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जंगल में एक गर्भवती हिरनी बच्चे को जन्म देने को थी।


जंगल में एक गर्भवती हिरनी बच्चे को जन्म देने को थी। वो एकांत जगह की तलाश में घुम रही थी, कि उसे नदी किनारे ऊँची और घनी घास दिखी। उसे वो उपयुक्त स्थान लगा शिशु को जन्म देने के लिये। वहां पहुँचते ही उसे प्रसव पीडा शुरू हो गयी। उसी समय आसमान में घनघोर बादल वर्षा को आतुर हो उठे और बिजली कडकने लगी। उसने दाये देखा, तो एक शिकारी तीर का निशाना, उस की तरफ साध रहा था। घबराकर वह दाहिने मुडी, तो वहां एक भूखा शेर, झपटने को तैयार बैठा था। सामने सूखी घास आग पकड चुकी थी और पीछे मुडी, तो नदी में जल बहुत था। मादा हिरनी क्या करती ? वह प्रसव पीडा से व्याकुल थी। अब क्या होगा ? क्या हिरनी जीवित बचेगी ? क्या वो अपने शावक को जन्म दे पायेगी ? क्या शावक जीवित रहेगा ? क्या जंगल की आग सब कुछ जला देगी ? क्या मादा हिरनी शिकारी के तीर से बच पायेगी ?क्या मादा हिरनी भूखे शेर का भोजन बनेगी ? वो एक तरफ आग से घिरी है और पीछे नदी है। क्या करेगी वो ? हिरनी अपने आप को शून्य में छोड, अपने बच्चे को जन्म देने में लग गयी। कुदरत का कारिष्मा देखिये। बिजली चमकी और तीर छोडते हुए, शिकारी की आँखे चौंधिया गयी। उसका तीर हिरनी के पास से गुजरते, शेर की आँख में जा लगा,शेर दहाडता हुआ इधर उधर भागने लगा।और शिकारी, शेर को घायल ज़ानकर भाग गया। घनघोर बारिश शुरू हो गयी और जंगल की आग बुझ गयी। हिरनी ने शावक को जन्म दिया। हमारे जीवन में भी कभी कभी कुछ क्षण ऐसे आते है, जब हम चारो तरफ से समस्याओं से घिरे होते हैं और कोई निर्णय नहीं ले पाते। तब सब कुछ नियति के हाथों सौंपकर अपने उत्तरदायित्व व प्राथमिकता पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।अन्तत: यश, अपयश ,हार ,जीत, जीवन,मृत्यु का अन्तिम निर्णय ईश्वर करता है।हमें उस पर विश्वास कर उसके निर्णय का सम्मान करना चाहिए। कुछ लोग हमारी सराहना करेंगे, कुछ लोग हमारी आलोचना करेंगे। दोनों ही मामलों में हम फायदे में हैं, एक हमें प्रेरित करेगा और दूसरा हमारे भीतर सुधार लाएगा।। अच्छा सोचें

सयानी कमल

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कृष्णवट


“कृष्णवट” _________________________________________________ जैसे “शाक्यमुनि” का जीवन वृक्षों की वंदनवार था, वैसा ही “श्रीकृष्ण” का जीवन-प्रसंग है! “गीता” में तो श्रीकृष्ण ने स्वयं को “वृक्ष” कहा ही है। “समस्त वृक्षों में मैं “अश्वत्थ” हूं।” “अश्वत्थ” यानी पीपल का पेड़। किंतु श्रीकृष्ण केवल अश्वत्थ ही नहीं हैं, वे स्वयं में एक “महावन” हैं! ब्रज में एक नहीं दो नहीं सोलह वन हैं! “शाक्यमुनि” के जीवन के पांच वनों के बारे में पहले बताया था। “लुम्ब‍िनी वन”, जहां वे जन्मे। “शालवन”, जहां देह त्यागी। सारनाथ का “मृगदाव”, जहां धर्मचक्र प्रवर्तन किया। वैशाली का “जेतवन” और राजगृह का “वेणुवन”, जहां आजीवन किया विहार। किंतु अकेले ब्रज में श्रीकृष्ण के सोलह वन हैं। और वनखंडियां तो अगणित! मैं उसी ब्रज की भूमि में “वंशीवट” की तरह स्वयं को रोप देना चाहता हूं! इन सोलह वनों में सबसे कृष्णमय है “वृन्दावन”। “वृन्दा” यानी तुलसी। “वृन्दावन” यानी तुलसी का वन। यह वही तुलसी हैं, जो “शालिग्राम” से ब्याही हैं। “कौस्तुभ” मणि के मुकुट वाले शालिग्राम। यह भी स्मरण रहे कि “राधारानी” के सोलह नामों में से एक “वृन्दा” भी है। उसी “वृन्दा” का वह वन है, ब्रज का “आनंदघन”! “वृन्दावनधाम” के “रमणरेती” में जो “बांकेबिहारी” का विग्रह है, उसकी “त्र‍िभंग” छवि को मैं नतशिर होकर निहारना चाहता हूं! ब्रज में ही “मधुवन” है, जहां श्रीकृष्ण “राधिके! ललिते! विशाखे!” की टेर लगाते थे। उनकी वह टेर “भांडीरवन” तक गूंजती थी। “निधिवन” में जहां “ललिता सखी” के आराधक हरिदासजी की पर्णकुटी थी, वहां तक भी। सुखमा, कामा, कुमुदा, प्रमदा गोपियां जहां श्रीकृष्ण निकुंज लीलाओं की साक्षी थीं, उस “महावन” तक भी। “भद्रवन” से “तालवन” तक वृक्षों की पंक्त‍ियां श्रीकृष्ण की उस डाक में रहतीं निमग्न! “राधिके! ललिते! विशाखे!” ब्रज में सोलह वन और तीन वट हैं : “कृष्णवट”, “वंशीवट”, “श्रीदामवट”। “श्रीहितहरिवंश” के चौरासी पदों में जिन “त्रिवटों” का वर्णन है, मैं प्रलय तक उन्हीं “न्यग्रोधवृक्ष” का करना चाहता हूं अनुगायन! और ब्रज में “कदम्ब” है। श्रीकृष्णरूप से उज्जवल सभी वृक्ष एक तरफ़ और “कदम्ब” का पेड़ दूसरी तरफ़। यूं ही इस वृक्ष को “सुरद्रुम” नहीं कहा है। “सुरद्रुम” यानी “देवतरु”। देवताओं का वृक्ष! ब्रज में ही “कुमुदवन” भी है, जिसमें कदम्बों के पूरे के पूरे कुंज : “कदम्बखंडियां।” मुझे ऐसी ही किसी “कदम्बखंडी” में चैत्र का समीरण बनकर तैरना है! “कदम्ब” भी तीन होते हैं : “राजकदम्ब”, “धूलिकदम्ब” और “कदम्ब‍िका”। यह वृक्ष श्रीकृष्णलीलास्वरूप का प्रतीक बन गया है। यहां तक कि “महानिर्वाणतंत्र” में भी ललिता सखी को “कदम्बवनसंचारा” और “कदम्बवनवासिनी” कहकर इंगित किया गया है। “भागवत” और “पद्मपुराण” ने कदम्ब को श्रीकृष्णलीला का अविच्छेद्य रूप माना है। और कौन जाने, महाकवि बाणभट्ट ने अपनी नायिका को जब “कदम्ब” के नाम पर “कादम्बरी” कहकर पुकारा था तो उनके मन में कौन-सी लीला रही होगी! श्रीकृष्ण भले ही स्वयं को “अश्वत्थ” वृक्ष कहें, मथुराजी के जनवृन्द भले ही बरगदों को “कृष्णवट” की संज्ञा से अभिहित करें, मैं तो श्रीकृष्ण को “कदम्ब” का पेड़ कहकर ही पुकारूंगा। श्रीटीकारीरानी की “ठाकुरबाड़ी” का नतग्रीव कदम्ब! मैं उसी कदम्ब का उपासक बनना चाहता हूं, “शतभिषा” नक्षत्र का जातक जो ठहरा! “जौ खग हौं तौ बसेरो करौं मिलि कालिंदी-कूल कदम्ब की डारन” — इस देवतरु की संज्ञा में ही वह भाव है, जो मुझे बना देता है रसखान! “महाभारत” में अनेक वृक्षों का वर्णन है, जिनकी पहचान अब खो रही। जैसे “अरिष्ट”, “मेषश्रंग”, “प्लक्ष” वृक्ष और “श्लेषमातकी”। केवल गूलर, कुटज, बिल्व, करील को पहचान पाता हूं। और पहचानता हूं वृन्दा को, कदम्ब को, मलयज को। मैं “श्रीकृष्णविग्रह” के ललाट पर लिपा “गोपी-चन्दन” का वृत्त बनना चाहता हूं, ब्रज के मलयजवन का गंधवाह चन्दन! एक ऐसा भी वृक्ष है, जिसे स्वयं एक “वन” कहकर पुकारा गया है। वह है “छितवन”। “सप्तपर्ण” वृक्ष। सागौन नहीं, शीशम नहीं, मैं “छितवन” की छांह में देखना चाहता हूं स्वप्न, यदि श्रीकृष्ण स्वयं को कहकर पुकारें “सप्तपर्ण”। मैं उस सप्तपर्ण की छाल बनना चाहता हूं! वृक्षों की वंदना देवताओं की तरह बहुत कर ली, अब मैं देवताओं की उपासना वृक्षों की भांति करना चाहता हूं! मैं “श्रीकृष्णस्वरूप” को “व्यक्ति” नहीं, “विग्रह” नहीं, एक “वृक्ष” की तरह देखना चाहता हूं। कल्पद्रुम-सा “कृष्णवट”!

प्रमोद कुमार

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कान्हा के प्रेम की कथा


कान्हा के प्रेम की कथा….. (((( माँ-बाबा मुझको भूख लगी है )))) . एक गांव में एक निर्धन जुलाहा दम्पत्ति रहता था। जुलाहे के नाम था सुन्दर और उसकी पत्नी का नाम था लीला। . दोनों पति-पत्नी अत्यंत परिश्रमी थे। सारा दिन परिश्रम करते सुन्दर-सुन्दर कपड़े बनाते, किन्तु उनको उनके बनाए वस्त्रों की अधिक कीमत नहीं मिल पाती थी। . दोनों ही अत्यन्त संतोषी स्वाभाव के थे जो मिलता उसी से संतुष्ट हो कर एक टूटी-फूटी झोपडी में रहकर अपना जीवन-निर्वाह कर लेते थे। . वह दोनों भगवान श्री कृष्ण के परम भक्त थे, दिन भर के परिश्रम के बाद जो भी समय मिलता उसे दोनों भगवान के भजन-कीर्तन में व्यतीत करते। . सुन्दर बाबा के पास एक तानपुरा और एक खड़ताल थी, जब दोनों मिलकर भजन गाते तो सुन्दर तानपुरा बजाता और लीला खड़ताल, फिर तो दोनों भगवान के भजन के ऐसा खो जाते की उनको अपनी भूख-प्यास की चिंता भी नहीं रहती थे। . यूं तो दोनों संतोषी स्वाभाव के थे, अपनी दीन-हीन अवस्था के लिए उन्होंने कभी भगवान् को भी कोई उल्हाना नही दिया और अपने इसी जीवन में प्रसन्न थे किन्तु … . एक दुःख उनको सदा कचोटता रहता था, उनके कोई संतान नहीं थी। इसको लेकर वह सदा चिंतित रहा करते थे, किन्तु रहते थे फिर भी सदा भगवान में मग्न, इसको भी उन्होंने भगवान की लीला समझ कर स्वीकार कर लिया और निष्काम रूप से श्री कृष्ण के प्रेम-भक्ति में डूबे रहते। . जब उनकी आयु अधिक होने लगी तो एक दिन लीला ने सुन्दर से कहा कि हमारी कोई संतान नहीं है, कहते है की संतान के बिना मुक्ति प्राप्त नहीं होती, अब हमारी आयु भी अधिक को चली है, ना जाने कब बुलावा आ जाए, मरने की बाद कौन हमारी चिता को अग्नि देगा और कौन हमारे लिए तर्पण आदि का कार्य करेगा, कैसे हमारी मुक्ति होगी। . सुन्दर बोला तू क्यों चिंता करती है, ठाकुर जी है ना वही सब देखेंगे। सुन्दर ने यह बात कह तो दी किन्तु वह भी चिंता में डूब गया, . तभी उसके मन में एक विचार आया वह नगर में गया और श्री कृष्ण के बाल गोपाल रूप की एक प्रतीमा ले आया। घर आ कर बोला अब तुझे चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है में यह बाल गोपाल लेकर आया हूँ, . हमारे कोई संतान नहीं तो वह भी इन्ही की तो लीला है, हम इनको ही अपने पुत्र की सामान प्रेम करेंगे, यही हमारे पुत्र का दाईत्व पूर्ण करेंगे यही हमारी मुक्ति करेंगे। . सुन्दर की बात सुन कर लीला अत्यंत प्रसन्न हुई, उसने बाल गोपाल को लेकर अपने हृदय से लगा लिया और बोली आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं, आज से यही हमारा लल्ला है। . दोनों पति-पत्नी ने घर में एक कोना साफ़ करके वहां के स्थान बनाया और एक चौकी लगा कर उसपर बाल गोपाल को विराजित कर दिया। . तब से जुलाहा दंपत्ति का नियम हो गया वह प्रतिदिन बाल गोपाल को स्नान कराते उनको धुले वस्त्र पहनाते अपनी संतान की तरह उनको लाड-लडाते, उन्ही के सामने बैठ कर भजन कीर्तन करते और वहीं सो जाते। . . जुलाहा अपने हाथ से बाल गोपाल के लिए सुन्दर वस्त्र बनाता और उनको पहनता इसमें उसको बड़ा आनदं आता। धीरे-धीरे दोनों बाल गोपाल को अपनी संतान के सामान ही प्रेम करने लगे। . लीला का नियम था की वह प्रति दिन अपने हाथ से अपने लल्ला को भोजन कराती तब स्वयं भोजन करती, लल्ला को भोजन कराते समय उसको ऐसा ही प्रतीत होता मानो अपने पुत्र को ही भोजन करा रही हो। . उन दोनों के निश्चल प्रेम को देख कर करुणा निधान भगवान् अत्यन्त्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अदृश्य रूप में आकर स्वयं भोजन खाना आरम्भ कर दिया, . लीला जब प्रेम पूर्वक बाल गोपाल को भोजन कराती तो भगवान् को प्रतीत होता मानो वह अपनी माँ के हाथो से भोजन कर रहें हैं, उनको लीला के हाथ से प्रेम पूर्वक मिलने वाले हर कौर में माँ का प्रेम प्राप्त होता था, . लीलाधारी भगवान श्री कृष्ण स्वयं माँ की उस प्रेम लीला के वशीभूत हो गए। किन्तु लीला कभी नहीं जान पाई कि स्वयं बाल-गोपाल उसके हाथ से भोजन करते हैं। . एक दिन कार्य बहुत अधिक होने के कारण लीला बाल गोपाल को भोजन कराना भूल गई। . गर्मी का समय था भरी दोपहरी में दोनों पति-पत्नी कार्य करते-करते थक गए और बिना भोजन किए ही सो गए, उनको सोए हुए कुछ ही देर हुई थी कि उनको एक आवाज सुनाई दी.. माँ-बाबा मुझको भूख लगी है . दोनों हड़बड़ा कर उठ गए, चारो और देखा आवाज कहाँ से आई है, किन्तु कुछ दिखाई नहीं दिया। . तभी लीला को स्मरण हुआ की उसने अपने लल्ला को भोजन नहीं कराया, वह दौड़ कर लल्ला के पास पहुंची तो देखा की बाल गोपाल का मुख कुम्हलाया हुआ है, . इतना देखते ही दोनों पति-पत्नी वहीं उनके चरणो में गिर पड़े, दोनों की आँखों से आसुओं की धार बह निकली, . लीला तुरंत भोजन लेकर आई और ना जाने कैसा प्रेम उमड़ा की लल्ला को उठा कर अपनी गोद में बैठा लिया और भोजन कराने लगी, दोनों पति-पत्नी रोते जाते और लल्ला को भोजन कराते जाते, साथ ही बार-बार उनसे अपने अपराध के लिए क्षमा मांगे जाते, . . ऐसा प्रगाढ़ प्रेम देख कर भगवान अत्यंत द्रवित हुए और अन्तर्यामी भगवान श्रीहरि साक्षात् रूप में प्रकट हो गए। . भगवान् ने अपने हाथों से अपने रोते हुए माता-पिता की आँखों से आंसू पोंछे और बोले “प्रिय भक्त में तुम्हारी भक्ति और प्रेम से अत्यंत प्रसन्न हूँ, तुम जो चाहो वर माँग लो मैं तुम्हारी प्रत्येक इच्छा पूर्ण करूँगा” . . इतना सुनते ही दोनों भगवान के चरणो में गिर पड़े और बोले “दया निधान आप हमसे प्रसन्न हैं और स्वयं हमारे सम्मुख उपस्थित है, हमारा जीवन धन्य हो गया, इससे अधिक और क्या चाहिए, . इससे अधिक किसी भी वस्तु का भला क्या महत्त्व हो सकता है, आपकी कृपा हम पर बनी रहे बस इतनी कृपा करें” . श्रीहरि बोले “यदि तुम चाहो तो में तुम्हारे जीवन में संतान के आभाव को समाप्त कर के तुम्हे एक सुन्दर संतान प्रदान करूँगा” . यह सुनते ही सुन्दर और लीला एकदम व्याकुल होकर बोले “नही भगवन् हमको संतान नहीं चाहिये” . उनका उत्तर सुनकर भगवान ने पूंछा “किन्तु क्यों ! अपने जीवन में संतान की कमी को पूर्ण करने के लिए ही तो तुम मुझ को अपने घर लेकर आये थे ” . यह सुनकर वह दोनों बोले प्रभु हमको भय है कि यदि हमको संतान प्राप्त हो गई तो हमारा मोह उस संतान के प्रति बड़ जाएगा और तब हम आपकी सेवा नहीं कर पाएंगे” . उनका प्रेम और भक्ति से भरा उत्तर सुनकर करुणा निधान भगवान् करुणा से भर उठे, स्वयं भगवान् की आँखों से आँसू टपक पड़े वह बोले, . “हे मैया, बाबा में यहाँ आया था आपके ऋण को उतारने के लिए किन्तु आपने तो मुझको सदा-सदा के लिए अपना ऋणी बना लिया, . में आपके प्रेम का यह ऋण कभी नहीं उतार पाउँगा, में सदा-सदा तुम दोनों का ऋणी रहूँगा, में तुम्हारे प्रेम से अत्यंत प्रसन्न हूँ तुमने अपने निर्मल प्रेम से मुझको भी अपने बंधन में बांध लिया है. . में तुमको वचन देता हूँ कि आज से में तुम्हारे पुत्र के रूप में तुम्हारे समस्त कार्य पूर्ण करूँगा तुमको कभी संतान का आभाव नहीं होने दूंगा, मेरा वचन कभी असत्य नहीं होता” ऐसा कह कर भक्तवत्सल भगवान् बाल गोपाल की प्रतिमा में विलीन हो गए। . उस दिन से सुन्दर और लीला का जीवन बिल्कुल ही बदल गया उन्होंने सारा काम-धंधा छोड़ दिया और सारा दिन बाल गोपाल के भजन-कीर्तन और उनकी सेवा में व्यतीत करने लगे। . उनको ना भूख-सताती थी ना प्यास लगती थी, सभी प्रकार की इच्छाओं का उन्होंने पूर्ण रूप से त्याग कर दिया, . सुन्दर कभी कोई कार्य करता तो केवल अपने बाल गोपाल के लिए सुन्दर-सुन्दर वस्त्र बनाने का। उनके सामने जब भी कोई परेशानी आती बाल गोपाल तुरंत ही एक बालक के रूप में उपस्तिथ हो जाते और उनके समस्त कार्य पूर्ण करते । . वह दंपत्ति और बालक गांव भर में चर्चा का विषय बन गए, किन्तु गाँव में कोई भी यह नहीं जान पाया की वह बालक कौन है, कहाँ से आता है, और कहाँ चला जाता है। . धीरे-धीरे समय बीतने लगा, जुलाह दंपत्ति बूढ़े हो गए, किन्तु भगवान की कृपा उन पर बनी रही, अब दोनों की आयु पूर्ण होने का समय आ चला था भगवत प्रेरणा से उनको यह ज्ञात हो गया की अब उनका समय पूरा होने वाला है, . एक दिन दोनों ने भगवान को पुकारा ठाकुर जी तुरंत प्रकट हो गए और उनसे उनकी इच्छा जाननी चाही, दोनों भक्त दम्पत्ति भगवान के चरणो में प्रणाम करके बोले …. . “है नाथ हमने अपने पूरे जीवन में आपसे कभी कुछ नहीं माँगा, अब जीवन का अंतिम अमय आ गया है, इसलिए आपसे कुछ मांगना चाहते हैं” . भगवान बोले “निःसंकोच अपनी कोई भी इच्छा कहो में वचन देता हूँ कि तुम्हारी प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करूँगा” . तब बाल गोपाल के अगाध प्रेम में डूबे उस वृद्ध दम्पति बोले “हे नाथ हमने अपने पुत्र के रूप में आपको देखा, और आपकी सेवा की आपने भी पुत्र के समान ही हमारी सेवा करी अब वह समय आ गया है जिसके लिए कोई भी माता-पिता पुत्र की कामना करते हैं, . है दीनबंधु हमारी इच्छा है की हम दोनों पति-पत्नी के प्राण एक साथ निकले और है दया निधान जिस प्रकार एक पुत्र अपने माता-पिता की अंतिम क्रिया करता है, और उनको मुक्ति प्रदान करता है, उसी प्रकार है परमेश्वर हमारी अंतिम क्रिया आप अपने हाथो से करें और हमको मुक्ति प्रदान करें” . श्रीहरि ने दोनों को उनकी इच्छा पूर्ण करने का वचन दिया और बाल गोपाल के विग्रह में विलीन हो गए। . अंत में वह दिन आ पहुंचा जब प्रत्येक जीव को यह शरीर छोड़ना पड़ता है, दोनों वृद्ध दम्पति बीमार पड़ गए, उन दोनों की भक्ति की चर्चा गांव भर में थी इसलिए गांव के लोग उनका हाल जानने उनकी झोपडी पर पहुंचे, . किन्तु उन दोनों का ध्यान तो श्रीहरि में रम चुका था उनको नही पता कि कोई आया भी है, नियत समय पर एक चमत्कार हुआ जुलाहे की झोपड़ी एक तीर्व और आलौकिक प्रकाश से भर उठी, . वहां उपस्थित समस्त लोगो की आँखे बंद हो गई, किसी को कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था, कुछ लोग तो झोपडी से बाहर आ गए कुछ वही धरती पर बैठ गए। . श्री हरी आपने दिव्य चतर्भुज रूप में प्रकट हुए, उनकी अप्रितम शोभा समस्त सृष्टि को आलौकित करने वाली थी, वातावरण में एक दिव्य सुगंध भर गई, . अपनी मंद-मंद मुस्कान से अपने उन भक्त माता-पिता की और देखते रहे, उनका यह दिव्य रूप देख कर दोनों वृद्ध अत्यंत आनंदित हुए, . अपने दिव्य दर्शनों से दोनों को तृप्त करने के बाद करुणा निधान, लीलाधारी, समस्त सृष्टि के पालन हार श्री हरी, वही उन दोनों के निकट धरती पर ही उनके सिरहाने बैठ गए, . भगवान् ने उन दोनों भक्तों का सर अपनी गोद में रखा, उनके शीश पर प्रेम पूर्वक अपना हाथ रखा, तत्पश्चात अपने हाथो से उनके नेत्र बंद कर दिए, . तत्काल ही दोनों के प्राण निकल कर श्री हरी में विलीन हो गए, पंचभूतों से बना शरीर पंच भूतो में विलीन हो गया। . कुछ समय बाद जब वह दिव्य प्रकाश का लोप हुआ तो सभी उपस्थित ग्रामीणो ने देखा की वहां ना तो सुन्दर था, ना ही लीला थी और ना ही बाल गोपाल थे। . शेष थे तो मात्र कुछ पुष्प जो धरती पर पड़े थे और एक दिव्य सुगंध जो वातावरण में चहुं और फैली थी। विस्मित ग्रामीणो ने श्रद्धा से उस धरती को नमन किया, . उन पुष्पों को उठा कर शीश से लगाया तथा सुंदर, लीला की भक्ति और गोविन्द के नाम का गुणगान करते हुए चल दिए उन पुष्पों के श्री गंगा जी में विसर्जित करने के लिए। . मित्रो…भक्त वह है जो एक क्षण के लिए भी विभक्त नहीं होता, अर्थात जिसका चित्त ईश्वर में अखंड बना रहे वह भक्त कहलाता है। सरल शब्दों में भक्ति के अंतिम चरण का अनुभव करने वाले को भक्त कहते हैं । ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ (((((((((( जय जय श्री राधे )))))))))) ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ प्रेम से बोलो जय श्री राधे…. 🌿🌿🌿🌿🌿 🌹Զเधे Զเधे🌹 . ๑ ,(-_-), ‘\””’.\’=’-. Զเधे Զเधे \/..\\,’ //””) Զเधे Զเधे (\ / \ |, ,,; ‘, 🌹🇷 🇦 🇩 🇭 🇪🌹 🌹🇷 🇦 🇩 🇭 🇪🌹 🙏🏻🌷जय श्री कृष्णा🌷🙏🏻

R K Neekhara

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क्या सिखाता है भगवान कृष्ण का स्वरूप ?


क्या सिखाता है भगवान कृष्ण का स्वरूप ? कभी सोचा है भगवान कृष्ण का स्वरूप हमें क्या सिखाता है। क्यों भगवान जंगल में पेड़ के नीचे खड़े बांसुरी बजा रहे हैं, मोरमुकुट पहने, तन पर पीतांबरी, गले में वैजयंती की माला, साथ में राधा, पीछे गाय। कृष्ण की यह छवि हमें क्या प्रेरणा देती है। क्यों कृष्ण का रूप इतना मनोहर लगता है। दरअसल कृष्ण हमें जीवन जीना सिखाते हैं, उनका यह स्वरूप अगर गहराई से समझा जाए तो इसमें हमें सफल जीवन के कई सूत्र मिलते हैं। विद्वानों का मत है कि भगवान विरोधाभास में दिखता है। आइए जानते हैं कृष्ण की छवि के क्या मायने हैं। 1. मोर मुकुट – भगवान के मुकुट में मोर का पंख है। यह बताता है कि जीवन में विभिन्न रंग हैं। ये रंग हमारे जीवन के भाव हैं। सुख है तो दुख भी है, सफलता है तो असफलता भी, मिलन है तो बिछोह भी। जीवन इन्हीं रंगों से मिलकर बना है। जीवन से जो मिले उसे माथे लगाकर अंगीकार कर लो। इसलिए मोर मुकुट भगवान के सिर पर है। 2. बांसुरी – भगवान बांसुरी बजा रहे हैं, मतलब जीवन में कैसी भी घडी आए हमें घबराना नहीं चाहिए। भीतर से शांति हो तो संगीत जीवन में उतरता है। ऐसे ही अगर भक्ति पानी है तो अपने भीतर शांति कायम करने का प्रयास करें। 3. वैजयंती माला – भगवान के गले में वैजयंती माला है, यह कमल के बीजों से बनती है। इसके दो मतलब हैं कलम के बीच सख्त होते हैं, कभी टूटते नहीं, सड़ते नहीं, हमेशा चमकदार बने रहते हैं। भगवान कह रहे हैं जब तक जीवन है तब तक ऐसे रहो जिससे तुम्हें देखकर कोई दुखी न हो। दूसरा यह माला बीज की है और बीज ही है जिसकी मंजिल होती है भूमि। भगवान कहते हैं जमीन से जुड़े रहो, कितने भी बड़े क्यों न बन जाओ, हमेशा अपने अस्तित्व की असलियत के नजदीक रहो 4. पीतांबर – पीला रंग सम्पन्नता का प्रतीक है। भगवान कहते हैं ऐसा पुरुषार्थ करो कि सम्पन्नता खुद आप तक चल कर आए। इससे जीवन में शांति का मार्ग खुलेगा। 5. कमरबंद – भगवान ने पीतांबर को ही कमरबंद बना रखा है। इसका अर्थ है हमेशा चुनौतियों के लिए तैयार रहें। धर्म के पक्ष में जब भी कोई कर्म करना पड़े हमेशा तैयार रहें। Jai ho bihari ji ki🙏🙏🙏🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

R K Neekhara

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स्वामी श्रद्धानन्द और मोहनदास करमचंद गाँधी हिन्दू-मुस्लिम दंगे फैले थे। गाँधी जी स्वामी श्रद्धानन्द जी से मिलने के लिए उनके आवास पर जाते है। दोनों में अभिवादन हुआ। गाँधी जी – स्वामी जी आपसे कुछ बात करनी थी, एकांत में। स्वामी जी – आइये फिर दोनों के सेवक बाहर रुकते है और स्वामी जी गाँधी जी को अंदर ले जाते है। गाँधी जी – स्वामी जी दंगो के कारण हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बड़ा बुरा असर पड़ रहा है। आपके कहने से दंगे रुक सकते है। आप हिन्दुओ को कहिये कि वो मुसलमानो को न मारे। हिन्दू-मुस्लिम एकता आवश्यक है। स्वामी जी – और इस हिन्दू-मुस्लिम एकता का स्वरुप क्या होगा गाँधी जी? एकता परस्पर होती है। प्रेम और एकता एक दूसरे के भावनाओ के सम्मान पर टिकी होती है। गाँधी जी – स्वामी जी हिन्दू-मुस्लिम एकता के बिना “स्वराज” नहीं मिल पायेगा। स्वामी जी – ये भ्रम क्यों फैलाया जा रहा है गाँधी जी? गाँधी जी – स्वामी जी आप अपने संगठन “भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा” (घर वापसी के लिए स्थापित) को बंद कर दीजिये। स्वामी जी – ठीक है! यदि आप चाहते है की मैं “भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा” को बंद कर दूँ, शुद्धि सभा का अभियान बंद कर दूँ, तो मैं कर देता हूँ, किन्तु क्या आप इतने ही अधिकारपूर्वक मुसलमानो से ये बात कह पाएंगे कि वो ज़बरदस्ती हिन्दुओ का धर्म-परिवर्तन बंद कर दें। गाँधी जी – स्वामी जी हमे आपका सहयोग चाहिए। स्वामी श्रद्धानन्द – मैंने तो सदैव ही आपके साथ सहयोग किया है। जब आप साऊथ अफ्रीका में आंदोलन चला रहे थे उस समय हमने और हमारे गुरुकुल के बच्चों ने सर पर मिटटी ढो के आपके आंदोलन के सहयोग के लिए पैसे भेजे थे। बच्चों ने घी-दूध तक पीना-खाना छोड़ दिया था। गाँधी जी – इस बात के लिए मैं सदैव आपका ऋणी रहूँगा। स्वामी जी – तो आपके साथ तो असहयोग की कोई बात ही नहीं है, किन्तु आज आवश्यकता इस बात की है कि इस देश की बहुसंख्यक जनता की भावनाओ को भी समझा जाए। गाँधी जी लौट गए। फिर समाचार पत्रो में छपा की “गाँधी जी अनशन पर गए”। 21 दिन के बाद गाँधी जी ने अनशन तोडा। गाँधी जी इसी प्रकार “ब्लैकमेल” की राजनीति करते थे। इस बात पर स्वामी श्रद्धानन्द जी बहुत दुखी हुए और गंगा किनारे संध्या के समय ईश्वर से प्रार्थना की और कहा- “हे ईश्वर! मुझे शक्ति दो। मुझे शक्ति दो की मैं राजनितिक अवसरवादिता से लड़ सकूँ। तुम्हारी सृष्टि में पल रहे मानवमात्र की सेवा कर सकूँ। अपने जीवन की हर सांस उनके उत्थान में अर्पित करूँ। चाहे जितना भी षड्यंत्र हो, जितना भी विरोध हो मैं सत्य के मार्ग से कभी न डिगु और सदैव मानवता की सेवा करता रहूँ। मुझे शक्ति दो ईश्वर, मुझे शक्ति दो।” कुछ कुछ अज्ञानी लोग गाँधी जी के लेख दिखाकर कहते है कि गाँधी जी कहते थे कि आर्य समाज साम्प्रदायिकता और झगड़ें फैलाता है। क्या वो सभी गाँधी जी के प्रत्येक कार्य से सहमत है। गाँधी जी एक सर्वमान्य नेता बनने की चाह में बहुसंख्यको की भावनाओ को नज़रअंदाज़ करते थे। उन्होंने हिन्दू समाज, दलितों, विधवाओ की आवाज ही नहीं उठाई सहारा भी दिया, फिर भी स्वामी जी को गाँधी जी की अवसरवादिता भरी राजनीति का शिकार होकर मुसलमानो से सीने में गोली खानी पड़ी और बलिदान दिया। स्वामी श्रद्धानन्द जी ने अछूत शब्द को जातिसूचक मानते हुए दलित शब्द को प्राथमिकता देते हुए कहा कि आर्थिक स्थिति का सूचक शब्द दलित है अतः अछूतों को दलित कहा गया। स्वामी श्रद्धानन्द, पंडित लेखराम, महाशय राजपाल, महात्मा फूल सिंह ये महापुरुष वैदिक धर्म की रक्षा करते हुए मुसलमानो की गोली और खंजर का शिकार हुए। यदि हिन्दू समाज उसी समय सचेत होता और आर्य समाज का साथ देता तो केरल, बंगाल, कश्मीर, कैराना जैसी स्थिति कभी न आती।

नीरज एय अँधेड़ी

Posted in हास्यमेव जयते

एक पहाड़ी पर एक जाट जानवर चरा रहा था.. तभी वहाँ एक हेलीकॉप्टर उतरा..


एक पहाड़ी पर एक जाट जानवर चरा रहा था.. तभी वहाँ एक हेलीकॉप्टर उतरा..

 

उसमें से एक आदमी उतरा..

 

उसने उस जाट से कहा – अगर मैं बिना गिने गायों की संख्या बता दूँ, तो

क्या तुम मुझे एक बछड़ा दे दोगे..??

 

जाट बोला – दे दूंगा..

 

उस आदमी ने मोबाइल में Google Map से वहाँ की Location ली और उसे ISRO को भेज कर पूछा कि – इस पहाड़ी पर कितने जीवित प्राणी हैं..??

 

जवाब आया – 35 प्राणी..

 

उस आदमी ने 2 कम करके कहा कि – तुम्हारे पास 33 गाय हैं..

जाट बोला – जी हाँ ! ये 33 ही हैं..

 

वो आदमी बोला – तो अब एक बछड़ा मुझे दो..

 

जाट ने दे दिया..

 

आदमी जब हेलीकॉप्टर में बछड़ा ले जाने लगा तो जाट बोला – अगर मैं आपका नाम बता दूँ, तो क्या आप मेरा जानवर मुझे वापिस दे देंगे..??

 

आदमी बोला – बताओ..??

 

जाट – आप “राहुल गाँधी” हो.. 😉😉

 

राहुल गांधी – तुमने कैसे पहचाना..?? 😳😳

 

जाट बोला – बहुत ही आसान है.. पहली बात आप बिन बुलाये आये हो..

दूसरी, जिन्हें आप गायें बता रहे हो, वह भेंड़ हैं.. और तीसरी बात यह कि जिसे आप ले जा रहे हो वह बछड़ा नहीं कुत्ता है..

 

राहुल बेहोश… 😜😜😂

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भारत को आखिर बॉलीवुड ने दिया क्या है ?


भारत को आखिर बॉलीवुड ने दिया क्या है ?
निवेदन एक बार जरूर पढे
👇👇👇👇👇👇👇👇👇
बॉलीवुड ने भारत को इतना सब कुछ दिया है, तभी तो आज देश यहाँ है …

1. बलात्कार गैंग रेप करने के तरीके।
2. विवाह किये बिना लड़का लड़की का शारीरिक सम्बन्ध बनाना।
3. विवाह के दौरान लड़की को मंडप से भगाना
4. चोरी डकैती करने के तरीके।
5. भारतीय संस्कारो का उपहास उडाना।
6. लड़कियो को छोटे कपडे पहने की सीख देना….
जिसे फैशन का नाम देना।
7. दारू सिगरेट चरस गांजा कैसे पिया और लाया जाये।
8. गुंडागर्दी कर के हफ्ता वसूली करना।
9. भगवान का मजाक बनाना और अपमानित करना।
10. पूजा पाठ यज्ञ करना पाखण्ड है व नमाज पढ़ना ईश्वर की सच्ची पूजा है।
11. भारतीयों को अंग्रेज बनाना।
12. भारतीय संस्कृति को मूर्खता पूर्ण बताना और पश्चिमी संस्कृति को श्रेष्ठ बताना।
13. माँ बाप को वृध्दाश्रम छोड़ के आना।
14. गाय पालन को मज़ाक बनाना और कुत्तों को उनसे श्रेष्ठ बताना और पालना सिखाना।
15. रोटी हरी सब्ज़ी खाना गलत बल्कि रेस्टोरेंट में पिज़्ज़ा बर्गर कोल्ड ड्रिंक और नॉन वेज खाना श्रेष्ठ है।
16. पंडितों को जोकर के रूप में दिखाना, चोटी रखना या यज्ञोपवीत पहनना मूर्खता है मगर बालो के अजीबो गरीब स्टाइल (गजनी) रखना व क्रॉस पहनना श्रेष्ठ है उससे आप सभ्य लगते है।
17. शुद्ध हिन्दी या संस्कृत बोलना हास्य वाली बात है और उर्दू या अंग्रेजी बोलना सभ्य पढ़ा-लिखा और अमीरी वाली बात…
हमारे देश की युवा पीढ़ी बॉलीवुड को और उसके अभिनेता और अभिनेत्रियों का अपना आदर्श मानती है…..
अगर यही बॉलीवुड देश की संस्कृति सभ्यता दिखाए ..
तो सत्य मानिये हमारी युवा पीढ़ी अपने रास्ते से कभी नही भटकेगी…
समझिये ..जानिए और आगे बढिए…

ये संदेश उन हिन्दू ,लौंडो के लिए है
जो फिल्म देखने के बाद
गले में क्रोस मुल्ले जैसी छोटी सी दाड़ी रख कर
खुद को मॉडर्न समझते हैं
हिन्दू नौजवानौं के रगो में धीमा जहर भरा जा रहा है
फिल्म जेहाद
*****
सलीम – जावेद की जोड़ी की लिखी हुई फिल्मो को देखे, तो उसमे आपको अक्सर बहुत ही चालाकी से हिन्दू धर्म का मजाक तथा मुस्लिम / इसाई / साईं बाबा को महान दिखाया जाता मिलेगा. इनकी लगभग हर फिल्म में एक महान मुस्लिम चरित्र अवश्य होता है और हिन्दू मंदिर का मजाक तथा संत के रूप में पाखंडी ठग देखने को मिलते है.

फिल्म “शोले” में धर्मेन्द्र भगवान् शिव की आड़ लेकर “हेमामालिनी” को प्रेमजाल में फंसाना चाहता है जो यह साबित करता है कि – मंदिर में लोग लडकियां छेड़ने जाते है. इसी फिल्म में ए. के. हंगल इतना पक्का नमाजी है कि – बेटे की लाश को छोड़कर, यह कहकर नमाज पढने चल देता है.कि- उसे और बेटे क्यों नहीं दिए कुर्बान होने के लिए.

“दीवार” का अमिताभ बच्चन नास्तिक है और वो भगवान् का प्रसाद तक नहीं खाना चाहता है, लेकिन 786 लिखे हुए बिल्ले को हमेशा अपनी जेब में रखता है और वो बिल्ला भी बार बार अमिताभ बच्चन की जान बचाता है. “जंजीर” में भी अमिताभ नास्तिक है और जया भगवान से नाराज होकर गाना गाती है लेकिन शेरखान एक सच्चा इंसान है.

फिल्म ‘शान” में अमिताभ बच्चन और शशिकपूर साधू के वेश में जनता को ठगते है लेकिन इसी फिल्म में “अब्दुल” जैसा सच्चा इंसान है जो सच्चाई के लिए जान दे देता है. फिल्म “क्रान्ति” में माता का भजन करने वाला राजा (प्रदीप कुमार) गद्दार है और करीमखान (शत्रुघ्न सिन्हा) एक महान देशभक्त, जो देश के लिए अपनी जान दे देता है.

अमर-अकबर-अन्थोनी में तीनो बच्चो का बाप किशनलाल एक खूनी स्मग्लर है लेकिन उनके बच्चों अकबर और अन्थोनी को पालने वाले मुस्लिम और ईसाई महान इंसान है. साईं बाबा का महिमामंडन भी इसी फिल्म के बाद शुरू हुआ था. फिल्म “हाथ की सफाई” में चोरी – ठगी को महिमामंडित करने वाली प्रार्थना भी आपको याद ही होगी.

कुल मिलाकर आपको इनकी फिल्म में हिन्दू नास्तिक मिलेगा या धर्म का उपहास करता हुआ कोई कारनामा दिखेगा और इसके साथ साथ आपको शेरखान पठान, DSP डिसूजा, अब्दुल, पादरी, माइकल, डेबिड, आदि जैसे आदर्श चरित्र देखने को मिलेंगे. हो सकता है आपने पहले कभी इस पर ध्यान न दिया हो लेकिन अबकी बार ज़रा ध्यान से देखना.

केवल सलीम / जावेद की ही नहीं बल्कि कादर खान, कैफ़ी आजमी, महेश भट्ट, आदि की फिल्मो का भी यही हाल है. फिल्म इंडस्ट्री पर दाउद जैसों का नियंत्रण रहा है. इसमें अक्सर अपराधियों का महिमामंडन किया जाता है और पंडित को धूर्त, ठाकुर को जालिम, बनिए को सूदखोर, सरदार को मूर्ख कामेडियन, आदि ही दिखाया जाता है.

“फरहान अख्तर” की फिल्म “भाग मिल्खा भाग” में “हवन करेंगे” का आखिर क्या मतलब था ? pk में भगवान् का रोंग नंबर बताने वाले आमिर खान क्या कभी अल्ला के रोंग नंबर 786 पर भी कोई फिल्म बनायेंगे ? मेरा मानना है कि – यह सब महज इत्तेफाक नहीं है बल्कि सोची समझी साजिश है एक चाल है ।

Posted in हास्यमेव जयते

एक बार एक अंग्रेज हिंदुस्तान आया


एक बार एक अंग्रेज हिंदुस्तान आया😇😇😇😇

.

उसने एक दुकानदार से कहा कि😇😇😇😇

मुझे आप हिन्दी सिखाओ।

.

.😇😇😇😇

मैं आपके यहां नौकरी करूंगा।

.😇😇😇

उसने कहा मेरे पास एक सेब की दुकान है।😇😇😇😇

यहां जो भी ग्राहक आता है वो तीन चीजें😇😇😇

बोलता है। पहली ‘सेब क्या भाव हैं?’

दूसरी, ‘कुछ खराब हैं’

.😇😇😇

और तीसरी, ‘मुझे नहीं लेने।’

.

इसके बाद दुकानदार ने अंग्रेज को बताया,😇😇😇😇

‘इनके 😇😇जवाब में तुम बोलना, ‘तीस रुपए किलो।’

फिर कहना, ‘कुछ- कुछ खराब हैं।’😇😇😇😇

और जब ग्राहक जाने

लगे तो उससे कहना, ‘तुम नहीं ले😇😇😇😇

जाओगे तो कोई और ले जाएगा।😇😇😇😇

.

हम तो खड़े ही इस काम के लिए हैं।’

.😇😇😇😇

.😇😇😇😇

थोड़ी देर बाद दुकान पर एक लड़की आई।😇😇😇

उसने पूछा, ‘रेलवे स्टेशन

कौन-सा रास्ता जाता है?’

.😇😇😇😇😇

अंग्रेज : तीस रुपए किलो।

.😇😇😇😇😇

लड़की : क्या बक रहे हो, दिमाग😇😇😇😇

खराब है क्या?😇😇😇

अंग्रेज : कुछ-कुछ खराब है।

.😇😇😇😇

.😄😇😇😇

लड़की (गुस्से में) : तुझे तो थाने लेकर जाना

पड़ेगा।😄😄

अंग्रेज : तुम नहीं ले जाओगी तो कोई और ले

जाएगा। 😄😄हम तो खड़े ही इस काम के लिए हैं

Posted in हास्यमेव जयते

IND vs PAK पर नेताओं की प्रतिक्रिया :-*


IND vs PAK पर नेताओं की प्रतिक्रिया :-*

 

*केजरीवाल :-*

जनता पाकिस्तान के साथ है, फिर भारत ये मैच कैसे जीत सकता है ?? मोदी जी ने स्कोरबोर्ड से छेड़छाड़ करवाई है जी। जब 40 ओवर में 213 रन बनते हैं,10 ओवर में 53 के हिसाब से,तो अंतिम 8 ओवर में इन्होंने100 से ज्यादा रन कैसे बना लिए इसकी जाँच होनी चाहिये। मोदी जी देश की आँखों में धूल झोंक रहे हैं।

 

 

*सौरभ भारद्वाज :-*

मैंने विदेशों में काफी कार्य किया है।मैं जानता हूँ कि स्कोरबोर्ड कैसे हैक किया जाता है। मैं केवल 90 सेकंड में मैं स्कोरबोर्ड हैक कर सकता हूँ।मैं चुनौती देता हूँ, केवल 90 सेकंड मुझे दे दो,फिर देखना केवल पाकिस्तान ही जीतेगा।

 

*मायावती :-*

मोदी जी मनुवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। वो दूसरों को आगे बढ़ने  देना नही चाहते। उनके राज में मुस्लिमों पर अत्याचार बढ़ा है। हमारी संवेदनायें पाकिस्तान के साथ है।

 

*राहुल गाँधी :-*

मोदी जी केवल एक विचारधारा सब पर थोपना चाहते हैं। इसलिये उन्होंने पहले तो पाकिस्तानियों को खूब मारा और फिर जब उनकी बल्लेबाजी आयी,तो जल्दी आउट कर दिया। ये उनकी आवाज दबाने की कोशिश है। उन्हें भी हक है चौके छक्के मारने का। उन्हें भी हक था कि वो पुरे 48 ओवर्स बल्लेबाजी करते। इस तरह आप उन्हें नही हरा  सकते। आप उनका हक छीन रहे हो ।हम उनके हक के लिए हमेशा लड़ते रहे हैं, और आगे भी लड़ेंगे। हम मोदी जी से डरने वाले नही हैं।

 

*के सी त्यागी :-* देखिये,क्रिकेट एक सेक्युलर खेल है, और यही इसकी खूबसूरती है। आप इस तरह किसी को नही हरा सकते । मैं मानता हूँ कि अंतिम के ओवरों में कोहली को ज्यादा आक्रामक नही होना चाहिए था, और पंड्या ने जो लगातार तीन छक्के मारे मैं उससे बिल्कुल भी सहमत नही हूँ। ऐसा नही होना चाहिये था।यह घटना दुखद घटना है। मैं इसकी निंदा करता हूँ।

 

*मुलायम सिंह यादव :-* पाकिस्तान को जिताने के लिये अगर मुझे कई खिलाड़ियों के टिकट काटने पड़ते,तो भी मैं पीछे नही हटता।

 

*लालू यादव :-*

हॉप बुड़बक, ई कौनो अपने से जीता है।मोदिया जितवाया है सबके।ई सब संघी विचारधारा के लोग भारत के लिए खतरा है।बताईये त, अपना बेरी चार बार पानी गिरवाये, सुस्ता सुस्ता के बैटिंग किए…. अउ जब पाकिस्तान का बारी आया तो धूप निकलवा दिये। एतना गर्मी में कौन खेले पायेगा। अब देखियेगा, हम सब ऊपरे वाला मिल के ई सब संघी लोग के कैसे आउट करेंगे….जाइये रहे हैं दिल्ली।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक बार एक अंग्रेज हिंदुस्तान आया


एक बार एक अंग्रेज हिंदुस्तान आया😇😇😇😇

उसने एक दुकानदार से कहा कि😇😇😇😇

मुझे आप हिन्दी सिखाओ।

मैं आपके यहां नौकरी करूंगा।

.😇😇😇

उसने कहा मेरे पास एक सेब की दुकान है।😇😇😇😇

यहां जो भी ग्राहक आता है वो तीन चीजें😇😇😇

बोलता है। पहली ‘सेब क्या भाव हैं?’

दूसरी, ‘कुछ खराब हैं’

.😇😇😇

और तीसरी, ‘मुझे नहीं लेने।’

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इसके बाद दुकानदार ने अंग्रेज को बताया,😇😇😇😇

‘इनके 😇😇जवाब में तुम बोलना, ‘तीस रुपए किलो।’

फिर कहना, ‘कुछ- कुछ खराब हैं।’😇😇😇😇

और जब ग्राहक जाने

लगे तो उससे कहना, ‘तुम नहीं ले😇😇😇😇

जाओगे तो कोई और ले जाएगा।😇😇😇😇

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हम तो खड़े ही इस काम के लिए हैं।’

.😇😇😇😇

.😇😇😇😇

थोड़ी देर बाद दुकान पर एक लड़की आई।😇😇😇

उसने पूछा, ‘रेलवे स्टेशन

कौन-सा रास्ता जाता है?’

.😇😇😇😇😇

अंग्रेज : तीस रुपए किलो।

.😇😇😇😇😇

लड़की : क्या बक रहे हो, दिमाग😇😇😇😇

खराब है क्या?😇😇😇

अंग्रेज : कुछ-कुछ खराब है।

.😇😇😇😇

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लड़की (गुस्से में) : तुझे तो थाने लेकर जाना

पड़ेगा।😄😄

अंग्रेज : तुम नहीं ले जाओगी तो कोई और ले

जाएगा। 😄😄हम तो खड़े ही इस काम के लिए हैं