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एक शादीशुदा जोड़ा टीवी पर IPL का मैच साथ में देख रहे होते हैं ।


एक शादीशुदा जोड़ा टीवी पर IPL का मैच साथ में देख रहे होते हैं । ( पाँच भिनट के बाद ) पत्नी: ये ब्रेट ली है क्या..? ) पति : ” नहीं ” ये क्रिस गेल है । ब्रेट ली तो गेंदबाज़ है । पत्नी: ब्रेट ली तो काफी स्मार्ट है।उसे तो अपने भाई की तरह फिल्मों में हीरो बन जाना चाहिए। पति : उसका कोई भाई अभिनेता नहीं है। पत्नी:तो ये ब्रूस ली कौन है फिर ? ) पति: ” अरे नहीं भाई ” ब्रेट ली तो आस्ट्रेलिया से है। पत्नी: ” अरे वाह ” वो देखो दो मिनट में एक और विकेट गिर गया। पति: ” अरे नहीं ” ये एक्शन रिप्ले है। पत्नी : ऐसा लग रहा है कि भारत जीत जायेगा पति: इसमें भारत नहीं खेलता है। ये चेन्नई और कोलकाता के बीच है। पत्नी: ये अंपायर हेलीकाप्टर क्यों बुला रहा है ? पति: वो हेलीकाप्टर नहीं बुला रहा है। ये फ्री हिट है। पत्नी: दर्शकों ने क्या पैसे नहीं दिये जो ये फ्री हिट दे रहा है ? ) पत्नी: अब ये किसे हाय कह रहा है ? पति: ये ” बाय ” का इशारा है। पत्नी: ये बाय क्यों कह रहा है ? ) क्या मैच खत्म हो गया है ? पत्नी: अब कितने रन और चाहिए जीतने के लिए ? पति: 36 गेंदों में 72 रन चाहिए। पत्नी: ” ओह बस ” ये तो कितना आसान है। केवल 1 गेंद पर 2 रन ही बनाना है। ( पति टीवी बंद कर देता है ) पत्नी टीवी चलाती है और ‘Jodha Akbar’ देखने लग जाती है ) 😊 पति: ये “Jodha ” कौन है ? पत्नी : तुम्हारी माँ है अब अगर तुमने मुझे परेशान किया तो देख लेना ” ) 😡 पति : 😳😳

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एक दृश्य साड़ी की दुकान ये वाला लुगरा बने लागत हे बाबूजी।


एक दृश्य साड़ी की दुकान ये वाला लुगरा बने लागत हे बाबूजी। ये तो सिरिफ हजार रुपया के आए। येला देख येहा पन्द्रह सौ के हरय मोला इही बने लागत हे। माहँगी हे बाबू येला नई लँव। ऐके बार तो तीजा आथे बेटी इही साड़ी ल रखले। दूसरा दृश्य मनियारी दुकान जौन जौन तोला बने लागत हे छांट ले बेटी। अरे तोर जगह त ओ वाला चीज नई ये ना उहू ल लेले। अन्य दृश्य कई और दुकानों के सामने येला भी लेबे का बेटी। नहीं बाबू मोर जगह हाबय। येदे ह तो तोर घर म नई ये ना येला लेले। छत्तीसगढ़ के बाजारों में पिछले दो दिन से यही दृश्य देखने को मिल रहा है। अवसर है छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा त्यौहार तीजा का। कुछ गैर छत्तीसगढ़िया मित्र बताते हैं कि तीजा मतलब तीज त्यौहार तो पूरे भारत भर में मनाई जाती है। किंतु छत्तीसगढ़ जैसी रौनक कहीं देखने नहीं मिलती। असल में इस अंचल में तीजा के अवसर पर महिलाएं अपने मायके जाकर अपने पति की दीर्घायु के लिए चौबीस घण्टे का उपवास करती हैं। उपवास से पहले करेले की सब्जी के साथ खाना खाया जाता है। अगले दिन अपने रिश्तेदारों के यहां जाकर खाना खाने का रिवाज है। पूर्व में उपवास के दिन बचे चावल को पानी में डुबाकर अगले दिन बासी खाने की परंपरा थी। जो अब भी कहीं कहीं विद्यमान है। इस अवसर पर पिता या भाई द्वारा तिजहारिनों को साड़ी तथा अन्य चीजें यथाशक्ति भेंट की जाती है। यही वजह है कि सरकार ने पिता की सम्पत्ति में बेटियों को भी अधिकार दे दिया हो। मगर छत्तीसगढ़ में बहनें भाईयों से सम्पत्ति का बंटवारा मांगते कम ही देखी जाती है। बहनों की एक ही इच्छा होती है कि भाई तीजा और अन्य अवसर पर बस पूछ भर ले। छत्तीसगढ़ के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि बाहरी त्यौहार जिसे अंचल में मुट्ठी भर लोग मनाने वाले हैं, मीडिया में उनका जमकर महिमामंडन किया जाता है। किंतु तीजा की ना जानें क्यों वे अनदेखी करते हैं। शायद तीजा में उन्हें विज्ञापन नहीं मिलता इस वजह से। तीजा के एक और दुश्मन स्कूल प्रशासन भी हैं जो इन तीन दिनों में जानबूझकर परीक्षा रखते हैं।

अजय वर्मा

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गंगा के तट पर एक सन्यासी ईश्वर के ध्यान में बैठा हुआ था


गंगा के तट पर एक सन्यासी ईश्वर के ध्यान में बैठा हुआ था तभी उन्हें गंगा के जल में किसी वस्तु के गिरने की आवाज सुनाई दी । सन्यासी ने आंखे खोल कर देखा कि एक औरत रोते हुए गंगा के जल में कुछ बहाकर और एक कपडे के टुकडे को धोकर वापिस रख रही है सन्यासी ने उत्सुकता वश औरत से पूछा माता आप रो क्यों रही है और आपने गंगा के जल में क्या वस्तु बहाई है और यह कपडे के टुकडे को धोकर वापिस क्यों ले जा रही है सन्यासी की बात सुनकर वह औरत बोली महाराज मैं एक विधवा औरत हूं और जिसे मैं गंगा में बहाकर आ रही हूं वह मेरा इकलौता बेटा था । गरीबी के कारण उसकी मौत हो गई । विधवा औरत का मुंह देखना लोग पाप समझते है इसलिए मेरे बेटे का दाहसंस्कार करने कोई व्यक्ति नहीं आया और गरीबी के कारण मेरे पास कफन के लिए पैसे नहीं थे इसलिए मैने अपनी साडी को फाड कर कफन बनाया और अब इस कफन के कपडे को धोकर वापिस अपनी साडी में जोड लूंगी जिससे मेरा तन ढक जाएगा । उस औरत की बात सुनकर और अज्ञानता, अंध विश्वास , गरीबी के कारण अपने देश के लोगों की दुर्दशा देखकर वह सन्यासी दो दिन तक भूखा प्यासा रहकर रोता रहा । क्या आप जानते है कि अपने देश के लोगों के कष्ट और गरीबी पर रोने वाला वह सन्यासी कौन था । वह सन्यासी था गुरूवर महर्षि दयानंद सरस्वती ।………………………….ओ३म् ….

नरवीर चौधरी

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बंदरों की ज़िद्द एक बार कुछ वैज्ञानिकों ने एक बड़ा ही मजेदार प्रयोग किया..


बंदरों की ज़िद्द एक बार कुछ वैज्ञानिकों ने एक बड़ा ही मजेदार प्रयोग किया.. उन्होंने 5 बंदरों को एक बड़े से पिंजरे में बंद कर दिया और बीचों -बीच एक सीढ़ी लगा दी जिसके ऊपर केले लटक रहे थे.. जैसा की अनुमान था, एक बन्दर की नज़र केलों पर पड़ी वो उन्हें खाने के लिए दौड़ा.. पर जैसे ही उसने कुछ सीढ़ियां चढ़ीं उस पर ठण्डे पानी की तेज धार डाल दी गयी और उसे उतर कर भागना पड़ा.. पर वैज्ञानिक यहीं नहीं रुके,उन्होंने एक बन्दर के किये गए की सजा बाकी बंदरों को भी दे डाली और सभी को ठन्डे पानी से भिगो दिया.. बेचारे बन्दर हक्के-बक्के एक कोने में दुबक कर बैठ गए.. पर वे कब तक बैठे रहते,कुछ समय बाद एक दूसरे बन्दर को केले खाने का मन किया.. और वो उछलता कूदता सीढ़ी की तरफ दौड़ा.. अभी उसने चढ़ना शुरू ही किया था कि पानी की तेज धार से उसे नीचे गिरा दिया गया.. और इस बार भी इस बन्दर के गुस्ताखी की सज़ा बाकी बंदरों को भी दी गयी.. एक बार फिर बेचारे बन्दर सहमे हुए एक जगह बैठ गए… थोड़ी देर बाद जब तीसरा बन्दर केलों के लिए लपका तो एक अजीब वाक्य हुआ.. बाकी के बन्दर उस पर टूट पड़े और उसे केले खाने से रोक दिया, ताकि एक बार फिर उन्हें ठन्डे पानी की सज़ा ना भुगतनी पड़े.. अब प्रयोगकारों ने एक और मजेदार चीज़ की.. अंदर बंद बंदरों में से एक को बाहर निकाल दिया और एक नया बन्दर अंदर डाल दिया.. नया बन्दर वहां के नियम क्या जाने.. वो तुरंत ही केलों की तरफ लपका.. पर बाकी बंदरों ने झट से उसकी पिटाई कर दी.. उसे समझ नहीं आया कि आख़िर क्यों ये बन्दर ख़ुद भी केले नहीं खा रहे और उसे भी नहीं खाने दे रहे.. ख़ैर उसे भी समझ आ गया कि केले सिर्फ देखने के लिए हैं खाने के लिए नहीं.. इसके बाद प्रयोगकारों ने एक और पुराने बन्दर को निकाला और नया अंदर कर दिया.. इस बार भी वही हुआ नया बन्दर केलों की तरफ लपका पर बाकी के बंदरों ने उसकी धुनाई कर दी और मज़ेदार बात ये है कि पिछली बार आया नया बन्दर भी धुनाई करने में शामिल था.. जबकि उसके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था! प्रयोग के अंत में सभी पुराने बन्दर बाहर जा चुके थे और नए बन्दर अंदर थे जिनके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था.. पर उनका स्वभाव भी पुराने बंदरों की तरह ही था.. वे भी किसी नए बन्दर को केलों को नहीं छूने देते.. हमारे समाज में भी ये स्वभाव देखा जा सकता है.. जब भी कोई नया काम शुरू करने की कोशिश करता है, चाहे वो पढ़ाई , खेल , एंटरटेनमेंट, व्यापार, राजनीति, समाजसेवा या किसी और क्षेत्र से सम्बंधित हो, उसके आस पास के लोग उसे ऐसा करने से रोकते हैं.. उसे असफलता का डर दिखाया जाता है.. और मजेदार बात ये है कि उसे रोकने वाले अधिकतर वो होते हैं जिन्होंने ख़ुद उस क्षेत्र में कभी हाथ भी नहीं आज़माया होता.. इसलिए यदि आप भी कुछ नया करने की सोच रहे हैं और आपको भी समाज या आस पास के लोगों के नकारात्मक विचारों को झेलना पड़ रहा है तो कान बंद कर लीजिये .. और अपनी अंतरात्मा ,अपनी सामर्थ्य और अपने विश्वास को सुनिए..

सयानी कमल

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एक शख्स गाड़ी से उतरा.


एक शख्स गाड़ी से उतरा.. और बड़ी तेज़ी से एयरपोर्ट मे घुसा , जहाज़ उड़ने के लिए तैयार था , उसे किसी कांफ्रेंस मे पहुंचना था जो खास उसी के लिए आयोजित की जा रही थी….. वह अपनी सीट पर बैठा और जहाज़ उड़ गया… अभी कुछ दूर ही जहाज़ उड़ा था कि….कैप्टन ने ऐलान किया , तूफानी बारिश और बिजली की वजह से जहाज़ का रेडियो सिस्टम ठीक से काम नही कर रहा…. इसलिए हम क़रीबी एयरपोर्ट पर उतरने के लिए मजबूर हैं.। जहाज़ उतरा वह बाहर निकल कर कैप्टन से शिकायत करने लगा कि….. उसका एक-एक मिनट क़ीमती है और होने वाली कांफ्रेस मे उसका पहुचना बहुत ज़रूरी है…. पास खड़े दूसरे मुसाफिर ने उसे पहचान लिया…. और बोला डॉक्टर पटनायक आप जहां पहुंचना चाहते हैं….. वहां टैक्सी द्वारा यहां से केवल तीन घंटे मे पहुंच सकते हैं….. उसने शुक्रिया अदा किया और टैक्सी लेकर निकल पड़ा… लेकिन ये क्या आंधी , तूफान , बिजली , बारिश ने गाड़ी का चलना मुश्किल कर दिया , फिर भी ड्राइवर चलता रहा… अचानक ड्राइवर को एह़सास हुआ कि वह रास्ता भटक चुका है… ना उम्मीदी के उतार चढ़ाव के बीच उसे एक छोटा सा घर दिखा…. इस तूफान मे वही ग़नीमत समझ कर गाड़ी से नीचे उतरा और दरवाज़ा खटखटाया…. आवाज़ आई….जो कोई भी है अंदर आ जाए..दरवाज़ा खुला है… अंदर एक बुढ़िया आसन बिछाए भगवद् गीता पढ़ रही थी… उसने कहा ! मांजी अगर इजाज़त हो तो आपका फोन इस्तेमाल कर लूं… बुढ़िया मुस्कुराई और बोली….. बेटा कौन सा फोन ?? यहां ना बिजली है ना फोन.. लेकिन तुम बैठो..सामने चरणामृत है , पी लो…. थकान दूर हो जायेगी..और खाने के लिए भी कुछ ना कुछ फल मिल जायेगा…..खा लो ! ताकि आगे सफर के लिए कुछ शक्ति आ जाये… डाक्टर ने शुक्रिया अदा किया और चरणामृत पीने लगा…. बुढ़िया अपने पाठ मे खोई थी कि उसकेे पास उसकी नज़र पड़ी…. एक बच्चा कंबल मे लपेटा पड़ा था जिसे बुढ़िया थोड़ी थोड़ी देर मे हिला देती थी… बुढ़िया फारिग़ हुई तो उसने कहा….मांजी ! आपके स्वभाव और एह़सान ने मुझ पर जादू कर दिया है…. आप मेरे लिए भी दुआ कर दीजिए…. यह मौसम साफ हो जाये मुझे उम्मीद है आपकी दुआऐं ज़रूर क़बूल होती होंगी… बुढ़िया बोली….नही बेटा ऐसी कोई बात नही… तुम मेरे अतिथी हो और अतिथी की सेवा ईश्वर का आदेश है…. मैने तुम्हारे लिए भी दुआ की है…. परमात्मा का शुक्र है…. उसने मेरी हर दुआ सुनी है.. बस एक दुआ और मै उससे माँग रही हूँ शायद जब वह चाहेगा उसे भी क़बूल कर लेगा… कौन सी दुआ..?? डाक्टर बोला… बुढ़िया बोली… ये जो 2 साल का बच्चा तुम्हारे सामने अधमरा पड़ा है , मेरा पोता है , ना इसकी मां ज़िंदा है ना ही बाप , इस बुढ़ापे मे इसकी ज़िम्मेदारी मुझ पर है , डाक्टर कहते हैं…इसे कोई खतरनाक रोग है जिसका वो इलाज नही कर सकते , कहते हैं एक ही नामवर डाक्टर है , क्या नाम बताया था उसका ! हां “डॉ पटनायक ” …. वह इसका ऑप्रेशन कर सकता है , लेकिन मैं बुढ़िया कहां उस डॉ तक पहुंच सकती हूं ? लेकर जाऊं भी तो पता नही वह देखने पर राज़ी भी हो या नही ? बस अब बंसीवाले से ये ही माँग रही थी कि वह मेरी मुश्किल आसान कर दे..!! डाक्टर की आंखों से आंसुओं का सैलाब बह रहा है…. वह भर्राई हुई आवाज़ मे बोला ! माई…आपकी दुआ ने हवाई जहाज़ को नीचे उतार लिया , आसमान पर बिजलियां कौदवां दीं , मुझे रस्ता भुलवा दिया , ताकि मैं यहां तक खींचा चला आऊं , हे भगवान! मुझे यकीन ही नही हो रहा…. कि कन्हैया एक दुआ क़बूल करके अपने भक्तौं के लिए इस तरह भी मदद कर सकता है…..!!!! दोस्तों वह सर्वशक्तीमान है…. परमात्मा के बंदो उससे लौ लगाकर तो देखो… जहां जाकर इंसान बेबस हो जाता है , वहां से उसकी परमकृपा शुरू होती है…। यह आप सबसे अधिक लोगो को भेजे ताकि मुझ जैसे लाखो लोगो की आँखे खुले।

Posted in राजनीति भारत की - Rajniti Bharat ki

कर्नल पुरोहित मामले की अनकही कहानी


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श्री गणेश की मूर्ति के विषय में सारगर्भित वर्णन


श्री गणेश की मूर्ति के विषय में सारगर्भित वर्णन— 1-श्री गणेश की मूर्ति 1फुट से अधिक बड़ी (ऊंची) नहीं होना चाहिए. 2-एक व्यक्ति के द्वारा सहजता से उठाकर लाई जा सके ऐसी मूर्ति हो. 3-सिंहासन पर बैठी हुई, लोड पर टिकी हुई प्रतिमा सर्वोत्तम है 4-सांप,गरुड,मछली आदि पर आरूढ अथवा युद्ध करती हुई या चित्रविचित्र आकार प्रकार की प्रतिमा बिलकुल ना रखें. 5-शिवपार्वती की गोद में बैठे हुए गणेश जी कदापि ना लें. क्येंकि शिवपार्वती की पूजा लिंगस्वरूप में ही किये जाने का विधान है. शास्त्रों में शिवपार्वती की मूर्ति बनाना और उसे विसर्जित करना निषिद्ध है. 6-श्रीगणेश की मूर्ति की आंखों पर पट्टी बांधकर घरपर ना लाएं. 7-श्रीगणेश की जबतक विधिवत प्राणप्रतिष्ठा नहीं होती तब तक देवत्व नहीं आता. अत: विधिवत् प्राणप्रतिष्ठा करें. 8-परिवार मेंअथवा रिश्तेदारी में मृत्युशोक होने पर, सूतक में पडोसी या मित्रों द्वारा पूजा, नैवेद्य आदि कार्य करायें. विसर्जित करने की शीघ्रता ना करें. 9-श्रीगणेश की प्राणप्रतिष्ठा होने के बाद घर में वादविवाद, झगड़ा, मद्यपान, मांसाहार आदि ना करें. 10-श्रीगणेशजी को ताजी सब्जीरोटी का भी प्रसाद नैवेद्य के रूप में चलता है केवल उसमें खट्टा, तीखा, मिर्चमसाले आदि ना हों. 11-दही+शक्कर+भात यह सर्वोत्तम नैवेद्य है. 12-विसर्जन के जलूस में झांज- मंजीरा,भजन आदि गाकर प्रभु को शांति पूर्वक विदा करें. डी. जे. पर जोर जोर से अश्लील नाच, गाने, होहल्ला करके विकृत हावभाव के साथ श्रीगणेश की बिदाई ना करें. ध्यान रहे कि इस प्रकार के अश्लील गाने अन्यधर्मावलंबियों केउत्सवों पर नहीं बजाते. 13-यदि ऊपर वर्णित बातों पर अमल करना संभव ना हो तो श्रीगणेश की स्थापना कर उस मूर्ति का अपमान ना करें. अंत में-जो लोग 10दिनों तक गणेशाय की झांकी के सामने रहते हैं, अगर वो नहीं सुधर सकते, तो हम आप भीड़ में धक्के खाकर 2,4 सेकिंड का दर्शन कर सुघर जायेंगे??? कितने अंधेरे में हैं हम लोग.!! इस अंधेरे में क्षणिक प्रकाश ढूंढने की अपेक्षा, घर में रखी हुई गणेशमूर्ति के सामने 1घंटे तक शांत बैठे. अपना आत्मनिरीक्षण करें, अच्छा व्यवहार करें.. घरपर ही गणेश आपपर कृपा बरसायेंगे. श्रीगणेशजी एक ही हैं…. उनकी अलग अलग कंपनियां नहीं होती… अपनी सोच अलग हो सकती है. एकाग्रचित्त हों, शांति प्राप्त करें…

लष्मीकांत वर्शनय

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प्रेम का भगवान्‌


||श्रीहरि:||

प्रेम का भगवान्‌

एक बादशाह जंगलमें शिकार खेलने गया, वहां उसे एक साधु मिले। कुछ समय तक साधुका संग करनेपर बादशाहको बड़ी प्रसन्नता हुई, और उसने साधुको कुछ देना चाहा। साधुने कहा, ‘नहीं, मैं अपनी स्थितिमें पूर्णरूपसे सन्तुष्ट हूं। खानेके लिये ये वृक्ष मुझे यथेष्ट फल दे देते हैं, ये रमणीय पवित्रसलिला नदियां मुझे आवश्यकतानुसार जल प्रदान करती हैं, और सोनेके लिये तो पहाड़ोंकी गुफाएं बनी ही हैं। तुम राजा हो या सम्राट्‌, मुझे तुमसे कुछ भी लेना नहीं है।’ सम्राट्‌ने कहा, ‘स्वामीजी! मुझे पवित्र करने और मेरा जीवन सफल करनेके लिये ही कुछ लीजिये और कृपापूर्वक एक बार मेरी राजधानीमें पदार्पण कीजिये।’ बहुत दबानेपर साधुने सम्राट्‌के साथ उसके नगरमें जाना स्वीकार कर लिया। साधु बादशाहके महलमें पहुंचे, वहां चारों ओर हीरे-पन्ने मोती-माणिक आदि जवाहिरात और सोने, चाँदीके पदार्थ पड़े थे, सभी ओर ऐश्वर्य और वैभवके चिन्ह दिखायी देते थे। वहां पहुंचनेपर सम्राट्‌ने साधुसे कहा, ‘महाराज! आप तनिक विश्राम कीजिये, इतनेमें मैं प्रार्थना कर लेता हूं’ यह कह बादशाह एक कोनेमें जाकर दीनवाणीसे इस प्रकार प्रार्थना करने लगा,-‘प्रभो! मुझे और भी अधिक ऐश्वर्य, और भी अधिक सन्तान तथा और भी राज्य प्रदान कीजिये।’ इतना सुनते ही साधु उठकर जाने लगे। बादशाहने पीछे दौड़कर मूछा, ‘महाराज! कहां जा रहे हैं, मेरी सेवा स्वीकार किये बिना ही कैसे लौट रहे हैं?’ साधुने बादशाहकी ओर मुख फिराकर कहा, ‘भिखारी! मैं तुझ भिखारीसे भीख नहीं माँगता, तू मुझे क्या दे सकता है, तू तो स्वयं ही भीख माँगता है?’ वास्तवमें सम्राट्‌की प्रार्थना प्रेमकी भाषामें नहीं थी। यदि भगवान्‌से ऐसी प्रार्थना की जा सकती हो तो फिर प्रेम और दुकानदारीमें भेद ही क्या रह जायगा? अतएव प्रेमका सर्वप्रथम यही लक्षण है कि, उसमें क्रय-विक्रय नहीं है-प्रेम तो सदा दिया ही करता है, वह कभी लेता नहीं;-प्रेम दाता है, गृहीता नहीं है। भगवान्‌का भक्त कहता है कि ‘भगवान्‌ चाहें तो मैं अपना सर्वस्व उसके अर्पण कर सकता हूं, परन्तु उससे मैं कुछ भी लेना नहीं चाहता। इस जगत्‌की कोई भी वस्तु मुझे नहीं चाहिये। उससे किये बिना रहा नहीं जाता, इसीलिये प्रेम करता हूं; इस प्रेमके परिवर्तनमें उससे किसी प्रकारकी कृपा-भिक्षा नहीं चाहता। ईश्‍वर सर्वशक्तिमान‌ है या नहीं, यह जाननेकी मुझे कोई आवश्यकता नहीं; कारण, मैं न तो उससे कोई शक्ति चाहता हूं और न उसकी किसी शक्तिका विकास ही देखना चाहता हूं, वह मेरे प्रेमका भगवान्‌ है। बस, इतना ही जान लेना मेरे लिये बहुत है। इसके अतिरिक्त मैं और कुछ भी नहीं जानना चाहता। —-स्वामी विवेकानन्दजी ….. ००४. ०७. माघ कृष्ण ११,सं०१९८६(वि०).कल्याण(पृ०८३७)

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कामधेनु का वर्णन पौराणिक गाथाओं में एक ऐसी चमत्कारी गाय के रूप में मिलता है,


कामधेनु का वर्णन पौराणिक गाथाओं में एक ऐसी चमत्कारी गाय के रूप में मिलता है, जिसमें दैवीय शक्तियाँ थीं और जिसके दर्शन मात्र से ही लोगो के दुःख व पीड़ा दूर हो जाती थी। यह कामधेनु जिसके पास होती थी, उसे हर तरह से चमत्कारिक लाभ होता था। इस गाय का दूध अमृत के समान माना जाता था। सर्वपालनकर्ता कामधेनु सबका पालन करने वाली है। यह माता स्वरूपिणी है, सब इच्छाएँ पूर्ण करने वाली है। कृष्ण कथा में अंकित सभी पात्र किसी न किसी कारणवश शापग्रस्त होकर जन्मे थे। कश्यप ने वरुण से कामधेनु माँगी थी, लेकिन बाद में लौटायी नहीं। अत: वरुण के शाप से वे ग्वाले हुए। जैसे देवताओं में भगवान विष्णु, सरोवरों में समुद्र, नदियों में गंगा, पर्वतों में हिमालय, भक्तों में नारद, सभी पुरियों में कैलाश, सम्पूर्ण क्षेत्रों में केदार क्षेत्र श्रेष्ठ है, वैसे ही गऊओं में कामधेनु सर्वश्रेष्ठ है। भगवान विष्णु स्वयं कच्छपरूप धारण करके समुद्र मंथन के समय मन्दराचल पर्वत के आधार बने। इस प्रकार मन्थन करने पर क्षीरसागर से क्रमश: ‘कालकूट विष’, ‘कामधेनु’, ‘उच्चैश्रवा’ नामक अश्व, ‘ऐरावत’ नामक हाथी, ‘कौस्तुभ्रमणि’, ‘कल्पवृक्ष’, ‘अप्सराएँ’, ‘लक्ष्मी’, ‘वारुणी’, ‘चन्द्रमा’, ‘शंख’, ‘शांर्ग धनुष’, ‘धनवन्तरि’ और ‘अमृत’ प्रकट हुए। क्षीर-समुद्र का मन्थन मथे जाते हुए समुद्र के चारों ओर बड़े ज़ोर की आवाज़ उठ रही थी। इस बार के मन्थन से देवकार्यों की सिद्धि के लिये साक्षात् सुरभि कामधेनु प्रकट हुईं। उन्हें काले, श्वेत, पीले, हरे तथा लाल रंग की सैकड़ों गौएँ घेरे हुए थीं। उस समय ऋषियों ने बड़े हर्ष में भरकर देवताओं और दैत्यों से कामधेनु के लिये याचना की और कहा- ‘आप सब लोग मिलकर भिन्न-भिन्न गोत्रवाले ब्राह्मणों को कामधेनु सहित इन सम्पूर्ण गौओं का दान अवश्य करें।’ ऋषियों के याचना करने पर देवताओं और दैत्यों ने भगवान शंकर की प्रसन्नता के लिये वे सब गौएँ दान कर दीं तथा यज्ञ कर्मों में भली-भाँति मन को लगाने वाले उन परम मंगलमय महात्मा ऋषियों ने उन गौओं का दान स्वीकार किया। तत्पश्चात सब लोग बड़े जोश में आकर क्षीरसागर को मथने लगे। तब समुद्र से कल्पवृक्ष, पारिजात, आम का वृक्ष और सन्तान- ये चार दिव्य वृक्ष प्रकट हुए। कथा: शिव द्वारा दिव्यास्त्र गाय बड़े होने पर परशुराम ने शिवाराधन किया। उस नियम का पालन करते हुए उन्होंने शिव को प्रसन्न कर लिया। शिव ने उन्हें दैत्यों का हनन करने की आज्ञा दी। परशुराम ने शत्रुओं से युद्ध किया तथा उनका वध किया। किंतु इस प्रक्रिया में परशुराम का शरीर क्षत-विक्षत हो गया। शिव ने प्रसन्न होकर कहा कि शरीर पर जितने प्रहार हुए हैं, उतना ही अधिक देवदत्व उन्हें प्राप्त होगा। वे मानवेतर होते जायेंगे। तदुपरान्त शिव ने परशुराम को अनेक दिव्यास्त्र प्रदान किये, जिनमें से परशुराम ने कर्ण पर प्रसन्न होकर उसे दिव्य धनुर्वेद प्रदान किया। जमदग्नि ऋषि ने रेणुका के गर्भ से अनेक पुत्र प्राप्त किए। उनमें सबसे छोटे परशुराम थे। उन दिनों हैहयवंश का अधिपति अर्जुन था। उसने विष्णु के अंशावतार दत्तात्रेय के वरदान से एक सहस्र भुजाएँ प्राप्त की थीं। एक बार नर्मदा में स्नान करते हुए मदोन्मत्त हैहयराज ने अपनी बाँहों से नदी का वेग रोक लिया, फलतः उसकी धारा उल्टी बहने लगी, जिससे रावण का शिविर पानी में डूबने लगा। दशानन ने अर्जुन के पास जाकर उसे भला-बुरा कहा तो उसने रावण को पकड़कर कैद कर लिया। पुलस्त्य के कहने पर उसने रावण को मुक्त कर दिया। एक बार वह वन में जमदग्नि के आश्रम पर पहुँचा। जमदग्नि के पास कामधेनु थी। अतः वे अपरिमित वैभव क भोक्ता थे। ऐसा देखकर हैहयराज सहस्र बाहु अर्जुन ने कामधेनु का अपहरण कर लिया। परशुराम ने फरसा उठाकर उसका पीछा किया तथा युद्ध में उसकी समस्त भुजाएँ तथा सिर काट डाले। उसके दस हज़ार पुत्र भयभीत होकर भाग गये। कामधेनु सहित आश्रम लौटने पर पिता ने उन्हें तीर्थाटन कर अपने पाप धोने के लिए आज्ञा दी क्योंकि उनकी मति में ब्राह्मण का धर्म क्षमादान है। परशुराम ने वैसा ही किया। दिलीप अंशुमान के पुत्र और अयोध्या के राजा थे। दिलीप बड़े पराक्रमी थे यहाँ तक के देवराज इन्द्र की भी सहायता करने जाते थे। इन्होंने देवासुर संग्राम में भाग लिया था। वहाँ से विजयोल्लास से भरे राजा लौट रहे थे। रास्ते में कामधेनु खड़ी मिली लेकिन उसे दिलीप ने प्रणाम नहीं किया तब कामधेनु ने श्राप दे दिया कि तुम पुत्रहीन रहोगे। यदि मेरी सन्तान तुम्हारे ऊपर कृपा कर देगी तो भले ही सन्तान हो सकती है। श्री वसिष्ठ जी की कृपा से उन्होंने नन्दिनी गौ की सेवा करके पुत्र श्री रघु जी को प्राप्त किया। वसिष्ठ का आतिथ्य ग्रहण महर्षि वसिष्ठ क्षमा की प्रतिपूर्ति थे। एक बार श्री विश्वामित्र उनके अतिथि हुए। महर्षि वसिष्ठ ने कामधेनु के सहयोग से उनका राजोचित सत्कार किया। कामधेनु की अलौकिक क्षमता को देखकर विश्वामित्र के मन में लोभ उत्पन्न हो गया। उन्होंने इस गौ को वसिष्ठ से लेने की इच्छा प्रकट की। कामधेनु वसिष्ठ जी के लिये आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु महत्त्वपूर्ण साधन थी, अत: इन्होंने उसे देने में असमर्थता व्यक्त की। विश्वामित्र ने कामधेनु को बलपूर्व ले जाना चाहा। वसिष्ठ जी के संकेत पर कामधेनु ने अपार सेना की सृष्टि कर दी। विश्वामित्र को अपनी सेना के साथ भाग जाने पर विवश होना पड़ा। द्वेष-भावना से प्रेरित होकर विश्वामित्र ने भगवान शंकर की तपस्या की और उनसे दिव्यास्त्र प्राप्त करके उन्होंने महर्षि वसिष्ठ पर पुन: आक्रमण कर दिया, किन्तु महर्षि वसिष्ठ के ब्रह्मदण्ड के सामने उनके सारे दिव्यास्त्र विफल हो गये और उन्हें क्षत्रिय बल को धिक्कार कर ब्राह्मणत्व के लिये तपस्या हेतु वन जाना पड़ा।