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एक महिला रोज मंदिर जाती थी


एक महिला रोज मंदिर जाती थी एक दिन उस महिला ने पुजारी से कहा अब मैं मंदिर नही आया करूँगी इस पर पुजारी ने पूँछा क्यो ??? तब महिला बोली मैं देखती हूं लोग मंदिर परिसर मे अपने फोन से अपने व्यापार की बात करते है कुछ ने तो मंदिर को ही गपसप करने का स्थान चुन रखा है कुछ पूजा कम पाखंड ज्यादा करते है इस पर पुजारी कुछ देर तक चुप रहे फिर कहा सही हैं परंतु अपना अंतिम निर्णय लेने से पहले आप मेरे कहने से कुछ कर सकती है। महिला बोली -आप बताइए क्या करना है पुजारी ने कहा- एक गिलास पानी से भरकर लीजिए औऱ 2 बार मंदिर परिसर के अंदर परिक्रमा लगाइए शर्त ये है कि गिलास का पानी गिरना नही चाहिये। महिला बोली-मे ऐसा कर सकती हूँ फिर थोड़ी ही देर में उस महिला ने ऐसा कर दिखाया। उसके बाद मंदिर के पुजारी ने महिला से 3 सवाल पूछे :-1.क्या आपने किसी को फोन पर बात करते देखा 2.क्या आपने किसी को मंदिर मे गपसप करते देखा 3.क्या किसी को पाखंड करते देखा महिला बोली-नही मैंने कुछ भी नही देखा फिर पुजारी बोले- जब आप परिक्रमा लगा रही थी तो आपका पूरा ध्यान गिलास पर था कि इस मे से पानी न गिर जाए इसलिए आपको कुछ दिखाई नही दिया अब जब भी आप मंदिर आये तो सिर्फ अपना ध्यान परम पिता परमात्मा में ही लगाना फिर आपको कुछ दिखाई ही नही देगा सिर्फ भगवान ही सर्ववृत दिखाई देगा जब ऐसा होगा तो स्वयं ही कल्पना कर लीजियेगा।

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अहमस्मि रोमशा ऋग्वेद के प्रथम मंडल 126 में सूक्त के 7वें मंत्र की ऋषि रोमशा हैं।


अहमस्मि रोमशा ऋग्वेद के प्रथम मंडल 126 में सूक्त के 7वें मंत्र की ऋषि रोमशा हैं। इन्हें भी अपनी पहचान स्थापित करने के लिए आवाज बुलंद करनी पड़ी थी। भाष्यकार सायण ने इन्हें बृहस्पति की पुत्री तथा ब्रह्मवादिनी कहा है। सिंधु नदी के तट पर स्थित सिंधु देश में एक अत्यंत पराक्रमी एवं यशस्वी शासक उत्पन्न हुए, जिनका नाम था स्वनय भावयज्ञ। इनके पिता का नाम भव्य था। भावयव्य का विवाह गंधार देश की कन्या रोमशा के साथ हुआ था। राजा भावयव्य ने हजारों सोम यज्ञ में याजकों को प्रचुर मात्रा में दान देकर द्यूलोक तक अपनी कीर्ति का विस्तार किया। ऐसे दानशील राजा की प्रशंसा में ऋषि कक्षीवान् ने स्तोत्र की रचना की। इसी स्तोत्र के अंतर्गत सातवां मंत्र रोमशा के नाम से लिखित है। युवती होते हुए भी संभवतः रोमशा के शरीर में यौवन की पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं हुई थी। अतः भावयव्य उन्हें बालिका समझते हुए अभिगम योग्य अथवा गृहस्थ धर्म के पालन योग्य नहीं समझते थे। पति की उपेक्षा से व्यथित होकर रोमशा को अपनी अस्मिता को स्पष्ट करने के लिए स्त्रियोचित लज्जा और संकोच का परित्याग कर ऊंचे स्वर में प्रमाण के साथ अपनी योग्यता को सिद्ध करना पड़ा था। ऋग्वेद के इस मंत्र में अपने पति को संबोधित करते हुए रोमशा का उद्गार इस प्रकार व्यक्त हुआ- मेरे समीप आकर मुझ से परामर्श लो। मेरे कार्यों और विचारों को छोटा मत समझो। मैं अपरिपक्व बुद्धि वाली नहीं, अपितु गंधार देश की भेड़ के समान सर्वत्र रोम वाली अर्थात पूर्ण विकसित बुद्धि और परिपक्व विचारों वाली हूं। ब्रह्मवादिनी रोमशा ने अपने इसी एक मंत्र के द्वारा जीवन के गंभीर सत्य को रेखांकित किया। रोमशा का स्पष्ट कथन है कि मा मे दभ्राणि मन्यथा। मुझे छोटा मत समझना। अहमस्मि रोमशा। मैं रोमशा हूँ। यह वाक्य प्रत्येक स्त्रियों के आत्मविश्वास की सशक्त अभिव्यक्ति है

जगनन्द जा

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मेरी दवा की दुकान थी और उस दिन दुकान पर काफी भीड़ थी


मेरी दवा की दुकान थी और उस दिन दुकान पर काफी भीड़ थी मैं ग्राहको को दवाई दे रहा था.. दुकान से थोड़ी दूर पेड़ के नीचे वो बुजुर्ग औरत खड़ी थी मेरी निगाह दो तीन बार उस महिला पर पड़ी तो देखा उसकी निगाह मेरी दुकान की तरफ ही थी मैं ग्राहकों को दवाई देता रहा लेकिन मेरे मन में उस बुजुर्ग महिला के प्रति जिज्ञासा भी थी की वो वहां खड़े खड़े क्या देख रही है जब ग्राहक कुछ कम हुए तो मैंने दुकान का काउंटर दुकान में काम करने वाले लड़के के हवाले किया और उस महिला के पास गया मैंने पूछा..”क्या हुआ माता जी कुछ चाहिए आपको..मैं काफी देर से आपको यहां खड़े देख रहा हूं गर्मी भी काफी है इसलिए सोचा चलो मैं ही पूछ लेता हूं आपको क्या चाहिए..बुजुर्ग महिला इस सवाल पर कुछ सकपका सी गई फिर हिम्मत जुटा कर उसने पूछा…”बेटा काफी दिन हो गए मेरे दो बेटे हैं दोनो दूसरे शहर में रहते हैं हर बार गर्मी की छुट्टियों में बच्चों के साथ मिलने आ जाते हैं इस बार उन्होंने कहीं पहाड़ों पर छुट्टियां मनाने का निर्णय लिया है बेटा इसलिए इस बार वो हमारे पास नही आएंगे यह समाचार मुझे कल शाम को ही मिला..कल सारी रात ये बात सोच सोच कर परेशान रही.. एक मिनट भी सो नही सकी..आज सोचा था तुम्हारी दुकान से दवाई लूंगी लेकिन दुकान पर भीड़ देखकर यही खड़ी हो गई सोचा जब कोई नही होगा तब तुमसे दवा पूछूंगी.. “हां हां बताइये ना मां जी..कौन सी दवाई चाहिये आपको अभी ला देता हूं..आप बताइये.. “बेटा कोई बच्चों को भूलने की दवाई है क्या..?? अगर है तो ला दे बेटा..भगवान तुम्हारा भला करेगा.. इससे आगे के शब्द सुनने की मेरी हिम्मत ना थी मेरे कान सुन्न हो चूके थे मैं उसकी बातों का बिना कुछ जवाब दिये चुपचाप दुकान की तरफ लौट आया क्योंकि उस बुजुर्ग महिला की दवा उसके बेटों के पास थी जो शायद विश्व के किसी मैडिकल स्टोर पर नही मिलेगी..अब मैं काउंटर के पीछे खड़ा था..मन में विचारों की आंधी चल रही थी लेकिन मैं उस पेड़ के नीचे खड़ी उस मां से नजरें भी नही मिला पा रहा था..मेरी भरी दुकान भी उस महिला के लिए खाली थी..मै कितना असहाय था..या तो ये मैं जानता था या मेरा भगवान..

विजय खट्टर

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ભગવાને એક ગધેડાનું સર્જન કર્યું અને એને કહ્યું


ભગવાને એક ગધેડાનું સર્જન કર્યું અને એને કહ્યું, “તું ગધેડા તરીકે ઓળખાશે, તું સૂર્યોદય થી લઈને સુર્યાસ્ત સુધી થાક્યા વગર તારી પીઠ પર બોજો ઉઠાવવાનું કામ કરશે, તું ઘાસ ખાશે, તને બુદ્ધિ નહિ હોય અને તું ૫૦ વર્ષ સુધી જીવશે.” ગધેડો બોલ્યો, “હું ગધેડો થયો એ બરાબર છે પણ ૫૦ વર્ષ નું આયુષ્ય ઘણું બધું કહેવાય, મને ૨૦ વર્ષ નું આયુષ્ય આપો.” ઈશ્વરે એની અરજ મંજુર કરી. ભગવાને કુતરાનું સર્જન કર્યું, એને કહ્યું “તું કુતરો કહેવાશે, તું મનુષ્યોના ઘરોની ચોકીદારી કરશે, તું મનુષ્ય નો પરમ મિત્ર હશે, તું એને નાખેલા રોટલાના ટુકડા ખાશે, અને તું ૩૦ વર્ષ જીવીશ. કુતરાએ કહ્યું, “હે પ્રભુ ૩૦ વર્ષ નું આયુષ્ય તોઘનું કહેવાય ૧૫ વત્સ રાખો,” ભગવાને મંજુર કર્યું. ભગવાને વાંદરો બનાવ્યો અને કહ્યું, “તું વાંદરો કહેવાશે, તું એક ડાળી થી બીજી ડાળી પર જુદા જુદા કરતબ કરતો કુદાકુદ કરશે અને મનોરંજન પૂરું પાડશે, તું ૨૦ વર્ષ જીવીશ.” વાંદરો બોલ્યો “૨૦ વર્ષ તો ઘણા કહેવાય ૧૦ વર્ષ રાખો”. ભગવાને મંજુર કર્યું. છેલ્લે ભગવાને મનુષ્ય બનાવ્યો અને એને કહ્યું : “તું મનુષ્ય છે, પૃથ્વી પર તું એક માત્ર બુદ્ધિજીવી પ્રાણી હોય. તું તારી અક્કલ નાં ઉપયોગ વડે સર્વે પ્રાણીઓનો સ્વામી બનશે. તું વિશ્વને તારા તાબામાં ર્રાખીશ અને ૨૦ વર્ષ જીવીશ.” માણસ બોલ્યો : ” પ્રભુ, હું મનુષ્ય ખરો પણ ૨૦ વર્ષનું આયુષ્ય ઘણું ઓછું કહેવાય, મને ગધેડાએ નકારેલ ૩૦ વર્ષ, કુતરાએ નકારેલ ૧૫ વર્ષ અને વાંદરાએ નકારેલ ૧૦ પણ આપી દો.” ભગવાને મનુષ્ય ની ઈચ્છા સ્વીકારી લીધી. અને ત્યારથી, માણસ પોતે માણસ તરીકે ૨૦ વર્ષ જીવે છે, લગ્ન કરીને ૩૦ વર્ષ ગધેડો બનીને જીવે છે, પોતાની પીઠ પર બધો બોજો ઉપાડી સતત કામ કરતો રહે છે, બાળકો મોટા થાય એટલે ૧૫ વર્ષ કુતરા તરીકે ઘરની કાળજી રાખી જે મળે તે ખાઈ લે છે, અંતે જ્યારે વૃદ્ધ થાય ત્યારે નિવૃત્ત થઈને વાંદરા તરીકે ૧૦ વર્ષ સુધી આ પુત્રના ઘરથી પેલા પેલા પુત્રના ઘરે અથવા પુત્રીને ઘરે જઈને જુદા જુદા ખેલ કરીને પુત્રો અને પુત્રીઓને મનોરંજન પૂરું પાડે છે. 👌👌👌👌

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चूना जो आप पान में खाते है वो सत्तर बीमारी ठीक कर देते है.


चूना जो आप पान में खाते है वो सत्तर बीमारी ठीक कर देते है….! ” चूना अमृत है ” .. 🤔👌🏻👌🏻🤔👌🏻👌🏻🤔👌🏻👌🏻 * चूना एक टुकडा छोटे से मिट्टी के बर्तन मे डालकर पानी से भर दे , चूना गलकर नीचे और पानी ऊपर होगा ! वही एक चम्मच पानी किसी भी खाने की वस्तु के साथ लेना है ! 50 के उम्र के बाद कोई कैल्शियम की दवा शरीर मे जल्दी नही घुलती चूना तुरन्त घुल व पच जाता है … * जैसे किसी को पीलिया हो जाये माने जॉन्डिस उसकी सबसे अच्छी दवा है चूना ;गेहूँ के दाने के बराबर चूना गन्ने के रस में मिलाकर पिलाने से बहुत जल्दी पीलिया ठीक कर देता है । * ये ही चूना नपुंसकता की सबसे अच्छी दवा है -अगर किसी के शुक्राणु नही बनता उसको अगर गन्ने के रस के साथ चूना पिलाया जाये तो साल डेढ़ साल में भरपूर शुक्राणु बनने लगेंगे; और जिन माताओं के शरीर में अन्डे नही बनते उनकी बहुत अच्छी दवा है ये चूना । * बिद्यार्थीओ के लिए चूना बहुत अच्छा है जो लम्बाई बढाता है .. * गेहूँ के दाने के बराबर चूना रोज दही में मिला के खाना चाहिए, दही नही है तो दाल में मिला के खाओ, दाल नही है तो पानी में मिला के पियो – इससे लम्बाई बढने के साथ स्मरण शक्ति भी बहुत अच्छा होता है । * जिन बच्चों की बुद्धि कम काम करती है मतिमंद बच्चे उनकी सबसे अच्छी दवा है चूना ..जो बच्चे बुद्धि से कम है, दिमाग देर में काम करते है, देर में सोचते है हर चीज उनकी स्लो है उन सभी बच्चे को चूना खिलाने से अच्छे हो जायेंगे । * बहनों को अपने मासिक धर्म के समय अगर कुछ भी तकलीफ होती हो तो उसका सबसे अच्छी दवा है चूना । हमारे घर में जो माताएं है जिनकी उम्र पचास वर्ष हो गयी और उनका मासिक धर्म बंध हुआ उनकी सबसे अच्छी दवा है चूना.. * गेहूँ के दाने के बराबर चूना हर दिन खाना दाल में, लस्सी में, नही तो पानी में घोल के पीना । जब कोई माँ गर्भावस्था में है तो चूना रोज खाना चाहिए क्योंकि गर्भवती माँ को सबसे ज्यादा केल्शियम की जरुरत होती है और चूना केल्शियम का सबसे बड़ा भंडार है । गर्भवती माँ को चूना खिलाना चाहिए ..अनार के रस में – अनार का रस एक कप और चूना गेहूँ के दाने के बराबर ये मिलाके रोज पिलाइए नौ महीने तक लगातार दीजिये..तो चार फायदे होंगे – पहला फायदा :- माँ को बच्चे के जनम के समय कोई तकलीफ नही होगी और नॉर्मल डीलिवरी होगा, दूसरा :- बच्चा जो पैदा होगा वो बहुत हृष्ट पुष्ट और तंदुरुस्त होगा , तीसरा फ़ायदा :- बच्चा जिन्दगी में जल्दी बीमार नही पड़ता जिसकी माँ ने चूना खाया , चौथा सबसे बड़ा लाभ :- बच्चा बहुत होशियार होता है बहुत Intelligent और Brilliant होता है उसका IQ बहुत अच्छा होता है । * चूना घुटने का दर्द ठीक करता है , कमर का दर्द ठीक करता है ,कंधे का दर्द ठीक करता है, * एक खतरनाक बीमारी है Spondylitis वो चूने से ठीक होता है । * कई बार हमारे रीढ़की हड्डी में जो मनके होते है उसमे दुरी बढ़ जाती है Gap आ जाता है – ये चूना ही ठीक करता है उसको; रीड़ की हड्डी की सब बीमारिया चूने से ठीक होता है । अगर आपकी हड्डी टूट जाये तो टूटी हुई हड्डी को जोड़ने की ताकत सबसे ज्यादा चूने में है । चूना खाइए सुबह को खाली पेट । * मुंह में ठंडा गरम पानी लगता है तो चूना खाओ बिलकुल ठीक हो जाता है , * मुंह में अगर छाले हो गए है तो चूने का पानी पियो तुरन्त ठीक हो जाता है । * शरीर में जब खून कम हो जाये तो चूना जरुर लेना चाहिए , एनीमिया है खून की कमी है उसकी सबसे अच्छी दवा है ये चूना , चूना पीते रहो गन्ने के रस में , या संतरे के रस में नही तो सबसे अच्छा है अनार के रस में – अनार के रस में चूना पिए खून बहुत बढता है , बहुत जल्दी खून बनता है – एक कप अनार का रस गेहूँ के दाने के बराबर चूना सुबह खाली पेट । * घुटने में घिसाव आ गया और डॉक्टर कहे के घुटना बदल दो तो भी जरुरत नही चूना खाते रहिये और हरसिंगार के पत्ते का काढ़ा खाइए घुटने बहुत अच्छे काम करेंगे । —. Forward massage किसी के काम आये जानकारी ओओर हैल्थ सही हो ।

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श्रीकृष्ण की व्रज में आनन्द बांटने की बाललीला


श्रीकृष्ण की व्रज में आनन्द बांटने की बाललीला…………. कृष्णावतार आनन्द अवतार है। भगवान श्रीकृष्ण व्रज के सुख की टोकरी सिर पर लेकर ढोते हैं और व्रज की गलियों में कहते फिरते हैं–आनंद लो आनंद एक दिन नंद के दुलारे श्रीकृष्ण प्रात:काल जल्दी उठकर अपनी बालसुलभ क्रीड़ाओं से यशोदामाता को बहुत खिझाने लगे। यशोदामाता ने कई बार समझाया–कन्हैया उत्पात मत कर। आज मुझे बहुत काम है पर कन्हैया ने एक नहीं सुनी। खीजकर मैया ने उन्हें घर से बाहर सखाओं के साथ जाकर खेलने को कह दिया। श्रीकृष्ण तो मानो इसी ताक में थे। आज उन्हें अपनी बाललीला में कुछ नवीन रंग भरने थे। वात्सल्य-प्रेम में आकण्ठ डूबी हुई किसी गोपी को अपनी बाललीला के द्वारा कृतार्थ करना था। इसलिए वे मैया से डरने का बहाना करके यमुनातट की ओर भाग चले। श्रीकृष्ण का मनोहारी स्वरूप छोटे से कृष्ण हैं, पीली धोती धारण किये, उसके ऊपर लाल-हरा कछोटा बांधे, कन्धे तक घुँघराले केश मुख पर लहराते हुए, मस्तक पर गोरोचन का तिलक लगाये, कमनीय कण्ठ में कठुला पहने, हृदय पर बघनखा आदि टोना-निवारक वस्तुओं से निर्मित माला पहने, पांव में नुपुर पहने हुए हैं। इधर-उधर घूमने के बाद उन्हें भूख सताने लगी तो वह एक गोपी के पास जाकर खड़े हो गये। गोपी उनकी वेशभूषा, मन्द-मन्द कटीली मुस्कान, प्रेम भरी चितवन, भौंहों की मटकन आदि को देखकर मन-ही-मन उन पर रीझ गयी और कन्हैया से बोली–क्या चाहिए? कन्हैया गोपी से थोड़ा माखन-छाछ देने का अनुरोध करने लगे; परन्तु गोपी ने कन्हैया से कहा– ’बिना मूल्य दिये कहीं भी कुछ नहीं मिलता। गोपी के इस स्वार्थभरे उत्तर को सुनकर कन्हैया ने कहा– श्रीकृष्ण ने माखन के लिए उठाये गोपियों के गोमय (गोबर) के टोकरे गोपी को कन्हैया पर जरा भी दया नहीं आयी और उसने कहा–कन्हैया ! कोई बात नहीं है। तू यदि मेरे माखन का मूल्य नहीं दे सकता तो न सही, तू मेरा कुछ काम कर दे। माखन बनाने के लिए कितना परिश्रम करना पड़ता है? देख कन्हैया ! ब्राह्ममुहुर्त में जगकर हम दधिमंथन करती हैं, दिन-रात गौओं की सेवा करती हैं– गौओं को चारा आदि देना, उन्हें स्नान कराना, गोष्ठ की झाड़ू-बुहारी लगाना, गोबर (गोमय) को खाँच (टोकरी) में भर-भर कर पुष्पवाटिका में डालना, यमुनाजी से जल भरकर लाना और ऊपर से घर के सारे काम भी हम ही करते हैं। हम सभी गोपियां तेरी मैया के समान ‘व्रजरानी’ तो हैं नहीं कि हमारे सब काम दास-दासियां कर दें। अत: कन्हैया ! तू यदि सचमुच मेरा ताजा माखन अरोगना चाहता है तो गोष्ठ में चलकर मेरा थोड़ा-सा काम कर दे। काम यह है कि मैं गोष्ठ की सफाई करके जब गोबर की टोकरियां भर-भर कर उन्हें बाहर ले आऊँ, तब तुम प्रत्येक बार सहारा देकर मेरे सिर पर खाँच रखवाते जाना। इसके बदले में मैं तुम्हें उतने ही माखन के लौंदे (गोले) दूँगी जितनी बार तुम टोकरी उठवाओगे कन्हैया ने गोपी की बात मान ली। पर कितनी टोकरी उठाई हैं–इस संख्या का पता कैसे चले क्योंकि दोनों को ही गिनती नहीं आती है। गोपी बहुत चालाक है, उसने कन्हैया को एक उपाय सुझाया– ‘तू जितनी बार मेरे सिर पर गोमय (गोबर) की टोकरी रखवाने में सहायता करेगा, मैं उतनी बार तेरे कपोलों पर गोबर की रेखाएं बनाती जाऊँगी। काम खत्म हो जाने पर हम किसी पढ़े-लिखे सयाने व्यक्ति से वे रेखाएं गिनवा लेंगे और उतने ही माखन के लोंदे मैं तुझे दे दूंगी। बोलो, स्वीकार है यह प्रस्ताव।’ श्रीकृष्ण ने गोपियों के मन की अभिलाषा पूरी की कन्हैया क्या करते? जो गोपी अनेक जन्मों से अपने हृदय के जिन भावों को श्रीकृष्ण को अर्पण करने की प्रतीक्षा कर रही है, उसकी उपेक्षा वह कैसे करें? इन्हीं गोपियों की अभिलाषाओं को पूरा करने के लिए ही तो निर्गुण-निराकार परम-ब्रह्म ने सगुण-साकार लीलापुरुषोत्तमरूप धारण किया है। दिन भर के भूखे-प्यासे श्यामसुन्दर गोपी के साथ उसकी गौशाला में जाकर गोमय की टोकरियां उठवाने लगे। एक हाथ से अपनी खिसकती हुई काछनी को सम्हालते और दूसरे हाथ से गोमय की खाँच गोपी के सिर पर रखवाते। ऐसा करते हुए कन्हैया का कमल के समान कोमल मुख लाल हो गया। चार-पांच टोकरियां उठवाने के बाद कन्हैया बोले–गोपी, तेरा कोई भरोसा नहीं है। तू बाद में धोखा दे सकती है, इसलिए गिनती करती जा। और उस निष्ठुर गोपी ने कन्हैया के लाल-लाल मुख पर गोमय की हरी-पीली आड़ी रेखाएं बना दीं। अब तो गोपी अपनी सुध-बुध भूल गयी और कन्हैया के सारे मुख-मण्डल पर गोमय के प्रेम-भरे चित्र अंकित हो गये–’गोमय-मण्डित-भाल-कपोलम्।’ जब गोपी को होश आया तब वह बोली कि मुझे इतना गोबर तो चाहिए नहीं था, मैं क्यों इतनी टोकरियां भर-भर कर ले गयी।? कन्हैया ने कहा–बहाना मत बना, गिनती के अनुसार गिन-गिन कर माखन के लोंदे ला। गोपी बोली–कन्हैया, ऐसे माखन नहीं मिलता। कन्हैया ने पूछा–फिर कैसे मिलेगा? गोपी ने कहा–पहले नाचो तब मिलेगा। छछिया भर छाछ पर नाच दिखावे अब कन्हैया एक हाथ अपनी कमर पर और दूसरा हाथ अपने सिर पर रखकर ‘ता-ता थेई, ता-ता थेई’ नाच रहे हैं। ब्राह्मणों द्वारा किये गये यज्ञ-आवाहन आदि कर्मकाण्ड भी जिन्हें अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाते वही प्रेमरससिन्धु भगवान श्रीकृष्ण व्रज में तनिक से माखन के लिए कभी नृत्य करते हैं तो कभी याचक बनने में भी संकोच नहीं करते हैं। व्रजमण्डल के आकाश में स्थित देवतागण गोपी और श्रीकृष्ण की इस झांकी को देखकर पुष्पवर्षा करते हैं। प्रेम की झिड़कियाँ भी मीठी होती हैं–मार भी मीठी लगती है। शेष, महेश, गणेश, सुरेश इस मजे को क्या जानें–सुस्वादु रस का यह जायका उनके भाग्य में कहाँ? वे जिस परब्रह्म की अपार महिमा का पार पाने के लिए दिन-रात नाक रगड़ते रहते हैं, वही सलोना श्यामसुन्दर व्रजमण्डल के प्रेमसाम्राज्य में छाछ की ओट से इसी रस के पीछे अहीर की छोकरियों (गोपियों) के इशारों पर तरह-तरह के नाच नाचता-फिरता है– श्रीमद्भागवत में कहा गया है– ’प्यारे कृष्ण ! आपकी एक-एक लीला मनुष्यों के लिए परम मंगलमयी और कानों के लिए अमृतस्वरूप हैं। जिसे एक बार उस रस का चस्का लग जाता है, उसके मन में फिर किसी दूसरी वस्तु के लिए लालसा ही नहीं रह जाती।’ जय हो मेरे प्यारे श्यामजू

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अपने-अपने मन एयरपोर्ट पर एक लड़की हाथ में ट्रे लेकर खड़ी थी।


अपने-अपने मन एयरपोर्ट पर एक लड़की हाथ में ट्रे लेकर खड़ी थी। ट्रे में कई छोटे-छोटे कप थे। दिल्ली से लखनऊ की मेरी उड़ान में अभी समय था। मैं जब भी एयरपोर्ट पहले पहुंच जाता हूं, वहां मौजूद एक-एक दुकान में झांकता हूं। समझने की कोशिश करता हूं कि आख़िर कोई एयरपोर्ट जाकर शॉपिंग क्यों करता है। अपनी जिज्ञासा की इसी कड़ी में मेरी निगाह वहां मौजूद कॉफी की दुकान ‘स्टारबक्स’ के बाहर खड़ी लड़की पर पड़ी। कई लोग आते, लड़की से कुछ पूछते, कप उठा कर कॉफी पीते और चलते बनते। ये हैरानी की बात नहीं थी। आज बहुत से विकसित देशों में देखा गया है कि बड़े-बड़े मॉल में खाने पीने की चीजों का प्रचार ऐसे ही किया जाता है। पहले लोगों को मुफ्त में खिलाया जाता है और पसंद आने पर खरीदने को कहा जाता है। पर दिल्ली एयरपोर्ट पर ये प्रयोग कुछ हैरान करने वाला लगा। काफी देर तक सब देखने के बाद मैं उस लड़की के पास गया। लड़की मेरी ओर देख कर मुस्कुराई। फिर उसने कहा कि सर, आप कॉफी पी कर देखिए। कोल्ड कॉफी में नया फ्लेवर है। मुझे हल्की सी प्यास भी लग रही थी, मैंने कॉफी का कप उठाया और धीरे-धीरे पीने लगा। कॉफी वाकई अच्छी थी। अब कॉफी पी कर बिना कुछ बोले तो लौट नहीं सकते थे। अतः लड़की से बातचीत शुरू कर दी। “आप लोगों को मुफ्त में कॉफी क्यों पिला रही हैं?” “सर, लोग कॉफी पीने के बाद खरीदेंगे। ये कंपनी की ओर से प्रमोशन है।” “तो क्या आप यहां एयरपोर्ट पर कॉफी के पैकेट बेच रही हैं, जिसे खरीद कर हम घर ले जा सकते हैं?” “नहीं सर। हम तो कॉफी बना कर बेचते हैं। आप कॉफी यहीं पी सकते हैं।” “कमाल है। आप यहां मुफ्त कॉफी लोगों को पिला रही हैं और चाह रही हैं कि कॉफी पीने के बाद लेग दुबारा खरीद कर पिएं?” “पर सर, ये तो बहुत कम है। इतनी सी कॉफी से क्या होगा? अगर आपको पसंद आए तो आप और कॉफी खरीद कर पी सकते हैं।” बातचीत दिलचस्प मोड़ पर थी। मैंने देखा कि कई लोग यहां से मुफ्त कॉफी पीने के बाद दुकान के भीतर जा कर कॉफी खरीद कर भी पी रहे थे। पर ढेरों लोग वहां आते, लड़की से पूछते कि ये क्या है, और जैसे ही पता चलता कि ये प्रमोशनल कॉफी है, चुपचाप उठा कर उसे पीते और धीरे से खिसक लेते। मैंने बात आगे बढ़ाई। लड़की से कहा कि इस तरह मुफ्त में अगर आप कॉफी पिलाएंगी तो मुझे नहीं लगता कि कोई खरीद कर पीना चाहेगा। और आप जो कह रही हैं कि ये कप छोटे हैं, इतने से क्या होगा, तो क्या कोई दो कप मुफ्त में पीना चाहेगा तो आप मना करेंगी? लड़की ने बहुत गंभीर हो कर कहा, “मैं क्यों मना करूंगी। ये कंपनी का प्रमोशनल ऑफर है, मैं किसी को मना नहीं करूंगी।” मैंने मस्कुराते हुए कहा कि फिर तो यही समझिए कि बहुत से लोग मुफ्त में कॉफी पीकर ही खिसक जाएंगे, खरीद कर पीने वाले कुछ ही लोग होंगे। अब लड़की मुस्कुराने लगी। उसने धीरे से कहा, “सर, ये तो अपना-अपना मन है।” “मन?” ये छोटी सी लड़की और इतना बड़ा शब्द? बात मेरी नहीं, कोई भी ये सुन कर रुक जाता। लड़की कह रही थी कि ये तो अपना मन है कि कोई मुफ्त में दो-तीन कॉफी पी कर खुश हो रहा है और चालाक बन कर खिसक जा रहा है। मैंने बहुत गौर से उस लड़की की ओर देखा। उसकी आंखों में एक पूरी कहानी तैर रही थी। मैंने धीरे से पूछा, “तुम इस शब्द का अर्थ भी समझती हो?” “जी सर, मन कुछ नहीं, बस चेतना में तैरता हुआ बादल भर है। सच कहू तो मन ही आदमी की मुक्ति में रुकावट है। जो मन पर नियंत्रण करना सीख लेता है, वही तन पर भी नियंत्रण कर पाता है।” मैं हैरान निगाहों से लड़की को देख रहा था। हाथ में कॉफी की ट्रे। कुछ हज़ार रुपयों की नौकरी। और ज्ञान इतना विस्तृत? लड़की कह रही थी, “एक-दो कप कॉफी मुफ्त में पीकर कोई खुश हो जाए, तो हमें अफसोस नहीं। ये तो बिजनेस है। आज मुफ्त पीकर जाएगा, अगली बार खरीद कर पिएगा। या हो सकता है दो घूंट कॉफी पी कर उसे अच्छा लगे और वो फिर अभी ही खरीद कर कॉफी पी ले। पर जो लोग मुफ्त की दो-तीन कप कॉफी पीकर चले जा रहे हैं, उनके बारे में सोचिए। उन्हें लग रहा होगा कि उनका तन तृप्त हो गया। असल में वो अतृप्त मन है। जिन्हें कुछ भी मुफ्त पाने की आदत पड़ जाती है, वो कभी तृप्त नहीं होते। वो कभी मुक्त भी नही होते। आप अधिक मत सोचिए, एक कप कॉफी और पीजिए, खुश रहिए।” फ्लाइट में बैठ कर सोच रहे थे कि सचमुच जो मन पर नियंत्रण करना सीख लेता है, वही तन पर नियंत्रण कर पाता है। मन का क्या है, वो तो चेतना में तैरता हुआ बादल भर है। बढ़े हुए #मन_की_सज़ा तो बेचारा तन ही भुगतता है। सत्य है शिव है सुन्दर है

K S Sexsena

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થોડા દિવસ પહેલા મીડીયમ ઈગ્લીશ શાળામાં બોલાવામાં આવેલ


થોડા દિવસ પહેલા મીડીયમ ઈગ્લીશ શાળામાં બોલાવામાં આવેલ, ત્યાંના પ્રિન્સીપાલની ફરીયાદ એ હતી કે, એક બાળક વાલી મીટીંગ કયારેય પોતાની માતાને શાળાએ લાવતો નથી, અને ઘરે જાણ પણ કરતો નથી. ધોરણ પાંચના તે કલાસના દરેક વિદ્યાર્થીઓ સાથે અલક મલકની વાતો કરી ને પછી દરેકને કેવી ”મા” પસંદ છે. તે નિબંધ લખવા માટે આપ્યો, દરેકે પોત પોતાની માતાના વખાણ લખ્યા હતા. રાહુલના લખાણનું હેડીંગ હતું. ”ઓફ લાઈન મા” મારે મા જોઈએ છે પણ ઓફ લાઈને. મારે અભણ મા જોઈએ છે જેને મોબાઈલ વાપરતા નહીં આવડે તો ચાલશે પણ મારી સાથે દરેક જગ્યાએ જવા માટે સમય હોય. મારે જીન્સ અને ટીર્શટ પહેરે તેવી મા નહીં પણ છોટુના મમ્મી જેવી સાડી પહેરતી મા જોઈએ છે. જેના ખોળામાં માથું રાખીને હું છોટુની જેમ સુઈ શકું. મારે મા તો જોઈએ છે પણ ઓફ લાઈન જેને મારા માટે સમય તેના મોબાઈલ કરતાં વધારે હોય પપ્પા માટે વધારે હોય જો ઓફ લાઈન મા હશે તો પપ્પા સાથે ઝગડો નહિ થાય. મને સાંજે સુતી વખતે વીડીયો ગેમ્સની બદલે વાર્તા સંભળાવીને સુવરાવશે ઓન લાઈન પીઝા નહિ મંગાવે મને અને બાને સમયસર રસોઈ કરીને જમાડશે. બસ મારે તો એક ઓફ લાઈન મા જોઈએ. આટલું વાંચતા મોનીટરના હીંબકા પુરા કલાસમાં સંભળાય રહયા હતાં. દરેક વિદ્યાર્થીની આંખોમાં ગંગા જમુના વહેતી હતી. (સત્ય ઘટના )

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हनुमान की जन्म तिथि- पंचांग में हनुमान जयन्ती की कई तिथियों दी गई हैं


हनुमान की जन्म तिथि- पंचांग में हनुमान जयन्ती की कई तिथियों दी गई हैं पर उनका स्रोत मैंने कहीं नहीं देखा है। पंचांग निर्माताओं के अपने अपने आधार होंगे। पराशर संहिता, पटल 6 में यह तिथि दी गई है- तस्मिन् केसरिणो भार्या कपिसाध्वी वरांगना। अंजना पुत्रमिच्छन्ति महाबलपराक्रमम्।।29।। वैशाखे मासि कृष्णायां दशमी मन्द संयुता। पूर्व प्रोष्ठपदा युक्ता कथा वैधृति संयुता।।36।। तस्यां मध्याह्न वेलायां जनयामास वै सुतम्। महाबलं महासत्त्वं विष्णुभक्ति परायणम्।।37।। इसके अनुसार हनुमान जी का जन्म वैशाख मास कृष्ण दशमी तिथि शनिवार (मन्द = शनि) युक्त पूर्व प्रोष्ठपदा (पूर्व भाद्रपद) वैधृति योग में मध्याह्न काल में हुआ। बाल समय रवि भक्षि लियो तब तीनहु लोक भयो अन्धियारो। = यदि इसका अर्थ है कि हनुमान जी के जन्म दिन सूर्य ग्रहण हुआ था तो उनका जन्म अमावस्या को ही हो सकता है। दिन के समय ही सूर्य ग्रहण उस स्थान पर दृश्य होगा। युग सहस्त्र योजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।। = सूर्य युग सहस्त्र या 2000 योजन पर नहीं है। तुलसीदास जी ने सूर्य सिद्धांत पढ़ा था जिसमें सूर्य का व्यास 6500 योजन (13,92,000 किमी) दिया है। इन दोनों को मिला कर अर्थ- सूर्य की दैनिक गति हमको पूर्व क्षितिज से पश्चिमी क्षितिज तक दीखती है। इसमें सूर्योदय को बाल्यकाल, मध्याह्न में युवा तथा सायंकाल को वृद्धावस्था कहते हैं। सूर्य के अंश रूप गायत्री की इसी प्रकार प्रार्थना होती है। पूर्व तथा पश्चिमी क्षितिज पृथ्वी सतह पर दृश्य आकाश के दो हनु हैं। इन दो हनु के बीच सूर्य की दैनिक गति का पूरा जीवन समाहित है। जब हमको सूर्य उदय होते दीखता है तब वह वास्तव में क्षितिज से नीचे होता है, पर वायुमंडल में किरण के आवर्तन से मुड़ने के कारण पहले ही दीखने लगता है। इसको सूर्य सिद्धांत में वलन कहा गया है। सूर्य का व्यास सूर्य सिद्धांत में 6500 योजन है जहाँ योजन का मान प्रायः 214 किमी है। जब व्यास का 2000 योजन क्षितिज के नीचे रहता है तभी पूरा सूर्य बिम्ब दीखने लगता है। यही युग (युग्म) सहस्त्र योजन पर भानु है जिसको क्षितिज रूपी हनु निगल जाता है।

अरुण उपाध्याय