Posted in संस्कृत साहित्य

बाबाओ का चमत्कार


*बाबाओ का चमत्कार* इस देश मे लाखो करोड़ो बाबा है और अनेको तो चमत्कारी शक्तियों से सिद्ध है , तंत्र मंत्र से चमत्कार दिखाते है। आग पर लेट जाते है पानी ओर आग पर चलते है भूत भविष्य बताते है हवा में उड़ते भी है बड़े बड़े शैतानों को वश में रखते है म्रत्यु पर विजय प्राप्त करते है श्राप देकर दुस्टो को भस्म भी करते है हाथ लगाकर रोग मिटाते है समोसा खिलाकर दुख मिटाते है फ्रिज में बैठ कर उपासना करते है मार्क जुकरबर्क को कामयाबी के मन्त्र सीखा देते है *ये सारे दावे करते है इस देश के चमत्कारी बाबा साधु सन्त ओर इनके चेले खूब प्रचार करते है इनका* जो जो बाबा इन सिद्धियों से युक्त है उसको देश और धर्म की बिगड़ती स्थिति नही दिखाई देती ??? पानी पर चलकर कितने पैसे की सिद्धि कमा ली ?? दस बीस रुपये देकर नदी पार की जा सकती है। आज भोले की भक्तो को चुन चुन कर मारा जा रहा है कश्मीर बंगाल केरल में सामूहिक हत्याएं की जा रही है हिन्दुओ की स्त्रियों को चाकू गोद गोद कर मारा जा रहा है लव जिहाद का जाल फैलाया जा रहा है बीफ पार्टियां हो रही है *कोई सिद्धि है तुम्हारे पास धर्म की रक्षा के लिए ??* धूर्त हो तुम , पाखंडी हो ओर जो जो इनका भक्त इनका प्रचार करे वह भी धूर्त है *संत क्या होता है* ये सीखो गुरुगोविंद सिंह से जिसने चमत्कार नही दिखाए सिर्फ शौर्य दिखाया , बलिदान दिखाया। संसार को सीख दी कि अगर कोई मुसलमान सौ बार भी कुरान की कसम खाये तो भी उसका यकीन मत करना *साधु क्या होता है* ये सीखो रविदास से जिन्होंने खुल कर कुरान को झूठा कहा ओर वेद मत का मण्डन किया *वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान* *फिर मैं क्यों छोड़ूँ इसे पढ़ लूँ झूट क़ुरान* *वेद धर्म छोड़ूँ नहीं कोसिस करो हजार* *तिल-तिल काटो चाही गोदो अंग कटार* *सन्यासी क्या होता है* ये सीखो स्वामी श्रद्धानन्द से जिन्होंने इस्लाम और ईसायत की धज्जियां उड़ा दी और लाखों मुसलमानों की पुनः वैदिक धर्म मे वापसी कराई *पंडित क्या होता है* ये सीखो पंडित महेंद्र पाल आर्य से, जो पूर्व में मुस्लिम इमाम थे, धर्म के वैदिक स्वरूप को जानकर् घर वापसी की , वैदिक ग्रन्थों का पठन पाठन करके विद्या अर्जित की ओर आज हज़ारो मुसलमानों की भीड़ में मुसलमानों से शाश्त्रार्थ करते है , हज़ारो मुसलमानों की घर वापसी करा चुके है। *आचार्य क्या होता है* ये सीखो गुरुकुल चितोडाझाल के आचार्यो से जो हिन्दू समाज के बीच जाकर उन्हें अपने धर्म के वैदिक सिद्धान्त व विधर्मियो की कूटनीति से अवगत कराते है , हिन्दू समाज को पाखण्ड अंधविश्वास से निकाल शौर्य की शिक्षा देते है। हर रोज नए खतरों का सामना करते है अपने ही सेक्युलर गद्दार नेताओ का विरोध झेलते है , मुस्लिम कट्टरपंथियों से टक्कर लेते है । *परन्तु ये तथाकथित जादू टोना करने वाले धूर्त , बड़े बड़े मठो के अधिकारी है, मीठी मीठी लच्छेदार बाते करके आपको यंत्र तंत्र माला ताबीज लाकेट बेचते है* इस्लाम के विरुद्ध इनके मुँह से बोल नही निकलते , हिन्दुओ के पाखण्ड के विरुद्ध बोलने से आय के साधन नष्ट होने का भय रहता है । वेद की शिक्षाओं को समाज तक बताने का संकल्प नही रखते क्योकि ये खुद जानते है वेद शिक्षा का अर्थ है समाज से पाखण्ड अंधविश्वास जादू टोना तंत्र टोटका फलित ज्योतिष भाग्यवाद अवतारवाद से मुक्त करना है ओर समाज को कर्म शौर्य वीरता विज्ञान की शिक्षा देना ही धर्म है। ऐसा करते ही इनकी करोड़ो रुपयों का चढ़ावा इकट्ठा करने वाले मठ बन्द हो जाएंगे । *हिन्दुओ अपने आदर्श साधु सन्तो का चुनाव बुद्धि से करो* विवेकानन्द जैसे महासेक्युलर मांसभक्षी को संत कहते लज़्ज़ा नही आती जो संसार के सभी धर्मों को सत्य के रूप देखता है मूल्लो की सभा मे इस्लाम का मण्डन ईसाइयों की सभा मे ईसाइयत का मण्डन हिन्दुओ की सभा मे हिन्दू धर्म का मण्डन ओर सामूहिक धर्म सभा मे सर्व धर्म सद्भाब की सेक्युलर शिक्षा देता है। जिसने कभी स्वतंत्रता की लड़ाई में भाग नही लिया । वेदो का दुष्प्रचार करते हुए कहता है वेदो में गौमांस भक्षण की शिक्षा है । *आंखे खोलो हिन्दुओ* श्री राम व श्री कृष्ण ने विजय जादू टोनो से नही बल्कि वेद विद्या के बल पर वीरता और शौर्य से प्राप्त की थी *वेद कहता है* कृतं में दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः। गोजिद् भूयासमश्वजिद् धनञ्जयो हिरण्यजित्।।-(अथर्व० ७/५०/८) *तेरे दायें हाथ में कर्म है और बायें हाथ में विजय है। तू अपने कर्मों के द्वारा गौ,भूमि,अश्व,धन और स्वर्ण का विजेता बन*

नीरज आर्य अँधेड़ी

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एक दिन स्कूल में छुट्टी की घोषणा होने के कारण


एक दिन स्कूल में छुट्टी की घोषणा होने के कारण, एक दर्जी का बेटा, अपने पापा की दुकान पर चला गया । वहाँ जाकर वह बड़े ध्यान से अपने पापा को काम करते हुए देखने लगा।उसने देखा कि उसके पापा कैंची से कपड़े को काटते हैं और कैंची को पैर के पास टांग से दबा कर रख देते हैं। फिर सुई से उसको सीते हैं और सीने के बाद सुई को अपनी टोपी पर लगा लेते हैं जब उसने इसी क्रिया को चार-पाँच बार देखा तो उससे रहा नहीं गया, तो उसने अपने पापा से कहा कि वह एक बात उनसे पूछना चाहता है ? पापा ने कहा- बेटा बोलो क्या पूछना चाहते हो ? बेटा बोला- पापा मैं बड़ी देर से आपको देख रहा हूं , आप जब भी कपड़ा काटते हैं, उसके बाद कैंची को पैर के नीचे दबा देते हैं, और सुई से कपड़ा सीने के बाद, उसे टोपी पर लगा लेते हैं, ऐसा क्यों ? इसका जो उत्तर पापा ने दिया- उन दो पंक्तियाँ में मानों उसने ज़िन्दगी का सार समझा दिया । उत्तर था- ” बेटा, कैंची काटने का काम करती है, और सुई जोड़ने का काम करती है, और काटने वाले की जगह हमेशा नीची होती है परन्तु जोड़ने वाले की जगह हमेशा ऊपर होती है । यही कारण है कि मैं सुई को टोपी पर लगाता हूं और कैंची को पैर के नीचे रखता हूं ।” M P Avasthi

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व्रज की माटी


*_🥀व्रज की माटी🥀_* विष्णुजी के व्रज में कृष्ण रूप में अवतार लेने की बात जब देवताओ को पता लगी तो सभी बाल कृष्ण की लीला के साक्षी बनने को लालायित हो गए। देवताओं ने व्रज में कोई ग्वाला कोई गोपी कोई गाय, कोई मोर तो कोई तोते के रूप में जन्म लिया।कुछ देवता और ऋषि रह गए थे।वे सभी ब्रह्माजी के पास आये और कहने लगे कि ब्रह्मदेव आप ने हमें व्रज में क्यों नही भेजा? आप कुछ भी करिए किसी भी रूप में भेजिए।ब्रह्मा जी बोले व्रज में जितने लोगों को भेजना संभव था उतने लोगों को भेज दिया है अब व्रज में कोई भी जगह खाली नहीं बची है। देवताओं ने अनुरोध किया प्रभु आप हमें ग्वाले ही बना दें ब्रह्माजी बोले जितने लोगों को बनाना था उतनों को बना दिया और ग्वाले नहीं बना सकते।देवता बोले प्रभु ग्वाले नहीं बना सकते तो हमे बरसाने को गोपियां ही बना दें ब्रह्माजी बोले अब गोपियों की भी जगह खाली नही है।देवता बोले गोपी नहीं बना सकते, ग्वाला नहीं बना सकते तो आप हमें गायें ही बना दें। ब्रह्माजी बोले गाएं भी खूब बना दी हैं।अकेले नन्द बाबा के पास नौ लाख गाएं हैं।अब और गाएं नहीं बना सकते। देवता बोले प्रभु चलो मोर ही बना दें।नाच-नाच कर कान्हा को रिझाया करेंगे।ब्रह्माजी बोले मोर भी खूब बना दिए। इतने मोर बना दिए की व्रज में समा नहीं पा रहे।उनके लिए अलग से मोर कुटी बनानी पड़ी।देवता बोले तो कोई तोता,मैना, चिड़िया, कबूतर, बंदर कुछ भी बना दीजिए। ब्रह्माजी बोले वो भी खूब बना दिए पुरे पेड़,भरे हुए हैं पक्षियों से।देवता बोले तो कोई पेड़-पौधा,लता-पता ही बना दें। ब्रह्मा जी बोले- पेड़-पौधे, लता-पता भी मैंने इतने बना दिए की सूर्यदेव मुझसे रुष्ट है कि उनकी किरने भी बड़ी कठिनाई से ब्रिज की धरती को स्पर्श करती हैं।देवता बोले प्रभु कोई तो जगह दें हमें भी व्रज में भेजिए।ब्रह्मा जी बोले-कोई जगह खाली नही है।तब देवताओ ने हाथ जोड़ कर ब्रह्माजी से कहा प्रभु अगर हम कोई जगह अपने लिए ढूंढ़ के ले आएं तो आप हम को व्रज में भेज देंगे।ब्रह्मा जी बोले हाँ तुम अपने लिए कोई जगह ढूंढ़ के ले आओगे तो मैं तुम्हें व्रज में भेज दूंगा। देवताओ ने कहा धुल और रेत कणो कि तो कोई सीमा नहीं हो सकती और कुछ नहीं तो बालकृष्ण लल्ला के चरण पड़ने से ही हमारा कल्याण हो जाएगा हम को व्रज में धूल रेत ही बना दे।ब्रह्मा जी ने उनकी बात मान ली। इसलिए जब भी व्रज जाये तो धूल और रेत से क्षमा मांग कर अपना पैर धरती पर रखे क्योंकि व्रज की रेत भी सामान्य नही है वो रज तो देवी देवता ऋषि-मुनि हैं। Brijmohan oza

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What is Success?


What is Success? *At the age of 4 years …* *Success is.* That you do not urinate in your pants, *At the age of 8 years …* *Success is..* To know the way back home. *At the age of 12 years,* *success is..* To have friends. *At the age of 18 years,* *success is.* To get a driver’s license. *At the age of 23 years,* *success is.* To graduate from a university. *At the age of 25 years,* *success is.* To get an earning. *At the age of 30 years,* *success is.* To be a family Man. *At the age of 35 years,* *success is.* To make money. *At the age of 45 years,* *success is.* To maintain the appearance of a young man. *At the age of 50 years,* *success is.* To provide good education for your children. *At the age of 55 years,* *success is.* To still be able to perform your duties well. *At the age of 60 years,* *success.* To still be able to keep driving license. *At the age of 65 years,* *success is.* To live without disease. *At the age of 70 years,* *success is.* To not be a burden on any one. *At the age of 75 years,* *success is.* To have old friends. *At the age of 81 years,* *success is.* To know the way back home. *At the age of 86 years,* *success is.* That not to urinate in your pants Again 🌾Life is a cycle..🍃

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एक_करोड़_की_साड़ी #रक्षाबंधन_स्पेशल


#एक_करोड़_की_साड़ी #रक्षाबंधन_स्पेशल “ये ले छुटकी तेरी राखी का तोहफा…देख कितनी सुन्दर साड़ी है..साड़ी वाड़ी पहना कर..निक्कर पहन के..ये तेरा इधर उधर घूमना मुझे बिल्कुल पसंद नहीं आता” अजय ने राखी बंधवाने के बाद अपने बैग से साड़ी निकालकर हाथ नचाते हुए कहा “मुक्केबाजी की प्रैक्टिस क्या..साड़ी पहन के होती है…आप भी न भइया…बस कमाल हो…अरे.वाह!.. भइया साड़ी तो बहुत ही अच्छी है…” कहकर विजया ने साड़ी खोल के खुद पे लगाई और शीशे में अलट पलट के खुद को देखने लगी अजय अभिमान से बोला “अच्छी क्यों नहीं होगी…पूरे चार हजार की है” फिर उसने पास ही खड़े अपने छोटे भाई अमर को देखते हुए कहा “इन लाट साहब को कितनी बार कहा…मेरे साथ सूरत चलें…अपनी तरह हीरे का काम सिखा दूँगा…पर नहीं इनको यहीं इस कस्बे में सर फोड़ना है…चल तू इसे राखी बाँध मैं जाकर जरा अम्मा के पास बैठता हूँ” “सब अगर सूरत चले गए तो माधव पुर का क्या होगा…और मुझे छुटकी को स्टेट लेवल से आगे की एक बढ़िया मुक्केबाज भी बनाना है..इसे ओलम्पिक में भेजना है” अमर ने बुदबुदाते हुए कहा,अजय उसकी बात सुन दोनों को देख एक व्यंग्यात्मक मुस्कान छोड़ता है और कमरे से निकल जाता है विजया अमर को राखी बाँधती है और अपने हाथ से सिवइयाँ खिलाती है अजय अपने हाथ में लिया चमकीली पन्नी का एक पैकेट पीछे छुपाने लगता है विजया उसे सकुचाते हुए देख लेती है और उससे कहती है “भइया क्या छुपा रहे हो” “कुछ नहीं..अ… वो…मैं…तेरे लिए…” वो आँखों में शर्मिन्दिगी लिए कुछ बोल नहीं पाता,विजया उसके हाथ से पैकेट छीन लेती है और खोलती है उसमें एक बहुत साधारण सी साड़ी होती है वो फिर भी साड़ी की खूब तारीफ करती है “मैं बस…आज…यही ला सका….ढाई सौ की है….” अमर की आवाज रुंधी हुई थी “लेकिन बस जरा मेरा काम जम जाने दे… छुटकी…देखना एक दिन मैं तेरे लिए एक करोड़ की साड़ी लाऊँगा… पूरे माधवपुर क्या सूरत के किसी रईस ने भी वैसी साड़ी न देखी होगी कभी” दोनों भाई बहन की आँखे भीग गईं दिन बीतते जाते हैं अमर का काम बस ठीक ठाक ही चल रहा है वो चाहे खुद आधा पेट रहे पर अपनी छुटकी को कोई कमी नहीं होने देता विजया की सेहत और खानपान की चीजें,बॉक्सिंग के सारे सामान, कोच के पैसे,आना जाना आदि आदि उसकी जितनी भी जरूरतें होती सब पूरी करता उसका हौसला बढ़ाता और पैसे कमाने के लिए दिन रात खटता रहता था इसी कारण उसकी तबियत खराब रहने लगी पर वो विजया के सामने कुछ जाहिर नहीं होने देता था आखिरकार विजया ओलम्पिक के लिये चुन ली जाती है और विदेश में जहाँ ओलम्पिक का आयोजन होता है चली जाती है,इधर अमर को डॉक्टर बताते हैं कि उसे कैंसर है वो भी अंतिम अवस्था में और वो उसे तुरंत सूरत के बड़े अस्पताल जाने को कहते हैं पर पैसे के अभाव में वह जा नहीं पाता और एक दिन इस संसार से विदा हो जाता है विजया बॉक्सिंग मुकाबले के फाइनल में पहुँच जाती है अगले दिन उसे स्वर्ण पदक के लिए कोरिया की बॉक्सर से लड़ना है उसे अमर का आखिरी संदेश मिलता है “छुटकी तुझे फाइनल में जीतना ही होगा मेरे लिए नहीं…बड़ी बिंदी वाली उस महिला के लिए जिसने कहा था कि शक्ल सूरत तो इन जैसी लड़कियो की कुछ खास होती नहीं.. ओलम्पिक में इसलिए जाती हैं कि चड्ढी पहनकर उछलती कूदती टीवी पे दिखाई दें और अपने गाँव में हीरोइन बन जाएं….छुटकी ये जन्म तो चला गया एक करोड़ की साड़ी अगले जनम दिलाऊँगा…तू बस सोना जीत के आना” विजया अमर की मौत से टूट के रह जाती है पर किसी तरह खुद को समेट के वो फाइनल लड़ती है और जीतती है उसके गले में गोल्ड मैडल है उसकी आँखों के सामने तिरंगा ऊपर उठाया जा रहा है उसे लग रहा है जैसे उसके अमर भइया तिरंगे की डोर खींच रहे हैं और झंडे को सबसे ऊपर उठा रहे हैं,उसकी आँख से आंसू बहते ही जा रहे हैं पूरे देश में विजया का डंका बज जाता है कुछ दिनों बाद एक नामी सामाजिक कल्याण (सोशल वर्क) संस्था कैंसर मरीजों के उपचार के लिए धन इकट्ठा करने के उद्देश्य से देश के तमाम बड़े फ़िल्मी और खेल सितारों की चीजों की नीलामी करवाती है “देवियों और सज्जनों..अब पेश है ओलम्पिक गोल्ड मैडल विनर बॉक्सर विजया की समाज कल्याण के इस कार्य के लिए दी गई अपनी सबसे अनमोल साड़ी जो उनके स्वर्गीय भाई ने उन्हें रक्षाबंधन पे दी थी” भीड़ से पहली ही बोली आती है “एक करोड़”

Laxmikant varshnay

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बेटी की फिक्र


बेटी की फिक्र…. पापा मैंने आपके लिए हलवा बनाया है 11 साल की चेतना अपने पिता मोहन से बोली जो ऑफिस से घर मे घुसा ही था। मोहन – अच्छा क्या बात है ? अच्छा खिला फिर अपने पापा को, चेतना दौड़ती रसोई मे गई और बडा कटोरा भरकर हलवा लेकर आई। मोहन ने खाना शुरू किया और चेतना को देखा ! मोहन की आँखों मे आँसू थे। चेतना – क्या हुआ पापा हलवा अच्छा नही लगा ? मोहन – नही मेरी बेटी हलवा तो बहुत अच्छा बना है, और देखते देखते पूरा कटोरा खाली कर दिया इतने मे मोहन की पत्नी राधा बाथरूम से नहाकर बाहर आई। और बोली – ला मुझे भी खिला तेरा हलवा मोहन ने चेतना को 50 ₹ इनाम मे दिए। चेतना खुशी से मम्मी के लिए रसोई से हलवा लेकर आई मगर ये कया जैसे ही उसने हलवा की पहली चम्मच मुंह मे डाली तो तुरंत थूक दिया। और बोली – ये क्या बनाया है ? ये कोई हलवा है ? इसमें तो चीनी नही नमक भरा है और आप इसे कैसे खा गये ये तो जहर हे। मेरे बनाये खाने मे तो कभी नमक मिर्च कम है तेज है कहते रहते हो ओर बेटी को कुछ कहने के बजाय ईनाम देते हो ! मोहन हंसते हुए – अरे पगली तेरा मेरा तो जीवन भर का साथ है, रिश्ता है पति पत्नी का। जिसमें नौक-झौक, रूठना-मनाना ये सब तो चलता है मगर ये तो एक बेटी है कल चली जाएगी| मगर आज इसे वो एहसास वो अपनापन महसूस हुआ जो मुझे इसके जन्म के समय हुआ था। आज इसने बडे प्यार से पहली बार मेरे लिए कुछ बनाया है फिर वो जैसा भी हो मेरे लिए सबसे बेहतर और सबसे स्वादिष्ट है| ये बेटियां भो अपने पापा की परियां और राजकुमारी होती है जैसे तुम अपने पापा की हो। चेतना रोते हुए मोहन के सीने से लग गई और सोच रही थी इसीलिए हर लडकी अपने पति मे अपने पापा की छवि ढूंढती है। दोस्तों यही सच है हर बेटी अपने पिता के बडे करीब होती है या यूं कहे कलेजे का टुकड़ा इसीलिए शादी मे विदाई के समय सबसे ज्यादा पिता ही रोता है। इसीलिए हर पिता हर समय अपनी बेटी की फिक्र करता रहता है। फिर भी दिल हैं हिन्दुस्तानी

Laxmikant varshnay

Posted in खाना खजाना - રસોઈ

जोधपुर की गलियाँ……


नमस्कार
“जोधपुर की गलियां” ग्रुप विशुद्ध रूप से खानपान सम्बन्धी पोस्ट के लिए है…
सभी सम्मानित सदस्य कृपया इसका ख्याल रखते हुए अपनी पोस्ट करें…
आप सभी से सक्रिय योगदान की अपेक्षा है…
आभार..

जोधपुर की गलियाँ……

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