Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🙇‍♂🙇‍♂🙇‍♂🙇‍♂🙇‍♂🙇‍♂🙇‍♂🔥असली समझदार🔥*
एक गाँव में एक सेठ रहता था। एक बार राजा ने उसे चर्चा पर बुलाया। कुछ देर चर्चा के बाद राजा ने कहा –“महाशय, आप बहुत बड़े सेठ हैं, इतना बड़ा कारोबार है पर आपका लड़का इतना मूर्ख क्यों है ? उसे भी कुछ सिखायें। उसे तो सोने चांदी में मूल्यवान क्या है, यह भी नहीं पता।” यह कहकर राजा जोर से हंस पड़ा।सेठ को बुरा लगा, वह घर गया व लड़के से पूछा “सोना व चांदी में अधिक मूल्यवान क्या है ?”
“सोना”, बिना एक पल भी गंवाए लड़के ने कहा।
“तुम्हारा उत्तर तो ठीक है, फिर राजा ने ऐसा क्यूं कहा-? सभी के बीच मेरी खिल्ली भी उड़ाई।” लड़का बोला – “गाँव के पास ही मेरे स्कूल जाने के मार्ग पर राजा एक खुला दरबार लगाते हैं। मुझे देखते ही बुलवा लेते हैं। अपने एक हाथ में सोने का व दूसरे में चांदी का सिक्का रखकर, जो अधिक मूल्यवान है वह ले लेने को कहते हैं.. और मैं चांदी का सिक्का ले लेता हूँ। सभी ठहाका लगाकर हंसते हैं व मजा लेते हैं। ऐसा तक़रीबन हर दूसरे दिन होता है।”
“फिर तुम सोने का सिक्का क्यों नहीं उठाते, चार लोगों के बीच अपनी फ़जीहत कराते हो व साथ में मेरी भी !”लड़का हँसा व हाथ पकड़कर पिता को अंदर ले गया। कपाट से एक पेटी निकालकर दिखाई जो चांदी के सिक्कों से भरी हुई थी।
यह देख सेठ हतप्रभ रह गया लड़का बोला “जिस दिन मैंने सोने का सिक्का उठा लिया उस दिन से यह खेल बंद हो जाएगा।वो मुझे मूर्ख समझकर मजा लेते हैं तो लेने दें, यदि मैं बुद्धिमानी दिखाउंगा तो कुछ नहीं मिलेगा। आपका बेटा हूँ.. अक़्ल से काम लेता हूँ।”मूर्ख होना अलग बात है और मूर्ख समझा जाना अलग..

स्वर्णिम मौके का फायदा उठाने से बेहतर है…हर मौके को स्वर्ण में तब्दील करना।

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।। आनंदित रहने की कला ।।

एक राजा बहुत दिनों से विचार कर रहा था कि वह राजपाट छोड़कर अध्यात्म (ईश्वर की खोज) में समय लगाए । राजा ने इस बारे में बहुत सोचा और फिर अपने गुरु को अपनी समस्याएँ बताते हुए कहा कि उसे राज्य का कोई योग्य वारिस नहीं मिल पाया है । राजा का बच्चा छोटा है, इसलिए वह राजा बनने के योग्य नहीं है । जब भी उसे कोई पात्र इंसान मिलेगा, जिसमें राज्य सँभालने के सारे गुण हों, तो वह राजपाट छोड़कर शेष जीवन अध्यात्म के लिए समर्पित कर देगा ।

गुरु ने कहा, “राज्य की बागड़ोर मेरे हाथों में क्यों नहीं दे देते ? क्या तुम्हें मुझसे ज्यादा पात्र, ज्यादा सक्षम कोई इंसान मिल सकता है ?”

राजा ने कहा, “मेरे राज्य को आप से अच्छी तरह भला कौन संभल सकता है ? लीजिए, मैं इसी समय राज्य की बागड़ोर आपके हाथों में सौंप देता हूँ ।”

गुरु ने पूछा, “अब तुम क्या करोगे ?”

राजा बोला, “मैं राज्य के खजाने से थोड़े पैसे ले लूँगा, जिससे मेरा बाकी जीवन चल जाए ।”

गुरु ने कहा, “मगर अब खजाना तो मेरा है, मैं तुम्हें एक पैसा भी लेने नहीं दूँगा ।”

राजा बोला, “फिर ठीक है, “मैं कहीं कोई छोटी-मोटी नौकरी कर लूँगा, उससे जो भी मिलेगा गुजारा कर लूँगा ।”

गुरु ने कहा, “अगर तुम्हें काम ही करना है तो मेरे यहाँ एक नौकरी खाली है । क्या तुम मेरे यहाँ नौकरी करना चाहोगे ?”

राजा बोला, “कोई भी नौकरी हो, मैं करने को तैयार हूँ ।”

गुरु ने कहा, “मेरे यहाँ राजा की नौकरी खाली है । मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे लिए यह नौकरी करो और हर महीने राज्य के खजाने से अपनी तनख्वाह लेते रहना ।”

एक वर्ष बाद गुरु ने वापस लौटकर देखा कि राजा बहुत खुश था । अब तो दोनों ही काम हो रहे थे । जिस अध्यात्म के लिए राजपाट छोड़ना चाहता था, वह भी चल रहा था और राज्य सँभालने का काम भी अच्छी तरह चल रहा था । अब उसे कोई चिंता नहीं थी ।

इस कहानी से समझ में आएगा की वास्तव में क्या परिवर्तन हुआ ? कुछ भी तो नहीं! राज्य वही, राजा वही, काम वही; दृष्टीकोण बदल गया ।

इसी तरह हम भी जीवन में अपना दृष्टीकोण बदलें । मालिक बनकर नहीं, बल्कि यह सोचकर सारे कार्य करें की, “मैं ईश्वर कि नौकरी कर रहा हूँ” अब ईश्वर ही जाने । और सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दें । फिर ही आप हर समस्या और परिस्थिति में खुशहाल रह पाएँगे । आपने देखा भी होगा की नौकरों को कोई चिंता नहीं होती मालिक का चाहे फायदा हो या नुकसान वो मस्त रहते हैं । सब छोड़ दो वही जानें!!!!!!!!!

संजय गुप्ता

Posted in लक्ष्मी प्राप्ति - Laxmi prapti

आर्थिक स्थिति में उन्नति के लिए श्रीसूक्त का पाठ करें। श्रीसूक्त में 15 ऋचाएं हैं। प्रत्येक ऋचा अति शक्तिशाली होती है। हवन कुंड में अग्नि प्रज्वलित करें और श्रीसूक्त की प्रत्येक ऋचा के साथ आहुति दें। तत्पश्चात् थोड़ा जल आसन के नीचे छिड़कें और उस जल को माथे पर लगाएं।
दीपक को दोनों हाथों में लेकर अपने निवास स्थान के ऐसे स्थान पर आ जाएं , जहां से आकाश दिखाई देता हो। वहां मां लक्ष्मी से अपने घर की समृद्धि के लिए प्रार्थना करें। फिर उस दीपक को लेकर पूरे घर में घूम जाएं और अन्त में उसे पूजा स्थल में रख दें। इस प्रयोग से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं।

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((((((( श्रीजगन्नाथ जी कथा ))))))))
.एक बार भगवान श्री कृष्ण सो रहे थे और निद्रावस्था में उनके मुख से राधा जी का नाम निकला. पटरानियों को लगा कि वह प्रभु की इतनी सेवा करती है परंतु प्रभु सबसे ज्यादा राधा जी का ही स्मरण रहता है.
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रुक्मिणी जी एवं अन्य रानियों ने रोहिणी जी से राधा रानी व श्री कृष्ण के प्रेम व ब्रज-लीलाओं का वर्णन करने की प्रार्थना की. माता ने कथा सुनाने की हामी तो भर दी लेकिन यह भी कहा कि श्री कृष्ण व बलराम को इसकी भनक न मिले.
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तय हुआ कि सभी रानियों को रोहिणी जी एक गुप्त स्थान पर कथा सुनाएंगी. वहां कोई और न आए इसके लिए सुभद्रा जी को पहरा देने के लिए मना लिया गया.
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सुभद्रा जी को आदेश हुआ कि स्वयं श्री कृष्ण या बलराम भी आएं तो उन्हें भी अंदर न आने देना. माता ने कथा सुनानी आरम्भ की. सुभद्रा द्वार पर तैनात थी. थोड़ी देर में श्री कृष्ण एवं बलराम वहां आ पहुंचे. सुभद्रा ने अन्दर जाने से रोक लिया.
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इससे भगवान श्री कृष्ण को कुछ संदेह हुआ. वह बाहर से ही अपनी सूक्ष्म शक्ति द्वारा अन्दर की माता द्वारा वर्णित ब्रज लीलाओं को आनंद लेकर सुनने लगे. बलराम जी भी कथा का आनंद लेने लगे.
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कथा सुनते-सुनते श्री कृष्ण, बलराम व सुभद्रा के हृदय में ब्रज के प्रति अद्भुत प्रेम भाव उत्पन्न हुआ. उस भाव में उनके पैर-हाथ सिकुड़ने लगे जैसे बाल्य काल में थे. तीनों राधा जी की कथा में ऐसे विभोर हुए कि मूर्ति के समान जड़ प्रतीत होने लगे.
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बड़े ध्यान पूर्वक देखने पर भी उनके हाथ-पैर दिखाई नहीं देते थे. सुदर्शन ने भी द्रवित होकर लंबा रूप धारण कर लिया. उसी समय देवमुनि नारद वहां आ पहुंचे. भगवान के इस रूप को देखकर आश्चर्यचकित हो गए और निहारते रहे.
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कुछ समय बाद जब तंद्रा भंग हुई तो नारद जी ने प्रणाम करके भगवान श्री कृष्ण से कहा- हे प्रभु ! मेरी इच्छा है कि मैंने आज जो रूप देखा है, वह रूप आपके भक्त जनों को पृथ्वी लोक पर चिर काल तक देखने को मिले. आप इस रूप में पृथ्वी पर वास करें.
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भगवान श्री कृष्ण नारद जी की बात से प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि ऐसा ही होगा. कलिकाल में मैं इसी रूप में नीलांचल क्षेत्र में अपना स्वरूप प्रकट करुंगा.
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कलियुग आगमन के उपरांत प्रभु की प्रेरणा से मालव राज इन्द्रद्युम्न ने भगवान श्री कृष्ण, बलभद्र जी और बहन सुभद्रा जी की ऐसी ही प्रतिमा जगन्नाथ मंदिर में स्थापित करा

संजय गुप्ता

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“त्याग”
💗💗💗💗💗💗💗💗💗💗💗💗💗💗💗💗एक नई मिसाल ,जो आपकी आँखों में आँसू ला ही देगी
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।।नई सोच नई दिशा।।
एक घर के करीब से गुज़र रहा था अचानक मुझे घर के अंदर से एक दस साल के बच्चे की रोने की आवाज़ आई – आवाज़ में इतना दर्द था कि अंदर जा कर बच्चा क्यों रो रहा है यह मालूम करने से मैं खुद को रोक ना सका – अंदर जा कर मैने देखा कि माँ अपने बेटे को धीरे से मारती और बच्चे के साथ खुद भी रोने लगती –

मै ने आगे हो कर पूछा ऑन्टी क्यों बच्चे को मार रही हो जबकि खुद भी रोती हो…..

उसने जवाब दिया की आप तो जानते ही होंगे कि इसके पिताजी का देहांत हो गया है। हम बहुत गरीब हैं। उनके जाने के बाद मैं फैक्ट्री में मजदूरी करके घर और इसके पढ़ाई का खर्च बहुत कठिनाई के साथ उठाती हूँ यह देर से स्कूल जाता है और देर से घर आता है – जाते हुए रास्ते मे कहीं खेल कूद में लग जाता है और पढ़ाई की तरफ ज़रा भी ध्यान नहीं देता है जिसकी वजह से रोज़ाना अपनी स्कूल की यूनिफार्म गन्दी कर लेता है – मै ने बच्चे और उसकी माँ को थोड़ा समझाया और चल दिया…..

कुछ दिन ही बीते थे…एक दिन सुबह सुबह कुछ काम से सब्जी मंडी गया – तो अचानक मेरी नज़र उसी दस साल के बच्चे पर पड़ी जो रोज़ाना घर से मार खाता था –

क्या देखता हूँ कि वह बच्चा मंडी में घूम रहा है और जो दुकानदार अपनी दुकानों के लिए सब्ज़ी खरीद कर अपनी बोरियों में डालते तो उनसे कोई सब्ज़ी ज़मीन पर गिर जाती वह बच्चा उसे फौरन उठा कर अपनी झोली में डाल लेता –

मै यह माजरा देख कर परेशान हो रहा था कि चक्कर क्या है – मै उस बच्चे को चोरी चोरी फॉलो करने लगा –

जब उसकी झोली सब्ज़ी से भर गई तो वह सड़क के किनारे बैठ कर उसे ऊंची ऊंची आवाज़ें लगा कर बेचने लगा – मुंह पर मिट्टी गन्दी वर्दी और आंखों में नमी , ऐसा महसूस हो रहा था कि ऐसा दुकानदार ज़िन्दगी में पहली बार देख रहा हूँ कि अचानक एक आदमी अपनी दुकान से उठा जिसकी दुकान के सामने उस बच्चे ने अपनी नन्ही सी दुकान लगाई थी , उसने आते ही एक जोरदार धक्का मार कर उस नन्ही दुकान को एक ही झटके में रोड पर बिखेर दिया और बाज़ुओं से पकड़ कर उस बच्चे को भी उठा कर धक्का दे दिया –

वह बच्चा आंखों में आंसू लिए चुप चाप दोबारा अपनी सब्ज़ी को इकठ्ठा करने लगा और थोड़ी देर बाद अपनी सब्ज़ी एक दूसरे दुकान के सामने डरते डरते लगा ली –

भला हो उस दुकानदार का जिसकी दुकान के सामने इस बार उसने अपनी नन्ही दुकान लगाई उस ने बच्चे को कुछ नहीं कहा – थोड़ी सी सब्ज़ी थी ऊपर से दूसरी दुकानों से कम कीमत की थी इसलिए जल्द ही बिक गयी

और वह बच्चा उठा और बाज़ार में एक कपड़े वाले की दुकान में घुस गया और दुकानदार को वह पैसे देकर दुकान में पड़ा अपना स्कूल बैग उठाया और बिना कुछ कहे वापस स्कूल की ओर चल पड़ा । कौतूहल वश मैं भी उसके पीछे पीछे चल रहा था –

बच्चे ने रास्ते में अपना मुंह धोया और स्कूल चल दिया – मै भी उसके पीछे स्कूल चला गया –

जब वह बच्चा स्कूल गया तो एक घंटा लेट हो चुका था – जिस पर अध्यापक जी ने डंडे से उसे खूब मारा –

मैने जल्दी से जाकर अध्यापक जी को मना किया कि छोटा बच्चा है इसे मत मारो –

अध्यापक कहने लगे कि यह रोज़ाना एक डेढ़ घण्टे लेट से ही आता है मै रोज़ाना इसे सज़ा देता हूँ कि डर से स्कूल समय पर आए और कई बार मै इसके घर पर भी सुचना दे चुका हूं – खैर बच्चा मार खाने के बाद क्लास में बैठ कर पढ़ने लगा – मैने उसके शिक्षक का मोबाइल नम्बर लिया और घर की ओर चल दिया घर पहुंच कर ज्ञात हुआ कि जिस कार्य के लिए मैं सब्ज़ी मंडी गया था उसको तो भूल ही गया।

दूसरी ओर बच्चे ने घर आ कर माँ से एक बार फिर मार खाई – सारी रात मेरा सर चकराता रहा –

सुबह उठकर जल्दी से तैयार हुआ और ईश्वर की आराधना के उपरांत शिक्षक महोदय को मोबाइल पर फोन कर कहा कि हर हालत में तुरंत सब्जीमंडी पहुंचें। शिक्षक महोदय ने मेरे अनुरोध को स्वीकार किया।

बच्चे का स्कूल जाने का समय हुआ और बच्चा घर से सीधा सब्जीमंडी अपनी नन्ही सी दुकान की व्यवस्था करने चल पड़ा। मै ने उसके घर जाकर उसकी माँ को कहा कि ऑन्टी आप मेरे साथ चलो मै तुम्हे बताता हूँ आप का बेटा स्कूल क्यों देर से जाता है –

वह फौरन मेरे साथ क्रोध मे यह बड़बड़ाते हुए चल पड़ीं कि आज उस लड़के को छोडूंगी नहीं उसे आज बहुत मार मारूंगी। मंडी में बच्चे के शिक्षक भी आ चुके थे।

हम तीनों सब्जीमंडी के एक स्थान पर आड़ लेकर खड़े हो गए जहाँ से उस बच्चे को देखा जा सकता था लेकिन वो हमें नहीं और उस लड़के को छुप कर देखने लगे।
प्रतिदिन की भाँति उसको आज भी उसे काफी लोगों से डांट फटकार और धक्के खाने पड़े और आखिरकार वह लड़का अपनी सब्ज़ी बेच कर कपड़े वाली दुकान पर चल दिया। मेरी नज़र उसकी माँ पर पड़ी तो देखता हूँ कि वो बहुत ही दर्द भरी सिसकियां लेकर रो रही थी।

मै ने स्कूल के अध्यापक जी की ओर देखा तो बहुत करुणा के साथ उनके नेत्रों से अश्रु बह रहे थे। दोनो के रोने में मुझे ऐसा लग रहा था जैसे उन्हों ने बहुत बड़ा अपराध किया हो और आज उन को अपनी गलती का पछतावा हो रहा हो। मैंने दोनों को सांत्वना देते हुए वहां से विदा किया।

उसकी माँ रोते रोते घर चली गयी और अध्यापक जी भी सजल नेत्रों के साथ स्कूल चले गए।

पूर्व की भाँति बच्चे ने दुकानदार को पैसे दिए और आज उसको दुकानदार ने कपडे देते हुए कहा कि बेटा आज कपड़ों के सारे पैसे पूरे हो गए हैं।

बच्चे ने उन कपड़ों को पकड़ कर स्कूल बैग में रखा और स्कूल चला गया – आज भी एक घंटा लेट था वह सीधा आचार्य जी के पास गया और बैग डेस्क पर रखकर मार खाने के लिए अपने हाथ आगे कर दिए कि शिक्षक डंडे से उसे मार ले।

आचार्य अपनी कुर्सी से उठे और बच्चे को गले लगाकर सुबक पड़े कि मैं भी देख कर अपने आंसुओं पर नियंत्रण ना रख सका।

मै ने अपने आप को संभाला और आगे बढ़कर बच्चे से पूछा कि यह जो बैग में कपडे हैं वो है वह किसके लिए है – बच्चे ने रोते हुए जवाब दिया कि मेरी माँ फैक्ट्री में मजदूरी करने जाती है और उसके कपड़े फटे हुए होते हैं। कोई कपडा सही ढंग से तन ढांपने वाला नहीं और और हमारे माँ के पास पैसे नही हैं इसलिये इस दिवाली पर अपने माँ के लिए यह सलवार कमीज का कपडा खरीदा है।

मैंने बच्चे से पूछा तो यह कपडा अब घर ले जाकर माँ को दोगे ?

परंतु उसके उत्तर ने मेरे और उस बच्चे के शिक्षक के पैरों के नीचे से ज़मीन ही निकाल दी….

बच्चे ने जवाब दिया नहीं अंकल छुट्टी के बाद मैं इसे दर्जी को सिलाई के लिए दे दूँगा।

रोज़ाना स्कूल से जाने के बाद काम करके थोड़े थोड़े पैसे सिलाई के लिए दर्जी के पास जमा किये हैं ।

…. आचार्य जी और मैं यह सोच कर रोते जा रहे थे कि आखिर कब तक हमारे समाज में गरीबों और विधवाओं के साथ ऐसा होता रहेगा उन के बच्चे होली-दिवाली जैसी खुशियों को मानाने के लिए कठोर परीक्षाओं का परिश्रम के साथ सामना करते रहेंगे आखिर कब तक!

क्या ईश्वर ने इन जैसे गरीब अनाथ बच्चों और विधवाओं को त्योहारों को प्रसनन्ता के साथ मनाने का कोई हक नहीं दिया? क्या हम चन्द रुपयों का मन्दिर में चढ़ावा या दान दे कर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से हट सकते हैं?

क्या हम अपनी खुशियों के अवसरों पर अपनी व्यर्थ की इच्छाओं को कम कर थोड़े पैसे, थोड़ी खुशियां उनके साथ नहीं बाँट सकते?!!!
सोचना ज़रूर
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संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

कल बाज़ार में फल खरीदने गया, तो देखा कि एक फल की रेहड़ी की छत से एक छोटा सा बोर्ड लटक रहा था, उस पर मोटे अक्षरों से लिखा हुआ था…
“घर मे कोई नहीं है, मेरी बूढ़ी माँ बीमार है, मुझे थोड़ी थोड़ी देर में उन्हें खाना, दवा और टॉयलट कराने के लिए घर जाना पड़ता है, अगर आपको जल्दी है तो अपनी मर्ज़ी से फल तौल लें, रेट साथ में लिखे हैं।
पैसे कोने पर गत्ते के नीचे रख दें, धन्यवाद!!”
अगर आपके पास पैसे नहीं हो तो मेरी तरफ से ले लेना, इजाज़त है..!!

मैंने इधर उधर देखा, पास पड़े तराजू में दो किलो सेब तोले दर्जन भर केले लिये, बैग में डाले, प्राइस लिस्ट से कीमत देखी, पैसे निकाल कर गत्ते को उठाया, वहाँ सौ-पचास और दस-दस के नोट पड़े थे, मैंने भी पैसे उसमें रख कर उसे ढंक दिया।

बैग उठाया और अपने फ्लैट पे आ गया, रात को खाना खाने के बाद मैं उधर से निकला, तो देखा एक कमज़ोर सा आदमी, दाढ़ी आधी काली आधी सफेद, मैले से कुर्ते पजामे में रेहड़ी को धक्का लगा कर बस जाने ही वाला था, वो मुझे देखकर मुस्कुराया और बोला “साहब! फल तो खत्म हो गए।”

उसका नाम पूछा तो बोला: “सीताराम”
फिर हम सामने वाले ढाबे पर बैठ गए।
चाय आयी, वो कहने लगा, “पिछले तीन साल से मेरी माता बिस्तर पर हैं, कुछ पागल सी भी हो गईं है और अब तो फ़ालिज भी हो गया है, मेरी कोई संतान नहीं है, बीवी मर गयी है, सिर्फ मैं हूँ और मेरी माँ..!!
माँ की देखभाल करने वाला कोई नहीं है, इसलिए मुझे ही हर वक़्त माँ का ख्याल रखना पड़ता है”…

एक दिन मैंने माँ के पाँव दबाते हुए बड़ी नरमी से कहा, “..माँ!! तेरी सेवा करने को तो बड़ा जी चाहता है पर जेब खाली है और तू मुझे कमरे से बाहर निकलने नहीं देती, कहती है, तू जाता है तो जी घबराने लगता है, तू ही बता मै क्या करूँ?”
न ही मेरे पास कोई जमा पूंजी है।..

ये सुन कर माँ ने हाँफते-काँपते उठने की कोशिश की। मैंने तकिये की टेक लगवाई, उन्होंने झुर्रियों वाला चेहरा उठाया अपने कमज़ोर हाथों को ऊपर उठाया,
मन ही मन राम जी की स्तुति की फिर बोली..
“तू रेहड़ी वहीं छोड़ आया कर, हमारी किस्मत का हमें जो कुछ भी है, इसी कमरे में बैठकर मिलेगा।”

मैंने कहा, “माँ क्या बात करती हो, वहाँ छोड़ आऊँगा तो कोई चोर उचक्का सब कुछ ले जायेगा, आजकल कौन लिहाज़ करता है? और बिना मालिक के कौन फल खरीदने आएगा?”

कहने लगीं.. “तू राम का नाम लेने के बाद बाद रेहड़ी को फलों से भरकर छोड़ कर आजा बस, ज्यादा बक-बक नहीं कर, शाम को खाली रेहड़ी ले आया कर, अगर तेरा रुपया गया तो मुझे बोलियो!”

ढाई साल हो गए हैं भाईसाहब सुबह रेहड़ी लगा आता हूँ …शाम को ले जाता हूँ, लोग पैसे रख जाते हैं..
..फल ले जाते हैं, एक धेला भी ऊपर नीचे नहीं होता, बल्कि कुछ तो ज्यादा भी रख जाते हैं, कभी कोई माँ के लिए फूल रख जाता है, कभी कोई और चीज़!!

परसों एक बच्ची पुलाव बना कर रख गयी,
साथ में एक पर्ची भी थी “अम्मा के लिए!”

एक डॉक्टर अपना कार्ड छोड़ गए पीछे लिखा था,
‘माँ की तबियत नाज़ुक हो तो मुझे कॉल कर लेना,
मैं आ जाऊँगा, कोई ख़जूर रख जाता है, रोजाना कुछ न कुछ मेरे हक के साथ मौजूद होता है।

न माँ हिलने देती है न मेरे राम कुछ कमी रहने देते हैं, माँ कहती है, तेरे फल मेरा राम अपने फरिश्तों से बिकवा देता है।

आखिर में, इतना ही कहूँगा की अपने मां -बाप की सेवा करो, और देखो दुनिया की कामयाबियाँ कैसे हमारे कदम चूमती हैं।…

अगर मेरे द्वारा इस पोस्ट की पुनरावृति हुई हो तो मैं क्षमा चाहता हूं… परंतु पोस्ट इतनी अच्छी है कि प्रेषित करने से स्वयं को रोक नहीं पाया।🙏🙏

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

बहराइच जिले में दरगाह का मेला आरम्भ हो गया है!!!

उसी सैयद सालार मसूद गाज़ी की याद में ये मेला प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है जो महमूद गजनवी का भांजा था और महमूद गजनवी द्वारा भारत से लूटी हुई अकूत दौलत की चकाचौंध ने उसे भारत पर कब्ज़े के लिए उकसाया था पर इससे भी बड़ा उसका मकसद था सम्पूर्ण भारत से काफिरों अर्थात गैर मुस्लिमों का खात्मा कर पूर्ण रूप से इस्लामिक बनाना। काफ़िर स्त्रियों को सेक्स स्लेव बनाकर पूरी दुनिया में बेचना ( जो आज भी यज़ीदियों के साथ हो रहा है) और धन दौलत कमाना। इसके लिए वो अफगानिस्तान से दो लाख की सेना लेकर भारत आया और पंजाब के अनेकों राजाओं को हराता हुआ उत्तर प्रदेश आया। जहां कहीं भी उसे विजय मिली उसने बेहद क्रूरता से हिंदुओं का कत्लेआम किया। उसका प्रिय शौक था हिंदुओं के सिर कटवाकर उसकी मीनार बनवाना और उस पर बैठ कर गाज़ी की उपाधि धारण करना। बहराइच में आकर उसका सामना बेहद पराक्रमी राजा सुहेलदेव पासी की संगठित सेना से हुआ। सुहेलदेव पासी के पराक्रम और कुशल रणनीति के आगे सैयद सालार मसूद गाज़ी की एक न चली और वो राजा सुहेलदेव के हाथों मारा गया उसकी दो लाख की सेना डेढ़ लाख की हिंदुओं की फौज से बुरी तरह परास्त हुई। और इस तरह राजा सुहेलदेव ने सम्पूर्ण भारत को इस्लामिक देश होने से बचा लिया और हिंदुओं को गौरव प्रदान किया। इस युद्ध की गणना विश्व के भीषणतम युद्ध में की जाती है। युद्ध इतना भीषण था कि दोनों तरफ के युद्धबन्दी तक काट दिये गए थे। ऐसे आतताई का अंत कोई मामूली विजय नहीं थी।

पर आपको ये जानकर ताज्जुब होगा कि राजा सुहेलदेव की मूर्ति, फोटो या तैलचित्र आपको बहराइच तो क्या पूरे भारत में कहीं नहीं मिलेगा उनसे सम्बन्धित इतिहास और साहित्य कहीं नहीं मिलेगा। उनसे सम्बन्धित शिलालेख तक कहीं नहीं है। यहां तक कि बहराइच के 75 प्रतिशत हिंदुओं तक को राजा सुहेलदेव के बारे में कुछ नहीं पता कि बहराइच में कोई इस नाम के राजा भी थे। उनके बारे में जानकारी बूढ़े बुजुर्गों से ही सुनने को मिलेंगी कि वो पृथ्वीराज चौहान के समान ही बेहद वीर, पराक्रमी, बुद्धिमान और आकर्षक थे और युद्ध कौशल में बेहद निपुण थे।

इसके विपरीत सैयद सालार मसूद गाज़ी का मेला दिन प्रतिदिन भव्य होता जा रहा है।उनसे सम्बन्धित साहित्य और जानकारी भी बूढ़े मुस्लिमों के पास सुरक्षित है और प्रत्येक वर्ष इस पर व्यय होने वाली धनराशि बढ़ती ही जा रही है। प्रतिदिन उनकी मज़ार पर चादर चढ़ाई जाती है, लोबान सुलगता है, इत्र छिड़काव होता है, उनके सम्मान में जलसों का आयोजन होता है। इसी तरह मसूद गाज़ी के सेनापति की मजार को भी यही सम्मान मिलता है जिसकी मज़ार घण्टाघर के पास सड़क के किनारे है।

यहां हिन्दू और मुस्लिम मानसिकता में फर्क देखिये सैयद सालार मसूद गाज़ी हारा हुआ शासक था और सुहेलदेव के हाथों मारा गया था पर मुसलमान इतना सम्मान उसे इसलिये देते हैं क्योंकि उसने लाखों हिंदुओं का कत्ल किया था और भारत को इस्लामिक बनाने के लिए उसने अपना जीवन दांव पर लगाया था, बड़ी संख्या में धर्मांतरण करवाया था। वहीं हिंदुओं में राजा सुहेलदेव जैसे योद्धा का कोई सम्मान नहीं है जिसने उनकी प्राण रक्षा की, मुगलों का गुलाम होने से बचाया….और सबसे बड़ा दुख इस बात का है कि खुद हिन्दू भी सैयद सालार मसूद गाज़ी की दरगाह पर मन्नंत मांगने खड़े हो जाते हैं।
कल को मुस्लिम इतिहासकार ये भी कह सकते हैं कि राजा सुहेलदेव का कोई अस्तित्व कभी था ही नहीं और ये हिंदुओं की कल्पना मात्र की उपज है।

10 जून- विजय_दिवस हिन्दू सम्राट राजा सुहेल देव।

आज ही के दिन हिन्दू सम्राट राजा सुहेल देव ने चीर दी थी भारत को हिन्दू विहीन करने आये आक्रान्ता “सालार गाजी” की छाती

ये वही जगह है जहाँ आज हर दिन कईयों की इबादतगाह का स्वरूप ले लिया है और मन्नत और दुआओं का केंद्र .. अफ़सोस कईयों को अपना इतिहास ही नहीं पता है .. उन्हें नहीं पता की हमारे पूर्वजो का गौरवशाली अतीत क्या रहा है और अपने सर को जहाँ भी पाया झुका दिया .. ये इतिहास भी उसकी एक छोटी सी कड़ी है . इस्लामिक आक्रान्ता सालार मसूद को बहराइच (उत्तर प्रदेश) में उसकी एक लाख बीस हजार सेना सहित वहीँ दफन कर देने वाले महान हिन्दू योद्धा राजा सुहेलदेव का जन्म श्रावस्ती के राजा त्रिलोकचंद के वंशज पासी मंगलध्वज (मोरध्वज) के घर में माघ कृष्ण 4, विक्रम संवत 1053 (सकट चतुर्थी) को हुआ था। अत्यन्त तेजस्वी होने के कारण इनका नाम सुहेलदेव (चमकदार सितारा) रखा गया। जैसा कि पहले भी कई बार कहा जा चुका है कि चाटुकार इतिहासकारों ने भारत के गौरवशाली हिन्दू इतिहास को शर्मनाक बताने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है.

क्रूर, अत्याचारी और अनाचारी मुगल शासकों के गुणगान करने में इन लोगों को आत्मिक सुख की अनुभूति होती है। लेकिन यह मामला उससे भी बढ़कर है, एक मुगल आक्रांता, जो कि समूचे भारत को हिन्दू विहीन बनाने का सपना देखता था विक्रम संवत 1078 में इनका विवाह हुआ तथा पिता के देहांत के बाद वसंत पंचमी विक्रम संवत 1084 को ये राजा बने। इनके राज्य में आज के बहराइच, गोंडा, बलरामपुर, बाराबंकी, फैजाबाद तथा श्रावस्ती के अधिकांश भाग आते थे। बहराइच में बालार्क (बाल अर्क = बाल सूर्य) मंदिर था, जिस पर सूर्य की प्रातःकालीन किरणें पड़ती थीं। मंदिर में स्थित तालाब का जल गंधकयुक्त होने के कारण कुष्ठ व चर्म रोग में लाभ करता था। अतः दूर-दूर से लोग उस कुंड में स्नान करने आते थे। महमूद गजनवी ने भारत में अनेक राज्यांे को लूटा तथा सोमनाथ सहित अनेक मंदिरों का विध्वंस किया। उसकी मृत्यु के बाद उसका बहनोई सालार साहू अपने पुत्र सालार मसूद, सैयद हुसेन गाजी, सैयद हुसेन खातिम, सैयद हुसेन हातिम, सुल्तानुल सलाहीन महमी, बढ़वानिया,सालार, सैफुद्दीन, मीर इजाउद्दीन उर्फ मीर सैयद दौलतशाह, मियां रज्जब उर्फ हठीले, सैयद इब्राहिम बारह हजारी तथा मलिक फैसल जैसे क्रूर साथियों को लेकर भारत आया। बाराबंकी के सतरिख (सप्तऋषि आश्रम) पर कब्जा कर उसने अपनी छावनी बनायी।

यहां से पिता सेना का एक भाग लेकर काशी की ओर चला; पर हिन्दू वीरों ने उसे प्रारम्भ में ही मार गिराया। पुत्र मसूद अनेक क्षेत्रों को रौंदते हुए बहराइच पहुंचा। उसका इरादा बालार्क मंदिर को तोड़ना था; पर राजा सुहेलदेव भी पहले से तैयार थे। उन्होंने निकट के अनेक राजाओं के साथ उससे लोहा लिया। कुटिला नदी के तट पर हुए राजा सुहेलदेव के नेतृत्व में हुए इस धर्मयुद्ध में उनका साथ देने वाले राजाओं में प्रमुख थे रायब, रायसायब, अर्जुन, भग्गन, गंग, मकरन, शंकर, वीरबल, अजयपाल, श्रीपाल, हरकरन, हरपाल, हर, नरहर, भाखमर, रजुन्धारी, नरायन, दल्ला, नरसिंह, कल्यान आदि। वि.संवत 1091 के ज्येष्ठ मास के पहले गुरुवार के बाद पड़ने वाले रविवार आज ही के दिन (10.6.1034 ई.) को राजा सुहेलदेव ने उस आततायी का सिर धड़ से अलग कर दिया।

तब से ही क्षेत्रीय जनता इस दिन चित्तौरा (बहराइच) में विजयोत्सव मनाने लगी। इस विजय के परिणामस्वरूप अगले 200 साल तक मुस्लिम हमलावरों का इस ओर आने का साहस नहीं हुआ। पिता और पुत्र के वध के लगभग 300 साल बाद दिल्ली के शासक फीरोज तुगलक ने बहराइच के बालार्क मंदिर व कुंड को नष्ट कर वहां मजार बना दी। अज्ञानवश हिन्दू लोग उसे सालार मसूद गाजी की दरगाह कहकर विजयोत्सव वाले दिन ही पूजने लगे, जबकि उसका वध स्थल चित्तौरा वहां से पांच कि.मी दूर है। कालान्तर में इसके साथ कई अंधविश्वास जुड़ गये। वह चमत्कारी तालाब तो नष्ट हो गया था; पर एक छोटे पोखर में ही लोग चर्म रोगों से मुक्ति के लिए डुबकी लगाने लगे। ऐसे ही अंधों को आंख और निःसंतानों को संतान मिलने की बातें होने लगीं।
इसी मूर्खता को देखकर तुलसी बाबा ने कहा था – लही आंख कब आंधरो, बांझ पूत कब जाय कब कोढ़ी काया लही, जग बहराइच जाय।। उ0प्र0 की राजधानी लखनऊ में राजा सुहेलदेव की वीर वेष में घोड़े पर सवार मनमोहक प्रतिमा स्थापित है। आज महाराजा सुहेलदेव जी के उस विजयोतसव पर तमाम धर्मनिष्ठ जनता को शुभकामाएं देते हुए इस पावन दिन के असल स्वरूप को सुदर्शन परिवार ने सबके आगे रखा है . जन मानस को इस पावन और गौरवशाली दिवस की शुभकामना