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संगति का असर संगत का असर


संगति का असर संगत का असर 】 एक बार एक भंवरे की मित्रता एक गोबरी कीड़े के साथ हो गई, कीड़े ने भंवरे से कहा कि भाई तुम मेरे सबसे अच्छे मित्र हो इसलिए मेरे यहाँ भोजन पर आओं। अगला दिन भंवरा सुबह सुबह तैयार हो गया और अपने बच्चों को साथ गोबरी कीड़े के यहाँ भोजन के लिए पहुँचा कीड़ा भी उनको देखकर बहुत खुश हुआ। और सबका आदर करके भोजन भोजन परोसा भोजन मे गोबर की गोलियां परोसी गई और कीड़े ने कहा कि खाओं भाई रूक क्यों गए। भंवरा सोच मे पड़ गया कि मैने बुरे का संग किया इसलिए मुझे तो गोबर खाना ही पड़ेगा। भंवरा ने सोचा कि ये मुझे इस संग करने से मिला और फल भी पाया अब इसको भी मेरे संग का फल मिलना चाहिए। भंवरा बोला भाई आज तो मे आप के यहाँ भोजन के लिए आया अब तुम कल मेरे यहाँ आओंगे। अगले दिन कीड़ा तैयार होकर भंवरे के यहाँ पहुँचा, भंवरे ने कीड़े उठाकर गुलाब के फूल मे बिठा दिया और रस पिलाया, कीड़े ने खूब फूलों का रस पीया और मजे किये। अपने मित्र का धन्यवाद किया और कहा मित्र तुम तो बहुत अच्छी जगह रहते हो और अच्छा खाते हो। इसके बाद कीड़े ने सोचा क्यों न अब मे यही रहूँ और यह सोचकर वही फूल मे बैठा रहा इतने मे ही पास के मंदिर का पुजारी आया और फूल तोड़कर ले गया और चढ़ा दिया इसको प्रभु के चरनन मे… कीड़े को भगवान के दर्शन भी हुए और उनके चरणों मे बैठा इसके बाद संन्ध्या मे पुजारी ने सारे फूल इकठ्ठा किये और गंगा जी मे छोड़ दिये। कीड़ा गंगा की लहरों पर लहर रहा था और अपनी किस्मत पर हैरान था कि इतना पुण्य हो गया इतने मे भंवरा उड़ता हुआ कीड़े के पास आया और बोला कि मित्र अब बताओं क्या हाल हैं। कीड़ा बोला भाई अब जन्म जन्म के पापों से मुक्ति हो चुकी हैं जहाँ गंगा जी मे मरने के बाद अस्थियों को छोड़ा जाता हैं। वहाँ मैं जिंदा ही आ गया हूँ यह सब मुझे आपकी मित्रता और अच्छी संगत का ही फल मिला हैं, और खुशी से निहाल हूँ। आपका धन्यवाद जिसको मैं अपनी जन्नत समझता था वो गंदगी थी और जो आपकी वजह से मिला ये ही स्वर्ग हैं। किसी महात्मा ने सही कहा हैं… संगत से गुण उपजे, संगत से गुण जाएँ। लोहा लगा जहाज मे, पानी मे उतराय।। सच्चे भक्तो की संगती ईश्वर से मिला देती है….. तो देर किस बात की आईयै चले ईश्वर की ओर…….. Radhasoami ji 🙏🏻🌹

मनु कुमार

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लड़का… I love you.. जान लड़की..


लड़का… I love you.. जान लड़की…. तो में क्या करूं लड़का…ईट्स ओके हाय ही बोल देती लड़की.. देख़ो तुम मुझे जान मत बोलो लड़का… ओके स्वीट तो बोल सकता हूँ लड़की… नही ना जान ना स्वीट ओके लड़का..लेकिन I love u स्वीट लड़की… बहुत हो गया प्यार अब बस भी करो लड़का.. क्या तुम मुझसे प्यार नही करती लड़की.. नही में तो मस्ती कर रही थी.. तुम सिरियस हो गए तो में क्या करूँ लड़का. प्यार तुम्हे मज़ाक लगता हैं अगर यही करना था तो क्यूँ आई मेरी ज़िन्दगी में , लड़की… में तो टाइम पास कर रही थी और तुम उसे सच समझ बैठे गलती तुम्हारी हैं लड़का.. प्लीज़ जान ऐसा मत करो प्लीज़ लड़की… मज़ाक तो पहले था अब नही और सुनो कभी दुबारा मुझे फोन मत करना और भूल जाओ मुझे…. वो सब एक टाइम पास था और तुम मुझसे दूर चले जाओ फिर कभी मुझे ढूँढना ना और लडकी फोन काट देती हैं…. लड़का बहुत बार उसे फोन करता है लेकिन फोन बंद मिलता है……!! दूसरे नम्बर पे भी कॉल करता है लेकिन सभी नम्बर नॉट रेचेबल बताता हैं लड़का…..घर आकर.. सोचता है अपना हाथ का नाम काट लूँ मिटा दूँ अपने आपको फिर सोचता है मम्मी पाप का क्या होगा वो मम्मी के पास आकर मम्मी के गले लग कर खूब रोता है.. और वो दूसरे शहर चला जाता हैं, वो उस लड़की को बहुत प्यार करता था उसने कभी और किसी से प्यार नही किया और ना कभी शादी की लोगो को के सामने हँसता था और लड़की की याद में जीने लगा , लड़की भी बेवफा नही.!! उसकी शादी उसकी मम्मी पापा ने कही और तय क्र दी थी और उसे कसम दिलाई अगर तू शादी नही करेगी तो तू हमारा मरा मुँह देखेगी..!! लड़की ने मम्मी पापा के लिये अपने प्यार को छोड़ दिया और शादी कर ली दूसरे दिन लड़की ने आत्म हत्या कर लिया.. लड़की ने लड़को को शहर से बहार जाने को इस लिए बोला ताकि उसे पता न चले की उसका प्यार अब इस दुनिया में नही हैं..! हमेशा लड़की ही गलत नही होती….” वो बन्धी होती है. कभी अपने फैमली से तो कभी अपने क्यूट से रिस्तो से…!।।।।। अगर आप को मेरी पोस्ट अच्छी लगी तो प्लीज़ कमेंट कर के बताओ……!! 🙂 🙂 🙂 🙂 🙂 🙂 🙂 🙂 🙂 👇👇👇👇👇👇👇👇 #_____पोस्ट____अछीलगेतोरिक्वेस्ट_भेजेऔरfollow_ज़रूरकरे ✍✍ Prince Golu Sen ✍✍

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एक गांव में एक निर्धन जुलाहा दम्पत्ति रहता था।


एक गांव में एक निर्धन जुलाहा दम्पत्ति रहता था। जुलाहे के नाम था सुन्दर और उसकी पत्नी का नाम था लीला। . दोनों पति-पत्नी अत्यंत परिश्रमी थे। सारा दिन परिश्रम करते सुन्दर-सुन्दर कपड़े बनाते, किन्तु उनको उनके बनाए वस्त्रों की अधिक कीमत नहीं मिल पाती थी। . दोनों ही अत्यन्त संतोषी स्वाभाव के थे जो मिलता उसी से संतुष्ट हो कर एक टूटी-फूटी झोपडी में रहकर अपना जीवन-निर्वाह कर लेते थे। . वह दोनों भगवान श्री कृष्ण के परम भक्त थे, दिन भर के परिश्रम के बाद जो भी समय मिलता उसे दोनों भगवान के भजन-कीर्तन में व्यतीत करते। . सुन्दर बाबा के पास एक तानपुरा और एक खड़ताल थी, जब दोनों मिलकर भजन गाते तो सुन्दर तानपुरा बजाता और लीला खड़ताल, फिर तो दोनों भगवान के भजन के ऐसा खो जाते की उनको अपनी भूख-प्यास की चिंता भी नहीं रहती थे। . यूं तो दोनों संतोषी स्वाभाव के थे, अपनी दीन-हीन अवस्था के लिए उन्होंने कभी भगवान् को भी कोई उल्हाना नही दिया और अपने इसी जीवन में प्रसन्न थे किन्तु … . एक दुःख उनको सदा कचोटता रहता था, उनके कोई संतान नहीं थी। इसको लेकर वह सदा चिंतित रहा करते थे, किन्तु रहते थे फिर भी सदा भगवान में मग्न, इसको भी उन्होंने भगवान की लीला समझ कर स्वीकार कर लिया और निष्काम रूप से श्री कृष्ण के प्रेम-भक्ति में डूबे रहते। . जब उनकी आयु अधिक होने लगी तो एक दिन लीला ने सुन्दर से कहा कि हमारी कोई संतान नहीं है, कहते है की संतान के बिना मुक्ति प्राप्त नहीं होती, अब हमारी आयु भी अधिक को चली है, ना जाने कब बुलावा आ जाए, मरने की बाद कौन हमारी चिता को अग्नि देगा और कौन हमारे लिए तर्पण आदि का कार्य करेगा, कैसे हमारी मुक्ति होगी। . सुन्दर बोला तू क्यों चिंता करती है, ठाकुर जी है ना वही सब देखेंगे। सुन्दर ने यह बात कह तो दी किन्तु वह भी चिंता में डूब गया, . तभी उसके मन में एक विचार आया वह नगर में गया और श्री कृष्ण के बाल गोपाल रूप की एक प्रतिमा ले आया। घर आ कर बोला अब तुझे चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है मैं यह बाल गोपाल लेकर आया हूँ, . हमारे कोई संतान नहीं तो वह भी इन्ही की तो लीला है, हम इनको ही अपने पुत्र के समान प्रेम करेंगे, यही हमारे पुत्र का दायित्व पूर्ण करेंगे यही हमारी मुक्ति करेंगे। . सुन्दर की बात सुन कर लीला अत्यंत प्रसन्न हुई, उसने बाल गोपाल को लेकर अपने हृदय से लगा लिया और बोली आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं, आज से यही हमारा लल्ला है। . दोनों पति-पत्नी ने घर में एक कोना साफ़ करके स्थान बनाया और एक चौकी पर बाल गोपाल को विराजित कर दिया। . तब से जुलाहा दंपत्ति का नियम हो गया वह प्रतिदिन बाल गोपाल को स्नान कराते उनको धुले वस्त्र पहनाते अपनी संतान की तरह उनको लाड-लडाते, उन्ही के सामने बैठ कर भजन कीर्तन करते और वहीं सो जाते। . . जुलाहा अपने हाथ से बाल गोपाल के लिए सुन्दर वस्त्र बनाता और उनको पहनता इसमें उसको बड़ा आनदं आता। धीरे-धीरे दोनों बाल गोपाल को अपनी संतान के समान ही प्रेम करने लगे। . लीला का नियम था की वह प्रति दिन अपने हाथ से अपने लल्ला को भोजन कराती तब स्वयं भोजन करती, लल्ला को भोजन कराते समय उसको ऐसा ही प्रतीत होता मानो अपने पुत्र को ही भोजन करा रही हो। . उन दोनों के निश्चल प्रेम को देख कर करुणा निधान भगवान् अत्यन्त्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अदृश्य रूप में आकर स्वयं भोजन खाना आरम्भ कर दिया, . लीला जब प्रेम पूर्वक बाल गोपाल को भोजन कराती तो भगवान् को प्रतीत होता मानो वह अपनी माँ के हाथो से भोजन कर रहें हैं, उनको लीला के हाथ से प्रेम पूर्वक मिलने वाले हर कौर में माँ का प्रेम प्राप्त होता था, . लीलाधारी भगवान श्री कृष्ण स्वयं माँ की उस प्रेम लीला के वशीभूत हो गए। किन्तु लीला कभी नहीं जान पाई कि स्वयं बाल-गोपाल उसके हाथ से भोजन करते हैं। . एक दिन कार्य बहुत अधिक होने के कारण लीला बाल गोपाल को भोजन कराना भूल गई। . गर्मी का समय था भरी दोपहरी में दोनों पति-पत्नी कार्य करते-करते थक गए और बिना भोजन किए ही सो गए, उनको सोए हुए कुछ ही देर हुई थी कि उनको एक आवाज सुनाई दी.. माँ-बाबा मुझको भूख लगी है . दोनों हड़बड़ा कर उठ गए, चारो और देखा आवाज कहाँ से आई है, किन्तु कुछ दिखाई नहीं दिया। . तभी लीला को स्मरण हुआ की उसने अपने लल्ला को भोजन नहीं कराया, वह दौड़ कर लल्ला के पास पहुंची तो देखा की बाल गोपाल का मुख कुम्हलाया हुआ है, . इतना देखते ही दोनों पति-पत्नी वहीं उनके चरणो में गिर पड़े, दोनों की आँखों से आसुओं की धार बह निकली, . लीला तुरंत भोजन लेकर आई और ना जाने कैसा प्रेम उमड़ा की लल्ला को उठा कर अपनी गोद में बैठा लिया और भोजन कराने लगी, दोनों पति-पत्नी रोते जाते और लल्ला को भोजन कराते जाते, साथ ही बार-बार उनसे अपने अपराध के लिए क्षमा मांगे जाते, . . ऐसा प्रगाढ़ प्रेम देख कर भगवान अत्यंत द्रवित हुए और अन्तर्यामी भगवान श्रीहरि साक्षात् रूप में प्रकट हो गए। . भगवान् ने अपने हाथों से अपने रोते हुए माता-पिता की आँखों से आंसू पोंछे और बोले “प्रिय भक्त में तुम्हारी भक्ति और प्रेम से अत्यंत प्रसन्न हूँ, तुम जो चाहो वर माँग लो मैं तुम्हारी प्रत्येक इच्छा पूर्ण करूँगा” . . इतना सुनते ही दोनों भगवान के चरणो में गिर पड़े और बोले “दया निधान आप हमसे प्रसन्न हैं और स्वयं हमारे सम्मुख उपस्थित है, हमारा जीवन धन्य हो गया, इससे अधिक और क्या चाहिए, . इससे अधिक किसी भी वस्तु का भला क्या महत्त्व हो सकता है, आपकी कृपा हम पर बनी रहे बस इतनी कृपा करें” . श्रीहरि बोले “यदि तुम चाहो तो में तुम्हारे जीवन में संतान के आभाव को समाप्त कर के तुम्हे एक सुन्दर संतान प्रदान करूँगा” . यह सुनते ही सुन्दर और लीला एकदम व्याकुल होकर बोले “नही भगवन् हमको संतान नहीं चाहिये” . उनका उत्तर सुनकर भगवान ने पूंछा “किन्तु क्यों ! अपने जीवन में संतान की कमी को पूर्ण करने के लिए ही तो तुम मुझ को अपने घर लेकर आये थे ” . यह सुनकर वह दोनों बोले प्रभु हमको भय है कि यदि हमको संतान प्राप्त हो गई तो हमारा मोह उस संतान के प्रति बढ जाएगा और तब हम आपकी सेवा नहीं कर पाएंगे” . उनका प्रेम और भक्ति से भरा उत्तर सुनकर करुणा निधान भगवान् करुणा से भर उठे, स्वयं भगवान् की आँखों से आँसू टपक पड़े वह बोले, . “हे मैया, बाबा मैं यहाँ आया था आपके ऋण को उतारने के लिए किन्तु आपने तो मुझको सदा-सदा के लिए अपना ऋणी बना लिया, . मैंआपके प्रेम का यह ऋण कभी नहीं उतार पाउँगा, मैं सदा-सदा तुम दोनों का ऋणी रहूँगा, मैं तुम्हारे प्रेम से अत्यंत प्रसन्न हूँ तुमने अपने निर्मल प्रेम से मुझको भी अपने बंधन में बांध लिया है. . मैं तुमको वचन देता हूँ कि आज से मैं तुम्हारे पुत्र के रूप में तुम्हारे समस्त कार्य पूर्ण करूँगा तुमको कभी संतान का आभाव नहीं होने दूंगा” ऐसा कह कर भक्तवत्सल भगवान् बाल गोपाल की प्रतिमा में विलीन हो गए। . उस दिन से सुन्दर और लीला का जीवन बिल्कुल ही बदल गया उन्होंने सारा काम-धंधा छोड़ दिया और सारा दिन बाल गोपाल के भजन-कीर्तन और उनकी सेवा में व्यतीत करने लगे। . उनको ना भूख-सताती थी ना प्यास लगती थी, सभी प्रकार की इच्छाओं का उन्होंने पूर्ण रूप से त्याग कर दिया, . सुन्दर कभी कोई कार्य करता तो केवल अपने बाल गोपाल के लिए सुन्दर-सुन्दर वस्त्र बनाने का। उनके सामने जब भी कोई परेशानी आती बाल गोपाल तुरंत ही एक बालक के रूप में उपस्तिथ हो जाते और उनके समस्त कार्य पूर्ण करते । . वह दंपत्ति और बालक गांव भर में चर्चा का विषय बन गए, किन्तु गाँव में कोई भी यह नहीं जान पाया की वह बालक कौन है, कहाँ से आता है, और कहाँ चला जाता है। . धीरे-धीरे समय बीतने लगा, जुलाह दंपत्ति बूढ़े हो गए, किन्तु भगवान की कृपा उन पर बनी रही, अब दोनों की आयु पूर्ण होने का समय आ चला था भगवत प्रेरणा से उनको यह ज्ञात हो गया की अब उनका समय पूरा होने वाला है, . एक दिन दोनों ने भगवान को पुकारा ठाकुर जी तुरंत प्रकट हो गए और उनसे उनकी इच्छा जाननी चाही, दोनों भक्त दम्पत्ति भगवान के चरणो में प्रणाम करके बोले …. . “है नाथ हमने अपने पूरे जीवन में आपसे कभी कुछ नहीं माँगा, अब जीवन का अंतिम अमय आ गया है, इसलिए आपसे कुछ मांगना चाहते हैं” . भगवान बोले “निःसंकोच अपनी कोई भी इच्छा कहो मैं वचन देता हूँ कि तुम्हारी प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करूँगा” . तब बाल गोपाल के अगाध प्रेम में डूबे उस वृद्ध दम्पति बोले “हे नाथ हमने अपने पुत्र के रूप में आपको देखा, और आपकी सेवा की आपने भी पुत्र के समान ही हमारी सेवा करी अब वह समय आ गया है जिसके लिए कोई भी माता-पिता पुत्र की कामना करते हैं, . है दीनबंधु हमारी इच्छा है की हम दोनों पति-पत्नी के प्राण एक साथ निकले और है दया निधान जिस प्रकार एक पुत्र अपने माता-पिता की अंतिम क्रिया करता है, और उनको मुक्ति प्रदान करता है, उसी प्रकार है परमेश्वर हमारी अंतिम क्रिया आप अपने हाथो से करें और हमको मुक्ति प्रदान करें” . श्रीहरि ने दोनों को उनकी इच्छा पूर्ण करने का वचन दिया और बाल गोपाल के विग्रह में विलीन हो गए। . अंत में वह दिन आ पहुंचा जब प्रत्येक जीव को यह शरीर छोड़ना पड़ता है, दोनों वृद्ध दम्पति बीमार पड़ गए, उन दोनों की भक्ति की चर्चा गांव भर में थी इसलिए गांव के लोग उनका हाल जानने उनकी झोपडी पर पहुंचे, . किन्तु उन दोनों का ध्यान तो श्रीहरि में रम चुका था उनको नही पता कि कोई आया भी है, नियत समय पर एक चमत्कार हुआ जुलाहे की झोपड़ी एक तीव्र और आलौकिक प्रकाश से भर उठी। . वहां उपस्थित समस्त लोगो की आँखे बंद हो गई, किसी को कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था, कुछ लोग तो झोपडी से बाहर आ गए कुछ वही धरती पर बैठ गए। . श्री हरी आपने दिव्य चतर्भुज रूप में प्रकट हुए, उनकी अप्रितम शोभा समस्त सृष्टि को आलौकित करने वाली थी, वातावरण में एक दिव्य सुगंध भर गई, . अपनी मंद-मंद मुस्कान से अपने उन भक्त माता-पिता की और देखते रहे, उनका यह दिव्य रूप देख कर दोनों वृद्ध अत्यंत आनंदित हुए, . अपने दिव्य दर्शनों से दोनों को तृप्त करने के बाद करुणा निधान, लीलाधारी, समस्त सृष्टि के पालन हार श्री हरी, वही उन दोनों के निकट धरती पर ही उनके सिरहाने बैठ गए, . भगवान् ने उन दोनों भक्तों का सर अपनी गोद में रखा, उनके शीश पर प्रेम पूर्वक अपना हाथ रखा, तत्पश्चात अपने हाथो से उनके नेत्र बंद कर दिए, . तत्काल ही दोनों के प्राण निकल कर श्री हरी में विलीन हो गए, पंचभूतों से बना शरीर पंच भूतो में विलीन हो गया। . कुछ समय बाद जब वह दिव्य प्रकाश का लोप हुआ तो सभी उपस्थित ग्रामीणो ने देखा की वहां ना तो सुन्दर था, ना ही लीला थी और ना ही बाल गोपाल थे। . शेष थे तो मात्र कुछ पुष्प जो धरती पर पड़े थे और एक दिव्य सुगंध जो वातावरण में चहुं और फैली थी। विस्मित ग्रामीणो ने श्रद्धा से उस धरती को नमन किया, . उन पुष्पों को उठा कर शीश से लगाया तथा सुंदर, लीला की भक्ति और गोविन्द के नाम का गुणगान करते हुए चल दिए उन पुष्पों के श्री गंगा जी में विसर्जित करने के लिए। . मित्रो…भक्त वह है जो एक क्षण के लिए भी विभक्त नहीं होता, अर्थात जिसका चित्त ईश्वर में अखंड बना रहे वह भक्त कहलाता है। सरल शब्दों में भक्ति के अंतिम चरण का अनुभव करने वाले को भक्त कहते हैं । ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ (((((((((( जय जय श्री राधे )))))))))) ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ प्रेम से बोलो जय श्री राधे…… . ๑ ,(-_-), ‘\””’.\’=’-. Զเधे Զเधे \/..\,’ //””) Զเधे Զเधे (\ / \ |, ,,; ‘,

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अजमेर शरीफ के दरगाह की सच्चाई:


अजमेर शरीफ के दरगाह की सच्चाई:- अजमेर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर इतनी भीड़ थी कि वहाँ की कोई बैंच खाली नहीं थी। एक बैंच पर एक परिवार, जो पहनावे से हिन्दू लग रहा था, के साथ बुर्के में एक अधेड़ सुसभ्य महिला बैठी थी। बहुत देर चुपचाप बैठने के बाद बुर्खे में भेठी महिला ने बगल में बैठे युवक से पूछा, “अजमेर के रहनेवाले हैँ या फिर यहाँ घूमने आये हैं?” युवक ने बताया, “जी अपने माता पिता के साथ पुष्कर में ब्रह्मा जी के मंदिर के दर्शन करने आया था।” महिला ने बुरा मुँह बनाते हुए फिर पूछा,”आप लोग अजमेर शरीफ की दरगाह पर नहीं गये?” युवक ने उस महिला से प्रतिउत्तर कर दिया, “क्या आप ब्रह्मा जी के मंदिर गयी थीं?” महिला अपने मुँह को और बुरा बनाते हुये बोली, “लाहौल विला कुव्वत। इस्लाम में बुतपरस्ती हराम है और आप पूछ रहे हैं कि ब्रह्मा के मंदिर में गयी थी।” युवक झल्लाकर बोला, “जब आप ब्रह्मा जी के मंदिर में जाना हराम मानती हैं तो हम क्यों अजमेर शरीफ की दरगाह पर जाकर अपना माथा फोड़ें।” महिला युवक की माँ से शिकायती लहजे में बोली, “देखिये बहन जी। आपका लड़का तो बड़ा बदतमीज है। ऐसी मजहबी कट्टरता की वजह से ही तो हमारी कौमी एकता में फूट पड़ती है।” युवक की माँ मुस्काते हुये बोली, “ठीक कहा बहन जी। कौमी एकता का ठेका तो हम हिन्दुओं ने ही ले रखा है। अगर हर हिँदू माँ-बाप अपने बच्चों को बताए कि अजमेर दरगाह वाले ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती ने किस तरह इस्लाम कबूल ना करने पर पृथ्वीराज चौहान की पत्नी संयोगिता को मुस्लिम सैनिकों के बीच बलात्कार करने के लिए निर्वस्त्र करके फेँक दिया था और फिर किस तरह पृथ्वीराज चौहान की वीर पुत्रियों ने आत्मघाती बनकर मोइनुद्दीन चिश्ती को 72 हूरों के पास भेजा थातो शायद ही कोई हिँदू उस मुल्ले की कब्र पर माथा पटकने जाए “अजमेर के ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती को ९० लाख हिंदुओं को इस्लाम में लाने का गौरव प्राप्त है. मोइनुद्दीन चिश्ती ने ही मोहम्मद गोरी को भारत लूटने के लिए उकसाया और आमंत्रित किया था… (सन्दर्भ – उर्दू अखबार “पाक एक्सप्रेस, न्यूयार्क १४ मई २०१२).

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मैं एक घर के करीब से गुज़र रहा था


मैं एक घर के करीब से गुज़र रहा था की अचानक से मुझे उस घर के अंदर से एक बच्चे की रोने की आवाज़ आई। उस बच्चे की आवाज़ में इतना दर्द था कि अंदर जा कर वह बच्चा क्यों रो रहा है, यह मालूम करने से मैं खुद को रोक ना सका। अंदर जा कर मैने देखा कि एक माँ अपने दस साल के बेटे को आहिस्ता से मारती और बच्चे के साथ खुद भी रोने लगती। मैने आगे हो कर पूछा बहनजी आप इस छोटे से बच्चे को क्यों मार रही हो? जब कि आप खुद भी रोती हो। उस ने जवाब दिया भाई साहब इस के पिताजी भगवान को प्यारे हो गए हैं और हम लोग बहुत ही गरीब हैं, उन के जाने के बाद मैं लोगों के घरों में काम करके घर और इस की पढ़ाई का खर्च बामुश्किल उठाती हूँ और यह कमबख्त स्कूल रोज़ाना देर से जाता है और रोज़ाना घर देर से आता है। जाते हुए रास्ते मे कहीं खेल कूद में लग जाता है और पढ़ाई की तरफ ज़रा भी ध्यान नहीं देता है जिस की वजह से रोज़ाना अपनी स्कूल की वर्दी गन्दी कर लेता है। मैने बच्चे और उसकी माँ को जैसे तैसे थोड़ा समझाया और चल दिया। इस घटना को कुछ दिन ही बीते थे की एक दिन सुबह सुबह कुछ काम से मैं सब्जी मंडी गया। तो अचानक मेरी नज़र उसी दस साल के बच्चे पर पड़ी जो रोज़ाना घर से मार खाता था। मैं क्या देखता हूँ कि वह बच्चा मंडी में घूम रहा है और जो दुकानदार अपनी दुकानों के लिए सब्ज़ी खरीद कर अपनी बोरियों में डालते तो उन से कोई सब्ज़ी ज़मीन पर गिर जाती थी वह बच्चा उसे फौरन उठा कर अपनी झोली में डाल लेता। मैं यह नज़ारा देख कर परेशानी में सोच रहा था कि ये चक्कर क्या है, मैं उस बच्चे का चोरी चोरी पीछा करने लगा। जब उस की झोली सब्ज़ी से भर गई तो वह सड़क के किनारे बैठ कर उसे ऊंची ऊंची आवाज़ें लगा कर वह सब्जी बेचने लगा। मुंह पर मिट्टी गन्दी वर्दी और आंखों में नमी, ऐसा महसूस हो रहा था कि ऐसा दुकानदार ज़िन्दगी में पहली बार देख रहा हूँ । अचानक एक आदमी अपनी दुकान से उठा जिस की दुकान के सामने उस बच्चे ने अपनी नन्ही सी दुकान लगाई थी, उसने आते ही एक जोरदार लात मार कर उस नन्ही दुकान को एक ही झटके में रोड पर बिखेर दिया और बाज़ुओं से पकड़ कर उस बच्चे को भी उठा कर धक्का दे दिया। वह बच्चा आंखों में आंसू लिए चुप चाप दोबारा अपनी सब्ज़ी को इकठ्ठा करने लगा और थोड़ी देर बाद अपनी सब्ज़ी एक दूसरे दुकान के सामने डरते डरते लगा ली। भला हो उस शख्स का जिस की दुकान के सामने इस बार उसने अपनी नन्ही दुकान लगाई उस शख्स ने बच्चे को कुछ नहीं कहा। थोड़ी सी सब्ज़ी थी ऊपर से बाकी दुकानों से कम कीमत। जल्द ही बिक्री हो गयी, और वह बच्चा उठा और बाज़ार में एक कपड़े वाली दुकान में दाखिल हुआ और दुकानदार को वह पैसे देकर दुकान में पड़ा अपना स्कूल बैग उठाया और बिना कुछ कहे वापस स्कूल की और चल पड़ा। और मैं भी उस के पीछे पीछे चल रहा था। बच्चे ने रास्ते में अपना मुंह धो कर स्कूल चल दिया। मै भी उस के पीछे स्कूल चला गया। जब वह बच्चा स्कूल गया तो एक घंटा लेट हो चुका था। जिस पर उस के टीचर ने डंडे से उसे खूब मारा। मैने जल्दी से जा कर टीचर को मना किया कि मासूम बच्चा है इसे मत मारो। टीचर कहने लगे कि यह रोज़ाना एक डेढ़ घण्टे लेट से ही आता है और मै रोज़ाना इसे सज़ा देता हूँ कि डर से स्कूल वक़्त पर आए और कई बार मै इस के घर पर भी खबर दे चुका हूँ। खैर बच्चा मार खाने के बाद क्लास में बैठ कर पढ़ने लगा। मैने उसके टीचर का मोबाइल नम्बर लिया और घर की तरफ चल दिया। घर पहुंच कर एहसास हुआ कि जिस काम के लिए सब्ज़ी मंडी गया था वह तो भूल ही गया। मासूम बच्चे ने घर आ कर माँ से एक बार फिर मार खाई। सारी रात मेरा सर चकराता रहा। सुबह उठकर फौरन बच्चे के टीचर को कॉल की कि मंडी टाइम हर हालत में मंडी पहुंचें। और वो मान गए। सूरज निकला और बच्चे का स्कूल जाने का वक़्त हुआ और बच्चा घर से सीधा मंडी अपनी नन्ही दुकान का इंतेज़ाम करने निकला। मैने उसके घर जाकर उसकी माँ को कहा कि बहनजी आप मेरे साथ चलो मै आपको बताता हूँ, आप का बेटा स्कूल क्यों देर से जाता है। वह फौरन मेरे साथ मुंह में यह कहते हुए चल पड़ीं कि आज इस लड़के की मेरे हाथों खैर नही। छोडूंगी नहीं उसे आज। मंडी में लड़के का टीचर भी आ चुका था। हम तीनों ने मंडी की तीन जगहों पर पोजीशन संभाल ली, और उस लड़के को छुप कर देखने लगे। आज भी उसे काफी लोगों से डांट फटकार और धक्के खाने पड़े, और आखिरकार वह लड़का अपनी सब्ज़ी बेच कर कपड़े वाली दुकान पर चल दिया। अचानक मेरी नज़र उसकी माँ पर पड़ी तो क्या देखता हूँ कि वह बहुत ही दर्द भरी सिसकियां लेकर लगा तार रो रही थी, और मैने फौरन उस के टीचर की तरफ देखा तो बहुत शिद्दत से उसके आंसू बह रहे थे। दोनो के रोने में मुझे ऐसा लग रहा था जैसे उन्हों ने किसी मासूम पर बहुत ज़ुल्म किया हो और आज उन को अपनी गलती का एहसास हो रहा हो। उसकी माँ रोते रोते घर चली गयी और टीचर भी सिसकियां लेते हुए स्कूल चला गया। बच्चे ने दुकानदार को पैसे दिए और आज उसको दुकानदार ने एक लेडी सूट देते हुए कहा कि बेटा आज सूट के सारे पैसे पूरे हो गए हैं। अपना सूट ले लो, बच्चे ने उस सूट को पकड़ कर स्कूल बैग में रखा और स्कूल चला गया। आज भी वह एक घंटा देर से था, वह सीधा टीचर के पास गया और बैग डेस्क पर रख कर मार खाने के लिए अपनी पोजीशन संभाल ली और हाथ आगे बढ़ा दिए कि टीचर डंडे से उसे मार ले। टीचर कुर्सी से उठा और फौरन बच्चे को गले लगा कर इस क़दर ज़ोर से रोया कि मैं भी देख कर अपने आंसुओं पर क़ाबू ना रख सका। मैने अपने आप को संभाला और आगे बढ़कर टीचर को चुप कराया और बच्चे से पूछा कि यह जो बैग में सूट है वह किस के लिए है। बच्चे ने रोते हुए जवाब दिया कि मेरी माँ अमीर लोगों के घरों में मजदूरी करने जाती है और उसके कपड़े फटे हुए होते हैं कोई जिस्म को पूरी तरह से ढांपने वाला सूट नहीं और और मेरी माँ के पास पैसे नही हैं इस लिये अपने माँ के लिए यह सूट खरीदा है। तो यह सूट अब घर ले जाकर माँ को आज दोगे? मैने बच्चे से सवाल पूछा। जवाब ने मेरे और उस बच्चे के टीचर के पैरों के नीचे से ज़मीन ही निकाल दी। बच्चे ने जवाब दिया नहीं अंकल छुट्टी के बाद मैं इसे दर्जी को सिलाई के लिए दे दूँगा। रोज़ाना स्कूल से जाने के बाद काम करके थोड़े थोड़े पैसे सिलाई के लिए दर्जी के पास जमा किये हैं। टीचर और मैं सोच कर रोते जा रहे थे कि आखिर कब तक हमारे समाज में गरीबों और विधवाओं के साथ ऐसा होता रहेगा उन के बच्चे त्योहार की खुशियों में शामिल होने के लिए जलते रहेंगे आखिर कब तक। क्या ऊपर वाले की खुशियों में इन जैसे गरीब विधवाओंं का कोई हक नहीं ? क्या हम अपनी खुशियों के मौके पर अपनी ख्वाहिशों में से थोड़े पैसे निकाल कर अपने समाज मे मौजूद गरीब और बेसहारों की मदद नहीं कर सकते। आप सब भी ठंडे दिमाग से एक बार जरूर सोचना ! ! ! ! और हाँ अगर आँखें भर आईं हो तो छलक जाने देना संकोच मत करना..😢 अगर हो सके तो इस लेख को उन सभी सक्षम लोगो को बताना ताकि हमारी इस छोटी सी कोशिश से किसी भी सक्षम के दिल मे गरीबों के प्रति हमदर्दी का जज़्बा ही जाग जाये और यही लेख किसी भी गरीब के घर की खुशियों की वजह बन जाये। यह प्रेरक बोध कथा

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One day a man saw an old lady,


One day a man saw an old lady, stranded on the side of the road, but even in the dim light of day, he could see she needed help. So he pulled up in front of her Mercedes and got out. His Pontiac was still sputtering when he approached her. Even with the smile on his face, she looked worried. No one had stopped to help for the last hour or so. Was he going to hurt her? He didn’t look safe; he looked poor and hungry. He could see that she was frightened, standing out there in the cold. He knew how she felt. It was that chill which only fear can put in you. He said, ‘I’m here to help you, ma’am. Why don’t you wait in the car where it’s warm? By the way, my name is Bryan Anderson.’ Well, all she had was a flat tire, but for an old lady, that was bad enough. Bryan crawled under the car looking for a place to put the jack, skinning his knuckles a time or two. Soon he was able to change the tire. But he had to get dirty and his hands hurt. As he was tightening up the lug nuts, she rolled down the window and began to talk to him. She told him that she was from St. Louis and was only just passing through. She couldn’t thank him enough for coming to her aid. Bryan just smiled as he closed her trunk. The lady asked how much she owed him. Any amount would have been all right with her. She already imagined all the awful things that could have happened had he not stopped. Bryan never thought twice about being paid. This was not a job to him. This was helping someone in need, and God knows there were plenty, who had given him a hand in the past. He had lived his whole life that way, and it never occurred to him to act any other way. He told her that if she really wanted to pay him back, the next time she saw someone who needed help, she could give that person the assistance they needed, and Bryan added, ‘And think of me.’ He waited until she started her car and drove off. It had been a cold and depressing day, but he felt good as he headed for home, disappearing into the twilight. A few miles down the road the lady saw a small cafe. She went in to grab a bite to eat, and take the chill off before she made the last leg of her trip home. It was a dingy looking restaurant. Outside were two old gas pumps. The whole scene was unfamiliar to her. The waitress came over and brought a clean towel to wipe her wet hair. She had a sweet smile, one that even being on her feet for the whole day couldn’t erase. The lady noticed the waitress was nearly eight months pregnant, but she never let the strain and aches change her attitude. The old lady wondered how someone who had so little could be so giving to a stranger. Then she remembered Bryan .. After the lady finished her meal, she paid with a hundred dollar bill. The waitress quickly went to get change for her hundred dollar bill, but the old lady had slipped right out the door. She was gone by the time the waitress came back. The waitress wondered where the lady could be. Then she noticed something written on the napkin. There were tears in her eyes when she read what the lady wrote: ‘You don’t owe me anything. I have been there too. Somebody once helped me out, the way I’m helping you. If you really want to pay me back, here is what you do: Do not let this chain of love end with you.’ Under the napkin were four more $100. Well, there were tables to clear, sugar bowls to fill, and people to serve, but the waitress made it through another day. That night when she got home from work and climbed into bed, she was thinking about the money and what the lady had written. How could the lady have known how much she and her husband needed it? With the baby due next month, it was going to be hard…. She knew how worried her husband was, and as he lay sleeping next to her, she gave him a soft kiss and whispered soft and low, ‘Everything’s going to be all right. I love you, Bryan Anderson.’ There is an old saying.. ‘What goes around comes around.’ Today I send you this story, and I’m asking you to pass it on. Let this light shine. God works in wonderful ways and sometimes puts people in our lives for a reason. Don’t delete it, don’t return it… Simply, pass it on to a friend, I just did… 🌷🌷🌷🌷🌷🌷

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पाँच साल की बेटी बाज़ार में गोल गप्पे खाने के लिए मचल गई।


पाँच साल की बेटी बाज़ार में गोल गप्पे खाने के लिए मचल गई। “किस भाव से दिए भाई?” पापा नें सवाल् किया। “10 रूपये के 8 दिए हैं। गोल गप्पे वाले ने जवाब दिया…… पापा को मालूम नहीं था गोलगप्पे इतने महँगे हो गये है….जब वे खाया करते थे तब तो एक रुपये के 10 मिला करते थे। . पापा ने जेब मे हाथ डाला 15 रुपये बचे थे। बाकी रुपये घर की जरूरत का सामान लेने में खर्च हो गए थे। उनका गांव शहर से दूर है 10 रुपये तो बस किराए में लग जाने है। “नहीं भई 5 रुपये में 10 दो तो ठीक है वरना नही लेने। यह सुनकर बेटी नें मुँह फुला लिया…. “अरे अब चलो भी , नहीं लेने इतने महँगे। पापा के माथे पर लकीरें उभर आयीं …. “अरे खा लेने दो ना साहब.. अभी आपके घर में है तो आपसे लाड़ भी कर सकती है… कल को पराये घर चली गयी तो पता नहीं ऐसे मचल पायेगी या नहीं. … तब आप भी तरसोगे बिटिया की फरमाइश पूरी करने को… गोलगप्पे वाले के शब्द थे तो चुभने वाले पर उन्हें सुनकर पापा को अपनी बड़ी बेटी की याद आ गयी…. जिसकी शादी उसने तीन साल पहले एक खाते -पीते पढ़े लिखे परिवार में की थी…… उन्होंने पहले साल से ही उसे छोटी छोटी बातों पर सताना शुरू कर दिया था….. दो साल तक वह मुट्ठी भरभर के रुपये उनके मुँह में ठूँसता रहा पर उनका पेट बढ़ता ही चला गया …. और अंत में एक दिन सीढियों से गिर कर बेटी की मौत की खबर ही मायके पहुँची…. आज वह छटपटाता है कि उसकी वह बेटी फिर से उसके पास लौट आये..? और वह चुन चुन कर उसकी सारी अधूरी इच्छाएँ पूरी कर दे… पर वह अच्छी तरह जानता है कि अब यह असंभव है. “दे दूँ क्या बाबूजी गोलगप्पे वाले की आवाज से पापा की तंद्रा टूटी… “रुको भाई दो मिनिट …. पापा पास ही पंसारी की दुकान थी उस पर गए जहाँ से जरूरत का सामान खरीदा था। खरीदी गई पाँच किलो चीनी में से एक किलो चीनी वापस की तो 40 रुपये जेब मे बढ़ गए। फिर ठेले पर आकर पापा ने डबडबायी आँखें पोंछते हुए कहा अब खिलादे भाई। हाँ तीखा जरा कम डालना। मेरी बिटिया बहुत नाजुक है…. सुनकर पाँच वर्ष की गुड़िया जैसी बेटी की आंखों में चमक आ गई और पापा का हाथ कस कर पकड़ लिया। जब तक बेटी हमारे घर है उनकी हर इच्छा जरूर पूरी करे,… क्या पता आगे कोई इच्छा पूरी हो पाये या ना हो पाये । ये बेटियां भी कितनी अजीब होती हैं ससुराल में कितना भी प्यार मिले….. माँ बाप की एक मुस्कान को तरसती है ये बेटियां…. ससुराल में कितना भी रोएँ पर मायके में एक भी आंसूं नहीं बहाती ये बेटियां…. क्योंकि बेटियों का सिर्फ एक ही आंसू माँ बाप भाई बहन को हिला देता है रुला देता है…. भगवान की अनमोल देंन हैं ये बेटियां …… हो सके तो बेटियों को बहुत प्यार दें उन्हें कभी भी न रुलाये क्योंकि ये अनमोल बेटी दो परिवार जोड़ती है दो रिश्तों को साथ लाती है। अपने प्यार और मुस्कान से। हम चाहते हैं कि सभी बेटियां खुश रहें हमेशा भले ही हो वो मायके में या ससुराल में। ●●●●●●●● खुशकिस्मत है वो जो बेटी के बाप हैं, उन्हें भरपूर प्यार दे, दुलार करें और यही व्यवहार अपनी पत्नी के साथ भी करें क्यों की वो भी किसी की बेटी है और अपने पिता की छोड़ कर आपके साथ पूरी ज़िन्दगी बीताने आयी है। उसके पिता की सारी उम्मीदें सिर्फ और सिर्फ आप से।

दिनेश केडल

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जब श्री कृष्ण महाभारत के युद्ध पश्चात् लौटे तो रोष में भरी रुक्मिणी जी ने उनसे पूछा


जब श्री कृष्ण महाभारत के युद्ध पश्चात् लौटे तो रोष में भरी रुक्मिणी जी ने उनसे पूछा.., ” बाकी सब तो ठीक था किंतु आपने द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह जैसे धर्मपरायण लोगों के वध में क्यों साथ दिया?” श्री कृष्ण ने उत्तर दिया.., “ये सही है की उन दोनों ने जीवन पर्यंत धर्म का पालन किया किन्तु उनके किये एक पाप ने उनके सारे पुण्यों को हर लिया ” “वो कौनसे पाप थे….?” श्री कृष्ण ने कहा :- “जब भरी सभा में द्रोपदी का चीर हरण हो रहा था तब ये दोनों भी वहां उपस्थित थे ,और बड़े होने के नाते ये दुशासन को आज्ञा भी दे सकते थे किंतु इन्होंने ऐसा नहीं किया…. उनका इस एक पाप से बाकी, धर्मनिष्ठता छोटी पड गई” रुक्मिणी जी ने पुछा, “और कर्ण ? वो अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध था , कोई उसके द्वार से खाली हाथ नहीं गया उसकी क्या गलती थी?” श्री कृष्ण ने कहा, “वस्तुतः वो अपनी दानवीरता के लिए विख्यात था और उसने कभी किसी को ना नहीं कहा….. किन्तु जब अभिमन्यु सभी युद्धवीरों को धूल चटाने के बाद युद्धक्षेत्र में आहत हुआ भूमि पर पड़ा था तो उसने कर्ण से, जो उसके पास खड़ा था, पानी माँगा , कर्ण जहाँ खड़ा था उसके पास पानी का एक गड्ढा था किंतु कर्ण ने मरते हुए अभिमन्यु को पानी नहीं दिया….!!! इसलिये उसका जीवन भर दानवीरता से कमाया हुआ पुण्य नष्ट हो गया। बाद में उसी गड्ढे में उसके रथ का पहिया फंस गया और वो मारा गया…। अक्सर ऐसा होता है की हमारे आसपास कुछ गलत हो रहा होता है और हम कुछ नहीं करते । हम सोचते हैं की इस पाप के भागी हम नहीं हैं अगर हम मदद करने की स्थिति में नहीे है तो सच्ची बात बोल तो सकते है परंतु हम ऐसा भी नही करते ऐसा ना करने से हम भी उस पाप के उतने ही हिस्सेदार हो जाते हैं। सीख- आपके अधर्म का एक क्षण सारे जीवन के कमाये धर्म को नष्ट कर सकता है।।