिनका मुकद्दमा अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में चला, मगर ब्रिटेन और फ्रांस की मिलीभगत के कारण उनको न्याय नहीं मिला और बंदी बनाकर भारत लाया गया…! 13. वीर सावरकर विश्व के पहले क्रांतिकारी और भारत के पहले राष्ट्रभक्त थे जिन्हें अंग्रेजी सरकार ने दो आजन्म कारावास की सजा सुनाई थी…! 14. सावरकर पहले ऐसे देशभक्त थे जो दो जन्म कारावास की सजा सुनते ही हंसकर बोले – *“चलो, ईसाई सत्ता ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत को मान लिया”…!* 15. वीर सावरकर पहले राजनैतिक बंदी थे जिन्होंने काला पानी की सज़ा के समय 10 साल से भी अधिक समय तक आज़ादी के लिए कोल्हू चलाकर 30 पोंड तेल प्रतिदिन निकाला…! 16. वीर सावरकर काला पानी में पहले ऐसे कैदी थे जिन्होंने काल कोठरी की दीवारों पर कंकर कोयले से कवितायें लिखीं और 6000 पंक्तियाँ याद रखी..! 17. वीर सावरकर पहले देशभक्त लेखक थे, जिनकी लिखी हुई पुस्तकों पर आज़ादी के बाद कई वर्षों तक प्रतिबन्ध लगा रहा…! 18. वीर सावरकर पहले विद्वान लेखक थे जिन्होंने हिन्दू को परिभाषित करते हुए लिखा कि : *‘आसिन्धु सिन्धुपर्यन्ता यस्य भारत भूमिका,* *पितृभू: पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरितीस्मृतः।* अर्थात समुद्र से हिमालय तक भारत भूमि जिसकी पितृभूमि है, जिसके पूर्वज यहीं पैदा हुए हैं व यही पुण्य भूमि है, जिसके तीर्थ भारत भूमि में ही हैं, वही हिन्दू है..! *19.वीर सावरकर प्रथम राष्ट्रभक्त थे जिन्हें अंग्रेजी सत्ता ने 30 वर्षों तक जेलों में रखा तथा आजादी के बाद 1948 में नेहरु सरकार ने गाँधी हत्या की आड़ में लाल किले में बंद रखा पर न्यायालय द्वारा आरोप झूठे पाए जाने के बाद ससम्मान रिहा कर दिया… देशी-विदेशी दोनों सरकारों को उनके राष्ट्रवादी विचारों से डर लगता था…। 20. वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी थे जब उनका 26 फरवरी 1966 को उनका स्वर्गारोहण हुआ तब भारतीय संसद में कुछ सांसदों ने शोक प्रस्ताव रखा तो यह कहकर रोक दिया गया कि वे संसद सदस्य नही थे जबकि चर्चिल की मौत पर शोक मनाया गया था…। 21. वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी राष्ट्रभक्त स्वातंत्र्य वीर थे जिनके मरणोपरांत 26 फरवरी 2003 को उसी संसद में मूर्ति लगी जिसमे कभी उनके निधन पर शोक प्रस्ताव भी रोका गया था…। 22. वीर सावरकर ऐसे पहले राष्ट्रवादी विचारक थे जिनके चित्र को संसद भवन में लगाने से रोकने के लिए कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा लेकिन राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने सुझाव पत्र नकार दिया और वीर सावरकर के चित्र अनावरण राष्ट्रपति ने अपने कर-कमलों से किया…। 23. वीर सावरकर पहले ऐसे राष्ट्रभक्त हुए जिनके शिलालेख को अंडमान द्वीप की सेल्युलर जेल के कीर्ति स्तम्भ से UPA सरकार के मंत्री मणिशंकर अय्यर ने हटवा दिया था और उसकी जगह गांधी का शिलालेख लगवा दिया..। 24. वीर सावरकर ने दस साल आजादी के लिए काला पानी में कोल्हू चलाया था जबकि गाँधी ने काला पानी की उस जेल में कभी दस मिनट चरखा नही चलाया..? 25. वीर सावरकर माँ भारती के पहले सपूत थे जिन्हें जीते जी और मरने के बाद भी आगे बढ़ने से रोका गया… पर आश्चर्य की बात यह है कि इन सभी विरोधियों के घोर अँधेरे को चीरकर आज वीर सावरकर सभी मे लोकप्रिय और युवाओं के आदर्श बन रहे है।। वन्दे मातरम्॥

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1947 में मदरसों की संख्या


1947 में मदरसों की संख्या 300 1988 में 2800 2002 में 8800 आज 2017 में मदरसों की संख्या लगभग 35000…. और भारतीय सविधान के अनुसार हर मदरसे में कुरान पढ़ाना अनिवार्य है और इसी दोगले संविधान के अनुसार हिंदू स्कूलों में गीता पढ़ाना कानूनन अपराध है जय हो नेहरु-गांधी सेकुलरवाद की……!!

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जैसी_करनी_बैसी_भरनी


‘ #जैसी_करनी_बैसी_भरनी…. पोते की मालिश करते हुए दादी की नज़र उसके खाली गले पर पड़ी तो वह गुस्से से चीख़ पड़ी, ‘‘बहू, ओ बहू….कहाँ मर गई….. अरे…मुन्ने के गले की चेन कहाँ गई?’’ आँगन में पड़े ढेर सारे जूठे बर्तनों को साफ़ करती बहू के हाथ रुक गए। उसने जल्दी से नल खोलकर हाथ धोया और फिर दौड़ी हुई आई, ‘‘माँजी….. कल मुन्ने के हाथ में फँस कर चेन टूट गई थी….. इसके पापा से सुनार के यहाँ भेज कर बनवा दूँगी….।’’ ‘‘बड़ी आई बनवाने वाली…तेरी माँ से इतना भी नहीं हुआ कि कम से कम मुन्ने को तो कायदे की चीज़ देते….। अरे उन कँगलों ने तुझे कुछ नहीं दिया….. मेरे बेटे और मैंने तो अपने खोटे भाग्य पर संतोष कर लिया, पर यह मुन्ना….? बड़ा होकर यह भी उन भिखमंगों पर शर्मिन्दा होगा….। दे मुझे यह चेन…..इसे बेच कर मैं दूसरी बनवा दूँगी अपने मुन्ना राजा को।’’ बहू आँचल से खोलकर अपनी सास को चेन दे ही रही थी कि तभी दरवाजे़ जोर की दस्तक हुई। उसने जाकर दरवाजा खोला तो अवाक रह गई। सामने अपना सूटकेस लिए एकदम फटेहाल उसकी ननद खड़ी हुई थी। ननद ने भाभी को सामने देखा तो लिपट कर फफक पड़ी, ‘‘भाभी, माँ ने सचिन के जन्म पर जो सामान भेजा है, उसे खराब और सस्ता कहकर उन लोगों ने वापस कर दिया है और कहा है कि जबतक मैं बच्चे व उसके पापा के लिए सोने की मोटी चेन, घर के हर सदस्य के लिए पाँच जोड़ी कपड़े ,बच्चे का पालना आदि, सासू और ननद के लिए डायमण्ड की अगूँठी और इक्कीस टोकरी–फल अपनी माँ से लेकर न आऊँ, घर वापस न लौटूँ। भाभी, अब तुम्ही मेरा सहारा हो…. भैया से कहकर तुम्ही कुछ कर सकती हो….. मुझे मेरे बच्चे से अब तुम्ही मिला सकती हो….. माँ से तो कुछ होने से रहा अब..।’’ ननद को वह सांत्वना दे ही रही थी कि तभी सासू माँ एकदम फट पड़ी,’’ हरामजा़दे…लड़के वाले है या लुटेरे…. अरे, यहाँ कोई खजाना गड़ा है जो उन्हें लुटा दें…. जितनी हैसियत होगी, आदमी उतना ही तो करेगा…। देखती हूँ तुझे वापस कैसे नहीं बुलाते…. दहेज उत्पीड़न में फँसा न दिया तो मैं तेरी माँ नहीं…।’’ ननद को अंदर कमरे की तरफ ले जाते हुए वह सोच रही थी कि अपनी बेटी पर बात आई तो एक माँ के चेहरे पर चढ़ा सास का यह मुखौटा कितनी जल्दी उतर गया।

इंदु सोनी